१९ काव्यभूषणशतक

काव्यभूषणशतक के प्रणेता श्रीकृष्णवल्लभकवि का देश, काल अज्ञात है। इनके इस शतक में श्रृङ्गाररस की उन्मद धारा प्रवाहित है। कवि की शैली अत्यन्त अलङ्कत और चमत्कृतिमय है। पृथ्वी, मन्दाक्रान्ता, शार्दूलविक्रीडित, स्रग्धरा आदि विविध छन्दों का निपुण प्रयोग इस शतक में किया गया है। नायिका के देह को रङ्गमञ्च बताकर सागरूपक का चतुराई से निर्वाह करता हुआ कवि कहता है गि अङ्ग रङ्गस्थलं ते कुवलयनयने मन्मथः सूत्रधारो कि त हीभारः स्थापकोऽयं तरलितवलयक्वाणभगिंश्च नान्दी। हमाठ किनिदष्टा केलिप्रदीपस्तरुणिमललितं नाटनीयं वसन्तः कि किती उन्न । - सन्ध्यव्यसयन्नुरोनावरणजवनिकां नायकोऽयं प्रविष्टः ।।२१।। गाना