बौद्ध कवि मातृचेट के जीवन चरित की अधिकांश बातें अज्ञात हैं। उनमें से केवल एक ही निःसन्दिग्ध बात प्रकाशपथ में आयी है और वह है इनकी महाराज कनिष्क की समकालिकता। कनिष्क ने बौद्धधर्म के दिव्य उपदेशों को सुनने की इच्छा से जब मातृचेट को अपनी राजसभा में बुलाया, तब अत्यन्त वृद्ध होने के कारण कवि ने अपनी असमर्थता प्रकट की और बौद्ध धर्म के प्रशस्त सिद्धान्तों का विवरणमय पद्यात्मक पत्र कनिष्क के पास भेजा। ८५ पद्यों का लघु काव्यमय यह ‘महाराज कनिक लेख’ आज भी तिब्बती भाषा में अनूदित होकर सुरक्षित है। कतिपय विद्वान् मातृचेट को अश्वघोष और नागार्जुन से पश्चाद्वर्ती मानते हैं और इनके समकालिक राजा कनिक (कनिष्क) को कनिष्क द्वितीय बतलाते हैं। ग्रन्थ-अपने दो स्तोत्रग्रन्थों के कारण मातृचेट बौद्धजगत् में स्तुतिकार की महनीय ख्याति से विभूषित हैं (१) वर्णार्हवर्णस्तोत्र चार सौ पद्यों में निबद्ध स्तुतिकाव्य है। इसका तिब्बती अनुवाद आज भी प्राप्त है। इसमें १२ परिच्छेद हैं, जिनमें तथागत की भव्य और नितान्त सुन्दर स्तुति की गई है। समग्र ग्रन्थ अनुष्टुप् छन्द में निबद्ध है। म (२) अध्यर्थशतक’ यह डेढ़ सौ अनुष्टुप् छन्दों में निबद्ध बुद्धस्तुति मातृचेट की सर्वप्रधान रचना है, जिसकी लोकप्रियता तथा व्यापकता का परिचय इसके अनुवादों से मिल जाता है। चीनी तथा तिब्बती भाषा में अनूदित होने के अतिरिक्त मध्य एशिया की १. आचार्य बलदेव उपाध्याय, संस्कृत साहित्य का इतिहास पृ. १७७ । २. अंग्रजी अनुवाद के लिए द्रष्टव्य-इ.ए. भाग ३४, १६०५.प.१४५ ३. ग्रन्थ का मूल संस्कृत पाळ बिहार एण्ड उड़ीसा रिसर्च पत्रिका भाग २३, खण्ड ४ (१९३७) में प्रकाशित हुआ है। म मता काव्य-खण्ड काम ‘तोखारी’ भाषा में भी इसके अनुवाद का अवशेष इसकी महती ख्याति का पर्याप्त परिचायक है। १३ विभागों में विभक्त यह स्तुतिकाव्य परवर्ती कवियों के लिए प्रेरणादायक था। जैनसमुदाय के अनेक महनीय आचार्यों ने इस स्तुतिकाव्य के फला आधार पर नवीन स्तुतिकाव्यों की रचना की। समन्तभद्र का ‘स्वयंभूस्तोत्र’ और मा हेमचन्द्र का ‘वीतरागस्तोत्र’ मातृचेट के आदर्श तथा आधार पर निश्चित रूप से Fmनिर्मित हुए हैं। मातृचेट तथा हेमचन्द्र के पद्यों में तो घनिष्ठ भावसाम्य है । समीक्षण-मातृचेट के स्तुतिकाव्य की भाषा अत्यन्त सरल, प्रसन्न, आडम्बरहीन और कृत्रिमता से परे है। इनमें तथागत के आध्यात्मिक जीवन और उनके नैतिक उपदेशों का रुचिर वर्णन है। काव्य के अधिकांश पचों में कविहृदय की सरलता, सत्यता और भावग्राहिता का मनोरम चित्र सहृदयों को मन्त्रमुग्ध कर देता है। तथागत-धर्म के विपुल प्रसार की मङ्गल कामना ही कवि की हार्दिक भावना है। मातृचेट के स्तुतिकाव्य में हृदय को छू लेने की विलक्षण क्षमता है, तथागत के उच्च सिद्धान्तों को सुबोध शब्दों में प्रकट करने की अद्भुत शक्ति है। बौद्ध आचार्यों तथा जैन-सूरियों को स्तुति काव्य लिखने की प्रशस्त प्रेरणा देने के कारण मातृचेट को स्तुतिकाव्य का जनक माना जा सकता है। तथागत की स्तुति में मातृचेट की निम्न उक्ति में विरोधाभास की सुन्दर छटा द्रष्टव्य है पराथैकान्तकल्याणी कामं स्वाश्रयनिष्ठुरा। साहिरी त्वय्येव केवलं नाथ करुणाऽकरुणाऽभवत् ।। (अध्यर्थशतक ६४) * हे नाथ! आपकी करुणा परोपकार के सम्पादन में एकान्तरूप से संलग्न है, किन्तु आश्रयरूपी अपने शरीर के प्रति अत्यन्त निष्ठुर है। अतः आपकी करुणा स्वतः करुण होते हुए भी करुणाविहीन है। साग अश्वघोष की विपुल प्रसिद्धि ने मातृचेट की कीर्ति को ढक दिया फलतः चीनी परम्पराओं में दोनों में अभिन्ता सिद्ध होने लगी, परन्तु दोनों बौद्धकवि समकालिक होने पर भी भिन्न-भिन्न व्यक्ति थे, यह निःसंदिग्ध तथ्य है। किसी
आर्यशूर
बौद्धजातकों को भी साहित्यिक शैली में लोकप्रिय बनाने वाले बौद्धकवि आर्यशूर अश्वघोष के अनुकरणकर्ता माने जा सकते हैं। इनके जीवन की घटनाएं अपरिचित हैं अतः इनको अश्वघोष से अभिन्न माना गया है। किन्तु वस्तुतः दोनो नितान्त भिन्न व्यक्ति हैं। अश्वघोष की काव्यशैली का अनुकरण ही दोनों की अभिन्नता का कारण माना जा सकता है। इनके मुख्यग्रन्थ ‘जातकमाला’ की ख्याति भारत से बाहर बौद्ध जगत् में में भी १. मातृचेट तथा हेमचन्द्र के भावसाम्य के लिए ट्रष्टव्य विश्वभारतीपत्रिका, खण्ड५, सं. २००२, भाग १, पृ. ३३८-३४३। २. आचार्य बलदेव उपाध्याय, संस्कृत साहित्य का इतिहास पृ. १७८ ३. वही, पृ. १BE महाकवि अश्वघोष और बौद्ध काव्य-परम्परा थी। ७वीं शती में इसके विपुल प्रचार का परिचय इत्सिंग के यात्रा-विवरण से मिलता है। जातकमाला संस्कृत में लिखी रचना है। आर्यशर की कीर्ति का स्तम्भ है ‘जातकमाला’ जिसमें ३४ जातकों का सुन्दर काव्य शैली तथा भव्य साहित्यिक भाषा में वर्णन है। इनके कुछ जातक तो पालिजातकों के आधार पर हैं, परन्तु अन्य जातक प्राचीन बौद्ध अनुश्रुति पर ही आश्रित हैं। भारत में इस ग्रन्थ की प्रसिद्धि का अनुमान इसी घटना से लगाया जा सकता है कि हेमचन्द्र (१२वीं शती) ने अपने ‘अभिधानचिन्तामणि’ कोष में बुद्ध का अन्यतम नाम दिया है- ‘चतुस्त्रिंशज्जात कहा। इसकी दो टीकाएँ संस्कत में अनपलब्ध होने पर भी तिब्बती भाषा में सरक्षित हैं। दो टीकाओं की रचना तथा तिब्बती अनुवाद इस ग्रन्थ की लोकप्रियता के परिचायक हैं। आर्यशूर की एक दूसरी काव्यरचना इधर प्रकाश में आयी है। ग्रन्थ का नाम है-पारमितासमास। इसमें छहों पारमिताओं (दान, शील, शान्ति, वीर्य, ध्यान तथा प्रज्ञा-पारमिता) का वर्णन ६ सर्गों तथा ३६४ श्लोकों में जातकमाला की ही सरल तथा सुबोध शैली में किया गया है। बौद्ध कथाओं का काव्यात्मक रोचक आख्यान शैली में अवतारण आर्यशूर का मुख्य कार्य है ’ ।
बुद्धघोष - पद्यचूडामणि
पांचवी शताब्दी में विरचित ‘पद्यचूडामणि’ बुद्धघोष प्रणीत एक मात्र संस्कृत महाकाव्य है। दस सर्गों में निबद्ध इस महाकाव्य की कथा में बुद्धचरित का आख्यान मार-विजय तक वर्णित है। इस महाकाव्य के प्रमुख स्रोत त्रिपिटक, ललितविस्तर तथा अश्वघोषकृत बुद्धचरित महाकाव्य हैं। __ ‘पद्यचूडामणि’ महाकाव्य के प्रथम सर्ग में ७६, द्वितीय सर्ग में ५५, तृतीय सर्ग में ६४, चतुर्थ सग में ८७, पंचम सर्ग में ६४, षष्ठ सर्ग में ४५, सप्तम सर्ग में ५६, अष्टम सर्ग में ४७, नवम सर्ग में ८३ तथा दशम सर्ग में ५१ पद्य हैं। इस प्रकार पद्यचूडामणि में कुल श्लोक संख्या ६४१ है। दस सर्गों में निबद्ध ‘पद्यचूडमणि’ महाकाव्य के प्रथम सर्ग में मंगलाचरण तथा विनय प्रदर्शन के बाद कवि ने कपिलानगरी तथा कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन और उनकी रानी महादेवी का वर्णन किया है। सर्गान्त में पुत्र-प्राप्ति के निमित्त किए गये व्रतों का वर्णन है। द्वितीय सर्ग में देवताओं की तुषिता नामक नगरी, तुषिताधिपति, तुषिताधिपति का स्तवन तथा तुषिताधिपति का महादेवी के गर्भ में अनुप्रवेश वर्णित है। तृतीय सर्ग में महादेवी के दोहद चिह्नों का वर्णन, सिद्धार्थ का जन्म, राजा द्वारा दानादि का आचरण, राजा द्वारा १. आचार्य बलदेव उपाध्याय, संस्कृत साहित्य का इतिहास पृ. १७E-१८० २. कुणू स्वामी शास्त्री के द्वारा मद्रास से संस्कृत टीका के साथ १८२१ ई. में प्रकाशित । कुप्पू स्वामी ने बुद्धघोष का समय पंचम शती का उत्तरार्ध माना है। ३. यह बुद्धघोष पालिसाहित्य के सुप्रसिद्ध विद्वान् बुद्धघोष से भिन्न व्यक्ति हैं। काव्य-खण्ड कुमार का निरीक्षण, जातकर्म आदि संस्कार, सिद्धार्थ के नामकरण, राजा द्वारा कुमार का निरीक्षण, जातकर्म आदि संस्कार, सिद्धार्थ के नामकरण, बालक्रीड़ा, उपनयन, विद्याग्रहण, यौवन तथा युवराज के पद पर अभिषेक का वर्णन है। __चतुर्थ सर्ग में सिद्धार्थ के विवाह का वर्णन तथा कपिलवस्तु की स्त्रियों द्वारा कुमार का दर्शन तथा राजभवन में प्रवेश के समय नीराजन आदि के अनुष्ठान का वर्णन है। पंचम सर्ग में कुमार के द्वारा ऋतूत्सव के अनुभव का वर्णन, राजा द्वारा कुमारास शिक्षा के दर्शन का वर्णन है। षष्ठ सर्ग में वसन्त-वर्णन, कुमार का उद्यान-विहार के लिए निर्गमन तथा मार्ग में देवताओं द्वारा वृद्ध, रोगी, मृत, आदि के प्रदर्शन, कुमार एवं सारथि का संवाद, देवताओं द्वारा तपस्वी तथा राजकुमार द्वारा पुनः उद्यान-विहार की इच्छा का वर्णन किया गया है। सप्तम सर्ग में उद्यान-वर्णन, जलक्रीड़ा-वर्णन जलक्रीड़ा के उपरान्त अलंकारादि के ग्रहण का वर्णन है। अष्टम सर्ग में सूर्यास्त, रात्रि, दीप, अन्तरिक्ष तथा चन्द्रोदय का वर्णन तथा राजकुमार द्वारा गृह-प्रवेश का निरूपण किया गया है। नवम सर्ग में सभा में नृत्तादि वर्णन, अनवमा-नदी-वर्णन, प्रातःकाल वर्णन, सूर्योदय वर्णन, अनवमा नदी के तट पर सिद्धार्थ का निवास, बिम्बसार-नगरी का वर्णन, भिक्षाटन, भिक्षा लेकर पर्वत का आश्रयण, कानन-प्रवेश, वहां लम्बे समय तक तपश्चरण, निर्वाण-प्राप्ति के उपायों का चिन्तन, स्वप्नपंचक-दर्शन, निर्वाण-प्राप्ति का निश्चय, वटवृक्ष के नीचे स्थिति, पायस-भोजन, साल-वन का वर्णन, अश्वत्थ-प्राप्ति, दर्भासन ग्रहण, देवकृत बुद्ध-स्तोत्र तथा कामदेव का बुद्ध-विजय के लिए चिन्तित होना वर्णित है। दशम सर्ग में युद्ध के लिए मदन का अभिगमन सैन्यसन्नाह, चतुरंगबल-वर्णन, सेनाभिगमन-वर्णन, युद्ध का आरम्भ, मार-बुद्ध-संवाद, मार का पलायन, मार की स्त्रियों के नृत्तादि का वर्णन, मार-स्त्रियों का पलायन तथा निर्वाणप्रेप्सुरक्षण वर्णित हैं। इस प्रकार पद्यचूडामणि की कथा में बुद्धचरित का आख्यान मारविजय तक वर्णित है।