+०३ महाकवि अश्वघोष और बौद्ध काव्य-परम्परा

संस्कृत साहित्य में महाकवि कालिदास भारतीय संस्कृति के समर्थ समर्थक थे। उन्होंने अपनी रचनाओं के माध्यम से भारतीय धर्म, दर्शन और मान्यताओं का स्वरूप प्रस्तुत किया। उनकी इन विशेषताओं ने बौद्ध धर्मावलम्बी आचार्यों को भी प्रभावित किया। कालिदास के काव्यों से प्रेरित होकर बौद्धकवियों ने भी अपने धर्मप्रचार के लिए संस्कृत में काव्यरचना आवश्यक समझा, फलतः बौद्धधर्म के आदि प्रवर्तक भगवान् बुद्ध के उदात्त चरित को आधार मानकर संस्कृत में काव्य-रचना प्रारम्भ हुई। इस परम्परा का श्रीगणेश बौद्धकवि अश्वघोष ने किया। नाया बौद्ध-संस्कृत-काव्यकारों में द्वितीय शती ईस्वी के सुप्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन का भी उल्लेखनीय स्थान है। इन्होंने ‘सुहल्लेख’ नामक सन्देश काव्य तथा ‘युक्तिषष्टिका’ एवम् ‘शून्यतासप्तति’ नामक पुरुषार्थ-काव्यों की रचना की। ‘सुहल्लेख’ में नागार्जुन ने किसी राजा के पास बौद्ध-जीवन-दर्शन का सन्देश भेजा है। इसका एक पद्य ‘सुभाषितावली’ में संगृहीत है। शून्यवाद के मीमांसक नागार्जुन ने ६० पद्यों की ‘यक्तिषष्टिका’ तथा ७० पद्यों में विरचित ‘शुन्यतासप्तति’ नामक काव्यों में शून्यवाद की चर्चा की है। विदर्भ के ब्राह्मण-कुल में उत्पन्न नागार्जुन ने बुद्ध की शरण लेने के बाद माध्यमिक कारिकाओं की रचना कर शून्यवाद का विश्लेषण किया। ये महान् दार्शनिक तथा संस्कृत के श्रेष्ठ बौद्ध कवि थे। नागार्जुन के ही प्रधान शिष्य आर्यदेव ने २५० ई. के आसपास ‘चतुःशतक’ नामक काव्य में ४०० कारिकाएं लिखकर नागार्जुन द्वारा प्रवर्तित शून्यवाद की परम्परा को विकसित किया। अश्वघोष के बाद बौद्ध-संस्कृत महाकाव्यों की परम्परा के उन्नायकों में महाकवि बुद्धघोष का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। इन्होंने पांचवीं शताब्दी में ‘पद्यचूड़ामणि’ नामक एक श्रेष्ठ महाकाव्य की रचना की। १० सर्गों तथा ६४१ पद्यों में निबद्ध इस महाकाव्य की कथा में बुद्धचरित का आख्यान मारविजय तक वर्णित है। भारतीय आचार्यों द्वारा निर्धारित महाकाव्य की प्रायः सभी विशेषताओं से मण्डित ‘पद्यचूड़ामणि’ एक उत्कृष्ट काव्य है। विविध अलंकारों से समलंकृत तथा विविध छन्दों में निबद्ध ‘पद्यचूड़ामणि’ काव्य-गुणों के उत्कर्ष की दृष्टि से एक उत्कृष्ट महाकाव्य है। तिनी तक प्रया विषस्य विषयाणां च दूरमत्यन्तसञ्चरम्। उपभुक्तं विषं सन्ति विषयाः स्मरणादपि।। वल्लमदेव-सुभाषितावली काव्य-खण्ड संस्कृत में बौद्ध-काव्य-परम्परा के उन्नायकों में सातवीं शती में सौराष्ट्र में प्रसूत शान्तिदेव का स्थान महत्त्वपूर्ण है। ये पंचशिख नामक राजा के मन्त्री थे तथा विरक्त होने पर इन्होंने योगाचार्य का शिष्यत्व स्वीकार कर लिया था। इन्होंने नालन्दा के महान् आचार्य जयदेव से शिक्षा प्राप्त की तथा ‘बोधिचर्यावतार’, ‘शिक्षासमुच्चय’ एवम् ‘सूत्रसमुच्चय’ नामक तीन ग्रन्थों की रचना की। इनमें ‘बोधिचर्यावतार’ एक उत्कृष्ट काव्य है। दस परिच्छेदों में विभक्त इस काव्य में कुल ६१३ श्लोक हैं। इसमें कवि ने बुद्ध बनने के लिए आवश्यक चर्या का काव्यात्मक विन्यास किया है। इसमें सार्वभौम मैत्रीभाव का सन्देश है। ‘सबमें अपने को तथा अपने में सबको देखो’ यही बोधिचर्या का सार है। शान्तिदेव का सम्पूर्ण मानवता को यही सन्देश है- ‘अपने को वश में करके सदा प्रसन्न रहो, भौहें टेढ़ी मत करो, पहले स्वयं बोलो और सारे संसार को अपना मित्र बनाओ।" - का उपर्युक्त बौद्ध-संस्कृत-काव्यकारों के अतिरिक्त महाराज हर्षवर्धन, सर्वज्ञमित्र, वजदत्त, शिवस्वामी तथा रामचन्द्र-कविभारती का नाम भी उल्लेखनीय है। महाराज हर्षवर्धन ने सुप्रभातस्तोत्र तथा अष्टमहाश्रीचेत्यस्तोत्र की रचना की। ये दोनों स्तोत्र फ्रान्सीसी पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। २४ पद्यों में विरचित तथा प्रातः गेय ‘सुप्रभातस्तोत्र’ में भगवान् बुद्ध की स्तुति की है। इसी प्रकार आठवीं शती के कश्मीरी कवि सर्वज्ञमित्र ने ३७ नग्धरा पद्यों में ‘आर्यातारास्रग्धरास्तोत्र’ की रचना की। इसी क्रम में नवीं शताब्दी में महाराज देवपाल के आश्रय में बज्रदत्त नामक कवि ने १०० स्रग्धरा पद्यों में लोकेश्वरशतक’ नामक काव्य की रचना की। इसमें लोकेश्वर अथवा अवलोकितेश्वर की प्रशंसा की गई है। संस्कृत के बौद्ध महाकाव्यकारों में नवीं शती के कश्मीर नरेश अवन्तिवर्मा की राजसभा के कवि शिवस्वामी का नाम भी उल्लेखनीय है। इन्होंने बौद्धावदान की कथा को महाकाव्य का स्वरूप प्रदान करने के उद्देश्य से ‘कप्फिणाभ्युदय’ नामक महाकाव्य की रचना की। संस्कृत के बौद्ध-काव्यों में रामचन्द्र-कविभारतीप्रणीत ‘भक्तिशतक’ भी एक उल्लेखनीय काव्य है। इसमें भगवान् बुद्ध के गुणों का वर्णन है। इस प्रकार प्रथम शताब्दी से लेकर तेरहवीं शती तक संस्कृत में अनेक बौद्ध-काव्यों का प्रणयन हुआ। कर जाता है कि किसी फिलमण जामीन नांला