निर्वेद और शान्तरस की प्रधानता होते हुए भी अश्वघोष के दोनों ही महाकाव्यों में सभी रसों का यथोचित परिपाक हुआ है। बुद्धचरित के चौथे और पांचवें अंकों में स्त्रियों की कामोद्दीपक चेष्टाओं के वर्णन में अश्वघोष ने श्रृंगार की सारी सामग्री संजो दी है। उसी प्रकार सौन्दरनन्द में सुन्दरी और नन्द के प्रगाढ़ अनुराग और निर्भर विलास का चित्रण भी प्रभविष्णु है, भले ही अश्वघोष ने इसे मात्र पूर्व-पक्ष की दृष्टि से किया हो। बुद्धचरित के षष्ठ सर्ग में छन्दक की निश्छल मार्मिक उक्तियाँ और प्रलाप, इसके आगे यशोधरा की करुणा, सौन्दरनन्द में नन्द के वापस न आने पर सुन्दरी की हृदयभेदी उक्तियाँ- करुणरस की सृष्टि करती हैं। बीभत्स रस का प्रयोग तो शान्तरस के परिपोष के लिये अश्वघोष ने बहुत सधे हुए ढंग से किया है। इस दृष्टि से बुद्धचरित के पंचम सर्ग में सोती हुई स्त्रियों का उनका वर्णन संस्कृत महाकाव्य-परंपरा में एक उल्लेखनीय प्रसंग है, और यह वाल्मीकि द्वारा लंका के राजप्रासाद में अर्धरात्रि में सोती स्त्रियों का हनुमान् के द्वारा अवलोकन के प्रसंग के समकक्ष है। दोनो ही प्रसंगों में नायक निर्वेद और तटस्थ भाव से सोती हुई सुंदरियों के समुदाय को देखते हैं। अश्वघोष ने यहां बाहरी रूप में छिपी कुरूपता और तथाकथित सौंदर्य की बीभत्सता का जो निदर्शन कराया है, वह संस्कृत कविता में अप्रतिम ही कहा जा सकता है। सौन्दरनन्द भावनाओं के घात-प्रत्याघात और अन्तर्द्वन्द्व के चित्रण की दृष्टि से संस्कृत महाकाव्यों के बीच एक अनूठी कृति ही कही जा सकती है। नन्द के मन में चलते महाकवि अश्वघोष और बौद्ध काव्य-परम्परा प्रवृत्ति और निवृत्ति के बीच अन्तःसंघर्ष को अश्वघोष ने बहुत अनुभूतिप्रवण और संवेदनमय अभिव्यक्ति दी है। यह कार्की है अश्वघोष के दोनों महाकाव्यों का एक दुर्लभ पक्ष है- उदात्त की अभिव्यक्ति। दोनों महाकाव्यों के केंद्र में महात्मा बुद्ध का पावन, धीर और गंभीर व्यक्तित्व है। वस्तुतः अश्वघोष के संपूर्ण काव्य की प्रेरणा और शक्ति बुद्ध के प्रति उनकी सुदृढ़ और गहन आस्था ही है। एक युगद्रष्टा इतिहासपुरुष के चरित्र पर महाकाव्यरचना करके अश्वघोष ने यथार्थ में अपने महाकाव्यों को महत्ता दी है। अश्वघोष के काव्य की आस्वादभूमि को उनकी इस उदात्त चारित्रिक सृष्टि और बुद्ध के प्रति गहरी श्रद्धा के परिप्रेक्ष्य में समझने पर ही उनके काव्य की असाधारणता जानी जा सकती है। वास्तव में जीवनदर्शन को कविता की भाषा में प्रकट करने के दर्लभ वैशिष्ट्य के कारण अश्वघोष का महत्त्व है।