१७ कालिदास का जीवन-दर्शन

कालिदास प्रेम और शृङ्गार के कवि हैं, पर वे प्रेम को वासना के पंक से मलिन होता हुआ नहीं देखना चाहते, तपस् और साधना के द्वारा उसे उदात्त बनाना चाहते हैं। वास्तविक प्रेम मनुष्य के व्यक्तित्व को अनन्त से जोड़ देता है। मेघदूत में कवि का यही सन्देश है - अमित स्नेहानाहुः किमपि विरहे ध्वंसिनस्ते त्वभोगा-हिीि कलाकात दिष्टे वस्तुन्युपचितरसाः, प्रेमराशीभवन्ति ।। (उत्तरमेघ-४५) मंत्र मेघदूत में विरह वेदना की अथाह गहराई के साथ-साथ यक्ष की चेतना के क्रमशः परिष्कार और उदात्त होते चले जाने की प्रक्रिया का भी बोध होता है। कुमारसम्भव में भी पार्वती अपने रूप से शिव को आकर्षित करना चाहती है, पर केवल रूप से शिव को नहीं पाया जा सकता। कुमारसम्भव में कामदेव की लीलाओं की मनोहारिता का विशद चित्रण कवि ने किया है और रघुवंश के अन्तिम सर्ग में अग्निवर्ण के भोग-विलास और लिप्सा का अत्यन्त यथार्थ चित्र उसने खींचा है, दोनों की ही परिणति अवसाद में होती है। अग्निवर्ण की राजयक्ष्मा से ग्रस्त दशा का चित्र भी कालिदास उसी ताटस्थ्य और निःस्पृह भाव से सजीव कर देते हैं, जिस भाव से वे उसकी लिप्सा का अंकन करते हैं और उसके द्वारा वे सामंतीय समाज के क्षय और कठोर टिप्पणी भी व्यंजित करते हैं। पार्वती का भी सौन्दर्य और सुकुमार कल्पनाओं का सुरम्य संसार एक झटके से टूट जाता है, तब वह क्षयिष्णु रूप की निन्दा करती हुई, तपस और समाधि से शिव को पाने के लिये कठोर साधना करती हैं। कालिदास मनुष्य की गरिमा और सम्भावना का साक्षात्कार करने वाले कवि हैं। जीवन में उनकी अटूट आस्था है- क्षणमप्यवतिष्ठते श्वसन यदि जन्तुर्ननु लाभवानसौ (रघुवंश ८७)। अग्निवर्ण के क्षयिष्णु अवसान के अनन्तर भी रघुवंश के उत्थान-पतन का क्रम जारी है, उसकी रानी सिंहासन पर बैठ कर विधिवत् शासन करती रही- इस कथन के साथ कवि काव्य को समाप्त करता है। (रघु. १६५७)