१७ नैषधीयचरित-परिचय एवं समीक्षा

(क) परिचय

जैसा कि इसके नाम से ही पता चलता है यह निषधदेशोद्भव पुराणप्रसिद्ध पुण्यश्लोक महाराज नल और विदर्भदेश की राजकुमारी दमयन्ती के प्रणय एवं विवाह की कथा पर आधृत है। यों तो यह कथा पुराणों तथा कथासरित्सागर आदि अन्य ग्रन्थों में प्राप्त होती है, किन्तु नैषधकार ने जिसे अपने महाकाव्य का आधार बनाया है वह सम्भवतः महाभारत के वनपर्व में वर्णित ‘नलोपाख्यान’ है। नलोपाख्यान में ५२ से लेकर ७६ तक अट्ठाइस अध्यायों में विस्तार से नल का चरित्र वर्णित हुआ है। वन में विषादग्रस्त पाण्डवों के आश्वासनार्थ महर्षि बृहदश्व ने उन्हें यह वृत्तान्त सुनाया है और वहाँ इसका मूल रस शान्त है, क्योंकि नल और दमयन्ती का चरित र मानवीय जीवन के अनेकविध उतार-चढ़ावों के बीच अदम्य जिजीविषा और दाम्पत्य-निष्ठा का उज्ज्वल उदाहरण है। महाकवि ने इस कथानक के एकदेश को 4. हस्तपतिलिपियों की कुछ सूचियों में निम्नलिखित कुछ और ग्रन्च श्रीहर्ष के नाम से उल्लिखित हैं - (7) अमरखण्डनम् (२) द्विस्पकोश (३) जानकीगीता (४) शब्दभेदनिर्देश (५) श्लेषार्थपदसंग्रह (E) सुप्रभातस्तोत्र (७)वाणीविलास आदि, किन्तु इन सबका हर्ष की रचना होना संदिग्ध ही है। । कालिदासोत्तर महाकाव्य : पहली शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी तक लेकर ही अपनी लेखनी का प्रवर्तन किया है। नल-दमयन्ती के विवाह तक की प्रणय-कथा ही उसमें २२ सर्गों तथा २८३० पद्यों में वर्णित की गई है। कम से कम वर्तमान नैषधीयचरित के आधार पर तो यही सत्य है। हाँ कुछ लोग इस काव्य को अपूर्ण मानते हैं और उनके अनुसार या तो इसका शेष भाग लुप्त हो गया या कवि । उसे पूरा नहीं कर पाया (इस विषय का संक्षिप्त विवेचन हम बाद में करेंगे) ऐसे समीक्षकों के मत को मान लेने पर यह अनुमान करना पड़ेगा कि इसमें कवि के द्वारा समग्र नलचरित-वर्णन ही उद्दिष्ट रहा होगा। जो भी हो, कवि श्रीहर्ष ने मूलकथा की शैली, रस और पद्धति में, पर्याप्त परिवर्तन किए हैं और सीधीसादी नलकथा में अपने तथाकथित काव्यकौशल एवं पाण्डित्यप्रदर्शन के अनेक प्रसङ्ग निर्मित कर दिए हैं। काव्य की कथावस्तु संक्षेप में इस प्रकार है- जलाशय महाकाव्य का आरम्भ नल के विशद वर्णन से होता है। यहाँ निषधनरेश नल के पवित्र चरित का उत्तम वर्णन है। वर्णनक्रम में नल का मृगया-विहार, हैमहंस का ग्रहण, हंस का विलाप और नल द्वारा कृपापूर्वक उसकी मुक्ति प्रमुख हैं। राजा नल से मुक्त होकर वह स्वर्णहंस दमयन्ती के पास जाकर राजा नल का गुणगान करता है। नल के गुणों से आकृष्ट होकर दमयन्ती उसी हंस के द्वारा नल के पास अपना प्रणय-सन्देश भेजती है। राजा भीम अपनी कन्या दमयन्ती के लिए स्वयंवर का आयोजन करते हैं। स्वयंवर में सम्मिलित होने के लिए देश-देश के राजाओं को आमन्त्रित किया जाता है। उस स्वयंवर में दमयन्ती के अलौकिक सौन्दर्य की बात सुनकर इन्द्र, वरुण, अग्नि, यम देवता भी जाना चाहते हैं। वे राजा नल को ही अपना दूत बनाकर दमयन्ती के पास भेजते हैं। नल देवताओं के पक्ष को निष्ठापूर्वक दमयन्ती के समक्ष प्रस्तुत करते हैं और चतुर्देवों में से किसी को भी वरण करने का आग्रह करते हैं। दमयन्ती इस प्रस्ताव को अस्वीकार करती है और नल के प्रति अपने अगाध स्नेह को व्यक्त करती है। जो चारों देवता नल का ही रूप धारण कर सभा में उपस्थित होते हैं। उस सभा में मागासरस्वती स्वयं उपस्थित होकर राजाओं का परिचय देती है। नल की आकृति के पाँच पुरुषों को देखकर दमयन्ती असमंजस में पड़ जाती है। सरस्वती श्लेष भगिमा से पाँचों नलों का वर्णन करती है। अन्ततोगत्वा दमयन्ती की पतिभक्ति से प्रसन्न देवगण अपने विशिष्ट चिह्नों को प्रकट करते हैं, जिससे वह राजा नल को आसानी से पहचान लेती है। दमयन्ती नल के गले में वरमाला पहनाती है और दोनों का मंगलमय विवाह सम्पन्न होता है। देवगण स्वर्ग प्रस्थान करते हैं। मार्ग में कलि से भेंट होती है। कलि भी दमयन्ती को पाने की अभिलाषा से स्वयंवर में जाना चाहता है। देवता उसे लौट जाने को कहते हैं किन्तु वह क्रुद्ध होकर उनसे विवाद करने १७० का HिIT F काव्य-खण्ड: शाशा कामात ति-सा लगता है। देवता कलि को वाग्युद्ध में पराजित करते हैं। नल और दमयन्ती का सिक प्रथम मिलन होता है और इसी के साथ काव्य का पर्यवसान भी। आगर

(ख) समीक्षा

वस्तु, नेता और रस-इन तीनों की दृष्टि से ‘नैषधीयचरित’ अपने की || महाकाव्यत्व को सार्थक करने में पूर्ण समर्थ है। नल-दमयन्ती की कथा भारत में की एक लोकप्रिया कथा रही है और इसे संस्कृत के अनेक कवियों ने अपने काव्य और कत नाटकों का विषय बनाया है। श्रीहर्ष ने सम्भवतः महाभारत के नलोपाख्यान को अपनी वस्तु का उपजीव्य बनाया है किन्तु उस सीधी-सादी कथा को उन्होंने अपने का प्रातिभ परिवर्तन-परिवर्धनों से पर्याप्त रजक बना दिया है। यथास्थान सड़कोच और स्मिा विस्तार करते हुए कहीं-कहीं नूतन घटनाओं की भी उद्भावना वे करते चलते हैं।’ महाकाव्यों की परिपाटी का निर्वाह करते हुए प्रभात, चन्द्रोदय, सुरतक्रीडा आदि वर्णन कवि के स्वकल्पनोपात्त हैं। प्रथम सर्ग में हंस का करुणविलाप, पञ्चनली की श्लेषक्रीडा, बारातवर्णन आदि कवि की मौलिक योजनाएं हैं। पुण्यश्लोक नल के निर्देश (वस्तुनिर्देश) द्वारा मङ्गलाचरण करते हुए श्रीहर्ष अपने नायक और नायिका के पूर्वराग-वर्णन से काव्य का समारम्भ करते हैं। सप्तम सर्ग में दमयन्ती के नख-शिखवर्णन में उन्होंने अपनी रतिशास्त्रीय विदग्धता खुलकर प्रदर्शित की है। के स्वयंवर-सभा के.वर्णनमें भी कवि ने मूलकथा की अपेक्षा पर्याप्त विस्तार किया है। दस से चौदह तक पाँच सों में, लगभग ५०० से भी अधिक पद्यों के द्वारा इस प्रसङ्ग का वर्णन हुआ है। सरस्वती देवी के द्वारा स्वयंवर में समागत राज-परिचय-प्रसङ्ग अध्य च सम्पूर्ण एकादश तथा द्वादशसर्ग कवि श्रीहर्ष की कल्पना के ही विलास हैं। त्रयोदशसर्ग तो उनकी विचित्र मार्गीय कविकला का चूडान्त निदर्शन है ही। कलि-प्रसङ्ग को अपने अनुरूप विस्तार देकर महाकवि ने तत्कालीन विविध दार्शनिक धाराओं को अभिव्यक्त किया है और उन पर स्वमतानुरूप टिप्पणी भी कर दी है। इस प्रकार कवि की प्रबन्ध-योजना भारवि और माघ की अपेक्षा (कुछ विस्तृत होते हुए भी) अधिक कसी हुई है। उन्होंने अपने काव्य में प्रत्येक सर्ग के अन्तिम श्लोक से पहले ‘आनन्द’ शब्द का प्रयोग किया है अतएव यह काव्य ‘आनन्दान्त’ कहलाता है। सबसे बड़ी बात यह है कि कवि ने कथावस्तु की दृष्टि से भारवि और माघ की परिपाटी से स्वतन्त्र अपना मार्ग बनाया है। नाट्यशास्त्रीय Bाशील कि 1 किट मालिक अहम 9. N. Jani - A Critical Study of Sriharsa’s Nalsadhlyacharitam p. 13. २. यद्यपि इस वर्णन को लेकर उन पर अनेक समीक्षकों ने खुलकर छींटाकसी की है, विशेष विवरण निमान के लिए देखिए- EFITS PRIL का नाम: ERA. Dr. S.K. De - A History of Sanskrit Literature p. 328. B. Krishna -Chaitanya - A New history of Sans. Lt. P. 274… C. Juthika ghosh - Epic Sources of Sans. Lit. p. 99 कालिदासोत्तर महाकाव्य : पडली शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी तक अर्थप्रकृतियों, सन्धि और सन्ध्यङ्गों की दृष्टि से देखने पर भी नैषधीयचरित का कथानक उत्कृष्ट सिद्ध होता है। फीलम लिटिमानकर चला नैषधीयचरित के महाराज नल धीरोदात्तकोटि के नायक हैं। आचार्यों द्वारा गिनाए गए नायक के सभी गुण उनमें विद्यमान हैं। श्रीहर्ष ने उनमें रूप-सौंदर्य, गुण-सौन्दर्य एवं चरित्रसौन्दर्य इन तीनों की प्रतिष्ठा की है। दमयन्ती के प्रेम में विरहार्त होकर भी वे अधीर नहीं होते, उनका हृदय अत्यन्त उदार और संवेदनशील है । हंसके करुण विलाप को सुनकर वे दया और करुणा से भर उठते हैं। वे कर्त्तव्यपरायण तथा अङ्गीकृत वचन का परिपालन करने वाले हैं। भारतीय परम्परा में वे प्रातःस्मरणीय पुण्य-पुरुष माने गए हैं । महाकवि श्रीहर्ष ने अपने काव्य में ऐसे प्रथित नायक को और भी मनोज्ञ एवं स्पृहणीय बनाकर चित्रित किया है। महाकाव्य का अड्गीरस श्रृगार है। यहाँ श्रृङ्गार के सम्भोग एवं विप्रलम्भ दोनों पक्षों का सुन्दर तथा साङ्गोपाङ्ग चित्रण हुआ है। किन्तु उनका श्रृङ्गारवर्णन उनकी अपनी शैली में हुआ है। वे कालिदास की भाँति उसे केवल हादसंवेदना तक ही सीमित नहीं रखते अपितु अनेक अप्रस्तुत-विधानों तथा उक्तिवैचित्र्यों के द्वारा बुद्धयनुमेय भी बना डालते हैं इसलिए कुछ समीक्षक उन्हें ‘श्रृगार का कवि’ कहने की अपेक्षा ‘श्रृङ्गारकला का कवि’ कहना अधिक पसन्द करते हैं । उनका सम्भोगवर्णन अधिक मांसल, उत्तेजक और कहीं-कहीं अश्लील भी हो गया है। प्रतीत होता है कि कवि वात्स्यायन के कामसूत्र में वर्णित ‘नागरक’ के जीवन को आदर्श मानकर अपने चित्र प्रस्तुत कर रहे हैं। सोलहवें सर्ग में ज्यौनार का वर्णन करते हुए वारनारी तथा वरयात्रियों के बीच का हास-परिहास तत्कालीन समाज की छाप भले ही दे रहा हो पर वह सभ्यरुचि के प्रतिकूल और बहुत कुछ ग्राम्य सा हो गया है। माना समानता ता फातिक फिर भी कुछ चित्र अत्यन्त सहज और सुन्दर बन पड़े हैं। एक दो उदाहरण आस्वाद्य FRETETE E SE FUTE वेश्म पत्युरविशन साध्वसावेशिताऽपि शयनं न साऽभजत्। भाजिताऽपि सविधं न साऽस्वपत् स्वापिताऽपि न च सम्मुखाभवत् ।।। विमा का रिसाई लागन जी का (नषध. १८३५) पिन- अथवा ये दो पद्य-की-ना कि वितनिकाला काली का हा तिनका कमि आए तीन वि की। कारी शामि जामवण्यात किमी करता प्रापित किशोरवरी अवा विशित 4. दे. नैषधपरिशीलन, पृ. ४३ से ४७ तथा सुषमा कुलश्रेष्ठ का बृहत्त्रयी एक तुलनात्मक अध्ययन, पृ. २४२ से २७५ तक का अंश २. दे., दशरूपक २१-२. ३. मौलाशङ्कर व्यास = सं. क.द. पृ. २०६ १७२ नागाह कीमती

वीक्ष्य पत्युरधरं कृशोदरी बन्धुजीवमिव भृगसङ्गतम्।। मञ्जुलं नयनकज्जलैर्निजैः संवरीतुमशकस्मितं न सा।।। तां विलोक्य विमुखश्रितस्मितां पृच्छतो हसितहेतुमीशितुः। हीमती व्यतरदुत्तरं वधूः पाणिपङ्करुहि दर्पणार्पणाम् ।। मा (वही १८ १२५,१२६) इन पद्यों में दमयन्ती के मुग्धात्व एवं रतिकाल के अनुकूल स्वाभाविक हास-परिहास का सरस चित्रण हुआ है। अशा जाणार जमान नैषध में श्रृङ्गार का विप्रलम्भ-पक्ष, पूर्वराग के रूप में पहले ही आ गया है। विप्रलम्भवर्णनों में यद्यपि कवि ने अपनी अनूठी कल्पना का पर्याप्त उपयोग किया है, फिर भी उनमें मर्म को छूने वाली व्यञ्जकता का अभाव खटकता है। कहीं-कहीं तो उनमें उक्तिवैचित्र्य एवं ऊहोक्तियों का ही प्राधान्य हो गया है। कामाग्नि से सन्तप्त दमयन्ती बार-बार ताजे कमल को हृदय में रखने का उपक्रम करती है, किन्तु उसके शरीरताप के कारण वह पहले ही सूखकर व्यर्थ हो जाता है स्मरहुताशनदीपितया तया बहुमुहुः सरसं सरसीरुहम्। थाना श्रयितुमर्धपथे कृतमन्तरा श्वसितनिर्मितमर्मरमुज्झितम् ।। (५।२६) छ अथवा यह दूसरा पद्य जिसमें श्लेषाश्रित अनूठी कल्पना की सङ्गति तो है, किन्तु सहृदय को संवेदित करने वाली तरलता का उतना ही अभाव है निविशते यदि शूकशिखा पदे सृजति सा कियतीमिव न व्यथाम् मृदुतनोतिनोतु कथं न तामवनिभृत्तु प्रविश्य हृदि स्थितः।।। (४११) अर्थात् किसी के पैर में यदि छोटा सा तिनका भी चुभ जाय तो वह कितनी वेदना उत्पन्न कर देता है। कोमलाङ्गी दमयन्ती के हृदय में तो अवनिभृत् (राजा नल, पक्षान्तर में पर्वत) प्रविष्ट हो गया, उसको भला कितनी वेदना न होगी? 5 अङ्गरसों में वीर, करुण, हास्य, रौद्र, भयानक आदि के साथ-साथ वात्सल्य की भी सुन्दर अभिव्यंजना हुई है। बाह्यनिसर्ग की अपेक्षा मानव-निसर्ग अर्थात् मनुष्य-स्वभाव-वर्णन में श्रीहर्ष अधिक पटु हैं। फिर भी उनके सूर्योदय, चन्द्रोदय आदि के वर्णन कहीं-कहीं अन्य कवियों से कुछ भिन्न और सुन्दर बन पड़े हैं, विशेष कर जब वे प्रकृति को लोकव्यवहार के अप्रस्तुविधान के साथ चित्रित करते हैं, जैसे सूर्यास्त के बाद काली अंधेरी रात के घिरने की यह उत्प्रेक्षा - कालिदासोत्तर महाकाव्य : पहली शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी तक १ ७३ आ ता ऊर्ध्वार्पितन्युजकटाहकल्पे यद्योम्नि दीपेन दिनाधिपेन। म मालिक समस्याका न्यधायि तद्भूममिलद्गुरुत्वं भूमी तमःकज्जलमस्खलत्किम् ।। गायक पाहताना (२२३१) “सूर्य के अस्त होने पर चारों ओर अंधेरा घिरने लगा। ऐसा लगता है कि मानो सूर्य के दीपक पर आकाशरूपी सकोरे को काजल बनाने के लिए औंधा रख दिया हो पर काजल इतना घना हो गया कि उसके भार से वह नीचे गिर पड़ा और उसने सूर्य रूपी दीपक को बुझा दिया।” सचमुच, यह कल्पना इतनी मनोहर है कि इसके आधार पर श्रीहर्ष को ‘दीपकहर्ष’ की उपाधि दी जानी चाहिए। खण्डनखण्डखाद्य जैसे प्रकृष्ट एवं जटिल दार्शनिक ग्रन्थ के रचयिता आचार्य की भाषा-शैली काव्य में भी कुछ वक्र, दुरुह और जटिल हो यह स्वाभाविक ही है। यही कारण है कि ‘नारायणी’ या ‘जीवातु’ टीकाओं को देखे बिना अच्छे-अच्छे पण्डितों को अर्थावबोध के लिए कोशादि देखना आवश्यक हो जाता है। स्वयं कवि ने यह स्वीकार किया है कि यह जटिलता या दुरूहता उन्होंने जानबूझकर इसलिए डाली है कि कोई पण्डितम्मन्य खल जो गुरुपरम्परा के प्रति श्रद्धालु नहीं है इससे खेल न सके । अपरिपक्व और अरसिक व्यक्ति उनके काव्य की निंदा करे तो भी उसकी परवाह उन्हें नहीं है, उन्होंने तो यह कृति प्रौढ़ पण्डित एवं कलारसिक के लिए प्रस्तुत की है। शैली के साथ-साथ नैषध की भाषा भी अपेक्षाकृत कुछ कठिन है, इसका कारण अप्रचलित शब्दों के प्रति अभिरुचि है। ‘अकूपार’ (१२।१८) ‘अगदङ्कारचय’ (३।१११). आदि कुछ सुबन्त पद तथा अनेक जटिल क्रियापद यहाँ कथ्य को कठिन बनाते चलते हैं। फिर भी उनकी भाषा, पदलालित्य तथा मुहावरों से भरपूर है। जैसे - ‘कथमास्य दर्शयितामहे’ (कैसे मुंह दिखाऊंगा) ‘नवीनमश्रावितवाननादिदम्’ (तुम्हारे मुंह से यह नई बात सुनी) ३ आदि। इङ्गाल,’ विरुद्ध, ’ धोरणिप जैसे लोकभाषाओं के भी बहुत से शब्द उन्होंने निःसङ्कोच ग्रहण किए हैं। काव्यशैली वैदर्भी है किन्तु यह कालिदास की वैदी की भांति प्रसन्न नहीं है, बल्कि विपुल समास होकर प्रायः गौड़ी का परिधान धारण कर लेती है। सभी अलकार यहाँ यथाऽवसर आते-जाते हैं फिर भी कवि का अनुप्रास और हा कि कि मि गोराशी कि कि १. अन्धग्रन्धिरिह क्वचित्क्वचिदपि न्यासि प्रयत्नान्मया माजम्मन्यमना हटेन पठिती माऽस्मिन्बलः खेलतु। अद्धाराद्धगुरुश्लथीकृतदृढनन्धिः समासादय किम का मन त्वेतत्कायरसोनिमज्जनसुखच्यासज्जनं सज्जनः।।" (नैषध २२।१५२) कण २. नैषध, ५७१३.६४१ ४. १E५. ११३७६, १५४E ७. एक उदाहरण - “सुवर्णदण्डैकसितातपत्रज्वलत्यतापावलिकीर्तिमण्डलः।” (9R)नक मार दिया। काव्य-खण्डमा यातनाम माता श्लेष के प्रति कुछ मोह अधिक दिखलाई पड़ता है। अर्थालङ्कारों में उपमा, उत्प्रेक्षा, आदि सभी का प्रयोग यथाऽवसर हुआ है। जिन विगजलमगीर का शिका श्रीहर्ष को छोटे-छन्द अत्यधिक प्रिय हैं। कुछ लम्बे छन्दों, मन्दाक्रान्ता, स्रग्धरा, शार्दूलविक्रीडित, शिखरिणी आदि का प्रयोग सीमित मात्रा में हुआ है। कुल मिलाकर लगभग २० छन्दों का कवि ने प्रयोग किया है। इनका प्रिय छन्द इन्द्रवज्रा है, इसके अतिरिक्त, उपजाति, वंशस्थ, श्लोक, वसन्ततिलका, स्वागता, द्रुतविलम्बित, रथोद्धता, वैतालीय और हरिणी छन्द यथास्थान प्रयुक्त हुए हैं। श्रीहर्ष स्वयं बहुत बड़े वेदान्ती तथा अन्य दार्शनिक नयों के निष्णात पण्डित थे अतएव इनके काव्य में स्थल-स्थल पर, न्याय, वैशेषिक, व्याकरण तथा वेदान्त के सिद्धान्त प्राप्त होते हैं। नीरस दार्शनिक सिद्धान्तों में भले ही पूर्वपक्ष के रूप में व्यङ्य-विनोद और हास-परिहास का अवसर खोज लेना श्रीहर्ष की अपनी मौलिकता या एक शास्त्रार्थी की शरारती शैली है। वैशेषिक दर्शन में दसवें द्रव्य के रूप में स्वीकृत ‘तम’ का प्रतिपादन करने वाले महर्षि ‘उलूक’ को वे अन्वर्थनामा सिद्ध करते है- काम निपटा । ध्वान्तस्य वामोरु विचारणायांक समारता शाकीज का वैशेषिकं चारुमतं मतं मे। विनि कि नामी तिन ठाक शाक औलूकमाहुः खलु दर्शनं तत HRJ FILER सीर TOFTHE TER क्षम तमस्तत्त्वनिरुपणाय।। (२२॥३५) शामिरि इसे सुनकर सब प्रसन्न हुए। तब श्रीहर्ष ने अपने प्रतिद्वन्द्वी को देखकर इस पद्य में अपना परिचय दिया न्यायदर्शन के प्रवर्तक गोतम को भी वे गो-तम (पक्का बैल) कहने का साहस कर बैठते हैं कि दीतिशालि कॉल सनीप्रति मल्ली हायक TEP TO FIED मक्तये यः शिलात्वाय शास्त्रमचे सचेताम । गा बि नि मिसिल्क र ना गोतमं तमवेक्ष्यैव यथा वित्थ तथैव सः।। (१७ १७५) का कारन और तो और ‘अपवर्गे तृतीया’ सूत्र की मनोरंजक व्याख्या करके वे महर्षि पाणिनि को भी परिहासभूमि में ले जाने से नहीं चूकते, भले ही यह कलि के अधिदेवता की उक्ति क्यों न हो E उभयी प्रकृतिः कामे सज्जेदिति मुनेर्मनः। mystem मा ‘अपवर्गे तृतीयेति भणतः पाणिनेरपि।। सायनागरिकालानि W E (949 190) (१७७०) (PER जिला कालिदासोत्तर महाकाव्य : पहली शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी तक १७५॥ -

संस्कृतकाव्यपरम्परा में स्थान

कालिदासोत्तर महाकाव्यों की उत्कर्षमूलक परम्परा का अन्यतम निदर्शन एवं बृहत्त्रयी के तीसरे घटक के रूप में ‘नैषधीयचरित’ सर्वदा।। सुप्रतिष्ठित रहेगा। विचित्रमार्ग का सार्थक और चरमोत्कर्ष यहाँ आकर पर्यवसित होता है, इसमें चाहे जिस प्रकार की हो अपनी मौलिकता, अपनी विशेषता और कविता तथा पाण्डित्य का मणिकाञ्चन संयोग है। कवि ने अपनी पूर्वपरम्पराओं का दाय स्वीकार करते हुए भी उसे एक अपनी पृथक् शैली - पृथक् ढाँचे में-इस दृष्टि से श्रीहर्ष और उनका यह काव्य सदैव महत्त्वपूर्ण रहेगा। समीक्षा या समालोचना के चाहे कितने ही मानदण्ड बदलें इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता। कानमार ति Ptivpोकर कामात

पारिजातहरण

इस महाकाव्य के कर्ता कविराज हैं तथा रचनाकाल बारहवीं शती है। कविराज के पिता नारायण गोतमवंशीय विद्वान् ब्राह्मण थे और वे कादंबवंश के राजा के यहां सेनापति थे। इनकी माता का नाम चन्द्रमुखी था। मैसूर में धारबाड़ के निकट इनका निवासस्थल रहा। । पहिला त म क 0 5 चरिणा गीपारिजातहरण महाकाव्य में कुल दस सर्ग तथ ७७० श्लोक हैं। सत्यभामा के अनुरोध पर श्रीकृष्ण द्वारा स्वर्ग के नन्दनकानन से पारिजात वृक्ष लाने की सुप्रसिद्ध हरिवंशादि में वर्णित कथा का कवि ने इसमें पल्लवन किया है। पिक जिमी तसा कमीत

पारिजातापहार

इस काव्य की विषयवस्तु भी उपर्युक्त पारिजातहरण महाकाव्य के ही समान है। कवि ने इसे महाकाव्य कहा है, पर इसमें महाकाव्य के लक्षण पूरी तरह घटित नहीं होते। इस काव्य में कुल १७६ श्लोक हैं, जिनका विभाजन आश्वासों में किया गया है। आश्वासों में विभाजन वस्तुतः प्राकृत महाकाव्यों का किया जाता रहा है, और संस्कृत महाकाव्य के शास्त्रीय लक्षण का यह उल्लंघन है। riyo 2 इस महाकाव्य (?) के रचयिता नारायण पंडित हैं, जो त्रिविकमभट्ट के पुत्र थे। श्री कृष्णमाचारियर ने इनका समय तेरहवीं शताब्दी निर्धारित किया है। श्रीत्रिविक्रम माध्वाचार्य के शिष्य थे। पारिजातापहार यमकप्रधान काव्य है। कवि नारायण ने इस काव्य के अतिरिक्त माध्वाचार्य के जीवन पर माध्वविजय काव्य रचे और कई स्तोत्र-काव्यों की भी रचना की थी।