खड्गशतकम्’ किसी अज्ञातनामा तथा अनिर्णीतदेशकाल कवि की उत्कृष्ट काव्यरचना है। कश्मीरनरेश के पुस्तकालय में इसकी हस्तलिखितप्रति प्राप्त होने से अनुमान होता है कि कवि संभव है कश्मीर का अभिजन हो। अनेक स्थलों पर त्रुटित पाठ के साथ इस काव्य के ६६ ही पद्य प्राप्त होते हैं, जिन पर (कदाचित् कवि की स्वोपज्ञ) टीका भी है। संपूर्ण काव्य स्रग्धरा छन्द में है तथा इसमें किसी राजा के खड्ग (तलवार) का अत्यंत ओजस्वी वर्णन है। गौडीरीति, सानुप्रास दीर्घवृत्तियों तथा गाढबंधा पदावली का आयंत सफल निर्वाह कवि ने किया है। शब्दचित्र और अर्थचित्र दोनों प्रकार के काव्यों का उसने समन्वय । करने का प्रयास भी किया है, फिर भी अर्थचित्र की अपेक्षा शब्दचित्र की छटा कुछ अधिक ही हावी होकर रचना में उभरी है। उदाहरणार्थ- त झात्कारान् जैत्रजन्ये झगिति जनयतो झन्मिकर्णज्वरार्ति झञ्झावातानुकाराज्झणझणितिझणत्कारिणः प्रोज्जिहानः। झाषाङ्की तामवस्था झगिति रिपुजनं ग्राहयन् धूर्जटीष्टां झूरन्नभ्राहितेषूज्झितरणरभस प्राज्ज्हिीतेऽस्य खड्गः।। (८) संपूर्ण काव्य में खड्ग के कर्तृत्व और चमत्कार पर कवि की दृष्टि इस तरह आसक्त है कि खड्ग चलाने वाले राजा का न तो उसने नामोल्लेख किया है, न ‘अस्य’ इस सर्वनाम के अतिरिक्त अन्य कोई विशेषण ही उसके लिये दिया है। सानुप्रासपदावली के गुंफन के साथ-साथ काव्य में कल्पना का समुचित उपयोग करते हुए अर्थालंकारों का भी अच्छा विन्यास कवि ने किया है। खड्ग के लिये आवश्यतानुसार अनेक पद्यों में ‘कृपाणी’ शब्द का प्रयोग करते हुए उसे कहीं काली से उपमा दी गयी है, तो कहीं वारवनिता के पुलक, राग, आश्लेष आदि हाव-भाव और चेष्टाओं का उसमें दर्शन करके श्लिष्टोपमाओं की छटा प्रकट की गयी है पिन को सश्रीका विस्फुरन्ती सततपुलकितं दर्शयन्ती निजाङ्गता सिद्रागा वीर्यमात्रा मनसि सरभसं क्षोभमुत्पादयन्ती। In आश्लिष्यन्ती किलान्यं समिति सुविपुले कण्ठदेशेऽतिगाढं TIF या वारस्त्रीव सक्ता भवति विजयते सास्य जैत्रा कृपाणी।। शनि