०३ अमरुक

अमरुक संस्कृत गीतिकाव्यपरम्परा में कालिदास के पश्चात् सर्वाधिक स्पृहणीय कवि हैं। मुक्तककाव्यपरम्परा में शृङ्गार और प्रेम के कवि के रूप में उन्होंने अनन्य सामान्य प्रशंसा तथा प्रसिद्धि पायी। पर अमरुक की कविता जितनी अधिक सराही जाती रही है, स्वयं अमरुक उतनी ही बड़ी पहेली बने रहे हैं। डी.डी. कोसाम्बी जैसे विद्वान तो अमरुक नामक किसी कवि के अस्तित्व पर ही प्रश्नचिह्न लगाते हैं। क्योंकि संस्कृत के सर्वप्राचीन सुभाषितसङ्ग्रह सुभाषितरत्नकोश में अमरुशतक के दस पद्य तो अज्ञातकर्तृक बता कर उद्धृत किये हैं और सोलह पद्य बारह अन्य कवियों के नाम से उद्धृत किये हैं, इसलिये ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी में कोशकार विद्याकर की दृष्टि में अमरुशतक का कर्तत्व किसी एक कवि का नहीं है, वे उसे कवियों की रचनाओं का संकलन मात्र समझते हैं। पर कोसाम्बी ने इस तथ्य को अनदेखा कर दिया है कि विद्याकर के बहुत पहले आनन्दवर्धन जैसे संस्कृत काव्यशास्त्र के महान् आचार्य की दृष्टि में अमरुक मुक्तक कवि के रूप में प्रतिष्ठित हैं। अतएव न तो अमरुक के अस्तित्व को अस्वीकार किया जा सकता है, न अमरुकशतक के सन्दर्भ में उनके कर्तृत्व को। यह सम्भावना अवश्य प्रबल लगती है कि मुक्तक कवि के रूप में अमरुक की असाधारण ख्याति के कारण दाम्पत्य और प्रणय के विषय में कतिपय अन्य कवियों के अच्छे पद्य भ्रान्तिवश अमरुक के मान कर उनके शतक में बाद में जोड़ दिये गये। अमरुशतक के कर्तृत्व को ले कर एक दूसरा सन्देह उससे जुड़ी एक किंवदन्ती के कारण प्रकट किया जाता रहा है। वस्तुतः इस किंवदन्ती का साक्षात् सम्बन्ध आदि-शंकराचार्य के जीवन से है और इसका सर्वप्रथम उल्लेख कदाचित् माधवाचार्य (स्वामी विद्यारण्य) के शङ्करदिग्विजय में हुआ है, जिसके आधार पर अमरुशतक के रविचन्द्र आदि टीकाकारों ने भी अमरुशतक की पृष्ठभूमि में इसे समाविष्ट किया है। इस किंवदन्ती के अनुसार मण्डनमिश्र की पत्नी भारती से कामशास्त्र पर शास्त्रार्थ का अवसर जब आया, तो इस शास्त्र का ज्ञान न होने से शंकराचार्य ने अपना जीव अमरुक नाम के राजा के शव में प्रविष्ट करा दिया, जिसका ठीक उसी समय निधन हुआ था। उस राजा के देह के माध्यम से उन्होंने कामशास्त्र का प्रत्यक्ष ज्ञान अर्जित किया और तभी अमरुशतक की रचना भी की। इस किंवदन्ती को सत्य मानते हुए अमरुक के कुछ टीकाकारों ने उन्हें कश्मीर का एक राजा बताया है। जहां शंकराचार्यविषयक किंवदन्ती सर्वथा सन्दिग्ध है, अमरुक का निवास स्थान कश्मीर में होने की बात विचारणीय है। डा. भोलाशंकर व्यास तो अमरुक नाम की दृष्टि सुभाषितरत्नकोश, सं. डी.डी. कोसाम्बी तथा ईगाल्स, भूमिका पृ. ७१ तथा एन एंथोलोजी आफ संस्कृत कोर्ट पोएट्रीः इंगाल्स, पृ. ४४-४५ १०२ काव्य-खण्ड से इस कवि को निश्चित रूप से कश्मीर का ही निवासी मानते हैं, क्योंकि इस प्रकार के नामकरण की परम्परा कश्मीर में रही है।'

रचनाकाल

अमरुक के काल का प्रश्न भी उतना ही उलझा हुआ है, जितना उनके कर्तृत्व और अस्तित्व का। डा. भोलाशंकर व्यास उन्हें भर्तृहरि का समकालिक मानते हैं। अमरुक के कालनिर्णय के विषय में वस्तुतः सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तथा प्रामाणिक तथ्य आचार्य आनन्दवर्धन के द्वारा उनका उल्लेख है। आनन्दवर्धन का समय ०७ वि.सं (८५०ई.) के आसपास है। तब तक अमरुक मुक्तक के कवि के रूप में लब्धप्रतिष्ठ हो चुके थे। अतएव अमरुक का समय ८०० वि.सं. (७५० ई.) के आसपास माना जाना चाहिये। आनन्दवर्धन के कुछ पूर्व आचार्य वामन ने अमरुशतक के तीन पद्य अपनी काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति में उद्धृत किये हैं, पर वे अमरुक का नाम कहीं नहीं लेते। आनन्दवर्धन के पश्चात् अमरुक का उल्लेख बड़ी सराहना के साथ आचार्य अभिनवगुप्त (दसवीं शताब्दी) ने किया है तथा अमरुक के सबसे पुराने टीकाकार अर्जुनवर्मदेव का समय बारहवीं शताब्दी है। पर इन सब तथ्यों से हम अमरुक की केवल उत्तरसीमा ही निर्धारित कर सकते हैं, अमरुक आठवीं शताब्दी के पहले हुए यह असन्दिग्ध है।

अमरुकशतक का कलेवर

अमरु या अमरुक कवि की एक ही रचना मिलती है अमरुकशतक। इसकी विभिन्न प्राचीन प्रतियों में ६० से ११५ तक पद्य प्राप्त होते हैं, जिनमें से केवल ५१ पद्य ही सर्वनिष्ठ हैं। वस्तुतः मेघदूत की भांति अमरुक की कृति ने भी संस्कृत कचिता पर इतनी गहरी छाप छोड़ी और उनके भी मेघदूत की भांति इतना अधिक अनुकरण हुआ है कि अमरुक की शैली और भावभूमि को ले कर लिखे गये पद्यों की भरमार के कारण प्राचीन काल से ही अमरुक के वास्तविक पद्य और उनके अनुकरण पर लिखे अन्य कवियों के पद्यो में पहचान करना आचार्यों तथा टीकाकारों के लिये कठिन होता गया होगा। साइमन तथा आफ्रेट इन दो पाश्चात्त्य विद्वानों ने छन्द को प्रमाण मानकर अमरुक के वास्तविक कर्तृत्व का परीक्षण करना चाहा है। आफ्रेट तो यहाँ तक कहते हैं कि अमरुक ने अपने पद्य केवल शार्दूलविक्रीडित छन्द में ही लिखे थे और शेष छन्दों में लिखे गये अमरुक के नाम से मिलने वाले पद्य वस्तुतः अमरुक के नहीं हैं। पर आप्रेट के इस तर्क में कोई सार नहीं है। टीकाकार अर्जुनवर्मदव ने कुल १०२ पचों पर टीका की है तथा निर्णयसागर संस्करण में इन पद्यों के अतिरिक्त पद्य अलग से संगृहीत किये गये हैं, जिनके अमरुककृत होने की सम्भावना प्रकट की जाती रही है। अमरुकशतक की प्राचीन प्रतियों तथा उपलब्ध संस्करणों के आधार पर उसके दो संस्करण प्राचीन काल से प्रचलित प्रतीत होते हैं। एक लगभग ११४ पद्यों का बृहत् संस्करण १. संस्कृत-कवि-दर्शनः डा. मौलाशंकर व्यास, पृ. ५३८ २.णा वही, पृ.५३७ ३. अमरुकशेतक-हिन्दी अनुवाद, डा. विद्यानिवास मित्र, भूमिका पृ.५-६ । का १०३ मुक्तक-काव्य-परम्परा : शतककाव्य है, जिसका प्रचार १००० ई के आसपास अवन्तिदेश में अधिक रहा। टीकाकार अर्जुनदेव अवन्ति के हैं और वे अमरुक के मूल पद्यों के अतिरिक्त १४ पद्यों को प्रक्षिप्त बता कर उद्धृत करते हैं। अमरुक का एक दूसरा संस्करण आन्ध्रप्रदेश में प्रचलित रहा होगा, जिसका अपनी टीकाओं में उपयोग रुद्रमदेव, रविचन्द्र तथा वेमभूपाल जैसे टीकाकारों ने किया है। वेमभूपाल द्वारा स्वीकृत पाठ दक्षिण में केरल में लोकप्रिय रहा है।

टीकाएं तथा अनुवाद

अमरुकशतक पर बारहवीं शताब्दी से लेकर अब तक अनेक टीकाएं लिखी जाती रही हैं। इनमें प्राचीन तथा उल्लेखनीय टीकाएं निम्नलिखित हैं (१) अर्जुनवर्मदेव द्वारा रचित रसिकसजीवनी (१३वीं शताब्दी के लगभग) (२) केरलराज वेमभूपालकृत शृङ्गारदीपिका सिलव) 1 yीपत (३) रुद्रमदेवकृत टीका। का असर पिविलिमि का मस्ताना (४) रविचन्द्रकृत कामदा टीका (५) सूर्यदासकृत शृङ्गारतरागणी (६) शेषरामकृष्णकृत रसिकसीवनीकार क (७) चतुर्भुजमिश्रकृत मानचिन्तामणि किया जाताळा (८) अमरुदर्पणटीका (E) कोकसम्भवकृत टीका (१०) नन्दलालकृत टीका मालिका (११) शंकरकृत टीका जियामिति बनाकर (१२) ज्ञानानन्द कलावरसेनकत टीका तथा मिति (१३) अज्ञातकृर्तक टिप्पण इनमें अर्जुनवर्मदेव की टीका सर्वाधिक तलावगाही और विशद है। रविचन्द्र ने अमरुशतक के विषय में शंकराचार्यसम्बद्ध किंवदन्ती को प्रमाण मानते हुए प्रत्येक पद्य की द्विविध व्याख्या की है- एक अर्थ शृगारपरक है, दूसरा वैराग्यपरक। पर इसमें अमरुक की कविता के साथ खींचातानी ही अधिक हुई है। वेमभूपाल आदि टीकाकारों ने अमरुक के काव्य को कामसूत्र या नायिका-लक्षणों के उदाहरण के रूप में ही प्रस्तुत करने की चेष्टा की है। इस प्रकार की व्याख्यापद्धति भी अमरुक की अनाविल अनुभूतिप्रवणता के साथ पूरा-पूरा न्याय नहीं कर सकती। वस्तुतः अमरुक का रसावेशवैशद्य - सौन्दर्यनिधानमत काव्य किसी शास्त्र को सामने रख कर उसकी काव्यात्मक टीका में नहीं रचा गया है, वह तो जीवन के सहज अनुभव से उपजा है। Myse अंग्रजी मैं फेड्रिक रुकर्ट, श्रोडर, हर्टल और लिंडाल ने अमरुशतक के अंग्रजी में अनुवाद किये हैं तथा इसके हिन्दी में अनुवाद डा. विद्यानिवास मिश्र और डा. कमलेशदत्त त्रिपाठी द्वारा प्रकाशित किये गये हैं। सपना - H EAकाव्य-खण्ड

अमरुक और काव्यशास्त्रीय आचार्यपरम्परा

अमरुक को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिये कि उन्होंने काव्यशास्त्र के महान् आचार्यों की परम्परा में मुक्तक को प्रतिष्टित करा दिया। अमरुक के रसपेशल पद्यों की महत्ता समझते हुए ही आचार्य आनन्दवर्धन ने कहा कि मुक्तक में भी उतना ही रसाभिनिवेश सम्भव है, जितना कि महाकाव्य में। इसके उदहरणस्वरूप उन्होंने अमरुक का ही उल्लेख किया और अमरुक के एक-एक प्रबन्ध के बराबर रसस्यन्दी माना मुक्तकेषु प्रबन्धेष्विव रसबन्धाभिनिवेशिनः कवयो दृश्यन्ते।। यथा स्यमरुकस्य कवेर्मुक्तकाः शृङ्गाररसस्यन्दिनः प्रबन्धायमानाः प्रसिद्धा एव। (ध्वन्यालोक ३७ पर वृत्ति) मामा आनन्दवर्धन के इस विवेचन से ही आगे चलकर सहृदय समाज में यह उक्ति प्रसिद्ध हो गयी-अमरुकस्य कवेरेकोपि श्लोकः प्रबन्धशतायते–अमरुक कवि का एक-एक श्लोक सौ-सौ महाकाव्यों के बराबर है। आनन्दवर्धन ने अमरुक की इतनी सटीक सराहना तो की ही, उन्होंने अपने सिद्धान्तों के निदर्शन स्वरूप एक रससिद्ध कवि के रूप में अमरुक के पद्यों को उदाहरण देकर भी उद्धृत किया। आनन्द की दृष्टि से अमरुक ‘रसनिर्वहणैकतानहृदय’ कवि हैं, वे अलङ्कार के निर्वाह के प्रति अत्यन्त आग्रह नहीं करते, जिसका उदाहरण उनका यह पद्य है कोपात् कोमललोलबाहुलतिकापाशेन बद्ध्वा दृढ़ नीत्वा वासनिकेतनं दयितया सायं सखीनां पुरः। भूयो नैवमिति स्खलत्कलगिरा संसूच्य दुश्चेष्टितं धन्यो हन्यत एव निस्नुतिपरः प्रेयान रुदत्या हसन् ।। (ध्वन्यालोक २।१६ वृत्ति) आगे चलकर आनन्द ने पुनः इसी पद्य को विरोधी रस या भाव के अङ्ग बनकर आने पर भी कविप्रतिभा के कारण रसानुभूति निर्बाध बने रहने के उदाहरण के रूप में उद्धृत किया है (वही, ३।२०) इसी प्रकार ध्वनिसौन्दर्य के कारण पूर्वकवियों के भाव से अन्चित होती हुई नये कवि की वाणी नये चमत्कार को प्रकट करती है-अपने इस सिद्धान्त की पुष्टि में आनन्दवर्धन ने पुनः अमरुक का सुप्रसिद्ध पत्र “शून्यं वासगृहं विलोक्य”.. उदधृत किया है। MEES मामाका - सिम 15 आनन्दबर्धन की भांति आचार्य अभिनवगुप्त भी अमरुक की रससृष्टि की विलक्षणता से अभिभूत हैं और वे अमरुक के दो पद्य भावसौन्दर्य या भावध्वनि तथा मुक्तक की प्रबन्धायमानता के उदाहरणस्वरूप पृथक् प्रस्तुत करते हैं (ध्वन्यालोकलोचन, पृ. ९०,३५५)। आचार्य वामन द्वारा गुण तथा अलकार के समुचित प्रयोग की दृष्टि से अमरुक के तीन मुक्तक-काव्य-परम्परा : शतककाव्य १०५ पद्य उद्धृत किये गये हैं-जिनकी चर्चा ऊपर आयी है। दशरूपक के वृत्तिकार धनिक ने तो विभिन्न नायिकाभेदों, योषिदलकारों या अन्य नाट्यशास्त्री कोटियों के उदाहरण के लिये अमरुक के १४ पद्य उदाहरण के रूप में उपस्थापित किये हैं और दशरूपक के ही दूसरे वृत्तिकार बहुरूपमिश्र ने भी इतने ही पद्य अमरुक के उदाहृत किये हैं। भोज एक स्थल पर अमरुक का नाम लेकर उनका पद्य उदाहृत करते हैं, एक अन्य स्थल पर बिना नामग्रहण के। आचार्य मम्मट तो उत्तम काव्य का उदाहरण देना हो या शृङ्गार रस का, अमरुक का ही सोदाहरण प्रस्तुतीकरण करते हैं। अमरुक को सराहना के भाव से असकृत उद्धृत करने वाले अन्य उल्लेख्य आचार्य हेमचन्द्र, विश्वनाथ, अप्पयदीक्षित तथा पण्डितराज जगन्नाथ हैं, जब कि क्षेमेन्द्र ने अमरुक के एक पद्य में शृङ्गार रस में शान्त रस के साकर्य का अनौचित्य भी बताने का प्रयास किया है, पर इस प्रयास में आचार्यत्व अधिक और सहृदयता अत्यल्प है।

अमरुक-काव्य की विषयवस्तु

अमरुक प्रणय-जीवन के कुशल चितेरे हैं। उनके सारे मुक्तकों का विषय वस्तुतः दाम्पत्य कहा जा सकता है। दम्पती के जीवन में भावनात्मक स्तर पर उठते घात-प्रत्याघात, प्रणय के अपूर्व उल्लास, मान, सम्बन्धों में बिखराव या विघटन और उपालम्भ की स्थितियों के उन्होंने गहरी मनोवैज्ञानिक दृष्टि के सांग अन्तरंग चित्र उकेरे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि अमरुक नारीत्व की गरिमा और उदात्तता के कवि हैं, और उनकी यही विशेषता मुक्तक कवियों में उन्हें अप्रतिम बना देती है। मान-मनौव्वल, देह के मांसल सौन्दर्य के प्रति दुर्निवार आकर्षण, अतृप्ति और अपरकीया रति-यह सब भी अमरुक में हैं, पर संस्कृत के अन्य परवर्ती शृङ्गारी कवियों की भांति वे इस संकरे शृङ्गार की कारा में कैद नहीं रहे। वे दम्पती के बीच सम्बन्धों में आते उतार-चढ़ाव की गहरी पड़ताल करते हुए भारतीय गृहस्थजीवन और दाम्पत्य की अखण्ड मांगलिकता का दिग्दर्शन कराते हैं- सिकार की दीर्घा वन्दनमालिका विरचिता दृष्ट्यैव नैन्दीवरैः पुष्पाणां प्रकरः स्मितेन रचितो नो कुन्दजात्यादिभिः। (३) || दत्तः स्वेदमुचा पयोधरभरेणा? न कुम्भाम्भसा स्वैरेवावयवैः प्रियस्य विशतस्तन्व्या कृतं मङ्गलम्।।। प्रोषितभर्तृका का पति परदेस से लौट आया है। वह बावली इतनी प्रतीक्षा के बाद उसे आया देख हड़बड़ी में कोई मंगल नहीं रच पाती पर उसे नहीं पता कि मांगलिक उपकरणों की टीमटाम के बिना ही उसने सहज रूप में स्वतः कितना उत्तम मंगल उपस्थित कर दिया है। अपनी दृष्टि के वितान से ही उसने लंबी बन्दनवार खींच दी, कमल नहीं हुए तो क्या ? उसने अपनी मुस्कानों से ही फूल बिखेर दिये, कुन्द और जाति के फूल भले न हों। पसीने से तरबतर अपने पयोधरों से ही उसने प्रिय को अर्घ्य दिया, मंगलकलश से नहीं। इस प्रकार प्रिय के प्रवेश करते समय उसने अपने आप अपने अवयवों से सारी मांगलिक सामग्री प्रस्तुत कर दी। १०६ काव्य-खण्ड F अमरुक के काव्य की अन्तर्वस्तु (थीम) वस्तुतः यही अकुण्ठित अनाविल प्रेम है, जो सुमानुष की पराकाष्ठा है। सारी कुठकुण्ठाओं, विडम्बनाओं और सम्बन्धों की टूटन के बीच यह प्रेम जीवित ही नहीं है, वह जगत् की क्षुद्रताओं के ऊपर ले जाकर मनुष्य को मनुष्य वहीं बनाता है- यही अमरुक कहना चाहते हैं। यह प्रेम जगत् को बदल देता है, नया कर देता है, वह मनुष्य के काल का अतिक्रमण करा देता है। कार की चिरविरहिणोरत्युत्कण्ठाश्लथीकृतगात्रयो- एक कलाम नवमिव जगज्जातं भूयश्चिरादभिनन्दतोः। न कि हाम्छ कथमिव दिने दीर्धे याते निशामधिरूढयोः कामायापक जनबाट नि प्रसरति कथा बहवी यूनोर्यथा न तथा रतिः।। (४४) किन किन लंबी प्रतीक्षा के पश्चात प्रेमी युगल किसी तरह मिल पाये हैं। दिन में तो पास आने का अवसर था ही नहीं। दिन की दीर्घता जैसे तैसे कटी। अत्यधिक उत्कंठा के कारण देह तो श्लथ हो गये थे, पर एक दूसरे को देखते ही संसार उनके आगे नया सा हो कर रच दिया गया। उन्होंने अपने आप को इस लोक में पाकर इसका अभिनन्दन किया। फिर तो बातचीत का लंबा सिलसिला जितना चला, उतनी रति न चल पायी।

अमरुक का भावपक्ष

अमरुक प्रेम की विस्वलता और अनन्यता के चित्रण में अनन्य ही हैं। अनुभावों के चित्रण में अपने सूक्ष्म पर्यवेक्षण से वे प्रेमी की एक-एक चेष्टा का ऐसा बारीक रेखांकन करते हैं कि वह सीधे भावजगत् से जुड़ती चले। प्रेमी हृदय की छोटी-छोटी सुकुमार अभिलाषाएं, आकाक्षाए और वावली हरकतें यहां हमें भावनाओं की गहराई में उतारती चलती हैं। प्रेमी का मन और देह तर्क से परिचालित नहीं होता– देशैरन्तरिता शतैश्च सरितामुर्वीभृतां काननै र्यत्नेनापि न याति लोचनपथं कान्तेति जानन्नपि। उद्ग्रीवश्चरणार्धरुद्धवसुधः प्रोन्मृज्य साने दृशी तामाशां पथिकस्तथापि किमपि ध्यायन् पुनर्वीक्षते ।। (६६) बटोही जानता है वह अपनी प्रिया से बहुत दूर है। बीच में कई देशों, सैकड़ों नदियों, पर्वतों और काननों का व्यवधान है। किसी भी तरह से अब वह प्रिया की कोई झलक नहीं पा सकता फिर भी अपने गुनताड़े में गरदन ऊपर उठा-उठा कर और पंजों के बल उचक-उचक कर अंसवाई हई आंखे पोंछता हआ वह फिर उसी दिशा में तकता है. जिस ओर प्रिया की बस्ती छूट गयी है। अमरुक में कहीं घनीभूत पीड़ा और विषाद की काली छायायें अन्तरतम अनुभूतियों के साथ घिरती हैं, तो कहीं आनन्द के तार जुटते हैं। जीवन के छोटे-छोटे सुख उनकी कविता में अनन्त को समेट लेते हैं -१०७ मुक्तक-काव्य-परम्परा : शतककाव्य नापेतोऽनुनयेन यः प्रियसुहृद्वाक्यैर्न यः संहृतो माली का र यो दीर्घ दिवसं विषहय विषमं यत्नात् कथञ्चिद् धृतः। माता अन्योन्यस्य हृते मुखे निहितयोस्तिर्यक् कथञ्चिद् दृशोः । स द्वाभ्यामतिविस्तरव्यतिकरो मानो विहस्योज्झितः ।। (४२)

अमरुक का कलापक्ष

अमरुक की पदावली, भाषा और मुहावरे उनकी भावाभिव्यक्ति में सहज रूप से समवेत होकर निकलते हैं। अमरुक उन प्रतिभाशाली कवियों में से हैं, जिनकी रचना में वस्तु और रूप के बीच कहीं फांक दिखायी ही नहीं देती। किसी भी पद्य में कही हुई बात अपनी पदावली से छिटक कर अलग से झांकती नहीं लगती, न पदावली ही कही गयी बात से अश्लिष्ट होकर अपनी छटा कहीं अलग से अतिरिक्त रूप में दिखाती लगती है। अमरुक की वक्रोक्ति के कवि के रूप में भी पहचान की गयी है, पर उनमें उक्ति की जो वक्रता है, वह उनकी कविता के जीवन-स्पन्दन में रमकर आयी है। ऊपर उद्धृत पद्य में संवादों की भंगिमा और अदायगी का जो चमत्कार है, वह नायिका के हार्दिक अनुभूतियों से स्वतः उच्छलित होकर आया है। यही बात ऊपर उद्धृत दूसरे पद्य में देखी जा सकती है। वहां नायिका के मुख से अपने लिये कलत्र शब्द संस्कृत में सती स्त्री के अर्थ का वाचक है, पर वह नपुंसकलिङ्ग में ही प्रयुक्त होता है। पुरुषप्रधान समाज में स्त्री के एक निर्जीव पदार्थ में परिगत होते जाने की दारुण स्थिति को इससे अधिक समर्थ ढंग से और क्या अभिव्यक्ति दी जा सकती थी? अमरुक के एक-एक शब्द से ही नहीं, शब्द के खंड-खंड (प्रकृति, प्रत्यय) से भी बहुत कुछ कह जाने की क्षमता पर पुराने आचार्यों ने विचार किया है। काव्यप्रकाशकार ने प्रकृतिप्रत्यय आदि की व्यञ्जकता दिखाने के लिये अमरुक का यह पद्य उद्धृत किया लिखन्नास्ते भूमिं बहिरवनतः प्राणदयितो ।’ निराहाराः सख्यः सततरुदितोच्छूननयनाः। परित्यक्तं सर्वं हसितपठितं पञ्जरशुकै स्तवावस्था चेयं विसृज कठिने मानमधुना। (७) किसी प्रौढ़ाधीरा या कठकरेजी मानिनी को उसकी सखी समझा रही है। सिर झुकाये कमरे के बाहर बैठा तेरा प्राणदयित धरती कुरेदे जा रहा है। सखियों ने भोजन नहीं किया, रोते-रोते उनकी भी आँखे सूज गयी हैं। पिंजरे के तोतों और मैनाओं तक ने तो हंसना बोलना तज दिया। और तुम्हारी भी यह हालत है। अरी कठिन कलेजे वाली, अब तो अपना यह मान छोड़ दे। यहां “लिखन्नास्ते” में लिख धातु में शतृप्रत्यय तथा आस्ते क्रिया का प्रयोग सूचित करता है कि प्रियतम बड़ी देर से बाहर बैठा है और जब तक नायिका मान नहीं जायेगी, १०८

  • काव्य-खाण्ड यों ही बैठा रहेगा। भूमि पर लिख रहा है- यह बताने के लिये ‘भूमी’ यह सप्तमी विभक्ति का प्रयोग न कर के द्वितीयान्त ‘भूमिम्’ पद रखा है, जो सूचित करता है कि प्रियतम धरती को यों ही बस कुरेदे जा रहा है, कुछ सोच समझकर नहीं लिख रहा है। इससे नायक की अस्तव्यस्त मनोदशा प्रकट होती है। कुल मिला कर अमरुक संस्कृत कवियों में मुक्तक की कसौटी पर कदाचित् सबसे अधिक खरे उतरते हैं, और कालिदास के पश्चात् प्रणय और शृङ्गार के वे सबसे बड़े कवि कहे जा सकते हैं। प्रेम के जिस लोक में अमरुक हमें ले जाते हैं, वह उन्हीं भावों से बना है जो पहले के काव्य में आते रहे हैं। पर अमरुक की मनुष्यस्वभाव और जीवनगति की पहचान ने उनके काव्यविश्व को चिरनवीन और अनोखा बना दिया है।

पारम्परिक प्रशस्तियां

सहृदय समाज में अमरुक एक रससिद्ध कवि के रूप में शताब्दियों से सराहे जाते रहे हैं। टीकाकार अर्जुनवर्मदेव ने उनके लिये कहा है– अमरुकविडमरुकनादेन विनिहनुता जयति। शृङ्गारभणितिरन्या धन्यानां श्रवणविवरेषु।। (अमरुक कवि के डमरुक के निनाद के आगे बाकी सब कवियों की शृङ्गारपूर्ण उक्तियां दब गयी हैं। अन्य किसी कवि की शृङ्गारोक्ति उसके आगे किसी धन्य व्यक्ति के ही कानों में पड़ सकती है।) __ दूसरी ओर हरिहरसुभाषितम् के कर्ता हरिहर ने अमरुक की प्रशंसा में कहा है कि रस चाहने वाले यदि मरुग्राम में रस खोजें, तो वे मूर्ख हैं। रस तो अमरु-देश में ही सर्वथा सुलभ हो सकता है– भ्राम्यन्तु मारवग्रामे विमूढा रसमीप्सवः। अमरुदेश एवासी सर्वतः सुलभो रसः।। हरि. सुभा. २।१२