०२ मुक्तक-काव्य की पृष्ठभूमि

प्रथम अध्याय में वैदिक संहिताओं में संस्कृत महाकाव्य की परम्परा के बीज का उपक्षेप किस प्रकार प्राप्त होता है– इस तथ्य पर चर्चा की गयी है। महाकाव्य की ही भांति मुक्तक-काव्य-परम्परा का मूल स्रोत भी वैदिक संहिताओं का काव्य ही कहा जा सकता है। संहिताओं में अनेक स्थलों पर वैयक्तिक रागात्मक भावों की सुकुमार अभिव्यक्ति मिलती है और अनेकत्र निसर्ग की भव्य और रमणीय छवियों का भी अंकन है। उषस्-सूक्तों में एक-एक मन्त्र सौन्दर्यबोध तथा कविकल्पना का अनूठा समागम है। यहां उषस् देवी की दिव्यता के साथ-साथ मानवीकरण की भी झलक है। उदाहरण के लिये एषा शुभा न तन्वो विदानोधैव स्नाती दृशये नो अस्थात्।। अप द्वेषां बाधमाना तमांस्युषा दिवो दुहिता ज्योतिषागात्।। । (ऋग्वेद ५१८०५) (यह उषा देवी किसी लावण्यमयी नारी की भांति स्नान कर के ऊपर आती सी लगती है और अपने शुम्भ देह को प्रकट करती है। अन्धकार तथा शत्रु को दूर हटाती हुई धुलोक की यह पुत्री अपने मनोहर तेज के साथ आ पहुँची है।) संहिताओं में अनेक ऐसे स्थल हैं, जिन्हें पाश्चात्त्य विद्वानों ने ‘पेस्टोरल पोएट्री’ (ग्राम गीत) की संज्ञा दी है। यद्यपि इन गीतों में आध्यात्मिक भाव भी अनुस्यूत हैं, पर इनमें गीतिकाव्य की सारी विशेषताओं का भी ऋषियों ने दिग्दर्शन करा दिया है। वैदिक ऋषि यहां लोकसाहित्य तथा लोकगीतों की भूमि पर अवस्थित होकर जीवन और जगत् के विषय मेंE४ पातामा काव्य-खण्ड - राग के साथ मनोभाव व्यक्त करते हुए प्रतीत होते हैं। सोम को निचोड़ने के समय गाये जाने वाले गीत का एक सुन्दर उदाहरण ऋग्वेद का नवम मण्डल का ११२वां सूक्त प्रस्तुत करता है। इसमें कहा गया है- “लोगों की बुद्धि और व्रत नाना प्रकार के हैं। बढ़ई चाहता है कि रथ टूटे। वैद्य चाहता है कि रोगी आयें। पुरोहित चाहता है कि यजमान मिलें। सोम, तुम चुओ। सूखी काष्ठ, पक्षियों के पंख और चमकीले प्रस्तरों से औजार बनाकर लुहार किसी धनी को खोजता है। सोम, तुम चुओ। मैं कारुहूं, मेरे पिता वैद्य हैं। मेरी माता चक्की चलाती है। लोगों की मति भिन्न-भिन्न होती है, पर सब के सब धन की खोज में गौ की भांति चक्कर काटते फिरते हैं। सोम, तुम इन्द्र के लिये चुओ।” S E मक ऋग्वेद का कितव-सूक्त तो मुक्तक-काव्य-परम्परा में अपने आप में एक प्रतिमान है। इसमें एक जुआरी के जीवन की करुणा और विडम्बना का अत्यंत मार्मिक दिग्दर्शन है। जुआरी अपनी व्यथा को अभिव्यक्त करते हुए आत्मालाप की शैली में कहता है-‘मेरी पत्नी मुझे डांटती नहीं थी। मेरे प्रति वह क्रोध भी नहीं करती थी। वह मेरे प्रति और मेरे मित्रों के प्रति दयालुता का व्यवहार करती थी। मैंने इन पांसों के फेर में पड़कर उस साध्वी पत्नी को निकाल-बाहर किया। अब तो मेरी सास भी मुझसे घृणा करने लगी है। मेरी स्त्री मुझसे अलग रहती है। मेरे जैसे अध:पतित को अब कौन अपनायेगा? जुआरी के लिये कहीं कुछ नहीं है, जैसे बूढ़े घोड़े को कोई नहीं पूछता। मैं अपने आप को रोक नहीं पाता। प्रतिदिन विचार करता हूं कि अब जुआरियों की संगत छोड़ दूंगा। मेरे साथी खेलने जायेंगे, तो उनके साथ जाने से मना कर दूंगा। पर जब (धूतशाला में) भरे पांसे फिकने लगते हैं, उनके फिकने का स्वर मेरे कानों में पड़ता है, तो उसे सुन कर मैं अपने आप को रोक नहीं पाता और फिर जुवा खेलने चल देता हूँ, जैसे कोई नायिका अपने प्रिय से मिलने चल पड़े। (ऋग्वेद १०३४) कितव-सूक्त का एक-एक पद्य हृदय में चुभने वाला और अपने आप में एक संपूर्ण कथ्य प्रस्तुत करने वाला है। अपनी काव्यात्मकता तथा अनुभूति की सघनता में यह सूक्त बेजोड़ है। पांसों के लिये कवि का यह कथन भाषा और वर्णनकला का गीतकाव्य की दृष्टि से उत्कृष्ट निदर्शन है नीचा वर्तन्ते उपरि स्फुरन्ति अहस्तासौ हस्तवन्तं सहन्ते। दिव्या अङ्गारा हरिणेन्युप्ताः शीता सन्तो हृदयं निर्वहन्ति ।। सा (ऋ.१०॥३४॥६) (ये पांसे नीचे फेंके जाते हुए भी ऊपर उछलते हैं। वे स्वयं बिना हार्थों के हैं, पर हाथ वालों को वश में कर लेते हैं। ये दिव्य अंगारे हैं, जो शीतल होते हुए भी हृदय को जला डालते हैं।) की जाति काड कितिहि माफ कि मुक्तक-काव्य-परम्परा : शतककाव्य वैयक्तिक भावनाओं से सम्पृक्त मन्त्रों की भी ऋग्वेद तथा अन्य वैदिक संहिताओं में कमी नहीं है। उपमा के माध्यम से अपनी कारुणिक स्थिति का चित्रण करता हुआ ऋग्वेद का कवि कहता है- जैसे प्यासे मृग को भेड़िया खा रहा हो, ऐसे ही व्याधि मुझे खाये जा रही है(ऋ.१।१०५१७)। य दि वैदिक कवियों ने भारतीय वसुन्धरा की नैसर्गिक अभिरामता पर मुग्ध होकर सहज भाव से अपनी निजी प्रतिक्रियाएं काव्यात्मक उपादानों के द्वारा व्यक्त की है। इन्द्र के द्वारा मुक्त की गयी नदियों का दृश्य देखकर कवि की मानसतन्त्री में उनका उन्मुक्त प्रवाह निनादित हो उठता है और वह गाता है एता अर्षन्त्यलला भवन्तीतावरीरिव सङ्क्रोशमानाः। STRIF एता वि पुच्छ किमिदं मनन्ति कमापो अहिं परिधिं रुजन्ति।।। काका (ऋ. ४।१८।६) । जियान प्रातः गि (ये मुक्त की गयी नदियां आनन्द से उछलती हुई भोलीभाली रमणियों की भांति अठखेलियां करती हुई आगे बढ़ रही हैं। इन्हीं से पूछ कर देखो कि ये कह क्या रही हैं, और रास्ते में आने वाले किन-किन रोड़ो को तोड़कर ये आगे बढ़ रही हैं। मा निश्चय ही रागबन्ध, गेयता, छन्दोविधान की प्रशस्तता और मनोभावों की गहन अभिव्यक्ति की दृष्टि से ऋग्वेद के अनेक सूक्त मुक्तक या गीतिकाव्य का मानदण्ड प्रस्तुत करते हैं। केवल कोमलता तथा रागात्मकता नहीं, पर्जन्य तथा मरुत के वर्णनों में ओजस्विता तथा गाहबन्ध का निर्वाह भी उसी दक्षता के साथ किया गया है। वर्णनकला तथा कल्पनाशीलता के भी समुज्जवल उदाहरण ऐसे सूक्तों में हम पाते हैं। अतएव वैदिक कवियों ने मुक्तक की परम्परा के लिये सुदृढ़ भूमि का निर्माण किया- यह कहना सर्वथा संगत है। वैदिक काव्य के पश्चात् मुक्तक के प्रवाह की एक धारा बौद्धों के वाङ्मय के विशाल मार्ग से होती हुई प्रवाहित हुई है। यद्यपि बौद्धों के पिटक साहित्य में भी मुक्तक के समुज्जवल निदर्शन मिलते हैं, पर थेरगाथा तथा थेरीगाथा-ये दो ग्रन्थ मुक्तक काव्य-परम्परा में विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, क्योंकि मुक्तक की अपनी भावभूमि के ये अत्यंत निकट थेरगाथा खुद्दकनिकाय के पन्द्रह ग्रन्थों में से एक है। थेर का अर्ध स्थविर या बौद्धभिक्ष है। थेरगाथा में कल १२७६ पद्य हैं। इन पद्यों की परम्परा महात्मा बुद्ध द्वारा संघ के निर्माण के समय से ही चल पड़ी होगी तथा संघ के भिक्षुओं द्वारा अनुश्रुति से इन पद्यों की रक्षा तथा संवर्धन का कार्य कुछ शताब्दियों तक किया जाता रहा होगा। ऋग्वेद के उपरिलिखित सूक्तों या अथर्ववेद के पृथिवीसूक्त की भांति थेरगाथा की गाथाओं में भी भारतीय वसुन्धरा के अकृत्रिम नैसर्गिक सौन्दर्य से सात्त्विक लगाव को सहज अभिव्यक्ति मिली है। यद्यपि ये गाथाएं अधिकांशतः निर्वाणप्राप्त सिद्ध भिक्षुओं या अनासक्त काव्य-खण्ड साधकों के उद्गार हैं, तथापि जगत् और भौतिक विषयों को असम्पृक्त रहकर देखने वाले इन गाथाकारों ने पावन अकलुषित सौन्दर्य के प्रति अपने नयन नहीं मूंदे हैं, यही नहीं, ऐसे सौन्दर्य के प्रति गहरी प्रशंसा के भाव उन्होंने व्यक्त किये हैं। गाथाकारों की अभिव्यक्ति में वैयक्तिकता और आत्मानुभूति की गहराई भी है, जो गीतिकाव्य या मुक्तक-परम्परा में उनके अवदान को स्पष्ट करती है। यह सत्य है कि ये भिक्षु, थोथी या गलदश्रु भावुकता से आक्रान्त नहीं हैं, क्षुद्र भावनाएं या देह की संसक्ति ने उन्हें स्पर्श नहीं किया है। पर प्रकृति की नयनाभिराम सुषमा के प्रति उनमें सहज आकर्षण है और इस आकर्षण में उदात्त मूल्यबोध अन्तर्निहित है। उन्होंने निसर्ग के भव्य और अनन्त सौन्दर्यमय रूप की आराधना में गाथाओं की कमनीय मालाएं अर्पित की हैं। वैदिक ऋषियों की भांति प्रकृति के विराट् रूप ने गाथाओं को उनके चित्त में स्वतः स्फूर्त किया है। थेरगाथा के काव्य की इस विशेषता को दृष्टिगत करते हुए संस्कृत साहित्य के प्रख्यात पाश्चात्त्य विद्वान श्री विण्टरनित्स ने कहा है–थेरगाथा में प्रकृति के इन रमणीय वर्णनों ने इन धार्मिक कविताओं को भारतीय गीतिकाव्य में सच्ची मुक्ताएं बना दिया है। बौद्ध साहित्य की प्रख्यात विदुषी श्रीमती रायस डेविड्स भी इन गाथाओं को कवि के आभ्यन्तर जगत् की गहन अभिव्यक्ति मानती है, और उनका तो यहाँ तक कहना है कि अपने शाब्दिक नाद की झंकार के कारण थेरगाथा की कविताएं बिना किसी हिचकिचाहट के कीट्स या शैली जैसे अंग्रजी के महान गीतिकाव्य के सर्जक कवियों के समकक्ष रखी जा सकती है। ताकि मि JOF थेरगाथा की गाथाओं में प्रकृति के अनाविल उन्मुक्त रूप पर गाथाकार की अनुरक्ति और अनासक्ति दोनों का अद्भुत मिश्रण है। एक ओर तो प्रकृति के विशाल प्रांगण में विचरण करता हुआ वह कहता है PASENIE नीलब्मवण्णा रुचिरा सीतवारी सुचिन्धरा। ॐ असता इन्दगोपकस छन्ना ते सेला रमयन्ति माम् ।। मास्का (वनवच्छथेरो, गाथा-१६) (नीलाभ वर्ण वाले, रुचिर, शीतल जल से भरे तथा इन्द्रगोपियों से आच्छादित ये पहाड़ मुझे रमाते हैं।) तो दूसरी ओर वह अपने चित्त में झांक कर सुसमाहित होकर कहता [ PRE धरणी च सिञ्चति वात माणूता। धरणी च सिञ्चति वाति मालूतो विज्जुता चरति नभे। उपसम्मन्ति वितक्का चित्तं सुसमाहितं मम।। (विमलो थेरो, गाथा -५३) १. हिस्ट्री आफ संस्कृत लिटरेचर : एम. विण्टरनित्स, भाग-२, पृ.१०६ २. घेरगाथा : एन.के. भागवत द्वारा सम्पादित, भूमिका पृ. ११ पर उद्धृत। जागा ६७ मुक्तक-काव्य-परम्परा : शतककाव्य (धरती वर्षा के जल से सिंच रही है, पवन बह रहा है, आकाश में बिजली चमक रही है। पर मेरे भीतर के वितर्क शान्त हो रहे हैं और मेरा चित्त सुसमाहित है।) या जिथेरगाथा का काव्य वस्तुतः अन्तर्जगत् की ओर लौटने का काव्य है, और बाह्य जगत् का विस्तीर्ण दृश्यफलक इस वापसी की आधारभूमि है। पर इस आधारभूमि को गाथाकारों ने असीम श्रद्धा और आस्था में भरकर निहारा है। वे कहते हैं सत्वचा व मालूते उपवायन्ते सीते सुरभिगन्धके। गामाला इनाम मा अविजं दालयिष्यामि निसिन्नो नगमूर्धनि।। बने कुसमसच्छन्ने पब्भारे वन सीतले। विमुत्तिसुखेन सुखितो रमिस्सामि गिरिव्रजे।। (एकविहारियो थेरो, गाथा- ५४७-४८) गरि (शीतल और सुरभित गन्ध वाला पवन बहता रहेगा। मैं इस पर्वत के शिखर पर बैठा हुआ अपने भीतर की अविद्या को नष्ट कर डालूंगा। इस फूलों से भरे वन में इस शीतल परिसर में विमुक्ति के सुख से सुखी होकर मैं इस पर्वतप्रान्त में रमता रहूंगा।) वैयक्तिकता और एकान्तसाधना से जन्मी हुई मुक्तककविता के दुर्लभ उदाहरण थेरगाथा की गाथाएं प्रस्तुत करती हैं। मुक्ति की अभीप्सा वाले साधक की अन्तरंग कामनाएं यहाँ प्रतिध्वनित हैं। साधक अपने आप से पूछता है कि मैं कब पर्वतकन्दराओं में एकाकी और अद्वितीय हो कर विहार करूंगा? कब मैं सारे संसार को नश्वर देख पाऊंगा? मुक्ति की परिपूर्ण स्थिति मुझे कब मिलेगी? । शिमा, कदा नु अह पब्बतकन्दारासु।वितिसत सामी काव्यात िएकाकियो अदुतियो विहस्सम्। जति काम कर रुमा ति अनिच्चतो सब्बभवं विपस्सम्। कहिन जिट वाली माजी - तं मे इदं नु कदा भविस्सदि?|| दिलान किया दिर (तालपुटो थेरो, गाथा - १०६४) यदि थेरगाथा की कविता निस्संगता के साथ-साथ अकलुष प्रकृति-प्रेम की कविता है, तो थेरीगाथा के काव्य में इसकी अपेक्षा भावना की तीव्रता और कारुणिकता है। थेरीगाथा की गाथाएं बौद्ध भिक्षणियों के द्वारा लिखी गयी हैं। इनमें घर-परिवार की उन विडम्बनामय स्थितियों के मार्मिक चित्र हैं, जिनसे उद्धेजित होकर इन महिलाओं ने संघ में प्रवेश किया। एक-एक गाथा अपने आप में एक संपूर्ण कविता है, और समाज में विभिन्न नारी-वर्गों की छवि का अंकन यहां किया गया है। रानी, राजकुमारी, सेठानी, सुशिक्षित ब्राह्मणी, दासी, वेश्या, नर्तकी भिखारिन आदि सभी प्रकार की स्त्रियों के जीवन के चित्र अलग-अलग गाथाओं में हैं। थेरीगाथा में कुल ५१८ पद्य हैं। यदि थेरगाथा में साधक के EE अन्तर्जगत् की आधारभूमि के रूप में प्रकृति का विशाल फलक है, तो यहां साधिकाओं के अन्तरंग जीवन की अभीप्साओं की आधारभित्ति विस्तीर्ण सामाजिक फलक है। अनुभूति की सुकुमारता के साथ जगत् की ८ क्षणभंगुरता और निर्वेद साधिकाओं ने अपने काव्य में हृदयंगम कराया है। एक साधिका अपने देह के विषय में कहती है कालका भमरवण्णसदिसा वेलिलग्गा मम मूद्धजा अहु। ते जराय सालवाकसदिसा सच्चवादिवचनं अनजथा।। (२५२) मेरे जो केश भौंरे के समान काले और घने थे, वे अब सन के समान सफेद हो गये। सत्यवादी बुद्ध का वचन अन्यथा नहीं हो सकता। थेरीगाथा की गाथाकत्रियों में गौतमी और वासिष्ठी ने संतान से बिछड़ जाने की मर्मच्छेदी व्यथा को शब्द दिये हैं। पटचारा ने तो गाथाओं के माध्यम से अपने जीवन की दारुण दुःखद गाथा ही कह दी है। इनमें से अनेक गाथाएं ‘अहम्’ से आरंभ होती हैं, और नितांत वैयक्तिक अनुभूतियों का संसार हमारे आगे खोलती हैं। तीन का यदि वैदिक संहिताओं से प्रस्फुटित हुई भारतीय मुक्तक की सम्पन्न परम्परा धेरगाथा और थेरीगाथा जैसी पालि की रचनाओं में वैराग्य की भूमि पर अवस्थित हुई, तो प्राकृत की गाथाओं में उसे फिर से राग और प्रेम की रसमय भूमि मिली। ईसा के कुछ पहले से लगाकर ईसा की बाद की कुछ शताब्दिों में रची गयी प्राकृत गाथाओं का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण संकलन हाल की ‘गाहासतसई’ है। परम्परा सातवाहन राजा हाल को इन गाथाओं के अनूठे कोश के निर्माण का श्रेय देती आयी है। सातवाहन राजाओं का साम्राज्य दक्षिण भारत में लगभग २२० ई.पू. से २२५ ई. तक रहा। यह काल भारतीय इतिहास में सातवाहन-युग कहलाता है। भोज ने अपने सरस्वतीकण्ठाभरण में तथा उनके टीकाकार रत्नेश्वर ने आढ्यराज शालिवाहन (सातवाहन) के राज्य में प्राकृत भाषा को विशेष आश्रय मिलने का उल्लेख किया है। यदि थेरगाथा तथा थेरीगाथा के मुक्तक जीवन और जगत् की क्षद्रताओं और विषमताओं से ऊपर उठ कर शान्तरस की सष्टि करते हैं, तो गाहासतसई के मुक्तक इस सारी विषमता और क्षुद्रता के बीच आनन्द, रस और राग की फुहारे छोड़ते हैं। घर-परिवार, खेत-खलिहान और गांव-देहात के बीच छोटी-छोटी बातों में यहां गाथाकारों ने अनन्त मधु पाया है। सोहनी जैसे विद्वानों ने तो कालिदास पर भी गाहासतसई का प्रभाव पाया है। कालिदास प्राकृत गाथासाहित्य से प्रभावित हुए थे या नहीं- यह शंकास्पद है, परन्तु अमरुक पर तो अवश्य ही प्राकृत गाथा-साहित्य का सूक्ष्म प्रभाव है। गाहासतसई की एक गाथा में नायिका के मुख से कहलाया गया है तथा अमयमअ गअणसेहर रअणीमुहतिलअ चन्द हे छिवसु। शार छित्तो जोहि पिअवमो ममं तेहि विअ करेंहि।। (११६) मस्या मुक्तक-काव्य-परम्परा : शतककाव्य रहिवाल की (अमृतमय गगनशेखर रजनीमुखतिलक चन्द्र हे स्पृश। और निवार स्पृष्टो यैः प्रियतमो मामपि तैरेव करैः।।) निशाना (हे अमृतमय गगनशेखर रजनीमुखतिलक चन्द्र, तू मुझे उन्हीं किरणों से छू, जिनसे तूने मेरे प्रियतम को छुआ है।) कालिदास ने मेघदूत के एक पद्य में यक्ष के मुख से कहलाया है कि उत्तर की ओर से देवदारु के किसलयपुटों को खिलाती हुई जो हवाएं बहती हुई आती हैं, उन तुषाराद्रि के स्पर्श से शीतल हवाओं का मैं यह सोच कर आलिंगन करता हूं कि वे तुम्हारे देह को छू कर बहती हुई आ रही होगी। गाहासतसई की गाथा तथा मेघदूत के पद्य में यह भावसाम्य प्रणयभावना की दोनों की गहरी पकड़ और प्रेमी के मनोविज्ञान के प्रतिभास्फूर्त चित्रण का कारण है, इसमें एक का दूसरे से प्रभावित होना कारण हो-यह आवश्यक नहीं।

  • इसी प्रकार दूसरी गाथा में नायिका अपनी सखी से कहती है एहिह सा वि पउत्थो अहं च कुप्पेज्ज सो वि अणुणेज्ज। इअ कस्स कि फलइ मणोरहाणं माला पिअअमम्मि ।।१।१७ ’ (एष्यति सोपि प्रोषितोऽहं च कुपिष्यामि सोप्यनुनेष्यति। का! इति कस्या अपि फलति मनोरथानां माला प्रियतमे) ठीक इसी भाव को वैशध और विस्तार तथा सघनता देते हुए अमरुक कहते हैं भ्रूभङ्गे रचितेऽपि दृष्टिरधिकं सोत्कण्ठमुवदीक्षते कि रुद्धायामपि वाचि सस्मितमिदं दग्धाननं जायते। कार्कश्यं गमितेऽपि चेतसि तनू रोमाञ्चमालम्बते दृष्टे निर्वहणं भविष्यति कथं मानस्य तस्मिन् जने।। मानिनी रूठ कर बैठी है। प्रियतम के सामने आने पर भौंहे टेढ़ी कर लेती है, पर आंखे तो उत्कण्ठित होकर प्रिय को तकने लगती हैं। मुंह सी लेती है कि कुछ कहूंगी ही नहीं, पर इस मुंहजले मुंह पर मुस्कान जो फैलती जा रही है, उसे कैसे रोके? जी बिल्कुल कड़ा कर लिया है, पर देह में तो रामांच हो रहा है। ऐसे में मान सध सकेगा भला? वस्तुतः गाहासतसई के मुक्तकों में प्रणयजीवन की अन्तरंग स्थितियों का सूक्ष्म पर्यवेक्षण के साथ अनुभूति-प्रवण चित्रण किया गया है। संस्कृत के शृङ्गारप्रद्यान मुक्तकों की भावभूमि भी यही है, अतएव गाहासतसई का संस्कृत मुक्तकसाहित्य पर प्रत्यक्ष प्रभाव हो या न हो, गाहासतसई समग्र भारतीय मुक्तकसाहित्य की एक अनिवार्य कड़ी है- यह तो निश्चित ही है। संस्कृत काव्यशास्त्र के आचार्यों में आनन्दवर्धन से लेकर साहित्यदर्पणकार तक महनीय आचायों ने अपने लक्षणो में गाहासतसई की गाथाएं उद्धृत की हैं। १०० यदि पालि और प्राकृत के गाथा-काव्यों के सम्पर्क ने संस्कृत-गीति-काव्य को गति दी, तो संस्कृत की अपनी छन्दःसम्पदा की श्रीवृद्धि ने उसे सम्पन्नतर बनाया। विश्व की किसी अन्य भाषा के काव्य में छन्दों की इतनी विविधता और प्रचुरता न होगी, जितनी संस्कृत के काव्य में। लौकिक संस्कृत काव्य में इस छान्दसी-श्री की अभूतपूर्व अभिवृद्धि का आधार तो वैदिक संहिताओं से ही निर्मित हो गया था। अनुष्टुप् छन्द वेदमन्त्रों से सीधे संस्कृत कविता में ग्रहण कर लिया गया। वैदिक त्रिष्टुप् छन्द से इन्द्रवजा और उपेन्द्रवजा का विकास हुआ। इसीप्रकार जगती से वंशस्थ और शक्वरी से वसन्ततिलका की उत्पत्ति मानी जा सकती है। छन्द तो छ: वेदाङ्गों में अध्ययन के अनिवार्य विषय के रूप में वैदिक काल से ही समादृत था। जिस देश की नैसर्गिक सष्टि में कलकल निनाद करतीं सरताओं और अनवरत झरते निझरों के लय में छन्द स्वतः फूटते प्रतीत होते हों, जहां सघन वनों में वंशवृक्षों के पोर-पोर में भरकर पवन स्वयं अलौकिक संगीत की रचना करता आया हो, और जहाँ चप्पे-चप्पे में हरीतिमा का अंकुरण होता रहता हो, वहां मुक्तक कविता तथा छान्दसी सृष्टि का यह वैविध्य सर्वथा सहजसाध्य ही कहा जाना चाहिये। भरतमुनि का नाट्यशास्त्र प्रथम प्राचीन ग्रन्ध है, जिसमें वैदिक और लौकिक दोनों प्रकार के छन्दों का अत्यन्त विशद, सांगपूर्ण सोदाहरण विवेचन किया गया है। इस विवेचन से स्पष्ट है कि ईसापूर्व की शताब्दियों में संस्कृत रंगमंच पर काम करने वाले अभिनेता छन्दों में रमे हुए थे तथा सारे संवादों और गीतों की छन्दोमयता अभीष्ट मानी जाती थी। ऐसी स्थिति में कालिदास, अमरुक, घटकपर आदि प्राचीन गीतिकाव्य के सर्जकों को संस्कृत रंगमंच की परम्परा में छन्दों की जीवन्त प्रस्तुतियों ने भी अभिप्रेरित किया होगा। नाट्यप्रस्तुति में आचार्य भरत ने तो छन्दोमयता पर इतना जोर दिया है कि उन्होंने समस्त वाङ्मय को छन्दोमय ही माना है- मीना । छन्दोहीनो न शब्दोऽस्ति, न च्छन्दः शब्दवर्जितम्। तस्मात्तूभयसंयोगो नाट्यस्योद्योतकः स्मृतः।। पर काफ लि (नाट्यशास्त्र, १४।४७)। भरत मुनि ने शत और सहस्र से लगाकर लक्ष की संख्याओं तक एक-एक छन्द के प्रस्तर का निरूपण किया है।’ इस प्रकार प्राकृत और पालि कविता की सुकुमार भावभूमि तथा संस्कृत की अपनी छान्दसी विपुलता ने कालिदास और अमरुक जैसे महान् मुक्तककवियों के लिये सुपुष्ट आधारभूमि प्रस्तुत कर दी थी। कालिदास ने अपने ऋतुसंहार तथा मेघदूत -इन दो काव्यों के द्वारा संस्कृत गीतिकाव्य में नवोन्मेष किया-जिसकी चर्चा कालिदासविषयक अध्याय में की जा चुकी है। कालिदास के साथ ही घटकर्पर कवि ने संस्कृत गीति-काव्य को यमक के विन्यास के द्वारा गेयता और नादसौन्दर्य की अतिरिक्त झंकार से नया आयाम दिया, जिसकी चर्चा सन्देशकाव्यविषयक आगामी अध्याय में की जायेगी। मुक्तक-काव्य-परम्परा : शतककाव्य १०१