०९ भल्लट : भल्लटशतक

भल्लट भी अमरुक की भांति प्राचीन मुक्तककारों में अग्रगण्य हैं तथा आनन्दवर्धन के द्वारा ध्वन्यालोक में (बिना नामोल्लेख) उनके शतक का एक पद्य उद्धृत किया गया है, अतः उनका भी समय आनन्दवर्धन के पूर्व ८०० ई. के आस-पास होना चाहिए। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि मल्लट आनन्दवर्धन के समकालिक युवा कवि रहे होगें, अतएव उन्होंने भल्लट का नामोल्लेख करने की आवश्यकता नहीं समझी। भल्लट का दूसरा महत्त्वपूर्ण उल्लेख कल्हण की राजतरङ्गिणी में किया गया है। कल्हण कहते हैं कि राजा शङ्करवर्मा गुणियों की संगति से पराङ्मुख था, अतएव उसके राज्य में भल्लट जैसे कवियों को कष्टमय जीवन बिताना पड़ रहा था। त्यागभीरुतया तस्मिन् गुणिसङ्गपराङ्मुखे। आसेवन्तावरा वृत्तीः कवयो भल्लटादयः।। (राजत. ५२०४) शङ्करवर्मा का शासनकाल ८८३ ई. से ६०२ ई. तक है। निश्चय ही भल्लट आनन्दवर्धन के कनिष्ठ समकालीन हैं, क्योंकि आनन्दवर्धन राजा अवन्तिवर्मन के समय रहे थे। उस समय भल्लट एक उभरते हुए कवि रहे होगें। उन्हें अवन्तिवर्मा के शासनकाल में कश्मीर में हुए महाकवियों मुक्ताकण, शिवस्वामी तथा आनन्दवर्धन का सांनिध्य भी मिला होगा। माला ल FFIFE I S FILEp कक मार

भल्लटशतक की विषयवस्तु

कल्हण ने भल्लट के कष्टमय जीवन का संकेत देते हुए यह भी उल्लेख किया है कि उसी राजा शङ्करवर्मा ने लवट नामक किसी जडबुद्धि मुक्तक-काव्य-परम्परा शतककाव्य भारवाहक को आश्रय देकर दो सहस्र दीनार वेतन प्रदान किया था। लवट संस्कृतकाव्य का द्रोही तथा नीचकुल में उत्पन्न था। सुकवियों और गुणशाली लोगों के प्रति शासक का ऐसा उपेक्षाभाव देखकर भल्लट ने वेदना को प्रच्छन्न रूप में अन्योक्तियों के द्वारा भल्लटशतक में अभिव्यक्ति दी है। इन अन्योक्तियों में व्यंग्य या आक्षेप का भाव अन्तर्गर्भित है। अपने समय की विसंगत तथा विडम्बना को तथा अपने से कुछ पहले के उज्ज्चलकाल को उन्होंने सूर्य के रूपक के द्वारा रेखांकित करते हुए कहा है कि कलाकारतछा कि इस पातः पष्णो भवति महते नोपतापाय यस्मात कालेनास्तं क इह न ययुर्यान्ति यास्यन्ति चान्ये। एतावत्त व्यथयतितरां लोकबायैस्तमोभि- 5 स्तस्मिन्नेव प्रकृतिमहति व्योम्नि लब्धोऽवकाशः।। (११) (सूर्य डूब गया, यह दुःखी होने की बात नहीं। समय आने पर कौन अस्त नहीं हुआ और होगा? पर दुःख की बात यह है कि उसी विशाल व्योम में बाहरी अँधेरे ने कब्जा कर डाला है। सारण भल्लट ऐसे प्रतिभाशाली लोगों के लिये पूरी सहानुभूति रखते हैं, जिन्हें व्यवस्था के दोष के कारण पनपने का अवसर नहीं मिला। उनका निम्नलिखित मार्मिक पद्य आनन्दवर्धन ने भी उद्धृत किया है- नाटक मणि रिमा एका ती काही परार्थे यः पीडामनुभवति भङ्गेऽपि मधुरो र म क आग यदीयः सर्वेषामिह खल विकारोऽप्यभिमतः। न म ला न सम्प्राप्तो वृद्धिं स यदि भृशमक्षेत्रपतितः किमिक्षोर्दोषोऽयं न पुनरगुणाया मरुभुवः।। (४३) (जो दूसरों के लिये पीड़ा सहता है, तोड़ा जाने पर भी माधुर्य ही विखेरता है, जिसका विकार (गुड़, शक्कर) आदि भी सब पसंद करते हैं, वह गन्ना यदि अनुर्वर भूमि में बो दिया जाने पर बढ़ नहीं पाया, तो यह गन्ने का दोष है या निर्गुण मरुभूमि का?) आनन्दवर्धन ने इसे (ध्वन्योलोक ३।४० वृत्ति) में उद्धृत करते हुए वाच्य की विवक्षा वाली अप्रस्तुतप्रशंसा का उदाहरण बताया है। भल्लट की उक्तियों में निराशा और विषाद की छाया भी है, गाम्भीर्य और चिन्तनप्रवणता भी है, पर उसके साथ-साथ हास्य की बारीक रेखा और अधिक्षेप की सूक्ष्मता उनके काव्य में सर्वत्र प्रभावशाली रूप में देखने को मिलती है। वे समुद्र का भी उपहास करने से नहीं चूकत- inीमा मालिनी की पाक किसी मिलान हा हल्ला) मामला बाजवा काव्य-खाण्ड, सातार अयं वारामेको निलय इति रत्नाकर इति पाय मारियार सनी लिमा श्रितोऽस्माभिस्तृष्णातरलितमनोभिर्जलनिधिः। इति तिमि कतारक एवं जानीते निजकरपुटीकोटरगतं HABEL क्षणादेनं ताम्यत्तिमिनिकरमापास्यति मनिः (१००) न तृष्णा से तरल मन वाले हम लोगों ने सागर का आश्रय लिया था कि यह तो जल का सबसे बड़ा आगार है, रत्नाकर है। पर कौन जानता था कि अगस्त्य मुनि अपनी अंजलि की खोह में समो कर तड़पती मछलियों वाले इस सागर को क्षण भर में पी लेगें? काव्यप्रकाशकार मम्मट ने इस पद्य को विरोध अलङ्कार के उदाहरण के रूप में दसवें उल्लास में प्रस्तुत किया है। उपहास, नर्म, व्यंग्य, विषाद, अधिक्षेप और आक्षेप के इन स्वरों के साथ भल्लट का काव्य वस्तुतः गुणी व्यक्तियों के समादर और अभिज्ञान के लिये एक प्रबल अनुरोध है। सागर को ही अन्योक्ति का विषय बनाकर उन्होने रत्नों को न ठुकराने का आग्रह किया है कल्लोलवेल्लितदृषत्परुषप्रहार-रत्नान्यमुनि मकराकर मावमंस्थाः। किं कौस्तुभेन विहितो भवतो न नाम याच्या प्रसारितकरः पुरुषोत्तमोऽपि ?।। (६०) हे मकरालय, अपनी लहरों से पत्थरों पर पछीट-पछीट कर इन रनों का अपमान मत करो। इन्हीं रत्नों में वह कौस्तुभ मणि भी तो थी, जिसके कारण भगवान् विष्णु तक तुम्हारे आगे हाथ पसारे आ खड़े हुए थे। दिने मम्मट ने इस पद्य को भी उद्धृत किया है, परन्तु अविशेषपरिवृत्ति-दोष के उदाहरण में। उनके मत में कौस्तुभ मणि का नाम लेने के स्थान पर “एकेन किं न विहितो भवता न नाम”-इस प्रकार वही बात कही जा सकती थी। निराशा और विषाद को अभिव्यक्ति देते हुए भी मल्लट हताश नहीं हैं, वे जीवन में आस्था और अटूट संघर्ष पर बल देते हैं, और उनके काव्य का अन्तःस्वर भी इसलिये आशा का ही है। पुरुषोत्तम के प्रेरणादायक चरित्र को उन्होंने इसी दृष्टि से उन्मीलित किया पुंस्त्वादपि प्रविचलेद् यदि यद्यथोऽपि -BFSSAIDी यायादु यदि प्रणयने न महानपि स्यात।REET अभ्युद्धरेत तदपि विश्वमितीदशीयं E URREARRITATE केनापि दिक् प्रकटिता पुरुषोत्तमैन ।। (७६) नि चाहे पौरुष को छोड़ना पड़े (विष्णु के पक्ष में मोहिनी रूप में), चाहे नीचे गिरना पड़े (विष्णु के पक्ष में पाताल में), चाहे याचना करके छोटा बनना पड़े (विष्णु के पक्ष में वामन रूप में), फिर भी पुरुषोत्तम (उत्तम व्यक्ति तथा विष्णु) विश्व का उद्धार करे - यह दिशा पुरुषोत्तम (उत्तम पुरुष, विष्णु) ने दिखा दी है। मुक्तक-काव्य-परम्परा : शतककाव्य ११ मम्मट ने इस पद्य को भी काव्यप्रकाश में उद्धृत करते हुए अप्रस्तुतप्रशंसा के श्लेषच्छाया नामक प्रकार का सुंदर उदाहारण माना है। जी छन्दों तथा विषयों की विविधता की दृष्टि से भी भल्लटशतक आकर्षित करता है। इसमें विभिन्न वृक्षों, विभिन्न पशुओं, सूर्य, इक्षु, सागर, तृण, पुरुष आदि विविध पदार्थों को माध्यम बना कर अत्यन्त सारग्राही ढंग से सुचिन्तित विचार को अभिव्यक्ति दी गयी है। भल्लट की वैदर्भी रीति तथा पदावली की प्राञ्जलता भी प्रशंसनीय है। आनन्दवर्धन के पश्चात भल्लट को सर्वाधिक उद्धृत आचार्य मम्मट ने किया है, जिससे भल्लट-काव्य की सारप्राणता स्पष्ट है भिल्लट-काव्य का महत्त्व इसलिये भी है कि वे संस्कृत के प्रथम कवि हैं, जिन्होंने अन्योक्ति को शतक-काव्य के एक समर्थ माध्यम के रूप में स्थापित किया। भल्लट के पूर्व अन्योक्ति के ही रचने की परम्परा का सूत्रपात भल्लट ने किया, जिससे आगे चलकर अन्योक्ति-प्रधान काव्यसंकलनों की रचना तथा अन्योक्ति के माध्यम से अपने देशकाल पर तीखी टिप्पणी करते हुए कवियों के द्वारा अपने गूढ़ आशय को सहजता से कहने की रीति को सम्बल मिला।