कालिदास की लोकातिक्रान्तगोचरक्षमा नवनवोन्मेष रमणीया प्रतिभा ने भारतीय साहित्य के मानदण्डों की स्थापना की, आचार्यों को लक्षणों के निर्माण, परिष्कार या शोधन के लिये स्फूर्ति दी तथा परवर्ती कवियों की सुदीर्घ परम्परा को भी उत्प्रेरित किया। प्रतिभा की प्रत्यग्रता उनकी प्रथम कृति ऋतुसंहार से ही अनुभूत होती है। यद्यपि ऋतुवर्णन की परम्परा रामायण और महाभारत की रचना से हमारे साहित्य में प्रक्रान्त हो चुकी थी, पर ऋतुचक्र के आवर्तन-विवर्तन में इस देश की वसुन्धरा के परिवर्तमान सौन्दर्य का साक्षात्कार काव्य-खण्ड कराने वाला ऐसा काव्य कालिदास की लेखनी से ही पहली बार सामने आया, जिसमें कवि की आत्माभिव्यक्ति, गेयता और लालित्य, शृङ्गार के साथ निसर्ग की बलशालिता और गत्यात्मकता की अपूर्व अभिव्यंजना एकत्र हुई। मेघदूत की तो सम्पूर्ण परिकल्पना ही कालिदास के पूर्व की साहित्यिक परम्परा में सर्वथा अछूती थी। कोई विरही व्यक्ति मेघ को दूत बनाकर प्रिया के पास भेजना चाहे- केवल इतनी वस्तु को लेकर एक पात्र के अन्तर्मन में गहराई से पाठकों को ले जाने वाला और उसके साथ सारे देश के भौगोलिक और सांस्कृतिक परिवेश से भी उतना ही विशद साक्षात्कार कराने वाला अन्य कोई काव्य इसके पूर्व लिखा नहीं गया था। मेघदूत के रचनाकार की लेखनी का जादू कुछ ऐसा चला कि उससे दूतकाव्य की परम्परा संस्कृत में शताब्दियों तक फलती-फूलती रही, पर कालिदास ने अपने काव्य में विषयनिष्ठता और आत्माभिव्यक्ति, वेदना और विवेक, अन्तः प्रकृति तथा बाह्य प्रकृति तथा भौतिकता और अध्यात्म का जो उत्कृष्ट समवाय निर्मित कर दिया था, वह उनका अनुकरण करने वाले दूतकाव्य के रचयिताओं के कृतित्व में कैसे आ सकता था ? कुमारसम्भव के द्वारा कालिदास ने नायिकाप्रधान महाकाव्य का एक अपूर्व रूप ही प्रस्तुत कर दिया। यद्यपि शिव का सर्वातिशायी रूप इस महाकाव्य में अलौकिक गाम्भीर्य और दार्शनिक बोध के साथ चित्रित है, पर सारे महाकाव्य में कर्तृत्व तो उमा का ही प्रधान है। कालिदास के बाद नायिका के कर्तृत्व की महनीयता चित्रित करने वाला ऐसा कोई महाकाव्य फिर नहीं लिखा गया। रघुवंश में तो कवि ने एक नायक की अवधारणा को ही तोड़ दिया, यहाँ पूरा का पूरा वंश या उस वंश के अनेक राजा नायक हैं, और तद्नुसार आचार्य विश्वनाथ को महाकाव्यलक्षण में पूर्ववर्ती आचार्यों में यह संशोधन करना पड़ा कि एक धीरोदात्त नायक के स्थान पर एक वंश के अनेक राजा भी महाकाव्य में नायक हो सकते हैं।’ वर्ण्य विषयों की दृष्टि से कुमारसम्भव तथा रघुवंश में विवाह और स्वयंवर के वर्णन भी प्रत्यग्रोन्मेषरम्या प्रतिभा की ही देन है। महाकवि के अनेक वर्णन, जो उनके अपने महाकाव्यों में विशेष अभिप्रायों के द्योतक थे, आगे की परम्परा में रूढ़ियाँ बन गये। नायक को देखने के लिये नगर की सुन्दरियों के सम्भ्रम का जो मनोहर चित्र कुमारसम्भव में शिव-पार्वती विवाह के समय है, या रघुवंश में इन्दुमती-स्वयंवर के प्रसंग में है, वह महाकाव्य में कौतुक, विस्मय तथा नायक की छवि के आकर्षण को अनुभव कराता है। माघ आदि परवर्ती कवियों ने कालिदास के ऐसे वर्णनका अनुकरण किया। रघुवंश के दिग्विजय तथा विमानयात्रा-वर्णन के प्रसंग भी ऐसे ही हैं। कालिदास ने तो दिग्विजय के माध्यम से सारे भारत का दिग्दर्शन भी करा दिया है और इस देश की वसुन्धरा के चप्पे-चप्पे से अपना परिचय और अनुराग प्रकट करके राष्ट्रभावना को अपूर्व अभिव्यक्ति दे दी है। परवर्ती काव्य में नायक का दिग्विजय एक रूढ़ि बन गया। स्वयंवर में सारे भारत के विभिन्न राज्यों से आये राजाओं का वर्णन भी ऐसी ही रुढि का जनक बना। १. एकवंशमवा भपा कलजा बहबोऽपि वा। साहित्यदर्पण RELETE- जा ED कालिदास के काव्य ६७ 17 कालिदास ने अपनी विश्वदृष्टि और लोकोत्तर प्रतिभा से इस देश के अतीत, अपने समय के वर्तमान और आने वाले युग को जैसे हस्तामलकवत् देखा है। अतीत के सांस्कृतिक वैभव और परम्पराओं की महनीयता, वर्तमान के सामन्तीय अपक्षय और पतनोन्मुखता तथा आने वाले युग की पदध्वनि का सजीव अनुभव कालिदास में होता है। अपनी ऐसी प्रतिभा से ही वे संस्कृत काव्य-परम्परा में नये शिल्प और नये प्रतिमानों की सृष्टि कर सके हैं। कार hी कि र वैदिक तथा पौराणिक धर्म के मूल तत्त्व को आत्मसात् कर कालिदास ने मनुष्य में देवत्व की प्रतिष्ठा की और देवों को मनुष्य के कर्तृत्व से स्पृहा करते हुए चित्रित किया। उनका दुष्यन्त इन्द्र की सहायता के लिये स्वर्ग जाता है, तो रघु इन्द्र से युद्ध करता है। कुमारसम्भव में शिव वीतराग और निष्काम होने पर भी मानवीय राग और काम को स्वतः अंगीकार करते हैं। का मिली कि राम काज विमानत नानार्मिक मान्यता