१५ सूही

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विश्वास-प्रस्तुतिः

ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥

मूलम्

ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला १ चउपदे घरु १

मूलम्

रागु सूही महला १ चउपदे घरु १

विश्वास-प्रस्तुतिः

भांडा धोइ बैसि धूपु देवहु तउ दूधै कउ जावहु ॥ दूधु करम फुनि सुरति समाइणु होइ निरास जमावहु ॥१॥

मूलम्

भांडा धोइ बैसि धूपु देवहु तउ दूधै कउ जावहु ॥ दूधु करम फुनि सुरति समाइणु होइ निरास जमावहु ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: धोइ = धोय, धो के। बैसि = बैठ के, टिक के। तउ = तब। दूधै कउ = दूध लेने के लिए। करम = रोजाना की मेहनत-कमाई। समाइणु = जाग। निरास = दुनिया की आशाओं से निर्लिप हो के।1।
अर्थ: (मक्खन हासिल करने के लिए हे भाई!) तुम (पहले) बर्तन धो के बैठ के (उस बर्तन को) धूप में धो के तब दूध लेने जाते हो (फिर जाग लगा के उसको जमाते हो। इसी तरह यदि हरि-नाम प्राप्त करना है, तो) हृदय को पवित्र करके मन को रोको - ये इस हृदय-बर्तन को धूप दो। तब दूध लेने जाओ। रोजाना की मेहनत-कमाई दूध है, प्रभु-चरणों में (हर वक्त) तवज्जो जोड़े रखनी (रोजाना के मेहनत-कमाई में) जाग लगाना है, (जुड़ी तवज्जो की इनायत से) दुनिया की आशाओं से ऊपर उठो, इस तरह ये दूध जमाओ (भाव, जुड़ी हुई तवज्जो की सहायता से रोजाना काम-काज करते हुए भी माया की ओर से उपरामता ही रहेगी)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जपहु त एको नामा ॥ अवरि निराफल कामा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

जपहु त एको नामा ॥ अवरि निराफल कामा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: एको नामा = सिर्फ प्रभु का नाम ही। अवरि = और उद्यम। निराफल = व्यर्थ।1। रहाउ।
अर्थ: (हे भाई! अगर प्रभु को प्रसन्न करना है) तो सिर्फ प्रभु का नाम ही जपो (स्मरण छोड़ के प्रभु को प्रसन्न करने के) और सारे उद्यम व्यर्थ हैं।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

इहु मनु ईटी हाथि करहु फुनि नेत्रउ नीद न आवै ॥ रसना नामु जपहु तब मथीऐ इन बिधि अम्रितु पावहु ॥२॥

मूलम्

इहु मनु ईटी हाथि करहु फुनि नेत्रउ नीद न आवै ॥ रसना नामु जपहु तब मथीऐ इन बिधि अम्रितु पावहु ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हाथि = हाथ में। नेत्रउ = नेत्रा, मथानी पर लपेटी वह रस्सी जिसकी मदद से मथानी को घुमा के चाटी का दूध मथा जाता है। मथीऐ = मथना। इन बिधि = इन तरीकों से।2।
अर्थ: (दूध मथने के वक्त तुम नेत्रे की गिटियाँ हाथ में पकड़ते हो) अपने इस मन को वश में करो (आत्मिक जीवन के लिए इस तरह ये मन-रूप) गीटियाँ हाथ में पकड़ो। माया के मोह की नींद (मन पर) प्रभाव ना डाल सके- ये है नेत्रा। जीभ से परमात्मा का नाम जपो (ज्यों-ज्यों नाम जपोगे) त्यों-त्यों (ये रोजाना काम-काज रूपी दूध) मथता रहेगा, इन तरीकों से (रोजाना काम-काज करते हुए ही) नाम-अमृत प्राप्त कर लोगे।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मनु स्मपटु जितु सत सरि नावणु भावन पाती त्रिपति करे ॥ पूजा प्राण सेवकु जे सेवे इन्ह बिधि साहिबु रवतु रहै ॥३॥

मूलम्

मनु स्मपटु जितु सत सरि नावणु भावन पाती त्रिपति करे ॥ पूजा प्राण सेवकु जे सेवे इन्ह बिधि साहिबु रवतु रहै ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: संपटु = वह डिब्बा जिसमें ठाकुर-मूर्ति को रखा जाता है। जितु = जिस (नाम) से। सत सरि = सत सरोवर में, साधु-संगत में। भवन = सरधा। पाती = पत्तियों से। त्रिपति करे = प्रसन्न करे। पूजा प्राण = प्राणों प्रयन्त पूजा करे, स्वै वार दे, अपनत्व त्याग दे। रवतु रहै = मिला रहता है।3।
अर्थ: (पुजारी मूर्ति को डिब्बे में डालता है, अगर जीव) अपने मन को डब्बा बनाए (उसमें परमात्मा का नाम टिका के रखे) उस नाम के द्वारा साधु-संगत सरोवर में स्नान करे, (मन में टिके हुए प्रभु ठाकुर को) श्रद्धा के पत्रों से प्रसन्न करे, अगर जीव सेवक बन के स्वै भाव छोड़ के (अंदर बसते ठाकुर-प्रभु की) सेवा (स्मरण) करे, तो इन तरीकों से वह जीव मालिक प्रभु को सदा मिला रहता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कहदे कहहि कहे कहि जावहि तुम सरि अवरु न कोई ॥ भगति हीणु नानकु जनु ज्मपै हउ सालाही सचा सोई ॥४॥१॥

मूलम्

कहदे कहहि कहे कहि जावहि तुम सरि अवरु न कोई ॥ भगति हीणु नानकु जनु ज्मपै हउ सालाही सचा सोई ॥४॥१॥

दर्पण-टिप्पनी

नोट: चउपदे = चार पदों वाले, चार बंदों वाले शब्द।

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कहदे = कहने वाले (स्मरण के बिना प्रभु को प्रसन्न करने के और-और उद्यम) बताने वाले। कहे कहि = बता बता के। जावहि = चले जाते हैं, व्यर्थ में समय गवा जाते हैं। तुम सरि = तेरे बराबर, तेरे स्मरण के साथ का। अवरु = और उद्यम। जंपै = विनती करता है। हउ = मैं। सालाही = महिमा करूँ।4।
अर्थ: (स्मरण के बिना प्रभु को प्रसन्न करने के अन्य उद्यम) बताने वाले लोग जो अन्य उद्यम बताते हैं, वे बता-बता के जीवन समय व्यर्थ गवा लेते हैं (क्योंकि) हे प्रभु! तेरे स्मरण जैसा और कोई उद्यम नहीं है। (चाहे) नानक (तेरा) दास भक्ति से वंचित (ही है फिर भी ये यही) विनती करता है कि मैं सदा कायम रहने वाले प्रभु की सदा महिमा करता रहूँ।4।1।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: इस शब्द में दो अलंकार दिए हुए हैं: दूध मथने का और मूर्ति को पूजने का। बर्तन धो के माँज के उसमें दूध डालते हैं और जाग लगाई जाती है। नेत्रे की ईटियाँ (मथानी की डोर के सिरे को) हाथ में पकड़ के दूध बर्तन में मथते हैं और मक्खन निकाला जाता है।
ठाकुरों की मूर्ति (देवताओं की मूर्ति) को डब्बे में डाल के रखा जाता है, स्नान कराया जाता है, फूल-पत्ते आदि भेट करके पूजा की जाती है।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला १ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

सूही महला १ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अंतरि वसै न बाहरि जाइ ॥ अम्रितु छोडि काहे बिखु खाइ ॥१॥

मूलम्

अंतरि वसै न बाहरि जाइ ॥ अम्रितु छोडि काहे बिखु खाइ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंतरि = अंतर आत्मे। वसै = टिका रहता है। बाहरि = दुनिया के रस पदार्थों की ओर। छोडि = छोड़ के। चाहे = क्यों? बिखु = जहर, चस्का रूपी जहर।1।
अर्थ: (सेवक वह है जिसका मन) दुनिया के रस पदार्थों की तरफ नहीं दौड़ता, और अपने अंतरात्मे ही (प्रभु चरणों में) टिका रहता है; परमात्मा का नाम-अमृत छोड़ के वह विषियों का जहर नहीं खाता।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ऐसा गिआनु जपहु मन मेरे ॥ होवहु चाकर साचे केरे ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

ऐसा गिआनु जपहु मन मेरे ॥ होवहु चाकर साचे केरे ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गिआनु = गहरी सांझ, सूझ। जपहु = बार बार याद रखो। होवहु = हो सको, बन सको। केरे = के।1। रहाउ।
अर्थ: हे मन! परमात्मा के साथ ऐसी गहरी सांझ पक्की कर, (जिसकी इनायत से) तू उस सदा कायम रहने वाले प्रभु का (सच्चा) सेवक बन सके।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गिआनु धिआनु सभु कोई रवै ॥ बांधनि बांधिआ सभु जगु भवै ॥२॥

मूलम्

गिआनु धिआनु सभु कोई रवै ॥ बांधनि बांधिआ सभु जगु भवै ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गिआनु = आत्मिक विद्या की सूझ। धिआनु = तवज्जो जोड़नी, मन एकाग्र करना। रवै = जबानी जबानी कहते है। बांधनि = बंधन में। सभु जगु = सारा संसार। भवै = भटकता है।2।
अर्थ: ज़्बानी-ज़बानी तो हर कोई कहता है कि मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया है, मेरी तवज्जो जुड़ी हुई है, पर (देखने में ये आता है कि) सारा जगत माया के मोह के बंधनो में बँधा हुआ भटक रहा है (सिर्फ ज़ुबान से कहने भर से कोई प्रभु का सेवक नहीं बन सकता)।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सेवा करे सु चाकरु होइ ॥ जलि थलि महीअलि रवि रहिआ सोइ ॥३॥

मूलम्

सेवा करे सु चाकरु होइ ॥ जलि थलि महीअलि रवि रहिआ सोइ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सु = वह मनुष्य। थलि = धरती के अंदर। महीअलि = महीतलि, धरती के तल पर, धरती के ऊपर अंतरिक्ष में। सोइ = वही प्रभु।3।
अर्थ: जो मनुष्य (मन को बाहर भटकने से हटा के प्रभु का) स्मरण करता है वही (प्रभु का) सेवक बनता है, उस सेवक को प्रभु जल में, धरती के अंदर, आकाश में हर जगह व्याप्त दिखता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हम नही चंगे बुरा नही कोइ ॥ प्रणवति नानकु तारे सोइ ॥४॥१॥२॥

मूलम्

हम नही चंगे बुरा नही कोइ ॥ प्रणवति नानकु तारे सोइ ॥४॥१॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रणवति = विनती करता है। सोइ = वह परमात्मा।4।
अर्थ: नानक विनती करता है: जो मनुष्य (अहंकार का त्याग करता है और) समझता है कि मैं औरों से बढ़िया नहीं, ऐसे सेवक को परमात्मा (संसार-समुंदर की विकार-लहरों से) पार लंघा लेता है।4।1।2।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: आखिरी अंकों में से अंक 1 बताता है कि ‘घर2’ का ये पहला शब्द है।

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विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला १ घरु ६ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

सूही महला १ घरु ६ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

उजलु कैहा चिलकणा घोटिम कालड़ी मसु ॥ धोतिआ जूठि न उतरै जे सउ धोवा तिसु ॥१॥

मूलम्

उजलु कैहा चिलकणा घोटिम कालड़ी मसु ॥ धोतिआ जूठि न उतरै जे सउ धोवा तिसु ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: चिलकणा = चमकीला। घोटिम = मैंने घोटा, घिसा के। कालड़ी = काली सी, थोड़ी थोड़ी काली। मसु = स्याही। सउ = सौ बार। तिसु = उस कांसे (के बर्तन) को।1।
अर्थ: मैंने कांसे (का) साफ और चमकीला (बर्तन) घिसाया (तब उसमें से) थोड़ी-थोड़ी काली स्याही (लग गई)। अगर मैं सौ बार भी उस कांसे के बर्तन को धोऊँ (साफ करूँ) तो भी (बाहर से) धोने से उसके (अंदर की) जूठ (कालिख़) दूर नहीं होती।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सजण सेई नालि मै चलदिआ नालि चलंन्हि ॥ जिथै लेखा मंगीऐ तिथै खड़े दिसंनि ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सजण सेई नालि मै चलदिआ नालि चलंन्हि ॥ जिथै लेखा मंगीऐ तिथै खड़े दिसंनि ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सेई = वह ही। मै नालि चलंन्हि = मेरे साथ चलते हैं। मंगीऐ = मांगा जाता है। खड़े = खड़े हुए। दसंन्हि = बताते हैं, लेखा समझाते हैं।1। रहाउ।
अर्थ: मेरे असल मित्र वही हैं जो (हमेशा) मेरे साथ रहें, और (यहाँ से) चलने के वक्त भी मेरे साथ ही चलें, (आगे) जहाँ (किए कर्मों का) हिसाब माँगा जाता है वहाँ बेबाकी से (बेझिझक हो के) हिसाब दे सकें (भाव, हिसाब देने में कामयाब हो सकें)।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कोठे मंडप माड़ीआ पासहु चितवीआहा ॥ ढठीआ कमि न आवन्ही विचहु सखणीआहा ॥२॥

मूलम्

कोठे मंडप माड़ीआ पासहु चितवीआहा ॥ ढठीआ कमि न आवन्ही विचहु सखणीआहा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मंडप = मंदिर। पासहु = तरफ से, चौतरफे से। चितवीआहा = चितरी हुई। कंमि = काम में। आवनी = आती हैं। विचहु = अंदर से।2।
अर्थ: जो घर-मन्दिर-महल चारों तरफ़ से चित्रे हुए हों (सजे धजे हों), पर अंदर से ख़ाली हों, (वे गिर जाते हैं और) गिरे हुए किसी काम नहीं आते।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बगा बगे कपड़े तीरथ मंझि वसंन्हि ॥ घुटि घुटि जीआ खावणे बगे ना कहीअन्हि ॥३॥

मूलम्

बगा बगे कपड़े तीरथ मंझि वसंन्हि ॥ घुटि घुटि जीआ खावणे बगे ना कहीअन्हि ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बगा कपड़े = बगुलों के पंख। बगे = सफेद। मंझि = में। घुटि घुटि = (गला) घोट घोट के। खावणे = खाने वाले। कहीअन्हि = कहे जाते हैं।3।
अर्थ: बगलों के पंख सफेद होते हैं, बसते भी वे तीर्थों पर ही हैं। पर जीवों को (गले से) घोट-घोट के खाने वाले (अंदर से) साफ-सुथरे नहीं कहे जाते।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सिमल रुखु सरीरु मै मैजन देखि भुलंन्हि ॥ से फल कमि न आवन्ही ते गुण मै तनि हंन्हि ॥४॥

मूलम्

सिमल रुखु सरीरु मै मैजन देखि भुलंन्हि ॥ से फल कमि न आवन्ही ते गुण मै तनि हंन्हि ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सरीरु मै = मेरा शरीर। मैजनु = (मेधाविन्) तोते। भूलंन्हि = भुलेखा खा जाते हैं। ते गुण = वही गुण, वैसे ही गुण। मै तनि = मेरे शरीर में। हंन्हि = हैं।4।
अर्थ: (जैसे) सिंबल का वृक्ष (है, वैसे) मेरा ये शरीर है, (सिंबल के फलों को) देख के तोते भुलेखा खा जाते हैं, (सिंबल के) वे फल (तोतों के) काम नहीं आते, वैसे ही गुण मेरे शरीर में हैं।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अंधुलै भारु उठाइआ डूगर वाट बहुतु ॥ अखी लोड़ी ना लहा हउ चड़ि लंघा कितु ॥५॥

मूलम्

अंधुलै भारु उठाइआ डूगर वाट बहुतु ॥ अखी लोड़ी ना लहा हउ चड़ि लंघा कितु ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंधुलै = अंधे (मनुष्य) ने। डूगर वाट = पहाड़ी रास्ता। अखी = आँखों से। लोड़ी = तलाशता है। ना लहा = मैं ढूँढ नहीं सकता। हउ = मैं। कितु = किस तरीके से?।5।
अर्थ: मुझ अंधे ने (सिर पर विकारों का) भार उठाया हुआ है, (आगे मेरा जीवन-राह) बहुत ही पहाड़ी रास्ता है। आँखों से तलाश के मैं राह-ठिकाना नहीं तलाश सकता (क्योंकि आँखें हैं ही नहीं। इस हालत में) किस तरीके से (पहाड़ी पर) चढ़ कर मैं पार लांघूँ?।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

चाकरीआ चंगिआईआ अवर सिआणप कितु ॥ नानक नामु समालि तूं बधा छुटहि जितु ॥६॥१॥३॥

मूलम्

चाकरीआ चंगिआईआ अवर सिआणप कितु ॥ नानक नामु समालि तूं बधा छुटहि जितु ॥६॥१॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: चाकरीआ = लोगों की खुशामदें। चंगिआईआ = बाहरी दिखावे। कितु = किस काम के? जितु = जिस तरह।6।
अर्थ: हे नानक! (पहाड़ी रास्ते जैसे बिखड़े जीवन-राह में पार लंघने के लिए) दुनिया के लोगों की खुशामदें, लोक-दिखावे और चालाकियाँ किसी काम नहीं आ सकतीं। परमात्मा का नाम (अपने हृदय में) संभाल के रख। (माया के मोह में) बँधा हुआ तू इस नाम (-स्मरण) के द्वारा ही (मोह के बंधनो से) खलासी पा सकेगा।6।1।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: अंक1 बताता है कि ‘घर ६’ का ये पहला शब्द है। सूही में अब तक गुरु नानक देव जी के 3शबद आ चुके हैं।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला १ ॥ जप तप का बंधु बेड़ुला जितु लंघहि वहेला ॥ ना सरवरु ना ऊछलै ऐसा पंथु सुहेला ॥१॥

मूलम्

सूही महला १ ॥ जप तप का बंधु बेड़ुला जितु लंघहि वहेला ॥ ना सरवरु ना ऊछलै ऐसा पंथु सुहेला ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जप तप का बेड़ुला = जप तप का सुंदर बेड़ा। जपु तपु = नाम स्मरण।
बंधु = बाँध, तैयार कर। जितु = जिस बेड़े से। वहेला = जल्दी। पंथु = रास्ता, जीवन-पंथ। सुहेला = आसान।1।
अर्थ: (हे जीवन-सफ़र के राही!) प्रभु-स्मरण का सुंदर सा बेड़ा तैयार कर, जिस (बेड़े) में तू (इस संसार-समुंदर में से) जल्दी पार लांघ जाएगा। (नाम-जपने की इनायत से) तेरा जीवन-रास्ता इतना आसान हो जाएगा कि (तेरे रास्ते में) ना ये (संसार-) सरोवर आएगा और ना ही (इसका मोह) उछाले मारेगा।1।

दर्पण-टिप्पनी

(नोट: ‘रहाउ’ की तुक सदा सारे शब्द का केन्द्रिय भाव बताती है। यहाँ ‘रहाउ’ में’नाम’ को ही महानता दी गई है।) और प्रमाण भी हैं;
भनति नानकु करे वीचार॥ साची बाणी सिउ धरे पिआरु॥ ता को पावै मोख दुआरु॥ जपु तपु सतु इहु शबद है सारु॥४॥२॥४॥ (धनासरी महला १, पंना 661)
ऐ जी जपु तपु संजमु सचु अधार॥ हरि हरि नामु देहि सुख पाईऐ तेरी भगति भरे भंडार॥१॥ रहाउ॥ (गुजरी महला १, पंना 503)

विश्वास-प्रस्तुतिः

तेरा एको नामु मंजीठड़ा रता मेरा चोला सद रंग ढोला ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

तेरा एको नामु मंजीठड़ा रता मेरा चोला सद रंग ढोला ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मंजीठड़ा = सुंदर मजीठ। रता = रंगा हुआ। सद रंग = सदा रहने वाला रंग, पक्का रंग। ढोला = हे मित्र! हे प्यारे!।1। रहाउ।
अर्थ: हे मित्र! (-प्रभु!) तेरा नाम ही सुंदर मजीठ है जिसके पक्के रंग से मेरे (आत्मिक जीवन का) चोला रंगा गया है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

साजन चले पिआरिआ किउ मेला होई ॥ जे गुण होवहि गंठड़ीऐ मेलेगा सोई ॥२॥

मूलम्

साजन चले पिआरिआ किउ मेला होई ॥ जे गुण होवहि गंठड़ीऐ मेलेगा सोई ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साजन = हे सज्जन! चले पिआरिआ = हे चले जा रहे प्यारे! हे जीवन-यात्रा के प्यारे पथिक! गंठड़ीऐ = गठड़ी में, पल्ले, राह के सफर के लिए बँधी हुई गाँठ में। सोई = वह परमात्मा।2।
अर्थ: हे सज्जन! जीवन-सफ़र के प्यारे पथिक! (क्या तुझे पता है कि) प्रभु के साथ मिलाप कैसे होता है? (देख!) अगर पल्ले गुण हों तो वह खुद ही (अपने साथ) मिला लेता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मिलिआ होइ न वीछुड़ै जे मिलिआ होई ॥ आवा गउणु निवारिआ है साचा सोई ॥३॥

मूलम्

मिलिआ होइ न वीछुड़ै जे मिलिआ होई ॥ आवा गउणु निवारिआ है साचा सोई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आवागउणु = आना और जाना, जनम और मरन का चक्कर। निवारिआ = खत्म कर दिया। साचा = सदा स्थिर रहने वाला। सोई = वह प्रभु।3।
अर्थ: जो जीव प्रभु-चरणों में जुड़ जाए अगर वह सचमुच दिल से जुड़ा हुआ है तो फिर कभी वह (इस) मिलाप से नहीं विछुड़ता। उसके जनम-मरन का चक्कर समाप्त हो जाता है, उसको हर जगह वह सदा-स्थिर प्रभु ही दिखाई देता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हउमै मारि निवारिआ सीता है चोला ॥ गुर बचनी फलु पाइआ सह के अम्रित बोला ॥४॥

मूलम्

हउमै मारि निवारिआ सीता है चोला ॥ गुर बचनी फलु पाइआ सह के अम्रित बोला ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मारि = मार के। सीता है चोला = अपने लिए कुर्ता तैयार किया है, अपने आप को श्रृंगारा है, खुद को सुंदर बनाया है। सह के = पति प्रभु के। अंम्रित बोला = अमर करने वाले बोल, आत्मिक जीवन देने वाले वचन।4।
अर्थ: जिस जीव ने अहंकार मार के स्वै भाव दूर किया है और (इस तरह) अपना आप सँवार लिया है, सतिगुरु के वचन पर चल के फल के तौर पर उसे पति-प्रभु की महिमा के बोल प्राप्त होते हैं जो आत्मिक जीवन देने के समर्थ हैं।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नानकु कहै सहेलीहो सहु खरा पिआरा ॥ हम सह केरीआ दासीआ साचा खसमु हमारा ॥५॥२॥४॥

मूलम्

नानकु कहै सहेलीहो सहु खरा पिआरा ॥ हम सह केरीआ दासीआ साचा खसमु हमारा ॥५॥२॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: खरा = बहुत। केरीआ = की। साचा = सदा स्थिर।5।
अर्थ: नानक कहता है: हे सत्संगी सहेलियो! (नाम-जपने की इनायत से) पति-प्रभु बहुत प्यारा लगने लगता है, (फिर ऐसा यकीन बना रहता है कि) हम पति की दासियाँ हैं, और वह पति-प्रभु हमेशा हमारे सिर पर कायम है।5।2।4।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: अंक 2 बताता है कि ‘घरु ६’ का ये दूसरा शब्द है। सूही राग में गुरु नानक देव जी का ये चौथा शब्द है।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला १ ॥ जिन कउ भांडै भाउ तिना सवारसी ॥ सूखी करै पसाउ दूख विसारसी ॥ सहसा मूले नाहि सरपर तारसी ॥१॥

मूलम्

सूही महला १ ॥ जिन कउ भांडै भाउ तिना सवारसी ॥ सूखी करै पसाउ दूख विसारसी ॥ सहसा मूले नाहि सरपर तारसी ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जिन कउ = जिस (जीवों) को। भांडै = बर्तन में, हृदय में। भाउ = प्रेम। सवारसी = सवारेगा, सुंदर बनाएगा। सूखी = सुखों की। पसाउ = प्रसाद, कृपां। विसारसी = बिसार देगा, भुला देता है। सहसा = सहम, शक। सरपर = जरूर।1।
अर्थ: (प्रभु) जिस (जीवों) के (हृदय-रूपी) बर्तन में प्रेम (की भिक्षा देता है), (उस प्रेम की इनायत से प्रभु) उनका जीवन सुंदर बना देता है। उन पर सुख की कृपा करता है, उनके दुख भुला देता है। इस बात में रक्ती भर भी शक नहीं कि ऐसे जीवों को प्रभु जरूर (संसार-समुंदर से) पार लंघा लेता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तिन्हा मिलिआ गुरु आइ जिन कउ लीखिआ ॥ अम्रितु हरि का नाउ देवै दीखिआ ॥ चालहि सतिगुर भाइ भवहि न भीखिआ ॥२॥

मूलम्

तिन्हा मिलिआ गुरु आइ जिन कउ लीखिआ ॥ अम्रितु हरि का नाउ देवै दीखिआ ॥ चालहि सतिगुर भाइ भवहि न भीखिआ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: लीखिआ = (बख्शिश का) लेखा। दीखिआ = शिक्षा। सतिगुर भाइ = गुरु के प्रेम में, गुरु के अनुसार। भीखिआ = भिक्षा के लिए।2।
अर्थ: जिस लोगों को (धुर से लिखा बख्शिश का) लेख मिल जाता है, उन्हें गुरु आ के मिल जाता है। गुरु उन्हें परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाला नाम शिक्षा के तौर पर देता है, वह लोग (जीवन-यात्रा में) गुरु के बताए हुए अनुसार चलते हैं, और (दूसरी तरफ) भटकते नहीं फिरते।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जा कउ महलु हजूरि दूजे निवै किसु ॥ दरि दरवाणी नाहि मूले पुछ तिसु ॥ छुटै ता कै बोलि साहिब नदरि जिसु ॥३॥

मूलम्

जा कउ महलु हजूरि दूजे निवै किसु ॥ दरि दरवाणी नाहि मूले पुछ तिसु ॥ छुटै ता कै बोलि साहिब नदरि जिसु ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: महलु = ठिकाना। हजूरि = प्रभु की हजूरी में। दरि = दरवाजे पर। दरवाणी = दरबानों की। नाहि मूले = बिल्कुल नहीं। ता कै बोलि = उस (गुरु) के वचन से।3।
अर्थ: (गुरु के बताए राह पर चलके) जिस आदमी को परमात्मा की हजूरी में जगह मिल जाती है वह किसी और के आगे तरले नहीं करता फिरता; परमात्मा के दरवाजे पर (पहुँचे हुए यम आदिक) दरबानों द्वारा कोई रक्ती भर भी पूछ-ताछ नहीं की जाती, क्योंकि जिस गुरु पर मालिक प्रभु की मेहर की नजर है उस गुरु के वचन में (चल के) वह सख्श (विकारों से) मुक्त हो जाता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

घले आणे आपि जिसु नाही दूजा मतै कोइ ॥ ढाहि उसारे साजि जाणै सभ सोइ ॥ नाउ नानक बखसीस नदरी करमु होइ ॥४॥३॥५॥

मूलम्

घले आणे आपि जिसु नाही दूजा मतै कोइ ॥ ढाहि उसारे साजि जाणै सभ सोइ ॥ नाउ नानक बखसीस नदरी करमु होइ ॥४॥३॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आणे = लाता है, वापस बुला लेता है। दूजा कोइ मतै नाहि = कोई दूसरा सलाह नहीं दे सकता, दूसरा कोई मति नहीं दे सकता। साजि जाणै = पैदा करना जानता है। करमु = कृपा। नदरी = मेहर की नजर करने वाला प्रभु।4।
अर्थ: जिस मालिक प्रभु को कोई और दूसरा कोई मतें नहीं दे सकता (समझा नहीं सकता, सलाह नहीं दे सकता) वह खुद ही जीवों को जगत में भेजता है और खुद ही वापस बुला लेता है, प्रभु स्वयं ही जगत-रचना को गिराता-बनाता है, वह सब कुछ खुद ही पैदा करना जानता है।
हे नानक! जिस मनुष्य पर मेहर की नजर करने वाले प्रभु की निगाह हो जाती है उसे बतौर बख्शिश उसका नाम मिलता है।4।3।5।

[[0730]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला १ ॥ भांडा हछा सोइ जो तिसु भावसी ॥ भांडा अति मलीणु धोता हछा न होइसी ॥ गुरू दुआरै होइ सोझी पाइसी ॥ एतु दुआरै धोइ हछा होइसी ॥ मैले हछे का वीचारु आपि वरताइसी ॥ मतु को जाणै जाइ अगै पाइसी ॥ जेहे करम कमाइ तेहा होइसी ॥ अम्रितु हरि का नाउ आपि वरताइसी ॥ चलिआ पति सिउ जनमु सवारि वाजा वाइसी ॥ माणसु किआ वेचारा तिहु लोक सुणाइसी ॥ नानक आपि निहाल सभि कुल तारसी ॥१॥४॥६॥

मूलम्

सूही महला १ ॥ भांडा हछा सोइ जो तिसु भावसी ॥ भांडा अति मलीणु धोता हछा न होइसी ॥ गुरू दुआरै होइ सोझी पाइसी ॥ एतु दुआरै धोइ हछा होइसी ॥ मैले हछे का वीचारु आपि वरताइसी ॥ मतु को जाणै जाइ अगै पाइसी ॥ जेहे करम कमाइ तेहा होइसी ॥ अम्रितु हरि का नाउ आपि वरताइसी ॥ चलिआ पति सिउ जनमु सवारि वाजा वाइसी ॥ माणसु किआ वेचारा तिहु लोक सुणाइसी ॥ नानक आपि निहाल सभि कुल तारसी ॥१॥४॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भांडा = बर्तन, हृदय। हछा = पवित्र। तिसु = उस (परमात्मा) को। भावसी = अच्छा लगे। धोता = बाहर से साफ करने पर, तीर्थ आदि के स्नान से। दुआरै = दर से। होइ = हो के, भिखारी बन के। सोझी = (हृदय को पवित्र करने की) अक्ल। पाइसी = प्राप्त करता है। एतु दुआरै = इस दर से, गुरु के दर से। धोइ = धो के, शुद्ध करने से। वीचारु = समझ। आपि = प्रभु खुद। वरताइसी = देता है। मतु को जाणै = कोई मनुष्य ये ना समझे। जाइ = (यहाँ जगत से) जा के। अगै = परलोक में। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला। पति सिउ = इज्जत से। वाइसी = बजाएगा। तिहु लोक = तीनों ही लोकों में। निहाल = प्रसन्न चिक्त। सभि = सारे।1।
अर्थ: वही हृदय पवित्र है जो उस परमात्मा को अच्दा लगने लगता है। अगर मनुष्य का हृदय (अंदर से विकारों से) बहुत गंदा हुआ पड़ा है तो बाहर से शरीर को तीर्थ आदि पर स्नान कराने से हृदय शुद्ध नहीं हो सकता।
अगर गुरु के दर पर (स्वै भाव मिटा के सवाली) बनें, तो ही (हृदय को पवित्र करने की) बुद्धि मिलती है। गुरु के दर पर रह के ही (विकारों की मैल) धोने से हृदय पवित्र होता है। (अगर गुरु के दर पर टिकें तो) परमात्मा खुद ही ये (विचारने की) समझ देता है कि हम अच्छे हैं अथवा बुरे।
(अगर इस मनुष्य-जीवन के समय में गुरु का आसरा नहीं लिया तो) कोई जीव ये ना समझ ले कि (यहाँ से खाली हाथ) जा के परलोक में (जीवन पवित्र करने की सूझ) मिलेगी। (ये एक कुदरती नियम है कि यहाँ) मनुष्य जिस प्रकार के कर्म करता है वैसा वह बन जाता है।
(जो मनुष्य गुरु के दर से गिरता है उसको) आत्मिक जीवन देने वाला अपना नाम खुद बख्शता है। (जिस मनुष्य को यह दाति मिलती है) वह अपना मानव जनम सँवार के आदर कमा के यहाँ से जाता है, वह अपनी शोभा का बाजा (यहाँ) बजा जाता था। कोई एक मनुष्य तो क्या? तीनों ही लोकों में परमात्मा उसकी शोभा बिखेरता है। हे नानक! वह मनुष्य खुद सदा प्रसन्न-चिक्त रहता है, और अपनी सारी कुलों को ही तैरा लेता है (शोभा दिलवाता है)।1।4।6।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: इस शब्द में अलग-अलग बंद नहीं हैं। सारा शब्द समूचे तौर पर एक बँद गिना गया है। ‘घरु ६’ का ये चौथा शब्द है।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला १ ॥ जोगी होवै जोगवै भोगी होवै खाइ ॥ तपीआ होवै तपु करे तीरथि मलि मलि नाइ ॥१॥

मूलम्

सूही महला १ ॥ जोगी होवै जोगवै भोगी होवै खाइ ॥ तपीआ होवै तपु करे तीरथि मलि मलि नाइ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जोगवै = जोग कमाता है। भोगी = मायावी पदार्थों को भोगने वाला, गृहस्थी। खाइ = खाता है, भोगों में मस्त है। तीरथि = तीर्थ पर। मलि = मल के। नाइ = स्नान करता है।1।
अर्थ: जो मनुष्य जोगी बन जाता है वह जोग ही कमाता है (योग कमाने को ही सही रास्ता समझता है), जो मनुष्य गृहस्थी बनता है वह भोगों में ही मस्त है। जो मनुष्य तपी बनता है वह (सदा) तप (ही) करता है, और तीर्थों पर (जा के) मल मल के (भाव, बड़ी श्रद्धा भाव से) स्नान करता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तेरा सदड़ा सुणीजै भाई जे को बहै अलाइ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

तेरा सदड़ा सुणीजै भाई जे को बहै अलाइ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सदड़ा = सुंदर निमंत्रण, सुंदर वचन सुंदर शब्द। सुणीजै = सुनना चाहता हूँ। भाई = हे प्यारे! को = कोई मनुष्य। बहै = (मेरे पास) बैठ जाए। अलाइ = अलाप करे, सुनाए।1। रहाउ।
अर्थ: (पर) हे प्यारे (प्रभु)! मैं तो तेरी महिमा के शब्द ही सुनना चाहता हूँ, यदि कोई (मेरे पास) बैठ जाए और मुझे सुनाए।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जैसा बीजै सो लुणे जो खटे सुो खाइ ॥ अगै पुछ न होवई जे सणु नीसाणै जाइ ॥२॥

मूलम्

जैसा बीजै सो लुणे जो खटे सुो खाइ ॥ अगै पुछ न होवई जे सणु नीसाणै जाइ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: लुणे = काटता है। जो = जो कुछ। सुो = वही (कमाई)। खाइ = खाता है, फल भोगता है। न होवई = न हो, नहीं होती। सणु = समेत। नीसाणु = परवाना, राहदारी, नाम। सणु नीसाणै = महिमा के परवाने समेत।2।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: शब्द ‘सुो’ के साथ दो मात्राएं हैं: ‘ो’ और ‘ु’। असल पाठ ‘सो’ है, यहाँ ‘सु’ पढ़ना है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: (मनुष्य) जिस तरह का बीज बीजता है उसी (तरह के फल) पाता है, जो कुछ कमाई करता है, वही बरतता है (जोग-भोग और तप में परमात्मा की महिमा की कमाई नहीं है पर प्रभु की हजूरी में महिमा ही स्वीकार है)। अगर मनुष्य परमात्मा की महिमा का परवाना ले के (यहाँ से) जाए तो आगे (प्रभु के दर पर) उसको रोक-टोक नहीं होती।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तैसो जैसा काढीऐ जैसी कार कमाइ ॥ जो दमु चिति न आवई सो दमु बिरथा जाइ ॥३॥

मूलम्

तैसो जैसा काढीऐ जैसी कार कमाइ ॥ जो दमु चिति न आवई सो दमु बिरथा जाइ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: काढीऐ = कहा जाता है। चिति = चिक्त में। न आवई = नहीं आता। बिरथा = व्यर्थ।3।
अर्थ: मनुष्य जिस प्रकार का काम करता है वैसा ही उसका नाम पैदा हो जाता है (आत्मिक जीवन की राह में भी यही नियम है। भक्त वही जो भक्ति करता है। जोग-भोग अथवा तप में से भक्ति-भाव पैदा नहीं हो सकता)। (मनुष्य का) जो श्वास (किसी ऐसे उद्यम में गुजरता है कि परमात्मा) उसके मन में नहीं बसता तो वह श्वास व्यर्थ ही जाता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

इहु तनु वेची बै करी जे को लए विकाइ ॥ नानक कमि न आवई जितु तनि नाही सचा नाउ ॥४॥५॥७॥

मूलम्

इहु तनु वेची बै करी जे को लए विकाइ ॥ नानक कमि न आवई जितु तनि नाही सचा नाउ ॥४॥५॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: वेची = मैं बेचता हूँ, बेचने को तैयार हूँ। बै करी = कीमत ले कर देने को तैयार हूँ। विकाइ = कीमत दे के। जितु = जिस में। जितु तनि = जिस शरीर में।4।
अर्थ: हे नानक! जिस (मानव) शरीर में परमात्मा का सदा-स्थिर रहने वाला नाम नहीं बसता वह शरीर किसी काम नहीं आता (वह शरीर व्यर्थ ही गया समझो। इस वास्ते) अगर कोई मनुष्य मुझे प्रभु के नाम के बदले में दे के मेरा शरीर लेना चाहे तो मैं ये शरीर बेचने के लिए तैयार हूँ मूल्य देने को तैयार हूँ।4।5।7।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘घरु ६’ के यहाँ 5 शब्द समाप्त होते हैं।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला १ घरु ७ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

सूही महला १ घरु ७ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

जोगु न खिंथा जोगु न डंडै जोगु न भसम चड़ाईऐ ॥ जोगु न मुंदी मूंडि मुडाइऐ जोगु न सिंङी वाईऐ ॥ अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति इव पाईऐ ॥१॥

मूलम्

जोगु न खिंथा जोगु न डंडै जोगु न भसम चड़ाईऐ ॥ जोगु न मुंदी मूंडि मुडाइऐ जोगु न सिंङी वाईऐ ॥ अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति इव पाईऐ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जोगु = योग साधना का अभ्यास, परमात्मा से मिलाप। खिंथा = गोदड़ी। डंडै = डंडें के द्वारा, डंडा हाथ में पकड़ने से। भसम = राख। चढ़ाईऐ = शरीर पर मल लें। मुंदी = मुद्राओं के द्वारा, कानों में मुंदाएं पहन लेने से। मूंडु = सिर। मूंडि = सिर से। मूंडि मुडाइऐ = अगर सिर मुनवा लें। सिंङी = सिंगी की बाजा, जोगियों की तुरी जो सींग की बनी होती है। वाईऐ = अगर बजाएं। अंजन = कालख़, सुरमा, माया के मोह की कालिख। निरंजनि = निरंजन में, उस परमात्मा में जो माया के प्रभाव से रहित है। जुगति = तरीका। इव = इस तरह।1।
अर्थ: गुदड़ी पहन लेना परमात्मा से मिलाप का साधन नहीं है, डंडा हाथ में पकड़ लेने से हरि-मेल नहीं हो जाता, अगर शरीर पर राख मल लें तो भी प्रभु से मिलाप नहीं होता। (कानों में) मुंद्राएं पहनने से रब का मेल नहीं, अगर सिर मुनवा लें तो भी प्रभु से मिलाप संभव नहीं। सिंगी बजाने से भी जोग सिद्ध नहीं हो जाता।
परमात्मा से मिलाप का ढंग सिर्फ इस तरह ही हासिल होता है कि माया के मोह की कालिख में रहते हुए ही माया से निर्लिप प्रभु में जुड़े रहें।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गली जोगु न होई ॥ एक द्रिसटि करि समसरि जाणै जोगी कहीऐ सोई ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

गली जोगु न होई ॥ एक द्रिसटि करि समसरि जाणै जोगी कहीऐ सोई ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गली = बातों से। द्रिसटि = निगाह, नजर। करि = कर के। समसरि = बराबर, एक समान।1। रहाउ।
अर्थ: सिर्फ बातें करने से प्रभु-मिलाप नहीं होता। वही मनुष्य जोगी कहलवा सकता है जो एक जैसी निगाह से ही सब (जीवों) को बराबर (के इन्सान) समझे।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जोगु न बाहरि मड़ी मसाणी जोगु न ताड़ी लाईऐ ॥ जोगु न देसि दिसंतरि भविऐ जोगु न तीरथि नाईऐ ॥ अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति इव पाईऐ ॥२॥

मूलम्

जोगु न बाहरि मड़ी मसाणी जोगु न ताड़ी लाईऐ ॥ जोगु न देसि दिसंतरि भविऐ जोगु न तीरथि नाईऐ ॥ अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति इव पाईऐ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मढ़ी = मढ़ियों में। मसाणी = मसाणों में। ताड़ी = समाधि। देसि = देश में। दिसंतरि = देस अंतरि, और-और देशों में। देस देसंतरि भविऐ = देस परदेस में भटकने से। तीरथि = तीर्थों पर।2।
अर्थ: (घर से) बाहर मढ़ीयों में मसाणों में रहने से प्रभु-मेल नहीं होता, समाधियां लगाने से भी प्रभु नहीं मिलता। अगर देस-परदेस में भटकते फिरें तो भी प्रभु का मिलाप नहीं होता। तीर्थों पर स्नान करने से भी प्रभु-प्राप्ति नहीं होती।
परमात्मा से मिलाप का ढंग सिर्फ इस तरह ही आता है कि माया के मोह की कालिख में रहते हुए ही माया से निर्लिप प्रभु में जुड़े रहें।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सतिगुरु भेटै ता सहसा तूटै धावतु वरजि रहाईऐ ॥ निझरु झरै सहज धुनि लागै घर ही परचा पाईऐ ॥ अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति इव पाईऐ ॥३॥

मूलम्

सतिगुरु भेटै ता सहसा तूटै धावतु वरजि रहाईऐ ॥ निझरु झरै सहज धुनि लागै घर ही परचा पाईऐ ॥ अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति इव पाईऐ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भेटै = मिले। सहसा = सहम, डर। धावतु = भटकता हुआ (मन)। वरजि = वरज के, रोक के। राहाईऐ = रख लेते हैं। निझरु = (निर्झर) चश्मा, पहाड़ी नदी। झरै = चल पड़ता है, बहने लगता है। सहज = अडोल अवस्था। धुनि = तार, तुकांत। घरि ही = हृदय घर में ही। परचा = परिचय, जान पहचान, सांझ, मित्रता।3।
अर्थ: जब गुरु मिल जाए तो मन का सहम समाप्त हो जाता है, विकारों की ओर दौड़ते मन को रोक सकते हैं, (मन में प्रभु के अंमृत नाम का एक) चश्मा चल पड़ता है, अडोल अवस्था की ही लहर बन जाती है; हृदय के अंदर ही परमात्मा के नाम के साथ सांझ बन जाती है।
परमात्मा के साथ मिलाप की सलीका सिर्फ इसी तरह आता है कि माया के मोह की कालिख में रहते हुए ही माया से निर्लिप प्रभु में जुड़े रहें।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नानक जीवतिआ मरि रहीऐ ऐसा जोगु कमाईऐ ॥ वाजे बाझहु सिंङी वाजै तउ निरभउ पदु पाईऐ ॥ अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति तउ पाईऐ ॥४॥१॥८॥

मूलम्

नानक जीवतिआ मरि रहीऐ ऐसा जोगु कमाईऐ ॥ वाजे बाझहु सिंङी वाजै तउ निरभउ पदु पाईऐ ॥ अंजन माहि निरंजनि रहीऐ जोग जुगति तउ पाईऐ ॥४॥१॥८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: म्रि = मर के, विकारों की ओर से मर के। जोगु = जोगाभ्यास। वाजै = बजती है। तउ = तब। पदु = आत्मिक दर्जा। निरभउ = जहाँ डर नहीं।4।
अर्थ: हे नानक! परमात्मा से मिलाप का अभ्यास यूँ करना चाहिए कि दुनिया के कार्य-व्यवहार करते हुए ही विकारों से परे हट के रहना चाहिए। (जोगी तो सिंगी का बाजा बजाता है, पर स्मरण अभ्यास करने वाले के अंदर एक ऐसा सुरीला आनंद बनता है कि, मानो) बिना बाजा बजाए ही सिंगी बज रही हो। (जब मनुष्य इस आत्मिक आनंद को पाने लग जाता है) तब वह ऐसी आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेता है जिस में किसी तरह का कोई डर नहीं रह जाता।
जब माया के मोह की कालिख में रहते हुए ही माया से निर्लिप प्रभु में जुड़े रह सकें, तब प्रभु-मिलाप का सलीका आ जाता है।4।1।8।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: अंक 1 बताता है कि ‘घरु 7’ का ये पहला शब्द है।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला १ ॥ कउण तराजी कवणु तुला तेरा कवणु सराफु बुलावा ॥ कउणु गुरू कै पहि दीखिआ लेवा कै पहि मुलु करावा ॥१॥

मूलम्

सूही महला १ ॥ कउण तराजी कवणु तुला तेरा कवणु सराफु बुलावा ॥ कउणु गुरू कै पहि दीखिआ लेवा कै पहि मुलु करावा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कउणु = कौन सी? तराजी = ताराजू। कवणु = कौन सा? तुला = बाँट। सराफ = मूल्य डालने वाला, परख करने वाला। बुलावा = मैं बुलाऊँ। कै पहि = किस और से? दीखिआ = दीक्षा। लेवा = मैं लूँ। मुलु करावा = मैं कीमत डलवाऊँ।1।
अर्थ: हे प्रभु! कोई ऐसा तराजू नहीं, कोई ऐसा बाँट नहीं (कोई ऐसा पैमाना नहीं, जो तेरे गुणों का अंदाजा लगा सके), कोई ऐसा सर्राफ नहीं जिसे में (तेरे गुणों की पैमायश के लिए) बुला सकूँ (इस्तेमाल कर सकूँ)। मुझे कोई ऐसा उस्ताद नहीं दिखता जिससे मैं तेरा मूल्य डलवा सकूँ अथवा मूल्य डालने की विधि सीख सकूँ।1।

[[0731]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे लाल जीउ तेरा अंतु न जाणा ॥ तूं जलि थलि महीअलि भरिपुरि लीणा तूं आपे सरब समाणा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे लाल जीउ तेरा अंतु न जाणा ॥ तूं जलि थलि महीअलि भरिपुरि लीणा तूं आपे सरब समाणा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: लाल = हे लाल! न जाणा = मैं नहीं जानता। जलि = जल में। थलि = थल में, धरती के अंदर। महीअल = मही तलि, धरती के तल पर, आकाश में, अंतरिक्ष में। भरिपुरि = भरपूर। लीणा = व्यापक। आपे = प्रभु खुद ही।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे सुंदर प्रभु जी! मैं तेरे गुणों का अंत नहीं जान सकता (मुझे ये समझ नहीं आ सकती कि तेरे में कितनी तारीफ हैं)। तू पानी में भरपूर है, तू धरती के अंदर व्यापक है, तू आकाश में हर जगह मौजूद है, तू खुद ही सब जीवों में सब जगहों में समाया हुआ है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मनु ताराजी चितु तुला तेरी सेव सराफु कमावा ॥ घट ही भीतरि सो सहु तोली इन बिधि चितु रहावा ॥२॥

मूलम्

मनु ताराजी चितु तुला तेरी सेव सराफु कमावा ॥ घट ही भीतरि सो सहु तोली इन बिधि चितु रहावा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ताराजी = तराजू। तेरी सेव कमावा = मैं तेरी सेवा करूँ, मैं तेरा स्मरण करूँ। घट = हृदय। भीतरि = अंदर। सहु = पति प्रभु। तोली = मैं तोलूँ, परख करूँ। इन बिधि = इन तरीकों से। रहावा = मैं टिकाऊँ।2।
अर्थ: हे प्रभु! अगर मेरा मन तराजू बन जाए, यदि मेरा चिक्त तोलने वाला बाँट बन जाए, अगर मैं तेरी सेवा कर सकूँ, तेरा स्मरण कर सकूँ (अगर ये सेवा-स्मरण मेरे वास्ते) सर्राफ़ बन जाए (तो भी, तेरे गुणों का मैं अंत नहीं पा सकूँगा, पर हाँ) इन तरीकों से मैं अपने चिक्त को तेरे चरणों में टिका के रख सकूँगा। (हे भाई!) मैं अपने हृदय में ही उस पति-प्रभु को बैठा विधि सकूँगा।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

आपे कंडा तोलु तराजी आपे तोलणहारा ॥ आपे देखै आपे बूझै आपे है वणजारा ॥३॥

मूलम्

आपे कंडा तोलु तराजी आपे तोलणहारा ॥ आपे देखै आपे बूझै आपे है वणजारा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कंडा = तराजू की डंडी के बीच की सूई। देखै = संभाल करता है। बूझै = समझता है। वणजारा = वणज करने वाला जीव व्यापारी।3।
अर्थ: (हे भाई! प्रभु हरेक जगह व्यापक है, अपनी उपमा भी वह स्वयं ही जानता है और उस महानता की पैमायश कर सकता है, वह) खुद ही तराजू है, खुद ही तराजू का बाँट है, खुद ही तराजू की सूई है, और खुद ही (अपने गुणों को) तोलने वाला है। वह खुद ही सब जीवों की संभाल करता है, खुद ही सबके दिलों की समझता है, खुद ही जीव-रूप हो के जगत में (नाम) का व्यापार कर रहा है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अंधुला नीच जाति परदेसी खिनु आवै तिलु जावै ॥ ता की संगति नानकु रहदा किउ करि मूड़ा पावै ॥४॥२॥९॥

मूलम्

अंधुला नीच जाति परदेसी खिनु आवै तिलु जावै ॥ ता की संगति नानकु रहदा किउ करि मूड़ा पावै ॥४॥२॥९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंधुला = अंधा। नीच जाति = नीच जाति वाला। परदेसी = भटकता रहने वाला। खिनु = आँख के झपकने जितने समय में। ता की = ऐसे (मन) की। किउ करि = किस तरह? मूढ़ा = मूर्ख। पावै = (कद्र) पा सकता है।4।
अर्थ: अंजान नानक परमात्मा के गुणों की कद्र नहीं पा सकता, क्योंकि इसकी संगति सदा उस मन से है जो (माया के मोह में) अंधा हुआ पड़ा है जो (जन्मों-जन्मांतरों के विकारों की मैल से) नीच जाति का बना हुआ है, जो सदा भटकता रहता है, थोड़ा सा भी कहीं एक जगह पर टिक नहीं सकता।4।2।9।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला ४ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला ४ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मनि राम नामु आराधिआ गुर सबदि गुरू गुर के ॥ सभि इछा मनि तनि पूरीआ सभु चूका डरु जम के ॥१॥

मूलम्

मनि राम नामु आराधिआ गुर सबदि गुरू गुर के ॥ सभि इछा मनि तनि पूरीआ सभु चूका डरु जम के ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मनि = मन में। गुर सबदि = गुरु के शब्द से। सभि = सारी। तनि = तन में। सभु = सारा। जम के = जम का।1।
अर्थ: जिस मनुष्य ने गुरु के शब्द में जुड़ के परमात्मा का नाम स्मरण किया है, उसके मन में तन में (उपजी) सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं (उसके दिल में से) जम का सारा डर उतर जाता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे मन गुण गावहु राम नाम हरि के ॥ गुरि तुठै मनु परबोधिआ हरि पीआ रसु गटके ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे मन गुण गावहु राम नाम हरि के ॥ गुरि तुठै मनु परबोधिआ हरि पीआ रसु गटके ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मन = हे मन! गुरि तुठै = अगर गुरु प्रसन्न हो जाए। परबोधिआ = जाग पड़ता है। गटके = गटक के, गट गट के, स्वाद से।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! परमात्मा के नाम के गुण गाया कर। अगर (किसी मनुष्य पर) गुरु दयावान हो जाए, तो (उसका) मन (माया के मोह की नींद में से) जाग पड़ता है, वह मनुष्य परमात्मा के नाम का रस स्वाद से पीता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सतसंगति ऊतम सतिगुर केरी गुन गावै हरि प्रभ के ॥ हरि किरपा धारि मेलहु सतसंगति हम धोवह पग जन के ॥२॥

मूलम्

सतसंगति ऊतम सतिगुर केरी गुन गावै हरि प्रभ के ॥ हरि किरपा धारि मेलहु सतसंगति हम धोवह पग जन के ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: केरी = की। गावै = गाता है। हरि = हे हरि! हम धोवह = हम धोएं। पग = पैर।2।
अर्थ: हे भाई! गुरु की साधु-संगत बड़ी श्रेष्ठ जगह है (साधु-संगत में मनुष्य) हरि-प्रभु के गुण गाता है। हे हरि! मेहर कर, मुझे साधसंगति मिला (वहाँ) मैं तेरे संतजनों के पैर धोऊँगा।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

राम नामु सभु है राम नामा रसु गुरमति रसु रसके ॥ हरि अम्रितु हरि जलु पाइआ सभ लाथी तिस तिस के ॥३॥

मूलम्

राम नामु सभु है राम नामा रसु गुरमति रसु रसके ॥ हरि अम्रितु हरि जलु पाइआ सभ लाथी तिस तिस के ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सभु = सदा (सुख देने वाला)। रसके = रसकि, स्वाद से। अंम्रितु जलु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल। तिस = प्यास, त्रिखा। तिस के = उसकी।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘तिस के’ में से ‘तिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘की’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! परमात्मा का नाम हरेक को सुख देने वाला है। (पर) गुरु की मति पर चल कर ही हरि-नाम के रस का स्वाद लिया जा सकता है। जिस मनुष्य ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल प्राप्त कर लिया, उसकी (माया की) सारी प्यास बुझ गई।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हमरी जाति पाति गुरु सतिगुरु हम वेचिओ सिरु गुर के ॥ जन नानक नामु परिओ गुर चेला गुर राखहु लाज जन के ॥४॥१॥

मूलम्

हमरी जाति पाति गुरु सतिगुरु हम वेचिओ सिरु गुर के ॥ जन नानक नामु परिओ गुर चेला गुर राखहु लाज जन के ॥४॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुर के = गुरु के आगे। परिओ = पड़ गया। गुर चेला = गुरु का सिख। लाज = इज्जत।4।
अर्थ: हे भाई! गुरु ही मेरी जाति है, गुरु ही मेरी इज्जत है, मैंने अपना सिर गुरु के पास बेच दिया है। हे दास नानक! (कह:) हे गुरु! मेरा नाम ‘गुरु का सिख’ पड़ गया है, अब तू अपने इस सेवक की इज्जत रख ले, (और, हरि-नाम की दाति बख्शे रख)।4।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ४ ॥ हरि हरि नामु भजिओ पुरखोतमु सभि बिनसे दालद दलघा ॥ भउ जनम मरणा मेटिओ गुर सबदी हरि असथिरु सेवि सुखि समघा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ४ ॥ हरि हरि नामु भजिओ पुरखोतमु सभि बिनसे दालद दलघा ॥ भउ जनम मरणा मेटिओ गुर सबदी हरि असथिरु सेवि सुखि समघा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पुरखोतमु = उत्तम पुरख, प्रभु। सभि = सारे। दालद = दलिद्र, गरीबियां। दलघा = दल, समूह। असथिरु = सदा कायम रहने वाला। सेवि = स्मरण करके। सुखि = सुख में। समघा = समा गया।1।
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम जपा है, हरि उत्तम पुरुख को जपा है, उसके सारे दरिद्र, दलों के दल नाश हो गए हैं। गुरु के शब्द में जुड़ के उस मनुष्य के जनम-मरण का डर भी खत्म कर लिया। सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा की सेवा-भक्ति करके वह आनंद में लीन हो गया।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे मन भजु राम नाम अति पिरघा ॥ मै मनु तनु अरपि धरिओ गुर आगै सिरु वेचि लीओ मुलि महघा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे मन भजु राम नाम अति पिरघा ॥ मै मनु तनु अरपि धरिओ गुर आगै सिरु वेचि लीओ मुलि महघा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मन = हे मन! पिरघा = प्यारा। अरपि = अरप के, भेटा करके। मुलि महघा = महंगे मूल्य।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! सदा परमात्मा का अति प्यारा नाम स्मरण किया कर। हे भाई! मैंने अपना सिर महँगे मूल्य पर बेच दिया है (मैंने सिर के बदले में कीमती हरि-नाम ले लिया है)।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नरपति राजे रंग रस माणहि बिनु नावै पकड़ि खड़े सभि कलघा ॥ धरम राइ सिरि डंडु लगाना फिरि पछुताने हथ फलघा ॥२॥

मूलम्

नरपति राजे रंग रस माणहि बिनु नावै पकड़ि खड़े सभि कलघा ॥ धरम राइ सिरि डंडु लगाना फिरि पछुताने हथ फलघा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नरपति = राजे। माणहि = माणते हैं। पकड़ि = पकड़ के। सभि = सारे। कलघा = काल, मौत, आत्मिक मौत। सिरि = सिर पर। हथ = हाथों में (बहु वचन)। फलघा = फल, कर्मों का फल।2।
अर्थ: हे भाई! दुनिया के राजे-महाराजे (माया के) रंग-रस भोगते रहते हैं, उन सबको आत्मिक मौत पकड़ कर आगे लगा लेती है। जब उन्हें किए कर्मों का फल मिलता है, जब उनके सिर पर परमात्मा का डंडा बजता है, तब पछताते हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि राखु राखु जन किरम तुमारे सरणागति पुरख प्रतिपलघा ॥ दरसनु संत देहु सुखु पावै प्रभ लोच पूरि जनु तुमघा ॥३॥

मूलम्

हरि राखु राखु जन किरम तुमारे सरणागति पुरख प्रतिपलघा ॥ दरसनु संत देहु सुखु पावै प्रभ लोच पूरि जनु तुमघा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: किरम = कीड़े, छोटे से जीव। सरणागति = शरण आए हैं। पुरख = हे सर्व व्यापक! प्रतिपलघा = हे प्रतिपालक! , हे पालनहार! लोच = तमन्ना। पूरि = पूरी कर। तुमघा = तेरा।3।
अर्थ: हे हरि! हे पालनहार सर्व-व्यापक! हम तेरे (पैदा किए हुए) निमाणे से जीव हैं, हम तेरी शरण आए हैं, तू खुद (अपने) सेवकों की रक्षा कर। हे प्रभु! मैं तेरा दास हूँ, दास की तमन्ना पूरी कर, इस दास को संत जनों की संगति बख्श (ता कि ये दास) आत्मिक आनंद प्राप्त कर सके।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तुम समरथ पुरख वडे प्रभ सुआमी मो कउ कीजै दानु हरि निमघा ॥ जन नानक नामु मिलै सुखु पावै हम नाम विटहु सद घुमघा ॥४॥२॥

मूलम्

तुम समरथ पुरख वडे प्रभ सुआमी मो कउ कीजै दानु हरि निमघा ॥ जन नानक नामु मिलै सुखु पावै हम नाम विटहु सद घुमघा ॥४॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभ = हे प्रभु! कउ = को। मो कउ = मुझे। निमघा = निमख भर, छिन भर के लिए (निमेष, आँख झपकने जितने समय के लिए)। विटहु = से। घुमघा = कुर्बान।4।
अर्थ: हे प्रभु! हे सबसे बड़े मालिक! तू सारी ताकतों का मालिक पुरुख है। मुझे एक छिन के वास्ते ही अपने नाम का दान दे। हे दास नानक! (कह:) जिसको प्रभु का नाम प्राप्त होता है, वह आनंद लेता है। मैं सदा हरि-नाम से सदके हूँ।4।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ४ ॥ हरि नामा हरि रंङु है हरि रंङु मजीठै रंङु ॥ गुरि तुठै हरि रंगु चाड़िआ फिरि बहुड़ि न होवी भंङु ॥१॥

मूलम्

सूही महला ४ ॥ हरि नामा हरि रंङु है हरि रंङु मजीठै रंङु ॥ गुरि तुठै हरि रंगु चाड़िआ फिरि बहुड़ि न होवी भंङु ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रंङु = रंग, प्यार। मजीठै रंङु = मजीठ का रंग, पक्का रंग। गुरि तुठै = अगर गुरु प्रसन्न हो जाए। बहुड़ि = दोबारा। होवी = होता। भंङु = भंग, तोट, नास।1।
अर्थ: हे भाई! हरि-नाम का स्मरण (मनुष्य के मन में) हरि का प्यार पैदा करता है, और, ये हरि के साथ प्यार मजीठ के रंग जैसा प्यार होता है। अगर (किसी मनुष्य पर) गुरु प्रसन्न हो के उसको हरि-ना का रंग चढ़ा दे तो दोबारा उस रंग (प्यार) का कभी नाश नहीं होता।1।

[[0732]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे मन हरि राम नामि करि रंङु ॥ गुरि तुठै हरि उपदेसिआ हरि भेटिआ राउ निसंङु ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे मन हरि राम नामि करि रंङु ॥ गुरि तुठै हरि उपदेसिआ हरि भेटिआ राउ निसंङु ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मन = हे मन! नामि = नाम में। रंङु = रंग, प्रेम। भेटिआ = मिला। हरि राउ = प्रभु पातशाह। निसंङु = निसंग, शर्म उतार के।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! परमात्मा के नाम में प्यार जोड़। अगर (किसी मनुष्य पर) गुरु मेहरवान हो के उसको हरि-नाम का उपदेश दे, तो उस मनुष्य को प्रभु-पातशाह जरूर मिल जाता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मुंध इआणी मनमुखी फिरि आवण जाणा अंङु ॥ हरि प्रभु चिति न आइओ मनि दूजा भाउ सहलंङु ॥२॥

मूलम्

मुंध इआणी मनमुखी फिरि आवण जाणा अंङु ॥ हरि प्रभु चिति न आइओ मनि दूजा भाउ सहलंङु ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मुंध = जीव-स्त्री। मनमुखी = अपने मन के पीछे चलने वाली। अंङु = अंग, साथ। चिति = चिक्त में। मनि = मन में। दूजा भाउ = माया का प्यार। सहलंङु = सह लग्न, साथी।2।
अर्थ: हे भाई! जो अंजान जीव-स्त्री (गुरु का आसरा छोड़ के) अपने ही मन के पीछे चलती है, उसके जनम-मरण के चक्करों का आसरा बना रहता है। उस (जीव-स्त्री) के स्मर्ण में हरि प्रभु नहीं बसता, उसके मन में माया का मोह ही साथी रहता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हम मैलु भरे दुहचारीआ हरि राखहु अंगी अंङु ॥ गुरि अम्रित सरि नवलाइआ सभि लाथे किलविख पंङु ॥३॥

मूलम्

हम मैलु भरे दुहचारीआ हरि राखहु अंगी अंङु ॥ गुरि अम्रित सरि नवलाइआ सभि लाथे किलविख पंङु ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दुह चारीआ = दुराचारी। अंगी = हे अंगी! हे अंगपाल! अंङु = अंग, पक्ष। गुरि = गुरु ने। अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल। सरि = सर में, तालाब में। अंम्रित सरि = आत्मिक जीवन देने वाले नाम जल सरोवर में। नवलाइआ = स्नान करवा दिया। किलविख = पाप। पंङु = पंगु। पंकु = कीचड़।3।
अर्थ: हे हरि! हम जीव! (विकारों की) मैल से भरे रहते हैं, हम दुराचारी हैं। हे अंग पालने वाले प्रभु! हमारी रक्षा कर, हमारी सहायता कर। हे भाई! गुरु ने (जिस मनुष्य को) आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल सरोवर में स्नान करा दिया, (उसके अंदर से) सारे पाप उतर जाते है, पापों के कीचड़ धुल जाता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि दीना दीन दइआल प्रभु सतसंगति मेलहु संङु ॥ मिलि संगति हरि रंगु पाइआ जन नानक मनि तनि रंङु ॥४॥३॥

मूलम्

हरि दीना दीन दइआल प्रभु सतसंगति मेलहु संङु ॥ मिलि संगति हरि रंगु पाइआ जन नानक मनि तनि रंङु ॥४॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दीना दीन = कंगालों से कंगाल। प्रभु = हे प्रभु! संङु = संगु = साथ। मिलि = मिल के।4।
अर्थ: हे अति कंगालों पर दया करने वाले हरि-प्रभु! मुझे साधु-संगत के साथ मिला। हे दास नानक! (कह:) जिस मनुष्य ने साधु-संगत में मिल के परमात्मा के नाम का प्रेम प्राप्त कर लिया, उसके मन में उसके हृदय में वह प्रेम (सदा टिका रहता है)।4।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ४ ॥ हरि हरि करहि नित कपटु कमावहि हिरदा सुधु न होई ॥ अनदिनु करम करहि बहुतेरे सुपनै सुखु न होई ॥१॥

मूलम्

सूही महला ४ ॥ हरि हरि करहि नित कपटु कमावहि हिरदा सुधु न होई ॥ अनदिनु करम करहि बहुतेरे सुपनै सुखु न होई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: करहि = करते हैं। हरि हरि करहि = (ज़बानी ज़बानी) हरि नाम उचारते हैं। कपटु = छल, धोखा। कमावहि = कमाते हैं। सुधु = पवित्र। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। करम = (तीर्थ स्नान आदि निहित हुए धार्मिक) कर्म। सुपनै = सपने में भी।1।
अर्थ: हे भाई! (जो मनुष्य गुरु की शरण में नहीं आते वैसे) ज़ुबानी-ज़ुबानी राम-राम उचारते रहते हैं, सदा धोखा-फरेब (भी) करते रहते हैं, उनका दिल पवित्र नहीं हो सकता। वह मनुष्य (तीर्थ स्नान आदि निहित) अनेक धार्मिक कर्म हर वक्त करते रहते हैं, पर उन्हें कभी सपने में भी आत्मिक आनंद नहीं मिलता।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गिआनी गुर बिनु भगति न होई ॥ कोरै रंगु कदे न चड़ै जे लोचै सभु कोई ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

गिआनी गुर बिनु भगति न होई ॥ कोरै रंगु कदे न चड़ै जे लोचै सभु कोई ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गिआनी = हे ज्ञानवान! कोरै = कोरे (कपड़े) को। लोचै = तमन्ना करे। सभु कोई = हरेक जीव।1। रहाउ।
अर्थ: हे ज्ञानवान! गुरु की शरण पड़े बिना भक्ति नहीं हो सकती (मन पर प्रभु की भक्ति का रंग नहीं चढ़ सकता, जैसे) चाहे हरेक मनुष्य तरले करता फिरे, कभी कोरे कपड़े पर रंग नहीं चढ़ता।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जपु तप संजम वरत करे पूजा मनमुख रोगु न जाई ॥ अंतरि रोगु महा अभिमाना दूजै भाइ खुआई ॥२॥

मूलम्

जपु तप संजम वरत करे पूजा मनमुख रोगु न जाई ॥ अंतरि रोगु महा अभिमाना दूजै भाइ खुआई ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: संजम = इन्द्रियों को वश करने के लिए शरीर को तंग करने वाले साधन। मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य। अंतरि = अंदर, मन में। अभिमाना = अहंकार। दूजै भाइ = माया के प्यार में। खुआई = गलत रास्ते पर पड़ा हुआ है।2।
अर्थ: हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (मंत्रों का) जाप (धूनियों का) तपाना (आदिक) कष्ट देने वाले साधन करता है, ब्रत रखता है, पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का (आत्मिक) रोग दूर नहीं होता। उसके मन में अहंकार का बड़ा रोग टिका रहता है। वह माया के मोह में फंस के गलत राह पर पड़ा रहता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बाहरि भेख बहुतु चतुराई मनूआ दह दिसि धावै ॥ हउमै बिआपिआ सबदु न चीन्है फिरि फिरि जूनी आवै ॥३॥

मूलम्

बाहरि भेख बहुतु चतुराई मनूआ दह दिसि धावै ॥ हउमै बिआपिआ सबदु न चीन्है फिरि फिरि जूनी आवै ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मनूआ = अनुचित मन। दह दिसि = दसों दिशाएं। धावै = दौड़ता है, भटकता है। बिआपिआ = फसा हुआ। चीनै = पहचानता, सांझ डालता।3।
अर्थ: हे भाई! (गुरु से टूटा हुआ मनुष्य) लोगों को दिखाने के लिए धार्मिक भेस बनाता है, बहुत सारी चुस्ती-चालाकी दिखाता है, पर उसका अनुचित मन दसों दिशाओं में दौड़ता फिरता है। अहंकार-घमंड में फसा हुआ वह मनुष्य गुरु के शब्द से सांझ नहीं डालता, वह बार-बार जूनियों के चक्कर में पड़ा रहता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नानक नदरि करे सो बूझै सो जनु नामु धिआए ॥ गुर परसादी एको बूझै एकसु माहि समाए ॥४॥४॥

मूलम्

नानक नदरि करे सो बूझै सो जनु नामु धिआए ॥ गुर परसादी एको बूझै एकसु माहि समाए ॥४॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नानक = हे नानक! नदरि = मेहर की निगाह। बूझै = समझता है। परसादी = कृपा से, प्रसाद से। एको बूझै = एक परमात्मा के साथ ही सांझ पाता है। एकसु माहि = एक परमात्मा में ही।4।
अर्थ: हे नानक! (कह: हे भाई!) जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर की निगाह करता है, वह (आत्मिक जीवन के रास्ते को) समझ लेता है, वह मनुष्य (सदा) परमात्मा का नाम स्मरण करता है, गुरु की कृपा से वह एक परमात्मा के साथ ही सांझ बनाए रखता है, वह एक परमात्मा में ही लीन रहता है।4।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ४ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

सूही महला ४ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरमति नगरी खोजि खोजाई ॥ हरि हरि नामु पदारथु पाई ॥१॥

मूलम्

गुरमति नगरी खोजि खोजाई ॥ हरि हरि नामु पदारथु पाई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुरमति = गुरु की मति ले के। नगरी = शरीर (-नगरी)। खोजि = खोज कर के। खोजाई = खोज कराई। पाई = ढूँढ लिया।1।
अर्थ: हे भाई! गुरु की मति ले के मैंने अपने शरीर-नगर की अच्छी तरह खोज की है, और (शरीर में से ही) परमात्मा का कीमती नाम मैंने पा लिया है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरै मनि हरि हरि सांति वसाई ॥ तिसना अगनि बुझी खिन अंतरि गुरि मिलिऐ सभ भुख गवाई ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरै मनि हरि हरि सांति वसाई ॥ तिसना अगनि बुझी खिन अंतरि गुरि मिलिऐ सभ भुख गवाई ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मेरै मनि = मेरे मन में। तिसना अगनि = माया की तृष्णा की आग। गुरि मिलिऐ = गुरु के मिलने से।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (गुरु ने मुझे हरि-नाम की दाति दे के) मेरे मन में ठंड डाल दी है। (मेरे अंदर से) एक छिन में (माया की) तृष्णा की आग बुझ गई है। गुरु के मिलने से मेरी सारी (माया की) भूख दूर हो गई है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि गुण गावा जीवा मेरी माई ॥ सतिगुरि दइआलि गुण नामु द्रिड़ाई ॥२॥

मूलम्

हरि गुण गावा जीवा मेरी माई ॥ सतिगुरि दइआलि गुण नामु द्रिड़ाई ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गावा = गाऊँ, मैं गाता हूँ। जीवा = जीऊँ, मैं आत्मिक जीवन प्राप्त करता हूँ। माई = हे माँ! सतिगुरि = सतिगुरु ने। दइआल = दयालु ने। द्रिढ़ाई = पक्का कर दिया है।2।
अर्थ: हे मेरी माँ! (अब ज्यों-ज्यों) मैं परमात्मा के गुण गाता हूँ, मुझे आत्मिक जीवन मिल रहा है। दया के घर सतिगुरु ने मेरे हृदय में प्रभु के गुण पक्के कर दिए हैं, परमात्मा का नाम पक्का कर दिया है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हउ हरि प्रभु पिआरा ढूढि ढूढाई ॥ सतसंगति मिलि हरि रसु पाई ॥३॥

मूलम्

हउ हरि प्रभु पिआरा ढूढि ढूढाई ॥ सतसंगति मिलि हरि रसु पाई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हउ = मैं। ढूढाई = तलाश कराता हूँ। मिलि = मिल के।3।
अर्थ: हे भाई! अब मैं प्यारे हरि-प्रभु की तलाश करता हूँ, (सत्संगियों से) तलाश करवाता हूँ। साधु-संगत में मिल के मैं परमात्मा के नाम का स्वाद लेता हूँ।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

धुरि मसतकि लेख लिखे हरि पाई ॥ गुरु नानकु तुठा मेलै हरि भाई ॥४॥१॥५॥

मूलम्

धुरि मसतकि लेख लिखे हरि पाई ॥ गुरु नानकु तुठा मेलै हरि भाई ॥४॥१॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: धुरि = धुर दरगाह से। मसतकि = माथे पर। तुठा = प्रसन्न। भाई = हे भाई!।4।
अर्थ: हे भाई! धुर दरगाह से (जिस मनुष्य के) माथे पर प्रभु-मिलाप का लिखा लेख उघड़ता है, उस पर गुरु नानक प्रसन्न होता है और, उसको परमात्मा मिला देता है।4।1।5।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: घर १ के चारों शबदों का संग्रह यहीं समाप्त होता है। आगे अब ‘घरु २’ के शब्द का ये पहला शब्द है।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ४ ॥ हरि क्रिपा करे मनि हरि रंगु लाए ॥ गुरमुखि हरि हरि नामि समाए ॥१॥

मूलम्

सूही महला ४ ॥ हरि क्रिपा करे मनि हरि रंगु लाए ॥ गुरमुखि हरि हरि नामि समाए ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मनि = मन में। रंगु = प्यार, प्रेम रंग। लाए = पैदा करता है। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ के। नामि = नाम में।1।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा जिस मनुष्य पर मेहर करता है, उसके मन में (अपने चरणों का) प्यार पैदा करता है। वह मनुष्य गुरु की शरण पड़ कर परमात्मा के नाम में सदा लीन रहता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि रंगि राता मनु रंग माणे ॥ सदा अनंदि रहै दिन राती पूरे गुर कै सबदि समाणे ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

हरि रंगि राता मनु रंग माणे ॥ सदा अनंदि रहै दिन राती पूरे गुर कै सबदि समाणे ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रंगि = रंग में। राता = रंगा हुआ। अनंदि = आनंद में। कै सबदि = के शब्द में।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा रहता है, उसका मन आनंद लेता रहता है। वह मनुष्य दिन-रात हर वक्त आनंद में मगन रहता है।, वह पूरे गुरु की वाणी में लीन रहता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि रंग कउ लोचै सभु कोई ॥ गुरमुखि रंगु चलूला होई ॥२॥

मूलम्

हरि रंग कउ लोचै सभु कोई ॥ गुरमुखि रंगु चलूला होई ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कउ = को, की खातिर। लोचै = चाहता है। सभु कोई = हरेक प्राणी। चलूला = गूढ़ा।2।
अर्थ: हे भाई! (वैसे तो) हरेक मनुष्य प्रभु (चरणों) के प्यार की खातिर तरले लेता है, पर गुरु की शरण पड़ के ही (मन पर प्रेम का) गाढ़ा रंग चढ़ता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मनमुखि मुगधु नरु कोरा होइ ॥ जे सउ लोचै रंगु न होवै कोइ ॥३॥

मूलम्

मनमुखि मुगधु नरु कोरा होइ ॥ जे सउ लोचै रंगु न होवै कोइ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य। मुगधु = मूर्ख। कोरा = प्यार से वंचित, रूखा। सउ = सौ बार।3।
अर्थ: हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाला मूर्ख मनुष्य प्यार से वंचित हृदय वाला ही रहता है। ऐसा मनुष्य जो सौ बार भी चाहे, उसको (प्रभु के प्यार का) रंग नहीं चढ़ सकता।3।

[[0733]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

नदरि करे ता सतिगुरु पावै ॥ नानक हरि रसि हरि रंगि समावै ॥४॥२॥६॥

मूलम्

नदरि करे ता सतिगुरु पावै ॥ नानक हरि रसि हरि रंगि समावै ॥४॥२॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नदरि = मेहर की निगाह। रस = रस में। रंगि = रंग में।4।
अर्थ: हे नानक! (कह: जब परमात्मा किसी मनुष्य पर) मेहर की निगाह करता है, तो वह गुरु (का मिलाप) प्राप्त करता है, (फिर वह) परमात्मा के नाम-रस में परमात्मा के प्रेम-रंग में समाया रहता है।4।2।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ४ ॥ जिहवा हरि रसि रही अघाइ ॥ गुरमुखि पीवै सहजि समाइ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ४ ॥ जिहवा हरि रसि रही अघाइ ॥ गुरमुखि पीवै सहजि समाइ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जिहवा = जीभ। रसि = रस में। अघाइ रही = तृप्त रहती है। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ के। सहजि = आत्मिक अडोलता में।1।
अर्थ: हे भाई! गुरु की शरण पड़ कर जिस मनुष्य की जीभ परमात्मा के नाम के रस में तृप्त रहती है, वह सदा वह नाम-रस ही पीता है, और आत्मिक अडोलता में टिका रहता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि रसु जन चाखहु जे भाई ॥ तउ कत अनत सादि लोभाई ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

हरि रसु जन चाखहु जे भाई ॥ तउ कत अनत सादि लोभाई ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भाई जन = हे भाई जनो! हे प्यारे सज्जनो! तउ = तब। सादि = स्वाद में। अनत सादि = और स्वादों में। कत = कहाँ? कत अनद सादि = किसी भी स्वाद में नहीं।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्यारे सज्जनों! अगर तुम परमात्मा के नाम का स्वाद चख लो, तो फिर किसी भी और स्वाद में नहीं फंसोगे।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरमति रसु राखहु उर धारि ॥ हरि रसि राते रंगि मुरारि ॥२॥

मूलम्

गुरमति रसु राखहु उर धारि ॥ हरि रसि राते रंगि मुरारि ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: उर = हृदय। धारि = टिका के। रंगि = प्रेम रंग में।2।
अर्थ: हे भाई! गुरु की शिक्षा पर चल के प्रभु के नाम का स्वाद अपने हृदय में बसाए रखो। जो मनुष्य प्रभु के नाम-रस में मगन हो जाते हैं, वह मुरारी प्रभु के प्रेम-रंग में रंगे जाते हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मनमुखि हरि रसु चाखिआ न जाइ ॥ हउमै करै बहुती मिलै सजाइ ॥३॥

मूलम्

मनमुखि हरि रसु चाखिआ न जाइ ॥ हउमै करै बहुती मिलै सजाइ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य। हउमै करै = ‘मैं मैं’ करता है, ‘मैं बड़ा मैं बहुत समझदार’ कहता फिरता है।3।
अर्थ: पर, हे भाई! जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है, वह परमात्मा के नाम-रस का स्वाद नहीं चख सकता, (ज्यों-ज्यों अपनी समझदारी का) अहंकार करता है (त्यों-त्यों) उसे और ज्यादा से ज्यादा सजा मिलती है (आत्मिक कष्ट सहना पड़ता है)।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नदरि करे ता हरि रसु पावै ॥ नानक हरि रसि हरि गुण गावै ॥४॥३॥७॥

मूलम्

नदरि करे ता हरि रसु पावै ॥ नानक हरि रसि हरि गुण गावै ॥४॥३॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पावै = हासिल करता है। नानक = हे नानक!।4।
अर्थ: हे नानक! (कह: हे भाई!) जब परमात्मा (किसी मनुष्य पर) मेहर की निगाह करता है तब वह प्रभु के नाम का स्वाद हासिल करता है, (फिर) वह हरि-नाम के स्वाद में मगन हो के परमात्मा की महिमा के गीत गाता रहता है।4।3।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ४ घरु ६ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

सूही महला ४ घरु ६ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

नीच जाति हरि जपतिआ उतम पदवी पाइ ॥ पूछहु बिदर दासी सुतै किसनु उतरिआ घरि जिसु जाइ ॥१॥

मूलम्

नीच जाति हरि जपतिआ उतम पदवी पाइ ॥ पूछहु बिदर दासी सुतै किसनु उतरिआ घरि जिसु जाइ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नीच जाति = नीच जाति का मनुष्य। उतम पदवी = उच्च आत्मिक दर्जा। पाइ = पा लेता है। बिदर = बिदर भक्त राजा विचित्रवीर्य की दासी सुदेशणा की कोख से जन्मा व्यास ऋषि का पुत्र था। इसका भक्ति भाव देख के ही कृष्ण जी दुर्योधन की महल-माढ़ियां छोड़ के बिदर के घर आ ठहरे थे (देखें भाई गुरदास जी की वार 10)। घरि जिसु = जिसके घर में। जाइ = जा के।1।
अर्थ: हे भाई! नीच जाति वाला मनुष्य भी परमात्मा का नाम जपने से उच्च आत्मिक दर्जा हासिल कर लेता है (अगर यकीन नहीं होता, तो किसी से) दासी के पुत्र बिदर की बात पूछ के देख लो। उस बिदर के घर में कृष्ण जी जा के ठहरे थे।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि की अकथ कथा सुनहु जन भाई जितु सहसा दूख भूख सभ लहि जाइ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

हरि की अकथ कथा सुनहु जन भाई जितु सहसा दूख भूख सभ लहि जाइ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जितु = जिस (कथा) के द्वारा। सहसा = सहम।1। रहाउ।
अर्थ: हे सज्जनो! परमात्मा की आश्चर्य महिमा सुना करो, जिसकी इनायत से हरेक किस्म की सहम, हरेक दुख दूर हो जाता है, (माया की) भूख मिट जाती है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रविदासु चमारु उसतति करे हरि कीरति निमख इक गाइ ॥ पतित जाति उतमु भइआ चारि वरन पए पगि आइ ॥२॥

मूलम्

रविदासु चमारु उसतति करे हरि कीरति निमख इक गाइ ॥ पतित जाति उतमु भइआ चारि वरन पए पगि आइ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: निमख इक = एक-एक निमख, हर वक्त (निमेष = आँख झपकने जितना समय)। कीरति = महिमा। पतित जाति = नीच जाति वाला। चारि वरन = ब्राहमण, खत्री, वैश्य, शूद्र। पगि = पैर पर। आइ = आ के।2।
अर्थ: हे भाई! (भक्त) रविदास (जाति का) चमार (था, वह परमात्मा की) महिमा करता था, वह हर वक्त प्रभु की कीर्ति गाता रहता था। नीच जाति का रविदास महापुरुष बन गया। चारों वर्णों के मनुष्य उसके पैरों में आ के लगे।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नामदेअ प्रीति लगी हरि सेती लोकु छीपा कहै बुलाइ ॥ खत्री ब्राहमण पिठि दे छोडे हरि नामदेउ लीआ मुखि लाइ ॥३॥

मूलम्

नामदेअ प्रीति लगी हरि सेती लोकु छीपा कहै बुलाइ ॥ खत्री ब्राहमण पिठि दे छोडे हरि नामदेउ लीआ मुखि लाइ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नामदेअ प्रीति = नामदेव की प्रीति। सेती = साथ। मुखि लाइ लीआ = दर्शन दिए, माथे से लगाया।3।
अर्थ: हे भाई! (भक्त) नामदेव की परमात्मा के साथ प्रीति बन गई। जगत उसे धोबी (छींबा) बुलाता था। परमात्मा ने क्षत्रियों-ब्राहमणों को पीठ दे दी, और नामदेव को माथे से लगाया था।3।

दर्पण-टिप्पनी

(नामदेव जी का जन्म गाँव नरसी वांमनी, जिला सतारा, प्रांत बंबई में सन् 1270 में हुआ था। उम्र का बहुत सारा हिस्सा इन्होंने पंडरपुर में गुजारा। वहीं सन्1350 में देहांत हुआ)।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जितने भगत हरि सेवका मुखि अठसठि तीरथ तिन तिलकु कढाइ ॥ जनु नानकु तिन कउ अनदिनु परसे जे क्रिपा करे हरि राइ ॥४॥१॥८॥

मूलम्

जितने भगत हरि सेवका मुखि अठसठि तीरथ तिन तिलकु कढाइ ॥ जनु नानकु तिन कउ अनदिनु परसे जे क्रिपा करे हरि राइ ॥४॥१॥८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मुखि = मुँह पर। अठसठि = अढ़सठ। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। परसे = छूए। हरि राइ = प्रभु पातशाह।4।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा के जितने भी भक्त हैं, सेवक हैं, उनके माथे पर अढ़सठ तीर्थ तिलक लगाते हैं (सारे ही तीर्थ भी उनका आदर-मान करते हैं)। हे भाई! अगर प्रभु-पातशाह मेहर करे, तो दास नानक हर वक्त उन (भगतों-सेवकों) के चरण छूता है।4।1।8।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘घरु 2’ के शबदों का संग्रह समाप्त होता है। आगे ‘घरु 6’ के संग्रह का ये पहला शब्द है। कुल जोड़ 8 है।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ४ ॥ तिन्ही अंतरि हरि आराधिआ जिन कउ धुरि लिखिआ लिखतु लिलारा ॥ तिन की बखीली कोई किआ करे जिन का अंगु करे मेरा हरि करतारा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ४ ॥ तिन्ही अंतरि हरि आराधिआ जिन कउ धुरि लिखिआ लिखतु लिलारा ॥ तिन की बखीली कोई किआ करे जिन का अंगु करे मेरा हरि करतारा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तिनी = उन मनुष्यों ने। अंतरि = अपने हृदय में। धुरि = धुर दरगाह से। लिखतु = लेख। लिलारा = लिलाट, माथे पर। बखीली = चुग़ली, निंदा। अंगु = पक्ष।1।
अर्थ: हे भाई! धुर-दरगाह से जिस मनुष्यों के माथे पर लेख लिखा होता है, वही मनुष्य अपने हृदय में परमात्मार की आराधना करते हैं (और परमात्मा उनका ही पक्ष करता है)। प्यारा कर्तार जिनका पक्ष करता है, कोई मनुष्य उनकी निंदा करके उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकता।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि हरि धिआइ मन मेरे मन धिआइ हरि जनम जनम के सभि दूख निवारणहारा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

हरि हरि धिआइ मन मेरे मन धिआइ हरि जनम जनम के सभि दूख निवारणहारा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मन = हे मन! सभि = सारे। निवारणहारा = दूर करने के लायक।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! परमात्मा का नाम स्मरण किया कर। हे मन! प्रभु का ध्यान धरा कर। परमात्मा (जीव के) जन्मों-जन्मांतरों के विकार दूर करने की सामर्थ्य रखता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

धुरि भगत जना कउ बखसिआ हरि अम्रित भगति भंडारा ॥ मूरखु होवै सु उन की रीस करे तिसु हलति पलति मुहु कारा ॥२॥

मूलम्

धुरि भगत जना कउ बखसिआ हरि अम्रित भगति भंडारा ॥ मूरखु होवै सु उन की रीस करे तिसु हलति पलति मुहु कारा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंम्रित भगति = आत्मिक जीवन देने वाली भक्ति। भंडारा = खजाना। रीस = बराबरी। हलति = इस लोक में (अत्र)। पलति = (परत्र) परलोक में। कारा = काला।2।
अर्थ: हे भाई! धुर-दरगाह से परमात्मा ने अपने भक्तों को अपनी आत्मिक जीवन देने वाली भक्ति का खजाना बख्शा हुआ है। जो मनुष्य मूर्ख होता हैवही उनकी बराबरी करता है (इस ईष्या के कारण, बल्कि) उसका मुँह इस लोक में भी और परलोक में काला होता है (वह लोक-परलोक में बदनामी कमाता है)।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

से भगत से सेवका जिना हरि नामु पिआरा ॥ तिन की सेवा ते हरि पाईऐ सिरि निंदक कै पवै छारा ॥३॥

मूलम्

से भगत से सेवका जिना हरि नामु पिआरा ॥ तिन की सेवा ते हरि पाईऐ सिरि निंदक कै पवै छारा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ते = से। पाईऐ = मिलता है। कै सिरि = के सिर पर। छारा = राख। पवै छारा = राख पड़ती है।3।
अर्थ: हे भाई! वही मनुष्य भक्त हैं, वह मनुष्य (परमात्मा के) सेवक हैं, जिनको परमात्मा का नाम प्यारा लगता है। उन (सेवक-भक्तों) की शरण पड़ने से परमात्मा (का मिलाप) प्राप्त होता है। (सेवकों-भक्तों के) निंदक के सिर पर (तो जगत की ओर से) राख (ही) पड़ती है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जिसु घरि विरती सोई जाणै जगत गुर नानक पूछि करहु बीचारा ॥ चहु पीड़ी आदि जुगादि बखीली किनै न पाइओ हरि सेवक भाइ निसतारा ॥४॥२॥९॥

मूलम्

जिसु घरि विरती सोई जाणै जगत गुर नानक पूछि करहु बीचारा ॥ चहु पीड़ी आदि जुगादि बखीली किनै न पाइओ हरि सेवक भाइ निसतारा ॥४॥२॥९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जिसु घरि = जिसके घर में, जिसके हृदय घर में। विरती = घटित होती है। पूछि = पूछ के। चहु पीढ़ी = चारों पीढ़ियों में, कभी भी। आदि जुगादि = जगत के आरम्भ से, जुगों के आरम्भ से। बखीली = चुगली करने से। किनै = किसी ने भी। भाइ = भावना से। निसतारा = पार उतारा।4।
अर्थ: हे भाई! (वैसे तो अपने अंदर की फिटकार को) वही मनुष्य जानता है जिसके हृदय में ये (बखीली वाली दशा) घटित होती है। (पर) तुम जगत के गुरु नानक (पातशाह) को पूछ के विचार के देखो (ये यकीन जानो कि) जगत के आरम्भ से ले के युगों की शुरुवात से ले के, कभी भी किसी मनुष्य ने (महां पुरुषों के साथ) ईष्या से (आत्मिक जीवन का धन) नहीं पाया। (महापुरुषों से) सेवक-भावना रखने से ही (संसार-समुंदर से) पार-उतारा होता है।4।2।9।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ४ ॥ जिथै हरि आराधीऐ तिथै हरि मितु सहाई ॥ गुर किरपा ते हरि मनि वसै होरतु बिधि लइआ न जाई ॥१॥

मूलम्

सूही महला ४ ॥ जिथै हरि आराधीऐ तिथै हरि मितु सहाई ॥ गुर किरपा ते हरि मनि वसै होरतु बिधि लइआ न जाई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मितु = मित्र। सहाई = मददगार। ते = से। मनि = मन में। होरतु बिधि = और किसी तरीके से। (होरतु = और के द्वारा। जितु = जिसके द्वारा। जितु = उसके द्वारा)।1।
अर्थ: हे भाई! जिस भी जगह परमात्मा की आराधना की जाए, वह मित्र परमात्मा वहीं आ के मददगार बनता है। (पर वह) परमात्मा गुरु की कृपा से (ही मनुष्य के) मन में बस सकता है, किसी भी और तरीके से उसको पाया नहीं जा सकता।1।

[[0734]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि धनु संचीऐ भाई ॥ जि हलति पलति हरि होइ सखाई ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

हरि धनु संचीऐ भाई ॥ जि हलति पलति हरि होइ सखाई ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: संचीऐ = इकट्ठा करना चाहिए। भाई = हे भाई!। जि हरि = जो हरि!। हलति = इस लोक में। पलति = परलोक में। सखाई = मित्र।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! जो हरि इस लोक में और परलोक में मित्र बनता है, उसका नाम-धन इकट्ठा करना चाहिए।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सतसंगती संगि हरि धनु खटीऐ होर थै होरतु उपाइ हरि धनु कितै न पाई ॥ हरि रतनै का वापारीआ हरि रतन धनु विहाझे कचै के वापारीए वाकि हरि धनु लइआ न जाई ॥२॥

मूलम्

सतसंगती संगि हरि धनु खटीऐ होर थै होरतु उपाइ हरि धनु कितै न पाई ॥ हरि रतनै का वापारीआ हरि रतन धनु विहाझे कचै के वापारीए वाकि हरि धनु लइआ न जाई ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: संगि = साथ। सत संगती संगि = सत्संगियों से (मिल के)। खटीऐ = कमाया जा सकता है। होरथै = किसी और जगह। होरतु उपाइ = किसी और प्रयत्न से। कितै = किसी भी जगह। विहाझे = खरीदता है। कचै के वापारीए = कच्ची चीजों का व्यापार करने वाले (कच्चा समान ही पाते हैं)। वाकि = (उनके) वाक से, (उनकी) शिक्षा से।2।
अर्थ: हे भाई! सत्संगियों के साथ (मिल के) परमात्मा का नाम-धन कमाया जा सकता है, (सत्संग के बिना) किसी भी और जगह, किसी भी अन्य प्रयासों से (अगर) नाम-धन खरीदता है, (तो) नाशवान चीजों के (कच्ची चीजों के) के व्यापारी (मायावी पदार्थ ही अर्थात कच्ची चीजें ही खरीदते हैं उनकी) शिक्षा से हरि-नाम-धन प्राप्त नहीं किया जा सकता।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि धनु रतनु जवेहरु माणकु हरि धनै नालि अम्रित वेलै वतै हरि भगती हरि लिव लाई ॥ हरि धनु अम्रित वेलै वतै का बीजिआ भगत खाइ खरचि रहे निखुटै नाही ॥ हलति पलति हरि धनै की भगता कउ मिली वडिआई ॥३॥

मूलम्

हरि धनु रतनु जवेहरु माणकु हरि धनै नालि अम्रित वेलै वतै हरि भगती हरि लिव लाई ॥ हरि धनु अम्रित वेलै वतै का बीजिआ भगत खाइ खरचि रहे निखुटै नाही ॥ हलति पलति हरि धनै की भगता कउ मिली वडिआई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जवेहरु = जवाहर। माणकु = मोती। अंम्रित वेलै = आत्मिक जीवन देने वाले समय में। वतै = वतर के समय। हरि भगती = हरि के भक्तों ने। लिव = लगन। लिव लाई = तवज्जो जोड़ी। निखुटै = खत्म होता। हलति = इस लोक में। पलति = परलोक में। कउ = को।3।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा का नाम (भी) धन (है, ये धन) रत्न-जवाहर-मोती (जैसा कीमती) है। प्रभु के भक्तों ने वत्र के वक्त उठ के अमृत बेला में उठ के (उस वक्त उठ के जब आत्मिक जीवन अंकुरित होता है) इस हरि-नाम-धन से तवज्जो जोड़ी होती है। अमृत बेला में (उठ के) बीजा हुआ ये हरि-नाम-धन भक्त जन खुद इस्तेमाल करते रहते हैं, और लोगों कोबाँटते रहते हैं, पर ये खत्म नहीं होता। भक्त जनों को इस लोक में परलोक में इस हरि-नाम-धन के कारण इज्जत मिलती है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि धनु निरभउ सदा सदा असथिरु है साचा इहु हरि धनु अगनी तसकरै पाणीऐ जमदूतै किसै का गवाइआ न जाई ॥ हरि धन कउ उचका नेड़ि न आवई जमु जागाती डंडु न लगाई ॥४॥

मूलम्

हरि धनु निरभउ सदा सदा असथिरु है साचा इहु हरि धनु अगनी तसकरै पाणीऐ जमदूतै किसै का गवाइआ न जाई ॥ हरि धन कउ उचका नेड़ि न आवई जमु जागाती डंडु न लगाई ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: असथिरु = सदा कायम रहने वाला। साचा = सदा टिके रहने वाला। तसकर = चोर। उचका = उठा के ले जाने वाला, लुटेरा। जागाती = मसूलिया। डंडु = दण्ड।4।
अर्थ: हे भाई! जिस हरि-नाम-धन को किसी किस्म का कोई खतरा नहीं, ये सदा ही कायम रहने वाला है, सदा ही टिका रहता है। आग-चोर-पानी-मौत, किसी के द्वारा भी इस धन का नुकसान नहीं किया जा सकता। कोई लुटेरा इस हरि-नाम-धन के नजदीक नहीं फटक सकता। जम मसूलिया इस धन को महसूल नहीं लगा सकता।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

साकती पाप करि कै बिखिआ धनु संचिआ तिना इक विख नालि न जाई ॥ हलतै विचि साकत दुहेले भए हथहु छुड़कि गइआ अगै पलति साकतु हरि दरगह ढोई न पाई ॥५॥

मूलम्

साकती पाप करि कै बिखिआ धनु संचिआ तिना इक विख नालि न जाई ॥ हलतै विचि साकत दुहेले भए हथहु छुड़कि गइआ अगै पलति साकतु हरि दरगह ढोई न पाई ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साकती = परमात्मा से टूटे हुए मनुष्यों ने। बिखिआ = माया। संचिआ = इकट्ठा किया, जोड़ा। विख = कदम। दुहेले = दुखी। साकत = माया ग्रसित मनुष्य। हथहु = हाथ में से। छुड़कि = छूट गया। अगै पलति = आगे परलोक में। साकतु = माया ग्रसित मनुष्य (एकवचन)। ढोई = आसरा।5।
अर्थ: हे भाई! माया-ग्रसित मनुष्यों ने (सदा) पाप कर-करके माया-धन ही जोड़ा, (पर) उनके साथ (जगत से चलने के वक्त) ये धन एक कदम भी साथ नहीं निभा सका। (इस माया धन के कारण) माया-ग्रसित लोग इस लोक में दुखी ही रहे (मरने के वक्त ये धन) हाथों से छिन गया, आगे परलोक में जा के माया-ग्रसित मनुष्य को परमात्मा की हजूरी में कोई जगह नहीं मिलती।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

इसु हरि धन का साहु हरि आपि है संतहु जिस नो देइ सु हरि धनु लदि चलाई ॥ इसु हरि धनै का तोटा कदे न आवई जन नानक कउ गुरि सोझी पाई ॥६॥३॥१०॥

मूलम्

इसु हरि धन का साहु हरि आपि है संतहु जिस नो देइ सु हरि धनु लदि चलाई ॥ इसु हरि धनै का तोटा कदे न आवई जन नानक कउ गुरि सोझी पाई ॥६॥३॥१०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साहु = शाहू, सरामाए का मालिक। संतहु = हे संत जनो! देइ = देता है। लदि = लाद के। तोटा = कमी। आवई = आए। गुरि = गुरु ने। जन कउ = अपने दास को। नानक = हे नानक!।6।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जिस नो’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे संत जनो! इस हरि-नाम-धन का मालिक परमात्मा स्वयं ही है। जिस मनुष्य को शाहूकार-प्रभु ये धन देता है, वह मनुष्य (इस जगत में) ये हरि-नाम-सौदा कमा के यहाँ से चलता है। हे नानक! (कह: हे भाई!) इस हरि-नाम-धन के व्यापार में कभी घाटा नहीं पड़ता। गुरु ने अपने सेवक को ये बात अच्छी तरह समझा दी है।6।3।10।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ४ ॥ जिस नो हरि सुप्रसंनु होइ सो हरि गुणा रवै सो भगतु सो परवानु ॥ तिस की महिमा किआ वरनीऐ जिस कै हिरदै वसिआ हरि पुरखु भगवानु ॥१॥

मूलम्

सूही महला ४ ॥ जिस नो हरि सुप्रसंनु होइ सो हरि गुणा रवै सो भगतु सो परवानु ॥ तिस की महिमा किआ वरनीऐ जिस कै हिरदै वसिआ हरि पुरखु भगवानु ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सुप्रसंनु = अच्छी तरह खुश। रवै = याद करता है। परवानु = स्वीकार। महिमा = बड़ाई। वरनीऐ = बयान की जाए। कै हिरदै = के हृदय में।1।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जिस नो, जिस कै, तिस की, जिस ते, तिस का’ में से शब्द ‘जिसु’, ‘तिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘नो’ ‘कै’ ‘की’ ‘का’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य पर परमात्मा अच्छी तरह खुश होता है, वह मनुष्य परमात्मा के गुण गाता है, वह मनुष्य (उसकी नजरों में) भक्त है (उसके दर पर) स्वीकार है। हे भाई! जिस मनुष्य के हृदय में भगवान पुरुष आ बसता है, उसकी महिमा बयान नहीं की जा सकती।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गोविंद गुण गाईऐ जीउ लाइ सतिगुरू नालि धिआनु ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

गोविंद गुण गाईऐ जीउ लाइ सतिगुरू नालि धिआनु ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गाईऐ = आओ गाएं। जीउ लाइ = जी लगा के, चित जोड़ के।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! आओ, चिक्त जोड़ के, गुरु (की वाणी) से तवज्जो जोड़ के, परमात्मा की महिमा के गीत गाया करें।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सो सतिगुरू सा सेवा सतिगुर की सफल है जिस ते पाईऐ परम निधानु ॥ जो दूजै भाइ साकत कामना अरथि दुरगंध सरेवदे सो निहफल सभु अगिआनु ॥२॥

मूलम्

सो सतिगुरू सा सेवा सतिगुर की सफल है जिस ते पाईऐ परम निधानु ॥ जो दूजै भाइ साकत कामना अरथि दुरगंध सरेवदे सो निहफल सभु अगिआनु ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सफल = कामयाब। ते = से। निधान = खजाना। दूजै भाइ = माया के प्यार में। कामना अरथि = मन की वासना की खातिर। दुरगंध = विषौ विकार। अगिआनु = आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझी।2।
अर्थ: हे भाई! वह गुरु (ऐसा समर्थ है) कि उसकी तरफ से सबसे ऊँचा खजाना मिल जाता है, उस गुरु की बताई हुई वह सेवा भी फल लाती है। जो माया-ग्रसित मनुष्य माया के प्यार में (फंस के) मन की वासनाएं (पूरी करने) की खातिर किसी विषौ-विकारों में लगे रहते हैं, वे जीवन व्यर्थ गवा लेते हैं, उनका सारा जीवन ही आत्मिक जीवन की ओर से बे-समझी है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जिस नो परतीति होवै तिस का गाविआ थाइ पवै सो पावै दरगह मानु ॥ जो बिनु परतीती कपटी कूड़ी कूड़ी अखी मीटदे उन का उतरि जाइगा झूठु गुमानु ॥३॥

मूलम्

जिस नो परतीति होवै तिस का गाविआ थाइ पवै सो पावै दरगह मानु ॥ जो बिनु परतीती कपटी कूड़ी कूड़ी अखी मीटदे उन का उतरि जाइगा झूठु गुमानु ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: परतीति = श्रद्धा, निश्चय। थाइ पवै = स्वीकार होता है। मानु = आदर। कपटी = फरेबी। कूड़ी कूड़ी = झूठ मूठ। गुमानु = मान, अहंकार।3।
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य को (गुरु पर) श्रद्धा होती है, उसका हरि-यश गाना (हरि की हजूरी में) स्वीकार पड़ता है; वह मनुष्य परमात्मा की दरगाह में आदर पाता है। पर जो फरेबी मनुष्य (गुरु पर) ऐतबार किए बिना झूठ-मूठ ही आँखें बँद करते हैं (जैसे, समाधि लगा के बैठे हों) उनका (अपनी उच्चता के बारे में) झूठा अहंकार (आखिर) उतर जाएगा।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जेता जीउ पिंडु सभु तेरा तूं अंतरजामी पुरखु भगवानु ॥ दासनि दासु कहै जनु नानकु जेहा तूं कराइहि तेहा हउ करी वखिआनु ॥४॥४॥११॥

मूलम्

जेता जीउ पिंडु सभु तेरा तूं अंतरजामी पुरखु भगवानु ॥ दासनि दासु कहै जनु नानकु जेहा तूं कराइहि तेहा हउ करी वखिआनु ॥४॥४॥११॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जीउ = जिंद। पिंडु = शरीर। अंतरजामी = सबके दिल की जानने वाला। दासनि दासु = दासों का दास। वखिआनु = बयान। करी = मैं करता हूँ।4।
अर्थ: हे प्रभु! जितना भी (जीवों के) जिंद-शरीर हैं ये सभ तेरा ही दिया हुआ है, तू सबके दिल की जानने वाला सर्व-व्यापक प्रभु है। हे प्रभु! तेरे दासों का दास नानक कहता है: (हे प्रभु!) तू जो कुछ मुझसे कहलवाता है, मैं वही कुछ कहता हूँ।4।4।11।

[[0735]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ४ घरु ७ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

सूही महला ४ घरु ७ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तेरे कवन कवन गुण कहि कहि गावा तू साहिब गुणी निधाना ॥ तुमरी महिमा बरनि न साकउ तूं ठाकुर ऊच भगवाना ॥१॥

मूलम्

तेरे कवन कवन गुण कहि कहि गावा तू साहिब गुणी निधाना ॥ तुमरी महिमा बरनि न साकउ तूं ठाकुर ऊच भगवाना ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कवन कवन = कौन कौन से? कहि कहि = कह कह के। गावा = गाऊँ। साहिब = मालिक। गुणी निधाना = गुणों का खजाना। महिमा = उपमा, बड़ाई। बरनि न साकउ = मैं बयान नहीं कर सकता।1।
अर्थ: हे सबसे ऊँचे भगवान! तू सबका मालिक है, तू सारे गुणों का खजाना है, तू सबको पालने वाला है। मैं तेरे कौन-कौन से गुण बता के तेरी महिमा कर सकता हूँ? मैं तेरी महिमा बयान नहीं कर सकता।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मै हरि हरि नामु धर सोई ॥ जिउ भावै तिउ राखु मेरे साहिब मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मै हरि हरि नामु धर सोई ॥ जिउ भावै तिउ राखु मेरे साहिब मै तुझ बिनु अवरु न कोई ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मै = मेरे वास्ते। धर = आसरा। अवरु = और।1। रहाउ।
अर्थ: हे हरि! मेरे वास्ते तेरा वह नाम ही सहारा है। हे मेरे मालिक! जैसे तुझे अच्छा लगे वैसे मेरी रक्षा कर तेरे बिना मेरा और कोई (सहारा) नहीं है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मै ताणु दीबाणु तूहै मेरे सुआमी मै तुधु आगै अरदासि ॥ मै होरु थाउ नाही जिसु पहि करउ बेनंती मेरा दुखु सुखु तुझ ही पासि ॥२॥

मूलम्

मै ताणु दीबाणु तूहै मेरे सुआमी मै तुधु आगै अरदासि ॥ मै होरु थाउ नाही जिसु पहि करउ बेनंती मेरा दुखु सुखु तुझ ही पासि ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ताणु = बल। दीबाणु = सहारा। पहि = पास। करउ = मैं करूँ। पासे = पास।2।
अर्थ: हे मेरे मालिक! तू ही मेरे वास्ते बल है, तू ही मेरे वास्ते आसरा है। मैं तेरे आगे ही आरजू कर सकता हूँ। मेरे लिए कोई और ऐसी जगह नहीं, जिसके पास मैं विनती कर सकूँ। मैं अपना हरेक सुख हरेक दुख तेरे सामने ही रख सकता हूँ।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

विचे धरती विचे पाणी विचि कासट अगनि धरीजै ॥ बकरी सिंघु इकतै थाइ राखे मन हरि जपि भ्रमु भउ दूरि कीजै ॥३॥

मूलम्

विचे धरती विचे पाणी विचि कासट अगनि धरीजै ॥ बकरी सिंघु इकतै थाइ राखे मन हरि जपि भ्रमु भउ दूरि कीजै ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: विचे पाणी = (पानी के) बीच ही। विचे धरती = (धरती के) बीच ही। कासट = काठ, लकड़ी। धरीजै = धरी हुई है। सिंघु = शेर। इक तै थाइ = एक ही जगह में। मन = हे मन!।3।
अर्थ: हे मेरे मन! देख, (पानी के) बीच में ही धरती है, (धरती के) बीच में ही पानी है, लकड़ी में आग रखी हुई है, (मालिक प्रभु ने, मानो) शेर और बकरी एक ही जगह रखे हुए हैं। हे मन! (तू डरता क्यों है? ऐसी शक्ति वाले) परमात्मा का नाम जप के तू अपना हरेक डर-भ्रम दूर कर लिया कर।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि की वडिआई देखहु संतहु हरि निमाणिआ माणु देवाए ॥ जिउ धरती चरण तले ते ऊपरि आवै तिउ नानक साध जना जगतु आणि सभु पैरी पाए ॥४॥१॥१२॥

मूलम्

हरि की वडिआई देखहु संतहु हरि निमाणिआ माणु देवाए ॥ जिउ धरती चरण तले ते ऊपरि आवै तिउ नानक साध जना जगतु आणि सभु पैरी पाए ॥४॥१॥१२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: चरण तले ते = पैरों के नीचे। आणि = ला के। सभु जगतु = सारा संसार।4।
अर्थ: हे संत जनो! देखो परमात्मा की बड़ी ताकत! परमात्मा उनको आदर दिलवाता है, जिनकी कोई इज्जत नहीं करता था। हे नानक! जैसे धरती (मनुष्य के) पैरों के नीचे से (मौत आने से उसके) ऊपर आ जाती है, वैसे ही परमात्मा सारे जगत को ला के साधु-जनों के चरणों में डाल देता है।4।1।12।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘घरु ७’ के नए संग्रह का ये पहला शब्द है।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ४ ॥ तूं करता सभु किछु आपे जाणहि किआ तुधु पहि आखि सुणाईऐ ॥ बुरा भला तुधु सभु किछु सूझै जेहा को करे तेहा को पाईऐ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ४ ॥ तूं करता सभु किछु आपे जाणहि किआ तुधु पहि आखि सुणाईऐ ॥ बुरा भला तुधु सभु किछु सूझै जेहा को करे तेहा को पाईऐ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: करता = सृष्टि रचने वाला। सभु किछु = हरेक बात। जाणहि = तू जानता है। पहि = पास। आखि = कह के। सूझै = पता लग जाता है। को = कोई जीव। पाईऐ = फल पा लेता है।1।
अर्थ: हे प्रभु! तू (सारी सृष्टि को) पैदा करने वाला है, (अपनी सारी सृष्टि की बाबत) हरेक बात तू खुद ही जानता है। तुझसे कोई बात छुपी नहीं (इस वास्ते) तुझे कौन सी बात कह के सुनाई जाए। हरेक जीव की बुराई और भलाई का तुझे खुद ही पता लग जाता है। (इसी लिए) जैसा कर्म कोई जीव करता है, वह वैसा ही फल पा लेता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे साहिब तूं अंतर की बिधि जाणहि ॥ बुरा भला तुधु सभु किछु सूझै तुधु भावै तिवै बुलावहि ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे साहिब तूं अंतर की बिधि जाणहि ॥ बुरा भला तुधु सभु किछु सूझै तुधु भावै तिवै बुलावहि ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साहिब = हे मालिक! अंतर की बिधि = (हरेक के) अंदर की हालत। तुधु भावै = जैसे तुझे ठीक लगता है। बुलावहि = तू बुलाता है।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मालिक! तू (हरेक जीव के) अंदर की हालत जानता है। किसी के अंदर बुराई है, किसी के अंदर भलाई, तुझे हरेक बात का पता चल जाता है। जैसे तुझे अच्छा लगता है, वैसे ही तू (हरेक जीव को अच्छे या बुरे नाम से) बुलाता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सभु मोहु माइआ सरीरु हरि कीआ विचि देही मानुख भगति कराई ॥ इकना सतिगुरु मेलि सुखु देवहि इकि मनमुखि धंधु पिटाई ॥२॥

मूलम्

सभु मोहु माइआ सरीरु हरि कीआ विचि देही मानुख भगति कराई ॥ इकना सतिगुरु मेलि सुखु देवहि इकि मनमुखि धंधु पिटाई ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सभु = सारा। कीआ = बनाया हुआ। देही = शरीर। कराई = कराता है। मेलि = मिला के। देवहि = तू देता है (हे प्रभु!)। इकि = कई, बहुत। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाले। धंधु पिटाई = धंधा रुलवाता है, माया के मोह में फसाए रखता है।2।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘इकि’ है ‘इक/एक’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! माया का सारा मोह परमात्मा ने बनाया है, हरेक शरीर भी प्रभु ने ही बनाया है। मनुष्य शरीर में भक्ति भी प्रभु खुद ही करवाता है। हे प्रभु! कई जीवों को तू गुरु मिलवा के आनंद बख्शता है। हे भाई! अनेक जीव ऐसे हैं जो अपने मन के पीछे चलते हैं, उनको वह खुद ही माया में फसाए रखता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सभु को तेरा तूं सभना का मेरे करते तुधु सभना सिरि लिखिआ लेखु ॥ जेही तूं नदरि करहि तेहा को होवै बिनु नदरी नाही को भेखु ॥३॥

मूलम्

सभु को तेरा तूं सभना का मेरे करते तुधु सभना सिरि लिखिआ लेखु ॥ जेही तूं नदरि करहि तेहा को होवै बिनु नदरी नाही को भेखु ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सभु को = हरेक जीव। करते = हे कर्तार! तुधु = तू। सिरि = सिर पर। नदरि = निगाह, दृष्टि। को भेखु = कोई भी भेख, कोई भी स्वरूप, कोई भी जीव।3।
अर्थ: हे मेरे कर्तार! हरेक जीव तेरा (पैदा किया हुआ) है, तू सभ जीवों का (पति) है। सब जीवों के सिर पर तूने ही (मेहनत-कमाई का) लेख लिखा हुआ है। उस लेख (के अनुसार) जैसी निगाह तू किसी जीव पर करता है वैसा ही वह बन जाता है। (चाहे कोई अच्छा है, चाहे कोई बुरा है) तेरी निगाह के बिना कोई भी जीव (अच्छा या बुरा) नहीं (बना)।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तेरी वडिआई तूंहै जाणहि सभ तुधनो नित धिआए ॥ जिस नो तुधु भावै तिस नो तूं मेलहि जन नानक सो थाइ पाए ॥४॥२॥१३॥

मूलम्

तेरी वडिआई तूंहै जाणहि सभ तुधनो नित धिआए ॥ जिस नो तुधु भावै तिस नो तूं मेलहि जन नानक सो थाइ पाए ॥४॥२॥१३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सभ = सारी दुनिया। तुधु भावै = तेरी रजा हो। थाइ पाए = स्वीकार होता है।4।
अर्थ: हे दास नानक (कह:) हे मेरे कर्तार! तू कितना बड़ा है; इस बात को तू खुद ही जानता है। सारी दुनिया सदा तेरा ध्यान धरती है। जिसे तू चाहता है उसको (अपने चरणों में) तू जोड़ लेता है। वह मनुष्य (तेरी दरगाह में) स्वीकार हो जाता है।4।2।13।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ४ ॥ जिन कै अंतरि वसिआ मेरा हरि हरि तिन के सभि रोग गवाए ॥ ते मुकत भए जिन हरि नामु धिआइआ तिन पवितु परम पदु पाए ॥१॥

मूलम्

सूही महला ४ ॥ जिन कै अंतरि वसिआ मेरा हरि हरि तिन के सभि रोग गवाए ॥ ते मुकत भए जिन हरि नामु धिआइआ तिन पवितु परम पदु पाए ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कै अंतरि = के अंदर, के हृदय में। सभि = सारे। ते = वह मनुष्य (बहुवचन)। मुकत = रोगों से स्वतंत्र। परम पदु = सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा। पाए = पाया, पा लिया।1।
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्यों के हृदय में मेरा हरि-प्रभु आ बसता है, उनके वह हरि सारे रोग दूर कर देता है। हे भाई! जिस मनुष्यों ने परमात्मा का नाम स्मरण किया, वह (अहंकार आदि जैसे रोगों से) स्वतंत्र हो गए, उन्होंने सबसे ऊँचा आत्मिक पवित्र दर्जा हासिल कर लिया।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे राम हरि जन आरोग भए ॥ गुर बचनी जिना जपिआ मेरा हरि हरि तिन के हउमै रोग गए ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे राम हरि जन आरोग भए ॥ गुर बचनी जिना जपिआ मेरा हरि हरि तिन के हउमै रोग गए ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मेरे राम हरि जन = मेरे राम के हरि जन। आरोग = रोग रहित।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! मेरे राम के, मेरे हरि के, दास (अहंकार आदि से) नरोए हो गए हैं। जिस मनुष्यों ने गुरु के वचनों पर चल के मेरे हरि प्रभु का नाम जपा उनके अहंकार (आदि) रोग दूर हो गए।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ब्रहमा बिसनु महादेउ त्रै गुण रोगी विचि हउमै कार कमाई ॥ जिनि कीए तिसहि न चेतहि बपुड़े हरि गुरमुखि सोझी पाई ॥२॥

मूलम्

ब्रहमा बिसनु महादेउ त्रै गुण रोगी विचि हउमै कार कमाई ॥ जिनि कीए तिसहि न चेतहि बपुड़े हरि गुरमुखि सोझी पाई ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: महा देउ = शिव। त्रै गुण = माया के तीन गुणों के प्रभाव के कारण। कमाई = कीती। जिनि = जिस (परमात्मा) ने। तिसहि = उसको ही। न चेतहि = नहीं चेतते। बपुड़े = विचारे। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ने से।2।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘तिसहि’ में ‘तिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘ही’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: (हे भाई! पुराणों की बताई साखियों के अनुसार) माया के तीन गुणों के प्रभाव के कारण (बड़े देवते) ब्रहमा, विष्णु, शिव (भी) रोगी ही रहे, (क्योंकि उन्होंने भी) अहंकार में ही कर्म किए। जिस परमात्मा ने उनको पैदा किया था, उसे उन बेचारों ने याद नहीं किया। हे भाई! परमात्मा की सूझ (तो) गुरु की शरण पड़ने से ही मिल सकती है।2।

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विश्वास-प्रस्तुतिः

हउमै रोगि सभु जगतु बिआपिआ तिन कउ जनम मरण दुखु भारी ॥ गुर परसादी को विरला छूटै तिसु जन कउ हउ बलिहारी ॥३॥

मूलम्

हउमै रोगि सभु जगतु बिआपिआ तिन कउ जनम मरण दुखु भारी ॥ गुर परसादी को विरला छूटै तिसु जन कउ हउ बलिहारी ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रोगि = रोग में। बिआपिआ = फसा हुआ। परसादी = कृपा से। को = कोई मनुष्य। हउ = मैं। बलिहारी = सदके।3।
अर्थ: हे भाई! सारा जगत अहंकार के रोग में फसा रहता है (और, अहंकार में फसे हुए) उन मनुष्यों को जन्म-मरण के चक्कर का बहुत सारा दुख लगा रहता है। कोई विरला मनुष्य गुरु की कृपा से (इस अहंम् रोग से) खलासी पाता है। मैं (ऐसे) उस मनुष्य के सदके जाता हूँ।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जिनि सिसटि साजी सोई हरि जाणै ता का रूपु अपारो ॥ नानक आपे वेखि हरि बिगसै गुरमुखि ब्रहम बीचारो ॥४॥३॥१४॥

मूलम्

जिनि सिसटि साजी सोई हरि जाणै ता का रूपु अपारो ॥ नानक आपे वेखि हरि बिगसै गुरमुखि ब्रहम बीचारो ॥४॥३॥१४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सिसटि = दुनिया। साजी = पैदा की हुई। ता का = उस (परमात्मा) का। अपारो = अपार, जिसका दूसरा छोर ना दिखे। आपे = खुद ही। वेखि = देख के। विगसै = खुश होता है। ब्रहम बीचारो = परमात्मा के गुणों की विचार।4।
अर्थ: हे भाई! जिस परमात्मा ने ये सारी सृष्टि पैदा की है, वह खुद ही (इसके रोग को) जानता है (और, दूर करता है)। उस परमात्मा का स्वरूप किसी भी हदबंदी से परे है। हे नानक! वह परमात्मा खुद ही (अपनी रची सृष्टि को) देख के खुश होता है। गुरु की शरण पड़ कर ही परमात्मा के गुणों की समझ आती है।4।3।14।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ४ ॥ कीता करणा सरब रजाई किछु कीचै जे करि सकीऐ ॥ आपणा कीता किछू न होवै जिउ हरि भावै तिउ रखीऐ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ४ ॥ कीता करणा सरब रजाई किछु कीचै जे करि सकीऐ ॥ आपणा कीता किछू न होवै जिउ हरि भावै तिउ रखीऐ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रजाई = रजा के मालिक प्रभु ने। कीचै = (हम) करें। भावै = अच्छा लगता है।1।
अर्थ: हे भाई! जो कुछ जगत में बना है जो कुछ कर रहा है, ये सब रजा का मालिक परमात्मा कर रहा है। हम जीव (तब ही) कुछ करें, अगर कुछ कर सकते हों। हम जीवों का किया कुछ नहीं हो सकता। जैसे परमात्मा को अच्छा लगता है, वैसे जीवों को रखता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे हरि जीउ सभु को तेरै वसि ॥ असा जोरु नाही जे किछु करि हम साकह जिउ भावै तिवै बखसि ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे हरि जीउ सभु को तेरै वसि ॥ असा जोरु नाही जे किछु करि हम साकह जिउ भावै तिवै बखसि ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: वसि = वश में।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे प्रभु जी! हरेक जीव तेरे बस में हैं। हम जीवों में को समर्थता नहीं कि (तुझसे परे) कुछ कर सकें। हे प्रभु! तुझे जैसे अच्छा लगे, हम पर मेहर कर।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सभु जीउ पिंडु दीआ तुधु आपे तुधु आपे कारै लाइआ ॥ जेहा तूं हुकमु करहि तेहे को करम कमावै जेहा तुधु धुरि लिखि पाइआ ॥२॥

मूलम्

सभु जीउ पिंडु दीआ तुधु आपे तुधु आपे कारै लाइआ ॥ जेहा तूं हुकमु करहि तेहे को करम कमावै जेहा तुधु धुरि लिखि पाइआ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जीउ = जिंद। पिंडु = शरीर। कारै = काम में। को = कोई जीव। धुरि = धुर दरगाह से। लिखि = लिखके।2।
अर्थ: हे प्रभु! ये जिंद, ये शरीर, सब कुछ (हरेक जीव को) तूने खुद ही दिया है, तूने स्वयं ही (हरेक जीव को) काम में लगाया हुआ है। जैसा हुक्म तू करता है, जीव वैसा ही काम करता है (जीव वैसा ही बनता है) जैसा तूने धुर-दरगाह से (उसके माथे पर) लेख लिख के रख दिया है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पंच ततु करि तुधु स्रिसटि सभ साजी कोई छेवा करिउ जे किछु कीता होवै ॥ इकना सतिगुरु मेलि तूं बुझावहि इकि मनमुखि करहि सि रोवै ॥३॥

मूलम्

पंच ततु करि तुधु स्रिसटि सभ साजी कोई छेवा करिउ जे किछु कीता होवै ॥ इकना सतिगुरु मेलि तूं बुझावहि इकि मनमुखि करहि सि रोवै ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पंच ततु = (हवा, पानी, आग, धरती, आकाश)। सभ = सारी। करिउ = बेशक कर देखो। मेलि = मिला के। बुझावहि = समझ बख्शता है। इकि = कई, बहुत। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाले। करहि = तू बना देता है। सि = वह मनुष्य (एकवचन)। रोवै = दुखी होता है।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘करिउ’ है हुकमी भविष्यत, अन्नपुरख, एकवचन।
नोट: ‘इकि’ है ‘इक/एक’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे प्रभु! तूने पाँच तत्व बना के सारी दुनिया पैदा की है। अगर (तुझसे बाहर) जीव से कुछ हो सकता हो, तो वह बेशक छेवाँ तत्व (ही) बना कर दिखा दे। हे प्रभु! कई जीवों को तू गुरु मिला के आत्मिक जीवन की सूझ बख्शता है। कई जीवों को तू अपने मन के पीछे चलने वाला बना देता है। फिर वह (अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य) दुखी होता रहता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि की वडिआई हउ आखि न साका हउ मूरखु मुगधु नीचाणु ॥ जन नानक कउ हरि बखसि लै मेरे सुआमी सरणागति पइआ अजाणु ॥४॥४॥१५॥२४॥

मूलम्

हरि की वडिआई हउ आखि न साका हउ मूरखु मुगधु नीचाणु ॥ जन नानक कउ हरि बखसि लै मेरे सुआमी सरणागति पइआ अजाणु ॥४॥४॥१५॥२४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हउ = मैं। नीचाणु = छोटा। मुगधु = मूर्ख। कउ = को। सुआमी = हे स्वामी!।4।
अर्थ: हे भाई! मैं (तो) मूर्ख हूँ, नीच जीवन वाला हूँ, मैं परमात्मा की प्रतिभा बयान नहीं कर सकता। हे हरि! दास नानक पर मेहर कर, (ये) अंजान दास तेरी शरण आ पड़ा है।4।4।15।24।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला ५ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला ५ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

बाजीगरि जैसे बाजी पाई ॥ नाना रूप भेख दिखलाई ॥ सांगु उतारि थम्हिओ पासारा ॥ तब एको एकंकारा ॥१॥

मूलम्

बाजीगरि जैसे बाजी पाई ॥ नाना रूप भेख दिखलाई ॥ सांगु उतारि थम्हिओ पासारा ॥ तब एको एकंकारा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बाजीगर = बाजीगर ने। नाना रूप = अनेक रूप। सांगु = नकली शकल। उतारि = उतार के। थंम्हिओ = रोक दिया। पासारा = खेल का खिलारा। एकंकार = परमात्मा।1।
अर्थ: हे भाई! जैसे किसी बाजीगर ने (कभी) बाजी डाल के दिखाई हो, वह कई किस्मों के रूप और भेस दिखाता है (इसी तरह परमात्मा ने ये जगत-तमाशा रचा हुआ है। इसमें अनेक रूप और भेस दिखा रहा है)। जब प्रभु अपनी ये (जगत-रूपी) नकली-शक्ल उतार के खेल का पसारा रोक देता है, तब स्वयं ही स्वयं रह जाता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कवन रूप द्रिसटिओ बिनसाइओ ॥ कतहि गइओ उहु कत ते आइओ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

कवन रूप द्रिसटिओ बिनसाइओ ॥ कतहि गइओ उहु कत ते आइओ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कवन रूप = कौन कौन से रूप? अनेक रूप। द्रिसटिओ = दिखा। बिनसाइओ = नाश हुआ। कतहि = कहाँ? उहु = जीव। कत ते = कहाँ से?।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (परमात्मा के) अनेक ही रूप दिखते रहते हैं, अनेक ही रूप नाश होते रहते हैं। (कोई नहीं बता सकता है कि) जीव कहाँ से आया था, और कहाँ चला जाता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जल ते ऊठहि अनिक तरंगा ॥ कनिक भूखन कीने बहु रंगा ॥ बीजु बीजि देखिओ बहु परकारा ॥ फल पाके ते एकंकारा ॥२॥

मूलम्

जल ते ऊठहि अनिक तरंगा ॥ कनिक भूखन कीने बहु रंगा ॥ बीजु बीजि देखिओ बहु परकारा ॥ फल पाके ते एकंकारा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ते = से। उठहि = उठते हैं। तरंग = लहरों। कनिक = सोना। भूखन = गहने। कीने = बनाए जाते हैं। बीजि = बीज के। फल पाके ते = फल पकने से।2।
अर्थ: हे भाई! पानी से अनेक लहरें उठती हैं (दोबारा पानी में मिल जाती हैं)। सोने से कई किस्मों के गहने घड़े जाते हैं (वे असल में होते तो सोना ही हैं)। (किसी वृक्ष का) बीज बीज के (शाखा-पत्ते आदि उसके) कई किस्मों में स्वरूप देखने को मिलता है। (वृक्ष के) फल पकने पर (वही पहली किस्म का बीज बन जाता है) (वैसे ही इस बहुरंगी संसार का असल) एक परमात्मा ही है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सहस घटा महि एकु आकासु ॥ घट फूटे ते ओही प्रगासु ॥ भरम लोभ मोह माइआ विकार ॥ भ्रम छूटे ते एकंकार ॥३॥

मूलम्

सहस घटा महि एकु आकासु ॥ घट फूटे ते ओही प्रगासु ॥ भरम लोभ मोह माइआ विकार ॥ भ्रम छूटे ते एकंकार ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सहस = हजारों। घट = घड़ा। घट फूटे ते = घड़े के टूटने से। भरम = भटकना।3।
अर्थ: हे भाई! एक ही आकाश (पानी से भरे हुए) हजारों घड़ों में (अलग-अलग दिखता है)। जब घड़े टूट जाते हैं, तो वह (आकाश) ही दिखाई देता रह जाता है। माया के भ्रम के कारण (परमात्मा की अंश जीवात्मा में) भटकना, लोभ-मोह आदि विकार उठते हैं। भ्रम मिट जाने के कारण एक परमात्मा का ही रूप हो जाता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ओहु अबिनासी बिनसत नाही ॥ ना को आवै ना को जाही ॥ गुरि पूरै हउमै मलु धोई ॥ कहु नानक मेरी परम गति होई ॥४॥१॥

मूलम्

ओहु अबिनासी बिनसत नाही ॥ ना को आवै ना को जाही ॥ गुरि पूरै हउमै मलु धोई ॥ कहु नानक मेरी परम गति होई ॥४॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अबिनासी = नाश रहित। को = कोई जीव। आवै = पैदा होता है। जाही = जाते हैं, मरते हैं। गुरि = गुरु ने। परम गति = उच्च आत्मिक अवस्था।4।
अर्थ: हे भाई! वह परमात्मा नाश-रहित है, उसका कभी नाश नहीं होता। (वह प्रभु जीवात्मा रूप हो के भी) ना कोई आत्मा पैदा होती है, ना कोई आत्मा मरती है। हे नानक! कह: पूरे गुरु ने (मेरे अंदर से) अहंकार की मैल धो दी है, अब मेरी ऊँची आत्मिक अवस्था बन गई है (और, मुझे ये जगत उस परमात्मा का अपना ही रूप दिख रहा है)।4।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ कीता लोड़हि सो प्रभ होइ ॥ तुझ बिनु दूजा नाही कोइ ॥ जो जनु सेवे तिसु पूरन काज ॥ दास अपुने की राखहु लाज ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ कीता लोड़हि सो प्रभ होइ ॥ तुझ बिनु दूजा नाही कोइ ॥ जो जनु सेवे तिसु पूरन काज ॥ दास अपुने की राखहु लाज ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कीता लोड़हि = तू करना चाहता है। प्रभ = हे प्रभु! राखहु = तू रखता है। लाज = इज्जत।1।
अर्थ: हे प्रभु! जो कुछ तू करना चाहता है। (जगत में) वही कुछ होता है, (क्योंकि) तेरे बिना (कुछ कर सकने वाला) और कोई नहीं है। जो सेवक तेरी शरण आता है, उसके सारे काम सफल हो जाते हैं। तू अपने सेवक की इज्जत खुद रखता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तेरी सरणि पूरन दइआला ॥ तुझ बिनु कवनु करे प्रतिपाला ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

तेरी सरणि पूरन दइआला ॥ तुझ बिनु कवनु करे प्रतिपाला ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दइआला = हे दया के घर प्रभु! कवनु = और कौन?।1। रहाउ।
अर्थ: हे सदा दयावान रहने वाले प्रभु! मैं तेरी शरण आया हूँ। तेरे बिना हम जीवों की पालना और कोई नहीं कर सकता।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जलि थलि महीअलि रहिआ भरपूरि ॥ निकटि वसै नाही प्रभु दूरि ॥ लोक पतीआरै कछू न पाईऐ ॥ साचि लगै ता हउमै जाईऐ ॥२॥

मूलम्

जलि थलि महीअलि रहिआ भरपूरि ॥ निकटि वसै नाही प्रभु दूरि ॥ लोक पतीआरै कछू न पाईऐ ॥ साचि लगै ता हउमै जाईऐ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जलि = पानी में। थलि = धरती में। महीअलि = मही तलि, धरती के तल पर, अंतरिक्ष में, आकाश में। निकटि = नजदीक। पतीआरै = पतिआने से, तसल्ली करवाने से। साचि = सदा-स्थिर प्रभु में।2।
अर्थ: हे भाई! पानी में, धरती में, आकाश में, हर जगह परमात्मा मौजूद है। (हरेक जीव के) नजदीक बसता है (किसी से भी) प्रभु दूर नहीं है। पर निरी लोगों की नजरों में अच्छा बनने से (उस परमात्मा के दर से आत्मिक जीवन की दाति का) कुछ भी नहीं मिलता। जब मनुष्य उस सदा-स्थिर प्रभु में लीन होता है, तब (इसके अंदर से) अहंकार दूर हो जाता है।2।

[[0737]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

जिस नो लाइ लए सो लागै ॥ गिआन रतनु अंतरि तिसु जागै ॥ दुरमति जाइ परम पदु पाए ॥ गुर परसादी नामु धिआए ॥३॥

मूलम्

जिस नो लाइ लए सो लागै ॥ गिआन रतनु अंतरि तिसु जागै ॥ दुरमति जाइ परम पदु पाए ॥ गुर परसादी नामु धिआए ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गिआन = आत्मिक जीवन की सूझ। अंतरि = अंदर, हृदय में। दुरमति = खोटी मति। पदु = आत्मिक दर्जा।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जिस नो’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! वही मनुष्य प्रभु (के चरणों) में लीन होता है, जिसको प्रभु स्वयं (अपने चरणों में) जोड़ता है। उस मनुष्य के अंदर रत्न (जैसे कीमती) आत्मिक जीवन की सूझ उघड़ पड़ती है। (उस मनुष्य के अंदर से) खोटी मति दूर हो जाती है, वह उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेता है। गुरु की कृपा से वह परमात्मा का नाम स्मरण करता रहता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दुइ कर जोड़ि करउ अरदासि ॥ तुधु भावै ता आणहि रासि ॥ करि किरपा अपनी भगती लाइ ॥ जन नानक प्रभु सदा धिआइ ॥४॥२॥

मूलम्

दुइ कर जोड़ि करउ अरदासि ॥ तुधु भावै ता आणहि रासि ॥ करि किरपा अपनी भगती लाइ ॥ जन नानक प्रभु सदा धिआइ ॥४॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कर = हाथ (बहुवचन)। जोड़ि = जोड़ के। करउ = मैं करता हूँ। आणहि = तू लाता है। आणहि रासि = तू सफल करता है। करि = कर के।4।
अर्थ: हे दास नानक! (कह: हे प्रभु!) मैं (अपने) दोनों हाथ जोड़ के (तेरे दर पे) अरदास करता हूँ। जब तुझे ठीक लगे (तेरी रजा हो) तब ही तू उस अरदास को सफल करता है। हे भाई! कृपा करके परमात्मा (जिस मनुष्य को) अपनी भक्ति में जोड़ता है, वह उसको सदा स्मरण करता रहता है।4।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ धनु सोहागनि जो प्रभू पछानै ॥ मानै हुकमु तजै अभिमानै ॥ प्रिअ सिउ राती रलीआ मानै ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ धनु सोहागनि जो प्रभू पछानै ॥ मानै हुकमु तजै अभिमानै ॥ प्रिअ सिउ राती रलीआ मानै ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: धनु = धन्य भाग्य वाली, सराहनीय। सोहागनि = सौभाग्यनी, सौहाग भाग वाली। पछानै = सांझ डालती है। मानै = मानती है। प्रिअ सिउ = प्यारे के साथ। राती = मगन, रंगी हुई। रलीआ = आत्मिक आनंद। मानै = माणती है।1।
अर्थ: हे सखिए! वह जीव-स्त्री सराहनीय है, सोहाग भाग वाली है, जो प्रभु-पति के साथ सांझ बनाती है, जो अहंकार छोड़ के प्रभु-पति का हुक्म मानती रहती है। वह जीव-स्त्री प्रभु पति (के प्यार-रंग) में रंगी हुई उसके मिलाप का आत्मिक आनन्द लेती रहती है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुनि सखीए प्रभ मिलण नीसानी ॥ मनु तनु अरपि तजि लाज लोकानी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सुनि सखीए प्रभ मिलण नीसानी ॥ मनु तनु अरपि तजि लाज लोकानी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सखीए = हे सहेली! अरपि = भेटा कर दे। तजि = त्याग दे। लाज लोकानी = लोक-सम्मान, लोगों की इज्जत के खातिर काम करने।1। रहाउ।
अर्थ: हे सखिए! परमात्मा को मिलने की निशानी (मुझसे) सुन ले। (वह निशानी वह तरीका ये है कि) लोक-सम्मान की खातिर काम करने छोड़ के अपना मन अपना शरीर परमात्मा के हवाले कर दे।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सखी सहेली कउ समझावै ॥ सोई कमावै जो प्रभ भावै ॥ सा सोहागणि अंकि समावै ॥२॥

मूलम्

सखी सहेली कउ समझावै ॥ सोई कमावै जो प्रभ भावै ॥ सा सोहागणि अंकि समावै ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कउ = को। प्रभ भावै = प्रभु को अच्छा लगे। सा = वह (स्त्रीलिंग)। अंकि = गोद में।2।
अर्थ: (एक सत्संगी) सहेली (दूसरी सत्संगी) सहेली को (प्रभु-पति के मिलाप के तरीके के बारे में) समझाती है (और कहती है कि) जो जीव-स्त्री वही कुछ करती है जो प्रभु-पति को पसंद आ जाता है, वह सोहाग-भाग वाली जीव-स्त्री उस प्रभु के चरणों में लीन रहती है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गरबि गहेली महलु न पावै ॥ फिरि पछुतावै जब रैणि बिहावै ॥ करमहीणि मनमुखि दुखु पावै ॥३॥

मूलम्

गरबि गहेली महलु न पावै ॥ फिरि पछुतावै जब रैणि बिहावै ॥ करमहीणि मनमुखि दुखु पावै ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गरबि = अहंकार में। गहेली = फसी हुई। महलु = ठिकाना। रैणि = (जिंदगी की) रात। करम हीणि = दुर्भाग्यणी। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाली।3।
अर्थ: (पर) जो जीव-स्त्री अहंकार में फसी रहती है, वह प्रभु-पति के चरणों में जगह प्राप्त नहीं कर सकती। जब (जिंदगी की) रात बीत जाती है, तब वह पछताती है। अपने मन के पीछे चलने वाली वह दुर्भाग्यपूर्ण जीव-स्त्री सदा दुख पाती रहती है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बिनउ करी जे जाणा दूरि ॥ प्रभु अबिनासी रहिआ भरपूरि ॥ जनु नानकु गावै देखि हदूरि ॥४॥३॥

मूलम्

बिनउ करी जे जाणा दूरि ॥ प्रभु अबिनासी रहिआ भरपूरि ॥ जनु नानकु गावै देखि हदूरि ॥४॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बिनउ = विनय, विनती। करी = मैं करता हूँ। जाण = मैं जानूँ। रहिआ भरपूरि = हर जगह मौजूद। देखि = देख के। हजूरि = अंग संग, हाजर नाजर।4।
अर्थ: हे भाई! (लोक-सम्मान की खातिर मैं तब ही परमात्मा के दर पर) अरदास करूँ, अगर मैं उसको कहीं दूर बसता समझूँ। वह नाश-रहित परमात्मा तो हर जगह व्यापक है। दास नानक (तो उसको अपने) अंग-संग (बसता) देख के उसकी महिमा करता है।4।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ ग्रिहु वसि गुरि कीना हउ घर की नारि ॥ दस दासी करि दीनी भतारि ॥ सगल समग्री मै घर की जोड़ी ॥ आस पिआसी पिर कउ लोड़ी ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ ग्रिहु वसि गुरि कीना हउ घर की नारि ॥ दस दासी करि दीनी भतारि ॥ सगल समग्री मै घर की जोड़ी ॥ आस पिआसी पिर कउ लोड़ी ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ग्रिह = (शरीर) घर। वसि = बस में। गुरि = गुरु के द्वारा। हउ = मैं। नारि = स्त्री, मलिका। दस = दस इंद्रिय। दासी = नौकरानियां। भतारि = पति प्रभु ने। सगल = सारी। समग्री = राशि-पूंजी, उच्च आत्मिक गुण। कउ = को। लोड़ी = मैं ढूँढता हूँ।1।
अर्थ: (हे सखी!) उस पति-प्रभु ने गुरु के द्वारा (मेरा) शरीर-घर (मेरे) बस में कर दिया है (अब) मैं (उसकी कृपा से इस) घर की मलिका बन गई हूँ। उस पति ने दसों ही इन्द्रियों को मेरी दासियां बना दिया है। (उच्च आत्मिक गुणों वाला) मैंने अपने शरीर-घर का सारा समान जोड़ के (सजा के) रख दिया है। अब मैं प्रभु-पति के दर्शनों की आस और तमन्ना में उसका इन्तजार कर रही हूँ।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कवन कहा गुन कंत पिआरे ॥ सुघड़ सरूप दइआल मुरारे ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

कवन कहा गुन कंत पिआरे ॥ सुघड़ सरूप दइआल मुरारे ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कहा = कहूँ। कंत = पति के। सुघड़ = सुचज्जा। सरूप = सोहणा। मुरारे = (मुर+अरि) परमात्मा (के)।1। रहाउ।
अर्थ: (हे सखी!) सुघड़, दयावान, प्रभु-कंत के मैं कौन-कौन से गुण बताऊँ।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सतु सीगारु भउ अंजनु पाइआ ॥ अम्रित नामु त्मबोलु मुखि खाइआ ॥ कंगन बसत्र गहने बने सुहावे ॥ धन सभ सुख पावै जां पिरु घरि आवै ॥२॥

मूलम्

सतु सीगारु भउ अंजनु पाइआ ॥ अम्रित नामु त्मबोलु मुखि खाइआ ॥ कंगन बसत्र गहने बने सुहावे ॥ धन सभ सुख पावै जां पिरु घरि आवै ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सतु = स्वच्छ आचरण। अंजनु = सुरमा। तंबोलु = पान। मुखि = मुँह से। सुहावे = सोहणे। धन = जीव-स्त्री। जा = जब। घरि = हृदय घर में।2।
अर्थ: (हे सखी! पति-प्रभु की कृपा से ही) स्वच्छ आचरण को मैंने (अपने जीवन का) श्रृंगार बना लिया है, उसके डर-अदब (का) मैंने (आँखों में) सुरमा डाल लिया है। (उसकी मेहर से ही) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-धन मैंने मुँह से खाया है। हे सखी! जब प्रभु-पति हृदय-घर में आ बसता है, तब जीव-स्त्री सारे सुख हासिल कर लेती है, उसके कंगन, कपड़े, गहने, सुंदर लगने लग जाते हैं (सारे धार्मिक उद्यम सफल हो जाते हैं)।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुण कामण करि कंतु रीझाइआ ॥ वसि करि लीना गुरि भरमु चुकाइआ ॥ सभ ते ऊचा मंदरु मेरा ॥ सभ कामणि तिआगी प्रिउ प्रीतमु मेरा ॥३॥

मूलम्

गुण कामण करि कंतु रीझाइआ ॥ वसि करि लीना गुरि भरमु चुकाइआ ॥ सभ ते ऊचा मंदरु मेरा ॥ सभ कामणि तिआगी प्रिउ प्रीतमु मेरा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कामण = टूणे। करि = बना के। रीझाइआ = खुश किया। गुरि = गुरु ने। भरमु = भटकना। ते = से। मंदरु = हृदय घर। कामणि = स्त्री।3।
अर्थ: हे सखी! गुरु ने (जिस जीव-स्त्री की) भटकना दूर कर दी, उसने प्रभु-पति को अपने वश में कर लिया, गुणों के टूणे बना के उसने प्रभु-पति को खुश कर लिया। (हे सखी! उस पति-प्रभु की कृपा से ही) मेरा हृदय-घर सब (वासनाओं) से ऊपर हो गया है। और सारी स्त्रीयों को छोड़ के वह प्रीतम मेरा प्यारा बन गया है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रगटिआ सूरु जोति उजीआरा ॥ सेज विछाई सरध अपारा ॥ नव रंग लालु सेज रावण आइआ ॥ जन नानक पिर धन मिलि सुखु पाइआ ॥४॥४॥

मूलम्

प्रगटिआ सूरु जोति उजीआरा ॥ सेज विछाई सरध अपारा ॥ नव रंग लालु सेज रावण आइआ ॥ जन नानक पिर धन मिलि सुखु पाइआ ॥४॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सूरु = सूरज। उजीआरा = प्रकाश। सरध = श्रद्धा। नव रंग लालु = नित्य नए प्यार वाला प्रीतम। सेज = हृदय सेज। पिर मिलि = पति को मिल के। धन = स्त्री (ने)।4।
अर्थ: हे सखी! (उस संत की कृपा से मेरे अंदर आत्मिक जीवन का) सूर्य उदय हो गया है, (आत्मिक जीवन की) ज्योति जग पड़ी है। बेअंत प्रभु की श्रद्धा की सेज मैंने बिछा दी है (मेरे हृदय में प्रभु के लिए पूरी श्रद्धा बन गई है), (अब अपनी मेहर से ही) वह नित्य नए प्यार वाला प्रीतम मेरे हृदय की सेज पर आ बैठा है। हे दास नानक! (कह:) प्रभु-पति को मिल के जीव-स्त्री आत्मिक आनंद पाती है।4।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ उमकिओ हीउ मिलन प्रभ ताई ॥ खोजत चरिओ देखउ प्रिअ जाई ॥ सुनत सदेसरो प्रिअ ग्रिहि सेज विछाई ॥ भ्रमि भ्रमि आइओ तउ नदरि न पाई ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ उमकिओ हीउ मिलन प्रभ ताई ॥ खोजत चरिओ देखउ प्रिअ जाई ॥ सुनत सदेसरो प्रिअ ग्रिहि सेज विछाई ॥ भ्रमि भ्रमि आइओ तउ नदरि न पाई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: उमकिओ = खुशी से उछल पड़ा है। हीउ = हृदय। ताई = से, वास्ते। खोजत चरिओ = चोजने के लिए चढ़ गया है। देखउ = मैं देखूँ। प्रिअ जाई = प्यारे (के रहने की) जगह। सदेसरो प्रिअ = प्यारे का संदेश। ग्रिहि = हृदय गृह में। भ्रमि भ्रमि = भटक भटक के। तउ = तो भी। नदरि = मेहर की निगाह।1।
अर्थ: हे सखी! प्यारे का सनेहा सुन के मैंने हृदय-गृह की सेज बिछा दी। मेरा हृदय प्रभु के मिलने के लिए खुशी से नाच उठा, (प्रभु को) तलाशने चढ़ पड़ा (कि) मैं प्यारे के रहने वाली जगह (कहीं) देख लूँ। (पर) भटक-भटक के वापस आ गया, तब (प्रभु की मेहर की) निगाह हासिल ना हुई।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

किन बिधि हीअरो धीरै निमानो ॥ मिलु साजन हउ तुझु कुरबानो ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

किन बिधि हीअरो धीरै निमानो ॥ मिलु साजन हउ तुझु कुरबानो ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: किन बिधि = किन तरीकों से? हीअरो निमानो = ये बेचारा हृदय। साजन = हे साजन! हउ = मैं।1। रहाउ।
अर्थ: हे सज्जन प्रभु! (मुझे) मिल, मैं तुझसे सदके जाती हूँ। (तेरे दर्शनों के बिना) मेरा ये निमाणा दिल कैसे धीरज धरे?।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

एका सेज विछी धन कंता ॥ धन सूती पिरु सद जागंता ॥ पीओ मदरो धन मतवंता ॥ धन जागै जे पिरु बोलंता ॥२॥

मूलम्

एका सेज विछी धन कंता ॥ धन सूती पिरु सद जागंता ॥ पीओ मदरो धन मतवंता ॥ धन जागै जे पिरु बोलंता ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: धन = स्त्री। पिरु = पति। पीओ = पिया हुआ है। मदरो = मदिरा, शराब। मतवंता = मस्त। जागै = जाग पड़ता है। बोलंता = बुलाता है।2।
अर्थ: हे सखी! जीव-स्त्री और प्रभु-पति की एक ही सेज (जीव-स्त्री के दिल में) बिछी हुई है; पर जीव-स्त्री (सदा माया के मोह की नींद में) सोई रहती है, प्रभु-पति सदा जागता रहता है (माया के प्रभाव से ऊपर रहता है) जीव-स्त्री यूँ मस्त रहती है जैसे इसने शराब पी हुई हो। (हाँ) जीव-स्त्री जाग भी सकती है, अगर प्रभु-पति खुद जगाए।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

भई निरासी बहुतु दिन लागे ॥ देस दिसंतर मै सगले झागे ॥ खिनु रहनु न पावउ बिनु पग पागे ॥ होइ क्रिपालु प्रभ मिलह सभागे ॥३॥

मूलम्

भई निरासी बहुतु दिन लागे ॥ देस दिसंतर मै सगले झागे ॥ खिनु रहनु न पावउ बिनु पग पागे ॥ होइ क्रिपालु प्रभ मिलह सभागे ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: निरासी = उदास। दिसंतर = देश अंतर। देस दिसंतर = देश देश के अंतर, और-और देश। झागे = फिरे हैं। न पावउ = मैं नहीं ढूँढ सकती। रहनु = टिकाव, धीरज। पग = पैर। बिनु पग पागे = चरणों पर पड़े बिना। प्रभ मिलह = हम प्रभु को मिल सकते हैं। सभागे = भाग्यों वाले।3।
अर्थ: हे सखी! (उम्र के) बहुत सारे दिन बीत गए हैं, में (बाहर) और-और सारे देश तलाश के देख लिए हैं (पर बाहर प्रभु-पति कहीं नहीं मिला। अब) मैं (बाहर ढूँढ-ढूँढ के) निराश हो गई हूँ। उस प्रभु-पति के चरणों में पड़े बिना मुझे एक छिन के लिए भी शांति प्राप्त नहीं होती। (हाँ, हे सखी!) अगर वह खुद दयावान हो, तो ही जीव-स्त्रीयों के सौभाग्य जागने से उस प्रभु को मिल सकती हैं।3।

[[0738]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

भइओ क्रिपालु सतसंगि मिलाइआ ॥ बूझी तपति घरहि पिरु पाइआ ॥ सगल सीगार हुणि मुझहि सुहाइआ ॥ कहु नानक गुरि भरमु चुकाइआ ॥४॥

मूलम्

भइओ क्रिपालु सतसंगि मिलाइआ ॥ बूझी तपति घरहि पिरु पाइआ ॥ सगल सीगार हुणि मुझहि सुहाइआ ॥ कहु नानक गुरि भरमु चुकाइआ ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सत संगि = सत्संग में। तपति = तपश, जलन। घरहि = घर में ही। मुझहि = मुझे ही। गुरि = गुरु ने। चुकाइआ = दूर कर दिया।4।
अर्थ: हे नानक! कह: प्रभु मेरे पर दयावान हो गया है। मुझे उसने सत्संग में मिला दिया है। मेरी (विकारों की) तपश मिट गई है, मैंने उस पति-प्रभु को हृदय-गृह में ही पा लिया है। अब मुझे (अपने) सारे श्रंृगार (उद्यम) सुंदर लग रहे हैं। गुरु ने मेरी भटकना दूर कर दी है।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जह देखा तह पिरु है भाई ॥ खोल्हिओ कपाटु ता मनु ठहराई ॥१॥ रहाउ दूजा ॥५॥

मूलम्

जह देखा तह पिरु है भाई ॥ खोल्हिओ कपाटु ता मनु ठहराई ॥१॥ रहाउ दूजा ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जह = जहाँ। देखा = मैं देखता हूँ। भाई = हे भाई! कपाटु = किवाड़, भिक्त। ठहराई = टिक गया है।1। रहाउ दूजा।
अर्थ: हे भाई! (गुरु ने मेरे अंदर से) भ्रम का पर्दा उतार दिया है, मेरा मन टिक गया है। अब मैं जिधर देखता हूँ, मुझे प्रभु ही दिखता है।1। रहाउ दूजा।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ किआ गुण तेरे सारि सम्हाली मोहि निरगुन के दातारे ॥ बै खरीदु किआ करे चतुराई इहु जीउ पिंडु सभु थारे ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ किआ गुण तेरे सारि सम्हाली मोहि निरगुन के दातारे ॥ बै खरीदु किआ करे चतुराई इहु जीउ पिंडु सभु थारे ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: किआ गुण = कौन कौन से गुण? सारि = याद कर के। समाली = मैं हृदय में बसाऊँ। मोहि दाता रे = हे मेरे दातार! निरगुन = गुण हीन। बै खरीदु = मूल्य लिया हुआ। जीउ = जिंद। पिंडु = शरीर। सभु = सब कुछ। थारे = तेरे।1।
अर्थ: मुझ गुणहीन के हे दातार! मैं तेरे कौन-कौन से गुण याद कर-कर के अपने दिल में बसाऊँ? (मैं तो तेरा मूल्य खरीदा हुआ सेवक हूँ) मूल्य खरीदा हुआ नौकर कोई चालाकी भरी बात नहीं कर सकता। (हे दातार! मेरा) ये शरीर और मेरी ये जिंद सब तेरे ही दिए हुए हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

लाल रंगीले प्रीतम मनमोहन तेरे दरसन कउ हम बारे ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

लाल रंगीले प्रीतम मनमोहन तेरे दरसन कउ हम बारे ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रंगीले = हे चोजी! बारे = सदके।1। रहाउ।
अर्थ: हे चोजी लाल! हे प्रीतम! हे मन को मोह लेने वाले! हम जीव तेरे दर्शनों को कुर्बान हैं।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रभु दाता मोहि दीनु भेखारी तुम्ह सदा सदा उपकारे ॥ सो किछु नाही जि मै ते होवै मेरे ठाकुर अगम अपारे ॥२॥

मूलम्

प्रभु दाता मोहि दीनु भेखारी तुम्ह सदा सदा उपकारे ॥ सो किछु नाही जि मै ते होवै मेरे ठाकुर अगम अपारे ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मोहि = मैं। दीनु = कंगाल। भेखारी = भिखारी। मै ते = मुझसे। ठाकुर = हे ठाकुर! अगम = हे अगम्य (पहुँच से परे)! अपारे = हे बेअंत!।2।
अर्थ: (हे दातार!) तू मालिक है, दातें देने वाला है, मैं (तेरे दर पर) कंगाल भिखारी हूँ, तू सदा ही, तू हमेशा ही मेरे ऊपर मेहरवानियाँ करता है। हे मेरे अगम्य (पहुँच से परे) और बेअंत मालिक! कोई ऐसा काम नहीं जो (बग़ैर तेरी मदद के) मुझसे हो सके।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

किआ सेव कमावउ किआ कहि रीझावउ बिधि कितु पावउ दरसारे ॥ मिति नही पाईऐ अंतु न लहीऐ मनु तरसै चरनारे ॥३॥

मूलम्

किआ सेव कमावउ किआ कहि रीझावउ बिधि कितु पावउ दरसारे ॥ मिति नही पाईऐ अंतु न लहीऐ मनु तरसै चरनारे ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे प्रभु! मैं तेरी कौन सी सेवा करूं? मैं क्या कह के तुझे प्रसन्न करूँ? मैं किस तरह तेरे दीदार हासिल करूँ? तेरी हस्ती का नाप नहीं पाया जा सकता, तेरे गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। मेरा मन सदा तेरे चरणों में पड़े रहने को तरसता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पावउ दानु ढीठु होइ मागउ मुखि लागै संत रेनारे ॥ जन नानक कउ गुरि किरपा धारी प्रभि हाथ देइ निसतारे ॥४॥६॥

मूलम्

पावउ दानु ढीठु होइ मागउ मुखि लागै संत रेनारे ॥ जन नानक कउ गुरि किरपा धारी प्रभि हाथ देइ निसतारे ॥४॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कमावउ = मैं करूँ। कहि = कह के। रीझावउ = मैं खुश करूँ। बिधि कितु = किस तरीके से? पावउ = पाऊँ। मागउ = मैं मांगता हूँ। मुखि = मूह पर। रेनारे = चरण धूल। कउ = को। गुरि = गुरु ने। प्रभि = प्रभु ने। देइ = दे के। निसतारे = पार लंघा लिया।4।
अर्थ: हे प्रभु! मैं ढीठ हो के (बार-बार तेरे दर से) माँगता हूँ, मुझे ये दान मिल जाए कि मेरे माथे पर तेरे संत जनों के चरणों की धूल लगती रहे। हे नानक! (कह:) जिस दास पर गुरु ने मेहर कर दी, प्रभु ने (उसको अपना) हाथ दे के (संसार-समुंदर से) पार लंघा लिया।4।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ घरु ३ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

सूही महला ५ घरु ३ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सेवा थोरी मागनु बहुता ॥ महलु न पावै कहतो पहुता ॥१॥

मूलम्

सेवा थोरी मागनु बहुता ॥ महलु न पावै कहतो पहुता ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मागनु = मांग। महलु = प्रभु की हजूरी। कहतो = कहता है। पहुता = पहुँचा हुआ हूँ।1।
अर्थ: हे भाई! ये मूर्ख काम तो थोड़ा करता है, पर उसके बदले में इसकी माँग बहुत ज्यादा है। प्रभु के चरणों तक पहुँच तो हासिल कर नहीं सकता, पर कहता है कि मैं (प्रभु की हजूरी में) पहुँचा हुआ हूँ।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जो प्रिअ माने तिन की रीसा ॥ कूड़े मूरख की हाठीसा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

जो प्रिअ माने तिन की रीसा ॥ कूड़े मूरख की हाठीसा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जे = जो मनुष्य। प्रिअ माने = प्यारे के सत्कारे हुए हैं। हाठीसा = हठ की बातें।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! झूठे मूर्ख मनुष्य के हठ की बात (सुन)। ये उनकी नकल करता है जो प्यारे प्रभु के दर से सत्कार हासिल कर चुके हैं।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

भेख दिखावै सचु न कमावै ॥ कहतो महली निकटि न आवै ॥२॥

मूलम्

भेख दिखावै सचु न कमावै ॥ कहतो महली निकटि न आवै ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सचु = सदा स्थिर हरि नाम का स्मरण। महली = प्रभु के महल का वासी। निकटि = नजदीक।2।
अर्थ: (हे भाई! झूठा मूर्ख और लोगों को अपने धर्मी होने के निरे) भेस दिखा रहा है, सदा-स्थिर प्रभु के नाम-जपने की कमाई नहीं करता। मुँह से कहता है कि मैं हजूरी में पहुँचा हुआ हूँ, पर (प्रभु-चरणों के कहीं) नजदीक भी नहीं पहुँचा।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अतीतु सदाए माइआ का माता ॥ मनि नही प्रीति कहै मुखि राता ॥३॥

मूलम्

अतीतु सदाए माइआ का माता ॥ मनि नही प्रीति कहै मुखि राता ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अतीतु = विरक्त, त्यागी। सदाए = कहलवाता है। माता = मस्त। मनि = मन में। मंखि = मुँह से। राता = रंगा हुआ।3।
अर्थ: (हे भाई! देख मूर्ख के हठ की बात! ये अपने आप को) त्यागी कहलवाता है पर माया (की लालसा) में मस्त रहता है। (इसके) मन में (प्रभु चरणों का) प्यार नहीं है, पर मुँह से कहता है कि मैं (प्रभु के प्रेम-रंग में) रंगा हुआ हूँ।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कहु नानक प्रभ बिनउ सुनीजै ॥ कुचलु कठोरु कामी मुकतु कीजै ॥४॥

मूलम्

कहु नानक प्रभ बिनउ सुनीजै ॥ कुचलु कठोरु कामी मुकतु कीजै ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नानक = हे नानक! प्रभ = हे प्रभु! बिनउ = विनती। कुचलु = गंदा, मैले आचरण वाला। कठोरु = निर्दई। मुकतु कीजै = विकारों से बचा ले।4।
अर्थ: हे नानक! कह: हे प्रभु! मेरी विनती सुन (जीव बेचारा कुछ करने के लायक नहीं, ये) दुष्कर्मी है, निर्दयी है, विषयी है (फिर भी तेरा) है इसको इन विकारों से खलासी बख्श।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दरसन देखे की वडिआई ॥ तुम्ह सुखदाते पुरख सुभाई ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१॥७॥

मूलम्

दरसन देखे की वडिआई ॥ तुम्ह सुखदाते पुरख सुभाई ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: देखे की = देखने की। सुभाई = सोहना प्यार करने वाला।1। रहाउ दूजा।
अर्थ: हे पुरख प्रभु! तू सब सुख देने के योग्य है, तू प्यार भरपूर है। (हम जीवों को) यह महिमा बख्श कि तेरे दर्शन कर सकें।1। रहाउ दूजा।1।7।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: नए संग्रह (घर 3) का ये पहला शब्द है। कुल जोड़ 7 है।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ बुरे काम कउ ऊठि खलोइआ ॥ नाम की बेला पै पै सोइआ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ बुरे काम कउ ऊठि खलोइआ ॥ नाम की बेला पै पै सोइआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ऊठि खलोइआ = उठ के खड़ा हो जाता है, जल्दी तैयार हो जाता है। बेला = के समय। पै पै सोइआ = लंबी तान के पड़ा रहता है।1।
अर्थ: हे भाई! मूर्ख मनुष्य बुरे काम करने के लिए (तो) जल्दी तैयार हो जाता है, पर परमात्मा का नाम स्मरण के वक्त (अमृत बेला में) लंबी तान के पड़ा रहता है (बेपरवाह हो के सोया रहता है)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अउसरु अपना बूझै न इआना ॥ माइआ मोह रंगि लपटाना ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

अउसरु अपना बूझै न इआना ॥ माइआ मोह रंगि लपटाना ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अउसरु = अवसर, मौका। रंगि = रंग में, लगन में। लपटाना = मस्त रहता है।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! मूर्ख मनुष्य माया के मोह की लगन में मस्त रहता है, ये नहीं समझता कि ये मानव जीवन ही अपना असली मौका है (जब प्रभु को याद किया जा सकता है)।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

लोभ लहरि कउ बिगसि फूलि बैठा ॥ साध जना का दरसु न डीठा ॥२॥

मूलम्

लोभ लहरि कउ बिगसि फूलि बैठा ॥ साध जना का दरसु न डीठा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बिगसि = खुश हो के। फूलि बैठा = फूल फूल बैठता है।2।
अर्थ: हे भाई! (अंदर उठ रही) लोभ की लहर के कारण (माया के लाभ की आस पर) खुश हो के फूल-फूल बैठता है, कभी संत-जनों के दर्शन भी नहीं करता।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कबहू न समझै अगिआनु गवारा ॥ बहुरि बहुरि लपटिओ जंजारा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

कबहू न समझै अगिआनु गवारा ॥ बहुरि बहुरि लपटिओ जंजारा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अगिआनु = आत्मिक जीवन की समझ से वंचित। गवारा = मूर्ख। बहुरि बहुरि = बार बार। जंजारा = जंजालों में, धंधों में।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! आत्मिक जीवन की समझ से वंचित मूर्ख मनुष्य (अपने असल भले की बात) कभी नहीं समझता, बार-बार (माया के) धंधों में व्यस्त रहता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बिखै नाद करन सुणि भीना ॥ हरि जसु सुनत आलसु मनि कीना ॥३॥

मूलम्

बिखै नाद करन सुणि भीना ॥ हरि जसु सुनत आलसु मनि कीना ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बिखै नाद = विषौ विकारों वाले गीत। करन = कानों से। सुणि = सुन के। भीना = खुश होता है। सुनत = सुन के। मनि = मन में।3।
अर्थ: हे भाई! (माया के मोह में अंधा हुआ मनुष्य) विषौ-विकारों के गीत कानों से सुन-सुन के प्रसन्न होता है। पर, परमात्मा की महिमा सुनने से मन में आलस करता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

द्रिसटि नाही रे पेखत अंधे ॥ छोडि जाहि झूठे सभि धंधे ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

द्रिसटि नाही रे पेखत अंधे ॥ छोडि जाहि झूठे सभि धंधे ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रे अंधे = हे अंधे! जाहि = जाएगा। सभि = सारे।1। रहाउ।
अर्थ: हे अंधे! तू आँखों से (क्यों) नहीं देखता कि ये सारे (दुनिया वाले) घंधे छोड़ के (तू आखिर, यहाँ से) चला जाएगा?।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कहु नानक प्रभ बखस करीजै ॥ करि किरपा मोहि साधसंगु दीजै ॥४॥

मूलम्

कहु नानक प्रभ बखस करीजै ॥ करि किरपा मोहि साधसंगु दीजै ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभ = हे प्रभु! बखस = कृपा, मेहर। करि = कर के। मोहि = मुझे। संगु = साथ।4।
अर्थ: हे नानक! कह: हे प्रभु! (मेरे पर) मेहर कर। कृपा कर के मुझे गुरमुखों की संगति बख्श।4।

[[0739]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

तउ किछु पाईऐ जउ होईऐ रेना ॥ जिसहि बुझाए तिसु नामु लैना ॥१॥ रहाउ॥२॥८॥

मूलम्

तउ किछु पाईऐ जउ होईऐ रेना ॥ जिसहि बुझाए तिसु नामु लैना ॥१॥ रहाउ॥२॥८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तउ = तब। जउ = जब। रेना = चरण धूल। जिसहि = जिस को।1। रहाउ।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जिसहि’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘ही’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! (साधु-संगत में से भी) तब ही कुछ हासिल हो सकता है, जब गुरमुखों के चरणों की धूल बन जाएं। हे भाई! जिस मनुष्य को परमात्मा (चरण-धूल होने की) सूझ बख्शता है, वे (साधु-संगत में टिक के उसका) नाम स्मरण करते हैं।1। रहाउ।2।8।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ घर महि ठाकुरु नदरि न आवै ॥ गल महि पाहणु लै लटकावै ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ घर महि ठाकुरु नदरि न आवै ॥ गल महि पाहणु लै लटकावै ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: घर महि = हृदय घर में। पाहणु = पत्थर, पत्थर की मूर्ति।1।
अर्थ: (साकत को अपने) हृदय-घर में मालिक प्रभु (बसता) नही दिखता, पत्थर (की मूर्ति) ले के अपने गले लटकाए फिरता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

भरमे भूला साकतु फिरता ॥ नीरु बिरोलै खपि खपि मरता ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

भरमे भूला साकतु फिरता ॥ नीरु बिरोलै खपि खपि मरता ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भरमे = भटकना में (पड़ कर)। साकतु = परमात्मा से टूटा हुआ। नीरु = पानी। बिरोलै = मथता है। खपि खपि = व्यर्थ की मेहनत करके। मरता = आत्मिक मौत सहेड़ता है।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा से टूटा हुआ मनुष्य भटकनों में पड़ के गलत रास्ते पर चलता फिरता है। (मूर्ती पूजा करके) पानी (ही) मथता है, ये व्यर्थ की मेहनत करके आत्मिक मौत सहेड़ता रहता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जिसु पाहण कउ ठाकुरु कहता ॥ ओहु पाहणु लै उस कउ डुबता ॥२॥

मूलम्

जिसु पाहण कउ ठाकुरु कहता ॥ ओहु पाहणु लै उस कउ डुबता ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कउ = को। कहता = कहता है।2।
अर्थ: हे भाई! साकत मनुष्य जिस पत्थर को परमात्मा कहता (समझता) रहता है, वह पत्थर (अपने) उस (पुजारी) को भी ले के (पानी में) डूब जाता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुनहगार लूण हरामी ॥ पाहण नाव न पारगिरामी ॥३॥

मूलम्

गुनहगार लूण हरामी ॥ पाहण नाव न पारगिरामी ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुनहगार = हे गुनहगार! हे पापी! लूण हरामी = नमकहराम, हे अकृतघ्न! नाव = बेड़ी। पार गिरामी = पार लंघाने वाली।3।
अर्थ: हे पापी! हे अकृतघ्न! (जैसे) पत्थर की नाव (नदी से) पार नहीं लांघ सकती (ऐसे ही पत्थर की मूर्ती की पूजा संसार-संमुद्र से पार नहीं लंघा सकती)।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुर मिलि नानक ठाकुरु जाता ॥ जलि थलि महीअलि पूरन बिधाता ॥४॥३॥९॥

मूलम्

गुर मिलि नानक ठाकुरु जाता ॥ जलि थलि महीअलि पूरन बिधाता ॥४॥३॥९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुर मिलि = गुरु को मिल के। जाता = सांझ डाली। जलि = पानी में। थलि = धरती में। महीअलि = मही तलि, धरती के तल पर, आकाश में। बिधाता = विधाता, रचने वाला कर्तार।4।
अर्थ: हे नानक! जिस मनुष्य ने गुरु को मिल के मालिक-प्रभु के साथ गहरी सांझ डाली हुई है, उसको वह कर्तार पानी में, धरती में आकाश में हर जगह बसता दिखाई देता है।4।3।9।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ लालनु राविआ कवन गती री ॥ सखी बतावहु मुझहि मती री ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ लालनु राविआ कवन गती री ॥ सखी बतावहु मुझहि मती री ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: लालनु = सुंदर लाल। राविआ = मिलाप का आनंद लिया। कवन गती = किस तरीके से? री = हे सखी! मुझहि = मुझे ही। मती = मति से, अक्ल।1।
अर्थ: हे सखी! तूने किस ढंग से सोहाने लाल का मिलाप पाया है? हे सखी! मुझे भी बता।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूहब सूहब सूहवी ॥ अपने प्रीतम कै रंगि रती ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सूहब सूहब सूहवी ॥ अपने प्रीतम कै रंगि रती ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सूहब = हे सूहे रंग वाली! कै रंगि = के प्रेम रंग में। रती = रंगी हुई।1। रहाउ।
अर्थ: हे सखी! तेरे मुँह पर लाली भख रही है, तू अपने प्यारे के प्रेम-रंग में रंगी हुई है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पाव मलोवउ संगि नैन भतीरी ॥ जहा पठावहु जांउ तती री ॥२॥

मूलम्

पाव मलोवउ संगि नैन भतीरी ॥ जहा पठावहु जांउ तती री ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पाव = (‘पांउ’ का बहुवचन) दोनों पैर। मलोवउ = मैं मलूँगी। संगि = साथ। नैन भतीरी = धीरा, पुतली। पठावहु = तू भेजे। जाउ = मैं जाऊँ। तती = तत्र ही, वहीं पर ही।2।
अर्थ: हे सखी! (मुझे भी बता) मैं तेरे पैर अपनी आँखों की पुतलियों से मलूँगी, तू मुझे जहाँ भी (किसी काम पर) भेजेगी, मैं वहीं (खुशी से) जाऊँगी।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जप तप संजम देउ जती री ॥ इक निमख मिलावहु मोहि प्रानपती री ॥३॥

मूलम्

जप तप संजम देउ जती री ॥ इक निमख मिलावहु मोहि प्रानपती री ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: देउ = मैं दे दूँ। जती = जत। निमख = आँख झपकने जितना समय (निमेष)। मोहि = मुझे।3।
अर्थ: हे सखी! आँख झपकने जितने समय के लिए ही सही मुझे जिंद का मालिक प्रभु मिला दे, मैं उसके बदले में सारे जप-तप-संजम दे दूँगी।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

माणु ताणु अह्मबुधि हती री ॥ सा नानक सोहागवती री ॥४॥४॥१०॥

मूलम्

माणु ताणु अह्मबुधि हती री ॥ सा नानक सोहागवती री ॥४॥४॥१०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अहंबुधि = अहंकार वाली मति। हती = नाश की। सा = उस (स्त्रीलिंग)। सोहागवती = पति वाली।4।
अर्थ: हे नानक! जो जीव-स्त्री (किसी भी अपने निहित पदार्थ अथवा उद्यम का) गुमान और आसरा छोड़ देती है, अहंकार वाली बुद्धि त्याग देती है, वह सोहाग-भाग वाली हो जाती है।4।4।10।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ तूं जीवनु तूं प्रान अधारा ॥ तुझ ही पेखि पेखि मनु साधारा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ तूं जीवनु तूं प्रान अधारा ॥ तुझ ही पेखि पेखि मनु साधारा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जीवनु = जिंदगी, जिंद। अधारा = आसरा। पेखि = देख के। साधारा = आसरा पकड़ता है।1।
अर्थ: हे प्रभु! तू ही मेरी जिंद है, तू ही मेरी जिंद का सहारा है। तुझे देख के ही मेरा मन धैर्य धरता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तूं साजनु तूं प्रीतमु मेरा ॥ चितहि न बिसरहि काहू बेरा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

तूं साजनु तूं प्रीतमु मेरा ॥ चितहि न बिसरहि काहू बेरा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: चितहि = चिक्त में से। काहू बेरा = किसी भी वक्त।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! तू ही मेरा सज्जन है, तू ही मेरा प्यारा है (मेहर कर) किसी भी वक्त मन से ना बिसर।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बै खरीदु हउ दासरो तेरा ॥ तूं भारो ठाकुरु गुणी गहेरा ॥२॥

मूलम्

बै खरीदु हउ दासरो तेरा ॥ तूं भारो ठाकुरु गुणी गहेरा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बै खरीदु = मूल्य लिया हुआ। हउ = मैं। दासरो = निमाणा सा दास। भारो = बड़ा। गुणी = गुणों का मालिक। गहेरा = गहरा, गहरे जिगरे वाला।2।
अर्थ: हे प्रभु! मैं मोल खरीदा हुआ तेरा अदना सा सेवक हूँ, तू मेरा बड़ा मालिक है, तू सारे गुणों से भरपूर है, तू बड़े जिगरे वाला है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कोटि दास जा कै दरबारे ॥ निमख निमख वसै तिन्ह नाले ॥३॥

मूलम्

कोटि दास जा कै दरबारे ॥ निमख निमख वसै तिन्ह नाले ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कोटि = करोड़ों। कै दरबारे = के दरबार में। निमख निमख = हर वक्त। निमख = (निमेष) आँख झपकने जितना समय।3।
अर्थ: हे भाई! वह प्रभु ऐसा है कि करोड़ों सेवक उसके दर पर (गिरे रहते हैं) वह हर वक्त उनके साथ बसता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हउ किछु नाही सभु किछु तेरा ॥ ओति पोति नानक संगि बसेरा ॥४॥५॥११॥

मूलम्

हउ किछु नाही सभु किछु तेरा ॥ ओति पोति नानक संगि बसेरा ॥४॥५॥११॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ओति पोति = ताने पेटे की तरह। ओत = उना हुआ। पोत = परोया हुआ। संगि = साथ।4।
अर्थ: हे नानक! (कह: हे प्रभु!) मेरी अपनी कोई बिसात नहीं, (मेरे पास जो कुछ भी है) सब कुछ तेरा ही बख्शा हुआ है। ताने-पेटे की तरह परोया हुआ तू ही मेरे साथ बसता है।4।5।11।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ सूख महल जा के ऊच दुआरे ॥ ता महि वासहि भगत पिआरे ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ सूख महल जा के ऊच दुआरे ॥ ता महि वासहि भगत पिआरे ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जा के = जिस परमात्मा के। ता महि = उस (सहज अवस्था) में। वासहि = बसते हैं।1।
अर्थ: हे भाई! उस (आत्मिक अडोलता पैदा करने वाली महिमा) में उस परमात्मा के प्यारे भक्त (ही) बसते हैं जिस परमात्मा के महल आनंद से भरपूर हैं, और जिसके दरवाजे ऊँचे हैं (भाव, वहाँ आत्मिक आनंद के बिना और किसी विकार आदि की पहुँच नहीं है)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सहज कथा प्रभ की अति मीठी ॥ विरलै काहू नेत्रहु डीठी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सहज कथा प्रभ की अति मीठी ॥ विरलै काहू नेत्रहु डीठी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सहज कथा = आत्मिक अडोलता पैदा करने वाली महिमा। अति = बहुत। विरलै काहू = किसी विरले ने। नेत्रहु = आँखों से।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! आत्मिक अडोलता पैदा करने वाली प्रभु की महिमा बड़ी ही रसीली (स्वादिष्ट) है, पर किसी विरले ही मनुष्य ने उसको अपनी आँखों से देखा है (महसूस किया है)।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तह गीत नाद अखारे संगा ॥ ऊहा संत करहि हरि रंगा ॥२॥

मूलम्

तह गीत नाद अखारे संगा ॥ ऊहा संत करहि हरि रंगा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तह = उस (सहज कथा) में। अखारे = अखाड़े, पहलवानों के घुलने की जमीन, दंगल।2।
अर्थ: हे भाई! आत्मिक अडोलता पैदा करने वाली उस महिमा में (मानो) गीत और राग हो रहे होते हैं (उसमें, मानो) दंगल बने होते है। (जहाँ कामादिक पहलवानों से मुकाबला करने की विधि सीखी जाती है)। उस महिमा में जुड़ के संत जन परमात्मा के मिलाप का आनंद लेते हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तह मरणु न जीवणु सोगु न हरखा ॥ साच नाम की अम्रित वरखा ॥३॥

मूलम्

तह मरणु न जीवणु सोगु न हरखा ॥ साच नाम की अम्रित वरखा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हरखा = खुशी। साच = सदा स्थिर रहने वाला। अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाला।3।
अर्थ: हे भाई! महिमा में जुड़ने से जनम-मरण का चक्कर नहीं रहता, खुशी-ग़मी नहीं छू सकती। उस अवस्था में सदा-स्थिर प्रभु के आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल की बरखा होती रहती है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुहज कथा इह गुर ते जाणी ॥ नानकु बोलै हरि हरि बाणी ॥४॥६॥१२॥

मूलम्

गुहज कथा इह गुर ते जाणी ॥ नानकु बोलै हरि हरि बाणी ॥४॥६॥१२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुहज = छुपी हुई। ते = से। नानकु बोलै = नानक बोलता है।4।
अर्थ: हे भाई! (महिमा के बारे में) ये भेद की बात (नानक ने) गुरु के पास से समझी है (तभी तो) नानक परमात्मा की महिमा की वाणी उचारता रहता है।4।6।12।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ जा कै दरसि पाप कोटि उतारे ॥ भेटत संगि इहु भवजलु तारे ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ जा कै दरसि पाप कोटि उतारे ॥ भेटत संगि इहु भवजलु तारे ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जा कै दरसि = जिनके दर्शनों से। कोटि = करोड़ों। भेटत संगि = (जिनके चरणों) को छूने से। भवजलु = संसार समुंदर।1।
अर्थ: हे भाई! (वह संत जन ही मेरे प्यारे मित्र हैं) जिनके दर्शनों से करोड़ों पाप उतर जाते हैं, (जिस के चरणों) को छूने से संसार-समुंदर से पार लांध जाया जाता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ओइ साजन ओइ मीत पिआरे ॥ जो हम कउ हरि नामु चितारे ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

ओइ साजन ओइ मीत पिआरे ॥ जो हम कउ हरि नामु चितारे ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ओइ = वह। हम कउ = हमें, मुझे। चितारे = याद कराते हैं।1। रहाउ।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘ओइ’ है ‘ओह/वो’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! जो (संत जन) मुझे परमात्मा का नाम याद करवाते हैं वह (ही) मेरे सज्जन हैं, वह (ही) मेरे प्यारे मित्र हैं।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जा का सबदु सुनत सुख सारे ॥ जा की टहल जमदूत बिदारे ॥२॥

मूलम्

जा का सबदु सुनत सुख सारे ॥ जा की टहल जमदूत बिदारे ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जा का सबदु = जिनका वचन। बिदारे = नाश हो जाते हैं।2।
अर्थ: हे भाई! (वही हैं मेरे मित्र) जिनके वचन सुन के सारे सुख प्राप्त हो जाते हैं, जिनकी टहल करने से जमदूत (भी) नाश हो जाते हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जा की धीरक इसु मनहि सधारे ॥ जा कै सिमरणि मुख उजलारे ॥३॥

मूलम्

जा की धीरक इसु मनहि सधारे ॥ जा कै सिमरणि मुख उजलारे ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: धीरक = धीरज। मनहि = मन को। सधारे = सहारा देती है। जा कै सिमरणि = जिनके (दिए हुए हरि-नाम के) स्मरण से। उजलारे = उजला, रौशन।3।
अर्थ: हे भाई! (वही हैं मेरे मित्र) जिस के द्वारा (दिया हुआ) धीरज (मेरे) इस मन को सहारा देता है, जिस (के दिए हुए हरि-नाम) के स्मरण से (लोक-परलोक में) मुँह उज्जवल होता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रभ के सेवक प्रभि आपि सवारे ॥ सरणि नानक तिन्ह सद बलिहारे ॥४॥७॥१३॥

मूलम्

प्रभ के सेवक प्रभि आपि सवारे ॥ सरणि नानक तिन्ह सद बलिहारे ॥४॥७॥१३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभि = प्रभु ने। सवारे = सोहाने जीवन वाले बनाए जाते हैं। सद = सदा।4।
अर्थ: हे नानक! प्रभु ने स्वयं ही अपने सेवकों का जीवन सुंदर बना दिया है। हे भाई! उन सेवकों की शरण पड़ना चाहिए, उन पर से सदा कुर्बान होना चाहिए।4।7।13।

[[0740]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ रहणु न पावहि सुरि नर देवा ॥ ऊठि सिधारे करि मुनि जन सेवा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ रहणु न पावहि सुरि नर देवा ॥ ऊठि सिधारे करि मुनि जन सेवा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रहणु = सदा का ठिकाना। न पावहि = नहीं हासिल कर सकते। सुरि नर = दैवी मनुष्य। देवा = देवते। ऊठि सिधारे = उठ के चल पड़े। करि = कर के।1।
अर्थ: हे भाई! (अनेक मनुष्य अपने आप को) दैवी मनुष्य, देवते (कहलवा गए, अनेक अपने आप को) ऋषी मुनी (कहलवा गए, अनेक ही उनकी) सेवा कर के (जगत से आखिर अपनी-अपनी बारी) चले जाते रहे, (कोई भी यहाँ) सदा के लिए टिका नहीं रह सकता।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जीवत पेखे जिन्ही हरि हरि धिआइआ ॥ साधसंगि तिन्ही दरसनु पाइआ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

जीवत पेखे जिन्ही हरि हरि धिआइआ ॥ साधसंगि तिन्ही दरसनु पाइआ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जीवत = जीवित, आत्मिक जीवन वाले। पेखे = देखे है। संगि = संगति में। तिनी = उन्होंने ही।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! आत्मिक जीवन वाले (सफल जीवन वाले सिर्फ वही) देखे जाते हैं जिन्होंने परमात्मा का स्मरण किया है, उन्होंने ही साधु-संगत में टिक के परमात्मा के दर्शन किए हैं।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बादिसाह साह वापारी मरना ॥ जो दीसै सो कालहि खरना ॥२॥

मूलम्

बादिसाह साह वापारी मरना ॥ जो दीसै सो कालहि खरना ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साह = शाह। दीसै = दिखता है। सो = उस को। कालहि = काल ने। खरना = ले जाना है।2।
अर्थ: हे भाई! शाह, व्यापारी, बादशाह (सबने आखिर) मरना है। जो भी कोई (यहाँ) दिखता है, हरेक को मौत ने ले जाना है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कूड़ै मोहि लपटि लपटाना ॥ छोडि चलिआ ता फिरि पछुताना ॥३॥

मूलम्

कूड़ै मोहि लपटि लपटाना ॥ छोडि चलिआ ता फिरि पछुताना ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मोहि = मोह में। छोडि = छोड़ के।3।
अर्थ: हे भाई! मनुष्य सदा झूठे मोह में फसा रहता है (और परमात्मा को भुलाए रखता है, पर जब दुनिया के पदार्थ) छोड़ के चलता है, तब पछताता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

क्रिपा निधान नानक कउ करहु दाति ॥ नामु तेरा जपी दिनु राति ॥४॥८॥१४॥

मूलम्

क्रिपा निधान नानक कउ करहु दाति ॥ नामु तेरा जपी दिनु राति ॥४॥८॥१४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: क्रिपा निधान = हे कृपा के खजाने! जपी = मैं जपता रहूँ।4।
अर्थ: हे कृपा के खजाने प्रभु! (मुझे) नानक को (ये) दाति दे (कि) मैं (नानक) दिन-रात तेरा नाम जपता रहूँ।4।8।14।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ घट घट अंतरि तुमहि बसारे ॥ सगल समग्री सूति तुमारे ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ घट घट अंतरि तुमहि बसारे ॥ सगल समग्री सूति तुमारे ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: घट = शरीर। घट घट अंतरि = हरेक शरीर में। तुमहि = तुम ही। बसारे = बस रहा है। सगल समग्री = सारी चीजें। सूति = धागे में।1।
अर्थ: हे प्रभु! हरेक शरीर में तू ही बसता है, (दुनिया की) सारी चीजें तेरी ही मर्यादा के धागे में (परोई हुई) हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तूं प्रीतम तूं प्रान अधारे ॥ तुम ही पेखि पेखि मनु बिगसारे ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

तूं प्रीतम तूं प्रान अधारे ॥ तुम ही पेखि पेखि मनु बिगसारे ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रान अधारे = जिंद का आसरा। पेखि = देख के। बिगसारे = खिलता है।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! तू हमारा प्रीतम है, तू हमारी जिंद का आसरा है। तुझे ही देख-देख के (हमारा) मन खुश होता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनिक जोनि भ्रमि भ्रमि भ्रमि हारे ॥ ओट गही अब साध संगारे ॥२॥

मूलम्

अनिक जोनि भ्रमि भ्रमि भ्रमि हारे ॥ ओट गही अब साध संगारे ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भ्रमि = भटक के। हारे = थक जाते हैं। गही = पकड़ी। अब = अब, मानव जन्म में।2।
अर्थ: हे प्रभु! (तुझसे विछुड़ के जीव) अनेक जूनियों में भटक-भटक के थक जाते हैं। मानव जनम में आ के (तेरी मेहर से) साधु-संगत का आसरा लेते हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अगम अगोचरु अलख अपारे ॥ नानकु सिमरै दिनु रैनारे ॥३॥९॥१५॥

मूलम्

अगम अगोचरु अलख अपारे ॥ नानकु सिमरै दिनु रैनारे ॥३॥९॥१५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अगम = अगम्य (पहुँच से परे)। अगोचरु = (अ+गो+चरु) जिस तक ज्ञान-इंद्रिय की पहुँच ना हो सके। अपारे = बेअंत। नानक सिमरै = नानक स्मरण करता है। रैनारे = रात।3।
अर्थ: हे भाई! (साधु-संगत की इनायत से) नानक दिन-रात उस परमात्मा का नाम स्मरण करता है जो अगम्य (पहुँच से परे) है, जिस तक ज्ञान-इंद्रिय की पहुँच नहीं हो सकती, जो मनुष्य की समझ से परे है, और जो बेअंत है।3।9।15।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ कवन काज माइआ वडिआई ॥ जा कउ बिनसत बार न काई ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ कवन काज माइआ वडिआई ॥ जा कउ बिनसत बार न काई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कवन काज = किस काम का? कउ = जिस (माया) को। बार = देर। कई बार = कोई भी देर।1।
अर्थ: हे भाई! जिस माया के नाश होने में रक्ती भर भी समय नहीं लगता, उस माया के कारण मिली बड़ाई भी किसी काम की नहीं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

इहु सुपना सोवत नही जानै ॥ अचेत बिवसथा महि लपटानै ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

इहु सुपना सोवत नही जानै ॥ अचेत बिवसथा महि लपटानै ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जानै = जानता, समझता। अचेत = गाफल। बिवसथा = हालत। लपटानै = लिपटा रहता है।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! ये (जगत ऐसे है, जैसे) सपना (होता) है, (सपने में) सोया हुआ मनुष्य (ये) नहीं जानता (कि मैं सोया हुआ हूँ, और सपना देख रहा हूँ।
इसी तरह मनुष्य जगत के मोह वाली) गाफल हालत में (जगत के मोह के साथ) चिपका रहता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

महा मोहि मोहिओ गावारा ॥ पेखत पेखत ऊठि सिधारा ॥२॥

मूलम्

महा मोहि मोहिओ गावारा ॥ पेखत पेखत ऊठि सिधारा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मोहि = मोह में। मोहिओ = मोहा रहता है, मस्त रहता है। गावारा = मूर्ख। सिधारा = चल पड़ता है।2।
अर्थ: हे भाई! मूर्ख मनुष्य माया के बड़े मोह में मस्त रहता है, पर देखते-देखते ही (यहाँ से) उठ के चल पड़ता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ऊच ते ऊच ता का दरबारा ॥ कई जंत बिनाहि उपारा ॥३॥

मूलम्

ऊच ते ऊच ता का दरबारा ॥ कई जंत बिनाहि उपारा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ता का = उस (परमात्मा) का। बिनाहि = नाश कर के। उपारा = पैदा करता है।3।
अर्थ: हे भाई! (परमात्मा का नाम ही जप) उसका दरबार ऊँचे से ऊँचा है। वह अनेक जीवों का नाश भी करता है, और, पैदा भी करता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दूसर होआ ना को होई ॥ जपि नानक प्रभ एको सोई ॥४॥१०॥१६॥

मूलम्

दूसर होआ ना को होई ॥ जपि नानक प्रभ एको सोई ॥४॥१०॥१६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: को = कोई। होई = होगा।4।
अर्थ: हे नानक! उस एक परमात्मा का नाम ही जपा कर, जिस जैसा और कोई दूसरा ना अभी तक कोई हुआ है, ना ही (आगे) होगा।4।10।16।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ सिमरि सिमरि ता कउ हउ जीवा ॥ चरण कमल तेरे धोइ धोइ पीवा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ सिमरि सिमरि ता कउ हउ जीवा ॥ चरण कमल तेरे धोइ धोइ पीवा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ता कउ = उस (परमात्मा के नाम) को। हउ = मैं। जीवा = मैं आत्मिक जीवन हासिल करता हूँ। पीवा = मैं पीता हूँ।1।
अर्थ: हे भाई! (भक्तजनों के अंग-संग रहने वाले) उस (प्रभु के नाम) को मैं सदा स्मरण करके आत्मिक जीवन हासिल कर रहा हूँ। हे प्रभु! मैं तेरे सोहणे चरण धो-धो के (नित्य) पीता हूँ।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सो हरि मेरा अंतरजामी ॥ भगत जना कै संगि सुआमी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सो हरि मेरा अंतरजामी ॥ भगत जना कै संगि सुआमी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंतरजामी = हरेक के दिल की जानने वाला। कै संगि = के साथ।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! मालिक प्रभु अपने भक्त जनों के साथ बसता है। मेरा वह हरि-प्रभु हरेक के दिल की जानने वाला है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुणि सुणि अम्रित नामु धिआवा ॥ आठ पहर तेरे गुण गावा ॥२॥

मूलम्

सुणि सुणि अम्रित नामु धिआवा ॥ आठ पहर तेरे गुण गावा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सुणि = सुन के। धिआवा = ध्याऊँ। गावा = गाऊँ।2।
अर्थ: हे प्रभु! बार बार (ये) सुन के (कि तेरा) नाम आत्मिक जीवन देने वाला (है,) मैं (तेरा नाम) स्मरण करता रहता हूँ, आठों पहर मैं तेरी महिमा के गीत गाता रहता हूँ।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पेखि पेखि लीला मनि आनंदा ॥ गुण अपार प्रभ परमानंदा ॥३॥

मूलम्

पेखि पेखि लीला मनि आनंदा ॥ गुण अपार प्रभ परमानंदा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पेखि = देख के। लीला = करिश्मे, खेल। मनि = मन में। प्रभ = हे प्रभु! परमानंदा = परम आनंद का मालिक।3।
अर्थ: हे सबसे ऊँचे आनंद के मालिक प्रभु! तेरे गुण बेअंत हैं, तेरे करिश्मे देख-देख के मेरे मन में आनंद पैदा होता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जा कै सिमरनि कछु भउ न बिआपै ॥ सदा सदा नानक हरि जापै ॥४॥११॥१७॥

मूलम्

जा कै सिमरनि कछु भउ न बिआपै ॥ सदा सदा नानक हरि जापै ॥४॥११॥१७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कै सिमरनि = के स्मरण से। बिआपै = जोर डाल सकता। जापै = जपा कर।4।
अर्थ: हे नानक! तू भी सदा उस हरि का नाम जपा कर, जिसके नाम-जपने की इनायत से कोई डर छू नहीं सकता।4।11।17।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ गुर कै बचनि रिदै धिआनु धारी ॥ रसना जापु जपउ बनवारी ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ गुर कै बचनि रिदै धिआनु धारी ॥ रसना जापु जपउ बनवारी ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कै बचनि = के वचनों से। रिदै = हृदय में। धारी = मैं धारण करता हूँ। रसना = जीभ (से)। जपउ = मैं जपता हूँ। बनवारी = (वनमालिन् = जंगली फूलों की माला वाला) परमात्मा।1।
अर्थ: हे भाई! गुरु के शब्द के द्वारा मैं अपने दिल में परमात्मा का ध्यान धरता हूँ, और अपनी जीभ से परमात्मा (के नाम) का जाप जपता हूँ।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सफल मूरति दरसन बलिहारी ॥ चरण कमल मन प्राण अधारी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सफल मूरति दरसन बलिहारी ॥ चरण कमल मन प्राण अधारी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मूरति = हस्ती, अस्तित्व, स्वरूप। सफल मूरति = (वह गुरु) जिसका वजूद मानव जनम का फल देने वाला है। बलिहारी = सदके। चरण कमल = कमल फूलों जैसे कोमल चरण। अधारी = आसरा बनाता हूँ।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! गुरु की हस्ती मानव जन्म का फल देने वाली है। मैं (गुरु के) दर्शनों से सदके जाता हूँ। गुरु के कोमल चरणों को मैं अपने मन का जिंद का आसरा बनाता हूँ।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

साधसंगि जनम मरण निवारी ॥ अम्रित कथा सुणि करन अधारी ॥२॥

मूलम्

साधसंगि जनम मरण निवारी ॥ अम्रित कथा सुणि करन अधारी ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साध संगि = गुरु की संगति में। निवारी = मैं करता हूँ। अंम्रित कथा = आत्मिक जीवन देने वाली महिमा। करन अधारी = कानों को आसरा देता हूँ।2।
अर्थ: हे भाई! गुरु की संगति में (रह के) मैंने जनम-मरण का चक्कर समाप्त कर लिया है, और आत्मिक जीवन देने वाली महिमा कानों से सुन कर (इस को मैं अपने जीवन का) आसरा बना रहा हूँ।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

काम क्रोध लोभ मोह तजारी ॥ द्रिड़ु नाम दानु इसनानु सुचारी ॥३॥

मूलम्

काम क्रोध लोभ मोह तजारी ॥ द्रिड़ु नाम दानु इसनानु सुचारी ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तजारी = त्यागता हूँ। द्रिढ़ु = (हृदय में) पक्का ठिकाना। दानु = दूसरों की सेवा। इसनानु = पवित्र आचरण। सुचारी = सदाचार, अच्छी जीवन मर्यादा।3।
अर्थ: हे भाई! (गुरु की इनायत से) मैंने काम-क्रोध-लोभ-मोह (आदि) को त्याग दिया है। हृदय में प्रभु-नाम को पक्का करके, दूसरों की सेवा करनी, आचरण को पवित्र रखना- ये मैंने अपना सदाचार (जीवन-मर्यादा) बना लिया है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कहु नानक इहु ततु बीचारी ॥ राम नाम जपि पारि उतारी ॥४॥१२॥१८॥

मूलम्

कहु नानक इहु ततु बीचारी ॥ राम नाम जपि पारि उतारी ॥४॥१२॥१८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नानक = हे नानक! ततु = निचोड़, अस्लियत। जपि = जप के। उतारी = उतार के, पार करके।4।
अर्थ: हे नानक! कह: (हे भाई! तू भी) ये अस्लियत अपने मन में बसा ले, और गुरु के माध्यम से परमात्मा का नाम जप के (अपने आप को संसार-समुंदर से) पार लंघा ले।4।12।18।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ लोभि मोहि मगन अपराधी ॥ करणहार की सेव न साधी ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ लोभि मोहि मगन अपराधी ॥ करणहार की सेव न साधी ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: लोभि = लोभ में। मोहि = मोह में। मगन = डूबे हुए, मस्त। अपराधी = भूल करने वाले जीव। सेव = भक्ति।1।
अर्थ: हे प्रभु! हम भूल करने वाले जीव लोभ में, मोह में मस्त रहते हैं। तू हमें पैदा करने वाला है, हम तेरी सेवा-भक्ति नहीं करते।1।

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विश्वास-प्रस्तुतिः

पतित पावन प्रभ नाम तुमारे ॥ राखि लेहु मोहि निरगुनीआरे ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

पतित पावन प्रभ नाम तुमारे ॥ राखि लेहु मोहि निरगुनीआरे ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पतित पावन = विकारों में गिरे हुओं को पवित्र करने वाला। मोहि = मुझे।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! तेरा नाम विकारियों को पवित्र करने वाला है। मुझे गुण-हीन को (अपना नाम दे के) विकारों से बचाए रख।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तूं दाता प्रभ अंतरजामी ॥ काची देह मानुख अभिमानी ॥२॥

मूलम्

तूं दाता प्रभ अंतरजामी ॥ काची देह मानुख अभिमानी ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभ = हे प्रभु! अंतरजामी = दिल की जानने वाला। काची देह = नाशवान शरीर।2।
अर्थ: हे प्रभु! तू हमें सब दातें देने वाला है, हमारे दिल की जानने वाला है। पर, हम जीव इस नाशवान शरीर का ही गुमान करते रहते हैं (और, तुझे याद नहीं करते)।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुआद बाद ईरख मद माइआ ॥ इन संगि लागि रतन जनमु गवाइआ ॥३॥

मूलम्

सुआद बाद ईरख मद माइआ ॥ इन संगि लागि रतन जनमु गवाइआ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बाद = झगड़े। ईरख = जलन, ईष्या। मद = अहंकार, नशा। संगि = साथ।3।
अर्थ: हे प्रभु! (दुनिया के पदार्थों के) चस्के, झगड़े, ईष्या, माया का घमण्ड- हम जीव इनमें ही लग के कीमती मानव जन्म को गवा रहे हैं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दुख भंजन जगजीवन हरि राइआ ॥ सगल तिआगि नानकु सरणाइआ ॥४॥१३॥१९॥

मूलम्

दुख भंजन जगजीवन हरि राइआ ॥ सगल तिआगि नानकु सरणाइआ ॥४॥१३॥१९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दुख भंजन = हे दुखों के नाश करने वाले! तिआगि = त्याग के।4।
अर्थ: हे दुखों के नाश करने वाले! हे जगत के जीवन! हे प्रभु पातशाह! और सारे (आसरे छोड़ के) नानक तेरी शरण आया है।4।13।19।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ पेखत चाखत कहीअत अंधा सुनीअत सुनीऐ नाही ॥ निकटि वसतु कउ जाणै दूरे पापी पाप कमाही ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ पेखत चाखत कहीअत अंधा सुनीअत सुनीऐ नाही ॥ निकटि वसतु कउ जाणै दूरे पापी पाप कमाही ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: चाखत = (चक्ष्) देखना। पेखत चाखत = देखता चाखता। सुनीअत = सुनते हुए। निकटि = नजदीक। कमाही = कमाते हैं।1।
अर्थ: हे भाई! (परमात्मा हर वक्त मनुष्य के अंग-संग बसता है, पर मनुष्य उसको देखता नहीं। इस वास्ते, दुनिया के और सारे पदार्थ) देखते-चाखते हुए भी (आत्मिक जीवन की ओर से) अंधा ही कहा जा सकता है, (दुनिया के और राग नाद) सुनता हुआ भी (परमात्मा की) महिमा नहीं सुन रहा (आत्मिक जीवन की तरफ से बहरा ही है)। नजदीक बस रहे (नाम-) पदार्थ को कहीं दूर समझता है। (इस कमी के कारण) विकारों में फंसे हुए मनुष्य विकार ही करते रहते हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सो किछु करि जितु छुटहि परानी ॥ हरि हरि नामु जपि अम्रित बानी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सो किछु करि जितु छुटहि परानी ॥ हरि हरि नामु जपि अम्रित बानी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जितु = जिस (काम) से। छुटहि = (विकारों से) बच सकें। परानी = हे प्राणी! अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाली।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्राणी! कोई वह काम कर जिसकी वजह से तू (विकारों से) बचा रह सके। सदा परमात्मा का नाम जपा कर। (प्रभु की महिमा की) वाणी आत्मिक जीवन देने वाली है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

घोर महल सदा रंगि राता ॥ संगि तुम्हारै कछू न जाता ॥२॥

मूलम्

घोर महल सदा रंगि राता ॥ संगि तुम्हारै कछू न जाता ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: घोर = घोड़े। रंगि = प्रेम में। राता = मस्त। संगि = साथ।2।
अर्थ: हे प्राणी! तू सदा घोड़े-महल-माढ़ियों के प्यार में मस्त रहता है, (पर इनमें से) कोई भी चीज तेरे साथ नहीं जा सकती।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रखहि पोचारि माटी का भांडा ॥ अति कुचील मिलै जम डांडा ॥३॥

मूलम्

रखहि पोचारि माटी का भांडा ॥ अति कुचील मिलै जम डांडा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पोचारि = पोच पाच के, बाहर से बना सवार के। रखहि = तू रखता है। अति कुचील = बहुत ही गंदा। जम डांडा = जम का दण्ड।3।
अर्थ: हे प्राणी! तू इस मिट्टी के बर्तन (शरीर) को (बाहर से) बना-सँवार के रखता है; (पर अंदर सें विकारों से यह) बहुत गंदा हुआ पड़ा है। (इस तरह के जीवन वाले को तो) जमों द्वारा सजा मिलती है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

काम क्रोधि लोभि मोहि बाधा ॥ महा गरत महि निघरत जाता ॥४॥

मूलम्

काम क्रोधि लोभि मोहि बाधा ॥ महा गरत महि निघरत जाता ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: क्रोधि = क्रोध में। बाधा = बंधा हुआ। गरत = गड्ढा। निघरत जाता = धसता जाता है।4।
अर्थ: हे प्राणी! तू काम-क्रोध में, लोभ में मोह में बंधा पड़ा है। विकारों के दल-दल में और भी फंसता जा रहा है।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नानक की अरदासि सुणीजै ॥ डूबत पाहन प्रभ मेरे लीजै ॥५॥१४॥२०॥

मूलम्

नानक की अरदासि सुणीजै ॥ डूबत पाहन प्रभ मेरे लीजै ॥५॥१४॥२०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पहन = पत्थर। प्रभ = हे प्रभु!।5।
अर्थ: हे मेरे प्रभु! (अपने दास) नानक की आरजू सुन। हम डूब रहे पत्थरों को डूबने से बचा ले।5।14।20।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ जीवत मरै बुझै प्रभु सोइ ॥ तिसु जन करमि परापति होइ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ जीवत मरै बुझै प्रभु सोइ ॥ तिसु जन करमि परापति होइ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जीवत = जीते हुए, दुनिया के काम काज करते हुए ही। मरै = (मोह की तरफ से) मरता है, मोह छोड़ देता है। सोइ = वह मनुष्य। करमि = बख्शिश से।1।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य दुनिया के कार्य-व्यवहार करता हुआ ही (दुनिया का) मोह त्याग देता है, वह मनुष्य परमात्मा के साथ सांझ डाल लेता है। उस मनुष्य को (परमात्मा की) कृपा से (परमात्मा का मिलाप) प्राप्त हो जाता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुणि साजन इउ दुतरु तरीऐ ॥ मिलि साधू हरि नामु उचरीऐ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सुणि साजन इउ दुतरु तरीऐ ॥ मिलि साधू हरि नामु उचरीऐ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साजन = हे सज्जन! इउ = इस तरीके से। दुतरु = दुस्तर, वह संसार जिससे पार होना बड़ा ही मुश्किल है। तरीऐ = पार लांघा जाता है। मिलि = मिल के। साधू = गुरु।1। रहाउ।
अर्थ: हे सज्जन! (मेरी विनती) सुन। संसार-समुंदर से पार लांघना बहुत मुश्किल है, इससे सिर्फ इस तरीके से पार लांघ सकते हैं (कि) गुरु को मिल के परमात्मा का नाम स्मरण किया जाए।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

एक बिना दूजा नही जानै ॥ घट घट अंतरि पारब्रहमु पछानै ॥२॥

मूलम्

एक बिना दूजा नही जानै ॥ घट घट अंतरि पारब्रहमु पछानै ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जानै = दिली सांझ डालता है। घट = शरीर। अंतरि = अंदर, में।2।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य एक परमात्मा के बिना किसी और के साथ सांझ नहीं डालता, वह मनुष्य परमात्मा को हरेक शरीर में बसता पहचान लेता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जो किछु करै सोई भल मानै ॥ आदि अंत की कीमति जानै ॥३॥

मूलम्

जो किछु करै सोई भल मानै ॥ आदि अंत की कीमति जानै ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भल = भला। आदि अंत की = उस परमात्मा की जो सृष्टि के आरम्भ से ही है और सृष्टि के आखिर में भी रहेगा। कीमति = कद्र।3।
अर्थ: जो कुछ भी परमात्मा करता है जो मनुष्य हरेक उस काम को (दुनिया के वास्ते) भला मानता है, वह मनुष्य सदा ही कायम रहने वाले परमात्मा की कद्र समझ लेता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कहु नानक तिसु जन बलिहारी ॥ जा कै हिरदै वसहि मुरारी ॥४॥१५॥२१॥

मूलम्

कहु नानक तिसु जन बलिहारी ॥ जा कै हिरदै वसहि मुरारी ॥४॥१५॥२१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बलिहारी = सदके। कै हिरदै = के हृदय में। वसहि = तू बसता है। मुरारी = हे प्रभु!।4।
अर्थ: हे नानक! कह: जिस मनुष्य के हृदय में सदा तू बसता है (जिसको तू सदा याद रखता है) उस मनुष्य से (मैं) कुर्बान जाता हूँ।4।15।21।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ गुरु परमेसरु करणैहारु ॥ सगल स्रिसटि कउ दे आधारु ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ गुरु परमेसरु करणैहारु ॥ सगल स्रिसटि कउ दे आधारु ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: परमेसरु = परम ईश्वर, सबसे ऊँचा मालिक। करणैहारु = सब कुछ कर सकने वाला। सगल = सारी। कउ = को। दे = देता है। आधारु = आसरा।1।
अर्थ: हे मेरे मन! गुरु उस परमात्मा का रूप है जो सबसे बड़ा मालिक है जो सब कुछ कर सकने वाला है। गुरु सारी सृष्टि को (परमात्मा के नाम का) आसरा देता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुर के चरण कमल मन धिआइ ॥ दूखु दरदु इसु तन ते जाइ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

गुर के चरण कमल मन धिआइ ॥ दूखु दरदु इसु तन ते जाइ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: चरण कमल = कमल फूल जैसे कोमल चरण। मन = हे मन! ते = से। जाइ = चला जाता है।1। रहाउ।
अर्थ: हे (मेरे) मन! (सदा) गुरु के सुंदर कोमल चरणों का ध्यान धरा करो (जो मनुष्य ये उद्यम करता है उसके) इस शरीर के हरेक किस्म के दुख-कष्ट दूर हो जाते हैं।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

भवजलि डूबत सतिगुरु काढै ॥ जनम जनम का टूटा गाढै ॥२॥

मूलम्

भवजलि डूबत सतिगुरु काढै ॥ जनम जनम का टूटा गाढै ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भवजलि = संसार समुंदर में। काढै = निकाल लेता है। टूटा = (परमात्मा से) टूटा हुआ मनुष्य। गाढै = जोड़ लेता है, प्रभु के साथ जोड़ लेता है।2।
अर्थ: (हे मन!) गुरु संसार समुंदर में डूबतों को बचा लेता है, अनेक जन्मों से (परमात्मा से) टूटे हुए मनुष्य को (परमात्मा से) जोड़ देता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुर की सेवा करहु दिनु राति ॥ सूख सहज मनि आवै सांति ॥३॥

मूलम्

गुर की सेवा करहु दिनु राति ॥ सूख सहज मनि आवै सांति ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सूख सहज = आत्मिक अडोलता के सुख। मनि = मन में।3।
अर्थ: हे भाई! दिन-रात गुरु की (बताई हुई) सेवा किया करो, (जो मनुष्य करता है उसके) मन में शांति पैदा हो जाती है, आत्मिक अडोलता के आनंद पैदा हो जाते हैं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सतिगुर की रेणु वडभागी पावै ॥ नानक गुर कउ सद बलि जावै ॥४॥१६॥२२॥

मूलम्

सतिगुर की रेणु वडभागी पावै ॥ नानक गुर कउ सद बलि जावै ॥४॥१६॥२२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रेणु = चरण धूल। वडभागी = बड़े भाग्यों वाला मनुष्य। नानक = हे नानक! सद = सदा। बलि = सदके।4।
अर्थ: हे नानक! कोई अति भाग्यशाली मनुष्य गुरु की चरण-धूल हासिल करता है, (फिर वह मनुष्य) गुरु से सदा सदके जाता है।4।16।22।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ गुर अपुने ऊपरि बलि जाईऐ ॥ आठ पहर हरि हरि जसु गाईऐ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ गुर अपुने ऊपरि बलि जाईऐ ॥ आठ पहर हरि हरि जसु गाईऐ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बलि जाईऐ = कुर्बान होना चाहिए। गाईऐ = गाना चाहिए। जसु = महिमा (का गीत)।1।
अर्थ: हे भाई! अपने गुरु पर से (सदा) कुर्बान होना चाहिए (गुरु की) शरण पड़ कर अपने अंदर से स्वै-भाव मिटा देना चाहिए, (क्योंकि, गुरु की कृपा से ही) आठों पहर परमात्मा का महिमा का गीत गाया जा सकता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सिमरउ सो प्रभु अपना सुआमी ॥ सगल घटा का अंतरजामी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सिमरउ सो प्रभु अपना सुआमी ॥ सगल घटा का अंतरजामी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सिमरउ = मैं स्मरण करता हूँ। सुआमी = मालिक। सगल = सारे। अंतरजामी = अंदर की जानने वाला।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (गुरु की कृपा से) मैं अपना वह मालिक प्रभु स्मरण करता हूँ, जो सब जीवों के दिल की जानने वाला है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

चरण कमल सिउ लागी प्रीति ॥ साची पूरन निरमल रीति ॥२॥

मूलम्

चरण कमल सिउ लागी प्रीति ॥ साची पूरन निरमल रीति ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सिउ = साथ। साची = सदा कायम रहने वाली। पूरन = पूर्ण। रीति = जीवन जुगति।2।
अर्थ: हे भाई! (गुरु की कृपा से ही) परमात्मा के सुंदर चरणों से प्यार बनता है। (गुरु चरणों की प्रीति ही) अटल सम्पूर्ण और पवित्र जीवन-जुगति है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

संत प्रसादि वसै मन माही ॥ जनम जनम के किलविख जाही ॥३॥

मूलम्

संत प्रसादि वसै मन माही ॥ जनम जनम के किलविख जाही ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: संत प्रसादि = गुरु की कृपा से। माही = में। किलविख = पाप। जाही = दूर हो जाते हैं।3।
अर्थ: हे भाई! गुरु की कृपा से (परमात्मा जिस मनुष्य के) मन में आ बसता है (उस मनुष्य के) अनेक जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥ नानकु मागै संत रवाला ॥४॥१७॥२३॥

मूलम्

करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥ नानकु मागै संत रवाला ॥४॥१७॥२३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभ = हे प्रभु! दीन = कंगाल। नानकु मागै = नानक माँगता है। रवाला = चरण धूल।4।
अर्थ: हे निमाणों पर दया करने वाले प्रभु! (अपने दास नानक पर) कृपा कर। (तेरा दास) नानक (तेरे दर से) गुरु के चरणों की धूल माँगता हूँ।4।17।23।

[[0742]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ दरसनु देखि जीवा गुर तेरा ॥ पूरन करमु होइ प्रभ मेरा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ दरसनु देखि जीवा गुर तेरा ॥ पूरन करमु होइ प्रभ मेरा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: देखि = देख के। जीवा = जीऊँ, मुझे आत्मिक जीवन मिल जाता है। गुर = हे गुरु! करमु = बख्शिश। प्रभ मेरा = हे मेरे प्रभु!।1।
अर्थ: हे गुरु! तेरे दर्शन करके मुझे आत्मिक जीवन मिल जाता है। हे मेरे प्रभु! तेरी सम्पूर्ण कृपा हो (और मुझे गुरु मिल जाए)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

इह बेनंती सुणि प्रभ मेरे ॥ देहि नामु करि अपणे चेरे ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

इह बेनंती सुणि प्रभ मेरे ॥ देहि नामु करि अपणे चेरे ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभ = हे प्रभु! करि = बना के। चेरे = सेवक।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे प्रभु (मेरी) ये आरजू सुन, (गुरु के द्वारा) मुझे अपना सेवक बना के (अपना) नाम बख्श।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अपणी सरणि राखु प्रभ दाते ॥ गुर प्रसादि किनै विरलै जाते ॥२॥

मूलम्

अपणी सरणि राखु प्रभ दाते ॥ गुर प्रसादि किनै विरलै जाते ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दाते = हे सब दातें देने वाले! गुर प्रसादि = गुरु की किरपा से। किनै विरलै = किसी मनुष्य ने। जाते = गहरी सांझ डाली है।2।
अर्थ: हे सब दातें देने वाले प्रभु! मुझे अपनी शरण में रख। हे प्रभु! गुरु की किरपा से किसी विरले मनुष्य ने तेरे साथ गहरी सांझ डाली है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुनहु बिनउ प्रभ मेरे मीता ॥ चरण कमल वसहि मेरै चीता ॥३॥

मूलम्

सुनहु बिनउ प्रभ मेरे मीता ॥ चरण कमल वसहि मेरै चीता ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बिनउ = विनती। मीता = हे मित्र! वसहि = बस जाना। मेरै चीता = मेरे चिक्त में।3।
अर्थ: हे मेरे मित्र भगवान! मेरा अनुरोध सुनिए, (कृपा करें कि आपके सुंदर चरण मेरे मन में बस जाएं ।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नानकु एक करै अरदासि ॥ विसरु नाही पूरन गुणतासि ॥४॥१८॥२४॥

मूलम्

नानकु एक करै अरदासि ॥ विसरु नाही पूरन गुणतासि ॥४॥१८॥२४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नानकु करै = नानक करता है। अरदासि = प्रार्थना। गुण तासि = हे गुणों के खजाने!।4।
अर्थ: हे मेरे मित्र प्रभु! सब गुणों के खजाने प्रभु! (तेरा सेवक) नानक (तेरे दर पे) एक अर्ज करता है (कृपा कर, मुझ नानक को कभी) ना भूल।4।18।24।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ मीतु साजनु सुत बंधप भाई ॥ जत कत पेखउ हरि संगि सहाई ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ मीतु साजनु सुत बंधप भाई ॥ जत कत पेखउ हरि संगि सहाई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सुत = पुत्र। बंधप = रिश्तेदार। भाई = भ्राता। जत कत = जिधर किधर, जहाँ कहाँ। पेखउ = देखता हूँ। संगि = साथ। सहाई = मददगार।1।
अर्थ: हे भाई! मैं जहाँ-कहाँ देखता हूँ, परमात्मा मेरे साथ मददगार है। परमात्मा ही मेरा मित्र है, सज्जन है, परमात्मा ही (मेरे वास्ते) पुत्र रिश्तेदार व भाई है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जति मेरी पति मेरी धनु हरि नामु ॥ सूख सहज आनंद बिसराम ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

जति मेरी पति मेरी धनु हरि नामु ॥ सूख सहज आनंद बिसराम ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जति = जाति। पति = इज्जत। बिसराम = शांति।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा का नाम मेरी (उच्च) जाति है, मेरी इज्जत है, मेरा धन है। (इसकी वजह से मेरे अंदर) आनंद है, शांति है, आत्मिक अडोलता और सुख हैं।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पारब्रहमु जपि पहिरि सनाह ॥ कोटि आवध तिसु बेधत नाहि ॥२॥

मूलम्

पारब्रहमु जपि पहिरि सनाह ॥ कोटि आवध तिसु बेधत नाहि ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जपि = जपा कर। पहिरि = पहने रख। सनाह = संजोअ, स्नाह। कोटि = करोड़ों। आवध = आयुद्ध, हथियार। तिसु = उस (संजोअ) को। बेधत = बेधते।2।
अर्थ: हे भाई! (सदा) परमात्मा (का नाम) जपा कर, (हरि नाम का) संजोअ (कवच) पहने रख। इस (संजोअ) को (कामादिक जैसे) करोड़ो हथियार (भी) नहीं बेध सकते।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि चरन सरण गड़ कोट हमारै ॥ कालु कंटकु जमु तिसु न बिदारै ॥३॥

मूलम्

हरि चरन सरण गड़ कोट हमारै ॥ कालु कंटकु जमु तिसु न बिदारै ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गढ़ = किले। कोट = किले। हमारै = मेरे वास्ते। कंटकु = काँटा (दुखदाई)। बिदारै = नाश करता।3।
अर्थ: हे भाई! मेरे वास्ते (तो) परमात्मा के चरणों की शरण अनेक किले हैं। इस (किले) को दुखद मौत (का डर) नाश नहीं कर सकता।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नानक दास सदा बलिहारी ॥ सेवक संत राजा राम मुरारी ॥४॥१९॥२५॥

मूलम्

नानक दास सदा बलिहारी ॥ सेवक संत राजा राम मुरारी ॥४॥१९॥२५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: राजा राम = हे प्रभु पातशाह! मुरारी = (मुरि+अरि) प्रभु।4।
अर्थ: हे नानक! (कह:) हे प्रभु-पातशाह! हे मुरारी! मैं तेरे सेवकों संतों से सदा सदके जाता हूँ (जिनकी संगति में तेरा नाम प्राप्त होता है)।4।19।25।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ गुण गोपाल प्रभ के नित गाहा ॥ अनद बिनोद मंगल सुख ताहा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ गुण गोपाल प्रभ के नित गाहा ॥ अनद बिनोद मंगल सुख ताहा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गाहा = गाएं। बिनोद = खुशी। ताहा = उन्हें।1।
अर्थ: हे सहेली! गोपाल प्रभु के गुण सदा गाते रहें। (जो गाते हैं) उन्हें सुख-आनंद-चाव-खुशियां बनीं रहती हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

चलु सखीए प्रभु रावण जाहा ॥ साध जना की चरणी पाहा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

चलु सखीए प्रभु रावण जाहा ॥ साध जना की चरणी पाहा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सखीए = हे सखी! रावण जाहा = स्मरण करने के लिए चलें। पाहा = पाएं।1। रहाउ।
अर्थ: हे सहेली! उठ, प्रभु का स्मरण करने चलें, संत जनों के चरणों में जा पड़ें।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

करि बेनती जन धूरि बाछाहा ॥ जनम जनम के किलविख लाहां ॥२॥

मूलम्

करि बेनती जन धूरि बाछाहा ॥ जनम जनम के किलविख लाहां ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बाछाहा = मांगें। किलविख = पाप। लाहां = दूर कर लें।2।
अर्थ: हे सहेली! (प्रभु के आगे) विनती कर के (उससे) संतजनों की चरणधूल मांगें, (और अपने) अनेक जन्मों के पाप दूर कर लें।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मनु तनु प्राण जीउ अरपाहा ॥ हरि सिमरि सिमरि मानु मोहु कटाहां ॥३॥

मूलम्

मनु तनु प्राण जीउ अरपाहा ॥ हरि सिमरि सिमरि मानु मोहु कटाहां ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अरपाहा = भेटा कर दें। मानु = अहंकार। कटाहां = काट लें।3।
अर्थ: हे सहेली! अपना मन-तन-जिंद-जान भेट कर दे। हर वक्त परमात्मा का नाम स्मरण कर-कर के (अपने अंदर से) अहंकार और मोह दूर कर ले।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दीन दइआल करहु उतसाहा ॥ नानक दास हरि सरणि समाहा ॥४॥२०॥२६॥

मूलम्

दीन दइआल करहु उतसाहा ॥ नानक दास हरि सरणि समाहा ॥४॥२०॥२६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: उतसाहु = उत्साह। समाहा = लीन हो जाएं।4।
अर्थ: हे नानक! (कह:) हे दीनों पर दया करने वाले प्रभु! (मेरे अंदर) उत्साह पैदा कर (कि) मैं तेरे दासों की शरण पड़ा रहूँ।4।20।26।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ बैकुंठ नगरु जहा संत वासा ॥ प्रभ चरण कमल रिद माहि निवासा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ बैकुंठ नगरु जहा संत वासा ॥ प्रभ चरण कमल रिद माहि निवासा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बैकुंठ = विष्णु का स्वर्ग। रिद = हृदय।1।
अर्थ: हे भाई! जिस जगह (परमात्मा के) संत जन बसते हों, वही है (असल) बैकुंठ का शहर। (संत जनों की संगति में रह के) प्रभु के सोहणे चरण हृदय में आ बसते हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुणि मन तन तुझु सुखु दिखलावउ ॥ हरि अनिक बिंजन तुझु भोग भुंचावउ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सुणि मन तन तुझु सुखु दिखलावउ ॥ हरि अनिक बिंजन तुझु भोग भुंचावउ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दिखलावउ = मैं दिखाऊँ। बिंजन = स्वादिष्ट भोजन। भुंचावउ = मैं खिलाऊँ।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (मेरी बात) सुन, (आ) मैं (तेरे) मन को (तेरे) तन को आत्मिक आनंद दिखा दूँ। प्रभु का नाम (मानो) अनेक स्वादिष्ट भोजन हैं, (आ, साधु-संगत में) मैं तुझे वह स्वादिष्ट भोजन खिलाऊँ।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अम्रित नामु भुंचु मन माही ॥ अचरज साद ता के बरने न जाही ॥२॥

मूलम्

अम्रित नामु भुंचु मन माही ॥ अचरज साद ता के बरने न जाही ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाला। भुंचु = खा। सदु = स्वाद।2।
अर्थ: हे भाई! (साधु-संगत में रह के) आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम (-भोजन) अपने मन में खाया कर, इस भोजन के हैरान कर देने वाले स्वाद हैं, बयान नहीं किए जा सकते।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

लोभु मूआ त्रिसना बुझि थाकी ॥ पारब्रहम की सरणि जन ताकी ॥३॥

मूलम्

लोभु मूआ त्रिसना बुझि थाकी ॥ पारब्रहम की सरणि जन ताकी ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ताकी = देखी। बुझि थाकी = मिट के रह जाती है।3।
अर्थ: हे भाई! जिस संतों ने (साधु-संगत बैकुंठ में आ के) परमात्मा का आसरा लिया है (अनके अंदर से) लोभ समाप्त हो जाता है, तृष्णा की आग बुझ के खत्म हो जाती है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जनम जनम के भै मोह निवारे ॥ नानक दास प्रभ किरपा धारे ॥४॥२१॥२७॥

मूलम्

जनम जनम के भै मोह निवारे ॥ नानक दास प्रभ किरपा धारे ॥४॥२१॥२७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भै = डर। निवारे = दूर कर देता है।4।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘भै’ है ‘भउ’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे नानक! (कह: हे भाई!) प्रभु अपने दासों पर मेहर करता है, और, उनके अनेक जन्मों के डर-मोह दूर कर देता है।4।21।27।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ अनिक बींग दास के परहरिआ ॥ करि किरपा प्रभि अपना करिआ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ अनिक बींग दास के परहरिआ ॥ करि किरपा प्रभि अपना करिआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बींग = टेढ़ापन, छल कपट, कमियां। परहरिआ = दूर कर दिए। करि = कर के। प्रभि = प्रभु ने। करिआ = बना लिया।1।
अर्थ: हे भाई! प्रभु ने अपने सेवक के अनेक टेढ़-मेढ़ (छल कपट) दूर कर दिए, और कृपा करके उसको अपना बना लिया है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तुमहि छडाइ लीओ जनु अपना ॥ उरझि परिओ जालु जगु सुपना ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

तुमहि छडाइ लीओ जनु अपना ॥ उरझि परिओ जालु जगु सुपना ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तुमहि = तू खुद ही। जनु = सेवक। उरझि परिओ = उलझा पड़ा था।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! सपने जैसे जगत (के मोह) जाल (ने तेरे सेवक को चारों तरफ से) उलझा लिया है, पर तूने अपने सेवक को (उसमें से) स्वयं निकाल लिया।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

परबत दोख महा बिकराला ॥ खिन महि दूरि कीए दइआला ॥२॥

मूलम्

परबत दोख महा बिकराला ॥ खिन महि दूरि कीए दइआला ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: परबत दोख = पहाड़ जितने ऐब। बिकराला = डरावने।2।
अर्थ: हे भाई! (शरण आए मनुष्य के) पहाड़ों जितने बड़े और भयानक ऐब दीनों पर दया करने वाले परमात्मा ने एक छिन में दूर कर दिए।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सोग रोग बिपति अति भारी ॥ दूरि भई जपि नामु मुरारी ॥३॥

मूलम्

सोग रोग बिपति अति भारी ॥ दूरि भई जपि नामु मुरारी ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सोग = ग़म। जपि = जप के।3।
अर्थ: हे भाई! (सेवक के) अनेक ग़म और रोग बड़ी भारी मुसीबतें परमात्मा का नाम जपके दूर हो गई।3।

[[0743]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

द्रिसटि धारि लीनो लड़ि लाइ ॥ हरि चरण गहे नानक सरणाइ ॥४॥२२॥२८॥

मूलम्

द्रिसटि धारि लीनो लड़ि लाइ ॥ हरि चरण गहे नानक सरणाइ ॥४॥२२॥२८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: द्रिसटि = (कृपा की) नजर। धारि = कर के। लड़ि = लड़ से। गहे = पकड़े।4।
अर्थ: हे नानक! (कह: हे भाई!) जिस मनुष्य ने परमात्मा के चरण पकड़ लिए, जो मनुष्य प्रभु की शरण आ पड़ा, परमात्मा ने मेहर की निगाह करके उसको अपने साथ लगा लिया।4।22।28।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: सारा शब्द ‘भूत काल’ में है, इस का भाव ‘सदा वास्ते’ समझना है। अर्थ ‘वर्तमान काल’ में कर लेना है।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ दीनु छडाइ दुनी जो लाए ॥ दुही सराई खुनामी कहाए ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ दीनु छडाइ दुनी जो लाए ॥ दुही सराई खुनामी कहाए ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दीनु = धर्म, नाम धन। दुनी = दुनियावी। जो = जिस मनुष्य को। लाए = (परमात्मा) लगाता है। दुही सराई = दोनों लोकों में। खुनामी = गुनाहगार, अपराधी। कहाए = कहलवाता है।1।
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य को परमात्मा का नाम-धन कमाने से हटा के दुनियावी धन की ओर लगा देता है, वह मनुष्य दोनों जहानों में (इस लोक में और परलोक में) गुनहगार कहलवाता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जो तिसु भावै सो परवाणु ॥ आपणी कुदरति आपे जाणु ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

जो तिसु भावै सो परवाणु ॥ आपणी कुदरति आपे जाणु ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तिसु = उस (परमात्मा) को। भावै = अच्छा लगता है। जाणु = जानने वाला।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा अपनी रची सृष्टि के बारे में स्वयं ही सब कुछ जानने वाला है। जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है, जीवों को वही कुछ सिर माथे मानना पड़ता है (वही कुछ जीव करते हैं)।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सचा धरमु पुंनु भला कराए ॥ दीन कै तोसै दुनी न जाए ॥२॥

मूलम्

सचा धरमु पुंनु भला कराए ॥ दीन कै तोसै दुनी न जाए ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सचा = सदा कायम रहने वाला। भला = भला काम। दीन कै तोसै = नाम धन इकट्ठे करने से। न जाए = नहीं बिगड़ता।2।
अर्थ: हे भाई! (जिस मनुष्य से परमात्मा) सदा-स्थिर रहने वाला (नाम-स्मरण) धर्म करवाता है, (नाम-स्मरण का) नेक भला काम करवाता है, नाम-धन इकट्ठा करते हुए उसकी ये दुनिया भी नहीं बिगड़ती।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सरब निरंतरि एको जागै ॥ जितु जितु लाइआ तितु तितु को लागै ॥३॥

मूलम्

सरब निरंतरि एको जागै ॥ जितु जितु लाइआ तितु तितु को लागै ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सरब निरंतरि = सबके अंदर एक रस (अंतरि = दूरी)। एको = एक परमात्मा ही। जितु = जिस तरफ। को = कोई।3।
अर्थ: हे भाई! (जीवों के भी क्या वश?) हरेक जीव उसी उसी काम में लगता है जिस जिस काम में परमात्मा लगाता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अगम अगोचरु सचु साहिबु मेरा ॥ नानकु बोलै बोलाइआ तेरा ॥४॥२३॥२९॥

मूलम्

अगम अगोचरु सचु साहिबु मेरा ॥ नानकु बोलै बोलाइआ तेरा ॥४॥२३॥२९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अगम = अगम्य (पहुँच से परे)। अगोचरु = (अ+गो+चरु। गो = ज्ञान-इंद्रिय) जिस तक ज्ञान-इंद्रिय की पहुँच नहीं हो सकती। सचु = सदा स्थिर रहने वाला।4।
अर्थ: हे प्रभु! तू सदा कायम रहने वाला मेरा मालिक है, तू अगम्य (पहुँच से परे) है, ज्ञान-इंद्रिय के माध्यम से तेरे तक पहुँचा नहीं जा सकता। (तेरा दास) नानक तेरे से प्रेरित हो के ही तेरा नाम उचार सकता है।4।23।29।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ प्रातहकालि हरि नामु उचारी ॥ ईत ऊत की ओट सवारी ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ प्रातहकालि हरि नामु उचारी ॥ ईत ऊत की ओट सवारी ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कालि = समय में। प्रातह = प्रभात, सवेर। प्रातह काल = अमृत बेला। उचारी = उचारा कर। ईत ऊत की = इस लोक की परलोक की। ओट = आसरा। सवारी = सुंदर बना लेना।1।
अर्थ: हे भाई! अमृत बेला में (उठ के) परमात्मा का नाम स्मरण किया कर, (इस तरह) इस लोक और परलोक के लिए सुंदर आसरा बनाते रहा कर।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सदा सदा जपीऐ हरि नाम ॥ पूरन होवहि मन के काम ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सदा सदा जपीऐ हरि नाम ॥ पूरन होवहि मन के काम ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जपीऐ = जपना चाहिए। होवहि = हो जाते हैं। मन के काम = मन के कल्पित काम।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! सदा ही परमात्मा का नाम स्मरण करते रहना चाहिए। (नाम-जपने की इनायत से) मन के चितवे हुए सारे काम सफल हो जाते हैं।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रभु अबिनासी रैणि दिनु गाउ ॥ जीवत मरत निहचलु पावहि थाउ ॥२॥

मूलम्

प्रभु अबिनासी रैणि दिनु गाउ ॥ जीवत मरत निहचलु पावहि थाउ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अबिनासी = नाश रहित। रैणि = रात। गाउ = गाया कर। जीवत मरत = दुनिया के कार्य व्यवहार करते हुए, निर्मोह रहने से। पावहि = तू प्राप्त कर लेगा।2।
अर्थ: हे भाई! रात-दिन अविनाशी प्रभु (की महिमा के गीत) गाया कर। (इस तरह) दुनिया के कार्य व्यवहार करते हुए निर्मोह रह के तू (प्रभु-चरणों में) सदा कायम रहने वाली जगह प्राप्त कर लेगा।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सो साहु सेवि जितु तोटि न आवै ॥ खात खरचत सुखि अनदि विहावै ॥३॥

मूलम्

सो साहु सेवि जितु तोटि न आवै ॥ खात खरचत सुखि अनदि विहावै ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साहु = शाह, नाम धन का मालिक। सेवि = शरण पड़ा रह। जितु = जिस (धन) में। तोटि = कमी। खात खरचत = बर्तते और बाँटते हुए। सुखि = सुख में। विहावै = उम्र बीतती है।3।
अर्थ: हे भाई! नाम-धन के मालिक उस प्रभु की सेवा-भक्ति किया कर, (उससे ऐसा धन मिलता है) जिस धन में कभी घाटा नहीं पड़ता। उस धन को खुद इस्तेमाल करते हुए औरों में बाँटते हुए जिंदगी सुख-आनंद से बीतती है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जगजीवन पुरखु साधसंगि पाइआ ॥ गुर प्रसादि नानक नामु धिआइआ ॥४॥२४॥३०॥

मूलम्

जगजीवन पुरखु साधसंगि पाइआ ॥ गुर प्रसादि नानक नामु धिआइआ ॥४॥२४॥३०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पुरखु = सर्व व्यापक प्रभु। संगि = संगति में। प्रसादि = कृपा से।4।
अर्थ: हे नानक! जिस मनुष्य ने साधु-संगत में गुरु की कृपा से परमात्मा का नाम स्मरणा शुरू कर दिया, उसने जगत के जीवन सर्व-व्यापक प्रभु का मिलाप हासिल कर लिया।4।24।30।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ गुर पूरे जब भए दइआल ॥ दुख बिनसे पूरन भई घाल ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ गुर पूरे जब भए दइआल ॥ दुख बिनसे पूरन भई घाल ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दइआल = दयावान। बिनसे = नाश हो जाते हैं। पूरन = सफल। घाल = (सेवा भक्ति की) मेहनत।1।
अर्थ: हे भाई! जब (किसी मनुष्य पर) पूरे सतिगुरु जी दयावान होते हैं (वह मनुष्य हरि-नाम स्मरण करता है, उसकी ये) मेहनत सफल हो जाती है, और उसके सारे दुख नाश हो जाते हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पेखि पेखि जीवा दरसु तुम्हारा ॥ चरण कमल जाई बलिहारा ॥ तुझ बिनु ठाकुर कवनु हमारा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

पेखि पेखि जीवा दरसु तुम्हारा ॥ चरण कमल जाई बलिहारा ॥ तुझ बिनु ठाकुर कवनु हमारा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पेखि = देख के। जीवा = मैं आत्मिक जीवन प्राप्त करता रहूँ। जाई = मैं जाऊँ। बलिहारा = सदके। ठाकुर = हे मालिक!।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! (मेहर कर) तेरे दर्शन सदा कर कर के मुझे आत्मिक जीवन मिलता रहे, मैं तेरे सुंदर चरणों से सदके होता रहूँ।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

साधसंगति सिउ प्रीति बणि आई ॥ पूरब करमि लिखत धुरि पाई ॥२॥

मूलम्

साधसंगति सिउ प्रीति बणि आई ॥ पूरब करमि लिखत धुरि पाई ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सिउ = साथ। पूरबि करमि = पूबर्लि जन्मों के किए कर्मों के अनुसार। धुरि = धुर दरगाह से।2।
अर्थ: हे भाई! पूर्बले जन्मों के किए कर्मों के अनुसार धुर दरगाह से जिस मनुष्य के लिखे लेख उघड़ते हैं, उस मनुष्य का प्यार गुरु की संगति से बन जाता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जपि हरि हरि नामु अचरजु परताप ॥ जालि न साकहि तीने ताप ॥३॥

मूलम्

जपि हरि हरि नामु अचरजु परताप ॥ जालि न साकहि तीने ताप ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अचरजु = हैरान करने वाला। परताप = तेज। जालि न साकहि = जला नहीं सकेंगे। तीने ताप = आधि, ब्याधि, उपाधि ये तीन ताप।3।
अर्थ: हे भाई! सदा परमात्मा का नाम जपा कर, ऐसा हैरान करने वाला आत्मिक तेज प्राप्त होता है कि (आधि-व्याधि-उपाधि, ये) तीनों ही ताप (आत्मिक जीवन को) जला नहीं सकेंगे।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

निमख न बिसरहि हरि चरण तुम्हारे ॥ नानकु मागै दानु पिआरे ॥४॥२५॥३१॥

मूलम्

निमख न बिसरहि हरि चरण तुम्हारे ॥ नानकु मागै दानु पिआरे ॥४॥२५॥३१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: निमख = आँख झपकने जितना समय। हरि = हे हरि! नानकु मागै = नानक माँगता है।4।
अर्थ: हे हरि! हे प्यारे! (तेरे दर से तेरा दास) नानक (ये) दान माँगता है कि तेरे चरण (नानक को) आँख झपकने जितने समय के लिए भी ना भूलें।4।25।31।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ से संजोग करहु मेरे पिआरे ॥ जितु रसना हरि नामु उचारे ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ से संजोग करहु मेरे पिआरे ॥ जितु रसना हरि नामु उचारे ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: से = वह (बहुवचन)। संजोग = शुभ लगन। जितु = जिस (अच्छे वक्त) के कारण। रसना = जीभ।1।
अर्थ: हे मेरे प्यारे! (मेरे लिए) वह संयोग बना, जिससे (मेरी) जीभ तेरा नाम उचारती रहे।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुणि बेनती प्रभ दीन दइआला ॥ साध गावहि गुण सदा रसाला ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सुणि बेनती प्रभ दीन दइआला ॥ साध गावहि गुण सदा रसाला ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभ = हे प्रभु! गावहि = गाते हैं। रसाला = रस भरे।1। रहाउ।
अर्थ: हे दीनों पर दया करने वाले प्रभु! (मेरी) विनती सुन, (जैसे) संत जन सदा तेरे रस भरे गुण गाते रहते हैुं (वैसे ही मैं भी गाता रहूँ)।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जीवन रूपु सिमरणु प्रभ तेरा ॥ जिसु क्रिपा करहि बसहि तिसु नेरा ॥२॥

मूलम्

जीवन रूपु सिमरणु प्रभ तेरा ॥ जिसु क्रिपा करहि बसहि तिसु नेरा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बसहि = तू बसता है। नेरा = नजदीक, हृदय में।2।
अर्थ: हे प्रभु! तेरा नाम स्मरणा (हम जीवों के लिए) आत्मिक जीवन के बराबर है। जिस मनुष्य पर तू कृपा करता है, उसके दिल में आ बसता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जन की भूख तेरा नामु अहारु ॥ तूं दाता प्रभ देवणहारु ॥३॥

मूलम्

जन की भूख तेरा नामु अहारु ॥ तूं दाता प्रभ देवणहारु ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आहारु = खुराक।3।
अर्थ: हे प्रभु! तेरे संत-जनों की (आत्मिक) भूख (दूर करने के लिए) तेरा नाम खुराक है। ये खुराक तू ही देता है, तू ही दे सकता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

राम रमत संतन सुखु माना ॥ नानक देवनहार सुजाना ॥४॥२६॥३२॥

मूलम्

राम रमत संतन सुखु माना ॥ नानक देवनहार सुजाना ॥४॥२६॥३२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रमत = स्मरण करते हुए। सुजाना = समझदार।4।
अर्थ: हे नानक! संत-जन उस परमात्मा का नाम स्मरण करके आत्मिक आनंद लेते रहते हैं, जो सब कुछ देने के समर्थ है और जो (हर पहलू से) समझदार है।4।26।32।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ बहती जात कदे द्रिसटि न धारत ॥ मिथिआ मोह बंधहि नित पारच ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ बहती जात कदे द्रिसटि न धारत ॥ मिथिआ मोह बंधहि नित पारच ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बहती जात = (उम्र की नदी) बहती जा रही है। द्रिसटि = निगाह, ध्यान। मिथिआ = नाशवान। पारच = कपड़े, बंधन। मिथिआ मोह पारच = नाशवान पदार्थों के मोह के बंधन। बंधहि = तू बाँधता है।1।
अर्थ: हे भाई! (तेरी उम्र की नदी) बहती जा रही है, पर तू इधर ध्यान नहीं करता। तू नाशवान पदार्थों के मोह के बंधन ही सदा बाँधता रहता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

माधवे भजु दिन नित रैणी ॥ जनमु पदारथु जीति हरि सरणी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

माधवे भजु दिन नित रैणी ॥ जनमु पदारथु जीति हरि सरणी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: माधवे = (मा+धव = माया का पति) परमात्मा को। भजु = स्मरण करता रह। रैणी = रात। जीति = जीत ले।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! दिन-रात सदा माया के पति प्रभु का नाम जपा कर। प्रभु की शरण पड़ कर कीमती मानव जन्म का फायदा उठा ले।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

करत बिकार दोऊ कर झारत ॥ राम रतनु रिद तिलु नही धारत ॥२॥

मूलम्

करत बिकार दोऊ कर झारत ॥ राम रतनु रिद तिलु नही धारत ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दोऊ कर = दोनों हाथ। दोऊ कर झारत = दोनों हाथ झाड़ के, दोनों हाथ धो के, अगला पिछला सोचे बिना। रिद = हृदय में। तिलु = रक्ती भर समय के लिए भी।2।
अर्थ: हे भाई! तू हानि-लाभ विचारे बिना ही विकार किए जा रहा है परमात्मा का रत्न (जैसा कीमती) नाम अपने दिल में तू एक पल के लिए भी नहीं टिकाता।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

भरण पोखण संगि अउध बिहाणी ॥ जै जगदीस की गति नही जाणी ॥३॥

मूलम्

भरण पोखण संगि अउध बिहाणी ॥ जै जगदीस की गति नही जाणी ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भरण पोखण = पालन पोषण। संगि = साथ। अउध = उम्र। जै जगदीस = जगत के ईश (मालिक) की जै हो, परमात्मा की महिमा। गति = आत्मिक अवस्था, आत्मिक आनंद की अवस्था।3।
अर्थ: हे भाई! (अपना शरीर) पालने-पोसने में ही तेरी उम्र बीतती जा रही है। परमात्मा की महिमा के आनंद की अवस्था तू (अब तक) समझी ही नहीं।3।

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विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ रहणु न पावहि सुरि नर देवा ॥ ऊठि सिधारे करि मुनि जन सेवा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ रहणु न पावहि सुरि नर देवा ॥ ऊठि सिधारे करि मुनि जन सेवा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रहणु = सदा का ठिकाना। न पावहि = नहीं हासिल कर सकते। सुरि नर = दैवी मनुष्य। देवा = देवते। ऊठि सिधारे = उठ के चल पड़े। करि = कर के।1।
अर्थ: हे भाई! (अनेक मनुष्य अपने आप को) दैवी मनुष्य, देवते (कहलवा गए, अनेक अपने आप को) ऋषी मुनी (कहलवा गए, अनेक ही उनकी) सेवा कर के (जगत से आखिर अपनी-अपनी बारी) चले जाते रहे, (कोई भी यहाँ) सदा के लिए टिका नहीं रह सकता।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जीवत पेखे जिन्ही हरि हरि धिआइआ ॥ साधसंगि तिन्ही दरसनु पाइआ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

जीवत पेखे जिन्ही हरि हरि धिआइआ ॥ साधसंगि तिन्ही दरसनु पाइआ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जीवत = जीवित, आत्मिक जीवन वाले। पेखे = देखे है। संगि = संगति में। तिनी = उन्होंने ही।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! आत्मिक जीवन वाले (सफल जीवन वाले सिर्फ वही) देखे जाते हैं जिन्होंने परमात्मा का स्मरण किया है, उन्होंने ही साधु-संगत में टिक के परमात्मा के दर्शन किए हैं।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बादिसाह साह वापारी मरना ॥ जो दीसै सो कालहि खरना ॥२॥

मूलम्

बादिसाह साह वापारी मरना ॥ जो दीसै सो कालहि खरना ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साह = शाह। दीसै = दिखता है। सो = उस को। कालहि = काल ने। खरना = ले जाना है।2।
अर्थ: हे भाई! शाह, व्यापारी, बादशाह (सबने आखिर) मरना है। जो भी कोई (यहाँ) दिखता है, हरेक को मौत ने ले जाना है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कूड़ै मोहि लपटि लपटाना ॥ छोडि चलिआ ता फिरि पछुताना ॥३॥

मूलम्

कूड़ै मोहि लपटि लपटाना ॥ छोडि चलिआ ता फिरि पछुताना ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मोहि = मोह में। छोडि = छोड़ के।3।
अर्थ: हे भाई! मनुष्य सदा झूठे मोह में फसा रहता है (और परमात्मा को भुलाए रखता है, पर जब दुनिया के पदार्थ) छोड़ के चलता है, तब पछताता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

क्रिपा निधान नानक कउ करहु दाति ॥ नामु तेरा जपी दिनु राति ॥४॥८॥१४॥

मूलम्

क्रिपा निधान नानक कउ करहु दाति ॥ नामु तेरा जपी दिनु राति ॥४॥८॥१४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: क्रिपा निधान = हे कृपा के खजाने! जपी = मैं जपता रहूँ।4।
अर्थ: हे कृपा के खजाने प्रभु! (मुझे) नानक को (ये) दाति दे (कि) मैं (नानक) दिन-रात तेरा नाम जपता रहूँ।4।8।14।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ घट घट अंतरि तुमहि बसारे ॥ सगल समग्री सूति तुमारे ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ घट घट अंतरि तुमहि बसारे ॥ सगल समग्री सूति तुमारे ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: घट = शरीर। घट घट अंतरि = हरेक शरीर में। तुमहि = तुम ही। बसारे = बस रहा है। सगल समग्री = सारी चीजें। सूति = धागे में।1।
अर्थ: हे प्रभु! हरेक शरीर में तू ही बसता है, (दुनिया की) सारी चीजें तेरी ही मर्यादा के धागे में (परोई हुई) हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तूं प्रीतम तूं प्रान अधारे ॥ तुम ही पेखि पेखि मनु बिगसारे ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

तूं प्रीतम तूं प्रान अधारे ॥ तुम ही पेखि पेखि मनु बिगसारे ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रान अधारे = जिंद का आसरा। पेखि = देख के। बिगसारे = खिलता है।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! तू हमारा प्रीतम है, तू हमारी जिंद का आसरा है। तुझे ही देख-देख के (हमारा) मन खुश होता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनिक जोनि भ्रमि भ्रमि भ्रमि हारे ॥ ओट गही अब साध संगारे ॥२॥

मूलम्

अनिक जोनि भ्रमि भ्रमि भ्रमि हारे ॥ ओट गही अब साध संगारे ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भ्रमि = भटक के। हारे = थक जाते हैं। गही = पकड़ी। अब = अब, मानव जन्म में।2।
अर्थ: हे प्रभु! (तुझसे विछुड़ के जीव) अनेक जूनियों में भटक-भटक के थक जाते हैं। मानव जनम में आ के (तेरी मेहर से) साधु-संगत का आसरा लेते हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अगम अगोचरु अलख अपारे ॥ नानकु सिमरै दिनु रैनारे ॥३॥९॥१५॥

मूलम्

अगम अगोचरु अलख अपारे ॥ नानकु सिमरै दिनु रैनारे ॥३॥९॥१५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अगम = अगम्य (पहुँच से परे)। अगोचरु = (अ+गो+चरु) जिस तक ज्ञान-इंद्रिय की पहुँच ना हो सके। अपारे = बेअंत। नानक सिमरै = नानक स्मरण करता है। रैनारे = रात।3।
अर्थ: हे भाई! (साधु-संगत की इनायत से) नानक दिन-रात उस परमात्मा का नाम स्मरण करता है जो अगम्य (पहुँच से परे) है, जिस तक ज्ञान-इंद्रिय की पहुँच नहीं हो सकती, जो मनुष्य की समझ से परे है, और जो बेअंत है।3।9।15।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ कवन काज माइआ वडिआई ॥ जा कउ बिनसत बार न काई ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ कवन काज माइआ वडिआई ॥ जा कउ बिनसत बार न काई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कवन काज = किस काम का? कउ = जिस (माया) को। बार = देर। कई बार = कोई भी देर।1।
अर्थ: हे भाई! जिस माया के नाश होने में रक्ती भर भी समय नहीं लगता, उस माया के कारण मिली बड़ाई भी किसी काम की नहीं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

इहु सुपना सोवत नही जानै ॥ अचेत बिवसथा महि लपटानै ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

इहु सुपना सोवत नही जानै ॥ अचेत बिवसथा महि लपटानै ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जानै = जानता, समझता। अचेत = गाफल। बिवसथा = हालत। लपटानै = लिपटा रहता है।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! ये (जगत ऐसे है, जैसे) सपना (होता) है, (सपने में) सोया हुआ मनुष्य (ये) नहीं जानता (कि मैं सोया हुआ हूँ, और सपना देख रहा हूँ।
इसी तरह मनुष्य जगत के मोह वाली) गाफल हालत में (जगत के मोह के साथ) चिपका रहता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

महा मोहि मोहिओ गावारा ॥ पेखत पेखत ऊठि सिधारा ॥२॥

मूलम्

महा मोहि मोहिओ गावारा ॥ पेखत पेखत ऊठि सिधारा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मोहि = मोह में। मोहिओ = मोहा रहता है, मस्त रहता है। गावारा = मूर्ख। सिधारा = चल पड़ता है।2।
अर्थ: हे भाई! मूर्ख मनुष्य माया के बड़े मोह में मस्त रहता है, पर देखते-देखते ही (यहाँ से) उठ के चल पड़ता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ऊच ते ऊच ता का दरबारा ॥ कई जंत बिनाहि उपारा ॥३॥

मूलम्

ऊच ते ऊच ता का दरबारा ॥ कई जंत बिनाहि उपारा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ता का = उस (परमात्मा) का। बिनाहि = नाश कर के। उपारा = पैदा करता है।3।
अर्थ: हे भाई! (परमात्मा का नाम ही जप) उसका दरबार ऊँचे से ऊँचा है। वह अनेक जीवों का नाश भी करता है, और, पैदा भी करता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दूसर होआ ना को होई ॥ जपि नानक प्रभ एको सोई ॥४॥१०॥१६॥

मूलम्

दूसर होआ ना को होई ॥ जपि नानक प्रभ एको सोई ॥४॥१०॥१६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: को = कोई। होई = होगा।4।
अर्थ: हे नानक! उस एक परमात्मा का नाम ही जपा कर, जिस जैसा और कोई दूसरा ना अभी तक कोई हुआ है, ना ही (आगे) होगा।4।10।16।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ सिमरि सिमरि ता कउ हउ जीवा ॥ चरण कमल तेरे धोइ धोइ पीवा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ सिमरि सिमरि ता कउ हउ जीवा ॥ चरण कमल तेरे धोइ धोइ पीवा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ता कउ = उस (परमात्मा के नाम) को। हउ = मैं। जीवा = मैं आत्मिक जीवन हासिल करता हूँ। पीवा = मैं पीता हूँ।1।
अर्थ: हे भाई! (भक्तजनों के अंग-संग रहने वाले) उस (प्रभु के नाम) को मैं सदा स्मरण करके आत्मिक जीवन हासिल कर रहा हूँ। हे प्रभु! मैं तेरे सोहणे चरण धो-धो के (नित्य) पीता हूँ।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सो हरि मेरा अंतरजामी ॥ भगत जना कै संगि सुआमी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सो हरि मेरा अंतरजामी ॥ भगत जना कै संगि सुआमी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंतरजामी = हरेक के दिल की जानने वाला। कै संगि = के साथ।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! मालिक प्रभु अपने भक्त जनों के साथ बसता है। मेरा वह हरि-प्रभु हरेक के दिल की जानने वाला है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुणि सुणि अम्रित नामु धिआवा ॥ आठ पहर तेरे गुण गावा ॥२॥

मूलम्

सुणि सुणि अम्रित नामु धिआवा ॥ आठ पहर तेरे गुण गावा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सुणि = सुन के। धिआवा = ध्याऊँ। गावा = गाऊँ।2।
अर्थ: हे प्रभु! बार बार (ये) सुन के (कि तेरा) नाम आत्मिक जीवन देने वाला (है,) मैं (तेरा नाम) स्मरण करता रहता हूँ, आठों पहर मैं तेरी महिमा के गीत गाता रहता हूँ।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पेखि पेखि लीला मनि आनंदा ॥ गुण अपार प्रभ परमानंदा ॥३॥

मूलम्

पेखि पेखि लीला मनि आनंदा ॥ गुण अपार प्रभ परमानंदा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पेखि = देख के। लीला = करिश्मे, खेल। मनि = मन में। प्रभ = हे प्रभु! परमानंदा = परम आनंद का मालिक।3।
अर्थ: हे सबसे ऊँचे आनंद के मालिक प्रभु! तेरे गुण बेअंत हैं, तेरे करिश्मे देख-देख के मेरे मन में आनंद पैदा होता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जा कै सिमरनि कछु भउ न बिआपै ॥ सदा सदा नानक हरि जापै ॥४॥११॥१७॥

मूलम्

जा कै सिमरनि कछु भउ न बिआपै ॥ सदा सदा नानक हरि जापै ॥४॥११॥१७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कै सिमरनि = के स्मरण से। बिआपै = जोर डाल सकता। जापै = जपा कर।4।
अर्थ: हे नानक! तू भी सदा उस हरि का नाम जपा कर, जिसके नाम-जपने की इनायत से कोई डर छू नहीं सकता।4।11।17।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ गुर कै बचनि रिदै धिआनु धारी ॥ रसना जापु जपउ बनवारी ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ गुर कै बचनि रिदै धिआनु धारी ॥ रसना जापु जपउ बनवारी ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कै बचनि = के वचनों से। रिदै = हृदय में। धारी = मैं धारण करता हूँ। रसना = जीभ (से)। जपउ = मैं जपता हूँ। बनवारी = (वनमालिन् = जंगली फूलों की माला वाला) परमात्मा।1।
अर्थ: हे भाई! गुरु के शब्द के द्वारा मैं अपने दिल में परमात्मा का ध्यान धरता हूँ, और अपनी जीभ से परमात्मा (के नाम) का जाप जपता हूँ।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सफल मूरति दरसन बलिहारी ॥ चरण कमल मन प्राण अधारी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सफल मूरति दरसन बलिहारी ॥ चरण कमल मन प्राण अधारी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मूरति = हस्ती, अस्तित्व, स्वरूप। सफल मूरति = (वह गुरु) जिसका वजूद मानव जनम का फल देने वाला है। बलिहारी = सदके। चरण कमल = कमल फूलों जैसे कोमल चरण। अधारी = आसरा बनाता हूँ।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! गुरु की हस्ती मानव जन्म का फल देने वाली है। मैं (गुरु के) दर्शनों से सदके जाता हूँ। गुरु के कोमल चरणों को मैं अपने मन का जिंद का आसरा बनाता हूँ।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

साधसंगि जनम मरण निवारी ॥ अम्रित कथा सुणि करन अधारी ॥२॥

मूलम्

साधसंगि जनम मरण निवारी ॥ अम्रित कथा सुणि करन अधारी ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साध संगि = गुरु की संगति में। निवारी = मैं करता हूँ। अंम्रित कथा = आत्मिक जीवन देने वाली महिमा। करन अधारी = कानों को आसरा देता हूँ।2।
अर्थ: हे भाई! गुरु की संगति में (रह के) मैंने जनम-मरण का चक्कर समाप्त कर लिया है, और आत्मिक जीवन देने वाली महिमा कानों से सुन कर (इस को मैं अपने जीवन का) आसरा बना रहा हूँ।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

काम क्रोध लोभ मोह तजारी ॥ द्रिड़ु नाम दानु इसनानु सुचारी ॥३॥

मूलम्

काम क्रोध लोभ मोह तजारी ॥ द्रिड़ु नाम दानु इसनानु सुचारी ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तजारी = त्यागता हूँ। द्रिढ़ु = (हृदय में) पक्का ठिकाना। दानु = दूसरों की सेवा। इसनानु = पवित्र आचरण। सुचारी = सदाचार, अच्छी जीवन मर्यादा।3।
अर्थ: हे भाई! (गुरु की इनायत से) मैंने काम-क्रोध-लोभ-मोह (आदि) को त्याग दिया है। हृदय में प्रभु-नाम को पक्का करके, दूसरों की सेवा करनी, आचरण को पवित्र रखना- ये मैंने अपना सदाचार (जीवन-मर्यादा) बना लिया है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कहु नानक इहु ततु बीचारी ॥ राम नाम जपि पारि उतारी ॥४॥१२॥१८॥

मूलम्

कहु नानक इहु ततु बीचारी ॥ राम नाम जपि पारि उतारी ॥४॥१२॥१८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नानक = हे नानक! ततु = निचोड़, अस्लियत। जपि = जप के। उतारी = उतार के, पार करके।4।
अर्थ: हे नानक! कह: (हे भाई! तू भी) ये अस्लियत अपने मन में बसा ले, और गुरु के माध्यम से परमात्मा का नाम जप के (अपने आप को संसार-समुंदर से) पार लंघा ले।4।12।18।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ लोभि मोहि मगन अपराधी ॥ करणहार की सेव न साधी ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ लोभि मोहि मगन अपराधी ॥ करणहार की सेव न साधी ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: लोभि = लोभ में। मोहि = मोह में। मगन = डूबे हुए, मस्त। अपराधी = भूल करने वाले जीव। सेव = भक्ति।1।
अर्थ: हे प्रभु! हम भूल करने वाले जीव लोभ में, मोह में मस्त रहते हैं। तू हमें पैदा करने वाला है, हम तेरी सेवा-भक्ति नहीं करते।1।

[[0741]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

पतित पावन प्रभ नाम तुमारे ॥ राखि लेहु मोहि निरगुनीआरे ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

पतित पावन प्रभ नाम तुमारे ॥ राखि लेहु मोहि निरगुनीआरे ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पतित पावन = विकारों में गिरे हुओं को पवित्र करने वाला। मोहि = मुझे।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! तेरा नाम विकारियों को पवित्र करने वाला है। मुझे गुण-हीन को (अपना नाम दे के) विकारों से बचाए रख।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तूं दाता प्रभ अंतरजामी ॥ काची देह मानुख अभिमानी ॥२॥

मूलम्

तूं दाता प्रभ अंतरजामी ॥ काची देह मानुख अभिमानी ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभ = हे प्रभु! अंतरजामी = दिल की जानने वाला। काची देह = नाशवान शरीर।2।
अर्थ: हे प्रभु! तू हमें सब दातें देने वाला है, हमारे दिल की जानने वाला है। पर, हम जीव इस नाशवान शरीर का ही गुमान करते रहते हैं (और, तुझे याद नहीं करते)।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुआद बाद ईरख मद माइआ ॥ इन संगि लागि रतन जनमु गवाइआ ॥३॥

मूलम्

सुआद बाद ईरख मद माइआ ॥ इन संगि लागि रतन जनमु गवाइआ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बाद = झगड़े। ईरख = जलन, ईष्या। मद = अहंकार, नशा। संगि = साथ।3।
अर्थ: हे प्रभु! (दुनिया के पदार्थों के) चस्के, झगड़े, ईष्या, माया का घमण्ड- हम जीव इनमें ही लग के कीमती मानव जन्म को गवा रहे हैं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दुख भंजन जगजीवन हरि राइआ ॥ सगल तिआगि नानकु सरणाइआ ॥४॥१३॥१९॥

मूलम्

दुख भंजन जगजीवन हरि राइआ ॥ सगल तिआगि नानकु सरणाइआ ॥४॥१३॥१९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दुख भंजन = हे दुखों के नाश करने वाले! तिआगि = त्याग के।4।
अर्थ: हे दुखों के नाश करने वाले! हे जगत के जीवन! हे प्रभु पातशाह! और सारे (आसरे छोड़ के) नानक तेरी शरण आया है।4।13।19।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ पेखत चाखत कहीअत अंधा सुनीअत सुनीऐ नाही ॥ निकटि वसतु कउ जाणै दूरे पापी पाप कमाही ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ पेखत चाखत कहीअत अंधा सुनीअत सुनीऐ नाही ॥ निकटि वसतु कउ जाणै दूरे पापी पाप कमाही ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: चाखत = (चक्ष्) देखना। पेखत चाखत = देखता चाखता। सुनीअत = सुनते हुए। निकटि = नजदीक। कमाही = कमाते हैं।1।
अर्थ: हे भाई! (परमात्मा हर वक्त मनुष्य के अंग-संग बसता है, पर मनुष्य उसको देखता नहीं। इस वास्ते, दुनिया के और सारे पदार्थ) देखते-चाखते हुए भी (आत्मिक जीवन की ओर से) अंधा ही कहा जा सकता है, (दुनिया के और राग नाद) सुनता हुआ भी (परमात्मा की) महिमा नहीं सुन रहा (आत्मिक जीवन की तरफ से बहरा ही है)। नजदीक बस रहे (नाम-) पदार्थ को कहीं दूर समझता है। (इस कमी के कारण) विकारों में फंसे हुए मनुष्य विकार ही करते रहते हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सो किछु करि जितु छुटहि परानी ॥ हरि हरि नामु जपि अम्रित बानी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सो किछु करि जितु छुटहि परानी ॥ हरि हरि नामु जपि अम्रित बानी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जितु = जिस (काम) से। छुटहि = (विकारों से) बच सकें। परानी = हे प्राणी! अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाली।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्राणी! कोई वह काम कर जिसकी वजह से तू (विकारों से) बचा रह सके। सदा परमात्मा का नाम जपा कर। (प्रभु की महिमा की) वाणी आत्मिक जीवन देने वाली है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

घोर महल सदा रंगि राता ॥ संगि तुम्हारै कछू न जाता ॥२॥

मूलम्

घोर महल सदा रंगि राता ॥ संगि तुम्हारै कछू न जाता ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: घोर = घोड़े। रंगि = प्रेम में। राता = मस्त। संगि = साथ।2।
अर्थ: हे प्राणी! तू सदा घोड़े-महल-माढ़ियों के प्यार में मस्त रहता है, (पर इनमें से) कोई भी चीज तेरे साथ नहीं जा सकती।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रखहि पोचारि माटी का भांडा ॥ अति कुचील मिलै जम डांडा ॥३॥

मूलम्

रखहि पोचारि माटी का भांडा ॥ अति कुचील मिलै जम डांडा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पोचारि = पोच पाच के, बाहर से बना सवार के। रखहि = तू रखता है। अति कुचील = बहुत ही गंदा। जम डांडा = जम का दण्ड।3।
अर्थ: हे प्राणी! तू इस मिट्टी के बर्तन (शरीर) को (बाहर से) बना-सँवार के रखता है; (पर अंदर सें विकारों से यह) बहुत गंदा हुआ पड़ा है। (इस तरह के जीवन वाले को तो) जमों द्वारा सजा मिलती है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

काम क्रोधि लोभि मोहि बाधा ॥ महा गरत महि निघरत जाता ॥४॥

मूलम्

काम क्रोधि लोभि मोहि बाधा ॥ महा गरत महि निघरत जाता ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: क्रोधि = क्रोध में। बाधा = बंधा हुआ। गरत = गड्ढा। निघरत जाता = धसता जाता है।4।
अर्थ: हे प्राणी! तू काम-क्रोध में, लोभ में मोह में बंधा पड़ा है। विकारों के दल-दल में और भी फंसता जा रहा है।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नानक की अरदासि सुणीजै ॥ डूबत पाहन प्रभ मेरे लीजै ॥५॥१४॥२०॥

मूलम्

नानक की अरदासि सुणीजै ॥ डूबत पाहन प्रभ मेरे लीजै ॥५॥१४॥२०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पहन = पत्थर। प्रभ = हे प्रभु!।5।
अर्थ: हे मेरे प्रभु! (अपने दास) नानक की आरजू सुन। हम डूब रहे पत्थरों को डूबने से बचा ले।5।14।20।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ जीवत मरै बुझै प्रभु सोइ ॥ तिसु जन करमि परापति होइ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ जीवत मरै बुझै प्रभु सोइ ॥ तिसु जन करमि परापति होइ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जीवत = जीते हुए, दुनिया के काम काज करते हुए ही। मरै = (मोह की तरफ से) मरता है, मोह छोड़ देता है। सोइ = वह मनुष्य। करमि = बख्शिश से।1।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य दुनिया के कार्य-व्यवहार करता हुआ ही (दुनिया का) मोह त्याग देता है, वह मनुष्य परमात्मा के साथ सांझ डाल लेता है। उस मनुष्य को (परमात्मा की) कृपा से (परमात्मा का मिलाप) प्राप्त हो जाता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुणि साजन इउ दुतरु तरीऐ ॥ मिलि साधू हरि नामु उचरीऐ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सुणि साजन इउ दुतरु तरीऐ ॥ मिलि साधू हरि नामु उचरीऐ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साजन = हे सज्जन! इउ = इस तरीके से। दुतरु = दुस्तर, वह संसार जिससे पार होना बड़ा ही मुश्किल है। तरीऐ = पार लांघा जाता है। मिलि = मिल के। साधू = गुरु।1। रहाउ।
अर्थ: हे सज्जन! (मेरी विनती) सुन। संसार-समुंदर से पार लांघना बहुत मुश्किल है, इससे सिर्फ इस तरीके से पार लांघ सकते हैं (कि) गुरु को मिल के परमात्मा का नाम स्मरण किया जाए।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

एक बिना दूजा नही जानै ॥ घट घट अंतरि पारब्रहमु पछानै ॥२॥

मूलम्

एक बिना दूजा नही जानै ॥ घट घट अंतरि पारब्रहमु पछानै ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जानै = दिली सांझ डालता है। घट = शरीर। अंतरि = अंदर, में।2।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य एक परमात्मा के बिना किसी और के साथ सांझ नहीं डालता, वह मनुष्य परमात्मा को हरेक शरीर में बसता पहचान लेता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जो किछु करै सोई भल मानै ॥ आदि अंत की कीमति जानै ॥३॥

मूलम्

जो किछु करै सोई भल मानै ॥ आदि अंत की कीमति जानै ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भल = भला। आदि अंत की = उस परमात्मा की जो सृष्टि के आरम्भ से ही है और सृष्टि के आखिर में भी रहेगा। कीमति = कद्र।3।
अर्थ: जो कुछ भी परमात्मा करता है जो मनुष्य हरेक उस काम को (दुनिया के वास्ते) भला मानता है, वह मनुष्य सदा ही कायम रहने वाले परमात्मा की कद्र समझ लेता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कहु नानक तिसु जन बलिहारी ॥ जा कै हिरदै वसहि मुरारी ॥४॥१५॥२१॥

मूलम्

कहु नानक तिसु जन बलिहारी ॥ जा कै हिरदै वसहि मुरारी ॥४॥१५॥२१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बलिहारी = सदके। कै हिरदै = के हृदय में। वसहि = तू बसता है। मुरारी = हे प्रभु!।4।
अर्थ: हे नानक! कह: जिस मनुष्य के हृदय में सदा तू बसता है (जिसको तू सदा याद रखता है) उस मनुष्य से (मैं) कुर्बान जाता हूँ।4।15।21।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ गुरु परमेसरु करणैहारु ॥ सगल स्रिसटि कउ दे आधारु ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ गुरु परमेसरु करणैहारु ॥ सगल स्रिसटि कउ दे आधारु ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: परमेसरु = परम ईश्वर, सबसे ऊँचा मालिक। करणैहारु = सब कुछ कर सकने वाला। सगल = सारी। कउ = को। दे = देता है। आधारु = आसरा।1।
अर्थ: हे मेरे मन! गुरु उस परमात्मा का रूप है जो सबसे बड़ा मालिक है जो सब कुछ कर सकने वाला है। गुरु सारी सृष्टि को (परमात्मा के नाम का) आसरा देता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुर के चरण कमल मन धिआइ ॥ दूखु दरदु इसु तन ते जाइ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

गुर के चरण कमल मन धिआइ ॥ दूखु दरदु इसु तन ते जाइ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: चरण कमल = कमल फूल जैसे कोमल चरण। मन = हे मन! ते = से। जाइ = चला जाता है।1। रहाउ।
अर्थ: हे (मेरे) मन! (सदा) गुरु के सुंदर कोमल चरणों का ध्यान धरा करो (जो मनुष्य ये उद्यम करता है उसके) इस शरीर के हरेक किस्म के दुख-कष्ट दूर हो जाते हैं।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

भवजलि डूबत सतिगुरु काढै ॥ जनम जनम का टूटा गाढै ॥२॥

मूलम्

भवजलि डूबत सतिगुरु काढै ॥ जनम जनम का टूटा गाढै ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भवजलि = संसार समुंदर में। काढै = निकाल लेता है। टूटा = (परमात्मा से) टूटा हुआ मनुष्य। गाढै = जोड़ लेता है, प्रभु के साथ जोड़ लेता है।2।
अर्थ: (हे मन!) गुरु संसार समुंदर में डूबतों को बचा लेता है, अनेक जन्मों से (परमात्मा से) टूटे हुए मनुष्य को (परमात्मा से) जोड़ देता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुर की सेवा करहु दिनु राति ॥ सूख सहज मनि आवै सांति ॥३॥

मूलम्

गुर की सेवा करहु दिनु राति ॥ सूख सहज मनि आवै सांति ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सूख सहज = आत्मिक अडोलता के सुख। मनि = मन में।3।
अर्थ: हे भाई! दिन-रात गुरु की (बताई हुई) सेवा किया करो, (जो मनुष्य करता है उसके) मन में शांति पैदा हो जाती है, आत्मिक अडोलता के आनंद पैदा हो जाते हैं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सतिगुर की रेणु वडभागी पावै ॥ नानक गुर कउ सद बलि जावै ॥४॥१६॥२२॥

मूलम्

सतिगुर की रेणु वडभागी पावै ॥ नानक गुर कउ सद बलि जावै ॥४॥१६॥२२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रेणु = चरण धूल। वडभागी = बड़े भाग्यों वाला मनुष्य। नानक = हे नानक! सद = सदा। बलि = सदके।4।
अर्थ: हे नानक! कोई अति भाग्यशाली मनुष्य गुरु की चरण-धूल हासिल करता है, (फिर वह मनुष्य) गुरु से सदा सदके जाता है।4।16।22।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ गुर अपुने ऊपरि बलि जाईऐ ॥ आठ पहर हरि हरि जसु गाईऐ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ गुर अपुने ऊपरि बलि जाईऐ ॥ आठ पहर हरि हरि जसु गाईऐ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बलि जाईऐ = कुर्बान होना चाहिए। गाईऐ = गाना चाहिए। जसु = महिमा (का गीत)।1।
अर्थ: हे भाई! अपने गुरु पर से (सदा) कुर्बान होना चाहिए (गुरु की) शरण पड़ कर अपने अंदर से स्वै-भाव मिटा देना चाहिए, (क्योंकि, गुरु की कृपा से ही) आठों पहर परमात्मा का महिमा का गीत गाया जा सकता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सिमरउ सो प्रभु अपना सुआमी ॥ सगल घटा का अंतरजामी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सिमरउ सो प्रभु अपना सुआमी ॥ सगल घटा का अंतरजामी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सिमरउ = मैं स्मरण करता हूँ। सुआमी = मालिक। सगल = सारे। अंतरजामी = अंदर की जानने वाला।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (गुरु की कृपा से) मैं अपना वह मालिक प्रभु स्मरण करता हूँ, जो सब जीवों के दिल की जानने वाला है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

चरण कमल सिउ लागी प्रीति ॥ साची पूरन निरमल रीति ॥२॥

मूलम्

चरण कमल सिउ लागी प्रीति ॥ साची पूरन निरमल रीति ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सिउ = साथ। साची = सदा कायम रहने वाली। पूरन = पूर्ण। रीति = जीवन जुगति।2।
अर्थ: हे भाई! (गुरु की कृपा से ही) परमात्मा के सुंदर चरणों से प्यार बनता है। (गुरु चरणों की प्रीति ही) अटल सम्पूर्ण और पवित्र जीवन-जुगति है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

संत प्रसादि वसै मन माही ॥ जनम जनम के किलविख जाही ॥३॥

मूलम्

संत प्रसादि वसै मन माही ॥ जनम जनम के किलविख जाही ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: संत प्रसादि = गुरु की कृपा से। माही = में। किलविख = पाप। जाही = दूर हो जाते हैं।3।
अर्थ: हे भाई! गुरु की कृपा से (परमात्मा जिस मनुष्य के) मन में आ बसता है (उस मनुष्य के) अनेक जन्मों के पाप दूर हो जाते हैं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥ नानकु मागै संत रवाला ॥४॥१७॥२३॥

मूलम्

करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥ नानकु मागै संत रवाला ॥४॥१७॥२३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभ = हे प्रभु! दीन = कंगाल। नानकु मागै = नानक माँगता है। रवाला = चरण धूल।4।
अर्थ: हे निमाणों पर दया करने वाले प्रभु! (अपने दास नानक पर) कृपा कर। (तेरा दास) नानक (तेरे दर से) गुरु के चरणों की धूल माँगता हूँ।4।17।23।

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विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ दरसनु देखि जीवा गुर तेरा ॥ पूरन करमु होइ प्रभ मेरा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ दरसनु देखि जीवा गुर तेरा ॥ पूरन करमु होइ प्रभ मेरा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: देखि = देख के। जीवा = जीऊँ, मुझे आत्मिक जीवन मिल जाता है। गुर = हे गुरु! करमु = बख्शिश। प्रभ मेरा = हे मेरे प्रभु!।1।
अर्थ: हे गुरु! तेरे दर्शन करके मुझे आत्मिक जीवन मिल जाता है। हे मेरे प्रभु! तेरी सम्पूर्ण कृपा हो (और मुझे गुरु मिल जाए)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

इह बेनंती सुणि प्रभ मेरे ॥ देहि नामु करि अपणे चेरे ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

इह बेनंती सुणि प्रभ मेरे ॥ देहि नामु करि अपणे चेरे ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभ = हे प्रभु! करि = बना के। चेरे = सेवक।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे प्रभु (मेरी) ये आरजू सुन, (गुरु के द्वारा) मुझे अपना सेवक बना के (अपना) नाम बख्श।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अपणी सरणि राखु प्रभ दाते ॥ गुर प्रसादि किनै विरलै जाते ॥२॥

मूलम्

अपणी सरणि राखु प्रभ दाते ॥ गुर प्रसादि किनै विरलै जाते ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दाते = हे सब दातें देने वाले! गुर प्रसादि = गुरु की किरपा से। किनै विरलै = किसी मनुष्य ने। जाते = गहरी सांझ डाली है।2।
अर्थ: हे सब दातें देने वाले प्रभु! मुझे अपनी शरण में रख। हे प्रभु! गुरु की किरपा से किसी विरले मनुष्य ने तेरे साथ गहरी सांझ डाली है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुनहु बिनउ प्रभ मेरे मीता ॥ चरण कमल वसहि मेरै चीता ॥३॥

मूलम्

सुनहु बिनउ प्रभ मेरे मीता ॥ चरण कमल वसहि मेरै चीता ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बिनउ = विनती। मीता = हे मित्र! वसहि = बस जाना। मेरै चीता = मेरे चिक्त में।3।
अर्थ: हे मेरे मित्र भगवान! मेरा अनुरोध सुनिए, (कृपा करें कि आपके सुंदर चरण मेरे मन में बस जाएं ।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नानकु एक करै अरदासि ॥ विसरु नाही पूरन गुणतासि ॥४॥१८॥२४॥

मूलम्

नानकु एक करै अरदासि ॥ विसरु नाही पूरन गुणतासि ॥४॥१८॥२४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नानकु करै = नानक करता है। अरदासि = प्रार्थना। गुण तासि = हे गुणों के खजाने!।4।
अर्थ: हे मेरे मित्र प्रभु! सब गुणों के खजाने प्रभु! (तेरा सेवक) नानक (तेरे दर पे) एक अर्ज करता है (कृपा कर, मुझ नानक को कभी) ना भूल।4।18।24।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ मीतु साजनु सुत बंधप भाई ॥ जत कत पेखउ हरि संगि सहाई ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ मीतु साजनु सुत बंधप भाई ॥ जत कत पेखउ हरि संगि सहाई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सुत = पुत्र। बंधप = रिश्तेदार। भाई = भ्राता। जत कत = जिधर किधर, जहाँ कहाँ। पेखउ = देखता हूँ। संगि = साथ। सहाई = मददगार।1।
अर्थ: हे भाई! मैं जहाँ-कहाँ देखता हूँ, परमात्मा मेरे साथ मददगार है। परमात्मा ही मेरा मित्र है, सज्जन है, परमात्मा ही (मेरे वास्ते) पुत्र रिश्तेदार व भाई है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जति मेरी पति मेरी धनु हरि नामु ॥ सूख सहज आनंद बिसराम ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

जति मेरी पति मेरी धनु हरि नामु ॥ सूख सहज आनंद बिसराम ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जति = जाति। पति = इज्जत। बिसराम = शांति।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा का नाम मेरी (उच्च) जाति है, मेरी इज्जत है, मेरा धन है। (इसकी वजह से मेरे अंदर) आनंद है, शांति है, आत्मिक अडोलता और सुख हैं।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पारब्रहमु जपि पहिरि सनाह ॥ कोटि आवध तिसु बेधत नाहि ॥२॥

मूलम्

पारब्रहमु जपि पहिरि सनाह ॥ कोटि आवध तिसु बेधत नाहि ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जपि = जपा कर। पहिरि = पहने रख। सनाह = संजोअ, स्नाह। कोटि = करोड़ों। आवध = आयुद्ध, हथियार। तिसु = उस (संजोअ) को। बेधत = बेधते।2।
अर्थ: हे भाई! (सदा) परमात्मा (का नाम) जपा कर, (हरि नाम का) संजोअ (कवच) पहने रख। इस (संजोअ) को (कामादिक जैसे) करोड़ो हथियार (भी) नहीं बेध सकते।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि चरन सरण गड़ कोट हमारै ॥ कालु कंटकु जमु तिसु न बिदारै ॥३॥

मूलम्

हरि चरन सरण गड़ कोट हमारै ॥ कालु कंटकु जमु तिसु न बिदारै ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गढ़ = किले। कोट = किले। हमारै = मेरे वास्ते। कंटकु = काँटा (दुखदाई)। बिदारै = नाश करता।3।
अर्थ: हे भाई! मेरे वास्ते (तो) परमात्मा के चरणों की शरण अनेक किले हैं। इस (किले) को दुखद मौत (का डर) नाश नहीं कर सकता।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नानक दास सदा बलिहारी ॥ सेवक संत राजा राम मुरारी ॥४॥१९॥२५॥

मूलम्

नानक दास सदा बलिहारी ॥ सेवक संत राजा राम मुरारी ॥४॥१९॥२५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: राजा राम = हे प्रभु पातशाह! मुरारी = (मुरि+अरि) प्रभु।4।
अर्थ: हे नानक! (कह:) हे प्रभु-पातशाह! हे मुरारी! मैं तेरे सेवकों संतों से सदा सदके जाता हूँ (जिनकी संगति में तेरा नाम प्राप्त होता है)।4।19।25।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ गुण गोपाल प्रभ के नित गाहा ॥ अनद बिनोद मंगल सुख ताहा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ गुण गोपाल प्रभ के नित गाहा ॥ अनद बिनोद मंगल सुख ताहा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गाहा = गाएं। बिनोद = खुशी। ताहा = उन्हें।1।
अर्थ: हे सहेली! गोपाल प्रभु के गुण सदा गाते रहें। (जो गाते हैं) उन्हें सुख-आनंद-चाव-खुशियां बनीं रहती हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

चलु सखीए प्रभु रावण जाहा ॥ साध जना की चरणी पाहा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

चलु सखीए प्रभु रावण जाहा ॥ साध जना की चरणी पाहा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सखीए = हे सखी! रावण जाहा = स्मरण करने के लिए चलें। पाहा = पाएं।1। रहाउ।
अर्थ: हे सहेली! उठ, प्रभु का स्मरण करने चलें, संत जनों के चरणों में जा पड़ें।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

करि बेनती जन धूरि बाछाहा ॥ जनम जनम के किलविख लाहां ॥२॥

मूलम्

करि बेनती जन धूरि बाछाहा ॥ जनम जनम के किलविख लाहां ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बाछाहा = मांगें। किलविख = पाप। लाहां = दूर कर लें।2।
अर्थ: हे सहेली! (प्रभु के आगे) विनती कर के (उससे) संतजनों की चरणधूल मांगें, (और अपने) अनेक जन्मों के पाप दूर कर लें।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मनु तनु प्राण जीउ अरपाहा ॥ हरि सिमरि सिमरि मानु मोहु कटाहां ॥३॥

मूलम्

मनु तनु प्राण जीउ अरपाहा ॥ हरि सिमरि सिमरि मानु मोहु कटाहां ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अरपाहा = भेटा कर दें। मानु = अहंकार। कटाहां = काट लें।3।
अर्थ: हे सहेली! अपना मन-तन-जिंद-जान भेट कर दे। हर वक्त परमात्मा का नाम स्मरण कर-कर के (अपने अंदर से) अहंकार और मोह दूर कर ले।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दीन दइआल करहु उतसाहा ॥ नानक दास हरि सरणि समाहा ॥४॥२०॥२६॥

मूलम्

दीन दइआल करहु उतसाहा ॥ नानक दास हरि सरणि समाहा ॥४॥२०॥२६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: उतसाहु = उत्साह। समाहा = लीन हो जाएं।4।
अर्थ: हे नानक! (कह:) हे दीनों पर दया करने वाले प्रभु! (मेरे अंदर) उत्साह पैदा कर (कि) मैं तेरे दासों की शरण पड़ा रहूँ।4।20।26।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ बैकुंठ नगरु जहा संत वासा ॥ प्रभ चरण कमल रिद माहि निवासा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ बैकुंठ नगरु जहा संत वासा ॥ प्रभ चरण कमल रिद माहि निवासा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बैकुंठ = विष्णु का स्वर्ग। रिद = हृदय।1।
अर्थ: हे भाई! जिस जगह (परमात्मा के) संत जन बसते हों, वही है (असल) बैकुंठ का शहर। (संत जनों की संगति में रह के) प्रभु के सोहणे चरण हृदय में आ बसते हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुणि मन तन तुझु सुखु दिखलावउ ॥ हरि अनिक बिंजन तुझु भोग भुंचावउ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सुणि मन तन तुझु सुखु दिखलावउ ॥ हरि अनिक बिंजन तुझु भोग भुंचावउ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दिखलावउ = मैं दिखाऊँ। बिंजन = स्वादिष्ट भोजन। भुंचावउ = मैं खिलाऊँ।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (मेरी बात) सुन, (आ) मैं (तेरे) मन को (तेरे) तन को आत्मिक आनंद दिखा दूँ। प्रभु का नाम (मानो) अनेक स्वादिष्ट भोजन हैं, (आ, साधु-संगत में) मैं तुझे वह स्वादिष्ट भोजन खिलाऊँ।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अम्रित नामु भुंचु मन माही ॥ अचरज साद ता के बरने न जाही ॥२॥

मूलम्

अम्रित नामु भुंचु मन माही ॥ अचरज साद ता के बरने न जाही ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाला। भुंचु = खा। सदु = स्वाद।2।
अर्थ: हे भाई! (साधु-संगत में रह के) आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम (-भोजन) अपने मन में खाया कर, इस भोजन के हैरान कर देने वाले स्वाद हैं, बयान नहीं किए जा सकते।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

लोभु मूआ त्रिसना बुझि थाकी ॥ पारब्रहम की सरणि जन ताकी ॥३॥

मूलम्

लोभु मूआ त्रिसना बुझि थाकी ॥ पारब्रहम की सरणि जन ताकी ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ताकी = देखी। बुझि थाकी = मिट के रह जाती है।3।
अर्थ: हे भाई! जिस संतों ने (साधु-संगत बैकुंठ में आ के) परमात्मा का आसरा लिया है (अनके अंदर से) लोभ समाप्त हो जाता है, तृष्णा की आग बुझ के खत्म हो जाती है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जनम जनम के भै मोह निवारे ॥ नानक दास प्रभ किरपा धारे ॥४॥२१॥२७॥

मूलम्

जनम जनम के भै मोह निवारे ॥ नानक दास प्रभ किरपा धारे ॥४॥२१॥२७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भै = डर। निवारे = दूर कर देता है।4।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘भै’ है ‘भउ’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे नानक! (कह: हे भाई!) प्रभु अपने दासों पर मेहर करता है, और, उनके अनेक जन्मों के डर-मोह दूर कर देता है।4।21।27।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ अनिक बींग दास के परहरिआ ॥ करि किरपा प्रभि अपना करिआ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ अनिक बींग दास के परहरिआ ॥ करि किरपा प्रभि अपना करिआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बींग = टेढ़ापन, छल कपट, कमियां। परहरिआ = दूर कर दिए। करि = कर के। प्रभि = प्रभु ने। करिआ = बना लिया।1।
अर्थ: हे भाई! प्रभु ने अपने सेवक के अनेक टेढ़-मेढ़ (छल कपट) दूर कर दिए, और कृपा करके उसको अपना बना लिया है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तुमहि छडाइ लीओ जनु अपना ॥ उरझि परिओ जालु जगु सुपना ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

तुमहि छडाइ लीओ जनु अपना ॥ उरझि परिओ जालु जगु सुपना ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तुमहि = तू खुद ही। जनु = सेवक। उरझि परिओ = उलझा पड़ा था।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! सपने जैसे जगत (के मोह) जाल (ने तेरे सेवक को चारों तरफ से) उलझा लिया है, पर तूने अपने सेवक को (उसमें से) स्वयं निकाल लिया।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

परबत दोख महा बिकराला ॥ खिन महि दूरि कीए दइआला ॥२॥

मूलम्

परबत दोख महा बिकराला ॥ खिन महि दूरि कीए दइआला ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: परबत दोख = पहाड़ जितने ऐब। बिकराला = डरावने।2।
अर्थ: हे भाई! (शरण आए मनुष्य के) पहाड़ों जितने बड़े और भयानक ऐब दीनों पर दया करने वाले परमात्मा ने एक छिन में दूर कर दिए।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सोग रोग बिपति अति भारी ॥ दूरि भई जपि नामु मुरारी ॥३॥

मूलम्

सोग रोग बिपति अति भारी ॥ दूरि भई जपि नामु मुरारी ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सोग = ग़म। जपि = जप के।3।
अर्थ: हे भाई! (सेवक के) अनेक ग़म और रोग बड़ी भारी मुसीबतें परमात्मा का नाम जपके दूर हो गई।3।

[[0743]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

द्रिसटि धारि लीनो लड़ि लाइ ॥ हरि चरण गहे नानक सरणाइ ॥४॥२२॥२८॥

मूलम्

द्रिसटि धारि लीनो लड़ि लाइ ॥ हरि चरण गहे नानक सरणाइ ॥४॥२२॥२८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: द्रिसटि = (कृपा की) नजर। धारि = कर के। लड़ि = लड़ से। गहे = पकड़े।4।
अर्थ: हे नानक! (कह: हे भाई!) जिस मनुष्य ने परमात्मा के चरण पकड़ लिए, जो मनुष्य प्रभु की शरण आ पड़ा, परमात्मा ने मेहर की निगाह करके उसको अपने साथ लगा लिया।4।22।28।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: सारा शब्द ‘भूत काल’ में है, इस का भाव ‘सदा वास्ते’ समझना है। अर्थ ‘वर्तमान काल’ में कर लेना है।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ दीनु छडाइ दुनी जो लाए ॥ दुही सराई खुनामी कहाए ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ दीनु छडाइ दुनी जो लाए ॥ दुही सराई खुनामी कहाए ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दीनु = धर्म, नाम धन। दुनी = दुनियावी। जो = जिस मनुष्य को। लाए = (परमात्मा) लगाता है। दुही सराई = दोनों लोकों में। खुनामी = गुनाहगार, अपराधी। कहाए = कहलवाता है।1।
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य को परमात्मा का नाम-धन कमाने से हटा के दुनियावी धन की ओर लगा देता है, वह मनुष्य दोनों जहानों में (इस लोक में और परलोक में) गुनहगार कहलवाता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जो तिसु भावै सो परवाणु ॥ आपणी कुदरति आपे जाणु ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

जो तिसु भावै सो परवाणु ॥ आपणी कुदरति आपे जाणु ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तिसु = उस (परमात्मा) को। भावै = अच्छा लगता है। जाणु = जानने वाला।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा अपनी रची सृष्टि के बारे में स्वयं ही सब कुछ जानने वाला है। जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है, जीवों को वही कुछ सिर माथे मानना पड़ता है (वही कुछ जीव करते हैं)।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सचा धरमु पुंनु भला कराए ॥ दीन कै तोसै दुनी न जाए ॥२॥

मूलम्

सचा धरमु पुंनु भला कराए ॥ दीन कै तोसै दुनी न जाए ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सचा = सदा कायम रहने वाला। भला = भला काम। दीन कै तोसै = नाम धन इकट्ठे करने से। न जाए = नहीं बिगड़ता।2।
अर्थ: हे भाई! (जिस मनुष्य से परमात्मा) सदा-स्थिर रहने वाला (नाम-स्मरण) धर्म करवाता है, (नाम-स्मरण का) नेक भला काम करवाता है, नाम-धन इकट्ठा करते हुए उसकी ये दुनिया भी नहीं बिगड़ती।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सरब निरंतरि एको जागै ॥ जितु जितु लाइआ तितु तितु को लागै ॥३॥

मूलम्

सरब निरंतरि एको जागै ॥ जितु जितु लाइआ तितु तितु को लागै ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सरब निरंतरि = सबके अंदर एक रस (अंतरि = दूरी)। एको = एक परमात्मा ही। जितु = जिस तरफ। को = कोई।3।
अर्थ: हे भाई! (जीवों के भी क्या वश?) हरेक जीव उसी उसी काम में लगता है जिस जिस काम में परमात्मा लगाता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अगम अगोचरु सचु साहिबु मेरा ॥ नानकु बोलै बोलाइआ तेरा ॥४॥२३॥२९॥

मूलम्

अगम अगोचरु सचु साहिबु मेरा ॥ नानकु बोलै बोलाइआ तेरा ॥४॥२३॥२९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अगम = अगम्य (पहुँच से परे)। अगोचरु = (अ+गो+चरु। गो = ज्ञान-इंद्रिय) जिस तक ज्ञान-इंद्रिय की पहुँच नहीं हो सकती। सचु = सदा स्थिर रहने वाला।4।
अर्थ: हे प्रभु! तू सदा कायम रहने वाला मेरा मालिक है, तू अगम्य (पहुँच से परे) है, ज्ञान-इंद्रिय के माध्यम से तेरे तक पहुँचा नहीं जा सकता। (तेरा दास) नानक तेरे से प्रेरित हो के ही तेरा नाम उचार सकता है।4।23।29।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ प्रातहकालि हरि नामु उचारी ॥ ईत ऊत की ओट सवारी ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ प्रातहकालि हरि नामु उचारी ॥ ईत ऊत की ओट सवारी ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कालि = समय में। प्रातह = प्रभात, सवेर। प्रातह काल = अमृत बेला। उचारी = उचारा कर। ईत ऊत की = इस लोक की परलोक की। ओट = आसरा। सवारी = सुंदर बना लेना।1।
अर्थ: हे भाई! अमृत बेला में (उठ के) परमात्मा का नाम स्मरण किया कर, (इस तरह) इस लोक और परलोक के लिए सुंदर आसरा बनाते रहा कर।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सदा सदा जपीऐ हरि नाम ॥ पूरन होवहि मन के काम ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सदा सदा जपीऐ हरि नाम ॥ पूरन होवहि मन के काम ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जपीऐ = जपना चाहिए। होवहि = हो जाते हैं। मन के काम = मन के कल्पित काम।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! सदा ही परमात्मा का नाम स्मरण करते रहना चाहिए। (नाम-जपने की इनायत से) मन के चितवे हुए सारे काम सफल हो जाते हैं।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रभु अबिनासी रैणि दिनु गाउ ॥ जीवत मरत निहचलु पावहि थाउ ॥२॥

मूलम्

प्रभु अबिनासी रैणि दिनु गाउ ॥ जीवत मरत निहचलु पावहि थाउ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अबिनासी = नाश रहित। रैणि = रात। गाउ = गाया कर। जीवत मरत = दुनिया के कार्य व्यवहार करते हुए, निर्मोह रहने से। पावहि = तू प्राप्त कर लेगा।2।
अर्थ: हे भाई! रात-दिन अविनाशी प्रभु (की महिमा के गीत) गाया कर। (इस तरह) दुनिया के कार्य व्यवहार करते हुए निर्मोह रह के तू (प्रभु-चरणों में) सदा कायम रहने वाली जगह प्राप्त कर लेगा।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सो साहु सेवि जितु तोटि न आवै ॥ खात खरचत सुखि अनदि विहावै ॥३॥

मूलम्

सो साहु सेवि जितु तोटि न आवै ॥ खात खरचत सुखि अनदि विहावै ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साहु = शाह, नाम धन का मालिक। सेवि = शरण पड़ा रह। जितु = जिस (धन) में। तोटि = कमी। खात खरचत = बर्तते और बाँटते हुए। सुखि = सुख में। विहावै = उम्र बीतती है।3।
अर्थ: हे भाई! नाम-धन के मालिक उस प्रभु की सेवा-भक्ति किया कर, (उससे ऐसा धन मिलता है) जिस धन में कभी घाटा नहीं पड़ता। उस धन को खुद इस्तेमाल करते हुए औरों में बाँटते हुए जिंदगी सुख-आनंद से बीतती है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जगजीवन पुरखु साधसंगि पाइआ ॥ गुर प्रसादि नानक नामु धिआइआ ॥४॥२४॥३०॥

मूलम्

जगजीवन पुरखु साधसंगि पाइआ ॥ गुर प्रसादि नानक नामु धिआइआ ॥४॥२४॥३०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पुरखु = सर्व व्यापक प्रभु। संगि = संगति में। प्रसादि = कृपा से।4।
अर्थ: हे नानक! जिस मनुष्य ने साधु-संगत में गुरु की कृपा से परमात्मा का नाम स्मरणा शुरू कर दिया, उसने जगत के जीवन सर्व-व्यापक प्रभु का मिलाप हासिल कर लिया।4।24।30।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ गुर पूरे जब भए दइआल ॥ दुख बिनसे पूरन भई घाल ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ गुर पूरे जब भए दइआल ॥ दुख बिनसे पूरन भई घाल ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दइआल = दयावान। बिनसे = नाश हो जाते हैं। पूरन = सफल। घाल = (सेवा भक्ति की) मेहनत।1।
अर्थ: हे भाई! जब (किसी मनुष्य पर) पूरे सतिगुरु जी दयावान होते हैं (वह मनुष्य हरि-नाम स्मरण करता है, उसकी ये) मेहनत सफल हो जाती है, और उसके सारे दुख नाश हो जाते हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पेखि पेखि जीवा दरसु तुम्हारा ॥ चरण कमल जाई बलिहारा ॥ तुझ बिनु ठाकुर कवनु हमारा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

पेखि पेखि जीवा दरसु तुम्हारा ॥ चरण कमल जाई बलिहारा ॥ तुझ बिनु ठाकुर कवनु हमारा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पेखि = देख के। जीवा = मैं आत्मिक जीवन प्राप्त करता रहूँ। जाई = मैं जाऊँ। बलिहारा = सदके। ठाकुर = हे मालिक!।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! (मेहर कर) तेरे दर्शन सदा कर कर के मुझे आत्मिक जीवन मिलता रहे, मैं तेरे सुंदर चरणों से सदके होता रहूँ।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

साधसंगति सिउ प्रीति बणि आई ॥ पूरब करमि लिखत धुरि पाई ॥२॥

मूलम्

साधसंगति सिउ प्रीति बणि आई ॥ पूरब करमि लिखत धुरि पाई ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सिउ = साथ। पूरबि करमि = पूबर्लि जन्मों के किए कर्मों के अनुसार। धुरि = धुर दरगाह से।2।
अर्थ: हे भाई! पूर्बले जन्मों के किए कर्मों के अनुसार धुर दरगाह से जिस मनुष्य के लिखे लेख उघड़ते हैं, उस मनुष्य का प्यार गुरु की संगति से बन जाता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जपि हरि हरि नामु अचरजु परताप ॥ जालि न साकहि तीने ताप ॥३॥

मूलम्

जपि हरि हरि नामु अचरजु परताप ॥ जालि न साकहि तीने ताप ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अचरजु = हैरान करने वाला। परताप = तेज। जालि न साकहि = जला नहीं सकेंगे। तीने ताप = आधि, ब्याधि, उपाधि ये तीन ताप।3।
अर्थ: हे भाई! सदा परमात्मा का नाम जपा कर, ऐसा हैरान करने वाला आत्मिक तेज प्राप्त होता है कि (आधि-व्याधि-उपाधि, ये) तीनों ही ताप (आत्मिक जीवन को) जला नहीं सकेंगे।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

निमख न बिसरहि हरि चरण तुम्हारे ॥ नानकु मागै दानु पिआरे ॥४॥२५॥३१॥

मूलम्

निमख न बिसरहि हरि चरण तुम्हारे ॥ नानकु मागै दानु पिआरे ॥४॥२५॥३१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: निमख = आँख झपकने जितना समय। हरि = हे हरि! नानकु मागै = नानक माँगता है।4।
अर्थ: हे हरि! हे प्यारे! (तेरे दर से तेरा दास) नानक (ये) दान माँगता है कि तेरे चरण (नानक को) आँख झपकने जितने समय के लिए भी ना भूलें।4।25।31।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ से संजोग करहु मेरे पिआरे ॥ जितु रसना हरि नामु उचारे ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ से संजोग करहु मेरे पिआरे ॥ जितु रसना हरि नामु उचारे ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: से = वह (बहुवचन)। संजोग = शुभ लगन। जितु = जिस (अच्छे वक्त) के कारण। रसना = जीभ।1।
अर्थ: हे मेरे प्यारे! (मेरे लिए) वह संयोग बना, जिससे (मेरी) जीभ तेरा नाम उचारती रहे।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुणि बेनती प्रभ दीन दइआला ॥ साध गावहि गुण सदा रसाला ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सुणि बेनती प्रभ दीन दइआला ॥ साध गावहि गुण सदा रसाला ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभ = हे प्रभु! गावहि = गाते हैं। रसाला = रस भरे।1। रहाउ।
अर्थ: हे दीनों पर दया करने वाले प्रभु! (मेरी) विनती सुन, (जैसे) संत जन सदा तेरे रस भरे गुण गाते रहते हैुं (वैसे ही मैं भी गाता रहूँ)।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जीवन रूपु सिमरणु प्रभ तेरा ॥ जिसु क्रिपा करहि बसहि तिसु नेरा ॥२॥

मूलम्

जीवन रूपु सिमरणु प्रभ तेरा ॥ जिसु क्रिपा करहि बसहि तिसु नेरा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बसहि = तू बसता है। नेरा = नजदीक, हृदय में।2।
अर्थ: हे प्रभु! तेरा नाम स्मरणा (हम जीवों के लिए) आत्मिक जीवन के बराबर है। जिस मनुष्य पर तू कृपा करता है, उसके दिल में आ बसता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जन की भूख तेरा नामु अहारु ॥ तूं दाता प्रभ देवणहारु ॥३॥

मूलम्

जन की भूख तेरा नामु अहारु ॥ तूं दाता प्रभ देवणहारु ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आहारु = खुराक।3।
अर्थ: हे प्रभु! तेरे संत-जनों की (आत्मिक) भूख (दूर करने के लिए) तेरा नाम खुराक है। ये खुराक तू ही देता है, तू ही दे सकता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

राम रमत संतन सुखु माना ॥ नानक देवनहार सुजाना ॥४॥२६॥३२॥

मूलम्

राम रमत संतन सुखु माना ॥ नानक देवनहार सुजाना ॥४॥२६॥३२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रमत = स्मरण करते हुए। सुजाना = समझदार।4।
अर्थ: हे नानक! संत-जन उस परमात्मा का नाम स्मरण करके आत्मिक आनंद लेते रहते हैं, जो सब कुछ देने के समर्थ है और जो (हर पहलू से) समझदार है।4।26।32।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ बहती जात कदे द्रिसटि न धारत ॥ मिथिआ मोह बंधहि नित पारच ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ बहती जात कदे द्रिसटि न धारत ॥ मिथिआ मोह बंधहि नित पारच ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बहती जात = (उम्र की नदी) बहती जा रही है। द्रिसटि = निगाह, ध्यान। मिथिआ = नाशवान। पारच = कपड़े, बंधन। मिथिआ मोह पारच = नाशवान पदार्थों के मोह के बंधन। बंधहि = तू बाँधता है।1।
अर्थ: हे भाई! (तेरी उम्र की नदी) बहती जा रही है, पर तू इधर ध्यान नहीं करता। तू नाशवान पदार्थों के मोह के बंधन ही सदा बाँधता रहता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

माधवे भजु दिन नित रैणी ॥ जनमु पदारथु जीति हरि सरणी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

माधवे भजु दिन नित रैणी ॥ जनमु पदारथु जीति हरि सरणी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: माधवे = (मा+धव = माया का पति) परमात्मा को। भजु = स्मरण करता रह। रैणी = रात। जीति = जीत ले।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! दिन-रात सदा माया के पति प्रभु का नाम जपा कर। प्रभु की शरण पड़ कर कीमती मानव जन्म का फायदा उठा ले।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

करत बिकार दोऊ कर झारत ॥ राम रतनु रिद तिलु नही धारत ॥२॥

मूलम्

करत बिकार दोऊ कर झारत ॥ राम रतनु रिद तिलु नही धारत ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दोऊ कर = दोनों हाथ। दोऊ कर झारत = दोनों हाथ झाड़ के, दोनों हाथ धो के, अगला पिछला सोचे बिना। रिद = हृदय में। तिलु = रक्ती भर समय के लिए भी।2।
अर्थ: हे भाई! तू हानि-लाभ विचारे बिना ही विकार किए जा रहा है परमात्मा का रत्न (जैसा कीमती) नाम अपने दिल में तू एक पल के लिए भी नहीं टिकाता।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

भरण पोखण संगि अउध बिहाणी ॥ जै जगदीस की गति नही जाणी ॥३॥

मूलम्

भरण पोखण संगि अउध बिहाणी ॥ जै जगदीस की गति नही जाणी ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भरण पोखण = पालन पोषण। संगि = साथ। अउध = उम्र। जै जगदीस = जगत के ईश (मालिक) की जै हो, परमात्मा की महिमा। गति = आत्मिक अवस्था, आत्मिक आनंद की अवस्था।3।
अर्थ: हे भाई! (अपना शरीर) पालने-पोसने में ही तेरी उम्र बीतती जा रही है। परमात्मा की महिमा के आनंद की अवस्था तू (अब तक) समझी ही नहीं।3।

[[0744]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सरणि समरथ अगोचर सुआमी ॥ उधरु नानक प्रभ अंतरजामी ॥४॥२७॥३३॥

मूलम्

सरणि समरथ अगोचर सुआमी ॥ उधरु नानक प्रभ अंतरजामी ॥४॥२७॥३३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: समरथ = हे सब ताकतों के मालिक! अगोचर = हे ज्ञान-इंद्रिय की पहुँच से परे रहने वाले! उधरु = (मुझे विकारों से) उद्धार ले।4।
अर्थ: हे नानक! (कह:) हे सब ताकतों के मालिक! ज्ञान-इंद्रिय की पहुँच से परे रहने वाले हे मालिक! मैं तेरी शरण आया हूँ, (मुझे विकारों से) बचा ले, तू मेरा मालिक है, तू मेरे दिल की जानने वाला है।4।27।33।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ साधसंगि तरै भै सागरु ॥ हरि हरि नामु सिमरि रतनागरु ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ साधसंगि तरै भै सागरु ॥ हरि हरि नामु सिमरि रतनागरु ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साध संगि = गुरु की संगति में। तरै = पार लांघ जाता है। भै = डर। सागरु = (संसार) समुंदर। सिमरि = स्मरण करके। रतनागरु = रत्नों की खान।1।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘भै’ है ‘भउ’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! गुरु की संगति में रत्नों की खान हरि नाम स्मरण कर-कर के मनुष्य डरों भरे संसार-समुंदर से पार लांघ जाता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सिमरि सिमरि जीवा नाराइण ॥ दूख रोग सोग सभि बिनसे गुर पूरे मिलि पाप तजाइण ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सिमरि सिमरि जीवा नाराइण ॥ दूख रोग सोग सभि बिनसे गुर पूरे मिलि पाप तजाइण ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जीवा = जीऊँ, आत्मिक जीवन हासिल कर रहा हूँ। सोग = शोक, ग़म। सभि = सारे। मिलि = मिल के। तजाइण = त्यागे जाते हैं।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (गुरु की कृपा से) मैं परमात्मा का नाम स्मरण कर-कर के आत्मिक जीवन हासिल कर रहा हूँ। हे भाई! गुरु को मिल के सारे दुख रोग ग़म नाश हो जाते हैं, पाप तिआगे जाते हैं।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जीवन पदवी हरि का नाउ ॥ मनु तनु निरमलु साचु सुआउ ॥२॥

मूलम्

जीवन पदवी हरि का नाउ ॥ मनु तनु निरमलु साचु सुआउ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पदवी = दर्जा, प्यार। साचु = सदा स्थिर प्रभु (का मिलाप)। सुआउ = स्वार्थ, जिंदगी का निशाना।2।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा का नाम (ही) आत्मिक जिंदगी का प्यार है। (नाम की इनायत से) मन पवित्र हो जाता है, शरीर पवित्र हो जाता है, (नाम स्मरण करते हुए) सदा-स्थिर प्रभु (का मिलाप ही) जीवन उद्देश्य बन जाता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

आठ पहर पारब्रहमु धिआईऐ ॥ पूरबि लिखतु होइ ता पाईऐ ॥३॥

मूलम्

आठ पहर पारब्रहमु धिआईऐ ॥ पूरबि लिखतु होइ ता पाईऐ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: धिआईऐ = स्मरणा चाहिए। पूरबि = पूर्बले जनम में।3।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा का नाम आठों पहर स्मरण करते रहना चाहिए, पर ये दाति तब ही मिलती है अगर पूर्बले जन्म में (माथे पर नाम स्मरण का) लेख लिखा हो।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सरणि पए जपि दीन दइआला ॥ नानकु जाचै संत रवाला ॥४॥२८॥३४॥

मूलम्

सरणि पए जपि दीन दइआला ॥ नानकु जाचै संत रवाला ॥४॥२८॥३४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जपि = जप के। नानक जाचै = नानक माँगता है। रवाला = चरण धूल।4।
अर्थ: हे भाई! दीनों पर दया करने वाले प्रभु का नाम जप के जो मनुष्य उस प्रभु की शरण में पड़े रहते हैं, नानक उन संत-जनों के चरणों की धूल माँगता है।4।28।34।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ घर का काजु न जाणी रूड़ा ॥ झूठै धंधै रचिओ मूड़ा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ घर का काजु न जाणी रूड़ा ॥ झूठै धंधै रचिओ मूड़ा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: घर का काजु = हृदय घर के काम आने वाला काम। रूढ़ा काजु = बढ़िया काम। धंधै = धंधे में। मूढ़ा = मूर्ख।1।
अर्थ: (हे प्रभु तेरी मेहर के बिना) ये मूर्ख झूठे धंधे में मस्त रहता है, वह उस सुन्दर काम को नहीं करता, जो इसके अपने हृदय-घर भले के काम आने वाले हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जितु तूं लावहि तितु तितु लगना ॥ जा तूं देहि तेरा नाउ जपना ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

जितु तूं लावहि तितु तितु लगना ॥ जा तूं देहि तेरा नाउ जपना ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जितु = जिस (काम) में। तितु तितु = उस उस (काम) में। देहि = देता है।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! जिस जिस काम में तू (हम जीवों को) लगाता है, उस उस काम में हम लगते हैं। जब तू (हमें अपना नाम) देता है, तब तेरा नाम जपते हैं।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि के दास हरि सेती राते ॥ राम रसाइणि अनदिनु माते ॥२॥

मूलम्

हरि के दास हरि सेती राते ॥ राम रसाइणि अनदिनु माते ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सेती = से। राते = रंगे हुए। रसाइणि = रसायन में, रस के घर में, सब से श्रेष्ठ रस में। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। माते = मस्त।2।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा के सेवक परमात्मा के साथ ही रंगे रहते हैं, हर वक्त सब रसों से श्रेष्ठ हरि-नाम-रस में मस्त रहते हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बाह पकरि प्रभि आपे काढे ॥ जनम जनम के टूटे गाढे ॥३॥

मूलम्

बाह पकरि प्रभि आपे काढे ॥ जनम जनम के टूटे गाढे ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पकरि = पकड़ के। प्रभि = प्रभु ने। आपे = आप ही। गाढे = जोड़ लिए।3।
अर्थ: हे भाई! प्रभु ने खुद ही (जिस मनुष्यों को) बाँह पकड़ के (झूठे धंधों में से) निकाल लिया, अनेक जन्मों के (प्रभु से) विछुड़े हुओं को (उस प्रभु ने खुद ही अपने साथ) जोड़ लिया।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

उधरु सुआमी प्रभ किरपा धारे ॥ नानक दास हरि सरणि दुआरे ॥४॥२९॥३५॥

मूलम्

उधरु सुआमी प्रभ किरपा धारे ॥ नानक दास हरि सरणि दुआरे ॥४॥२९॥३५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: उधरु = बचा लै। प्रभ = हे प्रभु! धारे = धार के, कर के। दुआरे = दर पर।4।
अर्थ: हे दास नानक! (कह:) हे मालिक प्रभु! मेहर कर। (मुझे झूठे धंधों से) बचा ले, मैं तेरी शरण आया हूँ, मैं तेरे दर पे (आ गिरा हूँ)।4।29।35।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ संत प्रसादि निहचलु घरु पाइआ ॥ सरब सूख फिरि नही डुोलाइआ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ संत प्रसादि निहचलु घरु पाइआ ॥ सरब सूख फिरि नही डुोलाइआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: संत प्रसादि = गुरु की कृपा से। निहचलु घरु = कभी ना डोलने वाला हृदय घर। डुोलाइआ = भटकना में डाल सकता है।1।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘डुोलाइआ’ में अक्षर ‘ड’ के साथ दो मात्राएं हैं: ‘ो’ और ‘ु’। असल शब्द है ‘डोलाया’, यहाँ पढ़ना है ‘डुलाया’।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! (जिसने) गुरु की किरपा से कभी ना डोलने वाला हृदय-घर पा लिया, (हृदय की अडोलता प्राप्त कर ली) उसको सारे सुख प्राप्त हो गए, (वह मनुष्य कभी विकारों में) नहीं डोलता।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरू धिआइ हरि चरन मनि चीन्हे ॥ ता ते करतै असथिरु कीन्हे ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

गुरू धिआइ हरि चरन मनि चीन्हे ॥ ता ते करतै असथिरु कीन्हे ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मनि = मन में। चीने = पहचान लिए। ता ते = इस के कारण। करतै = कर्तार ने। असथिरु = अडोल चिक्त।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (जिस मनुष्यों ने) गुरु का ध्यान धर के परमात्मा के चरणों को (अपने) मन में (बसता) पहचान लिया, इस (परख) की इनायत से कर्तार ने (उनको) अडोल चिक्त बना दिया।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुण गावत अचुत अबिनासी ॥ ता ते काटी जम की फासी ॥२॥

मूलम्

गुण गावत अचुत अबिनासी ॥ ता ते काटी जम की फासी ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अचुत = (अच्युत) कभी ना गिरने वाले। फासी = फाही।2।
अर्थ: हे भाई! अटल अबिनाशी प्रभु के गुण गाते हुए गुण-गान की इनायत से जमों की फाँसी कट जाती है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

करि किरपा लीने लड़ि लाए ॥ सदा अनदु नानक गुण गाए ॥३॥३०॥३६॥

मूलम्

करि किरपा लीने लड़ि लाए ॥ सदा अनदु नानक गुण गाए ॥३॥३०॥३६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: करि = कर के। लड़ि = पल्ले से। गाए = गा के। नानक = हे नानक!।3।
अर्थ: हे नानक! मेहर कर के जिन्हें प्रभु अपने पल्ले से लगा लेता है, वह मनुष्य प्रभु के गुण गा के सदा के लिए आत्मिक आनंद पाते हैं।3।30।36।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ अम्रित बचन साध की बाणी ॥ जो जो जपै तिस की गति होवै हरि हरि नामु नित रसन बखानी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ अम्रित बचन साध की बाणी ॥ जो जो जपै तिस की गति होवै हरि हरि नामु नित रसन बखानी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाले। साध = गुरु। जो जो = जो जो मनुष्य।गति = उच्च आत्मिक अवस्था। रसन = जीभ से। बखानी = उचारता है।1। रहाउ।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘तिस की’ में से ‘तिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘की’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! गुरु की उचारी हुई वाणी आत्मिक जीवन देने वाले वचन हैं। जो जो मनुष्य (इस वाणी को) जपता है, उसकी उच्च आत्मिक अवस्था बन जाती है, वह मनुष्य सदा अपनी जीभ से परमात्मा का नाम उचारता रहता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कली काल के मिटे कलेसा ॥ एको नामु मन महि परवेसा ॥१॥

मूलम्

कली काल के मिटे कलेसा ॥ एको नामु मन महि परवेसा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कली = झगड़े, कष्ट। काल = जीवन समय। कली काल = कष्टों भरा जीवन का समय। परवेसा = दखल।1।
अर्थ: हे भाई! (गुरबाणी की इनायत से) कष्टों-भरे जीवन-काल के सारे कष्ट मिट जाते हैं, (क्योंकि वाणी के सदका) एक हरि-नाम ही मन में टिका रहता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

साधू धूरि मुखि मसतकि लाई ॥ नानक उधरे हरि गुर सरणाई ॥२॥३१॥३७॥

मूलम्

साधू धूरि मुखि मसतकि लाई ॥ नानक उधरे हरि गुर सरणाई ॥२॥३१॥३७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: धूरि = पैरों की ख़ाक। मुखि = मुंह पर। मसतकि = माथे पर। उधरे = बच गए।2।
अर्थ: हे नानक! गुरु के चरणों की धूल (जिस मनुष्यों ने अपने) मुँह पर माथे पर लगा ली, वह मनुष्य गुरु की शरण पड़ के (झगड़े-कष्टों से) बच गए।2।31।37।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ घरु ३ ॥ गोबिंदा गुण गाउ दइआला ॥ दरसनु देहु पूरन किरपाला ॥ रहाउ॥

मूलम्

सूही महला ५ घरु ३ ॥ गोबिंदा गुण गाउ दइआला ॥ दरसनु देहु पूरन किरपाला ॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गोबिंद = हे गोबिंद! दइआला = हे दयालु! किरपाला = हे कृपालु! गाउ = मैं गाता रहूँ। रहाउ।
अर्थ: हे गोविंद! हे दयालु! हे कृपालु! (मुझे अपने) दर्शन दे, मैं (सदा तेरे) गुण गाता रहूँ। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

करि किरपा तुम ही प्रतिपाला ॥ जीउ पिंडु सभु तुमरा माला ॥१॥

मूलम्

करि किरपा तुम ही प्रतिपाला ॥ जीउ पिंडु सभु तुमरा माला ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: करि = कर के। जीउ = जिंद। पिंडु = शरीर। माला = माल, राशि, पूंजी।1।
अर्थ: हे गोबिंद! तू ही किरपा कर के (हम जीवों की) पालना करता है। ये जिंद ये शरीर सब कुछ तेरी ही दी हुई राशि-पूंजी है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अम्रित नामु चलै जपि नाला ॥ नानकु जाचै संत रवाला ॥२॥३२॥३८॥

मूलम्

अम्रित नामु चलै जपि नाला ॥ नानकु जाचै संत रवाला ॥२॥३२॥३८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाला। जपि = जपा कर। नानकु जाचै = नानक माँगता है। संत रवाला = गुरु के चरणों की धूल।2।
अर्थ: हे भाई! आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम (सदा) जपा कर (यही यहाँ से जीवों के) साथ जाता है। नानक (भी) गुरु के चरणों की धूल माँगता है। (जिसकी इनायत से हरि-नाम प्राप्त होता है)।2।32।38।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ तिसु बिनु दूजा अवरु न कोई ॥ आपे थमै सचा सोई ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ तिसु बिनु दूजा अवरु न कोई ॥ आपे थमै सचा सोई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: थंमै = सहारा देता है। आपे = आप ही। सचा = सदा कायम रहने वाला। सोई = वह (प्रभु) ही।1।
अर्थ: हे भाई! वह सदा कायम रहने वाला परमात्मा खुद ही (हरेक जीव को) सहारा देता है, उसके बिना और कोई नहीं (जो विकारों-रोगों से बचने के लिए सहारा दे सके)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि हरि नामु मेरा आधारु ॥ करण कारण समरथु अपारु ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

हरि हरि नामु मेरा आधारु ॥ करण कारण समरथु अपारु ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आधारु = आसरा। करण कारण = जगत का मूल। समरथु = सब ताकतों वाला। अपारु = बेअंत।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! जो परमात्मा सारे जगत का मूल है, जो सब ताकतों का मालिक है, जिसकी हस्ती का परला छोर तलाशना नामुमकिन है, उसका नाम मेरा आसरा है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सभ रोग मिटावे नवा निरोआ ॥ नानक रखा आपे होआ ॥२॥३३॥३९॥

मूलम्

सभ रोग मिटावे नवा निरोआ ॥ नानक रखा आपे होआ ॥२॥३३॥३९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: निरोआ = नि-रोग, रोग रहित। रखा = रक्षा करने वाला, रखवाला।2।
अर्थ: हे नानक! जिस मनुष्य का रखवाला प्रभु स्वयं बन जाता है, उसके वह सारे रोग मिटा देता है, उसको नया-निरोया निरोग कर देता है।2।33।39।

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विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ दरसन कउ लोचै सभु कोई ॥ पूरै भागि परापति होई ॥ रहाउ॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ दरसन कउ लोचै सभु कोई ॥ पूरै भागि परापति होई ॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कउ = को, के लिए। सभु कोई = हरेक जीव। भागि = किस्मत से।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! हरेक जीव (चाहे) परमात्मा के दर्शनों की चाह रखता हो, पर (उसका मिलाप) बड़ी किस्मत के साथ ही मिलता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सिआम सुंदर तजि नीद किउ आई ॥ महा मोहनी दूता लाई ॥१॥

मूलम्

सिआम सुंदर तजि नीद किउ आई ॥ महा मोहनी दूता लाई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सिआम = साँवले रंग वाला। सिआम सुंदर = सुंदर प्रभु! तजि = बिसार के। महा मोहनी = बड़ी मन को मोह लेने वाली माया। दूता = दूतों, कामादिक वैरियों ने।1।
अर्थ: (हाय!) मुझे क्यों गफ़लत की नींद आ गई? मैंने क्यों सुंदर प्रभु को भुला दिया? (हाय!) इन कामादिक वैरियों ने मुझे ये बड़ी मन को मोहनी वाली माया चिपका दी।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रेम बिछोहा करत कसाई ॥ निरदै जंतु तिसु दइआ न पाई ॥२॥

मूलम्

प्रेम बिछोहा करत कसाई ॥ निरदै जंतु तिसु दइआ न पाई ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रेम बिछोहा = प्रेम का ना होना। बिछोहा = बिछोड़ा। कसाई = कसक, खीच। निरदे = निर्दयी, जालिम।2।
अर्थ: प्रेम की विछोह (मेरे अंदर) कसाई-पन कर रही है, ये विछोड़ा (जैसे) एक निर्दयी जीव है जिसके अंदर रक्ती भर भी दया नहीं है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनिक जनम बीतीअन भरमाई ॥ घरि वासु न देवै दुतर माई ॥३॥

मूलम्

अनिक जनम बीतीअन भरमाई ॥ घरि वासु न देवै दुतर माई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बीतीअन = बीत गए हैं। भरमाई = भटकते हुए। घरि = हृदय घर में। दुतरु = दुष्तर, जिसको पार लांघना मुश्किल हो। माई = माया।3।
अर्थ: ये दुष्वार माया हृदय-घर में (मेरे मन को) टिकने नहीं देती, भटकते-भटकते अनेक ही जन्म बीत गए।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दिनु रैनि अपना कीआ पाई ॥ किसु दोसु न दीजै किरतु भवाई ॥४॥

मूलम्

दिनु रैनि अपना कीआ पाई ॥ किसु दोसु न दीजै किरतु भवाई ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रैनि = रात। पाई = मैं पाता हूँ। भवाई = चक्करों में डालती है। किरतु = पिछले किए कर्मों के संस्कारों का समूह।4।
अर्थ: पर किसी को भी दोष नहीं दिया जा सकता, पिछले जन्मों का अपना ही किया भटकना में डाल रहा है, मैं दिन-रात अपने कमाए का फल भोग रहा हूँ।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुणि साजन संत जन भाई ॥ चरण सरण नानक गति पाई ॥५॥३४॥४०॥

मूलम्

सुणि साजन संत जन भाई ॥ चरण सरण नानक गति पाई ॥५॥३४॥४०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गति = उच्च आत्मिक अवस्था।5।
अर्थ: हे नानक! (कह:) हे सज्जनो! हे भाईयो! हे संत जनो! सुनो। परमात्मा के सुंदर चरणों की शरण पड़ कर ही उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त हो सकती है।5।34।40।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला ५ घरु ४ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला ५ घरु ४ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

भली सुहावी छापरी जा महि गुन गाए ॥ कित ही कामि न धउलहर जितु हरि बिसराए ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

भली सुहावी छापरी जा महि गुन गाए ॥ कित ही कामि न धउलहर जितु हरि बिसराए ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भली = अच्छी। सुहावी = सुंदर, सुख देने वाली। छापरी = छपड़ी, कुल्ली। जा महि = जिस (कुल्ली) में। कित ही कामि = किसी ही काम में। धउलहर = पक्के महल।1। रहाउ।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘कित ही’ में से ‘कितु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘ही’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! वह छपरी ही अच्छी है जिस में (रहने वाला मनुष्य) प्रभु के गुण गाता रहता है। (पर) वह पक्के महल किसी काम के नहीं, जिस में (बसने वाला मनुष्य) परमात्मा को भुला देता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनदु गरीबी साधसंगि जितु प्रभ चिति आए ॥ जलि जाउ एहु बडपना माइआ लपटाए ॥१॥

मूलम्

अनदु गरीबी साधसंगि जितु प्रभ चिति आए ॥ जलि जाउ एहु बडपना माइआ लपटाए ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: संगि = संगति में। चिति = चिक्त में। जलि जाउ = जल जाए। बडपना = बड़े होने का मान।1।
अर्थ: हे भाई! साधु-संगत में गरीबी (सहते हुए भी) आनंद है क्योंकि उस (साधु-संगत) में परमात्मा चिक्त में बसा रहता है। ऐसे बड़प्पन को आग लगे (जिसके कारण मनुष्य) माया से ही चिपका रहे।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पीसनु पीसि ओढि कामरी सुखु मनु संतोखाए ॥ ऐसो राजु न कितै काजि जितु नह त्रिपताए ॥२॥

मूलम्

पीसनु पीसि ओढि कामरी सुखु मनु संतोखाए ॥ ऐसो राजु न कितै काजि जितु नह त्रिपताए ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पीसनु = चक्की। पीसि = पीस के। ओढि = पहन के। त्रिपताए = अघाता।2।
अर्थ: (गरीबी में) चक्की पीस के, कंबली पहन के आनंद (प्राप्त रहता है, क्योंकि) मन को संतोष मिला रहता है। पर, हे भाई! ऐसा राज किसी काम का नहीं जिस में (मनुष्य माया से कभी) तृप्त ही ना हो।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नगन फिरत रंगि एक कै ओहु सोभा पाए ॥ पाट पट्मबर बिरथिआ जिह रचि लोभाए ॥३॥

मूलम्

नगन फिरत रंगि एक कै ओहु सोभा पाए ॥ पाट पट्मबर बिरथिआ जिह रचि लोभाए ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कै रंगि = के प्रेम में। पटंबर = पट के अंबर, रेश्मी कपड़े। रचि = मस्त हो के।3।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य एक परमात्मा के प्रेम में नंगा भी चला फिरता है, वह शोभा पाता है, पर (ऐसे) रेशमी कपड़े पहनने व्यर्थ हैं जिस में मस्त हो के मनुष्य (माया के अनेक ही) लोभ करता रहता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सभु किछु तुम्हरै हाथि प्रभ आपि करे कराए ॥ सासि सासि सिमरत रहा नानक दानु पाए ॥४॥१॥४१॥

मूलम्

सभु किछु तुम्हरै हाथि प्रभ आपि करे कराए ॥ सासि सासि सिमरत रहा नानक दानु पाए ॥४॥१॥४१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हाथि = हाथ में। प्रभ = हे प्रभु! सासि सासि = हरेक सांस के साथ। रहा = रहूँ।4।
अर्थ: (हे भाई! जीवों को क्या दोष? प्रभु) खुद ही सब कुछ करता है (जीवों से) करवाता है। हे नानक! (कह:) हे प्रभु! सब कुछ तेरे हाथ में है (मेहर कर, तेरा दास तेरे दर से ये) दान हासिल कर ले कि मैं हरेक सांस के साथ तुझे स्मरण करता रहूँ।4।1।41।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ हरि का संतु परान धन तिस का पनिहारा ॥ भाई मीत सुत सगल ते जीअ हूं ते पिआरा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ हरि का संतु परान धन तिस का पनिहारा ॥ भाई मीत सुत सगल ते जीअ हूं ते पिआरा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: परान = प्राण। पनिहारा = पानी भरने वाला। सुत = पुत्र। सगल ते = सभी से। जीअ हूं ते = जिंद से भी।1। रहाउ।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘तिस का’ में से ‘तिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘का’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: जो मनुष्य प्रभु की भक्ति करने वाला है (अगर प्रभु की मेहर हो, तो मैं) अपने प्राण अपना धन उस संत के हवाले कर दूँ, मैं उसका पानी भरने वाला बना रहूँ। भाई, मित्र, पुत्रों से जिंद से भी, मुझे वह प्यारा लगे।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

केसा का करि बीजना संत चउरु ढुलावउ ॥ सीसु निहारउ चरण तलि धूरि मुखि लावउ ॥१॥

मूलम्

केसा का करि बीजना संत चउरु ढुलावउ ॥ सीसु निहारउ चरण तलि धूरि मुखि लावउ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: करि = बना के। बीजना = व्यजन, पंखा। ढुलावउ = ढुलाऊँ। निहारउ = निहराऊँ, नीचा करूँ। चरण तलि = चरणों के नीचे। मुखि = मुंह पर। लावउ = लगाऊँ।1।
अर्थ: (हे भाई! अगर प्रभु मेहर करे तो) मैं अपने केसों का पंखा बना के प्रभु के संत को चौर झुलाता रहूँ, मैं संत के वचनों पर अपना सिर निवाए रखूँ, उसके चरणों की धूल ले के मैं अपने माथे पर लगाता रहूँ।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मिसट बचन बेनती करउ दीन की निआई ॥ तजि अभिमानु सरणी परउ हरि गुण निधि पाई ॥२॥

मूलम्

मिसट बचन बेनती करउ दीन की निआई ॥ तजि अभिमानु सरणी परउ हरि गुण निधि पाई ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मिसट = मीठे। करउ = करूँ। निआई = की तरह। तजि = छोड़ के। परउ = पड़ूँ, मैं पड़ा रहूँ। गुण निधि = गुणों का खजाना। पाई = प्राप्त करूँ।2।
अर्थ: (हे भाई! यदि प्रभु दया करे तो) मैं निमाणों की तरह (संत के आगे) मीठे बोलों से विनती करता रहूँ, अहंकार त्याग के उसके चरणों में बैठा रहूँ, और, संत से गुणों के खजाने परमात्मा का मिलाप हासिल करूँ।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अवलोकन पुनह पुनह करउ जन का दरसारु ॥ अम्रित बचन मन महि सिंचउ बंदउ बार बार ॥३॥

मूलम्

अवलोकन पुनह पुनह करउ जन का दरसारु ॥ अम्रित बचन मन महि सिंचउ बंदउ बार बार ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अवलोकन = दर्शन। पुनह पुनह = बार बार। सिंचउ = मैं सींचता रहूँ। अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल। बंदउ = वंदना करूँ। बार बार = बारंबार।3।
अर्थ: (हे भाई! प्रभु कृपा करे) मैं उसके सेवक को बार-बार निहारता रहूँ। आत्मिक जीवन देने वाले उस संत के वचन के जल से मैं अपने मन को सींचता रहूँ, और बार-बार उसको नमस्कार करता रहूँ।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

चितवउ मनि आसा करउ जन का संगु मागउ ॥ नानक कउ प्रभ दइआ करि दास चरणी लागउ ॥४॥२॥४२॥

मूलम्

चितवउ मनि आसा करउ जन का संगु मागउ ॥ नानक कउ प्रभ दइआ करि दास चरणी लागउ ॥४॥२॥४२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: चितवउ = चितवता रहूँ। मनि = मन में। संगु = साथ। मागउ = मैं मांगता हूँ। लागउ = मैं लगा रहूँ।4।
अर्थ: हे प्रभु! नानक पवर मेहर कर, मैं तेरे दास के चरणों में लगा रहूँ, मैं हर वक्त यही चितवता रहूँ, मैं अपने मन में यही अरदास करता रहूँ, मैं तुझसे तेरे सेवक का साथ माँगता रहूँ।4।2।42।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ जिनि मोहे ब्रहमंड खंड ताहू महि पाउ ॥ राखि लेहु इहु बिखई जीउ देहु अपुना नाउ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ जिनि मोहे ब्रहमंड खंड ताहू महि पाउ ॥ राखि लेहु इहु बिखई जीउ देहु अपुना नाउ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जिनि = जिस (माया) ने। मोहे = मोह लिए हैं। ब्रहमंड = सारी सृष्टि। खंड = सारे देश। ता हू महि = उसी में ही। पाउ = पाऊँ, मैं पा रहा हूँ। बिखई = विकारी।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! जिस (माया) ने सारी सृष्टि के सारे देश अपने प्यार में फसाए हुए हैं, उसी (माया) के वश में मैं भी पड़ा हुआ हूँ। हे प्रभु! मुझे अपना नाम बख्श, और मुझे इस विकारी जीव को (माया के चुंगल से) बचा ले।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जा ते नाही को सुखी ता कै पाछै जाउ ॥ छोडि जाहि जो सगल कउ फिरि फिरि लपटाउ ॥१॥

मूलम्

जा ते नाही को सुखी ता कै पाछै जाउ ॥ छोडि जाहि जो सगल कउ फिरि फिरि लपटाउ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जा ते = जिस (माया) से। जाउ = मैं जाता हूँ। कउ = को। लपटाउ = लिपटूँ।1।
अर्थ: हे प्रभु! मैं भी उस (माया) के पीछे (बार-बार) जाता हूँ जिससे कभी भी कोई भी सुखी नहीं हुआ। मैं बार-बार (उन पदार्थों से) चिपकता हूँ, जो (आखिर) सभी को छोड़ जाते हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

करहु क्रिपा करुणापते तेरे हरि गुण गाउ ॥ नानक की प्रभ बेनती साधसंगि समाउ ॥२॥३॥४३॥

मूलम्

करहु क्रिपा करुणापते तेरे हरि गुण गाउ ॥ नानक की प्रभ बेनती साधसंगि समाउ ॥२॥३॥४३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: करुणा = तरस। पति = मालिक। पते = हे मालिक! करुणापते = हे तरस के मालिक! गाउ = गाऊँ। समाउ = मैं लीन रहूँ।2।
अर्थ: हे तरस के मालिक! हे हरि! (मेरे पर) मेहर कर, मैं तेरे गुण गाता रहूँ। हे प्रभु! (तेरे सेवक) नानक की (तेरे आगे यही) विनती है कि मैं साधु-संगत में टिका रहूँ।2।3।43।

[[0746]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला ५ घरु ५ पड़ताल ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला ५ घरु ५ पड़ताल ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

प्रीति प्रीति गुरीआ मोहन लालना ॥ जपि मन गोबिंद एकै अवरु नही को लेखै संत लागु मनहि छाडु दुबिधा की कुरीआ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

प्रीति प्रीति गुरीआ मोहन लालना ॥ जपि मन गोबिंद एकै अवरु नही को लेखै संत लागु मनहि छाडु दुबिधा की कुरीआ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रीति प्रीति = प्रीतों में प्रीति। गुरीआ = बड़ी। मन = हे मन! लेखै = लेखे में, स्वीकार। अवरु = कोई और (उत्तम)। मनहि = मन में से। दुबिधा = डांवा डोल हालत। कुरीआ = पगडंडी, रास्ता।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (दुनिया की) प्रीतों से बड़ी प्रीति मन को मोहने वाले प्रभु की है। हे मन! हे मन! सिर्फ उस प्रभु का नाम जपा कर। और कोई उद्यम उसकी दरगाह में स्वीकार नहीं होता। हे भाई! संतों के चरणों में लगा रह, और अपने मन में से डाँवा-डोल रहने वाली दशा की पगडंडी दूर कर दे।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

निरगुन हरीआ सरगुन धरीआ अनिक कोठरीआ भिंन भिंन भिंन भिन करीआ ॥ विचि मन कोटवरीआ ॥ निज मंदरि पिरीआ ॥ तहा आनद करीआ ॥ नह मरीआ नह जरीआ ॥१॥

मूलम्

निरगुन हरीआ सरगुन धरीआ अनिक कोठरीआ भिंन भिंन भिंन भिन करीआ ॥ विचि मन कोटवरीआ ॥ निज मंदरि पिरीआ ॥ तहा आनद करीआ ॥ नह मरीआ नह जरीआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: निरगुन = माया के तीन गुणों से निर्लिप। हरीआ = परमात्मा। सरगुन धरीआ = माया के तीन गुणों वाला स्वरूप धारा। भिंन = अलग। कोटवरीआ = कोतवाल। निज मंदरि = अपने मंदिर में। जरीआ = बुढ़ापा।1।
अर्थ: हे भाई! निर्लिप प्रभु ने त्रैगुणी संसार बनाया, इसमें ये अनेक (शरीर) रूपी कोठरियां उसने अलग-अलग (किस्म की) बना दीं। (हरेक शरीर-कोठरी) में मन को कोतवाल बना दिया। प्यारा प्रभु (हरेक शरीर-कोठरी में) अपने मन्दिर में रहता है, और वहाँ आनंद लेता है। उस प्रभु को ना मौत आती है, ना ही बुढ़ापा उसके नजदीक फटकता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

किरतनि जुरीआ बहु बिधि फिरीआ पर कउ हिरीआ ॥ बिखना घिरीआ ॥ अब साधू संगि परीआ ॥ हरि दुआरै खरीआ ॥ दरसनु करीआ ॥ नानक गुर मिरीआ ॥ बहुरि न फिरीआ ॥२॥१॥४४॥

मूलम्

किरतनि जुरीआ बहु बिधि फिरीआ पर कउ हिरीआ ॥ बिखना घिरीआ ॥ अब साधू संगि परीआ ॥ हरि दुआरै खरीआ ॥ दरसनु करीआ ॥ नानक गुर मिरीआ ॥ बहुरि न फिरीआ ॥२॥१॥४४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: किरतनि = इस किए हुए जगत में, रचे हुए संसार (के मोह) में। जुरीआ = जुड़ा हुआ। पर कउ = पराए (धन) को। हिरीआ = देखता है। बिखना = विषियों से। संगि = संगति में। परीआ = आ पड़ा है। दुआरै = दर पे। गुर मिरीआ = गुरु को मिल के। बहुरि = दोबारा।2।
अर्थ: हे भाई! जीव प्रभु की रची रचना में ही जुड़ा रहता है, कई तरीकों से भटकता फिरता है, पराए (धन को, रूप को) देखता फिरता है, विषौ-विकारों में घिरा रहता है।
इस मानव जनम में जब जीव गुरु की संगति में पहुँचता है, तब प्रभु के दर पर आ खड़ा होता है, (प्रभु के) दर्शन करता है। हे नानक! (जो भी मनुष्य) गुरु को मिलता है, वह दोबारा जन्म-मरण के चक्कर में नहीं भटकता।2।1।44।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ रासि मंडलु कीनो आखारा ॥ सगलो साजि रखिओ पासारा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ रासि मंडलु कीनो आखारा ॥ सगलो साजि रखिओ पासारा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मंडलु = मंडूआ। अखारा = जगत अखाड़ा। सगलो पासारा = सारा जगत पसारा। साज = सृजना करके।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! ये सारा जगत-पसारा परमात्मा ने खुद बना रखा है। ये (जैसे) उसने (रास डालने के लिए) अखाड़ा तैयार किया है, रासों के लिए मंडूआ बना दिया है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बहु बिधि रूप रंग आपारा ॥ पेखै खुसी भोग नही हारा ॥ सभि रस लैत बसत निरारा ॥१॥

मूलम्

बहु बिधि रूप रंग आपारा ॥ पेखै खुसी भोग नही हारा ॥ सभि रस लैत बसत निरारा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बहु बिधि = कई किस्मों के। आपारा = बेअंत। पेखै = देखता है। हारा = थकता। सभि = सारे। बसत = बसता है। निरारा = निराला, अलग, निर्लिप।1।
अर्थ: हे भाई! (इस जगत-अखाड़े में) कई किस्मों के बेअंत रूप हैं रंग हैं (परमात्मा खुद इसे) खुशी से देखता है, (पदार्थों के) भोग (भोगता है, पर भोगते हुए) थकता नहीं। सारे रसों के आनंद लेता हुआ भी वह प्रभु खुद निर्लिप रहता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बरनु चिहनु नाही मुखु न मासारा ॥ कहनु न जाई खेलु तुहारा ॥ नानक रेण संत चरनारा ॥२॥२॥४५॥

मूलम्

बरनु चिहनु नाही मुखु न मासारा ॥ कहनु न जाई खेलु तुहारा ॥ नानक रेण संत चरनारा ॥२॥२॥४५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बरनु = रंग। चिहनु = निशान। मासारा = दाढ़ी। रेण = धूल।2।
अर्थ: हे प्रभु! तेरा रचे हुए जगत-खेल को बयान नहीं किया जा सकता। तेरा ना कोई रंग है, ना कोई निशान है, ना तेरा कोई मुँह है, ना कोई दाढ़ी है।
हे नानक! (कह: हे प्रभु! मैं तेरे दर से तेरे) संत जनों के चरणों की धूल माँगता हूँ।2।2।45।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ तउ मै आइआ सरनी आइआ ॥ भरोसै आइआ किरपा आइआ ॥ जिउ भावै तिउ राखहु सुआमी मारगु गुरहि पठाइआ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ तउ मै आइआ सरनी आइआ ॥ भरोसै आइआ किरपा आइआ ॥ जिउ भावै तिउ राखहु सुआमी मारगु गुरहि पठाइआ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तउ सरनी = तेरी शरण। भरोसै = भरोसे से। सुआमी = हे स्वामी! मारगु = रास्ता। गुरहि = गुरु ने। पठाइआ = भेजा है।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! मैं तेरी शरण आया हूँ, इस भरोसे से आया हूँ कि तू कृपा करेगा। सो, हे मालिक प्रभु! जैसे तुझे अच्छा लगे, मेरी रक्षा कर। (मुझे तेरे दर पे) गुरु ने भेजा है, (मुझे तेरे दर का) रास्ता गुरु ने (दिखाया है)।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

महा दुतरु माइआ ॥ जैसे पवनु झुलाइआ ॥१॥

मूलम्

महा दुतरु माइआ ॥ जैसे पवनु झुलाइआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दुतरु = जिस को तैरना मुश्किल है। झुलाइआ = हिलोरे देती है।1।
अर्थ: हे प्रभु! जैसे (तेज) हवा धक्के मारती है, वैसे ही माया (की लहरें धक्के मारती हैं) (तेरी रची हुई) माया (एक बड़ा समुंदर है जिससे) पार लांघना बहुत मुश्किल है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुनि सुनि ही डराइआ ॥ कररो ध्रमराइआ ॥२॥

मूलम्

सुनि सुनि ही डराइआ ॥ कररो ध्रमराइआ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सुनि = सुन के। कररो = करड़ा, सख्त।2।
अर्थ: हे प्रभु! मैं तो ये सुन-सुन के ही डर रहा हूँ कि धर्मराज बड़ा कठोर (हाकिम) है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ग्रिह अंध कूपाइआ ॥ पावकु सगराइआ ॥३॥

मूलम्

ग्रिह अंध कूपाइआ ॥ पावकु सगराइआ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ग्रिह = घर, संसार। कूप = कूआँ। पावकु = (तृष्णा की) आग। सगराइआ = सारा।3।
अर्थ: हे प्रभु! ये संसार एक अंधा कूआँ है, इसमें सारी (तृष्णा की) आग ही आग है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गही ओट साधाइआ ॥ नानक हरि धिआइआ ॥ अब मै पूरा पाइआ ॥४॥३॥४६॥

मूलम्

गही ओट साधाइआ ॥ नानक हरि धिआइआ ॥ अब मै पूरा पाइआ ॥४॥३॥४६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गही = पकड़ी। साधइआ = गुरु (की)। पूरा = पूरन प्रभु।4।
अर्थ: हे नानक (कह: हे प्रभु! जब से) मैंने गुरु का आसरा लिया है, मैं परमात्मा का नाम स्मरण कर रहा हूँ, और, मुझे पूर्ण प्रभु मिल गया है।4।3।46।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला ५ घरु ६ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला ५ घरु ६ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सतिगुर पासि बेनंतीआ मिलै नामु आधारा ॥ तुठा सचा पातिसाहु तापु गइआ संसारा ॥१॥

मूलम्

सतिगुर पासि बेनंतीआ मिलै नामु आधारा ॥ तुठा सचा पातिसाहु तापु गइआ संसारा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आधारा = (जिंदगी का) आसरा। तुठा = प्रसन्न हुआ। सचा = सदा स्थिर रहने वाला। तापु = संसार वाला ताप, माया के मोह का ताप।1।
अर्थ: हे भाई! मैं तो गुरु के पास ही (सदा) आरजू करता हूँ कि मुझे परमात्मा का नाम मिल जाए, (ये नाम ही मेरी जिंदगी का) सहारा (है)। हे भाई! सदा कायम रहने वाला प्रभु-पातशाह जिस मनुष्य पर दयावान होता है (उसको उसका नाम मिलता है, और) उसका माया के मोह वाला ताप दूर हो जाता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

भगता की टेक तूं संता की ओट तूं सचा सिरजनहारा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

भगता की टेक तूं संता की ओट तूं सचा सिरजनहारा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: टेक = सहारा। ओट = आसरा। सिरजनहारा = पैदा करने वाला।1। रहाउ।
अर्थ: हे सदा कायम रहने वाले विधाता! तू (तेरा नाम) तेरे भक्तों का सहारा है, तेरा नाम तेरे संतों का आसरा है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सचु तेरी सामगरी सचु तेरा दरबारा ॥ सचु तेरे खाजीनिआ सचु तेरा पासारा ॥२॥

मूलम्

सचु तेरी सामगरी सचु तेरा दरबारा ॥ सचु तेरे खाजीनिआ सचु तेरा पासारा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सचु = सदा स्थिर। सामगरी = सामान, पदार्थ। खाजीनिआ = खजाने। पासारा = जगत खिलारा।2।
अर्थ: हे प्रभु! तेरा दरबार सदा कायम रहने वाला है, तेरे खजाने सदा भरपूर रहने वाले हैं, (तेरे खजानों में) तेरे पदार्थ सदा-स्थिर रहने वाले हैं, तेरा रचा हुआ जगत-पसारा अटल नियमों वाला है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तेरा रूपु अगमु है अनूपु तेरा दरसारा ॥ हउ कुरबाणी तेरिआ सेवका जिन्ह हरि नामु पिआरा ॥३॥

मूलम्

तेरा रूपु अगमु है अनूपु तेरा दरसारा ॥ हउ कुरबाणी तेरिआ सेवका जिन्ह हरि नामु पिआरा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अगंमु = अगम्य, अगम्य (पहुँच से परे)। अनूपु = बेमिसाल, अद्वितीय। दरसारा = दर्शन,नजारा। हउ = मैं।3।
अर्थ: हे प्रभु! तेरी हस्ती ऐसी है जिस तक (हम जीवों की) पहुँच नहीं हो सकती, तेरा नजारा अद्वितीय है (तेरे जैसा और कोई नहीं)। हे प्रभु! मैं तेरे उन सेवकों पर से सदके जाता हूँ, जिन्हें तेरा नाम प्यारा लगता है।3।

[[0747]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सभे इछा पूरीआ जा पाइआ अगम अपारा ॥ गुरु नानकु मिलिआ पारब्रहमु तेरिआ चरणा कउ बलिहारा ॥४॥१॥४७॥

मूलम्

सभे इछा पूरीआ जा पाइआ अगम अपारा ॥ गुरु नानकु मिलिआ पारब्रहमु तेरिआ चरणा कउ बलिहारा ॥४॥१॥४७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अगम = अगम्य (पहुँच से परे)। अपारा = बेअंत। कउ = को, से।4।
अर्थ: हे अगम्य (पहुँच से परे) प्रभु! हे बेअंत प्रभु! जब (किसी अति भाग्यशाली को) तू मिल जाता है, उसकी सारी ही मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं (उसे कोई कमी नहीं रह जाती, उसकी तृष्णा समाप्त हो जाती है)। हे प्रभु! मैं तेरे चरणों से सदके जाता हूँ। हे भाई! जिस मनुष्य को गुरु मिल गया, उसको परमात्मा मिल गया।4।1।47।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला ५ घरु ७ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला ५ घरु ७ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तेरा भाणा तूहै मनाइहि जिस नो होहि दइआला ॥ साई भगति जो तुधु भावै तूं सरब जीआ प्रतिपाला ॥१॥

मूलम्

तेरा भाणा तूहै मनाइहि जिस नो होहि दइआला ॥ साई भगति जो तुधु भावै तूं सरब जीआ प्रतिपाला ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तूं है = तू स्वयं ही है। भाणा…मनाइहि = तू रजा में चलाता है। होहि = तू होता है। दइआला = दयावान। साई = वही। तुधु भावै = तुझे पसंद आती है।1।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जिस नो’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे प्रभु! जिस मनुष्य पर तू दयावान होता है तू स्वयं ही उसको अपनी रजा में चलाता है। असल भक्ति वही है जो तुझे पसंद आ जाती है। हे प्रभु! तू सारे जीवों की पालना करने वाला है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे राम राइ संता टेक तुम्हारी ॥ जो तुधु भावै सो परवाणु मनि तनि तूहै अधारी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे राम राइ संता टेक तुम्हारी ॥ जो तुधु भावै सो परवाणु मनि तनि तूहै अधारी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रामराइ = रामराय, हे प्रभु पातशाह! टेक = आसरा। परवाणु = स्वीकार। मनि = मन में। अधारी = आसरा।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे प्रभु पातशाह! तेरे संतों को (सदा) तेरा ही आसरा रहता है। जो कुछ तुझे अच्छा लगता है वही (तेरे संतों को) स्वीकार होता है। उनके मन में, उनके तन में, तू ही आसरा है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तूं दइआलु क्रिपालु क्रिपा निधि मनसा पूरणहारा ॥ भगत तेरे सभि प्राणपति प्रीतम तूं भगतन का पिआरा ॥२॥

मूलम्

तूं दइआलु क्रिपालु क्रिपा निधि मनसा पूरणहारा ॥ भगत तेरे सभि प्राणपति प्रीतम तूं भगतन का पिआरा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: क्रिपानिधि = कृपा का खजाना। मनसा = मनीषा, मन की कामना। भगत = (‘भगति’ और ‘भगत’ में फर्क याद रखें)। सभि = सारे। प्राणपति = हे जिंद के मालिक! 2।
अर्थ: हे प्रभु! तू दया का घर है, तू कृपा का खजाना है, तू (अपने भक्तों की) मनोकामनाएं पूरी करने वाला है। हे जिंद के मालिक! हे प्रीतम प्रभु! तेरे सारे भक्त (तुझे प्यारे लगते हैं), तू भक्तों को प्यारा लगता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तू अथाहु अपारु अति ऊचा कोई अवरु न तेरी भाते ॥ इह अरदासि हमारी सुआमी विसरु नाही सुखदाते ॥३॥

मूलम्

तू अथाहु अपारु अति ऊचा कोई अवरु न तेरी भाते ॥ इह अरदासि हमारी सुआमी विसरु नाही सुखदाते ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अथाहु = जिसका थाह ना पड़ सके। अपारु = जिसका परला छोर ना मिल सके। तेरी भाते = तेरी भांति का, तेरे जैसे। सुआमी = हे स्वामी! सुख दाते = हे सुख देने वाले!।3।
अर्थ: हे प्रभु! (तेरे दिल की) गहराई नहीं पाई जा सकती, तेरी हस्ती का परला छोर नहीं पाया जा सकता, तू बहुत ही ऊँचा है, कोई और तेरे जैसा नहीं है। हे मालिक! हे सुखों के देने वाले! हम जीवों की (तेरे आगे) यही आरजू है, कि हमें तू कभी भी ना भूल।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दिनु रैणि सासि सासि गुण गावा जे सुआमी तुधु भावा ॥ नामु तेरा सुखु नानकु मागै साहिब तुठै पावा ॥४॥१॥४८॥

मूलम्

दिनु रैणि सासि सासि गुण गावा जे सुआमी तुधु भावा ॥ नामु तेरा सुखु नानकु मागै साहिब तुठै पावा ॥४॥१॥४८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रैणि = रात। सासि सासि = हरेक सांस के साथ। गावा = गाऊँ। तुठै = अगर प्रसन्न हो जाए। पावा = मैं हासिल करूँ।4।
अर्थ: हे स्वामी! अगर मैं तुझे अच्छा लगूँ (यदि तेरी मेरे पर मेहर हो) मैं दिन-रात हरेक सांस के साथ तेरे गुण गाता रहूँ। (तेरा दास) नानक (तुझसे) तेरा नाम माँगता है (यही नानक के लिए) सुख (है)। हे मेरे साहिब! यदि तू दयावान हो, तो मुझे ये दाति मिल जाए।4।1।48।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ विसरहि नाही जितु तू कबहू सो थानु तेरा केहा ॥ आठ पहर जितु तुधु धिआई निरमल होवै देहा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ विसरहि नाही जितु तू कबहू सो थानु तेरा केहा ॥ आठ पहर जितु तुधु धिआई निरमल होवै देहा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जितु = जहाँ, जिस जगह पर। कबहू = कभी भी। केहा = बड़ा आश्चर्यजनक। तुधु = तुझे। धिआई = ध्यान धरूँ। देहा = शरीर।1।
अर्थ: हे मेरे राम! तेरा वह (साधु-संगत) स्थान बड़ा ही आश्चर्यजनक है, जिसमें बैठ के तू कभी भी ना भूले, जिसमें बैठ के मैं तुझे आठों पहर याद कर सकूँ, और, मेरा शरीर पवित्र हो जाए।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे राम हउ सो थानु भालण आइआ ॥ खोजत खोजत भइआ साधसंगु तिन्ह सरणाई पाइआ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे राम हउ सो थानु भालण आइआ ॥ खोजत खोजत भइआ साधसंगु तिन्ह सरणाई पाइआ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हउ = मैं। खोजत = तलाशते हुए। साध संगु = गुरमुखों का मेल। तिन्ह सरणाई = उनकी शरण में।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे राम! मैं वह जगह तलाशने चल पड़ा (जहाँ मैं तेरे दर्शन कर सकूँ)। ढूँढते ढूँढते मुझे गुरमुखों का साथ मिल गया, उन (गुरमुखों) की शरण पड़ कर तुझे मैंने (तुझे भी) पा लिया।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बेद पड़े पड़ि ब्रहमे हारे इकु तिलु नही कीमति पाई ॥ साधिक सिध फिरहि बिललाते ते भी मोहे माई ॥२॥

मूलम्

बेद पड़े पड़ि ब्रहमे हारे इकु तिलु नही कीमति पाई ॥ साधिक सिध फिरहि बिललाते ते भी मोहे माई ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पढ़े पढ़ि = पढ़ पढ़ के। ब्रहमे = ब्रहमा जैसे अनेक। तिलु = रक्ती भर। साधिक = साधना करने वाले। सिध = साधना में सिद्ध योगी, करामाती योगी। ते भी = वो भी (बहुवचन)। माई = माया।2।
अर्थ: हे मेरे राम! ब्रहमा जैसे अनेक वेद (आदि धर्म-पुस्तकें) पढ़-पढ़ के थक गए, पर वे तेरी रक्ती भर भी कद्र ना समझ सके। साधना करने वाले जोगी, करामाती जोगी (तेरे दर्शनों को) बिलकते फिरते हैं, पर वे भी माया के मोह में फंसे रहे।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दस अउतार राजे होइ वरते महादेव अउधूता ॥ तिन्ह भी अंतु न पाइओ तेरा लाइ थके बिभूता ॥३॥

मूलम्

दस अउतार राजे होइ वरते महादेव अउधूता ॥ तिन्ह भी अंतु न पाइओ तेरा लाइ थके बिभूता ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दस अउतार = (सतियुग के अवतार: मच्छ, कच्छ, वराह, नरसिंह, वामन। त्रेते के अवतार: परुषराम, रामचंद्र। द्वापर का अवतार: कृष्ण। कलियुग के अवतार: बुद्ध, कलकी)। राजे = पूजनीय। महादेव = शिव। अवधूता = त्यागी। बिभूता = राख।3।
अर्थ: हे मेरे राम! (विष्णु के) दस अवतार (अपने-अपने युग में) आदर प्राप्त करते रहे। शिव जी बड़ा त्यागी प्रसिद्ध हुआ। पर वे भी तेरे गुणों का अंत ना पा सके। (शिव आदि अनेक अपने शरीर पर) राख मल-मल के थक गए।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सहज सूख आनंद नाम रस हरि संती मंगलु गाइआ ॥ सफल दरसनु भेटिओ गुर नानक ता मनि तनि हरि हरि धिआइआ ॥४॥२॥४९॥

मूलम्

सहज सूख आनंद नाम रस हरि संती मंगलु गाइआ ॥ सफल दरसनु भेटिओ गुर नानक ता मनि तनि हरि हरि धिआइआ ॥४॥२॥४९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सहज = अडोल अवस्था। संती = संतों ने। मंगलु = महिमा के गीत। सफल दरसनु = जिसके दर्शन फलदायक हों। भेटिआ = मिला। मनि = मन में। तनि = हृदय में।4।
अर्थ: हे नानक! (कह:) जिस संत-जनों ने परमात्मा की महिमा के गीत सदा गाए, उन्होंने ही आत्मिक अडोलता के सुख-आनंद हासिल किए, उन्होंने नाम का रस चखा। जब उन्हें वह गुरु मिल गया, जिसका दर्शन जीवन का उद्देश्य पूरा कर देता है, तब उन्होंने अपने मन में अपने दिल में परमात्मा का ध्यान आरम्भ कर दिया।4।2।49।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ करम धरम पाखंड जो दीसहि तिन जमु जागाती लूटै ॥ निरबाण कीरतनु गावहु करते का निमख सिमरत जितु छूटै ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ करम धरम पाखंड जो दीसहि तिन जमु जागाती लूटै ॥ निरबाण कीरतनु गावहु करते का निमख सिमरत जितु छूटै ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: करम धरम = (तीर्थ स्नान आदि निहित) धार्मिक कर्म। पाखंड = दिखावे के काम। तिन = उनको। जागाती = मसूलिया। निरबाण = निर्वाण, वासना रहित हो के। करते का = कर्तार का। निमख = आँख झपकने जितना समय। जितु = जिससे, जिस (कीर्तन) से। छूटै = (मनुष्य विकारों से) बच जाता है।1।
अर्थ: हे भाई! (तीर्थ-स्नान आदि निहित) धार्मिक काम दिखावे के काम हैं, ये काम जितने भी लोग करते हुए दिखाई देते हैं, उन्हें मसूलिया जम लूट लेता है। (इस वास्ते) वासना-रहित हो के कर्तार की महिमा किया करो, क्योंकि इसकी इनायत से छिन भर भी नाम स्मरण करने मात्र से मनुष्य विकारों से खलासी पा लेता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

संतहु सागरु पारि उतरीऐ ॥ जे को बचनु कमावै संतन का सो गुर परसादी तरीऐ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

संतहु सागरु पारि उतरीऐ ॥ जे को बचनु कमावै संतन का सो गुर परसादी तरीऐ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सागरु = (संसार) समुंदर। उतरीऐ = लांघा जाता है। को = कोई मनुष्य। परसादी = कृपा से।1। रहाउ।
अर्थ: हे संत जनों! (महिमा की इनायत से) संसार-समुंदर से पार लांघा जा सकता है। अगर कोई मनुष्य संत जनों के उपदेश को (जीवन में) कमा ले, वह मनुष्य गुरु की कृपा से पार लांघ जाता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कोटि तीरथ मजन इसनाना इसु कलि महि मैलु भरीजै ॥ साधसंगि जो हरि गुण गावै सो निरमलु करि लीजै ॥२॥

मूलम्

कोटि तीरथ मजन इसनाना इसु कलि महि मैलु भरीजै ॥ साधसंगि जो हरि गुण गावै सो निरमलु करि लीजै ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कोटि = करोड़ों। मजन = स्नान। कलि महि = जगत में।

दर्पण-टिप्पनी

(नोट: यहां किसी खास युग का वर्णन नहीं किया जा रहा)।

दर्पण-भाषार्थ

संगि = संगति में। करि लीजै = कर लिया जाता है।2।
अर्थ: हे भाई! करोड़ों तीर्थ-स्नान (करते हुए भी) जगत में (विकारों की) मैल लिबड़ जाती है। पर जो मनुष्य गुरु की संगति में (टिक के) परमात्मा की महिमा के गीत गाता रहता है, वह पवित्र जीवन वाला बन जाता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बेद कतेब सिम्रिति सभि सासत इन्ह पड़िआ मुकति न होई ॥ एकु अखरु जो गुरमुखि जापै तिस की निरमल सोई ॥३॥

मूलम्

बेद कतेब सिम्रिति सभि सासत इन्ह पड़िआ मुकति न होई ॥ एकु अखरु जो गुरमुखि जापै तिस की निरमल सोई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कतेब = पश्चिमी मतों की धर्म पुस्तकें (कुरान, अंजील, जंबूर, तौरेत)। सभि = सारे। पढ़िआ = सिर्फ पढ़ने से। मुकति = विकारों से खलासी। अखरु = अक्षर, ना रहित, अबिनाशी प्रभु। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ के। सोई = शोभा।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘तिस की’ में से ‘तिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘की’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! वेद-पुराण-स्मृतियाँ आदि ये सारे (हिन्दू धर्म पुस्तकें) (कुरान-अंजील आदि) ये सारे (पश्चिमी धर्म की पुस्तकें) आदि को सिर्फ पढ़ने मात्र से विकारों से निजात नहीं मिलती। पर जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ कर अबिनाशी प्रभु का नाम जपता है, उसकी (लोक-परलोक में) पवित्र शोभा बन जाती है।3।

[[0748]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

खत्री ब्राहमण सूद वैस उपदेसु चहु वरना कउ साझा ॥ गुरमुखि नामु जपै उधरै सो कलि महि घटि घटि नानक माझा ॥४॥३॥५०॥

मूलम्

खत्री ब्राहमण सूद वैस उपदेसु चहु वरना कउ साझा ॥ गुरमुखि नामु जपै उधरै सो कलि महि घटि घटि नानक माझा ॥४॥३॥५०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: उधरै = (विकारों से) बच जाता है। कलि महि = जगत में। घटि घटि = हरेक शरीर में। माझा = में।4।
अर्थ: हे भाई! (परमात्मा का नाम स्मरण करने का) उपदेश खत्री-ब्राहमण-वैश-शूद्र चारों वर्णों के लोगों के वास्ते एक जैसा ही है। (किसी भी वर्ण का हो) जो मनुष्य गुरु के बताए हुए रास्ते पर चल के प्रभु का नाम जपता है वह जगत में विकारों से बच निकलता है। हे नानक! उस मनुष्य को परमात्मा हरेक शरीर में बसा हुआ दिखाई देता है।4।3।50।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ जो किछु करै सोई प्रभ मानहि ओइ राम नाम रंगि राते ॥ तिन्ह की सोभा सभनी थाई जिन्ह प्रभ के चरण पराते ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ जो किछु करै सोई प्रभ मानहि ओइ राम नाम रंगि राते ॥ तिन्ह की सोभा सभनी थाई जिन्ह प्रभ के चरण पराते ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: करै = (परमात्मा) करता है। प्रभ मानहि = प्रभु का किया मानते हैं। ओइ = वे (संत जन)। रंगि = रंग में। राते = रंगे हुए। थाई = जगहों में। पराते = पहचाने, सांझ डाल ली।1।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘ओइ’ है ‘ओह/वो’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! वे संत जन परमात्मा के नाम-रंग में रंगे रहते हैं। जो कुछ परमात्मा करता है, उसको वे परमात्मा का किया हुआ ही मानते हैं। हे भाई! जिन्होंने परमात्मा के चरणों के साथ सांझ डाल ली, उनकी महिमा सब जगहों में (फैल जाती है)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे राम हरि संता जेवडु न कोई ॥ भगता बणि आई प्रभ अपने सिउ जलि थलि महीअलि सोई ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे राम हरि संता जेवडु न कोई ॥ भगता बणि आई प्रभ अपने सिउ जलि थलि महीअलि सोई ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जेवडु = जितना, बराबर का। सिउ = साथ। जलि = जल में। थलि = धरती में। महीअलि = मही तलि, धरती के तल पर, आकाश में, अंतरिक्ष में।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे प्रभु! तेरे संतों के बराबर का और कोई नहीं है। हे भाई! संत जनों की परमात्मा के साथ गहरी प्रीति बनी रहती है, उन्हें परमात्मा पानी में, धरती में, आकाश में हर जगह बसता दिखाई देता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कोटि अप्राधी संतसंगि उधरै जमु ता कै नेड़ि न आवै ॥ जनम जनम का बिछुड़िआ होवै तिन्ह हरि सिउ आणि मिलावै ॥२॥

मूलम्

कोटि अप्राधी संतसंगि उधरै जमु ता कै नेड़ि न आवै ॥ जनम जनम का बिछुड़िआ होवै तिन्ह हरि सिउ आणि मिलावै ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कोटि अप्राधी = करोड़ों पाप करने वाला। संगि = संगति में। उभरै = विकारों से बचा जाता है। कै नेड़ि = के नजदीक। सिउ = साथ। आणि = ला के।2।
अर्थ: हे भाई! करोड़ों अपराध करने वाले मनुष्य भी संतों की संगति में (टिक के) विकारों से बच जाते हैं, (फिर) जम उसके नजदीक नहीं आता। अगर कोई मनुष्य अनेक जन्मों से परमात्मा से विछुड़ा रहे - संत ऐसे अनेक मनुष्यों को ला के परमात्मा से मिला देता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

माइआ मोह भरमु भउ काटै संत सरणि जो आवै ॥ जेहा मनोरथु करि आराधे सो संतन ते पावै ॥३॥

मूलम्

माइआ मोह भरमु भउ काटै संत सरणि जो आवै ॥ जेहा मनोरथु करि आराधे सो संतन ते पावै ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भरमु = भटकना। करि = कर के, धार के। ते = से।3।
अर्थ: हे भाई! जो भी मनुष्य संत की शरण आ पड़ता है, संत उसके अंदर से माया का मोह, भटकना, डर दूर कर देता है। मनुष्य जिस तरह की वासना धार के प्रभु का स्मरण करता है वह वही फल संत जनों से प्राप्त कर लेता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जन की महिमा केतक बरनउ जो प्रभ अपने भाणे ॥ कहु नानक जिन सतिगुरु भेटिआ से सभ ते भए निकाणे ॥४॥४॥५१॥

मूलम्

जन की महिमा केतक बरनउ जो प्रभ अपने भाणे ॥ कहु नानक जिन सतिगुरु भेटिआ से सभ ते भए निकाणे ॥४॥४॥५१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: महिमा = बड़ाई। केतक = कितनी। बरनउ = मैं बयान करूँ। भाणे = अच्छे लगे। सभ ते = सारी दुनिया से। निकाणे = बेमुहताज।4।
अर्थ: हे भाई! जो सेवक अपने प्रभु को प्यारे लग चुके हैं, मैं उनकी कितनी महिमा बयान करूँ? हे नानक! कह: जिस मनुष्यों को गुरु मिल गया, वे सारी दुनिया से बे-मुहताज हो गए।4।4।51।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ महा अगनि ते तुधु हाथ दे राखे पए तेरी सरणाई ॥ तेरा माणु ताणु रिद अंतरि होर दूजी आस चुकाई ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ महा अगनि ते तुधु हाथ दे राखे पए तेरी सरणाई ॥ तेरा माणु ताणु रिद अंतरि होर दूजी आस चुकाई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: महा अगनि ते = (तृष्णा की) बड़ी आग से। तुधु = तू। दे = दे कर। ताणु = बल, ताकत। रिद = हृदय। चुकाई = दूर कर दी।1।
अर्थ: हे प्रभु! जो मनुष्य तेरी शरण आ पड़े, तूने उन्हें अपना हाथ दे के (तृष्णा की) बड़ी आग में से बचा लिया। उन्होंने किसी और से मदद की आस अपने दिल से खत्म कर दी, उनके हृदय में तेरा ही माण तेरा ही आसरा बना रहता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे राम राइ तुधु चिति आइऐ उबरे ॥ तेरी टेक भरवासा तुम्हरा जपि नामु तुम्हारा उधरे ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे राम राइ तुधु चिति आइऐ उबरे ॥ तेरी टेक भरवासा तुम्हरा जपि नामु तुम्हारा उधरे ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: राम राइ = हे प्रभु पातशाह! तुधु चिति आईऐ = यदि तू चिक्त में आ बसे। उबरे = डूबने से बच गए। टेक = आसरा। उधरे = विकारों से बच गए।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे प्रभु पातशाह! अगर तू (जीवों के) चिक्त में आ बसे, तो वह (संसार-समुंदर में) डूबने से बच जाते हैं। वह मनुष्य तेरा नाम जप के विकारों से खलासी पा लेते हैं, उनको (हर बात के लिए) तेरा ही आसरा तेरी सहायता का भरोसा बना रहता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अंध कूप ते काढि लीए तुम्ह आपि भए किरपाला ॥ सारि सम्हालि सरब सुख दीए आपि करे प्रतिपाला ॥२॥

मूलम्

अंध कूप ते काढि लीए तुम्ह आपि भए किरपाला ॥ सारि सम्हालि सरब सुख दीए आपि करे प्रतिपाला ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंध कूप ते = अंधेरे कूएँ में से। ते = से। सारि = सार ले के। समालि = संभाल कर के।2।
अर्थ: हे प्रभु! जिस मनुष्यों पर तू खुद दयावान हो गया, तूने उनको (माया के मोह के) अंधेरे कूएँ में से निकाल लिया, तूने उनकी सार ले के, उनकी संभाल करके उन्हें सारे सुख बख्शे। हे भाई! प्रभु खुद ही उनकी पालना करता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

आपणी नदरि करे परमेसरु बंधन काटि छडाए ॥ आपणी भगति प्रभि आपि कराई आपे सेवा लाए ॥३॥

मूलम्

आपणी नदरि करे परमेसरु बंधन काटि छडाए ॥ आपणी भगति प्रभि आपि कराई आपे सेवा लाए ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नदरि = मेहर की निगाह। काटि = काट के। प्रभि = प्रभु ने।3।
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्यों पर परमात्मा अपनी मेहर की निगाह करता है, उनके (मोह के) बंधन काट के उनकों विकारों से छुड़वा लेता है। उनको खुद ही अपनी सेवा-भक्ति में जोड़ लेता है। हे भाई! प्रभु ने उनसे अपनी भक्ति खुद ही करवा ली।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

भरमु गइआ भै मोह बिनासे मिटिआ सगल विसूरा ॥ नानक दइआ करी सुखदातै भेटिआ सतिगुरु पूरा ॥४॥५॥५२॥

मूलम्

भरमु गइआ भै मोह बिनासे मिटिआ सगल विसूरा ॥ नानक दइआ करी सुखदातै भेटिआ सतिगुरु पूरा ॥४॥५॥५२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भरमु = भटकना। भै = डर। विसूरा = झोरा, चिन्ता। सुखदाते = सुखों के दाते ने। भेटिआ = मिल गया।4।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘भै’ है ‘भउ’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे नानक! सुख देने वाले प्रभु ने जिस पर दया की उन्हें पूरा गुरु मिल गया, (उनके अंदर से) भटकना दूर हो गई, उनके अंदर से मोह और अन्य सारे डर नाश हो गए, उनकी सारी चिन्ता-फिक्र समाप्त हो गई।4।5।52।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ जब कछु न सीओ तब किआ करता कवन करम करि आइआ ॥ अपना खेलु आपि करि देखै ठाकुरि रचनु रचाइआ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ जब कछु न सीओ तब किआ करता कवन करम करि आइआ ॥ अपना खेलु आपि करि देखै ठाकुरि रचनु रचाइआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कछु = (जगत का) कुछ भी। सीओ = था। करि = कर के। आइआ = (अब) जन्मा है। खेलु = तमाशा। ठाकुरि = ठाकुर ने।1।
अर्थ: हे भाई! जब अभी संसार ही नहीं था (ये जीव भी नहीं थे, तब) ये जीव क्या करता था? और, कौन-कौन से कर्म करके ये अस्तित्व में आया है (दरअसल बात ये है कि) परमात्मा ने खुद ही जगत-रचना रची है, वह खुद ही अपना ये जगत-तमाशा रच के खुद ही इस जगत-तमाशे को देख रहा है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे राम राइ मुझ ते कछू न होई ॥ आपे करता आपि कराए सरब निरंतरि सोई ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे राम राइ मुझ ते कछू न होई ॥ आपे करता आपि कराए सरब निरंतरि सोई ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: राम राइ = हे प्रभु पातशाह! मुझ ते = मुझसे। आपो = आप ही। सरब निरंतरि = सबके अंदर एक रस। सोई = वह परमात्मा ही।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे प्रभु-पातशाह! (तेरी प्रेरणा सहायता के बिना) मुझसे कोई काम नहीं हो सकता। हे भाई! वह परमात्मा ही सारे जीवों में एक-रस व्यापक है, वह खुद ही (जीवों में बैठ के) सब कुछ करता है, वह खुद ही (जीवों से सब कुछ) करवाता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गणती गणी न छूटै कतहू काची देह इआणी ॥ क्रिपा करहु प्रभ करणैहारे तेरी बखस निराली ॥२॥

मूलम्

गणती गणी न छूटै कतहू काची देह इआणी ॥ क्रिपा करहु प्रभ करणैहारे तेरी बखस निराली ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गणती गणी = लेखा गिना। कत हू = किसी भी तरह। काची = नाशवान। प्रभ = हे प्रभु! करणैहारै = हे सब कुछ करने में समर्थ! निराली = अनोखी, अलग किस्म की।2।
अर्थ: हे प्रभु! ये जीव अंजान अक्ल वाला और नाशवान शरीर वाला है। अगर इसके किए कर्मों का लेखा गिना गया, तो ये किसी भी तरह आजाद नहीं हो सकता। हे सब कुछ कर सकने के समर्थ प्रभु! तू खुद ही मेहर कर (और बख्श ले)। तेरी कृपा अलग ही किस्म की है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जीअ जंत सभ तेरे कीते घटि घटि तुही धिआईऐ ॥ तेरी गति मिति तूहै जाणहि कुदरति कीम न पाईऐ ॥३॥

मूलम्

जीअ जंत सभ तेरे कीते घटि घटि तुही धिआईऐ ॥ तेरी गति मिति तूहै जाणहि कुदरति कीम न पाईऐ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कीते = पैदा किए हुए। घटि घटि = हरेक शरीर में। गति = आत्मिक अवस्था। मिति = माप, मर्यादा। तेरी गति मिति = तेरी आत्मिक अवस्था और तेरी हस्ती की सीमा। कीम = कीमत।3।
अर्थ: हे प्रभु! (जगत के) सारे जीव तेरे पैदा किए हुए हैं, हरेक शरीर में तेरा ही ध्यान धरा जा रहा है। तू कैसा है, तू कितना बड़ा है; ये भेद तू खुद ही जानता है। तेरी कुदरति का मूल्य नहीं डाला जा सकता।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

निरगुणु मुगधु अजाणु अगिआनी करम धरम नही जाणा ॥ दइआ करहु नानकु गुण गावै मिठा लगै तेरा भाणा ॥४॥६॥५३॥

मूलम्

निरगुणु मुगधु अजाणु अगिआनी करम धरम नही जाणा ॥ दइआ करहु नानकु गुण गावै मिठा लगै तेरा भाणा ॥४॥६॥५३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: निरगुणु = गुण हीन। मुगधु = मूर्ख। अजाणु = बेसमझ। अगिआनी = आत्मिक जीवन से बेसमझ। भाणा = रजा।4।
अर्थ: हे प्रभु! मैं गुणहीन हूँ, मैं मूर्ख हूँ, मैं बेसमझ हूँ, मुझे आत्मिक जीवन की सूझ नहीं, मैं कोई किए जाने वाले धार्मिक कर्म भी नहीं जानता (जिनसे मैं तुझे खुश कर सकूँ)। हे प्रभु! मेहर कर, (तेरा दास) नानक तेरे गुण गाता रहे, और (नानक को) तेरी रजा मिठी लगती रहे।4।6।53।

[[0749]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ भागठड़े हरि संत तुम्हारे जिन्ह घरि धनु हरि नामा ॥ परवाणु गणी सेई इह आए सफल तिना के कामा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ भागठड़े हरि संत तुम्हारे जिन्ह घरि धनु हरि नामा ॥ परवाणु गणी सेई इह आए सफल तिना के कामा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भागठड़े = भाग्यशाली। हरि = हे हरि! घरि = हृदय घर में। गणी = मैं गिनता हूँ।1।
अर्थ: हे हरि! तेरे संत जन बड़े भाग्यशाली हैं क्योंकि उनके हृदय-घर में तेरा नाम-धन बसता है। मैं समझता हूँ कि उनका ही जगत में आना तेरी नजरों में स्वीकार है, उन संतजनों के सारे (संसारिक) काम (भी) सफल हो जाते हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे राम हरि जन कै हउ बलि जाई ॥ केसा का करि चवरु ढुलावा चरण धूड़ि मुखि लाई ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे राम हरि जन कै हउ बलि जाई ॥ केसा का करि चवरु ढुलावा चरण धूड़ि मुखि लाई ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कै = से। बलि जाई = मैं सदके जाता हूँ। करि = बना के। ढुलावा = मैं झुलाऊँ। मुखि = मुँह पर। लाई = लगाऊँ।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे राम! (अगर तेरी मेहर हो, तो) मैं तेरे सेवकों से सदके जाऊँ (अपना सब कुछ बार दूँ), मैं अपने केसों का चवर बना के उन पर झुलाऊँ, मैं उनके चरणों की धूल ले के अपने माथे पर लगाऊँ।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जनम मरण दुहहू महि नाही जन परउपकारी आए ॥ जीअ दानु दे भगती लाइनि हरि सिउ लैनि मिलाए ॥२॥

मूलम्

जनम मरण दुहहू महि नाही जन परउपकारी आए ॥ जीअ दानु दे भगती लाइनि हरि सिउ लैनि मिलाए ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: महि = में। परउपकारी = दूसरों का भला करने वाले। जीअ दानु = आत्मिक जीवन की दाति। दे = देकर। लाइनि = लगाते हैं। लैनि मिलाए = मिला लेते हैं।2।
अर्थ: हे भाई! संत जन जनम-मरन के चक्कर में नहीं आते, वे तो जगत में दूसरों की भलाई करने के लिए आते हैं। संत जन (और लोगों को) आत्मिक जीवन की दाति दे के परमात्मा की भक्ति में जोड़ते हैं, और उनको परमात्मा के साथ मिला देते हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सचा अमरु सची पातिसाही सचे सेती राते ॥ सचा सुखु सची वडिआई जिस के से तिनि जाते ॥३॥

मूलम्

सचा अमरु सची पातिसाही सचे सेती राते ॥ सचा सुखु सची वडिआई जिस के से तिनि जाते ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सचा = सदा कायम रहने वाला। अमरु = हुक्म। सचे सेती = सदा स्थिर प्रभु से। राते = रंगे रहते हैं। जिस के = जिस (परमात्मा) के। से = (बने हुए) थे। तिनि = उस (परमात्मा) ने। जाते = पहचाने, गहरी सांझ डाली।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जिस के’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘के’ के कारण हटा दी गई है)।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! संत जन सदा-स्थिर प्रभु के प्रेम रंग में रंगे रहते हैं, उनका हुक्म सदा कायम रहता है, उनकी बादशाहियत् भी अटल रहती है। उनको सदा कायम रहने वाला आनंद प्राप्त रहता है, उनकी शोभा सदा के लिए टिकी रहती है। जिस परमात्मा के वे सेवक बने रहते हैं, वह परमात्मा ही उनकी कद्र जानता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पखा फेरी पाणी ढोवा हरि जन कै पीसणु पीसि कमावा ॥ नानक की प्रभ पासि बेनंती तेरे जन देखणु पावा ॥४॥७॥५४॥

मूलम्

पखा फेरी पाणी ढोवा हरि जन कै पीसणु पीसि कमावा ॥ नानक की प्रभ पासि बेनंती तेरे जन देखणु पावा ॥४॥७॥५४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: फेरी = मैं फेरूँ। ढोवा = ढोऊँ। जन कै = जनों के घरों में। पीसणु = चक्की। पीसि = पीस के। कमावा = मैं सेवा करूँ। देखणु पावा = दूख सकूँ।4।
अर्थ: हे भाई! नानक की परमात्मा के आगे सदा यही विनती है कि- हे प्रभु! मैं तेरे संत जनों के दर्शन करता रहूँ, मैं उनको पंखा करता रहूँ, उनके लिए पानी ढोता रहूँ और उनके दर पर चक्की पीस के सेवा करता रहूँ।4।7।54।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ पारब्रहम परमेसर सतिगुर आपे करणैहारा ॥ चरण धूड़ि तेरी सेवकु मागै तेरे दरसन कउ बलिहारा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ पारब्रहम परमेसर सतिगुर आपे करणैहारा ॥ चरण धूड़ि तेरी सेवकु मागै तेरे दरसन कउ बलिहारा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पारब्रहम = हे पारब्रहम! सतिगुर = हे सतिगुरु! आपे = (तू) स्वयं ही। करणैहारा = करने योग्य, कर सकने वाला। मागै = मांगता है। कउ = से। बलिहारा = सदके।1।
अर्थ: हे परमात्मा! हे परमेश्वर! हे सतिगुरु! तू स्वयं सब कुछ करने के समर्थ है। (तेरा) दास (तेरे से) तेरे चरणों की धूल माँगता है, तेरे दर्शन से सदके जाता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे राम राइ जिउ राखहि तिउ रहीऐ ॥ तुधु भावै ता नामु जपावहि सुखु तेरा दिता लहीऐ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे राम राइ जिउ राखहि तिउ रहीऐ ॥ तुधु भावै ता नामु जपावहि सुखु तेरा दिता लहीऐ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रामराइ = हे प्रभु पातशाह! राखहि = तू रखता है। रहीऐ = रह सकते हैं। तुधु भावै = अगर तुझे अच्छा लगे। लहीऐ = ले सकते हैं।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे प्रभु पातशाह! तू जैसे (हम जीवों को) रखता है, वैसे ही रहा जा सकता है। अगर तुझे अच्छा लगे तो तू (हम जीवों से अपना) नाम जपाता है, तेरा ही बख्शा हुआ सुख हम ले सकते हैं।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मुकति भुगति जुगति तेरी सेवा जिसु तूं आपि कराइहि ॥ तहा बैकुंठु जह कीरतनु तेरा तूं आपे सरधा लाइहि ॥२॥

मूलम्

मुकति भुगति जुगति तेरी सेवा जिसु तूं आपि कराइहि ॥ तहा बैकुंठु जह कीरतनु तेरा तूं आपे सरधा लाइहि ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मुकति = विकारों से खलासी। भुगति = दुनिया के सुखों के भोग। जुगति = अच्छी जीवन मर्यादा। तहा = वहीं ही। जह = जहाँ।2।
अर्थ: हे प्रभु! तेरी सेवा-भक्ति में ही (विकारों से) खलासी है, संसार के सुख हैं, सुचज्जी जीवन-विधि है (पर तेरी भक्ति वही करता है) जिससे तू स्वयं करवाता है। हे प्रभु! जिस जगह तेरी महिमा हो रही हो, (मेरे वास्ते) वही स्थान बैकुंठ है, तू स्वयं ही (महिमा करने की) श्रद्धा (हमारे अंदर) पैदा करता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सिमरि सिमरि सिमरि नामु जीवा तनु मनु होइ निहाला ॥ चरण कमल तेरे धोइ धोइ पीवा मेरे सतिगुर दीन दइआला ॥३॥

मूलम्

सिमरि सिमरि सिमरि नामु जीवा तनु मनु होइ निहाला ॥ चरण कमल तेरे धोइ धोइ पीवा मेरे सतिगुर दीन दइआला ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जीवा = जीऊँ, मैं आत्मिक जीवन प्राप्त करता हूँ। निहाला = प्रसन्न, खिला हुआ। चरण कमल = कमल फूलों जैसे सोहाने चरण। धोइ = धो के। पीवा = पीऊँ।3।
अर्थ: हे दीनों पर दया करने वाले मेरे सतिगुरु! (मेहर कर) मैं तेरा नाम जप-जप के आत्मिक जीवन हासिल करता रहूँ, मेरा मन मेरा तन (तेरे नाम की इनायत से) खिला रहे। (मेहर कर) मैं सदा तेरे सुंदर चरण धो-धो के पीता रहूँ।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कुरबाणु जाई उसु वेला सुहावी जितु तुमरै दुआरै आइआ ॥ नानक कउ प्रभ भए क्रिपाला सतिगुरु पूरा पाइआ ॥४॥८॥५५॥

मूलम्

कुरबाणु जाई उसु वेला सुहावी जितु तुमरै दुआरै आइआ ॥ नानक कउ प्रभ भए क्रिपाला सतिगुरु पूरा पाइआ ॥४॥८॥५५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जाई = मैं जाता हूँ। उसु वेला सुहावी = उस सोहानी घड़ी से। जितु = जिस में, जिस वक्त। दुआरै = दर पर। कउ = को, पर।4।
अर्थ: (हे सतिगुरु!) मैं उस सुंदर घड़ी से सदके जाता हूँ, जब मैं तेरे दर पर आ गिरूँ। हे भाई! जब (दास) नानक पर प्रभु जी दयावान हुए, तब (नानक को) पूरा गुरु मिला।4।8।55।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ तुधु चिति आए महा अनंदा जिसु विसरहि सो मरि जाए ॥ दइआलु होवहि जिसु ऊपरि करते सो तुधु सदा धिआए ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ तुधु चिति आए महा अनंदा जिसु विसरहि सो मरि जाए ॥ दइआलु होवहि जिसु ऊपरि करते सो तुधु सदा धिआए ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: चिति = चिक्त में। विसरहि = तू बिसर जाता है। मरि जाए = आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। करते = हे कर्तार!।1।
अर्थ: हे प्रभु! अगर तू चिक्त में आ बसे, तो बड़ा सुख मिलता है। जिस मनुष्य को तू बिसर जाता है, वह मनुष्य आत्मिक मौत सहेड़ लेता है। हे कर्तार! जिस मनुष्य पर तू दयावान होता है, वह सदा तुझे याद करता रहता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे साहिब तूं मै माणु निमाणी ॥ अरदासि करी प्रभ अपने आगै सुणि सुणि जीवा तेरी बाणी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे साहिब तूं मै माणु निमाणी ॥ अरदासि करी प्रभ अपने आगै सुणि सुणि जीवा तेरी बाणी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साहिब = हे साहिब! मैं = मेरा। करी = मैं करता हूँ। सुणि = सुन के। जीवा = जीऊँ, आत्मिक जीवन प्राप्त करता हूँ।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मालिक-प्रभु! मुझ निमाणी का तू ही माण है। हे प्रभु! मैं तेरे आगे आरजू करता हूँ, (मेहर कर) तेरी महिमा की वाणी सुन-सुन के मैं आत्मिक जीवन हासिल करता रहूँ।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

चरण धूड़ि तेरे जन की होवा तेरे दरसन कउ बलि जाई ॥ अम्रित बचन रिदै उरि धारी तउ किरपा ते संगु पाई ॥२॥

मूलम्

चरण धूड़ि तेरे जन की होवा तेरे दरसन कउ बलि जाई ॥ अम्रित बचन रिदै उरि धारी तउ किरपा ते संगु पाई ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: होवा = होऊँ। कउ = से। बलि = सदके। जाई = मैं जाता हूँ। अंम्रित = आत्मिक जीवन वाले। उरि = हृदय में। तउ = तेरी। ते = से। संगु = साथ। पाई = मैं डालूँ।2।
अर्थ: हे प्रभु! मैं तेरे दर्शनों से सदके जाता हूँ, (मेहर कर) मैं तेरे सेवक के चरणों की धूल बना रहूँ। (तेरे सेवक के) आत्मिक जीवन देने वाले वचन मैं अपने दिल में हृदय में बसाए रखूँ, तेरी कृपा से मैं (तेरे सेवक की) संगति प्राप्त करूँ।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अंतर की गति तुधु पहि सारी तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥ जिस नो लाइ लैहि सो लागै भगतु तुहारा सोई ॥३॥

मूलम्

अंतर की गति तुधु पहि सारी तुधु जेवडु अवरु न कोई ॥ जिस नो लाइ लैहि सो लागै भगतु तुहारा सोई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गति = हालत। सारी = खोली है। सोई = वह ही।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जिस नो’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! अपने दिल की हालत तेरे आगे खोल के रख दी है। मुझे तेरे बराबर का और कोई नहीं दिखता। जिस मनुष्य को तू (अपने चरणों में) जोड़ लेता है, वह (तेरे चरणों में) जुड़ा रहता है। वही तेरा (असल) भक्त है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दुइ कर जोड़ि मागउ इकु दाना साहिबि तुठै पावा ॥ सासि सासि नानकु आराधे आठ पहर गुण गावा ॥४॥९॥५६॥

मूलम्

दुइ कर जोड़ि मागउ इकु दाना साहिबि तुठै पावा ॥ सासि सासि नानकु आराधे आठ पहर गुण गावा ॥४॥९॥५६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कर = हाथ (बहुवचन)। जोड़ि = जोड़ के। मागउ = मांगू, मैं माँगता हूँ। साहिब तुठै = यदि सहिब प्रसन्न हो जाए। पावा = प्राप्त कर लूँ। सासि सासि = हरेक सांस के साथ। गावा = गाऊँ।4।
अर्थ: हे प्रभु! मैं (अपने) दोनों हाथ जोड़ कर (तुझसे) ये दान माँगता हूँ। हे साहिब! तेरे प्रसन्न होने से ही मैं (ये दान) ले सकता हूँ। (मेहर कर) नानक हरेक सांस के साथ तेरी आराधना करता रहे, मैं आठों पहर तेरी महिमा के गीत गाता रहूँ।4।9।56।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ जिस के सिर ऊपरि तूं सुआमी सो दुखु कैसा पावै ॥ बोलि न जाणै माइआ मदि माता मरणा चीति न आवै ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ जिस के सिर ऊपरि तूं सुआमी सो दुखु कैसा पावै ॥ बोलि न जाणै माइआ मदि माता मरणा चीति न आवै ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सुआमी = हे स्वामी! बोलि न जाणै = बोलना नहीं जानता। मदि = अहंकार में। माता = मस्त। मरणा = मौत, मौत का सहम। चीति = चित में।1।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जिस के’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘के’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे मेरे मालिक प्रभु! जिस मनुष्य के सिर पर तू (हाथ रखे) उसे कोई दुख नहीं व्यापता। वह मनुष्य माया के नशे में मस्त हो के तो बोलना ही नहीं जानता, मौत का सहिम भी उसके चिक्त में पैदा नहीं होता।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे राम राइ तूं संता का संत तेरे ॥ तेरे सेवक कउ भउ किछु नाही जमु नही आवै नेरे ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे राम राइ तूं संता का संत तेरे ॥ तेरे सेवक कउ भउ किछु नाही जमु नही आवै नेरे ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रामराइ = रामराय, हे प्रभु पातशाह! कउ = को। नेरे = नजदीक।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे प्रभु पातशाह! तू (अपने) संतो का (रखवाला) है, (तेरे) संत तेरे (आसरे रहते हैं)। हे प्रभु! तेरे सेवक को कोई डर छू नहीं सकता, मौत का डर उसके नजदीक नहीं फटकता।1। रहाउ।

[[0750]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

जो तेरै रंगि राते सुआमी तिन्ह का जनम मरण दुखु नासा ॥ तेरी बखस न मेटै कोई सतिगुर का दिलासा ॥२॥

मूलम्

जो तेरै रंगि राते सुआमी तिन्ह का जनम मरण दुखु नासा ॥ तेरी बखस न मेटै कोई सतिगुर का दिलासा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तेरै रंगि = तेरे प्रेम रंग में। राते = रंगे हुए। नासा = दूर हो जाता है। बखस = बख्शिश, कृपा। दिलासा = तसल्ली, भरोसा।2।
अर्थ: हे मेरे मालिक! जो मनुष्य तेरे प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं, उनके पैदा होने-मरने (के चक्रों) के दुख दूर हो जाते हैं, उन्हें गुरु द्वारा (दिया हुआ ये) भरोसा (हमेशा याद रहता है कि उनके ऊपर हुई) तेरी कृपा को कोई मिटा नहीं सकता।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नामु धिआइनि सुख फल पाइनि आठ पहर आराधहि ॥ तेरी सरणि तेरै भरवासै पंच दुसट लै साधहि ॥३॥

मूलम्

नामु धिआइनि सुख फल पाइनि आठ पहर आराधहि ॥ तेरी सरणि तेरै भरवासै पंच दुसट लै साधहि ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: धिआइनि = ध्याते हैं। पाइनि = पाते हैं। आराधहि = आराधना करते हैं। भरवासे = आसरे से। पंच दुसट = कामादिक पाँच वैरी। लै = पकड़ के। साधहि = बस में कर लेते हैं।3।
अर्थ: हे प्रभु! (तेरे संत तेरा) नाम स्मरण करते रहते हैं, आत्मिक आनंद भोगते रहते हैं, आठों पहर तेरी आराधना करते हैं। तेरी शरण में आ के, तेरे आसरे रह के वह (कामादिक) पाँचों वैरियों को पकड़ कर बस में कर लेते हैं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गिआनु धिआनु किछु करमु न जाणा सार न जाणा तेरी ॥ सभ ते वडा सतिगुरु नानकु जिनि कल राखी मेरी ॥४॥१०॥५७॥

मूलम्

गिआनु धिआनु किछु करमु न जाणा सार न जाणा तेरी ॥ सभ ते वडा सतिगुरु नानकु जिनि कल राखी मेरी ॥४॥१०॥५७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गिआनु = आत्मिक जीवन की सूझ। धिआनु = तवज्जो जोड़ने की विधि। न जाणा = नहीं था जानता। सार = कद्र। जिनि = जिस (गुरु) ने। कल = इज्जत, सत्कार।4।
अर्थ: हे मेरे मालिक प्रभु! मैं (भी) तेरी (कृपा की) कद्र नहीं था जानता, मुझे आत्मिक जीवन की समझ नहीं थी, तेरे चरणों में तवज्जो टिकानी भी नहीं जानता था, किसी अन्य धार्मिक कर्म की भी मुझे सूझ नहीं थी। पर (तेरी मेहर से) मुझे सबसे बड़ा गुरु नानक मिल गया, जिसने मेरी इज्जत रख ली (और मुझे तेरे चरणों में जोड़ दिया)।4।10।57।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ सगल तिआगि गुर सरणी आइआ राखहु राखनहारे ॥ जितु तू लावहि तितु हम लागह किआ एहि जंत विचारे ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ सगल तिआगि गुर सरणी आइआ राखहु राखनहारे ॥ जितु तू लावहि तितु हम लागह किआ एहि जंत विचारे ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सगल = सारे (आसरे)। तिआगि = छोड़ के। राखणहारे = हे रक्षा की सामर्थ्य वाले! जितु = जिस (काम) में। तिसु = उस (काम) में। हम लागह = हम (जीव) लग पड़ते हैं। एहि = यह, वे।1।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘इहि’ है ‘इह/यह’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे रक्षा करने के समर्थ प्रभु! मेरी रखा कर। मैं सारे (आसरे) छोड़ के गुरु की शरण आ पड़ा हूँ। हे प्रभु! इन जीव विचारों की क्या बिसात है? तू जिस काम में हम जीवों को लगा लेता है, हम उस काम में लग पड़ते हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे राम जी तूं प्रभ अंतरजामी ॥ करि किरपा गुरदेव दइआला गुण गावा नित सुआमी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे राम जी तूं प्रभ अंतरजामी ॥ करि किरपा गुरदेव दइआला गुण गावा नित सुआमी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभ = हे प्रभु! अंतरजामी = हे दिल की जानने वाला! गुरदेव = हे गुरदेव! गावा = गाऊँ।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे राम जी! हे मेरे प्रभु! तू (मेरे) दिल की जानने वाला है। हे दया के घर गुरदेव! ळे स्वामी! मेहर कर, मैं सदा तेरे गुण गाता रहूँ।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

आठ पहर प्रभु अपना धिआईऐ गुर प्रसादि भउ तरीऐ ॥ आपु तिआगि होईऐ सभ रेणा जीवतिआ इउ मरीऐ ॥२॥

मूलम्

आठ पहर प्रभु अपना धिआईऐ गुर प्रसादि भउ तरीऐ ॥ आपु तिआगि होईऐ सभ रेणा जीवतिआ इउ मरीऐ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: धिआईऐ = स्मरणा चाहिए। प्रसादि = कृपा से। भउ = भव सागर, संसार समुंदर। तरीऐ = पार लांघ सकते हैं। आपु = स्वै भाव। रेणा = चरणधूल। इउ = इस तरह। जीवतिआ मरीऐ = दुनिया के कार्य व्यवहार करते हुए निर्मोह रहा जाता है।2।
अर्थ: हे भाई! आठों पहर अपने मालिक प्रभु का ध्यान धरना चाहिए, (इस तरह) गुरु की कृपा से संसार-समुंदर से पार लांघा जाता है। हे भाई! स्वै भाव छोड़ के गुरु के चरणों की धूल बन जाना चाहिए, इस तरह दुनिया कें कार्य-व्यवहार करते हुए ही निर्मोही हो जाना चाहिए।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सफल जनमु तिस का जग भीतरि साधसंगि नाउ जापे ॥ सगल मनोरथ तिस के पूरन जिसु दइआ करे प्रभु आपे ॥३॥

मूलम्

सफल जनमु तिस का जग भीतरि साधसंगि नाउ जापे ॥ सगल मनोरथ तिस के पूरन जिसु दइआ करे प्रभु आपे ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सफल = कामयाब। भीतरि = में। संगि = संगति में। जापु = जपता है। मनोरथ = मुरादें। आपे = खुद ही।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘तिस का’ में से ‘तिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘का’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य गुरु की संगति में रह के परमात्मा का नाम जपता है, जगत में उसका जीवन कामयाब हो जाता है। हे भाई! जिस मनुष्य पर परमात्मा आप ही कृपा करता है, उसकी सारी मुरादें पूरी हो जाती हैं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दीन दइआल क्रिपाल प्रभ सुआमी तेरी सरणि दइआला ॥ करि किरपा अपना नामु दीजै नानक साध रवाला ॥४॥११॥५८॥

मूलम्

दीन दइआल क्रिपाल प्रभ सुआमी तेरी सरणि दइआला ॥ करि किरपा अपना नामु दीजै नानक साध रवाला ॥४॥११॥५८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभ = प्रभु! करि = करके। दीजै = दे। साध रवाला = गुरु के चरणों की धूल।4।
अर्थ: हे नानक! (कह:) हे दीनों पर दया करने वाले! हे कृपालू! हे मालिक प्रभु! हे दया के श्रोत! मैं तेरी शरण आया हूँ! मेहर कर, मुझे अपना नाम बख्श, गुरु के चरणों की धूल दे।4।11।58।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही असटपदीआ महला १ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही असटपदीआ महला १ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सभि अवगण मै गुणु नही कोई ॥ किउ करि कंत मिलावा होई ॥१॥

मूलम्

सभि अवगण मै गुणु नही कोई ॥ किउ करि कंत मिलावा होई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सभि = सारे। मै = मेरे अंदर। कंत मिलावा = कंत का मिलाप।1।
अर्थ: मेरे अंदर सारे अवगुण ही हैं, एक भी गुण नहीं, (इस हालत में) मुझे पति-प्रभु का मिलाप कैसे हो सकता है?।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ना मै रूपु न बंके नैणा ॥ ना कुल ढंगु न मीठे बैणा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

ना मै रूपु न बंके नैणा ॥ ना कुल ढंगु न मीठे बैणा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मै = मेरा। बंके = बाँके, सुंदर। नैणा = आँखें, नेत्र। कुल ढंगु = उच्च कुल वाला तौर तरीका। बैणा = बोल।1। रहाउ।
अर्थ: ना मेरी (सुंदर) सूरति है, ना मेरी आँखें सुंदर हैं, ना ही उच्च कुल वालों की तरह मेरे तौर-तरीके (रहन-सहन) है, ना ही मेरी बोली मीठी है (फिर मैं कैसे पति-प्रभु को खुश कर सकूँगी?)।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सहजि सीगार कामणि करि आवै ॥ ता सोहागणि जा कंतै भावै ॥२॥

मूलम्

सहजि सीगार कामणि करि आवै ॥ ता सोहागणि जा कंतै भावै ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सहजि = अडोल आत्मिक अवस्था में। कामणि = स्त्री, जीव-स्त्री। करि = कर के। सोहागणि = सौभाग्यवती। जा = जब।2।
अर्थ: जो जीव-स्त्री अडोल आत्मिक अवस्था में (टिकती है, और ये) हार-श्रृंगार करके (प्रभु-पति के दर पर) आती है (वह पति-प्रभु को अच्छी लगती है, और) तब ही जीव-स्त्री सौभाग्यवती है जब वह कंत-प्रभु को पसंद आती है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ना तिसु रूपु न रेखिआ काई ॥ अंति न साहिबु सिमरिआ जाई ॥३॥

मूलम्

ना तिसु रूपु न रेखिआ काई ॥ अंति न साहिबु सिमरिआ जाई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तिसु = उस (प्रभु कंत) का। रेखिआ = चिन्ह। काई = कोई। अंति = अंत के समय, दुनिया छोड़ने के वक्त।3।
अर्थ: उस पति-प्रभु की (इन आँखों से दिखाई देने वाली कोई) सूरति नहीं है उसका कोई चिन्ह भी नहीं है (जिसको देख सकें, और उसका स्मरण कर सकें। पर अगर सारी उम्र उसे बिसारे ही रखा, तो) अंत के समय वह मालिक स्मरण किया नहीं जा सकता।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुरति मति नाही चतुराई ॥ करि किरपा प्रभ लावहु पाई ॥४॥

मूलम्

सुरति मति नाही चतुराई ॥ करि किरपा प्रभ लावहु पाई ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभ = हे प्रभु! पाई = चरणों में।4।
अर्थ: हे प्रभु! (मेरी ऊँची) सूझ नहीं, (मेरे में कोई) अक्ल नहीं (कोई) समझदारी नहीं। (तू स्वयं ही) मेहर कर के मुझे अपने चरणों से लगा ले।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

खरी सिआणी कंत न भाणी ॥ माइआ लागी भरमि भुलाणी ॥५॥

मूलम्

खरी सिआणी कंत न भाणी ॥ माइआ लागी भरमि भुलाणी ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: खरी = बहुत। कंत न भाणी = कंत को पसंद ना आई।5।
अर्थ: जो जीव-स्त्री माया (के मोह) में फसी रहे, भटकना में पड़ कर जीवन-राह से भटकी रहे, वह (दुनिया के कार्य-व्यवहार में भले ही) बहुत समझदार (भी हो, पर) वह कंत-प्रभु को अच्छी नहीं लगती।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हउमै जाई ता कंत समाई ॥ तउ कामणि पिआरे नव निधि पाई ॥६॥

मूलम्

हउमै जाई ता कंत समाई ॥ तउ कामणि पिआरे नव निधि पाई ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जाई = जाए, दूर हो। कंत = हे कंत! तउ = तब। पिआरे = हे प्यारे! नउनिधि = नौ खजाने।6।
अर्थ: हे कंत प्रभु! जब अहंकार दूर हो तब ही (तेरे चरणों में) लीन हुआ जा सकता है, तब ही, हे प्यारी! जीव-स्त्री तू, नौ-खजाने के श्रोत को मिल सकती है।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनिक जनम बिछुरत दुखु पाइआ ॥ करु गहि लेहु प्रीतम प्रभ राइआ ॥७॥

मूलम्

अनिक जनम बिछुरत दुखु पाइआ ॥ करु गहि लेहु प्रीतम प्रभ राइआ ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: करु = हाथ। गहि लेहु = पकड़ लो।7।
अर्थ: हे प्रभु राय! हे प्रीतम! तुझसे विछुड़ के अनेक जूनियों में भटक-भटक के मैंने दुख सहा है, अब तू मेरा हाथ पकड़ ले।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

भणति नानकु सहु है भी होसी ॥ जै भावै पिआरा तै रावेसी ॥८॥१॥

मूलम्

भणति नानकु सहु है भी होसी ॥ जै भावै पिआरा तै रावेसी ॥८॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भणति = विनती करता है। होसी = (सदा) रहेगा। जै भावै = जो उसे अच्छा लगे, जो जीव-स्त्री उसे अच्छी लगती है। ते = उस को।8।
अर्थ: नानक विनती करता है: पति-प्रभु (सचमुच मौजूद) है, सदा ही रहेगा। जो जीव-स्त्री उसको भाती है (प्रभु) उसे अपने साथ मिला लेता है।8।1।

[[0751]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला १ घरु ९ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

सूही महला १ घरु ९ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कचा रंगु कसु्मभ का थोड़ड़िआ दिन चारि जीउ ॥ विणु नावै भ्रमि भुलीआ ठगि मुठी कूड़िआरि जीउ ॥ सचे सेती रतिआ जनमु न दूजी वार जीउ ॥१॥

मूलम्

कचा रंगु कसु्मभ का थोड़ड़िआ दिन चारि जीउ ॥ विणु नावै भ्रमि भुलीआ ठगि मुठी कूड़िआरि जीउ ॥ सचे सेती रतिआ जनमु न दूजी वार जीउ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भ्रमि = भटकना में (पड़ कर)। ठगि = ठगी (जाती है। मुठी = लूटी (जाती है।) कूड़िआरि = झूठ की व्यापरिन (जीव-स्त्री)। सेती = साथ।1।
अर्थ: (जीव माया की खूबसूरती को देख के फूलता है, पर इस माया का साथ कुसंभ के रंग जैसा ही है) कुसंभ के फूल का रंग कच्चा होता है, थोड़े समय ही रहता है, चार दिन ही टिकता है। माया की व्यापारिन जीव-स्त्री प्रभु-नाम से टूट के (माया-कुसंभ के) भुलेखे में गलत राह पर पड़ जाती है, ठगी जाती है, और इसके आत्मिक जीवन (की पूंजी) लुट जाती है। हे भाई! अगर सदा-स्थिर प्रभु के प्यार-रंग में रंगे जाएं, तो दोबारा बार-बार जन्म (के चक्कर) समाप्त हो जाते हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रंगे का किआ रंगीऐ जो रते रंगु लाइ जीउ ॥ रंगण वाला सेवीऐ सचे सिउ चितु लाइ जीउ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

रंगे का किआ रंगीऐ जो रते रंगु लाइ जीउ ॥ रंगण वाला सेवीऐ सचे सिउ चितु लाइ जीउ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: किआ रंगीऐ = किसी और रंग की आवश्यक्ता नहीं रहती। सचे सिउ = सदा स्थिर प्रभु से।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! जो लोग परमात्मा का प्रेम रंग लगा के रंगे जाते हैं उनके रंगे हुए मन को किसी और रंग की आवश्यक्ता नहीं रह जाती (नाम के रंगे हुए को) किसी और कर्म-सुहज की अधीनता नहीं रहती। (पर ये नाम-रंग परमात्मा खुद ही देता है, सो) उस सदा-स्थिर रहने वाले को और (जीवों के मन को अपने प्रेम-रंग से) रंगने वाले प्रभु को चिक्त लगा के स्मरणा चाहिए।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

चारे कुंडा जे भवहि बिनु भागा धनु नाहि जीउ ॥ अवगणि मुठी जे फिरहि बधिक थाइ न पाहि जीउ ॥ गुरि राखे से उबरे सबदि रते मन माहि जीउ ॥२॥

मूलम्

चारे कुंडा जे भवहि बिनु भागा धनु नाहि जीउ ॥ अवगणि मुठी जे फिरहि बधिक थाइ न पाहि जीउ ॥ गुरि राखे से उबरे सबदि रते मन माहि जीउ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कुंडा = तरफ, कूंटों में। भवहि = तू भटकता है। धनु = नाम धन। बधिक = शिकारी। थाइ न पाहि = तू जगह नहीं पाएगी, तू स्वीकार नहीं होगी। गुरि = गुरु ने। उबरे = बचे गए।2।
अर्थ: हे जीवात्मा! अगर तू चारों कुंटों में तलाशती फिरे तो भी सौभाग्य के बिना नाम-धन नहीं मिलता। अगर अवगुणों ने तेरे मन को ठग लिया है, और यदि इस आत्मिक अवस्था में तू (तीर्थ आदि पर भी) फिरती रहे, तो भी शिकारी की तरह बाहर झुकने की तरह तू (अपने इन उद्यमों से) स्वीकार नहीं होगी। जिनकी गुरु ने रक्षा की, जो गुरु के शब्द की इनायत से मन में प्रभु-नाम से रंगे गए हैं, वही (माया के मोह व विकारों से) बचते हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

चिटे जिन के कपड़े मैले चित कठोर जीउ ॥ तिन मुखि नामु न ऊपजै दूजै विआपे चोर जीउ ॥ मूलु न बूझहि आपणा से पसूआ से ढोर जीउ ॥३॥

मूलम्

चिटे जिन के कपड़े मैले चित कठोर जीउ ॥ तिन मुखि नामु न ऊपजै दूजै विआपे चोर जीउ ॥ मूलु न बूझहि आपणा से पसूआ से ढोर जीउ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कठोर = सख्त, निर्दयी। दूजै विआपै = माया के मोह में दबे हुए, प्रभु के बिना किसी और में फंसे हुए। ढोर = पशु, महामूर्ख।3।
अर्थ: (बगुले देखने में तो सफेद हैं, तीर्थों पर निवास भी करते हैं, पर समाधि लगा के पकड़ते मछलियाँ ही हैं, वैसे ही) जिनके कपड़े तो सफेद हैं पर मन मैले हैं और निर्दयी हैं उनके मुँह से (कहने पर मन में) प्रभु का नाम प्रकट नहीं होता वे (बाहर से साधु दिखते हैं पर असल में वे) चोर हैं, वे माया के मोह में फंसे हुए हैं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नित नित खुसीआ मनु करे नित नित मंगै सुख जीउ ॥ करता चिति न आवई फिरि फिरि लगहि दुख जीउ ॥ सुख दुख दाता मनि वसै तितु तनि कैसी भुख जीउ ॥४॥

मूलम्

नित नित खुसीआ मनु करे नित नित मंगै सुख जीउ ॥ करता चिति न आवई फिरि फिरि लगहि दुख जीउ ॥ सुख दुख दाता मनि वसै तितु तनि कैसी भुख जीउ ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: चिति = चित में। आवई = आए, आता है। तितु तनि = उस शरीर में।4।
अर्थ: (माया-ग्रसित मनुष्य का) मन सदा दुनिया वाले चाव-मलार ही करता है और सदा सुख ही माँगता है, पर (जब तक) कर्तार उसके चिक्त में नहीं बसता, उसे बारंबार दुख व्यापते रहते हैं।
(हाँ) जिस मन में सुख-दुख देने वाला परमात्मा बस जाता है, उसे कोई तृष्णा नहीं रह जाती (और वह सुखों की लालसा नहीं करता)।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बाकी वाला तलबीऐ सिरि मारे जंदारु जीउ ॥ लेखा मंगै देवणा पुछै करि बीचारु जीउ ॥ सचे की लिव उबरै बखसे बखसणहारु जीउ ॥५॥

मूलम्

बाकी वाला तलबीऐ सिरि मारे जंदारु जीउ ॥ लेखा मंगै देवणा पुछै करि बीचारु जीउ ॥ सचे की लिव उबरै बखसे बखसणहारु जीउ ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बाकी वाला = करजाई, जिसने विकारों रूपी कर्जे की गठड़ी उठाई हुई है। तलबीऐ = तलब किया जाता है, बुलाया जाता है (लेखा देने के लिए)। सिरि = (उसके) सिर पर। जंदारु = जंदाल, अवैड़ा, जम। लिव = लगन।5।
अर्थ: (जीव बंजारा यहाँ नाम का व्यापार करने आया है, पर जो जीव ये व्यापार बिसार के विकारों का कर्जा अपने सिर पर चढ़ाने लग जाता है, उस) कर्जाई को बुलावा आता है; जमराज उसके सर पर चोट मारता है, उसके सारे किए कर्मों का विचार करके उससे पूछता है और उससे वह लेखा माँगता है जो (उसके जिंम्मे) देना बनता है। जिस जीव बन्जारे के अंदर सदा-स्थिर प्रभु की लगन हो, वह जमराज की मार से बच जाता है, बख्शनेवाला प्रभु उस पर मेहर करता है।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अन को कीजै मितड़ा खाकु रलै मरि जाइ जीउ ॥ बहु रंग देखि भुलाइआ भुलि भुलि आवै जाइ जीउ ॥ नदरि प्रभू ते छुटीऐ नदरी मेलि मिलाइ जीउ ॥६॥

मूलम्

अन को कीजै मितड़ा खाकु रलै मरि जाइ जीउ ॥ बहु रंग देखि भुलाइआ भुलि भुलि आवै जाइ जीउ ॥ नदरि प्रभू ते छुटीऐ नदरी मेलि मिलाइ जीउ ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: को = कोई। अन = अन्य। कीजै = बनाया जाए। मरि जाइ = (आत्मिक मौत) मर जाता है। देखि = देख के। ते = से, के द्वारा। नदरी = मेहर की निगाह से।6।
अर्थ: अगर परमात्मा के बिना किसी और को मित्र बनाया जाए, तो (ऐसे मित्र बनाने वाला) मिट्टी में मिल जाता है आत्मिक मौत मर जाता है। माया के बहुत सारे रंग-तमाशे देख के वह गलत राह पड़ जाता है, सही जीवन-राह से टूट के वह जनम-मरण के चक्कर में पड़ जाता है। (इस चक्कर में से) परमात्मा की मेहर से निजात पाई जा सकती है, वह प्रभु मेहर की निगाह से (गुरु-चरणों में) मिला के अपने साथ मिला लेता है।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गाफल गिआन विहूणिआ गुर बिनु गिआनु न भालि जीउ ॥ खिंचोताणि विगुचीऐ बुरा भला दुइ नालि जीउ ॥ बिनु सबदै भै रतिआ सभ जोही जमकालि जीउ ॥७॥

मूलम्

गाफल गिआन विहूणिआ गुर बिनु गिआनु न भालि जीउ ॥ खिंचोताणि विगुचीऐ बुरा भला दुइ नालि जीउ ॥ बिनु सबदै भै रतिआ सभ जोही जमकालि जीउ ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गाफल = हे गाफ़ल! , हे बेसमझ! हे लापरवाह बंदे! विहूणा = वंचित। खिंचोताणि = खींचातानी में। विगुचीऐ = ख्वार होते हैं। बुरा भला दुइ = नेकी और बदी दोनों। भै = सहम में। जोही = देखी, नजर के नीचे रखी। कालि = काल ने।7।
अर्थ: हे गाफिल हुए ज्ञानहीन जीव! गुरु की शरण पड़े बिना परमात्मा के साथ गहरी सांझ की आस करनी व्यर्थ है। किए हुए अच्छे और बुरे संस्कार तो हर वक्त अंदर मौजूद ही हैं, (अगर गुरु की शरण ना पड़ें, तो वह अंदरूनी अच्छे-बुरे संस्कार अच्छी-बुरी तरफ ही खींचते हैं) और इस खींचातानी में (जीव) दुखी ही होता है। गुरु-शब्द का आसरा लिए बिना दुनिया (दुनियावी) सहम में ग्रसित रहती है, ऐसी दुनिया को आत्मिक मौत ने (हर वक्त) अपनी ताक में रखा हुआ होता है।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जिनि करि कारणु धारिआ सभसै देइ आधारु जीउ ॥ सो किउ मनहु विसारीऐ सदा सदा दातारु जीउ ॥ नानक नामु न वीसरै निधारा आधारु जीउ ॥८॥१॥२॥

मूलम्

जिनि करि कारणु धारिआ सभसै देइ आधारु जीउ ॥ सो किउ मनहु विसारीऐ सदा सदा दातारु जीउ ॥ नानक नामु न वीसरै निधारा आधारु जीउ ॥८॥१॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जिनि = जिस (कर्तार) ने। कारणु = जगत। सभसै = हरेक जीव को। आधारु = आसरा। मनहु = मन से। निधारा = निआसरों का।8।
अर्थ: जिस कर्तार ने ये सृष्टि रची है, और रच के इसे टिकाया हुआ है, वह हरेक जीव को आसरा दे रहा है। उस को कभी भी मन से भुलाना नहीं,वह सदा ही सबको दातें देने वाला है।
हे नानक! (अरदास कर कि) परमात्मा का नाम कभी ना भूले। परमात्मा निआसरों का आसरा है।8।1।2।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: पहली अष्टपदी ‘घरु १’ की है। दूसरी अष्टपदी ‘घरु ९’ की है। अंक 1 यही प्रकट करता है। कुल जोड़ हुआ 2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला १ काफी घरु १० ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

सूही महला १ काफी घरु १० ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

माणस जनमु दुल्मभु गुरमुखि पाइआ ॥ मनु तनु होइ चुल्मभु जे सतिगुर भाइआ ॥१॥

मूलम्

माणस जनमु दुल्मभु गुरमुखि पाइआ ॥ मनु तनु होइ चुल्मभु जे सतिगुर भाइआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: माणस जनमु = मनुष्य जन्म। दुलंभु = दर्लभ, बड़ी मुश्किल से मिलने वाला। पाइआ = कद्र पाई। चुलंभु = गाढ़ा लाल।1।
अर्थ: (चौरासी लाख जूनियों में से) मानव जन्म बड़ी मुश्किल से मिलता है, पर इसकी कद्र वही मनुष्य जानता है जो गुरु की शरण पड़े। यदि सतिगुरु को ठीक लगे (अर्थात अगर सतिगुरु की कृपा हो जाए) तो (शरण आए उस मनुष्य का) मन और शरीर (प्रभु के प्रेम-रंग से) गाढ़ा लाल हो जाता है (नाम की इनायत से उसको लाली चढ़ी रहती है)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

चलै जनमु सवारि वखरु सचु लै ॥ पति पाए दरबारि सतिगुर सबदि भै ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

चलै जनमु सवारि वखरु सचु लै ॥ पति पाए दरबारि सतिगुर सबदि भै ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सवारि = सवार के। वखरु = व्यापार का सौदा। सचु = सदा स्थिर नाम। लै = ले के। पति = इज्जत। दरबारि = प्रभु की हजूरी में। भै = भय, डर अदब में (रह के)।1। रहाउ।
अर्थ: जो मनुष्य सतिगुरु के शब्द के द्वारा (परमात्मा के) डर-अदब में (रह के) सदा-स्थिर प्रभु के नाम के सौदे का व्यापार करता है और अपना जीवन सोहाना बना के (यहाँ से) जाता है वह (परमात्मा की) दरगाह में इज्जत हासिल करता है।1। रहाउ।

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विश्वास-प्रस्तुतिः

मनि तनि सचु सलाहि साचे मनि भाइआ ॥ लालि रता मनु मानिआ गुरु पूरा पाइआ ॥२॥

मूलम्

मनि तनि सचु सलाहि साचे मनि भाइआ ॥ लालि रता मनु मानिआ गुरु पूरा पाइआ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मनि = मन में। तनि = शरीर से। सालाहि = स्तुति करके, महिमा करके। लालि = लाल (रंग) में। रता = रंगा गया।2।
अर्थ: जिस मनुष्य को पूरा गुरु मिल जाता है वह अपने मन व शरीर के द्वारा सदा-स्थिर परमात्मा की महिमा करके सदा स्थिर प्रभु के मन में प्यारा लगने लग पड़ता है। प्रभु नाम की लाली में मस्त हुआ उसका मन उस लाली में भीग जाता है (उसके बिना रह नहीं सकता)।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हउ जीवा गुण सारि अंतरि तू वसै ॥ तूं वसहि मन माहि सहजे रसि रसै ॥३॥

मूलम्

हउ जीवा गुण सारि अंतरि तू वसै ॥ तूं वसहि मन माहि सहजे रसि रसै ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हउ = मैं। सारि = संभाल के। तू वसै = ‘तू ही तू’ के बोल बस गए। सहजे = सहज में, अडोल आत्मिक अवस्था में। रसि = (नाम-) अमृत से। रसै = रसता है, भीगता है, रचता है।3।
अर्थ: हे प्रभु! यदि तू मेरे मन में बस जाए, तो मेरा मन अडोल अवस्था में टिक के तेरे नाम के स्वाद में भीग जाए, तेरे गुण याद कर कर के मेरे अंदर आत्मिक जीवन मौल पड़े, मेरे अंदर ‘तू ही तू’ की धुन लग जाए।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मूरख मन समझाइ आखउ केतड़ा ॥ गुरमुखि हरि गुण गाइ रंगि रंगेतड़ा ॥४॥

मूलम्

मूरख मन समझाइ आखउ केतड़ा ॥ गुरमुखि हरि गुण गाइ रंगि रंगेतड़ा ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मन = हे मन! आखउ = मैं कहूँ। केतक = कितना? गुरमुखि = गुरु के सन्मुख हो के। गाइ = गा के। रंगि = रंग में। रंगेतड़ा = रंगा जा।4।
अर्थ: हे मेरे मूर्ख मन! मैं तुझे कितना समझा-समझा के बताऊँ कि गुरु की शरण पड़ के परमात्मा की महिमा कर, परमात्मा के नाम-रंग में रंगा जा (और इस तरह अपना जन्म-मरण सुंदर बना ले)।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नित नित रिदै समालि प्रीतमु आपणा ॥ जे चलहि गुण नालि नाही दुखु संतापणा ॥५॥

मूलम्

नित नित रिदै समालि प्रीतमु आपणा ॥ जे चलहि गुण नालि नाही दुखु संतापणा ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रिदै = हृदय में। समालि = संभाल। संतापणा = कष्ट दे सकना।5।
अर्थ: हे भाई! अपने प्रीतम प्रभु को सदा अपने दिल में संभाल के रख। अगर तू (प्रभु की भक्ति वाले अच्छे) गुण ले के (जीवन-यात्रा में) चले तो कोई दुख-कष्ट तुझे नहीं छू सकेगा।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मनमुख भरमि भुलाणा ना तिसु रंगु है ॥ मरसी होइ विडाणा मनि तनि भंगु है ॥६॥

मूलम्

मनमुख भरमि भुलाणा ना तिसु रंगु है ॥ मरसी होइ विडाणा मनि तनि भंगु है ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रंगु = (नाम की) लाली। मरसी = आत्मिक जीवन गवा बैठेगा। विडाणा = बेगाना, ऊपरी, बिना पति के। भंगु = तोट, विछोड़ा।6।
अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का मन भटकन में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ा रहता है, उसको परमात्मा के नाम की लाली नहीं चढ़ती। वह बेगाना (बिना पति वाला निखसमा) हो के आत्मिक मौत सहेड़ता है, उसके मन में उसके शरीर में (परमात्मा से) विछोड़ा बना रहता है।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुर की कार कमाइ लाहा घरि आणिआ ॥ गुरबाणी निरबाणु सबदि पछाणिआ ॥७॥

मूलम्

गुर की कार कमाइ लाहा घरि आणिआ ॥ गुरबाणी निरबाणु सबदि पछाणिआ ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: लाहा = लाभ। आणिआ = लाया। निरबाणु = निर्वाण, वासना रहित प्रभु।7।
अर्थ: जिस मनुष्य ने गुरु द्वारा बताया हुआ काम (भक्ति) करके (भक्ति का) लाभ अपने हृदय-गृह में ले लिया उसने गुरु की वाणी की इनायत से गुरु के शब्द में जुड़ के वासना-रहित परमात्मा के साथ गहरी सांझ बना ली।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

इक नानक की अरदासि जे तुधु भावसी ॥ मै दीजै नाम निवासु हरि गुण गावसी ॥८॥१॥३॥

मूलम्

इक नानक की अरदासि जे तुधु भावसी ॥ मै दीजै नाम निवासु हरि गुण गावसी ॥८॥१॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भावसी = अच्छी लगे, पसंद आए। मै = मुझे, मेरे दिल में। गावसी = गाएगा।8।
अर्थ: हे प्रभु! मेरी नानक की अरदास भी यही है कि अगर तुझे ये बात पसंद आ जाए तो मेरे हृदय में भी अपने नाम का निवास कर दे ता कि मैं तेरे गुण गाता रहूँ।8।1।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ये अष्टपदी सूही और काफी दानों मिश्रित रागनियों में गाई जानी हैं। काफी एक रागिनी का नाम है।
नोट: ये अष्टपदी ‘घरु १०’ की है। कुल जोड़ 3 है।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला १ ॥ जिउ आरणि लोहा पाइ भंनि घड़ाईऐ ॥ तिउ साकतु जोनी पाइ भवै भवाईऐ ॥१॥

मूलम्

सूही महला १ ॥ जिउ आरणि लोहा पाइ भंनि घड़ाईऐ ॥ तिउ साकतु जोनी पाइ भवै भवाईऐ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आरणि = भट्ठी में। भंनि = गला के। साकतु = ईश्वर से टूटा हुआ मनुष्य, माया ग्रसित जीव। भवै = भटकता है। भवाईऐ = (जूनियों में) डाला जाता है।1।
अर्थ: जैसे भट्ठी में लोहा डाल के (और) गला के (नए सिरे से) घड़ा जाता है (लोहे से काम आने वाली चीजें बनाई जाती हैं) वैसे ही माया-ग्रसित जीव को जूनियों में डाला जाता है, जनम-मरन के चक्करों में डाल के (उसे तपाया जाता है) (और आखिर गुरु की मेहर से इन दुखों में वह सुमति सीखता है)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बिनु बूझे सभु दुखु दुखु कमावणा ॥ हउमै आवै जाइ भरमि भुलावणा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

बिनु बूझे सभु दुखु दुखु कमावणा ॥ हउमै आवै जाइ भरमि भुलावणा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आवै जाइ = पैदा होता है मरता है।1। रहाउ।
अर्थ: (सही जीवन जुगति) समझे बिना मनुष्य (जो भी) कर्म करता है दुख (दुख पैदा करने वाले करता है) दुख ही दुख (सहेड़ता है)। अहंकार के कारण मनुष्य जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है, भटकना में गलत राह पर पड़ा रहता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तूं गुरमुखि रखणहारु हरि नामु धिआईऐ ॥ मेलहि तुझहि रजाइ सबदु कमाईऐ ॥२॥

मूलम्

तूं गुरमुखि रखणहारु हरि नामु धिआईऐ ॥ मेलहि तुझहि रजाइ सबदु कमाईऐ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ा मनुष्य। मेलहि = (हे प्रभु!) तू (गुरु) मिलाता है।2।
अर्थ: हे प्रभु! (भटक-भटक के आखिर) जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ता है तू उसको (चौरासी के चक्करों से) बचाता है; वह हे प्रभु! तेरा नाम स्मरण करता है। गुरु (भी) तू अपनी रजा अनुसार ही मिलाता है (जिसको मिलाता है) वही गुरु के शब्द को कमाता है (गुरु के शब्द के अनुसार आचरण बनाता है)।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तूं करि करि वेखहि आपि देहि सु पाईऐ ॥ तू देखहि थापि उथापि दरि बीनाईऐ ॥३॥

मूलम्

तूं करि करि वेखहि आपि देहि सु पाईऐ ॥ तू देखहि थापि उथापि दरि बीनाईऐ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: देहि = जो तू देता है। थापि = रच के। उथापि = नाश करके। दरि = अंदर, में। बीनाईऐ = बीनायी, निगाह, नज़र।3।
अर्थ: हे प्रभु! जीव पैदा करके इनकी संभाल भी तू स्वयं ही करता है। जो कुछ तू देता है वही जीवों को मिलता है तू स्वयं पैदा करता है तू स्वयं नाश करता है, सबकी तू अपनी ही निगरानी में संभाल (भी) करता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

देही होवगि खाकु पवणु उडाईऐ ॥ इहु किथै घरु अउताकु महलु न पाईऐ ॥४॥

मूलम्

देही होवगि खाकु पवणु उडाईऐ ॥ इहु किथै घरु अउताकु महलु न पाईऐ ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: होवहि = हो जाएगी। पवणु = स्वास। अउताकु = बैठक।4।
अर्थ: जब (शरीर में से) सांसें निकल जाती हैं तो शरीर मिट्टी हो जाता है (जिस महल-माढ़ियों का मनुष्य गुमान करता है) फिर ना ये घर इसको मिलता है ना बैठक मिलती है और ना ये महल मिलता है।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दिहु दीवी अंध घोरु घबु मुहाईऐ ॥ गरबि मुसै घरु चोरु किसु रूआईऐ ॥५॥

मूलम्

दिहु दीवी अंध घोरु घबु मुहाईऐ ॥ गरबि मुसै घरु चोरु किसु रूआईऐ ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: इहु दीवी = दिन दिनों में भी, सफेद दिन होते हुए भी। अंध घोरु = घोर अंधेरा। घबु = घर का माल। मुहाईऐ = लुट जाता है। गरबि = अहंकार में। मुसै = चुराता है। रूआईऐ = शिकायत की जाए।5।
अर्थ: (सही जीवन-जुगति समझे बिना) जीव अपने घर का माल (आत्मिक राशि-पूंजी) लुटाए जाता है, सफेद दिन होते हुए भी (इसके लिए तो) घोर अंधकार बना रहता है। अहंकार में (गाफ़ल रहने के कारण मोह-रूप) चोर इसके घर (आत्मिक राशि-पूंजी) को लूटता जाता है। (समझ ही नहीं आता) किसके पास शिकायत करे?।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरमुखि चोरु न लागि हरि नामि जगाईऐ ॥ सबदि निवारी आगि जोति दीपाईऐ ॥६॥

मूलम्

गुरमुखि चोरु न लागि हरि नामि जगाईऐ ॥ सबदि निवारी आगि जोति दीपाईऐ ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: न लागि = नहीं लग सकता। नामि = नाम से। आगि = तृष्णा की आग। दीपाईऐ = जलती है, चमकती है।6।
अर्थ: जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ता है उस (की राशि-पूंजी) को चोर नहीं पड़ते, गुरु उसको परमात्मा के नाम के द्वारा (आत्मिक सरमाए के चोर की तरफ से) सचेत रखता है। गुरु अपने शब्द से (उसके अंदर से तृष्णा) की आग बुझा देता है, और रूहानी ज्योति जगा देता है।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

लालु रतनु हरि नामु गुरि सुरति बुझाईऐ ॥ सदा रहै निहकामु जे गुरमति पाईऐ ॥७॥

मूलम्

लालु रतनु हरि नामु गुरि सुरति बुझाईऐ ॥ सदा रहै निहकामु जे गुरमति पाईऐ ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुरि = गुरु ने। निहकामु = वासना रहित।7।
अर्थ: परमात्मा का नाम (ही) लाल है रत्न है (शरण पड़े सिख को) गुरु ने ये समझ दी हुई होती है (इस लिए उसे तृष्णा की आग नहीं सताती)। अगर मनुष्य गुरु की शिक्षा प्राप्त कर ले तो वह सदा (माया की) वासना से बचा रहता है।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

राति दिहै हरि नाउ मंनि वसाईऐ ॥ नानक मेलि मिलाइ जे तुधु भाईऐ ॥८॥२॥४॥

मूलम्

राति दिहै हरि नाउ मंनि वसाईऐ ॥ नानक मेलि मिलाइ जे तुधु भाईऐ ॥८॥२॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दिहै = दिन में ही। मंनि = मन में।8।
अर्थ: हे नानक! (प्रभु के दर पर अरदास कर- हे प्रभु!) यदि तुझे अच्छा लगे (तो, मेहर कर, और) अपनी संगति में मिला, ताकि रात-दिन (हर वक्त) हे हरि! तेरा नाम मन में बसाया जा सके।8।2।4।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘घरु १०’ की ये दूसरी अष्टपदी है।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला १ ॥ मनहु न नामु विसारि अहिनिसि धिआईऐ ॥ जिउ राखहि किरपा धारि तिवै सुखु पाईऐ ॥१॥

मूलम्

सूही महला १ ॥ मनहु न नामु विसारि अहिनिसि धिआईऐ ॥ जिउ राखहि किरपा धारि तिवै सुखु पाईऐ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मनहु = मन से। अहि = दिन। निसि = रात। राखहि = (हे प्रभु!) तू रखे। धारि = धार के, कर के।1।
अर्थ: (हे जिंदे!) परमात्मा के नाम को मन से ना भुला। दिन-रात परमात्मा का नाम स्मरणा चाहिए। हे प्रभु! जैसे मेहर करके तूने मुझे (माया के मोह से) बचाया, वैसे मुझे आत्मिक आनंद प्राप्त होता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मै अंधुले हरि नामु लकुटी टोहणी ॥ रहउ साहिब की टेक न मोहै मोहणी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मै अंधुले हरि नामु लकुटी टोहणी ॥ रहउ साहिब की टेक न मोहै मोहणी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: लकुटी = छोटी लकड़ी, डंगोरी, डंडी। टोहणी = आसरा देने वाली डंडी (जिससे टोह टोह के रास्ता तलाश जा सके)। रहउ = मैं रहता हूं। टेक = आसरा। मोहणी = मोह लेने वाली।1। रहाउ।
अर्थ: मुझे (माया के मोह में) अंधे को परमात्मा का नाम छड़ी (का काम देता) है, (मेरे लिए ये नाम रूपी छड़ी) टोहनी है (जिससे मैं टोह-टोह के जीवन का सही रास्ता ढूँढता हूँ)। (जब) मैं मालिक प्रभु के आसरे रहता हूँ तो मन को मोहने वाली माया मोह नहीं सकती।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जह देखउ तह नालि गुरि देखालिआ ॥ अंतरि बाहरि भालि सबदि निहालिआ ॥२॥

मूलम्

जह देखउ तह नालि गुरि देखालिआ ॥ अंतरि बाहरि भालि सबदि निहालिआ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जह = जिधर, जहाँ। देखउ = देखूँ। गुरि = गुरु ने। भालि = ढूँढ के। सबदि = (गुरु के) शब्द से। निहालिआ = देख लिया है।2।
अर्थ: (हे प्रभु!) जिधर भी मैं देखता हूँ उधर ही गुरु ने मुझे दिखा दिया है कि तू मेरे साथ ही है। बाहर ढूँढ-ढूँढ के अब गुरु के शब्द के माध्यम से मैंने तुझे अपने अंदर देख लिया है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सेवी सतिगुर भाइ नामु निरंजना ॥ तुधु भावै तिवै रजाइ भरमु भउ भंजना ॥३॥

मूलम्

सेवी सतिगुर भाइ नामु निरंजना ॥ तुधु भावै तिवै रजाइ भरमु भउ भंजना ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सेवी = मैं सेवा करूँ, मैं स्मरण करूँ। सतिगुर भाइ = गुरु के अनुसार रह के। भंजना = नाश करने वाला।3।
अर्थ: हे माया-रहित प्रभु! गुरु के अनुसार रह के मैं तेरा नाम स्मरण करता हूँ। हे भ्रम और भय नाश करने वाले प्रभु! जो तुझे अच्छा लगता है मैं उसी को तेरी रजा समझता हूँ।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जनमत ही दुखु लागै मरणा आइ कै ॥ जनमु मरणु परवाणु हरि गुण गाइ कै ॥४॥

मूलम्

जनमत ही दुखु लागै मरणा आइ कै ॥ जनमु मरणु परवाणु हरि गुण गाइ कै ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जनमत ही = पैदा होते ही। मरणा = आत्मिक मौत। आइ कै = (जगत में) आ के। जनमु मरणु = जनम से मरन तक (सारी उम्र)।4।
अर्थ: (अगर प्रभु का नाम बिसार दें तो) पैदा होते ही जगत में आते ही आत्मिक मौत का दुख आ घेरता है। परमात्मा के गुण गा के सारा ही जीवन सफल हो जाता है।4।

[[0753]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

हउ नाही तू होवहि तुध ही साजिआ ॥ आपे थापि उथापि सबदि निवाजिआ ॥५॥

मूलम्

हउ नाही तू होवहि तुध ही साजिआ ॥ आपे थापि उथापि सबदि निवाजिआ ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हउ = मैं। तुध ही = तू ही। थापि = पैदा करके। उथापि = नाश करता है। निवाजिआ = आदर मान दिया।5।
अर्थ: हे प्रभु! तूने ही (सारा जगत) पैदा किया है, तू स्वयं ही र्पदा करता है स्वयं ही नाश करता है। जिस जीव को तू गुरु के शब्द में जोड़ के निवाजता है जिसके अंदर तू (प्रकट) होता है उसके अंदर ‘अहंकार’ नहीं रह जाता।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

देही भसम रुलाइ न जापी कह गइआ ॥ आपे रहिआ समाइ सो विसमादु भइआ ॥६॥

मूलम्

देही भसम रुलाइ न जापी कह गइआ ॥ आपे रहिआ समाइ सो विसमादु भइआ ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: देही = शरीर। भसम = राख, मिट्टी। रुलाइ = रुला के, मिला के। कह = कहाँ? विसमादु = हैरानी, आश्चर्यता।6।
अर्थ: जीवात्मा (अपने शरीर को छोड़ के) शरीर को मिट्टी में मिला के, पता नहीं लगता, कहाँ चली जाती है। आश्चर्यजनक करिश्मा घटित होता है। (पर हे प्रभु!) तू स्वयं ही हर जगह मौजूद है।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तूं नाही प्रभ दूरि जाणहि सभ तू है ॥ गुरमुखि वेखि हदूरि अंतरि भी तू है ॥७॥

मूलम्

तूं नाही प्रभ दूरि जाणहि सभ तू है ॥ गुरमुखि वेखि हदूरि अंतरि भी तू है ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हदूरि = अंग संग, (हर जगह) हाजिर।7।
अर्थ: जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ते हैं वे जानते हैं कि हे प्रभु! तू (किसी भी जगह से) दूर नहीं है, हर जगह तू ही तू है, अंदर भी तू है (बाहर भी तू ही है) तुझे हर जगह हाजिर-नाजिर देखते हैं।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मै दीजै नाम निवासु अंतरि सांति होइ ॥ गुण गावै नानक दासु सतिगुरु मति देइ ॥८॥३॥५॥

मूलम्

मै दीजै नाम निवासु अंतरि सांति होइ ॥ गुण गावै नानक दासु सतिगुरु मति देइ ॥८॥३॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मै = मुझे, मेरे हृदय में। देइ = देता है।8।
अर्थ: हे नानक! (अरदास कर- हे प्रभु!) मेरे अंदर अपने नाम का निवास बख्श, ताकि मेरे अंदर शांति पैदा हो। (तेरी मेहर से) जिसको सतिगुरु शिक्षा देता है, वह दास (तेरे) गुण गाता है।8।3।5।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘घरु १०’ की 3 अष्टपदियां हैं। कुल जोड़ राग सूही में 5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला ३ घरु १ असटपदीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला ३ घरु १ असटपदीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

नामै ही ते सभु किछु होआ बिनु सतिगुर नामु न जापै ॥ गुर का सबदु महा रसु मीठा बिनु चाखे सादु न जापै ॥ कउडी बदलै जनमु गवाइआ चीनसि नाही आपै ॥ गुरमुखि होवै ता एको जाणै हउमै दुखु न संतापै ॥१॥

मूलम्

नामै ही ते सभु किछु होआ बिनु सतिगुर नामु न जापै ॥ गुर का सबदु महा रसु मीठा बिनु चाखे सादु न जापै ॥ कउडी बदलै जनमु गवाइआ चीनसि नाही आपै ॥ गुरमुखि होवै ता एको जाणै हउमै दुखु न संतापै ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नामै ही = परमात्मा के नाम से ही। न जापै = कद्र नहीं पड़ती, समझ नहीं आती। महा रसु = बड़े रस वाला। सादु = स्वाद। चीन्सि = पहचानता। आपै = अपने आप को, अपने आत्मिक जीवन को। गुरमुखि = गुरु के बताए हुए राह पर चलने वाला। जाणै = सांझ डालता है। संतापै = दुख देता।1।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा के नाम से सब कुछ (सारा रौशन आत्मिक जीवन) होता है, पर गुरु की शरण पड़े बिना नाम की कद्र नहीं पड़ती। गुरु का शब्द बड़े रस वाला है मीठा है, जब तक इसे चखा ना जाए, स्वाद का पता नहीं चल सकता। जो मनुष्य (गुरु के शब्द के द्वारा) अपने आत्मिक जीवन को पहचानता नहीं, वह अपने मानव जन्म को कौड़ी के बदले (व्यर्थ ही) गवा लेता है। जब मनुष्य गुरु के बताए हुए राह पर चलता है, तब एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालता है, और, (तब) उसे अहंकार का दुख नहीं सता सकता।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बलिहारी गुर अपणे विटहु जिनि साचे सिउ लिव लाई ॥ सबदु चीन्हि आतमु परगासिआ सहजे रहिआ समाई ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

बलिहारी गुर अपणे विटहु जिनि साचे सिउ लिव लाई ॥ सबदु चीन्हि आतमु परगासिआ सहजे रहिआ समाई ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: विटहु = से। जिनि = जिस (गुरु) से। सिउ = से। लिव = लगन, प्रीति। चीन्हि = पहचान के। आतमु = अपना आप, स्वै। परगासिआ = रौशन हो जाता है, चमक पड़ता है। सहजे = आत्मिक अडोलता में।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! मैं अपने गुरु से सदके जाता हूँ, जिसने (शरण आए मनुष्य की) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के साथ प्रीति जोड़ दी (भाव, जोड़ देता है)। गुरु के शब्द से सांझ डाल के मनुष्य का आत्मिक जीवन चमक उठता है, मनुष्य आत्मिक अडोलता में लीन रहता है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरमुखि गावै गुरमुखि बूझै गुरमुखि सबदु बीचारे ॥ जीउ पिंडु सभु गुर ते उपजै गुरमुखि कारज सवारे ॥ मनमुखि अंधा अंधु कमावै बिखु खटे संसारे ॥ माइआ मोहि सदा दुखु पाए बिनु गुर अति पिआरे ॥२॥

मूलम्

गुरमुखि गावै गुरमुखि बूझै गुरमुखि सबदु बीचारे ॥ जीउ पिंडु सभु गुर ते उपजै गुरमुखि कारज सवारे ॥ मनमुखि अंधा अंधु कमावै बिखु खटे संसारे ॥ माइआ मोहि सदा दुखु पाए बिनु गुर अति पिआरे ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जीउ = जिंद। पिंडु = शरीर। ते = से। उपजै = पैदा होता है, आत्मिक जन्म लेता है। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य। बिख = जहर, आत्मिक जीवन को खत्म कर देने वाला जहर। मोहि = मोह में।2।
अर्थ: हे भाई! गुरु की शरण पड़ने वाला मनुष्य गुरु के शब्द को गाता रहता है, गुरु के शब्द को समझता है, गुरु के शब्द को विचारता है। उस मनुष्य की जिंद उसका शरीर गुरु की इनायत से नया आत्मिक जन्म लेता है, गुरु की शरण पड़ कर वह अपने सारे काम सँवार लेता है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य माया के मोह में अंधा हुआ रहता है, वह सदैव अंधों वाला काम ही करता रहता है, जगत में वह वही कमाई करता है जो उसके आत्मिक जीवन के लिए जहर बन जाती है। प्यारे गुरु की शरण पड़े बिना वह मनुष्य माया के मोह में फंस के सदा दुख सहता रहता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सोई सेवकु जे सतिगुर सेवे चालै सतिगुर भाए ॥ साचा सबदु सिफति है साची साचा मंनि वसाए ॥ सची बाणी गुरमुखि आखै हउमै विचहु जाए ॥ आपे दाता करमु है साचा साचा सबदु सुणाए ॥३॥

मूलम्

सोई सेवकु जे सतिगुर सेवे चालै सतिगुर भाए ॥ साचा सबदु सिफति है साची साचा मंनि वसाए ॥ सची बाणी गुरमुखि आखै हउमै विचहु जाए ॥ आपे दाता करमु है साचा साचा सबदु सुणाए ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सोई = वही मनुष्य। सेवकु = परमात्मा का भक्त। सतिगुर सेवे = गुरु की शरण पड़े। सतिगुर भाए = सतिगुर भाय, गुरु की रजा में। साचा सबदु = सदा स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी। साची = सदा कायम रहने वाली। साचा = सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा। मंनि = मन में। गुरमुखि = गुरु के बताए हुए राह पर चल के। आखै = उचारता है। जाए = दूर हो जाती है। आपे = (प्रभु) आप ही। करमु = बख्शिश।3।
अर्थ: जो मनुष्य गुरु की शरण आ पड़ता है, गुरु की रजा में चलने लग जाता है वह मनुष्य परमात्मा का भक्त बन जाता है। सदा-स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी, सदा-स्थिर प्रभु की महिमा (उसके मन में टिकी रहती है), वह मनुष्य सदा कायम रहने वाले मनुष्य को अपने मन में बसाए रखता है। गुरु के बताए हुए राह पर चलने वाला मनुष्य सदा-स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी उचारता रहता है (जिसकी इनायत से उसके) अंदर से अहंकार दूर हो जाती है। (उसे यकीन बन जाता है कि) परमात्मा स्वयं सब दातें देने वाला है, परमात्मा की बख्शिश अटल है। वह मनुष्य (और लोगों को भी) सदा-स्थिर प्रभु की महिमा सुनाता रहता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरमुखि घाले गुरमुखि खटे गुरमुखि नामु जपाए ॥ सदा अलिपतु साचै रंगि राता गुर कै सहजि सुभाए ॥ मनमुखु सद ही कूड़ो बोलै बिखु बीजै बिखु खाए ॥ जमकालि बाधा त्रिसना दाधा बिनु गुर कवणु छडाए ॥४॥

मूलम्

गुरमुखि घाले गुरमुखि खटे गुरमुखि नामु जपाए ॥ सदा अलिपतु साचै रंगि राता गुर कै सहजि सुभाए ॥ मनमुखु सद ही कूड़ो बोलै बिखु बीजै बिखु खाए ॥ जमकालि बाधा त्रिसना दाधा बिनु गुर कवणु छडाए ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: घाले = (स्मरण की) मेहनत करता है। खटे = नाम धन कमाता है। अलिपतु = निर्लिप। साचै रंगि = सदा स्थिर प्रभु के प्रेम रंग में। राता = रंगा हुआ। गुर कै = गुरु के द्वारा, गुरु के दर पर रह के। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाए = प्रेम में। मनमुखु = अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य। कूड़ो = झूठ ही। जम कालि बाधा = मौत (के पंजे) के बीच बँधा हुआ, आत्मिक मौत (की फाहियों में) बँधा हुआ। दाधा = जलाया हुआ।4।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य गुरु के बताए हुए मार्ग पर चलता है, वह (नाम स्मरण की) मेहनत करता है, (नाम-धन) कमाता है, और, (और लोगों को भी) नाम जपवाता है। सदा-स्थिर प्रभु के प्रेम रंग में रंगीज के वह मनुष्य सदैव (माया के मोह से) निर्लिप रहता है। गुरु के दर पर रह के वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिका रहता है, प्रभु के प्रेम में लीन रहता है।
पर, अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य सदा ही झूठ बोलता है, (आत्मिक जीवन के खत्म कर देने वाली माया के मोह का) जहर बीजता है, और वही जहर खाता है (उसी जहर को अपने जीवन का सहारा बनाए रखता है)। वह मनुष्य आत्मिक मौत की फाहियों में बँधा रहता है, तृष्णा की आग में जला रहता है। (इस बिपता में से उसको) गुरु के बिना और कोई नहीं छुड़ा सकता।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सचा तीरथु जितु सत सरि नावणु गुरमुखि आपि बुझाए ॥ अठसठि तीरथ गुर सबदि दिखाए तितु नातै मलु जाए ॥ सचा सबदु सचा है निरमलु ना मलु लगै न लाए ॥ सची सिफति सची सालाह पूरे गुर ते पाए ॥५॥

मूलम्

सचा तीरथु जितु सत सरि नावणु गुरमुखि आपि बुझाए ॥ अठसठि तीरथ गुर सबदि दिखाए तितु नातै मलु जाए ॥ सचा सबदु सचा है निरमलु ना मलु लगै न लाए ॥ सची सिफति सची सालाह पूरे गुर ते पाए ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सचा = सदा स्थिर रहने वाला। जितु सतिसरि = जिस सच्चे सरोवर में। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ने वाले मनुष्य। अठसठि = अढ़सठि। सबदि = शब्द में। दिखाए = (प्रभु) दिखा देता है। तितु = उस (गुरु शब्द तीर्थ) में। नातै = नहाने से। गुर ते = गुरु से।5।
अर्थ: जो मनुष्य गुरु की शरण आ पड़ता है उसको प्रभु स्वयं ये सूझ बख्शता है कि जिस सच्चे सरोवर में स्नान करना चाहिए वह सदा कायम रहने वाला तीर्थ (गुरु का शब्द ही है) गुरु के शब्द में (ही उस प्रभु को) अढ़सठ तीर्थ दिखा देता है (और दिखा देता है कि) उस (गुरु-शब्द-तीर्थ) में नहाने से (विकारों की) मैल उतर जाती है। (उस मनुष्य को यकीन बन जाता है कि) गुरु का शब्द ही सदा कायम रहने वाला और पवित्र तीर्थ है (उसमें स्नान करने से विकारों की) मैल नहीं लगती, (वह तीर्थ और) मैल नहीं चिपकाता। वह मनुष्य पूरे गुरु के पास से सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा की महिमा प्राप्त कर लेता है।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तनु मनु सभु किछु हरि तिसु केरा दुरमति कहणु न जाए ॥ हुकमु होवै ता निरमलु होवै हउमै विचहु जाए ॥ गुर की साखी सहजे चाखी त्रिसना अगनि बुझाए ॥ गुर कै सबदि राता सहजे माता सहजे रहिआ समाए ॥६॥

मूलम्

तनु मनु सभु किछु हरि तिसु केरा दुरमति कहणु न जाए ॥ हुकमु होवै ता निरमलु होवै हउमै विचहु जाए ॥ गुर की साखी सहजे चाखी त्रिसना अगनि बुझाए ॥ गुर कै सबदि राता सहजे माता सहजे रहिआ समाए ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हरि तिसु केरा = उस हरि का। केरा = का। दुरमति = खोटी मति (के कारण)। निरमलु = पवित्र। साखी = शिक्षा। सहजे = आत्मिक अडोलता में। कै सबदि = के शब्द में। राता = रंगा हुआ। माता = मस्त, लीन। सहजे = आत्मिक अडोलता में।6।
अर्थ: पर, जो मनुष्य गुरु की शरण नहीं पड़ता, वह (मनुष्य) खोटी मति के कारण ये नहीं कह सकता कि हमारा ये शरीर हमारा ये मन सब कुछ उस प्रभु का ही दिया हुआ है। जब परमात्मा की रजा होती है (मनुष्य गुरु की शरण पड़ता है, उसका मन) पवित्र हो जाता है (उसके) अंदर से अहंकार दूर हो जाता है वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के गुरु के उपदेश का आनंद लेता है, (गुरु का उपदेश उसके अंदर से) तृष्णा की आग बुझा देता है। वह मनुष्य गुरु के शब्द में रंगा जाता है, आत्मिक अडोलता में मस्त हो जाता है, आत्मिक अडोलता में ही लीन रहता है।6।

[[0754]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि का नामु सति करि जाणै गुर कै भाइ पिआरे ॥ सची वडिआई गुर ते पाई सचै नाइ पिआरे ॥ एको सचा सभ महि वरतै विरला को वीचारे ॥ आपे मेलि लए ता बखसे सची भगति सवारे ॥७॥

मूलम्

हरि का नामु सति करि जाणै गुर कै भाइ पिआरे ॥ सची वडिआई गुर ते पाई सचै नाइ पिआरे ॥ एको सचा सभ महि वरतै विरला को वीचारे ॥ आपे मेलि लए ता बखसे सची भगति सवारे ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सति करि जाणै = सच करके जानता है, ये जान लेता है कि यही सच्चा साथी है। कै भाइ = के प्रेम में। गुर ते = गुरु से। सचै नाइ = सदा स्थिर हरि नाम में। पिआरे = प्यार बनाता है। सचा = सदा कायम रहने वाला प्रभु!। आपे = (प्रभु) आप ही। सची = सदा स्थिर रहने वाली।7।
अर्थ: जो मनुष्य प्यारे गुरु के प्रेम में टिका रहता है, वह ये बात समझ लेता है कि परमात्मा का नाम ही सच्चा साथी है। वह मनुष्य परमात्मा की सदा-स्थिर रहने वाली महिमा गुरु से प्राप्त कर लेता है, वह सदा-स्थिर प्रभु के नाम में प्यार करने लग जाता है। कोई विरला मनुष्य (गुरु की शरण पड़ के) ये विचार करता है कि सारी सृष्टि में सदा-स्थिर रहने वाला परमात्मा ही बसता है। (ऐसे मनुष्य को) जब प्रभु स्वयं ही अपने चरणों में जोड़ता है, तो उस पर बख्शिश करता है, सदा-स्थिर रहने वाली अपनी भक्ति दे के उसका जीवन सोहाना बना देता है।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सभो सचु सचु सचु वरतै गुरमुखि कोई जाणै ॥ जमण मरणा हुकमो वरतै गुरमुखि आपु पछाणै ॥ नामु धिआए ता सतिगुरु भाए जो इछै सो फलु पाए ॥ नानक तिस दा सभु किछु होवै जि विचहु आपु गवाए ॥८॥१॥

मूलम्

सभो सचु सचु सचु वरतै गुरमुखि कोई जाणै ॥ जमण मरणा हुकमो वरतै गुरमुखि आपु पछाणै ॥ नामु धिआए ता सतिगुरु भाए जो इछै सो फलु पाए ॥ नानक तिस दा सभु किछु होवै जि विचहु आपु गवाए ॥८॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सभो = हर जगह। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख रहने वाला मनुष्य। हुकमो = हुक्म ही। आपु पछाणै = अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता है। सतिगुर भाए = गुरु को प्यारा लगता है। सभु किछु होवै = आत्मिक जीवन का सारी संपत्ति बनी रहता है। आपु = स्वै भाव।8।
अर्थ: हे भाई! कोई विरला मनुष्य गुरु की शरण पड़ के समझता है कि हर जगह सदा कायम रहने वाला परमात्मा ही काम कर रहा है। जगत में पैदा होना मरना भी उसी के हुक्म में चल रहा है। गुरु की शरण पड़ने वाला वह मनुष्य अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता रहता है। जब वह मनुष्य परमात्मा के नाम का स्मरण शुरू करता है तो वह गुरु को प्यारा लगने लग जाता है, फिर वह जो भी मुराद माँगता है वही हासिल कर लेता है। हे नानक! (कह:) जो मनुष्य (गुरु की शरण पड़ कर) अपने अंदर से स्वै भाव दूर कर लेता है, उसके आत्मिक जीवन का सारी संपत्ति बची रहती है।8।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ३ ॥ काइआ कामणि अति सुआल्हिउ पिरु वसै जिसु नाले ॥ पिर सचे ते सदा सुहागणि गुर का सबदु सम्हाले ॥ हरि की भगति सदा रंगि राता हउमै विचहु जाले ॥१॥

मूलम्

सूही महला ३ ॥ काइआ कामणि अति सुआल्हिउ पिरु वसै जिसु नाले ॥ पिर सचे ते सदा सुहागणि गुर का सबदु सम्हाले ॥ हरि की भगति सदा रंगि राता हउमै विचहु जाले ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: काइआ = शरीर। कामणि = स्त्री। अति = बहुत। सुआलिओ = सोहणी। पिरु = प्रभु पति। ते = से, मिलाप से, मिलाप के कारण। सुहागणि = सोहाग भाग वाली। समाले = संभालती है, हृदय में बसाती है। रंगि = रंग में। राता = रंगा हुआ। जाले = जला लेता है।1।
अर्थ: हे भाई! (गुरु की वाणी की इनायत से) जिस काया में प्रभु-पति आ बसता है, वह काया-स्त्री बहुत सुंदर बन जाती है। जो जीव-स्त्री गुरु के शब्द को अपने हृदय में बसाती है, सदा-स्थिर प्रभु-पति के मिलाप के कारण वह सदा के लिए सोहाग भाग वाली बन जाती है। हे भाई! (वाणी की इनायत से जो मनुष्य) अपने अंदर से अहंकार को जला लेता है, वह सदा के लिए परमात्मा की भक्ति के रंग में रंगा जाता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

वाहु वाहु पूरे गुर की बाणी ॥ पूरे गुर ते उपजी साचि समाणी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

वाहु वाहु पूरे गुर की बाणी ॥ पूरे गुर ते उपजी साचि समाणी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: वाहु वाहु = धन्य धन्य। ते = से, हृदय में से। साचि = सदा सिथर प्रभु में। समाणी = लीन कर देती है।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! पूरे गुरु की वाणी धन्य धन्य है। ये वाणी पूरे गुरु के हृदय में से पैदा होती है, और (जो मनुष्य इसको अपने हृदय में बसाता है उसको) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा में लीन कर देती है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

काइआ अंदरि सभु किछु वसै खंड मंडल पाताला ॥ काइआ अंदरि जगजीवन दाता वसै सभना करे प्रतिपाला ॥ काइआ कामणि सदा सुहेली गुरमुखि नामु सम्हाला ॥२॥

मूलम्

काइआ अंदरि सभु किछु वसै खंड मंडल पाताला ॥ काइआ अंदरि जगजीवन दाता वसै सभना करे प्रतिपाला ॥ काइआ कामणि सदा सुहेली गुरमुखि नामु सम्हाला ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सभु किछु = हरेक सुख। खंड = देश। प्रतिपाला = पालना। सुहेली = आसान। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ कर।2।
अर्थ: हे भाई! खण्डों-मण्डलों-पातालों (सारे जगत) का हरेक सुख उस शरीर के अंदर आ बसता है, जिस शरीर में जगत का जीवन वह दातार-प्रभु प्रकट हो जाता है जो सारे जीवों की पालना करता है। जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ के परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाता है उसकी काया-स्त्री सदा सुखी रहती है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

काइआ अंदरि आपे वसै अलखु न लखिआ जाई ॥ मनमुखु मुगधु बूझै नाही बाहरि भालणि जाई ॥ सतिगुरु सेवे सदा सुखु पाए सतिगुरि अलखु दिता लखाई ॥३॥

मूलम्

काइआ अंदरि आपे वसै अलखु न लखिआ जाई ॥ मनमुखु मुगधु बूझै नाही बाहरि भालणि जाई ॥ सतिगुरु सेवे सदा सुखु पाए सतिगुरि अलखु दिता लखाई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आपे = (प्रभु) आप ही। अलखु = अदृष्य। मनमुखु = अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य। मुगधु = मूर्ख। सतिगुरि = गुरु ने। दिता लखाई = समझा दिया।3।
अर्थ: हे भाई! इस शरीर में प्रभु आप ही बसता है, पर वह अदृश्य है (साधारण तौर पर) देखा नहीं जा सकता। अपने मन के पीछे चलने वाला मूर्ख मनुष्य (ये भेद) नहीं समझता, (उस प्रभु को) बाहर (जंगल आदि में) तलाशने के लिए चल पड़ता है। जो मनुष्य गुरु की शरण आ पड़ता है, वह सदा आत्मिक आनंद पाता है (क्योंकि जो भी मनुष्य गुरु की शरण आ पड़ा) गुरु ने (उसको) अदृश्य परमात्मा (उसके अंदर बसता) दिखा दिया।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

काइआ अंदरि रतन पदारथ भगति भरे भंडारा ॥ इसु काइआ अंदरि नउ खंड प्रिथमी हाट पटण बाजारा ॥ इसु काइआ अंदरि नामु नउ निधि पाईऐ गुर कै सबदि वीचारा ॥४॥

मूलम्

काइआ अंदरि रतन पदारथ भगति भरे भंडारा ॥ इसु काइआ अंदरि नउ खंड प्रिथमी हाट पटण बाजारा ॥ इसु काइआ अंदरि नामु नउ निधि पाईऐ गुर कै सबदि वीचारा ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भंडारा = खजाने। नउ खंड प्रिथमी = नौ खण्डों वाली धरती, सारी धरती (के)। हाट = दुकान। पटण = शहर। नउनिधि = नौ खजाने, धरती के सारे ही नौ खजाने। कै सबदि = के शब्द में।4।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा की भक्ति (जैसे) रत्न-पदार्थ है (इन रत्न-पदार्थों के) खजाने इस मनुष्य शरीर में भरे पड़े हैं। इस शरीर के अंदर ही (जैसे) सारी धरती के हाट-बाजार और शहर (बस रहे हैं। गुरु की वाणी की इनायत से मनुष्य अंदर ही नाम-धन का व्यापार करता है)। गुरु के शब्द के माध्यम से विचार कर के इस शरीर में से ही परमात्मा का नाम प्राप्त हो जाता है। जो (जैसे धरती के) नौ ही खजाने हैं।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

काइआ अंदरि तोलि तुलावै आपे तोलणहारा ॥ इहु मनु रतनु जवाहर माणकु तिस का मोलु अफारा ॥ मोलि कित ही नामु पाईऐ नाही नामु पाईऐ गुर बीचारा ॥५॥

मूलम्

काइआ अंदरि तोलि तुलावै आपे तोलणहारा ॥ इहु मनु रतनु जवाहर माणकु तिस का मोलु अफारा ॥ मोलि कित ही नामु पाईऐ नाही नामु पाईऐ गुर बीचारा ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आपे = प्रभु आप ही। तोलणहार = नाम रत्न की परख करने वाला। तोलि = नाम रत्न को परख के। तुलावै = परखने की विधि सिखाता है। अफारा = बहुत। मोलि = मूल्य से। कित ही मोलि = किसी भी मूल्य से।5।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘तिस का’ में से ‘तिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘का’ के कारण हटा दी गई है। कित ही: ‘कित’ की ‘त’ की ‘ि’ मात्रा ‘ही’ क्रिया विशेषण के कारण हट गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! जिस मानव शरीर में नाम-रत्न की परख करने वाला प्रभु स्वयं ही बसता है, वह स्वयं परख करके नाम-रत्न की परख की विधि सिखाता है, (जिस मनुष्य को विधि देता है, उसका) ये मन (जैसे) रतन-जवाहर-मोती (जैसा कीमती बन जाता है कि) उसका मूल्य नहीं पड़ सकता। (उस मनुष्य को समझ पड़ जाती है कि परमात्मा का) नाम किसी (दुनियावी) कीमत से नहीं मिल सकता। सतिगुरु की वाणी की विचार की इनायत से परमात्मा का नाम मिलता है।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरमुखि होवै सु काइआ खोजै होर सभ भरमि भुलाई ॥ जिस नो देइ सोई जनु पावै होर किआ को करे चतुराई ॥ काइआ अंदरि भउ भाउ वसै गुर परसादी पाई ॥६॥

मूलम्

गुरमुखि होवै सु काइआ खोजै होर सभ भरमि भुलाई ॥ जिस नो देइ सोई जनु पावै होर किआ को करे चतुराई ॥ काइआ अंदरि भउ भाउ वसै गुर परसादी पाई ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु के सन्मुख। भरमि = भटकना में (पड़ कर)। भुलाई = गलत रास्ते पड़ी है। देइ = देता है। को = कोई मनुष्य। किआ चतुराई = कौन सी समझदारी? भउ = डर अदब। भाउ = प्यारे। परसादी = कृपा से।6।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जिस नो’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ता है वह (परमात्मा के नाम की प्राप्ति के वास्ते) अपने शरीर को ही खोजता है। बाकी की दुनिया भटकना में पड़ कर गलत राह पर पड़ी रहती है। परमात्मा खुद जिस मनुष्य को (अपने नाम की दाति) देता है, वही मनुष्य प्राप्त करता है। कोई भी मनुष्य (गुरु की शरण के बिना) और कोई समझदारी नहीं कर सकता (जिससे नाम प्राप्त कर सके)। गुरु की कृपा से ही नाम प्राप्त होता है। जिसे प्राप्त होता है उसके शरीर में परमात्मा का डर-अदब और प्यार आ बसता है।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

काइआ अंदरि ब्रहमा बिसनु महेसा सभ ओपति जितु संसारा ॥ सचै आपणा खेलु रचाइआ आवा गउणु पासारा ॥ पूरै सतिगुरि आपि दिखाइआ सचि नामि निसतारा ॥७॥

मूलम्

काइआ अंदरि ब्रहमा बिसनु महेसा सभ ओपति जितु संसारा ॥ सचै आपणा खेलु रचाइआ आवा गउणु पासारा ॥ पूरै सतिगुरि आपि दिखाइआ सचि नामि निसतारा ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सभ ओपति = सारी उत्पक्ति। जितु = जिस (परमात्मा) से। सचै = सदा स्थिर प्रभु ने। आवागउणु = पैदा होना मरना। पासारा = खिलारा। सतिगुरि = सतिगुरु ने। सचि नामि = सदा स्थिर रहने वाले प्रभु के नाम में।7।
अर्थ: हे भाई! इस शरीर में वह परमात्मा बस रहा है, जिससे ब्रहमा-विष्णु-शिव और सारी सृष्टि की उत्पक्ति हुई है। सदा-स्थिर प्रभु ने (ये जगत) अपना एक तमाश रचा हुआ है ये पैदा होने व मरने का एक पसारा पसार दिया है। जिस मनुष्य को पूरे गुरु ने (ये अस्लियत) दिखा दी, सदा-स्थिर प्रभु के नाम में जुड़ के उस मनुष्य का पार उतारा हो गया।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सा काइआ जो सतिगुरु सेवै सचै आपि सवारी ॥ विणु नावै दरि ढोई नाही ता जमु करे खुआरी ॥ नानक सचु वडिआई पाए जिस नो हरि किरपा धारी ॥८॥२॥

मूलम्

सा काइआ जो सतिगुरु सेवै सचै आपि सवारी ॥ विणु नावै दरि ढोई नाही ता जमु करे खुआरी ॥ नानक सचु वडिआई पाए जिस नो हरि किरपा धारी ॥८॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सा = वह (स्त्रीलिंग)। दरि = (प्रभु के) दर पर। ढोई = आसरा। सचु = सदा स्थिर हरि नाम।8।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जिस नो’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! वही शरीर सफल है जो गुरु की शरण पड़ता है। उस शरीर को सदा-स्थिर रहने वाले कर्तार ने स्वयं सुंदर बना दिया। परमात्मा के नाम के बिना परमात्मा के दर पर खड़ा होना भी नसीब नहीं होता। तब (ऐसे मनुष्य को) जमराज दुखी करता है। हे नानक! जिस मनुष्य पर परमात्मा स्वयं कृपा करता है, उसको अपना सदा-स्थिर नाम बख्शता है (यही उसके वास्ते सबसे बड़ी) इज्जत है।8।2।

[[0755]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला ३ घरु १० ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला ३ घरु १० ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

दुनीआ न सालाहि जो मरि वंञसी ॥ लोका न सालाहि जो मरि खाकु थीई ॥१॥

मूलम्

दुनीआ न सालाहि जो मरि वंञसी ॥ लोका न सालाहि जो मरि खाकु थीई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मरि वंञसी = मर जाएगी। मरि = मर के। खाकु = मिट्टी। थीई = हो जाएगी।1।
अर्थ: हे भाई! दुनिया की खुशामदें ना करता फिर, दुनिया तो नाश हो जाएगी। लोगों की महिमा भी ना गाता फिर, सृष्टि भी मर के मिट्टी हो जाएगी।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

वाहु मेरे साहिबा वाहु ॥ गुरमुखि सदा सलाहीऐ सचा वेपरवाहु ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

वाहु मेरे साहिबा वाहु ॥ गुरमुखि सदा सलाहीऐ सचा वेपरवाहु ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: वाहु = धन्य, साराहनीय। साहिबा = हे मालिक! गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ कर। सलाहीऐ = महिमा करनी चाहिए। सचा = सदा कायम रहने वाला। वेपरवाहु = बेमुथाज।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मालिक! तू धन्य है! तू ही सराहनीय है! हे भाई! गुरु की शरण पड़ कर सदा उस परमात्मा की महिमा करनी चाहिए जो सदा कायम रहने वाला है, और जिस को किसी की अधीनता नहीं है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दुनीआ केरी दोसती मनमुख दझि मरंनि ॥ जम पुरि बधे मारीअहि वेला न लाहंनि ॥२॥

मूलम्

दुनीआ केरी दोसती मनमुख दझि मरंनि ॥ जम पुरि बधे मारीअहि वेला न लाहंनि ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: केरी = की। मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य। दझि = जल के। मरंनि = मरते हैं। जम पुरि = जम की पुरी में। मारीअहि = मारे जाते हैं, मार खाते हैं। वेला = मानव जन्म का अवसर। न लाहंनि = नहीं प्राप्त कर सकते।2।
अर्थ: हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य दुनिया की मित्रता में ही जल मरते हैं (आत्मि्क जीवन को जला के राख कर लेते हैं। अंत में) जमराज के दर पर चोटें खाते हैं। तब उन्हें (हाथों से फिसल चुका मानव जन्म का) समय नहीं मिलता।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरमुखि जनमु सकारथा सचै सबदि लगंनि ॥ आतम रामु प्रगासिआ सहजे सुखि रहंनि ॥३॥

मूलम्

गुरमुखि जनमु सकारथा सचै सबदि लगंनि ॥ आतम रामु प्रगासिआ सहजे सुखि रहंनि ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ने वाले मनुष्य। सकारथा = सफल। सचै सबदि = सदा स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी में। आतम रामु = सर्व व्यापक परमात्मा। सहजे = आत्मिक अडोलता में। सुखि = आनंद में।3।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ते हैं, उनका जीवन सफल हो जाता है, क्योंकि वे सदा-स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी में जुड़े रहते हैं। उनके अंदर सर्व-व्यापक परमात्मा का प्रकाश हो जाता है। वे आत्मिक अडोलता में आनंद में मगन रहते हैं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुर का सबदु विसारिआ दूजै भाइ रचंनि ॥ तिसना भुख न उतरै अनदिनु जलत फिरंनि ॥४॥

मूलम्

गुर का सबदु विसारिआ दूजै भाइ रचंनि ॥ तिसना भुख न उतरै अनदिनु जलत फिरंनि ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दूजे भाइ = माया के प्यार में। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त।4।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य गुरु की वाणी को भुला देते हैं, वे माया के मोह में मस्त रहते हैं, उनके अंदर से माया की प्यास-भूख दूर नहीं होती, वे हर वक्त (तृष्णा की आग में) जलते फिरते हैं।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दुसटा नालि दोसती नालि संता वैरु करंनि ॥ आपि डुबे कुट्मब सिउ सगले कुल डोबंनि ॥५॥

मूलम्

दुसटा नालि दोसती नालि संता वैरु करंनि ॥ आपि डुबे कुट्मब सिउ सगले कुल डोबंनि ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: करंनि = करते हैं। दुसट = दुष्कर्मी, बुरे लोग। सिउ = समेत। डोबंनि = डुबा देते हैं।5।
अर्थ: ऐसे मनुष्य बुरे लोगों से मित्रता बनाए रखते हैं, और संतों से वैर कमाते हैं। वे खुद अपने परिवार समेत (संसार समुंदर में) डूब जाते हैं, अपनी कुलों को भी (अपने ही अन्य रिश्तेदारों को भी) साथ में ही डुबा लेते हैं।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

निंदा भली किसै की नाही मनमुख मुगध करंनि ॥ मुह काले तिन निंदका नरके घोरि पवंनि ॥६॥

मूलम्

निंदा भली किसै की नाही मनमुख मुगध करंनि ॥ मुह काले तिन निंदका नरके घोरि पवंनि ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मुगध = मूर्ख। नरके घोरि = घोर नर्क में, भयानक नर्क में। पवंनि = पड़ते हैं।6।
अर्थ: हे भाई! किसी की भी निंदा करनी अच्छी बात नहीं है। अपने मन के पीछे चलने वाले मूर्ख मनुष्य ही निंदा किया करते हैं। (लोक-परलोक में) वही बदनामी कमाते हैं और भयानक नर्क में पड़ते हैं।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ए मन जैसा सेवहि तैसा होवहि तेहे करम कमाइ ॥ आपि बीजि आपे ही खावणा कहणा किछू न जाइ ॥७॥

मूलम्

ए मन जैसा सेवहि तैसा होवहि तेहे करम कमाइ ॥ आपि बीजि आपे ही खावणा कहणा किछू न जाइ ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ए मन = हे मन! हे जीव! जैसा सेवहि = जैसी तू सेवा भक्ति करता है। तैसा होवहि = तू वैसा ही बन जाता है। तेहे = वैसे ही। कमाइ = कमा के। बीजि = (कर्मों के बीज) बीज के। आपे = आप ही। कहणा किछु न जाइ = (इस नियम में) कोई एतराज नहीं किया जा सकता।7।
अर्थ: हे (मेरे) मन! तू जैसे की सेवा-भक्ति करेगा, वैसे ही कर्म कमा के वैसा ही बन जाएगा। (प्रभु की रजा में ये नियम है कि जीव ने इस कर्म भूमि शरीर में) आप बीज के आप ही (उसका) फल खाना होता है। इस (सत्य) की उलंघ्ना नहीं की जा सकती।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

महा पुरखा का बोलणा होवै कितै परथाइ ॥ ओइ अम्रित भरे भरपूर हहि ओना तिलु न तमाइ ॥८॥

मूलम्

महा पुरखा का बोलणा होवै कितै परथाइ ॥ ओइ अम्रित भरे भरपूर हहि ओना तिलु न तमाइ ॥८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: किते परथाइ = किसी प्रसंग के अनुसार। ओइ = वह, वे (महा पुरुख)। अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाला नाम रस। हहि = होते हैं। तमाइ = लालच, अपनी गरज़।8।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘ओइ’ है ‘ओह/वो’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: (उच्च आत्मिक अवस्था वाले) महापुरुषों के वचन किसी प्रसंग के अनुसार होते हैं। वे महापुरुख आत्मिक जीवन देने वाले नाम-रस से भरपूर रहते हैं, उन्हें किसी सेवा आदि का लालच नहीं होता (पर जो मनुष्य उनकी सेवा करता है, उसे उनसे आत्मिक जीवन मिल जाता है)।8।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुणकारी गुण संघरै अवरा उपदेसेनि ॥ से वडभागी जि ओना मिलि रहे अनदिनु नामु लएनि ॥९॥

मूलम्

गुणकारी गुण संघरै अवरा उपदेसेनि ॥ से वडभागी जि ओना मिलि रहे अनदिनु नामु लएनि ॥९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुणकारी = गुण करने वाला, उपकारी, गुरमुखि। संघरै = एकत्र करता है। उपदेसेनि = उपदेश देते हैं। सो = वह (बहुवचन)। जि = जो। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। लएनि = लेते हैं।9।
अर्थ: वह महापुरुख और लोगों को भी (नाम जपने का) उपदेश करते हैं। गुण ग्रहण करने वाला मनुष्य (उनसे) गुण ग्रहण कर लेता है। सो, जो मनुष्य उन महापुरुषों की संगति में रहते हैं, वे बड़े भाग्यशाली हो जाते हैं, वे भी हर वक्त नाम जपने लग जाते हैं।9।

विश्वास-प्रस्तुतिः

देसी रिजकु स्मबाहि जिनि उपाई मेदनी ॥ एको है दातारु सचा आपि धणी ॥१०॥

मूलम्

देसी रिजकु स्मबाहि जिनि उपाई मेदनी ॥ एको है दातारु सचा आपि धणी ॥१०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: देसी = देगा। संबाहि = अपना के। जिनि = जिस (परमात्मा) ने। मेदनी = सृष्टि। धणी = मालिक।10।
अर्थ: हे भाई! जिस परमात्मा ने ये सृष्टि पैदा की है वह स्वयं ही सब जीवों को रिज़क पहुँचाता है। वही स्वयं सब दातें देने वाला है। वह मालिक सदा कायम रहने वाला (भी) है।10।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सो सचु तेरै नालि है गुरमुखि नदरि निहालि ॥ आपे बखसे मेलि लए सो प्रभु सदा समालि ॥११॥

मूलम्

सो सचु तेरै नालि है गुरमुखि नदरि निहालि ॥ आपे बखसे मेलि लए सो प्रभु सदा समालि ॥११॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सचु = सदा कायम रहने वाला। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ कर। नदरि निहालि = ध्यान से देख। समालि = हृदय में संभाल के रख।11।
अर्थ: हे भाई! वह सदा कायम रहने वाला परमात्मा तेरे अंग-संग बसता है। गुरु की शरण पड़ कर तू उसको अपनी आँखें से देख ले। (जिस मनुष्य पर वह) स्वयं ही बख्शिश करता है उसको अपने आप ही (अपने चरणों में) जोड़ लेता है। हे भाई! उस प्रभु को सदा अपने दिल में बसाए रख।11।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मनु मैला सचु निरमला किउ करि मिलिआ जाइ ॥ प्रभु मेले ता मिलि रहै हउमै सबदि जलाइ ॥१२॥

मूलम्

मनु मैला सचु निरमला किउ करि मिलिआ जाइ ॥ प्रभु मेले ता मिलि रहै हउमै सबदि जलाइ ॥१२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: निरमला = पवित्र। सबदि = शब्द के द्वारा। जलाइ = जला के।12।
अर्थ: हे भाई! वह सदा कायम रहने वाला परमात्मा (सदा) पवित्र है, (जब तक मनुष्य का) मन (विकारों से) मैला रहे, उस परमात्मा के साथ मिलाप नहीं हो सकता। जीव तब ही उस प्रभु के चरणों से मिल सकता है, जब प्रभु खुद गुरु के शब्द से उसके अंदर का अहंकार जला के उसको अपने साथ मिलाता है।12।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सो सहु सचा वीसरै ध्रिगु जीवणु संसारि ॥ नदरि करे ना वीसरै गुरमती वीचारि ॥१३॥

मूलम्

सो सहु सचा वीसरै ध्रिगु जीवणु संसारि ॥ नदरि करे ना वीसरै गुरमती वीचारि ॥१३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सहु = खसम, पति। ध्रिगु = धिक्कार योग्य। संसारि = संसार में। नदरि = मेहर की निगाह। गुरमती = गुरु की मति ले कर। वीचारि = हरि नाम का विचार करता है।13।
अर्थ: हे भाई! अगर वह सदा कायम रहने वाला पति-प्रभु भूल जाए, तो जगत में जीना धिक्कारयोग्य है। जिस मनुष्य पर प्रभु स्वयं मेहर की निगाह करता है, उसे प्रभु नहीं भूलता। वह मनुष्य गुरु की मति की इनायत से हरि-नाम में तवज्जो जोड़ता है।13।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सतिगुरु मेले ता मिलि रहा साचु रखा उर धारि ॥ मिलिआ होइ न वीछुड़ै गुर कै हेति पिआरि ॥१४॥

मूलम्

सतिगुरु मेले ता मिलि रहा साचु रखा उर धारि ॥ मिलिआ होइ न वीछुड़ै गुर कै हेति पिआरि ॥१४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मिलि रहा = मैं मिला रह सकता हूँ। रखा = मैं रख सकता हूँ। उर = हृदय। धारि = टिका के। कै हेति पिआरि = के प्यार हित की इनायत से।14।
अर्थ: हे भाई! (हम जीवों का कोई अपना जोर नहीं चल सकता) अगर गुरु (मुझे प्रभु से) मिला दे, तो ही मैं मिला रह सकता हूँ, और उस सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा को मैं अपने हृदय में टिका के रख सकता हूँ। हे भाई! गुरु के प्यार की इनायत से जो मनुष्य प्रभु-चरणों में मिल जाए वह फिर कभी वहाँ से नहीं विछुड़ता।14।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पिरु सालाही आपणा गुर कै सबदि वीचारि ॥ मिलि प्रीतम सुखु पाइआ सोभावंती नारि ॥१५॥

मूलम्

पिरु सालाही आपणा गुर कै सबदि वीचारि ॥ मिलि प्रीतम सुखु पाइआ सोभावंती नारि ॥१५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पिरु सालाही = हे भाई! तू प्रभु पति की महिमा किया कर। वीचारि = तवज्जो/ध्यान जोड़ के। सबदि = शब्द में। मिलि = मिल के।15।
अर्थ: हे भाई! गुरु के शब्द में तवज्जो जोड़ के तू भी अपने पति-प्रभु की महिमा किया कर। प्रीतम प्रभु को मिल के जिस जीव-स्त्री ने आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया, उसने (लोक-परलोक में) शोभा कमा ली।15।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मनमुख मनु न भिजई अति मैले चिति कठोर ॥ सपै दुधु पीआईऐ अंदरि विसु निकोर ॥१६॥

मूलम्

मनमुख मनु न भिजई अति मैले चिति कठोर ॥ सपै दुधु पीआईऐ अंदरि विसु निकोर ॥१६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य। अति = बहुत। चिति = चिक्त में। सपै = साँप को। विसु = जहर। निकोर = केवल।16।
अर्थ: हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्यों का मन परमात्मा के नाम में नहीं भीगता (हरि नाम के साथ प्यार नहीं डालता)। वह मनुष्य अपने मन में मैले और कठोर रहते हैं। अगर साँप को दूध भी पिलाया जाए, तो भी उसके अंदर केवल जहिर ही टिका रहता है।16।

विश्वास-प्रस्तुतिः

आपि करे किसु आखीऐ आपे बखसणहारु ॥ गुर सबदी मैलु उतरै ता सचु बणिआ सीगारु ॥१७॥

मूलम्

आपि करे किसु आखीऐ आपे बखसणहारु ॥ गुर सबदी मैलु उतरै ता सचु बणिआ सीगारु ॥१७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सबदी = शब्द से। सचु = सदा स्थिर टिकने वाला।17।
अर्थ: हे भाई! (सब जीवों में व्यापक हो के सब कुछ) प्रभु स्वयं ही कर रहा है। किसको (अच्छा या बुरा) कहा जा सकता है? (गलत रास्ते पर पड़े हुए जीवों पर भी) वह स्वयं ही बख्शिश करने वाला है। जब गुरु के शब्द की इनायत से (किसी मनुष्य के मन की) मैल उतर जाती है, तो उसकी आत्मा को सदा कायम रहने वाली स्वतंत्रता मिल जाती है।17।

[[0756]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सचा साहु सचे वणजारे ओथै कूड़े ना टिकंनि ॥ ओना सचु न भावई दुख ही माहि पचंनि ॥१८॥

मूलम्

सचा साहु सचे वणजारे ओथै कूड़े ना टिकंनि ॥ ओना सचु न भावई दुख ही माहि पचंनि ॥१८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: वणजारे = व्यापार करने वाला। ओथै = उस शाह के दरबार में। कूड़े = माया के साथ ही प्यार करने वाले। टिकंनि = टिक सकते। न भावई = न भाए, पसंद नहीं आता। सचु = सदा स्थिर प्रभु का नाम। पचंनि = ख्वार होते हैं।18।
अर्थ: हे भाई! (हरि-नाम की पूंजी का मालिक) शाह-प्रभु सदा कायम रहने वाला है, उसके नाम का व्यापार करने वाले भी अटल आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं। पर उस शाह के दरबार में झूठी दुनिया के बनजारे नहीं टिक सकते। उन्हें सदा-स्थिर प्रभु का नाम पसंद नहीं आता, और वे सदा दुख में ही ख्वार होते रहते हैं।18।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हउमै मैला जगु फिरै मरि जमै वारो वार ॥ पइऐ किरति कमावणा कोइ न मेटणहार ॥१९॥

मूलम्

हउमै मैला जगु फिरै मरि जमै वारो वार ॥ पइऐ किरति कमावणा कोइ न मेटणहार ॥१९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मैला = मैले मन वाला। वारो वार = बार बार। पइऐ किरति = किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार।19।
अर्थ: हे भाई! अहंकार (की मैल) से मैला हुआ ये जगत भटक रहाप है, बार बार जनम-मरन के चक्कर में रहता है, पिछले जन्मों के किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार वैसे ही और कर्म किए जाता है। (कर्मों के बनी इस फाँसी को) कोई मिटा नहीं सकता।19।

विश्वास-प्रस्तुतिः

संता संगति मिलि रहै ता सचि लगै पिआरु ॥ सचु सलाही सचु मनि दरि सचै सचिआरु ॥२०॥

मूलम्

संता संगति मिलि रहै ता सचि लगै पिआरु ॥ सचु सलाही सचु मनि दरि सचै सचिआरु ॥२०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सचि = सदा स्थिर प्रभु में। सलाही = महिमा कर। मनि = मन में। दरि सचै = सदा स्थिर प्रभु के दर पर। सचिआरु = सुखरू।20।
अर्थ: हे भाई! अगर मनुष्य साधु-संगत में टिका रहे, तो इसका प्यार सदा-स्थिर प्रभु में बन जाता है। हे भाई! तू (साधु-संगत में टिक के) सदा-स्थिर प्रभु की महिमा किया कर, सदा-स्थिर प्रभु को अपने मन में बसा ले, (इस तरह) सदा-स्थिर प्रभु के दर पे सही स्वीकार होगा।20।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुर पूरे पूरी मति है अहिनिसि नामु धिआइ ॥ हउमै मेरा वड रोगु है विचहु ठाकि रहाइ ॥२१॥

मूलम्

गुर पूरे पूरी मति है अहिनिसि नामु धिआइ ॥ हउमै मेरा वड रोगु है विचहु ठाकि रहाइ ॥२१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पूरी = बगैर किसी कमी के। अहि = दिन। निसि = रात। ठाकि रहाइ = रोक के रखता है।21।
अर्थ: हे भाई! पूरे गुरु की मति किसी (भी तरह की) कमी के बग़ैर है। (जो मनुष्य गुरु की पूरी मति ले के) दिन-रात परमात्मा का नाम स्मरण करता है, वह मनुष्य अहंकार और ममता के बड़े रोग को अपने अंदर से रोक देता है।21।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरु सालाही आपणा निवि निवि लागा पाइ ॥ तनु मनु सउपी आगै धरी विचहु आपु गवाइ ॥२२॥

मूलम्

गुरु सालाही आपणा निवि निवि लागा पाइ ॥ तनु मनु सउपी आगै धरी विचहु आपु गवाइ ॥२२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सालाही = मैं महिमा करूँ। निवि = झुक के। लागा = लगूँ। पाइ = पैरों पर। सउपी = मैं सौंप दूँ। धरी = धर दूं। आपु = स्वै भाव। गवाइ = गवा के, दूर कर के।22।
अर्थ: हे भाई! (यदि प्रभु मेहर करे तो) मैं अपने गुरु की बड़ाई करूँ, झुक झुक के मैं गुरु के चरणों में लगूँ, अपने अंदर से अहंकार को दूर करके अपना मन अपना तन गुरु के हवाले करि दूँ, गुरु के आगे रख दूँ।22।

विश्वास-प्रस्तुतिः

खिंचोताणि विगुचीऐ एकसु सिउ लिव लाइ ॥ हउमै मेरा छडि तू ता सचि रहै समाइ ॥२३॥

मूलम्

खिंचोताणि विगुचीऐ एकसु सिउ लिव लाइ ॥ हउमै मेरा छडि तू ता सचि रहै समाइ ॥२३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: खिंचोताणि = खींचोतान में, डाँवा डोल हालत में। विगुचीऐ = ख्वार होते हैं। लिव लाइ = प्यार जोड़। मेरा = ममता। सचि = सदा स्थिर प्रभु में।23।
अर्थ: हे भाई! डाँवा-डोल हालत में रहने से दूखी ही हुआ जाता है। एक परमात्मा के साथ ही तवज्जो जोड़े रख। अपने अंदर से अहंकार दूर कर, ममता दूर कर। (जब मनुष्य अहंकार-ममता दूर करता है) तब सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा में लीन हुआ रहता है।23।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सतिगुर नो मिले सि भाइरा सचै सबदि लगंनि ॥ सचि मिले से न विछुड़हि दरि सचै दिसंनि ॥२४॥

मूलम्

सतिगुर नो मिले सि भाइरा सचै सबदि लगंनि ॥ सचि मिले से न विछुड़हि दरि सचै दिसंनि ॥२४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ने = को। सि = वह मनुष्य (‘से’ है बहुवचन)। भाइरा = (मेरे) भाई। सचै सबदि = सदा स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी में। लगंनि = लगते हैं, चिक्त जोड़ते हैं। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। दरि सचै = सदा थिर प्रभु के दर पर।24।
अर्थ: हे भाई! वे मनुष्य (मेरे) भाई हैं, जो गुरु की शरण में आ पड़े हैं, और सदा-स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी में चिक्त जोड़ते हैं। जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभु में लीन हो जाते हैं, वह (फिर प्रभु से) नहीं विछुड़ते। वह सदा-स्थिर प्रभु के दर पे (टिके हुए) दिखते हैं।24।

विश्वास-प्रस्तुतिः

से भाई से सजणा जो सचा सेवंनि ॥ अवगण विकणि पल्हरनि गुण की साझ करंन्हि ॥२५॥

मूलम्

से भाई से सजणा जो सचा सेवंनि ॥ अवगण विकणि पल्हरनि गुण की साझ करंन्हि ॥२५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: से = वह मनुष्य (बहुवचन)। सेवंनि = स्मरण करते हैं। विकणि = बिकने से। अवगण विकणि = अवगुणों के बिक जाने से। पल्रनि = प्रफुल्लित होते हैं।25।
अर्थ: हे भाई! वह मनुष्य मेरे भाई हैं मित्र हैं, जो सदा कायम रहने वाले परमात्मा की सेवा-भक्ति करते हैं। (गुणों के बदले) अवगुण बिक जाने से (दूर हो जाने से) वह मनुष्य (आत्मिक जीवन में) प्रफुल्लित होते हैं, वह मनुष्य परमात्मा के गुणों से सांझ पाते हैं।25।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुण की साझ सुखु ऊपजै सची भगति करेनि ॥ सचु वणंजहि गुर सबद सिउ लाहा नामु लएनि ॥२६॥

मूलम्

गुण की साझ सुखु ऊपजै सची भगति करेनि ॥ सचु वणंजहि गुर सबद सिउ लाहा नामु लएनि ॥२६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सची भगति = सदा कायम रहने वाली हरि भक्ति। करंन्हि = करते हैं। वणंजहि = व्यापार करते हैं। सिउ = साथ, से। लाहा = लाभ। लएनि = लेते हैं।26।
अर्थ: हे भाई! गुरु से (आत्मिक) सांझ की इनायत से (उनके अंदर आत्मिक आनंद पैदा होता है, वह परमात्मा की अटल रहने वाली भक्ति करते रहते हैं। वह मनुष्य गुरु के शब्द से सदा-स्थिर प्रभु के नाम का व्यापार करते हैं और हरि-नाम (का) लाभ कमाते हैं।26।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुइना रुपा पाप करि करि संचीऐ चलै न चलदिआ नालि ॥ विणु नावै नालि न चलसी सभ मुठी जमकालि ॥२७॥

मूलम्

सुइना रुपा पाप करि करि संचीऐ चलै न चलदिआ नालि ॥ विणु नावै नालि न चलसी सभ मुठी जमकालि ॥२७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रुपा = चाँदी। संचीऐ = इकट्ठा किया जाता है। न चलसी = नहीं चलेगा। सभ = सारी सृष्टि। मुठी = लूट ली। जमकालि = जम काल ने, मौत ने, आत्मिक मौत ने।27।
अर्थ: हे भाई! (कई किस्म के) पाप कर कर के सोना-चाँदी (आदि धन) इकट्ठा करते हैं, पर (जगत से) चलने के वक्त (वह धन मनुष्य के) साथ नहीं जाता। परमात्मा के नाम के बिना और कोई भी चीज मनुष्य के साथ नहीं जाएगी। नाम से विहीन सारी दुनिया आत्मिक मौत के हाथों से लूटी जाती है (अपना आत्मिक जीवन लुटा बैठती है)।27।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मन का तोसा हरि नामु है हिरदै रखहु सम्हालि ॥ एहु खरचु अखुटु है गुरमुखि निबहै नालि ॥२८॥

मूलम्

मन का तोसा हरि नामु है हिरदै रखहु सम्हालि ॥ एहु खरचु अखुटु है गुरमुखि निबहै नालि ॥२८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तोसा = रास्ते का खर्च। समालि = संभाल के। अखुटु = कभी ना खत्म होने वाला। गुरमुखि = वह मनुष्य जो गुरु के बताए हुए रास्ते पर चलता है।28।
अर्थ: हे भाई! मनुष्य के मन के लिए परमात्मा का नाम ही (जीवन-यात्रा का) खर्च है। इस यात्रा-खर्च को अपने हृदय में संभाल के रखो। ये खर्च कभी समाप्त होने वाला नहीं है। जो मनुष्य गुरु के बताए हुए रास्ते पर चलता है, उसके साथ ये सदा के लिए साथ बनाता है।28।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ए मन मूलहु भुलिआ जासहि पति गवाइ ॥ इहु जगतु मोहि दूजै विआपिआ गुरमती सचु धिआइ ॥२९॥

मूलम्

ए मन मूलहु भुलिआ जासहि पति गवाइ ॥ इहु जगतु मोहि दूजै विआपिआ गुरमती सचु धिआइ ॥२९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मूलहु = मूल से, परमात्मा से। जासहि = जाएगा। पति = इज्जत। गवाइ = गवा के। मोह = मोह में। मोहि दूजे = दूसरे के मोह में, माया के मोह में। विआपिआ = फसा हुआ है। सचु = सदा कायम रहने वाला परमात्मा।29।
अर्थ: जगत के मूल परमात्मा से टूटे हुए ऐ मन! (अगर तू इसी तरह टूटा रहा तो) अपनी इज्जत गवा के (यहाँ से) जाएगा। ये जगत तो माया के मोह में फसा हुआ है (तू इससे मोह छोड़ दे, और) गुरु की मति पर चल के सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम स्मरण किया कर।29।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि की कीमति ना पवै हरि जसु लिखणु न जाइ ॥ गुर कै सबदि मनु तनु रपै हरि सिउ रहै समाइ ॥३०॥

मूलम्

हरि की कीमति ना पवै हरि जसु लिखणु न जाइ ॥ गुर कै सबदि मनु तनु रपै हरि सिउ रहै समाइ ॥३०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जसु = शोभा, बड़ाई। कै सबदि = के शब्द में। सिउ = साथ।30।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा किसी मूल्य से नहीं मिल सकता। परमात्मा की महिमा बयान नहीं की जा सकती। जिस मनुष्य का मन और तन गुरु के शब्द में रंगा जाता है, वह सदा परमात्मा में लीन रहता है।30।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सो सहु मेरा रंगुला रंगे सहजि सुभाइ ॥ कामणि रंगु ता चड़ै जा पिर कै अंकि समाइ ॥३१॥

मूलम्

सो सहु मेरा रंगुला रंगे सहजि सुभाइ ॥ कामणि रंगु ता चड़ै जा पिर कै अंकि समाइ ॥३१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सहु = शहु, पति प्रभु। रंगुला = रंगीला, आनंद स्वरूप। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाइ = प्रेम में। कामणि = जीव-स्त्री। रंगु = प्रेम रंग। ता = तब। जा = जब। कै अंकि = की गोद में, के चरणों में।31।
अर्थ: हे भाई! मेरा वह पति-प्रभु आनंद स्वरूप है (जो मनुष्य उसके चरणों में आ जुड़ता है) उसको वह आत्मिक अडोलता में, प्रेम रंग में रंग देता है। जब कोई जीव-स्त्री उस पति-प्रभु के चरणों में लीन हो जाती है, तब उस (की जिंद) को प्रेम-रंग चढ़ जाता है।31।

विश्वास-प्रस्तुतिः

चिरी विछुंने भी मिलनि जो सतिगुरु सेवंनि ॥ अंतरि नव निधि नामु है खानि खरचनि न निखुटई हरि गुण सहजि रवंनि ॥३२॥

मूलम्

चिरी विछुंने भी मिलनि जो सतिगुरु सेवंनि ॥ अंतरि नव निधि नामु है खानि खरचनि न निखुटई हरि गुण सहजि रवंनि ॥३२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मिलनि = मिल जाते हैं। सेवंनि = शरण पड़ते हैं। अंतरि = (हरेक के) अंदर। नवनिधि = धरती के सारे नौ खजाने। खानि = खाते हैं। खरचनि = खर्चते हैं। रवंनि = स्मरण करते हैं।32।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ते हैं, वह (प्रभु से) चिरों से विछुड़े हुए भी (प्रभु को) आ मिलते हैं। परमात्मा का नाम (जो, मानो धरती के सारे) नौ खजाने (हैं, उनको) अपने अंदर ही मिल जाते हैं। उस नाम-खजाने को वे खुद इस्तेमाल करते हैं, और लोगों को बाँटते हैं, वह फिर भी खत्म नहीं होता। आत्मिक अडोलता में टिक के वह मनुष्य परमात्मा के गुण याद करते रहते हैं।32।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ना ओइ जनमहि ना मरहि ना ओइ दुख सहंनि ॥ गुरि राखे से उबरे हरि सिउ केल करंनि ॥३३॥

मूलम्

ना ओइ जनमहि ना मरहि ना ओइ दुख सहंनि ॥ गुरि राखे से उबरे हरि सिउ केल करंनि ॥३३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ओइ = वह, वे। सहंनि = सहते हैं। गुरि = गुरु ने। उबरे = (जन्म मरन के चक्कर में से) बच गए। सिउ = साथ। केल = आनंद।33।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘ओइ’ है ‘ओह/वो’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! (गुरु की शरण आ पड़े) वे मनुष्य ना तो पैदा होते हैं ना मरते हैं, ना ही वे (जनम-मरण के चक्कर में) दुख सहते हैं। जिनकी रक्षा गुरु ने कर दी है, वह (जन्म-मरन के चक्करों से) बच गए। वह सदा प्रभु के चरणों में जुड़ के आत्मिक आनंद पाते हैं।33।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सजण मिले न विछुड़हि जि अनदिनु मिले रहंनि ॥ इसु जग महि विरले जाणीअहि नानक सचु लहंनि ॥३४॥१॥३॥

मूलम्

सजण मिले न विछुड़हि जि अनदिनु मिले रहंनि ॥ इसु जग महि विरले जाणीअहि नानक सचु लहंनि ॥३४॥१॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जि = जो। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। जाणीअहि = जाने जाते हैं। सचु = सदा स्थिर प्रभु। लहंनि = लेते हैं, मेल प्राप्त करते हैं।34।
अर्थ: हे भाई! जो भले मनुष्य हर वक्त प्रभु-चरणों में जुड़े रहते हैं, वह प्रभु-चरणों में मिल के दोबारा कभी नहीं विछुड़ते। पर, हे नानक! इस जगत में ऐसे विरले बंदे ही उघड़ते हैं, जो सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा का मिलाप प्राप्त करते हैं।34।1।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ३ ॥ हरि जी सूखमु अगमु है कितु बिधि मिलिआ जाइ ॥ गुर कै सबदि भ्रमु कटीऐ अचिंतु वसै मनि आइ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ३ ॥ हरि जी सूखमु अगमु है कितु बिधि मिलिआ जाइ ॥ गुर कै सबदि भ्रमु कटीऐ अचिंतु वसै मनि आइ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सूखमु = सूक्ष्म, बहुत बारीक, अदृश्य। अगम = अगम्य, अगम्य (पहुँच से परे)। कितु बिधि = किस तरीके से? कै सबदि = के शब्द से। अचिंतु = हमारी सोचों विचारों के बिना ही, सहज सुभाय। मनि = मन में। आइ = आ के।1।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा अदृश्य है अगम्य (पहुँच से परे) है, (फिर) उसको किस तरीके से मिला जा सकता है? हे भाई! जब गुरु के शब्द की इनायत से (मनुष्य के अंदर से उसके मन की) भटकना कट जाती है, तब परमात्मा सहज स्वभाव ही (खुद ही मनुष्य के) मन में आ बसता है।1।

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विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरमुखि हरि हरि नामु जपंनि ॥ हउ तिन कै बलिहारणै मनि हरि गुण सदा रवंनि ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

गुरमुखि हरि हरि नामु जपंनि ॥ हउ तिन कै बलिहारणै मनि हरि गुण सदा रवंनि ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य। कै बलिहारणै = से सदके। रवंनि = याद करते हैं।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सदा परमात्मा का नाम जपते हैं। जो मनुष्य अपने मन में सदा परमात्मा के गुण याद करते रहते हैं, मैं उनसे सदके जाता हूँ।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरु सरवरु मान सरोवरु है वडभागी पुरख लहंन्हि ॥ सेवक गुरमुखि खोजिआ से हंसुले नामु लहंनि ॥२॥

मूलम्

गुरु सरवरु मान सरोवरु है वडभागी पुरख लहंन्हि ॥ सेवक गुरमुखि खोजिआ से हंसुले नामु लहंनि ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सरवरु = सोहणा तालाब। लहंन्हि = पा लेते हैं। से = वह (बहुवचन)। हंसुले = सुंदर हंस।2।
अर्थ: हे भाई! गुरु एक सुंदर सा सरोवर है, मान सरोवर है। बड़े भाग्यों वाले मनुष्य उसको पा लेते हैं। गुरु के सन्मुख रहने वाले जिस सेवकों ने तलाश की, वह सुंदर हंस (-गुरसिख उस मान सरोवर में से) नाम (-मोती) पा लेते हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नामु धिआइन्हि रंग सिउ गुरमुखि नामि लगंन्हि ॥ धुरि पूरबि होवै लिखिआ गुर भाणा मंनि लएन्हि ॥३॥

मूलम्

नामु धिआइन्हि रंग सिउ गुरमुखि नामि लगंन्हि ॥ धुरि पूरबि होवै लिखिआ गुर भाणा मंनि लएन्हि ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: धिआइन्हि = ध्यान करते हैं। रंग = प्यार। सिउ = साथ। नामि = नाम में। धुरि = धुर दरगाह से। पूरबि = पहले जन्म में। भाणा = रजा।3।
अर्थ: हे भाई! गुरु के सन्मुख रहने वाला मनुष्य प्रेम से परमात्मा का नाम स्मरण करते हैं, और नाम में जुड़े रहते हैं। जिस मनुष्यों के भाग्यों में धुर-दरगाह से पहले से ही लिखा होता है, वही गुरु की रजा को मानते हैं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

वडभागी घरु खोजिआ पाइआ नामु निधानु ॥ गुरि पूरै वेखालिआ प्रभु आतम रामु पछानु ॥४॥

मूलम्

वडभागी घरु खोजिआ पाइआ नामु निधानु ॥ गुरि पूरै वेखालिआ प्रभु आतम रामु पछानु ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: घरु = हृदय घर। निधानु = खजाना। गुरि पूरे = पूरे गुरु ने। आतम रामु = सर्व व्यापक परमात्मा। पछानु = सांझ पैदा कर।4।
अर्थ: हे भाई! जिस बड़े भाग्यों वाले मनुष्यों ने अपने हृदय-घर की खोज की, उन्होंने (अपने हृदय में से ही) परमात्मा का नाम-खजाना पा लिया। पूरे गुरु ने (उन्हें उनके अंदर ही वह नाम-खजाना) दिखला दिया। हे भाई! तू भी (गुरु की शरण पड़ कर) उस सर्व-व्यापक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सभना का प्रभु एकु है दूजा अवरु न कोइ ॥ गुर परसादी मनि वसै तितु घटि परगटु होइ ॥५॥

मूलम्

सभना का प्रभु एकु है दूजा अवरु न कोइ ॥ गुर परसादी मनि वसै तितु घटि परगटु होइ ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभु = मालिक। परसादी = कृपा से। मनि = मन में। तितु = उस में। घटि = हृदय में। तितु घटि = उस हृदय में (‘तिसु घटि’ = उसके हृदय में)।5।
अर्थ: हे भाई! एक परमात्मा ही सब जीवों का मालिक है, उसके बराबर का और कोई नहीं हैं। गुरु की कृपा से (जिस) मन में आ बसता है, उसके हृदय में वह प्रत्यक्ष उघड़ ही पड़ता है (उस मनुष्य के जीवन में अच्छी तब्दीली आ जाती है)।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सभु अंतरजामी ब्रहमु है ब्रहमु वसै सभ थाइ ॥ मंदा किस नो आखीऐ सबदि वेखहु लिव लाइ ॥६॥

मूलम्

सभु अंतरजामी ब्रहमु है ब्रहमु वसै सभ थाइ ॥ मंदा किस नो आखीऐ सबदि वेखहु लिव लाइ ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सभु = यह सारा जगत आकार। अंतरजामी = हरेक के दिल की जानने वाला। सभ थाइ = हरेक जगह में। लिव लाइ = तवज्जो/ध्यान जोड़ के।6।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘किस नो’ में से ‘किसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! ये सारा जगत-आकार उस अंतरजामी परमात्मा का स्वरूप है। हरेक जगह में ही परमात्मा बस रहा है। हे भाई! गुरु के शब्द में तवज्जो जोड़ के देखो (हरेक जगह वही दिखेगा। जब हरेक जगह वही दिख पड़े, तो) किसी को बुरा कहा नहीं जा सकता।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बुरा भला तिचरु आखदा जिचरु है दुहु माहि ॥ गुरमुखि एको बुझिआ एकसु माहि समाइ ॥७॥

मूलम्

बुरा भला तिचरु आखदा जिचरु है दुहु माहि ॥ गुरमुखि एको बुझिआ एकसु माहि समाइ ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तिचरु = उतना चिर, तब तक। दुहु माहि = मेरे तेर में। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख रहने वाला मनुष्य।7।
अर्थ: हे भाई! मनुष्य उतनी देर ही किसी को अच्छा या बुरा कहता है जब तक वह खुद मेर-तेर में रहता है। जो मनुष्य गुरु के राह पर चलता है, वह (हर जगह) एक प्रभु को ही (बसता) समझता है, वह एक परमात्मा में लीन रहता है।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सेवा सा प्रभ भावसी जो प्रभु पाए थाइ ॥ जन नानक हरि आराधिआ गुर चरणी चितु लाइ ॥८॥२॥४॥९॥

मूलम्

सेवा सा प्रभ भावसी जो प्रभु पाए थाइ ॥ जन नानक हरि आराधिआ गुर चरणी चितु लाइ ॥८॥२॥४॥९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभ भावसी = (जो) प्रभु को अच्छी लगे। पाए थाइ = थाय पाए, स्वीकार करता है। चरणी = चरणों में।8।
अर्थ: हे भाई! वही सेवा-भक्ति प्रभु को पसंद आती है, जो प्रभु स्वीकार करता है। हे दास नानक! गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य गुरु के चरणों में चिक्त जोड़ के परमात्मा की आराधना करते हैं।8।2।4।9।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही असटपदीआ महला ४ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही असटपदीआ महला ४ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

कोई आणि मिलावै मेरा प्रीतमु पिआरा हउ तिसु पहि आपु वेचाई ॥१॥

मूलम्

कोई आणि मिलावै मेरा प्रीतमु पिआरा हउ तिसु पहि आपु वेचाई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आणि = ला के, आ के। हउ = मैं। पहि = पास, आगे। आपु = अपना आप। वेचाई = बेच दूँ।1।
अर्थ: हे भाई! अगर कोई (सज्जन) मेरा प्रीतम ला के मुझे मिला दे, तो मैं उसके आगे अपना आप बेच दूँ।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दरसनु हरि देखण कै ताई ॥ क्रिपा करहि ता सतिगुरु मेलहि हरि हरि नामु धिआई ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

दरसनु हरि देखण कै ताई ॥ क्रिपा करहि ता सतिगुरु मेलहि हरि हरि नामु धिआई ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कै ताई = वासते। करहि = (अगर) तू करे। मेलहि = तू मिला दे। धिआई = मैं ध्याऊँ।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! अगर तू (मेरे पर) मेहर करे, (मुझे) गुरु मिला दे, तो तेरे दर्शन करने के लिए मैं सदा तेरा नाम स्मरण करता रहूँगा।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जे सुखु देहि त तुझहि अराधी दुखि भी तुझै धिआई ॥२॥

मूलम्

जे सुखु देहि त तुझहि अराधी दुखि भी तुझै धिआई ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे प्रभु! (मेहर कर) अगर तू मुझे सुख दे, तो मैं तुझे ही स्मरण करता रहूँ, दुख में भी मैं तेरी ही आराधना करता रहूँ।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जे भुख देहि त इत ही राजा दुख विचि सूख मनाई ॥३॥

मूलम्

जे भुख देहि त इत ही राजा दुख विचि सूख मनाई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: इत ही = इतु ही, इस (भूख) में ही। राजा = रजां, मैं तृप्त रहूँ, अघाया रहूँ। मनाई = मनाऊँगा।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘इत ही’ में ‘इत’ की ‘ु’ की मात्रा ‘ही’ क्रिया विशेषण के कारण हट गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे प्रभु! अगर तू मुझे भूखा रखे, तो मैं इस भूख में ही तृप्त रहूँगा, दुख में मैं सुख प्रतीत करूँगा (तेरी ये मेहर जरूर हो जाए कि मुझे तेरे दर्शन हो जाएं)।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तनु मनु काटि काटि सभु अरपी विचि अगनी आपु जलाई ॥४॥

मूलम्

तनु मनु काटि काटि सभु अरपी विचि अगनी आपु जलाई ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: काटि = काट के। सभु = सारा। अरपी = अर्पित करूँ, मैं भेटा कर दूँ। आपु = अपना आप।4।
अर्थ: हे प्रभु! (तेरे दर्शन करने की खातिर अगर जरूरत पड़े तो) मैं अपना शरीर अपना मन काट काट के सारा भेटा कर दूँगा, आग में अपने आप को जला (भी) दूँगा।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पखा फेरी पाणी ढोवा जो देवहि सो खाई ॥५॥

मूलम्

पखा फेरी पाणी ढोवा जो देवहि सो खाई ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: फेरी = फेरूँ। ढोवा = ढोऊँ। देवहि = तू देगा। खाई = मैं खाऊँ।5।
अर्थ: हे प्रभु! (तेरे दीदार की खातिर, तेरी संगतों को) मैं पंखा झेलूँगा, पानी ढोऊँगा, जो कुछ तू मुझे (खाने के लिए) देगा वही (खुश हो के) खा लूँगा।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नानकु गरीबु ढहि पइआ दुआरै हरि मेलि लैहु वडिआई ॥६॥

मूलम्

नानकु गरीबु ढहि पइआ दुआरै हरि मेलि लैहु वडिआई ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: वडिआई = उपकार।6।
अर्थ: हे प्रभु! (तेरा दास) गरीब नानक तेरे दर पर आ गिरा है, मुझे अपने चरणों में जोड़ ले, तेरा ये उपकार होगा।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अखी काढि धरी चरणा तलि सभ धरती फिरि मत पाई ॥७॥

मूलम्

अखी काढि धरी चरणा तलि सभ धरती फिरि मत पाई ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अखी = आँखों से। धरी = मैं धर दूँ। तलि = नीचे। फिरि = फिरूँ। मत पाई = शायद (गुरु को) पा लूँ।7।
अर्थ: हे प्रभु! (अगर जरूरत पड़े तो) मैं अपनी आँखें निकाल के (गुरु के) पैरों तले रख दूँ, मैं सारी धरती पर तलाश करूँ कि शायद कहीं गुरु मिल जाए।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जे पासि बहालहि ता तुझहि अराधी जे मारि कढहि भी धिआई ॥८॥

मूलम्

जे पासि बहालहि ता तुझहि अराधी जे मारि कढहि भी धिआई ॥८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कढहि = तू निकाल ले।8।
अर्थ: हे प्रभु! यदि तू मुझे अपने पास बैठा ले, तो तुझे आराधता रहूँ, अगर तू मुझे (धक्के) मार के (अपने दर से) निकाल दे, तो भी मैं तेरा ही ध्यान धरता रहूँगा।8।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जे लोकु सलाहे ता तेरी उपमा जे निंदै त छोडि न जाई ॥९॥

मूलम्

जे लोकु सलाहे ता तेरी उपमा जे निंदै त छोडि न जाई ॥९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: लोकु = जगत। सलाहे = (मेरी) उपमा करे। न जाई = ना जाऊँ।9।
अर्थ: हे प्रभु! अगर जगत मुझे अच्छा कहेगा, तो (दरअसल) ये तेरी ही उपमा होगी, अगर (तेरी महिमा करने के कारण) दुनिया मेरी निंदा करेगी, तो भी मैं (तुझे) छोड़ के नहीं जाऊँगा।9।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जे तुधु वलि रहै ता कोई किहु आखउ तुधु विसरिऐ मरि जाई ॥१०॥

मूलम्

जे तुधु वलि रहै ता कोई किहु आखउ तुधु विसरिऐ मरि जाई ॥१०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तुधु वलि रहै = तेरी तरफ प्रीति बनी रहे। किहु आखउ = बेशक कोई भी कहता रहे। मरि जाइ = मैं आत्मिक मौत मर जाऊँगा।10।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘आखउ’ है हुकमी भविष्य, अन्न पुरख, एकवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे प्रभु! अगर मेरी प्रीति तेरे पास बनी रहे, तो बेशक कोई कुछ भी मुझे कहता फिरे। पर, तुझे भूलते ही, हे प्रभु! मैं आत्मिक मौत मर जाऊँगा।10।

विश्वास-प्रस्तुतिः

वारि वारि जाई गुर ऊपरि पै पैरी संत मनाई ॥११॥

मूलम्

वारि वारि जाई गुर ऊपरि पै पैरी संत मनाई ॥११॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जाई = जाऊँ। पै = पड़ कर। पैरी = पैरों पर। संत मनाई = गुरु को प्रसन्न करूँ।11।
अर्थ: हे प्रभु! (तेरे दर्शनों की खातिर) मैं गुरु पर कुर्बान-कुर्बान जाऊँगा, मैं संत-गुरु के चरणों में पड़ के उसको प्रसन्न करूँगा।11।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नानकु विचारा भइआ दिवाना हरि तउ दरसन कै ताई ॥१२॥

मूलम्

नानकु विचारा भइआ दिवाना हरि तउ दरसन कै ताई ॥१२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दिवाना = कमला। हरि = हे हरि! तउ = तेरे। कै ताई = के वास्ते।12।
अर्थ: हे हरि! तेरे दर्शन करने की खातिर (तेरा दास) बेचारा नानक कमला हुआ फिरता है।12।

विश्वास-प्रस्तुतिः

झखड़ु झागी मीहु वरसै भी गुरु देखण जाई ॥१३॥

मूलम्

झखड़ु झागी मीहु वरसै भी गुरु देखण जाई ॥१३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: झखड़ु = झक्खड़, तेज अंधेरी। झागी = मैं झेलूँ, मैं सहने को तैयार हूँ। जाई = मैं जाऊँ।13।
अर्थ: हे प्रभु! (तेरा मिलाप प्राप्त करने की खातिर) मैं गुरु के दर्शनों के लिए झक्खड़-अंधेरी (अपने सिर पर) झेलने के लिए भी तैयार हूँ, अगर बारिश होने लगे तो भी (बरसती बारिश में ही) मैं गुरु को देखने के लिए जाने को तैयार हूँ।13।

विश्वास-प्रस्तुतिः

समुंदु सागरु होवै बहु खारा गुरसिखु लंघि गुर पहि जाई ॥१४॥

मूलम्

समुंदु सागरु होवै बहु खारा गुरसिखु लंघि गुर पहि जाई ॥१४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सागरु = समुंदर। गुरसिख = गुरु का सिख। लंघि = लांघ के। पहि = पास। जाई = जाता है।14।
अर्थ: हे भाई! खारा समुंदर भी लांघना पड़े तो भी उसको लांघ के गुरु का सिख गुरु के पास पहुँचता है।14।

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विश्वास-प्रस्तुतिः

जिउ प्राणी जल बिनु है मरता तिउ सिखु गुर बिनु मरि जाई ॥१५॥

मूलम्

जिउ प्राणी जल बिनु है मरता तिउ सिखु गुर बिनु मरि जाई ॥१५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जिउ = जैसे। मरि जाई = आत्मिक मौत मर जाता है।15।
अर्थ: जैसे प्राणी पानी के बिना मरने लगता है, वैसे ही सिख गुरु को मिले बिना अपनी आत्मिक मौत आ गई समझता है।15।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जिउ धरती सोभ करे जलु बरसै तिउ सिखु गुर मिलि बिगसाई ॥१६॥

मूलम्

जिउ धरती सोभ करे जलु बरसै तिउ सिखु गुर मिलि बिगसाई ॥१६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सोभ करे = सुंदर दिखने लग पड़ती है। बरसै = बरसता है। बिगसाई = खिल पड़ता है, खुश होता है।16।
अर्थ: जैसे प्राणी पानी के बिना मरने लग जाता है, वैसे ही सिख गुरु को मिले बिना अपनी आत्मिक मौत आ गई समझता है। जैसे जब बारिश होती है तब धरती सुंदर लगने लगती है, वैसे ही सिख को मिल के प्रसन्न होता है।16।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सेवक का होइ सेवकु वरता करि करि बिनउ बुलाई ॥१७॥

मूलम्

सेवक का होइ सेवकु वरता करि करि बिनउ बुलाई ॥१७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: होइ = बन के। वरता = मैं बरतूँ, मैं कार करूँ। बिनउ = विनती। बुलाई = बुलाऊँ।17।
अर्थ: हे भाई! मैं गुरु के सेवक का सेवक बन के उसके काम करने को तैयार हूँ मैं उसको विनतियाँ कर कर के (खुशी से) बुलाऊँगा।17।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नानक की बेनंती हरि पहि गुर मिलि गुर सुखु पाई ॥१८॥

मूलम्

नानक की बेनंती हरि पहि गुर मिलि गुर सुखु पाई ॥१८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुर मिलि = गुरु को मिल के। गुर सुखु = बड़ा सुख, महा आनंद। पाई = प्राप्त करूँ।18।
अर्थ: नानक की परमात्मा के पास विनती है (-हे प्रभु! मुझे गुरु मिला) गुरु को मिल के मुझे बड़ा आनंद प्राप्त होता है।18।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तू आपे गुरु चेला है आपे गुर विचु दे तुझहि धिआई ॥१९॥

मूलम्

तू आपे गुरु चेला है आपे गुर विचु दे तुझहि धिआई ॥१९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आपे = आप ही। विचु दे = के द्वारा। गुर विचु दे = गुरु के द्वारा। धिआई = मैं ध्याता रहूँ।19।
अर्थ: हे प्रभु! तू स्वयं ही गुरु है, तू खुद ही सिख है। मैं गुरु के द्वारा तुझे ही ध्याता हूँ।19।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जो तुधु सेवहि सो तूहै होवहि तुधु सेवक पैज रखाई ॥२०॥

मूलम्

जो तुधु सेवहि सो तूहै होवहि तुधु सेवक पैज रखाई ॥२०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तुधु = तुझे। तू है = तू ही, तेरा ही रूप। होवहि = हो जाते हैं। पैज = इज्जत।20।
अर्थ: हे प्रभु! जो मनुष्य तेरी सेवा-भक्ति करते हैं, वे तेरा ही रूप बन जाते हैं। तू अपने सेवकों की इज्जत (सदा) रखता आया है।20।

विश्वास-प्रस्तुतिः

भंडार भरे भगती हरि तेरे जिसु भावै तिसु देवाई ॥२१॥

मूलम्

भंडार भरे भगती हरि तेरे जिसु भावै तिसु देवाई ॥२१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भंडार = खजाने। हरि = हे हरि! भावै = तेरी रजा होती है।21।
अर्थ: हे हरि! तेरे पास तेरी भक्ति के खजाने भरे पड़े हैं। जिस पर तेरी रजा होती है उसको तू (गुरु के द्वारा ये खजाना) दिलवाता है।21।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जिसु तूं देहि सोई जनु पाए होर निहफल सभ चतुराई ॥२२॥

मूलम्

जिसु तूं देहि सोई जनु पाए होर निहफल सभ चतुराई ॥२२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: निहफल = व्यर्थ। चतुराई = समझदारी।22।
अर्थ: हे प्रभु! (तेरी भक्ति का खजाना प्राप्त करने के लिए) हरेक समझदारी-चतुराई बेकार है। वही मनुष्य (इस खजाने को) हासिल करता है जिसको तू खुद देता है।22।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सिमरि सिमरि सिमरि गुरु अपुना सोइआ मनु जागाई ॥२३॥

मूलम्

सिमरि सिमरि सिमरि गुरु अपुना सोइआ मनु जागाई ॥२३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सिमरि = स्मरण करके। सोइआ = (माया के मोह की नींद में) सोया हुआ। जागाई = मैं जगाता हूँ।23।
अर्थ: हे प्रभु! (तेरी मेहर से) मैं अपने गुरु को बार-बार याद करके (माया के मोह की नींद में) सोए हुए अपने मन को जगाता रहता हूँ।23।

विश्वास-प्रस्तुतिः

इकु दानु मंगै नानकु वेचारा हरि दासनि दासु कराई ॥२४॥

मूलम्

इकु दानु मंगै नानकु वेचारा हरि दासनि दासु कराई ॥२४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मंगै नानकु = नानक माँगता है। दासनि दासु = दासों का दास। कराई = कराय, बना दे।24।
अर्थ: हे प्रभु! (तेरे दर से तेरा) गरीब (दास) नानक एक दान माँगता है: (मेहर कर) मुझे अपने दासों का दास बनाए रख।24।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जे गुरु झिड़के त मीठा लागै जे बखसे त गुर वडिआई ॥२५॥

मूलम्

जे गुरु झिड़के त मीठा लागै जे बखसे त गुर वडिआई ॥२५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: वडिआई = उपकार। झिड़के = फटकार लगाए।25।
अर्थ: अगर गुरु (मुझे मेरी किसी भूल के कारण) फटकार दे, तो उसकी वह झिड़क मुझे प्यारी लगती है। अगर गुरु मेरे पर मेहर की निगाह करता है, तो ये गुरु का उपकार है (मुझ में कोई कोई गुण नहीं)।25।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरमुखि बोलहि सो थाइ पाए मनमुखि किछु थाइ न पाई ॥२६॥

मूलम्

गुरमुखि बोलहि सो थाइ पाए मनमुखि किछु थाइ न पाई ॥२६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य। थाइ पाए = स्वीकार करता है। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य।26।
अर्थ: गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य जो वचन बोलते हैं, गुरु उन्हें स्वीकार करता है। अपने मन के पीछे चलने वालों का बोला हुआ स्वीकार नहीं होता।26।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पाला ककरु वरफ वरसै गुरसिखु गुर देखण जाई ॥२७॥

मूलम्

पाला ककरु वरफ वरसै गुरसिखु गुर देखण जाई ॥२७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जाई = जाता है।27।
अर्थ: पाला पड़े, कक्कर पड़े, बर्फ पड़े, फिर भी गुरु का सिख गुरु के दर्शन करने जाता है।27।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सभु दिनसु रैणि देखउ गुरु अपुना विचि अखी गुर पैर धराई ॥२८॥

मूलम्

सभु दिनसु रैणि देखउ गुरु अपुना विचि अखी गुर पैर धराई ॥२८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रैणि = रात। देखउ = देखूँ। विचि अखी = आँखों में। धराई = बसाए रखूँ।28।
अर्थ: मैं भी दिन-रात हर वक्त अपने गुरु के दर्शन करता रहता हूँ। गुरु के चरणों को अपनी आँखों में बसाए रखता हूँ।28।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनेक उपाव करी गुर कारणि गुर भावै सो थाइ पाई ॥२९॥

मूलम्

अनेक उपाव करी गुर कारणि गुर भावै सो थाइ पाई ॥२९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: उपाव = उद्यम, कोशिशें, प्रयत्न; उपाय। करी = करूँ। गुर भावै = गुरु को अच्छा लगे।29।
अर्थ: अगर मैं गुरु (को प्रसन्न करने) के लिए अनेक ही यत्न करता रहूँ वही प्रयत्न स्वीकार होता है, जो गुरु को पसंद आता है।29।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रैणि दिनसु गुर चरण अराधी दइआ करहु मेरे साई ॥३०॥

मूलम्

रैणि दिनसु गुर चरण अराधी दइआ करहु मेरे साई ॥३०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आराधी = मैं आराधूँ। साई = हे सांई!।30।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘उपाव’ है ‘उपाउ’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे मेरे पति-प्रभु! (मेरे पर) मेहर कर, मैं दिन-रात हर वक्त गुरु के चरणों का ध्यान धरता रहूँ।30।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नानक का जीउ पिंडु गुरू है गुर मिलि त्रिपति अघाई ॥३१॥

मूलम्

नानक का जीउ पिंडु गुरू है गुर मिलि त्रिपति अघाई ॥३१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जीउ = जिंद। पिंडु = शरीर। गुर मिलि = गुरु को मिल के। त्रिपति = तृप्ति हो जाती है। अघाई = मैं अघा जाता हूँ।31।
अर्थ: नानक की जिंद गुरु के हवाले है, नानक का शरीर गुरु के चरणों में है। गुरु को मिल के मैं तृप्त हो जाता हूँ, अघा जाता हूँ (माया की भूख नहीं रह जाती)।31।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नानक का प्रभु पूरि रहिओ है जत कत तत गोसाई ॥३२॥१॥

मूलम्

नानक का प्रभु पूरि रहिओ है जत कत तत गोसाई ॥३२॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पूरि रहिओ है = व्यापक है। जत = जहाँ। कत = कहाँ। तत = वहाँ। जत कत तत = हर जगह।32।
अर्थ: (गुरु की कृपा से ये समझ आती है कि) नानक का प्रभु सब सृष्टि का पति हर जगह व्यापक हो रहा है।32।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला ४ असटपदीआ घरु १० ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला ४ असटपदीआ घरु १० ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अंदरि सचा नेहु लाइआ प्रीतम आपणै ॥ तनु मनु होइ निहालु जा गुरु देखा साम्हणे ॥१॥

मूलम्

अंदरि सचा नेहु लाइआ प्रीतम आपणै ॥ तनु मनु होइ निहालु जा गुरु देखा साम्हणे ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंदरि = (मेरे) हृदय में। सचा नेहु = सदा कायम रहने वाला प्यार। प्रीतम आपणै = अपने प्रीतम प्रभु का। निहालु = प्रसन्न। जा = जब। देखा = देखूँ।1।
अर्थ: हे भाई! (गुरु ने) अपने प्यारे प्रभु का सदा कामय रहने वाला प्यार मेरे दिल में पैदा कर दिया है, (तभी तो) जब मैं गुरु को अपने सामने देखता हूँ, तो मेरा तन मेरा मन खिल उठता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मै हरि हरि नामु विसाहु ॥ गुर पूरे ते पाइआ अम्रितु अगम अथाहु ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मै हरि हरि नामु विसाहु ॥ गुर पूरे ते पाइआ अम्रितु अगम अथाहु ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: विसाहु = संपत्ति। ते = से। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला। अगम = अगम्य (पहुँच से परे)। अथाह = बहुत गहरा।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! पूरे गुरु से मैंने उस परमात्मा की वह नाम संपत्ति प्राप्त कर ली है जो आत्मिक जीवन देने वाला है, जो (गुरु के बिना) अगम्य (पहुँच से परे) है, जो बड़े गहरे दिल वाला है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हउ सतिगुरु वेखि विगसीआ हरि नामे लगा पिआरु ॥ किरपा करि कै मेलिअनु पाइआ मोख दुआरु ॥२॥

मूलम्

हउ सतिगुरु वेखि विगसीआ हरि नामे लगा पिआरु ॥ किरपा करि कै मेलिअनु पाइआ मोख दुआरु ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हउ = मैं। वेखि = देख के। विगसिआ = खिल गई हूँ। नामे = नाम में। मेलिअनु = मिला लिए हैं। मोख दुआरु = मुक्ति का दरवाजा।2।
अर्थ: हे भाई! गुरु को देख के मेरी जिंद खिल उठती है, (गुरु की कृपा) परमात्मा के नाम में मेरा प्यार बन गया है। (जिन्हें गुरु ने) मेहर करके (परमात्मा के चरणों से) जोड़ दिया है, उन्होंने (दुनिया के मोह से) खलासी का रास्ता पा लिया।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सतिगुरु बिरही नाम का जे मिलै त तनु मनु देउ ॥ जे पूरबि होवै लिखिआ ता अम्रितु सहजि पीएउ ॥३॥

मूलम्

सतिगुरु बिरही नाम का जे मिलै त तनु मनु देउ ॥ जे पूरबि होवै लिखिआ ता अम्रितु सहजि पीएउ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बिरही = प्रेमी। त = तो। देउ = मैं दे दूँ। पूरबि = पहले जन्म में। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल। सहजि = आत्मिक अडोलता में। पीएउ = पीऊँ।3।
अर्थ: हे भाई! गुरु परमात्मा के नाम का प्रेमी है, अगर मुझे गुरु मिल जाए तो मैं अपना तन अपना मन उसके आगे भेटा रख दूँ। अगर पूर्बले समय में (गुरु के मिलाप के लेख मेरे माथे पर) लिखें हों, तब ही (गुरु से ले के) मैं आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल आत्मिक अडोलता में पी सकता हूँ।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुतिआ गुरु सालाहीऐ उठदिआ भी गुरु आलाउ ॥ कोई ऐसा गुरमुखि जे मिलै हउ ता के धोवा पाउ ॥४॥

मूलम्

सुतिआ गुरु सालाहीऐ उठदिआ भी गुरु आलाउ ॥ कोई ऐसा गुरमुखि जे मिलै हउ ता के धोवा पाउ ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आलाउ = मैं उच्चारूँ। ता के = उस के। पाउ = पैर।4।
अर्थ: हे भाई! सोए हुए भी गुरु की महिमा करनी चाहिए, उठते समय पर भी मैं गुरु का नाम उचारूँ - अगर ऐसी मति देने वाले गुरु के सन्मुख रहने वाला कोई सज्जन मुझे मिल जाए, तो मैं उसके पैर धोऊँ।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कोई ऐसा सजणु लोड़ि लहु मै प्रीतमु देइ मिलाइ ॥ सतिगुरि मिलिऐ हरि पाइआ मिलिआ सहजि सुभाइ ॥५॥

मूलम्

कोई ऐसा सजणु लोड़ि लहु मै प्रीतमु देइ मिलाइ ॥ सतिगुरि मिलिऐ हरि पाइआ मिलिआ सहजि सुभाइ ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: लोड़ि लहु = ढूँढ लो। मै = मुझे। सतिगुरि मिलिऐ = अगर गुरु मिल जाए। सुभाइ = प्यार रंग में।5।
अर्थ: हे भाई! मुझे कोई ऐसा सज्जन ढूँढ दो, जो मुझे प्रीतम-गुरु से मिला दे। गुरु के मिलने से ही परमात्मा (का मिलाप) हासिल होता है। (जिसको गुरु मिल जाता है, उसको) परमात्मा आत्मिक अडोलता में प्यार-रंग में मिल जाता है।5।

[[0759]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सतिगुरु सागरु गुण नाम का मै तिसु देखण का चाउ ॥ हउ तिसु बिनु घड़ी न जीवऊ बिनु देखे मरि जाउ ॥६॥

मूलम्

सतिगुरु सागरु गुण नाम का मै तिसु देखण का चाउ ॥ हउ तिसु बिनु घड़ी न जीवऊ बिनु देखे मरि जाउ ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सागरू = समुंदर। तिसु = उस (गुरु) को। हउ = मैं। न जीवऊ = (आत्मिक जीवन) जी नहीं सकता। मरि जाउ = मर जाऊँ, मेरी आत्मा की मौत हो जाती है।6।
अर्थ: हे भाई! गुरु गुणों का समुंदर है, परमात्मा के नाम का समुंदर है। उस गुरु के दर्शन की मुझे चाहत लगी हुई है। मैं उस गुरु के बिना एक घड़ी भर के लिए भी आत्मिक जीवन कायम नहीं रख सकता। गुरु के दर्शन किए बिना मेरी आत्मिक मौत हो जाती है।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जिउ मछुली विणु पाणीऐ रहै न कितै उपाइ ॥ तिउ हरि बिनु संतु न जीवई बिनु हरि नामै मरि जाइ ॥७॥

मूलम्

जिउ मछुली विणु पाणीऐ रहै न कितै उपाइ ॥ तिउ हरि बिनु संतु न जीवई बिनु हरि नामै मरि जाइ ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कितै उपाइ = किसी भी प्रयत्न से। न जीवई = न जीए, आत्मिक जीवन कायम नहीं रख सकता।7।
अर्थ: हे भाई! जैसे मछली पानी के बिना और किसी भी यत्न से जीवित नहीं रह सकती, वैसे ही परमात्मा के बिना संत भी जीवित नहीं रह सकता। परमात्मा के नाम के बिना वह अपनी आत्मिक मौत समझता है।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मै सतिगुर सेती पिरहड़ी किउ गुर बिनु जीवा माउ ॥ मै गुरबाणी आधारु है गुरबाणी लागिरहाउ ॥८॥

मूलम्

मै सतिगुर सेती पिरहड़ी किउ गुर बिनु जीवा माउ ॥ मै गुरबाणी आधारु है गुरबाणी लागिरहाउ ॥८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सेती = साथ। पिरहड़ी = प्यार। किउ जीवा = कैसे जीऊँ? कैसे जी सकता हूँ? माउ = हे माँ! आधारु = आसरा। लागि रहाउ = लग के टिक सकता हूँ।8।
अर्थ: हे माँ! मेरा अपने गुरु के साथ गहरा प्यार है। गुरु के बिना मैं कैसे जी सकता हूँ? गुरु की वाणी में जुड़ के ही मैं रह सकता हूँ।8।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि हरि नामु रतंनु है गुरु तुठा देवै माइ ॥ मै धर सचे नाम की हरि नामि रहा लिव लाइ ॥९॥

मूलम्

हरि हरि नामु रतंनु है गुरु तुठा देवै माइ ॥ मै धर सचे नाम की हरि नामि रहा लिव लाइ ॥९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तुठा = प्रसन्न। माइ = हे माँ! धर = आसरा। नामि = नाम में। लिव लाइ = तवज्जो/ध्यान जोड़ के। रहा = रह सकता हूँ।9।
अर्थ: हे माँ! परमात्मा का नाम रत्न (जैसा कीमती पर्दाथ) है। गुरु (जिस पर) प्रसन्न (होता है, उसको ये रत्न) देता है। सदा-स्थिर रहने वाले प्रभु का नाम ही मेरा आसरा बन चुका है। प्रभु के नाम में तवज्जो जोड़ के ही मैं रह सकता हूँ।9।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुर गिआनु पदारथु नामु है हरि नामो देइ द्रिड़ाइ ॥ जिसु परापति सो लहै गुर चरणी लागै आइ ॥१०॥

मूलम्

गुर गिआनु पदारथु नामु है हरि नामो देइ द्रिड़ाइ ॥ जिसु परापति सो लहै गुर चरणी लागै आइ ॥१०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुर बिआनु = गुरु की दी हुई आत्मिक जीवन की सूझ। पदारथु = कीमती चीज। नामो = नाम ही। देइ द्रिढ़ाइ = हृदय में पक्का कर देता है। लहै = हासिल करता है। आइ = आ के।10।
अर्थ: हे भाई! गुरु की दी हुई आत्मिक जीवन की सूझ एक कीमती चीज है। गुरु का दिया हुआ हरि नाम कीमती पदार्थ है। जिस मनुष्य के भाग्यों में इसकी प्राप्ति लिखी है, वह मनुष्य गुरु के चरणों में आ लगता है, और ये पदार्थ हासिल कर लेता है।10।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अकथ कहाणी प्रेम की को प्रीतमु आखै आइ ॥ तिसु देवा मनु आपणा निवि निवि लागा पाइ ॥११॥

मूलम्

अकथ कहाणी प्रेम की को प्रीतमु आखै आइ ॥ तिसु देवा मनु आपणा निवि निवि लागा पाइ ॥११॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अकथ = जो बयान ना की जा सके। को प्रीतमु = (अगर) कोई प्यारा सज्जन। आइ = आ के। देवा = दूँ। निवि = झुक के। लागा = लगूँ। पाइ = पैरों पर।11।
अर्थ: हे भाई! प्रभु के प्रेम की कहानी हर कोई बयान नहीं कर सकता। जो कोई प्यारा सज्ज्न मुझे आ के ये कहानी सुनाए, तो मैं अपना मन उसके हवाले कर दूँ, झुक-झुक के उसके पैरों पर गिर पड़ूँ।11।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सजणु मेरा एकु तूं करता पुरखु सुजाणु ॥ सतिगुरि मीति मिलाइआ मै सदा सदा तेरा ताणु ॥१२॥

मूलम्

सजणु मेरा एकु तूं करता पुरखु सुजाणु ॥ सतिगुरि मीति मिलाइआ मै सदा सदा तेरा ताणु ॥१२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: एक तूं = सिर्फ तू ही। सुजाणु = समझदार। सतिगुरि = गुरु ने। मीति = मित्र ने। ताणु = आसरा।12।
अर्थ: हे प्रभु! सिर्फ तू ही मेरा (असल) सज्जन है। तू सबको पैदा करने वाला है। सबमें व्यापक है, सबकी जानने वाला हैं। मित्र गुरु ने मुझे तेरे साथ मिला दिया है। मुझे सदा ही तेरा सहारा है।12।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सतिगुरु मेरा सदा सदा ना आवै ना जाइ ॥ ओहु अबिनासी पुरखु है सभ महि रहिआ समाइ ॥१३॥

मूलम्

सतिगुरु मेरा सदा सदा ना आवै ना जाइ ॥ ओहु अबिनासी पुरखु है सभ महि रहिआ समाइ ॥१३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आवै = पैदा होता है। जाइ = मरता। अबिनासी = नाश रहित।13।
अर्थ: हे भाई! प्यारा गुरु (बताता है कि) परमात्मा सदा ही कायम रहने वाला है। वह ना मरता है न पैदा होता है। वह पुरुख-प्रभु कभी नाश होने वाला नहीं, वह सबमें मौजूद है।13।

विश्वास-प्रस्तुतिः

राम नाम धनु संचिआ साबतु पूंजी रासि ॥ नानक दरगह मंनिआ गुर पूरे साबासि ॥१४॥१॥२॥११॥

मूलम्

राम नाम धनु संचिआ साबतु पूंजी रासि ॥ नानक दरगह मंनिआ गुर पूरे साबासि ॥१४॥१॥२॥११॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: संचिआ = इकट्ठा किया। साबतु = कभी ना कम होने वाली। मंनिआ = मत्कारा जाता है। साबासि = शाबाश।14।
अर्थ: हे नानक! (कह: हे भाई!) जिस मनुष्य की पूरे गुरु ने पीठ थप-थपा दी उसने परमात्मा का नाम-धन इकट्ठा कर लिया, उसकी ये राशि-पूंजी सदा अनन्त रहती है, और उसको प्रभु की दरगाह में सत्कार प्राप्त होता है।14।1।2।11।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही असटपदीआ महला ५ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही असटपदीआ महला ५ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

उरझि रहिओ बिखिआ कै संगा ॥ मनहि बिआपत अनिक तरंगा ॥१॥

मूलम्

उरझि रहिओ बिखिआ कै संगा ॥ मनहि बिआपत अनिक तरंगा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: उरझि रहिओ = उलझा हुआ है, फसा पड़ा है। बिखिआ = माया (का मोह)। कै संगा = के साथ। मनहि = मन पर। बिआपत = जोर डाला हुआ है। तरंगा = लहरें।1।
अर्थ: मनुष्य माया की संगति में फंसा रहता है, मनुष्य के मन को (लोभ की) अनेक लहरें दबाए रखती हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरे मन अगम अगोचर ॥ कत पाईऐ पूरन परमेसर ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

मेरे मन अगम अगोचर ॥ कत पाईऐ पूरन परमेसर ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मन = हे मन! अगम = अगम्य (पहुँच से परे) प्रभु। अगोचर = (अ+गो+चर। गो = ज्ञान-इंद्रिय) जिस तक ज्ञानेन्द्रियाँ नहीं पहुँच सकती। कत = कैसे?।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! वह पूर्ण परमात्मा कैसे मिले? मनुष्य की बुद्धि से वह परे है, ज्ञान-इंद्रिय की सहायता से भी उस तक पहुँचा नहीं जा सकता।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मोह मगन महि रहिआ बिआपे ॥ अति त्रिसना कबहू नही ध्रापे ॥२॥

मूलम्

मोह मगन महि रहिआ बिआपे ॥ अति त्रिसना कबहू नही ध्रापे ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मगन = मस्ती। बिआपे = फसा हुआ। अति = बहुत। ध्रापे = तृप्त हो जाता, अघा जाता।2।
अर्थ: (मनुष्य का मन) मोह की मगनता में दबा रहता है (हर वक्त इसे माया की) बहुत सारी तृष्णा बनी रहती है, किसी भी वक्त (किसी भी तरह से) (इसका मन) तृप्त नहीं होता।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बसइ करोधु सरीरि चंडारा ॥ अगिआनि न सूझै महा गुबारा ॥३॥

मूलम्

बसइ करोधु सरीरि चंडारा ॥ अगिआनि न सूझै महा गुबारा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बसइ = बसै, बसता है। सरीरि = शरीर में। चंडारा = चंडाल। अगिआनि = अज्ञान के कारण, आत्मिक जीवन से बेसमझी के कारण। गुबारा = अंधेरा।3।
अर्थ: मनुष्य के शरीर में चांडाल क्रोध बसता है। आत्मिक जीवन से बेसमझी के कारण (इसकी जीवन-यात्रा में) बहुत अंधकार बना रहता है (जिसके कारण इसे सही जीवन-राह) नहीं सूझता (दिखाई देता)।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

भ्रमत बिआपत जरे किवारा ॥ जाणु न पाईऐ प्रभ दरबारा ॥४॥

मूलम्

भ्रमत बिआपत जरे किवारा ॥ जाणु न पाईऐ प्रभ दरबारा ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भ्रमत = भटकना। बिआपत = माया का जोर। जरे = बंद किए। किवारा = किवाड़, भिक्ति। जाणु न पाईऐ = पहुँच नहीं सकते।4।
अर्थ: भटकना और माया का दबाव- (हर वक्त) ये दो किवाड़ बँद रहते हैं, इसलिए मनुष्य परमात्मा के दरबार में नहीं पहुँच सकता।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

आसा अंदेसा बंधि पराना ॥ महलु न पावै फिरत बिगाना ॥५॥

मूलम्

आसा अंदेसा बंधि पराना ॥ महलु न पावै फिरत बिगाना ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंदेसा = चिन्ता। बंधि = बंधन में। महलु = प्रभु की हजूरी। बिगाना = बेगाना।5।
अर्थ: मनुष्य हर वक्त माया की आसा और चिन्ता-फिक्र के बंधन में पड़ा रहता है, प्रभु की हजूरी प्राप्त नहीं कर सकता, परदेसियों की तरह (राहों से बेराह हुआ) भटकता फिरता है।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सगल बिआधि कै वसि करि दीना ॥ फिरत पिआस जिउ जल बिनु मीना ॥६॥

मूलम्

सगल बिआधि कै वसि करि दीना ॥ फिरत पिआस जिउ जल बिनु मीना ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बिआधि = मानसिक रोग। कै वसि = के काबू में। मीना = मछली।6।
अर्थ: हे भाई! मनुष्य सारी ही बिमारियों के वश में आया रहता है, जैसे पानी के बिना मछली तड़फती है, वैसे ही ये तृष्णा का मारा हुआ भटकता है।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कछू सिआनप उकति न मोरी ॥ एक आस ठाकुर प्रभ तोरी ॥७॥

मूलम्

कछू सिआनप उकति न मोरी ॥ एक आस ठाकुर प्रभ तोरी ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: उकति = दलील, विचार। मोरी = मेरी। ठाकुर = हे ठाकुर! तेरी = तेरी।7।
अर्थ: हे प्रभु! (इन सारे विकारों के मुकाबले) मेरी कोई चतुराई कोई विकार चल नहीं सकते। हे मेरे मालिक! सिर्फ तेरी (सहायता की ही) आशा है (कि तू बचा ले)।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

करउ बेनती संतन पासे ॥ मेलि लैहु नानक अरदासे ॥८॥

मूलम्

करउ बेनती संतन पासे ॥ मेलि लैहु नानक अरदासे ॥८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: करउ = मैं करता हूँ। अरदासे = आरजू।8।
अर्थ: हे प्रभु! मैं तेरे संत-जनों के आगे विनती करता हूँ, आरजू करता हूँ कि मुझ नानक को (अपने चरणों में) मिलाए रखे।8।

विश्वास-प्रस्तुतिः

भइओ क्रिपालु साधसंगु पाइआ ॥ नानक त्रिपते पूरा पाइआ ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१॥

मूलम्

भइओ क्रिपालु साधसंगु पाइआ ॥ नानक त्रिपते पूरा पाइआ ॥१॥ रहाउ दूजा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साध संगु = गुरु की संगति। त्रिपते = तृप्त हुए, अघा गए।1। रहाउ दूजा।
अर्थ: हे नानक! (कह:) जिस मनुष्यों पर परमात्मा दयावान होता है, उनको गुरु की संगति प्राप्त होती है, वह (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाते हैं, और, उन्हें पूरन प्रभु मिल जाता है।1। रहाउ दूजा।

[[0760]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला ५ घरु ३ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला ५ घरु ३ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मिथन मोह अगनि सोक सागर ॥ करि किरपा उधरु हरि नागर ॥१॥

मूलम्

मिथन मोह अगनि सोक सागर ॥ करि किरपा उधरु हरि नागर ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मिथन = नाशवान। अगनि = (तृष्णा की) आग। सोक = शोक, चिन्ता। सागर = समुंदर। करि = कर के। उधरु = बचा ले। हरि नागर = हे सुंदर हरि!।1।
अर्थ: हे सुंदर हरि! नाशवान पदार्थों का मोह, तृष्णा की आग, चिन्ता के समुंदर में से कृपा करके (हमें) बचा ले।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

चरण कमल सरणाइ नराइण ॥ दीना नाथ भगत पराइण ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

चरण कमल सरणाइ नराइण ॥ दीना नाथ भगत पराइण ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नराइण = हे नारायण! पराइण = आसरा।1। रहाउ।
अर्थ: हे गरीबों के पति! हे भक्तों के आसरे! हे नारायण! (हम जीव) तेरे सुंदर चरणों की शरण में आए हैं (हमें विकारों से बचाए रख)।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनाथा नाथ भगत भै मेटन ॥ साधसंगि जमदूत न भेटन ॥२॥

मूलम्

अनाथा नाथ भगत भै मेटन ॥ साधसंगि जमदूत न भेटन ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भै = सारे डर। साधसंगि = संगति में। भेटन = नजदीक छूता।2।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘भै’ है ‘भउ’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे निआसरों के आसरे! हे भक्तों के सारे डर दूर करने वाले! (मुझे गुरु की संगति बख्श), गुरु की संगति में रहने से जमदूत (भी) नजदीक नहीं फटकते (मौत का डर नहीं व्यापता)।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जीवन रूप अनूप दइआला ॥ रवण गुणा कटीऐ जम जाला ॥३॥

मूलम्

जीवन रूप अनूप दइआला ॥ रवण गुणा कटीऐ जम जाला ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अनूप = अद्वितीय। रवण = स्मरण।3।
अर्थ: हे जिंदगी के श्रोत! हे अद्वितीय प्रभु! हे दया के घर! (अपनी महिमा बख्श), तेरे गुणों को याद करने से मौत के जंजाल कट जाते हैं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अम्रित नामु रसन नित जापै ॥ रोग रूप माइआ न बिआपै ॥४॥

मूलम्

अम्रित नामु रसन नित जापै ॥ रोग रूप माइआ न बिआपै ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाला। रसन = जीभ (से)। न बिआपै = जोर नहीं डाल सकती।4।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य अपनी जीभ से सदा आत्मि्क जीवन देने वाला हरि-नाम जपता है, उस पर ये माया जोर नहीं डाल सकती, जो सारे रोगों का मूल है।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जपि गोबिंद संगी सभि तारे ॥ पोहत नाही पंच बटवारे ॥५॥

मूलम्

जपि गोबिंद संगी सभि तारे ॥ पोहत नाही पंच बटवारे ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: संगी = साथी। सभि = सारे। पंच = पाँच। बटवारे = लुटेरे, डाकू।5।
अर्थ: हे भाई! सदा परमात्मा का नाम जपा कर (जो जपता है) वह (अपने) सारे साथियों को (संसार-समुंदर से) पार लंघा लेता है पाँचों लुटेरे उस पर दबाव नहीं डाल सकते।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मन बच क्रम प्रभु एकु धिआए ॥ सरब फला सोई जनु पाए ॥६॥

मूलम्

मन बच क्रम प्रभु एकु धिआए ॥ सरब फला सोई जनु पाए ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बच = वचन। क्रम = कर्म। धिआए = ध्याता है।6।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य अपने मन से, कर्मों से एक परमात्मा का ध्यान धरे रखता है, वह मनुष्य (मानव जन्म के) सारे फल हासिल कर लेता है।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

धारि अनुग्रहु अपना प्रभि कीना ॥ केवल नामु भगति रसु दीना ॥७॥

मूलम्

धारि अनुग्रहु अपना प्रभि कीना ॥ केवल नामु भगति रसु दीना ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: धारि = धारण करके। अनुग्रहु = कृपा। प्रभि = प्रभु ने। रसु = स्वाद।7।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा ने कृपा करके जिस मनुष्य को अपना बना लिया, उसको उसने अपना नाम बख्शा, उसको अपनी भक्ति का स्वाद दिया।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

आदि मधि अंति प्रभु सोई ॥ नानक तिसु बिनु अवरु न कोई ॥८॥१॥२॥

मूलम्

आदि मधि अंति प्रभु सोई ॥ नानक तिसु बिनु अवरु न कोई ॥८॥१॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आदि मधि अंति = सदा ही। आदि = जगत के आरम्भ में। मधि = बीच के समय। अंति = आखिर में।8।
अर्थ: हे नानक! वह परमात्मा ही जगत के आरम्भ से है, अब भी है, जगत के आखिर में भी रहेगा। उसके बिना (उसके जैसा) और कोई नहीं है।8।1।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला ५ असटपदीआ घरु ९ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला ५ असटपदीआ घरु ९ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

जिन डिठिआ मनु रहसीऐ किउ पाईऐ तिन्ह संगु जीउ ॥ संत सजन मन मित्र से लाइनि प्रभ सिउ रंगु जीउ ॥ तिन्ह सिउ प्रीति न तुटई कबहु न होवै भंगु जीउ ॥१॥

मूलम्

जिन डिठिआ मनु रहसीऐ किउ पाईऐ तिन्ह संगु जीउ ॥ संत सजन मन मित्र से लाइनि प्रभ सिउ रंगु जीउ ॥ तिन्ह सिउ प्रीति न तुटई कबहु न होवै भंगु जीउ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रहसीऐ = खिल उठता है। किउ = कैसे? किस प्रकार? संगु = साथ। सजन = गुरमुख। मन मित्र = मन के मेली, असली मित्र। से = वह (बहुवचन)। लाइनि = लगाते हैं। रंगु = प्यार। सिउ = साथ। तुटई = टूटता है। भंगु = टूटना।1।
अर्थ: हे प्रभु! उन गुरमुखों का साथ कैसे प्राप्त हो, जिनके दर्शन करने से मन खिल उठता है? हे भाई! वही मनुष्य (मेरे वास्ते) सज्जन हैं, संत हैं, मेरे असली मेली हैं, जो परमात्मा के सथ मेरा प्यार जोड़ दें। हे प्रभु! (मेहर कर) उनके साथ मेरा प्यार ना टूटे, उनसे मेरे संबंध कभी खत्म ना हों।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पारब्रहम प्रभ करि दइआ गुण गावा तेरे नित जीउ ॥ आइ मिलहु संत सजणा नामु जपह मन मित जीउ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

पारब्रहम प्रभ करि दइआ गुण गावा तेरे नित जीउ ॥ आइ मिलहु संत सजणा नामु जपह मन मित जीउ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पारब्रहम प्रभ = हे पारब्रहम! हे प्रभु! गावा = मैं गाऊँ। जपह = हम जपें।1। रहाउ।
अर्थ: हे पारब्रहम! हे प्रभु! (मेरे मित्र) मेहर कर, मैं सदा तेरे गुण गाता रहूँ। हे संत जनो! हे सज्जनो! हे मेरे मन के मेलियो! आ के मिलो (इकट्ठे बैठें, और) परमात्मा का नाम जपें।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

देखै सुणे न जाणई माइआ मोहिआ अंधु जीउ ॥ काची देहा विणसणी कूड़ु कमावै धंधु जीउ ॥ नामु धिआवहि से जिणि चले गुर पूरे सनबंधु जीउ ॥२॥

मूलम्

देखै सुणे न जाणई माइआ मोहिआ अंधु जीउ ॥ काची देहा विणसणी कूड़ु कमावै धंधु जीउ ॥ नामु धिआवहि से जिणि चले गुर पूरे सनबंधु जीउ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: देखै सुणे न जाणई = ना देखे, ना सुने, ना जाने। मोहिआ = मोह में फसा हुआ। अंधु = अंधा। काची = कच्चे घड़े जैसी। विणसणी = नाशवान। कूड़ धंधु = झूठा धंधा। धिआवहि = ध्याते हैं। जिणि = जीत के (शब्द ‘जिनि’ और ‘जिणि’ में फर्क याद रखें)। सनबंधु = मिलाप।2।
अर्थ: हे भाई! माया के मोह में फसा हुआ मनुष्य (आत्मिक जीवन की ओर से) अंधा हो जाता है, वह (अस्लियत को) ना देख सकता है, ना सुन सकता है, ना ही समझ सकता है। (उसे ये नहीं सूझता कि) कच्चे घड़े जैसा ये शरीर नाश होने वाला है, वह हर वक्त नाशवान पदार्थों की खातिर ही दौड़-भाग करता रहता है। हे भाई! जो मनुष्य पूरे गुरु का मिलाप (हासिल करके) परमात्मा का नाम जपते हैं, वह (मानव जनम की बाजी) जीत के यहाँ से जाते हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हुकमे जुग महि आइआ चलणु हुकमि संजोगि जीउ ॥ हुकमे परपंचु पसरिआ हुकमि करे रस भोग जीउ ॥ जिस नो करता विसरै तिसहि विछोड़ा सोगु जीउ ॥३॥

मूलम्

हुकमे जुग महि आइआ चलणु हुकमि संजोगि जीउ ॥ हुकमे परपंचु पसरिआ हुकमि करे रस भोग जीउ ॥ जिस नो करता विसरै तिसहि विछोड़ा सोगु जीउ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हुकमे = हुकमि ही, प्रभु के हुक्म अनुसार ही। जुग = जगत। चलणु = कूच। संजोगि = कारणों के संजोग से। परपंचु = जगत रचना। रस भोग = रसों के भोग। सोगु = चिन्ता।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘तिसहि’ में से ‘तिसु’ की ‘सु’ की ‘ु’ मात्रा ‘ही’ क्रिया विशेषण के कारण हट गई है।
नोट: ‘जिस नो’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! परमात्मा के हुक्म अनुसार ही (जीव) जगत में आता है, हुक्म के अनुसार ही संयोग बनने पर (जीव यहाँ से) कूच कर जाता है। प्रभु की रजा में जगत-पसारा पसरा है, रजा में ही जीव यहाँ रसों के भोग भोगता है। (इन रसों में फंस के) जिस मनुष्य को कर्तार भूल जाता है, ये विछोड़ा उसके अंदर चिन्ता-फिक्र डाले रखता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

आपनड़े प्रभ भाणिआ दरगह पैधा जाइ जीउ ॥ ऐथै सुखु मुखु उजला इको नामु धिआइ जीउ ॥ आदरु दिता पारब्रहमि गुरु सेविआ सत भाइ जीउ ॥४॥

मूलम्

आपनड़े प्रभ भाणिआ दरगह पैधा जाइ जीउ ॥ ऐथै सुखु मुखु उजला इको नामु धिआइ जीउ ॥ आदरु दिता पारब्रहमि गुरु सेविआ सत भाइ जीउ ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभ भाणिआ = जो प्रभु को अच्छा लगा। पैधा = इज्जत से, सिरोपा ले के। जाइ = जाता है। ऐथै = इस लोक में। उजला = रौशन। पारब्रहमि = पारब्रहम ने। सत भाइ = सच्ची भावना से।4।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य अपने प्रभु को अच्छा लगने लग जाता है, वह प्रभु की दरगाह में इज्जत के साथ जाता है। उसे इस लोक में सुख मिला रहता है, परलोक में भी वह सुर्ख-रू होत है (क्योंकि वह) परमात्मा का ही नाम स्मरण करता रहता है। उसने (यहाँ) अच्छी भावना से गुरु का आसरा लिए रखा, (इस वास्ते) परमात्मा ने उसे आदर बख्शा।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

थान थनंतरि रवि रहिआ सरब जीआ प्रतिपाल जीउ ॥ सचु खजाना संचिआ एकु नामु धनु माल जीउ ॥ मन ते कबहु न वीसरै जा आपे होइ दइआल जीउ ॥५॥

मूलम्

थान थनंतरि रवि रहिआ सरब जीआ प्रतिपाल जीउ ॥ सचु खजाना संचिआ एकु नामु धनु माल जीउ ॥ मन ते कबहु न वीसरै जा आपे होइ दइआल जीउ ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: थान थनंतरि = स्थान स्थान अंतर, हरेक जगह में। प्रतिपाल = पालने वाला। सचु = सदा स्थिर रहने वाला नाम। संचिआ = इकट्ठा किया। ते = से। कबहू = कभी भी। आपे = आप ही।5।
अर्थ: हे भाई! जो परमात्मा हरेक जगह में व्यापक है, जो सारे जीवों की पालना करने वाला है जब वह स्वयं ही जिस जीव पर दयावान होता है उसके मन से वह कभी नहीं भूलता। वह मनुष्य सदा कायम रहने वाला हरि-नाम-खजाना इकट्ठा करता है, परमात्मा के नाम को ही वह अपना धन-पदार्थ बनाता है।5।

[[0761]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

आवणु जाणा रहि गए मनि वुठा निरंकारु जीउ ॥ ता का अंतु न पाईऐ ऊचा अगम अपारु जीउ ॥ जिसु प्रभु अपणा विसरै सो मरि जमै लख वार जीउ ॥६॥

मूलम्

आवणु जाणा रहि गए मनि वुठा निरंकारु जीउ ॥ ता का अंतु न पाईऐ ऊचा अगम अपारु जीउ ॥ जिसु प्रभु अपणा विसरै सो मरि जमै लख वार जीउ ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आवणु = पैदा होना। जाणा = मरना। रहि गए = खत्म हो गए। मनि = मन में। वुठा = आ बसा। ता का = उस (प्रभु) का। अगम = अगम्य (पहुँच से परे)। अपारु = जिसके अस्तित्व का परला छोर ना मिल सके। मरि = मर के।6।
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य के मन में परमात्मा आ बसता है, उसके जन्म-मरण का चक्र समाप्त हो जाता है। हे भाई! उस परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता, वह सबसे ऊँची हस्ती वाला है, अगम्य (पहुँच से परे) है, वह बेअंत है। जिस मनुष्य को परमात्मा भूल जाता है, वह लाखों बार पैदा होता मरता रहता है।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

साचु नेहु तिन प्रीतमा जिन मनि वुठा आपि जीउ ॥ गुण साझी तिन संगि बसे आठ पहर प्रभ जापि जीउ ॥ रंगि रते परमेसरै बिनसे सगल संताप जीउ ॥७॥

मूलम्

साचु नेहु तिन प्रीतमा जिन मनि वुठा आपि जीउ ॥ गुण साझी तिन संगि बसे आठ पहर प्रभ जापि जीउ ॥ रंगि रते परमेसरै बिनसे सगल संताप जीउ ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साचु नेहु = सदा कायम रहने वाला प्यार। तिन संगि = उनके साथ। जापि = जप के। रंगि = प्रेम में। रते = रंगे जाते हैं। सगल = सारे। संताप = दुख-कष्ट।7।
अर्थ: हे भाई! जिस गुरमुख सज्जनों के मन में परमात्मा आ बसता है, उनके हृदय में प्रभु का सदा कायम रहने वाला प्यार बन जाता है। जो मनुष्य उनकी संगति में बसते हैं, वे भी आठों पहर प्रभु का नाम जप के उनके साथ गुणों की सांझ बना लेते हैं। जो मनुष्य परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगे जाते हैं, उनके अंदर से सारे दुख-कष्ट दूर हो जाते हैं।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तूं करता तूं करणहारु तूहै एकु अनेक जीउ ॥ तू समरथु तू सरब मै तूहै बुधि बिबेक जीउ ॥ नानक नामु सदा जपी भगत जना की टेक जीउ ॥८॥१॥३॥

मूलम्

तूं करता तूं करणहारु तूहै एकु अनेक जीउ ॥ तू समरथु तू सरब मै तूहै बुधि बिबेक जीउ ॥ नानक नामु सदा जपी भगत जना की टेक जीउ ॥८॥१॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: करणहारु = कर सकने वाला। तूहै = तू ही। समरथु = सब ताकतों का मालिक। सरब मै = सबमें व्यापक। बिबेक = (अच्छे बुरे की) परख। जपी = जपीं, मैं जपता रहूँ। टेक = आसरा।8।
अर्थ: हे प्रभु! तू सबको पैदा करने वाला है, तू सब कुछ करने के समर्थ है, तू आप ही आप एक है, (जगत-रचना करके) अनेक रूप भी तू स्वयं ही है। तू सब ताकतों का मालिक है, तू सबमें व्यापक है, (जीवों, को अच्छे-बुरे की) परख की बुद्धि (देने वाला भी) तू स्वयं ही है। हे नानक! (कह: हे प्रभु! अगर तू मेहर करे, तो) तेरे भक्तजनों का आसरा ले के मैं सदा तेरा नाम जपता रहूँ।8।1।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला ५ असटपदीआ घरु १० काफी ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला ५ असटपदीआ घरु १० काफी ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

जे भुली जे चुकी साईं भी तहिंजी काढीआ ॥ जिन्हा नेहु दूजाणे लगा झूरि मरहु से वाढीआ ॥१॥

मूलम्

जे भुली जे चुकी साईं भी तहिंजी काढीआ ॥ जिन्हा नेहु दूजाणे लगा झूरि मरहु से वाढीआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भुली = (मैं) भूली, मैं भूलें करती रही हूँ। चुकी = मैं गलतियां करती रही हूँ। साईं = साई, हे पति प्रभु! भी = तो भी। तहिंजी = तेरी। काढीआ = कहलवाती हूँ। नेहु = प्यार। दूजाणे = किसी और से। मरहु = मर जाएं। झूरि मरहु = वह बेशक चिन्ता कर कर के मर जाएं। से = वे (बहुवचन)। वाढीआ = परदेसनें, जिनके पति परदेस में हैं, पति से विछुड़ी हुई, छुटड़ें।1।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘मरहु’ है हुकमी भविष्यत, अन्य-पुरुष, बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे मेरे पति-प्रभु! अगर मैं भूलें करती हूँ, अगर मैं गलतियां करती हूँ, तो भी मैं तेरी ही कहलवाती हूँ (मैं तेरा दर छोड़ के कहीं और जाने को तैयार नहीं हूँ)। जिनका प्यार (तेरे बग़ैर) किसी और से बना हुआ है, वे त्यागी हुई स्त्री जरूर झुर-झुर के मर रही हैं (वे पति से विछफड़ी हुई अवश्य चिन्ता में झुर रही हैं)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हउ ना छोडउ कंत पासरा ॥ सदा रंगीला लालु पिआरा एहु महिंजा आसरा ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

हउ ना छोडउ कंत पासरा ॥ सदा रंगीला लालु पिआरा एहु महिंजा आसरा ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हउ = मैं। ना छोडउ = मैं नहीं छोड़ती। पासरा = सोहाना पासा, बढ़िया वाली साईड। रंगीला = आनंद स्वरूप। महिंजा = मेरा।1। रहाउ।
अर्थ: मैं पति-प्रभु का सोहाना पासा (का उत्तम पक्ष) (कभी भी) नहीं छोड़ूँगी। मेरा वह प्यारा लाल सदा आनंद-स्वरूप है, मेरा यही आसरा है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सजणु तूहै सैणु तू मै तुझ उपरि बहु माणीआ ॥ जा तू अंदरि ता सुखे तूं निमाणी माणीआ ॥२॥

मूलम्

सजणु तूहै सैणु तू मै तुझ उपरि बहु माणीआ ॥ जा तू अंदरि ता सुखे तूं निमाणी माणीआ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सजणु = मित्र। सैणु = संबंधी। माणीआ = माण। सुखे = सुख में।2।
अर्थ: हे पति-प्रभु! मेरा तो तू ही सज्जन है, तू ही संबंधी है। मुझे तो तेरे पर ही गर्व है। जब तू मेरे हृदय-घर में बसता है, तब ही मैं सुखी होती हूँ। मुझ निमाणी का तू ही माण है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जे तू तुठा क्रिपा निधान ना दूजा वेखालि ॥ एहा पाई मू दातड़ी नित हिरदै रखा समालि ॥३॥

मूलम्

जे तू तुठा क्रिपा निधान ना दूजा वेखालि ॥ एहा पाई मू दातड़ी नित हिरदै रखा समालि ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तुठा = प्रसन्न हुआ। क्रिपा निधान = हे कृपा के खजाने! मू = मैं। दातड़ी = सोहानी दाति। रखा = मैं रखती हूँ। समालि = संभाल के।3।
अर्थ: हे कृपा के खजाने पति-प्रभु! अगर तू मेरे पर दयावान हुआ है, तो (अपने चरणों के बिना) कोई और (आसरा) ना दिखलाना। मैंने तो यही सुंदर दाति पाई हुई है, इसी को मैं सदा अपने हृदय में संभाल-संभाल के रखती हूँ।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पाव जुलाई पंध तउ नैणी दरसु दिखालि ॥ स्रवणी सुणी कहाणीआ जे गुरु थीवै किरपालि ॥४॥

मूलम्

पाव जुलाई पंध तउ नैणी दरसु दिखालि ॥ स्रवणी सुणी कहाणीआ जे गुरु थीवै किरपालि ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पाव = पैर। जुलाई = मैं चलाऊँ। पंध तउ = तेरे रास्ते पर। नैणी = (मेरी इन) आखों को। स्रवणी = कानों से। सुणी = मैं सुनूँ। थीवै = हो जाए। किरपालि = कृपालु, दयावान।4।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘पाव’ है ‘पाउ’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे पति-प्रभु! अगर गुरु (मेरे पर) दयावान हो, तो मैं (उससे) अपने कानों से तेरी महिमा की बातें सुनती रहूँ, मैं अपने पैरों को तेरे (देश ले जाने वाले) रास्ते पर चलाऊँ। हे प्यारे! (मेरी इन) आँखों को अपने दर्शन दे।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

किती लख करोड़ि पिरीए रोम न पुजनि तेरिआ ॥ तू साही हू साहु हउ कहि न सका गुण तेरिआ ॥५॥

मूलम्

किती लख करोड़ि पिरीए रोम न पुजनि तेरिआ ॥ तू साही हू साहु हउ कहि न सका गुण तेरिआ ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: किती = कितने ही, अनगिनत। पिरीए = हे प्यारे! न पुजनि = नहीं पहुँच सकते। साही हू साहु = शाहों का पातशाह। हउ = मैं। सका = सकूँ।5।
अर्थ: हे प्यारे! तू शाहों का पातशाह है। मैं तेरे सारे गुण बयान नहीं कर सकती। अगर में कितने ही लाखों-करोड़ों गुण तेरे बताऊँ, तो भी वह सारे तेरे एक रोम (जितनी महिमा) तक नहीं पहुँच सकते।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सहीआ तऊ असंख मंञहु हभि वधाणीआ ॥ हिक भोरी नदरि निहालि देहि दरसु रंगु माणीआ ॥६॥

मूलम्

सहीआ तऊ असंख मंञहु हभि वधाणीआ ॥ हिक भोरी नदरि निहालि देहि दरसु रंगु माणीआ ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सहीआ = सहेलियां। तऊ = तेरी (दासियां)। असंख = अनगिनत। मंझहु = मेरे से। सभि = सारी। वधाणीआं = बढ़िया, अच्छी। हिक भोरी = एक पल भर ही। नदरि = मेहर की निगाह से। निहालि = देख। माणीआ = मैं माणू, मैं उपभोग करूँ।6।
अर्थ: हे प्यारे! अनगिनत ही सहेलियां तेरे (दर की दासियां) हैं। मुझसे तो वह सारी ही अति उत्तम हैं। एक रक्ती भर समय के लिए ही सही मेरी तरफ भी मेहर भरी निगाह से देख। मुझे भी दर्शन दे ता कि मैं आत्मिक आनंद ले सकूँ।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जै डिठे मनु धीरीऐ किलविख वंञन्हि दूरे ॥ सो किउ विसरै माउ मै जो रहिआ भरपूरे ॥७॥

मूलम्

जै डिठे मनु धीरीऐ किलविख वंञन्हि दूरे ॥ सो किउ विसरै माउ मै जो रहिआ भरपूरे ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जै डिठे = जिसे देखने से। धीरीऐ = धैर्य पकड़ता है। किलविख = पाप। वंञन्हि = वंजनि, चले जाते हैं। माऊ = हे माँ! मै = मुझे।7।
अर्थ: हे माँ! मुझे (भला) वह (प्यारा) कैसे बिसर सकता है, जो सारे जगत में व्यापक है, जिसके दर्शन करने से मन धैर्य धरता है और सारे पाप दुख दूर हो जाते हैं?।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

होइ निमाणी ढहि पई मिलिआ सहजि सुभाइ ॥ पूरबि लिखिआ पाइआ नानक संत सहाइ ॥८॥१॥४॥

मूलम्

होइ निमाणी ढहि पई मिलिआ सहजि सुभाइ ॥ पूरबि लिखिआ पाइआ नानक संत सहाइ ॥८॥१॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाइ = प्रेम में। पूरबि = पहले जन्म में। संत सहाइ = गुरु की सहायता से।8।
अर्थ: हे नानक! (कह:) जब मैं आत्मिक अडोलता में प्रेम में टिक के, आज़िज़ हो के (गुमान त्याग के उसके दर पर) गिर पड़ी, तो वह प्यारा मुझे मिल गया। किसी पूर्बले जन्म में अच्छी किस्मत के लिखे लेखों (के संयोग) मुझे गुरु की सहायता से मिल गए।8।1।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ सिम्रिति बेद पुराण पुकारनि पोथीआ ॥ नाम बिना सभि कूड़ु गाल्ही होछीआ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ सिम्रिति बेद पुराण पुकारनि पोथीआ ॥ नाम बिना सभि कूड़ु गाल्ही होछीआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पुकारनि = (जो मनुष्य कर्मकांड आदि का राह) ऊँचा ऊँचा पुकारते बतलाते फिरते हैं। सभि = सारे। गाली = बातें। होछीआं = थोथी बातें।1।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य वेद-पुराण-स्मृतियाँ आदि पुस्तकें पढ़ कर (नाम को किनारे छोड़ के कर्मकांड आदि के उपदेश) ऊँचे स्वरों में सुनाते फिरते हैं, वे लोग थोथी बातें करते हैं। परमात्मा के नाम के बिना झूठा प्रचार ही ये सारे लोग करते हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नामु निधानु अपारु भगता मनि वसै ॥ जनम मरण मोहु दुखु साधू संगि नसै ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

नामु निधानु अपारु भगता मनि वसै ॥ जनम मरण मोहु दुखु साधू संगि नसै ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: निधानु = खजाना। अपारु = बेअंत। मनि = मन में। साधू संगि = गुरु की संगति में।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा के नाम का बेअंत खजाना (परमात्मा के) भक्तों के हृदय में बसता है। गुरु की संगति में (नाम जपने से) जनम-मरण के दुख और मोह आदि हरेक कष्ट दूर हो जाते हैं।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मोहि बादि अहंकारि सरपर रुंनिआ ॥ सुखु न पाइन्हि मूलि नाम विछुंनिआ ॥२॥

मूलम्

मोहि बादि अहंकारि सरपर रुंनिआ ॥ सुखु न पाइन्हि मूलि नाम विछुंनिआ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मोहि = मोह में। बादि = झगड़े में। अहंकारि = अहंकार में। सरपर = जरूर। रुंनिआ = रोते हुए। न पाइन्हि = नहीं पाते। मूलि = बिल्कुल। विछुंनिआ = विछुड़े हुए।2।
अर्थ: हे भाई! प्रभु के नाम से विछुड़े हुए मनुष्य कभी भी आत्मिक आनंद नहीं पाते। वह मनुष्य माया के मोह में, शास्त्रार्थ में, अहंकार में फंस के अवश्य दुखी होते हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरी मेरी धारि बंधनि बंधिआ ॥ नरकि सुरगि अवतार माइआ धंधिआ ॥३॥

मूलम्

मेरी मेरी धारि बंधनि बंधिआ ॥ नरकि सुरगि अवतार माइआ धंधिआ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मेरी मेरी धारि = माया की ममता ख्याल मन में टिका के। बंधनि = (मोह के) बंधनों में। नरकि = नर्क में, दुख में। सुरगि = स्वर्ग में, सुख में। अवतार = जनम।3।
अर्थ: हे भाई! (परमात्मा के नाम से टूट के) माया की ममता का विचार मन में टिका के मोह के बंधन में बँधे रहते हैं। निरी माया के झमेलों के कारण वे लोग दुख-सुख भोगते रहते हैं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सोधत सोधत सोधि ततु बीचारिआ ॥ नाम बिना सुखु नाहि सरपर हारिआ ॥४॥

मूलम्

सोधत सोधत सोधि ततु बीचारिआ ॥ नाम बिना सुखु नाहि सरपर हारिआ ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सोधत = विचार करते हुए। सोधि = विचार करके। ततु = अस्लियत। हारिआ = (जीवन की बाजी) हारते हैं।4।
अर्थ: हे भाई! अच्छी तरह पड़ताल करके निर्णय करके हम इस सच्चाई पर पहुँचे हैं कि परमात्मा के नाम के बिना आत्मिक आनंद नहीं मिल सकता। नाम से टूटे रहने वाले अवश्य ही (मनुष्य जन्म की बाजी) हार के जाते हैं।4।

[[0762]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

आवहि जाहि अनेक मरि मरि जनमते ॥ बिनु बूझे सभु वादि जोनी भरमते ॥५॥

मूलम्

आवहि जाहि अनेक मरि मरि जनमते ॥ बिनु बूझे सभु वादि जोनी भरमते ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आवहि = संसार में आते हैं। जाहि = (संसार से) चले जाते हैं। मरि मरि = आत्मिक मौत सहेड़ सहेड़ के। वादि = व्यर्थ। भरमते = भटकते हैं।5।
अर्थ: (परमात्मा के नाम से टूट के) अनेक प्राणी (बार-बार) पैदा होते मरते हैं। आत्मिक मौत सहेड़-सहेड़ के बार-बार जन्म लेते रहते हैं। (आत्मिक जीवन की) सूझ के बिना उनका सारा ही उद्यम व्यर्थ रहता है, वे अनेक जूनियों में भटकते रहते हैं।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जिन्ह कउ भए दइआल तिन्ह साधू संगु भइआ ॥ अम्रितु हरि का नामु तिन्ही जनी जपि लइआ ॥६॥

मूलम्

जिन्ह कउ भए दइआल तिन्ह साधू संगु भइआ ॥ अम्रितु हरि का नामु तिन्ही जनी जपि लइआ ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कउ = को। संगु = साथ। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला। जनी = जनों ने, लोगों ने।6।
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्यों पर परमात्मा दयावान होता है उन्हें गुरु की संगति प्राप्त होती है, वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम जपते रहते हैं।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

खोजहि कोटि असंख बहुतु अनंत के ॥ जिसु बुझाए आपि नेड़ा तिसु हे ॥७॥

मूलम्

खोजहि कोटि असंख बहुतु अनंत के ॥ जिसु बुझाए आपि नेड़ा तिसु हे ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: खोजहि = खोजते हैं। कोटि = करोड़ों। असंख = अनगिनत। अनंत = बेअंत। के = कई, अनेक। नेड़ा = निकटता। तिसु हे = उस मनुष्य को प्राप्त होती है।7।
अर्थ: हे भाई! करोड़ों, अनगिनत, बेअंत, अनेक ही प्राणी (परमात्मा की) तलाश करते हैं, पर परमात्मा स्वयं जिस मनुष्य को सूझ बख्शता है, उस मनुष्य को प्रभु की समीपता मिल जाती है।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

विसरु नाही दातार आपणा नामु देहु ॥ गुण गावा दिनु राति नानक चाउ एहु ॥८॥२॥५॥१६॥

मूलम्

विसरु नाही दातार आपणा नामु देहु ॥ गुण गावा दिनु राति नानक चाउ एहु ॥८॥२॥५॥१६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: छातार = हे दातार! गवा = मैं गाता रहूँ। नानक = हे नानक! (कह-)।8।
अर्थ: हे नानक! (प्रभु चरणों में अरदास कर और कह:) हे दातार! मेरे अंदर ये तमन्ना है कि मैं दिन-रात तेरे गुण गाता रहूँ। मुझे अपना नाम बख्श। मैं तुझे कभी ना भुलाऊँ।8।2।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला १ कुचजी ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला १ कुचजी ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मंञु कुचजी अमावणि डोसड़े हउ किउ सहु रावणि जाउ जीउ ॥ इक दू इकि चड़ंदीआ कउणु जाणै मेरा नाउ जीउ ॥ जिन्ही सखी सहु राविआ से अ्मबी छावड़ीएहि जीउ ॥ से गुण मंञु न आवनी हउ कै जी दोस धरेउ जीउ ॥ किआ गुण तेरे विथरा हउ किआ किआ घिना तेरा नाउ जीउ ॥ इकतु टोलि न अ्मबड़ा हउ सद कुरबाणै तेरै जाउ जीउ ॥ सुइना रुपा रंगुला मोती तै माणिकु जीउ ॥ से वसतू सहि दितीआ मै तिन्ह सिउ लाइआ चितु जीउ ॥ मंदर मिटी संदड़े पथर कीते रासि जीउ ॥ हउ एनी टोली भुलीअसु तिसु कंत न बैठी पासि जीउ ॥ अ्मबरि कूंजा कुरलीआ बग बहिठे आइ जीउ ॥ सा धन चली साहुरै किआ मुहु देसी अगै जाइ जीउ ॥ सुती सुती झालु थीआ भुली वाटड़ीआसु जीउ ॥ तै सह नालहु मुतीअसु दुखा कूं धरीआसु जीउ ॥ तुधु गुण मै सभि अवगणा इक नानक की अरदासि जीउ ॥ सभि राती सोहागणी मै डोहागणि काई राति जीउ ॥१॥

मूलम्

मंञु कुचजी अमावणि डोसड़े हउ किउ सहु रावणि जाउ जीउ ॥ इक दू इकि चड़ंदीआ कउणु जाणै मेरा नाउ जीउ ॥ जिन्ही सखी सहु राविआ से अ्मबी छावड़ीएहि जीउ ॥ से गुण मंञु न आवनी हउ कै जी दोस धरेउ जीउ ॥ किआ गुण तेरे विथरा हउ किआ किआ घिना तेरा नाउ जीउ ॥ इकतु टोलि न अ्मबड़ा हउ सद कुरबाणै तेरै जाउ जीउ ॥ सुइना रुपा रंगुला मोती तै माणिकु जीउ ॥ से वसतू सहि दितीआ मै तिन्ह सिउ लाइआ चितु जीउ ॥ मंदर मिटी संदड़े पथर कीते रासि जीउ ॥ हउ एनी टोली भुलीअसु तिसु कंत न बैठी पासि जीउ ॥ अ्मबरि कूंजा कुरलीआ बग बहिठे आइ जीउ ॥ सा धन चली साहुरै किआ मुहु देसी अगै जाइ जीउ ॥ सुती सुती झालु थीआ भुली वाटड़ीआसु जीउ ॥ तै सह नालहु मुतीअसु दुखा कूं धरीआसु जीउ ॥ तुधु गुण मै सभि अवगणा इक नानक की अरदासि जीउ ॥ सभि राती सोहागणी मै डोहागणि काई राति जीउ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कुचजी = कु+चजी, जिसे जीवन का चज आचार ना हो। मंञु = मंझ, मैं। अंमावणि = जो समा ना सके, बहुतात में। डोसड़े = घटिआ दोष, ऐब। हउ = मैं। किउ = कैसे? सहु = पति। रावणि = माणने के लिए। जासउ = मैं जाऊँ।
इक दू = एक से। इकि = कई, बहुत। चड़ंदीआ = बढ़ चढ़ के, बढ़िया।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘इकि’ है ‘इक/एक’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

जिनी सखी = जिस सखियों ने। से = वह सहेलियां। अंबी छावड़ीएहि = आमों की (ठंडी) छाया तले।
मंञु = मंझ, मेरे में। आवनी = आते। कै = किस पर? विथरा = मैं विस्तार से बताऊँ। घिना = मैं लूँ। इकतु = एक में, एक से ही। इकतु टोलि = एक सुंदर पदार्थ के द्वारा ही। अंबड़ा = अपड़ सकती, मैं पहुँच सकती।
रूपा = चाँदी। रंगुला = सोहाना। तै = और, तथा। माणिकु = लाल। सहि = शहु ने। संदड़े = के। कीते = मैंने बना लिए हैं। रासि = राशि, पूंजी, संपत्ति, धन-दौलत। एनी टोली = इन सुंदर पदार्थों में ही। भुलीअसु = मैं कुमार्ग पर पड़ गई।
अंबरि = आकाश में। कूँजा = कूंजें (शुभ गुण)। अंबरि कुरलीआ = आकाश में कुरल कुरल कर रही हैं, दूर चली गई हैं। बग = बगुले (पाखण्ड)। बहिठे आइ = आ के बैठ गए हैं। साधन = जीव-स्त्री। साहुरे = परलोक में। अगै = परलोक में। जाइ = जा के।
सुती सुती = सारी उम्र माया मोह की नींद में सोए हुए ही। झालु = सफेद दिन, बुढ़ापा, पलांघा। वाटड़ीआसु = सुंदर वाट, बढ़िया रास्ता। सह = हे पति! ते नालहु = तेरे से। मुतीअसु = मैं बिछुड़ गई हूँ। कूँ = को। धरीआसु = धारण कर लिया है।
मैं = मेरे अंदर। सभि = सारे। अरदासि = बेनती। सभि = सारी (सोहागनें)। डोहगणि = बद नसीब को। काई = कोई एक।1।
अर्थ: (हे सहेली!) मैंने सही जीवन की विधि नहीं सीखी, मेरे अंदर इतने ऐब हैं कि अंदर समा ही नहीं सकते (इस हालत में) मैं प्रभु-पति को प्रसन्न करने के लिए कैसे जा सकती हूँ? (उसके दर पर तो) एक से बढ़ कर एक हैं, मेरा तो वहाँ कोई नाम भी नहीं जानता।
जिस सहेलियों ने प्रभु-पति को प्रसन्न कर लिया है, वह मानो (चौमासे में) आमों की (ठंडी) छाया में बैठी हुई हैं। मेरे अंदर तो वह गुण ही नहीं हैं (जिस पर प्रभु-पति रीझता है) मैं (अपने इस दुर्भाग्य का) दोष और किस पर दे सकती हूँ?
हे प्रभु पति! (तू बेअंत गुणों का मालिक है) मैं तेरे कौन-कौन से गुण विस्तार से कहूँ? और मैं तेरा कौन-कौन सा नाम लूँ? (तेरे अनेक गुणों को देख-देख के तेरा अनेक ही नाम जीव ले रहे हैं)। तेरे बख्शे हुए किसी एक सुंदर पदार्थ के द्वारा भी (तेरी दातों के लेखे तक) नहीं पहुँच सकती (बस!) मैं तुझ पर से कुर्बान ही कुर्बान जाती हूँ।
(हे सहेली! देख मेरे दुर्भाग्य) सोना, चाँदी, मोती और हीरा आदि सुंदर व कीमती पदार्थ- ये चीजें प्रभु-पति ने मुझे दीं, (और) मैं (उसको भुला के, उसकी दी हुई) इन चीजों से प्यार डाल बैठी। मिट्टी-पत्थर आदि के बनाए हुए सुंदर घर -यही मैंने अपने राशि-पूंजी बना लिए। मैं इन सुंदर पदार्थों में ही (फंस के) गलती खा गई, (इन पदार्थों के देने वाले) उस पति-प्रभु के पास ना बैठी।
माया के मोह में फंस के जिस जीव-स्त्री के शुभ गुण उससे दूर-परे चले जाएं, और उसके अंदर निरे पाखण्ड ही इकट्ठे हो जाएं, वह जब इस हाल में परलोक जाए तो जा के परलोक में (प्रभु की हजूरी में) क्या मुँह दिखाएगी?
हे प्रभु! माया के मोह की नींद में गाफिल पड़े रहने से मुझे बुढ़ापा आ गया है, जीवन के सही रास्ते से मैं विछुड़ी हुई हूँ, मैंने निरे दुख ही दुख सहेड़े हुए हैं।
हे प्रभु! तू बेअंत गुणों वाला है, मेरे अंदर सारे अवगुण ही अवगुण हैं, फिर भी नानक की विनती (तेरे ही दर पर) है कि भाग्यशाली जीव-सि्त्रयाँ तो सदा ही तेरे नाम-रंग में रंगी हुई हैं, मुझ अभागन को भी कोई एक रात बख्श (मेरे पर भी कभी मेहर की निगाह कर)।1।

दर्पण-टिप्पनी

(नोट: ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे ये छंत गर्म ऋतु में उचारा गया है जब चौमासे के दिनों में किसान हल वगैरा का काम निपटा के दोपहर को वृक्षों के नीचे आराम करते हैं। गुरु नानक देव जी के सामने वह इलाका है जहाँ आम बहुत हैं, जिला गुरदासपुर)।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला १ सुचजी ॥ जा तू ता मै सभु को तू साहिबु मेरी रासि जीउ ॥ तुधु अंतरि हउ सुखि वसा तूं अंतरि साबासि जीउ ॥ भाणै तखति वडाईआ भाणै भीख उदासि जीउ ॥ भाणै थल सिरि सरु वहै कमलु फुलै आकासि जीउ ॥ भाणै भवजलु लंघीऐ भाणै मंझि भरीआसि जीउ ॥ भाणै सो सहु रंगुला सिफति रता गुणतासि जीउ ॥ भाणै सहु भीहावला हउ आवणि जाणि मुईआसि जीउ ॥ तू सहु अगमु अतोलवा हउ कहि कहि ढहि पईआसि जीउ ॥ किआ मागउ किआ कहि सुणी मै दरसन भूख पिआसि जीउ ॥ गुर सबदी सहु पाइआ सचु नानक की अरदासि जीउ ॥२॥

मूलम्

सूही महला १ सुचजी ॥ जा तू ता मै सभु को तू साहिबु मेरी रासि जीउ ॥ तुधु अंतरि हउ सुखि वसा तूं अंतरि साबासि जीउ ॥ भाणै तखति वडाईआ भाणै भीख उदासि जीउ ॥ भाणै थल सिरि सरु वहै कमलु फुलै आकासि जीउ ॥ भाणै भवजलु लंघीऐ भाणै मंझि भरीआसि जीउ ॥ भाणै सो सहु रंगुला सिफति रता गुणतासि जीउ ॥ भाणै सहु भीहावला हउ आवणि जाणि मुईआसि जीउ ॥ तू सहु अगमु अतोलवा हउ कहि कहि ढहि पईआसि जीउ ॥ किआ मागउ किआ कहि सुणी मै दरसन भूख पिआसि जीउ ॥ गुर सबदी सहु पाइआ सचु नानक की अरदासि जीउ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सुचजी = जिसने जीवन की सही विधि सीखी हुई है। जा = जब। ता = तब। सभु को = हरेक जीव। रासि = राशि, पूंजी, संपत्ति, धन-दौलत। तुधु = तुझे। अंतरि = अपने हृदय में (बसा के)। हउ = मैं। सुखि = सुखी, सुखसे। वसा = बसूँ। साबासि = बड़ाई।
भाणै = प्रभु की रजा में ही। तखति = तख्त पर। उदासि = उदास, त्यागी। थल सिरि = थल के सिर पर। सरु = तालाब, दरिया, समुंदर। वहै = बह पड़ता है। आकासि = आकाश में, अहंकारी हृदय में। फुलै = खिल जाता है। मंझि = बीच में ही। भरीआसि = भर के डूब जाते हैं। सहु = पति प्रभु। रंगुला = प्यारा। गुण तासि = गुणों का खजाना। भीहावला = डरावना। हउ = मैं। आवणि जाइ = पैदा होना मरना (के चक्कर) में।
अगम = अगम्य (पहुँच से परे)। अतोलवा = बेअंत गुणों वाला। मागउ = मैं माँगू। पिआसि = प्यासी। सचु = सदा स्थिर रहने वाला।2।
अर्थ: हे प्रभु! जब तू (मेरी ओर होता है) तब हरेक जीव मुझे (आदर देता है)। तू ही मेरा मालिक है, तू ही मेरी संपत्ति है। जब मैं तुझे अपने हृदय में बसा लेती हूँ तब मैं सुखी बसती हूँ जब तू मेरे दिल में प्रगट हो जाता है तब मुझे (हर जगह) शोभा मिलती है।
प्रभु की रजा में ही कोई तख़्त पर बैठा है और (उसे) आदर-मान मिल रहा है, उसकी रजा में ही कोई विरक्त हो के (दर-ब-दर) भिक्षा माँगता फिरता है। प्रभु की रजा में ही कहीं सूखी धरती पर सरोवर चल पड़ता है और कमल फूल आकाश में खिल उठता है (भाव, किसी अहंकारी प्रेम-हीन हृदय में प्रेम का प्रवाह चल पड़ता है)।
प्रभु की रजा में ही संसार-समुंदर से पार लांघा जाता है; उसकी रजा के अनुसार ही विकारों से भर के बीच में डूब जाते हैं। उसकी रजा में ही किसी जीव-स्त्री को वह प्रभु-पति प्यारा लगता है, रजा के अनुसार ही कोई जीव उस गुणों के खजाने प्रभु की सिफतों में मस्त रहता है। ये भी उसकी रजा में ही है कि कभी वह पति मुझ जीव-स्त्री को डरावना लगता है, और मैं जनम-मरन के चक्कर में पड़ कर आत्मिक मौत मरती हूँ।
हे प्रभु-पति! तू अगम्य (पहुँच से परे) है, तू बेअंत गुणों का मालिक है। मैं अरदास कर कर के तेरे ही दर पर गिर पड़ी हूँ (मैंने तेरा ही आसरा-परना लिया है)। मैं तेरे दर से और क्या माँगू? तुझे और क्या कहूँ जो तू सुने? मुझे तेरे दीदार की भूख है, मैं तेरे दर्शनों की प्यासी हूँ। तू सदा-स्थिर रहने वाला पति गुरु के शब्द के माध्यम से मिलता है। मेरी नानक की तेरे आगे आरजू है कि मुझे भी गुरु की शरण डाल के मिल।2।

[[0763]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ गुणवंती ॥ जो दीसै गुरसिखड़ा तिसु निवि निवि लागउ पाइ जीउ ॥ आखा बिरथा जीअ की गुरु सजणु देहि मिलाइ जीउ ॥ सोई दसि उपदेसड़ा मेरा मनु अनत न काहू जाइ जीउ ॥ इहु मनु तै कूं डेवसा मै मारगु देहु बताइ जीउ ॥ हउ आइआ दूरहु चलि कै मै तकी तउ सरणाइ जीउ ॥ मै आसा रखी चिति महि मेरा सभो दुखु गवाइ जीउ ॥ इतु मारगि चले भाईअड़े गुरु कहै सु कार कमाइ जीउ ॥ तिआगें मन की मतड़ी विसारें दूजा भाउ जीउ ॥ इउ पावहि हरि दरसावड़ा नह लगै तती वाउ जीउ ॥ हउ आपहु बोलि न जाणदा मै कहिआ सभु हुकमाउ जीउ ॥ हरि भगति खजाना बखसिआ गुरि नानकि कीआ पसाउ जीउ ॥ मै बहुड़ि न त्रिसना भुखड़ी हउ रजा त्रिपति अघाइ जीउ ॥ जो गुर दीसै सिखड़ा तिसु निवि निवि लागउ पाइ जीउ ॥३॥

मूलम्

सूही महला ५ गुणवंती ॥ जो दीसै गुरसिखड़ा तिसु निवि निवि लागउ पाइ जीउ ॥ आखा बिरथा जीअ की गुरु सजणु देहि मिलाइ जीउ ॥ सोई दसि उपदेसड़ा मेरा मनु अनत न काहू जाइ जीउ ॥ इहु मनु तै कूं डेवसा मै मारगु देहु बताइ जीउ ॥ हउ आइआ दूरहु चलि कै मै तकी तउ सरणाइ जीउ ॥ मै आसा रखी चिति महि मेरा सभो दुखु गवाइ जीउ ॥ इतु मारगि चले भाईअड़े गुरु कहै सु कार कमाइ जीउ ॥ तिआगें मन की मतड़ी विसारें दूजा भाउ जीउ ॥ इउ पावहि हरि दरसावड़ा नह लगै तती वाउ जीउ ॥ हउ आपहु बोलि न जाणदा मै कहिआ सभु हुकमाउ जीउ ॥ हरि भगति खजाना बखसिआ गुरि नानकि कीआ पसाउ जीउ ॥ मै बहुड़ि न त्रिसना भुखड़ी हउ रजा त्रिपति अघाइ जीउ ॥ जो गुर दीसै सिखड़ा तिसु निवि निवि लागउ पाइ जीउ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुणवंती = गुणों वाली। सिखड़ा = प्यारा सिख। लागउ = मैं लगूँ। पाइ = पाय, पैरों पर। बिरथा = पीड़ा, दुख। जीअ की = जिंद की। उपदेसड़ा = सुंदर उपदेश। अनत = अन्यत्र, किसी और तरफ। तै कू = तुझे। डेवसा = मैं दे दूँगा। मारगु = रास्ता।
हउ = मैं। सरणाइ = आसरा। महि = में। सभो = सारा, सभ।
इतु मारगि = इस रास्ते पर। भाईअड़े = प्यारे भाई। तिआगें = यदि तू त्याग दे। मतड़ी = अनुचित मति। विसारें = यदि तू विसार दे। भाउ = भाव, प्यार। इउ = इस तरह। दरसावड़ा = सुंदर दीदार। वाउ = हवा। तती वाउ = दुख-कष्ट, शोक।
आपहु = अपने आप से, अपनी अक्ल से। हुकमाउ = प्रभु का हुक्म ही। गुरि = गुरु ने। नानकि = नानक ने। पसाउ = प्रसादि, कृपा। बहुड़ि = दोबारा। मैं = मुझे। भुखड़ी = बुरी भूख। हउ = मैं। अघाइ = अघा के, तृप्त हो के। रजा त्रिपति अघाइ = खा पी के अच्छी तरह से तृप्त हो गया हूँ। गुर सिखड़ा = गुरु का प्यारा सिख।3।
अर्थ: मुझे जो भी कोई गुरु का प्यारा सिख मिल जाता है, मैं झुक-झुक के (भाव, विनम्रता-अधीनगी से) उसके पैरों पे लगता हूँ, और उसे अपने दिल की पीड़ा (तमन्ना) बताता हूँ (और विनती करता हूँ- हे गुरसिख!) मुझे सज्जन गुरु मिला दे। मुझे कोई ऐसा सुंदर उपदेश दे (जिसकी इनायत से) मेरा मन किसी और की तरफ ना जाए। मैं अपना ये मन तेरे हवाले कर दूँगा, मुझे रास्ता बता (जिस रास्ते पर चल के प्रभु के दर्शन कर सकूँ)। मैं (चौरासी लाख के) दूर की राहों से चल के आया हूँ, अब मैंने तेरा ही सहारा देखा है। मैंने अपने चिक्त में यही आस रखी हुई है कि तू मेरा सारा दुख दूर कर देगा।
(आगे से उक्तर मिलता है:) इस रास्ते पर जो गुर-भाई चलते हैं (वे गुरु के बताए हुए कर्म करते हैं) तू भी वही काम कर जो गुरु बताता है। अगर तू अपने मन की अनुचित मति छोड़ दे, अगर तू प्रभु के बिना अन्य (माया आदि) का प्यार भुला दे, तो इस तरह तू प्रभु के सुंदर दर्शन कर लेगा, तुझे कोई दुख-कष्ट नहीं व्यापेगा। मैंने जो कुछ तुझे बताया है गुरु का हुक्म ही बताया है, मैं अपनी अक्ल का आसरा ले के ये रास्ता नहीं बता रहा। जिस (सौभाग्यशाली व्यक्ति) पर नानक ने कृपा की है, परमात्मा ने उसको अपनी भक्ति का खजाना बख्श दिया है। (गुरु नानक की मेहर के सदके मैं पूरी तरह से तृप्त हो गया हूँ, मुझे अब माया की कोई भूख नहीं सताती।)
मुझे जो भी कोई गुरु का प्यारा सिख मिल जाता है, मैं विनम्रता-अधीनगी सहित उसके पैर लगता हूँ।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही छंत महला १ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही छंत महला १ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

भरि जोबनि मै मत पेईअड़ै घरि पाहुणी बलि राम जीउ ॥ मैली अवगणि चिति बिनु गुर गुण न समावनी बलि राम जीउ ॥ गुण सार न जाणी भरमि भुलाणी जोबनु बादि गवाइआ ॥ वरु घरु दरु दरसनु नही जाता पिर का सहजु न भाइआ ॥ सतिगुर पूछि न मारगि चाली सूती रैणि विहाणी ॥ नानक बालतणि राडेपा बिनु पिर धन कुमलाणी ॥१॥

मूलम्

भरि जोबनि मै मत पेईअड़ै घरि पाहुणी बलि राम जीउ ॥ मैली अवगणि चिति बिनु गुर गुण न समावनी बलि राम जीउ ॥ गुण सार न जाणी भरमि भुलाणी जोबनु बादि गवाइआ ॥ वरु घरु दरु दरसनु नही जाता पिर का सहजु न भाइआ ॥ सतिगुर पूछि न मारगि चाली सूती रैणि विहाणी ॥ नानक बालतणि राडेपा बिनु पिर धन कुमलाणी ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भरि जोबनि = भरी जवानी में। मै = मय, शराब। मत = मस्त। पेईअड़ै घरि = पिता के घर, पेके घर में। पाहुणी = प्राहुणी। बलि = सदके। राम = हे राम! अवगणि = अवगुण के कारण। चिति = चिक्त में। न समावनी = नहीं समाते। सार = कद्र। भरमि = भटकना में। बादि = व्यर्थ। वरु = पति प्रभु। सहजु = सुभाउ। भाइआ = अच्छा लगा। पूछि = पूछ के। मारगि = (सही) रास्ते पर। रैणि = (जिंदगी की) रात। बालतण = बाल उम्र में (ही)। धन = जीव-स्त्री।1।
अर्थ: हे प्रभु जी! मैं तुझसे सदके हूँ (तूने कैसी आश्चर्यजनक लीला रचाई है!) जीव-स्त्री (तेरी रची माया के प्रभाव तहत) जवानी के वक्त वह ऐसे मस्त है जैसे शराब पी के मदहोश है, (ये भी नहीं समझती कि) इस पेके घर में (इस जगत में) वह एक मेहमान ही है। विकारों की कमाई के कारण चिक्त से वह मैली रहती है (गुरु की शरण नहीं आती, और) गुरु (की शरण पड़े) बिना (हृदय में) गुण टिक नहीं सकते।
(माया की) भटकना में पड़ कर जीव-स्त्री ने (प्रभु के) गुणों की कीमत ना समझी, गलत रास्ते पर पड़ी रही, और जवानी का समय व्यर्थ गवा लिया। ना उसने पति-प्रभु के साथ सांझ डाली, ना उसके दर ना उसके घर और ना ही उसके दर्शनों की कद्र पहचानी। (भटकना में ही रह कर) जीव-स्त्री को प्रभु-पति का सुभाव भी पसंद नहीं आया।
माया के मोह में सोई हुई जीव-स्त्री की जिंदगी की सारी रात बीत गई, सतिगुरु की शिक्षा ले के ठीक रास्ते पर कभी ना चली। हे नानक! ऐसी जीव-स्त्री तो बाली उम्र में ही विधवा हो गई, और प्रभु-पति के मिलाप के बिना उसका हृदय-कमल कुम्हलाया ही रहा।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बाबा मै वरु देहि मै हरि वरु भावै तिस की बलि राम जीउ ॥ रवि रहिआ जुग चारि त्रिभवण बाणी जिस की बलि राम जीउ ॥ त्रिभवण कंतु रवै सोहागणि अवगणवंती दूरे ॥ जैसी आसा तैसी मनसा पूरि रहिआ भरपूरे ॥ हरि की नारि सु सरब सुहागणि रांड न मैलै वेसे ॥ नानक मै वरु साचा भावै जुगि जुगि प्रीतम तैसे ॥२॥

मूलम्

बाबा मै वरु देहि मै हरि वरु भावै तिस की बलि राम जीउ ॥ रवि रहिआ जुग चारि त्रिभवण बाणी जिस की बलि राम जीउ ॥ त्रिभवण कंतु रवै सोहागणि अवगणवंती दूरे ॥ जैसी आसा तैसी मनसा पूरि रहिआ भरपूरे ॥ हरि की नारि सु सरब सुहागणि रांड न मैलै वेसे ॥ नानक मै वरु साचा भावै जुगि जुगि प्रीतम तैसे ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बाबा = हे गुरु! मै = मुझे। वरु = प्रभु पति। देहि = मिला, दे। भावै = प्यारा लगता है। मै तिस की बलि राम = मैं उस राम से सदके हूँ। रवि रहिआ = मौजूद है, हर जगह व्यापक है। जुग चारि = सदा ही। त्रिभवण = तीनों भवनों में, सारे जगत में। बाणी = हुक्म। रवै = प्यार करता है। मनसा = (मनीषा) इच्छा। सरब = सदा ही। रांड = रंडी। तैसे = एक समान।2।
अर्थ: हे प्यारे सतिगुरु! मुझे पति-प्रभु मिला। (मेहर कर) मुझे वह पति-प्रभु प्यारा लगे, मैं उससे सदके जाऊँ, जो सदा ही हर जगह व्यापक है, तीनों ही भवनों में जिसका हुक्म चल रहा है।
तीनों भवनों का मालिक प्रभु भाग्यशाली जीव-स्त्री से प्यार करता है, पर जिसने अवगुण ही अवगुण सहेड़ लिए वह उसके चरणों से विछुड़ी रहती है। वह मालिक हरेक के हृदय में व्यापक है (वह हरेक के दिल की जानता है) जैसी आस ले के कोई उसके दर पर आती है वैसी ही इच्छा वह पूरी कर देता है।
जो जीव-स्त्री प्रभु-पति की बनी रहती है वह सदा सोहाग-भाग वाली है, वह कभी विधवा नहीं होती, उसका वेश कभी मैला नहीं होता (उसका हृदय कभी विकारों से मैला नहीं होता)।
हे नानक! (अरदास कर और कह: हे सतिगुरु! तेरी मेहर हो तो) वह सदा-स्थिर रहने वाला प्रभु-पति मुझे (हमेशा) प्यारा लगता रहे जो प्रीतम हरेक युग में एक समान रहने वाला है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बाबा लगनु गणाइ हं भी वंञा साहुरै बलि राम जीउ ॥ साहा हुकमु रजाइ सो न टलै जो प्रभु करै बलि राम जीउ ॥ किरतु पइआ करतै करि पाइआ मेटि न सकै कोई ॥ जाञी नाउ नरह निहकेवलु रवि रहिआ तिहु लोई ॥ माइ निरासी रोइ विछुंनी बाली बालै हेते ॥ नानक साच सबदि सुख महली गुर चरणी प्रभु चेते ॥३॥

मूलम्

बाबा लगनु गणाइ हं भी वंञा साहुरै बलि राम जीउ ॥ साहा हुकमु रजाइ सो न टलै जो प्रभु करै बलि राम जीउ ॥ किरतु पइआ करतै करि पाइआ मेटि न सकै कोई ॥ जाञी नाउ नरह निहकेवलु रवि रहिआ तिहु लोई ॥ माइ निरासी रोइ विछुंनी बाली बालै हेते ॥ नानक साच सबदि सुख महली गुर चरणी प्रभु चेते ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: लगनु = महूरत। लगनु गणाइ = महूरत निकलवा के। हंभी = मैं भी। वंञा = वंजां, पहुँच सकूँ। साहुरै = पति के घर में, प्रभु चरणों में। साहा = लगन, महूरत। रजाइ = रजाय, परमात्मा की मर्जी के अनुसार। न टलै = आगे-पीछे नहीं हो सकता, नहीं टल सकता। किरतु पइआ = किए हुए कर्मों के संस्कारों के अनुसार मिला हुआ। किरत = मेहनत-कमाई, किए हुए कर्मों का समूह। करतै = कर्तार ने। जाञी = जांजी, बारात का मालिक, दूल्हा। निहकेवल = निष्कैवल्य, पवित्र, स्वतंत्र। नरह निहकेवलु = मनुष्यों से स्वतंत्र। तिहु लोई = तीन लोकों में। माइ = माइआ। निरासी = आस हीनी। रोइ = रोय, रो के। विछुंनी = विछुड़ जाती है। बाली = बालिका, लड़की। बालै = लड़के का। हेते = प्यार के कारण। बाली बालै हेते = लड़की लड़के के प्यार के कारण। सबदि = शब्द की इनायत से। सुख = आनंद। महली = प्रभु के घर में।3।
अर्थ: हे सतिगुरु! (वह) महूरत निकलवा (वह अवसर पैदा कर, जिसकी इनायत से) मैं भी पति-प्रभु के चरणों में जुड़ सकूँ। (हे गुरु! तेरी कृपा से) रजा का मालिक जो हुक्म करता है वह मेल का अवसर बन जाता है, उसको कोई टाल नहीं सकता (उसमें कोई विघ्न नहीं डाल सकता)।
जीवों के किए कर्मों के अनुसार कर्तार ने (उनके मिलन व विछोड़े का) जो भी हुक्म दिया है उसकी कोई उलंघ्ना नहीं कर सकता।
(गुरु विचोले की कृपा से) वह परमात्मा जो तीनों लोकों में व्यापक है और (फिर भी अपने पैदा किए) बंदों से स्वतंत्र है (जीव-स्त्री को अपने चरणों में जोड़ने के लिए) दूल्हा बन के आता है। (जैसे बेटी को विदा करती माँ दोबारा मिलने की उम्मीदें त्याग के रो के विछुड़ती है, वैसे ही) माया जीव-स्त्री के प्रभु-पति के साथ प्रेम के कारण जीव-स्त्री को अपने काबू में रख सकने की उम्मीदें छोड़ के (मानो) रो के विछुड़ती है।
हे नानक! जीव-स्त्री गुरु के चरणों की इनायत से प्रभु-पति को हृदय में बसाती है, और सदा स्थिर प्रभु की महिमा वाले शब्द के द्वारा प्रभु की हजूरी में आनंद पाती है।3।

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विश्वास-प्रस्तुतिः

बाबुलि दितड़ी दूरि ना आवै घरि पेईऐ बलि राम जीउ ॥ रहसी वेखि हदूरि पिरि रावी घरि सोहीऐ बलि राम जीउ ॥ साचे पिर लोड़ी प्रीतम जोड़ी मति पूरी परधाने ॥ संजोगी मेला थानि सुहेला गुणवंती गुर गिआने ॥ सतु संतोखु सदा सचु पलै सचु बोलै पिर भाए ॥ नानक विछुड़ि ना दुखु पाए गुरमति अंकि समाए ॥४॥१॥

मूलम्

बाबुलि दितड़ी दूरि ना आवै घरि पेईऐ बलि राम जीउ ॥ रहसी वेखि हदूरि पिरि रावी घरि सोहीऐ बलि राम जीउ ॥ साचे पिर लोड़ी प्रीतम जोड़ी मति पूरी परधाने ॥ संजोगी मेला थानि सुहेला गुणवंती गुर गिआने ॥ सतु संतोखु सदा सचु पलै सचु बोलै पिर भाए ॥ नानक विछुड़ि ना दुखु पाए गुरमति अंकि समाए ॥४॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बाबूलि = पिता के, सतिगुरु ने। दितड़ी = भेज दी। दूरि = (माया के प्रभाव से) दूर परे। घरि = घर में। पेईऐ घरि = पेके घर में, जनम मरन में। रहसी = प्रसन्न होती है। वेखि = देख के। हदूरि = अपने सामने। पिरि = पिर ने, प्रभु पति ने। रावी = प्यार किया। घरि = घर में, प्रभु के चरणों में। सोहीऐ = शोभा देती है, आत्मिक जीवन सुंदर बना लेती है। परधाने = जानी मानी। संजोगी = अच्छे भाग्यों से। थानि = प्रभु चरणों में। सुहेला = आसान (जीवन)। सचु = सदा स्थिर प्रभु का नाम। पलै = पल्ले में, उसके पास। बोलै = सिमरती है। पिर भाए = पति को प्यारी लगती है। अंकि = अंक में, जप्फी में। समाए = लीन हो जाती है।4।
अर्थ: सतिगुरु ने (मेहर करके जीव-स्त्री माया के प्रभाव से इतनी) दूर पहुँचा दी कि वह दोबारा जनम-मरण के चक्कर में नहीं आती। प्रभु-पति के प्रत्यक्ष दीदार करके वह प्रसन्न-चिक्त होती है। प्रभु-पति ने (जब) उससे प्यार किया, तो उसके चरणों में जुड़ के वह अपना आत्मिक जीवन सँवारती है।
सदा-स्थिर प्रीतम प्रभु को उस जीव-स्त्री की जरूरत पड़ी (भाव, जीव-स्त्री उसके लेखे में आ गई) उसने उसको अपने साथ मिला लिया। (इस मिलाप की इनायत से) उसकी मति त्रुटि-हीन हो गई, वह जानी पहचानी हस्ती बन गई। सौभाग्य से उसका मिलाप हो गया, प्रभु-चरणों में उसका जीवन सुखी हो गया, वह गुणवती हो गई, गुरु के दिए ज्ञान वाली हो गई।
सत्य-संतोष और सदा-स्थिर याद उसके हृदय में टिक जाती है, वह सदा-स्थिर प्रभु को सदा सिमरती है, वह प्रभु-पति को प्यारी लगने लग जाती है। हे नानक! जीव-स्त्री (प्रभु-चरणों से) विछुड़ के दुख नहीं पाती, गुरु की शिक्षा की इनायत से वह प्रभु की गोद में लीन हो जाती है।4।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला १ छंतु घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला १ छंतु घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

हम घरि साजन आए ॥ साचै मेलि मिलाए ॥ सहजि मिलाए हरि मनि भाए पंच मिले सुखु पाइआ ॥ साई वसतु परापति होई जिसु सेती मनु लाइआ ॥ अनदिनु मेलु भइआ मनु मानिआ घर मंदर सोहाए ॥ पंच सबद धुनि अनहद वाजे हम घरि साजन आए ॥१॥

मूलम्

हम घरि साजन आए ॥ साचै मेलि मिलाए ॥ सहजि मिलाए हरि मनि भाए पंच मिले सुखु पाइआ ॥ साई वसतु परापति होई जिसु सेती मनु लाइआ ॥ अनदिनु मेलु भइआ मनु मानिआ घर मंदर सोहाए ॥ पंच सबद धुनि अनहद वाजे हम घरि साजन आए ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हम घर = मेरे हृदय घर में। साजन आए = प्रभु मित्र जी आ के प्रकट हुए हैं।

दर्पण-टिप्पनी

(नोट: ये शब्द आदर के भाव में ‘बहुवचन’ में बरते गए हैं; जैसे ‘प्रभ जी बसहि साधु की रसना’)।

दर्पण-भाषार्थ

साचै = सदा स्थिर रहने वाले प्रभु ने। मेलि = अपने मेल में, अपने चरणों में। सहजि = आत्मिक अडोलता में। मनि = (मेरे) मन में। भाए = प्यारे लग रहे हैं। पंच = मेरे पाँचों ज्ञान-इंद्रिय (अपने-अपने विषय की और दौड़ने की जगह प्रभु-प्यार में मिल के बैठे हैं)। सुखु = आत्मिक आनंद। जिसु…लाइआ = जिससे मन जोड़ा था, जिसकी मेरे अंदर तमन्ना पैदा हो रही थी। अनदिनु = हर रोज। घर मंदर = मेरा हृदय आदि सारे अंग। पंच सबद धुनि = पाँच किस्मों के साजों के बजने का मिश्रित सुर। अनहद = एक रस। पंच सबद = (तार, चमड़ी, धातु, घड़ा, हवा मारने वाले)।1।
अर्थ: मेरे हृदय-घर में मित्र प्रभु जी आ प्रकट हुए हैं। सदा-स्थिर प्रभु ने मुझे अपने चरणों में जोड़ लिया है। प्रभु जी ने मुझे आत्मिक अडोलता में टिका दिया है, अब प्रभु जी मेरे मन को प्यारे लग रहे हैं, मेरी पाँचों ज्ञान-इंद्रिय (अपने-अपने विषयों की ओर भागने की जगह प्रभु के प्रेम में) इकट्ठी हो के बैठ गई हैं, मैंने आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया है। जिस नाम-वस्तु की मेरे अंदर चाहत पैदा हो रही थी, वह अब मुझे मिल गई है। अब हर वक्त प्रभु के नाम से मेरा मिलाप बना रहता है, मेरा मन (उसके नाम से) पतीज गया है, मेरा हृदय और ज्ञान-इंद्रिय सोहावने हो गए हैं। मेरे हृदय-घर में सज्जन प्रभु जी आ प्रकट हुए हैं (अब मेरे अंदर ऐसा आनंद आ बना है, जैसे) पाँच किस्मों के साज लगातार मिश्रित सुर में (मेरे) अंदर बज रहे हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

आवहु मीत पिआरे ॥ मंगल गावहु नारे ॥ सचु मंगलु गावहु ता प्रभ भावहु सोहिलड़ा जुग चारे ॥ अपनै घरि आइआ थानि सुहाइआ कारज सबदि सवारे ॥ गिआन महा रसु नेत्री अंजनु त्रिभवण रूपु दिखाइआ ॥ सखी मिलहु रसि मंगलु गावहु हम घरि साजनु आइआ ॥२॥

मूलम्

आवहु मीत पिआरे ॥ मंगल गावहु नारे ॥ सचु मंगलु गावहु ता प्रभ भावहु सोहिलड़ा जुग चारे ॥ अपनै घरि आइआ थानि सुहाइआ कारज सबदि सवारे ॥ गिआन महा रसु नेत्री अंजनु त्रिभवण रूपु दिखाइआ ॥ सखी मिलहु रसि मंगलु गावहु हम घरि साजनु आइआ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मीत पिआरे = हे मेरे प्यारे मित्रो! हे मेरी ज्ञानेन्द्रियो! नारे = हे नारियो! हे मेरी सहेलियो! हे मेरी ज्ञानेन्द्रियो! मंगल = खुशी के गीत, वे गीत जो मन में खुशी पैदा करें, परमात्मा के महिमा के गीतजो मन में हिलौरे पैदा करते हैं। सचु = सदा कायम रहने वाला। सचु मंगलु = अटल आत्मिक आनंद देने वाला महिमा का गीत। जुग चारे = सदा के लिए अटल। अपनै घरि = अपने हृदय घर में। थानि = हृदय स्थल में। सुहाइआ = शोभा दे रहा है। कारज = मेरे जीवन उद्देश्य। सबदि = गुरु के शब्द ने। नेत्री = मेरी आँखों में। अंजनु = सुरमा। त्रिभवण रूपु = तीन भवनों में व्यापक प्रभु का दीदार। सखी = हे मेरी सहेलियो! हे मेरी ज्ञान-इंद्रिय! मिलहु = अपने-अपने विषयों से हट के प्रभु प्यार में आ मिलो। रसि = आनंद से। साजनु = मित्र प्रभु।2।
अर्थ: हे मेरी ज्ञानेन्द्रियो! हे मेरी सहेलियो! आओ, परमात्मा की महिमा के गीत गाओ जो मन में हिलोरे पैदा करते हैं। वह गीत गाओ जो अटल आत्मिक आनंद पैदा करते हैं, महिमा के वह गीत गाओ जो चारों युगों में आत्मिक हुलारे दिए रखता है, तब ही तुम प्रभु को अच्छी लगोगी।
(हे सहेलियो! मेरे हृदय को अपना घर बना के सज्जन प्रभु) अपने घर में आया है, मेरे हृदय-घर में बैठा शोभायमान है, गुरु के शब्द ने मेरे जीवन का लक्ष्य सवार दिए हैं।
ऊँचे से ऊँचा आत्मिक आनंद देने वाले सतिगुरु के बख्शे ज्ञान का अंजन मुझे आँखों में डालने के लिए मिला है (उसकी इनायत से गुरु ने) मुझे तीन भवनों में व्यापक प्रभु के दर्शन करा दिए हैं।
हे सहेलियो! प्रभु के चरणों में जुड़ो और आनंद से महिमा के वह गीत गाओ जो आत्मिक हिल्लौरे पैदा करते हैं, मेरे हृदय-घर में सज्जन-प्रभु आ प्रकट हुए हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मनु तनु अम्रिति भिंना ॥ अंतरि प्रेमु रतंना ॥ अंतरि रतनु पदारथु मेरै परम ततु वीचारो ॥ जंत भेख तू सफलिओ दाता सिरि सिरि देवणहारो ॥ तू जानु गिआनी अंतरजामी आपे कारणु कीना ॥ सुनहु सखी मनु मोहनि मोहिआ तनु मनु अम्रिति भीना ॥३॥

मूलम्

मनु तनु अम्रिति भिंना ॥ अंतरि प्रेमु रतंना ॥ अंतरि रतनु पदारथु मेरै परम ततु वीचारो ॥ जंत भेख तू सफलिओ दाता सिरि सिरि देवणहारो ॥ तू जानु गिआनी अंतरजामी आपे कारणु कीना ॥ सुनहु सखी मनु मोहनि मोहिआ तनु मनु अम्रिति भीना ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंम्रिति = अमृत से, आत्मिक जीवन देने वाले नाम जल से। भिंना = भीगा हुआ। अंतरि = (मेरे) अंदर, मेरे हृदय में। रतंना = रतन। ततु = तत्व, the supreme being, परमात्मा। परम ततु = परमात्मा। वीचारो = विचार। जंत भेख दाता = भेखारी जीवों का दाता। सफलिओ = कामयाब। सिरि सिरि = हरेक सिर पर। जानु = सुजान समझदार। आपे = आप ही। कारणु = जगत। मोहनि = मोहन ने, प्रभु ने (देखें: ‘मोहन तेरे ऊचे मंदर’, गउड़ी महला ५)।3।
अर्थ: हे सहेलियो! मेरा मन और शरीर आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल से भीग गया है, मेरे हृदय में प्रेम-रत्न पैदा हो गया है। मेरे हृदय में परमात्मा के गुणो की विचार (का एक ऐसा) सुंदर रत्न पैदा हो गया है (जिसकी इनायत से मैं उसके दर पर यूं अरदास करती हूँ - हे प्रभु! सारे जीव तेरे दर के भिखारी हैं) तू भिखारी जीवों का कामयाब दाता है, तू हरेक जीव के सिर पर (रखवाला और) दातार है। तू समझदार है, ज्ञानवान है, हरेक के दिल की जानने वाला है, तूने खुद ही ये (सारा) जगत रचा है (और खुद ही हरेक की जरूरतें पूरी करनी जानता ह। और पूरी करता है)।
हे सहेलियो! (मेरा हाल सुनो) मोहन-प्रभु ने मेरा मन अपने प्रेम के वश में कर लिया है, मेरा मन मेरा तन उसके नाम-अमृत जल से भीग गया है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

आतम रामु संसारा ॥ साचा खेलु तुम्हारा ॥ सचु खेलु तुम्हारा अगम अपारा तुधु बिनु कउणु बुझाए ॥ सिध साधिक सिआणे केते तुझ बिनु कवणु कहाए ॥ कालु बिकालु भए देवाने मनु राखिआ गुरि ठाए ॥ नानक अवगण सबदि जलाए गुण संगमि प्रभु पाए ॥४॥१॥२॥

मूलम्

आतम रामु संसारा ॥ साचा खेलु तुम्हारा ॥ सचु खेलु तुम्हारा अगम अपारा तुधु बिनु कउणु बुझाए ॥ सिध साधिक सिआणे केते तुझ बिनु कवणु कहाए ॥ कालु बिकालु भए देवाने मनु राखिआ गुरि ठाए ॥ नानक अवगण सबदि जलाए गुण संगमि प्रभु पाए ॥४॥१॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आतम रामु = जिंद जान। रामु = (रमते इति राम:) सर्व व्यापक। साचा = सच मुच के अस्तित्व वाला। अगम = (अगम्य) अगम्य (पहुँच से परे)। अपारा = बेअंत। सिध = जोग साधना में पुगे हुए जोगी। साधिक = साधना करने वाले। केते = अनेक। कालु = मौत। बिकालु = (‘काल’ के विपरीत) जनम। देवाले भए = पागल हो गए, भाग गए। गुरि = गुरु ने। ठाए = ठाय, जगह पर, प्रभु के चरणों में। सबदि = शब्द द्वारा। संगमि = संगम में।4।
अर्थ: हे प्रभु! तू संसार की जिंद-जान है, ये संसार तेरी सचमुच की रची हुई खेल है (भाव, है तो ये संसार एक खेल ही, है तो नाशवान, पर मन का भ्रम नहीं, सच-मुच मौजूद है)।
हे अगम्य (पहुँच से परे) और बेअंत प्रभु! ये संसार तेरी सचमुच की रची हुई एक खेल है (लीला है) (ये अस्लियत) तेरे बिना और कोई नहीं समझ सकता। (इस संसार में) अनेक ही पहुँचे हुए जोगी अनेक ही साधना करने वाले और अनेक ही समझदार होते आए हैं (तेरी ही मेहर से इस मंजिल मंजिल तक पहुँचते हैं) तेरे बिना और कोई तेरा स्मरण करा ही नहीं सकता। (तेरी ही मेहर से) गुरु ने जिसका मन तेरे चरणों में जोड़ा, उसके जनम-मरण के चक्कर समाप्त हो गए।
हे नानक! (प्रभु की मेहर के सदका) जिस मनुष्य ने गुरु के शब्द में जुड़ के (अपने अंदर से) औगुण जला लिए, उसने गुणों के मिलाप से प्रभु को पा लिया।4।1।2।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: छंद के बंद 4 हैं। ‘घरु २8 का ये पहला छंद है। कुल जोड़ है 2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला १ घरु ३ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला १ घरु ३ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

आवहु सजणा हउ देखा दरसनु तेरा राम ॥ घरि आपनड़ै खड़ी तका मै मनि चाउ घनेरा राम ॥ मनि चाउ घनेरा सुणि प्रभ मेरा मै तेरा भरवासा ॥ दरसनु देखि भई निहकेवल जनम मरण दुखु नासा ॥ सगली जोति जाता तू सोई मिलिआ भाइ सुभाए ॥ नानक साजन कउ बलि जाईऐ साचि मिले घरि आए ॥१॥

मूलम्

आवहु सजणा हउ देखा दरसनु तेरा राम ॥ घरि आपनड़ै खड़ी तका मै मनि चाउ घनेरा राम ॥ मनि चाउ घनेरा सुणि प्रभ मेरा मै तेरा भरवासा ॥ दरसनु देखि भई निहकेवल जनम मरण दुखु नासा ॥ सगली जोति जाता तू सोई मिलिआ भाइ सुभाए ॥ नानक साजन कउ बलि जाईऐ साचि मिले घरि आए ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आवहु = आओ। सजणा = हे सज्जन प्रभु! हउ = मैं। देखा = देखूँ। घरि = हृदय घर में, अंतरात्मे। खड़ी तका = खड़ी हो के इन्तजार कर रही हूँ। मै मनि = मेरे मन में। घनेरा = बहुत। प्रभ मेरा = हे मेरे प्रभु! मै = मुझे। निहकेवल = पवित्र, निर्लिप। जाता = पहचाना। तू सोई = तुझे ही। भाइ = प्रेम से। भाउ = प्रेम। भाउ = प्रेम। साचि = सदा स्थिर नाम में जुड़ने से। घरि = हृदय घर में। आए = आय, आ के।1।
अर्थ: हे सज्जन प्रभु! आ, मैं तेरे दर्शन कर सकूँ। (हे सज्जन!) मैं अपने हृदय में पूरी सावधानी से तेरा इन्तजार कर रही हूँ, मेरे मन में बड़ा चाव है (कि मुझे तेरे दर्शन हों)। हे मेरे प्रभु! (मेरी विनती) सुन, मेरे मन में (तेरे दर्शनों के लिए) बड़ा ही उत्साह है, मुझे आसरा भी तेरा ही है।
(हे प्रभु!) जिस जीव-स्त्री ने तेरे दर्शन कर लिए, वह पवित्र आत्मा हो गई, उसके जनम-मरण के दुख दूर हो गए। उसने सारे जीवों में तुझे ही बसता पहचान लिया, उसके प्रेम (के आर्कषण) के द्वारा तू उसे मिल गया।
हे नानक! सज्जन प्रभु से सदके होना चाहिए। जो जीव-स्त्री उसके सदा-स्थिर नाम में जुड़ती है, उसके हृदय में वह आ प्रगट होता है।1।

[[0765]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

घरि आइअड़े साजना ता धन खरी सरसी राम ॥ हरि मोहिअड़ी साच सबदि ठाकुर देखि रहंसी राम ॥ गुण संगि रहंसी खरी सरसी जा रावी रंगि रातै ॥ अवगण मारि गुणी घरु छाइआ पूरै पुरखि बिधातै ॥ तसकर मारि वसी पंचाइणि अदलु करे वीचारे ॥ नानक राम नामि निसतारा गुरमति मिलहि पिआरे ॥२॥

मूलम्

घरि आइअड़े साजना ता धन खरी सरसी राम ॥ हरि मोहिअड़ी साच सबदि ठाकुर देखि रहंसी राम ॥ गुण संगि रहंसी खरी सरसी जा रावी रंगि रातै ॥ अवगण मारि गुणी घरु छाइआ पूरै पुरखि बिधातै ॥ तसकर मारि वसी पंचाइणि अदलु करे वीचारे ॥ नानक राम नामि निसतारा गुरमति मिलहि पिआरे ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: घरि = घर में, हृदय में। आइअड़े साजना = प्यारे सज्जन जी आए, प्यारे सज्जन प्रभु जी प्रकट हुए। ता = तब। धन = जीव-स्त्री। खरी = बहुत। सरसी = स+रसी, खुश, प्रसन्न। हरि मोहिअड़ी साच सबदि = साच हरि सबदि मोहिअड़ी, सदा स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द में आकर्षित किया। रहंसी = एकाग्र चिक्त, अडोल चिक्त। संगि = साथ। जा = जब। रावी = अपने साथ जोड़ लिया, (उसे) पाया। रंगि रातै = प्रेम में रंगे हुए प्रभु ने। मारि = मार के। गुणी = गुणों से। घरु = हृदय। छाइआ = ढक दिया, भरपूर कर दिया। पुरखि = पुरख ने। बिधातै = विधाते ने, निर्माता ने। तसकर = कामादिक चोर। पंचाइणि = पंचायण में। पंचाइणु = (पंच+अयन। पंच = साधु-संगत। अयन = घर) साधु-संगत जिसका घर है, जो साधु-संगत में बसता है, परमात्मा। वीचारो = विचार, पूरी विचार से। अदलु = न्याय। निसतारा = पार उतारा। मिलहि पिआरे = प्यारे प्रभु जी मिल पड़ते हैं।2।
अर्थ: जब सज्जन प्रभु जी जीव-स्त्री के हृदय-गृह में प्रकट होते हैं, तो जीव-स्त्री बहुत प्रसन्न-चिक्त हो जाती है। जब सदा-स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द ने उसको आकर्षित किया, तब ठाकुर जी के दर्शन करके वह अडोल-चिक्त हो गई।
जब प्रेम-रंग में रंगे हुए परमात्मा ने जीव-स्त्री को अपने चरणों में जोड़ा तो वह प्रभु के गुणों (की याद) में अडोल-आत्मा हो गई और बहुत प्रसन्न-चिक्त हो गई। पूरन-पुरख ने, विधाता ने (उसके अंदर से) अवगुण दूर करके उसके हृदय को गुणों से भरपूर कर दिया कामादिक चोरों को मार के वह जीव-स्त्री उस परमात्मा (के चरणों) में टिक गई जो सदा पूरी विचार से न्याय करता है।
हे नानक! परमात्मा के नाम में जुड़ने से संसार-समुंदर से पार लांघा जाता है, गुरु की शिक्षा पर चलने से प्यारे प्रभु जी मिल पड़ते हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

वरु पाइअड़ा बालड़ीए आसा मनसा पूरी राम ॥ पिरि राविअड़ी सबदि रली रवि रहिआ नह दूरी राम ॥ प्रभु दूरि न होई घटि घटि सोई तिस की नारि सबाई ॥ आपे रसीआ आपे रावे जिउ तिस दी वडिआई ॥ अमर अडोलु अमोलु अपारा गुरि पूरै सचु पाईऐ ॥ नानक आपे जोग सजोगी नदरि करे लिव लाईऐ ॥३॥

मूलम्

वरु पाइअड़ा बालड़ीए आसा मनसा पूरी राम ॥ पिरि राविअड़ी सबदि रली रवि रहिआ नह दूरी राम ॥ प्रभु दूरि न होई घटि घटि सोई तिस की नारि सबाई ॥ आपे रसीआ आपे रावे जिउ तिस दी वडिआई ॥ अमर अडोलु अमोलु अपारा गुरि पूरै सचु पाईऐ ॥ नानक आपे जोग सजोगी नदरि करे लिव लाईऐ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: वरु = पति प्रभु। पाइअड़ा = मिल गया। बालड़ीए = जिस जीव-स्त्री ने। मनसा = इच्छा (मनीषा)। पिरि = पिर ने, पति ने। राविअड़ी = अपने चरणों में जोड़ ली। सबदि = गुरु के शब्द से। रवि रहिआ = सब जगह व्यापक (दिखता है)। घटि घटि = हरेक घट में। सबाई नारि = सारी जीव स्त्रीयां। रसीआ = आनंद का मालिक, आनंद का श्रोत। वडिआई = रज़ा। गुरि = गुरु के द्वारा। सचु = सदा स्थिर रहने वाला। जोग सजोगी = मिलाप के संजो बनाने वाला, योग के संयोग बनाने वाला।3।
अर्थ: जिस जीव-स्त्री ने पति-प्रभु को पा लिया, उसकी हरेक आस उसकी हरेक इच्छा पूरी हो जाती है (भाव, उसका मन दुनिया की आशाओं आदि की ओर नहीं दौड़ता भागता)। जिस जीव-स्त्री को प्रभु-पति ने अपने चरणों में जोड़ लिया, जो जीव-स्त्री गुरु के शब्द की इनायत से प्रभु में लीन हो गई, उसे प्रभु हर जगह व्यापक दिखाई देता है, उसको अपने से दूर नहीं प्रतीत होता। उसे ये निश्चय हो जाता है कि प्रभु कहीं दूर नहीं हरेक शरीर में वही मौजूद है, सारी जीव-स्त्रीयां उसी की ही हैं। वह स्वयं ही आनंद का श्रोत है, जैसे उसकी रजा होती है वह स्वयं ही अपने मिलाप का आनंद देता है। वह परमात्मा मौत-रहित है, माया में डोलता नहीं उसका मूल्य नहीं पड़ सकता (भाव, कोई पदार्थ भी उसके बराबर का नहीं) वह सदा-स्थिर रहने वाला है, वह बेअंत है, पूरे गुरु के द्वारा ही उसकी प्राप्ति होती है।
हे नानक! प्रभु खुद ही जीवों के अपने साथ मेल के संयोग बनाता है, जब वह मेहर की नजर करता है, तब जीव उसमें तवज्जो जोड़ता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पिरु उचड़ीऐ माड़ड़ीऐ तिहु लोआ सिरताजा राम ॥ हउ बिसम भई देखि गुणा अनहद सबद अगाजा राम ॥ सबदु वीचारी करणी सारी राम नामु नीसाणो ॥ नाम बिना खोटे नही ठाहर नामु रतनु परवाणो ॥ पति मति पूरी पूरा परवाना ना आवै ना जासी ॥ नानक गुरमुखि आपु पछाणै प्रभ जैसे अविनासी ॥४॥१॥३॥

मूलम्

पिरु उचड़ीऐ माड़ड़ीऐ तिहु लोआ सिरताजा राम ॥ हउ बिसम भई देखि गुणा अनहद सबद अगाजा राम ॥ सबदु वीचारी करणी सारी राम नामु नीसाणो ॥ नाम बिना खोटे नही ठाहर नामु रतनु परवाणो ॥ पति मति पूरी पूरा परवाना ना आवै ना जासी ॥ नानक गुरमुखि आपु पछाणै प्रभ जैसे अविनासी ॥४॥१॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पिरु = पति प्रभु। उचड़ी = सुंदर ऊँची। उचड़ीऐ = सुंदर ऊँची में। माड़ी = महल। माड़ड़ी = सुंदर महल। माड़ड़ीऐ = सुंदर महल में। तिहु लोआ = तीनों लोकों का। सिरताजा = सिर का ताज, पति। हउ = मैं। बिखम = हैरान। अनहद = एक रस, बिना बजाए बजने वाला। सबद = नाद, जीवन लहर। अगाजा = चारों तरफ गर्जता है। वीचारी = विचारने वाला। करणी = आचरण। सारी = श्रेष्ठ। नीसाणो = नासाणु, परवाना, राहदारी। ठाहर = जगह, ठिकाना। परवाणो = मंजूर, स्वीकार। पति = इज्जत। पूरी = जिसमें कोई कमी ना हो। परवाना = हुक्म। आपु = अपने आप को, अपने जीवन को।4।
अर्थ: प्रभु-पति एक सोहाने-ऊँचे महल में बसता है (जहाँ माया का प्रभाव नहीं पड़ सकता) वह तीनों लोकों का नाथ है। उसके गुण देख के मैं हैरान हो रही हूँ। चारों तरफ (सारे संसार में) उसकी जीवन-लहर एक-रस रुमक रही है।
जो मनुष्य प्रभु के महिमा के शब्द को विचारता है (भाव, अपने मन में बसाता है) जिसने ये श्रेष्ठ कर्तव्य बना लिया है, जिसके पास परमात्मा के नाम (रूपी) राहदारी है (उसको प्रभु की हजूरी में जगह मिल जाती है, पर) नाम-हीन खोटे मनुष्य को (उसकी दरगाह में) जगह नहीं मिलती। (प्रभु के दर पर) प्रभु का नाम-रत्न ही स्वीकार होता है।
जिस मनुष्य के पास (प्रभु-नाम का) अ-रुक परवाना है, उसको (प्रभु-दर पर) पूरी इज्जत मिलती है उसकी अक्ल त्रुटि-हीन हो जाती है।, वह जनम-मरन के चक्कर से बच जाता है।
हे नानक! गुरु की शरण पड़ कर जो मनुष्य अपने जीवन को पड़तालता है, वह अविनाशी प्रभु का रूप हो जाता है।4।1।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सूही छंत महला १ घरु ४ ॥

मूलम्

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सूही छंत महला १ घरु ४ ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

जिनि कीआ तिनि देखिआ जगु धंधड़ै लाइआ ॥ दानि तेरै घटि चानणा तनि चंदु दीपाइआ ॥ चंदो दीपाइआ दानि हरि कै दुखु अंधेरा उठि गइआ ॥ गुण जंञ लाड़े नालि सोहै परखि मोहणीऐ लइआ ॥ वीवाहु होआ सोभ सेती पंच सबदी आइआ ॥ जिनि कीआ तिनि देखिआ जगु धंधड़ै लाइआ ॥१॥

मूलम्

जिनि कीआ तिनि देखिआ जगु धंधड़ै लाइआ ॥ दानि तेरै घटि चानणा तनि चंदु दीपाइआ ॥ चंदो दीपाइआ दानि हरि कै दुखु अंधेरा उठि गइआ ॥ गुण जंञ लाड़े नालि सोहै परखि मोहणीऐ लइआ ॥ वीवाहु होआ सोभ सेती पंच सबदी आइआ ॥ जिनि कीआ तिनि देखिआ जगु धंधड़ै लाइआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जिनि = जिस ने, (हे प्रभु!) जिस तू ने। कीआ = पैदा किया है। तिनि = उसने (हे प्रभु!) उस तू ने ही। देखिआ = संभाल की हुई है। धंधड़ै = माया की दौड़ भाग में। दानि तेरै = तेरी बख्शिश से। घटि = जीव के हृदय में। तनि = शरीर में। चंदु दीपाइआ = चाँद चमक रहा है, शीतलता हुलारे दे रही है। दानि हरि कै = परमात्मा की बख्शिश से। सोहै = शोभा देती है। परखि = परख के। मोहणी = मन को मोह लेने वाली, सुंदर स्त्री, वह जीव-स्त्री जिसने अपना जीवन सुंदर बना लिया है। मोहणीऐ = सुंदर जीव-स्त्री ने। सेती = साथ। सोभ = शोभा। वीवाहु = जीव-स्त्री का प्रभु से मिलाप। पंच सबद = पाँच किस्मों के साजों के बजने की आवाजें। पंच सबद धुनि = पाँच किस्मों के साजों के बजन से पैदा हुई मिले-जुले सुर, एक रस आनंद। पंच सबदी = एक रस आनंद देने वाला प्रभु। आइआ = हृदय में प्रकट हुआ।1।
अर्थ: जिस प्रभु ने ये जगत पैदा किया है उसी ने ही इसकी संभाल की हुई है, उसी ने ही इसको माया की दौड़-भाग में लगाया हुआ है।
(पर, हे प्रभु!) तेरी बख्शिश से (किसी सौभाग्य भरे) हृदय में तेरी ज्योति का प्रकाश होता है, (किसी सौभाग्यशाली) शरीर में चाँद चमकता है (तेरे नाम की शीतलता हिल्लौरे देती है)।
प्रभु की बख्शिश से जिस हृदय में (प्रभु नाम की) शीतलता चमक मारती है उस हृदय में से (अज्ञानता का) अंधकार और दुख-कष्ट दूर हो जाता है। जैसे बारात दूल्हे के साथ ही फबती है, वैसे ही जीव-स्त्री के गुण (भी) तभी अच्छे लगते हैं जब प्रभु-पति हृदय में बसता हो। जिस जीव-स्त्री ने अपने जीवन को प्रभु की महिमा से सुंदर बना लिया है, उस ने इसकी कद्र समझ के प्रभु को अपने हृदय में बसा लिया है। उसका प्रभु-पति से मिलाप हो जाता है, (लोक-परलोक में) उसे शोभा भी मिलती है, एक-रस आत्मिक आनंद का दाता प्रभु उसके हृदय में प्रकट हो जाता है।
जिस प्रभु ने ये जगत पैदा किया है वही इसकी संभाल करता है, उसने इसको माया की दौड़-भाग में लगाया हुआ है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हउ बलिहारी साजना मीता अवरीता ॥ इहु तनु जिन सिउ गाडिआ मनु लीअड़ा दीता ॥ लीआ त दीआ मानु जिन्ह सिउ से सजन किउ वीसरहि ॥ जिन्ह दिसि आइआ होहि रलीआ जीअ सेती गहि रहहि ॥ सगल गुण अवगणु न कोई होहि नीता नीता ॥ हउ बलिहारी साजना मीता अवरीता ॥२॥

मूलम्

हउ बलिहारी साजना मीता अवरीता ॥ इहु तनु जिन सिउ गाडिआ मनु लीअड़ा दीता ॥ लीआ त दीआ मानु जिन्ह सिउ से सजन किउ वीसरहि ॥ जिन्ह दिसि आइआ होहि रलीआ जीअ सेती गहि रहहि ॥ सगल गुण अवगणु न कोई होहि नीता नीता ॥ हउ बलिहारी साजना मीता अवरीता ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हउ = मैं। अवरीता = (अवृत) जिस पर माया का पर्दा नहीं पड़ा। जिन सिउ गाडिआ = जिस से मिलाया है। तनु = शरीर। मनु लीअड़ा दीता = जिस का मन लिया है और जिस को अपना मन दिया है, जिनसे दिल की सांझ डाली है। मानु = मन। वीसरहि = भूल जाएं। दिसि आइआ = दिस आया, दीदार करने से। होहि रलीआ = आत्मिक खुशियां पैदा होती हैं। जीअ सेती = जिंद से। गहि रहहि = पकड़ के रखते हैं, लगाए रखते हैं। सबल = सारे। नीता नीता = नित्य, सदा ही।2।
अर्थ: मैं उन सज्जनों-मित्रों से सदके जाता हूँ जिस पर माया का पर्दा नहीं पड़ा जिनकी संगति करके मैंने उनके साथ दिली सांझ डाली है। जिस गुरमुखों के साथ दिली सांझ पड़ सके वे सज्जन कभी भी भूलने नहीं चाहिए। उनका दर्शन करने से आत्मिक खुशियाँ पैदा होती हैं, वह सज्जन (अपने सत्संगियों को अपनी) जान की तरह रखते हैं (जिंद से भी ज्यादा प्यारा समझते हैं)। उनमें सारे ही गुण होते हें, अवगुण उनके नजदीक नहीं फटकते।
मैं सदके हूँ उन सज्जन-मित्रों के जिस पर माया अपना असर ना कर सकी।2।

[[0766]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुणा का होवै वासुला कढि वासु लईजै ॥ जे गुण होवन्हि साजना मिलि साझ करीजै ॥ साझ करीजै गुणह केरी छोडि अवगण चलीऐ ॥ पहिरे पट्मबर करि अड्मबर आपणा पिड़ु मलीऐ ॥ जिथै जाइ बहीऐ भला कहीऐ झोलि अम्रितु पीजै ॥ गुणा का होवै वासुला कढि वासु लईजै ॥३॥

मूलम्

गुणा का होवै वासुला कढि वासु लईजै ॥ जे गुण होवन्हि साजना मिलि साझ करीजै ॥ साझ करीजै गुणह केरी छोडि अवगण चलीऐ ॥ पहिरे पट्मबर करि अड्मबर आपणा पिड़ु मलीऐ ॥ जिथै जाइ बहीऐ भला कहीऐ झोलि अम्रितु पीजै ॥ गुणा का होवै वासुला कढि वासु लईजै ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: वास = (वासु = to make fragrant, सुगंधित करना) सुगंधि, खुशबू। वासुला = सुगंधि देने वाली वस्तुओं का डिब्बा। कढि = निकाल के। लईजै = लेनी चाहिए। साजना मिलि = गुरमुखों के साथ मिल के। साझ = गुणों की सांझ। करीजै = करनी चाहिए। गुणह केरी = गुणों की। केरी = की। छोडि = त्याग के। चलीऐ = जीवन-यात्रा में चलना चाहिए। पहिरे = पहन के। पटंबर = (पट+अंबर) रंशम के कपड़े, कोमलता और प्रेम भरा बर्ताव। अडंबर = हार श्रृंगार, सोहाने उद्यम। मलीऐ = कब्जा कर लेना चाहिए, कब्जा किया जा सकता है। आपणा पिड़ु मलीऐ = दुनिया के विकारों से मुकाबले के लिए मैदान संभाला जा सकता है, विकारों से टकराव पर कुश्ती जीती जा सकती है।

दर्पण-टिप्पनी

(नोट: जगत में जीव, मानो, पहलवान है। कामादिक विकारों से इसकी कुष्ती हो रही है। जो हार जाता है वह मैदान छोड़ के भाग जाता है)।

दर्पण-भाषार्थ

पिड़ = वह जगह जहाँ कुष्तियाँ होती हैं (दंगल स्थल)। कहीऐ = कहना चाहिए। झोलि = हिला के, नितार के, विकारों की गंदगी आदि को परे हटा के। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल। पीजै = पीना चाहिए।3।
अर्थ: (अगर किसी मनुष्य के पास सुगंधि देने वाली वस्तुओं से भरा डिब्बा हो, उस डब्बे का लाभ उसे तब ही है जब वह उस डब्बे को खोल के उससे सुगंधि ले। गुरमुखों की संगति गुणों का डब्बा है) यदि किसी को गुणों का डब्बा मिल जाए, तो वह डब्बा खोल के (डब्बे के भीतर की) सुगंधि लेनी चाहिए। (हे भाई!) अगर तू चाहता है कि तेरे अंदर (भी) गुण पैदा हों, तो गुरमुखों को मिल के उनके साथ गुणों की सांझ करनी चाहिए। (गुरमुखों से) गुणों की सांझ करनी चाहिए, इस तरह (अंदर से) अवगुण त्याग के जीवन-यात्रा पर चला जा सकता है, सबसे प्रेम भरा बर्ताव करके भलाई के सुंदर उद्यम करके विकारों से मुकाबला और जीवन-युद्ध को जीता जा सकता है।
(गुरमुखों की संगति की इनायत से फिर) जहाँ भी जा के बैठें भलाई की बात ही की जा सकती है, और बुरी ओर से हट के आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीया जा सकता है।
(हे भाई!) अगर किसी को गुणों का डब्बा मिल जाए तो वह डब्बा खोल के (डब्बे की) सुगंधि लेनी चाहिए।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

आपि करे किसु आखीऐ होरु करे न कोई ॥ आखण ता कउ जाईऐ जे भूलड़ा होई ॥ जे होइ भूला जाइ कहीऐ आपि करता किउ भुलै ॥ सुणे देखे बाझु कहिऐ दानु अणमंगिआ दिवै ॥ दानु देइ दाता जगि बिधाता नानका सचु सोई ॥ आपि करे किसु आखीऐ होरु करे न कोई ॥४॥१॥४॥

मूलम्

आपि करे किसु आखीऐ होरु करे न कोई ॥ आखण ता कउ जाईऐ जे भूलड़ा होई ॥ जे होइ भूला जाइ कहीऐ आपि करता किउ भुलै ॥ सुणे देखे बाझु कहिऐ दानु अणमंगिआ दिवै ॥ दानु देइ दाता जगि बिधाता नानका सचु सोई ॥ आपि करे किसु आखीऐ होरु करे न कोई ॥४॥१॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: किसु आखीऐ = और किसी के आगे गिला नहीं किया जा सकता। ता कउ = उस (परमात्मा) को। जाइ = जा के। किउ भुलै = नहीं भूल सकता। बाझु कहिऐ = (जीवों के) कहे बिना ही। दिवै = देता है, देवै। देइ = देता है। जगि = जगत में (सब जीवों को)। बिधाता = विधाता, निर्माता। सचु = सदा स्थिर रहने वाला।4।
अर्थ: (जगत में अनेक ही जीव गुण कमा रहे हैं, अनेक ही अवगुण कमा रहे हैं। ये परमात्मा की अपनी ही रची हुई खेल है) परमात्मा स्वयं ही (ये सब कुछ) कर रहा है, उसके बिना और कोई नहीं कर सकता, (तभी तो) किसी और के पास (इसके संबंध में) कोई गिला-शिकवा आदि नहीं किया जा सकता। (फिर जो कुछ वह प्रभु करता है ठीक करता है) वह टूटा हुआ नहीं हैं, इस वास्ते (किसी कमी के बारे में) उसे कुछ कहने की आवश्यक्ता ही नहीं पड़ती। अगर वह टूटा हुआ (व भटका हुआ) हो तो जा के कुछ कहें भी, पर स्वयं कर्तार कोई भूल नहीं कर सकता। वह सब जीवों की अरदासें सुनता है वह सब जीवों के किए कर्मों को देखता है, माँगे बिना ही सबको दान देता है। हे नानक! वह विधाता ही सदा-स्थिर रहने वाला है। वह सब कुछ स्वयं ही करता है, कोई और (उससे आकी हो के) कुछ नहीं कर सकता। किसी और के पास जा के कोई गिला नहीं किया जा सकता।4।1।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला १ ॥ मेरा मनु राता गुण रवै मनि भावै सोई ॥ गुर की पउड़ी साच की साचा सुखु होई ॥ सुखि सहजि आवै साच भावै साच की मति किउ टलै ॥ इसनानु दानु सुगिआनु मजनु आपि अछलिओ किउ छलै ॥ परपंच मोह बिकार थाके कूड़ु कपटु न दोई ॥ मेरा मनु राता गुण रवै मनि भावै सोई ॥१॥

मूलम्

सूही महला १ ॥ मेरा मनु राता गुण रवै मनि भावै सोई ॥ गुर की पउड़ी साच की साचा सुखु होई ॥ सुखि सहजि आवै साच भावै साच की मति किउ टलै ॥ इसनानु दानु सुगिआनु मजनु आपि अछलिओ किउ छलै ॥ परपंच मोह बिकार थाके कूड़ु कपटु न दोई ॥ मेरा मनु राता गुण रवै मनि भावै सोई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: राता = रंगा हुआ, रत्र। रवै = याद करता है, स्मरण करता है। मनि = मन में। सोई = वही, वह प्रभु ही। पउड़ी साच की = सदा स्थिर प्रभु तक पहुँचाने वाली सीढ़ी। साचा = सदा स्थिर रहने वाला। सुखु = आत्मक आनंद। सूखि = आत्मिक आनंद में। सहजि = आत्मिक अडोलता में। आवै = आता है, पहुँचता है। साच भावै = सदा स्थिर प्रभु को प्यारा लगता है।

दर्पण-टिप्पनी

(नोट: कई बीड़ों में पाठ ‘साचु’ है। इस तरह अर्थ बनता है; उस बंदे को सदा स्थिर प्रभु प्यारा लगता है। पर श्री करतारपुर वाली बीड़ में पाठ ‘साच’ है)।

दर्पण-भाषार्थ

साच की मति = सदा स्थिर प्रभु के गुण गाने वाली मति। किउ टलै = नहीं टलती, अटल हो जाती है। सुगिआनु = अच्छा ज्ञान, ज्ञान की बातें कर सकने की अच्छी सामर्थ्य। मजनु = तीर्थ स्नान। अछलिओ = जो ठगा ना जा सके। किउ छलै = ठग नहीं सकता, खुश नहीं कर सकता। परपंच = धोखे। थाके = रह जाते हैं, हार जाते हैं, खत्म हो जाते हैं। दोई = द्वैत, मेर तेर। कपटु = ठगी।1।
अर्थ: (परमात्मा के प्यार में) रंगा हुआ मेरा मन (ज्यों-ज्यों परमात्मा के) गुण चेते करता है (त्यों-त्यों) मेरे मन में वह परमात्मा ही प्यारा लगता जाता है। परमात्मा के गुण गाने, मानो, एक सीढ़ी है जो गुरु ने दी है और इस सीढ़ी के माध्यम से सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा तक पहुँचा जा सकता है, (इस सीढ़ी पर चढ़ने की इनायत से मेरे अंदर) सदा-स्थिर रहने वाला आनंद बन रहा है।
जो मनुष्य (इस सीढ़ी की इनायत से) आत्मिक आनंद में आत्मिक अडोलता में पहुँचता है वह सदा-स्थिर प्रभु को प्यारा लगता है। सदा-स्थिर प्रभु के गुण गाने वाली उसकी मति अटल हो जाती है। परमात्मा अटल है। (अगर गुण गाने वाली मति नहीं बनी तो) कोई स्नान, कोई दान, कोई ज्ञान की चोंच-चर्चा, और कोई तीर्थ स्नान परमात्मा को खूश नहीं कर सकते। (गुण गाने वाले मनुष्य के मन में से) धोखे-फरेब, मोह के चमत्कार, विकार आदि सब समाप्त हो जाते हैं। उसके अंदर ना झूठ रह जाता है, ना ठगी रहती है, ना ही मेर-तेर रहती है।
(प्रभु के प्यार में) रंगा हुआ मेरा मन (ज्यों-ज्यों प्रभु के) गुण गाता है (त्यों-त्यों) मेरे मन में वह प्रभु ही प्यारा लगता जा रहा है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

साहिबु सो सालाहीऐ जिनि कारणु कीआ ॥ मैलु लागी मनि मैलिऐ किनै अम्रितु पीआ ॥ मथि अम्रितु पीआ इहु मनु दीआ गुर पहि मोलु कराइआ ॥ आपनड़ा प्रभु सहजि पछाता जा मनु साचै लाइआ ॥ तिसु नालि गुण गावा जे तिसु भावा किउ मिलै होइ पराइआ ॥ साहिबु सो सालाहीऐ जिनि जगतु उपाइआ ॥२॥

मूलम्

साहिबु सो सालाहीऐ जिनि कारणु कीआ ॥ मैलु लागी मनि मैलिऐ किनै अम्रितु पीआ ॥ मथि अम्रितु पीआ इहु मनु दीआ गुर पहि मोलु कराइआ ॥ आपनड़ा प्रभु सहजि पछाता जा मनु साचै लाइआ ॥ तिसु नालि गुण गावा जे तिसु भावा किउ मिलै होइ पराइआ ॥ साहिबु सो सालाहीऐ जिनि जगतु उपाइआ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जिनि = जिस (साहब) ने। कारणु = जगत। मनि मैलिऐ = अगर मन मैला रहे, अगर मन को विकारों की मैल लगी रहे। किनै = किसी विरले ने, किसी ने नहीं। मथि = मथ के, बार बार जप के। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम रस। मनु दीआ = मन (गुरु को) दे दिया। मोलु = मूल्य, कीमत। सहजि = आत्मिक अडोलता में। साचै = सदा स्थिर रहने वाले प्रभु में। तिसु नालि = उस प्रभु के चरणों में जुड़ के। गावा = मैं गा सकता हूँ। तिसु भावा = उस प्रभु को अच्छा लगूँ। किउ मिलै = नहीं मिल सकता। होइ = हो के। पराइआ = बेगाना।2।
अर्थ: उस मालिक प्रभु की महिमा करनी चाहिए जिसने जगत पैदा किया है। (महिमा किए बिना मनुष्य के मन में विकारों की) मैल लगी रहती है, और अगर मन (विकारों से) मैला टिका रहे तो कोई भी नाम-अमृत पी नहीं सकता। (पर इस नाम-अमृत की प्राप्ति के लिए भी मूल्य चुकाना पड़ता है) मैंने गुरु से मूल्य डलवाया (तो उसने बताया कि) जिसने अपना ये मन (गुरु के) हवाले किया उसने बार-बार स्मरण करके नाम-अमृत पी लिया। (गुरु के बताए हुए राह पर चल कर) जब किसी मनुष्य ने अपना मन (मैल से हटा के) सदा-स्थिर प्रभु में जोड़ा तो उसने आत्मिक अडोलता में टिक के अपने प्रीतम प्रभु से गहरी सांझ डाल ली।
(पर) मैं तब ही प्रभु-चरणों से जुड़ के प्रभु के गुण गा सकता हूँ अगर प्रभु की रजा ही हो (यदि मैं उसे अच्छा लगने लगूँ)। प्रभु के साथ ऊपर-ऊपर रहने पर प्रभु के साथ मिलाप नहीं हो सकता।
(सो, हे भाई!) उस मालिक प्रभु की (सदा) महिमा करनी चाहिए जिसने (ये) जगत पैदा किया है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

आइ गइआ की न आइओ किउ आवै जाता ॥ प्रीतम सिउ मनु मानिआ हरि सेती राता ॥ साहिब रंगि राता सच की बाता जिनि बि्मब का कोटु उसारिआ ॥ पंच भू नाइको आपि सिरंदा जिनि सच का पिंडु सवारिआ ॥ हम अवगणिआरे तू सुणि पिआरे तुधु भावै सचु सोई ॥ आवण जाणा ना थीऐ साची मति होई ॥३॥

मूलम्

आइ गइआ की न आइओ किउ आवै जाता ॥ प्रीतम सिउ मनु मानिआ हरि सेती राता ॥ साहिब रंगि राता सच की बाता जिनि बि्मब का कोटु उसारिआ ॥ पंच भू नाइको आपि सिरंदा जिनि सच का पिंडु सवारिआ ॥ हम अवगणिआरे तू सुणि पिआरे तुधु भावै सचु सोई ॥ आवण जाणा ना थीऐ साची मति होई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आइ गइआ = आय गया (जिस मनुष्य के दिल में प्रभु) आ बसा। की न आइओ = उस के पास और क्या कुछ नहीं आया? उसे और क्या ना मिला? उसे किसी और चीज की तमन्ना ना रही। किउ आवै। जाता = वह क्यों पैदा होगा और मरेगा? उसका जनम मरण समाप्त हो जाता है। सेती = साथ। राता = रंगा जाता है। रंगि = रंगमें। सच की बाता = सदा स्थिर प्रभु की बातें। जिनि = जिस प्रभु ने। बिंब का कोटु = पानी की बूँद से शरीर किला। पंच भू = पंच तत्व। नाइको = मालिक। सिरंदा = पैदा करने वाला। सच = सदा स्थिर रहने वाला। सच का पिंडु = (सदा स्थिर प्रभु ने) अपने रहने के वास्ते शरीर। सवारिआ = सजाया। तुधु = तूझे। सचु = सदा स्थिर परमात्मा की महिमा करने वाली बूद्धि।3।
अर्थ: जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा आ बसे, उसे किसी और पदार्थ की लालसा नहीं रह जाती, उसका जनम-मरण समाप्त हो जाता है। उसका मन प्रीतम-प्रभु में रीझ जाता है, प्रभु के प्रेम से रंगा जाता है। उसका मन उस मालिक के रंग में रंगा जाता है, वह उस सदा-स्थिर मालिक की महिमा की बातें करता रहता है जिसने पानी की बूँद से शरीर किले का निर्माण किया है, जो पाँच तत्वों का मालिक है, जो स्वयं ही (शरीर जगत को) पैदा करने वाला है, जिसने अपने रहने के लिए मनुष्य का शरीर सजाया है।
हे प्यारे प्रभु! तू (मेरी विनती) सुन। हम जीव अवगुणों से भरे हुए हैं (तू स्वयं ही अपनी महिमा की दाति दे के हमें पवित्र करने वाला है) जो जीव (तेरी मेहर से) तुझे पसेंद आ जाता है वह तेरा ही रूप हो जाता है। उसके जनम-मरन के चक्कर समाप्त हो जाते हैं, उसकी बुद्धि अमोध हो जाती है (वह सद्बुद्धि वाला हो जाता है)।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अंजनु तैसा अंजीऐ जैसा पिर भावै ॥ समझै सूझै जाणीऐ जे आपि जाणावै ॥ आपि जाणावै मारगि पावै आपे मनूआ लेवए ॥ करम सुकरम कराए आपे कीमति कउण अभेवए ॥ तंतु मंतु पाखंडु न जाणा रामु रिदै मनु मानिआ ॥ अंजनु नामु तिसै ते सूझै गुर सबदी सचु जानिआ ॥४॥

मूलम्

अंजनु तैसा अंजीऐ जैसा पिर भावै ॥ समझै सूझै जाणीऐ जे आपि जाणावै ॥ आपि जाणावै मारगि पावै आपे मनूआ लेवए ॥ करम सुकरम कराए आपे कीमति कउण अभेवए ॥ तंतु मंतु पाखंडु न जाणा रामु रिदै मनु मानिआ ॥ अंजनु नामु तिसै ते सूझै गुर सबदी सचु जानिआ ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंजनु = सुरमा। अंजनु तैसा अंजीऐ = वैसा सुर्मा (आँखों में) डालना चाहिए, आत्मिक जीवन की प्राप्ति के लिए वैसा उद्यम करना चाहिए।

दर्पण-टिप्पनी

(नोट: स्त्री अपनी शारीरिक सुंदरता से अपने पति को प्रसन्न करने के लिए अपनी आँखों में सुर्मा डालती है)।

दर्पण-भाषार्थ

पिर भावै = पति को पसंद आ जाए।

दर्पण-टिप्पनी

(नोट: ‘पिर भावै’ और ‘पिरु भावै’ में फर्क है जो याद रखना चाहिए)।

दर्पण-भाषार्थ

जाणावै = जानने में सहायता करे। मारगि = (सही) रास्ते पर। लेवए = लेवे, लेता है, अपने वश में कर लेता है।
करम सुकरम = साधारण कर्म और अच्छे कर्म। अभेवए = अभेवै, अभेव प्रभु की। अभेव = जिसका भेद ना पाया जा सके। तंतु = तंत्र, टूणा। न जाणा = मैं नहीं जानता। रिदै = हृदय में। तिसै ते = उस परमात्मा से। सचु = सदा स्थिर प्रभु।4।
अर्थ: स्त्री को ऐसा सुर्मा पहनना चाहिए जैसा उसके पति को अच्छा लगे (जीव-स्त्री को प्रभु-पति के मिलाप के लिए ऐसे उद्यम करने चाहिए जो प्रभु-पति को पसंद आए)। (पर जीव के भी वश में क्या है?) जब परमात्मा खुद समझ बख्शे, तब ही जीव (सही रास्ता) समझ सकता है, तब ही जीव को सूझ आ सकती है, तब ही कुछ जाना जा सकता है। परमात्मा खुद ही समझ देता है, खुद ही सही रास्ते पर डालता है खुद ही जीव के मन को अपनी ओर प्रेरित करता है। साधारण काम और अच्छे काम परमात्मा खुद ही जीव से करवाता है, पर उस प्रभु का भेद नहीं पाया जा सकता, कोई उसकी कीमत नहीं जान सकता।
(परमात्मा का प्यार प्राप्त करने के लिए) मैं कोई जादू-टोना कोई मंत्र आदि पाखण्ड करना नहीं जानती। मैंने तो केवल उस प्रभु को अपने हृदय में बसाया है, मेरा मन उसकी याद में भीग गया है। प्रभु-पति को प्रसन्न करने के लिए उसका नाम ही सुर्मा है, इस सुर्मे की सूझ भी उसके पास से ही मिलती है। (जिस जीव को ये सूझ पड़ जाती है वह) गुरु के शब्द में जुड़ के उस सदा-स्थिर प्रभु के साथ गहरी सांझ डाल लेता है।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

साजन होवनि आपणे किउ पर घर जाही ॥ साजन राते सच के संगे मन माही ॥ मन माहि साजन करहि रलीआ करम धरम सबाइआ ॥ अठसठि तीरथ पुंन पूजा नामु साचा भाइआ ॥ आपि साजे थापि वेखै तिसै भाणा भाइआ ॥ साजन रांगि रंगीलड़े रंगु लालु बणाइआ ॥५॥

मूलम्

साजन होवनि आपणे किउ पर घर जाही ॥ साजन राते सच के संगे मन माही ॥ मन माहि साजन करहि रलीआ करम धरम सबाइआ ॥ अठसठि तीरथ पुंन पूजा नामु साचा भाइआ ॥ आपि साजे थापि वेखै तिसै भाणा भाइआ ॥ साजन रांगि रंगीलड़े रंगु लालु बणाइआ ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साजन होवनि आपणे = अगर सज्जन पुरुष अपने बन जाएं।

दर्पण-टिप्पनी

(नोट: शब्द ‘साजन होवनि आपणे’ आदर सत्कारन के भाव में ‘बहुवचन’ बरते जाते हैं)।

दर्पण-भाषार्थ

पर घर = पराए घरों में (घरि-घर में। घर-घरों में)। साजन राते = सज्जन पुरुख के रंग में रंगे हुए। सच के संगे = सदा स्थिर प्रभु की संगति में। मन माही = मन में, अंतरात्मे। साजन = प्रभु जी। रलीआ = आनंद। सबाइआ = सारा। करम धरम = धार्मिक कर्म। नामु साचा = सदा स्थिर प्रभु का नाम। भाइआ = भाया, प्यारा लगा। तिसै भाणा = उस प्रभु की ही मर्जी। साजन रांगि = सज्जन प्रभु के रंग में।5।
अर्थ: सज्जन प्रभु जी (जिस सौभाग्यशाली बँदों के) अपने बन जाते हैं, वह लोग फिर पराए घरों में नहीं जाते (भाव, प्रभु का स्मरण छोड़ के और तथाकथित धर्म-कर्म नहीं करते फिरते)। वे आदमी अंतरात्मे सदा-स्थिर सज्जन-प्रभु के साथ रंगे रहते हैं। वे अपने मन में सज्जन-प्रभु जी के मिलाप का आनंद ही लेते हैं, यही उनके वास्ते सारे धार्मिक कर्म हैं। उनको सदा-स्थिर प्रभु का नाम प्यारा लगता है; यही उनके वास्ते अढ़सठ तीर्थों का स्नान है, यही उनके वास्ते पुण्य-दान है और यही उनकी देव-पूजा है। उन लोगों को उसी प्रभु की रजा मीठी लगती है जो खुद (जगत को) पैदा करता है और पैदा करके संभाल करता है। सज्जन-प्रभु के रंग में रंगे हुए उन लोगों ने अपने अंदर प्रभु-प्रेम का लाल रंग बना रखा है।5।

[[0767]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

अंधा आगू जे थीऐ किउ पाधरु जाणै ॥ आपि मुसै मति होछीऐ किउ राहु पछाणै ॥ किउ राहि जावै महलु पावै अंध की मति अंधली ॥ विणु नाम हरि के कछु न सूझै अंधु बूडौ धंधली ॥ दिनु राति चानणु चाउ उपजै सबदु गुर का मनि वसै ॥ कर जोड़ि गुर पहि करि बिनंती राहु पाधरु गुरु दसै ॥६॥

मूलम्

अंधा आगू जे थीऐ किउ पाधरु जाणै ॥ आपि मुसै मति होछीऐ किउ राहु पछाणै ॥ किउ राहि जावै महलु पावै अंध की मति अंधली ॥ विणु नाम हरि के कछु न सूझै अंधु बूडौ धंधली ॥ दिनु राति चानणु चाउ उपजै सबदु गुर का मनि वसै ॥ कर जोड़ि गुर पहि करि बिनंती राहु पाधरु गुरु दसै ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंधा = माया के मोह में अंधा हुआ मनुष्य। थीऐ = बन गए। पाधरु = पध्धर, सीधा रास्ता। मूसै = ठगा जा रहा है, लूटा जा रहा है। मति होछिऐ = होछी मति के कारण। राहि = (सही) रास्ते पर। महल = परमात्मा का ठिकाना। अंधली = अंधी। अंध = अंधा मनुष्य। धंधली = माया की दौड़ भाग में। मनि = मन में। कर जोड़ि = (दोनों) हाथ जोड़ के। करि = कर, करता है। राहु पाधरु = सीधा रास्ता, पधरा राह।6।
अर्थ: अगर किसी मनुष्य का नायक (नेता) वह मनुष्य बन जाए जो खुद ही माया के मोह में अंधा हुआ पड़ा हो, तो वह जीवन-सफर का सीधा रास्ता नहीं समझ सकता, क्योंकि वह नायक स्वयं ही होछी अक्ल के कारण (कामादिक विकारों के हाथों) लुटा जा रहा है (उसकी रहनुमाई में चलने वाला भी) कैसे सही रास्ता पा सकता है? माया के मोह में अंधे हुए मनुष्य की अपनी ही बुद्धि भ्रष्ट (अंधी-बहरी) हुई होती है, वह खुद ही सही रास्ते पर नहीं चल सकता, और परमात्मा के दर को नहीं पा सकता; परमात्मा के नाम से वंचित होने के कारण उसको (सही जीवन के बारे में) कुछ नहीं सूझता, माया के मोह में अँधा हुआ मनुष्य माया की दौड़-भाग में डूबा रहता है।
पर जिस मनुष्य के मन में गुरु का शब्द बसता है, उसके हृदय में दिन-रात नाम का प्रकाश हुआ रहता है, उसके अंदर (सेवा-स्मरण का) उत्साह पैदा हुआ रहता है। वह अपने दोनों हाथ जोड़ के गुरु के पास विनती करता रहता है क्योंकि गुरु उसको जीवन का सही रास्ता बताता है।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मनु परदेसी जे थीऐ सभु देसु पराइआ ॥ किसु पहि खोल्हउ गंठड़ी दूखी भरि आइआ ॥ दूखी भरि आइआ जगतु सबाइआ कउणु जाणै बिधि मेरीआ ॥ आवणे जावणे खरे डरावणे तोटि न आवै फेरीआ ॥ नाम विहूणे ऊणे झूणे ना गुरि सबदु सुणाइआ ॥ मनु परदेसी जे थीऐ सभु देसु पराइआ ॥७॥

मूलम्

मनु परदेसी जे थीऐ सभु देसु पराइआ ॥ किसु पहि खोल्हउ गंठड़ी दूखी भरि आइआ ॥ दूखी भरि आइआ जगतु सबाइआ कउणु जाणै बिधि मेरीआ ॥ आवणे जावणे खरे डरावणे तोटि न आवै फेरीआ ॥ नाम विहूणे ऊणे झूणे ना गुरि सबदु सुणाइआ ॥ मनु परदेसी जे थीऐ सभु देसु पराइआ ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: परदेसी = अपने देश से विछुड़ा हुआ, प्रभु चरणों से विछुड़ा हुआ। पराइआ = बेगाना, पराया। खोलउ = मैं खोलूँ। पहि = के पास। गंठड़ी = दुखों की गठड़ी। दूखी = दुखों से। सबाइआ = सारा। बिधि = हालत, दशा। आवणे जावणे = जनम मरन के चक्र। खरे = बहुत। फेरिआ = जनम मरन की फेरियाँ। ऊणे = उदास। ऊणे झूणे = चिन्ता फिक्र में झुरते, दुखी। गुरि = गुरु ने।
अर्थ: अगर मनुष्य का मन प्रभु-चरणों से विछुड़ा रहे तो उसको सारा जगत बेगाना लगता है (भाव, उसके अंदर भेद भाव बना रहता है)। (प्रभु-चरणों से विछुड़ के) सारा जगत ही (भाव, हरेक जीव) दुखों से (नाको-नाक) भरा रहता है (उनमें मुझे कोई ऐसा नहीं दिखाई देता जो नाम से वंचित रह के सुखी दिखता हो, और) जिसके आगे मैं अपने दुखों की गठड़ी खोल सकूँ (हरेक को आपो धापी पड़ी रहती है)।
(प्रभु-चरणों से विछुड़ा हुआ) सारा ही जगत (हरेक जीव) दुखों से भरा रहता है (हरेक के अंदर इतना स्वार्थ होता है कि कोई किसी का दर्दी नहीं बनता), मेरी दुखद दशा को जानने (समझने) की भी कोई परवाह नहीं करता। (नाम से टूटे हुए जीवों के सिर पर) बहुत भयानक जनम-मरन (के चक्कर) बने रहते हैं, उनके जनम-मरण की जगत-फेरियाँ खत्म होने को नहीं आती।
जिस (भाग्यहीन लोगों) को गुरु ने परमात्मा की महिमा का शब्द नहीं सुनाया, जो नाम से वंचित रहे हैं वे दुखी जीवन ही बिताते गए (क्योंकि) यदि मनुष्य का मन प्रभु-चरणों से विछुड़ा रहे तो उसे सारा जगत बेगाना प्रतीत होता है (असके अंदर भेद भाव मेर तेर बनी रहती है)।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुर महली घरि आपणै सो भरपुरि लीणा ॥ सेवकु सेवा तां करे सच सबदि पतीणा ॥ सबदे पतीजै अंकु भीजै सु महलु महला अंतरे ॥ आपि करता करे सोई प्रभु आपि अंति निरंतरे ॥ गुर सबदि मेला तां सुहेला बाजंत अनहद बीणा ॥ गुर महली घरि आपणै सो भरिपुरि लीणा ॥८॥

मूलम्

गुर महली घरि आपणै सो भरपुरि लीणा ॥ सेवकु सेवा तां करे सच सबदि पतीणा ॥ सबदे पतीजै अंकु भीजै सु महलु महला अंतरे ॥ आपि करता करे सोई प्रभु आपि अंति निरंतरे ॥ गुर सबदि मेला तां सुहेला बाजंत अनहद बीणा ॥ गुर महली घरि आपणै सो भरिपुरि लीणा ॥८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: महलु = ठिकाना। महली = ठिकाने वाला। गुर महली = ऊँचे ठिकाने के मालिक प्रभु। घरि आपणै = (जिस मनुष्य की) अपने हृदय घर में। सो = वह मनुष्य। भरपुरि = भरपूर में, सर्व व्यापक प्रभु में। तां = तब। सच सबदि = सदा स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द में। पतीणा = पतीजना, मगन रहना। अंकु = हृदय। सु महलु = (प्रभु का) वह ठिकाना। महला अंतरे = हरेक शरीर में। अंति = अंतरि, अंदर, हरेक के अंदर। निरंतरे = निरंतरि (निर+अंतर; अंतर = दूरी) बिना दूरी के, एक रस। सुहेला = सुखी। बीणा = बंसरी। अनहद = (अन+हत्) बिना बजाए, एक रस, सदा ही।8।
अर्थ: ऊँचे ठिकाने के मालिक प्रभु जिस मनुष्य के अपने हृदय-घर में आ बसता है वह मनुष्य उस सर्व-व्यापक प्रभु (की याद) में मस्त रहता है, वह मनुष्य प्रभु का सेवक बन जाता है, प्रभु की सेवा-भक्ति करता है सदा-स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द में (उसका मन) मगन रहता है। वह मनुष्य सतिगुरु के शब्द में पतीज जाता है, उसका हृदय नाम-रस से भीगा रहता है, उसको हरेक शरीर के अंदर प्रभु का निवास दिखता है, (उसे विश्वास बना रहता है कि) प्रभु स्वयं ही सब कुछ कर रहा है, खुद ही हरेक के अंदर एक-रस व्यापक है। गुरु के शब्द की इनायत से जब उस मनुष्य का परमात्मा से मिलाप हो जाता है तो उसका जीवन आसान हो जाता है (उसके अंदर मानो) एक-रस बाँसुरी सी बजती रहती है।
ऊँचे ठिकाने का मालिक प्रभु जिस मनुष्य के अपने हृदय-घर में प्रकट हो जाता है वह मनुष्य उस सर्व-व्यापक प्रभु (की याद) में जुड़ा रहता है।8।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कीता किआ सालाहीऐ करि वेखै सोई ॥ ता की कीमति ना पवै जे लोचै कोई ॥ कीमति सो पावै आपि जाणावै आपि अभुलु न भुलए ॥ जै जै कारु करहि तुधु भावहि गुर कै सबदि अमुलए ॥ हीणउ नीचु करउ बेनंती साचु न छोडउ भाई ॥ नानक जिनि करि देखिआ देवै मति साई ॥९॥२॥५॥

मूलम्

कीता किआ सालाहीऐ करि वेखै सोई ॥ ता की कीमति ना पवै जे लोचै कोई ॥ कीमति सो पावै आपि जाणावै आपि अभुलु न भुलए ॥ जै जै कारु करहि तुधु भावहि गुर कै सबदि अमुलए ॥ हीणउ नीचु करउ बेनंती साचु न छोडउ भाई ॥ नानक जिनि करि देखिआ देवै मति साई ॥९॥२॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कीता = परमात्मा का पैदा किया हुआ जीव। किआ सालाहीऐ = क्या सराहें, सराहने का क्या लाभ? करि = पैदा कर के। वेखै = संभाल करता है। सोई = वह प्रभु ही। ता की = उस (परमात्मा) की। न भुलदे = ना भूले, भूल नहीं करता। करहि = (जीव) करते हैं। तुधु = तुझे। सबदि अमुलए = अमूल्य शब्द, अमोलक शबदों के द्वारा। हीणउ = हीन, तुच्छ। करउ = मैं करता हूँ। साचु = सदा स्थिर प्रभु। भाई = हे भाई! जिनि = जिस परमात्मा ने। साई = वही।9।
अर्थ: परमात्मा के पैदा किए हुए जीवों की प्रशंसा (तारीफ) करने का क्या लाभ? (महिमा तो उस परमात्मा की करनी चाहिए) जो जगत पैदा करके खुद ही संभाल भी करता है। (पर उस प्रभु का मूल्य नहीं आँका जा सकता, उस जैसा कोई और कहा भी नहीं जा सकता)। अगर कोई मनुष्य ये चाहे (कि परमात्मा के गुण बयान करके उसका मूल्य पा सकेगा तो ये नहीं हो सकता) उस प्रभु का मूल्य नहीं पड़ सकता।
जिस मनुष्य को प्रभु स्वयं सूझ बख्शता है, वह प्रभु की कद्र समझ लेता है (और बताता है कि) प्रभु अमोध है कभी भूल नहीं करता। (वह सख्श इस प्रकार विनती करता है:) हे प्रभु! जो लोग तुझे प्यारे लगते हैं वे गुरु के अमोलक शब्द में जुड़ के तेरी महिमा करते हैं।
हे नानक! (कह:) हे भाई! मैं तुच्छ हूँ, मैं नीच हूँ, पर मैं (प्रभु के दर पर ही) विनती करता हूँ, मैं उस सदा-स्थिर प्रभु (के पल्ले) को नहीं छोड़ता। (मेरी कोई बिसात नहीं कि मैं महिमा करने का दम भर सकूँ), जो प्रभु पैदा करके प्रतिपालना करता है वही (महिमा करने की) बुद्धि भी बख्शता है।9।2।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही छंत महला ३ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही छंत महला ३ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुख सोहिलड़ा हरि धिआवहु ॥ गुरमुखि हरि फलु पावहु ॥ गुरमुखि फलु पावहु हरि नामु धिआवहु जनम जनम के दूख निवारे ॥ बलिहारी गुर अपणे विटहु जिनि कारज सभि सवारे ॥ हरि प्रभु क्रिपा करे हरि जापहु सुख फल हरि जन पावहु ॥ नानकु कहै सुणहु जन भाई सुख सोहिलड़ा हरि धिआवहु ॥१॥

मूलम्

सुख सोहिलड़ा हरि धिआवहु ॥ गुरमुखि हरि फलु पावहु ॥ गुरमुखि फलु पावहु हरि नामु धिआवहु जनम जनम के दूख निवारे ॥ बलिहारी गुर अपणे विटहु जिनि कारज सभि सवारे ॥ हरि प्रभु क्रिपा करे हरि जापहु सुख फल हरि जन पावहु ॥ नानकु कहै सुणहु जन भाई सुख सोहिलड़ा हरि धिआवहु ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सुख = आत्मिक आनंद। सोहिलड़ा = (सुख केल: सोहिला) खुशी पैदा करने वाला गीत। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ कर। निवारे = दूर करता है। विटहु = से। बलिहारी = सदके। जिनि = जिस (गुरु) ने। सभि = सारे। जापहु = जपा करो। नानकु कहै = नानक कहता है। जन भाई = हे भाई जनो!।1।
अर्थ: हे भाई जनो! आत्मिक आनंद देने वाले प्रभु की महिमा के गीत गाया करो। गुरु की शरण पड़ कर (महिमा के गीत गाने से) परमात्मा के दर से (इसका) फल प्राप्त करोगे।
हे भाई! गुरु की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम स्मरण किया करो, (इसका) फल हासिल करोगे, परमात्मा का नाम अनेक जन्मों के दुख दूर कर देता है। जिस गुरु ने तुम्हारे (लोक-परलोक के) सारे काम सवार दिए हैं, उस अपने गुरु से सदके जाओ।
हे भाई! परमात्मा का नाम जपा करो। हरि प्रभु कृपा करेगा, (उसके दर से) आत्मिक आनंद का फल प्राप्त कर लोगे। नानक कहता है: हे भाई जनो! आत्मिक आनंद देने वाले प्रभु की महिमा के गीत गाते रहा करो।1।

[[0768]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुणि हरि गुण भीने सहजि सुभाए ॥ गुरमति सहजे नामु धिआए ॥ जिन कउ धुरि लिखिआ तिन गुरु मिलिआ तिन जनम मरण भउ भागा ॥ अंदरहु दुरमति दूजी खोई सो जनु हरि लिव लागा ॥ जिन कउ क्रिपा कीनी मेरै सुआमी तिन अनदिनु हरि गुण गाए ॥ सुणि मन भीने सहजि सुभाए ॥२॥

मूलम्

सुणि हरि गुण भीने सहजि सुभाए ॥ गुरमति सहजे नामु धिआए ॥ जिन कउ धुरि लिखिआ तिन गुरु मिलिआ तिन जनम मरण भउ भागा ॥ अंदरहु दुरमति दूजी खोई सो जनु हरि लिव लागा ॥ जिन कउ क्रिपा कीनी मेरै सुआमी तिन अनदिनु हरि गुण गाए ॥ सुणि मन भीने सहजि सुभाए ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भीने = भीग जाते हैं। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाए = सुभाय, प्रेम में। धिआए = स्मरण करके। धुरि = धुर दरगाह से। तिन्ह = उनको। तिन भउ = उनका डर। अंदरहु = हृदय में से। दुरमति दूजी = माया की ओर ले जाने वाली खोटी मति। खोई = दूर कर ली। लिव = लगन। मेरै सुआमी = मेरे मालिक ने। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त।2।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा की महिमा सुन के आत्मिक अडोलता में प्रेम में भीगा जाता है। हे भाई! तू भी गुरु की मति पर चल के प्रभु का नाम स्मरण करके आत्मिक अडोलता में टिक। हे भाई! जिस मनुष्यों के माथे पर धुर-दरगाह से लिखे लेख उघड़ते हैं उनको गुरु मिलता है (और नाम की इनायत से) उनका जनम-मरण (के चक्करों) का डर दूर हो जाता है। (जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ कर अपने) हृदय में से माया की ओर ले जाने वाली खोटी मति दूर करता है, वह मनुष्य परमात्मा के चरणों में तवज्जो जोड़ता है।
हे भाई! मेरे मालिक प्रभु ने जिस मनुष्यों पर मेहर की, उन्होंने हर वक्त परमात्मा के गुण गाने आरम्भ कर दिए। हे मन! (परमात्मा की महिमा) सुन के आत्मिक अडोलता में प्रेम में भीगा जाता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जुग महि राम नामु निसतारा ॥ गुर ते उपजै सबदु वीचारा ॥ गुर सबदु वीचारा राम नामु पिआरा जिसु किरपा करे सु पाए ॥ सहजे गुण गावै दिनु राती किलविख सभि गवाए ॥ सभु को तेरा तू सभना का हउ तेरा तू हमारा ॥ जुग महि राम नामु निसतारा ॥३॥

मूलम्

जुग महि राम नामु निसतारा ॥ गुर ते उपजै सबदु वीचारा ॥ गुर सबदु वीचारा राम नामु पिआरा जिसु किरपा करे सु पाए ॥ सहजे गुण गावै दिनु राती किलविख सभि गवाए ॥ सभु को तेरा तू सभना का हउ तेरा तू हमारा ॥ जुग महि राम नामु निसतारा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जुग महि = जगत में। निसतारा = पार उतारा (करता है)। गुर ते उपजै = (जो मनुष्य) गुरु के पास से नया जन्म लेता है। सहजे = आत्मिक अडोलता में (टिक के)। किलविख = पाप। सभि = सारे। सभु को = हरेक जीव। हउ = मैं।3।
अर्थ: हे भाई! जगत में परमात्मा का नाम ही (हरेक जीव का) पार उतारा करता है। जो मनुष्य गुरु से नया आत्मिक जीवन लेता है, वह गुरु के शब्द को विचारता है। वह मनुष्य गुरु के शब्द को (ज्यों-ज्यों) विचारता है (त्यों-त्यों) परमात्मा का नाम उसको प्यारा लगने लग जाता है। पर, हे भाई! जिस मनुष्य पर प्रभु कृपा करता है, वही मनुष्य (ये दाति) प्राप्त करता है।
वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के दिन-रात परमात्मा के गुण गाता रहता है, और अपने सारे पाप दूर कर लेता है।
हे प्रभु! हरेक जीव तेरा (पैदा किया हुआ है), तू सारे जीवों का पति है। हे प्रभु! मैं तेरा (सेवक) हूँ, तू हमारा मालिक है (हमें अपना नाम बख्श)। हे भाई! संसार में परमात्मा का नाम (ही हरेक जीव का पार-उतारा करता है)।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

साजन आइ वुठे घर माही ॥ हरि गुण गावहि त्रिपति अघाही ॥ हरि गुण गाइ सदा त्रिपतासी फिरि भूख न लागै आए ॥ दह दिसि पूज होवै हरि जन की जो हरि हरि नामु धिआए ॥ नानक हरि आपे जोड़ि विछोड़े हरि बिनु को दूजा नाही ॥ साजन आइ वुठे घर माही ॥४॥१॥

मूलम्

साजन आइ वुठे घर माही ॥ हरि गुण गावहि त्रिपति अघाही ॥ हरि गुण गाइ सदा त्रिपतासी फिरि भूख न लागै आए ॥ दह दिसि पूज होवै हरि जन की जो हरि हरि नामु धिआए ॥ नानक हरि आपे जोड़ि विछोड़े हरि बिनु को दूजा नाही ॥ साजन आइ वुठे घर माही ॥४॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साजन = सज्जन प्रभु जी। वुठे = बस गए। घर = हृदय घर। गावहि = गाते हैं। त्रिपति = संतोष। अघाही = अघा जाते हैं, तृप्त हो जाते हैं। त्रिपतासी = (जो जिंद) तृप्त हो गई, अघा गई। न लागै = नहीं चिपकती। आए = आ के। दह दिसि = दसों दिशाओं में, हर जगह। पूज = इज्जत। नानक = हे नानक! आपे = आप ही। जोड़ि = (माया में) जोड़ के। विछोड़े = (अपने चरणों से) विछोड़ता है।
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्यों के हृदय-घर में सज्जन-प्रभु जी आ बसते हैं, वह मनुष्य परमात्मा के गुण गाते रहते हैं, माया की ओर से संतोषी हो जाते हैं, वे तृप्त हो जाते हैं।
हे भाई! जो जीवात्मा सदा प्रभु के गुण गा-गा के (माया की ओर से) तृप्त हो जाती है, उसे दोबारा माया की भूख आ के नहीं चिपकती। जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम स्मरण करता रहता है, उस सेवक की हर जगह इज्जत होती है।
हे नानक! परमात्मा खुद ही (किसी को माया में) जोड़ के (अपने चरणों से) विछोड़ता है। परमात्मा के बिना और कोई (ऐसी सामर्थ्य वाला) नहीं है। (जिस के ऊपर मेहर करते हैं) उसके हृदय-गृह में सज्जन-प्रभु जी आ के निवास करते हैं।4।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सूही महला ३ घरु ३ ॥

मूलम्

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सूही महला ३ घरु ३ ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

भगत जना की हरि जीउ राखै जुगि जुगि रखदा आइआ राम ॥ सो भगतु जो गुरमुखि होवै हउमै सबदि जलाइआ राम ॥ हउमै सबदि जलाइआ मेरे हरि भाइआ जिस दी साची बाणी ॥ सची भगति करहि दिनु राती गुरमुखि आखि वखाणी ॥ भगता की चाल सची अति निरमल नामु सचा मनि भाइआ ॥ नानक भगत सोहहि दरि साचै जिनी सचो सचु कमाइआ ॥१॥

मूलम्

भगत जना की हरि जीउ राखै जुगि जुगि रखदा आइआ राम ॥ सो भगतु जो गुरमुखि होवै हउमै सबदि जलाइआ राम ॥ हउमै सबदि जलाइआ मेरे हरि भाइआ जिस दी साची बाणी ॥ सची भगति करहि दिनु राती गुरमुखि आखि वखाणी ॥ भगता की चाल सची अति निरमल नामु सचा मनि भाइआ ॥ नानक भगत सोहहि दरि साचै जिनी सचो सचु कमाइआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: राखै = रखता है। जुगि जुगि = हरेक युग में। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख। सबदि = गुरु के शब्द के द्वारा। भाइआ = प्यारा लगा। जिस दी = जिस प्रभु की। साची = सदा कायम रहने वाली। बाणी = महिमा की वाणी। सची = सदा स्थिर। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ कर। आखि = उचार के। वखाणी = (और लोगों को) समझाई। चाल = जीवन जुगति। मनि = मन में। सोहहि = शोभा देते हैं। दरि साचै = सदा स्थिर प्रभु के दर पर। सचो सचु = सदा स्थिर रहने वाला हरि-नाम ही।1।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा अपने भक्तों की इज्जत रखता है, हरेक युग में ही (भक्तों की) इज्जत रखता आया है। जो मनुष्य गुरु के बताए हुए राह पर चलता है, वह प्रभु का भक्त बन जाता है, वह मनुष्य गुरु के शब्द में जुड़ के अपने अहंकार को दूर करता है।
हे भाई! जो मनुष्य गुरु के शब्द के द्वारा अपने अंदर से अहंकार को जला देता है, वह उस परमात्मा को प्यारा लगता है जिसकी महिमा सदा अटल रहने वाली है।
गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य दिन-रात परमात्मा की सदा स्थिर रहने वाले भक्ति करते रहते हैं, वे खुद महिमा वाली वाणी उचारते रहते हैं, और-और लोगों को भी उसकी समझ देते हैं।
हे भाई! भक्तों की जीवन-जुगति सदा एक रस रहने वाली और बड़ी पवित्र होती है, उनके मन को परमात्मा का सदा-स्थिर नाम प्यारा लगता रहता है। हे नानक! परमात्मा के भक्त सदा-स्थिर परमात्मा के दर पर शोभा देते हैं, वे परमात्मा का सदा-स्थिर रहने वाला नाम ही सदा जपते रहते हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि भगता की जाति पति है भगत हरि कै नामि समाणे राम ॥ हरि भगति करहि विचहु आपु गवावहि जिन गुण अवगण पछाणे राम ॥ गुण अउगण पछाणै हरि नामु वखाणै भै भगति मीठी लागी ॥ अनदिनु भगति करहि दिनु राती घर ही महि बैरागी ॥ भगती राते सदा मनु निरमलु हरि जीउ वेखहि सदा नाले ॥ नानक से भगत हरि कै दरि साचे अनदिनु नामु सम्हाले ॥२॥

मूलम्

हरि भगता की जाति पति है भगत हरि कै नामि समाणे राम ॥ हरि भगति करहि विचहु आपु गवावहि जिन गुण अवगण पछाणे राम ॥ गुण अउगण पछाणै हरि नामु वखाणै भै भगति मीठी लागी ॥ अनदिनु भगति करहि दिनु राती घर ही महि बैरागी ॥ भगती राते सदा मनु निरमलु हरि जीउ वेखहि सदा नाले ॥ नानक से भगत हरि कै दरि साचे अनदिनु नामु सम्हाले ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पति = इज्जत। कै नामि = के नाम में। करहि = करते हैं। विचहु = अपने अंदर से। आपु = स्वै भाव। पछाणै = पहचानता है। वखाणै = उचारता है। भै = डर अदब में। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। घर ही = घरि ही, घर में ही। बैरागी = विरक्त। राते = रंगे हुए। वेखहि = देखते हैं। नाले = साथ। कै दरि = के दर पर। साचे = सच्चे, सुरखरू। समाले = हृदय में बसा के।2।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘घर ही’ में से शब्द ‘घरि’ की ‘ि’ क्रिया विशेषण ‘ही’ के कारण हट गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! परमात्मा ही भक्तों के लिए (ऊँची) जाति है, परमात्मा ही उनकी इज्जत है। भक्त परमात्मा के नाम में ही लीन रहते हैं। भक्त (सदा) हरि की भक्ति करते हैं, अपने अंदर से स्वै भाव (भी) दूर कर लेते हैं, क्योंकि उन्होंने गुणों व अवगुणों की परख कर ली होती है (उनको पता होता है कि अहंकार अवगुण है)। जो मनुष्य गुण और अवगुण की परख कर लेता है, और परमात्मा का नाम उचारता रहता है, उसको प्रभु के डर-अदब में रहने के कारण प्रभु की भक्ति प्यारी लगती है। जो मनुष्य दिन-रात हर वक्त परमात्मा की भक्ति करते हैं, वे गृहस्थ में ही माया के मोह से निर्लिप रहते हैं। हे भाई! जो मनुष्य सदा प्रभु की भक्ति (के रंग) में रंगे रहते हैं, उनका मन पवित्र हो जाता है, वे परमात्मा को सदा अपने अंग-संग बसता देखते हैं। हे नानक! ऐसे भक्त हर वक्त प्रभु के नाम को अपने हृदय में बसा के परमात्मा के दर पर सुर्ख-रू हो जाते हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मनमुख भगति करहि बिनु सतिगुर विणु सतिगुर भगति न होई राम ॥ हउमै माइआ रोगि विआपे मरि जनमहि दुखु होई राम ॥ मरि जनमहि दुखु होई दूजै भाइ परज विगोई विणु गुर ततु न जानिआ ॥ भगति विहूणा सभु जगु भरमिआ अंति गइआ पछुतानिआ ॥ कोटि मधे किनै पछाणिआ हरि नामा सचु सोई ॥ नानक नामि मिलै वडिआई दूजै भाइ पति खोई ॥३॥

मूलम्

मनमुख भगति करहि बिनु सतिगुर विणु सतिगुर भगति न होई राम ॥ हउमै माइआ रोगि विआपे मरि जनमहि दुखु होई राम ॥ मरि जनमहि दुखु होई दूजै भाइ परज विगोई विणु गुर ततु न जानिआ ॥ भगति विहूणा सभु जगु भरमिआ अंति गइआ पछुतानिआ ॥ कोटि मधे किनै पछाणिआ हरि नामा सचु सोई ॥ नानक नामि मिलै वडिआई दूजै भाइ पति खोई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य। करहि = करते हैं। रोगि = रोग में। विआपे = फसे रहते हैं। मरि जनमहि = मर के पैदा होते हैं, आत्मिक मौत सहेड़ के जूनियों में पड़े रहते हैं। दूजै भाइ = किसी और के प्यार में, माया के मोह में। परज = सृष्टि। विगोई = ख्वार होती है। ततु = अस्लियत। विहूणा = बगैर। भरमिआ = भटकता है। अंति = आखिर को। कोटि मधे = करोड़ों में। किनै = किसी विरले ने। सचु = सदा स्थिर रहने वाला। नामि = नाम में। पति = इज्जत।3।
अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य गुरु की शरण पड़े बिना (अपनी ओर से ही) प्रभु की भक्ति करते हैं, पर गुरु की शरण पड़े बिना भक्ति नहीं हो सकती। वह मनुष्य अहंकार में, माया के रोग में, फंसे रहते हैं, आत्मिक मौत सहेड़ के वे जन्मों के चक्करों में पड़े रहते हैं, उन्हें दुख चिपका रहता है। हे भाई! माया के मोह में फंस के दुनिया ख्वार होती है। गुरु की शरण पड़े बिना कोई भी अस्लियत को नहीं समझता। भक्ति से वंचित हुआ सारा जगत ही भटकता फिरता है, और, आखिर हाथ मलता (दुनिया से) जाता है।
हे नानक! करोड़ों में से किसी विरले मनुष्य ने ये बात समझी है कि परमात्मा का नाम ही सदा कायम रहने वाला है, नाम में जुड़ने से ही (लोक-परलोक में) इज्जत मिलती है, और, माया के मोह में मनुष्य इज्जत गवा लेता है।3।

[[0769]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

भगता कै घरि कारजु साचा हरि गुण सदा वखाणे राम ॥ भगति खजाना आपे दीआ कालु कंटकु मारि समाणे राम ॥ कालु कंटकु मारि समाणे हरि मनि भाणे नामु निधानु सचु पाइआ ॥ सदा अखुटु कदे न निखुटै हरि दीआ सहजि सुभाइआ ॥ हरि जन ऊचे सद ही ऊचे गुर कै सबदि सुहाइआ ॥ नानक आपे बखसि मिलाए जुगि जुगि सोभा पाइआ ॥४॥१॥२॥

मूलम्

भगता कै घरि कारजु साचा हरि गुण सदा वखाणे राम ॥ भगति खजाना आपे दीआ कालु कंटकु मारि समाणे राम ॥ कालु कंटकु मारि समाणे हरि मनि भाणे नामु निधानु सचु पाइआ ॥ सदा अखुटु कदे न निखुटै हरि दीआ सहजि सुभाइआ ॥ हरि जन ऊचे सद ही ऊचे गुर कै सबदि सुहाइआ ॥ नानक आपे बखसि मिलाए जुगि जुगि सोभा पाइआ ॥४॥१॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कै घरि = के हृदय में। कारजु = कार्य, काम, आहर। साचा = सदा कायम रहने वाला। वखाणे = उचारे। आपे = आप ही। कंटकु = कांटा, काँटे की तरह चुभने वाला, दुखदाई। मारि = मार के। समाणे = लीन रहे। मनि = मन में। भाणे = अच्छे लगे। निधानु = खजाना। सचु = सदा कायम रहने वाला। अखुटु = कभी ना खत्म होने वाला। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाइआ = सुभाया, प्रेम में। कै सबदि = के शब्द से। जुगि जुगि = हरेक युग में।4।
अर्थ: परमात्मा के गुण सदा गाते रहने के कारण भक्तों के हृदय में ये आहर सदा बना रहता है। भक्ति का खजाना परमात्मा ने खुद ही अपने भक्तों को दिया हुआ है, (इसकी इनायत से वे) दुखद मौत के डर को समाप्त करके (परमात्मा में) लीन रहते हैं। दुखदाई मौत के डर को खत्म करके भक्त परमात्मा में लीन रहते हैं, परमात्मा के मन को प्यारे लगते हैं, (परमात्मा के पास से भक्त) सदा कायम रहने वाला नाम-खजाना प्राप्त कर लेते हैं। ये खजाना ना खत्म होने वाला है, कभी खत्म नहीं होता। परमात्मा ने उनको आत्मिक अडोलता में प्रेम में टिके हुओं को ये खजाना दे दिया। (इस खजाने के सदका) भक्त सदा ही ऊँचे आत्मिक मण्डल में टिके रहते हैं, गुरु के शब्द की इनायत से उनका जीवन सोहाना बन जाता है।
हे नानक! परमात्मा खुद ही मेहर कर के उनको चरणों से जोड़े रखता है, हरेक युग में वे शोभा कमाते हैं।4।1।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ३ ॥ सबदि सचै सचु सोहिला जिथै सचे का होइ वीचारो राम ॥ हउमै सभि किलविख काटे साचु रखिआ उरि धारे राम ॥ सचु रखिआ उर धारे दुतरु तारे फिरि भवजलु तरणु न होई ॥ सचा सतिगुरु सची बाणी जिनि सचु विखालिआ सोई ॥ साचे गुण गावै सचि समावै सचु वेखै सभु सोई ॥ नानक साचा साहिबु साची नाई सचु निसतारा होई ॥१॥

मूलम्

सूही महला ३ ॥ सबदि सचै सचु सोहिला जिथै सचे का होइ वीचारो राम ॥ हउमै सभि किलविख काटे साचु रखिआ उरि धारे राम ॥ सचु रखिआ उर धारे दुतरु तारे फिरि भवजलु तरणु न होई ॥ सचा सतिगुरु सची बाणी जिनि सचु विखालिआ सोई ॥ साचे गुण गावै सचि समावै सचु वेखै सभु सोई ॥ नानक साचा साहिबु साची नाई सचु निसतारा होई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सबदि सचै = सदा स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द के द्वारा। सोहिला = (सुख केल:) आत्मिक आनंद देने वाला गीत। जिथै = जिस हृदय घर में। सभि किलविख = सारे पाप। सचु = सदा स्थिर। उरि = हृदय में। दुतरु = जिसे तैरना बहुत मुश्किल है। भवजलु = संसार समुंदर। तरणु न होई = तैरने की जरूरत नहीं पड़ती। सची बाणी = सदा स्थिर प्रभु की महिमा से भरपूर वाणी। जिनि = जिस (गुरु) ने। सचु = सदा स्थिर प्रभु। सचि = सदा कायम रहने वाले प्रभु में। नाई = महिमा, बड़ाई (स्ना, अरबी शब्द)। सचु निसतारा = सदा के लिए पार उतारा।1।
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य के हृदय-गृह में सच्चे शब्द के द्वारा सदा-स्थिर प्रभु की महिमा का गीत होता रहता है, सदा स्थिर प्रभु के गुणों की विचार होती रहती है, उसके अंदर से अहंकार आदि जैसे सारे पाप कट जाते हैं, वह मनुष्य सदा-कायम रहने वाले परमात्मा को अपने दिल में बसाए रखता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभु को हृदय में बसाए रखता है, मुश्किल से तैरे जाने वाले संसार-समुंदर से पार लांघ जाता है। संसार-समुंदर से पार लांघने की उसे बार-बार आवश्यक्ता नहीं रहती। हे भाई! जिस गुरु ने उसको सदा-स्थिर प्रभु के दर्शन करवा दिए हैं, वह खुद भी सदा-स्थिर प्रभु का रूप है, उसकी वाणी प्रभु की महिमा से भरपूर है। (गुरु की कृपा से) वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभु के गुण गाता रहता है, उसमें ही लीन रहता है, और उसको हर जगह बसा हुआ देखता है। हे नानक! जो परमात्मा खुद सदा-स्थिर है, जिसकी महिमा सदा-स्थिर है वह उस मनुष्य का सदा के लिए पार-उतारा कर देता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

साचै सतिगुरि साचु बुझाइआ पति राखै सचु सोई राम ॥ सचा भोजनु भाउ सचा है सचै नामि सुखु होई राम ॥ साचै नामि सुखु होई मरै न कोई गरभि न जूनी वासा ॥ जोती जोति मिलाई सचि समाई सचि नाइ परगासा ॥ जिनी सचु जाता से सचे होए अनदिनु सचु धिआइनि ॥ नानक सचु नामु जिन हिरदै वसिआ ना वीछुड़ि दुखु पाइनि ॥२॥

मूलम्

साचै सतिगुरि साचु बुझाइआ पति राखै सचु सोई राम ॥ सचा भोजनु भाउ सचा है सचै नामि सुखु होई राम ॥ साचै नामि सुखु होई मरै न कोई गरभि न जूनी वासा ॥ जोती जोति मिलाई सचि समाई सचि नाइ परगासा ॥ जिनी सचु जाता से सचे होए अनदिनु सचु धिआइनि ॥ नानक सचु नामु जिन हिरदै वसिआ ना वीछुड़ि दुखु पाइनि ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सचै सतिगुरि = सदा-स्थिर प्रभु के रूप गुरु ने। साचु = सदा स्थिर प्रभु। पति = इज्जत। भाउ सचा = सदा कायम रहने वाला प्रेम। नामि = नाम में। मरै न = आत्मिक मौत नहीं सहेड़ता। गरभि = माँ के पेट में। जोती = परमात्मा की ज्योति में। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। सचि नाइ = सदा स्थिर हरि नाम की इनायत से। जिनि = जिस मनुष्यों ने। जाता = गहरी सांझ डाली। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। धिआइनि = ध्याते हैं। हिरदै = हृदय घर में। वीछुड़ि = विछुड़ के। न पाइनि = नहीं पाते।2।
अर्थ: हे भाई! सदा-स्थिर प्रभु के रूप गुरु ने जिस मनुष्य को सदा-स्थिर प्रभु का ज्ञान दिया उसकी इज्जत सदा-स्थिर प्रभु स्वयं रखता है। प्रभु-चरणों से अटल प्यार उस मनुष्य की आत्मिक खुराक बन जाता है, सदा-स्थिर हरि-नाम से उसको आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। जिस भी मनुष्य को सदा-स्थिर प्रभु के नाम में आत्मिक आनंद मिलता है, वह कभी आत्मिक मौत नहीं सहेड़ता, वह जनम-मरण के चक्करों जूनियों में नहीं पड़ता। (गुरु ने जिस मनुष्य की) तवज्जो परमात्मा की ज्योति में मिला दी, वह मनुष्य सदा-स्थिर प्रभु में लीन हो जाता है, सदा-स्थिर हरि-नाम की इनायत से (उसके अंदर आत्मिक जीवन का) प्रकाश पैदा हो जाता है। हे भाई! जिस मनुष्यों ने सदा-स्थिर प्रभु के साथ गहरी सांझ डाल ली वे उसी का रूप बन गए, वे हर वक्त उस सदा-स्थिर प्रभु का नाम स्मरण करते रहते हैं। हे नानक! जिस मनुष्यों के हृदय में सदा-स्थिर प्रभु का नाम बस जाता है, वे फिर परमात्मा के चरणों से विछुड़ के दुख नहीं पाते।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सची बाणी सचे गुण गावहि तितु घरि सोहिला होई राम ॥ निरमल गुण साचे तनु मनु साचा विचि साचा पुरखु प्रभु सोई राम ॥ सभु सचु वरतै सचो बोलै जो सचु करै सु होई ॥ जह देखा तह सचु पसरिआ अवरु न दूजा कोई ॥ सचे उपजै सचि समावै मरि जनमै दूजा होई ॥ नानक सभु किछु आपे करता आपि करावै सोई ॥३॥

मूलम्

सची बाणी सचे गुण गावहि तितु घरि सोहिला होई राम ॥ निरमल गुण साचे तनु मनु साचा विचि साचा पुरखु प्रभु सोई राम ॥ सभु सचु वरतै सचो बोलै जो सचु करै सु होई ॥ जह देखा तह सचु पसरिआ अवरु न दूजा कोई ॥ सचे उपजै सचि समावै मरि जनमै दूजा होई ॥ नानक सभु किछु आपे करता आपि करावै सोई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सची बाणी = सदा-स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी के द्वारा। गावहि = गाते हैं। तितु घरि = (उनके) उस हृदय घर में। सोहिला = (सुख केल:) खुशी के गीत, आनंद की लहर। सचा = सदा स्थिर, अडोल। सभु = हर जगह। सचो = सच ही, सदा स्थिर प्रभु ही। जह देखा = जिधर भी उन्होंने देखा। तह = उधर (ही)। सचे उपजै = (जो मनुष्य) सदा स्थिर प्रभु से नया आत्मिक जीवन लेता है। सचि = सदा स्थिर प्रभु में।3।
अर्थ: हे भाई! (जो मनुष्य अपने हृदय में) सदा-स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी के द्वारा सदा-स्थिर प्रभु के गुण गाते हैं (उनकी) उस हृदय-गृह में आनंद मीठी सुरीली अवस्था बनी रहती है। सदा-स्थिर प्रभु के पवित्र गुणों की इनायत से उनका मन उनका तन (विकारों की ओर से) अडोल हो जाता है। उनके अंदर सदा-स्थिर प्रभु-पुरुख प्रत्यक्ष प्रकट हो जाता है। (उन्हें यकीन बन जाता है कि) हर जगह सदा-स्थिर प्रभु काम कर रहा है, वह ही बोल रहा है, जो कुछ वह करता है वही होता है। जिधर भी उन्होंने निगाह की, उधर ही उनको सदा-स्थिर प्रभु का पसारा दिखा। प्रभु के बिना उनको (कहीं भी) कोई और नहीं दिखता।
हे भाई! जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभु से नया आत्मिक जीवन प्राप्त करता है, वह सदा-स्थिर प्रभु में ही लीन रहता है। पर माया के साथ प्यार करने वाला जनम-मरण में पड़ा रहता है। हे नानक! कर्तार खुद ही सब कुछ कर रहा है, खुद ही जीवों से करवा रहा है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सचे भगत सोहहि दरवारे सचो सचु वखाणे राम ॥ घट अंतरे साची बाणी साचो आपि पछाणे राम ॥ आपु पछाणहि ता सचु जाणहि साचे सोझी होई ॥ सचा सबदु सची है सोभा साचे ही सुखु होई ॥ साचि रते भगत इक रंगी दूजा रंगु न कोई ॥ नानक जिस कउ मसतकि लिखिआ तिसु सचु परापति होई ॥४॥२॥३॥

मूलम्

सचे भगत सोहहि दरवारे सचो सचु वखाणे राम ॥ घट अंतरे साची बाणी साचो आपि पछाणे राम ॥ आपु पछाणहि ता सचु जाणहि साचे सोझी होई ॥ सचा सबदु सची है सोभा साचे ही सुखु होई ॥ साचि रते भगत इक रंगी दूजा रंगु न कोई ॥ नानक जिस कउ मसतकि लिखिआ तिसु सचु परापति होई ॥४॥२॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सचे भगत = सदा-स्थिर प्रभु के भक्त। दरवारे = दरबारि, (प्रभु की) हजूरी में। सचो सचु = सत्य ही सत्य, सदा स्थिर प्रभु का नाम ही नाम। अंतरे = अंदर। घट = हृदय। साची वाणी = सदा स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी। साचो = साचु ही, सदा स्थिर प्रभु को ही। आपि = अपने अंदर। आपु = अपने आप को, अपने आत्मिक जीवन को। जाणहि = गहरी सांझ डालते हैं। साचि = सदा स्थिर हरि नाम में। इक रंगी = एक प्रभु के ही प्रेम रंग वाले। मसतकि = माथे पर।4।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जिस कउ’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘कउ’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के भक्त उस सदा स्थिर प्रभु का नाम ही हर वक्त उचार के उसकी हजूरी में शोभा पाते हैं। उनके हृदय में सदा-स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी सदा बसती है। वे सदा-स्थिर प्रभु को अपने अंदर बसता देखते हैं। जब भक्तजन अपने आत्मिक जीवन की पड़ताल (आत्मचिंतन) करते हैं, तब वे सदा-स्थिर प्रभु के साथ गहरी सांझ डालते हैं, उन्हें उस सदा-स्थिर प्रभु की जान-पहचान हो जाती है। उनके अंदर प्रभु की महिमा वाला गुरु-शब्द बसता रहता है, (इस कारण लोक-परलोक में) उन्हें सदा के लिए शोभा मिल जाती है। प्रभु में जुड़े रहने के कारण उन्हें आत्मिक आनंद मिला रहता है। सदा कायम रहने वाले परमात्मा (के प्रेम रंग) में रंगे हुए भक्तजन एक ही प्रभु-प्रेम के रंग में रंगे रहते हैं। कोई और (माया के मोह आदि का) रंग उन पर नहीं चढ़ता।
हे नानक! जिस मनुष्य के माथे पर (प्रभु-मिलाप के लेख) लिखे होते हैं, उसको सदा कायम रहने वाले परमात्मा का मिलाप प्राप्त हो जाता है।4।2।3।

[[0770]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ३ ॥ जुग चारे धन जे भवै बिनु सतिगुर सोहागु न होई राम ॥ निहचलु राजु सदा हरि केरा तिसु बिनु अवरु न कोई राम ॥ तिसु बिनु अवरु न कोई सदा सचु सोई गुरमुखि एको जाणिआ ॥ धन पिर मेलावा होआ गुरमती मनु मानिआ ॥ सतिगुरु मिलिआ ता हरि पाइआ बिनु हरि नावै मुकति न होई ॥ नानक कामणि कंतै रावे मनि मानिऐ सुखु होई ॥१॥

मूलम्

सूही महला ३ ॥ जुग चारे धन जे भवै बिनु सतिगुर सोहागु न होई राम ॥ निहचलु राजु सदा हरि केरा तिसु बिनु अवरु न कोई राम ॥ तिसु बिनु अवरु न कोई सदा सचु सोई गुरमुखि एको जाणिआ ॥ धन पिर मेलावा होआ गुरमती मनु मानिआ ॥ सतिगुरु मिलिआ ता हरि पाइआ बिनु हरि नावै मुकति न होई ॥ नानक कामणि कंतै रावे मनि मानिऐ सुखु होई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जुग चारे = चारों ही युगों में। धन = जीव-स्त्री। सोहागु = प्रभु पति का मिलाप। निहचल = अटल, कभी ना हिलने वाला। केरा = का। सचु = सदा कायम रहने वाला। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ने वाला मनुष्य। एको = एक परमात्मा ही। मेलावा = मिलाप। गुरमती = गुरु की मति पर चलने से। कामणि = जीव-स्त्री। कंतै रावै = पति प्रभु को हृदय में बसाती है। रावे = मिलाप भोगती है। मनि मानिऐ = अगर मन पतीज जाए।1।
अर्थ: हे भाई! (युग चाहे कोई भी हो) गुरु (की शरण पड़े) बिना पति प्रभु का मिलाप नहीं होता, जीव-स्त्री चाहे चारों युगों में भटकती फिरे। उस प्रभु-पति का हुक्म अटल है (कि गुरु के द्वारा ही उसका मिलाप प्राप्त होता है)। उसके बिना कोई और उसकी बराबरी का नहीं (जो इस हुक्म को बदलवा सके)। हे भाई! जिस प्रभु के बिना उस जैसा और कोई नहीं। वह प्रभु स्वयं ही सदा कायम रहने वाला है। गुरु के सन्मुख रहने वाली जीव-स्त्री उस एक के साथ गहरी सांझ बनाती है। जब गुरु की मति पर चल के जीव-स्त्री का मन (परमात्म की याद में) रीझ जाता है, तब जीव-स्त्री का प्रभु-पति से मिलाप हो जाता है।
हे भाई! जब गुरु मिलता है तब ही प्रभु की प्राप्ति होती है (गुरु ही) प्रभु का नाम जीव-स्त्री के हृदय में बसाता है, और परमात्मा के नाम के बिना (माया के बंधनो से) खलासी नहीं होती। हे नानक! अगर मन प्रभु की याद में रीझ जाए, तो जीव-स्त्री प्रभु के मिलाप का आनंद भोगती है, उसके हृदय में आनंद पैदा हुआ रहता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सतिगुरु सेवि धन बालड़ीए हरि वरु पावहि सोई राम ॥ सदा होवहि सोहागणी फिरि मैला वेसु न होई राम ॥ फिरि मैला वेसु न होई गुरमुखि बूझै कोई हउमै मारि पछाणिआ ॥ करणी कार कमावै सबदि समावै अंतरि एको जाणिआ ॥ गुरमुखि प्रभु रावे दिनु राती आपणा साची सोभा होई ॥ नानक कामणि पिरु रावे आपणा रवि रहिआ प्रभु सोई ॥२॥

मूलम्

सतिगुरु सेवि धन बालड़ीए हरि वरु पावहि सोई राम ॥ सदा होवहि सोहागणी फिरि मैला वेसु न होई राम ॥ फिरि मैला वेसु न होई गुरमुखि बूझै कोई हउमै मारि पछाणिआ ॥ करणी कार कमावै सबदि समावै अंतरि एको जाणिआ ॥ गुरमुखि प्रभु रावे दिनु राती आपणा साची सोभा होई ॥ नानक कामणि पिरु रावे आपणा रवि रहिआ प्रभु सोई ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सेवि = सेवा कर, शरण पड़। धन बालड़ीए = हे अंजान जिंदे! वरु = पति। पावहि = तू पा लेगी। होवहि = तू रहेगी। सोहागणी = पति वाली। मैला वेसु = रंडेपा, विधवा, प्रभु पति से विछोड़ा।

दर्पण-टिप्पनी

(नोट: ‘मैला वेसु’ विधवा स्त्री को मैले कपड़े पहनने पड़ते हैं; रंडेपा, विधवा, प्रभु पति से विछोड़ा)।

दर्पण-भाषार्थ

गुरमुखि = गुरु की शरण में रहने वाली जीव-स्त्री। रवि रहिआ = जो सब जगह मौजूद है।2।
अर्थ: हे अंजान जीवात्मा! गुरु के बताए हुए काम किया कर, (इस तरह) तू प्रभु-पति को प्राप्त कर लेगी। तू सदा के लिए पति वाली (सोहागनि) हो जाएगी, फिर कभी प्रभु-पति से विछोड़ा नहीं होगा। कोई विरली जीव-स्त्री ही गुरु के बताए हुए मार्ग पर चल के इस बात को समझती है (कि गुरु के द्वारा प्रभु से मिलाप होने पर) फिर उससे कभी विछोड़ा नहीं होता। वह जीव-स्त्री (अपने अंदर से) अहंकार दूर करके प्रभु से सांझ कायम रखती है। वह जीव-स्त्री (प्रभु स्मरण का) करने-योग्य कार्य करती रहती है, गुरु के शब्द में लीन रहती है, अपने हृदय में एक प्रभु के साथ जीव-स्त्री पहचान बनाए रखती है। हे नानक! गुरु के सन्मुख रहने वाली जीव-स्त्री दिन-रात अपने प्रभु का नाम सिमरती रहती है, (लोक-परलोक में) उसको सदा कायम रहने वाली इज्जत मिलती है। वह जीव-स्त्री अपने उस प्रभु-पति को हर वक्त याद करती है जो हर जगह व्यापक है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुर की कार करे धन बालड़ीए हरि वरु देइ मिलाए राम ॥ हरि कै रंगि रती है कामणि मिलि प्रीतम सुखु पाए राम ॥ मिलि प्रीतम सुखु पाए सचि समाए सचु वरतै सभ थाई ॥ सचा सीगारु करे दिनु राती कामणि सचि समाई ॥ हरि सुखदाता सबदि पछाता कामणि लइआ कंठि लाए ॥ नानक महली महलु पछाणै गुरमती हरि पाए ॥३॥

मूलम्

गुर की कार करे धन बालड़ीए हरि वरु देइ मिलाए राम ॥ हरि कै रंगि रती है कामणि मिलि प्रीतम सुखु पाए राम ॥ मिलि प्रीतम सुखु पाए सचि समाए सचु वरतै सभ थाई ॥ सचा सीगारु करे दिनु राती कामणि सचि समाई ॥ हरि सुखदाता सबदि पछाता कामणि लइआ कंठि लाए ॥ नानक महली महलु पछाणै गुरमती हरि पाए ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: करे = करि, कर। धन बालड़ीए = हे अंजान जिंदे! देइ मिलाए = देय मिलाय, मिला देता है। कै रंगि = के प्रेम रंग में। रती = रंगी हुई। कामणि = जीव-स्त्री। साचि = सदा स्थिर प्रभु में। सचु = सदा स्थिर प्रभु। सबदि = गुरु के शब्द द्वारा। पछाता = पहचान लिया, सांझ डाल ली। कंठि = गले से। महली महलु = महल के मालिक प्रभु का महल।3।
अर्थ: हे अंजान जिंदे! गुरु का बताया हुआ काम किया कर। गुरु प्रभु-पति के साथ मिला देता है। जो जीव-स्त्री प्रभु के प्रेम-रंग में रंगी जाती है, वह प्यारे प्रभु को मिल के आत्मिक आनंद पाती है। प्रभु प्रीतम को मिल के वह आत्मिक आनंद भोगती है, सदा स्थिर प्रभु में लीन रहती है, वह सदा स्थिर प्रभु उसे हर जगह बसता दिखाई देता है। वह जीव-स्त्री सदा-स्थिर प्रभु की याद में मस्त रहती है, यही सदा कायम रहने वाला (आत्मिक) श्रंृगार दिन-रात वह किए रखती है। गुरु के शब्द में जुड़ के वह जीव-स्त्री सारे सुख देने वाले प्रभु के साथ सांझ डालती है, उसको अपने गले से लगाए रखती है (गले में परोए रखती है, हर वक्त उसका जाप करती है)। हे नानक! वह जीव-स्त्री मालिक प्रभु का महल ढूँढ लेती है, गुरु की मति पर चल के वह प्रभु-पति का मिलाप प्राप्त कर लेती है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सा धन बाली धुरि मेली मेरै प्रभि आपि मिलाई राम ॥ गुरमती घटि चानणु होआ प्रभु रवि रहिआ सभ थाई राम ॥ प्रभु रवि रहिआ सभ थाई मंनि वसाई पूरबि लिखिआ पाइआ ॥ सेज सुखाली मेरे प्रभ भाणी सचु सीगारु बणाइआ ॥ कामणि निरमल हउमै मलु खोई गुरमति सचि समाई ॥ नानक आपि मिलाई करतै नामु नवै निधि पाई ॥४॥३॥४॥

मूलम्

सा धन बाली धुरि मेली मेरै प्रभि आपि मिलाई राम ॥ गुरमती घटि चानणु होआ प्रभु रवि रहिआ सभ थाई राम ॥ प्रभु रवि रहिआ सभ थाई मंनि वसाई पूरबि लिखिआ पाइआ ॥ सेज सुखाली मेरे प्रभ भाणी सचु सीगारु बणाइआ ॥ कामणि निरमल हउमै मलु खोई गुरमति सचि समाई ॥ नानक आपि मिलाई करतै नामु नवै निधि पाई ॥४॥३॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साधन बाली = अंजान जीव-स्त्री। धुरि = धुर दरगाह से। प्रभि = प्रभु ने। गुरमती = गुरु की मति पर चल के। घटि = हृदय में। मंनि = मन में। पूरबि = पूर्बले जन्म में। सेज = हृदय सेज। सुखाली = सुखी। प्रभ भाणी = प्रभु को अच्छी लगी। सचु सीगारु = सदा स्थिर हरि का नाम जपने का आत्मिक सुहज। कामणि = जीव-स्त्री। खोई = दूर कर ली। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। करतै = कर्तार ने। नवै निधि = नौ ही खजाने।4।
अर्थ: हे भाई! जिस अंजान जीव-स्त्री को धुर दरगाह से मिलाप के लेख प्राप्त हुआ, उसको प्रभु ने स्वयं अपने चरणों से जोड़ लिया। उस जीव-स्त्री के हृदय में ये रौशनी हो गई कि परमात्मा हर जगह मौजूद है। सब जगह व्यापक प्रभु को उस जीव-स्त्री ने अपने मन में बसा लिया, पिछले जन्म के लिखे लेख (उसके माथे पर) उघड़ आए। वह जीव-स्त्री प्यारे प्रभु को अच्छी लगने लग पड़ी, उसकी हृदय-सेज आनंद-भरपूर हो गई, सदा-स्थिर प्रभु के नाम स्मरण को उसने (अपने जीवन का) श्रृंगार बना लिया।
जो जीव-स्त्री गुरु की मति ले के सदा-स्थिर प्रभु के नाम में लीन हो जाती है, वह (अपने अंदर से) अहंकार की मैल दूर कर लेती है, वह पवित्र जीवन वाली बन जाती है। हे नानक! (कह:) कर्तार ने स्वयं उसे अपने साथ मिला लिया, उसने परमात्मा का नाम प्राप्त कर लिया, जो उसके लिए सृष्टि के नौ खजानों के तूल्य है।4।3।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ३ ॥ हरि हरे हरि गुण गावहु हरि गुरमुखे पाए राम ॥ अनदिनो सबदि रवहु अनहद सबद वजाए राम ॥ अनहद सबद वजाए हरि जीउ घरि आए हरि गुण गावहु नारी ॥ अनदिनु भगति करहि गुर आगै सा धन कंत पिआरी ॥ गुर का सबदु वसिआ घट अंतरि से जन सबदि सुहाए ॥ नानक तिन घरि सद ही सोहिला हरि करि किरपा घरि आए ॥१॥

मूलम्

सूही महला ३ ॥ हरि हरे हरि गुण गावहु हरि गुरमुखे पाए राम ॥ अनदिनो सबदि रवहु अनहद सबद वजाए राम ॥ अनहद सबद वजाए हरि जीउ घरि आए हरि गुण गावहु नारी ॥ अनदिनु भगति करहि गुर आगै सा धन कंत पिआरी ॥ गुर का सबदु वसिआ घट अंतरि से जन सबदि सुहाए ॥ नानक तिन घरि सद ही सोहिला हरि करि किरपा घरि आए ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हरि हरे हरि गुण = सदा ही हरि के गुण। गुरमुखे = गुरु की शरण पड़ने से। अनदिनो = हर रोज। सबदि = गुरु के शब्द द्वारा। रवहु = स्मरण करो। वजाए = बजा के। अनहद = एक रस, लगातार। अनहद सबद वजाए = एक रस परमात्मा की महिमा की वाणी (के बाजे) बजा के। वजाए = बजाता है। घरि = हृदय घर में। नारी = हे नारियो! हे ज्ञानेन्द्रियो! गुर आगै = गुरु के सन्मुख हो के। साधन = वह जीव स्त्रीयां। सुहाए = सुंदर जीवन वाले बन जाते हैं। सोहिला = खुशी के गीत। करि = कर के। आए = आता है।1।
अर्थ: हे भाई! सदा परमात्मा के गुण गाया करो। (जो मनुष्य प्रभु के गुण गाता है वह) गुरु की शरण पड़ कर परमात्मा को मिल जाता है। हे भाई! एक रस परमात्मा के महिमा की वाणी (के बाजे) बजा के गुरु के शब्द के द्वारा हर वक्त परमात्मा का नाम स्मरण किया करो। जो मनुष्य परमात्मा की महिमा की वाणी के बाजे एक-रस बजाता रहता है, परमात्मा उसके हृदय-गृह में प्रकट हो जाता है। हे (मेरी) ज्ञानेन्द्रियो! तुम भी परमात्मा की महिमा के गीत गाया करो। जो जीव-स्त्रीयां गुरु के सन्मुख हो के हर वक्त परमात्मा की भक्ति करती हैं, वे प्रभु-पति को प्यारी लगती हैं।
हे नानक! जिस मनुष्यों के दिल में गुरु का शब्द बस पड़ता है, गुरु के शब्द की इनायत से उनका जीवन सुंदर बन जाता है, उनके हृदय-घर में सदा ही (मानो) खुशी के गीत चलते रहते हैं, प्रभु कृपा करके उनके हृदय-घर में आ बसता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

भगता मनि आनंदु भइआ हरि नामि रहे लिव लाए राम ॥ गुरमुखे मनु निरमलु होआ निरमल हरि गुण गाए राम ॥ निरमल गुण गाए नामु मंनि वसाए हरि की अम्रित बाणी ॥ जिन्ह मनि वसिआ सेई जन निसतरे घटि घटि सबदि समाणी ॥ तेरे गुण गावहि सहजि समावहि सबदे मेलि मिलाए ॥ नानक सफल जनमु तिन केरा जि सतिगुरि हरि मारगि पाए ॥२॥

मूलम्

भगता मनि आनंदु भइआ हरि नामि रहे लिव लाए राम ॥ गुरमुखे मनु निरमलु होआ निरमल हरि गुण गाए राम ॥ निरमल गुण गाए नामु मंनि वसाए हरि की अम्रित बाणी ॥ जिन्ह मनि वसिआ सेई जन निसतरे घटि घटि सबदि समाणी ॥ तेरे गुण गावहि सहजि समावहि सबदे मेलि मिलाए ॥ नानक सफल जनमु तिन केरा जि सतिगुरि हरि मारगि पाए ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मनि = मन में। नामि = नाम में। रहे लिव लाए = लगन लगा के रखते हैं। गुरमुखे = गुरु के सन्मुख रह के। गाए = गा के। मंनि = मन में। वसाए = बसा के। अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाली। सेई जन = वही मनुष्य। निसतरे = पार लांघ जाते हैं। घटि घटि = हरेक शरीर में। सबदि = शब्द के द्वारा। गावहि = गाते हैं। सहजि = आत्मिक अडोलता में। समावहि = लीन रहते हैं। सबदि = शब्द की इनायत से। केरा = का। जि = जिस मनुष्यों को। सतिगुरि = गुरु ने। मारगि = रास्ते पर।2।
अर्थ: हे भाई! प्रभु के भक्तों के मन में आनंद बना रहता है, क्योकि वह परमात्मा के नाम में सदा तवज्जो जोड़े रखते हैं। गुरु के द्वारा परमात्मा के पवित्र गुण गा गा के उनका मन पवित्र हो जाता है। परमात्मा की आत्मिक जीवन देने वाली महिमा की वाणी के द्वारा, प्रभु के पवित्र गुण गा गा के, प्रभु का नाम अपने मन में बसा के (उनका मन पवित्र हो जाता है)। हे भाई! जिस मनुष्यों के मन में परमात्मा का नाम बस जाता है, वे मनुष्य संसार सागर से पार लांघ जाते हैं। गुरु के शब्द की इनायत सेउनको परमात्मा हरेक शरीर में बसता दिखता है।
हे प्रभु! जो मनुष्य तेरे गुण गाते हैं, वे आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं। गुरु अपने शब्द के द्वारा उनको (हे प्रभु!) तेरे चरणों में जोड़ देता है। हे नानक! उन मनुष्यों का जनम कामयाब हो जाता है, जिनको गुरु परमात्मा के रास्ते पर चला देता है।2।

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विश्वास-प्रस्तुतिः

संतसंगति सिउ मेलु भइआ हरि हरि नामि समाए राम ॥ गुर कै सबदि सद जीवन मुकत भए हरि कै नामि लिव लाए राम ॥ हरि नामि चितु लाए गुरि मेलि मिलाए मनूआ रता हरि नाले ॥ सुखदाता पाइआ मोहु चुकाइआ अनदिनु नामु सम्हाले ॥ गुर सबदे राता सहजे माता नामु मनि वसाए ॥ नानक तिन घरि सद ही सोहिला जि सतिगुर सेवि समाए ॥३॥

मूलम्

संतसंगति सिउ मेलु भइआ हरि हरि नामि समाए राम ॥ गुर कै सबदि सद जीवन मुकत भए हरि कै नामि लिव लाए राम ॥ हरि नामि चितु लाए गुरि मेलि मिलाए मनूआ रता हरि नाले ॥ सुखदाता पाइआ मोहु चुकाइआ अनदिनु नामु सम्हाले ॥ गुर सबदे राता सहजे माता नामु मनि वसाए ॥ नानक तिन घरि सद ही सोहिला जि सतिगुर सेवि समाए ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सिउ = साथ। मेलु = मिलाप। नामि = नाम में। कै सबदि = के शब्द की इनायत से। जीवन मुकते = दुनिया के काम काज करते हुए भी निर्लिप। कै नामि = के नाम में। लिव = लगन। लाए = लगा के। गुरि = गुरु ने। मेलि = प्रभु चरणों में। चुकाइआ = चुकाया, दूर कर दिया। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। समाले = हृदय में बसा के। सहजे = आत्मिक अडोलता में। माता = मस्त। मनि = मन में। घरि = हृदय घर में। सद = सदा। सोहिला = खुशी, आनंद। जि = जो मनुष्य।3।
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्यों का साधु-संगत के साथ मिलाप हो जाता है, वे परमात्मा के नाम में लीन रहते हैं। गुरु के शब्द की इनायत से परमात्मा के नाम में तवज्जो जोड़ के वे दुनिया के काम-काज करते हुए ही माया से निर्लिप रहते हैं। जिनको गुरु ने प्रभु-चरणों में जोड़ दिया, उन मनुष्यों ने परमात्मा के नाम में मन जोड़ लिया, उनका मन परमात्मा के (प्रेम-रंग से) रंगा गया। उन्होंने हर वक्त परमात्मा का नाम हृदय में बसा के (अपने अंदर से माया का) मोह दूर कर लिया, और, सारे सुख देने वाले परमात्मा के साथ मिलाप हासिल कर लिया। जो मनुष्य गुरु के शब्द में रंगा जाता है, वह आत्मिक अडोलता में मस्त रहता है, वह हरि-नाम को मन में बसाए रखता है। हे नानक! जो मनुष्य गुरु की बताई हुई सेवा करके प्रभु में लीन रहते हैं, उनके हृदय में सदा ही खुशी बनी रहती है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बिनु सतिगुर जगु भरमि भुलाइआ हरि का महलु न पाइआ राम ॥ गुरमुखे इकि मेलि मिलाइआ तिन के दूख गवाइआ राम ॥ तिन के दूख गवाइआ जा हरि मनि भाइआ सदा गावहि रंगि राते ॥ हरि के भगत सदा जन निरमल जुगि जुगि सद ही जाते ॥ साची भगति करहि दरि जापहि घरि दरि सचा सोई ॥ नानक सचा सोहिला सची सचु बाणी सबदे ही सुखु होई ॥४॥४॥५॥

मूलम्

बिनु सतिगुर जगु भरमि भुलाइआ हरि का महलु न पाइआ राम ॥ गुरमुखे इकि मेलि मिलाइआ तिन के दूख गवाइआ राम ॥ तिन के दूख गवाइआ जा हरि मनि भाइआ सदा गावहि रंगि राते ॥ हरि के भगत सदा जन निरमल जुगि जुगि सद ही जाते ॥ साची भगति करहि दरि जापहि घरि दरि सचा सोई ॥ नानक सचा सोहिला सची सचु बाणी सबदे ही सुखु होई ॥४॥४॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भरमि = भटकना में (पड़ कर)। भुलाइआ = कुराहे पड़ा रहता है। महलु = हजूरी। गुरमुखे = गुरु के सन्मुख रहने वाले। इकि = कई। मेलि = प्रभु चरणों में। मनि = मन में। रंगि = रंग में। राते = रंगे हुए। जुगि जुगि = हरेक युग में। जाते = प्रकट हो जाते हैं। साची भगति = सदा स्थिर प्रभु की भक्ति। दरि = प्रभु के दर पर। जापहि = आदर पाते हैं। घरि = हृदय-घर में। वरि = अंदर। सोहिला = खुशी।4।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘इकि’ है ‘इक/एक’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! गुरु की शरण पड़े बिना जगत भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ा रहता है, परमात्मा की हजूरी प्राप्त नहीं कर सकता। पर कई (भाग्यशाली ऐसे हैं, जो) गुरु के सन्मुख (रहते हैं, उन्हें गुरु ने) प्रभु-चरणों में जोड़ दिया है, उनके सारे दुख दूर कर दिए हैं। जब वे प्रभु के मन को प्यारे लगते हैं, उनके दुख दूर हो जाते हैं, वे प्रेम-रंग में रंगीज के सदा परमात्मा की महिमा के गीत गाते रहते हैं। परमात्मा के वे भक्त सदा के लिए पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं, वे हरेक युग में सदा ही प्रकट हो जाते हैं। वे (भाग्यशाली मनुष्य) सदा-स्थिर प्रभु की भक्ति करते हैं, उसके दर पर इज्जत पाते हैं, उनके हृदय में उनके अंदर सदा-स्थिर रहने वाला प्रभु बस जाता है। हे नानक! उनके अंदर महिमा वाली वाणी बसी रहती है, शब्द की इनायत से उनके अंदर आत्मिक आनंद बना रहता है।4।4।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ३ ॥ जे लोड़हि वरु बालड़ीए ता गुर चरणी चितु लाए राम ॥ सदा होवहि सोहागणी हरि जीउ मरै न जाए राम ॥ हरि जीउ मरै न जाए गुर कै सहजि सुभाए सा धन कंत पिआरी ॥ सचि संजमि सदा है निरमल गुर कै सबदि सीगारी ॥ मेरा प्रभु साचा सद ही साचा जिनि आपे आपु उपाइआ ॥ नानक सदा पिरु रावे आपणा जिनि गुर चरणी चितु लाइआ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ३ ॥ जे लोड़हि वरु बालड़ीए ता गुर चरणी चितु लाए राम ॥ सदा होवहि सोहागणी हरि जीउ मरै न जाए राम ॥ हरि जीउ मरै न जाए गुर कै सहजि सुभाए सा धन कंत पिआरी ॥ सचि संजमि सदा है निरमल गुर कै सबदि सीगारी ॥ मेरा प्रभु साचा सद ही साचा जिनि आपे आपु उपाइआ ॥ नानक सदा पिरु रावे आपणा जिनि गुर चरणी चितु लाइआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: वरु = पति प्रभु (का मिलाप)। बालड़ीए = हे अंजान जीव-स्त्री! लाए = लगा। सोहागणी = सोहाग भाग वाली। जाए = नाश होता। गुर कै = गुरु के द्वारा। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाए = प्रेम में, सुभाय। साधन = जीव-स्त्री। सचि = सदा स्थिर हरि नाम में। संजमि = संयम में, बंदिश में। गुर कै सबदि = गुरु के शब्द के द्वारा। सीगारी = आत्मिक जीवन को सुंदर बनाती है। साचा = सदा स्थिर रहने वाला। जिनि = जिस (प्रभु) ने। आपे = स्वयं ही। आपु = अपने आप को। जिनि = जिस जीव-स्त्री ने।1।
अर्थ: हे अंजान जीव-स्त्री! अगर तू प्रभु पति का मिलाप चाहती है, तो अपने गुरु के चरणों में चिक्त जोड़ के रख। तू सदा के लिए सोहाग-भाग वाली बन जाएगी, (क्योंकि) प्रभु-पति ना कभी मरता है ना कभी नाश होता है। जो जीव-स्त्री गुरु के द्वारा आत्मिक अडोलता में प्रेम में लीन रहती है, वह पति-प्रभु को प्यारी लगती है। सदा-स्थिर प्रभु में जुड़ के, (विकारों पर) संयम रख के, वह जीव-स्त्री पवित्र जीवन वाली हो जाती है, गुरु के शब्द की इनायत से वह अपने आत्मिक जीवन को सुंदर बना लेती है। हे सहेलिए! मेरा प्रभु सदा कायम रहने वाला है, उसने अपने आप को आप ही प्रकट किया हुआ है। हे नानक! जिस जीव-स्त्री ने गुरु के चरणों में अपना मन जोड़ लिया, वह सदा प्रभु पति के मिलाप का आनंद भोगती है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पिरु पाइअड़ा बालड़ीए अनदिनु सहजे माती राम ॥ गुरमती मनि अनदु भइआ तितु तनि मैलु न राती राम ॥ तितु तनि मैलु न राती हरि प्रभि राती मेरा प्रभु मेलि मिलाए ॥ अनदिनु रावे हरि प्रभु अपणा विचहु आपु गवाए ॥ गुरमति पाइआ सहजि मिलाइआ अपणे प्रीतम राती ॥ नानक नामु मिलै वडिआई प्रभु रावे रंगि राती ॥२॥

मूलम्

पिरु पाइअड़ा बालड़ीए अनदिनु सहजे माती राम ॥ गुरमती मनि अनदु भइआ तितु तनि मैलु न राती राम ॥ तितु तनि मैलु न राती हरि प्रभि राती मेरा प्रभु मेलि मिलाए ॥ अनदिनु रावे हरि प्रभु अपणा विचहु आपु गवाए ॥ गुरमति पाइआ सहजि मिलाइआ अपणे प्रीतम राती ॥ नानक नामु मिलै वडिआई प्रभु रावे रंगि राती ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पिरु = प्रभु पति। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। सहजे = आत्मिक अडोलता में। मनि = मन में। तितु तनि = उस शरीर में। राती = रक्ती भर भी। प्रभि = प्रभु में। राती = मस्त। मेलि = मेल में, चरणों में। आपु = स्वै भाव। रावै = भोगती है, माणती है। रंगि राती = प्रेम रंग में रंगी हुई।2।
अर्थ: हे अंजान जीव-स्त्री! जो जीव-स्त्री प्रभु-पति का मिलाप हासिल कर लेती है, वह हर वक्त आत्मिक अडोलता में मस्त रहती है। गुरु की मति के सदका उसके मन में आनंद बना रहता है, (उसके) शरीर में (विचारों की) रक्ती भर भी मैल नहीं होती। (उसके) शरीर में रक्ती भर भी मैल नहीं होती, वह प्रभु (के प्रेम-रंग में) रंगी रहती है प्रभु उसको अपने चरणों में मिला लेता है। वह जीव-स्त्री अपने अंदर से स्वै भाव दूर करके हर वक्त अपने हरि-प्रभु को सिमरती रहती है। गुरु की शिक्षा के साथ प्रभु से मिल जाती है, गुरु उसको आत्मिक अडोलता में टिका देता है, वह अपने प्रभु-प्रीतम के रंग में रंगी जाती है। हे नानक! उसको हरि-नाम मिल जाता है, इज्जत मिल जाती है, वह प्रेम-रंग में रंगी हुई हर वक्त प्रभु का स्मरण करती है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पिरु रावे रंगि रातड़ीए पिर का महलु तिन पाइआ राम ॥ सो सहो अति निरमलु दाता जिनि विचहु आपु गवाइआ राम ॥ विचहु मोहु चुकाइआ जा हरि भाइआ हरि कामणि मनि भाणी ॥ अनदिनु गुण गावै नित साचे कथे अकथ कहाणी ॥ जुग चारे साचा एको वरतै बिनु गुर किनै न पाइआ ॥ नानक रंगि रवै रंगि राती जिनि हरि सेती चितु लाइआ ॥३॥

मूलम्

पिरु रावे रंगि रातड़ीए पिर का महलु तिन पाइआ राम ॥ सो सहो अति निरमलु दाता जिनि विचहु आपु गवाइआ राम ॥ विचहु मोहु चुकाइआ जा हरि भाइआ हरि कामणि मनि भाणी ॥ अनदिनु गुण गावै नित साचे कथे अकथ कहाणी ॥ जुग चारे साचा एको वरतै बिनु गुर किनै न पाइआ ॥ नानक रंगि रवै रंगि राती जिनि हरि सेती चितु लाइआ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रावे = मिलाप करती है, स्मरण करती है। रंगि रातड़ीए = हे प्रेम रंग में रंगी हुई जीव-स्त्री! महलु = हजूरी। तिन = उस (जीव-स्त्री) ने। सहो = सहु, शहु। जिनि = जिस (जीव-स्त्री) ने। आपु = स्वै भाव। हरि मनि = हरि के मन में। कामणि = जीव-स्त्री। भाई = पसंद आई। अकथ = जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सके। किनै = किसी ने भी। रवै = सिमरती है। जिनि = जिस (जीव-स्त्री) ने। सेती = साथ।3।
अर्थ: हे प्रभु के प्रेम-रंग में रंगी हुई जीव-स्त्री! जो जीव-स्त्री प्रभु-पति को हर वक्त सिमरती है, जिसने अपने अंदर से स्वैभाव दूर कर दिया है, उसने उस प्रभु की हजूरी प्राप्त कर ली है जो बहुत पवित्र है, और, सबको दातें देने वाला है।
जब प्रभु की रजा होती है, तब जीव-स्त्री अपने अंदर से मोह दूर करती है, और, प्रभु के मन को प्यारी लगने लगती है। फिर वह हर वक्त सदा-स्थिर प्रभु के गुण गाती रहती है, और उस प्रभु की महिमा की बातें करती है जिसका स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता।
हे सखिए! चारों युगों में वह सदा-स्थिर प्रभु खुद ही अपना हुक्म बरता रहा है, पर गुरु की शरण के बिना किसी ने भी उसका मिलाप हासिल नहीं किया। हे नानक! जिस जीव-स्त्री ने परमात्मा से अपना मन जोड़ लिया, वह उसके प्रेम-रंग में रंगी हुई उसके प्रेम में उसका स्मरण करती है।3।

[[0772]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

कामणि मनि सोहिलड़ा साजन मिले पिआरे राम ॥ गुरमती मनु निरमलु होआ हरि राखिआ उरि धारे राम ॥ हरि राखिआ उरि धारे अपना कारजु सवारे गुरमती हरि जाता ॥ प्रीतमि मोहि लइआ मनु मेरा पाइआ करम बिधाता ॥ सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ हरि वसिआ मंनि मुरारे ॥ नानक मेलि लई गुरि अपुनै गुर कै सबदि सवारे ॥४॥५॥६॥

मूलम्

कामणि मनि सोहिलड़ा साजन मिले पिआरे राम ॥ गुरमती मनु निरमलु होआ हरि राखिआ उरि धारे राम ॥ हरि राखिआ उरि धारे अपना कारजु सवारे गुरमती हरि जाता ॥ प्रीतमि मोहि लइआ मनु मेरा पाइआ करम बिधाता ॥ सतिगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ हरि वसिआ मंनि मुरारे ॥ नानक मेलि लई गुरि अपुनै गुर कै सबदि सवारे ॥४॥५॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कामणि मनि = (उस) जीव-स्त्री के मन में। सोहिलड़ा = आनंद, खुशी। साजन = सज्जन प्रभु जी। गुरमती = गुरु की मति पर चल के। निरमल = पवित्र। उरि = हृदय में। धारे = धर के, टिका के। कारजु = काम, जनम का उद्देश्य। जाता = समझा, गहरी सांझ डाल ली। प्रीतमि = प्रीतम प्रभु ने। मनु मेरा = ‘मेरा मेरा’ करने वाला मन। करम बिधाता = जीवों को कर्मों के अनुसार पैदा करने वाला। सेवि = शरण पड़ के। मंनि = मन में। मुरारे = (मुर+अरि। मुर दैत्य का वैरी) परमात्मा। गुरि = गुरु ने। कै सबदि = के शब्द से। सवारे = (जीवन) सुंदर बना लिया।4।
अर्थ: जिस जीव-स्त्री को प्यारे सज्जन प्रभु जी मिल जाते हैं, उसके मन में आनंद बना रहता है। गुरु की मति पर चल कर उसका मन पवित्र हो जाता है, वह अपने दिल में हरि-प्रभु को टिकाए रखती है। वह जीव-स्त्री परमात्मा को अपने हृदय में बसाए रखती है, इस तरह अपने जीवन के उद्देश्य को सँवार लेती है, गुरु की शिक्षा की इनायत से वह परमात्मा के साथ गहरी सांझ बना लेती है। उसका मन, जो पहले ममता में फसा हुआ था, प्रीतम प्रभु ने अपने बस में कर लिया, और, उस जीव-स्त्री ने सदा आत्मिक आनंद पाया है, मुरारी प्रभु उस के मन में आ बसा है। हे नानक! गुरु के शब्द की इनायत से उस जीव-स्त्री ने अपना जीवन सुंदर बना लिया है, प्यारे गुरु ने उसको प्रभु-चरणों में जोड़ दिया है।4।5।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ३ ॥ सोहिलड़ा हरि राम नामु गुर सबदी वीचारे राम ॥ हरि मनु तनो गुरमुखि भीजै राम नामु पिआरे राम ॥ राम नामु पिआरे सभि कुल उधारे राम नामु मुखि बाणी ॥ आवण जाण रहे सुखु पाइआ घरि अनहद सुरति समाणी ॥ हरि हरि एको पाइआ हरि प्रभु नानक किरपा धारे ॥ सोहिलड़ा हरि राम नामु गुर सबदी वीचारे ॥१॥

मूलम्

सूही महला ३ ॥ सोहिलड़ा हरि राम नामु गुर सबदी वीचारे राम ॥ हरि मनु तनो गुरमुखि भीजै राम नामु पिआरे राम ॥ राम नामु पिआरे सभि कुल उधारे राम नामु मुखि बाणी ॥ आवण जाण रहे सुखु पाइआ घरि अनहद सुरति समाणी ॥ हरि हरि एको पाइआ हरि प्रभु नानक किरपा धारे ॥ सोहिलड़ा हरि राम नामु गुर सबदी वीचारे ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सोहिलड़ा = आनंद की लहर। गुरसबदी = गुरु के शब्द द्वारा। राम नामु वीचारे = हरि नाम को विचारता है। तनो = तनु। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख रह के। पिआरे = प्यार करता है। सभि = सारे। उधारे = पार लंघा लेता है। मुखि = मुँह से। रहे = खत्म हो जाते हैं। घरि = हृदय घर में। अनहद = एक रस (सुख)। समाणी = जुड़ जाती है।1।
अर्थ: जो मनुष्य गुरु के शब्द में जुड़ के परमात्मा के नाम को विचारता है, उसके अंदर आनंद की लहर चलती रहती है। गुरु के सन्मुख रहने वाला उसका मन उसका हृदय परमात्मा (के प्यार रस) में भीग जाता है, वह मनुष्य परमात्मा के नाम को प्यार करता है। वह मनुष्य परमात्मा के नाम से प्यार करता है। परमात्मा का नाम, परमात्मा की महिमा की वाणी वह अपने मुँह से उचारता है, और अपनी सारी कुलों को (विकारों से) बचा लेता है। उसके जनम-मरन के चक्कर खत्म हो जाते हैं, वह अपने हृदय-घर में एक रस आनंद लेता रहता है, उसकी तवज्जो (प्रभु-चरणों में) लीन रहती है। हे नानक! परमात्मा उस मनुष्य पर मेहर करता है, वह मनुष्य परमात्मा के साथ मिलाप हासिल कर लेता है। हे भाई! जो मनुष्य गुरु के शब्द के द्वारा प्रभु के नाम को विचारता है, उसके अंदर आत्मिक आनंद की लहर चल पड़ती है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हम नीवी प्रभु अति ऊचा किउ करि मिलिआ जाए राम ॥ गुरि मेली बहु किरपा धारी हरि कै सबदि सुभाए राम ॥ मिलु सबदि सुभाए आपु गवाए रंग सिउ रलीआ माणे ॥ सेज सुखाली जा प्रभु भाइआ हरि हरि नामि समाणे ॥ नानक सोहागणि सा वडभागी जे चलै सतिगुर भाए ॥ हम नीवी प्रभु अति ऊचा किउ करि मिलिआ जाए राम ॥२॥

मूलम्

हम नीवी प्रभु अति ऊचा किउ करि मिलिआ जाए राम ॥ गुरि मेली बहु किरपा धारी हरि कै सबदि सुभाए राम ॥ मिलु सबदि सुभाए आपु गवाए रंग सिउ रलीआ माणे ॥ सेज सुखाली जा प्रभु भाइआ हरि हरि नामि समाणे ॥ नानक सोहागणि सा वडभागी जे चलै सतिगुर भाए ॥ हम नीवी प्रभु अति ऊचा किउ करि मिलिआ जाए राम ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हम = हम जीव स्त्रीयां। नीवी = (आत्मिक जीवन के) निम्न स्तर पर। किउ करि = कैसे? गुरि = गुरु ने। कै सबदि = के शब्द के द्वारा। सुभाए = प्यार में (लीन)। मिलि = मिल के। आपु = स्वै भाव। सिउ = साथ। रलीआ = आत्मिक आनंद। सेज = हृदय सेज। सुखाली = सुख भरपूर। जा = जब। भाइआ = भाया, प्यारा लगता है। नामि = नाम में। सोहागणि = पति वाली। भाए = भाय, रजा में।2।
अर्थ: हे भाई! हम जीव स्त्रीयां (आत्मिक जीवन की) निम्न स्तर पर हैं, पर प्रभु (इस स्तर से) बहुत ऊँचा है (उच्च स्तर पर है), फिर हमारा उसके साथ मिलाप कैसे हो? (उक्तर) जिस पर गुरु ने कृपा कर दी, उसको (प्रभु चरणों में) जोड़ दिया। गुरु के शब्द के द्वारा वह जीव-स्त्री प्रभु के प्यार में लीन हो जाती है। गुरु के शब्द के द्वारा वह जीव-स्त्री प्रभु में मिल के प्रभु के प्रेम में टिक के (अपने अंदर से) स्वै-भाव दूर कर लेती है, और प्रेम में प्रभु का मिलाप भोगती है। जब उसे परमात्मा प्यारा लगने लग जाता है, तब उसके हृदय की सेज आनंद-भरपूर हो जाती है, वह प्रभु के नाम में ही लीन रहती है। हे नानक! सोहाग-भाग वाली जीव-स्त्री जब गुरु की रजा के अनुसार चलती है तब वह बड़ी किस्मत वाली बन जाती है। (वैसे तो) हम जीव-स्त्रीयां (आत्मिक जीवन के) निम्न स्तर पर हैं (पर) प्रभु (इस स्तर से) बहुत ऊँचा है, उसके साथ हमारा मेल नहीं हो सकता।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

घटि घटे सभना विचि एको एको राम भतारो राम ॥ इकना प्रभु दूरि वसै इकना मनि आधारो राम ॥ इकना मन आधारो सिरजणहारो वडभागी गुरु पाइआ ॥ घटि घटि हरि प्रभु एको सुआमी गुरमुखि अलखु लखाइआ ॥ सहजे अनदु होआ मनु मानिआ नानक ब्रहम बीचारो ॥ घटि घटे सभना विचि एको एको राम भतारो राम ॥३॥

मूलम्

घटि घटे सभना विचि एको एको राम भतारो राम ॥ इकना प्रभु दूरि वसै इकना मनि आधारो राम ॥ इकना मन आधारो सिरजणहारो वडभागी गुरु पाइआ ॥ घटि घटि हरि प्रभु एको सुआमी गुरमुखि अलखु लखाइआ ॥ सहजे अनदु होआ मनु मानिआ नानक ब्रहम बीचारो ॥ घटि घटे सभना विचि एको एको राम भतारो राम ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: घटि घटे = घट घट, हरेक शरीर में। एको राम भतारो = एक प्रभु पति ही। मनि = मन में। आधारो = आसरा। सिरजणहारो = सबको पैदा करने वाला। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ने वाला मनुष्य। अलखु = अदृश्य प्रभु। सहजे = आत्मिक अडोलता में। मानिआ = पतीज जाता है। ब्रहम बीचारो = परमात्मा (के गुणों) की विचार। भतारो = पति।3।
अर्थ: हे भाई! हरेक शरीर में, सब जीवों में एक प्रभु-पति ही बस रहा है। पर, कई जीवों को वह प्रभु कहीं दूर बसता प्रतीत होता है, और, कई जीवों के मन में उस प्रभु का ही आसरा है। सबको पैदा करने वाला प्रभु ही कई जीवों के मन का सहारा है (क्योंकि उन्होंने उनके) बड़े भाग्यों से गुरु ढूँढ लिया है।
हे भाई! हरेक शरीर में एक मालिक प्रभु ही बसता है, गुरु की शरण रहने वाले मनुष्य ने उस अदृश्य प्रभु को (हरेक शरीर में बसता) देख लिया है। हे नानक! वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिका रहता है, उसके अंदर आनंद बना रहता है, उसका मन परमात्मा के गुणों की विचार करने में पतीजा रहता है। हरेक शरीर में सब जीवों में एक प्रभु-पति ही बस रहा है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरु सेवनि सतिगुरु दाता हरि हरि नामि समाइआ राम ॥ हरि धूड़ि देवहु मै पूरे गुर की हम पापी मुकतु कराइआ राम ॥ पापी मुकतु कराए आपु गवाए निज घरि पाइआ वासा ॥ बिबेक बुधी सुखि रैणि विहाणी गुरमति नामि प्रगासा ॥ हरि हरि अनदु भइआ दिनु राती नानक हरि मीठ लगाए ॥ गुरु सेवनि सतिगुरु दाता हरि हरि नामि समाए ॥४॥६॥७॥५॥७॥१२॥

मूलम्

गुरु सेवनि सतिगुरु दाता हरि हरि नामि समाइआ राम ॥ हरि धूड़ि देवहु मै पूरे गुर की हम पापी मुकतु कराइआ राम ॥ पापी मुकतु कराए आपु गवाए निज घरि पाइआ वासा ॥ बिबेक बुधी सुखि रैणि विहाणी गुरमति नामि प्रगासा ॥ हरि हरि अनदु भइआ दिनु राती नानक हरि मीठ लगाए ॥ गुरु सेवनि सतिगुरु दाता हरि हरि नामि समाए ॥४॥६॥७॥५॥७॥१२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सेवनि = (जो मनुष्य) सेवा करते हैं, शरण पड़ते हैं। नामि = नाम में। हरि = हे हरि! मै = मुझे। आपु = स्वै भाव। निज घरि = अपने असल घर में, प्रभु चरणों में। बिबेक बुधी = अच्छे बुरे कर्मों को परखने वाली बुद्धि। सुखि = सुख में, आत्मिक आनंद में। रैणि = (जिंदगी की) राम। नामि = नाम से। प्रगासा = (आत्मिक जीवन का) प्रकाश।4।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य हरि-नाम की दाति देने वाले गुरु की शरण पड़ते हैं, वे परमात्मा के नाम में लीन रहते हैं। हे हरि! मुझे भी पूरे गुरु के चरणों की धूल बख्श। गुरु हम पापी जीवों को (विकारों से) आजाद कर देता है। गुरु विकारी जीवों को विकारों से स्वतंत्र कर देता है, (उनके अंदर से) स्वै-भाव दूर कर देता है। (गुरु की शरण आए मनुष्य) प्रभु-चरणों में ठिकाना प्राप्त कर लेते हैं। (गुरु से) अच्छे-बुरे कामों की परख कर सकने वाली बुद्धि प्राप्त करके उनकी (जिंदगी की) रात आनंद में बीतती है। गुरु की मति के सदके हरि-नाम के द्वारा (उनके अंदर आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो जाता है। हे नानक! जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ते हैं, उनको हरि-नाम प्यारा लगने लगता है, दिन-रात उनके अंदर आत्मिक आनंद बना रहता है, वह मनुष्य परमात्मा के नाम में लीन हुए रहते हैं।4।6।7।5।7।12।

[[0773]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला ४ छंत घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला ४ छंत घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सतिगुरु पुरखु मिलाइ अवगण विकणा गुण रवा बलि राम जीउ ॥ हरि हरि नामु धिआइ गुरबाणी नित नित चवा बलि राम जीउ ॥ गुरबाणी सद मीठी लागी पाप विकार गवाइआ ॥ हउमै रोगु गइआ भउ भागा सहजे सहजि मिलाइआ ॥ काइआ सेज गुर सबदि सुखाली गिआन तति करि भोगो ॥ अनदिनु सुखि माणे नित रलीआ नानक धुरि संजोगो ॥१॥

मूलम्

सतिगुरु पुरखु मिलाइ अवगण विकणा गुण रवा बलि राम जीउ ॥ हरि हरि नामु धिआइ गुरबाणी नित नित चवा बलि राम जीउ ॥ गुरबाणी सद मीठी लागी पाप विकार गवाइआ ॥ हउमै रोगु गइआ भउ भागा सहजे सहजि मिलाइआ ॥ काइआ सेज गुर सबदि सुखाली गिआन तति करि भोगो ॥ अनदिनु सुखि माणे नित रलीआ नानक धुरि संजोगो ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: विकणा = बेचते हुए, दूर करते हुए। रवा = मैं याद करूँ। बलि = सदके। राम जीउ = हे राम जी! चवा = मैं उचारता रहूँ। सद = सदा। सहजे सहजि = सहज ही सहज, सदा आत्मिक अडोलता में। काइम = शरीर। सबदि = शब्द की इनायत से। सुखाली = आसान। गिआन = आत्मिक जीवन की सूझ। तति = तत्व में। गिआन तति = आत्मिक जीवन की सूझ के मूल प्रभु में (जुड़ के)। करि = करे, करती है। करि भोगो = मिलाप का सुख भोगती है। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। सुखि = सुख में। धुरि = धुर दरगाह से। संजोगो = मिलाप।1।
अर्थ: हे राम जी! मैं तुझसे सदके हूँ। मुझे गुरु पुरख मिला (जिसके द्वारा) मैं (तेरे) गुणों को याद करूँ, और (इन गुणों के बदले) अवगुण बेच दूँ (दूर कर दूँ)। हे हरि! तेरा नाम स्मरण कर-कर के मैं सदा ही गुरु की वाणी उचारूँ।
जिस जीव-स्त्री को गुरु की वाणी सदा प्यारी लगती है, वह (अपने अंदर से) पाप विकार दूर कर लेती है, उसका अहंकार का रोग समाप्त हो जाता है, हरेक किस्म का डर-सहम भाग जाता है, वह सदा सदा ही आत्मिक अडोलता में टिकी रहती है। गुरु के शब्द की इनायत से उसके हृदय में सेज सुख से भरपूर हो जाती है (सुख का घर बन जाती है), आत्मिक जीवन की सूझ के मूल-प्रभु में जुड़ के वह प्रभु के मिलाप का सुख भोगती है। हे नानक! धुर-दरगाह से जिसके भाग्यों में संजोग लिखा होता है, वह हर वक्त आनंद में टिकी रह के सदा (प्रभु-मिलाप का) सुख पाती है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सतु संतोखु करि भाउ कुड़मु कुड़माई आइआ बलि राम जीउ ॥ संत जना करि मेलु गुरबाणी गावाईआ बलि राम जीउ ॥ बाणी गुर गाई परम गति पाई पंच मिले सोहाइआ ॥ गइआ करोधु ममता तनि नाठी पाखंडु भरमु गवाइआ ॥ हउमै पीर गई सुखु पाइआ आरोगत भए सरीरा ॥ गुर परसादी ब्रहमु पछाता नानक गुणी गहीरा ॥२॥

मूलम्

सतु संतोखु करि भाउ कुड़मु कुड़माई आइआ बलि राम जीउ ॥ संत जना करि मेलु गुरबाणी गावाईआ बलि राम जीउ ॥ बाणी गुर गाई परम गति पाई पंच मिले सोहाइआ ॥ गइआ करोधु ममता तनि नाठी पाखंडु भरमु गवाइआ ॥ हउमै पीर गई सुखु पाइआ आरोगत भए सरीरा ॥ गुर परसादी ब्रहमु पछाता नानक गुणी गहीरा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सतु = दान, सेवा। करि = पैदा कर के। भाउ = प्रेम। कुड़मु = जीव-स्त्री को प्रभु पति के साथ मिलाने वाला बिचोलिया, गुरु। कुड़माई = जीव-स्त्री का प्रभु पति के साथ मिलाप करने के लिए (विवाह)। करि मेलु = इकट्ठा करके, साधु-संगत एकत्र करके। परम गति = सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था। पंच = ज्ञान-इंद्रिय। सोहाइआ = (हृदय = स्थल) सुंदर बना लिया। तनि = शरीर में। नाठी = भाग गई। पीर = पीड़ा। आरोगत = निरोग, निरोआ। परसादी = कृपा से। ब्रहमु पछाता = परमात्मा के साथ सांझ बना ली। गुणी = गुणों का खजाना। गुणी = गुणों का खजाना। गहीरा = गहरे जिगरे वाला।2।
अर्थ: हे राम जी! मैं तुझसे सदके जाता हूँ। (जिस जीव-स्त्री को) प्रभु-पति से मिलाने के लिए विचोलिया गुरु आ के मिल गया (उसके हृदय में) सेवा-संतोख-प्रेम आदि गुण पैदा करके, साधसंगति का (उसके साथ) मेल करके गुरु ने (उसको) महिमा की वाणी गाने की प्रेरणा की।
जब जीव-स्त्री ने गुरु की उचारी हुई प्रभु की महिमा की वाणी गानी आरम्भ की, उसने सबसे उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त कर ली, उसकी ज्ञान-इंद्रिय (विकारों की तरफ दौड़ने की जगह प्रभु की महिमा करने में) मिल बैठीं, और सुंदर लगने लग पड़ी। उसके अंदर से क्रोध दूर हो गया, उसके शरीर में बसती ममता भाग गई, उसका पाखण्ड दूर हो गया, भटकना दूर हो गई। (उसके अंदर से) अहंकार की पीड़ा चली गई, उसका सारा शरीर निरोग हो गया, और उसको आत्मिक आनंद प्राप्त हो गया। हे नानक! गुरु की कृपा से उस जीव-स्त्री ने गुणों के मालिक गहरे जिगरे वाले परमात्मा के सयाथ सांझ डाल ली।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मनमुखि विछुड़ी दूरि महलु न पाए बलि गई बलि राम जीउ ॥ अंतरि ममता कूरि कूड़ु विहाझे कूड़ि लई बलि राम जीउ ॥ कूड़ु कपटु कमावै महा दुखु पावै विणु सतिगुर मगु न पाइआ ॥ उझड़ पंथि भ्रमै गावारी खिनु खिनु धके खाइआ ॥ आपे दइआ करे प्रभु दाता सतिगुरु पुरखु मिलाए ॥ जनम जनम के विछुड़े जन मेले नानक सहजि सुभाए ॥३॥

मूलम्

मनमुखि विछुड़ी दूरि महलु न पाए बलि गई बलि राम जीउ ॥ अंतरि ममता कूरि कूड़ु विहाझे कूड़ि लई बलि राम जीउ ॥ कूड़ु कपटु कमावै महा दुखु पावै विणु सतिगुर मगु न पाइआ ॥ उझड़ पंथि भ्रमै गावारी खिनु खिनु धके खाइआ ॥ आपे दइआ करे प्रभु दाता सतिगुरु पुरखु मिलाए ॥ जनम जनम के विछुड़े जन मेले नानक सहजि सुभाए ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री। महलु = प्रभु की हजूरी। बलि गई = (तृष्णा की आग में) जल जाती है। कूरि ममता = झूठी ममता। विहाझे = खरीदती है, वणज करती है। कूड़ि लई = झूठ ने उसको ग्रस लिया। कपटु = ठगी। मगु = (सही जीवन का) रास्ता। उझड़ पंथि = उजाड़ के रास्ते पर। भ्रमै = भटकती फिरती है। गावारी = मूर्ख जीव-स्त्री। आपे = स्वयं ही। सतिगुरु पुरखु = समरथ गुरु। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाए = प्रेम में।3।
अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री प्रभु-पति से विछुड़ी रहती है, (उसके चरणों से) दूर रहती है, उसकी हजूरी प्राप्त नहीं कर सकती, (तृष्णा की आग में) जली रहती है। उसके अंदर झूठी ममता बनी रहती है, वह सदा नाशवान माया ही एकत्र करती रहती है, माया उसे सदैव ग्रसे हुए रखती है। वह जीव-स्त्री (माया की खातिर सदा) झूठ-ठगी (आदि का ही) काम करती है, बड़ा दुख सहती रहती है, गुरु की शरण पड़े बिना उसको (जिंदगी का सही) रास्ता नहीं मिलता। वह मूर्ख जीव-स्त्री उजाड़ के रास्ते में (जहाँ कामादिक लुटेरे उसे लूटते रहते हैं) भटकती फिरती है, और हर वक्त धक्के खाती है।
हे नानक! जिस मनुष्यों पर दातार प्रभु खुद ही दया करता है, उनको समर्थ गुरु मिला देता है, गुरु उन अनेक जन्मों से विछुड़े हुओं को आत्मिक अडोलता में प्रेम में टिका के प्रभु से मिला देता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

आइआ लगनु गणाइ हिरदै धन ओमाहीआ बलि राम जीउ ॥ पंडित पाधे आणि पती बहि वाचाईआ बलि राम जीउ ॥ पती वाचाई मनि वजी वधाई जब साजन सुणे घरि आए ॥ गुणी गिआनी बहि मता पकाइआ फेरे ततु दिवाए ॥ वरु पाइआ पुरखु अगमु अगोचरु सद नवतनु बाल सखाई ॥ नानक किरपा करि कै मेले विछुड़ि कदे न जाई ॥४॥१॥

मूलम्

आइआ लगनु गणाइ हिरदै धन ओमाहीआ बलि राम जीउ ॥ पंडित पाधे आणि पती बहि वाचाईआ बलि राम जीउ ॥ पती वाचाई मनि वजी वधाई जब साजन सुणे घरि आए ॥ गुणी गिआनी बहि मता पकाइआ फेरे ततु दिवाए ॥ वरु पाइआ पुरखु अगमु अगोचरु सद नवतनु बाल सखाई ॥ नानक किरपा करि कै मेले विछुड़ि कदे न जाई ॥४॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: लगनु गणाइ = लगन गणाय, महूर्त निकलवा के, लगन गिनवा के। हिरदै = हृदय में। धन = जीव-स्त्री। ओमाहीआ = उमाह से भर जाती है, चाव से भर जाती है। आणि = ला के। पती = पत्री। बहि = बैठ के। वाचाईआ = पढ़वाई, सोधी। मनि = मन में। वजी वधाई = खुशी पैदा हुई। घरि = घर में, हृदय घर में। मता पकाइआ = सलाह की। फेरे = लावां, विवाह। ततु = तुरंत। अगंमु = अगम्य (पहुँच से परे)। अगोचरु = जिस तक ज्ञान-इंद्रिय की पहुँच ना हो सके (अ+गो+चरु। गो = ज्ञान-इंद्रिय)। सद = सदा। नवतनु = नूतन, नया। बाल सखाई = बचपन से ही मित्र।4।
अर्थ: (जैसे जब दूल्हा) महूर्त निकलवा के (बारात ले के) आता है (तब,) स्त्री अपने दिल में प्रसन्न होती है, ज्योतिषी-पंडित पत्री ला के बैठ के (फेरे देने के समय) की विचार करते हैं। (ज्योतिषी-पण्डित) पत्री विचारते हैं (उधर) जब (विवाह वाली कन्या) साजन घर आए सुनती है, तो उसके मन में खुशी की लहर चल पड़ती है, गुणवान बैठ के फैसला करते हैं, और तुरंत फेरे दे देते हैं (वैसे ही, गुरु की कृपा से प्रभु जीव-स्त्री के अंदर प्रकट होता है, जीव-स्त्री के हृदय में आत्मिक आनंद की लहर चल पड़ती है। गुरमुख वाणी के रसिए साधु-संगत में मिल के गुरु की वाणी पढ़ते-विचारते हैं। ज्यों-ज्यों गुरबाणी विचारते हैं, जीव-स्त्री के हृदय-गृह में साजन-प्रभु का प्रकाश होता है, उसके मन में आनंद के, मानो, बाजे बजते हैं। गुरमुख सत्संगी जीव-स्त्री का प्रभु-पति से मिलाप करवा देते हैं)।
हे नानक! जीव-स्त्री को पति-प्रभु मिल जाता है जो (साधारण उद्यम से) अगम्य (पहुँच से परे) है, जिस तक ज्ञान-इंद्रिय की पहुँच नहीं हो सकती, जो सदा नए प्यार वाला है, जो बचपन से मित्र बना हुआ है। जिस जीव-स्त्री को वह प्रभु कृपा करके अपने साथ मिलाता है, वह दोबारा कभी उससे नहीं विछुड़ती।4।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ४ ॥ हरि पहिलड़ी लाव परविरती करम द्रिड़ाइआ बलि राम जीउ ॥ बाणी ब्रहमा वेदु धरमु द्रिड़हु पाप तजाइआ बलि राम जीउ ॥ धरमु द्रिड़हु हरि नामु धिआवहु सिम्रिति नामु द्रिड़ाइआ ॥ सतिगुरु गुरु पूरा आराधहु सभि किलविख पाप गवाइआ ॥ सहज अनंदु होआ वडभागी मनि हरि हरि मीठा लाइआ ॥ जनु कहै नानकु लाव पहिली आर्मभु काजु रचाइआ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ४ ॥ हरि पहिलड़ी लाव परविरती करम द्रिड़ाइआ बलि राम जीउ ॥ बाणी ब्रहमा वेदु धरमु द्रिड़हु पाप तजाइआ बलि राम जीउ ॥ धरमु द्रिड़हु हरि नामु धिआवहु सिम्रिति नामु द्रिड़ाइआ ॥ सतिगुरु गुरु पूरा आराधहु सभि किलविख पाप गवाइआ ॥ सहज अनंदु होआ वडभागी मनि हरि हरि मीठा लाइआ ॥ जनु कहै नानकु लाव पहिली आर्मभु काजु रचाइआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हरि पहलड़ी लाव = प्रभु पति के साथ (जीव-स्त्री के विवाह की) ये पहली सुंदर लाव है (फेरी है)। परविरती करम = कर्म की प्रवृति, परमात्मा के नाम जपने में व्यस्त होने का काम। द्रिढ़ाइआ = (गुरु ने) दृढ़ करवाया। बाणी = गुरु की वाणी। द्रिढ़हु = हृदय में पक्का करो। तजाइआ = त्यागे जाते हैं। सिम्रिति नामु द्रिढ़ाइआ = गुरु ने जो हरि नाम जपने की ताकीद की है = यही सिख के लिए स्मृति (का उपदेश) है। सभि = सारे। किलविख = पाप। सहज अनंदु = आत्मिक अडोलता का सुख। मनि = मन में। आरंभु = आदि, आरम्भ। काजु = विवाह।1।
अर्थ: हे राम जी! मैं तुझसे सदके जाता हूँ। (तेरी मेहर से गुरु के सिख को) हरि-नाम जपने के आहर में व्यस्त होने का काम निश्चय करवाया है (हरि-नाम जपने की कर्म प्रवृति दृढ़ करवाई है)। यही है प्रभु-पति से (जीव-स्त्री के विवाह की) पहली सुंदर लांव। हे भाई! गुरु की वाणी ही (सिख के लिए) ब्रहमा के वेद हैं। इस वाणी की इनायत से (परमात्मा के नाम के स्मरण का) धर्म (अपने हृदय में) पक्का करो (नाम स्मरण करने से सारे) पाप दूर हो जाते हैं। हे भाई! परमात्मा का नाम स्मरण करते रहो, (मनुष्य के जीवन का यह) धर्म (अपने अंदर) पक्का कर लो। गुरु ने जो नाम-जपने की ताकीद की है, यही सिख के लिए स्मृतियों (का उपदेश) है। हे भाई! पूरे गुरु (के इस उपदेश को) हर वक्त याद रखो, सारे पाप विकार (इसकी इनायत से) दूर हो जाते हैं।
हे भाई! जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम प्यारा लगने लग जाता है, उस अति भाग्यशाली को आत्मिक अडोलता का सुख मिला रहता है। दास नानक कहता है: परमात्मा का नाम जपना प्रभु-पति के साथ जीव-स्त्री के विवाह की पहली लांव है। हरि के नाम स्मरण से ही (प्रभु-पति से जीव-स्त्री के) विवाह (का) आगाज़ (आरम्भ) होता है।1।

[[0774]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि दूजड़ी लाव सतिगुरु पुरखु मिलाइआ बलि राम जीउ ॥ निरभउ भै मनु होइ हउमै मैलु गवाइआ बलि राम जीउ ॥ निरमलु भउ पाइआ हरि गुण गाइआ हरि वेखै रामु हदूरे ॥ हरि आतम रामु पसारिआ सुआमी सरब रहिआ भरपूरे ॥ अंतरि बाहरि हरि प्रभु एको मिलि हरि जन मंगल गाए ॥ जन नानक दूजी लाव चलाई अनहद सबद वजाए ॥२॥

मूलम्

हरि दूजड़ी लाव सतिगुरु पुरखु मिलाइआ बलि राम जीउ ॥ निरभउ भै मनु होइ हउमै मैलु गवाइआ बलि राम जीउ ॥ निरमलु भउ पाइआ हरि गुण गाइआ हरि वेखै रामु हदूरे ॥ हरि आतम रामु पसारिआ सुआमी सरब रहिआ भरपूरे ॥ अंतरि बाहरि हरि प्रभु एको मिलि हरि जन मंगल गाए ॥ जन नानक दूजी लाव चलाई अनहद सबद वजाए ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हरि दूजड़ी लाव = प्रभु पति (जीव-स्त्री के विवाह की) दूसरी सुंदर लांव। सतिगुरु पुरखु मिलाइआ = (प्रभु ने जीव-स्त्री को) गुरु महा पुरुख मिला दिया। बलि राम जीउ = हे राम जी! मैं तुझसे सदके जाता हूँ। भै = (दुनिया के) सारे डरों से। निरभउ भउ = पवित्र डर, अदब सत्कार। वेखै = देखती है। हदूरे = हाजर नाजर, अंग संग। आतमु रामु पसारिआ = प्रभु अपने आपे का पसारा पसार रहा है। सरब = सब जीवों में। भरपूरे = व्यापक। एको = एक ही। मिलि हरि जन = संत जनों के साथ मिल के, साधु-संगत में मिल के। मंगल = महिमा के गीत। चलाई = चला दी। अनहद = एक रस, बिना बजाए। सबद वजाए = महिमा की वाणी के जैसे बाजे बजते हैं।2।
अर्थ: हे राम जी! मैं तुझसे कुर्बान जाता हूँ। (तू मेहर करके जिस जीव-स्त्री को) गुरु महापुरुख मिलवा देता है (उसका) मन (दुनिया के) सारे डरों से निडर हो जाता है (निर्भय हो जाता है), (गुरु, उसके अंदर से) अहंकार की मैल दूर कर देता है; यही है प्रभु पति के (जीव-स्त्री के विवाह की) दूसरी सुंदर लांव।
हे भाई! (जो जीव-स्त्री अहंकार दूर करके) परमात्मा के गुण गाती है, उसके अंदर (प्रभु-पति के लिए) आदर-सत्कार पैदा हो जाता है, वह परमात्मा को अपने अंग-संग बसता देखती है। (उसे ये निश्चय हो जाता है कि यह जगत-पसारा) प्रभु अपने स्वयं का पसारा पसार रहा है, और वह मालिक-प्रभु सब जीवों में व्याप रहा है। (उस जीव-स्त्री को अपने) अंदर और बाहर (सारे जगत में) सिर्फ परमात्मा ही (बसता दिखता है), साधु-संगत में मिल के वह प्रभु की महिमा के गीत गाती रहती है।
हे दास नानक! (कह: गुरु की शरण पड़ कर, अहंकार दूर करके प्रभु की महिमा के गीत गाने और उसे सर्व-व्यापक देखना- प्रभु ने यह) दूसरी लांव (जीव-स्त्री के विवाह की) चाल दी है, (इस आत्मिक अवस्था पर पहुँची जीव-स्त्री के अंदर प्रभु) महिमा की वाणी के, जैसे एक-रस बाजे बजा देता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि तीजड़ी लाव मनि चाउ भइआ बैरागीआ बलि राम जीउ ॥ संत जना हरि मेलु हरि पाइआ वडभागीआ बलि राम जीउ ॥ निरमलु हरि पाइआ हरि गुण गाइआ मुखि बोली हरि बाणी ॥ संत जना वडभागी पाइआ हरि कथीऐ अकथ कहाणी ॥ हिरदै हरि हरि हरि धुनि उपजी हरि जपीऐ मसतकि भागु जीउ ॥ जनु नानकु बोले तीजी लावै हरि उपजै मनि बैरागु जीउ ॥३॥

मूलम्

हरि तीजड़ी लाव मनि चाउ भइआ बैरागीआ बलि राम जीउ ॥ संत जना हरि मेलु हरि पाइआ वडभागीआ बलि राम जीउ ॥ निरमलु हरि पाइआ हरि गुण गाइआ मुखि बोली हरि बाणी ॥ संत जना वडभागी पाइआ हरि कथीऐ अकथ कहाणी ॥ हिरदै हरि हरि हरि धुनि उपजी हरि जपीऐ मसतकि भागु जीउ ॥ जनु नानकु बोले तीजी लावै हरि उपजै मनि बैरागु जीउ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तीजड़ी लाव = सुंदर सी तीसरी लांव। हरि तीजड़ी लाव = प्रभु पति के साथ (जीव-स्त्री के विवाह की) तीसरी सुंदर सी लांव। मनि = मन में। बैरागीआ मनि = वैरावानों के मन में। चाउ = (प्रभु-मिलाप के लिए) उत्साह। मेलु = मिलाप। वडभागीआ = बड़े भाग्यों वाले मनुष्य। मुखि = मुँह से। बोली = उचारण की। हरि बाणी = परमात्मा के महिमा की वाणी। कथीऐ = कथन करनी चाहिए। अकथ = जिसका सही स्वरूप बयान ना किया जा सके, अकथनीय। अकथ कहाणी = अकथ प्रभु की महिमा। हिरदै = हृदय में। धुनि = लगन, लहर। जपीऐ = जपा जा सकता है। मसतकि = माथे पर। भागु = अच्छी किस्मत। नानकु बोलै = नानक बोलता है। तीजी लावै = तीसरी लांव द्वारा, प्रभु पति से जीव-स्त्री के विवाह की तीसरे फेरे के वक्त। मनि = (जीव-स्त्री के) मन में। हरि बैरागु = प्रभु (-मिलाप की) तीव्र इच्छा। उपजै = पैदा हो जाती है।3।
अर्थ: हे राम जी! मैं तेरे से सदके जाता हूँ। (तेरी मेहर से) वैरागियों के मन में (तेरे से मिलने के लिए) तीव्र तमन्ना पैदा होती है, (ये आत्मिक अवस्था प्रभु-पति के साथ जीव-स्त्री के विवाह की) तीसरी सुंदर लांव है।
हे भाई! जिस अति-भाग्यशाली मनुष्यों को संतजनों का मिलाप हासिल होता है, उनको परमात्मा का मेल प्राप्त होता है, (वे मनुष्य जीवन को) पवित्र करने वाले प्रभु का मिलाप हासिल करते हैं, सदा प्रभु के गुण गाते हैं, और मुँह से परमात्मा की महिमा की वाणी उचारते हैं, वह अति-भाग्यशाली मनुष्य संत-जनों की संगति में प्रभु-मिलाप प्राप्त करते हैं।
हे भाई! अकथ प्रभु की महिमा हमेशा करते रहना चाहिए, (जो मनुष्य प्रभु की महिमा सदा करता रहता है, उसके) हृदय में सदा टिकी रहने वाली प्रभु-प्रेम की लहर चल पड़ती है। पर, हे भाई! परमात्मा का नाम (तब ही) जपा जा सकता है, अगर माथे पर अहो-भाग्य जाग जाएं।
हे भाई! दास नानक कहता है (कि प्रभु-पति के साथ जीव-स्त्री की) तीसरी लांव के समय (जीव-स्त्री के) मन में प्रभु (-मिलाप की) तीव्र चाहत पैदा हो जाती है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि चउथड़ी लाव मनि सहजु भइआ हरि पाइआ बलि राम जीउ ॥ गुरमुखि मिलिआ सुभाइ हरि मनि तनि मीठा लाइआ बलि राम जीउ ॥ हरि मीठा लाइआ मेरे प्रभ भाइआ अनदिनु हरि लिव लाई ॥ मन चिंदिआ फलु पाइआ सुआमी हरि नामि वजी वाधाई ॥ हरि प्रभि ठाकुरि काजु रचाइआ धन हिरदै नामि विगासी ॥ जनु नानकु बोले चउथी लावै हरि पाइआ प्रभु अविनासी ॥४॥२॥

मूलम्

हरि चउथड़ी लाव मनि सहजु भइआ हरि पाइआ बलि राम जीउ ॥ गुरमुखि मिलिआ सुभाइ हरि मनि तनि मीठा लाइआ बलि राम जीउ ॥ हरि मीठा लाइआ मेरे प्रभ भाइआ अनदिनु हरि लिव लाई ॥ मन चिंदिआ फलु पाइआ सुआमी हरि नामि वजी वाधाई ॥ हरि प्रभि ठाकुरि काजु रचाइआ धन हिरदै नामि विगासी ॥ जनु नानकु बोले चउथी लावै हरि पाइआ प्रभु अविनासी ॥४॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: चउथड़ी लाव = चौथी सुंदर लांव। हरि चउथड़ी लाव = प्रभु पति के साथ (जीव-स्त्री के विवाह की) चौथी सुंदर लांव। मनि = (जीव-स्त्री के) मन में। सहजु = आत्मिक अडोलता। गुरमुखि = गुरु की तरफ मुँह करके, गुरु के सन्मुख रहके। सुभाइ = (प्रभु के) प्यार में (टिक के)। मनि = मन में। तनि = तन में। प्रभ भाइआ = प्रभु को भाया, अच्छा लगा। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। लिव लाई = तवज्जो जोड़ के रखी। मन चिंदिआ = मन इच्छित।
नामि = नाम से। वजी वाधाई = चढ़दीकला बन गई, प्रफुल्लित हो गई। प्रभि = प्रभु ने। ठाकुरि = ठाकुर ने। काजु = (जीव-स्त्री के) विवाह का उद्यम। रचाइआ = रचाया, आरम्भ कर दिया। धन = जीव-स्त्री। हिरदै = हृदय में। नामि = नाम की इनायत से। विगासी = खिल उठी, आनंद भरपूर हो गई। चउथी लावै = प्रभु पति के साथ जीव-स्त्री के विवाह की चौथी लांव के समय। अविनासी = कभी नाश ना होने वाला।4।
अर्थ: हे सुंदर राम जी! मैं तुझसे सदके हूँ। (तेरी मेहर से जिस जीव-स्त्री के) मन में आत्मिक अडोलता पैदा हो जाती है, उसको तेरा मिलाप हासिल हो जाता है (ये आत्मिक अवस्था प्रभु-पति के साथ जीव-स्त्री के मिलाप की) चौथी लांव है।
हे भाई! गुरु की शरण पड़ कर (प्रभु-) प्रेम में (टिक के, जिस जीव-स्त्री को प्रभु) मिल जाता है, (उसके) मन में (उसके) तन में प्रभु प्यारा लगने लग जाता है।
हे भाई! जिस जीव को परमात्मा प्यारा लगने लग जाता है, प्रभु को (भी) वह जीव प्यारा लगने लगता है, वह मनुष्य सदा प्रभु की याद में (अपनी) तवज्जो जोड़े रखता है, वह मनुष्य प्रभु-मिलाप का मन-बाँछित फल प्राप्त कर लेता है। प्रभु के नाम की इनायत से (उसके अंदर सदा) चढ़दीकला बनी रहती है।
हे भाई! प्रभु ने, मालिक हरि ने (जिस जीव-स्त्री के) विवाह का उद्यम शुरू कर दिया, वह जीव-स्त्री नाम-जपने की इनायत से (अपने) दिल में सदैव आनंद-भरपूर रहती है। दास नानक कहता है: प्रभु-पति के साथ जीव-स्त्री के विवाह की चौथी लांव के समय जीव-स्त्री कभी नाश ना होने वाले प्रभु के मिलाप का आनंद प्राप्त कर लेती है।4।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सूही छंत महला ४ घरु २ ॥

मूलम्

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सूही छंत महला ४ घरु २ ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरमुखि हरि गुण गाए ॥ हिरदै रसन रसाए ॥ हरि रसन रसाए मेरे प्रभ भाए मिलिआ सहजि सुभाए ॥ अनदिनु भोग भोगे सुखि सोवै सबदि रहै लिव लाए ॥ वडै भागि गुरु पूरा पाईऐ अनदिनु नामु धिआए ॥ सहजे सहजि मिलिआ जगजीवनु नानक सुंनि समाए ॥१॥

मूलम्

गुरमुखि हरि गुण गाए ॥ हिरदै रसन रसाए ॥ हरि रसन रसाए मेरे प्रभ भाए मिलिआ सहजि सुभाए ॥ अनदिनु भोग भोगे सुखि सोवै सबदि रहै लिव लाए ॥ वडै भागि गुरु पूरा पाईऐ अनदिनु नामु धिआए ॥ सहजे सहजि मिलिआ जगजीवनु नानक सुंनि समाए ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ कर। गाए = गाता रहता है। हिरदै = हृदय में (बसाता है)। रसन = जीभ से। रसाए = रस लेता है। प्रभ भाए = (वह मनुष्य) प्रभु को प्यारा लगता है। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाए = प्यार से। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। सुखि = सुख में। सोवै = लीन रहता है। सबदि = शब्द से। लिव लाए रहै = तवज्जो जोड़े रखता है। भागि = किस्मत से। पाईऐ = मिलता है। धिआए = स्मरण करता रहता है। सहजे सहजि = हर वक्त आत्मिक अडोलता में। जग जीवनु = जगत का जीवन प्रभु। सुंनि = सुंन में, उस अवस्था में जहाँ माया के फुरनों से सुंन्न है।1।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य गुरु के सन्मुख रह के परमात्मा के गुण गाता रहता है (परमात्मा के गुण अपने) हृदय में (बसाए रखता है, अपनी) जीभ से (गुणों का) रस लेता है, (जो मनुष्य) हरि (के गुणों का) रस (अपनी) जीभ से लेता रहता है, वह मनुष्य प्रभु को प्यारा लगने लगता है, आत्मिक अडोलता में प्रेम में (उस टिके हुए को) परमात्मा मिल जाता है। वह मनुष्य हर वक्त (महिमा का) आनंद लेता है, आनंद में लीन रहता है, (गुरु के) शब्द के द्वारा (वह मनुष्य प्रभु में) तवज्जो जोड़े रखता है।
पर, हे भाई! पूरा गुरु मिलता है बड़ी किस्मत से, (जिसको मिलता है, वह) हर वक्त हरि-नाम स्मरण करता रहता है। हे नानक! वह मनुष्य हर समय आत्मिक अडोलता में टिका रहता है, जगत का सहारा प्रभु उसको मिल जाता है, वह मनुष्य उस अवस्था में लीन रहता है जहाँ माया का कोई विचार छू भी नहीं सकता।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

संगति संत मिलाए ॥ हरि सरि निरमलि नाए ॥ निरमलि जलि नाए मैलु गवाए भए पवितु सरीरा ॥ दुरमति मैलु गई भ्रमु भागा हउमै बिनठी पीरा ॥ नदरि प्रभू सतसंगति पाई निज घरि होआ वासा ॥ हरि मंगल रसि रसन रसाए नानक नामु प्रगासा ॥२॥

मूलम्

संगति संत मिलाए ॥ हरि सरि निरमलि नाए ॥ निरमलि जलि नाए मैलु गवाए भए पवितु सरीरा ॥ दुरमति मैलु गई भ्रमु भागा हउमै बिनठी पीरा ॥ नदरि प्रभू सतसंगति पाई निज घरि होआ वासा ॥ हरि मंगल रसि रसन रसाए नानक नामु प्रगासा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: संगति संत = संत जनों की संगति में। सरि = सरोवर में। सरि निरमल = पवित्र सरोवर में। नाए = स्नान करता है। निरमलि जलि = पवित्र (नाम-) जल में। दुरमति = खोटी मति। भ्रमु = भटकना। बिनठी = नाश हो जाती है। पीरा = पीड़ा। नदरि = मेहर की निगाह से। निज घरि = अपने (असल) घर में, प्रभु चरणों में। होआ = हो जाता है। मंगल = महिमा के गीत। रसि = स्वाद से। रसन रसाए = जीभ से (गुणों का) रस लेता है। प्रगासा = (आत्मिक जीवन का) प्रकाश करता है।2।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य संत जनों की संगति में मिलता है, वह परमात्मा के पवित्र सरोवर में स्नान करता है। वह मनुष्य प्रभु के पवित्र नाम-जल में स्नान करता है, उसका शरीर पवित्र हो जाता है, (नाम-जल उसके अंदर से विकारों की) मैल दूर कर देता है।
(नाम-जल के इनायत से उसके अंदर से) दुमर्ति की मैल धुल जाती है, भटकना दूर हो जाती है, अहंकार की पीड़ा नाश हा जाती है।
पर, हे भाई! परमात्मा की मेहर की निगाह के साथ ही साधु-संगत मिलती है (जिसको मिलती है, उसका) ठिकाना प्रभु-चरणों में हुआ रहता है। हे नानक! वह मनुष्य स्वाद से परमातमा की महिमा के गीतों का रस लेता है, (उसके अंदर परमात्मा का) नाम (आत्मिक जीवन का) प्रकाश पैदा कर देता है।2।

[[0775]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

अंतरि रतनु बीचारे ॥ गुरमुखि नामु पिआरे ॥ हरि नामु पिआरे सबदि निसतारे अगिआनु अधेरु गवाइआ ॥ गिआनु प्रचंडु बलिआ घटि चानणु घर मंदर सोहाइआ ॥ तनु मनु अरपि सीगार बणाए हरि प्रभ साचे भाइआ ॥ जो प्रभु कहै सोई परु कीजै नानक अंकि समाइआ ॥३॥

मूलम्

अंतरि रतनु बीचारे ॥ गुरमुखि नामु पिआरे ॥ हरि नामु पिआरे सबदि निसतारे अगिआनु अधेरु गवाइआ ॥ गिआनु प्रचंडु बलिआ घटि चानणु घर मंदर सोहाइआ ॥ तनु मनु अरपि सीगार बणाए हरि प्रभ साचे भाइआ ॥ जो प्रभु कहै सोई परु कीजै नानक अंकि समाइआ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अंतरि = हृदय में। रतनु = नाम रत्न को, प्रभु की अमोलक महिमा को। बीचारे = बिचारता है, आत्मिक अडोलता में परोए रखता है। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख हो के। पिआरे = प्यार करता है। सबदि = (गुरु अपने) शब्द के द्वारा। निसतारे = (गुरु उसको संसार समुंदर से) पार लंघा लेता है। अगिआनु = आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझी। अधेरु = अंधेरा। गिआनु = आत्मिक जीवन की सूझ। प्रचण्ड = तेज, तीव्र। बलिआ = जल उठता है। घटि = हृदय में। घर मंदर = शरीर और ज्ञानंन्द्रियां। सोहाइआ = सुंदर आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं। अरपि = भेटा करके। सीगार = आत्मिक जीवन की सुहज। प्रभ साचे भाइआ = सदा स्थिर प्रभु को प्यारा लगता है। परु कीजै = अच्छी तरह करना चाहिए। अंकि = गोद में।3।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य अपने अंदर प्रभु की अमूल्य महिमा को परोए रखता है, गुरु के सन्मुख रहके परमात्मा के नाम को प्यार करता है, हरि-नाम से प्यार डाले रखता है, (गुरु अपने) शब्द के द्वारा (उसको संसार समुंदर से) पार लंघा देता है, (उसके अंदर से) आत्मिक जीवन के प्रति अज्ञानता (का) अंधकार दूर कर देता है। (उस मनुष्य के) हृदय में आत्मिक जीवन की सूझ वाला तेज प्रकाश जल उठता है, उसकी सारी ज्ञान-इंद्रिय सुंदर आत्मिक जीवन वाली बन जाती हैं। (वह मनुष्य अपना) शरीर भेट करके, (अपना) मन भेट करके आत्मिक जीवन का सुहज पैदा कर लेता है, वह सदा-स्थिर प्रभु को प्यारा लगने लग जाता है। हे नानक! (वह मनुष्य सदा प्रभु की) गोद में लीन रहता है (उसकी ये श्रद्धा बनी रहती है कि) जो कुछ प्रभु हुक्म करता है, वही ध्यान से करना चाहिए (प्रभु की रजा में पूरी तौर पर राजी रहना चाहिए)।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि प्रभि काजु रचाइआ ॥ गुरमुखि वीआहणि आइआ ॥ वीआहणि आइआ गुरमुखि हरि पाइआ सा धन कंत पिआरी ॥ संत जना मिलि मंगल गाए हरि जीउ आपि सवारी ॥ सुरि नर गण गंधरब मिलि आए अपूरब जंञ बणाई ॥ नानक प्रभु पाइआ मै साचा ना कदे मरै न जाई ॥४॥१॥३॥

मूलम्

हरि प्रभि काजु रचाइआ ॥ गुरमुखि वीआहणि आइआ ॥ वीआहणि आइआ गुरमुखि हरि पाइआ सा धन कंत पिआरी ॥ संत जना मिलि मंगल गाए हरि जीउ आपि सवारी ॥ सुरि नर गण गंधरब मिलि आए अपूरब जंञ बणाई ॥ नानक प्रभु पाइआ मै साचा ना कदे मरै न जाई ॥४॥१॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रभि = प्रभु ने। काजु = विवाह का कार्य। रचाइआ = रचाया, आरम्भ कर दिया। गुरमुखि = गुरु के द्वारा। साधन = (वह) जीव-स्त्री। कंत पिआरी = पति प्रभु को प्यारी लगती है। मिलि = मिल के। मंगल = महिमा के गीत। सवारी = सुंदर जीवन वाली बना दी। सुरि = देवते। सुरि नर = दैवी स्वभाव वाले मनुष्य। गण = शिवजी के उपासक। गंधरब = गंधर्व, देवताओं के रागी। सुरि…गंधरब = उच्च जीवन वाले संत जन। अपूरब = अपूर्व, जो पहले देखने में ना आई हो। प्रभ मै = मै प्रभु, मेरा प्रभु। साचा = सदा कायम रहने वाला। जाई = पैदा होता।4।
अर्थ: हे भाई! हरि प्रभु ने (जिस जीव-स्त्री के विवाह का) काम रच दिया, उसको वह गुरु के द्वारा ब्याहने के लिए आ पहुँचा (जिस जीव-स्त्री को परमात्मा अपने चरणों से जोड़ता है, उसको गुरु की शरण में टिकाता है)।
हे भाई! (जिस जीव-स्त्री को) प्रभु अपने साथ जोड़ने की मेहर करता है, उसको गुरु के माध्यम से मिल जाता है, वह जीव-स्त्री प्रभु-पति को प्यारी लगने लग जाती है। वह जीव-स्त्री संत जनों के साथ मिल के प्रभु-पति की महिमा के गीत गाती है, प्रभु स्वयं उसका जीवन सुंदर बना देता है।
(जैसे विवाह के समय बाराती मिलजुल के आते हैं, वैसे ही जीव-स्त्री को प्रभु-पति से मिलाने के लिए) दैवी-गुणों वाले संत-जन, प्रभु की महिमा करने वाले भक्तजन मिल के आते हैं (उस जीव-स्त्री का प्रभु-पति के साथ विवाह करने के लिए) एक अद्वितीय बारात बनाते हैं। हे नानक! (सत्संगियों की उस बारात की इनायत से, भाव, उस सत्संग की कृपा से उस जीव-स्त्री को) वह प्यारा प्रभु मिल जाता है, जो सदा कायम रहने वाला है, जो कभी पैदा होता मरता नहीं।4।1।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही छंत महला ४ घरु ३ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही छंत महला ४ घरु ३ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

आवहो संत जनहु गुण गावह गोविंद केरे राम ॥ गुरमुखि मिलि रहीऐ घरि वाजहि सबद घनेरे राम ॥ सबद घनेरे हरि प्रभ तेरे तू करता सभ थाई ॥ अहिनिसि जपी सदा सालाही साच सबदि लिव लाई ॥ अनदिनु सहजि रहै रंगि राता राम नामु रिद पूजा ॥ नानक गुरमुखि एकु पछाणै अवरु न जाणै दूजा ॥१॥

मूलम्

आवहो संत जनहु गुण गावह गोविंद केरे राम ॥ गुरमुखि मिलि रहीऐ घरि वाजहि सबद घनेरे राम ॥ सबद घनेरे हरि प्रभ तेरे तू करता सभ थाई ॥ अहिनिसि जपी सदा सालाही साच सबदि लिव लाई ॥ अनदिनु सहजि रहै रंगि राता राम नामु रिद पूजा ॥ नानक गुरमुखि एकु पछाणै अवरु न जाणै दूजा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आवहो = आओ। संत जनहु = हे संत जनो! गावह = आओ, हम गाएं। केरे = के। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख हो के। मिलि रहीऐ = (प्रभु के चरणों में) खड़े रहना चाहिए। घरि = (हृदय-) घर में। वाजहि = बज पड़ते हैं, अपना प्रभाव डाले रखते हैं। शबद = (परमात्मा की महिमा के) शब्द। घनेरे = अनेक, बहुत। प्रभ = हे प्रभु! थाई = जगहों में। अहि = दिन। निसि = रात। जपी = मैं जपता रहूँ। सालाही = मैं सलाहता रहूँ। साच सबदि = सदा स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द में। लिव लाई = तवज्जो जोड़े रखूँ। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। सहजि = आत्मिक अडोलता में। रंगि = प्रेम रंग में। राता रहै = रंगा रहता है। रिद पूजा = हृदय की पूजा (बनाता है)।1।
अर्थ: हे संत जनो! आओ, (साधु-संगत में मिल के) परमात्मा के गुण गाते रहें। (हे संत जनों!) गुरु की शरण पड़ कर (प्रभु चरणों में) जुड़े रहना चाहिए (प्रभु चरणों में जुड़ने की इनायत से) हृदय-घर में प्रभु की महिमा के शब्द अपना प्रभाव डाले रखते हैं।
हे प्रभु! (ज्यों-ज्यों) तेरी महिमा के शब्द (मनुष्य के हृदय में) प्रभाव डालते हैं, (त्यों-त्यों तू, हे प्रभु!) उसको हर जगह बसता दिखाई देता है। (हे प्रभु! मेरे ऊपर भी मेहर कर) मैं दिन-रात तेरा नाम जपता रहूँ, मैं सदा तेरी महिमा करता रहूँ, मैं तेरी सदा महिमा में तवज्जो जोड़े रखूँ।
हे नानक! जो मनुष्य परमात्मा के नाम को अपने हृदय की पूजा बनाता है (भाव, हर वक्त हृदय में बसाए रखता है) वह मनुष्य हर समय आत्मिक अडोलता में टिका रहता है, वह मनुष्य परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा रहता है। गुरु की शरण पड़ कर वह एक प्रभु के साथ ही सांझ डाले रखता है, किसी और दूसरे के साथ सांझ नहीं डालता।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सभ महि रवि रहिआ सो प्रभु अंतरजामी राम ॥ गुर सबदि रवै रवि रहिआ सो प्रभु मेरा सुआमी राम ॥ प्रभु मेरा सुआमी अंतरजामी घटि घटि रविआ सोई ॥ गुरमति सचु पाईऐ सहजि समाईऐ तिसु बिनु अवरु न कोई ॥ सहजे गुण गावा जे प्रभ भावा आपे लए मिलाए ॥ नानक सो प्रभु सबदे जापै अहिनिसि नामु धिआए ॥२॥

मूलम्

सभ महि रवि रहिआ सो प्रभु अंतरजामी राम ॥ गुर सबदि रवै रवि रहिआ सो प्रभु मेरा सुआमी राम ॥ प्रभु मेरा सुआमी अंतरजामी घटि घटि रविआ सोई ॥ गुरमति सचु पाईऐ सहजि समाईऐ तिसु बिनु अवरु न कोई ॥ सहजे गुण गावा जे प्रभ भावा आपे लए मिलाए ॥ नानक सो प्रभु सबदे जापै अहिनिसि नामु धिआए ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रवि रहिआ = व्यापक है। अंतरजामी = हरेक के दिल की जानने वाला। सबदि = शब्द के द्वारा। रवै = स्मरण करता है। घटि घटि = हरेक शरीर में। रविआ = व्यापक। सोई = वही। सचु = सदा स्थिर प्रभु। पाईऐ = मिलता है। सहजि = आत्मिक अडोलता में। समाईऐ = टिके रहना है। अवरु = और। सहजे = आत्मिक अडोलता में (टिक के)। गावा = मैं गा सकता हूँ। प्रभ भावा = प्रभु को अच्छा लगूँ। आपे = आप ही। सबदे = शब्द के द्वारा। जापै = जाना जा सकता है, गहरी सांझ पड़ सकती है। अहि = दिन। निसि = रात।2।
अर्थ: हे भाई! वह परमात्मा हरेक के दिल की जानने वाला है, और सब जीवों में व्यापक है। (पर जो मनुष्य) गुरु के शब्द के द्वारा (उसको) स्मरण करता है, उसको ही वह मालिक प्रभु (सब जगह) व्यापक दिखाई देता है। (उस मनुष्य को ये निश्चय हो जाता है कि कहीं भी) उस परमात्मा के बिना और कोई नहीं।
हे भाई! (प्रभु की अपनी ही मेहर से) अगर मैं उस प्रभु को अच्छा लग पड़ूँ, तो आत्मिक अडोलता में टिक के मैं उसके गुण गा सकता हूँ, वह खुद ही (जीव को अपने साथ) मिलाता है। हे नानक! गुरु के शब्द के द्वारा ही उस प्रभु के साथ गहरी सांझ पड़ सकती है (जो मनुष्य शब्द में) जुड़ता है, (वह) दिन-रात परमात्मा का नाम स्मरण करता रहता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

इहु जगो दुतरु मनमुखु पारि न पाई राम ॥ अंतरे हउमै ममता कामु क्रोधु चतुराई राम ॥ अंतरि चतुराई थाइ न पाई बिरथा जनमु गवाइआ ॥ जम मगि दुखु पावै चोटा खावै अंति गइआ पछुताइआ ॥ बिनु नावै को बेली नाही पुतु कुट्मबु सुतु भाई ॥ नानक माइआ मोहु पसारा आगै साथि न जाई ॥३॥

मूलम्

इहु जगो दुतरु मनमुखु पारि न पाई राम ॥ अंतरे हउमै ममता कामु क्रोधु चतुराई राम ॥ अंतरि चतुराई थाइ न पाई बिरथा जनमु गवाइआ ॥ जम मगि दुखु पावै चोटा खावै अंति गइआ पछुताइआ ॥ बिनु नावै को बेली नाही पुतु कुट्मबु सुतु भाई ॥ नानक माइआ मोहु पसारा आगै साथि न जाई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जगो = जगत। दुतरु = (दुष्तर) जिससे पार लांघना मुश्किल है। मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य। पारि न पाई = परले पासे नहीं पहुँच सकता। अंतरे = (मनमुख के) अंदर ही। ममता = अपनत्व, मल्कियत की लालसा। थाइ = जगह में। थाइ न पाई = (प्रभु की हजूरी में) जगह नहीं मिलती, स्वीकार नहीं होता। बिरथा = व्यथा, व्यर्थ। जम मगि = जमराज के रास्ते पर। पावै = सहता है। अंति = आखिरी वक्त, अंत के समय। को = कोई मनुष्य। बेली = मददगार। सुतु = पुत्र। भाई = भ्राता। पसारा = खिलारा। आगै = परलोक में। साथि = साथ।3।
अर्थ: हे भाई! ये जगत (एक ऐसा समुंदर है, जिससे) पार लांघना मुश्किल है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (इसके) दूसरे छोर पर नहीं पहुँच सकता, (क्योंकि उसके) अंदर ही अहंकार, अस्लियत की लालसा, काम, क्रोध चतुराई (आदि बुराईयाँ) टिकी रहती हैं।
हे भाई! (जिस मनुष्य के) अंदर अपनी समझदारी का मान टिका रहता है वह मनुष्य (प्रभु के दर पर) स्वीकार नहीं होता, वह अपना मानव जन्म व्यर्थ गवा लेता है। (वह मनुष्य सारी उम्र) जमराज के रास्ते पर चलता है, दुख सहता है (आत्मिक मौत की) चोटें खाता रहता है, अंत के समय यहाँ से हाथ मलता जाता है। हे भाई! (जीवन-यात्रा में यहाँ) पुत्र, परिवार, भाई - इनमें से कोई भी मददगार नहीं, परमात्मा के नाम के बिना कोई बेली नहीं बनता। हे नानक! ये सारा माया के मोह का पसारा (ही) है, परलोक में (भी मनुष्य के) साथ नहीं जाता।3।

[[0776]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

हउ पूछउ अपना सतिगुरु दाता किन बिधि दुतरु तरीऐ राम ॥ सतिगुर भाइ चलहु जीवतिआ इव मरीऐ राम ॥ जीवतिआ मरीऐ भउजलु तरीऐ गुरमुखि नामि समावै ॥ पूरा पुरखु पाइआ वडभागी सचि नामि लिव लावै ॥ मति परगासु भई मनु मानिआ राम नामि वडिआई ॥ नानक प्रभु पाइआ सबदि मिलाइआ जोती जोति मिलाई ॥४॥१॥४॥

मूलम्

हउ पूछउ अपना सतिगुरु दाता किन बिधि दुतरु तरीऐ राम ॥ सतिगुर भाइ चलहु जीवतिआ इव मरीऐ राम ॥ जीवतिआ मरीऐ भउजलु तरीऐ गुरमुखि नामि समावै ॥ पूरा पुरखु पाइआ वडभागी सचि नामि लिव लावै ॥ मति परगासु भई मनु मानिआ राम नामि वडिआई ॥ नानक प्रभु पाइआ सबदि मिलाइआ जोती जोति मिलाई ॥४॥१॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हउ = मैं। पूछउ = मैं पूछता हूँ। किन बिधि = किस तरीके से? दुतरु = मुश्किल से तैरा जा सकने वाला समुंदर। तरीऐ = तैरा जा सकता है। सतिगुर भाइ = गुरु की रजा में। इव = इस तरह। मरीऐ = मर सकते हैं, विकारों की ओर से मुर्दा हो जाया जाता है। भउजलु = संसार समुंदर। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख रहने वाला मनुष्य। नामि = नाम में। समावै = लीन रहता है। वडभागी = बड़े भाग्यों से। सचि = सदा स्थिर में। सचि नामि = सदा स्थिर हरि नाम में। लिव लावै = तवज्जो जोड़े रखता है। परगासु = आत्मिक जीवन की समझ से रौशन। मानिआ = पतीज जाता है। वडिआई = इज्जत, शोभा। सबदि = गुरु के शब्द द्वारा। जोती = प्रभु की ज्योति में। जोति = जिंद, जीवात्मा।4।
अर्थ: हे भाई! (जब) मैं (नाम की) दाति देने वाले अपने गुरु को पूछता हूँ कि ये दुष्तर संसार-समुंदर कैसे पार लांघा जा सकता है (तो आगे से उक्तर मिलता है कि) गुरु की रजा में (जीवन की चाल) चलते रहो, इस तरह दुनिया की मेहनत-कमाई करते हुए ही विकारों से बचे रहा जा सकता है। (गुरु की रजा में चलने से) दुनिया के काम करते हुए ही विकारों की ओर से मृतक रहा जाता है, संसार-समुंदर से पार लांघा जाता है। (क्योंकि) जो मनुष्य गुरु के सन्मुख रहता है, वह परमात्मा के नाम में लीन रहता है उसको बड़े-भाग्यों से सारे गुणों से भरपूर प्रभु मिल जाता है, सदा स्थिर हरि नाम में वह तवज्जो जोड़े रखता है। उसकी मति में आत्मिक जीवन की सूझ का प्रकाश हो जाता है, उसका मन नाम में पतीज जाता है, उसको नाम की इनायत से (लोक-परलोक में) इज्जत मिल जाती है। हे नानक! जो मनुष्य गुरु के शब्द में जुड़ता है उसे प्रभु मिल जाता है, उसकी जीवात्मा प्रभु की ज्योति में एक-मेक हुई रहती है।4।1।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ४ घरु ५ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

सूही महला ४ घरु ५ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरु संत जनो पिआरा मै मिलिआ मेरी त्रिसना बुझि गईआसे ॥ हउ मनु तनु देवा सतिगुरै मै मेले प्रभ गुणतासे ॥ धनु धंनु गुरू वड पुरखु है मै दसे हरि साबासे ॥ वडभागी हरि पाइआ जन नानक नामि विगासे ॥१॥

मूलम्

गुरु संत जनो पिआरा मै मिलिआ मेरी त्रिसना बुझि गईआसे ॥ हउ मनु तनु देवा सतिगुरै मै मेले प्रभ गुणतासे ॥ धनु धंनु गुरू वड पुरखु है मै दसे हरि साबासे ॥ वडभागी हरि पाइआ जन नानक नामि विगासे ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: संत जनो! = हे संत जनो! मै = मुझे। बुझि गईआसे = बुझ गई है, बुझ गई। हउ = मैं। देवा = मैं भेट करता हूँ। देवा सतिगुरै = सतिगुरु को देता हूँ। गुणतासे = गुण तास, गुणों का खजाना। धनु धंनु = सराहनीय। वड पुरखु = महा पुरुष। दसे हरि = हरि के बारे में बताता है। साबासे = गुरु को शाबाश। वडभागी = बड़े भाग्यों वाला। नामि = नाम में (जुड़ के)। विगासे = खिल गए, आत्मिक आनंद से भरपूर हो गए।1।
अर्थ: हे संत जनो! मुझे प्यारा गुरु मिल गया है (उसकी मेहर से) मेरी (माया की) तृष्णा मिट गई है। (गुरु) मुझे गुणों के खजाने परमात्मा के साथ मिला रहा है, मैं अपना मन, अपना तन गुरु के आगे भेट धरता हूँ।
हे भाई! गुरु सराहनीय है, गुरु महापुरुष है, गुरु को शाबाश। गुरु मुझे परमात्मा के बारे में बता रहा है। हे दास नानक! जिन्हें परमात्मा बड़े भाग्यों से मिल जाता है, (वे मनुष्य परमात्मा के) नाम में जुड़ के आत्मिक आनंद से भरपूर हो जाते हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरु सजणु पिआरा मै मिलिआ हरि मारगु पंथु दसाहा ॥ घरि आवहु चिरी विछुंनिआ मिलु सबदि गुरू प्रभ नाहा ॥ हउ तुझु बाझहु खरी उडीणीआ जिउ जल बिनु मीनु मराहा ॥ वडभागी हरि धिआइआ जन नानक नामि समाहा ॥२॥

मूलम्

गुरु सजणु पिआरा मै मिलिआ हरि मारगु पंथु दसाहा ॥ घरि आवहु चिरी विछुंनिआ मिलु सबदि गुरू प्रभ नाहा ॥ हउ तुझु बाझहु खरी उडीणीआ जिउ जल बिनु मीनु मराहा ॥ वडभागी हरि धिआइआ जन नानक नामि समाहा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मै = मुझे। मारगु = रास्ता। पंथु = रास्ता। दसाहा = मैं पूछती हूँ। घरि = (हृदय) घर में। चिरी विछंनिआ = चिरों के बिछुड़े हुए। सबदि गुरू = गुरु के शब्द के द्वारा। प्रभ नाहा = हे प्रभु पति! हउ = मैं। खरी = बहुत। उडीणीआ = उदास। मीनु = मछली। नामि = नाम में।2।
अर्थ: हे संत जनो! (जबका) प्यारा गुरु सज्जन मुझे मिला है, मैं (उससे) परमात्मा (के मिलाप) का रास्ता पूछती रहती हूँ, (और प्रभु-पति को भी कहती रहती हूँ-) हे प्रभु-पति! गुरु के शब्द के द्वारा मुझ चिरों से विछुड़ी हुई को आ के मिल, मेरे (हृदय-) घर में आ के बस। हे प्रभु! जैसे पानी के बिना मछली (तड़प) के मरती है, (वैसे ही) तेरे बिना मैं बहुत उदास रहती हूँ।
हे दास नानक! जिस मनुष्यों ने बहुत भाग्यों से परमात्मा का स्मरण किया, वे परमात्मा के नाम में (ही) लीन हो गए।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मनु दह दिसि चलि चलि भरमिआ मनमुखु भरमि भुलाइआ ॥ नित आसा मनि चितवै मन त्रिसना भुख लगाइआ ॥ अनता धनु धरि दबिआ फिरि बिखु भालण गइआ ॥ जन नानक नामु सलाहि तू बिनु नावै पचि पचि मुइआ ॥३॥

मूलम्

मनु दह दिसि चलि चलि भरमिआ मनमुखु भरमि भुलाइआ ॥ नित आसा मनि चितवै मन त्रिसना भुख लगाइआ ॥ अनता धनु धरि दबिआ फिरि बिखु भालण गइआ ॥ जन नानक नामु सलाहि तू बिनु नावै पचि पचि मुइआ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दह = दस। दिसि = दिशाएं, पासा, तरफ़। दह दिसि = दसों दिशाएं (पूर्व, पश्चिम, उक्तर, दक्षिण ये चार दिशाएं, चारों कोनें और ऊपर-नीचे)। चलि चलि = दौड़ दौड़ के। भरमिआ = भटकता है। मनमुखु = अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य। भुलाइआ = गलत रास्ते पर पड़ा रहता है। मनि = मन में। चितवै = चितवता है। अनता = अनंत, बेअंत। धरि = धरती में। फिरि = फिर भी। बिखु = आत्मिक मौत लाने वाली माया जहर। पचि = (प्लुष् = to born) जल के, खिझ के। मुइआ = आत्मिक मौत सहेड़ी रखता है।3।
अर्थ: हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (माया की) भटकना में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ा रहता है, (उसका) मन दसों-दिशाओं में दौड़-दौड़ के भटकता रहता है। (अपने मन का मुरीद मनुष्य अपने) मन में सदा (माया की) आशाएं चितारता रहता है, (उसके) मन को (माया की) तृष्णा (माया की) भूख चिपकी रहती है। बेअंत धन धरती में दबा के रखता है, फिर भी आत्मिक मौत लाने वाली और माया-जहर की तलाश करता फिरता है।
हे दास नानक! (कह: हे भाई!) तू परमात्मा का नाम जपता रहा कर। नाम से टूट के मनुष्य (तृष्णा की आग में) जल-जल के आत्मिक मौत सहेड़े रखता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुरु सुंदरु मोहनु पाइ करे हरि प्रेम बाणी मनु मारिआ ॥ मेरै हिरदै सुधि बुधि विसरि गई मन आसा चिंत विसारिआ ॥ मै अंतरि वेदन प्रेम की गुर देखत मनु साधारिआ ॥ वडभागी प्रभ आइ मिलु जनु नानकु खिनु खिनु वारिआ ॥४॥१॥५॥

मूलम्

गुरु सुंदरु मोहनु पाइ करे हरि प्रेम बाणी मनु मारिआ ॥ मेरै हिरदै सुधि बुधि विसरि गई मन आसा चिंत विसारिआ ॥ मै अंतरि वेदन प्रेम की गुर देखत मनु साधारिआ ॥ वडभागी प्रभ आइ मिलु जनु नानकु खिनु खिनु वारिआ ॥४॥१॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मोहनु = मन को आकर्षित करने वाला, प्यारा। पाइ करि, पाय करि, पा के। प्रेम बाणी = प्रेम के बाणों से। मेरै हिरदै = मेरे हृदय में। सुधि बुधि = सूझ बूझ। मै अंतरि = मेरे अंदर। वेदन = पीड़ा। साधारिआ = आसरे वाला बन गया है। प्रभ = हे प्रभु! वारिआ = कुर्बान, सदके।4।
अर्थ: हे भाई! प्यारे सुंदर गुरु को मिल के मेरा मन प्रेम के तीरों से भेदा जा चुका है, आशा-चिन्ता वाली समझ मेरे हृदय में से भूल गई है, मैं अपने मन की आशा और चिन्ता विसार चुका हूँ। (अब) मेरे अंदर प्रेम की चुभन बनी रहती है, गुरु के दर्शन करके मेरा मन धैर्यवान हो गया है।
हे दास नानक! (अब यूँ अरदास किया कर-) हे प्रभु! मेरे अच्छे भाग्यों को मुझे आ के मिल- मैं तुझसे हर वक्त कुर्बान जाता हूँ।4।1।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही छंत महला ४ ॥ मारेहिसु वे जन हउमै बिखिआ जिनि हरि प्रभ मिलण न दितीआ ॥ देह कंचन वे वंनीआ इनि हउमै मारि विगुतीआ ॥ मोहु माइआ वे सभ कालखा इनि मनमुखि मूड़ि सजुतीआ ॥ जन नानक गुरमुखि उबरे गुर सबदी हउमै छुटीआ ॥१॥

मूलम्

सूही छंत महला ४ ॥ मारेहिसु वे जन हउमै बिखिआ जिनि हरि प्रभ मिलण न दितीआ ॥ देह कंचन वे वंनीआ इनि हउमै मारि विगुतीआ ॥ मोहु माइआ वे सभ कालखा इनि मनमुखि मूड़ि सजुतीआ ॥ जन नानक गुरमुखि उबरे गुर सबदी हउमै छुटीआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मारेहिसु = इस (अहंकार) को मार दो। वे जन = हे भाई! बिखिआ = माया। जिनि = जिस (माया) ने। देह = शरीर, काया। कंचन = सोना। वे = हे भाई! कंचन वंनीआ = सोने के रंग वाली, सोहणी। इनि हउमै = इस अहंकार ने। मारि = मार के। विगुतीआ = दुखी कर दी है। इनि मूढ़ि मनमुखि = इस मूर्ख मनमुख ने। मूढ़ि = मूर्ख ने। मनमुखि = मन के मुरीद मनुष्य ने। सजुतीआ = (अपने आप को कालिख से) जोड़ा हुआ है। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य। उबरे = (कालिख से) बच जाते हैं। छुटीआ = खत्म हो जाती है, निजात मिल जाती है।1।
अर्थ: हे भाई! जिस अहंकार ने जिस माया ने (जीव को कभी) परमात्मा से मिलने नहीं दिया, इस अहंकार को इस माया को (अपने अंदर से) मार भगाओ। हे भाई! (देखो!) ये शरीर सोने के रंग जैसा सुंदर होता है, (पर जहाँ अहंकार आ घुसा) इस अहंकार ने (उस शरीर को) मार के दुखी कर दिया।
हे भाई! माया का मोह निरी कालिख है, पर अपने मन के मुरीद इस मूर्ख मनुष्य ने (अपने आप को इस कालिख़ से ही) जोड़ रखा है।
हे दास नानक! (कह: हे भाई!) गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य (इस अहंकार से) बच जाते हैं, गुरु के शब्द की इनायत से उन्हें अहंकार से निजात मिल जाती है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

वसि आणिहु वे जन इसु मन कउ मनु बासे जिउ नित भउदिआ ॥ दुखि रैणि वे विहाणीआ नित आसा आस करेदिआ ॥ गुरु पाइआ वे संत जनो मनि आस पूरी हरि चउदिआ ॥ जन नानक प्रभ देहु मती छडि आसा नित सुखि सउदिआ ॥२॥

मूलम्

वसि आणिहु वे जन इसु मन कउ मनु बासे जिउ नित भउदिआ ॥ दुखि रैणि वे विहाणीआ नित आसा आस करेदिआ ॥ गुरु पाइआ वे संत जनो मनि आस पूरी हरि चउदिआ ॥ जन नानक प्रभ देहु मती छडि आसा नित सुखि सउदिआ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: वसि = वश में। वसि आणिहु = (अपने) वश में लाओ। कउ = को। बासा = बाशा, एक शिकारी पक्षी। जिउ = की तरह। दुखि = दुख में। रैणि = (जिंदगी की) रात। विहाणीआ = बीतती है। प्रभ = हे प्रभु! छडि = छोड़ के। सुखि = आनंद में। सउदिआ = लीन रहता है।2।
अर्थ: हे भाई! (अपने) इस मन को (सदा अपने) वश में रखो। (मनुष्य का ये) मन सदा (शिकारी पक्षी) बाशे की तरह भटकता है। सदा आशाएं ही आशाएं बनाते हुए (मनुष्य की सारी जिंदगी की) रात दुख में ही बीतती है।
हे संत जनो! जिस मनुष्य को गुरु मिल गया (वह परमात्मा का नाम जपने लग जाता है, और) नाम जपते हुए (उसके) मन में (उठी हरि-नाम स्मरण की) आशा पूरी हो जाती है। हे दास नानक! (प्रभु के दर पर अरदास किया कर और कह:) हे प्रभु! (मुझे भी अपना नाम जपने की) सूझ बख्शो (जो मनुष्य नाम जपता है, वह दुनियावी) आशाएं छोड़ के आत्मिक आनंद में लीन रहता है।2।

[[0777]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सा धन आसा चिति करे राम राजिआ हरि प्रभ सेजड़ीऐ आई ॥ मेरा ठाकुरु अगम दइआलु है राम राजिआ करि किरपा लेहु मिलाई ॥ मेरै मनि तनि लोचा गुरमुखे राम राजिआ हरि सरधा सेज विछाई ॥ जन नानक हरि प्रभ भाणीआ राम राजिआ मिलिआ सहजि सुभाई ॥३॥

मूलम्

सा धन आसा चिति करे राम राजिआ हरि प्रभ सेजड़ीऐ आई ॥ मेरा ठाकुरु अगम दइआलु है राम राजिआ करि किरपा लेहु मिलाई ॥ मेरै मनि तनि लोचा गुरमुखे राम राजिआ हरि सरधा सेज विछाई ॥ जन नानक हरि प्रभ भाणीआ राम राजिआ मिलिआ सहजि सुभाई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साधन = जीव-स्त्री। चिति = चिक्त में। राम राजिआ = हे प्रभु पातशाह! हरि = हे हरि! प्रभ = हे प्रभु! सेजड़ीऐ = सुंदर सेज पर, (मेरे हृदय की) सोहणी सेज पे। ठाकुर = मालिक। प्रभ = हे प्रभु! अगम = अगम्य (पहुँच से परे)। दइआलु = दया का घर। करि = कर के। मेरै मनि = मेरे मन में। मेरै तनि = मेरे तन में। लोचा = तमन्ना। गुरमुखे = गुरु की शरण पड़ कर। सरधा सेज = श्रद्धा की सेज। प्रभ भाणीआ = प्रभु को अच्छी लगती है। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाई = प्रेम में (टिकी को)।3।
अर्थ: हे भाई! (गुरु की शरण पड़ी रहने वाली) जीव-स्त्री (अपने) चिक्त में (नित्य प्रभु-पति के मिलाप की) आस करती रहती है (और कहती है:) हे प्रभु पातशाह! हे हरि! हे प्रभु! (मेरे हृदय की) सुदर सेज पर आ (के बस)। हे प्रभु पातशाह! तू मेरा मालिक है, तू दया का श्रोत है, (पर तू मेरे लिए) अगम्य (पहुँच से परे) है (तू स्वयं ही) मेहर कर के (मुझे अपने चरणों में) मिला ले। हे प्रभु पातशाह! गुरु की शरण पड़ कर मेरे मन में, मेरे तन में (तेरे मिलाप की) तमन्ना पैदा हो चुकी है। हे हरि! मैंने श्रद्धा की सेज बिछा रखी है।
हे दास नानक! (कह:) हे प्रभु पातशाह! हे हरि! जो जीव-स्त्री तुझे प्यारी लग जाती है, तू उस आत्मिक अडोलता में टिकी को प्रेम में ठहरी हुई को मिल जाता है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

इकतु सेजै हरि प्रभो राम राजिआ गुरु दसे हरि मेलेई ॥ मै मनि तनि प्रेम बैरागु है राम राजिआ गुरु मेले किरपा करेई ॥ हउ गुर विटहु घोलि घुमाइआ राम राजिआ जीउ सतिगुर आगै देई ॥ गुरु तुठा जीउ राम राजिआ जन नानक हरि मेलेई ॥४॥२॥६॥५॥७॥६॥१८॥

मूलम्

इकतु सेजै हरि प्रभो राम राजिआ गुरु दसे हरि मेलेई ॥ मै मनि तनि प्रेम बैरागु है राम राजिआ गुरु मेले किरपा करेई ॥ हउ गुर विटहु घोलि घुमाइआ राम राजिआ जीउ सतिगुर आगै देई ॥ गुरु तुठा जीउ राम राजिआ जन नानक हरि मेलेई ॥४॥२॥६॥५॥७॥६॥१८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: इकतु = एक पर ही। इकतु सेजै = एक ही हृदय सेज पर। हरि प्रभो = हरि प्रभु (बसता है)। दसे = बताता है। मेलेई = मिला देता है। मै मनि = मेरे मन में। मै तनि = मेरे तन में। बैरागु = तीव्र तमन्ना। करेई = करता है। हउ = मैं। विटहु = से। घोलि घुमाइआ = सदके कुर्बान जाता हूँ। जीउ = जिंद। देई = मैं देता हूं। तुठा = प्रसन्न होया हुआ। जीउ राम राजिआ = हे प्रभु पातशाह जी!।4।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘इकतु’ शब्द है ‘इकसु’ से बना अधिकरण कारक एकवचन।
नोट: शब्द ‘राम राजिआ’ छंत की टेक के लिए ही है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! (जीव-स्त्री की) एक ही (हृदय-) सेज पर हरि प्रभु (बसता है), (जिस जीव-स्त्री को) गुरु बताता है, उसको हरि से मिलवा देता है। मेरे मन में मेरे हृदय में (प्रभु के मिलाप के लिए) आकर्षण है तमन्ना है (पर जिस जीव-स्त्री पर) गुरु मेहर करता है, उसको (प्रभु से) मिलाता है।
हे भाई! मैं गुरु से सदके कुर्बान जाता हूँ, मैं (अपनी) जिंद को गुरु के आगे अर्पित करता हूँ। हे दास नानक! (कह:) जिस पर गुरु दयालु होता है, उसको हरि-प्रभु से मिला देता है।4।2।6।18।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही छंत महला ५ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही छंत महला ५ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुणि बावरे तू काए देखि भुलाना ॥ सुणि बावरे नेहु कूड़ा लाइओ कुस्मभ रंगाना ॥ कूड़ी डेखि भुलो अढु लहै न मुलो गोविद नामु मजीठा ॥ थीवहि लाला अति गुलाला सबदु चीनि गुर मीठा ॥ मिथिआ मोहि मगनु थी रहिआ झूठ संगि लपटाना ॥ नानक दीन सरणि किरपा निधि राखु लाज भगताना ॥१॥

मूलम्

सुणि बावरे तू काए देखि भुलाना ॥ सुणि बावरे नेहु कूड़ा लाइओ कुस्मभ रंगाना ॥ कूड़ी डेखि भुलो अढु लहै न मुलो गोविद नामु मजीठा ॥ थीवहि लाला अति गुलाला सबदु चीनि गुर मीठा ॥ मिथिआ मोहि मगनु थी रहिआ झूठ संगि लपटाना ॥ नानक दीन सरणि किरपा निधि राखु लाज भगताना ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बावरे = (माया के मोह में) पागल हुए हे मनुष्य! काए = क्यों? देखि = (इस माया को) देख के। भुलाना = (जीवन-राह से) भटक गया है। कूड़ा = झूठा, ना निभ सकने वाला। कुसंभ रंगाना = कुसंभ के फूल के रंग। कूड़ी = नाशवान। डेखि = देख के। अढु = आधी कौड़ी। थीवहि = तू हो जाएगा। लाला = एक फूल का नाम। चीन्हि = पहचान के। मिथिआ = नाशवान पदार्थ। मोहि = मोह में। मगनु = मस्त। संगि = साथ। दीन = गरीबी। किरपा निधि = हे कृपा के खजाने! लाज = इज्जत।1।
अर्थ: (माया के मोह में) पागल हो रहे हे मनुष्य! (जो कुछ मैं कह रहा हूँ, इसको ध्यान से) सुन। तू (माया को) देख के क्यों (जीवन-राह से) भटक रहा है। हे बावरे! सुन, (ये माया) कुसंभ के रंग (जैसी है, तूने इससे) प्यार डाला हुआ है जो सदा निभने वाला नहीं। तू (उस) नाशवान (माया) को देख के जीवन-राह से भटक रहा है, (जो आखिर) आधी कौड़ी के बदले में भी नहीं खरीदी जा सकती। हे भाई! परमात्मा का नाम ही मजीठ के पक्के रंग की तरह सदा साथ (निभाने वाला) है। अगर तू गुरु के मीठे शब्द से गहरी सांझ डाल के (परमात्मा का नाम जपता रहे, तो) तू सुंदर गहरे रंग वाले लाल फूल बन जाएगा। पर तू तो नाशवान (माया) के मोह में मस्त हो रहा है, तू उन पदार्थों के साथ चिपक रहा है जिनसे तेरा साथ नहीं निभना।
हे नानक! (कह:) हे दया के खजाने प्रभु! (मैं) गरीब (तेरी) शरण (आया हूँ मेरी) इज्जत रख, (जैसे) तू अपने भक्तों की (इज्जत रखता आया है)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुणि बावरे सेवि ठाकुरु नाथु पराणा ॥ सुणि बावरे जो आइआ तिसु जाणा ॥ निहचलु हभ वैसी सुणि परदेसी संतसंगि मिलि रहीऐ ॥ हरि पाईऐ भागी सुणि बैरागी चरण प्रभू गहि रहीऐ ॥ एहु मनु दीजै संक न कीजै गुरमुखि तजि बहु माणा ॥ नानक दीन भगत भव तारण तेरे किआ गुण आखि वखाणा ॥२॥

मूलम्

सुणि बावरे सेवि ठाकुरु नाथु पराणा ॥ सुणि बावरे जो आइआ तिसु जाणा ॥ निहचलु हभ वैसी सुणि परदेसी संतसंगि मिलि रहीऐ ॥ हरि पाईऐ भागी सुणि बैरागी चरण प्रभू गहि रहीऐ ॥ एहु मनु दीजै संक न कीजै गुरमुखि तजि बहु माणा ॥ नानक दीन भगत भव तारण तेरे किआ गुण आखि वखाणा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सेवि = सेवा भक्ति कर। नाथु पराणा = प्राणों के नाथ, जिंद के मालिक। तिसु जाणा = उसको (यहाँ से) जाना (भी पड़ेगा)। हभ = सारी सृष्टि। निहचलु = अटल। रहीऐ = मिल के रहना चाहिए, (प्रभु की याद में) मिले रहना चाहिए। पाईऐ = मिलता है। बैरागी = (माया के मोह की ओर से) उपराम (रह कर)। गहि = पकड़ के। रहीऐ = टिके रहना चाहिए। दीजै = भेटा कर दे। संक = शंका, झिझक। न कीजै = नहीं करनी चाहिए। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ कर। माणा = अहंकार। भव = संसार समुंदर। आखि = कह के। वखाणा = मैं बताऊँ।2।
अर्थ: हे बावरे! सुन; जिंद के मालिक प्रभु की सेवा-भक्ति किया कर। हे झल्ले! सुन! (यहाँ सदा किसी ने नहीं बैठे रहना) जो (जीव जगत में) आया है उसको (यहाँ से) जाना भी पड़ेगा।
हे पराए देश में आए जीव! सुन, (जिस जगत को तू) अटल (समझ रहा है, यह) सारी सृष्टि नाश हो जाएगी। हे परदेसी! साधु-संगत में टिक के प्रभु-चरणों में जुड़े रहना चाहिए। हे भाई! सुन, (माया के मोह से) उपराम (हो के ही) अच्छी किस्मत से प्रभु को मिला जा सकता है, (इस वास्ते) प्रभु के चरणों को अच्छी तरह पकड़ के रखना चाहिए।
हे भाई! ये मन गुरु के हवाले कर, (इसमें रक्ती भर भी) झिझकना नहीं चाहिए। गुरु की शरण पड़ कर (अपने अंदर से) अहंकार दूर कर।
हे नानक! (प्रभु दर पर अरदास कर और कह:) हे (शरण पड़े) गरीबों को और भक्तों को संसार-समुंदर से पार लंघाने वाले! (तू बेअंत गुणों का मालिक है) मैं तेरे कौन-कौन से गुण कह के बता सकता हूँ?।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुणि बावरे किआ कीचै कूड़ा मानो ॥ सुणि बावरे हभु वैसी गरबु गुमानो ॥ निहचलु हभ जाणा मिथिआ माणा संत प्रभू होइ दासा ॥ जीवत मरीऐ भउजलु तरीऐ जे थीवै करमि लिखिआसा ॥ गुरु सेवीजै अम्रितु पीजै जिसु लावहि सहजि धिआनो ॥ नानकु सरणि पइआ हरि दुआरै हउ बलि बलि सद कुरबानो ॥३॥

मूलम्

सुणि बावरे किआ कीचै कूड़ा मानो ॥ सुणि बावरे हभु वैसी गरबु गुमानो ॥ निहचलु हभ जाणा मिथिआ माणा संत प्रभू होइ दासा ॥ जीवत मरीऐ भउजलु तरीऐ जे थीवै करमि लिखिआसा ॥ गुरु सेवीजै अम्रितु पीजै जिसु लावहि सहजि धिआनो ॥ नानकु सरणि पइआ हरि दुआरै हउ बलि बलि सद कुरबानो ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: किआ कीचै = नहीं करना चाहिए। कूड़ा = झूठा। मानो = अहंकार। हभु = सारा। गरबु = गर्व, अहंकार। निहचलु = अटल। हभ = सारी सृष्टि। मिथिआ = झूठा। होइ = बना रहे। जीवत मरीऐ = अगर जीते जी मरे रहें, अगर सदा स्वै भाव दूर किए रखें। भउजलु = संसार समुंदर। थीवै = होए। करमि = (प्रभु की) मेहर से। सेवीजै = शरण पड़ना चाहिए। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल। पीजै = पीना चाहिए। लावहि = (हे प्रभु!) तू जोड़ता है। सहजि = आत्मिक अडोलता में। जिसु धिआनो = जिस की तवज्जो, ध्यान। हरि दुआरै = हरि के दर पे। हउ = मैं। सद = सदा।3।
अर्थ: हे बावरे! (नाशवान पदार्थों का) झूठा अहंकार नहीं करना चाहिए। हे बावरे! सुन, (पदार्थों से संबंध टूटने पर ये) सारा गर्व और गुमान भी खत्म हो जाएगा। हे भाई1 जिस जगत को (तू) सदा स्थिर समझता है, यह सारी सृष्टि चलायमान है, इसका मान करना झूठा कर्म है। (यहाँ) गुरु का प्रभु का दास बने रहना चाहिए। अगर सदा स्वै भाव दूर किए रखें, तो संसार-समुंदर से पार लांघा जाता है, (पर ये तब ही हो सकता है,) अगर (परमात्मा की) मेहर से (माथे पर लेख) लिखे हों। हे भाई! गुरु की शरण पड़े रहना चाहिए (गुरु से ही) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पीया जा सकता है। (पर, हे प्रभु! वही मनुष्य तेरा नाम-अमृत पीता है) जिसकी तवज्जो तू आत्मिक अडोलता में टिकाता है।
हे हरि! (तेरा दास) नानक तेरे दर पर तेरी शरण आ पड़ा है। मैं (तुझसे) सदा-सदा कुर्बान जाता हूँ।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सुणि बावरे मतु जाणहि प्रभु मै पाइआ ॥ सुणि बावरे थीउ रेणु जिनी प्रभु धिआइआ ॥ जिनि प्रभु धिआइआ तिनि सुखु पाइआ वडभागी दरसनु पाईऐ ॥ थीउ निमाणा सद कुरबाणा सगला आपु मिटाईऐ ॥ ओहु धनु भाग सुधा जिनि प्रभु लधा हम तिसु पहि आपु वेचाइआ ॥ नानक दीन सरणि सुख सागर राखु लाज अपनाइआ ॥४॥१॥

मूलम्

सुणि बावरे मतु जाणहि प्रभु मै पाइआ ॥ सुणि बावरे थीउ रेणु जिनी प्रभु धिआइआ ॥ जिनि प्रभु धिआइआ तिनि सुखु पाइआ वडभागी दरसनु पाईऐ ॥ थीउ निमाणा सद कुरबाणा सगला आपु मिटाईऐ ॥ ओहु धनु भाग सुधा जिनि प्रभु लधा हम तिसु पहि आपु वेचाइआ ॥ नानक दीन सरणि सुख सागर राखु लाज अपनाइआ ॥४॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मतु जाणहि = कहीं तू ये समझे। पाइआ = पा लिया है। थीउ = हो जा। रेणु = चरण धूल। जिनि = जिस (मनुष्य) ने। तिनि = उसने। पाईऐ = प्राप्त होता है। सद = सदा। आपु = स्वै भाव। धनु = धन्य, सराहनीय। भाग सुधा = शुद्ध भाग्य, अच्छे भाग्य। लधा = पा लिया, ढूँढ लिया। हम = मैं। आपु = अपना आप। पहि = पास। सुख सागर = हे सुखों के समुंदर! अपनाइआ = अपने (सेवक की)।4।
अर्थ: हे (माया के मोह में) झल्ले (हो रहे) मनुष्य (जो कुछ मैं कर रहा हूँ, ध्यान से) सुन। ये ना समझ कि (माया के गुमान में रहके भी) मैंने (भाव, तूने) परमात्मा का मिलाप हासिल कर लिया है। हे बावरे! सुन, जिस लोगों ने परमात्मा का स्मरण किया है, (उनके) चरणों की धूल बना रह (तब ही प्रभु-मिलाप होता है)।
हे भाई! जिस (मनुष्य) ने परमात्मा का स्मरण किया है, उसने आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया है। बड़े भाग्यों से ही (परमात्मा के) दर्शन होते हैं। गरीब स्वभाव वाला बना रहा कर, (जिन्होंने प्रभु का स्मरण किया है, उन पर से) सदा सदके हुआ कर। हे भाई! सवै भाव (अहंकार भाव) अच्छी तरह से दूर कर देना चाहिए।
हे भाई! जिस (मनुष्य) ने परमात्मा का मिलाप हासिल कर लिया, वह साराहनीय हो गया, उसके भाग्य उत्तम हो गए। मैंने तो अपना-आप ऐसे मनुष्य के आगे भेट कर दिया है।
हे नानक! (कह:) हे गरीबों की सहायता करने वाले! हे सुखों के समुंदर! (मैं तेरी शरण आया हूँ) अपने सेवक की इज्जत रख।4।1।

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विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ हरि चरण कमल की टेक सतिगुरि दिती तुसि कै बलि राम जीउ ॥ हरि अम्रिति भरे भंडार सभु किछु है घरि तिस कै बलि राम जीउ ॥ बाबुलु मेरा वड समरथा करण कारण प्रभु हारा ॥ जिसु सिमरत दुखु कोई न लागै भउजलु पारि उतारा ॥ आदि जुगादि भगतन का राखा उसतति करि करि जीवा ॥ नानक नामु महा रसु मीठा अनदिनु मनि तनि पीवा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ हरि चरण कमल की टेक सतिगुरि दिती तुसि कै बलि राम जीउ ॥ हरि अम्रिति भरे भंडार सभु किछु है घरि तिस कै बलि राम जीउ ॥ बाबुलु मेरा वड समरथा करण कारण प्रभु हारा ॥ जिसु सिमरत दुखु कोई न लागै भउजलु पारि उतारा ॥ आदि जुगादि भगतन का राखा उसतति करि करि जीवा ॥ नानक नामु महा रसु मीठा अनदिनु मनि तनि पीवा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: चरण कमल = कमल के फूल जैसे कोमल चरण। टेक = सहारा। सतिगुरि = गुरु ने। तुसि कै = प्रसन्न हो के। बलिराम जीउ = (मैं) प्रभु जी से सदके हूँ। अंम्रिति = आत्मिक जीवन देने वाले नाम जल से। भंडार = खजाने। सभु किछु = हरेक पदार्थ। घरि तिस कै = उस (प्रभु) के घर में। बाबुल = पति प्रभु। समरथा = ताकतों का मालिक। करण कारण हारा = हरेक सबब बना सकने वाला। सिमरत = स्मरण करते हुए। भउजलु = संसार समुंदर। आदि = आरम्भ से। जुगादि = जुगों के आरम्भ से। उसतति = उपमा। करि = कर के। जीवा = मैं आत्मिक जीवन हासिल करता हूँ। महा रसु = सब रसों से बड़ा रस। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। मनि = मन से। तनि = तन से। पीवा = मैं पीता हूँ।1।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘तिस कै’ में से ‘तिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘कै’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! मैं सुंदर प्रभु से सदके जाता हूँ (उसकी मेहर से) गुरु ने मेहरवान हो के मुझे उसके सुंदर चरणों का आसरा दिया है। मैं उस प्रभु से कुर्बान हूँ, उसके घर में हरेक पदार्थ मौजूद है, आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल से (उसके घर में) खजाने भरे पड़े हैं।
हे भाई! मेरा प्रभु-पति बड़ी ताकतों का मालिक है, वह प्रभु हरेक सबब बना सकने वाला है। (वह ऐसा है) जिसका नाम स्मरण करने से कोई दुख छू नहीं सकता, (उसका नाम) संसार-समुंदर से पार लंघा देता है।
हे भाई! जगत के आरम्भ से ही (वह प्रभु अपने) भक्तों का रखवाला (चला आ रहा) है। उसकी महिमा कर कर के मैं आत्मिक जीवन हसिल कर रहा हूँ। हे नानक! (कह: हे भाई! उसका) नाम मीठा है, (सब रसों से) बड़ा रस है मैं तो हर वक्त (वह नाम-रस अपने) मन के द्वारा ज्ञान-इंद्रिय के द्वारा पीता रहता हूँ।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि आपे लए मिलाइ किउ वेछोड़ा थीवई बलि राम जीउ ॥ जिस नो तेरी टेक सो सदा सद जीवई बलि राम जीउ ॥ तेरी टेक तुझै ते पाई साचे सिरजणहारा ॥ जिस ते खाली कोई नाही ऐसा प्रभू हमारा ॥ संत जना मिलि मंगलु गाइआ दिनु रैनि आस तुम्हारी ॥ सफलु दरसु भेटिआ गुरु पूरा नानक सद बलिहारी ॥२॥

मूलम्

हरि आपे लए मिलाइ किउ वेछोड़ा थीवई बलि राम जीउ ॥ जिस नो तेरी टेक सो सदा सद जीवई बलि राम जीउ ॥ तेरी टेक तुझै ते पाई साचे सिरजणहारा ॥ जिस ते खाली कोई नाही ऐसा प्रभू हमारा ॥ संत जना मिलि मंगलु गाइआ दिनु रैनि आस तुम्हारी ॥ सफलु दरसु भेटिआ गुरु पूरा नानक सद बलिहारी ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आपे = खुद ही। थीवई = हो सकता है। किउ थीवई = कैसे हो सकता है? नहीं हो सकता। सद = सदा। जीवई = जीए, आत्मिक जीवन हासिल किए रखता है। तुझै ते = तुझ से ही, तेरे पास से ही। पाई = मिलती है। साचे = हे सदा कायम रहने वाले! मिलि = मिल के। मंगलु = महिमा का गीत। रैनि = रात। सफलु = हरेक फल देने वाला, हरेक मुराद पूरी करने वाला। भेटिआ = मिला। बलिहारी = कुर्बान।2।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जिस ते’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘ते’ के कारण हटा दी गई है।
नोट: ‘जिस नो’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! मैं सुंदर प्रभु से सदके जाता हूँ, (जिस मनुष्य को) वह स्वयं ही (अपने चरणों से) जोड़ता है (उस मनुष्य का प्रभु से) फिर कभी वियोग नहीं होता।
हे राम! मैं तेरे से कुर्बान हूँ। जिस मनुष्य को तेरा सहारा मिल जाता है, वह सदा ही आत्मिक जीवन हासिल किए रखता है। पर, हे सदा कायम रहने वाले और सब को पैदा करने वाले! तेरा आसरा मिलता भी तेरे पास ही से है। तू ऐसा हमारा मालिक है, जिस (के दर) से कोई खाली (बेमुराद) नहीं जाता। हे प्रभु! तेरे संत जन मिल के (सदा तेरी) महिमा के गीत गाते हैं, (उनको) दिन-रात तेरी (सहायता की) ही आशा रहती है। हे नानक! (कह: हे प्रभु!) मैं तुझसे सदा सदके जाता हूँ (तेरी ही मेहर से वह) पूरा गुरु मिलता है जिसका दीदार हरेक मुराद पूरी करने वाला है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सम्हलिआ सचु थानु मानु महतु सचु पाइआ बलि राम जीउ ॥ सतिगुरु मिलिआ दइआलु गुण अबिनासी गाइआ बलि राम जीउ ॥ गुण गोविंद गाउ नित नित प्राण प्रीतम सुआमीआ ॥ सुभ दिवस आए गहि कंठि लाए मिले अंतरजामीआ ॥ सतु संतोखु वजहि वाजे अनहदा झुणकारे ॥ सुणि भै बिनासे सगल नानक प्रभ पुरख करणैहारे ॥३॥

मूलम्

सम्हलिआ सचु थानु मानु महतु सचु पाइआ बलि राम जीउ ॥ सतिगुरु मिलिआ दइआलु गुण अबिनासी गाइआ बलि राम जीउ ॥ गुण गोविंद गाउ नित नित प्राण प्रीतम सुआमीआ ॥ सुभ दिवस आए गहि कंठि लाए मिले अंतरजामीआ ॥ सतु संतोखु वजहि वाजे अनहदा झुणकारे ॥ सुणि भै बिनासे सगल नानक प्रभ पुरख करणैहारे ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: संम्लिआ = संभाला। सचु थानु = सदा कायम रहने वाला प्रभु का दर। महतु = महत्वता, बड़ाई। सचु = सदा स्थिर हरि। बलि राम जीउ = मैं प्रभु जी से सदके जाता हूँ। दइआलु = दया का घर। गाउ = गाया करो। नित नित = हर रोज, सदा ही। सुभ = भले। दिवस = दिन। गहि = पकड़ के। कंठि = गले से। अंतरजामीआ = सबके दिल की जानने वाला। सतु = ऊँचा आचरण। संतोखु = माया की ओर से तृप्ति। वजहि वाजे = बाजे बजते हैं (जैसे कहीं बाजे बज रहे हों तो उस जगह पर साधारण आवाज में की गई बात नहीं सुनी जा सकती, वैसे ही हृदय में विकारों की प्रेरणा नहीं सुनी जाती)। अनहदा = एक रस, लगातार। झुणकारे = मीठी सुर। सुणि = सुन के। भै = भय, सारे डर। करणैहारै = सब कुछ करने वाले की सामर्थ्य वाले के।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘भै’ है ‘भउ’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! मैं प्रभु जी से सदके जाता हूँ। (प्रभु की मेहर से जिसको) दया का श्रोत गुरु मिल गया, उसने अविनाशी प्रभु के गुण गाने आरम्भ कर दिए, उसने सदा-स्थिर प्रभु के दर पर कब्जा कर लिया, उसको सदा-स्थिर प्रभु मिल गया, (उसको प्रभु के दर से) सम्मान मिला, उपमा मिली।
हे भाई! जिंद के मालिक प्रीतम प्रभु के गुण सदा ही गाया करो, (जो मनुष्य गुण गाता है उसके वास्ते जिंदगी के) सुंदर दिन आए रहते हैं, उसको प्रभु जी अपने गले से लगाए रहते हैं, सबके दिल की जानने वाले प्रभु उससे मिल जाते हैं। (उस मनुष्य के अंदर) उच्च आचरण और संतोष (हर वक्त अपना पूरा प्रभाव डाले रखते हैं, मानो, सत्-संतोख के अंदर) बाजे बज रहे हैं, (सत्-संतोख की उसके अंदर) एक रस मीठी लय बनी रहती है।
हे नानक! सब कुछ करने की सामर्थ्य रखने वाले प्रभु अकाल पुरूख के गुण गा-गा के सारे डर नाश हो जाते हैं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

उपजिआ ततु गिआनु साहुरै पेईऐ इकु हरि बलि राम जीउ ॥ ब्रहमै ब्रहमु मिलिआ कोइ न साकै भिंन करि बलि राम जीउ ॥ बिसमु पेखै बिसमु सुणीऐ बिसमादु नदरी आइआ ॥ जलि थलि महीअलि पूरन सुआमी घटि घटि रहिआ समाइआ ॥ जिस ते उपजिआ तिसु माहि समाइआ कीमति कहणु न जाए ॥ जिस के चलत न जाही लखणे नानक तिसहि धिआए ॥४॥२॥

मूलम्

उपजिआ ततु गिआनु साहुरै पेईऐ इकु हरि बलि राम जीउ ॥ ब्रहमै ब्रहमु मिलिआ कोइ न साकै भिंन करि बलि राम जीउ ॥ बिसमु पेखै बिसमु सुणीऐ बिसमादु नदरी आइआ ॥ जलि थलि महीअलि पूरन सुआमी घटि घटि रहिआ समाइआ ॥ जिस ते उपजिआ तिसु माहि समाइआ कीमति कहणु न जाए ॥ जिस के चलत न जाही लखणे नानक तिसहि धिआए ॥४॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: उपजिआ = पैदा हो जाता है। ततु = निचोड़। गिआनु = आत्मिक जीवन की सूझ। ततु गिआनु = आत्मिक जीवन की असल सूझ। साहुरै = परलोक में। पेईऐ = इस लोक में, पिता के घर में। ब्रहमै ब्रहमु मिलिआ = जीवात्मा को परमात्मा (ऐसे) मिल जाता है। भिंन = अलग। बिसमु = आश्चर्य रूप प्रभु। पेखै = देखता है। बिसमादु = आश्चर्यरूप हरि। नदरी आइआ = दिखता है। माहि = में। चलत = चरित्र, करिश्मे। न जाही लखणे = बयान नहीं किए जा सकते। तिसहि = (तिस ही) उस (प्रभु) को ही। जलि = जल में। थलि = थल में, धरती में। महीअलि = मही तलि, धरती की तह के ऊपर, पाताल में, आकाश में।4।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जिस ते’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘ते’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! मैं प्रभु जी से सदके जाता हूँ। (जो मनुष्य उस प्रभु को सदा स्मरण करता है, उसके अंदर) असल आत्मिक जीवन की सूझ पैदा हो जाती है, (उसको) इस लोक में और परलोक में वही परमात्मा दिखाई देता है। उस जीव को परमात्मा (ऐसे) मिल जाता है कि कोई (भी परमात्मा से उसको) जुदा नहीं कर सकता। (वह मनुष्य हर जगह) उस आश्चर्य-रूप प्रभु को देखता है, (वही हर जगह बोलता हुआ उसे) सुनाई देता है, हर जगह वही उसे दिखता है। पानी में, धरती पर, आकाश में परमात्मा ही उसको व्यापक दिखता है।
हे नानक! (कह: हे भाई!) जिस परमात्मा के करिश्मे-तमाशे बयान नहीं किए जा सकते, (जो मनुष्य सदा) उसका ही ध्यान धरता है, उस मनुष्य की ऊँची हो चुकी आत्मिक अवस्था का मूल्य नहीं डाला जा सकता, (क्योंकि) जिस परमात्मा से वह पैदा हुआ है (नाम-जपने की इनायत से) उसमें (हर वक्त) लीन रहता है।4।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही छंत महला ५ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही छंत महला ५ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

गोबिंद गुण गावण लागे ॥ हरि रंगि अनदिनु जागे ॥ हरि रंगि जागे पाप भागे मिले संत पिआरिआ ॥ गुर चरण लागे भरम भागे काज सगल सवारिआ ॥ सुणि स्रवण बाणी सहजि जाणी हरि नामु जपि वडभागै ॥ बिनवंति नानक सरणि सुआमी जीउ पिंडु प्रभ आगै ॥१॥

मूलम्

गोबिंद गुण गावण लागे ॥ हरि रंगि अनदिनु जागे ॥ हरि रंगि जागे पाप भागे मिले संत पिआरिआ ॥ गुर चरण लागे भरम भागे काज सगल सवारिआ ॥ सुणि स्रवण बाणी सहजि जाणी हरि नामु जपि वडभागै ॥ बिनवंति नानक सरणि सुआमी जीउ पिंडु प्रभ आगै ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रंगि = प्रेम रंग में। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। जागे = (माया के हमलों से) सचेत हो गए। संत = गुरु। भरम = भटकना। सगल = सारे। सुणि = सुन के। स्रवन = कानों से। सहजि = आत्मिक अडोलता में (टिक के)। जपि = जप के। वड भागै = बड़ी किस्मत से। जीउ = जिंद। पिंडु = शरीर।1।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य प्यारे गुरु को मिल जाते हैं, वे मनुष्य परमात्मा का गुण-गान करने लग जाते हैं, परमात्मा के प्रेम-रंग में (टिक के) वह हर वक्त (माया के हमलों से) सचेत रहते हैं, (ज्यों-ज्यों) वह प्रभु के प्यार-रंग में (टिक के) सचेत होते हैं, (उनके अंदर से) सारे पाप भाग जाते हैं। हे भाई! जो मनुष्य गुरु के चरणों में लगते हैं, उनकी सारी भटकनें दूर हो जाती हैं, उनके सारे काम भी सँवर जाते हैं।
नानक विनती करता है: जो मनुष्य बहुत बड़ी किस्मत से सतिगुरु की वाणी कानों से सुन के परमात्मा का नाम जप के आत्मिक अडोलता में (टिक के परमात्मा के साथ) गहरी सांझ डालता है, वह मनुष्य मालिक प्रभु की शरण पड़ कर अपनी जिंद अपना शरीर (सब कुछ) परमात्मा के आगे (रख देता है)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनहत सबदु सुहावा ॥ सचु मंगलु हरि जसु गावा ॥ गुण गाइ हरि हरि दूख नासे रहसु उपजै मनि घणा ॥ मनु तंनु निरमलु देखि दरसनु नामु प्रभ का मुखि भणा ॥ होइ रेण साधू प्रभ अराधू आपणे प्रभ भावा ॥ बिनवंति नानक दइआ धारहु सदा हरि गुण गावा ॥२॥

मूलम्

अनहत सबदु सुहावा ॥ सचु मंगलु हरि जसु गावा ॥ गुण गाइ हरि हरि दूख नासे रहसु उपजै मनि घणा ॥ मनु तंनु निरमलु देखि दरसनु नामु प्रभ का मुखि भणा ॥ होइ रेण साधू प्रभ अराधू आपणे प्रभ भावा ॥ बिनवंति नानक दइआ धारहु सदा हरि गुण गावा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अनहत = एक रस, लगातार, हर वक्त। सुहावा = (कानों को) सुख देने वाला। सचु = सदा स्थिर। मंगलु = महिमा का गीत। जसु = महिमा। गावा = (जिन्होंने) गाया। गाइ = गा के। रहसु = खुशी। मनि = मन में। घणा = बहुत। तंनु = तन (पढ़ने में एक मात्रा बढ़ाने के लिए ‘तनु’ से ‘तंनु’ बनाया)। देखि = देख के। मुखि = मुँह से। भणा = (जिसने) उचारा। प्रभ भावा = प्रभु को प्यारे लगे। गावा = मैं गाता रहूँ। रेण = चरण धूल। साधू = गुरु।2।
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्यों ने सदा-स्थिर प्रभु की महिमा के गीत हर वक्त गाए, उनको महिमा की वाणी हर वक्त एक-रस (कानों को) सुखद लगने लग जाती है। परमात्मा के गुण गा-गा के (उनके सारे) दुख नाश हो जाते हैं, (उनके) मन में बहुत आनंद पैदा हो जाता है। हे भाई! जो मनुष्य (अपने) मुँह से परमात्मा का नाम उचारते रहते हैं, (उनका) दर्शन करके मन पवित्र हो जाता है। गुरु की चरण-धूल हो के जो मनुष्य परमात्मा की आराधना करते रहते हैं, वह मनुष्य अपने प्रभु को प्यारे लगने लग जाते हैं।
नानक विनती करता है: हे प्रभु! (मेरे पर) मेहर कर, मैं (भी) सदा तेरे गुण गाता रहूँ।2।

[[0779]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुर मिलि सागरु तरिआ ॥ हरि चरण जपत निसतरिआ ॥ हरि चरण धिआए सभि फल पाए मिटे आवण जाणा ॥ भाइ भगति सुभाइ हरि जपि आपणे प्रभ भावा ॥ जपि एकु अलख अपार पूरन तिसु बिना नही कोई ॥ बिनवंति नानक गुरि भरमु खोइआ जत देखा तत सोई ॥३॥

मूलम्

गुर मिलि सागरु तरिआ ॥ हरि चरण जपत निसतरिआ ॥ हरि चरण धिआए सभि फल पाए मिटे आवण जाणा ॥ भाइ भगति सुभाइ हरि जपि आपणे प्रभ भावा ॥ जपि एकु अलख अपार पूरन तिसु बिना नही कोई ॥ बिनवंति नानक गुरि भरमु खोइआ जत देखा तत सोई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुर मिलि = गुरु को मिल के। सागरु = (संसार-) सागर। जपत = जपते हुए। निसतरिआ = निस्तारा हो गया, पार उतारा हो सकता है। धिआए = तवज्जो जोड़ता है। सभि = सारे। आवण जाणा = जनम मरण के चक्कर। भाइ = प्यार से। भगति सुभाइ = भक्ति वाले स्वभाव में टिक के। जपि = जप के। प्रभ भावा = प्रभु को अच्छा लगता है। अलख = जिसका सही स्वरूप बताया ना जा सके। अपार = जिसकी हस्ती का परला छोर ना मिले। गुरि = गुरु ने। जपि = जपा कर। जत = जिधर। देखा = मैं देखता हूँ। तत = उधर। सोई = वही प्रभु।3।
अर्थ: हे भाई! गुरु को मिल के परमात्मा का नाम जपने से संसार-समुंदर से पार लांघा जा सकता है।
जो मनुष्य परमात्मा के चरणों में तवज्जो जोड़े रखता है वह सारी मुँह मांगी मुरादें प्राप्त कर लेता है, उसके जनम-मरण के चक्कर भी मिट जाते हैं। प्यार के द्वारा, भक्ति वाले स्वभाव के द्वारा परमात्मा का नाम जप के वह मनुष्य अपने प्रभु को प्यारा लगने लगता है।
हे भाई! अदृश्य बेअंत और सर्व-व्यापक परमात्मा का नाम जपा कर, उसके बिना और कोई नहीं है।
नानक विनती करता है: गुरु ने (मेरी) भटकना दूर कर दी है, (अब) मैं जिधर देखता हूँ, उधर वह (परमात्मा) ही (दिखता है)।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पतित पावन हरि नामा ॥ पूरन संत जना के कामा ॥ गुरु संतु पाइआ प्रभु धिआइआ सगल इछा पुंनीआ ॥ हउ ताप बिनसे सदा सरसे प्रभ मिले चिरी विछुंनिआ ॥ मनि साति आई वजी वधाई मनहु कदे न वीसरै ॥ बिनवंति नानक सतिगुरि द्रिड़ाइआ सदा भजु जगदीसरै ॥४॥१॥३॥

मूलम्

पतित पावन हरि नामा ॥ पूरन संत जना के कामा ॥ गुरु संतु पाइआ प्रभु धिआइआ सगल इछा पुंनीआ ॥ हउ ताप बिनसे सदा सरसे प्रभ मिले चिरी विछुंनिआ ॥ मनि साति आई वजी वधाई मनहु कदे न वीसरै ॥ बिनवंति नानक सतिगुरि द्रिड़ाइआ सदा भजु जगदीसरै ॥४॥१॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पतित = (विकारों में) गिरे हुए। पावन = पवित्र (करने वाला)। पतित पावन = विकारियों को पवित्र करने वाला। के कामा = के (सारे) काम। पाइआ = पाया, मिलाप हासिल किया। सगल = सारी। इछा = मुराद। पुंनीआ = पूरी हो गई। हउ ताप = अहंकार का ताप। सरसे = प्रसन्न। प्रभ मिले = प्रभु को मिल गए। चिरी = चिरों के। मनि = मन में। साति = शांति, ठंढ। वजी वधाई = चढ़ती कला प्रबल हो गई। मनहु = मन से। सतिगुरि = गुरु ने। जगदीसरै = (जगत+ईसरै) जगत के ईश्वर को। भजु = भजन किया कर।4।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा का नाम विकारियों को पवित्र करने वाला है और संत जनों के सारे काम सिरे चढ़ाने वाला है।
जिनको संत-गुरु मिल गया, उन्होंने प्रभु का नाम स्मरणा आरम्भ कर दिया, उनकी सारी मुरादें पूरी होने लग पड़ीं, (उनके अंदर से) अहंकार के कष्ट नाश हो गए, वे सदैव प्रफुल्लित रहने लग पड़े, चिरों से विछुड़े हुए वे प्रभु को मिल गए। उनके मन में (नाम-जपने की इनायत से) ठंड पड़ गई, उनके अंदर चढ़दीकला (प्रगतिशील जीवन की उमंग) प्रबल हो गई, परमात्मा का नाम उन्हें कभी नहीं भूलता।
नानक विनती करता है: (हे भाई! गुरु ने ये बात हृदय में) पक्की कर दी है कि सदा जगत के मालिक का नाम जपते रहा करो।4।1।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही छंत महला ५ घरु ३ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही छंत महला ५ घरु ३ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तू ठाकुरो बैरागरो मै जेही घण चेरी राम ॥ तूं सागरो रतनागरो हउ सार न जाणा तेरी राम ॥ सार न जाणा तू वड दाणा करि मिहरमति सांई ॥ किरपा कीजै सा मति दीजै आठ पहर तुधु धिआई ॥ गरबु न कीजै रेण होवीजै ता गति जीअरे तेरी ॥ सभ ऊपरि नानक का ठाकुरु मै जेही घण चेरी राम ॥१॥

मूलम्

तू ठाकुरो बैरागरो मै जेही घण चेरी राम ॥ तूं सागरो रतनागरो हउ सार न जाणा तेरी राम ॥ सार न जाणा तू वड दाणा करि मिहरमति सांई ॥ किरपा कीजै सा मति दीजै आठ पहर तुधु धिआई ॥ गरबु न कीजै रेण होवीजै ता गति जीअरे तेरी ॥ सभ ऊपरि नानक का ठाकुरु मै जेही घण चेरी राम ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ठाकुरो = ठाकुर, मालिक, पालनहार। बैरागरो = वासना रहित, चाहत बगैर, बैरागी। मै जेही = मेरे जैसी। घण = अनेक। चेरी = दासियाँ। राम = हे राम! रतनागरो = रत्नों की खान, रतनाकरु, रत्न आकर। हउ = मैं। सार = कद्र। दाणा = सियाना, समझदार। मिहरंमति = मेहर। सांई = हे सांई! कीजै = करिए। दीजै = दे। मति = अकल। सा = ऐसी। धिआई = मैं ध्याऊँ। गरबु = अहंकार। रेण = चरण धूल। होवीजै = हो जा। गति = उच्च आत्मिक अवस्था। जीअरे = हे जीव!।1।
अर्थ: हे (मेरे) राम! तू (सब जीवों का) मालिक है, तेरे पर माया अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। मेरे जैसी (तेरे दर पे) अनेक दासियाँ हैं। हे राम! तू समुंदर है। तू रत्नों की खान है। हे प्रभु! मैं तेरी कद्र नहीं समझ सकी।
हे मेरे मालिक! मैं (तेरे गुणों की) कद्र नहीं जानती, तू बड़ा समझदार है (सब कुछ जानने वाला है), (मेरे पर) मेहर कर। कृपा कर, मुझे ऐसी समझ बख्श कि आठों पहर मैं तेरा स्मरण करती रहूँ।
हे जिंदे! अहंकार नहीं करना चाहिए, (सबके) चरणों की धूल बने रहना चाहिए, तब ही तेरी उच्च आत्मिक अवस्था बन सकेगी।
हे नानक! (कह:) मेरा मालिक प्रभु सबके सिर पर है। मेरे जैसी (उसके दर पे) अनेक दासियां हैं।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तुम्ह गउहर अति गहिर ग्मभीरा तुम पिर हम बहुरीआ राम ॥ तुम वडे वडे वड ऊचे हउ इतनीक लहुरीआ राम ॥ हउ किछु नाही एको तूहै आपे आपि सुजाना ॥ अम्रित द्रिसटि निमख प्रभ जीवा सरब रंग रस माना ॥ चरणह सरनी दासह दासी मनि मउलै तनु हरीआ ॥ नानक ठाकुरु सरब समाणा आपन भावन करीआ ॥२॥

मूलम्

तुम्ह गउहर अति गहिर ग्मभीरा तुम पिर हम बहुरीआ राम ॥ तुम वडे वडे वड ऊचे हउ इतनीक लहुरीआ राम ॥ हउ किछु नाही एको तूहै आपे आपि सुजाना ॥ अम्रित द्रिसटि निमख प्रभ जीवा सरब रंग रस माना ॥ चरणह सरनी दासह दासी मनि मउलै तनु हरीआ ॥ नानक ठाकुरु सरब समाणा आपन भावन करीआ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गउहर = (बहुत ही कीमती) मोती। गहिरा = गहरा, अथाह (समुंदर)। गंभीरा = बड़े जिगरे वाला। पिर = पति। हम = हम जीव। बहुरीआ = दुल्हनें। लहुरीआ = छोटी। इतनीक = बहुत ही छोटी। हउ = मैं। आपे = स्वयं ही। सुजाना = समझदार। अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाली। द्रिसटि = निगाह। निमख = (निमेष) आँख झपकने जितना समय। प्रभ = हे प्रभु! जीवा = जीऊँ, मैं जी पड़ती हूँ। माना = मान ले। मनि मउलै = मन खिल उठा। हरीआ = हरा भरा। भावन = मर्जी।2।
अर्थ: हे प्रभु! तू एक (अनमोल) मोती है, तू अथाह (समुंदर) है, तू बहुत बड़े जिगरे वाला है, तू (हमारा) पति है, हम जीव तेरी पत्नियाँ हैं। तू बेअंत बड़ा है, तू बेअंत ऊँचा है। मैं बहुत ही छोटी सी हस्ती वाली हूँ।
हे भाई! मेरी कुछ भी पाया नहीं है, एक तू ही तू है, तू खुद ही खुद सब कुछ जानने वाला है। हे प्रभु! आँख झपकने जितने समय के लिए मिली तेरी अमृत-दृष्टि से मुझे आत्मिक जीवन मिल जाता है (ऐसे होता है जैसे) मैंने सारे रंग-रस भोग लिए हैं। मैंने तेरे चरणों की शरण ली है, मैं तेरे दासों की दासी हूँ (आत्मिक जीवन देने वाली तेरी निगाह की इनायत से) जब मेरा मन खिल उठता है, मेरा शरीर (भी) हरा-भरा हो जाता है।
हे नानक! (कह: हे भाई!) मालिक-प्रभु सब जीवों में समा रहा है, वह (हर वक्त हर जगह) अपनी मर्जी करता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तुझु ऊपरि मेरा है माणा तूहै मेरा ताणा राम ॥ सुरति मति चतुराई तेरी तू जाणाइहि जाणा राम ॥ सोई जाणै सोई पछाणै जा कउ नदरि सिरंदे ॥ मनमुखि भूली बहुती राही फाथी माइआ फंदे ॥ ठाकुर भाणी सा गुणवंती तिन ही सभ रंग माणा ॥ नानक की धर तूहै ठाकुर तू नानक का माणा ॥३॥

मूलम्

तुझु ऊपरि मेरा है माणा तूहै मेरा ताणा राम ॥ सुरति मति चतुराई तेरी तू जाणाइहि जाणा राम ॥ सोई जाणै सोई पछाणै जा कउ नदरि सिरंदे ॥ मनमुखि भूली बहुती राही फाथी माइआ फंदे ॥ ठाकुर भाणी सा गुणवंती तिन ही सभ रंग माणा ॥ नानक की धर तूहै ठाकुर तू नानक का माणा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: माणा = मान, फख़र। ताणा = ताण, बल, सहारा। मति = बुद्धि। सुरति = सूझ। जाणाइहि = (जो कुछ) तू समझाता है। जाणा = मैं समझता हूँ। सेई = वही मनुष्य। जा कउ = जिस पर। नदरि = मिहर की निगाह। सिरंदे = विधाता की। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री। भुली = सही जीवन की ओर से भटकी हुई। राही = राहों में। फंदे = फाही में। भाणी = अच्छी लगी। तिन ही = उस ने ही। धर = आसरा। ठाकुर = हे ठाकुर!।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘तिन ही’ में से ‘तिनि’ की ‘नि’ की ‘ि’ मात्रा ‘ही’ क्रिया विशेषण के कारण हट गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे राम! मेरा माण तेरे ऊपर ही है, तू ही मेरा आरसरा है। (जो भी कोई) सूझ, बुद्धि, समझदारी (मेरे अंदर है, वह) तेरी (ही बख्शी हुई है) जो कुछ तू मुझे समझाता है, वही मैं समझता हूँ।
हे भाई! वही मनुष्य (सही जीवन को) समझता-पहचानता है, जिस पर विधाता की मेहर की निगाह होती है। अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री अनेक और रास्तों पर चल-चल के (सही जीवन-राह से) भटकी रहती है, माया के जंजाल में फसी रहती है। जो जीव-स्त्री मालिक-प्रभु को अच्छी लगती है, वह गुणवान हो जाती है, उसने ही सारे आत्मिक आनंद भोगे हैं।
हे ठाकुर! नानक का सहारा तू ही है, नानक का माण (भी) तू ही है।3।

[[0780]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

हउ वारी वंञा घोली वंञा तू परबतु मेरा ओल्हा राम ॥ हउ बलि जाई लख लख लख बरीआ जिनि भ्रमु परदा खोल्हा राम ॥ मिटे अंधारे तजे बिकारे ठाकुर सिउ मनु माना ॥ प्रभ जी भाणी भई निकाणी सफल जनमु परवाना ॥ भई अमोली भारा तोली मुकति जुगति दरु खोल्हा ॥ कहु नानक हउ निरभउ होई सो प्रभु मेरा ओल्हा ॥४॥१॥४॥

मूलम्

हउ वारी वंञा घोली वंञा तू परबतु मेरा ओल्हा राम ॥ हउ बलि जाई लख लख लख बरीआ जिनि भ्रमु परदा खोल्हा राम ॥ मिटे अंधारे तजे बिकारे ठाकुर सिउ मनु माना ॥ प्रभ जी भाणी भई निकाणी सफल जनमु परवाना ॥ भई अमोली भारा तोली मुकति जुगति दरु खोल्हा ॥ कहु नानक हउ निरभउ होई सो प्रभु मेरा ओल्हा ॥४॥१॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हउ = मैं। वारी वंञा = वारी वंजा, मैं कुर्बान जाती हूँ; मैं तुझसे सदके कुर्बान जाती हूँ। घोली = सदके। ओला = पर्दा। बलि जाई = मैं सदके जाती हूँ। बरीआ = बारी। जिनि = जिसने। भ्रमु = भटकना। तजे = त्याग दिए। सिउ = साथ। माना = मान गया। प्रभ भाणी = प्रभु को अच्छी लगी। निकाणी = बेमुथाज। भारा तोली = भार वाले तोल वाली। मुकति = विकारों से मुक्ति। जुगति = जीवन की विधि। दरु = दरवाजा।4।
अर्थ: हे प्रभु! मेरे लिए (तो) तू पहाड़ (के समान) ओट है, मैं तुझसे लाखों बार सदके जाती हूँ, जिसने (मेरे अंदर से) भटकना वाली दूरी मिटा दी है।
हे भाई! जिस जीव-स्त्री का मन मालिक-प्रभु के साथ पतीज जाता है, वह सारे विकार त्याग देती है। (उसके अंदर से माया के मोह वाले) अंधेरे दूर हो जाते हैं। (जो जीव-स्त्री) प्रभु को अच्छी लगने लग जाती है, वह (दुनिया की ओर से) बे-मुथाज हो जाती है, उसकी जिंदगी कामयाब हो जाती है, वह प्रभु दर पर स्वीकार हो जाती है। उसकी जिंदगी बहुत ही कीमती हो जाती है, भार वाले तोल वाली हो जाती है, उसके लिए वह दरवाजा खुल जाता है जहाँ उसको विकारों से खलासी मिल जाती है और सही जीवन की विधि आ जाती है।
हे नानक! जब से वह प्रभु मेरा सहारा बन गया है, मैं (विकारों, माया के हमलों की ओर से) निडर हो गई हूँ।4।1।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ साजनु पुरखु सतिगुरु मेरा पूरा तिसु बिनु अवरु न जाणा राम ॥ मात पिता भाई सुत बंधप जीअ प्राण मनि भाणा राम ॥ जीउ पिंडु सभु तिस का दीआ सरब गुणा भरपूरे ॥ अंतरजामी सो प्रभु मेरा सरब रहिआ भरपूरे ॥ ता की सरणि सरब सुख पाए होए सरब कलिआणा ॥ सदा सदा प्रभ कउ बलिहारै नानक सद कुरबाणा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ साजनु पुरखु सतिगुरु मेरा पूरा तिसु बिनु अवरु न जाणा राम ॥ मात पिता भाई सुत बंधप जीअ प्राण मनि भाणा राम ॥ जीउ पिंडु सभु तिस का दीआ सरब गुणा भरपूरे ॥ अंतरजामी सो प्रभु मेरा सरब रहिआ भरपूरे ॥ ता की सरणि सरब सुख पाए होए सरब कलिआणा ॥ सदा सदा प्रभ कउ बलिहारै नानक सद कुरबाणा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: न जाणा = मैं नहीं जानता। सुत = पुत्र। बंधप = सन्बंधी। जीअ = जिंद। मनि = मन में। भाणा = प्यारा लगता है।
जीउ = जिंद। पिंडु = शरीर। अंतरजामी = दिलों की जानने वाला। सरब = सब जीवों में। ता की = उस प्रभु की। कलिआणा = सुख आनंद। कउ = को, से। सद = सदा।1।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘तिस का’ में से ‘तिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘का’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! गुरु महापुरुष ही मेरा (असल) सज्जन है, उस (गुरु) के बिना मैं किसी और को नहीं जानता (जो मुझे परमात्मा की समझ दे सके)। हे भाई! (गुरु मुझे) मन में (ऐसे) प्यारा लग रहा है (जैसे) माता, पिता, पुत्र, संबंधी, जिंद, प्राण (प्यारे लगते हैं)।
हे भाई! (गुरु ने यह समझ बख्शी है कि) जिंद-शरीर सब कुछ उस (परमात्मा) का दिया हुआ है, (वह परमात्मा) सारे गुणों से भरपूर है। (गुरु ने ही मति दी है कि) हरेक के दिल की जानने वाला मेरा वह प्रभु सब जगह व्यापक है। उसकी शरण पड़ने से सारे सुख-आनंद मिलते हैं।
हे नानक! (कह: गुरु की कृपा से ही) मैं परमात्मा से सदा ही सदा ही सदा ही सदके कुर्बान जाता हूँ।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ऐसा गुरु वडभागी पाईऐ जितु मिलिऐ प्रभु जापै राम ॥ जनम जनम के किलविख उतरहि हरि संत धूड़ी नित नापै राम ॥ हरि धूड़ी नाईऐ प्रभू धिआईऐ बाहुड़ि जोनि न आईऐ ॥ गुर चरणी लागे भ्रम भउ भागे मनि चिंदिआ फलु पाईऐ ॥ हरि गुण नित गाए नामु धिआए फिरि सोगु नाही संतापै ॥ नानक सो प्रभु जीअ का दाता पूरा जिसु परतापै ॥२॥

मूलम्

ऐसा गुरु वडभागी पाईऐ जितु मिलिऐ प्रभु जापै राम ॥ जनम जनम के किलविख उतरहि हरि संत धूड़ी नित नापै राम ॥ हरि धूड़ी नाईऐ प्रभू धिआईऐ बाहुड़ि जोनि न आईऐ ॥ गुर चरणी लागे भ्रम भउ भागे मनि चिंदिआ फलु पाईऐ ॥ हरि गुण नित गाए नामु धिआए फिरि सोगु नाही संतापै ॥ नानक सो प्रभु जीअ का दाता पूरा जिसु परतापै ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: वडभागी = बड़े भाग्यों वाले। पाईऐ = मिलता है। जितु = जिससे। जितु मिलिऐ = जिस (गुरु) के मिलने से। जापै = समझ में आ जाती है। किलविख = पाप (सारे)। उतरहि = उतर जाते हैं (बहुवचन)। नापै = स्नान होता रहता है। नाईऐ = स्नान कर सकते हैं। धिआईऐ = स्मरण किया जा सकता है। बाहुड़ि = दोबारा। लागे = लग के। मनि चिंदिआ = मन में चितारा हुआ। सोगु = ग़म। संतापै = दुख-कष्ट। जीअ = जिंद, आत्मिक जीवन।2।
अर्थ: हे भाई! ऐसा गुरु बड़े भाग्यों से मिलता है, जिसके मिलने से (हृदय में) परमात्मा की समझ पड़ने लग जाती है, अनेक जन्मों के (सारे) पाप दूर हो जाते हैं, और हरि के संत जनों के चरणों की धूल में सदा स्नान होता रहता है। (जिस गुरु के मिलने से) प्रभु के संत जनों की चरण-धूल में स्नान हो सकता है, प्रभु का स्मरण हो सकता है और दोबारा जन्मों के चक्कर में नहीं पड़ते।
हे भाई! गुरु के चरणों में लग के भ्रम-डर नाश हो जाते हैं, मन में चितरे हुए हरेक फल प्राप्त हो जाते हैं। (गुरु की शरण पड़ कर जिस मनुष्य ने) सदा परमात्मा के गुण गाए हैं; परमात्मा का नाम स्मरण किया है, उसको फिर कोई ग़म कोई दुख-कष्ट छू नहीं सकता।
हे नानक! (गुरु की कृपा से समझ आ जाती है कि) जिस परमात्मा का पूरा प्रताप है, वही जिंद देने वाला (आत्मिक जीवन देने वाला है)।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि हरे हरि गुण निधे हरि संतन कै वसि आए राम ॥ संत चरण गुर सेवा लागे तिनी परम पद पाए राम ॥ परम पदु पाइआ आपु मिटाइआ हरि पूरन किरपा धारी ॥ सफल जनमु होआ भउ भागा हरि भेटिआ एकु मुरारी ॥ जिस का सा तिन ही मेलि लीआ जोती जोति समाइआ ॥ नानक नामु निरंजन जपीऐ मिलि सतिगुर सुखु पाइआ ॥३॥

मूलम्

हरि हरे हरि गुण निधे हरि संतन कै वसि आए राम ॥ संत चरण गुर सेवा लागे तिनी परम पद पाए राम ॥ परम पदु पाइआ आपु मिटाइआ हरि पूरन किरपा धारी ॥ सफल जनमु होआ भउ भागा हरि भेटिआ एकु मुरारी ॥ जिस का सा तिन ही मेलि लीआ जोती जोति समाइआ ॥ नानक नामु निरंजन जपीऐ मिलि सतिगुर सुखु पाइआ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुण निधे = गुणों का खजाना। कै वसि = के वश में। परम पदु = सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा। आपु = स्वै भाव। सफल = कामयाब। भउ = (हरेक) डर। भेटिआ = मिला। मुरारी = (मुर+अरि। अरि = वैरी) परमात्मा। सा = था, पैदा किया था। तिन ही = उसने ही। नामु निरंजन = निरंजन का नाम। निरंजन = (निर+अंजन। अंजन = माया के मोह की कालिख) निर्लिप। मिलि = मिल के।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘तिन ही’ में से ‘तिनि’ की ‘नि’ की ‘ि’ मात्रा ‘ही’ क्रिया विशेषण के कारण हट गई है।
नोट: ‘जिस का’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘का’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! सारे गुणों का खजाना परमात्मा संत जनों के (प्यार के) बस में टिका रहता है। जो मनुष्य संतजनों के चरण पड़ के गुरु की सेवा में लगे, उन्होंने सबसे ऊँचे आत्मिक दर्जे प्राप्त कर लिए।
हे भाई! जिस मनुष्य पर पूर्ण प्रभु ने मेहर की, (उसने अपने अंदर से) स्वै भाव दूर कर लिया, उसने सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल करा लिया। उसकी जिंदगी कामयाब हो गई, उसका (हरेक) डर दूर हो गया, उसको वह परमात्मा मिल गया जो एक स्वयं ही स्वयं है। जिस परमात्मा का वह पैदा किया हुआ था, उसने ही (उसको अपने चरणों में) मिला लिया, उस मनुष्य की जिंद परमात्मा की ज्योति में एक-मेक हो गई।
हे नानक! निर्लिप प्रभु का नाम (सदा) जपना चाहिए, (जिसने) गुरु को मिल के (नाम जपा, उसने) आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गाउ मंगलो नित हरि जनहु पुंनी इछ सबाई राम ॥ रंगि रते अपुने सुआमी सेती मरै न आवै जाई राम ॥ अबिनासी पाइआ नामु धिआइआ सगल मनोरथ पाए ॥ सांति सहज आनंद घनेरे गुर चरणी मनु लाए ॥ पूरि रहिआ घटि घटि अबिनासी थान थनंतरि साई ॥ कहु नानक कारज सगले पूरे गुर चरणी मनु लाई ॥४॥२॥५॥

मूलम्

गाउ मंगलो नित हरि जनहु पुंनी इछ सबाई राम ॥ रंगि रते अपुने सुआमी सेती मरै न आवै जाई राम ॥ अबिनासी पाइआ नामु धिआइआ सगल मनोरथ पाए ॥ सांति सहज आनंद घनेरे गुर चरणी मनु लाए ॥ पूरि रहिआ घटि घटि अबिनासी थान थनंतरि साई ॥ कहु नानक कारज सगले पूरे गुर चरणी मनु लाई ॥४॥२॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मंगलो = मंगल, खुशी के गीत, महिमा के गीत। हरि जनहु = हे संत जनो! पुंनी = पूरी हो जाती है। इछ = इच्छा, जरूरत। सबाई = सारी। रंगि = प्रेम रंग में। सेती = साथ। न आवै जाई = (जो) पैदा होता मरता नहीं। अबिनासी = नाश रहित। सगल = सारे। सहज = आत्मिक अडोलता। घनेरे = बहुत। पूरि रहिआ = व्यापक है। घटि घटि = हरेक शरीर में। थान थनंतरि = स्थान स्थान अंतर, हरेक जगह में। साई = वह (प्रभु) ही। लाई = लगा के।4।
अर्थ: हे संत जनो! सदा (परमात्मा की) महिमा के गीत गाया करो, (महिमा के प्रताप से) हरेक मुराद पूरी हो जाती है। जो प्रभु कभी जनम-मरन के चक्कर में नहीं आता (महिमा की इनायत से मनुष्य) उस मालिक के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं।
जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम स्मरण किया उसने नाश-रहित प्रभु का मिलाप हासिल कर लिया, उसने सारी मुरादें हासिल कर लीं। हे भाई! गुरु के चरणों में मन जोड़ के मनुष्य शांति प्राप्त करता है, आत्मिक अडोलता में आनंद लेता है। हे नानक! कह: (हे भाई!) गुरु के चरणों में मन लगा के सारे काम सफल हो जाते हैं, (नाम-जपने की इनायत से यह निश्चय बन जाता है कि) नाश-रहित परमात्मा ही हरेक जगह में हरेक शरीर में व्याप रहा है।4।2।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ करि किरपा मेरे प्रीतम सुआमी नेत्र देखहि दरसु तेरा राम ॥ लाख जिहवा देहु मेरे पिआरे मुखु हरि आराधे मेरा राम ॥ हरि आराधे जम पंथु साधे दूखु न विआपै कोई ॥ जलि थलि महीअलि पूरन सुआमी जत देखा तत सोई ॥ भरम मोह बिकार नाठे प्रभु नेर हू ते नेरा ॥ नानक कउ प्रभ किरपा कीजै नेत्र देखहि दरसु तेरा ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ करि किरपा मेरे प्रीतम सुआमी नेत्र देखहि दरसु तेरा राम ॥ लाख जिहवा देहु मेरे पिआरे मुखु हरि आराधे मेरा राम ॥ हरि आराधे जम पंथु साधे दूखु न विआपै कोई ॥ जलि थलि महीअलि पूरन सुआमी जत देखा तत सोई ॥ भरम मोह बिकार नाठे प्रभु नेर हू ते नेरा ॥ नानक कउ प्रभ किरपा कीजै नेत्र देखहि दरसु तेरा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: प्रीतम = हे प्रीतम! देखहि = देखते रहें। जिहवा = जीभ। पिआरे = हे प्यारे! आराधे = जपता रहे। जम पंथु = यमराज का रास्ता। साधे = जीत ले। न विआपै = जोर ना डाल सके। जलि = जल में। थलि = धरती में। महीअलि = धरती की तह पर, अंतरिक्ष में, आकाश में, मही तलि। जत = जिधर। देखां = देखूँ। तत = उधर।1।
अर्थ: हे मेरे प्रीतम! हे मेरे स्वामी! मेहर कर, मेरी आँखें तेरे दर्शन करती रहें। हे मेरे प्यारे! मुझे लाख जीभें दे (मेरी जीभें तेरा नाम जपती रहें। मेहर कर) मेरा मुँह तेरा हरि-नाम जपता रहे। (मेरा मुँह) तेरा नाम जपता रहे (जिससे) यमराज वाला रास्ता जीता जा सके, और कोई भी दुख (मेरे पर अपना) जोर ना डाल सके। पानी में, धरती में, आकाश में व्यापक हे स्वामी! (मेहर कर) मैं जिधर देखूँ, उधर (मुझे) वह तेरा ही रूप दिखे।
हे भाई! (हरि-नाम जपने की इनायत से) सारे भ्रम, सारे मोह, सारे विकार नाश हो जाते हैं, परमात्मा नजदीक से नजदीक दिखाई देने लग जाता है।
हे प्रभु! नानक पर मेहर कर, (नानक की) आँखें (हर जगह) तेरा ही दर्शन करती रहें।1।

[[0781]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

कोटि करन दीजहि प्रभ प्रीतम हरि गुण सुणीअहि अबिनासी राम ॥ सुणि सुणि इहु मनु निरमलु होवै कटीऐ काल की फासी राम ॥ कटीऐ जम फासी सिमरि अबिनासी सगल मंगल सुगिआना ॥ हरि हरि जपु जपीऐ दिनु राती लागै सहजि धिआना ॥ कलमल दुख जारे प्रभू चितारे मन की दुरमति नासी ॥ कहु नानक प्रभ किरपा कीजै हरि गुण सुणीअहि अविनासी ॥२॥

मूलम्

कोटि करन दीजहि प्रभ प्रीतम हरि गुण सुणीअहि अबिनासी राम ॥ सुणि सुणि इहु मनु निरमलु होवै कटीऐ काल की फासी राम ॥ कटीऐ जम फासी सिमरि अबिनासी सगल मंगल सुगिआना ॥ हरि हरि जपु जपीऐ दिनु राती लागै सहजि धिआना ॥ कलमल दुख जारे प्रभू चितारे मन की दुरमति नासी ॥ कहु नानक प्रभ किरपा कीजै हरि गुण सुणीअहि अविनासी ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कोटि करन = करोड़ों कान। दीजहि = दिए जाएं। प्रभ = हे प्रभु! सुणीअहि = सुने जा सकते हैं। सुण = सुन के। निरमलु = पवित्र। कटीऐ = काटी जाए। सिमरि = स्मरण करके। मंगल = खुशी। सुगिआना = आत्मिक जीवन की अच्छी समझ। जपीऐ = जपना चाहिए। सहजि = आत्मिक अडोलता में। कलमल = पाप। जारे = जलाए जाते हैं। चितारे = चिक्त में बसा के। दुरमति = खोटी मति। प्रभ = हे प्रभु!।2।
अर्थ: हे (मेरे) प्रीतम प्रभु! हे अविनाशी हरि! (यदि मुझे) करोड़ों कान दिए जाएं, तो (उनसे) तेरे गुण सुने जा सकें।
हे भाई! (परमात्मा की महिमा) सुन-सुन के ये मन पवित्र हो जाता है, और (आत्मिक) मौत की फाँसी काटी जाती है। अविनाशी प्रभु का नाम स्मरण करके जम की फाँसी काटी जाती है (अंतरात्मे) खुशियां ही खुशियां बन जाती हैं, आत्मिक जीवन की समझ पैदा हो जाती है। हे भाई! दिन-रात परमात्मा का नाम जपना चाहिए, (नाम की इनायत से) आत्मिक अडोलता में तवज्जो टिकी रहती है। प्रभु का नाम चिक्त में बसाने से सारे पाप, सारे दुख जल जाते हैं, मन की खोटी मति नाश हो जाती हैं।
हे नानक! कह: हे प्रभु! अगर तू मेहर करे, तो तेरे गुण (इन कानों से) सुने जाएं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

करोड़ि हसत तेरी टहल कमावहि चरण चलहि प्रभ मारगि राम ॥ भव सागर नाव हरि सेवा जो चड़ै तिसु तारगि राम ॥ भवजलु तरिआ हरि हरि सिमरिआ सगल मनोरथ पूरे ॥ महा बिकार गए सुख उपजे बाजे अनहद तूरे ॥ मन बांछत फल पाए सगले कुदरति कीम अपारगि ॥ कहु नानक प्रभ किरपा कीजै मनु सदा चलै तेरै मारगि ॥३॥

मूलम्

करोड़ि हसत तेरी टहल कमावहि चरण चलहि प्रभ मारगि राम ॥ भव सागर नाव हरि सेवा जो चड़ै तिसु तारगि राम ॥ भवजलु तरिआ हरि हरि सिमरिआ सगल मनोरथ पूरे ॥ महा बिकार गए सुख उपजे बाजे अनहद तूरे ॥ मन बांछत फल पाए सगले कुदरति कीम अपारगि ॥ कहु नानक प्रभ किरपा कीजै मनु सदा चलै तेरै मारगि ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हसत = हस्त, हाथ। कमावहि = कमा रहे हैं, कर रहे हैं। चलहि = चल रहे हैं। मारगि = रास्ते पर। भव सागर = संसार समुंदर। नाव = बेड़ी। सेवा = भक्ति। तिसु = उसको। तारगि = पार लंघा देगी। भवजलु = संसार समुंदर। सगले = सारे। मनोरथ = मुरादें। बाजे = बज पड़े। अनहद = एक रस। तूरे = बाजे, नरसिंघे। मन बांछत = मन माँगे। कीम = कीमत। अपारगि = अपार, बेअंत। प्रभ = हे प्रभु! तेरै मारगि = तेरे राह पर।3।
अर्थ: हे प्रभु! (जिस पर तेरी मेहर होती है उन जीवों के) करोड़ों हाथ तेरी टहल कर रहे हैं (उन जीवों के करोड़ो) पैर तेरे रास्ते पर चल रहे हैं।
हे भाई! संसार-समुंदर (से पार लांघने के लिए) परमात्मा की भक्ति (जीवों के लिए) बेड़ी है, जो जीव (इस बेड़ी में) सवार होता है, उसको (प्रभु) पार लंघा देता है। जिसने भी परमात्मा का नाम स्मरण किया, वह संसार-समुंदर से पार लांघ गया, उसकी सारी मुरादें प्रभु पूरी कर देता है। (उसके अंदर से) बड़े-बड़े विकार दूर हो जाते हैं (उसके अंदर सुख पैदा हो जाते हैं) (मानो) एक रस बाजे बज उठे हैं। (उस मनुष्य ने) सारी मन-मांगी मुरादें हासिल कर लीं। (हे प्रभु!) तेरी इस कुदरत का मूल्य नहीं पाया जा सकता।
हे नानक! कह: हे प्रभु! (मेरे पर भी) मेहर कर, (मेरा) मन सदा तेरे रास्ते पर चलता रहे।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

एहो वरु एहा वडिआई इहु धनु होइ वडभागा राम ॥ एहो रंगु एहो रस भोगा हरि चरणी मनु लागा राम ॥ मनु लागा चरणे प्रभ की सरणे करण कारण गोपाला ॥ सभु किछु तेरा तू प्रभु मेरा मेरे ठाकुर दीन दइआला ॥ मोहि निरगुण प्रीतम सुख सागर संतसंगि मनु जागा ॥ कहु नानक प्रभि किरपा कीन्ही चरण कमल मनु लागा ॥४॥३॥६॥

मूलम्

एहो वरु एहा वडिआई इहु धनु होइ वडभागा राम ॥ एहो रंगु एहो रस भोगा हरि चरणी मनु लागा राम ॥ मनु लागा चरणे प्रभ की सरणे करण कारण गोपाला ॥ सभु किछु तेरा तू प्रभु मेरा मेरे ठाकुर दीन दइआला ॥ मोहि निरगुण प्रीतम सुख सागर संतसंगि मनु जागा ॥ कहु नानक प्रभि किरपा कीन्ही चरण कमल मनु लागा ॥४॥३॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: एहो = ये ही। वरु = बख्शीश। वड भागा = बड़ी किस्मत। रस = स्वादिष्ट पदार्थ। करण कारण = सारे जगत का मूल। करण = जगत। ठाकुर = हे ठाकुर! दीन दइआला = हे दीनों पर दया करने वाले! मोहि निरगुण मनु = मैं गुण हीन का मन। प्रीतम = हे प्रीतम! सुख सागर = हे सुखों के समुंदर! संत संगि = संत जनों की संगति में। प्रभ = हे प्रभु!।4।
अर्थ: हे भाई! (जिस मनुष्य का) मन परमात्मा के चरणों में जुड़ जाता है, (जिसका) मन प्रभु के चरणों में लीन हो जाता है, जो मनुष्य जगत के मूल गोपाल के चरणों में पड़ा रहता है नाम में टिके रहना ही उस मनुष्य के लिए बख्शिश है, यही (उसके वास्ते) बड़ाई है उपमा है, उसके वास्ते धन है, यही उसके वास्ते बड़ी किस्मत है, यही है उसके लिए दुनिया का रंग-तमाशा और सारे स्वादिष्ट पदार्थों का भोगना।
हे मेरे प्रभु! हे मेरे ठाकुर! हे दीनों पर दया करने वाले! हरेक दाति (हम जीवों को) तेरी ही बख्शी हुई है। हे मेरे प्रीतम! हे सुखों के समुंदर! (तेरी मेहर से) मुझ गुण-हीन का मन संतजनों की संगति में (रह के माया के मोह की नींद में से) जाग पड़ा है।
हे नानक! कह: हे प्रभु! (जब) तूने मेहर की, तो (मेरा) मन (तेरे) सोहाने चरणों में लीन हो गया।4।3।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ हरि जपे हरि मंदरु साजिआ संत भगत गुण गावहि राम ॥ सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना सगले पाप तजावहि राम ॥ हरि गुण गाइ परम पदु पाइआ प्रभ की ऊतम बाणी ॥ सहज कथा प्रभ की अति मीठी कथी अकथ कहाणी ॥ भला संजोगु मूरतु पलु साचा अबिचल नीव रखाई ॥ जन नानक प्रभ भए दइआला सरब कला बणि आई ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ हरि जपे हरि मंदरु साजिआ संत भगत गुण गावहि राम ॥ सिमरि सिमरि सुआमी प्रभु अपना सगले पाप तजावहि राम ॥ हरि गुण गाइ परम पदु पाइआ प्रभ की ऊतम बाणी ॥ सहज कथा प्रभ की अति मीठी कथी अकथ कहाणी ॥ भला संजोगु मूरतु पलु साचा अबिचल नीव रखाई ॥ जन नानक प्रभ भए दइआला सरब कला बणि आई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हरि जपे = हरि का नाम जपने के लिए। मंदरु = घर। हरि साजिआ = हरि ने बनाया है। गावहि = गाते हैं। सिमरि = सिमरि के। सगले = सारे। तजावहि = दूर करवा लेते हैं। गाइ = गा के। परम पदु = सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा। सहज कथा = आत्मिक अडोलता पैदा करने वाली कथा। कथा = महिमा। कथी = (संत जनों ने) बयान की। अकथ = जिसका सही रूप बयान ना किया जा सके। अकथ कहाणी = परमात्मा की महिमा। भला = शुभ। संजोगु = मिलाप (का समय)। मूरतु = महूरत। साचा = सदा स्थिर रहने वाला। अबिचल = ना हिलने वाला। नीव = नींव। अबिचल नीव = कभी ना हिलने वाली नींव, बहुत ही पक्की नींव, महिमा की पक्की नीव। कला = ताकत।1।
अर्थ: हे भाई! (मनुष्य का ये शरीर-) घर परमात्मा ने नाम जपने के लिए बनाया है, (इस घर में) संत जन भक्त जन (परमात्मा के) गुण गाते रहते हैं। अपने मालिक प्रभु (का नाम) हर वक्त स्मरण कर-कर के (संत जन अपने अंदर से) सारे पाप दूर कर लेते हैं।
हे भाई! (इस शरीर घर में संत-जनों ने) परमात्मा की पवित्र महिमा की वाणी गा के, परमात्मा के गुण गा के सबसे उच्च आत्मिक दर्जा प्राप्त किया है। (इस शरीर-घर में संत-जनों ने) उस परमात्मा की महिमा की है जिसका सही स्वरूप बयान नहीं किया जा सकता, उस प्रभु की अत्यंत मीठी महिमा की है जो आत्मिक अडोलता पैदा करती है।
हे दास नानक! (जिस मनुष्य पर) प्रभु जी दयावान होते हैं (उसके शरीर-घर में वह) शुभ संजोग आ बनता है, वह सदा कायम रहने वाला महूरत आ बनता है जब (परमात्मा के महिमा करने की) कभी ना हिलने वाली नींव रखी जाती है (और, जिस के अंदर ये नींव रखी जाती है, उसके अंदर) मजबूत आत्मिक शक्ति पैदा हो जाती है।

विश्वास-प्रस्तुतिः

आनंदा वजहि नित वाजे पारब्रहमु मनि वूठा राम ॥ गुरमुखे सचु करणी सारी बिनसे भ्रम भै झूठा राम ॥ अनहद बाणी गुरमुखि वखाणी जसु सुणि सुणि मनु तनु हरिआ ॥ सरब सुखा तिस ही बणि आए जो प्रभि अपना करिआ ॥ घर महि नव निधि भरे भंडारा राम नामि रंगु लागा ॥ नानक जन प्रभु कदे न विसरै पूरन जा के भागा ॥२॥

मूलम्

आनंदा वजहि नित वाजे पारब्रहमु मनि वूठा राम ॥ गुरमुखे सचु करणी सारी बिनसे भ्रम भै झूठा राम ॥ अनहद बाणी गुरमुखि वखाणी जसु सुणि सुणि मनु तनु हरिआ ॥ सरब सुखा तिस ही बणि आए जो प्रभि अपना करिआ ॥ घर महि नव निधि भरे भंडारा राम नामि रंगु लागा ॥ नानक जन प्रभु कदे न विसरै पूरन जा के भागा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नित = सदा। वजहि = बजते रहते हैं। मनि = (जिस मनुष्य के) मन में। वूठा = आ बसता है। गुरमुखे = गुरु के सन्मुख रह के। सचु = सदा स्थिर हरि नाम का स्मरण। सारी = श्रेष्ठ। करणी = कतव्र्य। भै = सारे डर। अनहद = एक रस। वखाणी = उचारी, उचारता है। जसु = महिमा। सुणि = सुन के। हरिआ = हरा भरा, आत्मिक जीवन वाला। प्रभि = प्रभु ने। नव निधि = नौ खजाने, धरती के सारे खजाने। नामि = नाम में। रंगु = प्यार। जा के = जिस जन के।2।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘भै’ है ‘भउ’ का बहुवचन।
नोट: ‘तिस ही’ में से ‘तिसु’ की ‘सु’ की ‘ु’ मात्रा ‘ही’ क्रिया विशेषण के कारण हट गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! (महिमा की ‘अविचल नींव’ की इनायत से जिस मनुष्य के) मन में परमात्मा आ बसता है (उसके शरीर-मन्दिर में आत्मिक) आनंद के सदैव (मानो) बाजे बजते रहते हैं, (उसके शरीर-घर में से) सारे भ्रम-डर झूठ नाश हो जाते हैं, गुरु के सन्मुख रह के सदा-स्थिर हरि-नाम स्मरणा (उस मनुष्य का) श्रेष्ठ कर्तव्य बन जाता है।
हे भाई! गुरु के सन्मुख रहने वाला वह मनुष्य सदा एक-रस महिमा की वाणी उचारता रहता है, परमात्मा की महिमा सुन-सुन के उसका मन उसका तन आत्मिक जीवन वाला हो जाता है। हे भाई! जिस मनुष्य को परमात्मा ने अपना (प्यारा) बना लिया, सारे सुख उसके अंदर आ एकत्र हुए। हे भाई! परमात्मा के नाम में जिस मनुष्य का प्यार बन जाता है, उसके (हृदय-) घर में (मानो, धरती के) सारे खजाने और भण्डार भर जाते हैं।
हे नानक! जिस दास के पूरे भाग्य जाग पड़ते हैं, उसको परमात्मा कभी नहीं भूलता।2।

[[0782]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

छाइआ प्रभि छत्रपति कीन्ही सगली तपति बिनासी राम ॥ दूख पाप का डेरा ढाठा कारजु आइआ रासी राम ॥ हरि प्रभि फुरमाइआ मिटी बलाइआ साचु धरमु पुंनु फलिआ ॥ सो प्रभु अपुना सदा धिआईऐ सोवत बैसत खलिआ ॥ गुण निधान सुख सागर सुआमी जलि थलि महीअलि सोई ॥ जन नानक प्रभ की सरणाई तिसु बिनु अवरु न कोई ॥३॥

मूलम्

छाइआ प्रभि छत्रपति कीन्ही सगली तपति बिनासी राम ॥ दूख पाप का डेरा ढाठा कारजु आइआ रासी राम ॥ हरि प्रभि फुरमाइआ मिटी बलाइआ साचु धरमु पुंनु फलिआ ॥ सो प्रभु अपुना सदा धिआईऐ सोवत बैसत खलिआ ॥ गुण निधान सुख सागर सुआमी जलि थलि महीअलि सोई ॥ जन नानक प्रभ की सरणाई तिसु बिनु अवरु न कोई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: छाइआ = छाया। प्रभि = प्रभु ने। छत्रपति = पातशाह। प्रभि छत्रपति = प्रभु पातशाह ने। सगली = सारी। तपति = तपस, जलन। ढाठा = गिर पड़ा। कारजु = जीवन उद्देश्य। आइआ रासी = कामयाब हो गया। साचु धरमु = सदा स्थिर हरि नाम स्मरण (वाला) धर्म। साचु पुंनु = सदा स्थिर हरि नाम स्मरण वाला नेक कर्म। फलिआ = फलना आरम्भ हुआ, बढ़ना शुरू हुआ।
धिआईऐ = स्मरणा चाहिए। सोवत बैसत खलिआ = सोते हुए, बैठे हुए और खड़े रह के। निधान = खजाना। सागरु = समुंदर। जलि = जल में। थलि = थल में। महीअलि = मही तलि, धरती की तह पर, आकाश में, अंतरिक्ष में।3।
अर्थ: हे भाई! प्रभु पातशाह ने (जिस मनुष्य के सिर पर) अपना हाथ रखा, (उसके अंदर से विकारों की) सारी जलन नाश हो गई, (उसके अंदर से) दुखों का विकारों का अड्डा ही गिर गया, उस मनुष्य का जीवन-उद्देश्य कामयाब हो गया। हरि-प्रभु ने हुक्म दे दिया (और, उस मनुष्य के अंदर से माया) बला (का प्रभाव) खत्म हो गया, सदा स्थिर हरि-नाम स्मरण का परम पून्य (उसके अंदर) बढ़ना शुरू हो गया।
हे भाई! सोते हुए बैठे हुए और खड़े हुए (हर वक्त) उस परमात्मा का ध्यान धरना चाहिए। हे दास नानक! (जो मनुष्य ध्यान धरता है, उस को) वह गुणों के खजाने प्रभु सुखों का समुंदर प्रभु, पानी में, धरती में, आकाश में (हर जगह व्यापक) दिखता है, वह मनुष्य प्रभु की शरण में पड़ा रहता है, उस (प्रभु) के बिना उसको कोई अन्य आसरा नहीं दिखता।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मेरा घरु बनिआ बनु तालु बनिआ प्रभ परसे हरि राइआ राम ॥ मेरा मनु सोहिआ मीत साजन सरसे गुण मंगल हरि गाइआ राम ॥ गुण गाइ प्रभू धिआइ साचा सगल इछा पाईआ ॥ गुर चरण लागे सदा जागे मनि वजीआ वाधाईआ ॥ करी नदरि सुआमी सुखह गामी हलतु पलतु सवारिआ ॥ बिनवंति नानक नित नामु जपीऐ जीउ पिंडु जिनि धारिआ ॥४॥४॥७॥

मूलम्

मेरा घरु बनिआ बनु तालु बनिआ प्रभ परसे हरि राइआ राम ॥ मेरा मनु सोहिआ मीत साजन सरसे गुण मंगल हरि गाइआ राम ॥ गुण गाइ प्रभू धिआइ साचा सगल इछा पाईआ ॥ गुर चरण लागे सदा जागे मनि वजीआ वाधाईआ ॥ करी नदरि सुआमी सुखह गामी हलतु पलतु सवारिआ ॥ बिनवंति नानक नित नामु जपीऐ जीउ पिंडु जिनि धारिआ ॥४॥४॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: घरु = (शरीर-) घर। बनिआ = सुंदर बन गया है। बनु = बाग (शरीर)। तालु = (हृदय) तालाब। प्रभ परसे = जब प्रभ (के चरण) छूए। हरि राइआ = प्रभु पातशाह। सोहिआ = सुंदर बन गया। मीत साजन = मेरे मित्र सज्जन, मेरी सारी ज्ञान-इंद्रिय। सरसे = आत्मिक रस वाले हो गए, आत्मिक जीवन वाले बन गए हैं। मंगल = महिमा के गीत।
गाइ = गा के। धिआइ = स्मरण करके। साचा = सदा स्थिर प्रभु। सगल = सारी। जागे = (माया के हमलों की ओर से) सचेत हो गए। मनि = मन में। वजीआ वाधाईआ = उत्साह बना रहने लग पड़ा। करी = की। नदरि = मेहर की निगाह। सूखह गामी = सुख पहुँचाने वाले ने। हलतु = यह लोक। पलतु = परलोक। जपीऐ = जपना चाहिए। जिउ = जिंद। पिंडु = शरीर। जिनि = जिस (परमात्मा) ने।4।
अर्थ: हे भाई! (जब से) प्रभु-पातशाह के चरण परसे हैं, मेरा शरीर मेरा हृदय (सब कुछ) सुंदर (सुंदर आत्मिक रंगत वाला) बन गया है (जब से) मैंने परमात्मा की महिमा के गीत गाने शुरू किए हैं, मेरा मन सुंदर (सोहणे संस्कारों वाला) हो गया है, मेरे सारे मित्र (सारी ज्ञान-इंद्रिय) आत्मिक जीवन वाली बन गई हैं।
हे भाई! प्रभु के गुण गा के सदा-स्थिर हरि का नाम स्मरण करके सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं। जो मनुष्य गुरु की चरणी लगते हैं, वे (माया के हमलों की ओर से) सदा सचेत रहते हैं, उनके अंदर उत्साह-भरा आत्मिक जीवन बना रहता है।
हे भाई! सुखों के दाते मालिक-प्रभु ने (जिस मनुष्य पर) मेहर की निगाह की, (उसका उसने) ये लोक और परलोक दोनों सुंदर बना दिए। नानक विनती करता है: हे भाई! जिस (परमात्मा) ने यह जिंद और यह शरीर टिका के रखे हैं, उसका नाम सदा जपना चाहिए।4।4।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ भै सागरो भै सागरु तरिआ हरि हरि नामु धिआए राम ॥ बोहिथड़ा हरि चरण अराधे मिलि सतिगुर पारि लघाए राम ॥ गुर सबदी तरीऐ बहुड़ि न मरीऐ चूकै आवण जाणा ॥ जो किछु करै सोई भल मानउ ता मनु सहजि समाणा ॥ दूख न भूख न रोगु न बिआपै सुख सागर सरणी पाए ॥ हरि सिमरि सिमरि नानक रंगि राता मन की चिंत मिटाए ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ भै सागरो भै सागरु तरिआ हरि हरि नामु धिआए राम ॥ बोहिथड़ा हरि चरण अराधे मिलि सतिगुर पारि लघाए राम ॥ गुर सबदी तरीऐ बहुड़ि न मरीऐ चूकै आवण जाणा ॥ जो किछु करै सोई भल मानउ ता मनु सहजि समाणा ॥ दूख न भूख न रोगु न बिआपै सुख सागर सरणी पाए ॥ हरि सिमरि सिमरि नानक रंगि राता मन की चिंत मिटाए ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भै = सारे डर। भै सागर = अनेक डरों से भरपूर संसार समुंदर। धिआए = स्मरण करके। बोहिथड़ा = सुंदर जहाज। मिलि = गुरु को मिल के।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘भै’ है ‘भउ’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तरीऐ = पार लांघा जाता है। बहुड़ि = दोबारा। न मरीऐ = आत्मिक मौत नहीं आती। चूकै = समाप्त हो जाता है। करै = (परमात्मा) करता है। भल = भला, अच्छा। मानउ = मैं मानता हूँ। ता = तब। सहजि = आत्मिक अडोलता में। न बिआपै = जोर नहीं डाल सकता। सुख सागर सरणी = सुखों के समुंदर प्रभु की शरण। रंगि = प्रेम रंग में।1।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा का नाम स्मरण कर-कर के अनेक डरों से भरपूर संसार-समुंदर से पार लांघा जाता है। परमात्मा के चरण सुंदर जहाज हैं, (जो मनुष्य) गुरु को मिल के हरि-चरणों की आराधना करता है, (गुरु उसको संसार-समुंदर से) पार लंघा देता है।
हे भाई! गुरु के शब्द के प्रताप से (संसार-समुंदर से) पार लांघा जाया जाता है, बार-बार आत्मिक मौत का शिकार नहीं होना पड़ता, जनम-मरन के चक्कर समाप्त हो जाते हैं। हे भाई! जो कुछ परमात्मा करता है (गुरु के शब्द की इनायत से) मैं उसको भला मानता हूँ। (जब ये रास्ता पकड़ा जाए) तब मन आत्मिक अडोलता में टिक जाता है।
हे भाई! सुखों के समुंदर प्रभु की शरण पड़ने से कोई दुख, कोई रोग कोई भी अपना जोर नहीं डाल सकता। हे नानक! परमात्मा का नाम स्मरण कर-कर के जो मनुष्य (प्रभु के) प्रेम रंग में रंगा जाता है, वह अपने मन की हरेक चिन्ता मिटा लेता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

संत जना हरि मंत्रु द्रिड़ाइआ हरि साजन वसगति कीने राम ॥ आपनड़ा मनु आगै धरिआ सरबसु ठाकुरि दीने राम ॥ करि अपुनी दासी मिटी उदासी हरि मंदरि थिति पाई ॥ अनद बिनोद सिमरहु प्रभु साचा विछुड़ि कबहू न जाई ॥ सा वडभागणि सदा सोहागणि राम नाम गुण चीन्हे ॥ कहु नानक रवहि रंगि राते प्रेम महा रसि भीने ॥२॥

मूलम्

संत जना हरि मंत्रु द्रिड़ाइआ हरि साजन वसगति कीने राम ॥ आपनड़ा मनु आगै धरिआ सरबसु ठाकुरि दीने राम ॥ करि अपुनी दासी मिटी उदासी हरि मंदरि थिति पाई ॥ अनद बिनोद सिमरहु प्रभु साचा विछुड़ि कबहू न जाई ॥ सा वडभागणि सदा सोहागणि राम नाम गुण चीन्हे ॥ कहु नानक रवहि रंगि राते प्रेम महा रसि भीने ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हरि मंत्रु = हरि नाम का मंत्र। द्रिढ़ाइआ = (जिस मनुष्य ने) हृदय में पक्का कर लिया। वसगति = वश में। आगै धरिआ = हवाले कर दिया। सरबसु = (सर्वस्व। स्व = धन) सब कुछ। ठाकुरि = ठाकुर ने।
करि = कर ली, बना ली। उदासी = बाहर भटकते फिरना। हरि मंदरि = हरि के बनाए (शरीर-) घर में। थिति = पक्का ठिकाना। अनद बिनोद = आनंद खुशियां। साचा = सदा कायम रहने वाला।
सा = वह जीव-स्त्री। वडभागणि = बड़े भाग्यों वाली। सुहागणि = सोहाग वाली। चीने = पहचाने, सांझ डाली। नानक = हे नानक! रवहि = (जो मनुष्य हरि नाम) स्मरण करते हैं। रंगि राते = प्यार के रंग में रंगे हुए। प्रेम रसि = प्रेम के स्वाद में। भीने = भीगे रहते हैं।2।
अर्थ: हे भाई! संत जनो ने (जिस जीव-स्त्री के) हृदय में परमात्मा का नाम-मंत्र पक्का कर दिया, प्रभु जी उस जीव-स्त्री के प्रेम-वश हो गए। (उस जीव-स्त्री ने) अपना प्यारा मन (प्रभु-ठाकुर के) आगे भेट कर दिया, (आगे से) ठाकुर-प्रभु ने सब कुछ (उस जीव-स्त्री को) दे दिया। ठाकुर-प्रभु ने उस जीव-स्त्री को अपनी दासी बना लिया, (उसके अंदर से माया आदि के लिए) भटकना समाप्त हो गई, उसने परमात्मा के बनाए इस शरीर-मंदिर में ही ठहराव हासिल कर लिया।
हे भाई! सदा कायम रहने वाले परमात्मा का नाम स्मरण करते रहो (तुम्हारे अंदर) आत्मिक आनंद बने रहेंगे। (जो जीव-स्त्री हरि-नाम सिमरती है, वह प्रभु चरणों से) विछुड़ के कभी भी (किसी और तरफ़) भटकती नहीं। जिसने परमात्मा के नाम से, परमात्मा के गुणों से गहरी सांझ बना ली, वह जीव-स्त्री बड़े भाग्यों वाली बन जाती है, वह सदा प्रभु-पति वाली बनी रहती है।
हे नानक! कह: जो मनुष्य परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगीज के हरि-नाम स्मरण करते हैं, वे मनुष्य प्रेम के बड़े स्वाद में भीगे रहते हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

अनद बिनोद भए नित सखीए मंगल सदा हमारै राम ॥ आपनड़ै प्रभि आपि सीगारी सोभावंती नारे राम ॥ सहज सुभाइ भए किरपाला गुण अवगण न बीचारिआ ॥ कंठि लगाइ लीए जन अपुने राम नाम उरि धारिआ ॥ मान मोह मद सगल बिआपी करि किरपा आपि निवारे ॥ कहु नानक भै सागरु तरिआ पूरन काज हमारे ॥३॥

मूलम्

अनद बिनोद भए नित सखीए मंगल सदा हमारै राम ॥ आपनड़ै प्रभि आपि सीगारी सोभावंती नारे राम ॥ सहज सुभाइ भए किरपाला गुण अवगण न बीचारिआ ॥ कंठि लगाइ लीए जन अपुने राम नाम उरि धारिआ ॥ मान मोह मद सगल बिआपी करि किरपा आपि निवारे ॥ कहु नानक भै सागरु तरिआ पूरन काज हमारे ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बिनोद = (विनोद, pleasure, happiness) खुशी, आनंद। सखीए = हे सहेली! म्ंगल = खुशी। प्रभि = प्रभु ने। आपनड़ै प्रभि = अपने प्यारे प्रभु ने। सीगारी = श्रृंगार दी, सोहणे जीवन वाली बना दी। सहज = आत्मिक अडोलता। सुभाइ = सु भाय, प्यार से। सहज सुभाइ = आत्मिक अडोलता वाले प्यार से। हमारै = मेरे हृदय में। कंठि = गले से। उरि = हृदय में। सगल बिआपी = जिस में सारी सृष्टि फसी हुई है। करि = कर के। निवारे = दूर कर दिए। भै सागरु = भयानक संसार समुंदर।3।
अर्थ: हे सहेली! अब मेरे हृदय-गृह में सदा ही आनंद खुशिया व चाव बने रहते हैं, (क्योंकि) मेरे अपने प्यारे प्रभु ने स्वयं मेरी जिंदगी सुंदर बना दी है, मुझे शोभा वाली जीव-स्त्री बना दी है।
हे सहेली! प्रभु जी अपने सेवकों को (अपने) गले से लगा लेते हैं, (उनके) हृदय में अपना नाम बसा देते हैं। प्रभु जी अपने सेवकों के गुणों-अवगुणों की ओर ध्यान नहीं देते, अपने आत्मिक अडोलता वाले प्यार के कारण ही (सहज-सह जाएते इति सहजं) अपने सेवकों पर दयावान हो जाते हैं।
हे नानक! कह: हे सहेली! अहंकार, माया का मोह, माया का नशा जो सारी सृष्टि पर भारी हो रहे हैं (प्रभु जी ने मेरे पर) मेहर करके (मेरे अंदर से) स्वयं ही दूर कर दिए हैं। (उसकी मेहर से इस) भयानक संसार-समुंदर से मैं पार लांघ रहा हूँ, मेरे सारे काम (भी) सिरे चढ़ रहे हैं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुण गोपाल गावहु नित सखीहो सगल मनोरथ पाए राम ॥ सफल जनमु होआ मिलि साधू एकंकारु धिआए राम ॥ जपि एक प्रभू अनेक रविआ सरब मंडलि छाइआ ॥ ब्रहमो पसारा ब्रहमु पसरिआ सभु ब्रहमु द्रिसटी आइआ ॥ जलि थलि महीअलि पूरि पूरन तिसु बिना नही जाए ॥ पेखि दरसनु नानक बिगसे आपि लए मिलाए ॥४॥५॥८॥

मूलम्

गुण गोपाल गावहु नित सखीहो सगल मनोरथ पाए राम ॥ सफल जनमु होआ मिलि साधू एकंकारु धिआए राम ॥ जपि एक प्रभू अनेक रविआ सरब मंडलि छाइआ ॥ ब्रहमो पसारा ब्रहमु पसरिआ सभु ब्रहमु द्रिसटी आइआ ॥ जलि थलि महीअलि पूरि पूरन तिसु बिना नही जाए ॥ पेखि दरसनु नानक बिगसे आपि लए मिलाए ॥४॥५॥८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गोपाल = सृष्टि का पालनहार। सखीहो = हे सहेलियो! मनोरथ = मुरादें। सफल = कामयाब। मिलि साधू = गुरु को मिल के। एकंकारु = व्यापक प्रभु। धिआए = ध्यान करके, स्मरण करके।
जपि = जप के। रविआ = व्यापक, मौजूद। मंडलि = जगत में। छाइआ = व्यापक। ब्रहमो पसारा = (ये सारा) जगत पसारा परमात्मा ही है। ब्रहमु पसरिआ = परमात्मा (अपने आप का) प्रकाश कर रहा है। सभु = हर जगह। द्रिसटी आइआ = दिखता है।
जलि = जल में। थलि = धरती में। महीअलि = मही तलि, धरती के तल पर, अंतरिक्ष में, आकाश में। जाए = जगह। पेखि = देख के। बिगसे = खिल गए, प्रसन्न चिक्त हो गए।4।
अर्थ: हे सहेलियो! सृष्टि के पालनहार प्रभु के गुण सदा गाया करो, वह सारी मुरादें पूरी कर देता है। गुरु को मिल के सर्व-व्यापक प्रभु का नाम स्मरण करने से जीवन कामयाब हो जाता है।
हे सहेलियो! वह एक परमात्मा अनेक में व्यापक है, सारे जगत में व्यापक है, ये सारा जगत-पसारा प्रभु स्वयं ही है, (सारे जगत में) परमात्मा (अपने आप का) प्रकाश कर रहा है, (उसका नाम) जप के हर जगह वह प्रभु ही दिखाई देने लग पड़ता है।
हे सहेलियो! उस परमात्मा के बिना कोई भी जगह नहीं है (कोई भी जगह उस परमात्मा से खाली नहीं है)। पानी में, धरती में, आकाश में हर जगह वह मौजूद है। हे नानक! (कह: हे सहेलियो! जिनको वह) खुद (अपने चरणों में) जोड़ लेता है, वे (उस सर्व-व्यापक का) दर्शन करके आनंद भरपूर रहते हैं।4।5।8।

[[0783]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ अबिचल नगरु गोबिंद गुरू का नामु जपत सुखु पाइआ राम ॥ मन इछे सेई फल पाए करतै आपि वसाइआ राम ॥ करतै आपि वसाइआ सरब सुख पाइआ पुत भाई सिख बिगासे ॥ गुण गावहि पूरन परमेसुर कारजु आइआ रासे ॥ प्रभु आपि सुआमी आपे रखा आपि पिता आपि माइआ ॥ कहु नानक सतिगुर बलिहारी जिनि एहु थानु सुहाइआ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ अबिचल नगरु गोबिंद गुरू का नामु जपत सुखु पाइआ राम ॥ मन इछे सेई फल पाए करतै आपि वसाइआ राम ॥ करतै आपि वसाइआ सरब सुख पाइआ पुत भाई सिख बिगासे ॥ गुण गावहि पूरन परमेसुर कारजु आइआ रासे ॥ प्रभु आपि सुआमी आपे रखा आपि पिता आपि माइआ ॥ कहु नानक सतिगुर बलिहारी जिनि एहु थानु सुहाइआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अबिचल = कभी नाश ना होने वाले परमात्मा का। जपत = जपते हुए। सुखु = आत्मिक आनंद। मन इछै = मन माँगा, जिस की इच्छा मन में की। सोई = वह (सारे) ही। करतै = कर्तार ने। नगरु = (शरीर) शहर। सरब सूख = सारे सुख। सिख = गुरु के सिख। बिगासे = खिल उठे, प्रसन्न चिक्त। गावहि = गाते हैं। कारजु = मानव जीवन का उद्देश्य। आइआ रासे = सिरे चढ़ जाता है। रखा = रक्षक। माइआ = माँ। सतिगुर बलिहारी = गुरु से सदके। जिनि = जिस (गुरु) ने। थानु = (शरीर-) जगह।
अर्थ: हे भाई! (गुरु की शरण पड़ के जिस मनुष्यों ने) सबसे बड़े गोबिंद का नाम जपते हुए आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया, (उनका शरीर) अविनाशी परमात्मा के रहने के लिए शहर बन गया। कर्तार ने (उस शरीर-शहर को) स्वयं बसाया (अपने रहने योग्य तैयार कर लिया) उन मनुष्यों नेमन-माँगी मुरादें सदा हासिल कीं।
हे भाई! कर्तार ने (जिस मनुष्यों के शरीर को) अपने बसने के लिए तैयार कर लिया, उन्होंने सारे सुख प्राप्त कर लिए, (गुरु के वह) सिख (गुरु के वह) पुत्र (गुरु के वह) भाई सदा प्रसन्न रहते हैं। (वह अति भाग्यशाली मनुष्य) सर्व-व्यापक परमात्मा के गुण गाते रहते हैं, (उन मनुष्यों का) जीवन-उद्देश्य सफल हो जाता है।
हे भाई! (जो मनुष्य परमात्मा का नाम जपते हैं, जिनके शरीर को परमात्मा ने अपने बसने के लिए शहर बना लिया) मालिक-प्रभु (उनके सिर पर) सदा खुद ही रखवाला बना रहता है (जैसे माता-पिता अपने पुत्र का ध्यान रखते हैं, वैसे ही परमात्मा उन मनुष्यों के लिए) खुद ही माँ खुद ही पिता बना रहता है। हे नानक! कह: (हे भाई!) उस गुरु से सदा कुर्बान होता रह, जिसने (हरि-नाम जपने की दाति दे के किसी भाग्यशाली के) इस शरीर-स्थल को सुंदर बना दिया है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

घर मंदर हटनाले सोहे जिसु विचि नामु निवासी राम ॥ संत भगत हरि नामु अराधहि कटीऐ जम की फासी राम ॥ काटी जम फासी प्रभि अबिनासी हरि हरि नामु धिआए ॥ सगल समग्री पूरन होई मन इछे फल पाए ॥ संत सजन सुखि माणहि रलीआ दूख दरद भ्रम नासी ॥ सबदि सवारे सतिगुरि पूरै नानक सद बलि जासी ॥२॥

मूलम्

घर मंदर हटनाले सोहे जिसु विचि नामु निवासी राम ॥ संत भगत हरि नामु अराधहि कटीऐ जम की फासी राम ॥ काटी जम फासी प्रभि अबिनासी हरि हरि नामु धिआए ॥ सगल समग्री पूरन होई मन इछे फल पाए ॥ संत सजन सुखि माणहि रलीआ दूख दरद भ्रम नासी ॥ सबदि सवारे सतिगुरि पूरै नानक सद बलि जासी ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जिसु विचि = जिस (शरीर-नगर) में। घर मंदर हटनाले = (उस शरीर नगर के) घर मंदिर के बाजार, उस शरीर की सारी ज्ञान-इंद्रिय। सोहै = सुंदर बन जाते हैं, सुंदर आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं। अराधहि = आराधना करते हैं, स्मरण करते हैं। कटीऐ = काटी जाती है। प्रभि = प्रभु ने। सगल समग्री = (सामग्री) जम का जंजाल काटने के सारे आवश्यक आत्मिक गुण।

दर्पण-टिप्पनी

(नोट: कड़ाह प्रसादि तैयार करने के लिए घी, चीनी, आटा, पानी, अग्नि-इन चीजों की जरूरत पड़ती है। घी चीनी आटा सामग्री है। जम की फाही आत्मिक मौत को खत्म करने के लिए ये जरूरी है कि सारी ज्ञान-इंद्रिय विकारों की तरफ से मुँह मोड़ चुकी हों। सारे आत्मिक गुणों का संचय सामग्री है)।

दर्पण-भाषार्थ

पूरन = पूर्ण। सुखि = आनंद में (टिक के)। रलीआ = आत्मिक आनंद। सबदि = शब्द के द्वारा। सतिगुरि पूरे = पूरे गुरु ने। सद = सदा। बलि जासी = सदके जाता हूँ।2।
अर्थ: हे भाई! (गुरु की कृपा से) जिस (शरीर-नगर) में परमात्मा का नाम आ बसता है, (उस शरीर की) सारी ज्ञानेन्द्रियाँ सुंदर आत्मिक जीवन वाली बन जाती हैं। (उस शरीर नगर में बैठे) संत जन भक्त जन परमात्मा का नाम स्मरण करते रहते हैं। (नाम-जपने की इनायत से) आत्मिक मौत की फाँसी काटी जाती है।
हे भाई! (गुरु की शरण पड़ कर जिस मनुष्यों ने) परमात्मा का नाम स्मरण किया, अविनाशी प्रभु ने उनकी आत्मिक मौत की फाँसी काट दी। (आत्मिक मौत की फाँसी काटने के लिए उनके अंदर) सारे जरूरी आत्मिक गुण सँपूर्ण हो गए, उनकी मन-वाँछित मुरादें पूरी हो गई।
हे भाई! (गुरु के माध्यम से नाम स्मरण करके) संतजन भक्त जन सुख में (टिक के) आत्मिक आनंद भोगते हैं। (उनके अंदर से) सारे दुख-दर्द और भ्रम नाश हो जाते हैं। हे नानक! (कह: मैं) उस पूरे गुरु से सदा सदके जाता हूँ जिसने (अपने) शब्द के द्वारा (शरण पड़े मनुष्य के) जीवन सुंदर बना दिए।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दाति खसम की पूरी होई नित नित चड़ै सवाई राम ॥ पारब्रहमि खसमाना कीआ जिस दी वडी वडिआई राम ॥ आदि जुगादि भगतन का राखा सो प्रभु भइआ दइआला ॥ जीअ जंत सभि सुखी वसाए प्रभि आपे करि प्रतिपाला ॥ दह दिस पूरि रहिआ जसु सुआमी कीमति कहणु न जाई ॥ कहु नानक सतिगुर बलिहारी जिनि अबिचल नीव रखाई ॥३॥

मूलम्

दाति खसम की पूरी होई नित नित चड़ै सवाई राम ॥ पारब्रहमि खसमाना कीआ जिस दी वडी वडिआई राम ॥ आदि जुगादि भगतन का राखा सो प्रभु भइआ दइआला ॥ जीअ जंत सभि सुखी वसाए प्रभि आपे करि प्रतिपाला ॥ दह दिस पूरि रहिआ जसु सुआमी कीमति कहणु न जाई ॥ कहु नानक सतिगुर बलिहारी जिनि अबिचल नीव रखाई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दाति = (नाम स्मरण की) कृपा। दाति पूरी = पूरी कृपा। चढ़ै सवाई = बढ़ती रहती है। पारब्रहमि = परमात्मा ने। खसमाना = खसम वाला फर्ज, पति वाले फर्ज। वडिआई = सामर्थ्य, महिमा। आदि जुगादि = शुरू से, युगों के आरम्भ से, सदा से ही। दइआला = दयावान। सभि = सारे। प्रभि = प्रभु ने। प्रतिपाला = पालना। दह दिस = दसों तरफ से (चार दिशाएं+चार कोने+ ऊपर+नीचे) सारे जगत में। पूरि रहिआ = बिखरा हुआ है। जसु = यश, शोभा। जिनि = जिस गुरु ने। अबिचल = कभी ना हिलने वाली। नीव = नींव, नाम जपने की नींव।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जिस दी’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘दी’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! (गुरु की कृपा से जिस मनुष्य पर नाम-जपने की) पूर्ण बख्शिश परमात्मा के द्वारा होती है (उसके अंदर यह कृपा) सदा बढ़ती रहती है, क्योंकि जिस परमात्मा की बेअंत सामर्थ्य है उसने खुद उस मनुष्य के सिर पर अपना हाथ रखा होता है।
हे भाई! जगत के आरम्भ से ही परमात्मा अपने भक्तों का रखवाला बना आ रहा है, भक्तों पर दयावान होता आ रहा है। उस प्रभु ने खुद ही सब जीवों की पालना की, उसने स्वयं ही सारे जीवों को सुखी बसाया हुआ है। सारे ही जगत में उसकी शोभा पसरी हुई है, (उसकी महिमा का) मूल्य नहीं बताया जा सकता।
हे नानक! कह: हे भाई! उस गुरु से सदा कुर्बान हो, जिसने कभी ना हिलने वाली (हरि-नाम-जपने की) नींव रखी है (जो गुरु मनुष्य के अंदर परमात्मा का नाम जपने की अहिल नींव रख देता है)।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गिआन धिआन पूरन परमेसुर हरि हरि कथा नित सुणीऐ राम ॥ अनहद चोज भगत भव भंजन अनहद वाजे धुनीऐ राम ॥ अनहद झुणकारे ततु बीचारे संत गोसटि नित होवै ॥ हरि नामु अराधहि मैलु सभ काटहि किलविख सगले खोवै ॥ तह जनम न मरणा आवण जाणा बहुड़ि न पाईऐ जुोनीऐ ॥ नानक गुरु परमेसरु पाइआ जिसु प्रसादि इछ पुनीऐ ॥४॥६॥९॥

मूलम्

गिआन धिआन पूरन परमेसुर हरि हरि कथा नित सुणीऐ राम ॥ अनहद चोज भगत भव भंजन अनहद वाजे धुनीऐ राम ॥ अनहद झुणकारे ततु बीचारे संत गोसटि नित होवै ॥ हरि नामु अराधहि मैलु सभ काटहि किलविख सगले खोवै ॥ तह जनम न मरणा आवण जाणा बहुड़ि न पाईऐ जुोनीऐ ॥ नानक गुरु परमेसरु पाइआ जिसु प्रसादि इछ पुनीऐ ॥४॥६॥९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गिआन = गहरी सांझ। धिआन = तवज्जो जोड़नी, समाधि। कथा = महिमा। नित = सदा। सुणीऐ = सुनी जाती है। भव भंजन = जनम मरण के चक्करों का नाश करने वाला। चोज भगत भव भंजन = भक्तों के जन्मों के चक्कर नाश करने वाले परमात्मा के चोज तमाशे। अनहद = एक रस, लगातार। वाजे धुनीऐ = महिमा की प्रबल धुनि। झुणकारे = कीरतन। गोसटि = चर्चा, वार्तालाप। आराधहि = जपते हैं। सभ = सारी। किलविख = पाप। खोवै = दूर कर देता है (एकवचन)। तह = उस (‘अबिचल नगर’) में, संत जनों के शरीर-नगर में। बहुड़ि = बार बार। न पाईऐ जुोनीऐ = जूनि में नहीं पाया जाता। जिसु प्रसादि = जिस की कृपा से। पुनीऐ = पूरी हो जाती है।4।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जुोनिअै’ में से अक्षर ‘ज’ के साथ दो मात्राएं हैं: ‘ो’ और ‘ु’। असल शब्द है जोनीअै, यहाँ जुनीअै पड़ना है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! (उस अबिचल नगर में) सर्व-व्यापक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालने की, परमात्मा में तवज्जो जोड़ने की कथा-विचार होती सुनी (निरंतर) जा सकती है। (संत-जनों के उस शरीर-नगर में) भक्तों के जन्म-मरण के चक्कर नाश करने वाले परमात्मा के चोज-तमाशों और महिमा की एक-रस प्रबल ध्वनि उठती रहती है।
हे भाई! (उस ‘अबिचल नगर’ में, संत-जनों के उस शरीर नगर में) परमात्मा की एक-रस महिमा होती रहती है, संत-जनों में परस्पर ईश्वरीय विचार-चर्चा होती रहती है। (संत-जन उस ‘अबिचल नगर’ में) परमात्मा का नाम स्मरण करते रहते हैं, (इस तरह से अपने अंदर से विकारों की) सारी मैल दूर करते रहते हैं, (परमात्मा का नाम उनके) सारे पाप दूर करता रहता है।
हे भाई! उस (‘अबिचल नगर’) में बने रहने से जनम-मरण के चक्कर नहीं रह जाते, बार-बार जूनियों में नहीं पड़ते। हे नानक, (कह: हे भाई!) जिस गुरु की कृपा से जिस प्रभु की मेहर से (मनुष्य की) हरेक इच्छा पूरी हो जाती है, वह गुरु वह परमेश्वर (उस ‘अबिचल नगर’ में टिकने से) मिल जाता है।4।6।9।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही महला ५ ॥ संता के कारजि आपि खलोइआ हरि कमु करावणि आइआ राम ॥ धरति सुहावी तालु सुहावा विचि अम्रित जलु छाइआ राम ॥ अम्रित जलु छाइआ पूरन साजु कराइआ सगल मनोरथ पूरे ॥ जै जै कारु भइआ जग अंतरि लाथे सगल विसूरे ॥ पूरन पुरख अचुत अबिनासी जसु वेद पुराणी गाइआ ॥ अपना बिरदु रखिआ परमेसरि नानक नामु धिआइआ ॥१॥

मूलम्

सूही महला ५ ॥ संता के कारजि आपि खलोइआ हरि कमु करावणि आइआ राम ॥ धरति सुहावी तालु सुहावा विचि अम्रित जलु छाइआ राम ॥ अम्रित जलु छाइआ पूरन साजु कराइआ सगल मनोरथ पूरे ॥ जै जै कारु भइआ जग अंतरि लाथे सगल विसूरे ॥ पूरन पुरख अचुत अबिनासी जसु वेद पुराणी गाइआ ॥ अपना बिरदु रखिआ परमेसरि नानक नामु धिआइआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कारजि = काम में, काम (की सफलता) में। धरति = (संतजनों की शरीर-) धरती। सुहावी = सुंदर बनी। तालु = (संतजनों का हृदय-) तालाब। विचि = (हृदय = तालाब) में। अंम्रित जलु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल। छाइआ = छा गया, प्रभाव डाल लिया। साजु = उद्यम। पूरन साज कराइआ = सारा उद्यम सफल कर दिया। मनोरथ = मुरादें। जै जै कारु = शोभा, उपमा। अंतरि = अंदर, में। विसूरे = चिन्ता, झोरे। अचुत जसु = अविनाशी प्रभु का यश। अचुत = (च्यू = to fall) कभी नाश ना होने वाला। वेद = वेदों ने (बहुवचन)। पुराणी = पुराणों ने। बिरदु = आदि कदीमों वाला स्वभाव, ईश्वर का मूल दयालु कृपालु प्रतिपालक स्वभाव। परमेसरि = परमेश्वर ने।1।
अर्थ: हे भाई! (परमात्मा का यह मूल कदीमी स्वभाव है कि वह अपने) संतों के काम में वह खुद सहायक होता रहा है, अपने संतों का काम सफल करने के लिए वह खुद आता रहा है।
हे भाई! (परमात्मा की मेहर से जिस मनुष्य के अंदर परमात्मा का) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल अपना पूरा प्रभाव डाल लेता है, उस मनुष्य की (काया-) धरती सुंदर बन जाती है, उस मनुष्य का (हृदय) तालाब सुंदर हो जाता है। (जिस मनुष्य के अंदर परमात्मा का) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल नाको-नाक भर जाता है, (आत्मिक जीवन ऊँचा करने वाले उस मनुष्य का) सारा उद्यम परमात्मा सिरे चढ़ा देता है, (उस मनुष्य की) सारी मुरादें पूरी हो जाती हैं। (उस मनुष्य की) शोभा सारे जगत में होने लग पड़ती है, (उसकी) सारी चिन्ता-झोरे समाप्त हो जाते हैं।
हे नानक! परमेश्वर ने अपना ये मूल कदीमी स्वभाव सदा ही कायम रखा है (कि जिस पर मेहर की, उसने उसका) नाम स्मरणा आरम्भ कर दिया। उस सर्व-व्यापक और कभी ना नाश होने वाले परमात्मा की (यही) कीर्ति (पुरानी धर्म पुस्तकों) वेदों और पुराणों ने (भी) की है।1।

[[0784]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

नव निधि सिधि रिधि दीने करते तोटि न आवै काई राम ॥ खात खरचत बिलछत सुखु पाइआ करते की दाति सवाई राम ॥ दाति सवाई निखुटि न जाई अंतरजामी पाइआ ॥ कोटि बिघन सगले उठि नाठे दूखु न नेड़ै आइआ ॥ सांति सहज आनंद घनेरे बिनसी भूख सबाई ॥ नानक गुण गावहि सुआमी के अचरजु जिसु वडिआई राम ॥२॥

मूलम्

नव निधि सिधि रिधि दीने करते तोटि न आवै काई राम ॥ खात खरचत बिलछत सुखु पाइआ करते की दाति सवाई राम ॥ दाति सवाई निखुटि न जाई अंतरजामी पाइआ ॥ कोटि बिघन सगले उठि नाठे दूखु न नेड़ै आइआ ॥ सांति सहज आनंद घनेरे बिनसी भूख सबाई ॥ नानक गुण गावहि सुआमी के अचरजु जिसु वडिआई राम ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नव निधि = (धरती के सारे) नौ खजाने (नव = नौ। निधि = खजाने)। सिधि रिधि = करामाती ताकतें। दीने = दे दिए। काई = रक्ती भर भी। बिलछत = भोगते हुए। दाति = (नाम की) बख्शिश। सवाई = बढ़ती जाती है। अंतरजामी = (हरेक के) दिल की जानने वाला। कोटि बिघन = करोड़ों रुकावटें। सहज = आत्मिक अडोलता। घनेरे = अनेक। सबाई = सारी। गावहि = गाते हैं। जिसु वडिआई = जिस परमात्मा की महिमा। अचरजु = हैरान करने वाला काम।2।
अर्थ: हे भाई! (जो मनुष्य मालिक-प्रभु की मेहर से उसके गुण गाते हैं उनको) ईश्वर ने ये एक ऐसी दाति बख्शी है जो, धरती के सारे ही नौ खजाने हैं, जो मानो, सारी ही करामाती ताकतें हैं, इस दाति में कभी कोई कमी नहीं होती। इस नाम-दाति को खाते हुए बाँटते हुए और भोगते हुए वे आत्मिक आनंद पाते हैं, कर्तार की ये बख्शिश (दिन-ब-दिन) बढ़ती रहती है। (यकीन जानो, ये) दाति बढ़ती ही रहती है, कभी खत्म नहीं होती, इस दाति की इनायत से उनको हरेक दिल की जानने वाला परमात्मा मिल जाता है, (जिंदगी के सफर में आने वाली) करोड़ों रुकावटें (उनके रास्ते में से) सारी ही दूर हो जाती हैं, कोई दुख उनके नजदीक नहीं फटकता। (उनके अंदर से माया की) सारी ही भूख नाश हो जाती है, (उनके अंदर) ठंडक बनी रहती है, आत्मिक अडोलता के अनेक आनंद बने रहते हैं।
हे नानक! वह मनुष्य उस मालिक-प्रभु के गुण गाते रहते हैं, जिसकी महिमा करना हैरान कर देने वाला उद्यम है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जिस का कारजु तिन ही कीआ माणसु किआ वेचारा राम ॥ भगत सोहनि हरि के गुण गावहि सदा करहि जैकारा राम ॥ गुण गाइ गोबिंद अनद उपजे साधसंगति संगि बनी ॥ जिनि उदमु कीआ ताल केरा तिस की उपमा किआ गनी ॥ अठसठि तीरथ पुंन किरिआ महा निरमल चारा ॥ पतित पावनु बिरदु सुआमी नानक सबद अधारा ॥३॥

मूलम्

जिस का कारजु तिन ही कीआ माणसु किआ वेचारा राम ॥ भगत सोहनि हरि के गुण गावहि सदा करहि जैकारा राम ॥ गुण गाइ गोबिंद अनद उपजे साधसंगति संगि बनी ॥ जिनि उदमु कीआ ताल केरा तिस की उपमा किआ गनी ॥ अठसठि तीरथ पुंन किरिआ महा निरमल चारा ॥ पतित पावनु बिरदु सुआमी नानक सबद अधारा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जिस का = जिस (परमात्मा) का। कारजु = काम, (जीव को अपने साथ मिलाने का) काम। तिन ही = उस (परमात्मा) ने ही। किआ वेचारा = क्या है बिचारा? कोई स्मर्था नहीं। सोहनि = शोभा देते हैं। गावहि = गाते हैं। करहि = करते हैं। जैकारा = (परमात्मा की) महिमा। गाइ = गा के। अनद = आनंद। संगि = साथ। बनी = प्रीति बनी रहती है। जिनि = जिस (प्रभु) ने। ताल केरा = (हृदय) तालाब (में ‘अमृत = जल’ भरने) का। केरा = का। तिस की = उस (परमात्मा) की। उपमा = बड़ाई। किआ गनी = मैं क्या गिनूँ? मैं बयान नहीं कर सकता। अठसठि = अढ़सठ। निरमल = पवित्र। चारा = (चारु) सुंदर। पतित पावनु = विकारियों को पवित्र करना। बिरदु = ईश्वर का मूल स्वभाव। सबद अधारा = (गुरु के) शब्द का आसरा (दे के)।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जिस का’ में से ‘जिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘का’ के कारण हटा दी गई है। ‘तिन ही’ में से ‘तिनि’ की ‘नि’ की ‘ि’ मात्रा ‘ही’ क्रिया विशेषण के कारण हट गई है। ‘तिस की’ में से ‘तिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘की’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे भाई! (संतजनों को अपने चरणों के साथ जोड़ना- यह) काम जिस (परमात्मा) का (अपना) है, उसने ही (सदा ये काम) किए हैं। (ये काम करने की) मनुष्य की कोई सामर्थ्य नहीं। (उसी की ही मेहर से उसके) भक्त (उस) हरि के गुण गाते रहते हैं, सदा महिमा करते रहते हैं, और सुंदर आत्मिक जीवन वाले बने रहते हैं। परमात्मा के गुण गा गा के (उनके अंदर आत्मिक) आनंद (के हिलोरे) पैदा होते रहते हैं, साधु-संगत में (टिक के परमात्मा) के साथ (उनकी प्रीति) बनी रहती है। हे भाई! जिस (परमात्मा) ने (संतजनों के हृदय-) तालाब (में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल भरने) का उद्यम (सदा) किया है, मैं उसकी कोई बड़ाई महिमा बयान करने के योग्य नहीं हूं।
हे भाई! आत्मिक आनंद देने वाला नाम-जल नाम भरपूर इस संत हृदय में ही अढ़सठ तीर्थ आ जाते हैं, बड़े-बड़े पवित्र और सुंदर पुण्य कर्म आ जाते हैं। हे नानक! गुरु के शब्द का आसरा (दे के) बड़े-बड़े विकारियों को पवित्र कर देना- मालिक-प्रभु का ये मूल कदीमों वाला बिरद वाला स्वभाव चला आ रहा है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

गुण निधान मेरा प्रभु करता उसतति कउनु करीजै राम ॥ संता की बेनंती सुआमी नामु महा रसु दीजै राम ॥ नामु दीजै दानु कीजै बिसरु नाही इक खिनो ॥ गुण गोपाल उचरु रसना सदा गाईऐ अनदिनो ॥ जिसु प्रीति लागी नाम सेती मनु तनु अम्रित भीजै ॥ बिनवंति नानक इछ पुंनी पेखि दरसनु जीजै ॥४॥७॥१०॥

मूलम्

गुण निधान मेरा प्रभु करता उसतति कउनु करीजै राम ॥ संता की बेनंती सुआमी नामु महा रसु दीजै राम ॥ नामु दीजै दानु कीजै बिसरु नाही इक खिनो ॥ गुण गोपाल उचरु रसना सदा गाईऐ अनदिनो ॥ जिसु प्रीति लागी नाम सेती मनु तनु अम्रित भीजै ॥ बिनवंति नानक इछ पुंनी पेखि दरसनु जीजै ॥४॥७॥१०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुण निधान = सारे गुणों का खजाना। करता = कर्तार। उसतति = महिमा, उपमा, बड़ाई। कउनु = कौन सा (मनुष्य)? करीजै = की जा सकती है। सुआमी = हे स्वामी! महा रसु नामु = बेअंत स्वादिष्ट हरि का नाम। दीजै = दे। दानु = बख्शिश। कीजै = करें। खिनो = छिन भर भी। उचरु = उचारा कर। रसना = जीभ (से)। गाईऐ = महिमा करनी चाहिए। अनदिनो = हर रोज, हर वक्त। सेती = साथ। अंम्रित भीजै = आत्मिक जीवन देने वाले नाम जल से भीग जाता है। पुंनी = पूरी हो जाती है। पेखि = देख के। जीजै = आत्मिक जीवन मिल जाता है।4।
अर्थ: हे भाई! मेरा कर्तार मेरा प्रभु सारे गुणों का खजाना है। कोई भी ऐसा मनुष्य नहीं, जिससे, (उसकी पूरी) महिमा की जा सके। (उसके) संतजनों की (उसके दर पर सदा यह) प्रार्थना होती है - हे मालिक प्रभु! बेअंत स्वादिष्ट अपना नाम बख्शे रख; ये मिहर कर कि अपना नाम दिए रख, एक छण भर के लिए भी (हमारे हृदय में से) ना भूल।
हे भाई! (अपनी) जीभ से गोपाल के गुण उचारता रहा कर। हर वक्त् उसकी महिमा करते रहना चाहिए। परमात्मा के नाम से जिस मनुष्य का प्यार बन जाता है, उसका मन उसका तन आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल से (सदा) तर रहता है। नानक विनती करता है - हे भाई! (परमात्मा के) दर्शन करके आत्मिक जीवन मिल जाता है, हरेक इच्छा पूरी हो जाती है।4।7।10।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही महला ५ छंत ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही महला ५ छंत ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

मिठ बोलड़ा जी हरि सजणु सुआमी मोरा ॥ हउ समलि थकी जी ओहु कदे न बोलै कउरा ॥ कउड़ा बोलि न जानै पूरन भगवानै अउगणु को न चितारे ॥ पतित पावनु हरि बिरदु सदाए इकु तिलु नही भंनै घाले ॥ घट घट वासी सरब निवासी नेरै ही ते नेरा ॥ नानक दासु सदा सरणागति हरि अम्रित सजणु मेरा ॥१॥

मूलम्

मिठ बोलड़ा जी हरि सजणु सुआमी मोरा ॥ हउ समलि थकी जी ओहु कदे न बोलै कउरा ॥ कउड़ा बोलि न जानै पूरन भगवानै अउगणु को न चितारे ॥ पतित पावनु हरि बिरदु सदाए इकु तिलु नही भंनै घाले ॥ घट घट वासी सरब निवासी नेरै ही ते नेरा ॥ नानक दासु सदा सरणागति हरि अम्रित सजणु मेरा ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मिठ बोलड़ा = मीठे बोलों वाला। मोरा = मेरा। हउ = मैं। समंलि = याद कर कर के। कउरा = कड़वे (बोल)। बोलि न जानै = बोलना जानता ही नहीं। अउगुणु को = कोई भी अवगुण। चितारे = याद रखता। पतित पावनु = विकारियों को पवित्र करने वाला। बिरदु = मूल कदीमी स्वभाव। सदाए = कहलवाता है। तिलु = रक्ती भर भी। भंनै = तोड़ता, व्यर्थ जाने देता। घाले = की हुई मेहनत को। घट = शरीर। नेरै ही तें नेरा = बहुत ही नजदीक। सरणागति = शरण में आया रहता है। अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाला।1।
अर्थ: हे भाई! मेरा मालिक-प्रभु मीठे बोलों वाला प्यारा मित्र है। मैं याद कर-कर के थक गई हूँ (कि उसका कभी कोई कठोर कड़वा बोल याद आ जाए, पर) वह कभी भी कड़वे बोल नहीं बोलता।
हे भाई! वह सारे गुणों से भरपूर भगवान खरवे (कड़वे) बोलना जानता ही नहीं, (क्योंकि वह हमारा) कोई भी अवगुण याद ही नहीं रखता। वह विकारियों को पवित्र करने वाला है; ये उसका मूल कदीमी स्वभाव बताया जाता है, (और वह किसी की भी) की हुई मेहनत-कमाई को तिल भर भी व्यर्थ नहीं जाने देता।
हे भाई! मेरा सज्जन हरेक शरीर में बसता है, सब जीवों में बसता है, हरेक जीव के अत्यंत नजदीक बसता है दास नानक सदा उस की शरण पड़ा रहता है। हे भाई! मेरा सज्जन प्रभु आत्मिक जीवन देने वाला है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हउ बिसमु भई जी हरि दरसनु देखि अपारा ॥ मेरा सुंदरु सुआमी जी हउ चरन कमल पग छारा ॥ प्रभ पेखत जीवा ठंढी थीवा तिसु जेवडु अवरु न कोई ॥ आदि अंति मधि प्रभु रविआ जलि थलि महीअलि सोई ॥ चरन कमल जपि सागरु तरिआ भवजल उतरे पारा ॥ नानक सरणि पूरन परमेसुर तेरा अंतु न पारावारा ॥२॥

मूलम्

हउ बिसमु भई जी हरि दरसनु देखि अपारा ॥ मेरा सुंदरु सुआमी जी हउ चरन कमल पग छारा ॥ प्रभ पेखत जीवा ठंढी थीवा तिसु जेवडु अवरु न कोई ॥ आदि अंति मधि प्रभु रविआ जलि थलि महीअलि सोई ॥ चरन कमल जपि सागरु तरिआ भवजल उतरे पारा ॥ नानक सरणि पूरन परमेसुर तेरा अंतु न पारावारा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हउ = मैं। बिसमु = विस्मय में, हैरान। जी = हे जीउ! देखि = देख के। अपारा दरसनु = बेअंत के दर्शन। चरन कमल पग छारा = कमल के फूल जैसे सुंदर चरणों की धूल। पग = पैर, चरण।
पेखत = देखते हुए। जीवा = जीऊँ, मैं आत्मिक जीवन हासिल कर लेती हूँ। ठंडी = शांत चिक्त। थीवा = मैं हो जाती हूँ। तिसु जेवडु = उसके जितना बड़ा, उसके बराबर का। आदि = जगत के आरम्भ में। अंति = जगत के आखिर में। मधि = अब जगत के अस्तित्व के बीच। जलि = जल में। थलि = धरती में। महीअलि = मही तलि, धरती पर, अंतरिक्ष में, आकाश में। सोई = वही प्रभु! जपि = जप के। सागरु = संसार समुंदर। भवजल = संसार समुंदर से। परमेसुर = हे परमेश्वर। पारावारा = पार+अवार, परला और इधर का किनारा।2।
अर्थ: हे भाई! उस बेअंत हरि के दर्शन करके मैं हैरान हो रही हूँ। हे भाई! वह मेरा सुंदर मालिक है, मैं उसके सोहणे चरणों की धूल हूँ।
हे भाई! प्रभु के दर्शन करते हुए मेरे अंदर जिंद पड़ जाती है, मैं शांत-चिक्त हो जाती हूँ, उसके बराबर का और कोई नहीं है। जगत के शुरू में वही था, जगत के आखिर में भी वही होगा, अब इस वक्त भी वही है। पानी में, धरती में, आकाश में वही बसता है।
हे भाई! उसके सुंदर चरणों का ध्यान धर के संसार-समुंदर तैरा जा सकता है, अनेक ही जीव संसार-समुंदर से पार लांघते आ रहे हैं। हे नानक! (कह:) हे पूर्ण परमेश्वर! मैं तेरी शरण आया हूँ, तेरी हस्ती का अंत, तेरा उरला-परला किनारा नहीं पाया जा सकता।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हउ निमख न छोडा जी हरि प्रीतम प्रान अधारो ॥ गुरि सतिगुर कहिआ जी साचा अगम बीचारो ॥ मिलि साधू दीना ता नामु लीना जनम मरण दुख नाठे ॥ सहज सूख आनंद घनेरे हउमै बिनठी गाठे ॥ सभ कै मधि सभ हू ते बाहरि राग दोख ते निआरो ॥ नानक दास गोबिंद सरणाई हरि प्रीतमु मनहि सधारो ॥३॥

मूलम्

हउ निमख न छोडा जी हरि प्रीतम प्रान अधारो ॥ गुरि सतिगुर कहिआ जी साचा अगम बीचारो ॥ मिलि साधू दीना ता नामु लीना जनम मरण दुख नाठे ॥ सहज सूख आनंद घनेरे हउमै बिनठी गाठे ॥ सभ कै मधि सभ हू ते बाहरि राग दोख ते निआरो ॥ नानक दास गोबिंद सरणाई हरि प्रीतमु मनहि सधारो ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हउ = मैं। निमख = (निमेष) आँख झपकने जितना समय। छोडा = मैं छोड़ता। प्रान अधारो = प्राणों का आसरा, जिंद का आसरा। गुरि सतिगुर = सतिगुरु गुरु ने। जी = हे भाई! साचा = सदा कायम रहने वाला, अटल। अगम बीचारो = अगम्य (पहुँच से परे) परमात्मा के बारे में विचार की बात।
मिलि साधू = गुरु को मिल के। दीना = (गुरु के नाम की दाति) दी। ता = तब। लीना = जपा जा सकता है। नाठे = भाग जाते हैं। सहज सूख = आत्मिक अडोलता के सुख। बिनठी = नाश हो जाती है। गाठे = गाँठ।
कै मधि = के बीच। ते = से। राग = मोह। निआरो = अलग, निर्लिप। दोख = ईष्या। मनहि सधारो = मन को आसरा देने वाला।3।
अर्थ: हे भाई! प्रीतम हरि (हम जीवों की) जिंद का आसरा है, मैं आँख झपकने जितने समय के लिए भी उसकी याद को नहीं छोड़ूंगा - गुरु ने (मुझे) अगम्य (पहुँच से परे) परमात्मा (से मिलाप) के बारे में यह अटल विचार की बात बताई है।
हे भाई! गुरु को मिल के (जब गुरु के द्वारा नाम की दाति) मिलती है, तब ही परमात्मा का नाम जपा जा सकता है, (जो मनुष्य नाम जपता है, उसके) जनम से ले के मरने तक के सारे दुख नाश हो जाते हैं, (उसके अंदर) आत्मिक अडोलता के अनेक सुख पैदा हो जाते हैं, (उसके अंदर से) अहंकार की गाँठ का विनाश हो जाता है।
हे नानक! परमात्मा सब जीवों के अंदर है, सबसे अलग भी है, (सबके अंदर होता हुआ भी वह) मोह और ईष्या (आदि) से निर्लिप रहता है। उसके सेवक सदा उसकी शरण पड़े रहते हैं, वह प्रीतम हरि सब जीवों के मन का आसरा (बना रहता है)।3।

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विश्वास-प्रस्तुतिः

मै खोजत खोजत जी हरि निहचलु सु घरु पाइआ ॥ सभि अध्रुव डिठे जीउ ता चरन कमल चितु लाइआ ॥ प्रभु अबिनासी हउ तिस की दासी मरै न आवै जाए ॥ धरम अरथ काम सभि पूरन मनि चिंदी इछ पुजाए ॥ स्रुति सिम्रिति गुन गावहि करते सिध साधिक मुनि जन धिआइआ ॥ नानक सरनि क्रिपा निधि सुआमी वडभागी हरि हरि गाइआ ॥४॥१॥११॥

मूलम्

मै खोजत खोजत जी हरि निहचलु सु घरु पाइआ ॥ सभि अध्रुव डिठे जीउ ता चरन कमल चितु लाइआ ॥ प्रभु अबिनासी हउ तिस की दासी मरै न आवै जाए ॥ धरम अरथ काम सभि पूरन मनि चिंदी इछ पुजाए ॥ स्रुति सिम्रिति गुन गावहि करते सिध साधिक मुनि जन धिआइआ ॥ नानक सरनि क्रिपा निधि सुआमी वडभागी हरि हरि गाइआ ॥४॥१॥११॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: खोजत खोजत = तलाश करते करते। जी = हे भाई! सु घरु = वह घर, वह ठिकाना। निहचलु = कभी नाश ना होने वाला। सभि = सारे। अध्रुव = (अ+ ध्रुव) सदा ना टिके रहने वाले, नाशवान। जीउ = हे भाई! चरन कमल = सुंदर चरणों में। हउ = मैं। न आवै जाए = ना पैदा होता है ना मरता है। सभि = सारे (पदार्थ)। पूरन = भरपूर, मौजूद। मनि = मन में। चिंदी इछ = चितवी हुई इच्छा। पुजाए = पूरी करता है।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘तिस की’ में से ‘तिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘की’ के कारण हटा दी गई है।

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: स्रुति = श्रुति, वेद। गावहि = गाते हैं। करते = कर्तार के। सिध = सिद्ध, योग साधना में मुहारत हासिल किए हुए जोगी। साधिक = साधना करने वाले। मुनि जन = सारे मुनी लोग। क्रिपानिधि = दया का खजाना।4।
अर्थ: हे भाई! तलाश करते-करते मैंने हरि-प्रभु का वह ठिकाना ढूँढ लिया है जो कभी भी डोलता नहीं। जब मैंने देखा कि (जगत के) सारे (पदार्थ) नाशवान हैं, तब मैंने प्रभु के सुंदर चरणों में (अपना) मन जोड़ लिया।
हे भाई! परमात्मा कभी नाश होने वाला नहीं, मैं (तो) उसकी दासी बन गई हूँ, वह कभी जनम-मरण के चक्कर में नहीं पड़ता। (दुनिया के बड़े से बड़े प्रसिद्ध पदार्थ) धर्म अर्थ काम (आदिक) सारे ही (उस प्रभु में) मौजूद हैं, वह प्रभु (जीव के) मन में चितवी हरेक कामना पूरी कर देता है।
हे भाई! (काफी पुरातन समय से ही प्राचीन धर्म पुस्तकें) स्मृतियाँ-वेद (आदिक) उस कर्तार के गुण गाते आ रहे हैं। जोग-साधना में सिद्ध योगी, योग साधना करने वाले जोगी, सारे ऋषि-मुनि (उसी का नाम) स्मरण करते आ रहे हैं। हे नानक! वह मालिक-प्रभु कृपा का खजाना है, मनुष्य बड़े भाग्यों से उसकी शरण पड़ता है, उसकी महिमा करता है।4।1।11।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ वार सूही की सलोका नालि महला ३ ॥

मूलम्

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ वार सूही की सलोका नालि महला ३ ॥

दर्पण-भाव

पउड़ी वार भाव:
♥ जगत-रूपी तख्त प्रभु ने स्वयं बनाया है, धरती जीवों के धर्म कमाने के लिए रची है; सब जीवों को रिजक खुद ही पहुँचाता है।
♥ अपने हुक्म में रंग-बिरंगी सृष्टि रची है; कई जीवों को गुरु के शब्द के द्वारा अपने साथ जोड़े रखता है, उन्हें सच्चा व्यापारी जानो।
♥ सारे जीव प्रभु ने खुद पैदा किए हैं; माया का मोह रूपी अंधेरा भी उसी ने बनाया है और इसमें खुद ही जीवों को भटका रहा है। इस भटकना में पड़े मनमुख सदा पैदा होने मरने के चक्करों में पड़े रहते हैं।
♥ जगत की आश्चर्यजनक रचना प्रभु ने खुद रची है; इसमें मोह, झूठ और अहंकार भी उसने स्वयं ही पैदा किया, मनमुख इस मोह में फस जाता है, पर कई जीवों को गुरु की शरण में ला के ‘नाम’ का खजाना बख्शता है।
♥ मनमुख मोह में फसने के कारण ‘मैं, मेरी’ में ख्वार होता है; मौत को विसार के मानव जनम को विकारों में व्यर्थ ही गवा लेता है और इस चक्रव्यूह में पड़ा रहता है।
♥ जीवों के लिए प्रभु की सबसे महानतम् कृपा उसका ‘नाम’ है; जिसको गुरु के द्वारा ये खजाना मिलता है उसको फिर तोटि नहीं आती और उसके मोह के चक्कर समाप्त हो जाते हैं।
♥ जिन्हें सतिगुरु ने सृष्टि पैदा करने वाले प्रभु के दीदार करवा दिए उनके मन-तन में हमेशा शीतलता बनी रहती है; ज्यों-ज्यों वे गुरु के राह पर चल के महिमा करते हैं त्यों-त्यों प्रसन्न रहते हैं।
♥ गुरु-शब्द के द्वारा जो मनुष्य प्रभु को स्मरण करते हैं वे प्रभु के साथ एक-मेक हो जाते हैं, ‘मैं, मेरी’ त्याग के उनका मन पवित्र हो जाता है।
♥ पर, मनमुख ‘मैं, मेरी’ में पड़ के दातार को भुला देते हैं।
♥ परमात्मा के डर के बगैर उसकी भक्ति नहीं हो सकती; और ये डर तभी पैदा होता है जब सतिगुरु की शरण आया जाए।
♥ गुरु-शब्द के द्वारा प्रभु की प्राप्ति होती है क्योंकि गुरु के द्वारा ही तन-मन अर्पित करके महिमा करने की विधि आती है।
♥‘बंदगी’ का नियम प्रभु ने धुर से ही जीव के लिए बना दिया है, पर बँदगी गुरु की कृपा के साथ ही हो सकती है; शब्द के द्वारा उसके दर पर पहुँचने का परवाना मिलता है।
♥ मनुष्य का मन जगत के धंधों में दसों दिशाओं में दौड़ता है, यदि ये कभी बँदगी की तमन्ना भी करे तो भी नहीं कर सकता क्योंकि मन टिकता नहीं। सतिगुरु मन को रोकता है, सो, गुरु की मति के साथ ही ‘नाम’ मिलता है।
♥ जो मनुष्य प्रभु को बिसार के माया से प्यार डालते हैं वह ‘अहंकार’ में फस के ख्वार होते हैं और मानव जनम व्यर्थ में गवाते हैं।
♥ चाहे माया का मोह झूठा है पर जगत इसमें फसा हुआ है और ‘अहंकार’ के लंबे चक्करों में पड़ के दुखी हो रहा है।
♥ जो मनुष्य गुरु के द्वारा प्रभु के दर पर ‘नाम’ की दाति माँगता है, वह हृदय में ‘नाम’ परो के, ज्योति मिला के, महिमा का एक-रस आनंद भोगता है।
♥ महिमा करने वाला जनम सफल कर लेता है, प्रभु को हृदय में बसाता है और प्रभु के दर रूपी बिलकुल अपना घर ढूँढ लेता है, जहाँ से कभी भटकता नहीं।
♥ महिमा करने वाला अंदर से ‘अहंकार’ की मैल धो लेता है, जग में शोभा पाता है और चिरों से विछुड़े मालिक के साथ मेल हो जाता है।
♥ महिमा से मन की वासनाएं समाप्त हो जाती हैं, मन प्रभु में पतीज जाता है।
♥ ज्यों-ज्यों ‘नाम’ का रस आता है, त्यों-त्यों और लगन बढ़ती है। गुरु-शब्द के द्वारा ‘नाम’ में ही जुड़ा रहता है।
♥ आखिर, प्रभु के बिना और कोई बेली नहीं बनता, एक वह ही रक्षक दिखता है, किसी और की आस नहीं रह जाती।
समूचा भाव:
जगत-रूपी तख्त रच के प्रभु ने इसमें धरती जीवों के धर्म कमाने के लिए बनाई। इसमें मोह, झूठ, अहंकार आदि अंधकार भी उसने खुद ही बनाया। मन के पीछे चलने वाला मनुष्य ‘मोह’ में फस के ‘मैं, मेरी’ में ख्वार होता है और विकारों में गलतान रहता है।
सबसे उच्च दाति ‘नाम’ है; जो गुरु के सन्मुख हो के जपते हैं उनके मोह के चक्कर खत्म हो जाते हैं। उनके तन-मन में शीतलता बनी रहती है, वे रजा में प्रसन्न रहते हैं, प्रभु के साथ एक-मेक हो जाते हैं, ‘मैं, मेरी’ छोड़ने के कारण उनका मन पवित्र हो जाता है।
बँदगी गुरु के माध्यम से ही हो सकती है क्योंकि प्रभु के डर के बिना भक्ति नहीं होती और इस डर की समझ गुरु से ही पड़ती है, गुरु के द्वारा ही तन-मन अर्पित करके महिमा करने की विधि आती है, गुरु-शब्द के द्वारा ही उसके दर पर पहुँचने का परवाना मिलता है, गुरु मन को रोकने की युक्ति सिखाता है और मन को रोके बिना भक्ति में नहीं लगा जा सकता।
‘नाम’ के बिसरने से माया के मोह में फस जाते हैं और ‘अहंकार’ के लंबे चक्रव्यूह में पड़ के दुखी होते हैं।
‘नाम’ स्मरण करने वाला एक-रस आनंद में रहता है, स्वै-स्वरूप में टिकता है, अहंकार की मैल धो लेता है, (उसके) मन की वासनाएं समाप्त हो जाती हैं, आखिर, प्रभु ही हर जगर बेली (मित्र) व रखवाला प्रतीत होता है।

दर्पण-टिप्पनी

‘वार’ गुरु अमरदास जी की बनाई हुई है, पर उनके अपने श्लोक सिर्फ निम्न-लिखित 6 पौड़ियों के साथ ही हैं – १,२,३,५,६,९। पउड़ी नं: ६ के साथ 3 श्लोक हैं, बाकी पउड़ियों के साथ दो-दो। पउड़ी नंबर ४ के साथ भी गुरु अमरदास जी का 1सलोक है, दूसरा सलोक गुरु नानक देव जी का है। बाकी १३ पउड़ियों के साथ गुरु अमरदास जी का कोई श्लोक नहीं है।
अगर गुरु अमरदास जी ने ये ‘वार’ शलोको समेत उचारी होती, तो जैसे पउड़ियों के साथ बनावट का स्तर है, शलोक भी हरेक पउड़ी के साथ उचारते और गिनती भी एक जैसी ही रखते। पर 20 पउड़ियों में से सिर्फ 5 पउड़ियों के साथ कोई भी शलोक ना होने से ये बात स्पष्ट तौर पर इस नतीजे पर पहुँचाती है कि मूल रूप में ‘वार’ सिर्फ पउड़ियों में रची गई। गुरु अमरदास जीने ‘वार’ लिखने के वक्त कोई शलोक नहीं उचारा, ये शलोक उनके संग्रह में से गुरु अरजन देव जी ने ‘बीड़’ तैयार करने के वक्त दर्ज किए थे और सारी वारों के साथ दर्ज करने के उपरांत जो शलोक बढ़ गए, श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के आखिर में इकट्ठे ‘सलोक वारां ते वधीक’ के शीर्षक तले दर्ज कर दिए।
व्याकरण के ख्याल से गुरु अमरदास जी की इस रचना में एक मजेदार बात ये मिलती है कि 20 पउड़ियों में 10 पउड़ियां ऐसी हैं जिस में ‘भूत काल’ (Past tense) का एक विशेष रूप मिलता है जिसके साथ ही उसका ‘करता’ (subject) भी मिला हुआ है; देखें:
पउड़ी नंबर 1 – रचाइओनु, साजीअनु
पउड़ी नंबर 2 – साजीअनु
पउड़ी नंबर 3 – उपाइअनु
पउड़ी नंबर 4 – उपाइओनु, पाइअनु, बुझाइओनु, बखसीओनु
पउड़ी नंबर 5 – पाइओनु
पउड़ी नंबर 7 – उपाइअनु
पउड़ी नंबर 11– चलाईओनु
पउड़ी नंबर 12– लाइअनु
पउड़ी नंबर 16 – रचाइओनु, खुआइअनु
पउड़ी नंबर 14 – पाइओनु, चुकाइओनु
20 पउड़ियों में ये क्रिया-रूप 16 बार आया है; ऐसा प्रतीत होता है कि यह ‘क्रिया रूप’ के प्रयोग का उन्हें खास शौक था।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोकु मः ३ ॥ सूहै वेसि दोहागणी पर पिरु रावण जाइ ॥ पिरु छोडिआ घरि आपणै मोही दूजै भाइ ॥ मिठा करि कै खाइआ बहु सादहु वधिआ रोगु ॥ सुधु भतारु हरि छोडिआ फिरि लगा जाइ विजोगु ॥ गुरमुखि होवै सु पलटिआ हरि राती साजि सीगारि ॥ सहजि सचु पिरु राविआ हरि नामा उर धारि ॥ आगिआकारी सदा सुोहागणि आपि मेली करतारि ॥ नानक पिरु पाइआ हरि साचा सदा सुोहागणि नारि ॥१॥

मूलम्

सलोकु मः ३ ॥ सूहै वेसि दोहागणी पर पिरु रावण जाइ ॥ पिरु छोडिआ घरि आपणै मोही दूजै भाइ ॥ मिठा करि कै खाइआ बहु सादहु वधिआ रोगु ॥ सुधु भतारु हरि छोडिआ फिरि लगा जाइ विजोगु ॥ गुरमुखि होवै सु पलटिआ हरि राती साजि सीगारि ॥ सहजि सचु पिरु राविआ हरि नामा उर धारि ॥ आगिआकारी सदा सुोहागणि आपि मेली करतारि ॥ नानक पिरु पाइआ हरि साचा सदा सुोहागणि नारि ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सूहा = चुहचुहा रंग जैसे कुसंभे का होता है। वेसि = वेश में। सूहै वेसि = सूहे वेश में। रावण जाइ = भोगने जाती है। मोही = ठगी गई, लूटी गई। मिठा करि कै = स्वादिष्ट जान के। सुखु = खालस, बिलकुल अपना। पलटिआ = पलटा। साजि सीगारि = सजा धजा के। सहजि = सहज अवस्था में। उर = हृदय।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘सुोहागणि’ में से अक्षर ‘स’ के साथ दो मात्राएं ‘ु’ और ‘ो’ लगी हैं यहाँ ‘ु’ की मात्रा लगा के पढ़ना है।

दर्पण-भाषार्थ

करतारि = कर्तार ने। दोहागणि = बुरे भाग्यों वाली, रंडी।
अर्थ: जो जीव-स्त्री दुनिया के सुंदर पदार्थ-रूप कुसंभे के चुहचुहे रंग वाले वेश में (मस्त) है वह दुर्भागनि है, वह (जैसे) पराए पति से भोग करने चल पड़ी है, माया के प्यार में वह लूटी जा रही है (क्योंकि) वह अपने हृदय-घर में बसते पति-प्रभु को बिसार देती है।
(जिस जीव-स्त्री ने दुनिया के पदार्थों को) स्वादिष्ट समझ के भोगा है (उसके मन में) इस बहुत सारे चस्कों से रोग बढ़ता है, (भाव) वह बिलकुल अपने पति-प्रभु को छोड़ बैठती है और इस तरह उससे इसका विछोड़ा हो जाता है।
जो जीव-स्त्री गुरु के हुक्म में चलती है उसका मन (दुनियाँ के भोगों की तरफ से) पलट जाता है, वह (प्रभु के प्यार रूपी गहनों से अपने आप को) सजा-धजा के परमात्मा (के प्यार में) रंगी रहती है, प्रभु का नाम हृदय में धारण करके सहज अवस्था में (टिक के) सदा-स्थिर रहने वाले पति का आनंद लेती है।
प्रभु के हुक्म में चलने वाली जीव-स्त्री सदा सोहागभाग वाली है, ईश्वर ने उसको अपने साथ मिला लिया है। हे नानक! जिसने सदा-स्थिर प्रभु पति प्राप्त कर लिया है वह (जीव-) स्त्री सदा सोहाग-भाग वाली है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः ३ ॥ सूहवीए निमाणीए सो सहु सदा सम्हालि ॥ नानक जनमु सवारहि आपणा कुलु भी छुटी नालि ॥२॥

मूलम्

मः ३ ॥ सूहवीए निमाणीए सो सहु सदा सम्हालि ॥ नानक जनमु सवारहि आपणा कुलु भी छुटी नालि ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सूहवीए = हे सूहे वेश वाली! हे चुहचुहे कुसंभे रंग से प्यार करने वाली! हे निमाणी! हे बिचारी!
अर्थ: हे चुहचुहे कुसंभी रंग से प्यार करने वाली बिचारी! पति-प्रभु को तू सदा याद रख। हे नानक! (कह कि इस तरह) तू अपना जीवन सवारलेगी, तेरी कुल भी तेरे साथ मुक्त हो जाएगी।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ आपे तखतु रचाइओनु आकास पताला ॥ हुकमे धरती साजीअनु सची धरम साला ॥ आपि उपाइ खपाइदा सचे दीन दइआला ॥ सभना रिजकु स्मबाहिदा तेरा हुकमु निराला ॥ आपे आपि वरतदा आपे प्रतिपाला ॥१॥

मूलम्

पउड़ी ॥ आपे तखतु रचाइओनु आकास पताला ॥ हुकमे धरती साजीअनु सची धरम साला ॥ आपि उपाइ खपाइदा सचे दीन दइआला ॥ सभना रिजकु स्मबाहिदा तेरा हुकमु निराला ॥ आपे आपि वरतदा आपे प्रतिपाला ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रचाइओनु = रचाया उसने। साजीअनु = रचा उसने। धरमसाला = धर्म कमाने वाली जगह। उपाइ = पैदा कर के। संबाहिदा = पहुँचाता।
अर्थ: आकाश और पाताल के बीच का सारा जगत-रूपी तख्त प्रभु ने ही बनाया है, उसने अपने हुक्म में ही धरती के जीवों के धर्म कमाने के लिए जगह बनाई है।
हे दीनों पर दया करने वाले सदा कायम रहने वाले! तू खुद ही पैदा करके खुद ही नाश करता है। (हे प्रभु!) तेरा हुक्म अनोखा है (भाव, कोई इसको मोड़ नहीं सकता) तू सब जीवों को रिजक पहुँचाता है, हर जगह तू स्वयं मौजूद है और तू सवयं ही जीवों की पालना करता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोकु मः ३ ॥ सूहब ता सोहागणी जा मंनि लैहि सचु नाउ ॥ सतिगुरु अपणा मनाइ लै रूपु चड़ी ता अगला दूजा नाही थाउ ॥ ऐसा सीगारु बणाइ तू मैला कदे न होवई अहिनिसि लागै भाउ ॥ नानक सोहागणि का किआ चिहनु है अंदरि सचु मुखु उजला खसमै माहि समाइ ॥१॥

मूलम्

सलोकु मः ३ ॥ सूहब ता सोहागणी जा मंनि लैहि सचु नाउ ॥ सतिगुरु अपणा मनाइ लै रूपु चड़ी ता अगला दूजा नाही थाउ ॥ ऐसा सीगारु बणाइ तू मैला कदे न होवई अहिनिसि लागै भाउ ॥ नानक सोहागणि का किआ चिहनु है अंदरि सचु मुखु उजला खसमै माहि समाइ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सूहब = हे सूहे वेश वालिए! अगला = बहुत। अहि = दिन। निसि = रात। भाउ = प्रेम। चिहनु = लक्षण।
अर्थ: हे सूहे वेश वालिए! अगर तू सदा-स्थिर (प्रभु का) नाम मान ले तो तू सोहाग-भाग वाली हो जाए। अपने गुरु को प्रसन्न कर ले, बड़ी (नाम-) रंगत चढ़ आएगी (पर इस रंगत के लिए गुरु के बिना) कोई और जगह नहीं है। (सो गुरु की शरण पड़ कर) ऐसा (सुंदर) श्रृंगार बना जो कभी मैला ना हो और दिन-रात तेरा प्यार (प्रभु से) बना रहे।
हे नानक! (इसके बिना) सोहाग-भाग वाली जीव-स्त्री के और क्या लक्षण हो सकते हैं? उसके अंदर सच्चा नाम हो, मुँह (पर नाम की) लाली हो और वह पति-प्रभु में जुड़ी रहे।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः ३ ॥ लोका वे हउ सूहवी सूहा वेसु करी ॥ वेसी सहु न पाईऐ करि करि वेस रही ॥ नानक तिनी सहु पाइआ जिनी गुर की सिख सुणी ॥ जो तिसु भावै सो थीऐ इन बिधि कंत मिली ॥२॥

मूलम्

मः ३ ॥ लोका वे हउ सूहवी सूहा वेसु करी ॥ वेसी सहु न पाईऐ करि करि वेस रही ॥ नानक तिनी सहु पाइआ जिनी गुर की सिख सुणी ॥ जो तिसु भावै सो थीऐ इन बिधि कंत मिली ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे लोगो! मैं (निरी) सूहे वेश वाली (ही) हूँ, मैं (सिर्फ) सूहे कपड़े (ही) पहनती हूँ; पर (निरे) वेशों से पति (-प्रभु) नहीं मिलता, मैं भेस कर-कर के थक गई हूँ।
हे नानक! पति उनको (ही) मिलता है जिन्होंने सतिगुरु की शिक्षा सुनी है। (जब जीव-स्त्री इस अवस्था में पहुँच जाए कि) जो प्रभु को भाता है वही होता है, तो इस तरह वह प्रभु-पति को मिल जाती है।2।

[[0786]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ हुकमी स्रिसटि साजीअनु बहु भिति संसारा ॥ तेरा हुकमु न जापी केतड़ा सचे अलख अपारा ॥ इकना नो तू मेलि लैहि गुर सबदि बीचारा ॥ सचि रते से निरमले हउमै तजि विकारा ॥ जिसु तू मेलहि सो तुधु मिलै सोई सचिआरा ॥२॥

मूलम्

पउड़ी ॥ हुकमी स्रिसटि साजीअनु बहु भिति संसारा ॥ तेरा हुकमु न जापी केतड़ा सचे अलख अपारा ॥ इकना नो तू मेलि लैहि गुर सबदि बीचारा ॥ सचि रते से निरमले हउमै तजि विकारा ॥ जिसु तू मेलहि सो तुधु मिलै सोई सचिआरा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: स्रिसटि = जगत। बहु भिति = बहु भांति की। सचि = सच में, सदा-स्थिर प्रभु में। तजि = त्याग के। सचिआरा = सच का व्यापारी।
अर्थ: उस प्रभु ने ये सृष्टि ये संसार अपने हुक्म के अनुसार कई किस्मों का बनाया है।
हे सच्चे! हे अलख! और हे बेअंत प्रभु! ये समझ नहीं आती कि तेरा हुक्म कितना (बलवान) है। कई जीवों को तू गुरु-शब्द में जोड़ के अपने साथ मिला लेता है, वह अहंकार रूपी विकार त्याग के तेरे नाम में रंगे जाते हैं और पवित्र हो जाते हैं। हे प्रभु! जिसको तू मिलाता है वह तुझे मिलता है और वही सत्य का व्यापारी है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोकु मः ३ ॥ सूहवीए सूहा सभु संसारु है जिन दुरमति दूजा भाउ ॥ खिन महि झूठु सभु बिनसि जाइ जिउ टिकै न बिरख की छाउ ॥ गुरमुखि लालो लालु है जिउ रंगि मजीठ सचड़ाउ ॥ उलटी सकति सिवै घरि आई मनि वसिआ हरि अम्रित नाउ ॥ नानक बलिहारी गुर आपणे जितु मिलिऐ हरि गुण गाउ ॥१॥

मूलम्

सलोकु मः ३ ॥ सूहवीए सूहा सभु संसारु है जिन दुरमति दूजा भाउ ॥ खिन महि झूठु सभु बिनसि जाइ जिउ टिकै न बिरख की छाउ ॥ गुरमुखि लालो लालु है जिउ रंगि मजीठ सचड़ाउ ॥ उलटी सकति सिवै घरि आई मनि वसिआ हरि अम्रित नाउ ॥ नानक बलिहारी गुर आपणे जितु मिलिऐ हरि गुण गाउ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सूहवी = हे सूहे वेश वालिए! हे कुसंभ के रंग से प्यार करने वाली! सूहा = कुसंभ के रंग वाला, चुहचुहा, आकर्षित करने वाला रंग। बिरख = वृक्ष। रंगि = रंग में। सचड़ाउ = सच्चा, पक्का। सकति = माया। सिवै घरि = परमात्मा के घर। मनि = मन में। जितु मिलिऐ = जिस को मिल के।
अर्थ: हे कुसंभी रंग से प्यार करने वालिए! जिनके अंदर माया का मोह है और दुर्मति है, उन्हें संसार बहुत ही आकर्षक रंगों से भरा हुआ प्रतीत होता है (भाव, उन्हें दुनिया का मोह आकर्षित करता है); पर ये कुसंभ का रंग झूठा है पल में नाश हो जाता है जैसे वृक्ष की छाया नहीं टिकती।
जो जीव-स्त्री गुरु के सन्मुख होती है उसे पूरी तरह का पक्का लाल (नाम का) रंग चढ़ता है जैसे वह मजीठ के रंग में (रंगी हुई) है। वह माया से मुँह फेर के परमात्मा के स्वरूप में टिकती है। उसके मन में परमात्मा का अमृत नाम बसता है। हे नानक! अपने गुरु से सदके होएं, जिसको मिलने से परमात्मा के गुण गाते रहें।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः ३ ॥ सूहा रंगु विकारु है कंतु न पाइआ जाइ ॥ इसु लहदे बिलम न होवई रंड बैठी दूजै भाइ ॥ मुंध इआणी दुमणी सूहै वेसि लुोभाइ ॥ सबदि सचै रंगु लालु करि भै भाइ सीगारु बणाइ ॥ नानक सदा सोहागणी जि चलनि सतिगुर भाइ ॥२॥

मूलम्

मः ३ ॥ सूहा रंगु विकारु है कंतु न पाइआ जाइ ॥ इसु लहदे बिलम न होवई रंड बैठी दूजै भाइ ॥ मुंध इआणी दुमणी सूहै वेसि लुोभाइ ॥ सबदि सचै रंगु लालु करि भै भाइ सीगारु बणाइ ॥ नानक सदा सोहागणी जि चलनि सतिगुर भाइ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: विकारु = पाप, दुष्कर्म। बिलम = देरी, ढील। मुंध = स्त्री। दुंमणी = दुचिक्ती। वेसि = वेश में। लुोभाइ = (असल शब्द है ‘लोभाय’ यहाँ पढ़ना है ‘लुभाय’)। भाइ = भाय, प्रेम से। सीगारु = सजावट, सोहज। जि = जो (जीव स्त्रीयां)।
अर्थ: (जैसे) भड़कीला रंग (स्त्री के मन को आकर्षित करता है, वैसे ही) विकार (जीव-स्त्री को) आकर्षित करते हैं। (इस आकर्षण में फसने से) पति-प्रभु नहीं मिल सकता, (विकार के) इस (आकर्षित करने वाले रंग) के उतरते ही देरी भी नहीं लगती, (सो) माया के मोह में (फसी जीव-स्त्री को) रंडी हुई समझो। जो (माया के) आकर्षण वाले वेश में लोभित हुई हुई है वह (जीव) स्त्री अंजानी है उसका मन सदा डोलता है।
(जो जो जीव-स्त्री) सच्चे शब्द के द्वारा (प्रभु के नाम का पक्का) लाल रंग बना के, प्रभु के डर और प्रेम के द्वारा (अपने मन का) श्रृंगार करती हैं, जो सतिगुरु के प्यार में (इस जीवन-मार्ग पर) चलती हैं, हे नानक! वे सदा सोहाग-भाग वालियाँ हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ आपे आपि उपाइअनु आपि कीमति पाई ॥ तिस दा अंतु न जापई गुर सबदि बुझाई ॥ माइआ मोहु गुबारु है दूजै भरमाई ॥ मनमुख ठउर न पाइन्ही फिरि आवै जाई ॥ जो तिसु भावै सो थीऐ सभ चलै रजाई ॥३॥

मूलम्

पउड़ी ॥ आपे आपि उपाइअनु आपि कीमति पाई ॥ तिस दा अंतु न जापई गुर सबदि बुझाई ॥ माइआ मोहु गुबारु है दूजै भरमाई ॥ मनमुख ठउर न पाइन्ही फिरि आवै जाई ॥ जो तिसु भावै सो थीऐ सभ चलै रजाई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: उपाइअनु = उपाए उसने। कीमति = मूल्य, कद्र। बुझाई = समझ देता है। गुबारु = घुप अंधेरा। दूजै = और तरफ। ठउर = ठिकाना। रजाई = हुक्म में, रजा में।
अर्थ: प्रभु ने खुद ही (सारे जीव) पैदा किए हैं वह स्वयं ही (इनकी) कद्र जानता है। उस प्रभु का अंत नहीं पाया जा सकता (भाव, उसकी ये खेल समझी नहीं जा सकती), गुरु की समझ के द्वारा समझ (प्रभु स्वयं ही) बख्शता है।
माया का मोह (जैसे) घोर अंधेरा है (इस अंधेरे में चल के जीव जिंदगी का असल राह भूल के) और तरफ भटकने लग जाता है। मन के पीछे चलने वाले बँदों को (जिंदगी के सफर की) असल मंजिल नहीं मिलती, मनमुख मनुष्य बार-बार पैदा होता, मरता रहता है।
(पर कुछ कहा नहीं जा सकता) जो उस प्रभु को भाता है वही होता है, सारी सृष्टि उसकी रजा में चल रही है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोकु मः ३ ॥ सूहै वेसि कामणि कुलखणी जो प्रभ छोडि पर पुरख धरे पिआरु ॥ ओसु सीलु न संजमु सदा झूठु बोलै मनमुखि करम खुआरु ॥ जिसु पूरबि होवै लिखिआ तिसु सतिगुरु मिलै भतारु ॥ सूहा वेसु सभु उतारि धरे गलि पहिरै खिमा सीगारु ॥ पेईऐ साहुरै बहु सोभा पाए तिसु पूज करे सभु सैसारु ॥ ओह रलाई किसै दी ना रलै जिसु रावे सिरजनहारु ॥ नानक गुरमुखि सदा सुहागणी जिसु अविनासी पुरखु भरतारु ॥१॥

मूलम्

सलोकु मः ३ ॥ सूहै वेसि कामणि कुलखणी जो प्रभ छोडि पर पुरख धरे पिआरु ॥ ओसु सीलु न संजमु सदा झूठु बोलै मनमुखि करम खुआरु ॥ जिसु पूरबि होवै लिखिआ तिसु सतिगुरु मिलै भतारु ॥ सूहा वेसु सभु उतारि धरे गलि पहिरै खिमा सीगारु ॥ पेईऐ साहुरै बहु सोभा पाए तिसु पूज करे सभु सैसारु ॥ ओह रलाई किसै दी ना रलै जिसु रावे सिरजनहारु ॥ नानक गुरमुखि सदा सुहागणी जिसु अविनासी पुरखु भरतारु ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कामणि = स्त्री। कुलखणी = बुरे लक्षणों वाली। सीलु = शील, सद् आचरण। संजमु = संयम में चलना, युक्ति वाला जीवन। पूरबि = पहले से। भतारु = रक्षक। गलि = गले में। खिमा = किसी की गलती को सहने की आदत। पेईऐ = पेके घर में, इस लोक में। साहुरै = सहुरे घर में, परलोक में। ओह = वह जीव-स्त्री।
अर्थ: (माया के) आकर्षित रंगों भरे वेश में (मस्त जीव-स्त्री, मानो) बदकार स्त्री है जो प्रभु (पति) को बिसार के पराए मनुष्य के साथ प्यार करती है; उसका ना अच्छा आचरण है, ना जुगति वाला जीवन है, सदा झूठ बोलती है, मनमर्जी के कामों के कारण दुखी होती है। जिसके माथे पर धुर-दरगाह से सौभाग्य हों, उसको गुरु रखवाला मिल जाता है, फिर वह भड़कीला वेश सारा उतार देती है औरसहन-शीलता का गहना गले में पहनती है। इस लोक और परलोक में उसकी बड़ी इज्जत होती है, सारा जगत उसका आदर करता है। जिसको सारे जग का पैदा करने वाला पति मिल जाए, उसका जीवन निराला ही हो जाता है; हे नानक! जिसके सिर पर कभी ना मरने वाला पति हो, जो सदा गुरु के हुक्म में चले वह जीव-स्त्री सदा सोहाग भाग वाली होती है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः १ ॥ सूहा रंगु सुपनै निसी बिनु तागे गलि हारु ॥ सचा रंगु मजीठ का गुरमुखि ब्रहम बीचारु ॥ नानक प्रेम महा रसी सभि बुरिआईआ छारु ॥२॥

मूलम्

मः १ ॥ सूहा रंगु सुपनै निसी बिनु तागे गलि हारु ॥ सचा रंगु मजीठ का गुरमुखि ब्रहम बीचारु ॥ नानक प्रेम महा रसी सभि बुरिआईआ छारु ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: निसी = रात। ब्रहम बीचारु = प्रभु की विचार, ईश्वर की बातें। रसी = रसी हुई, भीगी हुई। छारु = राख।
अर्थ: (माया का) भड़कीला रंग (जैसे) रात का सपना है, (जैसे) धागे के बिना हार गले में डाला हुआ है; गुरु के सन्मुख हो के ईश्वर की महिमा की बातें (जैसे) मजीठ का पक्का रंग है।
हे नानक! जो जीव-स्त्री (प्रभु के) प्यार महा रस में भीगी हुई है उसकी सारी बुराईयाँ (जल के) राख हो जाती हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ इहु जगु आपि उपाइओनु करि चोज विडानु ॥ पंच धातु विचि पाईअनु मोहु झूठु गुमानु ॥ आवै जाइ भवाईऐ मनमुखु अगिआनु ॥ इकना आपि बुझाइओनु गुरमुखि हरि गिआनु ॥ भगति खजाना बखसिओनु हरि नामु निधानु ॥४॥

मूलम्

पउड़ी ॥ इहु जगु आपि उपाइओनु करि चोज विडानु ॥ पंच धातु विचि पाईअनु मोहु झूठु गुमानु ॥ आवै जाइ भवाईऐ मनमुखु अगिआनु ॥ इकना आपि बुझाइओनु गुरमुखि हरि गिआनु ॥ भगति खजाना बखसिओनु हरि नामु निधानु ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: उपाइओनु = उपाया उसने। चोज = करिश्मे, खेल। विडानु = हैरानगी, आश्चर्य चकित करने वाले। पंच धातु = पंच तत्व। पाईअनु = डाली है उसने। अगिआनु = ज्ञान हीन। बुझाइओनु = बुझाया है उसने। बखसिओनु = बख्शा है उसने। निधानु = खजाना।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘पाइअनु’ का भाव यहां ‘पाइअनु’ है जिसका अर्थ है ‘पाए है उसने’।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हैरान करने वाले करिश्में करके प्रभु ने खुद ही ये जगत पैदा किया, इसमें पाँच तत्व डाल दिए, जो मोह झूठ और घमण्ड (आदि के मूल) हैं। ज्ञानहीन मनमर्जी करने वाला मनुष्य (इनमें फंस के) भटकता है और पैदा होता मरता है।
कई जीवों को प्रभु ने गुरु के सन्मुख करके अपना ज्ञान खुद समझाया है और भक्ति व नाम-रूप खजाना बख्शा है।4।

[[0787]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोकु मः ३ ॥ सूहवीए सूहा वेसु छडि तू ता पिर लगी पिआरु ॥ सूहै वेसि पिरु किनै न पाइओ मनमुखि दझि मुई गावारि ॥ सतिगुरि मिलिऐ सूहा वेसु गइआ हउमै विचहु मारि ॥ मनु तनु रता लालु होआ रसना रती गुण सारि ॥ सदा सोहागणि सबदु मनि भै भाइ करे सीगारु ॥ नानक करमी महलु पाइआ पिरु राखिआ उर धारि ॥१॥

मूलम्

सलोकु मः ३ ॥ सूहवीए सूहा वेसु छडि तू ता पिर लगी पिआरु ॥ सूहै वेसि पिरु किनै न पाइओ मनमुखि दझि मुई गावारि ॥ सतिगुरि मिलिऐ सूहा वेसु गइआ हउमै विचहु मारि ॥ मनु तनु रता लालु होआ रसना रती गुण सारि ॥ सदा सोहागणि सबदु मनि भै भाइ करे सीगारु ॥ नानक करमी महलु पाइआ पिरु राखिआ उर धारि ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सूहवीए = हे कुसंभी रंग से प्यार करने वालिए! सूहा वेसु = आकर्षित करने वाला वेश, मन को मोहने वाले पदार्थों का चाव। दझि = जल के। गावारि = गवारनि। गुण सारि = प्रभु के गुण चेते कर के। करमी = प्रभु की मेहर से। उर = हृदय।
अर्थ: हे कुसंभी रंग से प्यार करने वालिए! मन को मोहने वाले पदार्थों का प्यार छोड़, तब ही तेरे अपने पति-प्रभु से प्यार बनेगा। इस भड़कीले रंग में (मोह डाल के) कभी किसी ने पति-प्रभु नहीं पाया, (ऐसी) मनमर्जी करने वाली मूर्ख स्त्री (इस मोह में ही) जल मरती है।
अगर गुरु मिल जाए तो अंदर से अहंकार दूर करने से शोख़-रंग माया का मोह दूर हो जाता है, मन और शरीर (नाम रूपी मजीठ रंग से) सुर्ख लाल हो जाता है, जीभ प्रभु के गुण याद कर के रंगी जाती है।
जिस जीव-स्त्री ने प्रभु के डर व प्यार से (अपने मन को) श्रृंगारा है जिस के मन में गुरु-शब्द बसता है वह सदा के लिए सोहाग-भाग वाली हो जाती है। हे नानक! प्रभु की मेहर से प्रभु को दिल में टिकाने से उसकी हजूरी प्राप्त होती है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः ३ ॥ मुंधे सूहा परहरहु लालु करहु सीगारु ॥ आवण जाणा वीसरै गुर सबदी वीचारु ॥ मुंध सुहावी सोहणी जिसु घरि सहजि भतारु ॥ नानक सा धन रावीऐ रावे रावणहारु ॥२॥

मूलम्

मः ३ ॥ मुंधे सूहा परहरहु लालु करहु सीगारु ॥ आवण जाणा वीसरै गुर सबदी वीचारु ॥ मुंध सुहावी सोहणी जिसु घरि सहजि भतारु ॥ नानक सा धन रावीऐ रावे रावणहारु ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मुंधे = हे स्त्री! परहरहु = छोड़ दे। घरि = हृदय घर में। सहजि = सहज अवस्था के कारण। साधन = स्त्री। रावीऐ = भोगी जाती है। रावणहारु = चोजी, आनंदी प्रभु।
अर्थ: हे जीव-स्त्री! मन को मोहने वाले पदार्थों का प्यार छोड़ के परमात्मा का नाम-श्रृंगार बना, जो (मानो, मजीठ का पक्का) लाल रंग है; गुरु के शब्द द्वारा (परमात्मा के नाम का) विचार कर, जनम-मरण का सिलसिला समाप्त हो जाएगा।
हे नानक! वह जीव-स्त्री सोहणी व सुंदर है जिसके हृदय-गृह में अडोल अवस्था बन जाने के कारण पति-प्रभु आ बसता है, उस जीव-स्त्री को चोजी प्रभु अपने साथ मिला लेता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ मोहु कूड़ु कुट्मबु है मनमुखु मुगधु रता ॥ हउमै मेरा करि मुए किछु साथि न लिता ॥ सिर उपरि जमकालु न सुझई दूजै भरमिता ॥ फिरि वेला हथि न आवई जमकालि वसि किता ॥ जेहा धुरि लिखि पाइओनु से करम कमिता ॥५॥

मूलम्

पउड़ी ॥ मोहु कूड़ु कुट्मबु है मनमुखु मुगधु रता ॥ हउमै मेरा करि मुए किछु साथि न लिता ॥ सिर उपरि जमकालु न सुझई दूजै भरमिता ॥ फिरि वेला हथि न आवई जमकालि वसि किता ॥ जेहा धुरि लिखि पाइओनु से करम कमिता ॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मुगधु = मूर्ख। कुटंबु = (भाव) घर का जंजाल। जमकालि = जमकाल ने। पाइओनु = पाया उस (प्रभु) ने। कमिता = करता है।
अर्थ: (इस जगत में) मोह, झूठ व जंजाल प्रबल हैं, मूर्ख मनमर्जी करने वाले बिगड़े हुए मनुष्य इसमें गलतान हुए पड़े हैं; ‘मैं मेरी’ में (भाव, ‘मैं बड़ा हूँ’, ‘ये मेरा पदार्थ है’ ये कह: कह के) मनमुख लोग (यहाँ) दुखी होते हैं, (और मरने के वक्त यहाँ से) कुछ साथ नहीं ले के चलते। माया में भटकने के कारण (इनको) सिर पर खड़ी मौत भी नहीं दिखती, और जब मौत ने आ दबोचा तब ये गवाया हुआ समय दोबारा हाथ नहीं आता।
(पर मनमुख भी क्या करें?) प्रभु ने (जीवों के पिछले किए कर्मों के अनुसार) जो लेख धुर से माथे पर लिख दिए, वे जीव वैसे ही कर्म कमाते हैं।5।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोकु मः ३ ॥ सतीआ एहि न आखीअनि जो मड़िआ लगि जलंन्हि ॥ नानक सतीआ जाणीअन्हि जि बिरहे चोट मरंन्हि ॥१॥

मूलम्

सलोकु मः ३ ॥ सतीआ एहि न आखीअनि जो मड़िआ लगि जलंन्हि ॥ नानक सतीआ जाणीअन्हि जि बिरहे चोट मरंन्हि ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सती = वह स्त्री जो अपने पति के मरने पर उसके साथ ही चिखा में जल मरती थी। आखीअनि = कही जाती थीं। मढ़ = लाश। बिरहा = विछोड़ा। एहि = ऐसी स्त्रीयां। जि = जो।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘एहि’ है ‘इह/यह’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: वह सि्त्रयाँ सती (हो गई) नहीं कहलवा सकती जो (पति की) लाश के साथ जल के मरती थी। हे नानक! जो (पति की मौत और) वियोग की चोट से ही मर जाएं उनको ही सती (हो गई) समझना चाहिए।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः ३ ॥ भी सो सतीआ जाणीअनि सील संतोखि रहंन्हि ॥ सेवनि साई आपणा नित उठि सम्हालंन्हि ॥२॥

मूलम्

मः ३ ॥ भी सो सतीआ जाणीअनि सील संतोखि रहंन्हि ॥ सेवनि साई आपणा नित उठि सम्हालंन्हि ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सील = शील, स्वच्छ आचरण। सील संतोखि = स्वच्छ आचरण रूप संतोष में। सेवनि = सेवा करती हैं। उठि = उठ के, उद्यम से।
अर्थ: उन स्त्रीयों को भी सती ही समझना चाहिए, जो पतिव्रता धर्म में रहती हैं, जो अपने पति की सेवा करती हैं और सदा उद्यम से अपना ये धर्म याद रखती हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः ३ ॥ कंता नालि महेलीआ सेती अगि जलाहि ॥ जे जाणहि पिरु आपणा ता तनि दुख सहाहि ॥ नानक कंत न जाणनी से किउ अगि जलाहि ॥ भावै जीवउ कै मरउ दूरहु ही भजि जाहि ॥३॥

मूलम्

मः ३ ॥ कंता नालि महेलीआ सेती अगि जलाहि ॥ जे जाणहि पिरु आपणा ता तनि दुख सहाहि ॥ नानक कंत न जाणनी से किउ अगि जलाहि ॥ भावै जीवउ कै मरउ दूरहु ही भजि जाहि ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: महेलीआ = स्त्रीयां। कंता नालि = जीवित पतियों से।

दर्पण-टिप्पनी

(नोट: जीव आत्मा के शरीर में से निकल जाने पर निरा शरीर ही किसी स्त्री का ‘कंत’ नहीं कहलवा सकता। ‘कंत’ जीवित मनुष्य ही हो सकता है; मरे मनुष्य के शरीर के वास्ते शब्द ‘मढ़’ बरता गया है; देखें शलोक नंबर 1)।

दर्पण-भाषार्थ

सेती = साथ। सेती अगि जलाहि = आग से जलती हैं, दुख सहती हैं, जगत के दुख सुख में कंत का साथ देती हैं। कै = चाहे, यद्यपि। भावै जीवउ कै मरउ = चाहे जीए चाहे मरे, चाहे सुखी होवे चाहे दुखी होवे!

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘जीवउ, मरउ’ हैं हुकमी भविष्यत अन्न पुरुख, एकवचन; देखें ‘गुरबाणी व्याकरण’।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: (सती) सि्त्रयाँ अपने पति के जीते जी उसकी सेवा करती हैं, पति को ‘अपना’ समझती हैं तभी शरीर के दुख सहती हैं। पर, हे नानक! जिन्होंने पति को पति ना समझा, वे क्यों दुख सहेंगी? पति चाहे सुखी हो चाहे दुखी हो वह (मुश्किल के वक्त) नजदीक नहीं फटकतीं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ तुधु दुखु सुखु नालि उपाइआ लेखु करतै लिखिआ ॥ नावै जेवड होर दाति नाही तिसु रूपु न रिखिआ ॥ नामु अखुटु निधानु है गुरमुखि मनि वसिआ ॥ करि किरपा नामु देवसी फिरि लेखु न लिखिआ ॥ सेवक भाइ से जन मिले जिन हरि जपु जपिआ ॥६॥

मूलम्

पउड़ी ॥ तुधु दुखु सुखु नालि उपाइआ लेखु करतै लिखिआ ॥ नावै जेवड होर दाति नाही तिसु रूपु न रिखिआ ॥ नामु अखुटु निधानु है गुरमुखि मनि वसिआ ॥ करि किरपा नामु देवसी फिरि लेखु न लिखिआ ॥ सेवक भाइ से जन मिले जिन हरि जपु जपिआ ॥६॥

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे कर्तार! (जगत में जीव पैदा करके) दुख और सुख भी तूने उनके साथ ही पैदा कर दिए, (दुख और सुख के) लेख भी (तूने उनके माथे पर) लिख दिए।
जिस प्रभु का ना कोई खास रूप ना रेख है, उसके नाम के बराबर (जीवों के लिए) और कोई बख्शिश नहीं है, ‘नाम’ एक ऐसा खजाना है जो कभी खत्म नहीं होता, गुरु के सन्मुख होने पर ये मन में बसता है। जिस मनुष्य पर मेहर करके प्रभु अपना ‘नाम’ देता है, उस (के अच्छे-बुरे कर्मों) का लेख दोबारा नहीं लिखता। पर, वही मनुष्य प्रभु को मिलते हैं जो सेवक भाव में रह के हरि-नाम का जाप करते हैं।6।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोकु मः २ ॥ जिनी चलणु जाणिआ से किउ करहि विथार ॥ चलण सार न जाणनी काज सवारणहार ॥१॥

मूलम्

सलोकु मः २ ॥ जिनी चलणु जाणिआ से किउ करहि विथार ॥ चलण सार न जाणनी काज सवारणहार ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: वह मनुष्य दुनिया के बड़े पसारे नहीं पसारते (भाव, मन को जगत के धंधों में खिलार देते) जिन्होंने ये समझ लिया है कि यहाँ से चले जाना है; पर निरे दुनिया के काम सुलझाने वाले बंदे (यहाँ से आखिर) चले जाने का ख्याल भी नहीं करते।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः २ ॥ राति कारणि धनु संचीऐ भलके चलणु होइ ॥ नानक नालि न चलई फिरि पछुतावा होइ ॥२॥

मूलम्

मः २ ॥ राति कारणि धनु संचीऐ भलके चलणु होइ ॥ नानक नालि न चलई फिरि पछुतावा होइ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे नानक! अगर सिर्फ रात के कारण धन इकट्ठा करें तो सवेरे (यहाँ से उठ के) चल पड़ना है (चलने के वक्त वह धन) साथ ना जा सके तो हाथ मलने पड़ने हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः २ ॥ बधा चटी जो भरे ना गुणु ना उपकारु ॥ सेती खुसी सवारीऐ नानक कारजु सारु ॥३॥

मूलम्

मः २ ॥ बधा चटी जो भरे ना गुणु ना उपकारु ॥ सेती खुसी सवारीऐ नानक कारजु सारु ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: गुणु = (अपने आप को) लाभ। उपकारु = (किसी और को) लाभ। सेती खुशी = खुशी से। सारु = अच्छा।
अर्थ: जो मनुष्य कोई काम बेमना हो के (खुशी से ना) करे, तो उसका लाभ ना उसे खुद को ना किसी और को। हे नानक! वही काम सफल हुआ समझो जो खुशी से (मन लगाकर) किया जाए।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः २ ॥ मनहठि तरफ न जिपई जे बहुता घाले ॥ तरफ जिणै सत भाउ दे जन नानक सबदु वीचारे ॥४॥

मूलम्

मः २ ॥ मनहठि तरफ न जिपई जे बहुता घाले ॥ तरफ जिणै सत भाउ दे जन नानक सबदु वीचारे ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हठि = हठ से। जिपई = जीता जाता है। जिणै = जीतता है। सत भाउ = अच्छी भावना, नेक नीयति। दे = दे के। तरफ = (ईश्वर वाला) पासा।
अर्थ: चाहे कितनी ही मेहनत मनुष्य करे, ईश्वर वाला पासा मन के हठ से नही जीता जा सकता, हे दास नानक! वह मनुष्य (यह) पासा जीतता है जो शुभ भावना बरतता है और गुरु के शब्द को विचारता है।4।

[[0788]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ करतै कारणु जिनि कीआ सो जाणै सोई ॥ आपे स्रिसटि उपाईअनु आपे फुनि गोई ॥ जुग चारे सभ भवि थकी किनि कीमति होई ॥ सतिगुरि एकु विखालिआ मनि तनि सुखु होई ॥ गुरमुखि सदा सलाहीऐ करता करे सु होई ॥७॥

मूलम्

पउड़ी ॥ करतै कारणु जिनि कीआ सो जाणै सोई ॥ आपे स्रिसटि उपाईअनु आपे फुनि गोई ॥ जुग चारे सभ भवि थकी किनि कीमति होई ॥ सतिगुरि एकु विखालिआ मनि तनि सुखु होई ॥ गुरमुखि सदा सलाहीऐ करता करे सु होई ॥७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कारणु = जगत। गोई = नाश की। फुनि = दोबारा। जुग चारे = चारे युगों में। भवि = भउ के। किनि = किससे?
अर्थ: जिस कर्तार ने यह जगत बनाया है इसकी संभाल करनी वह खुद ही जानता है; उसने खुद ही सृष्टि पैदा की है, और खुद ही फिर नाश करता है। जब से जगत बना है उस समय से लेकर अब तक ध्यान लगा के देखा है किसी भी जीव द्वारा प्रभु की बुजुर्गीयत का मूल्य नहीं पड़ सका (महानता आँकी नहीं जा सकी)।
जिस मनुष्य को गुरु ने वह एक प्रभु दिखा दिया है उस के मन में उसके तन में सुख होता है; जो कर्तार सब कुछ करने में खुद समर्थ है उसकी गुरु के माध्यम से ही महिमा की जा सकती है।7।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोक महला २ ॥ जिना भउ तिन्ह नाहि भउ मुचु भउ निभविआह ॥ नानक एहु पटंतरा तितु दीबाणि गइआह ॥१॥

मूलम्

सलोक महला २ ॥ जिना भउ तिन्ह नाहि भउ मुचु भउ निभविआह ॥ नानक एहु पटंतरा तितु दीबाणि गइआह ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मुचु = बहुत। पटंतरा = निर्णय, निबेड़ा। दीबाणि = दीवान में, हजूरी में। तितु दीबाणि = उस (रूहानी) हजूरी में।
अर्थ: जिस मनुष्यों को (ईश्वर का) डर है उनको (दुनिया वाला कोई) डर नहीं (सताता), (ईश्वर की ओर से जो) निडर (बनते फिरते हैं, उन) को (दुनिया का) बहुत डर सताता है। हे नानक! यह निर्णय तब होता है जब मनुष्य उस (ईश्वर) हजूरी में पहुँचे (भाव, जब प्रभु के चरणों में जुड़े)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः २ ॥ तुरदे कउ तुरदा मिलै उडते कउ उडता ॥ जीवते कउ जीवता मिलै मूए कउ मूआ ॥ नानक सो सालाहीऐ जिनि कारणु कीआ ॥२॥

मूलम्

मः २ ॥ तुरदे कउ तुरदा मिलै उडते कउ उडता ॥ जीवते कउ जीवता मिलै मूए कउ मूआ ॥ नानक सो सालाहीऐ जिनि कारणु कीआ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जीवता = जीवित दिलों वाला, जिंदा दिल। मूआ = मर्दा दिल। जिनि = जिस (प्रभु) ने। उडता = उड़ने वाला, पंक्षी। मिलै = साथ करता है।
अर्थ: (चीटीं से लेकर हाथी और मनुष्य तक) चलने वाले के साथ चलने वाला साथ करता है और उड़ने वाले के साथ (भाव, पंछी) के साथ उड़ने वाला। जिंदा दिल को जिंदा दिल मनुष्य आ मिलता है और मुर्दा दिल को मुर्दा दिल (भाव, हरेक जीव अपने-अपने स्वभाव वाले का ही संग करना पसंद करता है)।
हे नानक! (जीव भी ईश्वरीय गुणो वाला है, सो, इसको) चाहिए कि जिस प्रभु ने ये जगत रचा है उसकी महिमा करे (भाव, उसके साथ मन जोड़े)।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ सचु धिआइनि से सचे गुर सबदि वीचारी ॥ हउमै मारि मनु निरमला हरि नामु उरि धारी ॥ कोठे मंडप माड़ीआ लगि पए गावारी ॥ जिन्हि कीए तिसहि न जाणनी मनमुखि गुबारी ॥ जिसु बुझाइहि सो बुझसी सचिआ किआ जंत विचारी ॥८॥

मूलम्

पउड़ी ॥ सचु धिआइनि से सचे गुर सबदि वीचारी ॥ हउमै मारि मनु निरमला हरि नामु उरि धारी ॥ कोठे मंडप माड़ीआ लगि पए गावारी ॥ जिन्हि कीए तिसहि न जाणनी मनमुखि गुबारी ॥ जिसु बुझाइहि सो बुझसी सचिआ किआ जंत विचारी ॥८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सचु = सदा स्थिर रहने वाला प्रभु! सबदि = शब्द के द्वारा। उरि = हृदय में। मंडप = बड़े कमरे। माड़ीआं = महल। गुबारी = अंधेरे में।
अर्थ: गुरु के शब्द के द्वारा उच्च विचार वाले हो के जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभु को स्मरण करते हैं वह भी उसका रूप हो जाते हैं; प्रभु का नाम हृदय में रख के अहंकार को मार के उनका मन पवित्र हो जाता है।
पर मूर्ख मनुष्य घरों महलों माड़ियों (के मोह) में लग जाते हैं, मनमुख (मोह के) घोर अंधेरे में फंस के उसको पहचानते ही नहीं जिसने पैदा किया है।
हे सदा स्थिर रहने वाले प्रभु! जीव बिचारे क्या हैं? तू जिसे समझ बख्शता है वही समझता है।8।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोक मः ३ ॥ कामणि तउ सीगारु करि जा पहिलां कंतु मनाइ ॥ मतु सेजै कंतु न आवई एवै बिरथा जाइ ॥ कामणि पिर मनु मानिआ तउ बणिआ सीगारु ॥ कीआ तउ परवाणु है जा सहु धरे पिआरु ॥ भउ सीगारु तबोल रसु भोजनु भाउ करेइ ॥ तनु मनु सउपे कंत कउ तउ नानक भोगु करेइ ॥१॥

मूलम्

सलोक मः ३ ॥ कामणि तउ सीगारु करि जा पहिलां कंतु मनाइ ॥ मतु सेजै कंतु न आवई एवै बिरथा जाइ ॥ कामणि पिर मनु मानिआ तउ बणिआ सीगारु ॥ कीआ तउ परवाणु है जा सहु धरे पिआरु ॥ भउ सीगारु तबोल रसु भोजनु भाउ करेइ ॥ तनु मनु सउपे कंत कउ तउ नानक भोगु करेइ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कामणि = हे स्त्री! तउ = तब। मतु = मता, प्रस्ताव। बिरथा = व्यर्थ। पिर मनु = पति का मन। कीआ = (श्रृंगार) किया हुआ। तबोल = पान। भाउ = प्यार।
अर्थ: हे स्त्री! तब श्रृंगार कर जब पहले पति को रिझा ले, (नहीं तो) कहीं ऐसा ना हो कि पति सेज पर आए ही ना और (तेरा किया हुआ) श्रंृगार ऐसे व्यर्थ चला जाए। हे स्त्री! अगर पति का मन मान जाए तो ही किए हुए श्रृंगार को सफल समझ। स्त्री का किया हुआ श्रृंगार तभी स्वीकार है अगर पति उसको प्यार करे।
हे नानक! अगर जीव-स्त्री प्रभु के डर (में रहने) को श्रृंगार और पान का रस बनाती है, प्रभु के प्यार को भोजन (भाव, जिंदगी का आधार) बनाती है, और अपना तन मन पति प्रभु के हवाले कर देती है (भाव, पूर्ण तौर पर प्रभु की रजा में चलती है) उसको ही पति-प्रभु मिलता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः ३ ॥ काजल फूल त्मबोल रसु ले धन कीआ सीगारु ॥ सेजै कंतु न आइओ एवै भइआ विकारु ॥२॥

मूलम्

मः ३ ॥ काजल फूल त्मबोल रसु ले धन कीआ सीगारु ॥ सेजै कंतु न आइओ एवै भइआ विकारु ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: काजल = सुर्मा। धन = स्त्री ने। विकारु = बुरा काम। एवै = ऐसे, बल्कि।
अर्थ: स्त्री ने सुर्मा, फूल और पान का रस ले के श्रृंगार किया, (पर अगर) पति सेज पर ना आया तो ये (किया हुआ) श्रृंगार बल्कि बेकार हो गया (क्योंकि विछोड़े के कारण ये दुखद हो गया)।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः ३ ॥ धन पिरु एहि न आखीअनि बहनि इकठे होइ ॥ एक जोति दुइ मूरती धन पिरु कहीऐ सोइ ॥३॥

मूलम्

मः ३ ॥ धन पिरु एहि न आखीअनि बहनि इकठे होइ ॥ एक जोति दुइ मूरती धन पिरु कहीऐ सोइ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: एहि = यह, वे। मूरती = जिस्म।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘एहि’ है ‘इह/यह’ का बहुवचन।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: जो (सिर्फ शारीरिक तौर पर) मिल के बैठैं उन्हें असल पति-पत्नी नहीं कहा जाता, जिनके दोनों जिस्मों में एक ही आत्मा हो जाए (दरअसल) वही असली पत्नी है और असल पति है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ भै बिनु भगति न होवई नामि न लगै पिआरु ॥ सतिगुरि मिलिऐ भउ ऊपजै भै भाइ रंगु सवारि ॥ तनु मनु रता रंग सिउ हउमै त्रिसना मारि ॥ मनु तनु निरमलु अति सोहणा भेटिआ क्रिसन मुरारि ॥ भउ भाउ सभु तिस दा सो सचु वरतै संसारि ॥९॥

मूलम्

पउड़ी ॥ भै बिनु भगति न होवई नामि न लगै पिआरु ॥ सतिगुरि मिलिऐ भउ ऊपजै भै भाइ रंगु सवारि ॥ तनु मनु रता रंग सिउ हउमै त्रिसना मारि ॥ मनु तनु निरमलु अति सोहणा भेटिआ क्रिसन मुरारि ॥ भउ भाउ सभु तिस दा सो सचु वरतै संसारि ॥९॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नामि = नाम में। भाइ = भाव से, प्रेम से। भेटिआ = मिला। मुरारी = (मुर+अरि) ‘मुर’ दैत्य का वैरी, कृष्ण, भाव प्रभु।
अर्थ: प्रभु के डर (में रहे) बिना उसकी भक्ति नहीं हो सकती और उसके नाम में प्यार नहीं बन सकता (भाव, उसका नाम प्यारा नहीं लग सकता); ये डर तब ही पैदा होता है अगर गुरु मिले, (इस तरह) डर से प्यार से (भक्ति का) रंग बढ़िया चढ़ता है।
(प्रभु के डर और प्यार की सहायता से) अहंकार और तृष्णा को मार के मनुष्य का मन और शरीर (प्रभु की भक्ति के) रंग से रंगे जाते हैं; प्रभु को मिलके शरीर और मन पवित्र व सुंदर हो जाते हैं।
ये डर और प्रेम सब कुछ जिस प्रभु का (बख्शा हुआ मिलता) है वह खुद जगत में (हर जगह) मौजूद है।9।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोक मः १ ॥ वाहु खसम तू वाहु जिनि रचि रचना हम कीए ॥ सागर लहरि समुंद सर वेलि वरस वराहु ॥ आपि खड़ोवहि आपि करि आपीणै आपाहु ॥ गुरमुखि सेवा थाइ पवै उनमनि ततु कमाहु ॥ मसकति लहहु मजूरीआ मंगि मंगि खसम दराहु ॥ नानक पुर दर वेपरवाह तउ दरि ऊणा नाहि को सचा वेपरवाहु ॥१॥

मूलम्

सलोक मः १ ॥ वाहु खसम तू वाहु जिनि रचि रचना हम कीए ॥ सागर लहरि समुंद सर वेलि वरस वराहु ॥ आपि खड़ोवहि आपि करि आपीणै आपाहु ॥ गुरमुखि सेवा थाइ पवै उनमनि ततु कमाहु ॥ मसकति लहहु मजूरीआ मंगि मंगि खसम दराहु ॥ नानक पुर दर वेपरवाह तउ दरि ऊणा नाहि को सचा वेपरवाहु ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: वाहु = धन्य, आश्चर्य। हम कीए = हमें बनाया। वेलि = (हरि) बेल। वरस = वर्षा। वराहु = बादल। आपीणै = आप ही ने, तूने स्वयं ही। आपहु = निर्लिप, पाह के बिना। उनमनि = उत्साह से। मसकति = मुशक्कत, मेहनत करके। दराहु = दर से। पुर = भरे हुए। वेपरवाह = हे बेपरवाह प्रभु! दरि = दर पे। ऊणा = वंचित, सखणा।
अर्थ: हे मालिक पति! तू धन्य है! तू धन्य है! जिसने जगत रचना रच के हम (जीवों को) पैदा किया है। समुंदर, समुंदर की लहरें, तालाब, हरि बेलें, बरखा करने वाले बादल - (ये सारी रचना करने वाला तू ही तो है)।
तू खुद ही सबको पैदा करके सब में खुद व्यापक है और (सबसे निर्लिप भी है) उत्साह से तेरे नाम की कमाई करके गुरसिखों की मेहनत (तेरे दर पर) स्वीकार हो जाती है, वे बँदगी की मेहनत करके, हे पति! तेरे दर से मांग-मांग के मजदूरी लेते हैं (मुरादें पाते हैं)।
हे नानक! (कह:) हे बेपरवाह प्रभु! तेरे दर (बरकतों से) भरे पड़े हैं, कोई जीव तेरे दर पर (आ के) खाली नहीं गया, तू सदा कायम रहने वाला और बेमुहताज है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

महला १ ॥ उजल मोती सोहणे रतना नालि जुड़ंनि ॥ तिन जरु वैरी नानका जि बुढे थीइ मरंनि ॥२॥

मूलम्

महला १ ॥ उजल मोती सोहणे रतना नालि जुड़ंनि ॥ तिन जरु वैरी नानका जि बुढे थीइ मरंनि ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: उजल = उज्जवल, सफेद, साफ। मोती = भाव, दाँत। रतनु = भाव, आँखें। जरु = बुढ़ापा। थीइ = हो के। तिन = उनके (शरीर) का। जुड़ंनि = शोभा दे रहे हैं।
अर्थ: जो शरीर सुंदर सफेद दाँतों से सुंदर नैनों से शोभा दे रहे हैं, हे नानक! बुढ़ापा इनका वैरी है, क्योंकि बुढे हो के ये नाश हो जाते हैं।2।

[[0789]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ हरि सालाही सदा सदा तनु मनु सउपि सरीरु ॥ गुर सबदी सचु पाइआ सचा गहिर ग्मभीरु ॥ मनि तनि हिरदै रवि रहिआ हरि हीरा हीरु ॥ जनम मरण का दुखु गइआ फिरि पवै न फीरु ॥ नानक नामु सलाहि तू हरि गुणी गहीरु ॥१०॥

मूलम्

पउड़ी ॥ हरि सालाही सदा सदा तनु मनु सउपि सरीरु ॥ गुर सबदी सचु पाइआ सचा गहिर ग्मभीरु ॥ मनि तनि हिरदै रवि रहिआ हरि हीरा हीरु ॥ जनम मरण का दुखु गइआ फिरि पवै न फीरु ॥ नानक नामु सलाहि तू हरि गुणी गहीरु ॥१०॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सउपि = सौंप के, हवाले करके। गहिर = गहरे। गंभीरु = जिगरे वाला। हीरा हीरु = हीरों में से हीरा, श्रेष्ठ हीरा (रूप)। फीरु = फेरा। गुणी = गुणों का मालिक। गहीरु = गहरा, जिगरे वाला, बड़े दिल वाला।
अर्थ: (हे जीव!) तन मन शरीर (अपना आप) प्रभु के हवाले करके (भाव, प्रभु की पूर्ण रजा में रह के) सदा उसकी महिमा कर; (जिस मनुष्य ने) गुरु के शब्द के द्वारा (उसे स्मरण किया है, उसको) सदा-स्थिर रहने वाला, गहरे बड़े दिल वाला प्रभु मिल जाता है, उसके मन में तन में हीरों का हीरा (अमूल्य हीरा) प्रभु आ बसता है, उसके जनम-मरण का दुख मिट जाता है, उसको फिर (इस चक्कर में) चक्कर नहीं लगाने पड़ते।
(सो) हे नानक! तू भी उस प्रभु का नाम स्मरण कर जो गुणों का मालिक है और बड़े दिल वाला है।10।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोक मः १ ॥ नानक इहु तनु जालि जिनि जलिऐ नामु विसारिआ ॥ पउदी जाइ परालि पिछै हथु न अ्मबड़ै तितु निवंधै तालि ॥१॥

मूलम्

सलोक मः १ ॥ नानक इहु तनु जालि जिनि जलिऐ नामु विसारिआ ॥ पउदी जाइ परालि पिछै हथु न अ्मबड़ै तितु निवंधै तालि ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तनु = शरीर, शरीर का मोह, देह अध्यास। जिनि = जिस (शरीर) ने। जलिऐ = (तृष्णा की आग में) जले हुए ने। परालि = पराली, पापों की पराली। निवंधै तालि = नीचे तालाब में, गिरावट में आए हुए हृदय में। अंबड़ै = पहुँचता है। पउदी जाइ = पड़ती जाती है। तितु = इस में।
अर्थ: हे नानक! (तृष्णा की आग में) जले हुए इस शरीर ने प्रभु का ‘नाम’ विसार दिया है, इसलिए, शरीर के मोह को खत्म कर दे। (तृष्णा के कारण) गिरे हुए इस हृदय-तालाब में (पापों की) पराली एकत्र हो रही है (इसको निकालने के लिए) फिर पेश नहीं जाएगी (फिर तुझसे नहीं निकलेगी)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः १ ॥ नानक मन के कम फिटिआ गणत न आवही ॥ किती लहा सहम जा बखसे ता धका नही ॥२॥

मूलम्

मः १ ॥ नानक मन के कम फिटिआ गणत न आवही ॥ किती लहा सहम जा बखसे ता धका नही ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: फिटिआ = धिक्कारयोग्य, बुरे। सहंम = सहम, फिक्र। किती = कितने। लहा = मैं सहूँगा।
अर्थ: हे नानक! मेरे मन के इतने बुरे काम हैं कि गिने नहीं जा सकते, (इनके कारण) मुझे सहम भी बड़े सहने पड़ रहे हैं, जब प्रभु खुद बख्शता है तो (उसकी हजूरी में से) धक्का नहीं मिलता (भेद-भाव नहीं होता)।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ सचा अमरु चलाइओनु करि सचु फुरमाणु ॥ सदा निहचलु रवि रहिआ सो पुरखु सुजाणु ॥ गुर परसादी सेवीऐ सचु सबदि नीसाणु ॥ पूरा थाटु बणाइआ रंगु गुरमति माणु ॥ अगम अगोचरु अलखु है गुरमुखि हरि जाणु ॥११॥

मूलम्

पउड़ी ॥ सचा अमरु चलाइओनु करि सचु फुरमाणु ॥ सदा निहचलु रवि रहिआ सो पुरखु सुजाणु ॥ गुर परसादी सेवीऐ सचु सबदि नीसाणु ॥ पूरा थाटु बणाइआ रंगु गुरमति माणु ॥ अगम अगोचरु अलखु है गुरमुखि हरि जाणु ॥११॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सचु फुरमाणु = नाम स्मरण रूपी हुक्म। सचा = अटल। सुजाणु = सियाना। नीसाणु = निशाना, जीवन का आर्दश। थाटु = संरचना, स्मरण रूप रचना।
अर्थ: नाम स्मरण का नेम बना के प्रभु ने ये अटल हुक्म बना दिया है। वह प्रभु सब जीवों में व्यापक है (हरेक की भलाई को) अच्छी तरह जानने वाला है, सदा कायम रहने वाला है और हर जगह मौजूद है।
गुरु के शब्द के द्वारा प्रभु-स्मरण-रूप जीवन आदर्श मिलता है, सो, गुरु की मेहर प्राप्त कर के स्मरण करें। प्रभु के नाम-जपने की बनतर ऐसी है जो सम्पूर्ण है (जिसमें कोई कमी नहीं); (हे जीव!) गुरु की शिक्षा पर चल कर स्मरण के रंग का मजा ले।
प्रभु है तो अगम्य (पहुँच से परे), इन्द्रियों की पहुँच से परे और अदृश्य; पर गुरु के सन्मुख होने से उसकी समझ पड़ जाती है।11।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोक मः १ ॥ नानक बदरा माल का भीतरि धरिआ आणि ॥ खोटे खरे परखीअनि साहिब कै दीबाणि ॥१॥

मूलम्

सलोक मः १ ॥ नानक बदरा माल का भीतरि धरिआ आणि ॥ खोटे खरे परखीअनि साहिब कै दीबाणि ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बदरा = थैली। माल का बदरा = रुपयों की थैली, किए कर्मों का इकट्ठ। आणि = ला के। परखीअनि = परखे जाते हैं। दीबाणि = हजूरी में।
अर्थ: हे नानक! (किसी मालिक का नौकर) रुपयों की थैली (कमा के) अंदर ला के रखता है, मालिक के सामने खोटे और खरे रुपए परखे जाते हैं (इसी तरह ये जीव-बंजारा शाह-प्रभु का भेजा हुआ यहाँ वणज करके अच्छे-बुरे कर्मों के संस्कार इकट्ठे करता रहता है, मालिक प्रभु की हजूरी में नितारा हो जाता है कि यहाँ खोट ही कमा रहा है कि भलाई भी)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः १ ॥ नावण चले तीरथी मनि खोटै तनि चोर ॥ इकु भाउ लथी नातिआ दुइ भा चड़ीअसु होर ॥ बाहरि धोती तूमड़ी अंदरि विसु निकोर ॥ साध भले अणनातिआ चोर सि चोरा चोर ॥२॥

मूलम्

मः १ ॥ नावण चले तीरथी मनि खोटै तनि चोर ॥ इकु भाउ लथी नातिआ दुइ भा चड़ीअसु होर ॥ बाहरि धोती तूमड़ी अंदरि विसु निकोर ॥ साध भले अणनातिआ चोर सि चोरा चोर ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: मनि खोटै = खोटे मन से। तनि = शरीर में। चोर = कामादिक चोर। इकु भाउ = एक हिस्सा। लथी = (मैल) उतर गई। दुइ भा = दो हिस्से। होर = और मैल। तुंमड़ी = तुंमी। विसु = जहर। निकोर = असली।
अर्थ: अगर खोटे मन से तीर्थों पर नहाने चल पड़ें और शरीर में कामादिक चोर भी टिके रहे, तो नहाने से एक हिस्सा (भाव, शरीर की बाहरी) मैल तो उतर गई पर (मन में अहंकार आदि की) दुगनी मैल और चढ़ गई, (तुंमी वाला हाल ही हुआ) तुंमी बाहर से तो धोई गई, पर उसके अंदर खालिस विष (भाव, कड़वाहट) टिकी रही।
भले मनुष्य (तीर्थों पर) नहाए बिना ही भले हैं, और चोर (तीर्थों पर नहा के भी) चोर हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ आपे हुकमु चलाइदा जगु धंधै लाइआ ॥ इकि आपे ही आपि लाइअनु गुर ते सुखु पाइआ ॥ दह दिस इहु मनु धावदा गुरि ठाकि रहाइआ ॥ नावै नो सभ लोचदी गुरमती पाइआ ॥ धुरि लिखिआ मेटि न सकीऐ जो हरि लिखि पाइआ ॥१२॥

मूलम्

पउड़ी ॥ आपे हुकमु चलाइदा जगु धंधै लाइआ ॥ इकि आपे ही आपि लाइअनु गुर ते सुखु पाइआ ॥ दह दिस इहु मनु धावदा गुरि ठाकि रहाइआ ॥ नावै नो सभ लोचदी गुरमती पाइआ ॥ धुरि लिखिआ मेटि न सकीऐ जो हरि लिखि पाइआ ॥१२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दहदिस = दसों दिशाओं में। गुरि = गुरु ने। सभ = सारी दुनिया।
अर्थ: प्रभु खुद ही अपना हुक्म बरता रहा है और जगत को उसने खुद ही मायावी धंधे में लगा रखा है, जिन्हें उसने खुद ही (नाम में) जोड़ रखा है उन्होंने गुरु की शरण पड़ कर सुख हासिल किए हैं।
मनुष्य का ये मन दसों-दिशाओं में दौड़ता है, (शरण आए मनुष्य का मन) गुरु ने (ही) रोक के रखा है; सारी लोकाई प्रभु के नाम की तमन्ना करती है, पर मिलता गुरु की मति लेने से ही है।
(गुरु का मिलना भी सौभाग्य वाली बात है, और) जो लेख प्रभु ने आदि से माथे पर लिख दिए हैं वह मिटाए नहीं जा सकते।12।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोक मः १ ॥ दुइ दीवे चउदह हटनाले ॥ जेते जीअ तेते वणजारे ॥ खुल्हे हट होआ वापारु ॥ जो पहुचै सो चलणहारु ॥ धरमु दलालु पाए नीसाणु ॥ नानक नामु लाहा परवाणु ॥ घरि आए वजी वाधाई ॥ सच नाम की मिली वडिआई ॥१॥

मूलम्

सलोक मः १ ॥ दुइ दीवे चउदह हटनाले ॥ जेते जीअ तेते वणजारे ॥ खुल्हे हट होआ वापारु ॥ जो पहुचै सो चलणहारु ॥ धरमु दलालु पाए नीसाणु ॥ नानक नामु लाहा परवाणु ॥ घरि आए वजी वाधाई ॥ सच नाम की मिली वडिआई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दुइ = दोनों, चाँद और सूर्य। चउदह = चौदों लोक। हटनाले = बाजार। लाहा = नफा। घरि = घर में, भटकना से हट के प्रभु के दर पर। वाधाई वजी = बाधाई बजती है, चढ़दी कला बनती है।
अर्थ: जगत-रूपी शहर में चाँद और सूरज, जैसे दो दीप जग रहे हैं, और चौदह लोक (इस जगत-शहर के, जैसे) बाजार हैं, सारे जीव (इस शहर के) व्यापारी हैं। जब दुकान खुल गई (जगत-रचना हुई), व्यापार होने लगा। जो जो व्यापारी यहाँ आता है वह मुसाफिर ही होता है।
(हरेक जीव-व्यापारी के करणी-रूपी सौदे पर) धर्म-रूपी दलाल निशान लगाए जाता है (कि इसका सौदा खरा है अथवा खोटा), हे नानक! (शाह-प्रभु की हाट पर) ‘नाम’ नफा ही स्वीकार होता है। जो (ये नफा कमा के) हजूरी में पहुँचता है उसको लाली चढ़ती है और सच्चे नाम की (प्राप्ति का) उसको महातम (बड़ाई) मिलता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः १ ॥ राती होवनि कालीआ सुपेदा से वंन ॥ दिहु बगा तपै घणा कालिआ काले वंन ॥ अंधे अकली बाहरे मूरख अंध गिआनु ॥ नानक नदरी बाहरे कबहि न पावहि मानु ॥२॥

मूलम्

मः १ ॥ राती होवनि कालीआ सुपेदा से वंन ॥ दिहु बगा तपै घणा कालिआ काले वंन ॥ अंधे अकली बाहरे मूरख अंध गिआनु ॥ नानक नदरी बाहरे कबहि न पावहि मानु ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: से वंन = वही रंग। सुपेदा = सफेद चीजों का। दिहु = दिन। बगा = सफेद। घणा = बहुत। वंन = रंग। अंध गिआनु = अंनी मति।
अर्थ: रातें काली होती हैं (पर) सफेद चीजों के वही सफेद रंग ही रहते हैं (रात की कालिख का असर उन पर नहीं पड़ता), दिन सफेद होता है, अच्छा खासा चमकता है, पर काले पदार्थों के रंग काले ही रहते हैं (दिन की रौशनी का असर इन काली चीजों पर नहीं पड़ता)। (इसी तरह) जो मनुष्य अंधे मूर्ख बुद्धि-हीन हैं उनकी अंधी ही मति रहती है। हे नानक! जिस पर प्रभु की मेहर की नजर नहीं हुई उनको कभी (‘नाम’ की प्राप्ति का) सम्मान नहीं मिलता।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ काइआ कोटु रचाइआ हरि सचै आपे ॥ इकि दूजै भाइ खुआइअनु हउमै विचि विआपे ॥ इहु मानस जनमु दुल्मभु सा मनमुख संतापे ॥ जिसु आपि बुझाए सो बुझसी जिसु सतिगुरु थापे ॥ सभु जगु खेलु रचाइओनु सभ वरतै आपे ॥१३॥

मूलम्

पउड़ी ॥ काइआ कोटु रचाइआ हरि सचै आपे ॥ इकि दूजै भाइ खुआइअनु हउमै विचि विआपे ॥ इहु मानस जनमु दुल्मभु सा मनमुख संतापे ॥ जिसु आपि बुझाए सो बुझसी जिसु सतिगुरु थापे ॥ सभु जगु खेलु रचाइओनु सभ वरतै आपे ॥१३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कोटु = किला। आपे = खुद ही। इकि = कई जीव। खुआइअनु = (खुंझाए, पथ भ्रष्ट किए, पथ से विचलित) रास्ते से हटाए हैं उसने। विआपे = फसे हुए। सा = था। मनमुख = मन के पीछे चलने वाले। थापे = पीठ थप थपाए, हौसला दे।
अर्थ: ये मानव-देही (मानो) किला है जो सच्चे प्रभु ने खुद बनाया है, (पर इस किले में रहते हुए भी) कई जीवों को माया के मोह में डाल के उसने स्वयं कुमार्ग पर डाल दिए हैं, वे (बिचारे) अहंकार में फंसे पड़े हैं।
ये मानव-शरीर बड़ी मुश्किल से मिला था, पर मन के पीछे चल के जीव दुखी हो रहे हैं, (ये शरीर प्राप्त करके क्या करना था) ये समझ उसी को आती है जिसको प्रभु स्वयं समझ बख्शे और सतिगुरु हौसला (पीठ थप-थपाए) दे।
(पर इस अधोगति के लिए किसी को निंदा भी नहीं जा सकता क्योंकि) ये सारा जगत-खेल तो उस प्रभु ने ही बनाया है और इसमें हर जगह स्वयं ही मौजूद है।13।

[[0790]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोक मः १ ॥ चोरा जारा रंडीआ कुटणीआ दीबाणु ॥ वेदीना की दोसती वेदीना का खाणु ॥ सिफती सार न जाणनी सदा वसै सैतानु ॥ गदहु चंदनि खउलीऐ भी साहू सिउ पाणु ॥ नानक कूड़ै कतिऐ कूड़ा तणीऐ ताणु ॥ कूड़ा कपड़ु कछीऐ कूड़ा पैनणु माणु ॥१॥

मूलम्

सलोक मः १ ॥ चोरा जारा रंडीआ कुटणीआ दीबाणु ॥ वेदीना की दोसती वेदीना का खाणु ॥ सिफती सार न जाणनी सदा वसै सैतानु ॥ गदहु चंदनि खउलीऐ भी साहू सिउ पाणु ॥ नानक कूड़ै कतिऐ कूड़ा तणीऐ ताणु ॥ कूड़ा कपड़ु कछीऐ कूड़ा पैनणु माणु ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जार = व्यभचारी मनुष्य। रंडी = व्यभचारिन स्त्री। कुटणी = दल्ली, दलाल। दीबाणु = मजलस, बैठने खड़े होने की सांझ। वेदीन = बे+दीन, अधर्मी। खाणु = खाने पीने की सांझ। गदहु = गधा। चंदनि = चंदन से। खउलीऐ = मलें। साहू = राख। पाणु = पहनने का स्वभाव, बर्ताव व्यवहार। कूड़ै कतिऐ = झूठ रूपी सूत कातने से। ताणु = ताना। कछीऐ = कछना, कातना, नापा जाता है।
अर्थ: चोरों, लुच्चे लोगों, व्यभचारी औरतों और दल्लों का आपस में उठना बैठना होता है, इन अधर्मियों की आपस में मित्रता और खाने पीने की सांझ होती है; ईश्वर की महिमा करने की इन्हें समझ ही नहीं होती, (इनके मन में जैसे) सदा शैतान बसता है। (समझते हुए भी नहीं समझते, जैसे) गधे को अगर चंदन भी लेप दें तब उसका बरतन-व्यवहार गर्द और राख से ही होता है (पिछले किए कर्मों के चक्कर इस गलत रास्ते से हटने नहीं देते)।
हे नानक! ‘कूड़’ (झूठा, छल, भ्रम) (सूत्र) कातने के लिए ‘झूठ’ का ही ताना चाहिए, (और उससे) ‘झूठ’ का ही कपड़ा काता जाएगा और पहना जाएगा (इस ‘झूठ’ रूपी पोषाक के कारण ‘झूठी’ ही महिमा मिलती है, भाव, ‘खतिअहु जंमे खते करनि त खतिआ विचि पाहि’)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः १ ॥ बांगा बुरगू सिंङीआ नाले मिली कलाण ॥ इकि दाते इकि मंगते नामु तेरा परवाणु ॥ नानक जिन्ही सुणि कै मंनिआ हउ तिना विटहु कुरबाणु ॥२॥

मूलम्

मः १ ॥ बांगा बुरगू सिंङीआ नाले मिली कलाण ॥ इकि दाते इकि मंगते नामु तेरा परवाणु ॥ नानक जिन्ही सुणि कै मंनिआ हउ तिना विटहु कुरबाणु ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बुरगू = (फारसी: बुरग़ू) तूती। परवाणु = स्वीकार, पसंद।
अर्थ: (मुल्ला) बांग दे के, (फक़ीर) तूती बजा के, (जोगी) सिंगी बजा के, (मरासी) कलाण करके (लोगों के दर पर माँगते हैं); (संसार में इस तरह के) कई भिखारी और कई दाते हैं, पर मुझे तेरा नाम ही चाहिए।
हे नानक! जिस लोगों ने प्रभु का नाम सुन के उसमें मन को जोड़ लिया है, मैं उनसे सदके जाता हूँ।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ माइआ मोहु सभु कूड़ु है कूड़ो होइ गइआ ॥ हउमै झगड़ा पाइओनु झगड़ै जगु मुइआ ॥ गुरमुखि झगड़ु चुकाइओनु इको रवि रहिआ ॥ सभु आतम रामु पछाणिआ भउजलु तरि गइआ ॥ जोति समाणी जोति विचि हरि नामि समइआ ॥१४॥

मूलम्

पउड़ी ॥ माइआ मोहु सभु कूड़ु है कूड़ो होइ गइआ ॥ हउमै झगड़ा पाइओनु झगड़ै जगु मुइआ ॥ गुरमुखि झगड़ु चुकाइओनु इको रवि रहिआ ॥ सभु आतम रामु पछाणिआ भउजलु तरि गइआ ॥ जोति समाणी जोति विचि हरि नामि समइआ ॥१४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कूड़ु = छल भ्रम। कूड़ो = झूठ ही, छल ही। पाइओनु = पाया उस (प्रभु) ने। चुकाइओनु = समाप्त कर दिया उस (प्रभु) ने। भउजलु = संसार समुंदर। नामि = नाम में।
अर्थ: माया का मोह बिलकुल एक छल है, (आखिर) छल ही (साबित) होता है, पर प्रभु ने (माया के मोह में जीव फसा के) ‘अहंकार’ का चक्र पैदा कर दिया है इस चक्कर में (पड़ कर) जगत दुखी हो रहा है।
जो मनुष्य गुरु के सन्मुख है उसका ये झमेला प्रभु ने खुद समाप्त कर दिया है, उसको एक प्रभु ही व्यापक दिखाई देता है। गुरमुख हर जगह एक परमात्मा को ही पहचानता है और इस तरह इस संसार-समुंदर से पार लांघ जाता है; उसकी आत्मा परमात्मा में लीन हुई रहती है वह प्रभु के नाम में जुड़ा रहता है।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोक मः १ ॥ सतिगुर भीखिआ देहि मै तूं सम्रथु दातारु ॥ हउमै गरबु निवारीऐ कामु क्रोधु अहंकारु ॥ लबु लोभु परजालीऐ नामु मिलै आधारु ॥ अहिनिसि नवतन निरमला मैला कबहूं न होइ ॥ नानक इह बिधि छुटीऐ नदरि तेरी सुखु होइ ॥१॥

मूलम्

सलोक मः १ ॥ सतिगुर भीखिआ देहि मै तूं सम्रथु दातारु ॥ हउमै गरबु निवारीऐ कामु क्रोधु अहंकारु ॥ लबु लोभु परजालीऐ नामु मिलै आधारु ॥ अहिनिसि नवतन निरमला मैला कबहूं न होइ ॥ नानक इह बिधि छुटीऐ नदरि तेरी सुखु होइ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सतिगुर = हे गुरु! भिखिआ = भिक्षा, ख़ैर। आधारु = आसरा। अहिनिसि = दिन रात। नवतन = नया। इह बिधि = इस तरीके से (भाव, नाम जपने से)।
अर्थ: हे गुरु! तू बख्शिश करने योग्य है, मुझे ख़ैर दे (भिक्षा दे, ‘नाम’ की), मेरा अहम्, मेरा अहंकार, मेरा काम क्रोध दूर हो जाए। (हे गुरु! तेरे दर पर मुझे) प्रभु का नाम (जिंदगी के लिए) सहारा मिल जाए तो मेरा चस्का और लोभ अच्छी तरह जल जाएं। प्रभु का नाम दिन रात नए से नया होता है (भाव, ज्यों-ज्यों इसे जपते हैं, इससे प्यार बढ़ता जाता है) ‘नाम’ पवित्र है, ये कभी मैला नहीं होता (तभी तो), हे नानक! ‘नाम’ जपने से (अहंकार के) चक्कर से बच जाया जाता है।
हे प्रभु! ये सुख तेरी मेहर की नजर से मिलता है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः १ ॥ इको कंतु सबाईआ जिती दरि खड़ीआह ॥ नानक कंतै रतीआ पुछहि बातड़ीआह ॥२॥

मूलम्

मः १ ॥ इको कंतु सबाईआ जिती दरि खड़ीआह ॥ नानक कंतै रतीआ पुछहि बातड़ीआह ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सबाईआ = सभी का। जिती = जितनी। दरि = (प्रभु के) दर पर। बातड़ीआह = सुंदर बातें।
अर्थ: जितनी भी जीव-स्त्रीयां पति-प्रभु के दरवाजे पर खड़ी हुई हैं। उन सभी का एक प्रभु ही रखवाला है। हे नानक! पति-प्रभु के प्रेम-रंग में रंगी हुई प्रभु की ही मन-मोहक बातें (एक-दूसरे से) पूछती हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः १ ॥ सभे कंतै रतीआ मै दोहागणि कितु ॥ मै तनि अवगण एतड़े खसमु न फेरे चितु ॥३॥

मूलम्

मः १ ॥ सभे कंतै रतीआ मै दोहागणि कितु ॥ मै तनि अवगण एतड़े खसमु न फेरे चितु ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दोहागणि = बुरे भाग्य वाली, छुटड़। कितु = किस काम की? मै तनि = मेरे शरीर में।
अर्थ: सभी जीव-स्त्रीयां प्रभु-पति के प्यार में रंगी हुई हैं, (उन सोहागिनों के सामने) मैं अभागनि किस गिनती में हूँ? मेरे शरीर में इतने अवगुण हैं कि पति मेरी तरफ देखता (ध्यान नहीं देता) तक नहीं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः १ ॥ हउ बलिहारी तिन कउ सिफति जिना दै वाति ॥ सभि राती सोहागणी इक मै दोहागणि राति ॥४॥

मूलम्

मः १ ॥ हउ बलिहारी तिन कउ सिफति जिना दै वाति ॥ सभि राती सोहागणी इक मै दोहागणि राति ॥४॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दै = के। वाति = वात में, मुँह में।

दर्पण-टिप्पनी

(नोट: शब्द “दे’ और ‘के’ से ‘दै’ और ‘कै’ क्यों बन जाता है ये समझने के लिए देखें पुस्तक ‘गुरबाणी व्याकरण’)।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: मैं सदके हूँ उनसे जिनके मुँह में प्रभु की महिमा है। (हे प्रभु!) तू सारी रातें सुहागिनों को दे रहा है, एक रात मुझ छुटड़ को भी दे।4।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ दरि मंगतु जाचै दानु हरि दीजै क्रिपा करि ॥ गुरमुखि लेहु मिलाइ जनु पावै नामु हरि ॥ अनहद सबदु वजाइ जोती जोति धरि ॥ हिरदै हरि गुण गाइ जै जै सबदु हरि ॥ जग महि वरतै आपि हरि सेती प्रीति करि ॥१५॥

मूलम्

पउड़ी ॥ दरि मंगतु जाचै दानु हरि दीजै क्रिपा करि ॥ गुरमुखि लेहु मिलाइ जनु पावै नामु हरि ॥ अनहद सबदु वजाइ जोती जोति धरि ॥ हिरदै हरि गुण गाइ जै जै सबदु हरि ॥ जग महि वरतै आपि हरि सेती प्रीति करि ॥१५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दरि = दर पर, प्रभु के दर पर। जाचै = मांगताहै। हरि = हे हरि! जनु = (मैं) सेवक। अनहद = एक रस, कभी ना खत्म होने वाला। धरि = धर के, टिका के। जै जै सबदु = प्रभु के जै जैकार की वाणी।
अर्थ: हे प्रभु! मैं भिखारी तेरे दरवाजे पर (आकर) ख़ैर माँगता हूँ, मेहर कर मुझे भिक्षा दे; मुझे गुरु के सन्मुख करके (अपने चरणों में) जोड़ ले, मैं तेरा सेवक तेरा नाम प्राप्त कर लूँ; तेरी ज्योति में अपनी आत्मा टिका के मैं तेरी महिमा का एक-रस गीत गाऊँ, तेरी जै-जै कार की वाणी के गुण हृदय में गाऊँ, मैं तेरे से प्यार करूँ (और इस तरह मुझे विश्वास हो जाए कि) जगत में प्रभु खुद ही हर जगह मौजूद है।15।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोक मः १ ॥ जिनी न पाइओ प्रेम रसु कंत न पाइओ साउ ॥ सुंञे घर का पाहुणा जिउ आइआ तिउ जाउ ॥१॥

मूलम्

सलोक मः १ ॥ जिनी न पाइओ प्रेम रसु कंत न पाइओ साउ ॥ सुंञे घर का पाहुणा जिउ आइआ तिउ जाउ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: जिस जीव-स्त्रीयों ने प्रभु के प्यार का आनंद नहीं पाया, जिन्होंने पति-प्रभु के मिलाप का स्वाद नहीं चखा (वे इस मनुष्य-शरीर में आ के यूँ ही ख़ाली गई) जैसे किसी सूंने घर (जिस घर में कोई नहीं बस रहा) में आया पराहुणा (मेहमान) जैसे आता है वैसे ही चला जाता है (वहाँ से उसे खाने-पीने को कुछ भी प्राप्त नहीं होता)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः १ ॥ सउ ओलाम्हे दिनै के राती मिलन्हि सहंस ॥ सिफति सलाहणु छडि कै करंगी लगा हंसु ॥ फिटु इवेहा जीविआ जितु खाइ वधाइआ पेटु ॥ नानक सचे नाम विणु सभो दुसमनु हेतु ॥२॥

मूलम्

मः १ ॥ सउ ओलाम्हे दिनै के राती मिलन्हि सहंस ॥ सिफति सलाहणु छडि कै करंगी लगा हंसु ॥ फिटु इवेहा जीविआ जितु खाइ वधाइआ पेटु ॥ नानक सचे नाम विणु सभो दुसमनु हेतु ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ओलामे = उलाहमे। सहंस = हजारों। करंग = मुर्दा। हंसु = जीव रूपी हंस जिसकी खुराक नाम मोती होनी चाहिए। जितु = जिस में। हेतु = मोह। सभो हेतु = सारा मोह।
अर्थ: (जीव-) हंस परमात्मा की महिमा (रूप मोती) छोड़ के (विकार रूप) मुर्दा (खाने) में लगा हुआ है (दिन-रात बुरे कर्म कर रहा है, सो, इन) दिन के वक्त (किए बुरे कर्मों के इसको) सौ उलाहमे (शिकवे-शिकायतें) मिलते हैं और रात (के वक्त किए कर्मों) के हजारों।
धिक्कार है ऐसा जीना जिसमें सिर्फ खा खा के ही पेट बढ़ा लिया। हे नानक! प्रभु के इस नाम से वंचित रहने के कारण ये सारा मोह वैरी बन जाता है।2।

[[0791]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ ढाढी गुण गावै नित जनमु सवारिआ ॥ गुरमुखि सेवि सलाहि सचा उर धारिआ ॥ घरु दरु पावै महलु नामु पिआरिआ ॥ गुरमुखि पाइआ नामु हउ गुर कउ वारिआ ॥ तू आपि सवारहि आपि सिरजनहारिआ ॥१६॥

मूलम्

पउड़ी ॥ ढाढी गुण गावै नित जनमु सवारिआ ॥ गुरमुखि सेवि सलाहि सचा उर धारिआ ॥ घरु दरु पावै महलु नामु पिआरिआ ॥ गुरमुखि पाइआ नामु हउ गुर कउ वारिआ ॥ तू आपि सवारहि आपि सिरजनहारिआ ॥१६॥

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: ढाढी सदा प्रभु के गुण गाता है और अपना जीवन सुंदर बनाता है; गुरु के द्वारा वह प्रभु की बँदगी करके महिमा करके सच्चे प्रभु को अपने हृदय में बसाता है, प्रभु के नाम को प्यार करके वह प्रभु का घर, प्रभु का दर और महल ढूँढ लेता है। मैं कुर्बान हूं गुरु से, प्रभु का नाम गुरु के द्वारा ही मिलता है।
हे विधाता प्रभू्! तू स्वयं ही (गुरु के राह पर चला के जीव का) जीवन सँवारता है।16।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोक मः १ ॥ दीवा बलै अंधेरा जाइ ॥ बेद पाठ मति पापा खाइ ॥ उगवै सूरु न जापै चंदु ॥ जह गिआन प्रगासु अगिआनु मिटंतु ॥ बेद पाठ संसार की कार ॥ पड़्हि पड़्हि पंडित करहि बीचार ॥ बिनु बूझे सभ होइ खुआर ॥ नानक गुरमुखि उतरसि पारि ॥१॥

मूलम्

सलोक मः १ ॥ दीवा बलै अंधेरा जाइ ॥ बेद पाठ मति पापा खाइ ॥ उगवै सूरु न जापै चंदु ॥ जह गिआन प्रगासु अगिआनु मिटंतु ॥ बेद पाठ संसार की कार ॥ पड़्हि पड़्हि पंडित करहि बीचार ॥ बिनु बूझे सभ होइ खुआर ॥ नानक गुरमुखि उतरसि पारि ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बेद पाठ मति = वेदों के पाठ वाली मति, वेद आदि धर्म-पुस्तकों की वाणी के अनुसार ढली हुई बुद्धि। पापा खाइ = पापों को खा जाती है। बेद पाठ = वेदों के (निरे) पाठ।

दर्पण-टिप्पनी

(नोट: ‘बेद पाठ मति’ और ‘बेद पाठ’ के अंतर पर ध्यान देना आवश्यक है)।

दर्पण-भाषार्थ

संसार की कार = दुनियावी व्यवहार। बीचार = अर्थ बोध।

दर्पण-टिप्पनी

(नोट: ‘पढ़ि पढ़ि’ और ‘बूझे’ में वही फर्क है जो ‘बेद पाठ’ और ‘बेद पाठ मति’ में है)।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: (जैसे जब) दीपक जलता है तो अंधकार दूर हो जाता है (इसी तरह) वेद (आदि धर्म-पुस्तकों की) वाणी के अनुसार ढली हुई बुद्धि पापों का नाश कर देती है; जब सूर्य चढ़ जाता है चंद्रमा (चढ़ा हुआ) नहीं दिखता, (वैसे ही) जहाँ मति उज्जवल (ज्ञान का प्रकाश) हो जाए वहाँ अज्ञानता मिट जाती है।
वेद आदि धर्म-पुस्तकों के (निरे) पाठ तो दुनियावी व्यवहार (समझो), विद्वान लोक इनको पढ़-पढ़ के इनके सिर्फ अर्थ ही विचारते हैं; जब तक मति नहीं बदलती (निरे पाठ व अर्थ-विचार करने से) दुनिया दुखी ही होती है; हे नानक! वह मनुष्य ही (पापों के अंधकार से) पार लंघता है जिसने अपनी मति गुरु के हवाले कर दी है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः १ ॥ सबदै सादु न आइओ नामि न लगो पिआरु ॥ रसना फिका बोलणा नित नित होइ खुआरु ॥ नानक पइऐ किरति कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥२॥

मूलम्

मः १ ॥ सबदै सादु न आइओ नामि न लगो पिआरु ॥ रसना फिका बोलणा नित नित होइ खुआरु ॥ नानक पइऐ किरति कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पइऐ किरति = पिछले किए हुए कर्मों के इकट्ठे हुए संस्कारों के अनुसार।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘किरति’ शब्द ‘किरतु’ से ‘अधिकरण कारक, एकवचन’ है; शब्द ‘पइअै’ भी ‘पइआ’ से ‘अधिकर्ण कारक एकवचन” है, दोनों मिल के वह ‘वाक्यांश’ (Phrase) बना रहे हैं जिसे अंग्रजी में Locative Absolutwe कीते हैं। शब्द ‘किरत’ का अर्थ है ‘किया हुआ काम’; ‘पइआ’ का अर्थ है ‘इकट्ठा हुआ हुआ’।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: जिस मनुष्य को (कभी) गुरु शब्द का रस नहीं आया, जिसका (कभी) प्रभु के नाम में प्यार नहीं बना, वह जीभ से फीके बोल बोलता है और सदा ही ख्वार होता रहता है।
(पर), हे नानक! (उसके भी वश में क्या?) (हरेक जीव) अपने (अब तक के) किए कर्मों के इकट्ठे हुए संस्कारों के अनुसार काम करता है, कोई मनुष्य इस बने हुए चक्कर को (अपने उद्यम से) मिटा नहीं सकता।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ जि प्रभु सालाहे आपणा सो सोभा पाए ॥ हउमै विचहु दूरि करि सचु मंनि वसाए ॥ सचु बाणी गुण उचरै सचा सुखु पाए ॥ मेलु भइआ चिरी विछुंनिआ गुर पुरखि मिलाए ॥ मनु मैला इव सुधु है हरि नामु धिआए ॥१७॥

मूलम्

पउड़ी ॥ जि प्रभु सालाहे आपणा सो सोभा पाए ॥ हउमै विचहु दूरि करि सचु मंनि वसाए ॥ सचु बाणी गुण उचरै सचा सुखु पाए ॥ मेलु भइआ चिरी विछुंनिआ गुर पुरखि मिलाए ॥ मनु मैला इव सुधु है हरि नामु धिआए ॥१७॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जि = जो मनुष्य। मंनि = मन में (‘म’ को ‘ं’ छंद की चाल पूरी करने लिए लगाया गया है)। सचु = प्रभु का नाम। गुर पुरखि = सतिगुरु मर्द ने। इव = इस तरह।
अर्थ: जो मनुष्य अपने परमात्मा की महिमा करता है वह शोभा कमाता है, मन में से ‘अहंकार’ मिटा के सदा-स्थिर रहने वाले प्रभु को बसाता है, सतिगुरु की वाणी के द्वारा प्रभु के गुण उचारता है और नाम स्मरण करता है (इस तरह) असल सुख भोगता है, चिरों से (ईश्वर से) विछुड़े हुए का (दोबारा ईश्वर से) मेल हो जाता है, सतिगुरु मर्द ने (जो) मिला दिया। सो, प्रभु का नाम स्मरण करके इस तरह मैला मन पवित्र हो जाता है।17।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोक मः १ ॥ काइआ कूमल फुल गुण नानक गुपसि माल ॥ एनी फुली रउ करे अवर कि चुणीअहि डाल ॥१॥

मूलम्

सलोक मः १ ॥ काइआ कूमल फुल गुण नानक गुपसि माल ॥ एनी फुली रउ करे अवर कि चुणीअहि डाल ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कूमल = कुमली, कोपलें। गुपसि = गूँदता है। माल = माला, हार। एनी फुली = (प्रभु के गुण रूप) इन फूलों की ओर। रउ = रौ, ध्यान, लगन। अवर डाल = और डालियाँ। कि = क्या?
अर्थ: हे नानक! शरीर (तो जैसे, फूलों वाले पौधों की) कोपलें हैं, (परमात्मा के) गुण (इस कोमल टाहनी को, जैसे) फूल हैं, (कोई भाग्यशाली ही इन फूलों का) हार गूँदता है; अगर मनुष्य इन फूलों में लगन लगाए तो (मूर्तियों के आगे भेटा के लिए) और डालियाँ चुनने की क्या जरूरत?।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

महला २ ॥ नानक तिना बसंतु है जिन्ह घरि वसिआ कंतु ॥ जिन के कंत दिसापुरी से अहिनिसि फिरहि जलंत ॥२॥

मूलम्

महला २ ॥ नानक तिना बसंतु है जिन्ह घरि वसिआ कंतु ॥ जिन के कंत दिसापुरी से अहिनिसि फिरहि जलंत ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दिसा = पासा, तरफ, लाभ। दिसा पुरी = किसी लाभ वाले नगर में, परदेस में। अहि = दिन। निसि = रात।
अर्थ: हे नानक! जिस (जीव-) स्त्रीयों का पति घर में बसता है उनके लिए तो बसंत ऋतु आई हुई है; पर जिनके पति परदेस में (गए हुए) हैं, वह दिन-रात जलती फिरतीं हैं।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ आपे बखसे दइआ करि गुर सतिगुर बचनी ॥ अनदिनु सेवी गुण रवा मनु सचै रचनी ॥ प्रभु मेरा बेअंतु है अंतु किनै न लखनी ॥ सतिगुर चरणी लगिआ हरि नामु नित जपनी ॥ जो इछै सो फलु पाइसी सभि घरै विचि जचनी ॥१८॥

मूलम्

पउड़ी ॥ आपे बखसे दइआ करि गुर सतिगुर बचनी ॥ अनदिनु सेवी गुण रवा मनु सचै रचनी ॥ प्रभु मेरा बेअंतु है अंतु किनै न लखनी ॥ सतिगुर चरणी लगिआ हरि नामु नित जपनी ॥ जो इछै सो फलु पाइसी सभि घरै विचि जचनी ॥१८॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अनदिनु = हर रोज। सेवी = मैं सेवा करूँ, स्मरण करूँ। रवा = उचारूँ, याद करूँ। रचनी = जुड़े। सभि जचनी = सारी माँगें।
अर्थ: गुरु सतिगुरु की वाणी में जोड़ के प्रभु स्वयं ही मेहर करके (‘नाम’ की) बख्शिश करता है।
(हे प्रभु! मेहर कर) मैं हर वक्त तुझे स्मरण करता रहूँ तेरे गुण याद करूँ और मेरा मन तुझ सच्चे में जुड़ा रहे।
मेरा परमात्मा बेअंत है किसी जीव ने उसका अंत नहीं पाया, गुरु की शरण पड़ कर प्रभु का नाम नित्य स्मरण किया जा सकता है। (जो स्मरण करता है) उसकी सारी जरूरतें घर में ही पूरी हो जाती हैं, वह जिस फल की तमन्ना करता है वही उसको मिल जाता है।18।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोक मः १ ॥ पहिल बसंतै आगमनि पहिला मउलिओ सोइ ॥ जितु मउलिऐ सभ मउलीऐ तिसहि न मउलिहु कोइ ॥१॥

मूलम्

सलोक मः १ ॥ पहिल बसंतै आगमनि पहिला मउलिओ सोइ ॥ जितु मउलिऐ सभ मउलीऐ तिसहि न मउलिहु कोइ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: आगमन = आना। आगमनि = आने से। बसंतै आगमनि = बसंत के आने से। मउलिओ = खिला हुआ। जितु मउलिओ = जिसके खिलने से।
अर्थ: जो प्रभु बसंत ऋतु के आने के पहले का है वह ही सबसे पहले का खिला हुआ है, उसके खिलने से सारी सृष्टि खिलती है पर उसको और कोई नहीं खिलाता।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः २ ॥ पहिल बसंतै आगमनि तिस का करहु बीचारु ॥ नानक सो सालाहीऐ जि सभसै दे आधारु ॥२॥

मूलम्

मः २ ॥ पहिल बसंतै आगमनि तिस का करहु बीचारु ॥ नानक सो सालाहीऐ जि सभसै दे आधारु ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: उस प्रभु (के गुणों) की विचार करो जो बसंत ऋतु के आने से भी पहले का है (भाव, जिसकी इनायत से सारा जगत मौलता है); हे नानक! उस प्रभु को स्मरण करें जो सबका आसरा है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः २ ॥ मिलिऐ मिलिआ ना मिलै मिलै मिलिआ जे होइ ॥ अंतर आतमै जो मिलै मिलिआ कहीऐ सोइ ॥३॥

मूलम्

मः २ ॥ मिलिऐ मिलिआ ना मिलै मिलै मिलिआ जे होइ ॥ अंतर आतमै जो मिलै मिलिआ कहीऐ सोइ ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: सिर्फ कहने से कि मैं मिला हुआ हूँ मेल नहीं होता, मेल तभी होता है जब सचमुच मिला हुआ हो; अगर अंदर से आत्मा में मिले, उसको मिला हुआ कहना चाहिए।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ हरि हरि नामु सलाहीऐ सचु कार कमावै ॥ दूजी कारै लगिआ फिरि जोनी पावै ॥ नामि रतिआ नामु पाईऐ नामे गुण गावै ॥ गुर कै सबदि सलाहीऐ हरि नामि समावै ॥ सतिगुर सेवा सफल है सेविऐ फल पावै ॥१९॥

मूलम्

पउड़ी ॥ हरि हरि नामु सलाहीऐ सचु कार कमावै ॥ दूजी कारै लगिआ फिरि जोनी पावै ॥ नामि रतिआ नामु पाईऐ नामे गुण गावै ॥ गुर कै सबदि सलाहीऐ हरि नामि समावै ॥ सतिगुर सेवा सफल है सेविऐ फल पावै ॥१९॥

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: प्रभु का नाम स्मरणा चाहिए (जो स्मरण में लगता है वह) ये नाम-जपने की कार सदा करता है।
‘नाम’ के बिना और आहरों (कामों) में व्यस्त होने से बार-बार जूनियों में मनुष्य पड़ता है।
‘नाम’ में जुड़ने से ‘नाम’ ही कमाया जाता है प्रभु के ही गुण गाए जाते हैं। जिसने गुरु-शब्द के द्वारा महिमा की है वह नाम में ही लीन रहता है। गुरु के हुक्म में चलना बड़ा गुणकारी है, हुक्म में चलने से नाम-धन रूप फल मिलता है।19।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सलोक मः २ ॥ किस ही कोई कोइ मंञु निमाणी इकु तू ॥ किउ न मरीजै रोइ जा लगु चिति न आवही ॥१॥

मूलम्

सलोक मः २ ॥ किस ही कोई कोइ मंञु निमाणी इकु तू ॥ किउ न मरीजै रोइ जा लगु चिति न आवही ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: (हे प्रभु!) किसी का कोई (मिथा हुआ) आसरा है, किसी का कोई आसरा है, मुझ निमाणी का एक तू ही है। जब तक तू मेरे चिक्त में ना बसे, क्यों ना रो रो के मरूँ? (तुझे बिसार के दुखों में ही तो खपना है)।1।

[[0792]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

मः २ ॥ जां सुखु ता सहु राविओ दुखि भी सम्हालिओइ ॥ नानकु कहै सिआणीए इउ कंत मिलावा होइ ॥२॥

मूलम्

मः २ ॥ जां सुखु ता सहु राविओ दुखि भी सम्हालिओइ ॥ नानकु कहै सिआणीए इउ कंत मिलावा होइ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: अगर सुख है तो भी पति-प्रभु को याद करें, दुख में भी मालिक को चेते रखें, तो, नानक कहता है, हे समझदार जीव-स्त्री! इस तरह पति से मेल होता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

पउड़ी ॥ हउ किआ सालाही किरम जंतु वडी तेरी वडिआई ॥ तू अगम दइआलु अगमु है आपि लैहि मिलाई ॥ मै तुझ बिनु बेली को नही तू अंति सखाई ॥ जो तेरी सरणागती तिन लैहि छडाई ॥ नानक वेपरवाहु है तिसु तिलु न तमाई ॥२०॥१॥

मूलम्

पउड़ी ॥ हउ किआ सालाही किरम जंतु वडी तेरी वडिआई ॥ तू अगम दइआलु अगमु है आपि लैहि मिलाई ॥ मै तुझ बिनु बेली को नही तू अंति सखाई ॥ जो तेरी सरणागती तिन लैहि छडाई ॥ नानक वेपरवाहु है तिसु तिलु न तमाई ॥२०॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: हे प्रभु! मैं एक कीड़ा सा हूँ, तेरी महिमा बहुत अपार है, मैं तेरे क्या-क्या गुण बयान करूँ? तू बड़ा दयालु हैं, अगम्य (पहुँच से परे) है तू खुद ही अपने साथ मिलाता है। मुझे तेरे बिना और कोई बेली नहीं दिखता, आखिर तू ही साथी हो के पुकारता है, जो जो जीव तेरी शरण आते हैं उनको (तू अहंकार के चक्करों से) बचा लेता है।
हे नानक! प्रभु स्वयं बेमुहताज है, उसको रक्ती भर भी कोई लालच नहीं है।20।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही बाणी स्री कबीर जीउ तथा सभना भगता की ॥ कबीर के ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही बाणी स्री कबीर जीउ तथा सभना भगता की ॥ कबीर के ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

अवतरि आइ कहा तुम कीना ॥ राम को नामु न कबहू लीना ॥१॥

मूलम्

अवतरि आइ कहा तुम कीना ॥ राम को नामु न कबहू लीना ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अवतरि = उतर के, अवतार ले के, जनम ले के। आइ = (जगत में) आ के, (मनुष्य जनम में) आ के। कहा = क्या? को = का। कबहू = कभी भी।1।
अर्थ: (हे भाई!) तूने परमात्मा का नाम (तो) कभी स्मरण किया नहीं, फिर जगत में आ के जनम ले के तूने किया क्या? (अर्थात, तूने कुछ भी नहीं कमाया)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

राम न जपहु कवन मति लागे ॥ मरि जइबे कउ किआ करहु अभागे ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

राम न जपहु कवन मति लागे ॥ मरि जइबे कउ किआ करहु अभागे ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: न जपहु = तू नहीं स्मरण करता। मरि जइबे कउ = मरने के वक्त। करहु = तुम कर रहे हो। अभागे = हे भाग्यहीन!। रहाउ।
अर्थ: हे भाग्यहीन बंदे! तू मरने के वक्त के लिए क्या तैयारी कर रहा है? तू प्रभु का नाम नहीं स्मरण करता, कौन सी अनुचित मति से लगा हुआ है?। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दुख सुख करि कै कुट्मबु जीवाइआ ॥ मरती बार इकसर दुखु पाइआ ॥२॥

मूलम्

दुख सुख करि कै कुट्मबु जीवाइआ ॥ मरती बार इकसर दुखु पाइआ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दुख सुख करि कै = दुख सुख सह के, कई तरह की मुश्किलें सह के। जीवाइआ = पाला। इकसर = अकेले ही।2।
अर्थ: कई तरह की मुश्किलें सह के तू (सारी उम्र) कुटंब ही पालता रहा, पर मरने के वक्त तुझे अकेले ही (अपनी गलतियों के लिए) दुख सहने पड़े (पड़ेंगे)।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कंठ गहन तब करन पुकारा ॥ कहि कबीर आगे ते न सम्हारा ॥३॥१॥

मूलम्

कंठ गहन तब करन पुकारा ॥ कहि कबीर आगे ते न सम्हारा ॥३॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कंठ गहन = गले से पकड़ने के वक्त। करन पुकारा = पुकार करने का (क्या लाभ?)। कहि = कहे, कहता है। आगे ते = मरने से पहले ही। संमारा = याद किया।3।
अर्थ: कबीर कहता है: (जब जमों ने तुझे) गले से आ के पकड़ा (भाव, जब मौत सिर पर आ गई), तब रोने पुकारने (से कोई लाभ नहीं होगा); (उस वक्त के आने से) पहले ही तू क्यों नहीं परमात्मा को याद करता?।3।1।

दर्पण-भाव

शब्द का भाव: स्मरण के बिना जीवन व्यर्थ जाता है। मौत आने पर पछताने से कोई लाभ नहीं होता। पहले ही वक्त सिर संभलना चाहिए।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही कबीर जी ॥ थरहर क्मपै बाला जीउ ॥ ना जानउ किआ करसी पीउ ॥१॥

मूलम्

सूही कबीर जी ॥ थरहर क्मपै बाला जीउ ॥ ना जानउ किआ करसी पीउ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: थरहर कंपै = थर थर काँपता है, बहुत सहमा हुआ है। बाला जीउ = अंजान जिंद। ना जानउ = मैं नहीं जानता, मुझे नहीं पता। पीउ = पति प्रभु।1।
अर्थ: (इतनी उम्र भक्ति के बिना गुजर जाने के कारण अब) मेरी अंजान जिंद बहुत सहमी हुई है कि पता नहीं पति प्रभु (मेरे साथ) क्या सलूक करेगा।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रैनि गई मत दिनु भी जाइ ॥ भवर गए बग बैठे आइ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

रैनि गई मत दिनु भी जाइ ॥ भवर गए बग बैठे आइ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रैनि = रात, जवानी की उम्र जब केश काले होते हैं। दिनु = बुढ़ापे का समय जब केश सफेद हो गए। भवर = भवर जैसे काले केश। बग = बगुले जैसे सफेद केश।1। रहाउ।
अर्थ: (मेरे) काले केश चले गए हैं (उनकी जगह अब) सफेद आ गए हैं। (परमात्मा का नाम जपे बिना ही मेरी) जवानी की उम्र बीत गई है। (मुझे अब ये डर है कि) कहीं (इसी तरह) बुढ़ापा भी ना बीत जाए।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

काचै करवै रहै न पानी ॥ हंसु चलिआ काइआ कुमलानी ॥२॥

मूलम्

काचै करवै रहै न पानी ॥ हंसु चलिआ काइआ कुमलानी ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: काचै करवै = कच्चे कुज्जे में। हंसु = जीवात्मा। काइआ = काया, शरीर।2।
अर्थ: (अब तक बेपरवाही में ख्याल ही नहीं किया कि ये शरीर तो कच्चे बर्तन की तरह है) कच्चे कुजे में पानी टिका नहीं रह सकता (सांसें बीतती गई, अब) शरीर कुम्हला रहा है और (जीव-) भवरा उडारी मारने को तैयार है (पर अपना कुछ भी ना सवारा)।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कुआर कंनिआ जैसे करत सीगारा ॥ किउ रलीआ मानै बाझु भतारा ॥३॥

मूलम्

कुआर कंनिआ जैसे करत सीगारा ॥ किउ रलीआ मानै बाझु भतारा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कुआर = क्वारी। कंनिआ = कन्या। रलीआ = आनंद। बाझु = बिना।3।
अर्थ: जैसे कँवारी कन्या श्रृंगार करती रहे, पति मिलने के बिना (इन श्रृंगारों का) उसको कोई आनंद नहीं आ सकता, (वैसे ही मैं भी सारी उम्र निरे शरीर की खातिर ही आहर-पाहर करती रही, प्रभु को विसारने के कारण कोई आत्मिक सुख ना मिला)।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

काग उडावत भुजा पिरानी ॥ कहि कबीर इह कथा सिरानी ॥४॥२॥

मूलम्

काग उडावत भुजा पिरानी ॥ कहि कबीर इह कथा सिरानी ॥४॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: काग उडावत = (इन्तजार में) कौए उड़ाती हुई। भुजा = बाँह। पिरानी = थक गई। कथा = उम्र की कहानी (भाव, उम्र)। सिरानी = खत्म हो चली है।4।
अर्थ: कबीर कहता है: (हे पति-प्रभु! अब तो आ के मिल, तेरे इन्तजार में) कौए उड़ाती-उड़ाती मेरी तो बाँह भी थक चुकी है, (और उधर से मेरी उम्र की) कहानी भी समाप्त होने को आ गई है।4।2।

दर्पण-भाव

शब्द का भाव: स्मरण के बिना उम्र गवा के आखिर पछताना पड़ता है कि आगे क्या बनेगा।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही कबीर जीउ ॥ अमलु सिरानो लेखा देना ॥ आए कठिन दूत जम लेना ॥ किआ तै खटिआ कहा गवाइआ ॥ चलहु सिताब दीबानि बुलाइआ ॥१॥

मूलम्

सूही कबीर जीउ ॥ अमलु सिरानो लेखा देना ॥ आए कठिन दूत जम लेना ॥ किआ तै खटिआ कहा गवाइआ ॥ चलहु सिताब दीबानि बुलाइआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: अमलु = अमल का समय, जिंदगी रूपी मुलाज़मत के काम का समय। सिरानो = बीत गया है। कठिन = कड़े। कहा = कहाँ? सिताब = जल्दी। दीबानि = दीवान ने, धर्मराज ने।1।
अर्थ: (हे जीव! जगत में) नौकरी का समय (उम्र का नियत समय) निकल गया है, (यहाँ जो कुछ करता रहा है) उसका हिसाब देना पड़ेगा; कठोर जमदूत लेने आ गए हैं। (वे कहेंगे-) जल्दी चलो, धर्मराज ने बुलाया है। यहाँ रह के तूने क्या कमाई की है, और कहाँ गवाया है?।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

चलु दरहालु दीवानि बुलाइआ ॥ हरि फुरमानु दरगह का आइआ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

चलु दरहालु दीवानि बुलाइआ ॥ हरि फुरमानु दरगह का आइआ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दरहालु = अभी। फुरमानु = हुक्म।1। रहाउ।
अर्थ: जल्दी चल, धर्मराज ने बुलाया है; प्रभु की दरगाह का हुक्म आया है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

करउ अरदासि गाव किछु बाकी ॥ लेउ निबेरि आजु की राती ॥ किछु भी खरचु तुम्हारा सारउ ॥ सुबह निवाज सराइ गुजारउ ॥२॥

मूलम्

करउ अरदासि गाव किछु बाकी ॥ लेउ निबेरि आजु की राती ॥ किछु भी खरचु तुम्हारा सारउ ॥ सुबह निवाज सराइ गुजारउ ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: करउ = करूँ, मैं करता हूँ। गाव = पिंड। लेउ निबेरि = निबेड़ लूँगा, समाप्त कर लूँगा। सारउ = मैं प्रबंध करूँगा।2।
अर्थ: मैं विनती करता हूँ कि गाँव का कुछ हिसाब-किताब रह गया है, (अगर आज्ञा हो) तो मैं आज की रात ही वह हिसाब समाप्त कर लूँगा, कुछ तुम्हारे लिए भी खर्च का प्रबंध कर लूँगा, और सुबह की नमाज़ राह में ही पढ़ लूँगा (भाव, बहुत सुबह ही तुम्हारे साथ चल दूँगा)।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

साधसंगि जा कउ हरि रंगु लागा ॥ धनु धनु सो जनु पुरखु सभागा ॥ ईत ऊत जन सदा सुहेले ॥ जनमु पदारथु जीति अमोले ॥३॥

मूलम्

साधसंगि जा कउ हरि रंगु लागा ॥ धनु धनु सो जनु पुरखु सभागा ॥ ईत ऊत जन सदा सुहेले ॥ जनमु पदारथु जीति अमोले ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रंगु = प्यार। सभागा = भाग्यशाली। ईत ऊत = लोक परलोक में।3।
अर्थ: जिस मनुष्य को सत्संग में रह के प्रभु का प्यार प्राप्त होता है, वह मनुष्य धन्य है, भाग्यशाली है। प्रभु के सेवक लोक-परलोक में सुख से रहते हैं क्योंकि वे इस अमोलक जनम-रूपी कीमती शै को जीत लेते हैं।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जागतु सोइआ जनमु गवाइआ ॥ मालु धनु जोरिआ भइआ पराइआ ॥ कहु कबीर तेई नर भूले ॥ खसमु बिसारि माटी संगि रूले ॥४॥३॥

मूलम्

जागतु सोइआ जनमु गवाइआ ॥ मालु धनु जोरिआ भइआ पराइआ ॥ कहु कबीर तेई नर भूले ॥ खसमु बिसारि माटी संगि रूले ॥४॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: रूले = रुल गए, कहीं के ना रहे।4।
अर्थ: जो मनुष्य जागता ही (माया की नींद में) सोया रहता है, वह मानव जीवन को व्यर्थ गवा लेता है, (क्योंकि) उसका सारा इकट्ठा किया हुआ माल-धन (तो आखिर) बेगाना हो जाता है।
हे कबीर! कह: वे मनुष्य अवसर गवा चुके हैं, वे मिट्टी में ही मिल चुके हैं जिन्होंने परमात्मा पति को बिसारा।4।3।

दर्पण-भाव

शब्द का भाव: मनुष्य अपने काम-धंधे पूरे करने में इतना व्यस्त हो जाता है कि परमात्मा को भुला ही देता है। काम-धंधों की उलझन मरने के वक्त तक बनी रहती है, संचित किया हुआ धन भी यहीं छोड़ना पड़ता है, और इस तरह सारी उम्र व्यर्थ ही गुजर जाती है।

[[0793]]

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही कबीर जीउ ललित ॥ थाके नैन स्रवन सुनि थाके थाकी सुंदरि काइआ ॥ जरा हाक दी सभ मति थाकी एक न थाकसि माइआ ॥१॥

मूलम्

सूही कबीर जीउ ललित ॥ थाके नैन स्रवन सुनि थाके थाकी सुंदरि काइआ ॥ जरा हाक दी सभ मति थाकी एक न थाकसि माइआ ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: स्रवन = कान। सुनि थाके = सुन सुन के थक गए, कमजोर हो गए हैं। सुंदरि काइआ = सुंदर शरीर। जरा = बुढ़ापा। हाक = आवाज। दी = दी। थाकसि = थकेगी।1।
अर्थ: (तेरी) आँखें कमजोर हो चुकी हैं, कान भी (अब) सुनने से रह गए हैं, सुंदर शरीर (भी) रह गया है; बुढ़ापे ने आ के आवाज मारी है और (तेरी) सारी अक्ल भी (ठीक) काम नहीं करती, पर (तेरी) माया की कसक (अभी तक) नहीं खत्म हुई।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बावरे तै गिआन बीचारु न पाइआ ॥ बिरथा जनमु गवाइआ ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

बावरे तै गिआन बीचारु न पाइआ ॥ बिरथा जनमु गवाइआ ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बावरे = हे कमले! तै = तूने।1। रहाउ।
अर्थ: हे बावरे मनुष्य! तूने सारी उम्र व्यर्थ गवा ली है, तूने (परमात्मा के साथ) जान-पहिचान (करने) की समझ प्राप्त नहीं की।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तब लगु प्रानी तिसै सरेवहु जब लगु घट महि सासा ॥ जे घटु जाइ त भाउ न जासी हरि के चरन निवासा ॥२॥

मूलम्

तब लगु प्रानी तिसै सरेवहु जब लगु घट महि सासा ॥ जे घटु जाइ त भाउ न जासी हरि के चरन निवासा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सरेवहु = स्मरण करो। प्रानी = हे प्राणी! सासा = प्राण, सांस। घटु जाइ = शरीर नाश हो जाए। भाउ = (प्रभु से) प्यार।2।
अर्थ: हे बंदे! जब तक शरीर में प्राण चल रहे हैं, तब तक उस प्रभु को ही स्मरण करते रहो। (उससे इतना प्यार बनाओ कि) अगर शरीर नाश (भी) हो जाए, तो भी (उससे) प्यार ना घटे, और प्रभु के चरणों में मन टिका रहे।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जिस कउ सबदु बसावै अंतरि चूकै तिसहि पिआसा ॥ हुकमै बूझै चउपड़ि खेलै मनु जिणि ढाले पासा ॥३॥

मूलम्

जिस कउ सबदु बसावै अंतरि चूकै तिसहि पिआसा ॥ हुकमै बूझै चउपड़ि खेलै मनु जिणि ढाले पासा ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जिस कउ अंतरि = जिस मनुष्य के मन में। सबदु = महिमा की वाणी। चूकै = समाप्त हो जाती है। चउपड़ि = जिंदगी रूपी चौपड़ की खेल। जिणि = जीत के। ढाले = ढालता है।3।
अर्थ: (प्रभु स्वयं) जिस मनुष्य के मन में अपनी महिमा की वाणी बसाता है, उसकी (माया की) प्यास मिट जाती है। वह मनुष्य प्रभु की रजा को समझ लेता है (रजा में राजी रहने का) चौपड़ वह खेलता है, और मन को जीत के पासा फेंकता है (भाव, मन को जीतना- ये उसके लिए चौपड़ की खेल में पासा फेंकना है)।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जो जन जानि भजहि अबिगत कउ तिन का कछू न नासा ॥ कहु कबीर ते जन कबहु न हारहि ढालि जु जानहि पासा ॥४॥४॥

मूलम्

जो जन जानि भजहि अबिगत कउ तिन का कछू न नासा ॥ कहु कबीर ते जन कबहु न हारहि ढालि जु जानहि पासा ॥४॥४॥

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ये शब्द ‘सूही’ और ‘ललित’ दोनों मिश्रित रागों में गाना है।

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जानि = जान के, सोच समझ के, सांझ बना के। भजहि = स्मरण करते हैं। अबिगत = (संस्कृत: अव्यक्त = invisible) अदृष्ट प्रभु।4।
अर्थ: जो मनुष्य प्रभु के साथ सांझ बना के उस अदृश्य को स्मरण करते हैं, उनका जीवन व्यर्थ नहीं जाता। हे कबीर! कह: जो मनुष्य (स्मरण-रूपी) पासा फेंकना जानते हैं, वे जिंदगी की बाजी कभी हार के नहीं जाते।4।4।

दर्पण-भाव

शब्द का भाव: स्मरण के बिना मानव जनम की बाजी हार जाई जाती है, क्योंकि माया का मोह दिन-ब-दिन बढ़ता जाता है।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही ललित कबीर जीउ ॥ एकु कोटु पंच सिकदारा पंचे मागहि हाला ॥ जिमी नाही मै किसी की बोई ऐसा देनु दुखाला ॥१॥

मूलम्

सूही ललित कबीर जीउ ॥ एकु कोटु पंच सिकदारा पंचे मागहि हाला ॥ जिमी नाही मै किसी की बोई ऐसा देनु दुखाला ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कोटु = किला। सिकदार = चौधरी। पंच = कामादिक पाँच विकार। हाला = हल की कमाई पर सरकारी वसूली, मामला। दुखाला = दुखदाई, मुश्किल।1।
अर्थ: (मनुष्य का ये शरीर, जैसे) एक किला है, (इसमें) पाँच (कामादिक) चौधरी (बसते हैं), पाँचो ही (इस मनुष्य से) मामला मांगते हैं (भाव, ये पाँचों विकार इसे दुखी करते फिरते हैं)। (पर अपने सतिगुरु की कृपा से) मैं (इन पाँचों में से)। किसी का भी मुज़ारिया नहीं बना (भाव, मैं किसी के भी दबाव में नहीं आया), इस वास्ते किसी का मामला भरना मेरे लिए मुश्किल है (भाव, इनमें से कोई भी विकार मुझे कुमार्ग पर नहीं डाल सका)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हरि के लोगा मो कउ नीति डसै पटवारी ॥ ऊपरि भुजा करि मै गुर पहि पुकारिआ तिनि हउ लीआ उबारी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

हरि के लोगा मो कउ नीति डसै पटवारी ॥ ऊपरि भुजा करि मै गुर पहि पुकारिआ तिनि हउ लीआ उबारी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: हरि के लोगा = हे संत जनो! मो कउ = मुझे। नीति = सदा। डसै = डंक मारता है, डराता है। पटवारी = मामले का हिसाब बनाने वाला, किए कर्मों का लेखा रखने वाला, धर्म राज। भुजा = बाँह। पहि = पास। तिनि = उस (गुरु) ने। हउ = मुझे।1। रहाउ।
अर्थ: हे संतजनो! मुझे मामले का हिसाब बनाने वाले का हर वक्त सहम रहता है (अर्थात मुझे हर वक्त डर रहता है कि कामादिक विकारों का कहीं जोर पड़ कर मेरे अंदर भी कुकर्मों का लेखा ना बनने लग जाए), सो मैंने अपनी बाँह ऊँची करके (अपने) गुरु के आगे पुकार की और उसने मुझे (इनसे) बचा लिया।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

नउ डाडी दस मुंसफ धावहि रईअति बसन न देही ॥ डोरी पूरी मापहि नाही बहु बिसटाला लेही ॥२॥

मूलम्

नउ डाडी दस मुंसफ धावहि रईअति बसन न देही ॥ डोरी पूरी मापहि नाही बहु बिसटाला लेही ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: नउ = कान नाक आदि नौ श्रोत। डाडी = जरीब कश, जमीन को नापने वाले। दस = पाँच ज्ञान-इंद्रिय और पाँच कर्म इंद्रिय। मुंसफ = न्याय करने वाले। धावहि = दौड़ के आते हैं। रईअति = प्रजा, भले गुण। डोरी = जरीब। बहु = बहुत। बिसटाला = (विष्टा) गंद की कमाई, रिश्वत। बहु…लेही = अपनी सीमा से ज्यादा विषियों में फंसाते हैं (इन ज्ञान-इंद्रिय को किसी खास हद तक रहने की हिदायत है। पर इस हद के अंदर रहने की बजाय, इन्साफ की जगह बल्कि अन्याय करते हैं)।2।
अर्थ: (मनुष्य-शरीर के) नौ (श्रोत-) ज़रीब-कश (जमीन की पैमायश करने वाले) और दस (इंद्रिय) न्याय करने वाली (मनुष्य के जीवन पर ऐसे) टूट के पड़ते हैं कि (मनुष्य के अंदर भले गुणों की) प्रजा को बसने नहीं देते। (ये ज़रीबकश) जरीब पूरी नहीं नापते, ज्यादा रिश्वतें लेते हैं (भाव, मनुष्य को हद से ज्यादा विकारों में फसाते हैं, हद से ज्यादा काम आदि में फसा देते हैं)।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

बहतरि घर इकु पुरखु समाइआ उनि दीआ नामु लिखाई ॥ धरम राइ का दफतरु सोधिआ बाकी रिजम न काई ॥३॥

मूलम्

बहतरि घर इकु पुरखु समाइआ उनि दीआ नामु लिखाई ॥ धरम राइ का दफतरु सोधिआ बाकी रिजम न काई ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बहतरि घर = बहक्तर कोठड़ियां वाला शरीर। उनि = उस (गुरु) ने। नामु = प्रभु का नाम। लिखाई = (राहदारी) लिख के दे दी है। सोधिआ = पड़ताल की है। बाकी = (मेरे जिंमे) देने वाली रकम। रिजम = रक्ती भर भी।3।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: ‘एकुो’ अक्षर ‘क’ के साथ दो मात्राएं (ो) व (ु) लगीं हैं। असल शब्द है ‘ऐकु’; यहां पढ़ना है ‘एको’।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: (मैंने अपने गुरु के आगे पुकार की तो) उसने मुझे (उस परमात्मा का) नाम बतौर राहदारी लिख दिया, जो बहक्तर घरों वाले शरीर के अंदर ही मौजूद है। (सतिगुरु की इस मेहर के सदका जब) धर्मराज के दफतर की जाँच हुई तो मेरे जिम्मे रक्ती भर भी देनदारी नहीं निकली (भाव, गुरु की कृपा से मेरे अंदर से कुकर्मों का लेखा बिल्कुल ही खत्म हो गया)।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

संता कउ मति कोई निंदहु संत रामु है एकुो ॥ कहु कबीर मै सो गुरु पाइआ जा का नाउ बिबेकुो ॥४॥५॥

मूलम्

संता कउ मति कोई निंदहु संत रामु है एकुो ॥ कहु कबीर मै सो गुरु पाइआ जा का नाउ बिबेकुो ॥४॥५॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बिबेकुो = बिबेक रूप, पूर्ण विवेक वाला, पूर्ण ज्ञानवान।4।
अर्थ: (सो, हे भाई! ये इनायत संतजनों के संगति की है) तुम कोई भी संत की कभी निंदा ना करना, संत और परमात्मा एक रूप हैं। हे कबीर! कह: मुझे भी वही गुरु-संत ही मिला है जो पूर्ण ज्ञानवान है।4।5।

दर्पण-भाव

शब्द का भाव: गुरु की शरण पड़ कर प्रभु का स्मरण करो, विकार अपना जोर नहीं डाल सकेंगे।

विश्वास-प्रस्तुतिः

रागु सूही बाणी स्री रविदास जीउ की ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

मूलम्

रागु सूही बाणी स्री रविदास जीउ की ੴ सतिगुर प्रसादि ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

सह की सार सुहागनि जानै ॥ तजि अभिमानु सुख रलीआ मानै ॥ तनु मनु देइ न अंतरु राखै ॥ अवरा देखि न सुनै अभाखै ॥१॥

मूलम्

सह की सार सुहागनि जानै ॥ तजि अभिमानु सुख रलीआ मानै ॥ तनु मनु देइ न अंतरु राखै ॥ अवरा देखि न सुनै अभाखै ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सह = पति। सार = कद्र। सुहागनि = सोहाग वाली, पति के साथ प्यार करने वाली। तजि = छोड़ के। अंतरु = दूरी। देइ = हवाले करती है। अभाखै = बुरी प्रेरणा।1।
अर्थ: पति-प्रभु (के मिलाप) की कद्र पति से प्यार करने वाली ही जानती है, वह अहंकार छोड़ के (प्रभु-चरणों में जुड़ के उस मिलाप का) सुख-आनंद भोगती है, अपना तन-मन प्रभु पति के हवाले कर देती है, प्रभु-पति से (कोई) दूरी नहीं रखती, ना किसी और का आसरा देखती है, और ना ही किसी की बुरी प्रेरणा सुनती है।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सो कत जानै पीर पराई ॥ जा कै अंतरि दरदु न पाई ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

सो कत जानै पीर पराई ॥ जा कै अंतरि दरदु न पाई ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: पराई पीर = और (गुरमुख सुहागनों) के विछोड़े की पीड़ा। जा कै अंतरि = जिसके हृदय में। दरदु = प्रभु पति से विछोड़े की पीड़ा।1। रहाउ।
अर्थ: जिस जीव-स्त्री के हृदय में प्रभु से विछोड़े का शूल नहीं उठा, वह औरों (गुरमुख सुहागनों) के दिल की (इस) पीड़ा को कैसे समझ सकती है?।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दुखी दुहागनि दुइ पख हीनी ॥ जिनि नाह निरंतरि भगति न कीनी ॥ पुर सलात का पंथु दुहेला ॥ संगि न साथी गवनु इकेला ॥२॥

मूलम्

दुखी दुहागनि दुइ पख हीनी ॥ जिनि नाह निरंतरि भगति न कीनी ॥ पुर सलात का पंथु दुहेला ॥ संगि न साथी गवनु इकेला ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दुइ पख = दो पक्ष (ससुराल-पेका, लोक-परलोक)। हीनी = वंचित हुई। जिनि = जिस ने। नाह भगति = पति प्रभु की बंदगी। निरंतरि = एक रस। पुरसलात = (पुल सिरात) इस्लामी ख्याल के अनुसार एक पुल दोज़क (नर्क) की आग के ऊपर बना हुआ है, बाल के जितना बारीक है, हरेक को इसके ऊपर से गुजरना पड़ता है। देहुला = मुश्किल।2।
अर्थ: पर जिस जीव-स्त्री ने पति-प्रभु की बंदगी एक-रस नहीं की, वह छुटड़ दुखी रहती है, ससुराल-पेके (लोक-परलोक) दोनों जगहों से वंचित रहती है; जीवन का ये रास्ता (जो) पुरसलात (के समान है, उसके लिए) बड़ा मुश्किल हो जाता है, (यहाँ दुखों में) कोई संगी-साथी नहीं बनता, (जीवन-सफर का) सारा रास्ता ही अकेले (लांघना पड़ता) है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

दुखीआ दरदवंदु दरि आइआ ॥ बहुतु पिआस जबाबु न पाइआ ॥ कहि रविदास सरनि प्रभ तेरी ॥ जिउ जानहु तिउ करु गति मेरी ॥३॥१॥

मूलम्

दुखीआ दरदवंदु दरि आइआ ॥ बहुतु पिआस जबाबु न पाइआ ॥ कहि रविदास सरनि प्रभ तेरी ॥ जिउ जानहु तिउ करु गति मेरी ॥३॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: दरि = प्रभु के दर पर। पिआस = दर्शन की तमन्ना। जबाबु = उक्तर। गति = उच्च आत्मिक हालत।3।
अर्थ: हे प्रभु! मैं दुखी मैं दर्दवंद तेरे दर पर आया हूँ, मुझे तेरे दर्शनों की बहुत तमन्ना है (पर तेरे दर से) कोई उक्तर नहीं मिलता। रविदास कहता है: हे प्रभु! मैं तेरी शरण आया हूँ, जैसे भी बने, वैसे मेरी हालत सवार दे।3।

दर्पण-भाव

शब्द का भाव: परमात्मा की भक्ति की दाति के वास्ते प्रभु-दर से माँग।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही ॥ जो दिन आवहि सो दिन जाही ॥ करना कूचु रहनु थिरु नाही ॥ संगु चलत है हम भी चलना ॥ दूरि गवनु सिर ऊपरि मरना ॥१॥

मूलम्

सूही ॥ जो दिन आवहि सो दिन जाही ॥ करना कूचु रहनु थिरु नाही ॥ संगु चलत है हम भी चलना ॥ दूरि गवनु सिर ऊपरि मरना ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जो दिन = जो दिन। जाही = बीत जाते हैं, गुजर जाते हैं। रहनु = ठिकाना। थिरु = सदा का। संगु = साथ। गवनु = रास्ता, राही, मुसाफरी। दूरि गवनु = दूर का सफर। मरना = मौत।1।
अर्थ: (मनुष्य की जिंदगी में) जो जो दिन आते हैं, वह दिन (असल में साथ-साथ) गुजरते जाते हैं (भाव, उम्र में से कम होते जाते हैं), (यहाँ से हरेक ने) कूच कर जाना है (किसी की भी यहाँ) सदा ही रिहायश नहीं है। हमारा साथ चलता जा रहा है, हमने भी (यहाँ से) चले जाना है; ये दूर की यात्रा है और मौत सिर पर खड़ी है (पता नहीं कौन से वक्त आ जाए)।1।

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विश्वास-प्रस्तुतिः

किआ तू सोइआ जागु इआना ॥ तै जीवनु जगि सचु करि जाना ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

किआ तू सोइआ जागु इआना ॥ तै जीवनु जगि सचु करि जाना ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: किआ = क्यों? इआना = हे अंजान! जगि = जगत में। सचु = सदा कायम रहने वाला।1। रहाउ।
अर्थ: हे अंजान! होश कर! तू क्यों सो रहा है? तू जगत में इस जीवन को सदा कायम रहने वाला समझ बैठा है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जिनि जीउ दीआ सु रिजकु अ्मबरावै ॥ सभ घट भीतरि हाटु चलावै ॥ करि बंदिगी छाडि मै मेरा ॥ हिरदै नामु सम्हारि सवेरा ॥२॥

मूलम्

जिनि जीउ दीआ सु रिजकु अ्मबरावै ॥ सभ घट भीतरि हाटु चलावै ॥ करि बंदिगी छाडि मै मेरा ॥ हिरदै नामु सम्हारि सवेरा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: जिनि = जिस (प्रभु) ने। जीउ = जिंद। अंबरावै = पहुँचाता है। भीतरि = अंदर। हाटु = दुकान। हाटु चलावै = रोजी का प्रबंध करता है। सवेरा = समय सिर, सुबह ही।2।
अर्थ: (तू हर वक्त रिजक की ही फिक्र में रहता है, देख) जिस प्रभु ने जिंद दी है, वह रिजक भी पहुँचाता है, सारे शरीरों में बैठा हुआ वह स्वयं रिजक के आहर पैदा कर रहा है। मैं (इतना बड़ा हूँ) मेरी (इतनी मल्कियत है) - छोड़ ये बातें, प्रभु की बंदगी कर, अब वक्त रहते उसका नाम अपने दिल में संभाल।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

जनमु सिरानो पंथु न सवारा ॥ सांझ परी दह दिस अंधिआरा ॥ कहि रविदास निदानि दिवाने ॥ चेतसि नाही दुनीआ फन खाने ॥३॥२॥

मूलम्

जनमु सिरानो पंथु न सवारा ॥ सांझ परी दह दिस अंधिआरा ॥ कहि रविदास निदानि दिवाने ॥ चेतसि नाही दुनीआ फन खाने ॥३॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सिरानो = गुजर रहा है। पंथु = जिंदगी का रास्ता। सवारा = सुंदर बनाया। सांझ = शाम। दहदिस = दसों तरफ। कहि = कहे, कहता है। निदानि = अंत को। दिवाने = हे दिवाने! हे पागल! फनखाने = फनाह का घर, नाशवान।3।
अर्थ: उम्र बीतने पर आ रही है, पर तूने अपना राह सही नहीं बनाया; शाम पड़ रही है, हर तरफ अंधकार ही अंधकार छाने वाला है। रविदास कहता है: हे कमले मनुष्य! तू प्रभु को याद नहीं करता, दुनिया (जिससे तू मन जोड़े बैठा है) अंत में नाश हो जाने वाली है।3।2।

दर्पण-भाव

शब्द का भाव: जगत में सदा बैठे नहीं रहना। इसके मोह में मस्त हो के प्रभु की भक्ति के प्रति गाफिल ना होएं।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: आम तौर पर शब्द ‘निदानि’ को फारसी के शब्द ‘नादान’ समझ के इसके अर्थ ‘मूर्ख’ किए जा रहे हैं। इसके साथ लगा हुआ शब्द ‘दिवाने’ भी कुछ इसी ही अर्थ में मन का झुकाव पैदा करता है। पर यह गलत है, क्योंकि गुरु ग्रंथ साहिब जी में जहाँ कहीं भी ये शब्द आया हैइसके अर्थ ‘अंत को, आखिर को’ किया जाता है। ये संस्कृत का शब्द ‘निदान’ है जिसका अर्थ है ‘आखीर, अंत (end, termination)। देखें;
‘बिनु नारवै पाजु लहगु निदानि ॥’ (बिलावल महला ३) ‘नानक एव न जापई कोई खाइ निदानि॥’ (सलोक म: १, बिलावल की वार) ‘कहि कबीर ते अंति बिगूते आइआ कालु निदाना॥’ (बिलावलु)
बाकी रहा ये एतराज कि ये अर्थ करने के वक्त ‘निदानि’ को उठा के आखिर में शब्द ‘फ़नखाने’ के साथ मिलाना पड़ता है, इस ‘अनवय’ में खींच प्रतीत होती है। इसका उक्तर ये है कि हरेक कवि की कविता का अपना-अपना ढंग है; भक्त रविदास जी भी एक और जगह यही तरीका इस्तेमाल करते हैं;
‘निंदकु सोधि सोधि बीचारिआ ॥ कहु रविदास पापी नरकि सिधारिआ॥’ (गौंड)
इस प्रमाण में शब्द ‘निंदकु’ तुक का अर्थ करने के वक्त आखिर में शब्द ‘पापी’ के साथ बर्तना पड़ता है।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही ॥ ऊचे मंदर साल रसोई ॥ एक घरी फुनि रहनु न होई ॥१॥

मूलम्

सूही ॥ ऊचे मंदर साल रसोई ॥ एक घरी फुनि रहनु न होई ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: साल रसोई = रसोईशाला, रसोई घर। फुनि = दोबारा (भाव, मौत आने पर)।1।
अर्थ: (अगर) ऊँचे-ऊँचे पक्के घर व रसोईखाने हों (तो भी क्या हुआ?) मौत आने से (इनमें) एक घड़ी भी (ज्यादा) रहने को नहीं मिलता।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

इहु तनु ऐसा जैसे घास की टाटी ॥ जलि गइओ घासु रलि गइओ माटी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

इहु तनु ऐसा जैसे घास की टाटी ॥ जलि गइओ घासु रलि गइओ माटी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: टाटी = छप्पर।1। रहाउ।
अर्थ: (पक्के घर आदि तो कहाँ रहे) ये शरीर (भी) घास के छप्पर की तरह ही है, घास जल जाती है, और मिट्टी में मिल जाती है (यही हाल शरीर का होता है)।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

भाई बंध कुट्मब सहेरा ॥ ओइ भी लागे काढु सवेरा ॥२॥

मूलम्

भाई बंध कुट्मब सहेरा ॥ ओइ भी लागे काढु सवेरा ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: भाई बंध = रिश्तेदार। सहेरा = साथी, यार मित्र। लागे = कहने लग जाते हैं। सवेरा = सुबह, जल्दी।2।
अर्थ: (जब मनुष्य मर जाता है तब) रिश्तेदार, परिवार, सज्जन, साथी - ये सभी कहने लग जाते हैं कि इसे अब जल्दी बाहर निकालो।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

घर की नारि उरहि तन लागी ॥ उह तउ भूतु भूतु करि भागी ॥३॥

मूलम्

घर की नारि उरहि तन लागी ॥ उह तउ भूतु भूतु करि भागी ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: घर की नारि = अपनी पत्नी। उरहि = छाती से। भूतु = गुजर गया है, मर गया है। भागी = परे हट जाती है।3।
अर्थ: अपनी पत्नी (भी) जो सदा (मनुष्य) के साथ लगी रहती थी, ये कह के परे हट जाती है ये तो अब मर गया है, मर गया।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कहि रविदास सभै जगु लूटिआ ॥ हम तउ एक रामु कहि छूटिआ ॥४॥३॥

मूलम्

कहि रविदास सभै जगु लूटिआ ॥ हम तउ एक रामु कहि छूटिआ ॥४॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कहि = कहे, कहता है। लूटिआ = ठगा जा रहा है। तउ = तो।4।
अर्थ: रविदास कहता है: सारा जगत ही (शरीर को, जायदाद को, संबन्धियों को अपना समझ के) ठगा जा रहा है, पर मैं एक परमात्मा का नाम स्मरण करके (इस ठगी से) बचा हूँ।4।3।

दर्पण-भाव

शब्द का भाव: यहाँ। कुछ दिन का ठिकाना है। असल साथी परमात्मा ही है।

विश्वास-प्रस्तुतिः

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सूही बाणी सेख फरीद जी की ॥

मूलम्

ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ रागु सूही बाणी सेख फरीद जी की ॥

विश्वास-प्रस्तुतिः

तपि तपि लुहि लुहि हाथ मरोरउ ॥ बावलि होई सो सहु लोरउ ॥ तै सहि मन महि कीआ रोसु ॥ मुझु अवगन सह नाही दोसु ॥१॥

मूलम्

तपि तपि लुहि लुहि हाथ मरोरउ ॥ बावलि होई सो सहु लोरउ ॥ तै सहि मन महि कीआ रोसु ॥ मुझु अवगन सह नाही दोसु ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: तपि तपि = खप खप के, दुखी हो हो के। लुहि लुहि = तड़प तड़प के। हाथ मरोरउ = मैं हाथ मलती हूँ, मैं पछताती हूँ। बावलि = कमली, झल्ली। लोरउ = मैं तलाशती हूँ। सहि = पति ने। रोसु = गुस्सा। सह = पति का।1।
अर्थ: बड़ी दुखी हो के, बड़ी तड़फ के अब मैं हाथ मल रही हूँ, पागल हो के अब मैं उस पति को तलाशती फिरती हूँ। हे पति प्रभु! तेरा कोई दोष (मेरी इस बुरी हालत के लिए) नहीं है, मेरे में ही अवगुण थे, तभी तूने अपने मन में मेरे साथ रोष किया।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

तै साहिब की मै सार न जानी ॥ जोबनु खोइ पाछै पछुतानी ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

तै साहिब की मै सार न जानी ॥ जोबनु खोइ पाछै पछुतानी ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सार = कद्र। खोइ = गवा के।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मालिक! मैंने तेरी कद्र नहीं जानी, जवानी का समय गवा के अब बाद में मैं झुर रही हूँ।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

काली कोइल तू कित गुन काली ॥ अपने प्रीतम के हउ बिरहै जाली ॥ पिरहि बिहून कतहि सुखु पाए ॥ जा होइ क्रिपालु ता प्रभू मिलाए ॥२॥

मूलम्

काली कोइल तू कित गुन काली ॥ अपने प्रीतम के हउ बिरहै जाली ॥ पिरहि बिहून कतहि सुखु पाए ॥ जा होइ क्रिपालु ता प्रभू मिलाए ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: कित गुन = किन गुणों के कारण। हउ = मैं। बिरहै = बिछोड़े में। जाली = जली।2।
अर्थ: (अब मैं कोयल को पूछती फिरती हूँ-) हे काली कोयल! (भला, मैं तो अपने कर्मों की मारी दुखी जली सड़ी हुई हूँ) तू भी क्यों काली (हो गई) है? (कोयल भी यही उक्तर देती है) मुझे मेरे प्रीतम के विछोड़े ने जला डाला है। (ठीक है) पति से विछुड़ के कहीं कोई सुख पा सकी है? (पर, जीव-स्त्री के वश की भी बात नहीं) जब प्रभु खुद मेहरवान होता है तो खुद ही मिला लेता है।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

विधण खूही मुंध इकेली ॥ ना को साथी ना को बेली ॥ करि किरपा प्रभि साधसंगि मेली ॥ जा फिरि देखा ता मेरा अलहु बेली ॥३॥

मूलम्

विधण खूही मुंध इकेली ॥ ना को साथी ना को बेली ॥ करि किरपा प्रभि साधसंगि मेली ॥ जा फिरि देखा ता मेरा अलहु बेली ॥३॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: विधण = (विधून) कंपाने वाली, डरावनी, भयानक। मुंध = स्त्री। प्रभि = प्रभु ने। साध संगि = सत्संग में। बेली = मददगार।3।
अर्थ: (इस जगत रूप) डरावने कूएं में मैं जीव-स्त्री अकेली (गिर गई थी, यहाँ) कोई मेरा साथी नहीं (मेरे दुखों में) कोई मेरा मददगार नहीं। अब जब प्रभु ने मेहर करके मुझे सत्संग में मिलाया है, (सत्संग में आ के) जब मैं देखती हूँ तो मुझे मेरा रब बेली दिख रहा है।3।

विश्वास-प्रस्तुतिः

वाट हमारी खरी उडीणी ॥ खंनिअहु तिखी बहुतु पिईणी ॥ उसु ऊपरि है मारगु मेरा ॥ सेख फरीदा पंथु सम्हारि सवेरा ॥४॥१॥

मूलम्

वाट हमारी खरी उडीणी ॥ खंनिअहु तिखी बहुतु पिईणी ॥ उसु ऊपरि है मारगु मेरा ॥ सेख फरीदा पंथु सम्हारि सवेरा ॥४॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: वाट = जीवन सफर। उडीणी = दुखद, चिंतातुर करने वाली। खंनिअहु = खंडे से। पिइणी = तेज धार वाली, पतली। समारि = संभाल के। सवेरा = सुबह।4।
अर्थ: हे भाई! हमारा यह जीवन-पथ बहुत भयावह है, खंडे से भी तीखा है, बड़ी तेज धार वाला है; इसके ऊपर से हमें गुजरना है। इस वास्ते, हे फरीद! सुबह-सुबह रास्ता संभाल।4।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

सूही ललित ॥ बेड़ा बंधि न सकिओ बंधन की वेला ॥ भरि सरवरु जब ऊछलै तब तरणु दुहेला ॥१॥

मूलम्

सूही ललित ॥ बेड़ा बंधि न सकिओ बंधन की वेला ॥ भरि सरवरु जब ऊछलै तब तरणु दुहेला ॥१॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: बेड़ा = नाम स्मरण रूपी बेड़ा, ‘जप तप’ का बेड़ा। बंधि न सकिओ = (कसुंभ को ही हाथ डाले रखने से जीव) तैयार ना कर सका। बंधन की वेला = (बेड़ा) तैयार करने की उम्र में। भरि = (विकारों से लबालब) भर के। दुहेला = मुश्किल।1।
अर्थ: (जिस मनुष्य ने माया से ही मन लगाए रखा) वह (बेड़ा) तैयार करने की उम्र में नाम-रूप बेड़ा तैयार ना कर सका, और, जब सरोवर (लबालब) भर के (बाहर) उछलने लग पड़ता है तब इसमें तैरना मुश्किल हो जाता है (भाव, जब मनुष्य विकारों की अति कर देता है तो इनके चस्के में से निकलना दुश्वार हो जाता है)।1।

विश्वास-प्रस्तुतिः

हथु न लाइ कसु्मभड़ै जलि जासी ढोला ॥१॥ रहाउ॥

मूलम्

हथु न लाइ कसु्मभड़ै जलि जासी ढोला ॥१॥ रहाउ॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: ढोला = हे मित्र! जलि जासी = (कसुंभ) जल जाएगा, मुरझा जाएगा, कसुंभ का रंग बहुत देर तक रहने वाला नहीं, माया की मौज थोड़े दिन ही रहती है। हथु न लाइ कसुंभड़ै = बुरे कसुंभ को हाथ मत लगा, मन को दगाबाज माया के साथ ना जोड़े रख। रहाउ।
अर्थ: हे सज्जन! दगाबाज माया के साथ ही अपने मन को ना जोड़े रख, ये माया चार दिन की खेल है।1। रहाउ।

विश्वास-प्रस्तुतिः

इक आपीन्है पतली सह केरे बोला ॥ दुधा थणी न आवई फिरि होइ न मेला ॥२॥

मूलम्

इक आपीन्है पतली सह केरे बोला ॥ दुधा थणी न आवई फिरि होइ न मेला ॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: इक = कई (जीव-) स्त्रीयां। आपीनै = अपने आप में। पतली = कमजोर आत्मिक जीवन वाली। रे बोला = निरादरी के वचन। दुधाथणी = वह अवस्था जब स्त्री के थनों से दूध आता है, पति मिलाप। फिरि = कि ये वक्त हाथ से निकल जाने पर।2।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: गुरु नानक साहिब के अपने शब्द को छोड़ कर विलायत वाली साखी का आसरा लेते फिरना, फिर उसके भी गलत पाठ का आसरा लेना, समझदारी वाली बात नहीं, शब्द ‘इक’ बहुवचन ही है, पर है यह ‘स्त्रीलिंग’; पुलिंग में आमतौर पर बहुवचन शब्द ‘इक’ से ‘इकि’ होता है। शब्द ‘दुधाथणी’ के दो हिस्से ‘दुधा’ और ‘थणी’ कर देने भी गलत हैं। ये शब्द एक ही और ‘समासी’ शब्द है। सारे गुरु ग्रंथ साहिब में सिर्फ दो बार आया है, दूसरी बार गुरु नानक साहिब ने प्रयोग किया है।

दर्पण-भाषार्थ

अर्थ: जो जीव-सि्त्रयाँ (माया से मोह डालने के कारण) अपने आप में कमजोर आत्मिक जीवन वाली हो जाती हैं, उनको (प्रभु-) पति के दर से निरादरी के बोल नसीब होते हैं; उनपे पति के मिलाप की अवस्था नहीं आती और मानव जन्म का समय हाथ से छूट जाने पर (जब नाम-स्मरण का बेड़ा तैयार हो सकता था) प्रभु से मेल नहीं हो सकता।2।

विश्वास-प्रस्तुतिः

कहै फरीदु सहेलीहो सहु अलाएसी ॥ हंसु चलसी डुमणा अहि तनु ढेरी थीसी ॥३॥२॥

मूलम्

कहै फरीदु सहेलीहो सहु अलाएसी ॥ हंसु चलसी डुमणा अहि तनु ढेरी थीसी ॥३॥२॥

दर्पण-भाषार्थ

पद्अर्थ: सहु = पति प्रभु। अलाएसी = बुलाएगा। हंसु = जीवात्मा। डुंमणा = (डुं+मणा) दोचिता (हो के)। अहि तनु = ये शरीर। थीसी = हो जाएगा।3।
अर्थ: फरीद कहता है: हे सहेलियो! जब पति-प्रभु का बुलावा (इस जगत में से चलने के लिए) आएगा, तो (माया में ही ग्रसी रहने वाली जीव-स्त्री का) आत्मा-हंस दुबिधा में (दुचिती में यहाँ से) जाएगा (भाव, माया से विछुड़ने का चिक्त नहीं करेगा)।3।2।

दर्पण-टिप्पनी

नोट: श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी के हरेक शब्द में ‘रहाउ’ की एक व दो तूकें आती हैं। ‘रहाउ’ का अर्थ है ‘टिकाव’, ‘ठहरना’। सो, सारे शब्द को समझने के लिए पहले उस पंक्ति पर ठहरना है, जिसके साथ ‘रहाउ’ लिखा है। गुरु ग्रंथ साहिब जी के शबदों को समझने का मूल नियम यही है कि पहले ‘रहाउ’ की पंक्ति को अथवा पद को अच्छी तरह समझ लिया जाए। मुख्य भाव इसी पंक्ति में ही होता है, बाकी के पद इस मुख्य-भाव का विस्तार होते हैं।
हथु न लाइ कसुंभड़ै, जलि जासी ढोला॥१॥ रहाउ॥
‘कसुंभा’ एक फूल का नाम है, जिसका रंग देखने में तो बड़ा चटक और भड़कीला होता है, पर जल्दी ही खराब हो जाता है इसके मुकाबले पर ‘मजीठ’ है; इसका रंग पक्का होता है। श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी में ये दोनों ही पदार्थों के मुकाबले में ‘माया’ और ‘नाम’ के लिए बरते गए हैं, क्योंकि माया का साथ चार दिन का है, और, नाम-धन इसका साथ निभने वाला है। ‘कसुंभड़ै’ फूल के साथ ‘जलि’ जाने का शब्द का इस्तेमाल भी पंजाबी मुहावरे के मुताबिक ही है। हम आम तौर पर कहते हैं, ‘फूल जल गया’। शब्द ‘जलि’ का संबंध ‘कसुंभड़ै’ से है। इसे और ज्यादा स्पष्ट करने के लिए इसी राग के आरम्भ में गुरु नानक साहिब का एक शब्द काफी है इन दोनों शबदों को आमने-सामने रख के एक-एक पद मिला के पढ़ें तो ऐसा प्रतीत होता है कि शेख फरीद जी के भाव को स्पष्ट करने के लिए साहिब गुरु नानक देव जी ने ये शब्द उचारा है। शब्द यूँ है;
सूही महला १॥ जप तप का बंधु बेड़ुला जितु लंघहि वहेला॥ ना सरवरु ना ऊछलै ऐसा पंथु सुहेला॥१॥ तेरा एको नामु मंजीठड़ा रता मेरा चोला सद रंग ढोला॥१॥ रहाउ॥ साजन चले पिआरिआ किउ मेला होई॥ जे गुण होवहि गंठड़ीऐ मेलेगा सोई॥२॥ मिलिआ होइ न वीछुड़ै जे मिलिआ होई॥ आवा गउणु निवारिआ है साचा सोई॥३॥ हउमै मारि निवारिआ सीता है चोला॥ गुर बचनी फलु पाइआ सह के अंम्रित बोला॥४॥ नानकु कहै सहेलीहो सहु खरा पिआरा॥ हम सह केरीआ दासीआ साचा खसम हमारा॥५॥२॥४॥ (पन्ना 729)
इस शब्द का एक-एक पद फरीद जी के शब्द के एक-एक पद के भाव को खोल रहा है। यही हाल ‘रहाउ’ की तुक का है। ‘कुसंभै’ के मुकाबले में ‘मजीठ’ शब्द बरता है। इस तरह ‘कसुंभड़ै’ का अर्थ ‘कसुंभ’ का फूल ही है जो ‘माया’ के प्रथाय प्रयोग किया गया है।
अर्थ: हे मित्र! कसुंभ-रूपी माया को हाथ ना लगा, यह कसुंभ जल जाएगा, भाव इस माया का साथ जल्दी ही नष्ट होने वाला है। रहाउ।
मूल: बेड़ा बंधि न सकिओ, बंधन की वेला॥
(प्र:) कौन सा बेड़ा?
(उ:) जप तप का बंधु बेड़ुला॥
मूल: इकि आपीनै, पतली सहके रे बोला॥
इस तुक का ठीक पाठ करने के लिए ठीक अर्थ समझने के लिए गुरु नानक देव जी के उपरोक्त दिए शब्द का आठवाँ पद पढ़ें:
‘गुर बचनी फलु पाइआ, सह के अंम्रित बोला॥’
जिन्होंने कसुंभ को हाथ लगाया वह ‘आपीनै पतली’ रहीं और उन्हें प्राप्त क्या हुआ? ‘सह के रे बोला’। पर जिनका चोला नाम-मजीठ से रंगा गया, उन्होंने फल पाया ‘सह के अम्रित बोला’।
इन दोनों तुकों के सारे शब्दों को आपस में मेल करके देखें। शब्द ‘सह’, ‘के’, ‘बोला’; ये तीनों ही दोनों में सांझे हैं। गुरु नानक साहिब वाले शब्द की तुक में शब्द ‘रे’ रह गया।
इस तरह पाठ ‘सह के रे बोला’ है, भाव, ‘के’ और ‘रे’ अलग-अलग हैं। ‘रे’ अनादर भाव में बोले वचन हैं। जैसे: ‘रे रे दरगह कहै न कोऊ’
अर्थ: कई जीव सि्त्रयाँ (जिन्होंने कसुंभ को हाथ लगाया है) अपने आप में पतलियाँ हैं उन्हें पति के अनादरी वाले वचन ही मिलते हैं।
पतलीआं = नाज़क, अहंकारनें, चतुर बुद्धि, कमजोर आत्मिक जीवन वाली।
मूल: दुधाथणी न आवई फिरि होइ न मेला॥2।
इस तुक को समझने के लिए भी उपरोक्त शब्द के पद् 2 और 3 देखें;
(प्र:) किस मिलाप का जिक्र है?
(उ:) हरि से मिलाप का। मनुष्य के जनम के मिलने की ओर इशारा नहीं है। इस तरह ‘फिरि होइ न मेला’ का भाव है (अगर कसुंभे को हाथ लगाया) तो पति-परमात्मा के साथ मेल नहीं होगा।
बाकी रह गई पहली आधी तुक ‘दुधाथणी न आवई’।
(प्र:) स्त्री के थनों में दूध कब आता है?
(उ:) कुदरत के नियम अनुसार जब उसके पति से मिलाप होता है और पुत्र-वती बनती है, जब सोहाग-भाग वाली होती है।
डस सारी तुक का अर्थ इस प्रकार है: अगर कसुंभ को हाथ लगाया तो स्त्री सोहागवती नहीं हो सकेगी, और पति से मिलाप नहीं हो सकेगा।
इस अर्थ की प्रोढ़ता के लिए साहिब श्री गुरु नानक देव जी का निम्न-लिखित शब्द विशेष ध्यान देने योग्य है;
रागु गउड़ी पूरबी छंत महला १॥ मुंध रैणि दुहेलड़ीआ जीउ नीद न आवै॥ सा धन दुबलीआ जीउ पिर कै हावै॥ धन थीई दुबलि कंत हावै केव नैणी देखए॥ सीगार मिठ रस भोग भोजन सभु झूठु कितै न लेखए॥ मै मत जोबनि गरबि गाली दुधा थणी न आवए॥ नानक साधन मिलै मिलाई बिनु पिर नीद न आवए॥१॥ (पन्ना २४२)
इस छंत में केवल जीव-स्त्री और पति-परमात्मा के मिलाप का ही वर्णन है, मानव जनम की ओर कहीं इशारा नहीं है। यह अनुमान लग सकता है कि फरीद जी ने और साहिब गुरु नानक देव जी ने एक ही मुहावरा जीव-स्त्री के सोहाग-वती होने के लिए बरता है। ‘रहाउ’ की तुक को सामने रख के सारे शब्द को पढ़ने से यही प्रत्यक्ष दिखता है कि कसुंभ को हाथ लगाने से भयानक निर्णय बताए गए हैं।