दृष्टान्तशतक के रचयिता कुसुमदेव का समय १५वीं शताब्दी के पूर्व है, क्योंकि वल्लभदेव ने अपनी ‘सुभाषितावली’ में उन्हें उद्धृत किया है। इस पूरे शतक में दृष्टान्तों का प्रत्येक पद्य में प्रयोग करते हुए पूर्वार्ध में कथित सूक्तिवाक्य को सोदाहरण हृदयंगम उत्तरार्ध में बनाया गया है। सूक्तियों में कवि का जीवनानुभव पिरोया हुआ है और उसके लिये दृष्टान्त-योजना सर्वत्र सटीक ही उसने की है। उदाहरण के लिये धनमपि परदत्तं दुःखमौचित्यभाषांत किया कि जाता उगायतनिक भवति हृदि तदेवानन्दकारीतरेषाम् । नानातिकातीकारकीति मलयजरसबिन्दुबर्बाधते नेत्रमन्त- समाचार जनयति च स एवास्लादमन्यत्र गात्रामा सज्जन व्यक्ति के लिये दूसरों का दिया धन क्लेशदायक ही होता है,पर वहीं धन दूसरों के लिये आनंददायक हो जाता है। चंदन का रस आंख में पड़ गया, तो कष्ट देता है, वही रस देह में लगाने पर आह्लाद देता है। माना जाता तो निशिगत