१५ गुमानिकवि : उपदेशशतक

उपदेशशतक के कर्ता गुमानिकवि का समय अज्ञात है। इस काव्य का भी स्वरूप दृष्टान्तशतक के समान है। दृष्टान्तस्वरूप कवि ने इतिहासपुराणों के आख्यानों या सुप्रसिद्ध कथाओं का अच्छा उपयोग किया है। समान विपत्ति में पड़े हुए व्यक्ति से मित्रता फलदायक होती है, जिसनकार राम ने सुग्रीव से मित्रता की१२४ काव्य-खण्ड काला निकाल कल्स पिक सुग्रीवो रघुपतिना हृतदारेणोपगम्य हृतदारः। शाह जमाना कनिक दृढभावबन्धसख्यं समानदुःखः सखा कार्यः।। (१६)शाम से मना उपदेशशतक में अधिकांश दृष्टांत भागवत तथा हरिवंशपुराण से लिये गये हैं, जिनसे वैष्णव-परंपरा के प्रति कवि की आस्था प्रकट होती है तथा जिस श्रोतृवर्ग को वह उपदेश देना चाहता है, वह भी कृष्णकथा तथा महाभारत के प्रसंगो में रमा हुआ होगा, ऐसा कहा जा सकता है। साम के प्रयोग का दृष्टांत बड़ा सटीक है- जिसप्रकार वसुदेव ने देवकी को मारने के लिये उद्यत कंस को मधुर उक्तियों से समझाकर अपनी पत्नी की प्राणरक्षा की, उस प्रकार व्यक्ति को साम का प्रयोग करना चाहिये हन्तुं देवकीतनयान् वसुदेवेनोधतायुधः कंसः। मित सहा मधुरोक्तिभिरनुनीतः साम्ना मूर्ख वशे कुर्यात् ।। (८) यशाना ‘कुतुकाय कोविदानां मूढमतीनां महोपकाराय’ (१०१) विरचित उपदेशशतक में आद्यंत आर्या छन्दों में प्रसन्नगम्भीरपदा सरस्वती से उत्कर्षान्वित स्मृति तथा पुराण दोनों का अच्छा सामंजस्य प्रस्तुत हुआ है। आणि हा