कवि-परिचय
‘रावणार्जुनीयम्’ के रचयिता कविश्रेष्ठ-भट्टभीम के जीवन वृत्तान्त एवं स्थितिकाल के विषय में अद्यावधि सर्वथा प्रामाणिक एवं निर्धान्त सूचना यद्यपि उपलब्ध नहीं है, तथापि काव्य की पुष्पिका से प्राप्त संकेत से जो सूचना प्राप्त होती है, तदनुसार कवि परिचय इस प्रकार है नाम :- काव्यमाला ६८ में प्रकाशित इस काव्य को देखने से यह ज्ञात होता है कि रावणार्जुनीयम्’ के रचयिता कवि का नाम भट्टभीम अथवा भीमभट्ट था। इन दो नामों के अतिरिक्त इस कवि के श्लोक भट्टभौम, भूमभट्ट, भूभट्ट, भीम, भू तथा भौमक नामों से विभिन्न काव्यों एवं ग्रन्थों में उद्धृत हुए हैं। क्षेमेन्द्र ने भी इस कवि को भौम या भौमक नाम से स्मरण किया है। काव्यमाला संस्करण की पुष्पिका में रचनाकार का नाम भूमभट्ट दिया गया है। स्थान :- सौभाग्य से कवि ‘भट्टभीम’ के निवास स्थान एवं देश के विषय में निश्चित एवं प्रामाणिक सूचना उपलब्ध है। ‘रावणार्जुनीयम्’ की पुष्पिका - “कृतिस्तत्रभवतो महाप्रभावश्रीशारदा देशान्तर्वर्तिवल्लभीस्थाननिवासनो भूमभट्टस्येति शुभम्। वल्लभी स्थानं उडू इति ग्रामो वराहमूलोपकण्ठस्थितः”- से यह स्पष्ट हो जाता १. काव्यमाला ६८ में प्रकाशित २२२ मार का काव्य-खण्ड मिया है कि कवि भट्टभीम शारदादेश के ‘उडू’ नामक स्थान के निवासी थे जो-वराहमूल के समीप में स्थित था। इतिहासवेत्ता श्री एन.एल.डे. के अनुसार शारदा नामक यह स्थान कश्मीर में कामराज के समीप किसनगंगा के तट पर स्थित ‘सारदी’ है। श्री डे. के अनुसार ‘वराहमूल’ कश्मीर का प्रसिद्ध ‘बारामूला’ नामक स्थान है। कालः-कविश्रेष्ठ भट्टभीम के स्थितिकाल के विषय में किसी पुष्ट प्रमाण के प्राप्त न होने से इस विषय में विद्वानों में मतैक्य का अभाव है। विभिन्न तो एवं अन्तः प्रमाणों के आधार पर इनके स्थितिकाल-निर्धारण का प्रयास किया गया है। यतः क्षेमेन्द्र ने सुवृत्ततिलक में कवि भौमक का नामोल्लेख किया है। अतः ए.बी. कीथ एवं विण्टरनित्स आदि पा-चात्त्य विद्वानों ने ‘रावणार्जुनीयम्’ की रचना ११वीं शती के पूर्व की निर्धारित की है। कुछ विद्वानों के अनुसार ‘काशिका’ के व्याकरणविषयक नियमों का स्पष्ट प्रभाव ‘रावणार्जुनीयम्’ में परिलक्षित होने के कारण इसका रचनाकाल ‘काशिका’ के अनन्तर का होना चाहिये। काशिकाकार जयादित्य का समय विद्वानों ने वि.सं. ७१८ (६६१ ई.) निर्धारित किया है। अतः राबणार्जनीयम का रचनाकाल इसी समय के लगभग का होना चाहिए। कुछ विद्वानों ने “रावणार्जुनीयम्’ के सप्तम सर्ग के श्लोक ‘उदगात्कठकालापं प्रत्यष्ठात्कठकौथुमम्। येषां यज्ञे द्विजातीनां तद्विघातिभिरन्वितम्"।। (७४) के पूर्वार्ध के महाभाष्य एवं काशिका में उपलब्ध होने से इसके रचनाकाल को भाष्य से भी प्राचीन माना है, परन्तु यह उचित नहीं प्रतीत होता। यह सम्भव है कि भाष्य एवं काशिका के अर्धश्लोक को कवि ने पूर्णस्वरूप प्रदान कर अपने काव्य में संग्रह कर लिया हो। यद्यपि कोई भी प्रमाण कविकालनिर्धारण का सर्वमान्य आधार नहीं प्रदान कर पाता है, तथापि यह कहा जा सकता है कि ‘रावणवध’ काव्य की रचना के आसपास का समय ही ‘रावणार्जुनीयम्’ का भी रचनाकाल हो सकता है।
रावणार्जुनीयम् की विषयवस्तु
महाभारतीय कार्तवीर्यार्जुन एवं रावण के युद्ध की कथा को आधार बनाकर विरचित इस महाकाव्य का कलेवर २७ सों में विभक्त है। इस काव्य में सहस्रार्जुन एवं रावण की कथा तो प्रायः गौण ही है। प्राधान्य तो कवि द्वारा पाणिनीयाष्टाध्यायी के ३२ पादों में से ३० पादों में पठित सूत्रों के उसी क्रम से उदाहरण उपस्थापित करने में ही है। कवि ने प्रथम अध्याय के प्रथम पाद को संज्ञा-परिभाषात्मक होने के कारण तथा षष्ठ अध्याय के द्वितीय पाद को वैदिक स्वरों से सम्बद्ध होने के कारण परित्याग कर शेष ३० पादों को अपने काव्य के २७ सर्गों में उदाहृत किया है। कवि ने अपने काव्य के सर्गों का नामकरण भी ‘गाकुटादिपाद, भूवादिपाद, आकडारादिपाद’, इस प्रकार पाणिनीय सूत्रों के अनुसार ही किया है। शास्त्रकाव्य, सन्धानकाव्य, चित्रकाव्य तथा यमककाव्य छन्दः प्रयोग : ‘रावणार्जुनीयम्’ महाकाव्य में यद्यपि इन्द्रवजा, अनुष्टुप् आदि लौकिक छन्दों का प्रयोग प्राप्त होता है, तथापि बाहुल्य त्रिष्ट्रप, जगती, पंक्ति, उष्णिक आदि वैदिक छन्दों का ही परिलक्षित होता है। पाणिनीयाष्टाध्यायीकमेण सूत्रों के उदाहरणों के क्रमिक उपस्थापनरूपी अतिक्लिष्ट कार्य में दत्तावधान कवि से यत्र-तत्र छन्दोभंग भी हो गया है। परन्तु कविदृष्टि तो सूत्रों के उदाहरणोपस्थापन में ही संलग्न परिलक्षित होती है। अगर ‘यतश्च निर्धारणम्’ सूत्र के उदाहरण रूप में कवि द्वारा विरचित श्लोक द्रष्टव्य है लब्या युवानो विहतान्धकारां निशां निशानां परमां सचन्द्राम्। सुहृत्समेता रमयांबभूवुः । पानवामान सयौवनाः स्त्रीः सुमनोरमायाः।। (६५६) - - रात्रि में युवाओं के द्वारा युवतियों के साथ क्रीडा के इस वर्णन में काव्य को दुर्बोध बनाये बिना विभक्ति-प्रयोग के नियम को समझाया गया है।