बुद्धचरित महाकवि अश्वघोष की कवित्व-कीर्ति का आधार स्तम्भ है, किन्तु दुर्भाग्यवश यह महाकाव्य मूल रूप में अपूर्ण ही उपलब्ध है। २८ सों में विरचित इस महाकाव्य के द्वितीय से लेकर त्रयोदश सर्ग तक तथा प्रथम एवम् चतुर्दश सर्ग के कुछ अंश ही मिलते हैं। इस महाकाव्य के शेष सर्ग संस्कृत में उपलब्ध नहीं हैं। इस महाकाव्य के पूरे २८ सर्गों १. सौन्दरनन्द १८६३ २. Kelth- History of Sanskrit Literature, Page 56 ७६ काव्य-खण्ड का चीनी तथा तिब्बती अनुवाद अवश्य उपलब्ध है। महाकाव्य का आरम्भ बुद्ध के गर्भाट न से तथा बुद्धत्व-प्राप्ति में इसकी परिणति होती है। यह महाकाव्य भगवान् बुद्ध के संघर्षमय सफल जीवन का ज्वलन्त, उज्ज्वल तथा मूर्त चित्रपट है। इसका चीनी भाषा में अनवाद पांचवीं शताब्दी के प्रारम्भ में धर्मरक्ष, धर्मक्षेत्र अथवा धर्माक्षर नामक किसी भारतीय विद्वान् ने ही किया था तथा तिब्बती अनुवाद नवीं शताब्दी से पूर्ववर्ती नहीं है। इसकी कथा का रूप-विन्यास वाल्मीकिकत रामायण से मिलता-जुलता है। तः बुद्धचरित २८ सर्गों में था जिसमें १४ सर्गों तक बुद्ध के जन्म से बुद्धत्व-प्राप्ति तक का वर्णन है। यह अंश अश्वघोषकृत मूल संस्कृत सम्पूर्ण उपलब्ध है। केवल प्रथम सर्ग के प्रारम्भ सात श्लोक और चतुर्दश सर्ग के बत्तीस से एक सौ बारह तक (८१ श्लोक) मूल में नहीं मिलते हैं। चौखम्बा संस्कृत सीरीज तथा चौखम्बा विद्याभवन की प्रेरणा से उन श्लोकों की रचना श्री रामचन्द्रदास ने की है। उन्हीं की प्रेरणा से इस अंश का अनुवाद भी किया गया है। १५ से २८ सर्गों की मूल संस्कृत प्रति भारत में बहुत दिनों से अनुपलब्ध है। उसका अनुवाद तिब्बती भाषा में मिला था। उसके आधार पर किसी चीनी विद्वान् ने चीनी भाषा में अनुवाद किया तथा आक्सफोर्ट विश्वविद्यालय से संस्कृत अध्यापक डाक्टर जॉन्सटन ने उसे अंग्रेजी में लिखा। इसका अनुवाद श्रीसूर्यनारायण चौधरी ने हिन्दी में किया है, जिसको श्रीरामचन्द्रदास ने संस्कृतपद्यमय काव्य में परिणत किया है। बुद्धचरित और सौन्दरनन्द महाकाव्य के अतिरिक्त अश्वघोष के दो रूपक-शारिपुत्रप्रकरण तथा राष्ट्रपाल उपलब्ध हैं। इसके अतिरिक्त अश्वघोष की जातक की शैली पर लिखित ‘कल्पना मण्डितिका’ कथाओं का संग्रहग्रन्थ है।।
कथावस्तु
बुद्धचरित की कथावस्तु गौतम बुद्ध के जन्म से लेकर निर्वाण-प्राप्ति तथा धर्मोपदेश देने तक परिव्याप्त है। कपिलवस्तु जपनद के शाक्वंशीय राजा शुद्धोदन की पत्नी महारानी मायादेवी एक रात स्वप्न में एक गजराज को उनके शरीर में प्रविष्ट होते देखती है। लुम्बिनीवन के पावन वातावरण में वह एक बालक को जन्म देती है। बालक भविष्यवाणी करता है- ‘मैंने लोककल्याण तथा ज्ञानार्जन के लिए जन्म लिया है। ब्राह्मण भी तत्कालीन शकुनों और शुभलक्षणों के आधार पर भविष्यवाणी करते हैं कि यह बालक भविष्य में ऋषि अथवा सम्राट् होगा। महर्षि असित भी राजा से स्पष्ट शब्दों में कहते हैं कि आपका पुत्र बोध के लिए जन्मा है। बालक को देखते ही राजा की आंखों से अश्रुधारा प्रवाहित होने लगती है। राजा अपने शोक का कारण बताता है कि जब यह बालक युवावस्था में धर्म-प्रवर्तन करेगा तब मैं नहीं रहूँगा। बालक का सर्वार्थसिद्ध नामकरण किया १. बुद्धचरितम, चौखम्बा विद्याभवन, वाराणसी १६८८ ई. प्रथम भाग प्राक्कथन पृ. ७-८ २. संस्कृत साहित्य का इतिहास, आचार्य बलदेव उपाध्याय पृ.७०-७३ महाकवि अश्वघोष और बौद्ध काव्य-परम्परा जाता है। कुमार सर्वार्थसिद्ध की शैशवावस्था से ही सांसारिक विषयों की ओर आसक्त करने की चेष्टा की गई। उन्हें राजप्रासाद के भीतर रखा जाने लगा तथा बाह्य-अमण प्रतिषिद्ध कर दिया गया। उनका विवाह यशोधरा नामक सुन्दरी से किया गया, जिससे राहुल नामक पुत्र हुआ। । समृद्ध राज्य के भोग-विलास, सुन्दरी पत्नी तथा नवजात पुत्र का मोह भी उन्हें, सांसारिक पाश में आबद्ध नहीं कर सका। वे सबका परित्याग कर अन्ततः विहार-यात्रा के लिए बाहर निकल पड़े। देवताओं के प्रयास से सर्वार्थसिद्ध सर्वप्रथम राजमार्ग पर एक वृद्ध पुरुष को देखते हैं तथा प्रत्येक मनुष्य की परिणति इसी दुर्गति में देखकर उनका चित्त उद्विग्न हो उठता है। वे बहुत दिनों तक वृद्धावस्था के विषय में ही विचार करते रहे । उद्यान भूमि में आनन्द की उपलब्धि को असम्भव समझकर वे पुनः चित्त की शान्ति के लिए बाहर निकल पड़ते हैं। इस बार देवताओं के प्रयास से उन्हें एक रोगी दिखाई देता है। सारथि से उन्हें ज्ञात होता है कि सम्पूर्ण संसार में कोई भी रोग-मुक्त नहीं है। रोग-शोक से सन्तप्त होने पर भी प्रसन्न मनुष्यों की अज्ञानता पर उन्हें आश्चर्य होता है और वे पुनः उद्विग्न होकर लौट आते हैं। नाकात तृतीय विहार-यात्रा के समय सर्वार्थसिद्ध को श्मशान की ओर ले जाया जाता हुआ मृत व्यक्ति का शव दिखाई देता है। सारथि से उन्हें ज्ञात होता है कि प्रत्येक व्यक्ति का अन्त इसी प्रकार अवश्यम्भावी है इससे उद्विग्न होकर सर्वार्थसिद्ध विहार से विरत होना चाहते हैं। उनकी इच्छा न होते हुए भी सारथि उन्हें विहारभूमि ले जाता है। यहां सुन्दरियों का समूह भी उन्हें आकृष्ट नहीं कर पाता है। जीवन की क्षणभंगुरता, यौवन की क्षणिकता तथा मृत्यु की अवश्यंभाविता का बोध हो जाने पर जो मनुष्य कामासक्त होता हैं, उसकी बन्दि को लोहे से निर्मित मानकर सर्वार्थसिद्ध वहां से भी लौट आते हैं। का अपनी अन्तिम विहार-यात्रा में सर्वार्थसिद्ध को एक संन्यासी दिखाई देता है। पूछने पर पता चलता है कि वह जन्म-मरण से भयभीत होकर संन्यासी बन गया है। संन्यासी के इस आदर्श से प्रभावित होकर सर्वार्थसिद्ध भी संन्यास लेने का संकल्प करते हैं। परन्तु राजा उन्हें संन्यास की अनुमति नहीं देते हैं तथा सर्वार्थसिद्ध को गृहस्थाश्रम में ही आबद्ध करने का प्रयत्न करते हैं। प्रमदाओं का विवृत और विकृत रूप देखकर सर्वार्थसिद्ध के मन में वितृष्णा और घृणा का भाव उत्पन्न होता है। वे मन ही मन सोचते हैं कि स्त्रियों की इतनी विकृत और अपवित्र प्रकृति होने पर वस्त्राभूषणों से वंचित होता हुआ पुरुष उनके अनुराग-पाश में आबद्ध होता है। योग शविरक्त सर्वार्थसिद्ध सारथि छन्दक को साथ लेकर और कन्धक नामक अश्व की पीठ पर आरूढ़ होकर अर्धरात्रि में नगर से बाहर निकलते हैं तथा प्रतिज्ञा करते हैं- “जन्म और मृत्यु का पार देखे बिना कपिलवस्तु में प्रवेश नहीं करवंगा।” नगर में दूर पहुँचकर * सर्वार्थसिद्ध अपने सारथि तथा अश्व को बन्धन-मुक्त कर तपोवन में ऋषियों के पास ७E अपनी समस्या का समाधान ढूंढने के लिए जाते हैं, परन्तु उन तपस्वियों की स्वर्ग-प्रदायिनी प्रवृत्ति से उन्हें सन्तोष नहीं होता है । वे एक जटिल द्विज के निर्देशानुसार दिव्य ज्ञानी अराड् मुनि के पास मोक्ष-मार्ग की शिक्षा ग्रहण करने के लिए चले जाते हैं। इधर सारथि छन्दक और कन्थक नामक घोड़े को खाली देखकर अन्तःपुर की स्त्रियां बैलों से बिछुड़ी हुई गायों की भांति विलाप करने लगती हैं। पुत्र-मोह से व्यग्र राजा के निर्देशानुसार मन्त्री और पुरोहित कुमार का अन्वेषण करने के लिए निकल पड़ते हैं। राजा बिम्बसार सर्वार्थसिद्ध को आधा राज्य देकर पुनः गृहस्थ धर्म में प्रवेश करने का असफल प्रयास करते हैं। परन्तु आत्मवान् को भोग-विलासों से सुख-शान्ति की प्राप्ति कैसे हो सकती है? अन्ततः राजा प्रार्थना करता है कि सफल होने पर आप मुझ पर अनुग्रह करें। निवृत्ति-मार्ग के अन्वेषक सर्वार्थसिद्ध को अराड् मुनि ने सांख्य-योग की शिक्षा दी, परन्तु उनके उपदेशों में भी सर्वार्थसिद्ध, को शाश्वत मोक्ष-पथ परिलक्षित नहीं हुआ। भाग 1 अन्त में सर्वार्थसिद्ध गयाश्रम जाते हैं। यहां उन्हें सेवा लिए प्रस्तुत पांच भिक्षु मिलते हैं । गयाश्रम में गौतम तप करते हैं, किन्तु इससे भी उन्हें अभीष्ट-सिद्धि नहीं मिलती है। उन्हें यह अवबोध होता है कि इन्द्रियों को कष्ट देकर मोक्ष-प्राप्ति असम्भव है, क्योंकि सन्तप्त इन्द्रिय और मन वाले व्यक्ति की समाधि पूर्ण नहीं होती। समाधि की महिमा से प्रभावित सर्वार्थसिद्ध तप का परित्याग कर समाधि का मार्ग अंगीकार करते हैं। शाम को । अश्वत्थ महावृक्ष के नीचे मोक्ष-प्राप्ति के लिए प्रतिश्रुत राजर्षिवंश में उत्पन्न महर्षि सर्वार्थसिद्ध को समाधिस्थ देखकर सारा संसार तो प्रसन्न हुआ, पर सद्धर्म का शत्रु मार भयभीत होता है। अपने विभ्रम, हर्ष एवम् दर्प नामक तीनों पुत्रों तथा अरति, प्रीति तथा तृषा नामक पुत्रियों सहित पुष्पधन्वा ‘मार’ संसार को मोहित करने वाले अपने पांचों बाणों को लेकर अश्वत्थ वृक्ष के मूल में स्थित प्रशान्तमूर्ति समाधिस्थ सर्वार्थसिद्ध को भौतिक प्रलोभनों से विचलित करने का असफल प्रयास करता है। यहीं सर्वार्थसिद्ध का मार के साथ युद्ध है। इस में मार की पराजय तथा सर्वार्थसिद्ध की विजय होती है। समाधिस्थ सर्वार्थसिद्ध धैर्य और शान्ति से मार की सेना पर विजय प्राप्त कर परम तत्त्व का परिज्ञान प्राप्त करने के लिए ध्यान लगाते हैं। ध्यान के माध्यम से उन्हें सफलता मिलती है। वे अष्टांग योग का आश्रय लेकर अविनाशी पद तथा सर्वज्ञत्व को प्राप्त करते हैं। जिला इस प्रकार मूल संस्कृत में उपलब्ध बुद्धचरित के १४ सर्गों में भगवान् बुद्ध का जन्म से लेकर बुद्धत्व-प्राप्ति तक विशुद्ध जीवन-वृतान्त वर्णित है। पन्द्रहवें सर्ग से लेकर अठारहवें सर्ग तक का शेष भाग तिब्बती भाषा में प्राप्त है। आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के संस्कृत अध्यापक डा. जॉन्स्टन ने तिब्बती तथा चीनी भाषा से उसका अंग्रजी में भावानुवाद किया था, जिसका श्रीसूर्यनारायण चौधरी ने हिन्दी भाषा में अनुवाद किया। उसी का संस्कृत पद्यानुवाद जबलपुर महन्त श्रीरामचन्द्रदास शास्त्री ने किया है। यद्यपि महन्त श्री रामचन्द्रदास शास्त्री ने अनुवाद अश्वघोष के मूल के समकक्ष बनाने का यथासाध्य प्रयास किया है, फिर भी मूल तो मूल ही होता है। अनुवाद कभी भी मूल का स्थान नहीं ले सकता। UE महाकवि अश्वघोष और बौद्ध काव्य-परम्परा अश्वघोषप्रणीत मूल बुद्धचरित का चौदहवां सर्ग बुद्धत्व-प्राप्ति में समाप्त होता है। उसके बाद के सर्गों में क्रमशः बुद्ध का काशीगमन, शिष्यों को दीक्षादान, महाशिष्यों की प्रव्रज्या, अनाथपिण्डद की दीक्षा, पुत्र-पितासमागम, जैतवन की स्वीकृति, प्रव्रज्यानोत, आम्रपाली के उपवन में आयुनिर्णय, लिच्छवियों पर अनुकम्पा, निर्वाणमार्ग, महापरिनिर्वाण, निर्वाण की प्रशंसा तथा धातु का विभाजन विषय वर्णित है। बुद्धचरित के १५ से २८वें सर्ग तक इस अनूदित भाग में भगवान् बुद्ध के सिद्धान्तों का विवेचन है। अधिकतर अनुष्टुप छन्द में चिरचित बुद्धचरित के इस द्वितीय भाग में शास्त्रीजी ने सर्ग के अन्त में संस्कृत-काव्य-सरणि के अनुरूप वसन्ततिलका आदि छन्दों का भी प्रयोग किया है। २८ सगा में रचित बुद्धचरित के मूल १४ सर्गों तक के प्रथम भाग में १११५ तथा १५ से २८ सर्ग तक अनूदित द्वितीय भाग में १०३३ श्लोक हैं। भगवान् बुद्ध के विशुद्ध जीवनवृत्त पर आधारित इस महाकाव्य की कथावस्तु को वर्णनात्मक उपादानों से अलंकृत करने का महाकवि अश्वघोष ने सफल प्रयास किया है। इस महाकाव्य के सरल एवं प्रभावोत्पादक वर्णनों में अन्तःपुर-विहार, उपवन-विहार, वृद्ध-दर्शन, रोगी-दर्शन, मृतक-दर्शन, कामिनियों द्वारा मनोरंजन, वनभूमि-दर्शन, श्रमणोपदेश, सुन्दरियों का विकृत रूप-दर्शन, महाभिनिष्क्रमण, वन-यात्रा, छन्दक-कन्थक-विसर्जन, तपस्वियों से वार्तालाप, अन्तःपुर-विलाप तथा मारविजय उल्लेखनीय हैं। लामाल महाकवि अश्वघोष ने उपर्युक्त विषयों का काव्योचित शैली में वर्णन कर इस महाकाव्य के सौष्ठव का संवर्धन किया है तथा काव्य को सरस बनाने के लिए इन वर्णनों का समुचित संयोजन किया है।
- काव्य को दर्शन और धर्म के अनुकूल बना लेना अश्वघोष की मौलिक विशेषता है। बुद्धचरित में कवि का यह वैशिष्ट्य पद-पद पर परिलक्षित होता है। अश्वघोष ने इस महाकाव्य के माध्यम से बौद्ध-धर्म के सिद्धान्तों का प्रचार करने का सफल प्रयास किया है। विशुद्ध काव्य की दृष्टि से बुद्धचरित के प्रथम पांच सर्ग तथा अष्टम एवम् त्रयोदश सर्ग के कुछ अंश अत्यन्त रमणीय हैं। इसमें यमक, उपमा और उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों की कवि ने अत्यन्त रमणीय योजना की है। इस महाकाव्य में स्वाभाविकता का साम्राज्य है। आध्यात्मिक जीवन तथा तथागत भगवान बुद्ध के विशुद्ध एवम् लोकसुन्दर चरित्र के प्रति कवि की अगाध श्रद्धा के कारण इस महाकाव्य में भावों का नैसर्गिक प्रवाह इस महाकाव्य को उदात्त भावभूमि पर प्रतिष्ठित करता है। मानवता को अभ्युदय और मुक्ति का सन्देश देने के अभिलाषी महाकवि अश्वघोष के व्यक्तित्व की गरिमा के अनुरूप ही उनका यह काव्य भी भगवान् बुद्ध के गौरवपूर्ण व्यक्तित्व से मण्डित है। नाका काव्य-खण्ड
सौन्दरनन्दः
सौन्दरनन्द महाकवि अश्वघोष का द्वितीय महाकाव्य है। इसकी दो पाण्डुलिपियां नेपाल के राजकीय पुस्तकालय में संरक्षित हैं। इन्हीं के आधार पर हरप्रसाद शास्त्री ने बिल्लियोथेका इण्डिका क्रमांक १२ में इस महाकाव्य का प्रकाशन १EEE में कलकत्ता से करवाया है। बंगाल की रायल एशियाटिक सोसायटी से प्रकाशित १८ सर्गों के इस महाकाव्य में कुल १०६३ श्लोक हैं। अपनी कविता के विषय में कवि की सुस्पष्ट उद्घोषणा है- “मुक्ति की चर्चा करने वाली यह कविता शान्ति के लिए है, विलास के लिए नहीं है। अन्यमनस्क श्रोताओं का मन एक ओर आकृष्ट करने के उदेश्य से इसकी काव्य-रूप में रचना की गई है।” इस महाकाव्य के चरितनायक नन्द के भिक्षु बनने की मूलकथा महावग्ग तथा निदान-कथा में मिलती है। इस प्रकार इस महाकाव्य के कथानक का सम्बन्ध बुद्धचरित से ही है। परन्तु ‘सौन्दरनन्द’ में कवि ने यौवन सुलभ उद्दाम काम तथा धर्म के प्रति प्रबुद्ध प्रेम के विषम संघर्ष की कथा को कोमलकान्त पदावली में व्यक्त कर कमनीय काव्य के रूप में परिणत कर दिया है। काव्य-गुणों के उत्कर्ष की दृष्टि से सौन्दरनन्द बुद्धिचरित की अपेक्षा अधिक रमणीय है। महाकवि अश्वघोष ने तथागत बुद्ध के सौतेले भाई सुन्दरनन्द तथा उसकी पतिव्रता पत्नी सुन्दरी की मनोरम कथा को इस महाकाव्य की पीठिका पर अधिष्ठित किया है। कथा इस प्रकार है कपिलवस्तु के राजा शुद्धोदन की रानी कुमार सर्वार्थसिद्ध को जन्म देती है। इधर छोटी रानी से नन्द उत्पन्न होता है। स्वभावतः सुन्दर नन्द का उपनाम सुन्दर पड़ता है। इधर विरक्त सिद्धार्थ प्रव्रज्या ग्रहण करते हैं और उधर विषयासक्त नन्द भोग-विलास में आकण्ठ निमग्न हो जाता है। सिद्धार्थ मोक्ष-मार्ग की प्राप्ति के बाद बुद्ध हो जाते हैं, वे काशी में धर्मचक्र प्रवर्तन तथा गया और राजगृह में असंख्य लोगों को सन्मार्ग की शिक्षा देते हैं। __ एक दिन धर्मोपदेश करते हुए भगवान बुद्ध कपिलवस्तु आते हैं। वहां उनके व्यक्तित्व से प्रभावित होकर राजा शुद्धोदन उनका शिष्यत्व स्वीकार कर लेते हैं, किन्तु कामासक्त नन्द नहीं आता है, वह अनुपम सुन्दरी पत्नी सुन्दरी के साथ विहार करता रहता है। दोनों उद्दाम यौवन की उत्ताल-तरंगों में आनन्द का अनुभव करते हैं। स्वयं गौतम बुद्ध अपने भाई नन्द के जीवन को मंगलमय बनाने के उदेश्य से नन्द के घर जाते हैं। नन्द और सुन्दरी की क्रीड़ा-प्रसाधना में व्यस्त वहां के लोगों का ध्यान बुद्ध की ओर नहीं जा पाता है। गौतम बुद्ध के चले जाने पर नन्द को किसी से पता चलता है कि गौतम आये थे और चले गये। नन्द इस समाचार को सुनकर कम्पित हो जाता है। वह गौतम को प्रणाम करने के लिए प्रासाद से बाहर निकलता है। जानकारी १. इत्येषा व्युपशान्तये न रतये मोक्षार्थगर्भाकृतिः श्रोतणां ग्रहणार्थमन्यमनसां काव्योपचारात्कता। -सौन्दरनन्द १८/६३ मिSEESE Bा महाकवि अश्वघोष और बौद्ध काव्य-परम्परा प्रस मार्ग में जनसमूह द्वारा अभिनन्दित गौतम को एकान्त में नन्द प्रणाम करता है तथा भिक्षा हेतु निवेदन करके लौटना चाहता है। इतने में गौतम अपना भिक्षा-पात्र उसकी ओर बढ़ा देते हैं। भिक्षा-पात्र हाथ में होते हुए भी सुन्दरी के आकर्षण से प्रासाद की और आकृष्ट नन्द गौतम के उपदेश से पुनः उनके पीछे-पीछे चलने लगता है। गौतम और नन्द दोनों विहार में पहुंचते हैं। गौतम बुद्ध विषयासक्ति की तुच्छता का उपदेश देकर अनिच्छापूर्वक भी नन्द को प्रव्रजित करा देते हैं। वह रोते हुए अपना मुण्डन करवाता है। इस प्रकार गौतम बुद्ध के कारण वह भिक्षु-वेश तो धारण कर लेता है, पर सुन्दरी का स्मरण करते ही वह विलाप करने लगता है, यहां तक कि एक दिन वह सुन्दरी के पास लौटने का निश्चय कर लेता है। तब उसे गौतम बुद्ध दृष्टिपथ में लाया जाता है। वे नन्द को योगबल से हिमालय ले जाते हैं। वहां एकाक्षी वानरी दिखाकर नन्द से पूछते हैं कि तुम्हें यह बन्दरी अच्छी लगती है अथवा सुन्दरी। नन्द कहता है कि कहां वह उत्तम स्त्री सुन्दरी और कहां वृक्ष को पीड़ा पहुंचाने वाली यह बन्दरी। इसके बाद गौतम बुद्ध नन्द को साथ लेकर अप्सरालोक जाते हैं। वहां नन्द का मन रमने लगता है। गौतम बुद्ध नन्द से पुनः प्रश्न करते हैं कि अप्सरा और सुन्दरी में कौन सुन्दरतर है। नन्द कहता है कि जितना अन्तर उस एकाक्षी वानरी और सुन्दरी में है, उतना ही अन्तर सन्दरी और इन अप्सराओं में है। इन अप्सराओं के अभिराम सौन्दर्य को देखकर उसका मन अपनी प्रियतमा सुन्दरी से विरक्त हो जाता है। गौतम बुद्ध नन्द से कहते हैं कि यदि तुम इन अप्सराओं की अभिलाषा करते हो तो तप करो।
- नन्द तप करता है। एक दिन आनन्द प्रश्न करते हैं कि सच बताओ कि क्या तुम इन अप्सराओं के लिए तप कर रहे हो। अधोमुख नन्द का आशय समझकर आनन्द नन्द से कहते है- “तुम्हारा यह ब्रह्मचर्य-पालन अब्रह्मचर्य के लिए है। यदि तुम आनन्द के अभिलाषी हो तो अपना मन अध्यात्म में लगाओ। अस्थायी स्वर्ग की अभिलाषा मत करो।” नन्द जिस प्रकार अप्सराओं को देखकर सुन्दरी को भूल गया था, उसी प्रकार स्वर्ग की अनित्यता से उद्विग्न होकर शाश्वत आनन्द की ओर उन्मुख हुआ। वह गौतम बुद्ध से कहता है कि मै आपके परम धर्म में रमण करना चाहता हूँ। स्वर्गीय सुखों से अब मेरा मन विरक्त हो गया है। गौतम बुद्ध उसे श्रद्धा के अंकुर को बढ़ाने का, शील और इन्द्रिय-संयम से पालन का तथा योगाभ्यास करने का उपदेश देते हैं। गौतम का उपदेश सुनकर नन्द वन में चला जाता है। वहां योग-विधि से उसका चित्त प्रशान्त हो जाता है। उसके मन में गौतम के प्रति श्रद्धा तथा सद्भाव का प्रादुर्भाव होता है। वह भावविभोर होकर कहता है- “गौतम ने मेरे बहुत से दुःख दूर किये और असीम सुख दिये। मैं उस दयालु महर्षि बुद्ध को बार-बार प्रणाम करता हूं।” अन्त में नन्द गौतम बुद्ध के पास जाता है और प्रणामपूर्वक कहता है-“आपके उपदेश से मैं सन्मार्ग पर आ गया हूं।” गौतम बुद्ध प्रसन्न भाव से नन्द को सम्बोधित करते हैं - “तुमने अपना कार्य पूर्ण कर लिया है। तुम परम गति को प्राप्त कर चुके हो। काव्य-खण्ड गन । हे सौम्य! इसी प्रकार दूसरों को भी मुक्त करते हुए अनुकम्पापूर्वक विचरण करो।” भगवान् गौतम बुद्ध के प्रभाव से नन्द पूर्णतः मोक्षमार्ग का उपदेशक बन जाता है। पाय इस प्रकार इस महाकाव्य में चित्त की उच्छृखल प्रवृत्तियों को सही दिशा में अग्रसर कर देने की जो मार्मिक प्रक्रिया विद्यमान है, वह विश्व साहित्य में अन्यत्र दुर्लभ है। चरित्र विकास की कला के उत्तम निदर्शन के रूप में अश्वघोष का सौन्दरनन्द एक अद्वितीय काव्यकृति है। ष्णा सौन्दरनन्द महाकाव्य में नन्द और सुन्दरी की मूक वेदना का मार्मिक चित्रण करने में अश्वघोष को जितनी सफलता मिली है, उतनी ही सफलता बुद्ध धर्म के उपदेशों को भव्य भाषा में निबद्ध करने में भी कवि को सफलता मिली है। भावों के स्वाभाविक वर्णन में तथा काम और धर्म इन दो विरोधी तत्त्वों के संघर्ष का सफल चित्रण करने में एवम् बौद्ध-धर्म के आचार-प्रधान उपदेशों का हृदयावर्जक वर्णन करने में कवि को अद्भुत सफलता प्राप्त हुई है। निःसन्देह सौन्दरनन्द विषय की गम्भीरता तथा कोमल काव्य-भावना के अंकन में बुद्धचरित की अपेक्षा अधिक सरस और सफल महाकाव्य है। महाकवि अश्वघोष ने बुद्धचरित एवम् सौन्दरनन्द नामक महाकाव्यों के अतिरिक्त नौ अंकों के ‘शारिपपुत्र-प्रकरण’ तथा ‘राष्ट्रपाल’ नामक नाटक की भी रचना की है। संस्कृत के प्रथम बौद्ध महाकवि अश्वघोष ने संस्कृत के अनेक मूर्धन्य महाकवियों को प्रभावित किया है। ‘पद्यचूड़ामणि" नामक संस्कृत महाकाव्य के प्रणेता बुद्धघोषाचार्य तो पूर्णतः अश्वघोष से प्रभावित हैं। इसी प्रकार नवीं शताब्दी में कश्मीरनरेश अवन्तिवर्मा की राजसभा के शैवकवि तथा बौद्धाबदान की कथा को महाकाव्य का स्वरूप प्रदान करने वाले ‘कप्फिणाभ्युदय’ नामक बौद्ध महाकाव्य के प्रणेता शिवस्वामी पर भी महाकवि अश्वघोष का सुस्पष्ट प्रभाव दृष्टिगत होता है। ६ भगवान बुद्ध के प्रति आस्था तथा अन्य धर्मों के प्रति सहिष्णुता अश्वघोष के व्यक्तित्व की अन्यतम विशेषता है। वे एक ऐसे कलाकार हैं जो कला की जवनिका के पीछे छिपकर प्रच्छन्न भाव से अपनी मान्यताओं को प्रकाशित करते हैं। उन्होंने कविता के माध्यम से बौद्ध धर्म के सिद्धान्तों को जनसाधारण के लिए सुलभ बनाने का महनीय प्रयास किया है। निःसंदेह महाकवि अश्वघोष एक अमर कलाकार तथा संस्कृत के प्रथम बौद्ध महाकवि हैं।
अश्वघोष की काव्यदृष्टि
काव्य अश्वघोष के लिये भगवान बुद्ध के संदेश को जन-जन तक पहुंचाने का माध्यम है, केवल रसास्वाद में भावकों को निमज्जित करना उनका लक्ष्य नहीं है। सौन्दरनन्द की पुष्पिका में उन्होंने कहा है जी ती इत्येषा व्युपशान्तये न रतये मोक्षार्थगर्भा कृतिः किन गामेछ 25 वा श्रोतॄणां ग्रहणार्थमन्यमनसां काव्योपचारात् कृता। . . महाकवि अश्वघोष और बौद्ध काव्य-परम्परा पित यन्मोक्षात् कृतमन्यदत्र हि मया तत् काव्यधर्मात् कृतं मला गियी ८६ पातुं तिक्तमिवौषधं मधुयुतं हृद्यं कथं स्यादिति।।जान जितना सौन्दरनन्द १८/६३ (मेरी यह कृति लोगों को शम प्रदान करने के लिये है, रति या आनंद के लिये नहीं। मोक्ष इसका उद्देश्य है। काव्य तो एक बहाना है। मैंने मोक्ष के प्रयोजन से अन्य ग्रन्थों में सीधे-सीधे जो उपदेश निरूपित किये हैं, उन सब को यहां काव्यधर्म से व्यक्त किया गया है, जैसे कड़वी औषधि को मधु मिलाकर खाने योग्य बनाया जाता है।) इस काव्य में कालिदास आदि की आनंदवादी सरणि से भिन्न निर्वेदवादी धारा है, जिसके समर्थ प्रतिनिधि अश्वघोष है।
भाषाशैली
अपने उक्त काव्यप्रयोजन के अनुरूप अश्वघोष ने सर्वत्र ऐसी प्रासादिक भाषा का प्रयोग किया है, जो लोगों के चित्त में सीधे उतरती चली जाती है। अनेक स्थलों पर तो वे आदिकवि वाल्मीकि की प्रांजल आर्षशैली के अत्यधिक निकट पहुंच जाते हैं। इसके साथ ही उनकी भाषा में वर्ण्यविषय के अनुरूप प्रवाह, गतिमयता और ओजस्विता भी है। किसी भी दृश्य को सजीव रूप में साकार कर देने में ये निपुण हैं। बुद्धचरित के चौथे सर्ग में स्त्रियों की कामुक चेष्टाएं और सिद्धार्थ को रिझाने के निरर्थक यत्न तथा पांचवें सर्ग में सोती हुई स्त्रियों के वर्णन इस चित्रोपम शैली के सुंदर उदाहरण हैं। छठे सर्ग में छंदक का विलाप और चेष्टाएं भी स्वभावोक्ति के कारण मर्मस्पर्शी हैं मोस्वामी क्वचित प्रदथ्यौ विललाप च क्वचित् क्वचित् प्रचस्खाल पपात च क्वचित् । अतो व्रजन भक्तिवशेन दुःखितश्चचार बह्वीरवशः पथि क्रियाः।। ६।६८ भाषाशैली की दृष्टि से अश्वघोष में वैविध्य का दुर्लभ गुण है। वे अत्यंत सरल छोटे-छोटे पदों का भी यथावसर प्रयोग करते हैं, तो कहीं विषयानुरूप समस्त पदावली का भी। कहीं वे सहज आर्षशैली के अनुरूप हृदय में उतर जाने वाले उपमान प्रस्तुत करते हैं, उसके पास मिला परिया मुकुटाद् दीपकर्माणं मणिमादाय भास्वरम् । ब्रुवन् वाक्यमिदं तस्थौ सादित्य इव मन्दरः।। बुद्ध.च. ६१३ मा गाँध (अपने मुकुट से चमचमाती हुई मणि उतार कर छन्दक को सौंपते हुए सिद्धार्थ जब उससे संदेश कह रहे थे तो वे आदित्य से युक्त मंदर पर्वत से लग रहे थे।) या सौन्दरनन्द में नन्द के अन्तर्द्वन्द्व का चित्रण करने वाली इस उक्ति में लहरों में झूलते हंस का यह उपमान देखें तं गौरवं बुद्धगतं चकर्ष भार्यानुरागः पुनराचकर्ष। सोऽनिश्चयान्नापि ययौ न तस्थौ तरंस्तरङ्गेष्विव राजहंसः।।HTP काव्य-खण्ड पर इसके साथ ही अश्वघोष अलंकृत शैली का भी सटीक प्रयोग करने में दक्ष हैं। अलंकारों के सांकर्य और संसृष्टि के द्वारा जटिल बिंब साकार कर देते हैं। सिद्धार्थ को रिझाती सुंदरी का यह चित्र देखिये हिला की जि मुहुर्मुहुर्मुदव्याजम्नस्तनीलांशुकापरा। छि का तर# आलक्ष्यरशना रेजे स्फुरविद्युदिव क्षपा।। (बु.च. ४॥ ३३) मद का बहाना करके अपना नीला अंशुक गिराती कोई दूसरी स्त्री, जिसकी करधनी झलकने लगी थी, ऐसी रात्रि सी लगती थी जिसमें बिजली चमक रही हो।) अश्वघोष सरल प्रासादिक भाषा का प्रयोग जितनी सहजता से करते हैं, उतनी ही कुशलता से वे सानुप्रास और यमक के चमत्कार से युक्त परिष्कृत शैली का भी। उदाहरण के लिये HERE श्रुत्वा ततः सव्रतमुत्सिसृक्षं भार्या दिदृक्ष भवनं विविक्षमे। जी है कि नन्दं निरानन्दमपेतथैर्य अभ्युज्जिहीषुर्मुनिराजुहाव।। सौ ०१०।१ मा पर