२७ गीतिशतक

देवीस्तोत्रों में सुन्दराचार्यकृत ‘गीतिशतकम्’ एक भावपूर्ण रचना हैं । सुन्दराचार्य दक्षिण भारत के थे-यह उनके स्तोत्र से विदित होता है, पर उनका समय निर्धारण करना कठिन है। गीतिशतक में अत्यन्त लयपूर्ण गेय पदविन्यास के साथ अम्बिका की कान्ति का निर्वचन है। कान्तिमत्यम्ब की आवृत्ति प्रत्येक पद्य के अन्त में की गई है। कवि की दीनता और देवी की तेजस्विनी तथा वदान्यता दोनों का आख्यान तारतम्य और व्यतिरेक का विशद अनुभव देता है। कवि देवी को भक्ति और प्रेम में भरकर उपालम्भ भी देता है। मामसकृदाप्रसादाद् दुष्कृतकारीति माममन्यस्व। स्मर किं न मया सुकृतं वर्धितमिदमद्य कान्तिमत्यम्ब ।।(७) हे कान्तिमती अम्बिके, मैं अभी तक पाप करता रहा -यह समझकर मेरी उपेक्षा मत करो। यह क्यों नही देखती कि आज तुम्हारा नाम लेकर मैंने अपनी सुकृति को बढ़ा ली ही। अपनी हीनता का आख्यान करते हुए कवि ने रूपक का सुन्दर प्रयोग किया है। १. काव्यमाला गुचाक, पृ. १३२- १४० काव्य-खण्ड ध्यानाम्बरवसतेर्मम मानसमेघस्य दैन्यवर्षस्य। जिस पदयुगली तव शम्पालक्ष्मी विदधातु कान्तिमत्यम्ब ।। हे कान्तिमती अम्बिके, ध्यानरूपी आकाश में निवास करने वाली, दैन्य की वर्षा करने वाले मेने मानसमेघ पर तुम्हारे चरणयुगल की विद्युल्लक्ष्मी का अवतरण करे। एक उदाहरण और द्रष्यव्य है करुणाविषयं यदि मां न तनोषि यथा तथा वर्तेऽहम् । भवति कृपालुत्वं ते सीदाभि मृषेति कान्तिमत्यम्ब ।।