चण्डीशतक मयूर के सूर्यशतक की भाँति १०० पद्यों का स्तोत्र होना चाहिए। इस कृति की कोई प्रामाणिक प्रति उपलब्ध नहीं है। एक किंवदन्ती के अनुसार मयूरभट्ट के शाप से अपने को बचाने के लिए बाण ने भगवतीपरक एक सौ श्लोकों की स्रग्धरा छन्द में ‘चण्डीशतक’ नामक रचना की। इस कृति में ओज गुण का बाहुल्य है तथा पदविन्यास सर्वथा श्रेष्ठ है Film टॉकीजल प्रशस्त गर्मशानाही असा विद्राणे रुद्रवृन्दे सवितरि तरले वजिणि ध्वस्तवजे हि मीच जाताशके शशाङ्के विरमति मरुति व्यक्तवैरे कुबेरे। जा गरि वैकुण्ठे कुण्ठितास्त्रे महिषगतिरुषं पौरुषापघ्ननिघ्नं प्रकार लागण निर्विघ्नं विघ्नती वः शमयतु दुरितं भूरिभावा भवानी।। तक कि