संस्कृत काव्यशास्त्र के आचार्यों ने महाकवि कालिदास को अलोक-सामान्य प्रतिभा से सम्पन्न माना है, जिसके समकक्ष प्रतिभायें पूरी कवि-परम्परा में इनी-गिनी ही हो सकती हैं। कालिदास के ऐसे बिरले महाकवि के रूप में उल्लेख के साथ आनन्दवर्धन ने कुमारसम्भव में शिव-पार्वती के सम्भोग-वर्णन से हुए अनौचित्य की मीमांसा की है और यह मन्तव्य प्रकट किया है कि ऐसे प्रतिभाशाली महाकवि के काव्य में कहीं-कहीं इस प्रकार का दोष आ भी जाये, तो वह उसकी शक्ति (प्रतिभा) से ढक जाता है । आचार्य मम्मट ने ‘कालिदासीनामिव यशः’ कह कर यशस्वी कवि का सर्वोत्तम निदर्शन कालिदास में पाया है, तथापि कुमारसम्भव में माता और पिता के तुल्य उमा-महेश्वर की रति का वर्णन उनकी दृष्टि में क्षम्य नहीं है। आचार्य वामन ने काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति में दस स्थलों पर कालिदास से सराहना के साथ उद्धरण दिये हैं। मसृणता (कुमारसम्भव ११), ओजस् (वही, ६ IE४), सुगमत्व (वही, ३२), बाक्यार्थवृत्ति उपमा (रघुवंश ६६०), परिवृत्ति अलङ्कार (कुमारसम्भव ५।८), विशेषोक्ति अलंकार (वही, १।१०) आदि के उदाहरण कालिदास के काव्यों से देकर आचार्य वामन ने महाकवि को आदर दिया है। १. ध्वन्यालोक, १६ तथा वृत्ति २. वही, ३।६ का परिकर श्लोक तथा वृत्ति ३. काव्यप्रकाश, प्रथम उल्लास, कारिका-२ की वृत्ति 1 तार ४. काव्यप्रकाश, सप्तम उल्लास, रसदोषनिरूपण। ५. द्र. काव्यालङ्कारसूत्रवृत्ति, व्याख्या-विश्वेश्वर, पृ. ४५, १२३, १४६, २७७, १६१, २३७ आदि। काव्य-खण्ड म कुन्तक ने अलंकारों के स्वाभाविक और रमणीय प्रयोग के लिये कालिदास की प्रशंसा करते हुए सुकुमार मार्ग में अलंकार-विन्यास का आदर्श उनमें पाया है तथा इस मार्ग में अयत्ननिहित, स्वल्प किन्तु मनोहर अलंकार-विन्यास का उदाहरण कुमारसम्भव (बालेन्दुवक्त्राण्यविकासभावात्- ३RE) से दिया है, तो ‘भाव-स्वभावप्राधान्य-न्यकृताहार्यकौशल’ रचना का उदाहरण भी रघुवंश (तस्य प्रणयिभिः -६५) से दिया है। कुमारसम्भव (३।३५) ‘द्वन्द्वानि भावं क्रियया विवब्रु:-भी कुन्तक की दृष्टि में इसी प्रकार के अलंकार-विन्यास का उदाहरण है, जबकि इसी के अगले पद्य-शृङ्गेण च स्पर्शनिमीलिताक्षी मृगीमकण्डूयत कृष्णसार:-को उन्होंने प्राणियों की नैसर्गिक चेष्टाओं के सूक्ष्म चित्रण की दृष्टि से प्रशंसनीय माना है। सुकुमार मार्ग की सहृदयसयाह्लादकता के निदर्शन में कुन्तक ने रघुवंश से अनेक पद्य उद्धत किये हैं ’ तथा ‘ज्याबन्धनिष्पन्दभुजेन (रघु. ६४०) के अलंकारवैशिष्ट्य पर प्रकाश डालते हुए इसे ‘विधिवैदग्ध्यनिष्पन्ननिर्माणातिशयोपमा’ का उदाहरण माना है। कुन्तक ने विचित्र मार्ग के लिये कालिदास का कोई उदाहरण नहीं दिया, कालिदास को सहज सौकुमार्य का कवि बताते हुए वे कहते हैं- एवं सहजसौकुमार्यसुभगानि कालिदास-सर्वसेनादीनां काव्यानि दृश्यन्ते। कुछ स्थलों पर औचित्यभंग के लिये कुन्तक ने कालिदास की आलोचना भी की है। रघुवंश तथा कुमारसम्भव के कतिपय ऐसे स्थलों पर प्रकाश डाल कर कुन्तक कहते हैं कि यह आलोचना भी हमने कालिदास जैसा सहजसौकुमार्यगुण के कारण सूक्तियों के परिस्पन्द से परम उत्कृष्ट काव्य रचने वाला कवि है, इसलिये की है, किसी आहार्य प्रतिभा वाले मध्यम श्रेणी के कवि की तो ऐसी आलोचना करने की भी आवश्यकता नहीं -समाजाधिरको नी लिहिली गाना
- एतच्च तस्यैव कवेः सहजसौकुमार्यमुद्रितसूक्तिपरिस्पन्दसौन्दर्यस्य । हेट किया कि कि पर्यालोच्यते, न पुनरन्येषामाहार्यमात्रकाव्यकरणकौशलश्लाघिनाम्। __(वक्रोक्तिजीवित, १५७ की वृत्ति) औचित्य या अनौचित्य की दृष्टि से कालिदास की समीक्षा करने वाले आचार्यों में क्षेमेन्द्र और मम्मट उल्लेखनीय हैं। क्षेमेन्द्र ने औचित्यविचारचर्चा में आठ स्थलों पर कालिदास को उद्धृत किया है। मेघदूत (पूर्वमेघ-६-जातं वंशे भुवनविदिते.-) में उनकी दृष्टि से प्रबन्धौचित्य है, पृ. ११६) कुमारसम्भव (बालेन्दुवक्त्राप्यविकासभावात्- ३।२९) में रसौचित्य, तो कुमारसम्भव में ही अष्टम सर्ग में अनौचित्य के लिये उन्होंने कालिदास की १. द. वक्रोक्तिजीवित, सं. के. कृष्णमूर्ति, पृ. १७,४४, ४६ २. वही, पृ. ७ ३. वही, पृ. ६६ ४. वही, पृ. ७१-७२, रघुवंश १३५६, २४६, २।५४ तथा कुमार सं. ३७ पर विचार किया। ५. औचित्यविचारचर्चा (काव्यमाला गु.-१ पास तासाला मान्यतामा ६. वही, पृ. १२४ कालिदास के काव्य अच्छी खबर भी ली है।’ वसन्तवर्णन के प्रसंग में निर्गन्ध कर्णिकार के उल्लेख (कुमार ३२८) में भी क्षेमेन्द्र की दृष्टि से रसानौचित्य है।’ मम्मट ने अष्टमसर्ग के सम्भोगवर्णन के लिये भी कालिदास में अनौचित्य देखा है, और तृतीय सर्ग में रतिविलाप में उनकी दृष्टि से पुनः पुनः दीप्ति नामक रसदोष है। स मिति परिवार