नीलकण्ठदीक्षितरचित नीलकण्ठचम्पू के साक्ष्य के आधार पर अप्पयदीक्षित का समय १६वीं शती का अन्तिम चरण माना जाता है। इनकी ३० रचनाओं में वैराग्यशतक अन्यतम है। इस शतक में १०१ पद्य हैं जिनमें कवि ने संसार की असारता, जीव की क्षणभङ्गुरता, ज्ञान की महत्ता और अन्त में शिवभक्ति की श्रेष्ठता का प्रतिपादन अत्यन्त सरल एवं प्राञ्जल शैली में किया है। वीतराग पुरुष की धीरता का परिचय देते हुए कवि का कथन है - (RF पततु नभः स्फुटतु मही चलन्तु गिरयो मिलन्तु वारिधयः। निमयर लिफा कि अधरोत्तरमस्तु जगत् का हानिर्वीतरागस्य।। (वैराग्यशतक ६) सन्त पुरुष स्त्रीरूपी प्रचण्ड हवा के झोंके से पर्वत की भाँति झुकते नहीं हैं - तृणवद् भ्रमन्ति चपलाः स्त्रीनामनि चण्डमारुते चलति। ASTRधरणिधरा इव सन्तस्तत्र न किञ्चित्प्रकम्पन्ते।। (वै.श.१५) - व्यक्ति के जीवन में विरोधाभास का कितना सटीक वर्णन है- *गी बसर मात कामानि का मावि १. काव्यमाला गुच्छक प्रथम पृ. ६१ पादटिप्पणी। २. काव्यमाला गुच्छक प्रथम में चौखम्बा भारती अकादमी, वाराणसी, १८८ ई. में प्रकाशित १२० काव्य-खण्ड लाह पितृभिः कलहायन्ते पुत्रानध्यापयन्ति पितृभक्तिम्।। परदारानुपयन्तः पठन्ति शास्त्राणि दारेषु।। (वै. श. २४) नाशिक अन्त में परमशिव की शरणागति को जीवन का चरम लक्ष्य मानते हुए कवि का कथन है: त्यज संसारमसारं भज शरणं पार्वतीरमणम्।काला मार विश्वसिहि श्रुतिशिखरं विश्वमिदं तव निदेशकरम् ।। हिजार तानाश (वै. श. ६१) -
श्रीपद्मानन्दकवि - वैराग्यशतकम्-'
श्रीपद्मानन्दकवि के देश और काल अज्ञात हैं। इन्होंने वैराग्यशतक नामक पुस्तक की रचना की है। इस वैराग्यशतक में १०३ पद्य हैं। अधिकतर पद्य शार्दूलविक्रीडित छन्द में हैं। कुछ अनुष्टुप् भी हैं। भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और प्राञ्जल है। कवि ने अपनी अनुभूति को जनहित के लिए स्फीतवाणी का रूप दिया कवि की भाषा-शैली के कतिपय उदाहरण द्रष्टव्य हैं। महापुरुष की उत्कृष्टता के विषय में कवि की मान्यता है यः परवादे मूकः परनारीवक्त्रवीक्षणेऽप्यन्धः। पङ्गुः परधनहरणे स जयति लोके महापुरुषः।। (वै. श. ४) मिमा दुर्दशाग्रस्त कामिजनों को धिक्कारते हुए कवि ने कहा है योगे पीनपयोधराञ्चिततनोविच्छेदने बिभ्यतां मिल मानस्यावसरे चटूक्तिविधुरं दीनं मुखं बिभ्रताम् विश्लेषस्मरवहिननानुसमयं दन्दस्यमानात्मनां मक प्रातः सर्वदशासु दुःखगहनं धिक्कामिनां जीवितम् ।। (वै.श. ११) रूपक अलङ्कार के माध्यम से चरित्ररूपी वृक्ष के मुक्तिरूपीफल का वर्णन मर्मस्पर्शी है- तो किया । मी सज्ज्ञानमूलशाली दर्शनशाखश्च येन वृत्ततरुः। (P.B) | श्रद्धाजलेन सिक्तो मुक्तिफलं तस्य स ददाति ।। वै.श.२४ रमणी के प्रति आसक्त चित्त को वश में नहीं करने वाले पुरुष के पूजा-पाठ, व्रत-तप, दण्डधारण आदि निरर्थक हैं काव्यमाला गुच्छक-७ में (पृ.७१-८५) प्रकाशित। मुक्तक-काव्य-परम्परा : शतककाव्य किं भस्मप्रतिलेपनेन वपुषो धूमस्य पानेन किं वस्त्रत्यागजुगुप्सया किमनया किं वा त्रिदण्डाप्यहो। किं स्कन्धेन न तेन कम्बलभराज्जापस्य किं मालया - वामाक्षीमनुधावमानमनिशं चेतो न चै रक्षितम्।। (वै.श. ५३) इस प्रकार पद्मानन्द रचित वैराग्यशतक का शतक साहित्य में विशेष महत्त्व है।