०४ विनप्रभसूरि-श्रेणिकचरित

व्याकरण के निरूपण में श्रेणिकचरित्र में कातन्त्रव्याकरण का आधार लिया गया है। प्रथम सर्ग में पाँचों सन्धियों के रूप प्रदर्शित हैं। आरम्भ में ही उपोद्घात के साथ-साथ संज्ञा-प्रकरण का निर्वाह कुशलता से कवि ने कर दिया है। उदाहरण के लिये - देशोऽस्ति मगधाभिख्यो यत्र मजुस्वरा नराः। समानश्रीसवर्णश्रीयुक्ता हस्वेतराशयाः।। (११) प इसमें मगध देश और उसके निवासियों के परिचय के साथ-साथ समान संज्ञा, सवर्ण संज्ञा तथा इस्व संज्ञा का परिचय भी दिया गया है। इसी प्रकार सन्धि के प्रतिपादन में हल-ईषा, लाङ्गल-ईषा, मनस्-ईषा, ऋण-ऋण, वसन-ऋण, कम्बल-ऋण, दश-ऋण, वत्सतर-ऋण इनके सन्धि-रूपों को इस प्रकार मगध के निवासियों की सम्पन्नता के वर्णन में एक साथ प्रयुक्त किया गया है– AREE अत्र प्रिय हलीषानां लागलीषैश्चतुष्टये। पुण्यसाधनसामथ्री मनीषाशालिनां भवेत्। तक का विम ऋणार्ण वसनाणं च कम्बलाणं दशार्णवत्। प्रार्णवत्सतराणे वा विद्यन्ते नात्र कस्यचित्।। (91१५, १७) प्रतिनिार “रचनाकाल वि.सं. १३५६ (१२EE ई.)। परिचय के लिये जैन महाकाव्य विषयक अध्याय देखें।‘काया मारक काव्य-खण्ड कार मानव चौथे सर्ग में समास, पाँचवें में तद्धित, छठे में आख्यात का निरूपण किया गया है। आख्यात का विशद निरूपण ग्यारहवें सर्ग तक कवि ने किया है। व्याकरण पक्ष पर आग्रह प्रबल होने के कारण इस महाकाव्य में रसात्मकता की क्षति हुई है, तदपि विनप्रभसूरि एक समर्थ कवि हैं। पाँचवें सर्ग में महावीर स्वामी की देशनाओं का वर्णन उन्होंने बड़े मनोयोग से किया है और शान्त रस की निष्पत्ति की दृष्टि से यह प्रसंग प्रभावकारी है। इस महाकाव्य की एक विशेषता शान्त के साथ-साथ भक्तिभाव की सरस अभिव्यक्ति कही जा सकती है। वनपाल के मुख से गुणशील चैत्य में महावीर स्वामी के आगमन की बात को सुनकर श्रेणिक का मन भक्तिभाव से उच्छ्वसित हो जाता है सोऽङ्गभङ्गमभिव्यंजन पुलक स्फारतां पुनः।। बभार प्रतिचेतोऽनु नेत्रं परिमनोरथान् ।। जागिर वर्ण वर्ण प्रति प्रीतः सोऽभूत परिपदं पदम्। वाक्यं वाक्यं चानु तस्य वचः सुप्रियशंसिनः।। यहाँ वस्तुतः राजा के देह में रोमांच, आँखों में चमक आदि अनुभावों, हर्ष, आवेग आदि संचारी भावों तथा महावीर प्रभु के आगमन की वार्ता के आलम्बन से भक्तिरस की अभिव्यंजना कवि ने की है