०३ किरातार्जुनीय-समीक्षा

(क) शैली तथा वस्तुविन्यास

आचार्य कुन्तक ने कवियों की काव्य-रचना-प्रवृत्ति के हेतुभूत तीन कवि-मार्गों का निरूपण किया है। वे मार्ग हैं- PREFE (१) सुकुमार विचित्र, तथा (३) मध्यम या उभयात्मक १. यद्यपि महाकाव्य के लक्षणों का स्वरूप-निर्धारण भारवि से परवर्ती है तथापि इस क्षेत्र में कुछ रूढ़िया वाल्मीकि के समय से ही चली आ रही थी। कुछ महाकवि कालिदास के कार्यों द्वारा निर्मित हुई और कुछ के प्रयोक्ता स्वयं भारवि थे। परवर्ती आचार्यों ने इन्हीं को एक लिखित और निश्चित रूप दे दिया। २. वक्रोक्तिजीवित १.२४ कालिदासोत्तर महाकाव्य : पहली शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी तक १३७ को सुकुमार-मार्ग में प्रतिभा या कवित्वशक्ति का सहज उच्छलन तथा स्वाभाविकता प्रधान होती है, जबकि विचित्र-मार्ग में उक्ति-वैचित्र्य, वक्रता और बौद्धिक कलात्मकता की भूमिका अधिक रहती है। मध्यम-मार्ग में दोनों का मिश्रित रूप सौन्दर्य की सृष्टि करता है। प्रथम सरणि के कवियों में, कालिदास, अश्वघोष आदि, द्वितीय में, भारवि, माघ, श्रीहर्षादि तथा तृतीयमार्ग के रचनाकारों में मातृगुप्त, मायुराज तथा मजीर आदि को आदर्श माना जा सकता है। लक्ष्मणग्रन्थों का, इस प्रकार मार्ग या सरणि-विभाजन स्पष्ट रूप से दो प्रधान महाकवियों के कर्तृत्व की दो पृथक् शैलियों के आधार पर किया गया प्रतीत होता है। उनमें से प्रथम हैं कालिदास तथा दूसरे हैं किरातकाव्य के रचयिता भारवि। यद्यपि इस कथित विचित्रमार्ग के बीज हमें वाल्मीकि, व्यास तथा कालिदास की भी कृतियों में मिल जाते हैं, किन्तु इसको सर्वथा पृथक् और महत्त्वपूर्ण स्थिति प्रदान करने वाले प्रथम कवि भारवि ही हैं। बृहत्त्रयी के शेष दोनों कवि इन्हीं के अनुस" और प्रति-संस्कर्ता हैं। शान वाल्मीकि, व्यास, कालिदास तथा अश्वघोष प्रभृति, भारवि के पूर्ववर्ती कवियों के महाकाव्यों में विषय के रूप में किसी महापुरुष या एक वंश के विभिन्न चरित-नायकों का समग्र इतिवृत्त ग्रहण किया गया है, जिसमें मानवीय सभ्यता या सहृदयसमाज के लिए एक व्यापक सन्देश-गर्मितता की भी अभिव्यञ्जना मिलती है। भारवि ने इस इतिवृत्तात्मकता में कदाचित् कवि के पाण्डित्य और कल्पना के लिए कम अवसर देखा और महाभारत की ऐसी एक घटना को, जो अधिक से अधिक खण्डकाव्य का ही विषय बन सकती थी-महाकाव्य के रूप में परिणत किया। किरात के मुख्य कथास्रोत के रूप में महाभारत, वनपर्व के सत्ताइस से लेकर चालीसवें तक-चौदह अध्याय हैं। इनमें भी मुख्य कथा लगभग तीन-चार अध्यायों की ही है, शेष में पुरुषार्थ और दैव को पक्ष-विपक्ष बनाकर, द्रौपदी, भीम तथा युधिष्ठिर के संवाद हैं, जिनमें लगभग एक जैसी बातों को बार-बार दुहराया गया है। भारवि ने इसी घटना को अपने अभीप्सित कथ्य तथा राजनीतिक ज्ञान के प्रदर्शन के अनुकूल समझा। उनसे पूर्व के महाकाव्यों में श्रृङ्गार या शान्तरस ही अङ्गी के रूप में प्रतिष्ठित हुए थे, भारवि ने युगानुरूप नवीन उत्साह तथा शौर्य का सन्देश देने के लिए पार्थ जैसे अप्रतिहत और प्रसिद्ध योद्धा को चरितनायक बनाया और इस क्षेत्र में (सम्भवतः पहली बार) वीररस की अवतारणा की। इसके अतिरिक्त, इस काव्य में कुछ नवीन काव्य-रूढ़ियाँ भी निर्मित हुई जिनका बाद के कवियों ने लगभग परिपाटी मानकर अनुकरण किया। ‘किरातकाव्य’ का आरम्भ श्रीशब्द से होता है, और उसके प्रतिसर्गान्त-पद्य में नियमतः ‘लक्ष्मी’ शब्द आता है अतः विद्वानों गिय कुरूणामधिपस्य पालनी प्रजासु वृत्तिं यमयुक्त वेदितुम् । स वर्णलिङ्गी विदितः समाययो युधिष्ठिरं द्वैतवने बनेचरः।। (किरात. ११) १३८ में इस काव्य को ‘लक्ष्म्यन्त’ कहा जाता है। यह भारवि का मौलिक प्रयोग है जिससे प्रभावित होकर माघ ने शिशुपालवध को ‘थ्रयन्त’ (श्री-शब्द से अन्त होने वाला) तथा श्रीहर्ष ने नैषध को ‘आनन्दान्त’ बनाया है। मामला

(ख) रसपरिपाक और चरित्रचित्रण

‘किरातार्जुनीय’ का अङ्गीरस ‘वीर’ है। श्रृङ्गार, रौद्र, भयानक आदि रस अङ्ग रूप में आए हैं। भारवि की दृष्टि अपने काव्य में अर्थगौरव का समावेश करने के साथ-साथ रस-योजना के प्रति भी जागरूक है। कृष्ण कवि ने उनके काव्य की इन विशेषताओं का आकलन इस प्रकार किया है। प्रदेशवृत्यापि महान्तमर्थं प्रदर्शयन्तीरसमादधाना। नहीं है। सा भारवेः सत्पथदीपिकेव रम्या कृतिः कैरिव नोपजीव्या।। वीररस का उपनिबन्धन, यहाँ किरातवेश में अर्जुन के पराक्रम की परीक्षा करने के लिए अवतरित भगवान् शिव, उनके गणों तथा अर्जुन के पारस्परिक युद्ध में हुआ है। युद्धवीरता के साथ-साथ अर्जुन की अडिग तपोनिष्ठा के माध्यम से धर्मवीरता का भी विशेष परिपाक किया गया है। काव्य के आरम्भ में बनेचर का प्रवेश और उसकी उक्तियों से युधिष्ठिर की सुप्त उत्साहवृत्ति उद्बुद्ध होती है, भीम और द्रौपदी के प्रेरक-कथोपकथनों से उसका उपचय होता है और भगवान् व्यास के सन्दर्भ से वह ‘वीररस’ के बीजरूप में तृतीय पाण्डव अर्जुन में संक्रान्त हो जाती है। तपश्चर्या तथा किरात-युद्ध के माध्यम से विविध विच्छित्तियों में वही अनेकथा रस्यमान बन कर परिणति को प्राप्त होती है। द्वितीय-सर्ग में भीम की उक्तियाँ सर्वथा निराश और हतसत्त्व मनुष्य में भी नवीन उर्जा और स्फूर्ति का सञ्चार कर देती हैं, कतिपय उदाहरण आस्वाध हैं- सिम सागर स्तिक तदलं प्रतिपक्षमुन्नतेरवलम्ब्य व्यवसायवन्ध्यताम् । काष्ट निवसन्ति पराक्रमाश्रया न विषादेन समं समृद्धयः।। (२।१५) अथवा, SHAILEE माता मदसिक्तमुखैर्मृगाधिपः करिभिर्वर्तयते स्वयं हतैः। लघयन्खलु तेजसा जगन्न महानिच्छति भूतिमन्यतः।। (२।१८) इन पद्यों में सूक्तियों एवं निदर्शनों के माध्यम से कवि ने वीररस की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि तैयार की है। इनको पढ़ या सुनकर सिद्धान्ततः इनसे असहमत होता हुआ भी कोई व्यक्ति प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। यद्यपि युद्ध-वर्णन षोडश से अष्टादश तक दो सर्गों में ही हुआ है, किन्तु उसके मूल के रूप में पूर्वोक्त पृष्ठभूमि सम्पूर्ण काव्य में कालिदासोत्तर महाकाव्य : पहली शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी तक १३६ अनुस्यूत है। समुचित आलम्बन, उद्दीपन तथा सञ्चारियों के संयोग से निष्पन्न वीररस का परिपाक भारवि के युद्ध-वर्णन का वैशिष्ट्य है। शिव के द्वारा धनुष की प्रत्यञ्चा खींचने का यह चित्र देखिए - TATEL उदूढवक्षस्थगितैकदिङ्मुखो विकृष्टविस्फारितचापमण्डलः। वितत्य पक्षद्वयमायतं बभौ विभुर्गुणानामुपरीव मध्यगः ।। (१४।३१) नाद-सौन्दर्य से समन्वित यह पद्य तो कवि के कौशल का परिपक्व प्रमाण है - उन्मज्जन्मकर इवामरापगायावेगेन प्रतिमुखमेत्य बाणनद्याः। गाण्डीवी कनकशिलानिभं भुजाभ्यामाजघ्ने विषमविलोचनस्य वक्षः।। लामा (१७।६३) ‘अर्जुन अपने सब शस्त्रों का प्रयोग करके श्रान्त हो गए फिर भी उस अद्भुत किरात को पराजित न कर सके। तब उन्होंने गंगा के जल को चीरकर ऊपर उछले हुए मगर के समान बाणों की नदी के आगे आकर, त्रिलोचन शिव के सुवर्ण-शिला-सदृश विशाल वक्षःस्थल पर दोनों भुजाओं से प्रहार किया। अा-रसों के अन्तर्गत आठवें, नवें तथा दसवें सर्ग में श्रृङ्गार के चित्र विपुल मात्रा में हैं, अन्यत्र प्रसङ्गवश रौद्र और भयानक की भी सुन्दर अभिव्यञ्जनाएँ मिलती हैं। भारवि, श्रृङ्गार के चित्रण में सिद्धहस्त हैं किन्तु उनका श्रृङ्गार कालिदास के श्रृङ्गार से भिन्न नायिका-भेदादि-रूढियों से संकीर्ण तथा अधिक उद्दीपक है। विप्रलम्भ की अपेक्षा सम्भोग-चित्रणों में उनका अधिक अभिनिवेश व्यक्त हुआ है। अर्जुन के तप-प्रसङ्ग में अप्सराओं द्वारा प्रलोभन का प्रसङ्ग उपस्थित करके वे श्रृङ्गार की अनेक कलात्मक शब्दार्थविच्छित्तियाँ प्रदर्शित करते हैं। सुन्दरी स्त्रियों और उनके हाव-भाव तथा कौतूहलमयी क्रीड़ाओं का सूक्ष्म विश्लेषण तो वे कुशलता से कर लेते हैं, किन्तु प्रेम की मादकता से सहज उत्पन्न अनुभावों एवं स्वाभाविक प्रणय-स्थितियों का एक भी सफल चित्रण, जो कालिदास के काव्यों में पद-पद पर उपलब्ध हो जाता है, उनमें खोजने से भी नहीं मिलता। भारवि के ये श्रृङ्गारचित्र एक उथली ऐन्द्रियता की ओर झुक कर कहीं-कहीं अपेक्षित उदात्तता और मर्यादावृत्ति को भी खो बैठे हैं। अप्सराओं की अर्जुनविषयक रति के प्रदर्शन में (अनौचित्यप्रवर्तितत्व के कारण) श्रृङ्गार की रसाभास के रूप में भी योजना भारवि ने की है। आलम्बन और उद्दीपन दोनों रूपों में अधिकांश प्रकृति-वर्णन भी श्रृङ्गारपरक हैं। प्रकृति-वर्णनों में जहाँ ये श्रृङ्गार से उबरते भी हैं वहाँ यमक के फेर में पड़ जाते हैं इसलिए इनके नैसर्गिक वर्णन भी प्राचीन कवियों जैसे स्वाभाविक और हृद्य नहीं रह गए। भारवि के काव्य में चरित्र-चित्रण का पक्ष अवश्य अत्यन्त पुष्ट और स्पृहणीय है। संवादों के तो ये कुशल शिल्पी हैं। इनके द्वारा युधिष्ठिर, भीम और द्रौपदी के द्वारा कहलाई गई उक्तियाँ न केवल राजनीति की सूक्ष्म बातों का ज्ञान कराती हैं अपितु उनके द्वारा महाकाव्य के ये पात्र पाठक के सामने जीवन्त होकर आ जाते हैं, थोड़ी देर के लिए ही सही वह उसी परिवेश में पहुंच जाता है। अर्जुन की बातचीत, तपश्चर्या एवं युद्ध की प्रत्येक चेष्टा उनके धीरोदात्त व्यक्तित्व, दृढ़सङ्कल्पशक्ति और पराक्रमशीलता से समन्वित चेतनमूर्ति को हमारे लिए प्रत्यक्ष कर देती है।

(ग) रचनाशिल्प तथा पाण्डित्य-प्रदर्शन

भारवि प्रौढ़ एवं अलङ्कृत काव्यरचना के कुशल शिल्पी हैं। शुद्धकलाबादिता तथा पाण्डित्य की दृष्टि से मूल्याङ्कन करने पर वे कालिदास से भी आगे बढ़ जाते हैं। अर्थगौरव के वे आचार्य हैं। युधिष्ठिर द्वारा भीम के भाषण की प्रशंसा कराते हुए वे अपनी अभीप्सित वाकू शैली का परिचय स्वयं दे देते हैं। भारवि की दृष्टि में सत्काव्य के लिए, पदों की स्फुटता, अर्थगौरव का स्वीकार, शब्दों की भिन्नार्थकता तथा सामर्थ्य-ये ही आवश्यक गुण हैं। उनकी भाषा प्रौढ़ और परिमार्जित है। वह ‘विविक्तवर्णाभरणा’ और ‘सुखश्रुतिः’ तो है ही कहीं-कहीं प्रसन्न-गम्भीरपदा भी है, क्योंकि भाषा (सरस्वती) के विषय में ये ही उनके आदर्श हैं। फिर भी कालिदास जैसी प्रासादिकता उनमें नहीं मिलती। विकट समास-बन्धों के अनवसर प्रयोग के विषय में यद्यपि वे सावधान हैं फिर भी उनकी काव्य-सरणि में कालिदास-सदृश वैदर्भी का परीरम्भ नहीं है। कालिदास से माघ तक की यात्रा में शैली का जो रूप परिवर्तन हुआ, भारवि उसके एक विश्रामस्थल हैं। उनके महाकाव्य के प्रसिद्ध टीकाकार, मल्लिनाथ ने उनकी शैली को ‘नारिकेलफलसम्मित’ कहा है। आगः सभी प्रधान और महत्त्वपूर्ण अलङ्कार और चित्रालड्कारों का वे साभिनिवेश प्रयोग करते हैं। पूरा पञ्चदशसर्ग उन्होंने चित्रबन्धों की शाब्दीक्रीड़ा में व्यय कर दिया है। अर्थालङ्कारों के अन्तर्गत, उपमा, उत्प्रेक्षा, निदर्शना, समासोक्ति, काव्यलिङ्ग, व्यतिरेक, अतिशयोक्ति आदि का यथावसर प्रयोग वे करते हैं। कालिदास की ही भाँति ‘अर्थान्तरन्यास’ उनका भी प्रिय अलङ्कार है। उनकी प्रसिद्ध राजनीतिक तथा व्यावहारिक-सूक्तियाँ प्रायः इसी के माध्यम से मुखर हुई हैं। ‘निदर्शना’ का एक सुन्दर प्रयोग, जिसमें वायु द्वारा छितराए गए स्थल-कमलिनी के पराग को सुवर्णमय-छत्र जैसा बतलाया गया है- उन्हें काव्यरसिकों में ‘आतपत्र-भारवि’ की उपाधि द्वारा प्रथित करता है। १. भारवरर्थगौरवम् । २. स्फुटता न पदैरपाकृता न च न स्वीकृतमर्थगौरवम्।। रचिता पृथगर्थता गिरां न च सामर्थ्यमपोहितं क्वचित् ।। (२।२७) कोकि पति लागलाद किरात. १४३ ४. भोलाशङ्कर व्यास- संस्कृत-कविदर्शन- (चौखम्बा, वाराणसी १६६८, पृ.१३७ ५. नारिकेलफलसम्मितं बचो भारवेः सपदि तद्विभाज्यते। (किरात, घण्टापच व्याख्या) ६. उद्भूतस्थलनलिनीवनादमुष्मादुभूतः सरसिजसम्भवः परागः बात्याभिर्वियति विवर्तितः समन्तावायत्ते कनवमयातपत्रलक्ष्मीम्।। (किरात. ५३६) कालिदासोत्तर महाकाव्य : पहली शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी तक १४१ चित्रबन्धों के तो वे ऐन्द्रजालिक ही हैं। कूट-कविता की इस कला में वे न केवल दक्ष हैं, अपितु उसके प्रति उनका विशेष पक्षपात भी प्रकट होता है। पादान्तादियमक, पादादियमक, एकाक्षरपद, एकाक्षर, समुद्गक, प्रतिलोमानुलोमपाद, सर्वतोभद्र, गोमूत्रिकाबन्ध आदि के अनेक उदाहरण उन्होंने प्रस्तुत किये हैं।’ विविध वृत्तों के प्रयोग में वे निष्णात हैं। उपजाति (इन्द्रवज्रा, उपेन्द्रवज्रा), वैतालीय, द्रुतविलम्बित, प्रमिताक्षरा, प्रहर्षिणी, स्वागता, उद्गता, पुष्पिताग्रा के अतिरिक्त औपच्छन्दसिक, अपरवक्त्र, जलोद्धतगति, चन्द्रिका, मत्तमयूर जैसे अप्रसिद्ध छन्दों का भी प्रयोग उन्होंने किया है। उनका ‘वंशस्थ’ अत्यन्त स्पृहणीय माना गया है, इसकी प्रशंसा करते हुए क्षेमेन्द्र कहते हैं - “वृत्तच्छत्रस्य सा कापि वंशस्थस्य विचित्रता। नगन लिन प्रतिभा भारवेर्येन सच्छायेनाधिकीकृता।।” " लामा (सुवृत्ततिलक, काव्यमाला श्लो. ३१ तृतीय-विन्यास) भारवि, अनेक शास्त्रों के पारदृश्वा और बहुश्रुत विद्वान् थे। किरातार्जुनीय में उन्होंने अनेक शास्त्रों की बहुज्ञता प्रदर्शित की है। फिर भी अध्यात्म या दर्शनों की अपेक्षा उनकी रुचि राजनीति, व्याकरण, आयुर्वेद, धनुर्वेद तथा कामशास्त्र की ओर अधिक है। उनकी अनेक मञ्जुल सूक्तियाँ आज भी पण्डितजनों की जिहागनर्तकी बनी हुई हैं। कुछ निदर्शन यथा-कानी

F की E हितं मनोहारि च दुर्लभं वचः’। (किरात. १४) किमी ‘सदानुकूलेषु च कुर्वते रतिं नृपेष्वमात्येषु च सर्वसम्पदः। (१५) ‘वरं विरोधोऽपि समं महात्मभिः। (१) हिमा ‘अहो दुरन्ता बलवद्विरोधिता। (१।२३) ‘ननु वक्तृविशेषनिःस्पृहा गुणगृह्या वचने विपश्चितः। (२॥५) ‘निवसन्ति पराक्रमाश्रया न विषादेन समं समृद्धयः। (२।१५) ‘न महानिच्छति भूतिमन्यतः’ (२।१८) १. कुछ क्लिष्ट प्रयोगों के उदाहरण इस प्रकार हैं- BIR TH Fमायामाका IPE (क) एकाक्षरपद- ससासिः सासुसः सासो येयायेयाययाययः। लली लीला ललो लोलः शशीशशिशुशीः शशन्।। (१५१५) (ख) एकाक्षर - न नोननुनो नुनोनो नाना नानानना ननु। नुनो ऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुत्रनुत्।। (१५।१४) (ग) प्रतिलोमानुलोमार्यशः - ननु हो मचना राघो घोरा नाथमहो नु न। तयदातबादा भीमा माभीदा बत दायत ।। (१५ ॥२०) DE H

काव्य-खण्ड १४२ पाकिसहसा विदधीत न क्रियामविवेकः परमापदां पदम्। किशानी वृणते हि विमृश्यकारिणं गुणलुब्धाः स्वयमेव सम्पदः ।। (२।३०) इत्यादि। ।