शान्तिशतक के रचनाकार शिल्हण कश्मीर के निवासी प्रतीत होते हैं। सदुक्तिकर्णामृत (श्रीधरसेन, १२०५ ई.) में इनके पद्य उद्धृत किये गये हैं, अतः शिल्हण का समय १३वीं शताब्दी के पूर्व माना जा सकता है। डा. एस.के.डे. ने शिल्हण को राजशेखर से परिचित और विद्धशालभजिका नाटिका के एक पद्य से प्रभावित बताया है। पिशेल विल्हण तथा शिल्हण को अभिन्न मानते हैं, पर उनकी मान्यता प्रान्त प्रतीत होती है। शान्तिशतक में चार अध्याय हैं- परितापशमन, विवेकोदय, कर्तव्यता तथा ब्रह्मप्राप्ति । संपूर्ण काव्य में शान्तरस की प्रधानता है और भर्तृहरि के वैराग्यशतक का प्रभाव परिलक्षित होता है। शिल्हण की इस रचना की एक अन्य सुदुर्लभ विशेषता वैदिक, बौद्ध, तथा जैन धर्म और दर्शन के नीतियुक्त सदुपदेश का समन्वय है। शिल्हण की भाषाशैली सूक्तिप्रवण, तत्त्वावगाहिनी, सरल, और प्रांजल है। मनुष्य की बढ़ती हुई अपूरणीय कामनाओं पर कटाक्ष करते हुए कवि कहता है-अलिक विकि वास्ता शिवाय त्वामुदर साधु मन्ये शाकैरपि यदसि लब्धपरितोषम् । ती EE हृतहृदयं यधिकाधिकवाञ्छाशतदुर्भरं न पुनः।। जय हे उदर, तुम ही भले हो, जो साग-भाजी से भी संतुष्ट हो लेते हो। इस मुए हृदय का क्या किया जाय, जिसकी जितनी ही इच्छाएं पूरी करो, उतनी ही बढ़ती है। वस्तुतः शिल्हण मनस्विता और मनुष्य की स्वाधीनता का गायन करने वाले कवि हैं। वे मनुष्य को उसके सहज अकृत्रिम जीवन की ओर ले जाना चाहते हैं मूलो वल्कलमास्तरं किसलयान्योकस्तरूणां तलम्। मूलानि क्षतये क्षुधां गिरिनदीतोयं तृषाशान्तये। आकाः क्रीड़ा मुग्धमृगैर्वयांसि सुहृदो नक्तं प्रदीपाः शशी । स्वाधीने विभवे तथापि कृपया याचन्त इत्यद्भुतम् ।। (वल्कल के वस्त्र, पत्तों की शय्या, तरुतल के नीचे घर, क्षुधा, की पूर्ति के लिये फल-फूल और तृषा की शांति के लिये नदियों का जल, भोलेभाले मृगों के संग क्रीड़ा, पक्षियों की मैत्री और रात को चंद्रमा का दीपक-यह सारा वैभव जब स्वाधीन है, तो फिर भी कपण लोक भीख मांगते फिरते हैं- बड़े आश्चर्य की बात है।) १. हिस्ट्री आफ संस्कृत लिटरेचर, डे तथा दासगुप्ता, पृ.४०१ १२२ काव्य-खण्ड पनि