१३ कालिदास का छन्दोविधान

विषयवस्तु के अनुरूप उपयुक्त छन्द का चयन कालिदास के छन्दोविथान में सर्वत्र मिलता है। मेघदूत के सन्दर्भ में मन्दाक्रान्ता की उपादेयता पर ऊपर चर्चा की गयी है। वर्ण्यवस्तु की सहज अभिव्यक्ति या कथानक के प्रवाह की निर्भरता के लिये उपजाति छन्द को कवि ने विशेष पसन्द किया है, और इसी दृष्टि से कुमारसम्भव के षष्ठ तथा रघुवंश के दशम, द्वादश तथा पञ्चदश सों में अनुष्टुप् का प्रयोग अत्यन्त समीचीन और कथा की गतिशीलता तथा क्षिप्रता का बोध कराने वाला है। जब कि प्रथम सर्ग में अनुष्टुप् का प्रयोग कवि के आत्म-निवेदन, विषय के उपक्रम तथा प्रांजल अभिव्यक्ति की दृष्टि से अच्छा बन पड़ा है। I मेघदूत को छोड़ शेष तीनों काव्यों में महाकवि ने सर्गान्त में छन्द के परिवर्तन का विधान निभाया है, जिससे उसके छन्दोविधान में विविधता और रुचिरता आ गयी है। मालिनी छन्द के द्वारा सर्गान्त में वृत्त-परिवर्तन कवि को विशेष प्रिय है। वस्तुतः मालिनी छन्द की अपनी विशेष यति और लय सर्गान्त में घटनाचक्र की सहसा व्यावृत्ति या विपर्यास, कथानक में नया मोड़ या वर्णन की रोचकता की अभिवृद्धि की दृष्टि से सर्वत्र बहुत अनुकूल प्रतीत होती है। ऋतुसंहार के तो सभी सर्गों में मालिनी छन्द के द्वारा ही कवि ने अन्त में वृत्त-परिवर्तन किया है तथा प्रत्येक सर्ग में (द्वितीय तथा षष्ठ सर्ग को छोड़कर) मालिनी छन्दों की संख्या एक से अधिक है। पहले सर्ग के अन्त में सात तथा पाँचवें के अन्त में छः मालिनियाँ हैं। चौथे सर्ग में चार मालिनियों के द्वारा वृत्त-परिवर्तन करके फिर वसन्ततिलका और फिर एक मालिनी का प्रयोग है। कथानक में सहसा नया मोड़ आ जाना या घटना की आकस्मिकता दिखाने के लिये भी मालिनी छन्द बड़ा उपयुक्त है। इस दृष्टि से कुमारसम्भव के तीसरे सर्ग में वसन्ततिलका के पश्चात् मालिनी वृत्त का प्रयोग बड़ा आकर्षक है। जिस प्रकार मेघदूत में मन्दाक्रान्ता छन्द रस और भाव के सर्वथा अनुकूल है, उसी प्रकार कुमारसम्भव के चतुर्थ सर्ग में रतिविलाप के प्रसंग में अर्धसमवैतालीय तथा कालिदास के काव्य रघुवंश के अष्टम सर्ग में भी वैतालीय छन्द ने कारुण्य और विरह-व्यथा के बोध को तीव्रता बझा स्रग्धरा तथा शार्दूलविक्रीडित जैसे लम्बे छन्दों का कवि ने कम प्रयोग अपने काव्यों में किया है। उपजाति के अतिरिक्त वंशस्थ (ऋतुसंहार प्रथम सर्ग), वसन्ततिलका (वही, षष्ठसर्ग), इन्द्रवजा आदि का प्रयोग भी उत्तम है।

रस

कालिदास हृदयपक्ष अथवा भावपक्ष के कवि हैं। इसीलिये उनकी कविता द्राक्षापाक है। वे व्यञ्जनावादी हैं। रसोद्बोध में अत्यन्त सक्षम हैं। रसों में भी कोमल रसों के संयोजन में वे सिद्धहस्त हैं। यद्यपि उन्होंने वीर, भयानक आदि रसों का भी चित्रण किया है किन्तु शृङ्गार, करुण एवं शान्त प्रभृति सुकुमार रसों की अनुभूति कराने में वे जितने प्रवीण हैं, उतने प्रौढ़ रसों की अनुभूति में नहीं। शृगार के वर्णन में तो कालिदास अनुपम हैं। वस्तुतः वे शृगार के कवि हैं। उन्होंने शृगार के उभय पक्ष-सम्भोग एवं विप्रलम्भ का चित्रण किया है। किन्तु उनका विप्रलम्भ शृङ्गाररस अद्वितीय है। मेघदूत में तो सम्भोग शृङ्गार विप्रलम्भ का पोषक बन गया है। कालिदास के समस्त काव्यों में शृङ्गाररस की अभिव्यक्ति हुई है। ऋतुसंहार, मेघदूत आदि ग्रन्थों में सम्भोग शृङ्गार का भरपूर चित्रण है, किन्तु कुमारसम्भव में शिव-पार्वती के सम्भोगवर्णन में सम्भोग शृङ्गार की अभिव्यक्ति अत्युत्कृष्ट है। मेघदूत में भी सम्भोग शृङ्गार का खुलकर चित्रण हुआ है - नीवीबन्धोच्छ्वसितशिथिलं यत्र बिम्बाधराणां क्षौमं रागादनिभृतकरेष्वाक्षिपत्सु प्रियेषु र अर्चिस्तुङ्गानभिमुखमपि प्राप्य रत्नप्रदीपान्। हीमूढानां भवति विफलप्रेरणा चूर्णमुष्टिः ।। २.७ अलका नगरी में रागाधिक्यवश प्रेमिकाओं के अधोवस्त्रों के बन्ध ढीले पड़ जाते हैं और प्रेमियों के चंचल हाथ जब उनके रेशमी वस्त्रों को खीच लेते हैं तब लज्जित हुई प्रेमिकायें ऊँचे प्रज्ज्वलित रत्नदीपों को बुझाने के लिये उन पर मुट्ठी भर केसर की धूल फेंकती हैं, किन्तु उनका प्रयास विफल ही होता है। मेघदूत विप्रलम्भ शृगारप्रधान काव्य है। यहाँ सम्भोग श्रृंगार भी विप्रलम्भ का पोषक है। कालिदास मेघदूत में विप्रलम्भ की तीव्रतम अनुभूति कराने में सफल हुए हैं। यक्ष प्रिया मिलन के लिये इतना व्याकुल है कि उत्तर की ओर से आने वाली हवाओं का आलिङ्गन करता है, सम्भव है ये हवायें उसकी प्रिया के शरीर का स्पर्श करके आ रही हों - आलिझ्यन्ते गुणवति मया ते तुषाराद्रिवाताः। नमक का पूर्वस्पृष्टं यदि किल भवेदङ्गमेभिस्तवेति ।। २.५०।। काव्य-खण्ड मी कालिदास ने कुमारसम्भव में रति-विलाप तथा रघुवंश में अज-विलाप के प्रसङ्ग में करुण रस का बड़ा ही सजीव चित्रण किया है। कामदेव के जल जाने पर रति रोती हुई कहती है- प्रिय! आज तक तुम्हारे जिस कान्तिमान् शरीर से विलासियों के शरीर की उपमा दी जाती थी, उसे इस दशा में देखकर भी मेरी छाती फट नहीं रही है, सचमुच स्त्रियों का हृदय कठोर होता है - उपमानमभूद्विलासिना करणं यत्तव कान्तिमत्तया। तदिदं गतमीदृशीं दशां न विदीर्ये कठिनाः खलु स्त्रियः ।। ४.५