०२ भट्टिकाव्य

अश्वघोष एवं कालिदास के पश्चात् साहित्य में एक सौशब्य की जो प्रवृत्ति पनपी, उसका प्रथम निदर्शन भट्टिकाव्य है। साहित्य को विद्वानों का उत्सव मानने वाला यह काव्य संस्कृत के वैदुष्यपूर्ण काव्य का प्रतिनिधि है। भट्टिकाव्य केवल व्याकरण का शुष्क काव्य नहीं है, परन्तु व्याकरण के चुने एवं महत्त्वपूर्ण अंश, पूरी अलंकार-व्यवस्था तथा भाषासमन्वय (भाषासम) की प्रवृत्ति को अभिव्यक्त करता है, जिसमें काव्यशास्त्र तथा भाषाशास्त्र की सभी विधाएँ समन्वित हैं। लोक में प्रचलित एवं कम प्रचलित अनेक धातुओं का संकलन भट्टि ने तिङन्तकाण्ड में किया है जो संस्कृत धातुओं के इतिहास में भी महत्त्वपूर्ण है। मा

भट्टि का व्यक्तित्व

भट्टि एक विद्वान् कवि था जिसने संहिताओं, आश्वलायन एवं बौधायन गृह्यसत्रों से साम्य रखने वाले विचार, रामायण, अर्थशास्त्र, शकुनशास्त्र, संगीत एवं नृत्य इत्यादि कई शास्त्रों का अध्ययन किया। इसके अतिरिक्त पाणिनि के सूत्रों का, कात्यायन के वार्तिक एवं श्रृंखला में उपलब्ध होने वाले धातुओं का प्रयोग भट्टिकाव्य में किया। भट्टि स्त्रियों, पशु-पक्षियों, वीरों एवं कामभावनाओं का चित्रण करने में निष्णात है। इसके अतिरिक्त रामायण, महाभारत में मिलने वाली कई कथाओं का अन्तर्गुम्फन भी इस काव्य में उपलब्ध होता है। सिंह की जाति के वर्णन के सन्दर्भ में भट्टि २.६ तथा वसन्तसमयस्वभावाख्यानम् भट्टि २.१६ को अनेक सुभाषित-ग्रन्थों में उद्धृत किया गया है।

भट्टिकाव्य के व्याख्याकार

भट्टिकाव्य के प्रमुख व्याख्याकार अनिरुद्ध, कन्दर्पशर्मन् (१२५० ई.), केशवशर्मन्, कुमुदानन्द, जयमंगल (+९०० ई.), नारायण विद्याविनोद, पुण्डरीकाक्ष, पेडंडभट्ट, भट्टिकाव्य टीका (अज्ञात), भट्टिकाव्यविमर्श (अज्ञात), मट्टिकाव्य टीका (अज्ञात), भरतमल्लिक (१७६० ई.), मल्लिनाथ (१४०० ई.), राघव (शक सं. १७२१), २१८ रामचन्द्र, रामचन्द्र वाचस्पति की सुबोधिनी, विद्याविनोद की भट्टिकाव्यचन्द्रिका (१२०० ई. के बाद), विद्यासागर, वैजयन्ती, श्रीधर, श्रीनाथ (१३३० ई.) तथा श्रीनिवास हैं। इनके अतिरिक्त पट्टार (१६४६) ने भट्टिकाव्य के अनेक मलयालम हस्तलेखों की त्रिचूर में होने की सूचना दी है।

भट्टि का काल

भट्टि (२०.३५) ने स्वयं को वलभी के नरेन्द्र श्रीधरसेन का आश्रित बताया है। वलभी के इतिहास में चार श्रीधरसेन हुए। मट्टि ने अपने आश्रयदाता के लिए नरेन्द्र, नृप एवं क्षितिप शब्दों का प्रयोग किया है। क्योंकि शिलालेखों में श्रीधरसेन चतुर्थ को प्रभावशाली नृप बताया गया है अतएव के.पी. त्रिवेदी (१८६७) सी.बी. वैद्य (१९२१) तथा के.सी. पारिख (१E३८) भट्टि को उसका समकालिक मानते हैं। शिलालेखों में प्रयुक्त विशेषण भट्टि के काल नो निर्धारित करने के लिए महत्त्वपूर्ण है। श्रीधरसेन प्रथम अपने आपको सेनापति, श्रीधरसेन द्वितीय महाराज, सामन्त तथा महासामन्त तथा श्रीधरसेन चतुर्थ परम भट्टारक, महाराजाधिराज, परमेश्वर तथा चक्रवर्ती बताते हैं। भट्टि के द्वारा प्रयुक्त शब्दों से स्पष्ट है कि श्रीधरसेन को भट्टि के काल तक चक्रवर्ती पद प्राप्त न हुआ था। अतः भट्टि श्रीधरसेन द्वितीय के काल में ही रहा होगा। श्रीधरसेन द्वितीय शैव था जिसका प्रभाव भट्टि के धर्म पर भी पड़ा। श्रीधरसेन द्वितीय के पश्चात् भागवत एवं बौन्द मत को भी प्रोत्साहन दिया गया। इससे सिद्ध होता है कि इस प्रोत्साहन से पूर्व ही भट्टि का काल रहा होगा। यदि चामा निस्सन्देह भामह ने भहि (२२.३४) को काव्यालंकार (१.२०) में शब्दशः ग्रहण किया है। भट्टि (दशम सर्ग) के अलंकारों को भी भामह (२.१०) ने उल्लिखित किया है। इससे सिद्ध होता है कि भट्टिकाव्य भामह (७००-७५० ई.) से पूर्व लिखा गया। भट्टि (५.१८) एवं भामह (२.३१) एक-एक श्लोक का भी साम्य है। भामह ने (६.६२) पाणिनीय व्याकरण के अनुकम से लिखे जाने वाले काव्य पर विस्मय प्रकट किया है। श्रीशचन्द्र सक्रवर्ती (१९१३) के अनुसार जयादित्य (६६१ ई.) को भट्टि का ज्ञान था। इन सब तर्को से सिद्ध होता है कि भट्टि लगभग ५७० ई. में श्रीधरसेन द्वितीय के राज्यकाल में हुए।

शैली एवं भाषा

भट्टि ने स्वयं अपने काव्य को व्याख्यागम्य बताते हुए विद्वानों का उत्सव तथा बुद्धिहीनों का घात कहा है (भट्टि २२.३४)। क्षेमेन्द्र ने इस कवि को नाम्ना उद्धृत करते हुए इसके काव्य को काव्यशास्त्र बताया है। परम्परा में अष्टाध्यायी को जगन्माता, अमरकोष को जगत्पिता तथा भट्टिकाव्य को गणेश कहा है। न भट्टिकाव्य रामायण की कथा पर आधारित है, तथापि व्याकरण के उदाहरणों के लिए तथा विस्तार को ध्यान में रखते हुए परिवर्तन किये गये हैं। लगभग बीस स्थानों पर भट्टि ने रामायण की कथा को छोड़ दिया है। लुट् लकार के लिए तथा महाकाव्य के वर्णनों के लिए भट्टि ने कुछ नूतन स्थितियों की उद्भावना की है। लगभग तीस स्थानों पर पात्रों का अलग घटनाक्रम का व्यत्यय भट्टि ने किया है। कुछ पात्रों के धर्म का परिवर्तन भट्टि ने व्यक्तिगत धर्म के आधार पर भी किया है यथा दशरथ का त्र्यम्बक का उपासक होना। शास्त्रकाव्य, सन्धानकाव्य, चित्रकाव्य तथा यमककाव्य २१ महाका च की दृष्टि से यद्यपि पश्चाद्धती काव्य-शास्त्रियों के द्वारा प्रतिपादित महाकाव्य के लक्षणों का पूर्णरूप से निर्वाह भट्टिकाव्य में नहीं हुआ है, तथापि इसका पूर्ण अभाव भी नहीं है। धीरोदात्त नायक, उद्धत प्रतिनायक, सर्ग में अन्त वाले छन्द का परिवर्तन, नगर का वर्णन, शरद्वर्णन, आश्रम का वर्णन मट्टिकाव्य में उपलब्ध होता है। युद्धवर्णन का भट्टिकाव्य में राहुल्य है। श्रृंगार रस (विप्रलम्भ एवं सम्भोग) करुण-रौद्र, बीभत्स, वीर एवं शान्त रस भी उपलब्ध होते हैं। परन्तु इन रसों में व्याकरण का व्यवधान अधिक है और रस की परिपक्वता कम। रसों के अनुकूल शब्दावली भी उपलब्ध नहीं होती, क्योंकि च्याकरणपरक कृत्रिम शब्दों का बाहुल्य है। कथानक की दृष्टि से भट्टि सतर्क है और व्याकरण के बाहुल्य का परिहार करने के लिये असंकीर्ण अर्थात् व्याकरण रहित पद्यों का निर्माण भी करता है। कई बार किसी विशेष रूप के उदाहरणों को प्रस्तुत करने के लिए भट्टि को कथानक में एक विशेष परिवर्तन लाना पड़ता है। उदाहरणतः लुट्लकार (भट्टि सर्ग २२) के उदाहरण देने के लिए भट्ट को भविष्यत् घटनाओं की कल्पना करनी पड़ी जो कि मूल कथानक का परिवर्तित रूप है। भट्टि के कथानक की प्रशंसा हूयकास (१९५७) ने इन शब्दों में की है- “बीस यमक एवं तिरपन अलंकारों के उदाहरणों के होते हुए भी रामायण के कथानक को कोई क्षति नहीं पहुंची। य ही श्लेष, प्रसाद, समता, ओज एवं कान्ति-गुणों के विद्यमान होने के कारण भट्टि को वैदर्भी शैली के वर्ग का कहा जा सकता है। भट्टिकाव्य में समासों का प्राचुर्य नहीं है। प्रसाद गुण का प्रशसंक होने के कारण भट्टि ने स्वयं प्रसन्न काण्ड की रचना की। प्रसाद गुण का तिङन्तकाण्ड में भी अभाव नहीं है। कवि की विचारधारा में प्रवाह है और वह कथानक की गति के अनुसार शब्दावली, अनुप्रास अथवा यमकों की रचना कर सकता है। उदाहरणतः परशुराम के रौद्ररूप के लिए वह क्लिष्ट एवं कठोर शब्दों का निर्माण कर सकता है : विशङ्कटो वक्षसि बाणपाणिः सम्पन्नतालद्वयसः पुरस्तात्। - भीष्मो धनुष्मानुपजान्वरलिरैति स्म रामः पथि जामदग्न्यः।। नाम (भट्टि. २.५०) यद्यपि अलंकारों का मट्टिकाव्य में बाहुल्य है तथापि वे सुन्दर बन पाए हैं - तितीर 5 अवसितं हसितं प्रसितं मुदा विलसित हसितं स्मरभासितम्। नशा न समदाः प्रमदा हतसम्मदाः पुरहितं विहितं न समीहितम् ।। (मट्टि, १०.६)मा इसी प्रकार किसी विशेष पात्र के साथ सम्बद्ध गुणों की अभिव्यक्ति एवं उदाहरण रूप में प्रयुक्त किये जाने वाले प्रत्ययों का भट्टिकाव्य में समन्वय उपलब्ध होता है-जा २२० म काव्य-खण्ड भरका निराकरिष्णू वर्तिष्णू वर्धिष्णू परितो रणम् । यी माग उत्पतिष्णू सहिष्णू च चेरतुः खरदूषणौ ।। (भट्टि ५.१) भट्टि ने अनेक अप्रयुक्त एवं अप्रसिद्ध शब्दों का प्रयोग किया जो या तो कोषशास्त्र की परम्परा में अप्रसिद्ध है अथवा भिन्न अर्थ के हैं। यथा- श्रट्ट, अद्रिटक, फलेग्रहिन्, कूपमाण्डूकि, चन्द्रशिला, मृदुलाबुन, आहोपुरुषिका, न्यग्रोधपरिमण्डला, विशंकट, सध्यङ्, दैदूणाक, बहुकर, करूः तथा धवित्र । कुछ अप्रसिद्ध धातु-रूपों का भी प्रयोग किया गया है यथा अढौकिषत, मन्तूयति, अप्रोणीत, जूजूरे, बबल्गुः, अप्लोष्ट, शिशिज्जिरे, बुबुन्द आदि। चरित्र-चित्रण की दृष्टि से सब पात्र रामायण से ही लिए गए हैं। चरित्रों के गुणों में परिवर्तन दृष्टिगत नहीं होता। इसमें न तो नैषधीयचरित के पात्रों के समान कृत्रिमता है और न ही कालिदास की नूतनता। पात्रों के गुणों का मुख्य रचनात्मक भाग है व्याकरण। पात्रों के गुणों और व्याकरण के उदाहरणों से साम्य रखने वाले शब्दों का प्रयोग भट्टिकाव्य में उपलब्ध होता है। अलंकार:-भट्टिकाव्य में जैसे व्याकरण के नियमों के उदाहरण उपलब्ध होते हैं वैसे ही दशम सर्ग में अलंकारों के उदाहरण उपलब्ध होते हैं। भामह से पूर्ववर्ती एवं नाट्यशास्त्र के पश्चाद्वर्ती आलंकारिक साहित्य के अभाव में भट्टिकाव्य अलंकार-परम्परा की एक प्रमुख श्रृंखला है। भामह और दण्डी के साथ तुलनात्मक अध्ययन से भट्टिकाव्य अलंकार शास्त्र की विचारधारा में प्रमुख योगदान देता है। अतिशयोक्ति, आक्षेप, आशीः, उदात्त, उदार, ऊर्जस्वी, तुल्ययोगिता, परिवृत्ति, पर्यायोक्ति, प्रेयस, यमकों के भेद-प्रभेद, समाहित एवं समासोक्ति इत्यादि अलंकारों का पश्चाद्वर्ती परिवर्तित विचारधाराओं से तुलना करने के लिए एवं पूर्ववर्ती विचारधारा के ज्ञान के लिए भट्टिकाव्य का प्रमुख स्थान है। यद्यपि भट्टि ने अलंकारों की परिभाषा नहीं दी, तथापि उदाहरणों का प्रस्तुतीकरण परिभाषा से अधिक महत्त्वपूर्ण है। इन उदाहरणों के नामकरण पर व्याख्याकार मल्लिनाथ, जयमंगला तथा भरतमल्लिक का मतभेद भी है। पश्चाद्वर्ती आलंकारिक इनका प्रयोग अपने लक्षण से करके अन्य नामों की कल्पना भी करते हैं। इन अलंकारों का प्रभाव उत्तरवर्ती संस्कृत साहित्य पर कम हुआ। परन्तु जावा की पुरातन रामायण पर न केवल भट्टिकाव्य का अपितु उसके अलंकारों का प्रभाव भी हुआ। हूयकास (१E५८) की गणना के अनुसार प्राचीन जावा रामायण पर ५६ प्रतिशत प्रभाव भट्टिकाव्य का पड़ा। एकावली अलंकार (मट्टि. २.१६) के सन्दर्भ में प्रायः काव्यशास्त्र के ग्रन्थ भट्टि को उद्धृत करते हैं। व्याकरणात्मक-शैली :-भट्टिकाव्य चार काण्डों में विभाजित है - १. प्रकीर्णकाण्ड :- इसमें पाणिनि की अष्टाध्यायी के पाद उदाहरण रूप में उद्धृत नहीं शास्त्रकाव्य, सन्धानकाव्य, चित्रकाव्य तथा यमककाव्य । २२१ २. अधिकारकाण्ड :- इसमें पाणिनि के अधिकार उदाहरण रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। ये अधिकार ट, आम, दुस्यादि, सिच, श्नम्, कृत्य, कृत्, खश, ढक्, भावे, स्त्रीलिंग, ति, कित, आत्मनेपद, परस्मैपद, कारक, कर्मप्रवचनीय, सिचि वृद्धि, इट् प्रतिषेध, सत्व, पत्त्व तथा णत्व। ३. प्रसन्नकाण्ड:- इसमें अलंकार उदाहरण रूप में दिए गए हैं। माता ४. तिङन्तकाण्ड :- इसमें लेट् लकार को छोड़कर सब लकारों के एक-एक सर्ग में यथासमय से अधिक धातु उदाहरण रूप में प्रस्तुत किये गए हैं। यह सबसे बड़ा . काण्ड है और नौ सर्गों में इसके उदाहरण दिए गए हैं। भट्टिकाव्य में सब वैदिक सूत्र छोड़ दिए गए हैं। कात्यायन के वार्तिक भी बहुत कम मिलते हैं। इतसंज्ञक जिन्हें पाणिनि ने स्वर-प्रक्रिया के लिए प्रयुक्त किया था, नहीं दिए गए हैं। संज्ञा एवं प्रत्याहारों को भट्टिकाव्य में केवल एक उदाहरण के द्वारा ही प्रस्तुत किया गया है। प्रायः भट्टि अध्याहारों का प्रयोग नहीं करता, यदि कहीं करता भी है तो केवल एक उदाहरण देता है। जिन पर्यायों का ग्रहण पाणिनि ने अर्थ-शब्द के प्रयोग से सूचित किया था, उनमें से प्रायः आदि शब्द ही उदाहरण रूप में दिया गया है।