०६ सूर्यशतक

सूर्यशतक मयूरभट्ट का एक उत्तरकाव्य है। इस स्तोत्र काव्य की अनेकानेक . हस्तलिखित प्रतियाँ प्राप्त हुई हैं। संभवतः टीकाकार ने इस कृति में १०१वां पद्य और जोड़ दिया है पनि चीत OF THIति मानक के अशा का श्लोको लोकस्य भूत्यै शतमिति रचिता श्रीमयूरेण भक्त्या कि मौक युक्तश्चैतान पठेद्यः सकृदपि पुरुषः सर्व-पापैर्विमक्तः। तर आरोग्यं सत्कवित्वं मतिमतुलबलं कान्तिमायुः प्रकर्ष विद्यामैश्वर्यमर्थं सुतमपि लभते सोज़ सूर्यप्रसादात् ।। (श्रीमयूर ने लोगों के कल्याण के लिए भक्ति से एक सौ श्लोकों की रचना की। जो कोई योगपूर्वक एक-एक बार भी इन्हें पढ़ेगा, वह सब पापों से मुक्त हो जायेगा और आरोग्य, सत्कविता, सद्बुद्धि, अतुल बल, शोभा, दीधार्यु सद्विद्या, ऐश्वर्य, अर्थ और सुपुत्र भी सूर्य भगवान् की कृपा से प्राप्त करेगा।) इस काव्य का प्रमुख विषय भगवान् भास्कर की भक्ति से भूति प्राप्त करना है। कहते हैं मयूर कुष्ठरोग से आक्रान्त हो गये थे। उसकी निवृत्ति के निमित्त उन्होंने सूर्यशतक की रचना की थी शीर्णघ्राणांघ्रिपाणीन व्रणभिरपघनैर्घर्धराव्यक्तघोषान दीर्घाघातानघौघैः पुनरपि घटयत्येक उल्लाघयन् यः। घाशोस्तस्य वोऽन्तर्द्विगुणघनघृणाविघननिर्विघ्नवृत्तेः RHEOR दत्तार्धाः सिद्धसंधैः विदधतु घृणयः शीघ्रमंघोविघातम्।। वाल्या सूर्यशतक गौड़ी रीति तथा ओज गुण से युक्त अनुप्रास बहुल स्तोत्र है। अपने श्लोकों में एक-एक अक्षर २५-२५ बार भी आया है। उपर्युक्त श्लोक में भी ‘घ’ २३ बार आया है। इस स्तोत्र में यमकों की संख्या भी पर्याप्त है। अलंकारों में उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, व्यतिरेक, दीपक, तुल्ययोगिता, विरोधादि पूरे स्तोत्र में वितरित हैं। सग्धरा छंद में रचित यह स्तोत्र प्रौढ एवं ओजस्विनी रचना है। ।