मुक्तक का काव्यविधा के रूप में उल्लेख काव्यशास्त्र के आचार्यों में भामह ने सर्वप्रथम किया है। उन्होने मुक्तक को ‘अनिबद्ध काव्य’ कहा है। अनिबद्ध का उदाहरण भामह की दृष्टि में गाथा या फुटकर श्लोक आदि है (भामह : काव्यालङ्कार, १३०)। भामह के पश्चात् दण्डी ने गाथा या स्फुट श्लोकों से निर्मित विधाओं का नामान्तर से परिगणन किया है मुक्तकं कुलकं कोशः सङ्घात इति तादृशः। वह सर्गबन्धांशरूपत्वादनुक्तः काव्यविस्तरः।। (काव्यादर्श) में कवि मुक्तक, कुलक, कोश, सङ्घात आदि काव्यप्रकार दण्डी की दृष्टि में सर्गबन्ध महाकाव्य के अंश मात्र हैं, अतः उनका पृथक् निरूपण करना वृथा है। वामन ने तो अनिबद्ध या मुक्तक काव्य के विषय में हेयतादृष्टि साफ-साफ प्रकट कर ही दी आणी नानिबद्धं चकास्ति एकतेजः परमाणुवत्। जति वीज काव्यालङ्कारसूत्र १३३६ । मुक्तक के विषय में आचार्यों की इस उपेक्षादृष्टि में क्रान्तिकारी परिवर्तन ध्वनिवाद के आगमन के साथ हुआ। एक-एक पद्य में व्यञ्जना की अपार सम्भावनाएं खोजी जाने लगी, तो मुक्तक या एक पद्य में स्वतः पूर्ण छोटी कविता का महत्त्व बढ़ गया। मुक्तक के इस महत्त्वसंवर्धन में अमरुक जैसे मुक्तक कवियों का भी योगदान रहा होगा। तभी तो आचार्य आनन्दवर्धन ने अमरुक के विषय में कहा कि उनका एक एक पद्य प्रबन्ध या महाकाव्य बन सकने की क्षमता रखता है। इसलिये आनन्दवर्धन की दृष्टि में मुक्तक में रससृष्टि उसी प्रकार हो सकती है, जिस प्रकार प्रबन्ध में आनन्दबर्धन के इस वक्तव्य को आधार बना कर आचार्य अभिनवगुप्त ने मुक्तक का एक सारवाही लक्षण उपस्थित किया पूर्वापरनिरपेक्षेणापि येन रसचर्वणा क्रियते तदैव मुक्तकम्। (ध्वन्यालोकलौचन, पृ. १७५) १. ध्वन्यालोक : ३/७ पर वृत्ति ER काव्य-खण्ड अर्थात जो पूर्वापर निरपेक्ष हो कर भी रसचर्वणा करा सकता है, वह मुक्तक है। अग्निपुराण में पद्यकाव्य के निम्नलिखित भेद बताये गये हैं- महाकाव्य, कलाप, पर्यायबन्ध, विशेषक, कुलक, मुक्तक तथा कोश। इसमें मुक्तक ऐसे काव्य को कहा गया है जिसका एक-एक श्लोक सहृदयों को आह्लादित कर सके। दण्डी ने जिस काव्यप्रकार को सङ्घात् कहा है, उसी को अग्निपुराणकार कलाप कहते हुए प्रतीत होते हैं। दण्डी के टीकाकार तरुण वाचस्पति ने एक ऋतु अथवा एक वस्तु का वर्णन करने वाले पद्यों से अन्चित काव्य को सङ्घात बताया है तथा शरत्सङ्घात और वृन्दावन काव्य को इसका उदाहरण निरूपित किया है। अग्निपुराण के अनुसार समानवृत्त के निर्वाह से युक्त, कैशिकी वृत्ति वाला, प्रवास या पूर्वानुरागसम्पन्न शृङ्गाररसमय काव्य कलाप है। हेमचन्द्र ने काव्यानुशासन में मुक्तक, सन्दानितक, विशेषक, कलापक, कुलक, पर्याय तथा कोश आदि को अनिबद्ध श्रेणी के काव्य के भेदों में गिनाया है। वस्तुतः अनिबद्ध-काव्य की सभी विधाओं का बीज मुक्तक ही है, और मुक्तक के पल्लवन से संस्कृत काव्यधारा में रसात्मक लघुकाव्य, स्तोत्रकाव्य, प्रशस्तिकाव्य तथा सूक्तियों की रचना होती आयी है। माना इस्ला- रससिद्ध कवियों द्वारा रचित महाकाव्यों या खण्डकाव्यों में प्रायः ऐसे पद्य आते हैं, जिनमें एक-एक पद्य स्वतःपूर्ण तथा अन्योन्यनिरपेक्ष रहकर भी रसनिष्पत्ति कराने में समर्थ होता है। पर कविगोष्ठियों में या राजसभाओं में प्रस्तुत करने के लिये अलग से स्वतन्त्र मुक्तक रचने की परम्परा भी प्राचीन काल से चली आ रही होगी। कुछ आगे चलकर जब आनन्दवर्धन जैसे महान आचार्यों ने ऐसे स्वतंत्र मुक्तकों को महत्त्व प्रदान किया, तब इस प्रकार के मुक्तकों को संगृहीत करने की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिला होगा। इस प्रवृत्ति के कारण संस्कृत साहित्य के इतिहास में शतक-काव्यों और सुभाषितसङ्कलनों के निर्माण का उपक्रम हुआ। शतककाव्य में एक कवि अपने एक या अनेक विषयों पर लिखे उत्तमोत्तम पद्यों में सङ्कलित करते थे। यह आवश्यक नहीं था कि सकलित पद्यों की संख्या एकदम सौ ही रहे, संख्या न्यूनाधिक भी हो सकती थी। जब कवि एक ही विषय पर एक अन्चिति में कई मुक्तकों को रचता, तो उनका सङ्कलन सङ्घात-काव्य कहा गया। मिसम्म मुक्तक में वर्ण्य-विषय की कोई सीमा नहीं है। इसी प्रकार शतक काव्यों की भी विषय-वस्तु भिन्न-भिन्न हो सकती है। संस्कृत में शतक-काव्यों का विषयवस्तु की दृष्टि से इस प्रकार विभाजन किया जा सकता है- मी नाही कि जाट (१) शृङ्गारप्रधान शतक (२] नातप्रधान शतक की जान (३) वैराग्यप्रधान शतक स्तोत्र-शतक (५) प्रशस्तिपरक शतक मुक्तक-काव्य-परम्परा : शतककाव्य भाग स्फुट मुक्तकों में भी शृङ्गार, नीति, वैराग्य, स्तुति तथा प्रशस्ति -ये पाँच विषय प्रमुख रूप से मिलते हैं। मुक्तक के लिये पाश्चात्त्य-परम्परा में ‘लिरिक’ या गीतिकाव्य शब्द का व्यवहार होता है। भारतीय मुक्तक-परम्परा पाश्चात्त्य ‘लिरिक’ की तुलना में विषयनिष्ट अधिक है, जब कि पाश्चात्त्य लिरिक आत्मनिष्ठ अधिक है। लिरिक में गेयता का तत्त्व भी अनिवार्य तथा महत्त्वपूर्ण माना जाता है। संस्कृत परम्परा के मुक्तक पाठ्य होने के साथ-साथ गेय भी होते हैं, पर गेयकाव्य या गीतिकाव्य का स्वतन्त्र रूप से संस्कृत साहित्य की परम्परा में विकास रागकाव्य या काव्य नामक विधा के अन्तर्गत हुआ, जिस पर इस ग्रन्थ में स्वतन्त्र अध्याय में चर्चा की गयी है। किसी BP निकाय की गाय कालिदास के मेघदूत को कुछ प्राचीन आचार्यों ने यद्यपि सङ्घात काव्य का निदर्शन माना, किन्तु मेघसन्देश के रूप में इसकी ख्याति तथा कवि की क्रान्त दृष्टि से प्रचलित काव्यविधालक्षणों को अतिक्रमण कर देने की क्षमता के कारण इसे सन्देश-काव्य के रूप में भी प्रतिष्ठा मिली और इसके अनुकरण में सन्देशकाव्यों या दूतकाव्यों की महती परम्परा संस्कृत-कविता में चल पड़ी।