१६ विश्वेश्वर पाण्डेय : रोमावलीशतक

विश्वेश्वर पाण्डेय अठारहवीं शताब्दी के उल्लेख्य तार्किक, आलंकारिक, वैयाकरण तथा कवि हैं। ये अल्मोड़ा जिले के पाटिया ग्राम के मूल निवासी थे। इन्होंने अलङ्कारकौस्तुभ, अलङ्कारप्रदीप, अलकारमुक्तावली, कवीन्द्रकण्ठाभरण, रसचन्द्रिका, वैयाकरणसिद्धान्तसुधानिधि आदि प्रौढ़ शास्त्रीय ग्रंथों के अतिरिक्त नाटिका, सट्टक और मुक्तक की विधाओं में प्रचुर काव्यरचना की। काव्यों में काव्यतिलक, काव्यरत्न, वक्षोजशतक, षड्जातुवर्णन तथा होलिकाशतक के अतिरिक्त इनका रोमावलीशतक तथा आर्यासप्तशती उल्लेखनीय रचनाएं हैं। रोमालीशतक में उत्प्रेक्षा या कल्पना की उड़ान है। नायिका के देह-सौंदर्य का चमत्कारमय वर्णन करने वाले काव्यों की परंपरा में यह उन काव्यों में है, जिनमें अंग या प्रत्यंग के किसी एक कोने पर ही कवि मुग्ध होकर उसे विविध उपमानों, बिंबों या अप्रस्तुतविधानों के आलोक में ताकता रह जाता है। विश्वेश्वर पाण्डेय कहते हैं- .. वहिन विनैव तव रोमलतामिषेण AL लाल र घूमावली स्फुरति नाभिगभीरदर्याम् । जति कामाजिक संख्यामतीतमतिदुर्लभमत्र-तेन सामान बिलगमनाया उन्मानाका परिवाना मन्यामहे कुसुमचापमहानिधानम् ।। (२) पिया-प्रशालाला मुक्तक-काव्य-परम्परा: शतककाव्य १२५ रोमलता के बहाने से मानो तुम्हारी नाभिरूपी गहन गुहा से धुमावली निकल रही है। लगता है इस गुहा में कामदेव के असंख्य और अतिदुर्लभ शस्त्रों का खजाना छिपा हुआ है। वसन्ततिलकावृत्त में भाषा के निखार और रसमाधुरी के अभिषेक से विश्वेश्वर ने रोमावली को परम उज्ज्वल रूप में प्रस्तुत किया है, कहीं वह नायिका के हृदय में स्थित शिव के क्रोध से जलते कामदेव को हलधारी बलराम समझकर उसकी आग बुझाने दौड़ पड़ी कलिंदकन्या सी लगती है (२४), तो कहीं नाभिकूप से रसघट खीचने वाली रज्जु (१०), तो कभी वह कवि को वक्षोरुहक्षितिधरद्वितयान्तराल से फूट पड़ी “शुचिरसमयी सरस्वती” लगती है (२४)। व जगागागा का विश्वेर की आर्यासप्तशती गोवर्धन कवि के इसी नाम के कोशकाव्य को आदर्श बनाकर की गयी रचना है। गोवर्धन की कृति के ही समान यहां भी व्रज्या-क्रम से स्फुट आर्याओं को कवि ने संकलित कर लिया है। श्रृंगार की इस सप्तशती में पूर्ववत् प्रमुखता म