बुद्धघोष के महाकाव्य में अश्वघोष की भाषा का वैविध्य, बलशालिता और गत्यात्मकता नहीं है। इसकी अपेक्षा उसमें लालित्य और मसृणता अधिक है। भाषा के परिष्कार और सौष्ठव का कवि ने आद्यन्त एकरूपता के साथ निर्वाह किया है। अश्वघोष की अपेक्षा बुद्धघोष का कवित्व परवर्ती अलंकृत महाकाव्यों की शैली के अधिक निकट है, विशेष रूप से उन्होंने कल्पनाओं का जो रमणीय संसार अपने वर्णनों में रचा है, उसमें उत्प्रेक्षा और रूपकों की संयोजना ने चार चांद लगा दिये हैं। उदाहरण के लिये कपिलवस्तु के प्रासाद का यह वर्णन - यदिन्द्रनीलोपलकुटिमेषु प्रविष्टभाजां प्रथमेन्दुलेखाम्। RT मृणालखण्डस्पृहया मरालाश्चञ्चुपुटैश्चुम्बितुमुत्सहन्ते।। -२१५ EE महाकवि अश्वघोष और बौद्ध काव्य-परम्परा इंद्रनील (नीलम) से बने महल के फर्श पर जब चंद्रमा की पहली किरण पड़ती है, तो हंस उसे कमलनाल का टुकड़ा समझ कर चोंच से उठाने लगते हैं। इसी प्रकार वर्षा के बादलों से अभिषिक्त शरद् के मेघों का उत्तरीय धारण किये हुए चंद्रमा की किरणों रूपी चंदन का लेप लगाये और तारों का हार पहने हुए दिशा नायिकाओं का यह रूप भी दर्शनीय है कालजमीन पर पिता नमः कृताभिषेकाः प्रथमं घनाम्बुभिधृतोत्तरीयाः शरदभ्रसञ्चयैः। चिया विकार कि विलिप्तगात्रयः शशिरश्मिचन्दनैर्दिशो दधुस्तारकहारयष्टिकाम् ।। (५।४७) । यद्यपि बुद्धघोष भी अश्वघोष की भांति भगवान् बुद्ध के प्रति श्रद्धाभाव से अभिप्रेरित हैं, पर उनकी बुद्ध की छवि में भी व्यक्तित्व की महनीयता और उदारता के साथ उपयुक्त लालित्य विविधवर्णी सौन्दर्यच्छटा का समन्वय है। उदाहरण के लिए शिष्ट की प्रसन्नपूर्णावलयाभिरामं ज्योतिर्मयं तस्य मुखारविन्दम् । जया की भूयिष्ठमन्तर्गतचन्द्रलेखां बालार्कबिम्बश्रियमाततान ।। -३।६० परि हिलात का सिद्धार्थ के ललाट पर ऊर्णावलय (भौहों के बीच रोओं का घेरा) तथा मुखारविन्द के संयोग को कवि ने बालसूर्य के भीतर चन्द्रलेखा के योग से उपमित किया है। निष्चय ही बुद्धघोष का महाकाव्य कालिदास और अश्वघोष के पश्चाद्वर्ती महाकाव्यपरंपरा की एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण कड़ी है। यह महाकाव्य अलङ्कृत शैली का सरस रमणीय उदाहरण है। उपमा और उत्प्रेक्षा बुद्धघोष का प्रिय अलंकार प्रतीत होता है। इसका कवि ने सर्वाधिक प्रयोग किया है। अलंकारों के रमणीय प्रयोग की दृष्टि से यह एक सुन्दर काव्य है। अलंकारों की भांति कवि की छन्दोयोजना भी उत्कृष्ट है। बुद्धघोष ने पद्यचूड़ाणि में इन्द्रवज्रा, मालिनी, वसन्ततिलका, वियोगिनी, उपजाति, शालिनी, मन्दाक्रान्ता, शार्दूलविक्रीडित, अनुष्टुप, पुष्पिताग्रा तथा वंशस्थ आदि विविध छन्दों का सुन्दर प्रयोग किया है। पद्यचूडामणि का नवम सर्ग पूरा का पूरा अनुष्टुप् छन्द में निबद्ध है। प्रत्येक सर्ग के अन्त में कवि ने छन्द-परिवर्तन किया है। प्रसाद-गुण-बहुल इस महाकाव्य में माधुर्य एवं ओजोगुण की भी अत्यन्त सजीव योजना है। शान्तरस की प्रधानता होने पर भी यत्र-तत्र श्रृंगार तथा वीर रस की भी इस महाकाव्य में सशक्त अभिव्यक्ति हुई है। बुद्धघोष पर महाकवि कालिदास तथा अश्वघोष का व्यापक प्रभाव परिलक्षित होता है। पद्यचूडामणि के अनेक वर्णन कालिदासकृत रघुवंश तथा अश्वघोषकृत बुद्धचरित महाकाव्य से मिलते-जुलते हैं। नगर, पर्व, ऋतु,जलक्रीड़ा, सूर्यास्त तथा नदी-वर्णन के अतिरिक्त दोहद-वर्णन और बालावताराश्चर्य-वर्णन इस दृष्टि से तुलनीय हैं।
- काव्य-खण्ड सर Fa PAR