भारवि का समय तथा जीवनवृत्त
भारवि, ‘बृहत्त्रयी’ के प्रथम कवि और अलङ्कृत-काव्यधारा के पथिकृत पुरोधा हैं। अट्ठारह सर्गों में उपनिबद्ध तथा महाभारत के वनपर्व की एक छोटी घटना पर आधृत ‘किरातार्जुनीय’ महाकाव्य उनकी अब तक उपलब्ध एक मात्र कृति है। प्रायः अन्य प्राचीन संस्कृत-कवियों की ही भाँति, इतने भास्वर कर्तृत्व के धनी महाकवि का जीवनवृत्त अनुश्रुतियों और किंवदन्तियों के घेरे में अनिश्चित और अनिर्णीत सा है। स्वयं उन्होंने अपने विषय में कोई भी परिचयसूत्र अपने काव्य में नहीं दिया, इसलिए समीक्षकों ने विभिन्न बहिःसाक्ष्य एकत्र करके उनके स्थिति-काल, जन्मस्थान१३४ माता काव्य-खण्ड काममा नाकामयाब तथा वैदुष्य आदि के विषय में कुछ अनुमान किए हैं। विद्वानों के इन अनुमानों एवं उनसे प्राप्त होने वाले निष्कर्षों का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है - नीरष्टि भारवि कालिदास से प्रभावित हैं। महाकवि की शैली से पृथक् शैली के आविष्कर्ता होकर भी वे अनेकत्र कालिदास से, तथ्य और कथ्य दोनों का आदान करते हैं। अतएव वे कालिदास से परवर्ती हैं। माघ उनसे सर्वांशतः प्रभावित हैं इसलिए वे माघ से पूर्ववर्ती हैं- यह उनके समय की पूर्वापरसीमा है। जयादित्य और वामन ने अपनी ‘काशिकावृत्ति’, में ‘किरातार्जुनीय’ के पद्य को उद्धृत किया है। ‘काशिका’ की रचना ६०० ई. के आस-पास हुई मानी जाती है, इसलिए इनका समय छठी शती के आस-पास स्थिर होता है किन्तु ६५० ई. में होने वाले बाणभट्ट, जिन्होंने अपने गद्यकाव्य हर्षचरित में अपने से पूर्ववर्ती प्रायः सभी कवियों का उल्लेख किया है, भारवि का नामोल्लेख नहीं करते। इसका यही कारण हो सकता है कि सम्भवतः भारवि तब तक उत्तरभारत में प्रसिद्ध नहीं हुए थे। मि दक्षिण भारत के ‘ऐहोल-शिलालेख’ में जैन कवि रविकीर्ति अपने को कविता-निर्माण में कालिदास और भारवि के समान यशस्वी मानता है। इस शिलालेख का उत्कीर्णन चालुक्यवंशी राजा पुलकेशिन् द्वितीय की प्रशस्ति के रूप में ५५६ शकाब्द अर्थात् ६३४ ई: में हुआ था, तब तक दक्षिण-भारत में भारवि के (कालिदास के समान एक बड़े कवि के रूप में) प्रसिद्ध होने की सूचना मिलती है। शिलालेख का अन्तिम पद्य है - येनायोजि नवेश्म स्थिरमर्थविधौ विवेकिना जिनवेश्म । स विजयतां रविकीर्तिः कविताश्रितकालिदासभारविकीर्तिः ।। इसके अतिरिक्त दक्षिण भारत के ही पृथ्वीकोंकणि नामक एक राजा के दानपत्र से भी इनके समय का अनुमान करने में सहायता मिलती है। इसके लिखे जाने का समय ६६८ शक संवत् अर्थात् ७७६ ई. है। इसमें उल्लेख है कि पृथ्वीकोंकणि से सात पीढ़ी पूर्व उसके किसी पूर्वज राजा ‘दुर्विनीत’ ने भारविकृत किरातार्जुनीय के पन्द्रहवें सर्ग पर टीका लिखी थी पं. बलदेव उपाध्याय के अनुसार दुर्विनीत का समय ४८१ ई. के आस-पास है । तद्नुसार भारवि का स्थितिकाल ४५० ई. के लगभग माना जा सकता है। कुछ समीक्षक इसे छठी शताब्दी तक ले जाते हैं। देखिए- कालिदास के कुमारसम्भव की यह पहिती - “वद प्रदौथे स्फुटचन्दतारका विभावरी यबरुणाय कल्पते।” (५४४) तथा- ‘किरात ११४४ की वैसी ही उक्ति - “नमसः स्फुटतारस्य रावेरेव विपर्षयः।” तथा अनेक अन्य प्रसङ्ग। २. “श्रीमत्कोंकणमहाराजाधिराजस्य अविनीतनाम्नः पुत्रेण शब्दावतारकारेण देवभारतीनिबद्धबृहत्कथैनन। किरातार्जुनीयपञ्चदशासर्गटीकाकारेण दुर्बिनीतनामधेयेन…"। My Arch, Rep. (1916) 36 Scc. History of Classical Sanskrit Literrature. (M. Krishnamacharia) Motilal Banarasidas (First Reprint 1970) Pg. 184 ३. पं. बलदेव उपाध्याय- संस्कृत साहित्य का इतिहास (शारदा-निकेतन, वाराणसी) दशम संस्करण १६७८ पृ. १८२ कालिदासोत्तर महाकाव्य : पहली शताब्दी से तेरहवीं शताब्दी तक १३५ कि प्रो. कीथ इस समय को ५५० ई. के लगभग स्वीकार करते हैं। ’ दण्डी की कृति के रूप में प्रसिद्ध ‘अवन्तिसुन्दरीकथा’ से भारवि के निवासस्थान, आश्रयदाता एवं जीवन पर भी कुछ प्रकाश पड़ता है, किन्तु इस ग्रन्थ की प्रामाणिकता अभी सर्वमान्य नहीं है। इस कथा के उपक्रम के अनुसार भारवि दण्डी के प्रपितामह थे और इनका वास्तविक नाम ‘दामोदर’ था। ये चालुक्यवंशी नरेश-विष्णुवर्धन की सभा के रत्न थे। इसी प्रबन्ध के एक पाठान्तर के अनुसार वे दण्डी के प्रपितामह नहीं, अपितु प्रपितामह ‘दामोदर’ के मित्र थे। यद्यपि इन विवरणों से उनके दाक्षिणात्य होने के प्रमाण पुष्ट होते हैं। कि। शास्ता
‘किरातार्जुनीय’ की रचना के प्रेरकतत्त्व और उसका सामान्य-परिचय
किसी भी कवि की रचना के प्रेरकतत्त्व, तत्कालीन देश-काल की परिस्थितियाँ, समस्याएँ और लोकरुचि के अनुसार प्रवर्तित मान्यताएँ हुआ करती हैं। विशेष रूप से प्रबन्ध रचना और उसमें भी महाकाव्य की सृष्टि, साक्षात् न सही परोक्ष रूप से तो अपने युग की अभिव्यञ्जना अवश्य ही करती है भले ही उसका कथानक या वस्तु कुछ भी हो - कितनी ही पुरानी हो। जाअट्ठारह सर्गों का यह महाकाव्य महाभारत के ‘वनपर्व’ में तथा शिवपुराण, ज्ञान संहिता, अध्याय ६३ से ६७ तक वर्णित एक छोटी सी घटना पर आधारित है। दुर्योधन द्वारा अन्यायपूर्वक द्यूतक्रीडा में पराजित कर दिये जाने पर पाण्डव द्रौपदी के साथ अरण्य में निर्वासित जीवन व्यतीत कर रहे हैं। राज्यप्राप्ति हेतु शक्ति अर्जित करने के क्रम में व्यास एवं युधिष्ठिर की आज्ञा से तृतीय पाण्डव अर्जुन, इन्द्रकील पर्वत पर जाकर पाशुपतास्त्र की प्राप्ति के लिए भगवान् शकर की आराधना करते हैं। तपश्चर्या से प्रसन्न शिव किरातवेश में आकर उनके पराक्रम की परीक्षा लेते हैं और अन्त में सन्तुष्ट होकर उनको उनका अभीप्सित आयुध और शत्रुविजय का वर प्रदान करते हैं। महाभारत के इसी छोटे से इतिवृत्त को कल्पना और विचक्षणता का स्पर्श देकर महाकाव्य का वैशद्य प्रदान किया गया है। कवि ने अपनी कल्पना-प्रवणता, चरित्र-चित्रण की कुशलता एवं उक्ति-वैचित्र्य आदि से न केवल कथा को विस्तीर्ण किया है, अपितु अपने वैदुष्य, विशेषकर राजनीतिक व्युत्पत्ति के माध्यम से उसे आवर्जक, चमत्कारपूर्ण तथा हृद्य बनाकर विद्वान् सहृदयों के लिए, उनकी बुद्धि को कसने वाली कसौटी बनाकर प्रस्तुत किया है। महाकाव्य का अमीरस वीर है। नायक, धीरोदात्त अमित पराक्रमी अर्जुन है और पाशुपतास्त्ररूपी महान् उद्देश्य की सम्पूर्ति काव्य का परम फल है। महाकाव्य के लक्षणों के १. ए.बी. कीय- संस्कृतसाहित्य का इतिहास (हिन्दी अनु. मंगलदेव शास्त्री, मोतीलाल, बनारसीदास) द्वितीय संस्करण १६६७ पृ. १३४ 7. History of Classical Sanskrit Litt. Pg. 148-149 १३६ । काव्य-खण्ड अनुरूप’ प्रभात, चन्द्रोदय, ऋतु, पर्वत तथा अप्सराओं आदि के वर्णन द्वारा वस्तु को काव्यानुगुण और सरस बनाया गया है। महाकाव्य में विन्यस्त वस्तु का संक्षिप्त रूप इस प्रकार है - यूतक्रीडा में दुर्योधन से पराजित होकर युधिष्ठिर द्वैतवन में निवास कर रहे थे। उन्होंने दुर्योधन की राज्यव्यवस्था को जानने के लिए एक वनेचर को गुप्तचर के रूप में भेजा। वनेचर दुर्योधन की सम्पूर्ण राज्यप्रणाली का पता लगाकर युधिष्ठिर के पास आया और उसने दुर्योधन की सुव्यवस्थित व्यवस्था की बात बतायी। दुर्योधन की सफलता का समाचार सुनकर द्रौपदी और भीम ने युद्ध करने के लिए युधिष्ठिर को उत्तेजित किया, परन्तु धर्मराज ने उनके प्रस्ताव को अस्वीकार कर वनवास की अवधि पूरी करने की बात कही। उसी समय वेदव्यास जी वहाँ आये और उन्होंने मध्यम पाण्डब अर्जुन को पाशुपत अस्त्र पाने के लिए इन्द्रकील पर्वत पर तपस्या करने के लिए कहा। अर्जुन ने इन्द्रकील पर्वत पर जाकर कठिन तपस्या की। अर्जुन के तप को भङ्ग करने के लिए अप्सरायें आयीं किन्तु दृढव्रती अर्जुन पर उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ा। अर्जुन की तपस्या से प्रसन्न होकर देवराज इन्द्र वहाँ प्रकट हुए और उन्होंने अभीष्ट सिद्धि के लिए शङ्कर जी की उपासना का निर्देश दिया। इन्द्र के उपदेश के अनुसार अर्जुन ने दत्तचित्त होकर भगवान् शङ्कर की आराधना की। मुनिजन के आग्रह पर शिवजी ने अर्जुन की परीक्षा लेने के लिए किरात का वेष धारण किया और एक मायावी शूकर को अर्जुन की ओर भेजा। अर्जुन ने अपनी ओर आते हुए शूकर पर बाण छोड़ा। वह बाण शूकर को मारकर जमीन में धस गया। उधर किरात ने भी तीर छोड़ा जो शूकर के शरीर में घुसा था। उसी बाण के लिए किरात और अर्जुन के बीच द्वन्द्व छिड़ गया। युद्ध में कभी अर्जुन का पलड़ा भारी होता तो कभी किरात का। अन्ततः दोनों बाहुयुद्ध पर उतर आये। अर्जुन के अतुल बल से प्रसन्न होकर भगवान् शङ्कर ने अपना रूप प्रकट किया और अपना दिव्य पाशुपत अस्त्र देकर अर्जुन के मनोरथ को पूरा किया।