१३ नरहरिकृत श्रृङ्गारशतक

श्रृङ्गारशतक के रचयिता नरहरि का काल अज्ञात है। काव्य की पुष्पिका में कवि के कथन से विदित होता है कि कालिदास, बाण और श्रीहर्ष के काव्य से परिचित हैं। अतः उसका समय १२वीं शती के पश्चात् होना चाहिए। इस शतक में शार्दूलविक्रीडित, नग्धरा, ५.., काव्यमाला एकादश गुचाक fore गुना कम मुलाक बराक झिी मुक्तक-काव्य-परम्परा : शतककाव्य १२३ मन्दाक्रान्ता, आर्या, मालिनी, पृथ्वी, वसन्ततिलका तथा अन्त में शिखरिणी छन्द का क्रमशः प्रयोग है। भाषा और शैली अत्यन्त स्निग्ध, मसृण, और रसाप्लुत है, अनेक पद्यों में कवि ने अपना नामोल्लेख करके स्वयं को श्रृङ्गार की धारा में गोता लगाता हुआ चित्रित किया है। रूपक आदि अलंकारों की छटा से उसकी वाणी और सज-संवर उठी है-काणी मुक्तामण्डितकर्णशूक्तिरुचिरे बिम्बोष्ठरत्नाकरे या कि किती पर्यन्तस्थितनीलकुन्तलवने लावण्यकल्लोलिनि। चार्वङ्ग्या मधरस्मितामतनिधौ शोभासमद्रे मखेर चक्षमीनमनोहरे नरहरेश्चेतो निमग्नं सखि।। (जिसमें कान की रुचिर सीपी मुक्ता से मंडित है, बिंबाधर रत्नाकर सा है। पीछे नील कुंतलवन है, लावण्य की कल्लोलें उठ रही हैं, मधुर मुस्कान का चंद्रमा ऊपर उदित है, नयनों के मीन क्रीड़ा कर रहे हैं, ऐसे उस तन्वंगी की शोभा के समुद्र मुख में नरहरि का चित्त डूब गया है। माया पति त तपसमा मा निगमा शिणा