२८ जैन शतक

जिनशतक-जम्बूगुरु कवि के जिनशतक पर नागेन्द्र कुलोत्पन्न साम्बमुनि की टीका मिलती है। टीका की पुष्पिका में साम्ब ने टीका-समाप्ति का काल वि. सं. १०२५ बताया है ’ । अतएव “जिनशतक'२ ) की रचना ११वीं शती के पूर्व हो चुकी थी। यह सम्पूर्ण शतक स्रग्धरा छन्द में है तथा चार भागों में विभाजित है। प्रत्येक भाग में २५-२५ पद्य हैं। प्रथम भाग में जिन के चरण, द्वितीय में उनके हाथ, तृतीय में उनके मुख तथा चतुर्थ में उनकी वाणी का वर्णन है। इस शतक में पाञ्चाली रीति तथा अलङ्कारों की छटा मनोहर है। प्रायः सभी पर्यों में अनुप्रास का सातत्य बनाये रखने का कवि ने आयास किया है, जिसके कारण सम्पूर्ण काव्य में प्रसाद गुण की क्षति और चमत्कार तथा चित्रकाव्य के गुणों की वृद्धि हुई है। हाल जिन के चरण के विषय में कवि का कथन है क्षोणी क्षान्त्या क्षिपन्तः क्षणिकरनिकरस्त्रीकटाक्षाक्षताक्षा मोक्षक्षेत्राभिकाङ्क्षाः क्षपितशुभशताक्षेमविक्षेपदक्षाः। अक्षोभाः क्षीणरुक्षाक्षरपटुवचनाभिक्षवो मझ्वलक्ष्मी साक्षाद्वीक्ष्य क्षिपन्ति क्षपयतु स जिनः क्षय्यपक्षं यदङ्घी।। (६) भिक्षु या संन्यासीजन जिन जिन भगवान् के चरणों को देखकर अलक्ष्मी या अमङ्गल को दूर कर देते हैं, वे जिन आपके क्षय्यपक्ष का शत्रुपक्ष का क्षपण करें- इतनी सी बात को कहने के लिए कवि ने वाग्जाल का विस्तार किया है। माता मत पणा की किया कि पति । १. काव्यमाला, गुच्छक-७, पृ.५२ पर पादटिप्पणी-१ २. काव्यमाला गुच्छक-७ (पृ. ५२ - ७५

पञ्चम अध्याय IPEJNEEPDE