भारतीय मुक्तक सुभाषितों की शतक-परम्परा में भर्तृहरि के नीति, श्रृंगार और वैराग्य शतक अपेक्षाकृत अधिक लोकप्रिय है। कोई ऐसा संस्कृत पण्डित न होगा जिसे भर्तृहरि के इन शतकों ने आकर्षित न किया हो। भाषा की सरलता, भावों की तरलता तथा चमत्कार की विरलता भर्तृहरि-शतकों के पद-पद में पायी जा सकती है। भर्तृहरि के नाम से बहुविध विपुल साहित्य ज्ञात होता है। भर्तृहरि के नाम से प्रचलित ग्रन्थ ये हैं-(6) महाभाष्य की त्रिपदी दीपिका टीका, (२) वाक्यपदीय, (३) वाक्यपदीय के प्रथम और द्वितीय काण्ड की वृत्ति, (४) शब्दधातुसमीक्षा और (५) नीति, शङ्गार और वैराग्यशतक । इनके अतिरिक्त कुछ और ग्रन्थ भी भर्तृहरि के रचे बताये जाते हैं जो पूर्णतः मुक्तक-काव्य-परम्परा : शतककाव्य १०६ विवादास्पद अथवा अनुपलब्ध हैं। जैसे (१) भट्टिकाव्य, (२) मीमांसासूत्रवृत्ति, (३) वेदान्तसूत्रवृत्ति, (४) भागवृत्ति, (५) विटवृत्त, (६) विज्ञानशतक इत्यादि। कुछ लोग इनके रचे वेदभाष्य के अतिरिक्त विद्वच्छतक, दरिद्रशतक, व्यवहारशतक, मूर्खशतक, योगशतक, इत्यादि बारह शतक बताते हैं। इनके साथ ही भर्तृहरिसंहिता, राहतकाव्य, २२ श्लोकी रामायण इत्यादि की भी गणना की जाती है। साधारणतया भर्तृहरि का नाम लेते ही संस्कृतज्ञों को उसके नीति, श्रृंगार तथा वैराग्यशतकत्रय की याद आ जाना, इन शतकों की लोकप्रियता का प्रमाण है। सातवीं सदी के अन्त में चीनी यात्री इत्सिंग इन शतकों की चर्चा तो नहीं करता है, परन्तु जब वह महाभाष्य की भर्तृहरिकृत टीका के विषय में कहता है कि यह मानवीय जीवन के सिद्धान्तों तथा व्याकरण ज्ञान का विशद प्रतिपादन करती है। और उसका सम्बन्ध अनेक परिवारों के उत्थान-पतन के कारणों से है तो लगता है कि वह प्रत्यक्ष ज्ञान के आधार पर नहीं, अपितु सुनी-सुनाई बातों के आधार पर टिप्पणी कर रहा है और यह करते हुए वह शतकत्रय और वाक्यदीय आदि को अनजाने ही मिला देता है।(१.ए रिकार्ड आफ बुद्धिस्ट रिलिजन, पृ.१७८ तथा भर्तृहरि : के. ए. सु. अय्यर, पृ. १०-११) तिमा सोमदेव के ६५६ ई. में रचित यशस्तिलकचम्पू (जिल्द २, पृष्ठ ११३) में भर्तृहरि सहित अनेक कवियों का उल्लेख किया गया है। यथा-उर्वभार-विभवभूति- भर्तृहरि-भर्तृमेण्ठ कण्ठ-गुणाढ्य- व्यास-भास- वोस-कालिदास-बाण-मयूर-नारायण- कुमार-माघ- राजशेखर महाकविकाव्येषु तत्र तत्रावसरे भरतप्रणीते काव्याध्याय सर्वजनप्रसिद्धेषु तेषूपाख्यानेषु-इसी ग्रन्थ (भाग -२, पृष्ठ EE) में भर्तृहरि का ‘प्राणाघातान्निवृत्तिः" इत्यादि श्लोक भी उद्धृत किया गया है। दसवीं सदी के अन्त में धनिक ने भर्तृहरि के नाम से उसके शतकों तथा वाक्यपदीय से श्लोक उद्धत किये हैं। क्षेमेन्द्र, श्रीधरदास तथा भीमार्जुनसोम भी भर्तृहरि का उल्लेख करते हैं। चौदहवीं सदी का मेरुतुंग अपनी प्रबन्थचिन्तामणि में भर्तृहरि को वैराग्यशतकसहित विभिन्न काव्यों का रचयिता बताता है। जिला निक “तेन भर्तृहरिणा वैराग्यशतकादि प्रबन्धानि भूयांश्चक्रिरे।” प्रबन्धचिन्तामणि में भर्तृहरि का ‘दानं भोगो नाशः" आदि श्लोक भी उद्धृत है जो नीतिशतक का है। एक पारम्परिक श्लोक में शतकत्रय के रचयिता से वैयाकरण भर्तृहरि को अभिन्न माना गया है। महान्तः कवयः सन्तु महान्तः पण्डितास्तथा। महाकविर्महाविद्वानेको भर्तृहरिर्मतः।।।। १.द. शतकत्रयादिसुभाषितसमह, भूमिका, पृ.-७E तथा भर्तृहरिस्मारिका (१९७५) में कृष्णप्रसाद घिमिरे का लेख। ११० -काव्य-खण्ड एक परवर्ती कवि रामभद्रदीक्षित के पतञ्जलिचरित में भी यही बात कही गयी है। संदर्भणेन च भर्तृहरिः पदानां कन्दर्प-कार्मुक-रसार्पणकर्मठेन।। शृङ्गारनीतिविगतस्पृहानुबन्धमन्यत्र पद्यशतकत्रयमाततान ।। ग्रन्थोधिकृत्य किल वाक्यपदे बुधानां चक्रेऽथ तेन निखिलार्थविबोधहेतुः। यस्यातनोविवरणप्रणयेन हेलाराजः शशीव किरणेन विवृद्धिमब्धेः।। पतञ्जलिचरित काव्यमालता-५१,८१०,३१ पहले कहा जा चुका है कि सातवीं सदी का इत्सिंग भी भर्तृहरि की चर्चा करते हुए शतकों और वाक्यपदीय के रचयिता को मिला देता है। इत्सिंग ने भर्तृहरि सम्बन्धी विवरण अनुश्रुतियों के आधार पर लिखा है। इसलिए विद्वान् अब यह मानने लगे हैं कि उसका यह कथन असार प्रतीत होता है कि भर्तृहरि की मृत्यु ६५१ ई. में हुई थी। क्योंकि विभिन्न प्रमाणों से अब यह सिद्ध हो चुका है कि वाक्यपदीय की रचना चन्द्रगुप्त द्वितीय (३७५-४१३ ई.) से बाद की नहीं है। क्योंकि अष्टाङ्गहृदय के टीकाकार इन्दु ने उत्तरतन्त्र टीका में वाक्यदीप की “संयोगो विप्रयोगश्च” आदि दो कारिकाएं उद्धृत की हैं। यह इन्दु चन्द्रगुप्त द्वितीय का समकालीन माना जाता है। वाक्यपदीय के टीकाकार पुण्यराज के ‘अनुसार भर्तृहरि का गुरु वसुरात था। दिङ्नाग के प्रमाणसमुच्चय और उसके अनुपलब्ध ग्रन्थ त्रैकाल्यपरीक्षा में दिङ्नाग ने वाक्यपदीय का उपयोग किया है। दिङ्नाग का समय ३४५-४२५ ई. के लगभग माना जाता है। अतः वाक्यपदीय इससे पूर्व की रचना है। ऐसा ही विचार मुनि जम्बूविजय का भी है। (११…..) कवि भर्तृहरि के विषय में डी.डी. कोसंबी का भी यही मत है कि वह सातवीं सदी से पर्याप्त पूर्ववर्ती रहा। शिकार छ अनुश्रुतियां भर्तृहरि को विक्रमादित्य का अग्रज बताती हैं। बारह वर्ष तक सफलतापूर्वक राज्य संचालन करने के बाद विक्रमादित्य को राज्य सौंपकर वह संन्यासी बन गया। कहते हैं भर्तृहरि अपनी प्रिय पत्नी के कदाचार से खिन्न हो संन्यासी बना था। इस भाव का एक श्लोक भी उसके नीतिशतक में बताया जाता है, जिसे कोसंबी ने संशयित श्लोक माना है यां चिन्तयामि सततं मयि सा विरक्तामणगीतिर साप्यन्यमिच्छति जनं स जनोऽन्यसक्तः। तीन अस्मत्कृते च परितुष्यति काचिदन्या धिक् तां च तं च मदनं च इमां च मां च ।। ३११ नाथ-परम्परा में गोरखनाथ के शिष्य के रूप में भर्तृहरि का विशेष आदर है। ज्ञानार्णव के रचयिता शुभचन्द्र और भर्तृहरि भी राजा भोज के सौतेले भाई बताये गये हैं। तदनुसार शुभचन्द्र तो जैन साधु बन गया और भर्तृहरि रससिद्धि में तत्पर होकर नाथ साधु बन गया। १. ज्ञानार्णव, शुभचन्द्र, भूमिका। मुक्तक-काव्य-परम्परा शतककाव्य
- उसी परम्परा में ज्ञानेश्वर की कथा चांगदेव के तत्वसार और महानुभाव पंथ के ‘षड्दर्शन विवरण’ में भी प्राप्त होती है।’ इस नाथ सिद्ध भरथरी (भर्तृहरि) के कई ‘सबद’ ‘नाथ सिद्धों की बानियां’ में संगृहीत हैं जिनमें भर्तृहरि शतकों के कुछ श्लोकों का भी समाहार कर लिया गया है। भरथरी सम्बन्धित गीत गाते नाथ योगी भारत के विभिन्न अंचलों में पाये जा सकते हैं। ऐसे गीत विभिन्न लोक-भाषाओं में प्रचुर मात्रा में पाये जाते हैं। भर्तृहरि के इस लोकप्रिय जीवन से सम्बन्धी भर्तृहरिनिर्वेद’ नामक संस्कृत नाटक हरिहर ने पन्द्रहवीं सदी में रचा था। १५४०ई. के लगभग रच गये मलिक मुहम्मद जायसी के ‘पद्मावत’ महाकाव्य में इस योगी भर्तृहरि की अनेक बार चर्चा हुई है। भर्तृहरि के इस लोकप्रिय चरित से सम्बन्धित नाच, नौटंकी, ख्याल आदि अनेक लोकनाट्य भी प्रस्तुत किये जाते हैं। इनके गीत गांव-गांव में गाये जाते हैं। स्पष्ट ही भर्तृहरि की कथा जन-जन में लोकप्रिय थी और आज भी है। इनकी गुफाएं, धुने व स्मारक उज्जैन, चुनार, सरिस्का आदि देश के विभिन्न स्थानों पर पाये जाते हैं जो प्रायः नाथ साधुओं के अधिकार में हैं। यह माना जाता है कि नाथों की बैरागी शाखा के प्रवर्तक भर्तृहरि ही थे। एक राजा, एक रसिक और एक वैरागी का भर्तहरि के चरित में क्रमशः समाहार हो जाने से उसे नीति, शृङ्गार और वैराग्य शतक का रचयिता मान लेने की स्वाभाविक परम्परा बन गयी। भर्तृहरि की काव्यरचनाओं में भट्टिकाव्य की गणना नहीं की जानी चाहिए, क्योंकि उसे प्रायः सभी विद्वान् भर्तृहरि से भिन्न मानते हैं। भर्तृहरि के शतकत्रय के अतिरिक्त विटवृत, विज्ञानशतक, योगशतक, विद्वच्छतक, दरिद्रशतक, व्यवहारशतक, मूर्खशतक, भर्तृहरिसंहिता इत्यादि माने जाते हैं। इनमें से विटशतक का मंगलाचरण वल्लभदेव की सुभाषितावलि में भी भर्तृहरि के नाम से उद्धृत है। माधव ने इसकी ‘जडवृत्त’ व्याख्या लिखी थी। “विज्ञानशतक’ सर्वप्रथम १८६७ में टीकासहित नागपुर से प्रकाशित हुआ था। बाद में वह बम्बई की गुजराती प्रिंटिंग प्रेस से भी प्रकाशित हुआ था। परन्तु भर्तृहरि शतकों के अन्तर्गत जो ८५२ श्लोक कोसंबी ने अपने ‘शतकत्रयादिसुभाषितसंग्रह’ में एकत्र किये हैं उनमें इनका एक भी श्लोक नहीं है।
विषयवस्तु
भर्तृहरिशतक के श्लोकों को टीकाकारों ने विषयानुसार विभाजित कर दिया है, जो इस प्रकार है
नीतिशतक
मूर्ख, विद्वत्, मानौर्य, अर्थ, दुर्जन, सुजन, परोपकार, धैर्य, देव तथा कर्मपद्धति।
शृङ्गारशतक
स्त्रीप्रशंसा, संभोगवर्णन, कामिनीगर्हणा, सुविरक्तदुर्विरक्त-पद्धति तथा ऋतुवणनाचा मान मिलना APE
- ‘भर्तृहरि पुस्तक में बा.ना.मुण्डी का लेख ‘भर्तृहरि’: मराठी साहित्य के सन्दर्भ में। को पीट २. शतकत्रयादिसुभाषितसमह, भूमिका, पृ.६४ पाक का RE
वैराग्यशतक
तृष्णादूषण, विषयपरित्यागविडम्बना, याञ्चादैन्यदूषण, भोगास्थैर्य, कालमहिमा, यतिनृपतिसंवादवर्णन, मनःसम्बोधननियमन, नित्यानित्यवस्तुविचार, शिवार्चन तथा अवधूतचर्या । उनको सुभाषितों में भर्तृहरि के सुभाषित अग्रणी हैं। एक-एक श्लोक में जगत और जीवन का सार भरा है। कवि कहता है कि जानकार लोग ईर्ष्यालु हैं, प्रभावशाली लोग गर्व से भरे हैं, अन्य अबोध के मारे हैं, बेचारे सुभाषित अग में ही जीर्ण हो बुढ़ा गये।। बोद्धारो मत्सरग्रस्ताः प्रभवः स्मयदूषिताः। जनता समक अबोधोपहताश्चान्ये जीर्णमंगे सुभाषितम् ।। २ कि शमीमा नीतिशतक का निम्नपद्य द्रष्टव्य है-काशाजार पद्माकरं दिनकरो विकचीकरोति जा चन्द्रो विकासयति कैरवचनवालम्। ति भिती माता का नाभ्यर्थितो जलधरोऽपि जलं ददातिक मत सन्तः स्वयं परहिते विहिताभियोगः।।७४।। असई जागिर सूर्य कमलसमूह को प्रस्फुटित करता है, चन्द्रमा कुमुदसमूह को विकसित करता है। बादल बिना मांगे ही जल देता है। सज्जन स्वतः परोपकार में प्रवृत्त होते हैं। श्रृंगार शतक का निम्न पद्य सहृदय हृदय को चमत्कृत सा कर देता है विश्रम्य विश्रम्य वनद्रुमाणांनी काम किया जाता छायासु तन्वी विचचार काचित्। मका की स्तनोत्तरीयेण करोघृतेन निवारयन्ती शशिनो मयूखान।। २१॥ कोई कशागी वनवृक्षों की छाया में रुक-रुक कर हाथ से ऊपर उठाए हुए स्तन के आवरणपट (आँचल) से वियोगीजन के सन्तापदायक चन्द्रमा की किरणों को रोकती हुई घूम रही थी। वैराग्य शतक के निम्न पद्य में वृद्धावस्था की शोचनीयता का चित्रण कितना स्वाभाविक है गात्रं सङ्कुचितं गतिर्विगलिता भ्रष्टा च दन्तावलि दृष्टिनक्ष्यति वर्धत बधिरता वक्त्रं च लालायते। वाक्यं नाद्रियते च बान्धवजनो भार्या न शुश्रूषते ह! कष्टं पुरुषस्य जीर्णवयसः पुत्रोऽप्यमित्रायते ।। ६३ ।। शरीर सिकुड़ गया, चाल ढीली पड़ गयी और दाँत भी गिर गये। आँखों की रोशनी जा रही है, बहारापन बढ़ रहा है और मुँह से लार टपकने लगा है। बन्धुजन बात नहीं मुक्तक-काव्य-परम्परा : शतककाव्य ११३ सुनते हैं, पत्नी भी सेवा नहीं करती, यहाँ तक कि पुत्र भी शत्रु जैसा आचरण करने लगता है। मनुष्य की बुढ़ौती बहुत ही दुःखदायी है। काला
शैली
भर्तृहरि की भाषा सरल और सरस वैदर्भी का उत्तम उदाहरण है। शार्दूलविक्रीडित कवि का प्रिय छन्द है। इसके अतिरिक्त भी विविध छन्दों का सहज उपयोग किया गया है। अलंकार स्वाभाविक रूप से उसमें आ गये हैं। भाषा और अलंकारों की स्वाभाविकता तथा विचारों की सटीक सहज अभिव्यक्ति के कारण भर्तृहरि विक्रमादित्य के आरम्भ के युग में सरलता से पहुंच जाता है। जीवन और जगत् को जानकर भर्तृहरि ने जितना और जैसा अपने शतकों में व्यक्त किया वह परवर्ती कवियों के लिए उदाहरण बन गया। यही कारण है कि धर्म से परे जैन साधुओं में भी वैराग्यशतक पढ़ने-पढ़ाने की परम्परा है। शृङ्गारशतक भी वैराग्य की भूमिका बनाता प्रतीत होता है। यही कारण है कि भर्तृहरि का काव्य राग और विराग के अनिश्चय में झूलता हुआ भी वैराग्य की ओर उन्मुख ही अधिक प्रतीत होता है। सातवीं सदी का चीनी यात्री इत्सिंग भर्तृहरि को गृहस्थ और संन्यास के मध्य सात बार आवागमन करता बताता है। उसने इसे बौद्ध विद्वान् बताया है। परन्तु उसका साहित्य उसे परम शैव ही सिद्ध करता है। भर्तृहरि का साहित्य जीवन की विरूपताओं पर सतत कटाक्ष करता है। आज के समान भर्तृहरि ने बहुधा अपनी बात कहने के लिए मैं या अस्मत शैली अपनाई है। इसलिए कई बार उनके श्लोकों में आत्मकथ्य का आभास लगता है। शा ITMERE निकट कि भर्तृहरिशतक परवर्ती शतक काव्यों के आदर्श बन गये। उनके अनुकरण पर अनेक शतकादि काव्य रचे गये। अमरुकशतक, वल्लालशतक, शिल्हण का शान्तिशतक, नीलकंठदीक्षित का वैराग्यशतक, कुसुमदेव का दृष्टान्तशतक आदि के साथ ही सोमप्रभ की शृङ्गारवैराग्यतरंगिणी भी इसी परम्परा की है। पन्द्रहवीं सदी के धनदराज ने नीति, श्रृंगार तथा वैराग्य शतको की रचनाकर भर्तृहरि के काव्यपथ का अनुसरण किया। 2 राजा भोज के अप्रकाशित ‘सुभाषितप्रबन्ध’ (श्लोक १५७) में भर्तृहरि का “यदा किञ्चिज्ञोह” श्लोक के साथ ही अन्य श्लोक भी उद्धृत हैं (श्लोक क्रमांक १५३, १५७, १७७)। इसी प्रकार प्राचीन विविध सुभाषित संग्रहों में भी भर्तृहरि के श्लोक अनेकशः उद्धृत भर्तृहरि के लोकप्रिय श्लोकों का परवर्ती काव्यशास्त्रकारों ने पर्याप्त उपयोग किया है। पनिक ने दशरूपक की टीका में वाक्यपदीय के साथ शतकों को भर्तृहरि के नाम से विविध सन्दर्भो में उद्धृत किया है। धृति के उदाहरण (४ ।१२) में कहा गया है-5 : दान ज्ञानाद्यथा भर्तृहरिशतके- का वयमिह परितुष्टा वल्कलैस्त्वं च लक्ष्म्या सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेषः। स भवतु दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्रः ।।१७७।।सम्लाका र काव्य-खण्डाना इसी प्रकार (२।२ की टीका में) “प्रारम्यते न खलु-” आदि श्लोक भी उद्धृत किया गया है जो नायक के “स्थिर’ गुण की पुष्टि करता है। मम्मट ने अपने काव्यप्रकाश में ‘मात्सर्यमुत्सार्य (श्लोक ८४) आदि श्लोक को शान्त तथा श्रृंगार के संशयरूप गुणीभूत व्यंग्य और इसी संशय के कारण दोष में उदाहृत किया है। काव्यप्रकाश के साथ ही साहित्य-दर्पण में ‘शशी दिवसधूसरो’ आदि श्लोक समुच्चय अलंकार के उदाहरण के रूप में उद्धृत किया गया है। इसी प्रकार अन्य कई काव्यशास्त्रीय ग्रन्थों में उदाहृत भर्तृहरि के शतकों के श्लोक चिरकाल से रसिकों के कष्ठाभरण बन रहे हैं। काव्यप्रकाश में भर्तृहरि का यह श्लोक अनवीकृत दोष के रूप में उदाहृत है, क्योंकि इसमें बार-बार ‘ततः किं का ही उपयोग किया गया है। यह उल्लेखनीय है कि यह शैली फारसी के अनुकरण पर उर्दू में आज पर्याप्त प्रचलित है। ल तलमीत नि मा रितारणाकाहाणा प्राप्ताःश्रियः सकलकामदरास्ततः किं H TRADER दत्तं पदं शिरसि विद्विषतां ततः किं काम करना TE सन्मानिताः प्रणयिनो विभवैस्ततः कि- FIRST का कल्प स्थितं तनुभृतां तनुभिस्ततः किम ।।१EEP # इसी प्रकार “भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः’ आदि श्लोक के प्रत्येक चरण में वयमेव की आवृत्ति से नवीनता आ गयी है। वैयाकरणों में ‘हरि’ के नाम से प्रसिद्ध भर्तृहरि अपनी काव्यगत उत्कृष्टता, अनुभवसिद्ध कुशल अभिव्यक्ति और विद्रोहात्मक रुख के कारण आज भी उनसे वे ही हैं। शतक तो अनेक रचे गये पर भर्तृहरि तक उनमें से कोई शतक पहुंच नहीं पाया। दिवाली सेना पर काम किया ताज का