[[0557]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
मूलम्
ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
रागु वडहंसु महला १ घरु १ ॥
मूलम्
रागु वडहंसु महला १ घरु १ ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अमली अमलु न अ्मबड़ै मछी नीरु न होइ ॥ जो रते सहि आपणै तिन भावै सभु कोइ ॥१॥
मूलम्
अमली अमलु न अ्मबड़ै मछी नीरु न होइ ॥ जो रते सहि आपणै तिन भावै सभु कोइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अमली = अफीम आदि नशे करने वाला। अमलु = अफीम आदि नशा। अंबड़ै = पहुँचे, मिले। नीरु = पानी। सहि = सह में, पति (के प्यार) में। आपणै सहि = अपने पति के प्रेम में। रते = रंगे हुए। सभु कोइ = हरेक जीव।1।
अर्थ: (अफीमी आदि) अमली को अगर (अफीम आदि) अमल (नशा) ना मिले (तो वह मर जाता है), अगर मछली को पानी ना मिले (तो वह तड़प उठती है। इसी तरह, अगर प्रभु! तेरा नाम जिनकी जिंदगी का सहारा बन गया है वे तेरी याद के बिना नहीं रह सकते, उनको कुछ भी अच्छा नहीं लगता)। जो लोग अपने पति-प्रभु के प्यार में रंगे हुए हैं (वह अंदर से खिले हुए हैं) उन्हें हर कोई अच्छा लगता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ वारी वंञा खंनीऐ वंञा तउ साहिब के नावै ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
हउ वारी वंञा खंनीऐ वंञा तउ साहिब के नावै ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हउ = मैं। वारी वंञा = (वारी वंजां) मैं सदके जाता हूँ। खंनीऐ वंञा = टुकड़े टुकड़े होता हूँ, कुर्बान होता हूँ। तउ = तेरे।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे साहिब! मैं तेरे नाम से सदके हूँ, कुर्बान जाता हूँ।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साहिबु सफलिओ रुखड़ा अम्रितु जा का नाउ ॥ जिन पीआ ते त्रिपत भए हउ तिन बलिहारै जाउ ॥२॥
मूलम्
साहिबु सफलिओ रुखड़ा अम्रितु जा का नाउ ॥ जिन पीआ ते त्रिपत भए हउ तिन बलिहारै जाउ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सफलिओ = फलों वाला। रुखड़ा = सुंदर रुख। जा का = जिस (वृक्ष) का (फल)। अंम्रितु = अटल।, आत्मिक जीवन देने वाला रस। जिन = जिन्होंने। त्रिपत भए = तृप्त हुए, अघा गए, संतुष्ट हो गए।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जिनि’ एकवचन है और ‘जिन’ बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (हमारा) मालिक प्रभु फलों वाला एक सोहणा वृक्ष (है समझ लें), इस वृक्ष का फल है उसका ‘नाम’ जो (जीव को) अटल आत्मिक जीवन देने वाला (रस अमृत) है। जिन्होंने ये रस पीया है वे (मायावी पदार्थों की भूख-प्यास से) तृप्त हो जाते हैं। मैं उनसे कुर्बान जाता हूँ।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मै की नदरि न आवही वसहि हभीआं नालि ॥ तिखा तिहाइआ किउ लहै जा सर भीतरि पालि ॥३॥
मूलम्
मै की नदरि न आवही वसहि हभीआं नालि ॥ तिखा तिहाइआ किउ लहै जा सर भीतरि पालि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मै की = मुझे। आवही = आए, तू आता। हभि = सभी। तिहाइआ = प्यासा। सर = तालाब, सरोवर। पालि = दीवार। किउ लहै = कैसे मिले? नहीं मिल सकता।3।
अर्थ: (हे प्रभु!) तू सब जीवों के अंग-संग बसता है, पर तू मुझे नहीं दिखता। (जीव का ये कितना बड़ा दुर्भाग्य है कि उसके अपने अंदर ही पानी का सरोवर हो और वह प्यासा तड़पता फिरे! पर) प्यास से तड़प रहे को (पानी) मिले भी कैसे, जब उसके और (उसके अंदर के) सरोवर के बीच दीवार बनी हो? (माया के मोह की बनी कोई दीवार अमृत सरोवर में से नाम-जल तक पहुँचने नहीं देती)।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानकु तेरा बाणीआ तू साहिबु मै रासि ॥ मन ते धोखा ता लहै जा सिफति करी अरदासि ॥४॥१॥
मूलम्
नानकु तेरा बाणीआ तू साहिबु मै रासि ॥ मन ते धोखा ता लहै जा सिफति करी अरदासि ॥४॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बाणीआ = बनिया, वणजारा। मै रासि = मेरी पूंजी। धोखा = सहम। लहै = दूर हो। करी = मैं करूँ।4।
अर्थ: (हे प्रभु! मेहर कर, तेरा दास) तेरे नाम का बंजारा बन जाए, तू मेरा शाहु हो तेरा नाम मेरी पूंजी बने। मेरे मन से दुनिया का सहम तब ही दूर हो सकता है अगर मैं सदा प्रभु की महिमा करता रहूँ, अगर उसके दर पर अरदास-आरजू करता रहूँ।4।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला १ ॥ गुणवंती सहु राविआ निरगुणि कूके काइ ॥ जे गुणवंती थी रहै ता भी सहु रावण जाइ ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला १ ॥ गुणवंती सहु राविआ निरगुणि कूके काइ ॥ जे गुणवंती थी रहै ता भी सहु रावण जाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निरगुणि = गुण हीन स्त्री। काइ कूके = किस लिए कूकती है, क्यूँ तरले करती है? रोना विलखना व्यर्थ है। थी रहै = बनी रहे, हो जाए।1।
अर्थ: जिस जीव-स्त्री के पास ये गुण है (जिस जीव-स्त्री को ये विश्वास है कि प्रभु ही सुखों का स्रोत है, वह) प्रभु-पति (का पल्ला पकड़ के उस) को प्रसन्न कर लेती है (और आत्मिक सुख हासिल करती है) पर जिसके पल्ले ये गुण नहीं है (और जो जगह-जगह भटकती फिरती है) वह (आत्मिक सुख के लिए) व्यर्थ ही तरले लेती है। हाँ, अगर उसके अंदर भी ये गुण आ जाए, तो पति-प्रभु को प्रसन्न करने का सफल उद्यम कर सकती है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरा कंतु रीसालू की धन अवरा रावे जी ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरा कंतु रीसालू की धन अवरा रावे जी ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रीसालू = रसीला, रस आलय, रसों का घर; सुख आनंद का श्रोत। अवरा = और लोगों को। रावे = भोगे, मिले। जी = हे जी! हे बहन!।1। रहाउ।
अर्थ: हे बहन! (जिस जीव-स्त्री को ये विश्वास हो जाए कि) मेरा पति-प्रभु सारे सुखों का श्रोत है, वह (पति-प्रभु को छोड़ के) और लोगों को (सुखों का साधन समझ के) प्रसन्न करने नहीं जाती।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
करणी कामण जे थीऐ जे मनु धागा होइ ॥ माणकु मुलि न पाईऐ लीजै चिति परोइ ॥२॥
मूलम्
करणी कामण जे थीऐ जे मनु धागा होइ ॥ माणकु मुलि न पाईऐ लीजै चिति परोइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करणी = उच्च आचरण। कामण = टूणा (विवाह के समय जब बारात पहुँचती है तो लड़कियां गीत गाती हैं। मान्यता ये है कि इन गीतों से नव वर दूल्हा ब्याही जाने वाली वधू के कहे में चला करेगा। इसी प्रर्थाय पंजाबी मुहावरा भी है, ‘कामण पाणे’), पति को वश में करने वाले गीत। माणकु = मोती (प्रभु का नाम)। मुलि = किसी मुल्य से। चिति = चिक्त में।2।
अर्थ: अगर जीव-स्त्री का ऊँचा आचरण कामण डालने (पति को वश में करने वाले गीत) का काम करे, अगर वह मन धागा बने तो इस मन के धागे से उस नाम-मोती को अपने चिक्त में परो ले (धन-पदार्थ आदि किसी) मूल्य से नहीं मिल सकता।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
राहु दसाई न जुलां आखां अमड़ीआसु ॥ तै सह नालि अकूअणा किउ थीवै घर वासु ॥३॥
मूलम्
राहु दसाई न जुलां आखां अमड़ीआसु ॥ तै सह नालि अकूअणा किउ थीवै घर वासु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दसाई = मैं पूछूँ, मैं पूछती रहूँ। न जुलां = (पर उस रास्ते पर) मैं ना चलूँ। अंमड़ीआसु = मैं पहुँच गई हूँ। सह नालि = पति से। अकूअणा = बोलचाल ना होना।3।
अर्थ: (पर, निरी बातों से, हे सुख सागर! तेरे चरणों में पहुँचा जा सकता) हे पति-प्रभु! अगर मैं (तेरे देश का) हमेशा रास्ता ही पूछती रहूँ, पर उस रास्ते पर चलूँ ही ना, मुँह से कहे जाऊँ कि मैं (तेरे देश तक) पहुँच गई हूँ, वैसे कभी तेरे साथ बोलचाल (अपना पन) ना बनाया हो (कभी तेरे दर पर अरदास भी ना की हो), इस तरह तेरे चरणों में ठिकाना नहीं मिल सकता।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक एकी बाहरा दूजा नाही कोइ ॥ तै सह लगी जे रहै भी सहु रावै सोइ ॥४॥२॥
मूलम्
नानक एकी बाहरा दूजा नाही कोइ ॥ तै सह लगी जे रहै भी सहु रावै सोइ ॥४॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तै लगी = तेरे में जुड़ी हुई। सह = हे पति!।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: इस शब्द में शब्द ‘सहु’ और ‘सह’ आए है। शब्द ‘सहु’ कर्ता कर्म कारक एकवचन है। किसी संबंधक के साथ प्रयोग होने पर ‘ु’ की मात्रा हट जाती है, जैसे ‘सह नालि’। संबोधन में भी यही रूप है; जैसे ‘सह’ = हे पति!
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे नानक! (ये यकीन जानो कि) एक परमात्मा के बिना और कोई भी सुखदाता नहीं, (इसलिए उसके दर पे अरदास कर और कह:) हे प्रभु पति! जो जीव-स्त्री तेरे चरणों में जुड़ी रहती है वह तुझे प्रसन्न कर लेती है (और आत्मिक सुख पाती है)।4।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला १ घरु २ ॥ मोरी रुण झुण लाइआ भैणे सावणु आइआ ॥ तेरे मुंध कटारे जेवडा तिनि लोभी लोभ लुभाइआ ॥ तेरे दरसन विटहु खंनीऐ वंञा तेरे नाम विटहु कुरबाणो ॥ जा तू ता मै माणु कीआ है तुधु बिनु केहा मेरा माणो ॥
मूलम्
वडहंसु महला १ घरु २ ॥ मोरी रुण झुण लाइआ भैणे सावणु आइआ ॥ तेरे मुंध कटारे जेवडा तिनि लोभी लोभ लुभाइआ ॥ तेरे दरसन विटहु खंनीऐ वंञा तेरे नाम विटहु कुरबाणो ॥ जा तू ता मै माणु कीआ है तुधु बिनु केहा मेरा माणो ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मोरी = मोरों ने। रुणझुण = मीठा गीत। लाइआ = शुरू किया। तेरे = (हे प्रभु!) तेरे ये कुदरती दृश्य। मुंध = स्त्री। कटारे = कटार। जेवडा = जेवड़ा, फाही। तिनि = (कुदरति के) इस (सुहावने स्वरूप) ने। लुभाइआ = मोह लिया है। दरसन विटहु = इस सोहाने स्वरूप से जो अब दिखाई दे रहा है। खंनीऐ वंञा = मैं टुकड़े टुकड़े होता हूँ। जा तू = चुँकि तू (इस कुदरत में मुझे दिख रहा है)। मैं माणु कीआ है = मैंने ये कहने का हौसला किया है कि तेरी ये कुदरत सुहावनी है।
अर्थ: हे बहन! सावन (का महीना) आ गया है (सावन की काली घटाएं देख के सुहाने) मोरों ने मीठे गीत आरम्भ कर दिए हैं (और नाचना शुरू कर दिया हैं)। (हे प्रभु!) तेरी ये सोहानी कुदरत मुझ जीव-स्त्री के लिए, जैसे, कटार है (जो मेरे अंदर विरहा की चोट कर रही है), फाँसी है, इसने मुझे तेरे दीदार की प्रेमिका को मोह लिया है (और मुझे तेरे चरणों की तरफ खींचती जा रही है)। (हे प्रभु!) तेरे इस सोहाने स्वरूप से जो अब दिख रहा है मैं सदके हूँ मैं सदके हूँ (तेरा ये स्वरूप मुझे तेरा नाम याद करा रहा है, और) मैं तेरे नाम से कुर्बान हूँ। (हे प्रभु!) चुँकि तू (इस कुदरत में मुझे दिख रहा है) मैंने ये कहने का हौसला किया है (कि तेरी ये कुदरति सुहावनी है)। अगर कुदरति में तू ही ना दिखे तो ये कहने में क्या स्वाद रह जाए कि कुदरति सुहानी है?
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विश्वास-प्रस्तुतिः
चूड़ा भंनु पलंघ सिउ मुंधे सणु बाही सणु बाहा ॥ एते वेस करेदीए मुंधे सहु रातो अवराहा ॥ ना मनीआरु न चूड़ीआ ना से वंगुड़ीआहा ॥ जो सह कंठि न लगीआ जलनु सि बाहड़ीआहा ॥ सभि सहीआ सहु रावणि गईआ हउ दाधी कै दरि जावा ॥ अमाली हउ खरी सुचजी तै सह एकि न भावा ॥ माठि गुंदाईं पटीआ भरीऐ माग संधूरे ॥ अगै गई न मंनीआ मरउ विसूरि विसूरे ॥
मूलम्
चूड़ा भंनु पलंघ सिउ मुंधे सणु बाही सणु बाहा ॥ एते वेस करेदीए मुंधे सहु रातो अवराहा ॥ ना मनीआरु न चूड़ीआ ना से वंगुड़ीआहा ॥ जो सह कंठि न लगीआ जलनु सि बाहड़ीआहा ॥ सभि सहीआ सहु रावणि गईआ हउ दाधी कै दरि जावा ॥ अमाली हउ खरी सुचजी तै सह एकि न भावा ॥ माठि गुंदाईं पटीआ भरीऐ माग संधूरे ॥ अगै गई न मंनीआ मरउ विसूरि विसूरे ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भंनु = तोड़ दे। सिउ = साथ। मुंधे = हे स्त्री! सणु = समेत। बाही = पलंघ की बाहियां। एते = इतने, ये कई। वेस = श्रृंगार। करेदीए = करने वाली! रातो = रंगा हुआ है, प्यार कर रहा है। अवराहा = औरों से। मनीआरु = चूड़ीयां चढ़ाने वाला। ना से वंगुड़ीआहा = ना ही वे कंगन सुंदर जानो। सह कंठि = पति के गले से। जलनु = जल जाएं। सभि = सारी। रावणि = प्रसंन्न करना। हउ = मैं। दाधी = गरम, (विकारों में) जली हुई। कै दरि = किस दर पर? अंमाली = (अम्आली) हे सखी! खरी = बहुत। सुचजी = अच्छे आचार वाली, अच्छी कुदरत वाली। एकि = एक के कारण, एक भी गुण के कारण। माठि = सवार के। गुंदाई = मैं गुदांती हूँ। माग = मांग, पटियों के बीच का चीर। न मंनीआ = मुझे आदर नहीं मिलता। मरउ = मैं मरती हूँ। विसूरि विसूरे = विसूरि, विसूरि झुर झुर के, धुख धुख के।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जलनु’ व्याकरण के अनुसार शब्द ‘जलनु’ हुकमी भविश्यत्, अन्न पुरख, बहुवचन है। इस का एक वचन है ‘जलउ’ जैसे ‘कलम जलउ सणु मसवाणीअै’।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे भोली स्त्री! (तूने पति को मिलने के लिए अपनी बाँहों में चूड़ा डाला, व और भी कई श्रृंगार किए, पर) हे इतने सारे श्रृंगार करने वाली नारी! अगर तेरा पति (फिर भी) औरों से ही प्यार करता रहा (तो इतने सारे श्रृंगारों के क्या लाभ? फिर) पलंघ से मार-मार के अपना चूड़ा तोड़ दे, पलंघ की बाहियां ही तोड़ डाल और अपनी सजाई हुई बाँहें ही तोड़ डाल क्योंकि ना उन बाँहों को सजाने वाला मनियार ही तेरा कुछ सवार सका, ना ही उसकी दी हुई चूड़ियाँ और कंगन किसी काम आए। जल जाएं वे (सजी हुई) बाँहें जो पति के गले से ना लग सकीं। (भाव, अगर जीव-स्त्री सारी उम्र धार्मिक भेस करने में ही गुजार दे, इसको धर्मोपदेश देने वाला भी अगर बाहरी भेस की तरफ ही उसे प्रेरित करता रहे, तो ये सारे उद्यम व्यर्थ चले गए। क्योंकि, धार्मिक वेश-भूसा से ईश्वर को प्रसन्न नहीं किया जा सकता। उससे तो सिर्फ आत्मिक मिलाप ही हो सकता है)।
(प्रभु-चरणों में जुड़ने वाली) सारी सहेलियाँ (तो) प्रभु पति को प्रसन्न करने के प्रयत्न कर रही हैं (पर, मैं जो निरे दिखावे के ही धर्म-वेष करती रही) मैं कर्म जली किसके दर पर जाऊँ? हे सखी! मैं (इन धर्म-भेषों पर ही टेक रख के) अपनी ओर से तो बड़ी अच्छी करतूत वाली बनी बैठी हूँ। पर, (हे) प्रभु पति! किसी एक भी गुण के कारण मैं तुझे पसंद नहीं आ रही। मैं सवार-सवार के चोटियाँ गूँदती हूँ, मेरी पटियों के चीर में सिंदूर भी भरा जाता है, पर तेरी हजूरी में मैं फिर भी स्वीकार नहीं हो रही, (इस वास्ते) झुर झुर के मर रही हूँ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मै रोवंदी सभु जगु रुना रुंनड़े वणहु पंखेरू ॥ इकु न रुना मेरे तन का बिरहा जिनि हउ पिरहु विछोड़ी ॥ सुपनै आइआ भी गइआ मै जलु भरिआ रोइ ॥ आइ न सका तुझ कनि पिआरे भेजि न सका कोइ ॥ आउ सभागी नीदड़ीए मतु सहु देखा सोइ ॥ तै साहिब की बात जि आखै कहु नानक किआ दीजै ॥ सीसु वढे करि बैसणु दीजै विणु सिर सेव करीजै ॥ किउ न मरीजै जीअड़ा न दीजै जा सहु भइआ विडाणा ॥१॥३॥
मूलम्
मै रोवंदी सभु जगु रुना रुंनड़े वणहु पंखेरू ॥ इकु न रुना मेरे तन का बिरहा जिनि हउ पिरहु विछोड़ी ॥ सुपनै आइआ भी गइआ मै जलु भरिआ रोइ ॥ आइ न सका तुझ कनि पिआरे भेजि न सका कोइ ॥ आउ सभागी नीदड़ीए मतु सहु देखा सोइ ॥ तै साहिब की बात जि आखै कहु नानक किआ दीजै ॥ सीसु वढे करि बैसणु दीजै विणु सिर सेव करीजै ॥ किउ न मरीजै जीअड़ा न दीजै जा सहु भइआ विडाणा ॥१॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रुंना = रो पड़ा है, तरस कर रहा है। वणहु = जंगल में से। पंखेरू = पक्षी। इकु = सिर्फ। मेरे तन का बिरहा = मेरे अंदर का तेरे चरणों से विछोड़ा। जिनि = जिस (विछोड़े) ने। पिरहु = पति (-प्रभु) ये। सुपनै = सपने में। भी = मुड़। जलु भरिआ रोइ = आँसू भर के रोई। तुझ कनि = तेरे पास। कोइ = किसी को। मतु देखा = शायद मैं देख लूँ। जि = जो मनुष्य। दीजै = देना चाहिए। वढे करि = काट कर। बैसणु = बैठने के लिए जगह। किउ न मरीजै = स्वै भाव क्यों ना मारें? किउ जीअड़ा न दीजै = जिंद क्यों ना सदके करें? विडाणा = बेगाना।१।
अर्थ: (प्रभु-पति से विछुड़ के) मैं इतनी दुखी हो रही हूँ (कि) सारा जगत मेरे पर तरस कर रहा है, जंगल के पक्षी भी (मेरी दुखी हालत पर) तरस कर रहे हैं। सिर्फ ये मेरे अंदर का विछोड़ा ही है जो तरस नहीं करता (जो मेरी खलासी नहीं करता), इसने मुझे प्रभु-पति से विछोड़ा हुआ है।
(हे पति!) मुझे तू सपने में मिला (सपना खत्म हुआ, और तू) फिर चला गया, (विछोड़े के दुख में) मैं आूंसू भर के रोई। हे प्यारे! मैं (निमाणी) तेरे पास पहुँच नहीं सकती, मैं (गरीब) किसी को तेरे पास भेज नहीं सकती (जो मेरी हालत तुझे बताए। नींद के आगे ही तरले करती हूँ-) हे सौभाग्यशाली सुंदर नींद! तू (मेरे पास आ) शायद (तेरे द्वारा ही) मैं अपने पति-प्रभु का दीदार कर सकूँ।
हे नानक! (प्रभु-दर पर) कह: हे मेरे मालिक! अगर कोई गुरमुखि मुझे तेरी कोई बात सुनाए तो मैं उसके आगे कौन सी भेटा रखूँ! अपना सिर काट के मैं उसके बैठने के लिए आसन बना दूँ (भाव,) स्वै भाव दूर करके मैं उसकी सेवा करूँ।
जब हमारा प्रभु-पति (हमारी मूर्खता के कारण) हमसे अलग हो जाए (तो उसे दुबारा अपना बनाने के लिए यही एक तरीका है कि) हम स्वैभाव मार दें, और अपनी जिंद उस पर सदके कर दें।1।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनि मैलै सभु किछु मैला तनि धोतै मनु हछा न होइ ॥ इह जगतु भरमि भुलाइआ विरला बूझै कोइ ॥१॥
मूलम्
मनि मैलै सभु किछु मैला तनि धोतै मनु हछा न होइ ॥ इह जगतु भरमि भुलाइआ विरला बूझै कोइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनि मैलै = (विकारों से हुए) मैले मन से। तनि धोतै = धोए हुए शरीर से, अगर शरीर को (तीर्थों आदि पे) स्नान करा लिया जाए। भरमि = भुलेखे में (पड़ के)।1।
अर्थ: हे भाई! अगर मनुष्य का मन (विकारों की) मैल से भरा रहे (तो उतने वक्त मनुष्य जो कुछ करता है) सब कुछ विकार ही करता है, शरीर को (तीर्थ आदि के) स्नान करवाने से मन पवित्र नहीं हो सकता। पर ये संसार (तीर्थ-स्नान आदि से मन की पवित्रता मिल जाने के) भुलेखे में पड़ के गलत राह पर चला जा रहा है। कोई दुर्लभ मनुष्य ही (इस सच्चाई को) समझता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जपि मन मेरे तू एको नामु ॥ सतगुरि दीआ मो कउ एहु निधानु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
जपि मन मेरे तू एको नामु ॥ सतगुरि दीआ मो कउ एहु निधानु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मन = हे मन! सतगुरि = गुरु ने। मो कउ = मुझे। निधानु = खजाना।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! तू (विकारों से बचने के लिए) सिर्फ परमात्मा का नाम जपा कर। यह (नाम-) खजाना गुरु ने बख्शा है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिधा के आसण जे सिखै इंद्री वसि करि कमाइ ॥ मन की मैलु न उतरै हउमै मैलु न जाइ ॥२॥
मूलम्
सिधा के आसण जे सिखै इंद्री वसि करि कमाइ ॥ मन की मैलु न उतरै हउमै मैलु न जाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सिखै = सीख लिए। वसि करि = बस में करके।2।
अर्थ: अगर मनुष्य चमत्कारी योगियों वाले आसन सीख ले, अगर काम-वासना को जीत के (आसनों के अभ्यास की) कमाई करने लग जाए, तो भी मन की मैल नहीं उतरती, (मन में से) अहंकार की मैल नहीं जाती।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इसु मन कउ होरु संजमु को नाही विणु सतिगुर की सरणाइ ॥ सतगुरि मिलिऐ उलटी भई कहणा किछू न जाइ ॥३॥
मूलम्
इसु मन कउ होरु संजमु को नाही विणु सतिगुर की सरणाइ ॥ सतगुरि मिलिऐ उलटी भई कहणा किछू न जाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: संजमु = तरीका, प्रयत्न। सतिगुरि मिलिऐ = अगर गुरु मिल जाए।3।
अर्थ: हे भाई! गुरु की शरण पड़े बिना और कोई यत्न इस मन को पवित्र नहीं कर सकता। अगर गुरु मिल जाए तो मन तवज्जो संसार से पलट जाती है (और मन की ऐसी ऊँची दशा बन जाती है जो) बयान नहीं की जा सकती।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भणति नानकु सतिगुर कउ मिलदो मरै गुर कै सबदि फिरि जीवै कोइ ॥ ममता की मलु उतरै इहु मनु हछा होइ ॥४॥१॥
मूलम्
भणति नानकु सतिगुर कउ मिलदो मरै गुर कै सबदि फिरि जीवै कोइ ॥ ममता की मलु उतरै इहु मनु हछा होइ ॥४॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भणति = कहता है। कउ = को। मरै = (विकारों से) अछूता हो जाए। सबदि = शब्द से।4।
अर्थ: नानक कहता है: जो मनुष्य गुरु को मिल के (विकारों से) अछूता हो जाता है, और, फिर गुरु के शब्द में जुड़ के आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है (उसके अंदर से माया की) ममता की मैल उतर जाती है, उसका ये मन पवित्र हो जाता है।4।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ ॥ नदरी सतगुरु सेवीऐ नदरी सेवा होइ ॥ नदरी इहु मनु वसि आवै नदरी मनु निरमलु होइ ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ ॥ नदरी सतगुरु सेवीऐ नदरी सेवा होइ ॥ नदरी इहु मनु वसि आवै नदरी मनु निरमलु होइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नदरी = (परमात्मा की कृपा की) नजर से। सेवीऐ = सेवा की जा सकती है, शरण ली जा सकती है। वसि = काबू में। निरमलु = पवित्र।1।
अर्थ: (हे भाई!) परमात्मा की मेहर की निगाह से ही गुरु की शरण पड़ सकते हैं, मेहर की नजर से ही परमात्मा की सेवा भक्ति हो सकती है। मेहर की निगाह से ही ये मन काबू में आता है, और पवित्र हो जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन चेति सचा सोइ ॥ एको चेतहि ता सुखु पावहि फिरि दूखु न मूले होइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन चेति सचा सोइ ॥ एको चेतहि ता सुखु पावहि फिरि दूखु न मूले होइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चेति = स्मरण कर, याद करता रह। सचा = सदा कायम रहने वाला प्रभु! मूले = बिल्कुल।1। रहाउ।
अर्थ: हे (मेरे) मन! उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा को याद किया कर। अगर तू उस एक परमात्मा को याद करता रहेगा तो सुख हासिल करेगा, और तुझे कभी भी कोई दुख नहीं छू सकेगा।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नदरी मरि कै जीवीऐ नदरी सबदु वसै मनि आइ ॥ नदरी हुकमु बुझीऐ हुकमे रहै समाइ ॥२॥
मूलम्
नदरी मरि कै जीवीऐ नदरी सबदु वसै मनि आइ ॥ नदरी हुकमु बुझीऐ हुकमे रहै समाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मरि कै = विकारों की ओर से अछूता हो के। जीवीऐ = आत्मिक जीवन प्राप्त किया जाता है। मनि = मन में। हुकमे = हुकमि ही, हुक्म में ही।2।
अर्थ: (हे भाई!) परमात्मा की कृपा की नजर से ही विकारों से हट के आत्मिक जीवन हासिल किया जाता है, और गुरु का शब्द मन में आ बसता है। मेहर की निगाह से ही परमात्मा की रजा को समझा जा सकता है, और रजा में सदा टिके रहा जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनि जिहवा हरि रसु न चखिओ सा जिहवा जलि जाउ ॥ अन रस सादे लगि रही दुखु पाइआ दूजै भाइ ॥३॥
मूलम्
जिनि जिहवा हरि रसु न चखिओ सा जिहवा जलि जाउ ॥ अन रस सादे लगि रही दुखु पाइआ दूजै भाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिनि = जिस ने। जिनि जिहवा = जिस जीभ ने। जलि जाउ = जल जाए, वह जलने योग्य है। अन = अन्य। सादे = स्वाद में। दूजै भाइ = माया के प्यार में।3।
अर्थ: हे भाई! जिस जीभ ने कभी परमात्मा के नाम का स्वाद नहीं चखा वह जीभ जलने योग्य ही है, (क्योंकि जिस मनुष्य की जीभ) अन्य रसों के स्वाद में लगी रहती है, वह मनुष्य माया के मोह में फंस के दुख (ही) पाता रहता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभना नदरि एक है आपे फरकु करेइ ॥ नानक सतगुरि मिलिऐ फलु पाइआ नामु वडाई देइ ॥४॥२॥
मूलम्
सभना नदरि एक है आपे फरकु करेइ ॥ नानक सतगुरि मिलिऐ फलु पाइआ नामु वडाई देइ ॥४॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आपे = आप ही। करेइ = करता है। सतगुरि मिलिऐ = अगर गुरु मिल जाए। देइ = देता है।4।
अर्थ: (हे भाई! वैसे तो) सब जीवों पर एक परमात्मा की ही कृपा की नजर रहती है, (पर कोई अच्छा बन जाता है कोई विकारी हो जाता है, यह) फर्क (भी) परमात्मा खुद ही बनाता है (क्योंकि) हे नानक! अगर गुरु मिल जाए (तो ही परमात्मा की मेहर की निगाह का) फल मिलता है (परमात्मा गुरु के द्वारा अपना) नाम बख्शता है (ये नाम-प्राप्ति ही सब से बड़ी) इज्जत (है)।4।2।
[[0559]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ ॥ माइआ मोहु गुबारु है गुर बिनु गिआनु न होई ॥ सबदि लगे तिन बुझिआ दूजै परज विगोई ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ ॥ माइआ मोहु गुबारु है गुर बिनु गिआनु न होई ॥ सबदि लगे तिन बुझिआ दूजै परज विगोई ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुबारु = घोर अंधकार। गिआनु = आत्मिक जीवन की सूझ। सबदि = शब्द में। तिन = उन्होंने। दूजै = माया के मोह में। परज = दृष्टि। विगोई = ख्वार हो रही है।1।
अर्थ: (हे भाई! आत्मिक जीवन के राह में) माया का मोह (जैसे) घोर अंधकार है, गुरु की शरण पड़े बिना (इस घोर अंधकार में से) आत्मिक जीवन की सूझ नहीं पड़ सकती। जो मनुष्य गुरु के शब्द में जुड़े रहते हैं उन्हें समझ आ जाती है, (वरना) माया के मोह में फंस के संसार दुखी होता रहता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे गुरमति करणी सारु ॥ सदा सदा हरि प्रभु रवहि ता पावहि मोख दुआरु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे गुरमति करणी सारु ॥ सदा सदा हरि प्रभु रवहि ता पावहि मोख दुआरु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करणी = जीवन कर्तव्य। सारु = संभाल। रवहि = (यदि) तू स्मरण करता रहे। मोख = मोक्ष, विकारों से खलासी।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! गुरु की मति ले के जीवन-चाल चल। अगर तू सदा परमात्मा का नाम स्मरण करता रहे तो (माया के बंधनो से) निजात का रास्ता मिल जाएगा।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुणा का निधानु एकु है आपे देइ ता को पाए ॥ बिनु नावै सभ विछुड़ी गुर कै सबदि मिलाए ॥२॥
मूलम्
गुणा का निधानु एकु है आपे देइ ता को पाए ॥ बिनु नावै सभ विछुड़ी गुर कै सबदि मिलाए ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निधानु = खजाना। देइ = देता है। को = कोई मनुष्य। सबदि = शब्द के द्वारा।2।
अर्थ: हे भाई! एक हरि-नाम ही सारे गुणों का खजाना है, पर इस खजाने को तब ही कोई मनुष्य हासिल करता है जब प्रभु खुद ही ये खजाना देता है। परमात्मा के नाम स्मरण के बिना सृष्टि परमात्मा से विछुड़ी रहती है। गुरु के शब्द में जुड़ के (प्रभु अपने चरणों में) मिला लेता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरी मेरी करदे घटि गए तिना हथि किहु न आइआ ॥ सतगुरि मिलिऐ सचि मिले सचि नामि समाइआ ॥३॥
मूलम्
मेरी मेरी करदे घटि गए तिना हथि किहु न आइआ ॥ सतगुरि मिलिऐ सचि मिले सचि नामि समाइआ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: घटि गए = आत्मिक जीवन कमजोर हो गया। हथि = हाथ में। किहु = (आत्मिक जीवन में से) कुछ भी। सतगुरि मिलिऐ = अगर सतिगुरु मिल जाए। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। नामि = नाम में।3।
अर्थ: माया के अपनत्व की बातें कर करके जीवों के आत्मिक जीवन कमजोर होते रहते हैं (आत्मिक जीवन की पूंजी में से) उन्हें कुछ भी नहीं मिलता। (पर) अगर गुरु मिल जाए तो जीव सदा-स्थिर प्रभु में जुड़े रहते हैं, सदा स्थिर प्रभु के नाम में लीन रहते हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आसा मनसा एहु सरीरु है अंतरि जोति जगाए ॥ नानक मनमुखि बंधु है गुरमुखि मुकति कराए ॥४॥३॥
मूलम्
आसा मनसा एहु सरीरु है अंतरि जोति जगाए ॥ नानक मनमुखि बंधु है गुरमुखि मुकति कराए ॥४॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनसा = मन का फुरना, मनीषा। जोति जगाए = आत्मिक जीवन की रोशनी कर देता है। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य। बंधु = रोक, बंधन। मुकति = (विकारों के बंधनो से) मुक्ति।4।
अर्थ: हे भाई! मनुष्य का ये शरीर आसा और मनसा (के साथ बँधा रहता) है, (गुरु इस के) अंदर आत्मिक जीवन की रौशनी पैदा करता है। हे नानक! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य के राह में (आसा और मनसा के) बंधन पड़े रहते हैं, गुरु की शरण पड़े मनुष्य को (परमात्मा इस आसा-मनसा से) निजात दिलवा देता है।4।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ ॥ सोहागणी सदा मुखु उजला गुर कै सहजि सुभाइ ॥ सदा पिरु रावहि आपणा विचहु आपु गवाइ ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ ॥ सोहागणी सदा मुखु उजला गुर कै सहजि सुभाइ ॥ सदा पिरु रावहि आपणा विचहु आपु गवाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सोहागणी = सोहाग भाग वाली, प्रभु पति को सिर पर जीता जागता जानने वालियां। उजला = रौशन। गुर कै = गुरु के शब्द की इनायत से। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाव = प्रेम में। पिरु = पति। रावहि = हृदय में संभाल के रखती हें। आपु = स्वै भाव।1।
अर्थ: हे भाई! प्रभु-पति को सिर पर जीता-जागता जानने वाली जीव-स्त्रीयों का मुँह सदा रौशन रहता है, गुरु के शब्द के द्वारा वे सदा आत्मिक अडोलता में और प्रभु प्रेम में टिकी रहती हैं। वह अपने अंदर से स्वैभाव दूर करके सदा अपने प्रभु पति को हृदय में सम्भाल के रखतीं हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन तू हरि हरि नामु धिआइ ॥ सतगुरि मो कउ हरि दीआ बुझाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन तू हरि हरि नामु धिआइ ॥ सतगुरि मो कउ हरि दीआ बुझाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सतगुरि = गुरु ने। मो कउ = मुझे।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! तू सदा हरि नाम स्मरण करता रह। गुरु ने मुझे हरि-नाम (स्मरण) की सूझ दे दी है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दोहागणी खरीआ बिललादीआ तिना महलु न पाइ ॥ दूजै भाइ करूपी दूखु पावहि आगै जाइ ॥२॥
मूलम्
दोहागणी खरीआ बिललादीआ तिना महलु न पाइ ॥ दूजै भाइ करूपी दूखु पावहि आगै जाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: खरीआ = बहुत। महलु = प्रभु की हजूरी। करूपी = बुरे (आत्मिक) रूप वालियां, बुरे (आत्मिक) जीवन वालियां। आगै = परलोक में। जाइ = जा के।2।
अर्थ: पर त्यागी हुई जीव-स्त्रीयां दुखी ही रहती हैं, उन्हें प्रभु की हजूरी नसीब नहीं होती। माया के मोह में गलतान रहने के कारण वे बुरे आत्मिक जीवन वाली ही रहती हैं, परलोक में भी जा के वे दुख ही सहती हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुणवंती नित गुण रवै हिरदै नामु वसाइ ॥ अउगणवंती कामणी दुखु लागै बिललाइ ॥३॥
मूलम्
गुणवंती नित गुण रवै हिरदै नामु वसाइ ॥ अउगणवंती कामणी दुखु लागै बिललाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रवै = याद रखती है। वसाइ = बसा के। कामणी = (जीव-) स्त्री।3।
अर्थ: गुणवान जीव-स्त्री अपने दिल में प्रभु-नाम बसा के सदा प्रभु के गुण याद करती रहती है। पर, अवगुण भरी जीव-स्त्री को दुख चिपका रहता है वह सदा विलकती रहती है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभना का भतारु एकु है सुआमी कहणा किछू न जाइ ॥ नानक आपे वेक कीतिअनु नामे लइअनु लाइ ॥४॥४॥
मूलम्
सभना का भतारु एकु है सुआमी कहणा किछू न जाइ ॥ नानक आपे वेक कीतिअनु नामे लइअनु लाइ ॥४॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भतारु = पति। वेक = अलग अलग स्वभाव वाले। कीतिअनु = उसने बना दिए हैं। नामे = नाम में। लइअनु लाइ = उसने लगा लिए हैं।4।
अर्थ: (पर, ये एक आश्चर्यजनक खेल है) कुछ कहा नहीं जा सकता (कोई सुहागनें हैं तो कोई दुहागनें हैं, और) सबका पति एक परमात्मा मालिक ही है। हे नानक! प्रभु ने स्वयं ही जीवों को अलग-अलग स्वभाव वाले बना दिया है, उसने खुद ही जीव अपने नाम में जोड़े हुए हैं।4।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ ॥ अम्रित नामु सद मीठा लागा गुर सबदी सादु आइआ ॥ सची बाणी सहजि समाणी हरि जीउ मनि वसाइआ ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ ॥ अम्रित नामु सद मीठा लागा गुर सबदी सादु आइआ ॥ सची बाणी सहजि समाणी हरि जीउ मनि वसाइआ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाला। सद = सदा। सबदी = शब्द के द्वारा। सादु = स्वाद, आनंद। सची बाणी = सदा स्थिर हरि के महिमा की वाणी के द्वारा। सहजि = आत्मिक अडोलता में। मनि = मन में।1।
अर्थ: (जिस मनुष्य को गुरु मिल गया, उसको) आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम सदा मीठा लगने लगा, गुरु के शब्द की इनायत से उसको हरि के नाम का स्वाद आने लग पड़ा, सदा स्थिर प्रभु के महिमा की वाणी के द्वारा आत्मिक अडोलता में उसकी लीनता हो गई; उसने परमात्मा को अपने मन में परो लिया।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि करि किरपा सतगुरू मिलाइआ ॥ पूरै सतगुरि हरि नामु धिआइआ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
हरि करि किरपा सतगुरू मिलाइआ ॥ पूरै सतगुरि हरि नामु धिआइआ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करि = करके। सतगुरि = गुरु के द्वारा।1। रहाउ।
अर्थ: (हे भाई!) परमात्मा ने कृपा करके (जिस मनुष्य को) गुरु मिला दिया, उसने पूरे गुरु के द्वारा परमात्मा का नाम स्मरणा शुरू कर दिया।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ब्रहमै बेद बाणी परगासी माइआ मोह पसारा ॥ महादेउ गिआनी वरतै घरि आपणै तामसु बहुतु अहंकारा ॥२॥
मूलम्
ब्रहमै बेद बाणी परगासी माइआ मोह पसारा ॥ महादेउ गिआनी वरतै घरि आपणै तामसु बहुतु अहंकारा ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ब्रहमै = ब्रहमा ने। पसारा = खिलारा। महादेउ = शिव। वरतै = मस्त रहता है। घरि = हृदय घर में। तामसु = क्रोध।2।
अर्थ: (कहते हैं कि) ब्रहमा ने वेदों की वाणी प्रगट की। पर, उसने भी माया के मोह का पसारा ही बिखेरा, (कहते हैं कि) महादेव आत्मिक जीवन की सूझ वाला है, वह अपने हृदय-गृह में मस्त रहता है, (पर उसके अंदर भी) बड़ा क्रोध व अहंकार (बताया जाता) है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
किसनु सदा अवतारी रूधा कितु लगि तरै संसारा ॥ गुरमुखि गिआनि रते जुग अंतरि चूकै मोह गुबारा ॥३॥
मूलम्
किसनु सदा अवतारी रूधा कितु लगि तरै संसारा ॥ गुरमुखि गिआनि रते जुग अंतरि चूकै मोह गुबारा ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: किसनु = विष्णु। रूधा = व्यस्त रहता है। कितु लगि = किस के चरणों में लग के? गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ने वाले मनुष्य। गिआनि = ज्ञान में, आत्मिक जीवन की सूझ (के आनंद) में। जुग अंतरि = जमाने में, जगत में। गुबारा = घोर अंधेरा।3।
अर्थ: विष्णु सदा अवतार धारने में व्यस्त हुआ (बताया जा रहा) है। (बताओ) जगत किस के चरणों में लग के संसार-सागर से पार हो? (हाँ) जो मनुष्य जगत में गुरु की शरण पड़ के (गुरु से मिले आत्म) ज्ञान में रंगे रहते हैं, उनके अंदर से मोह का घुप अँधेरा दूर हो जाता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतगुर सेवा ते निसतारा गुरमुखि तरै संसारा ॥ साचै नाइ रते बैरागी पाइनि मोख दुआरा ॥४॥
मूलम्
सतगुर सेवा ते निसतारा गुरमुखि तरै संसारा ॥ साचै नाइ रते बैरागी पाइनि मोख दुआरा ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ते = से। निसतारा = पार उतारा। साचै नाइ = सदा स्थिर प्रभु के नाम में। बैरागी = माया के मोह से निर्लिप। पाइनि = पहनते हैं। मोख = मोह से खलासी।4।
अर्थ: हे भाई! गुरु की बताई सेवा-भक्ति की इनायत से ही पार उतारा होता है, गुरु की शरण पड़ कर ही जगत संसार-समुंदर से पार लांघता है। (गुरु के द्वारा) सदा स्थिर प्रभु के नाम में रंगे हुए मनुष्य माया के मोह से निर्लिप हो जाते हैं, और, माया के मोह से छुटकारे का दरवाजा तलाश लेते हैं।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
एको सचु वरतै सभ अंतरि सभना करे प्रतिपाला ॥ नानक इकसु बिनु मै अवरु न जाणा सभना दीवानु दइआला ॥५॥५॥
मूलम्
एको सचु वरतै सभ अंतरि सभना करे प्रतिपाला ॥ नानक इकसु बिनु मै अवरु न जाणा सभना दीवानु दइआला ॥५॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचु = सदा स्थिर रहने वाला प्रभु। प्रतिपाला = पालना। दीवानु = आसरा, हाकम जिसके पास फरियाद की जा सके। न जाणा = मैं नहीं जानता, ना जानूँ।5।
अर्थ: (हे भाई! गुरु की शरण पड़ने से ये समझ आ जाती है कि) सारी सृष्टि में एक सदा कायम रहने वाला परमात्मा ही बसता है, (वही) सब जीवों की पालणा करता है। हे नानक! (कह:) एक परमात्मा के बगैर मैं किसी और को (उस जैसा) नहीं जानता, वही दया का घर प्रभु सब जीवों का आसरा-सहारा है।5।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ ॥ गुरमुखि सचु संजमु ततु गिआनु ॥ गुरमुखि साचे लगै धिआनु ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ ॥ गुरमुखि सचु संजमु ततु गिआनु ॥ गुरमुखि साचे लगै धिआनु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ कर। सचु = सदा स्थिर प्रभु (का नाम स्मरणा)। संजमु = इन्द्रियों को वश में करने के यत्न। ततु = असल। साचे = सदा कायम रहने वाले प्रभु में।1।
अर्थ: हे भाई! गुरु की शरण पड़ के सदा स्थिर प्रभु का नाम-जपना ही इन्द्रियों का सही यत्न है, और आत्मिक जीवन की सूझ का मूल है। गुरु की शरण पड़ने से सदा कायम रहने वाले परमात्मा में तवज्जो जुड़ी रहती है।1।
[[0560]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखि मन मेरे नामु समालि ॥ सदा निबहै चलै तेरै नालि ॥ रहाउ॥
मूलम्
गुरमुखि मन मेरे नामु समालि ॥ सदा निबहै चलै तेरै नालि ॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मन = हे मन! समालि = सम्भाल, याद करता रह।1। रहाउ।
अर्थ: हे मन! गुरु की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम सदा याद करता रह। ये नाम ही तेरे साथ जाने वाला है साथ निभाने वाला है। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखि जाति पति सचु सोइ ॥ गुरमुखि अंतरि सखाई प्रभु होइ ॥२॥
मूलम्
गुरमुखि जाति पति सचु सोइ ॥ गुरमुखि अंतरि सखाई प्रभु होइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जाति पति = जाति पाति, ऊँची कुल। सखाई = मित्र, साथी।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जिस नो’ में से शब्द ‘जिस’ की ‘ु’ की मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण नहीं लगी है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे भाई! गुरु की शरण पड़ कर वह सदा स्थिर हरि का नाम-स्मरण ऊँची जाति व ऊँची कुल (का मूल) है। गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के अंदर परमात्मा आ बसता है, और उसका (सदा का) साथी बन जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखि जिस नो आपि करे सो होइ ॥ गुरमुखि आपि वडाई देवै सोइ ॥३॥
मूलम्
गुरमुखि जिस नो आपि करे सो होइ ॥ गुरमुखि आपि वडाई देवै सोइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वडाई = इज्जत।3।
अर्थ: पर वही मनुष्य गुरु के सन्मुख हो सकता है जिसको परमात्मा स्वयं (इस लायक) बनाता है, वह परमात्मा खुद मनुष्य को गुरु के सन्मुख करके सम्मान बख्शता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखि सबदु सचु करणी सारु ॥ गुरमुखि नानक परवारै साधारु ॥४॥६॥
मूलम्
गुरमुखि सबदु सचु करणी सारु ॥ गुरमुखि नानक परवारै साधारु ॥४॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करणी = कर्तव्य, जीवन उद्देश्य। परवारै = परिवार के वास्ते। साधारु = सु आधार। आधार सहित, आसरा देने योग्य।4।
अर्थ: हे भाई! गुरु की शरण पड़ कर सदा स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी (हृदय में) संभाल, यही करने योग्य काम है। हे नानक! गुरु के सन्मुख रहने वाला मनुष्य अपने परिवार के वास्ते भी आसरा देने के काबिल हो जाता है।4।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ ॥ रसना हरि सादि लगी सहजि सुभाइ ॥ मनु त्रिपतिआ हरि नामु धिआइ ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ ॥ रसना हरि सादि लगी सहजि सुभाइ ॥ मनु त्रिपतिआ हरि नामु धिआइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रसना = जीभ। सादि = स्वाद में। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाइ = प्रेम में। त्रिपतिआ = तृप्त हो जाता है। धिआइ = स्मरण करके।1।
अर्थ: (हे भाई! गुरु की शरण पड़ के जिस मनुष्य की) जीभ परमात्मा के नाम के स्वाद में लगती है, वह मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक जाता है, प्रभु-प्रेम में जुड़ जाता है। परमात्मा का नाम स्मरण करके उसका मन (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सदा सुखु साचै सबदि वीचारी ॥ आपणे सतगुर विटहु सदा बलिहारी ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
सदा सुखु साचै सबदि वीचारी ॥ आपणे सतगुर विटहु सदा बलिहारी ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साचै सबदि = सदा स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी में (जुड़ने से)। वीचारी = विचारवान। विटहु = से। बलिहारी = कुर्बान।1। रहाउ।
अर्थ: मैं अपने गुरु से सदा कुर्बान जाता हूँ, जिसके सदा स्थिर प्रभु की महिमा में जुड़ने से विचारवान हो जाते हैं, और सदैव आत्मिक आनंद मिला रहता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अखी संतोखीआ एक लिव लाइ ॥ मनु संतोखिआ दूजा भाउ गवाइ ॥२॥
मूलम्
अखी संतोखीआ एक लिव लाइ ॥ मनु संतोखिआ दूजा भाउ गवाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: संतोखीआ = तृप्त हो जाती हैं। लिव लाइ = तवज्जो/ध्यान जोड़ के। दूजा भाउ = माया का प्यार।2।
अर्थ: (हे भाई! गुरु की शरण की इनायत से) एक परमात्मा में तवज्जो जोड़ के मनुष्य की आँखें (पराए रूप से) तृप्त हो जाती हैं, (अंदर से) माया का प्यार दूर करके मनुष्य का मन (तृष्णा की ओर से) संतुष्ट हो जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
देह सरीरि सुखु होवै सबदि हरि नाइ ॥ नामु परमलु हिरदै रहिआ समाइ ॥३॥
मूलम्
देह सरीरि सुखु होवै सबदि हरि नाइ ॥ नामु परमलु हिरदै रहिआ समाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देह = शरीर। सरीरि = शरीर में। सबदि = शब्द के द्वारा। नाइ = नाम में (जुड़ने से)। परमलु = परिमल, सुगंधि, खुशबू देने वाला पदार्थ।3।
अर्थ: (हे भाई! गुरु के) शब्द की इनायत से परमात्मा के नाम में जुड़ने से शरीर में आनंद पैदा होता है, (गुरु की मेहर से) आत्मिक जीवन की सुगंधि देने वाला हरि-नाम मनुष्य के हृदय में सदा टिका रहता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक मसतकि जिसु वडभागु ॥ गुर की बाणी सहज बैरागु ॥४॥७॥
मूलम्
नानक मसतकि जिसु वडभागु ॥ गुर की बाणी सहज बैरागु ॥४॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मसतकि = माथे पर। जिसु मसतकि = जिसके माथे पर। सहज बैरागु = आत्मिक अडोलता पैदा करने वाला वैरागु। बैरागु = निर्मोहता।4।
अर्थ: हे नानक! जिस मनुष्य के माथे पर उच्च भाग्य जागते हैं वह मनुष्य गुरु की वाणी में जुड़ता है (जिसकी इनायत से उसके अंदर) आत्मिक अडोलता पैदा करने वाला वैराग उपजता है।4।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ ॥ पूरे गुर ते नामु पाइआ जाइ ॥ सचै सबदि सचि समाइ ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ ॥ पूरे गुर ते नामु पाइआ जाइ ॥ सचै सबदि सचि समाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ते = से। पाइआ जाइ = मिल सकता है। सचै सबदि = सदा स्थिर प्रभु की महिमा वाले गुर शब्द में। सचि = सदा स्थिर प्रभु में।1।
अर्थ: हे मेरे मन! तू अपने गुरु के हुक्म में चल, (और, गुरु से) नाम-खजाना हासिल कर।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ए मन नामु निधानु तू पाइ ॥ आपणे गुर की मंनि लै रजाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
ए मन नामु निधानु तू पाइ ॥ आपणे गुर की मंनि लै रजाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निधानु = खजाना। पाइ = प्राप्त कर। रजाइ = हुक्म।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! पूरे गुरु से (ही) परमात्मा का नाम (-खजाना) मिल सकता है, (जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु की महिमा वाले गुरु शब्द में जुड़ता है, वह) सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लीन हो जाता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर कै सबदि विचहु मैलु गवाइ ॥ निरमलु नामु वसै मनि आइ ॥२॥
मूलम्
गुर कै सबदि विचहु मैलु गवाइ ॥ निरमलु नामु वसै मनि आइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सबदि = शब्द में। गवाइ = दूर कर लेता है। निरमल = पवित्र। मनि = मन में।2।
अर्थ: (हे भाई! जो मनुष्य) गुरु के शब्द में (जुड़ता है, वह अपने) अंदर से (विकारों की) मैल दूर कर लेता है, परमात्मा का पवित्र नाम (उसके) मन में आ बसता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भरमे भूला फिरै संसारु ॥ मरि जनमै जमु करे खुआरु ॥३॥
मूलम्
भरमे भूला फिरै संसारु ॥ मरि जनमै जमु करे खुआरु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भरमे = भटकना में। भूला = गलत रास्ते पर पड़ा हुआ। मरि जनमै = (बारबार) पैदा होता मरता है।3।
अर्थ: (हे भाई! गुरु से टूट के) जगत भटकना के कारण (जीवन के सही रास्ते से) भूला फिरता है, जनम-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है, यम-राज इसको सदा दुखी करता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक से वडभागी जिन हरि नामु धिआइआ ॥ गुर परसादी मंनि वसाइआ ॥४॥८॥
मूलम्
नानक से वडभागी जिन हरि नामु धिआइआ ॥ गुर परसादी मंनि वसाइआ ॥४॥८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: से = वह मनुष्य (बहुवचन)। परसादी = प्रसादि से, कृपा से। मंनि = मन में।4।
अर्थ: हे नानक! जिस मनुष्यों ने गुरु की कृपा से परमात्मा का नाम स्मरणा शुरू किया, परमात्मा का नाम अपने मन में बसाया, वे भाग्यशाली हो गए।4।8।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ ॥ हउमै नावै नालि विरोधु है दुइ न वसहि इक ठाइ ॥ हउमै विचि सेवा न होवई ता मनु बिरथा जाइ ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ ॥ हउमै नावै नालि विरोधु है दुइ न वसहि इक ठाइ ॥ हउमै विचि सेवा न होवई ता मनु बिरथा जाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नावै नालि = नाम से। विरोधु = वैर। दुइ = ये दोनों। इक ठाइ = एक जगह में, हृदय में। ता = तब। बिरथा = खाली।1।
अर्थ: हे भाई! अहंकार का परमात्मा के नाम के साथ वैर है, ये दोनों इकट्ठे (हृदय में) नहीं रह सकते। अहंकार में रह कर परमात्मा की सेवा-भक्ति नहीं हो सकती (जब मनुष्य) अहंकार में रह के भक्ति करता है तब (उसका) मन खाली हो जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि चेति मन मेरे तू गुर का सबदु कमाइ ॥ हुकमु मंनहि ता हरि मिलै ता विचहु हउमै जाइ ॥ रहाउ॥
मूलम्
हरि चेति मन मेरे तू गुर का सबदु कमाइ ॥ हुकमु मंनहि ता हरि मिलै ता विचहु हउमै जाइ ॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चेति = स्मरण करता रह। मन = हे मन!। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! तू (अपने अंदर) गुरु का शब्द बसाने की कमाई कर और परमात्मा का नाम स्मरण करता रह। अगर तू (गुरु का) हुक्म मानेगा, तो तुझे परमात्मा मिल जाएगा, तो तेरे अंदर से अहंकार दूर हो जाएगा।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउमै सभु सरीरु है हउमै ओपति होइ ॥ हउमै वडा गुबारु है हउमै विचि बुझि न सकै कोइ ॥२॥
मूलम्
हउमै सभु सरीरु है हउमै ओपति होइ ॥ हउमै वडा गुबारु है हउमै विचि बुझि न सकै कोइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभु = सारा। ओपति = उत्पक्ति, जनम मरन का चक्कर। गुबारु = घुप अंधेरा।2।
अर्थ: हे भाई! शरीर (धारने का ये) सारा (सिलसिला) अहंकार के कारण ही है, अहंकार के कारण जनम-मरण का चक्कर बना रहता है। (मनुष्य के आत्मिक जीवन के रास्ते में) अहंकार बहुत बड़ा घोर अंधकार है, अहंकार (के घुप अंधेरे में) कोई मानव (आत्मिक जीवन का रास्ता) समझ नहीं सकता।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउमै विचि भगति न होवई हुकमु न बुझिआ जाइ ॥ हउमै विचि जीउ बंधु है नामु न वसै मनि आइ ॥३॥
मूलम्
हउमै विचि भगति न होवई हुकमु न बुझिआ जाइ ॥ हउमै विचि जीउ बंधु है नामु न वसै मनि आइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जीउ = जीवात्मा (के वास्ते)। बंधु = रुकावट। मनि = मन में।3।
अर्थ: हे भाई! अहंकार (के घोर अंधेरे) में परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती, परमात्मा की रजा समझी नहीं जा सकती, अहंकार (के घोर अंधकार में) जीवात्मा के वास्ते (आत्मिक जीवन के राह में) रुकावटें बनी रहती हैं, (और इसी कारण) परमात्मा का नाम मनुष्य के मन में आ के नहीं बस सकता।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक सतगुरि मिलिऐ हउमै गई ता सचु वसिआ मनि आइ ॥ सचु कमावै सचि रहै सचे सेवि समाइ ॥४॥९॥१२॥
मूलम्
नानक सतगुरि मिलिऐ हउमै गई ता सचु वसिआ मनि आइ ॥ सचु कमावै सचि रहै सचे सेवि समाइ ॥४॥९॥१२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सतगुरि मिलिऐ = अगर गुरु मिल जाए। सचु = सदा स्थिर प्रभु में। सेवि = सेवा भक्ति करके।4।
अर्थ: (पर) हे नानक! अगर गुरु मिल जाए तो (मनुष्य के अंदर से) अहंकार दूर हो जाता है, तब सदा स्थिर प्रभु आदमी के मन में आ बसता है, तब आदमी सदा-स्थिर हरि-नाम जपने की कमाई करता है, सदा-स्थिर हरि-नाम में टिका रहता है, सेवा-भक्ति कर के सदा-स्थिर हरि में लीन हो जाता है।4।9।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ४ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
वडहंसु महला ४ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सेज एक एको प्रभु ठाकुरु ॥ गुरमुखि हरि रावे सुख सागरु ॥१॥
मूलम्
सेज एक एको प्रभु ठाकुरु ॥ गुरमुखि हरि रावे सुख सागरु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ठाकुरु = मालिक। रावै = दिल में बसाए रखता है, आत्मिक मिलाप पाता है। सुख सागर = सुखों का समुंदर प्रभु।1।
अर्थ: (हे माँ! गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य का हृदय) एक (ऐसी) सेज है (जिस पर) ठाकुर प्रभु ही (सदा बसता है)। गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सुखों के समुंदर हरि को (सदा) अपने हृदय में बसाए रखता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मै प्रभ मिलण प्रेम मनि आसा ॥ गुरु पूरा मेलावै मेरा प्रीतमु हउ वारि वारि आपणे गुरू कउ जासा ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मै प्रभ मिलण प्रेम मनि आसा ॥ गुरु पूरा मेलावै मेरा प्रीतमु हउ वारि वारि आपणे गुरू कउ जासा ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: प्रेम = आकर्षण। मनि = मन में। हउ = मैं। वारि वारि जासा = कुर्बान जाऊँगा।1। रहाउ।
अर्थ: (हे मेरी माँ!) मेरे मन में प्रभु से मिलने के लिए कसक है आस है। पूरा गुरु ही (मुझे) मेरे प्रीतम (प्रभु से) मिला सकता है (इस वास्ते) मैं अपने गुरु से कुर्बान जाऊँगा, कुर्बान जाऊँगा।1। रहाउ।
[[0561]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
मै अवगण भरपूरि सरीरे ॥ हउ किउ करि मिला अपणे प्रीतम पूरे ॥२॥
मूलम्
मै अवगण भरपूरि सरीरे ॥ हउ किउ करि मिला अपणे प्रीतम पूरे ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: किउ करि = किस तरह? कैसे?।2।
अर्थ: (हे माँ!) मेरे शरीर में अवगुण ही अवगुण भरे पड़े हैं। मैं अपने उस प्रीतम को कैसे मिलूँ, जो सारे गुणों से भरपूर है? हे मेरी माँ! जिस गुणों वाली (भाग्यशाली जीव-स्त्री) ने प्रीतम प्रभु को पा लिया (उसे तो मिला गुणों की इनायत से, पर) मेरे अंदर वे गुण नहीं हैं। मैं कैसे प्रभु को मिल सकती हूँ?।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनि गुणवंती मेरा प्रीतमु पाइआ ॥ से मै गुण नाही हउ किउ मिला मेरी माइआ ॥३॥
मूलम्
जिनि गुणवंती मेरा प्रीतमु पाइआ ॥ से मै गुण नाही हउ किउ मिला मेरी माइआ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिनि = जिसने। से गुण = (बहुवचन) उन गुणो से। मै = मेरे में। माइआ = हे माँ!।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ करि करि थाका उपाव बहुतेरे ॥ नानक गरीब राखहु हरि मेरे ॥४॥१॥
मूलम्
हउ करि करि थाका उपाव बहुतेरे ॥ नानक गरीब राखहु हरि मेरे ॥४॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: उपाव = उपाय।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘उपाव’ है ‘उपाउ’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (हे माँ!) मैं (प्रीतम प्रभु को मिलने के लिए) अनेक उपाय कर कर के थक गया हूँ (प्रयासों व चतुराईयों से वह नहीं मिलता। अरदास आरजू ही मदद करती है, इस वास्ते) हे नानक! (कह:) हे मेरे हरि! मुझ गरीब को (अपने चरणों में) जोड़े रख।4।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ४ ॥ मेरा हरि प्रभु सुंदरु मै सार न जाणी ॥ हउ हरि प्रभ छोडि दूजै लोभाणी ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ४ ॥ मेरा हरि प्रभु सुंदरु मै सार न जाणी ॥ हउ हरि प्रभ छोडि दूजै लोभाणी ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सार = कद्र, कीमत। हउ = मैं। छोडि = छोड़ के। दूजै लोभाणी = माया (के मोह) में।1।
अर्थ: मेरा हरि प्रभु सोहणा है (पर) मैंने (उसकी सुंदरता की) कद्र ना समझी, (और) मैं उस हरि को उस प्रभु को छोड़ के माया के मोह में ही फसी रही।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ किउ करि पिर कउ मिलउ इआणी ॥ जो पिर भावै सा सोहागणि साई पिर कउ मिलै सिआणी ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
हउ किउ करि पिर कउ मिलउ इआणी ॥ जो पिर भावै सा सोहागणि साई पिर कउ मिलै सिआणी ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कउ = को। मिलउ = मिलूँ, मैं मिलूँ। इआणी = अंजान, मूर्ख। पिर भावै = पिर को भाती है। साई = वही। सिआणी = अक्ल वाली।1। रहाउ।
अर्थ: मैं मूर्ख हूँ, मैं प्रभु पति को कैसे मिल सकती हूँ? जो (जीव-स्त्री) प्रभु पति को पसंद आती है, वह भाग्यशाली है, वही अक्लवाली है, वही प्रभु-पति को मिल सकती है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मै विचि दोस हउ किउ करि पिरु पावा ॥ तेरे अनेक पिआरे हउ पिर चिति न आवा ॥२॥
मूलम्
मै विचि दोस हउ किउ करि पिरु पावा ॥ तेरे अनेक पिआरे हउ पिर चिति न आवा ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मै विचि = मेरे अंदर। पिर चिति = पिर के चिक्त में, हे पिर! तेरे चिक्त में। आवा = आऊँ।2।
अर्थ: मेरे अंदर (अनेक) ऐब हैं (जिनके कारण) मैं प्रभु-पति को मिल नहीं सकती। हे प्रभु-पति! तेरे से प्यार करने वाले अनेक ही हैं, मैं तेरे चिक्त में नहीं आ सकती।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनि पिरु राविआ सा भली सुहागणि ॥ से मै गुण नाही हउ किआ करी दुहागणि ॥३॥
मूलम्
जिनि पिरु राविआ सा भली सुहागणि ॥ से मै गुण नाही हउ किआ करी दुहागणि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिनि = जिसने। करी = करूँ, मैं करूँ। दुहागणि = बुरे भाग्यों वाली।3।
अर्थ: जिस जीव-स्त्री ने प्रभू-पति को हृदय में बसा लिया, वही सोहागन है (नेक है भाग्यशाली है)। मैं दोहागन क्या करूँ, मेरे में उस जैसी भाग्यशाली जीव-स्त्री वाले गुण नहीं हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नित सुहागणि सदा पिरु रावै ॥ मै करमहीण कब ही गलि लावै ॥४॥
मूलम्
नित सुहागणि सदा पिरु रावै ॥ मै करमहीण कब ही गलि लावै ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रावै = याद रखती है, हृदय में बसाए रखती है। करमहीण = भाग्यहीन, बद्किस्मत। गलि = गले से।4।
अर्थ: जो जीव-स्त्री ने प्रभु-पति को रोज़ाना हृदय में बसा रखा वह भाग्यशाली है। मेरी जैसी दुर्भाग्यवती को वह कभी (किस्मत से) ही अपने गले से लगाता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तू पिरु गुणवंता हउ अउगुणिआरा ॥ मै निरगुण बखसि नानकु वेचारा ॥५॥२॥
मूलम्
तू पिरु गुणवंता हउ अउगुणिआरा ॥ मै निरगुण बखसि नानकु वेचारा ॥५॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निरगुण = गुणहीन।5।
अर्थ: हे प्रभु पति! तू गुणों से भरपूर है, पर मैं अवगुणों से भरा हुआ हूँ। (तेरे दर पे ही अरदास है:) मुझ गुणहीन निमाणे नानक को बख्श ले (और, अपने नाम की दाति दे)।5।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ४ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
वडहंसु महला ४ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
मै मनि वडी आस हरे किउ करि हरि दरसनु पावा ॥ हउ जाइ पुछा अपने सतगुरै गुर पुछि मनु मुगधु समझावा ॥ भूला मनु समझै गुर सबदी हरि हरि सदा धिआए ॥ नानक जिसु नदरि करे मेरा पिआरा सो हरि चरणी चितु लाए ॥१॥
मूलम्
मै मनि वडी आस हरे किउ करि हरि दरसनु पावा ॥ हउ जाइ पुछा अपने सतगुरै गुर पुछि मनु मुगधु समझावा ॥ भूला मनु समझै गुर सबदी हरि हरि सदा धिआए ॥ नानक जिसु नदरि करे मेरा पिआरा सो हरि चरणी चितु लाए ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मै मनि = मेरे मन में। हरे = हे हरि! पावा = पाऊँ, मैं पा लूँ। पुछा = पूछूँ, मैं पूछती हूँ। जाइ = जा के। सतगुरै = गुरु को। पुछि = पूछ के। मुगधु = मूर्ख। समझावा = समझाऊँ।1।
अर्थ: मेरे मन में बड़ी तमन्ना है कि मैं किसी ना किसी तरह, हे हरि! तेरे दर्शन कर सकूँ। (इस वास्ते) मैं अपने गुरु के पास जा के गुरु से पूछती हूँ, और गुरु से पूछ के अपने मूर्ख मन को समझाती रहती हूँ। गलत रास्ते पर पड़ा हुआ (ये) मन गुरु के शब्द में जुड़ के ही समझता है, और फिर वह सदा परमात्मा को याद करता रहता है। हे नानक! जिस मनुष्य पर मेरा प्यारा प्रभु मेहर की नजर करता है, वह प्रभु के चरणों में अपना चिक्त जोड़े रखता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ सभि वेस करी पिर कारणि जे हरि प्रभ साचे भावा ॥ सो पिरु पिआरा मै नदरि न देखै हउ किउ करि धीरजु पावा ॥ जिसु कारणि हउ सीगारु सीगारी सो पिरु रता मेरा अवरा ॥ नानक धनु धंनु धंनु सोहागणि जिनि पिरु राविअड़ा सचु सवरा ॥२॥
मूलम्
हउ सभि वेस करी पिर कारणि जे हरि प्रभ साचे भावा ॥ सो पिरु पिआरा मै नदरि न देखै हउ किउ करि धीरजु पावा ॥ जिसु कारणि हउ सीगारु सीगारी सो पिरु रता मेरा अवरा ॥ नानक धनु धंनु धंनु सोहागणि जिनि पिरु राविअड़ा सचु सवरा ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभि = सारे। करी = करूँ, मैं करती हूँ। पिर कारणि = पति को मिलने के लिए। जे = ता कि। भावा = भा जाऊँ, पसंद आ जाऊँ। धीरजु = शांति। सीगारी = श्रृंगार करूँ, श्रृंगारती हूँ। अवरा = और लोगों को। धनु = सालाहने योग्य। जिनि = जिस ने। सचु = सदा कायम रहने वाला। सवरा = संवारा हुआ।2।
अर्थ: मैं प्रभु-पति को मिलने के लिए सारे वेष (धार्मिक पहरावे आदि) करती हूँ, ता कि मैं उस सदा कायम रहने वाले हरि को पसंद आ जाऊँ। पर वह प्यारा प्रभु मेरी ओर (मेरे इन पहिरावों की तरफ) नजर करके भी नहीं देखता, (तो फिर इन बाहरी भेषों से) मैं कैसे शांति हासिल कर सकती हूँ? जिस प्रभु-पति की खातिर मैं (ये बाहरी) श्रृंगार करती हूँ, मेरा वह प्रभु-पति तो और ही बातों (अंदरूनी आत्मिक गुणों) में प्रसन्न होता है। हे नानक! (कह:) वह जीव-स्त्री सराहनीय है, भाग्यशाली है जिसने उस सदा कायम रहने वाले सुंदर प्रभु-पति को अपने हृदय में बसा लिया है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ जाइ पुछा सोहाग सुहागणि तुसी किउ पिरु पाइअड़ा प्रभु मेरा ॥ मै ऊपरि नदरि करी पिरि साचै मै छोडिअड़ा मेरा तेरा ॥ सभु मनु तनु जीउ करहु हरि प्रभ का इतु मारगि भैणे मिलीऐ ॥ आपनड़ा प्रभु नदरि करि देखै नानक जोति जोती रलीऐ ॥३॥
मूलम्
हउ जाइ पुछा सोहाग सुहागणि तुसी किउ पिरु पाइअड़ा प्रभु मेरा ॥ मै ऊपरि नदरि करी पिरि साचै मै छोडिअड़ा मेरा तेरा ॥ सभु मनु तनु जीउ करहु हरि प्रभ का इतु मारगि भैणे मिलीऐ ॥ आपनड़ा प्रभु नदरि करि देखै नानक जोति जोती रलीऐ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पुछा = पूछूँ। जाइ = जा के। सोहाग सुहागणि = प्रभु पति की प्यारी को। किउ = कैसे? पिरि साचै = सदा कायम रहने वाले पिर ने। जीउ = जिंद। इतु = इस में। मारगि = रास्ते पर। इतु मारगि = इस रास्ते पर। भैणे = हे बहन!।3।
अर्थ: प्रभु-पति की प्यारी (जीव-स्त्री) को मैं जा के पूछती हूँ- (हे बहन!) तूम्हें प्यारा प्रभु-पति कैसे मिला? (वह उक्तर देती है - हे बहन!) सदा कायम रहने वाले प्रभु-पति ने मेरे पर मेहर की नजर की, तो मैंने तेर-मेर छोड़ दी। हे बहन! अपना मन, अपना शरीर, अपनी जिंद -सब कुछ प्रभु के हवाले कर दे- इस राह पर चलने से ही उसको मिल सकते हैं। हे नानक! (कह: हे बहन!) प्यारा प्रभु जिस जीव को मेहर की निगाह से देखता है उसकी जीवात्मा प्रभु की ज्योति से एक-मेक हो जाती है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जो हरि प्रभ का मै देइ सनेहा तिसु मनु तनु अपणा देवा ॥ नित पखा फेरी सेव कमावा तिसु आगै पाणी ढोवां ॥ नित नित सेव करी हरि जन की जो हरि हरि कथा सुणाए ॥ धनु धंनु गुरू गुर सतिगुरु पूरा नानक मनि आस पुजाए ॥४॥
मूलम्
जो हरि प्रभ का मै देइ सनेहा तिसु मनु तनु अपणा देवा ॥ नित पखा फेरी सेव कमावा तिसु आगै पाणी ढोवां ॥ नित नित सेव करी हरि जन की जो हरि हरि कथा सुणाए ॥ धनु धंनु गुरू गुर सतिगुरु पूरा नानक मनि आस पुजाए ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मै = मुझे। देइ = दे। तिसु = उसको। देवा = दूँ। फेरी = मैं फेरूँ। करी = मैं करूँ। मनि = मन में (टिकी हुई)। पुजाए = पूरी करता है।4।
अर्थ: जो (गुरमुख) मुझे हरि-प्रभु (की महिमा) का सनेहा दे, मैं अपना मन, अपना हृदय उसके हवाले करने को तैयार हूँ; मैं सदा उसको पंखा करने को तैयार हूँ, उसकी सेवा करने को तैयार हूँ, उसके वास्ते पानी ढोने को तैयार हूँ। परमात्मा का जो भक्त मुझे परमात्मा की महिमा की बातें सुनाए, मैं उसकी सेवा करने को सदा तैयार हूँ, सदा तैयार हूँ। हे नानक! (कह:) धन्य है मेरा गुरु, शाबाश है मेरे पूरे गुरु को, जो मेरे मन में (प्रभु मिलाप की टिकी हुई) आस पूरी करता है।4।
[[0562]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरु सजणु मेरा मेलि हरे जितु मिलि हरि नामु धिआवा ॥ गुर सतिगुर पासहु हरि गोसटि पूछां करि सांझी हरि गुण गावां ॥ गुण गावा नित नित सद हरि के मनु जीवै नामु सुणि तेरा ॥ नानक जितु वेला विसरै मेरा सुआमी तितु वेलै मरि जाइ जीउ मेरा ॥५॥
मूलम्
गुरु सजणु मेरा मेलि हरे जितु मिलि हरि नामु धिआवा ॥ गुर सतिगुर पासहु हरि गोसटि पूछां करि सांझी हरि गुण गावां ॥ गुण गावा नित नित सद हरि के मनु जीवै नामु सुणि तेरा ॥ नानक जितु वेला विसरै मेरा सुआमी तितु वेलै मरि जाइ जीउ मेरा ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मेलि = मिला। हरि = हे हरि! जितु = जिस में। मिलि = मिल के। धिआवा = ध्याऊँ। गोसटि = मिलाप। हरि गोसटि = परमात्मा का मिलाप। करि = कर के। सांझी = मेल मिलाप, संगति। सद = सदा। जीवै = जी पड़ता है, आत्मिक जीवन हासिल करता है। जितु वेला = जिस वक्त में, जब। जीउ = जीवात्मा। मरि जाइ = मर जाती है, आत्मिक मौत सहेड़ लेती है।5।
अर्थ: हे हरि! मुझे मेरा मित्र गुरु मिला, जिस (के चरणों) में लीन हो के मैं हरि-नाम स्मरण करता रहूँ। गुरु से मैं हरि-मिलाप (की बातें) पूछता रहूँ, गुरु की संगति करके मैं हरि गुण गाता रहूँ। हे हरि! तेरा नाम सुन के मेरा मन आत्मिक जीवन प्राप्त करता है। हे नानक! (कह:) जब मुझे मेरा मालिक प्रभु भूल जाता है, उस वक्त मेरी जीवात्मा आत्मिक मौत मर जाती है।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि वेखण कउ सभु कोई लोचै सो वेखै जिसु आपि विखाले ॥ जिस नो नदरि करे मेरा पिआरा सो हरि हरि सदा समाले ॥ सो हरि हरि नामु सदा सदा समाले जिसु सतगुरु पूरा मेरा मिलिआ ॥ नानक हरि जन हरि इके होए हरि जपि हरि सेती रलिआ ॥६॥१॥३॥
मूलम्
हरि वेखण कउ सभु कोई लोचै सो वेखै जिसु आपि विखाले ॥ जिस नो नदरि करे मेरा पिआरा सो हरि हरि सदा समाले ॥ सो हरि हरि नामु सदा सदा समाले जिसु सतगुरु पूरा मेरा मिलिआ ॥ नानक हरि जन हरि इके होए हरि जपि हरि सेती रलिआ ॥६॥१॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कउ = के लिए। सभु कोई = हरेक जीव। लोचै = चाहता है।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जिस नो’ में से ‘जिस’ की ‘ु’ की मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण नहीं लगी है।
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नदरि = नजर, निगाह। समाले = (दिल में) सम्भालता है। इको = एक ही, एक रूप, एक ज्योति। सेती = साथ। जपि = जप के।6।
अर्थ: परमात्मा के दर्शन करने के लिए हरेक जीव तमन्ना तो कर लेता है, पर वही मनुष्य दर्शन कर सकता है जिसको परमात्मा खुद दर्शन करवाता है। प्यारा प्रभु जिस मनुष्य पर मेहर की नजर करता है वह मनुष्य सदा परमात्मा को अपने हृदय में बसाए रखता है। (हे भाई!) जिस मनुष्य को पूरा गुरु मिल जाता है वह मनुष्य परमात्मा का नाम सदा अपने हृदय में बसाता है। हे नानक! मनुष्य परमात्मा का नाम जप जप के परमात्मा के साथ मिल जाता है (इस तरह) परमात्मा और परमात्मा के भक्त एक-रूप हो जाते हैं।6।1।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ५ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
वडहंसु महला ५ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
अति ऊचा ता का दरबारा ॥ अंतु नाही किछु पारावारा ॥ कोटि कोटि कोटि लख धावै ॥ इकु तिलु ता का महलु न पावै ॥१॥
मूलम्
अति ऊचा ता का दरबारा ॥ अंतु नाही किछु पारावारा ॥ कोटि कोटि कोटि लख धावै ॥ इकु तिलु ता का महलु न पावै ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ता का = उस (परमात्मा) का। पारावारा = इस पार उस पार का किनारा। कोटि = करोड़ों बार। लख = लाख बार। धावै = दौड़ता फिरे, यत्न करता फिरे। इकु तिलु = रक्ती भर भी।1।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा का दरबार बहुत ही ऊँचा है, उसके इस पार उस पार के किनारों का कोई अंत ही नहीं लगाया जा सकता। मनुष्य लाखों बार करोड़ों बार यत्न करे, (पर अपने प्रयत्नों से) परमात्मा की हजूरी रक्ती भर भी हासिल नहीं कर सकता।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुहावी कउणु सु वेला जितु प्रभ मेला ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
सुहावी कउणु सु वेला जितु प्रभ मेला ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुहावी = सोहानी (घड़ी)। जितु = जिस (समय) में।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! वह कैसा सुंदर समय होता है! वह कैसी सुंदर घड़ी होती है, जब परमात्मा से मिलाप हो जाता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
लाख भगत जा कउ आराधहि ॥ लाख तपीसर तपु ही साधहि ॥ लाख जोगीसर करते जोगा ॥ लाख भोगीसर भोगहि भोगा ॥२॥
मूलम्
लाख भगत जा कउ आराधहि ॥ लाख तपीसर तपु ही साधहि ॥ लाख जोगीसर करते जोगा ॥ लाख भोगीसर भोगहि भोगा ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कउ = को। तपीसर = (तपी+ईसर) बड़े बड़े। साधहि = साधते हैं।2।
अर्थ: हे भाई! लाखों ही भक्त जिस परमात्मा की आराधना करते हैं, (जिसके मिलाप की खातिर) लाखों ही बड़े-बड़े तपी तप करते रहते हैं, लाखों ही बड़े बड़े भोगी (जिसके दिए हुए) पदार्थ भोगते हैं (उसका अंत कोई नहीं पा सका)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
घटि घटि वसहि जाणहि थोरा ॥ है कोई साजणु परदा तोरा ॥ करउ जतन जे होइ मिहरवाना ॥ ता कउ देई जीउ कुरबाना ॥३॥
मूलम्
घटि घटि वसहि जाणहि थोरा ॥ है कोई साजणु परदा तोरा ॥ करउ जतन जे होइ मिहरवाना ॥ ता कउ देई जीउ कुरबाना ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: घटि घटि = हरेक घट में। घट = शरीर। वसहि = तू बसता है। थोरा = थोड़े लोग। जाणहि = जानते हैं। कोई = कोई दुर्लभ, कोई विरला। तोरा = तोड़ दिया। करउ = करूँ। देई = देऊँ, मैं देता हूँ।3।
अर्थ: हे प्रभु! तू हरेक शरीर में बसता है, पर बहुत ही थोड़े मनुष्य (इस भेद को) जानते हैं (क्योंकि जीवों के अंदर तेरे से दूरी बढ़ानी रहती है) कोई दुर्लभ ही गुरमुख होता है जो (उस) दूरी को दूर करता है। मैं उस गुरमुख के आगे अपनी जिंद भेटा करने को तैयार हूँ, मैं प्रयत्न करता हूँ कि वह गुरमुख मेरे पर दयावान हो।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
फिरत फिरत संतन पहि आइआ ॥ दूख भ्रमु हमारा सगल मिटाइआ ॥ महलि बुलाइआ प्रभ अम्रितु भूंचा ॥ कहु नानक प्रभु मेरा ऊचा ॥४॥१॥
मूलम्
फिरत फिरत संतन पहि आइआ ॥ दूख भ्रमु हमारा सगल मिटाइआ ॥ महलि बुलाइआ प्रभ अम्रितु भूंचा ॥ कहु नानक प्रभु मेरा ऊचा ॥४॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: संतन पहि = संतों के पास, गुरु के पास। हमारा = मेरा। सगल = सारा। महलि = महल में, हजूरी में। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल। भूंचा = पीया। नानक = हे नानक!।4।
अर्थ: हे भाई! तलाश करता करता मैं गुरु के पास पहुँचा, (गुरु ने) मेरा सारा दुख और भ्रम दूर कर दिया। (गुरु की कृपा से प्रभु ने मुझे) अपनी हजूरी में बुला लिया (मुझे अपने चरणों में जोड़ लिया, और) मैंने प्रभु का आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस (अमृत) पीया। हे नानक! कह: मेरा प्रभु सबसे ऊँचा है।4।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ५ ॥ धनु सु वेला जितु दरसनु करणा ॥ हउ बलिहारी सतिगुर चरणा ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ५ ॥ धनु सु वेला जितु दरसनु करणा ॥ हउ बलिहारी सतिगुर चरणा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: धनु = धन्य, भाग्यशाली। सु = वह। जितु = जिस (समय) में। हउ = मैं।1।
अर्थ: हे भाई! वह समय भाग्यशाली होता है जिस वक्त प्रभु के दर्शन होते हैं, (जिस गुरु की कृपा से प्रभु के दर्शन होते हैं) मैं उस गुरु के चरणों से सदके जाता हूँ।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जीअ के दाते प्रीतम प्रभ मेरे ॥ मनु जीवै प्रभ नामु चितेरे ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
जीअ के दाते प्रीतम प्रभ मेरे ॥ मनु जीवै प्रभ नामु चितेरे ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जीअ के दाते = हे जीवात्मा देने वाले! प्रभ = हे प्रभु! जीवै = आत्मिक जीवन प्राप्त कर लेता है। चितेरे = चेते करके।1। रहाउ।
अर्थ: हे जिंद देने वाले प्रभु! हे मेरे प्रीतम प्रभु! तेरा नाम याद कर कर के मेरा मन आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचु मंत्रु तुमारा अम्रित बाणी ॥ सीतल पुरख द्रिसटि सुजाणी ॥२॥
मूलम्
सचु मंत्रु तुमारा अम्रित बाणी ॥ सीतल पुरख द्रिसटि सुजाणी ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचु = सदा कायम रहने वाला। मंत्रु = उपदेश। अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाली। सीतल = शांत। सुजाणी = अच्छी परख वाली। द्रिसटि = नजर।2।
अर्थ: हे प्रभु! तेरा मंत्र सदा कायम रहने वाला है, तेरी महिमा की वाणी आत्मिक जीवन देने वाली है। हे शांति के पुँज अकाल-पुरख! तेरी निगाह खासी परख वाली है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचु हुकमु तुमारा तखति निवासी ॥ आइ न जावै मेरा प्रभु अबिनासी ॥३॥
मूलम्
सचु हुकमु तुमारा तखति निवासी ॥ आइ न जावै मेरा प्रभु अबिनासी ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तखति = राज गद्दी पर। निवासी = निवास करने वाला। अबिनासी = नाश रहित।3।
अर्थ: हे प्रभु! तेरा हुक्म सदा स्थिर रहने वाला है, तू (सदा) सिंहासन पर बिराजमान रहता है (तू सदा सबका हाकिम है)। (हे भाई!) मेरा प्रभु कभी नाश होने वाला नहीं, वह कभी पैदा होता मरता नहीं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तुम मिहरवान दास हम दीना ॥ नानक साहिबु भरपुरि लीणा ॥४॥२॥
मूलम्
तुम मिहरवान दास हम दीना ॥ नानक साहिबु भरपुरि लीणा ॥४॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हम = हम। दीन = निमाणे। नानक = हे नानक! साहिबु = मालिक। भरपुरि = भरपूर, हर जगह मौजूद। लीन = व्यापक।4।
अर्थ: हे प्रभु! हम जीव तेरे अदने से (निमाणे) सेवक हैं, तू हम पर दया करने वाला है। हे नानक! (कह:) हमारा मालिक प्रभु हर जगह मौजूद है, सब में व्यापक है।4।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ५ ॥ तू बेअंतु को विरला जाणै ॥ गुर प्रसादि को सबदि पछाणै ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ५ ॥ तू बेअंतु को विरला जाणै ॥ गुर प्रसादि को सबदि पछाणै ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जाणै = गहरी सांझ डालता है। प्रसादि = कृपा से। को = कोई विरला। सबदि = शब्द द्वारा।1।
अर्थ: हे प्रभु! तेरे गुणों का अंत नहीं पड़ सकता, कोई विरला मनुष्य ही तेरे साथ सांझ डालता है। गुरु की कृपा से गुरु के शब्द में जुड़ के कोई विरला तेरे साथ जान-पहचान बनाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सेवक की अरदासि पिआरे ॥ जपि जीवा प्रभ चरण तुमारे ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
सेवक की अरदासि पिआरे ॥ जपि जीवा प्रभ चरण तुमारे ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पिआरे = हे प्यारे! जपि = जप के, हृदय में बसा के। जीवा = जीऊँ, मैं आत्मिक जीवन प्राप्त करूँ। प्रभ = हे प्रभु!।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्यारे प्रभु! मुझे सेवक की (तेरे दर पर) अरदास है, (मेहर कर) हे प्रभु! तेरे चरण हृदय में बसा के मैं आत्मिक जीवन प्राप्त करूँ।1। रहाउ।
[[0563]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
दइआल पुरख मेरे प्रभ दाते ॥ जिसहि जनावहु तिनहि तुम जाते ॥२॥
मूलम्
दइआल पुरख मेरे प्रभ दाते ॥ जिसहि जनावहु तिनहि तुम जाते ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दइआल = हे दया के घर! जिसहि = जिसको। जनावहु = तू समझ देता है। तिनहि = उसने ही। तुम जाते = तुझे जाना है, तेरे साथ सांझ डाली है।2।
अर्थ: हे मेरे दाते प्रभु! हे दया के घर अकाल-पुरख! जिस मनुष्य को तू खुद समझ बख्शता है, उसी ने ही तेरे साथ सांझ डाली है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सदा सदा जाई बलिहारी ॥ इत उत देखउ ओट तुमारी ॥३॥
मूलम्
सदा सदा जाई बलिहारी ॥ इत उत देखउ ओट तुमारी ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जाई = मैं जाता हूँ। इत = इस लोक में। उत = परलोक में। देखउ = देखूँ, मैं देखता हूँ।3।
अर्थ: हे प्रभु! मैं सदा ही सदा ही तुझसे सदके जाता हूँ। इस लोक में व परलोक में मैं तेरा ही आसरा देखता हूँ।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मोहि निरगुण गुणु किछू न जाता ॥ नानक साधू देखि मनु राता ॥४॥३॥
मूलम्
मोहि निरगुण गुणु किछू न जाता ॥ नानक साधू देखि मनु राता ॥४॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मोहि = मैं। साधू = गुरु। देखि = देख के, दर्शन कर के। राता = रंगा गया है।4।
अर्थ: हे प्रभु! मैं गुण हीन हूँ, मैं तेरे गुण (उपकार) कुछ भी नहीं था समझ सका। हे नानक! (कह: हे प्रभु!) गुरु के दर्शन करके मेरा मन (तेरे प्रेम में) रंगा गया है।4।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु मः ५ ॥ अंतरजामी सो प्रभु पूरा ॥ दानु देइ साधू की धूरा ॥१॥
मूलम्
वडहंसु मः ५ ॥ अंतरजामी सो प्रभु पूरा ॥ दानु देइ साधू की धूरा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंतरजामी = दिल की जानने वाला। दानु = बख्शीश। देइ = देता है। साधू = गुरु।1।
अर्थ: हे भाई! वह प्रभु सबके दिल की जानने वाला है, सारे गुणों से भरपूर है, (जिस पर वह मेहर करता है उस को) गुरु के चरणों की धूल (बतौर) बख्शिश देता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥ तेरी ओट पूरन गोपाला ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
करि किरपा प्रभ दीन दइआला ॥ तेरी ओट पूरन गोपाला ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: प्रभ = हे प्रभु! ओट = आसरा। पूरन = हे सर्व व्यापक! गेपाला = हे सृष्टि के पालनहार!।1। रहाउ।
अर्थ: हे दीनों पर दया करने वाले प्रभु! (मेरे पर) कृपा कर (मुझे गुरु के चरणों की धूल बख्श)। हे सर्व-व्यापक! हे सृष्टि-पालक! मुझे तेरा ही आसरा है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जलि थलि महीअलि रहिआ भरपूरे ॥ निकटि वसै नाही प्रभु दूरे ॥२॥
मूलम्
जलि थलि महीअलि रहिआ भरपूरे ॥ निकटि वसै नाही प्रभु दूरे ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जलि = पानी में। थलि = धरती में। महीअलि = मही तलि, धरती के तल पर, अंतरिक्ष में, आकाश में। निकटि = नजदीक।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जिस नो’ में से शब्द ‘जिसु’ की ‘ु’ की मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण हट गई है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे भाई! प्रभु पानी में, धरती में, आकाश में, हर जगह ज़र्रे-ज़र्रे में मौजूद है, वह (हरेक जीव के) नजदीक बसता है, किसी से दूर नहीं है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिस नो नदरि करे सो धिआए ॥ आठ पहर हरि के गुण गाए ॥३॥
मूलम्
जिस नो नदरि करे सो धिआए ॥ आठ पहर हरि के गुण गाए ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गाए = गाता है।3।
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य पर (वह) मेहर की निगाह करता है वह मनुष्य उसका स्मरण करता रहता है, वह मनुष्य आठों पहर (हर वक्त) परमात्मा के गुण गाता रहता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जीअ जंत सगले प्रतिपारे ॥ सरनि परिओ नानक हरि दुआरे ॥४॥४॥
मूलम्
जीअ जंत सगले प्रतिपारे ॥ सरनि परिओ नानक हरि दुआरे ॥४॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जीअ = जीव। दुआरे = द्वार पे।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जीअ’ है ‘जीउ’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे भाई! परमात्मा सारे जीवों की पालना करता है। हे नानक! (उस प्रभु के आगे अरदास किया कर और कहा कर-) हे हरि! मैं तेरे दर पर आया हूँ, मैं तेरी शरण पड़ा हूँ (मुझे गुरु के चरणों की धूल बख्श)।4।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ५ ॥ तू वड दाता अंतरजामी ॥ सभ महि रविआ पूरन प्रभ सुआमी ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ५ ॥ तू वड दाता अंतरजामी ॥ सभ महि रविआ पूरन प्रभ सुआमी ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दाता = बख्शिशें करने वाला। पूरन = सर्व व्यापक।1।
अर्थ: हे मेरे स्वामी! हे सर्व-व्यापक प्रभु! तू सबसे बड़ा दाता है, तू (जीवों के) दिलों की जानने वाला है, तू सबके अंदर मौजूद है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे प्रभ प्रीतम नामु अधारा ॥ हउ सुणि सुणि जीवा नामु तुमारा ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे प्रभ प्रीतम नामु अधारा ॥ हउ सुणि सुणि जीवा नामु तुमारा ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: प्रभ = हे प्रभु! अधारा = आसरा। हउ = मैं। सुणि = सुन के। जीवा = जीऊँ, आत्मिक जीवन हासिल करता हूँ।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे प्रीतम प्रभु! तेरा नाम (मेरी जिंदगी का) आसरा है। तेरा नाम सुन सुन के मैं आत्मिक जीवन हासिल करता हूँ।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तेरी सरणि सतिगुर मेरे पूरे ॥ मनु निरमलु होइ संता धूरे ॥२॥
मूलम्
तेरी सरणि सतिगुर मेरे पूरे ॥ मनु निरमलु होइ संता धूरे ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सतिगुर = हे सतिगुरु! धूरे = चरण-धूल में।2।
अर्थ: हे मेरे पूरे सतिगुरु! मैं तेरी शरण आया हूँ, तेरे संत-जनों के चरणों की धूल से मन पवित्र हो जाता है (और, परमात्मा का दर्शन होता है)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
चरन कमल हिरदै उरि धारे ॥ तेरे दरसन कउ जाई बलिहारे ॥३॥
मूलम्
चरन कमल हिरदै उरि धारे ॥ तेरे दरसन कउ जाई बलिहारे ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: उरि = हृदय में। जाई = मैं जाता हूँ। कउ = को से।3।
अर्थ: हे प्रभु! मैं तेरे दर्शनों से कुर्बान जाता हूँ, तेरे सुंदर कोमल चरण मैंने अपने हृदय में टिकाए हुए हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
करि किरपा तेरे गुण गावा ॥ नानक नामु जपत सुखु पावा ॥४॥५॥
मूलम्
करि किरपा तेरे गुण गावा ॥ नानक नामु जपत सुखु पावा ॥४॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गावा = गाऊँ, गाऊँ। पावा = पाऊँ।4।
अर्थ: हे नानक! (कह: हे प्रभु!) मेहर कर, मैं तेरे गुण गाता रहूँ, और तेरा नाम जपते हुए आत्मिक आनंद लेता रहूँ।4।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ५ ॥ साधसंगि हरि अम्रितु पीजै ॥ ना जीउ मरै न कबहू छीजै ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ५ ॥ साधसंगि हरि अम्रितु पीजै ॥ ना जीउ मरै न कबहू छीजै ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साधू संगि = गुरु की संगति में। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला हरि नाम जल। पीजै = पीजिए, पी सकते हैं। जीउ = जीवात्मा, जिंद। ना मरै = आत्मिक मौत नहीं मरती। न छीजै = आत्मिक जीवन में कमजोर नहीं होती।1।
अर्थ: हे भाई! गुरु की संगति में आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम-जल पीया जा सकता है, (इस नाम-जल की इनायत) जीवात्मा ना आत्मिक मौत मरती है, ना ही कभी आत्मि्क जीवन में कमजोर पड़ती है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडभागी गुरु पूरा पाईऐ ॥ गुर किरपा ते प्रभू धिआईऐ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
वडभागी गुरु पूरा पाईऐ ॥ गुर किरपा ते प्रभू धिआईऐ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ते = से।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! पूरा गुरु बड़ी किस्मत से मिलता है, और गुरु की कृपा से परमात्मा का स्मरण किया जा सकता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रतन जवाहर हरि माणक लाला ॥ सिमरि सिमरि प्रभ भए निहाला ॥२॥
मूलम्
रतन जवाहर हरि माणक लाला ॥ सिमरि सिमरि प्रभ भए निहाला ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: माणक = मोती। सिमरि = स्मरण करके। निहाला = प्रसन्न।2।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा की महिमा के वचन (मानो) रत्न हैं, जवाहर हैं, मोती हैं, लाल हैं। प्रभु का नाम स्मरण कर-कर के सदा पुल्कित रहते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जत कत पेखउ साधू सरणा ॥ हरि गुण गाइ निरमल मनु करणा ॥३॥
मूलम्
जत कत पेखउ साधू सरणा ॥ हरि गुण गाइ निरमल मनु करणा ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जत कत = जिधर किधर। पेखउ = मैं देखता हूँ। साधू = गुरु। गाइ = गा के। निरमल = पवित्र।3।
अर्थ: हे भाई! मैं जिधर-जिधर देखता हूँ, गुरु की शरण ही (एक ऐसी जगह है जहाँ) परमात्मा के गीत गा-गा के मन को पवित्र किया जा सकता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
घट घट अंतरि मेरा सुआमी वूठा ॥ नानक नामु पाइआ प्रभु तूठा ॥४॥६॥
मूलम्
घट घट अंतरि मेरा सुआमी वूठा ॥ नानक नामु पाइआ प्रभु तूठा ॥४॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: घट = शरीर। वूठा = बसता है। तूठा = प्रसन्न होता है।4।
अर्थ: हे नानक! (कह:) मेरा मालिक प्रभु (वैसे तो) हरेक शरीर में बसता है (पर, जिस मनुष्य पर वह) प्रभु प्रसन्न होता है (वही उसका) नाम (-स्मरण) प्राप्त करता है।4।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ५ ॥ विसरु नाही प्रभ दीन दइआला ॥ तेरी सरणि पूरन किरपाला ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
वडहंसु महला ५ ॥ विसरु नाही प्रभ दीन दइआला ॥ तेरी सरणि पूरन किरपाला ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: विसरु नाही = ना भूल। प्रभ = हे प्रभु! पूरन = हे सर्व व्यापक!।1। रहाउ।
अर्थ: हे दीनों पर दया करने वाले प्रभु! हे सर्व व्यापक! हे कृपा के घर! मैं तेरी शरण आया हूँ, (मेहर कर, मेरे हृदय से कभी) ना भूल।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जह चिति आवहि सो थानु सुहावा ॥ जितु वेला विसरहि ता लागै हावा ॥१॥
मूलम्
जह चिति आवहि सो थानु सुहावा ॥ जितु वेला विसरहि ता लागै हावा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जह = जहाँ। चिति = चिक्त में। जह चिति = जिस चिक्त में। थानु = हृदय स्थल। जितु = जिस में। हावा = हाहूका।1।
अर्थ: हे प्रभु! जिस हृदय में तू आ बसता है वह हृदय-स्थल सुंदर बन जाता है। जिस वक्त तू (मुझे) भूल जाता है तब (मुझे) हाय-हाय लगती है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तेरे जीअ तू सद ही साथी ॥ संसार सागर ते कढु दे हाथी ॥२॥
मूलम्
तेरे जीअ तू सद ही साथी ॥ संसार सागर ते कढु दे हाथी ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जीअ = जीव। सद = सदा। ते = से, मे से। दे = दे के। हाथी = हाथ।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जीअ’ है ‘जीउ’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (हे प्रभु! ये सारे) जीव तेरे (पैदा किए हुए हैं), तू (इन जीवों की) सदा ही मदद करने वाला है। (हे प्रभु! अपना) हाथ दे के (जीवों को) संसार समुंदर में से निकाल ले।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आवणु जाणा तुम ही कीआ ॥ जिसु तू राखहि तिसु दूखु न थीआ ॥३॥
मूलम्
आवणु जाणा तुम ही कीआ ॥ जिसु तू राखहि तिसु दूखु न थीआ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आवणु जाणा = जनम मरन के चक्कर।3।
अर्थ: (हे प्रभु! जीवों के लिए) जनम-मरन के चक्कर तेरे ही बनाए हुए हैं, जिस जीव को तू (इस चककर में से) बचा लेता है, उसको कोई दुख नहीं छू सकता।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तू एको साहिबु अवरु न होरि ॥ बिनउ करै नानकु कर जोरि ॥४॥७॥
मूलम्
तू एको साहिबु अवरु न होरि ॥ बिनउ करै नानकु कर जोरि ॥४॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साहिबु = मालिक। एको = एक ही। होरि = अन्य, और। बिनउ = विनती। नानकु करै = नानक करता है (शब्द ‘नानक’ और ‘नानकु’ का फर्क याद रखें)। कर = (दोनों) हाथ। जोरि = जोड़ के।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘होरि’ है ‘होर’ का बहुवचन है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे प्रभु! तू ही एक मालिक है, और अनेक जीव (तेरे बनाए हुए हैं, इनमें से) कोई भी (तेरे जैसा) नहीं। नानक (तेरे आगे ही) हाथ जोड़ के विनती करता है।4।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु मः ५ ॥ तू जाणाइहि ता कोई जाणै ॥ तेरा दीआ नामु वखाणै ॥१॥
मूलम्
वडहंसु मः ५ ॥ तू जाणाइहि ता कोई जाणै ॥ तेरा दीआ नामु वखाणै ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जाणाइहि = तू जनाता है, तू सूझ देता है। जा = तब। जाणै = गहरी सांझ डालता है। वखाणै = उचारता है, स्मरण करता है।1।
अर्थ: हे प्रभु! जब किसी मनुष्य को तू सूझ बख्शता है, तब ही कोई तेरे साथ गहरी सांझ डालता है, और तेरा बख्शा हुआ तेरे नाम को उच्चारता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तू अचरजु कुदरति तेरी बिसमा ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
तू अचरजु कुदरति तेरी बिसमा ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अचरजु = हैरान कर देने वाले स्वरूप वाला। कुदरति = रचना। बिसमा = हैरानगी पैदा करने वाली।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! तू हैरान कर देने वाली हस्ती वाला है। तेरी रची रचना भी हैरानगी पैदा करने वाली है।1। रहाउ।
[[0564]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
तुधु आपे कारणु आपे करणा ॥ हुकमे जमणु हुकमे मरणा ॥२॥
मूलम्
तुधु आपे कारणु आपे करणा ॥ हुकमे जमणु हुकमे मरणा ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आपे = आप ही। कारणु = सबब, रचना पैदा करने का ढंग। करणा = जगत। हुकमे = हुक्म में ही।2।
अर्थ: हे प्रभु! तू खुद ही (जगत-रचना का) सबब (बनाने वाला) है, तू खुद ही जगत है (ये सारा जगत तेरा ही स्वरूप है)। तेरे हुक्म में ही (जीवों का) जनम होता है, तेरे हुक्म में ही मौत आती है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नामु तेरा मन तन आधारी ॥ नानक दासु बखसीस तुमारी ॥३॥८॥
मूलम्
नामु तेरा मन तन आधारी ॥ नानक दासु बखसीस तुमारी ॥३॥८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मन तन आधारी = मन का तन का आसरा। नानक = हे नानक!।3।
अर्थ: हे प्रभु! तेरा नाम मेरे मन का मेरे शरीर का आसरा है। हे नानक! (कह: हे प्रभु! अपना नाम दे) तेरा दास तेरी बख्शिश (की आशा लिए हुए है)।3।8।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ५ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
वडहंसु महला ५ घरु २ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरै अंतरि लोचा मिलण की पिआरे हउ किउ पाई गुर पूरे ॥ जे सउ खेल खेलाईऐ बालकु रहि न सकै बिनु खीरे ॥ मेरै अंतरि भुख न उतरै अमाली जे सउ भोजन मै नीरे ॥ मेरै मनि तनि प्रेमु पिरम का बिनु दरसन किउ मनु धीरे ॥१॥
मूलम्
मेरै अंतरि लोचा मिलण की पिआरे हउ किउ पाई गुर पूरे ॥ जे सउ खेल खेलाईऐ बालकु रहि न सकै बिनु खीरे ॥ मेरै अंतरि भुख न उतरै अमाली जे सउ भोजन मै नीरे ॥ मेरै मनि तनि प्रेमु पिरम का बिनु दरसन किउ मनु धीरे ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंतरि = अंदर। लोचा = तमन्ना। हउ = मैं। किउ = कैसे? पाई = पाऊँ। सउ = सो बार। खीर = दूध। अंमाली = हे सखी! हे सहेली!। भोजन = खाना। मै = मेरे आगे। नीरे = परोसे जाएं। मनि = मन में। तनि = शरीर में, हृदय में। पिरंम का = प्यारे का। धीरे = शांति प्राप्त करे।1।
अर्थ: हे प्यारे! मेरे मन में (गुरु को) मिलने की चाहत है। मैं किस तरह पूरे गुरु को ढूँढू? हे सहेली! यदि बालक को सौ खिलोनों से खिलाया जाए (उसका मनोरंजन किया जाए), तो भी वह दूध के बिना नहीं रह सकता। (वैसे ही) हे सखी! अगर मुझे सौ भोजन भी दिए जाएं, तो भी मेरे अंदर (बसती प्रभु-मिलाप की) भूख नहीं उतर सकती। हे सहेली! मेरे मन में मेरे हृदय में, प्यारे प्रभु का प्रेम बस रहा है। (उसके) दर्शनों के बिना मेरा मन शांति नहीं हासिल कर सकता।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुणि सजण मेरे प्रीतम भाई मै मेलिहु मित्रु सुखदाता ॥ ओहु जीअ की मेरी सभ बेदन जाणै नित सुणावै हरि कीआ बाता ॥ हउ इकु खिनु तिसु बिनु रहि न सका जिउ चात्रिकु जल कउ बिललाता ॥ हउ किआ गुण तेरे सारि समाली मै निरगुण कउ रखि लेता ॥२॥
मूलम्
सुणि सजण मेरे प्रीतम भाई मै मेलिहु मित्रु सुखदाता ॥ ओहु जीअ की मेरी सभ बेदन जाणै नित सुणावै हरि कीआ बाता ॥ हउ इकु खिनु तिसु बिनु रहि न सका जिउ चात्रिकु जल कउ बिललाता ॥ हउ किआ गुण तेरे सारि समाली मै निरगुण कउ रखि लेता ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सजण = हे सज्जन! भाई = हे भ्राता! मैं = मुझे। ओह = वह मित्र गुरु। जीअ की = जीवात्मा की। बेदन = वेदना, पीड़ा, दुख। कीआ = की। तिसु बिनु = उस (परमात्मा) के बिना। चात्रिकु = पपीहा। कउ = के लिए, की खातिर। हउ = मैं। सारि = याद करके। समाली = सम्भालूँ, मैं हृदय में बसाऊँ।2।
अर्थ: हे मेरे सज्जन! हे मेरे प्यारे भाई! (मेरी बिनती) सुन। मुझे आत्मिक आनंद देने वाला मित्र-गुरु मिला। वह (गुरु) मेरी जीवात्मा की सारी पीड़ा जानता है, और, मुझे परमात्मा की महिमा की बातें सुनाता है। (हे वीर!) मैं उस (परमात्मा) के बिना रक्ती भर समय के लिए भी नहीं रह सकता (उसके विछोड़े में मैं तड़पता हूँ) जैसे पपीहा बरखा की बूँद की खातिर बिलकता है।
हे प्रभु! तेरे कौन कौन से गुण याद कर करके मैं अपने हृदय में बसाऊँ? तू मुझ गुण-हीन को (सदा) बचा लेता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ भई उडीणी कंत कउ अमाली सो पिरु कदि नैणी देखा ॥ सभि रस भोगण विसरे बिनु पिर कितै न लेखा ॥ इहु कापड़ु तनि न सुखावई करि न सकउ हउ वेसा ॥ जिनी सखी लालु राविआ पिआरा तिन आगै हम आदेसा ॥३॥
मूलम्
हउ भई उडीणी कंत कउ अमाली सो पिरु कदि नैणी देखा ॥ सभि रस भोगण विसरे बिनु पिर कितै न लेखा ॥ इहु कापड़ु तनि न सुखावई करि न सकउ हउ वेसा ॥ जिनी सखी लालु राविआ पिआरा तिन आगै हम आदेसा ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हउ = मैं। उडीणी = उदास, उतावली। अंमाली = हे सखी! कदि = कब?। नैणी = आँखों से। देखा = देखूं, मैं देखूँगी। सभि = सारे। कितै न लेखै = किसी काम की नहीं। कापड़ु = कपड़ा। तनि = शरीर पर। न सुखावई = नहीं सुख देता, नहीं भाता। वेसा = पहरावे। आदेसा = नमस्कार, अरजोई।3।
अर्थ: हे सखी! मैं प्रभु-पति को मिलने के लिए उतावली हो रही हूँ। मैं कब उस पति को अपनी आँखों से देखूँगी? प्रभु-पति के मिलाप के बिना मुझे सारे पदार्थों के भोग भूल चुके हैं, ये पदार्थ प्रभु-पति के बिना मेरे किसी काम के नहीं। हे सहेली! मुझे तो अपने शरीर पर ये कपड़ा भी नहीं भाता, तभी तो मैं पहरावा नहीं कर सकती। जिस सहेलियों ने प्यारे लाल को पसंद कर लिया है, मैं उनके आगे अरजोई करती हूँ (कि मुझे भी उसके चरणों में जोड़ दें)।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मै सभि सीगार बणाइआ अमाली बिनु पिर कामि न आए ॥ जा सहि बात न पुछीआ अमाली ता बिरथा जोबनु सभु जाए ॥ धनु धनु ते सोहागणी अमाली जिन सहु रहिआ समाए ॥ हउ वारिआ तिन सोहागणी अमाली तिन के धोवा सद पाए ॥४॥
मूलम्
मै सभि सीगार बणाइआ अमाली बिनु पिर कामि न आए ॥ जा सहि बात न पुछीआ अमाली ता बिरथा जोबनु सभु जाए ॥ धनु धनु ते सोहागणी अमाली जिन सहु रहिआ समाए ॥ हउ वारिआ तिन सोहागणी अमाली तिन के धोवा सद पाए ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभि = सारे। कामि = काम में। सहि = सहु ने, पति ने। बिरथा = व्यर्थ। जोबनु = जवानी। धनु धनु = भाग्यों वालियां। सहु = पति। वारिआ = कुर्बान। धोवा = मैं धोता हूँ। पाए = पैर।4।
दर्पण-टिप्पनी
(‘सहि’ और ‘सहु’ में फर्क नोट करें)
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे सहेली! अगर मैंने सारे श्रृंगार कर भी लिए, तो भी प्रभु-पति के मिलाप के बिना (ये श्रृंगार) कोई काम नहीं आते। हे सखी! अगर प्रभु-पति ने मेरी कोई बात ही ना पूछी (मेरी तरफ ध्यान ही ना दिया) तो मेरी तो सारी जवानी ही व्यर्थ चली जाएगी। हे सखी! वे सुहागनें बहुत भाग्यशाली हैं जिनके दिल में पति-प्रभु सदा टिका रहता है। हे सहेली! मैं उन सुहागनों से कुर्बान हूँ, मैं सदा उनके पैर धोती हूँ (धोने को तैयार हूँ)।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिचरु दूजा भरमु सा अमाली तिचरु मै जाणिआ प्रभु दूरे ॥ जा मिलिआ पूरा सतिगुरू अमाली ता आसा मनसा सभ पूरे ॥ मै सरब सुखा सुख पाइआ अमाली पिरु सरब रहिआ भरपूरे ॥ जन नानक हरि रंगु माणिआ अमाली गुर सतिगुर कै लगि पैरे ॥५॥१॥९॥
मूलम्
जिचरु दूजा भरमु सा अमाली तिचरु मै जाणिआ प्रभु दूरे ॥ जा मिलिआ पूरा सतिगुरू अमाली ता आसा मनसा सभ पूरे ॥ मै सरब सुखा सुख पाइआ अमाली पिरु सरब रहिआ भरपूरे ॥ जन नानक हरि रंगु माणिआ अमाली गुर सतिगुर कै लगि पैरे ॥५॥१॥९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भरमु = भुलेखा। सा = था। जा = जब। मनसा = मनीषा, चाहत, मन का फुरना। सरब = सब में। रंग = आनंद। कै पैरे = के चरणों में। लगि = लग के।5।
अर्थ: हे सहेली! जब तक मुझे किसी और (के आसरे) का भुलेखा था, तब तक मैं प्रभु को (अपने से) दूर (-बसता) समझती रही। पर, हे सहेली! मुझे पूरा गुरु मिल गया, तो मेरी हरेक आशा हरेक तमन्ना पूरी हो गई (क्योंकि) हे सखी! मैंने सारे सुखों से श्रेष्ठ (प्रभु के मिलाप का) सुख पा लिया है, मुझे वह प्रभु पति सभी में बसता दिखाई दे गया। हे दास नानक! (कह:) हे सखी! गुरु के चरणों में लग के मैंने परमात्मा के मिलाप का आनंद प्राप्त कर लिया है।5।1।9।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ असटपदीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ असटपदीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सची बाणी सचु धुनि सचु सबदु वीचारा ॥ अनदिनु सचु सलाहणा धनु धनु वडभाग हमारा ॥१॥
मूलम्
सची बाणी सचु धुनि सचु सबदु वीचारा ॥ अनदिनु सचु सलाहणा धनु धनु वडभाग हमारा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सची बाणी = सदा स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी। धुनि = ध्यनि, आवाज, लगन। अनदिनु = हर रोज, हर समय।1।
अर्थ: हे भाई! मेरे भाग्य जाग पड़े हैं, (कि गुरु की शरण पड़ के) सदा-स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी (मेरे हृदय में बस गई है), सदा स्थिर हरि-नाम (की) लगन (मेरे अंदर) चल पड़ी है, सदा-स्थिर हरि की महिमा वाला गुरु शब्द मेरे विचारों (का केन्द्र बन गया है), मैं हर वक्त सदा स्थिर प्रभु की महिमा करता हूं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे साचे नाम विटहु बलि जाउ ॥ दासनि दासा होइ रहहि ता पावहि सचा नाउ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे साचे नाम विटहु बलि जाउ ॥ दासनि दासा होइ रहहि ता पावहि सचा नाउ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: विटहु = से। बलि जाउ = कुर्बान हो। पावहि = तू प्राप्त कर लेगा।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! सदा कायम रहने वाले हरि-नाम से सदके जाया कर। पर ये सदा स्थिर रहने वाला हरि-नाम तू तभी हासिल कर सकेगा, अगर तू परमात्मा के सेवकों का सेवक बना रहेगा।1। रहाउ।
[[0565]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिहवा सची सचि रती तनु मनु सचा होइ ॥ बिनु साचे होरु सालाहणा जासहि जनमु सभु खोइ ॥२॥
मूलम्
जिहवा सची सचि रती तनु मनु सचा होइ ॥ बिनु साचे होरु सालाहणा जासहि जनमु सभु खोइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जो जीभ सदा-स्थिर हरि (के प्रेम) में रंगी जाती है वह जीभ सफल हो जाती है, (ऐसी जीभ वाले मनुष्य का) मन सफल हो जाता है, शरीर सफल हो जाता है। (हे भाई!) अगर तू सदा-स्थिर प्रभु को छोड़ के किसी और को सलाहता रहेगा, तो अपना सारा जनम गवा के (यहाँ से) जाएगा।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचु खेती सचु बीजणा साचा वापारा ॥ अनदिनु लाहा सचु नामु धनु भगति भरे भंडारा ॥३॥
मूलम्
सचु खेती सचु बीजणा साचा वापारा ॥ अनदिनु लाहा सचु नामु धनु भगति भरे भंडारा ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचु = सदा स्थिर प्रभु का नाम। लाहा = लाभ।3।
अर्थ: जो मनुष्य सदा-स्थिर हरि-नाम को अपनी खेती बनाता है, जो सदा-स्थिर नाम-बीज (अपने हृदय में) बीजता है, जो सदा-स्थिर हरि-नाम का व्यापार करता है, उसे हर वक्त सदा-स्थिर हरि-नाम-धन (बतौर) लाभ प्राप्त होता रहता है, उसके हृदय में भक्ति के खजाने भर जाते हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचु खाणा सचु पैनणा सचु टेक हरि नाउ ॥ जिस नो बखसे तिसु मिलै महली पाए थाउ ॥४॥
मूलम्
सचु खाणा सचु पैनणा सचु टेक हरि नाउ ॥ जिस नो बखसे तिसु मिलै महली पाए थाउ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: टेक = आसरा। महली = प्रभु की हजूरी में।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जिस नो’ में से शब्द ‘जिसु’ की ‘ु’ की मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण हटा दी गई है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य पर परमात्मा कृपा करता है, उसको सदा-स्थिर हरि-नाम (आत्मिक) खुराक, हरि-नाम ही पोशाक, हरि-नाम ही (जीवन का) आसरा मिल जाता है। वह मनुष्य परमात्मा की हजूरी में जगह पा लेता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आवहि सचे जावहि सचे फिरि जूनी मूलि न पाहि ॥ गुरमुखि दरि साचै सचिआर हहि साचे माहि समाहि ॥५॥
मूलम्
आवहि सचे जावहि सचे फिरि जूनी मूलि न पाहि ॥ गुरमुखि दरि साचै सचिआर हहि साचे माहि समाहि ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचे = सदा स्थिर प्रभु में (लीन)। मूलि न = बिल्कुल ही नहीं। दरि = दर पर। दरि साचै = सदा स्थिर प्रभु के दर पे। सचिआर = सही रास्ते पर।5।
अर्थ: हे भाई! गुरु के सन्मुख रहने वाले बंदे हरि-नाम में लीन ही (जगत में) आते हैं, हरि-नाम में लीन ही (यहाँ से) जाते हैं, वे दुबारा कभी भी जूनियों के चक्कर में नहीं पड़ते। गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सदा-स्थिर प्रभु के दर पर सुर्ख-रू हो जाते हैं, वे सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लीन हो जाते हैं।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अंतरु सचा मनु सचा सची सिफति सनाइ ॥ सचै थानि सचु सालाहणा सतिगुर बलिहारै जाउ ॥६॥
मूलम्
अंतरु सचा मनु सचा सची सिफति सनाइ ॥ सचै थानि सचु सालाहणा सतिगुर बलिहारै जाउ ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंतरु = अंदरूनी, हृदय। सचा = सफल। सनाइ = (स्ना = अरबी शब्द) कीर्ति महिमा। सचै थानि = सदा स्थिर रहने वाले स्थान में। जाउ = जाऊँ, मैं जाता हूँ।6।
अर्थ: हे भाई! मैं अपने गुरु से सदके जाता हूँ (जिसकी मेहर से मेरा) हृदय सफल हो गया है, मेरा मन सफल हो गया है, और, मैं सदा-स्थिर प्रभु की महिमा करता रहता हूँ। हे भाई! जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभु की महिमा करता है उसे सदा-स्थिर हरि की हजूरी में जगह प्राप्त हो जाती है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचु वेला मूरतु सचु जितु सचे नालि पिआरु ॥ सचु वेखणा सचु बोलणा सचा सभु आकारु ॥७॥
मूलम्
सचु वेला मूरतु सचु जितु सचे नालि पिआरु ॥ सचु वेखणा सचु बोलणा सचा सभु आकारु ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचु = सफल। मूरतु = महूरत। जितु = जिस में। सचु = सदा स्थिर प्रभु। आकारु = दिखता जगत।7।
अर्थ: हे भाई! वह समय सफल है, वह महूरत सफल है जब किसी मनुष्य का प्यार सदा कायम रहने वाले परमात्मा से बन जाता है। (जिस मनुष्य का प्रभु से प्यार बनता है, वह मनुष्य) उस सदा-स्थिर प्रभु को ही हर जगह देखता है, सदा-स्थिर हरि-नाम ही जपता है, ये सारा संसार उस को सदा कायम रहने वाले का स्वरूप ही दिखता है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक सचै मेले ता मिले आपे लए मिलाइ ॥ जिउ भावै तिउ रखसी आपे करे रजाइ ॥८॥१॥
मूलम्
नानक सचै मेले ता मिले आपे लए मिलाइ ॥ जिउ भावै तिउ रखसी आपे करे रजाइ ॥८॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचै = सदा स्थिर प्रभु ने। रजाइ = हुक्म।8।
अर्थ: हे नानक! (कह:) जब सदा-स्थिर प्रभु (जीवों को अपने साथ) मिलाता है तब ही (जीव उसके चरणों में) मिलते हैं, वह खुद ही अपने (साथ) मिला लेता है। जैसे उसे अच्छा लगता है, वह खुद हुक्म करता है और (जीवों को अपने चरणों से जोड़े) रखता है।8।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ ॥ मनूआ दह दिस धावदा ओहु कैसे हरि गुण गावै ॥ इंद्री विआपि रही अधिकाई कामु क्रोधु नित संतावै ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ ॥ मनूआ दह दिस धावदा ओहु कैसे हरि गुण गावै ॥ इंद्री विआपि रही अधिकाई कामु क्रोधु नित संतावै ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनूआ = होछा मन। दह दिस = दसों दिशाओं में। दिस = दिशाएं, तरफ। इंद्री = काम-वासना। विआपि रही = जोर डाले रखती है। अधिकाई = बहुत। संतावै = दुखी करता है।1।
अर्थ: हे भाई! वह मनुष्य परमात्मा के गुण नहीं गा सकता, जिसका होछा मन दसों दिशाओं में दौड़ता रहता है, जिस पर काम-वासना बहुत जोर डाले रहती है, जिसे काम सदा सताता रहता है जिसको क्रोध सदा दुखी करता रहता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वाहु वाहु सहजे गुण रवीजै ॥ राम नामु इसु जुग महि दुलभु है गुरमति हरि रसु पीजै ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
वाहु वाहु सहजे गुण रवीजै ॥ राम नामु इसु जुग महि दुलभु है गुरमति हरि रसु पीजै ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वाहु वाहु = महिमा। सहजे = सहज ही, आत्मिक अडोलता में टिक के ही। रवीजै = विलीन रहा जा सकता है। इसु जुग महि = मानव जनम में। दुलभु = मुश्किल से मिलने वाला। पीतै = पीया जा सकता है।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! आत्मिक अडोलता में टिक के ही परमात्मा के गुणों की महिमा की जा सकती है। मानव जनम में परमात्मा का नाम एक अमूल्य वस्तु है। गुरु की मति पर चल के ही परमात्मा के नाम का रस पीया जा सकता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सबदु चीनि मनु निरमलु होवै ता हरि के गुण गावै ॥ गुरमती आपै आपु पछाणै ता निज घरि वासा पावै ॥२॥
मूलम्
सबदु चीनि मनु निरमलु होवै ता हरि के गुण गावै ॥ गुरमती आपै आपु पछाणै ता निज घरि वासा पावै ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चीनि = पहचान के, सांझ डाल के। ता = तब। आपै आपु = अपने आप को। निज घरि = अपने (असल) घर में, प्रभु चरणों में।2।
अर्थ: हे भाई! जब गुरु के शब्द से सांझ डाल के मनुष्य का मन पवित्र हो जाता है तब वह परमात्मा के महिमा के गीत गाता है। जब मनुष्य गुरु की मति पर चल के अपने आत्मिक जीवन को पड़तालता है (आत्मिक जीवन का विष्लेशण करता है) तब वह परमात्मा के चरणों में जगह प्राप्त कर लेता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ए मन मेरे सदा रंगि राते सदा हरि के गुण गाउ ॥ हरि निरमलु सदा सुखदाता मनि चिंदिआ फलु पाउ ॥३॥
मूलम्
ए मन मेरे सदा रंगि राते सदा हरि के गुण गाउ ॥ हरि निरमलु सदा सुखदाता मनि चिंदिआ फलु पाउ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रंगि = रंग में। राते = रंगे हुए। निरमलु = पवित्र। मनि = मन में। चिंदिआ = चितवा हुआ। पाउ = प्राप्त कर।3।
अर्थ: हे मेरे मन! सदा परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगा रह, सदा परमात्मा के महिमा के गीत गाता रह। (हे भाई!) परमात्मा सदा पवित्र है, सदा सुख देने वाला है (उसकी महिमा किया कर) मन-इच्छित फल हासिल करेगा।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हम नीच से ऊतम भए हरि की सरणाई ॥ पाथरु डुबदा काढि लीआ साची वडिआई ॥४॥
मूलम्
हम नीच से ऊतम भए हरि की सरणाई ॥ पाथरु डुबदा काढि लीआ साची वडिआई ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: से = से। साची = सदा कायम रहने वाली। वडिआई = इज्जत।4।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा की शरण पड़ने से हम जीव नीच से उत्तम हो जाते हैं। परमात्मा पत्थर-चिक्त मनुष्य को भी (विकारों में) डूबते हुए को निकाल लेता है, उनके अंदर (स्वच्छ आत्मिक जीवन की) सुगंधि आ बसती है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बिखु से अम्रित भए गुरमति बुधि पाई ॥ अकहु परमल भए अंतरि वासना वसाई ॥५॥
मूलम्
बिखु से अम्रित भए गुरमति बुधि पाई ॥ अकहु परमल भए अंतरि वासना वसाई ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जो गुरु की मति पर चल कर श्रेष्ठ मति प्राप्त कर लेते हैं, वे (मानो) विष से अमृत बन जाते हैं। वे मानो धतूरे से चँदन बन जाते हैं। उनके अँदर (स्वच्छ आत्मिक जीवन की) सुगँधि आ बसती है।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
माणस जनमु दुल्मभु है जग महि खटिआ आइ ॥ पूरै भागि सतिगुरु मिलै हरि नामु धिआइ ॥६॥
मूलम्
माणस जनमु दुल्मभु है जग महि खटिआ आइ ॥ पूरै भागि सतिगुरु मिलै हरि नामु धिआइ ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे भाई! मानव जनम बड़ी मुश्किल से मिलता है, जगत में आ के (मनुष्य जनम के द्वारा उसी मनुष्य ने कुछ) कमाया समझो, जिसे पूरे भाग्यों से गुरु मिल जाता है, और (वह) परमात्मा का नाम स्मरण करता है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनमुख भूले बिखु लगे अहिला जनमु गवाइआ ॥ हरि का नामु सदा सुख सागरु साचा सबदु न भाइआ ॥७॥
मूलम्
मनमुख भूले बिखु लगे अहिला जनमु गवाइआ ॥ हरि का नामु सदा सुख सागरु साचा सबदु न भाइआ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बिखु = जहर। से = से। अकहु = आक से, धतूरे से। परमल = चंदन। वासना = कीमती। सागरु = समुंदर। भाइआ = अच्छा लगा।7।
अर्थ: हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य गलत रास्ते पर पड़े रहते हैं (आत्मिक मौत लाने वाले विकारों के) जहर में मस्त रहते हैं, और, कीमती मानव जन्म को (व्यर्थ) गवा लेते हैं। सदा ही सुखों से भरपूर हरि-नाम उन्हें पसंद नहीं आता, सदा-स्थिर हरि की महिमा वाला गुरु-शब्द उनको अच्छा नहीं लगता।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मुखहु हरि हरि सभु को करै विरलै हिरदै वसाइआ ॥ नानक जिन कै हिरदै वसिआ मोख मुकति तिन्ह पाइआ ॥८॥२॥
मूलम्
मुखहु हरि हरि सभु को करै विरलै हिरदै वसाइआ ॥ नानक जिन कै हिरदै वसिआ मोख मुकति तिन्ह पाइआ ॥८॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुखहु = मुँह से। सभु को = हरेक जीव। हिरदै = हृदय में। मुकति = विकारों से खलासी।8।
अर्थ: हे भाई! मुँह से (बाहर-बाहर से) तो हरेक परमात्मा का नाम उचार देता है, पर किसी दुर्लभ व्यक्ति ने ही हरि-नाम अपने हृदय में बसाया है। हे नानक! (कह:) जिस मनुष्यों के हृदय में परमात्मा का नाम आ बसता है वे मनुष्य विकारों से मुक्ति पा लेते हैं।8।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला १ छंत ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
वडहंसु महला १ छंत ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
काइआ कूड़ि विगाड़ि काहे नाईऐ ॥ नाता सो परवाणु सचु कमाईऐ ॥ जब साच अंदरि होइ साचा तामि साचा पाईऐ ॥ लिखे बाझहु सुरति नाही बोलि बोलि गवाईऐ ॥ जिथै जाइ बहीऐ भला कहीऐ सुरति सबदु लिखाईऐ ॥ काइआ कूड़ि विगाड़ि काहे नाईऐ ॥१॥
मूलम्
काइआ कूड़ि विगाड़ि काहे नाईऐ ॥ नाता सो परवाणु सचु कमाईऐ ॥ जब साच अंदरि होइ साचा तामि साचा पाईऐ ॥ लिखे बाझहु सुरति नाही बोलि बोलि गवाईऐ ॥ जिथै जाइ बहीऐ भला कहीऐ सुरति सबदु लिखाईऐ ॥ काइआ कूड़ि विगाड़ि काहे नाईऐ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: काइआ = शरीर। कूड़ि = माया के मोह में। विगाड़ि = मैला करके। काहे नाईऐ = (तीर्थ-) स्नान का कोई लाभ नहीं। सचु = सदा स्थिर नाम का स्मरण। साच अंदरि = सदा स्थिर प्रभु के चरणों में टिक के। साचा = सदा स्थिर प्रभु (का रूप)। तामि = तब। लिखे बाझहु = प्रभु के लिखें हुकमों के बगैर। सुरति = ऊँची सोच, ध्यान।1।
अर्थ: शरीर को (हृदय को) माया के मोह में गंदा करके (तीर्थ-) स्नान करने का कोई लाभ नहीं है। वही मनुष्य नहाया हुआ (पवित्र) है और वही (प्रभु की हजूरी में) स्वीकार है जो सदा-स्थिर प्रभु-नाम-जपने की कमाई करता है। जब सदा-स्थिर-प्रभु के चरणों में जुड़ के जीव सदा स्थिर-प्रभु के साथ एक-मेक हो जाता है तब सदा-स्थिर रहने वाला परमात्मा मिल जाता है। पर, प्रभु के हुक्म के बिना मनुष्य की सूझ (झूठ में से निकल के) ऊँची नहीं हो सकती। सिर्फ जबानी (ज्ञान की) बातें करके बल्कि आत्मिक जीवन और खराब करता है। जहाँ भी (भाव, साधु-संगत में) जा के बैठें, प्रभु की महिमा ही करनी चाहिए, अपनी सूझ में प्रभु की महिमा की वाणी परोनी चाहिए। (नहीं तो) हृदय को माया के मोह में मैला करके (तीर्थ-) स्नान करने का क्या लाभ?।1।
[[0566]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
ता मै कहिआ कहणु जा तुझै कहाइआ ॥ अम्रितु हरि का नामु मेरै मनि भाइआ ॥ नामु मीठा मनहि लागा दूखि डेरा ढाहिआ ॥ सूखु मन महि आइ वसिआ जामि तै फुरमाइआ ॥ नदरि तुधु अरदासि मेरी जिंनि आपु उपाइआ ॥ ता मै कहिआ कहणु जा तुझै कहाइआ ॥२॥
मूलम्
ता मै कहिआ कहणु जा तुझै कहाइआ ॥ अम्रितु हरि का नामु मेरै मनि भाइआ ॥ नामु मीठा मनहि लागा दूखि डेरा ढाहिआ ॥ सूखु मन महि आइ वसिआ जामि तै फुरमाइआ ॥ नदरि तुधु अरदासि मेरी जिंनि आपु उपाइआ ॥ ता मै कहिआ कहणु जा तुझै कहाइआ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ता = तब ही। कहणु कहिआ = महिमा की। जा = जब। मनि = मन में। भाइआ = प्यारा लगा। मनहि = मन में। दूखि = दुख ने। जामि = जब। जिंनि = जिस (तू) ने। आपु = अपने आप को।2।
अर्थ: (पर, ये महिमा हे प्रभु! तेरी अपनी बख्शिश है) मैं तब ही महिमा कर सकता हूँ जब तू खुद प्रेरणा करता है।
(प्रभु की मेहर से ही) प्रभु का आत्मिक जीवन देने वाला नाम मेरे मन को प्यारा लग सकता है। जब प्रभु का नाम मन को मीठा लगता है तब दुखों ने (उस मन में से) अपना डेरा उठा लिया (समझो)।
हे प्रभु! जब तूने हुक्म किया तब आत्मिक आनंद मेरे मन में आ बसता है। हे प्रभु! जिस तू ने अपने आप को खुद ही (जगत-रूप में) प्रकट किया है, जब तू मुझे प्ररणा करता है तब ही मैं तेरी महिमा कर सकता हूँ। मेरी तो तेरे दर पे आरजू ही होती है, मेहर की नजर (तो) तू खुद ही करता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वारी खसमु कढाए किरतु कमावणा ॥ मंदा किसै न आखि झगड़ा पावणा ॥ नह पाइ झगड़ा सुआमि सेती आपि आपु वञावणा ॥ जिसु नालि संगति करि सरीकी जाइ किआ रूआवणा ॥ जो देइ सहणा मनहि कहणा आखि नाही वावणा ॥ वारी खसमु कढाए किरतु कमावणा ॥३॥
मूलम्
वारी खसमु कढाए किरतु कमावणा ॥ मंदा किसै न आखि झगड़ा पावणा ॥ नह पाइ झगड़ा सुआमि सेती आपि आपु वञावणा ॥ जिसु नालि संगति करि सरीकी जाइ किआ रूआवणा ॥ जो देइ सहणा मनहि कहणा आखि नाही वावणा ॥ वारी खसमु कढाए किरतु कमावणा ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वारी = मानव जन्म की बारी। कढाए = देता है। किरतु कमावणा = की हुई मेहनत-कमाई के मुताबिक। सुआमि सेती = स्वामी से। वञावणा = वंजावणा, ख्वार करना, दुखी करना। रूआवणा = शिकायत करनी। देइ = देता है। मनहि = मना है, वर्जित। वावणा = गिला-शिकवा करना।3।
अर्थ: जीवों के किए कर्मों के अनुसार पति-प्रभु हरेक जीव को मानव जन्म की बारी देता है (पिछले कर्मों के संस्कारों के अनुसार ही किसी को अच्छा और किसी को बुरा बनाता है, इस वास्ते) किसी मनुष्य को बुरा कह कह के कोई झगड़ा नहीं खड़ा करना चाहिए (बुरा मनुष्य प्रभु की रजा में ही बुरा बना हुआ है) बुरे की निंदा करना प्रभु से झगड़ा करना है। (सो, हे भाई!) मालिक प्रभु से झगड़ा नहीं डालना चाहिए, इस तरह तो (हम) अपने आप को खुद ही तबाह कर लेते हैं।
जिस मालिक के आसरे सदा जीना है, उसके साथ ही बराबरी करके (अगर दुख प्राप्त हुआ तो फिर उसके पास) जा के पुकार करने का कोई लाभ नहीं हो सकता। परमात्मा जो (सुख-दुख) देता है वह (खिले माथे) सहना चाहिए, गिला-श्किवा नहीं करना चाहिए, गिला-गुजारी करके व्यर्थ बोल-कुबोल नहीं बोलने चाहिए। (दरअसल बात ये है कि) हमारे किए कर्मों के अनुसार पति-प्रभु हमें मानव जनम की बारी देता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभ उपाईअनु आपि आपे नदरि करे ॥ कउड़ा कोइ न मागै मीठा सभ मागै ॥ सभु कोइ मीठा मंगि देखै खसम भावै सो करे ॥ किछु पुंन दान अनेक करणी नाम तुलि न समसरे ॥ नानका जिन नामु मिलिआ करमु होआ धुरि कदे ॥ सभ उपाईअनु आपि आपे नदरि करे ॥४॥१॥
मूलम्
सभ उपाईअनु आपि आपे नदरि करे ॥ कउड़ा कोइ न मागै मीठा सभ मागै ॥ सभु कोइ मीठा मंगि देखै खसम भावै सो करे ॥ किछु पुंन दान अनेक करणी नाम तुलि न समसरे ॥ नानका जिन नामु मिलिआ करमु होआ धुरि कदे ॥ सभ उपाईअनु आपि आपे नदरि करे ॥४॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: उपाईअनु = उसने पैदा की है। सभु कोइ = हरेक जीव। तुलि = बराबर। समसरे = बराबर। करमु = कृपा। धुरि = धुर से। कदे = कब की।4।
अर्थ: सारी सृष्टि परमात्मा ने स्वयं पैदा की है, खुद ही हरेक जीव पर मेहर की निगाह करता है। (उसके दर से सब जीव दातें मांगते हैं) कड़वी चीज (कोई भी) नहीं मांगता, हरेक जीव मीठी सुखदाई वस्तुएं ही मांगता है। हरेक जीव मीठे पदार्थों की मांग ही करता है, पर पति-प्रभु वही कुछ करता है (देता है) जो उसे अच्छा लगता है।
जीव (दुनिया के मीठे पदार्थों की खातिर) दान-पुण्य करते हैं, ऐसे और भी धार्मिक कर्म करते हैं, पर परमात्मा के नाम के बराबर और कोई उद्यम नहीं है। हे नानक! जिस लोगों पर धुर से परमात्मा की ओर से बख्शिश होती है उन्हें नाम की दाति मिलती है।
ये सारा जगत प्रभु ने खुद पैदा किया है और खुद ही सब पर मेहर की नजर करता है।4।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला १ ॥ करहु दइआ तेरा नामु वखाणा ॥ सभ उपाईऐ आपि आपे सरब समाणा ॥ सरबे समाणा आपि तूहै उपाइ धंधै लाईआ ॥ इकि तुझ ही कीए राजे इकना भिख भवाईआ ॥ लोभु मोहु तुझु कीआ मीठा एतु भरमि भुलाणा ॥ सदा दइआ करहु अपणी तामि नामु वखाणा ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला १ ॥ करहु दइआ तेरा नामु वखाणा ॥ सभ उपाईऐ आपि आपे सरब समाणा ॥ सरबे समाणा आपि तूहै उपाइ धंधै लाईआ ॥ इकि तुझ ही कीए राजे इकना भिख भवाईआ ॥ लोभु मोहु तुझु कीआ मीठा एतु भरमि भुलाणा ॥ सदा दइआ करहु अपणी तामि नामु वखाणा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वखाणा = मैं उच्चारूँ। उपाईऐ = पैदा की है। सरब = सभी में। उपाइ = पैदा करके। धंधै = रोजी रोटी में, माया की दौड़ भाग में। इकि = कई। एतु भरमि = इस भ्रम में, इस भटकना में। तामि = तब ही।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘इकि’ है ‘इक/एक’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे प्रभु! मेहर कर कि मैं तेरा नाम स्मरण कर सकूँ। तूने सारी सृष्टि खुद ही पैदा की है और खुद ही सब जीवों में व्यापक है। तू खुद ही सब जीवों में समाया हुआ है, पैदा करके तूने खुद ही सुष्टि को माया की दौड़-भाग में लगाया हुआ है।
कई जीवों को तू स्वयं ही राजे बना देता है, और कई जीवों को (भिखारी बना के) भिक्षा मांगने के वास्ते (दर-ब-दर) भटका रहा है।
हे प्रभु! तूने लोभ और मोह को मीठा बना दिया है, जगत इस भटकना में पड़ के गलत रास्ते पर चल रहा है। अगर तू सदा अपनी मेहर करता रहे तो ही मैं तेरा नाम स्मरण कर सकता हूँ।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नामु तेरा है साचा सदा मै मनि भाणा ॥ दूखु गइआ सुखु आइ समाणा ॥ गावनि सुरि नर सुघड़ सुजाणा ॥ सुरि नर सुघड़ सुजाण गावहि जो तेरै मनि भावहे ॥ माइआ मोहे चेतहि नाही अहिला जनमु गवावहे ॥ इकि मूड़ मुगध न चेतहि मूले जो आइआ तिसु जाणा ॥ नामु तेरा सदा साचा सोइ मै मनि भाणा ॥२॥
मूलम्
नामु तेरा है साचा सदा मै मनि भाणा ॥ दूखु गइआ सुखु आइ समाणा ॥ गावनि सुरि नर सुघड़ सुजाणा ॥ सुरि नर सुघड़ सुजाण गावहि जो तेरै मनि भावहे ॥ माइआ मोहे चेतहि नाही अहिला जनमु गवावहे ॥ इकि मूड़ मुगध न चेतहि मूले जो आइआ तिसु जाणा ॥ नामु तेरा सदा साचा सोइ मै मनि भाणा ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साचा = सदा स्थिर रहने वाला। मै मनि = मेरे मन में। भाणा = प्यारा लगता है। सुरि नर = श्रेष्ठ मनुष्य। सुघड़ = सुचजे। सुजाण = सुजान, माहिर। भावहे = भाते हैं। अहिला = उत्तम, श्रेष्ठ। मूढ़ मुगध = मूर्ख। मूले = बिल्कुल ही। सोइ = वही।2।
अर्थ: हे प्रभु! तेरा नाम सदा स्थिर रहने वाला है, तेरा नाम मेरे मन को प्यारा लगता है। जो मनुष्य तेरा नाम स्मरण करता है उसका दुख दूर हो जाता है और आत्मिक आनंद उसके अंदर आ बसता है।
भाग्यशाली सदाचारी समझदार मनुष्य तेरी महिमा के गीत गाते हैं। हे प्रभु! जो बंदे तेरे मन को भाते हैं वे सुघड़ सुजान तेरी महिमा के गीत गाते हैं। पर, जो मनुष्य माया में मोहे जाते हैं वे तुझे नहीं स्मरण करते वे अपना अमूल्य जन्म गवा लेते हैं।
अनेक ऐसे मूर्ख मनुष्य हैं जो, हे प्रभु! तुझे याद नहीं करते (वे ये नहीं समझते कि) जो जगत में पैदा हुआ है उसने (आखिर यहाँ से) चले जाना है। हे प्रभु! तेरा सदा ही स्थिर रहने वाला है, तेरा नाम मेरे मन को प्यारा लग रहा है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तेरा वखतु सुहावा अम्रितु तेरी बाणी ॥ सेवक सेवहि भाउ करि लागा साउ पराणी ॥ साउ प्राणी तिना लागा जिनी अम्रितु पाइआ ॥ नामि तेरै जोइ राते नित चड़हि सवाइआ ॥ इकु करमु धरमु न होइ संजमु जामि न एकु पछाणी ॥ वखतु सुहावा सदा तेरा अम्रित तेरी बाणी ॥३॥
मूलम्
तेरा वखतु सुहावा अम्रितु तेरी बाणी ॥ सेवक सेवहि भाउ करि लागा साउ पराणी ॥ साउ प्राणी तिना लागा जिनी अम्रितु पाइआ ॥ नामि तेरै जोइ राते नित चड़हि सवाइआ ॥ इकु करमु धरमु न होइ संजमु जामि न एकु पछाणी ॥ वखतु सुहावा सदा तेरा अम्रित तेरी बाणी ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वखतु = समय। तेरा वखतु = वह समय जब तू याद आए। अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाली। भाउ = प्रेम। साउ = स्वाद, आनंद। नामि = नाम में। जोइ = जो लोग। चढ़हि सवाइआ = बढ़ते फूलते हैं। जामि = जब। न पछाणी = मैं नहीं पहचानता।3।
अर्थ: हे प्रभु! तेरी महिमा की वाणी अमृत है (अटल आत्मिक जीवन देने वाली है) वह वक्त बहुत सुहावना लगता है जब तेरा नाम याद करते हैं। जिस बंदों को तेरे नाम का रस आता है वह सेवक प्रेम से तेरा नाम स्मरण करते हैं। उन ही लोगों को नाम का रस आता है जिनको ये नाम अमृत प्राप्त होता है। हे प्रभु! जो लोग तेरे नाम में जुड़ते हैं वह (आत्मिक जीवन की उन्नति में) सदा बढ़ते-फूलते रहते हैं।
हे प्रभु! जब तक मैं तेरे साथ एक गहरी सांझ नहीं डालता तब तक और कोई एक भी धर्म-कर्म कोई एक भी संयम किसी अर्थ के नहीं। तेरी महिमा की वाणी आत्मिक जीवन-दाती है, वह वक्त बहुत सुहाना लगता है जब तेरा नाम स्मरण करते हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
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मूलम्
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[[0567]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ बलिहारी साचे नावै ॥ राजु तेरा कबहु न जावै ॥ राजो त तेरा सदा निहचलु एहु कबहु न जावए ॥ चाकरु त तेरा सोइ होवै जोइ सहजि समावए ॥ दुसमनु त दूखु न लगै मूले पापु नेड़ि न आवए ॥ हउ बलिहारी सदा होवा एक तेरे नावए ॥४॥
मूलम्
हउ बलिहारी साचे नावै ॥ राजु तेरा कबहु न जावै ॥ राजो त तेरा सदा निहचलु एहु कबहु न जावए ॥ चाकरु त तेरा सोइ होवै जोइ सहजि समावए ॥ दुसमनु त दूखु न लगै मूले पापु नेड़ि न आवए ॥ हउ बलिहारी सदा होवा एक तेरे नावए ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हउ = मैं। नावै = नाम से। निहचलु = अटल। न जावए = न जाए, नहीं जाता। चाकरु = सेवक। सहजि = अडोल आत्मिक अवस्था में। समावए = समाए, लीन होता है। नेड़ि = नजदीक। होवा = मैं होऊँ। तेरे नावए = तेरे नाम से।4।
अर्थ: हे प्रभु! तेरे सदा-स्थिर रहने वाले नाम से कुर्बान जाता हूँ। तेरा राज कभी भी नाश होने वाला नहीं है। हे प्रभु! तेरा राज सदा अटल रहने वाला है, ये कभी भी नाश नहीं हो सकता। वही मनुष्य तेरा असल भक्त-सेवक है जो (तेरा नाम स्मरण करके) आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। कोई वैरी कोई दुख उस पर हावी नहीं हो सकता, कोई पाप उसके नजदीक नहीं फटकता।
हे प्रभु! मैं सदा तेरे नाम से बलिहार जाता हूँ।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जुगह जुगंतरि भगत तुमारे ॥ कीरति करहि सुआमी तेरै दुआरे ॥ जपहि त साचा एकु मुरारे ॥ साचा मुरारे तामि जापहि जामि मंनि वसावहे ॥ भरमो भुलावा तुझहि कीआ जामि एहु चुकावहे ॥ गुर परसादी करहु किरपा लेहु जमहु उबारे ॥ जुगह जुगंतरि भगत तुमारे ॥५॥
मूलम्
जुगह जुगंतरि भगत तुमारे ॥ कीरति करहि सुआमी तेरै दुआरे ॥ जपहि त साचा एकु मुरारे ॥ साचा मुरारे तामि जापहि जामि मंनि वसावहे ॥ भरमो भुलावा तुझहि कीआ जामि एहु चुकावहे ॥ गुर परसादी करहु किरपा लेहु जमहु उबारे ॥ जुगह जुगंतरि भगत तुमारे ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जुगह जुगंतरि = जुग जुग अंतरि, हरेक युग में। कीरति = महिमा। तेरै दुआरे = तेरे दर पे। साचा = सदा स्थिर रहने वाला। मुरारे = (मुर+अरि) परमात्मा। तामि = तब से ही। मंनि = (उनके) मन में। वसावहे = तू (नाम) बसाता है। भरमों = भटकना। तुझहि = तू ही। एहु = यह भ्रम भुलेखा। चुकावहे = तू चुका देता है, तू समाप्त कर देता है। जमहु = जम से। लेहु उबारे = बचा लेता है।5।
अर्थ: हे प्रभु! हरेक युग में ही तेरे भक्त मौजूद रहे हैं, जो, हे स्वामी! तेरे दर पर तेरी महिमा करते हैं, जो सदा तुझे ही सदा-स्थिर प्रभु को स्मरण करते हैं। हे प्रभु! तूझ सदा-स्थिर को वे तभी जप सकते हैं जब तू खुद उनके मन में अपना नाम बसाता है, जब तू उनके मन में से माया वाली भटकना दूर करता है जो तूने खुद ही पैदा की हुई है।
हे प्रभु! गुरु की कृपा से तू अपने भक्तों पर मेहर करता है, और उनको जमों से बचा लेता है। हरेक युग में ही तेरे भक्त-सेवक मौजूद हैं।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडे मेरे साहिबा अलख अपारा ॥ किउ करि करउ बेनंती हउ आखि न जाणा ॥ नदरि करहि ता साचु पछाणा ॥ साचो पछाणा तामि तेरा जामि आपि बुझावहे ॥ दूख भूख संसारि कीए सहसा एहु चुकावहे ॥ बिनवंति नानकु जाइ सहसा बुझै गुर बीचारा ॥ वडा साहिबु है आपि अलख अपारा ॥६॥
मूलम्
वडे मेरे साहिबा अलख अपारा ॥ किउ करि करउ बेनंती हउ आखि न जाणा ॥ नदरि करहि ता साचु पछाणा ॥ साचो पछाणा तामि तेरा जामि आपि बुझावहे ॥ दूख भूख संसारि कीए सहसा एहु चुकावहे ॥ बिनवंति नानकु जाइ सहसा बुझै गुर बीचारा ॥ वडा साहिबु है आपि अलख अपारा ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अलख = (अलक्ष्य) अदृष्य। अपारा = जिसके गुणों का पार ना पाया जा सके। किउ करि = कैसे? करउ = मैं करूँ। हउ = मैं। आखि ना जाणा = मैं कहना नहीं जानता। तेरा = तेरा (स्वरूप)। बुझावहे = तू समझ देता है। संसारि = संसार में। सहसा = सहम। जाइ = दूर हो जाता है।6।
अर्थ: हे मेरे बड़े मालिक! हे अदृष्य मालिक! हे बेअंत मालिक! मैं (तेरे दर पर) कैसे विनती करूँ? मुझे तो विनती करनी भी नहीं आती। अगर तू खुद (मेरे पर) मेहर की निगाह करे तो ही मैं तेरे सदा-स्थिर नाम जल से सांझ डाल सकता हूँ। तेरा सदा-स्थिर नाम मैं तब ही पहचान सकता हूँ (तब ही इसकी कद्र पा सकता हूँ) जब तू स्वयं मुझे उसकी सूझ बख्शे, जब तू मेरे मन में से माया की तृष्णा और (इससे पैदा होने वाले) उन दुखों का सहम दूर करे जो कि जगत में तूने स्वयं ही पैदा किए हुए हैं।
नानक विनती करता है कि जब मनुष्य गुरु के शब्द की विचार समझता है तो (इसके अंदर से दुख आदि का) सहम दूर हो जाता है (और यकीन बन जाता है कि) अदृष्य और बेअंत प्रभु खुद (सब जीवों के सिर पर) बड़ा मालिक है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तेरे बंके लोइण दंत रीसाला ॥ सोहणे नक जिन लमड़े वाला ॥ कंचन काइआ सुइने की ढाला ॥ सोवंन ढाला क्रिसन माला जपहु तुसी सहेलीहो ॥ जम दुआरि न होहु खड़ीआ सिख सुणहु महेलीहो ॥ हंस हंसा बग बगा लहै मन की जाला ॥ बंके लोइण दंत रीसाला ॥७॥
मूलम्
तेरे बंके लोइण दंत रीसाला ॥ सोहणे नक जिन लमड़े वाला ॥ कंचन काइआ सुइने की ढाला ॥ सोवंन ढाला क्रिसन माला जपहु तुसी सहेलीहो ॥ जम दुआरि न होहु खड़ीआ सिख सुणहु महेलीहो ॥ हंस हंसा बग बगा लहै मन की जाला ॥ बंके लोइण दंत रीसाला ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बंके = बाँके। लोइण = आँखें। दंत = दाँत। रसीला = (रस+आलय) सुंदर। नक = नाक (बहुवचन)। जिन = जिस के (जिसु = जिस का। जिन = जिन्हों का, जिस के)। लंमड़े = सुंदर लंबे। वाला = बाल, केश। कंचन काइआ = सोने का शरीर, सुंदर आरोग्य देह। ढाला = ढाला हुआ। सोवंन = सोने का। क्रिसन माला = वैजयंती माला (विष्णु की)। दुआरि = दर पे। सिख = शिक्षा। सहेलीहो = हे जीव स्त्रीयो! हंस हंसा = बड़े हंस, बहुत श्रेष्ठ मनुष्य। बग बगा = बड़े बगुले, महा ठग। लहै = दूर हो जाता है।7।
अर्थ: (हे सर्व-व्यापक विधाता! जगत की सारी सुंदरता तूने अपने स्वरूप से रची है। तूने ऐसे ऐसे स्त्री-पुरुष जिनके नैन-दाँत, नाक, केश आदि सारे ही अंग महान सुंदर हैं। उनमें, हे प्रभु! तू खुद ही बैठा जीवन ज्योति जगा रहा है। सो) हे प्रभु! तेरे नैन बांके हैं, तेरे दाँत सुंदर हैं, तेरा नाम सुंदर है, तेरे सुंदर लंबे केश हैं (जिनके सुंदर नाक हैं, जिनके सुंदर लंबे केश हैं; ये भी हे प्रभु! तेरे ही नाक व तेरे ही केश हैं)। हे प्रभु! तेरा शरीर सोने जैसा शुद्ध निरोग है और सुडोल है, मानो, सोने में ही ढला हुआ है।
हे सहेलियो! (हे सत्संगी सज्जनों!) तुम उस परमात्मा (के नाम) की माला जपो (उस परमात्मा का नाम बार बार जपो) जिसका शरीर अरोग्य और सुडोल है, जैसे, सोने में ढला हुआ है।
हे जीव-सि्त्रयो! मेरी शिक्षा सुनो! (अगर तुम भी उस आरोग्य और सुडोल स्वरूप वाले सर्व-व्यापक विधाता का नाम जपोगी, तो) तुम भी (अंत के समय) यम-राज के दरवाजे पर लाइन में खड़ी नहीं होवोगी। (जो लोग उस परमात्मा का नाम जपते हैं उनके) मन में से विकारों की मैल उतर जाती है। (नाम-जपने की इनायत से) महा-पाखण्डी बगुलों से श्रेष्ठ हंस बन जाते हैं (पाखण्डी लोगों से उच्च जीवन वाले गुरमुख बन जाते हैं)।
हे सहेलियो! (उस सर्व-व्यापक प्रभु के) सुंदर नैन हैं, सुंदर दाँत हैं (इस दिखाई देते संसार की सारी ही सुंदरता का श्रोत प्रभु खुद ही है)।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तेरी चाल सुहावी मधुराड़ी बाणी ॥ कुहकनि कोकिला तरल जुआणी ॥ तरला जुआणी आपि भाणी इछ मन की पूरीए ॥ सारंग जिउ पगु धरै ठिमि ठिमि आपि आपु संधूरए ॥ स्रीरंग राती फिरै माती उदकु गंगा वाणी ॥ बिनवंति नानकु दासु हरि का तेरी चाल सुहावी मधुराड़ी बाणी ॥८॥२॥
मूलम्
तेरी चाल सुहावी मधुराड़ी बाणी ॥ कुहकनि कोकिला तरल जुआणी ॥ तरला जुआणी आपि भाणी इछ मन की पूरीए ॥ सारंग जिउ पगु धरै ठिमि ठिमि आपि आपु संधूरए ॥ स्रीरंग राती फिरै माती उदकु गंगा वाणी ॥ बिनवंति नानकु दासु हरि का तेरी चाल सुहावी मधुराड़ी बाणी ॥८॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मधुराड़ी = सोहणी मीठी। कुहकनि = कूकती हैं। कोइला = कोयलें। तरल = चंचल। जुआणी = जवानी। भाणी = प्यारी लगी। सारंग = हाथी। पगु = पैर। ठिमि ठिमि = मटक मटक के। आपु = अपने आप को। संधूरए = मस्त करता है। स्रीरंग = श्री रंग, लक्ष्मी पति प्रभु। माती = मतवाली। उदक = पानी। वाणी = उपमा भरपूर वाणी, महिमा की वाणी। बिनवंति = विनती करता है।8।
अर्थ: (कहीं मीठी वैराग भरी सुर में कोयलें कूक रही हैं, कहीं चंचल जवानी में मद्-मस्त सुंदरियां हैं जो मस्त हाथी की तरह बड़ी मटक से चलती हैं। हे प्रभु! ये कोयल की मीठी बोली और चंचल जवानी का मद सब कुछ तूने खुद ही पैदा किया है। सो, हे प्रभु!) तेरी (मस्त) चाल (मन को) सुख देने वाली है, तेरी बोली सोहानी और मधुर है। (तेरी ही पैदा की हुई) चंचल जवानी की मद् भरी सुंदरीयां हैं।
ये चंचल जवानी प्रभु ने खुद ही पैदा की, उसे खुद को ही इसका पैदा करना अच्छा लगा, उसने अपने ही मन की इच्छा पूरी की। (चंचल जवानी से मद्-मस्त सुंदरियों में बैठ के प्रभु खुद ही) मस्त हाथी की तरह मटक-मटक के पैर धरता है, वह खुद ही अपने आप को (जवानी के मद् में) मस्त कर रहा है। (प्रभु की अपनी ही कृपा से कोई अति भाग्यशाली जीव-स्त्री उस) लक्ष्मी-पति के प्रेम रंग में रंगी हुई (उसके नाम में) मस्त फिरती है, (उसका जीवन पवित्र हो जाता है) जैसे गंगा का पानी (पवित्र माना जाता है)।
हरि का दास नानक विनती करता है: हे प्रभु! तेरी चाल सुहानी है और तेरी बोली मीठी-मीठी है।8।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ छंत ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ छंत ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपणे पिर कै रंगि रती मुईए सोभावंती नारे ॥ सचै सबदि मिलि रही मुईए पिरु रावे भाइ पिआरे ॥ सचै भाइ पिआरी कंति सवारी हरि हरि सिउ नेहु रचाइआ ॥ आपु गवाइआ ता पिरु पाइआ गुर कै सबदि समाइआ ॥ सा धन सबदि सुहाई प्रेम कसाई अंतरि प्रीति पिआरी ॥ नानक सा धन मेलि लई पिरि आपे साचै साहि सवारी ॥१॥
मूलम्
आपणे पिर कै रंगि रती मुईए सोभावंती नारे ॥ सचै सबदि मिलि रही मुईए पिरु रावे भाइ पिआरे ॥ सचै भाइ पिआरी कंति सवारी हरि हरि सिउ नेहु रचाइआ ॥ आपु गवाइआ ता पिरु पाइआ गुर कै सबदि समाइआ ॥ सा धन सबदि सुहाई प्रेम कसाई अंतरि प्रीति पिआरी ॥ नानक सा धन मेलि लई पिरि आपे साचै साहि सवारी ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पिर = पति। कै रंगि = के प्रेम रंग में। रती = रंगी हुई। मुईए = हे मरी हुई! हे मरजाणी! हे माया के मोह में अछूती हो चुकी! नरे = हे जीव-स्त्री! सचै = सदा स्थिर प्रभु में। सबदि = गुरु के शब्द द्वारा। रावे = माणता है, मिला हुआ है। भाइ = प्रेम के कारण। कंति = कंत ने। सिउ = साथ। नेहु = प्यार। आपु = स्वै भाव। सा धन = जीव-स्त्री। सुहाई = सुहाने जीवन वाली। कसाई = कसी हुई, खींची हुई। प्रेम कसाई = प्रेम में खिंची हुई। पिरि = पिर ने। साहि = शाहि, शाह ने।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘पिर’, ‘पिरु’ और ‘पिरि’ के व्याकर्णक अर्थ का ध्यान रखें।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे माया के मोह से अछूती हो चुकी जीव-स्त्री! तू भाग्यशाली हो गई है, क्योंकि तू अपने पति के प्रेम रंग में रंगी गई है। गुरु के शब्द की इनायत से तू सदा-स्थिर रहने वाले प्रभु में लीन रहती है, तुझे तेरे इस प्रेम-प्यार के कारण प्रभु-पति अपने चरणों में जोड़े रखता है।
जिस जीव-स्त्री ने सदा कायम रहने वाले प्रभु से प्यार किया, स्नेह पैदा किया, प्रभु-पति ने उसका जीवन सुंदर बना दिया। जब जीव-स्त्री ने (अपने अंदर से) स्वै भाव दूर किया, तब उसने (अपने अंदर ही) प्रभु-पति को पा लिया, गुरु के शब्द की इनायत से (उसका मन प्रभु में) लीन हो गया।
प्रभु-प्रेम की खिची हुई सदाचारी जीव-स्त्री गुरु के शब्द के द्वारा सोहणे जीवन वाली बन जाती है, उसके हृदय में प्रभु चरणों की प्रीति टिकी रहती है। हे नानक! (कह:) ऐसी सदाचारी जीव-स्त्री को प्रभु-पति ने स्वयं ही अपने साथ मिला लिया है, सदा कायम रहने वाले शाह ने उसका जीवन सँवार दिया है।1।
[[0568]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
निरगुणवंतड़ीए पिरु देखि हदूरे राम ॥ गुरमुखि जिनी राविआ मुईए पिरु रवि रहिआ भरपूरे राम ॥ पिरु रवि रहिआ भरपूरे वेखु हजूरे जुगि जुगि एको जाता ॥ धन बाली भोली पिरु सहजि रावै मिलिआ करम बिधाता ॥ जिनि हरि रसु चाखिआ सबदि सुभाखिआ हरि सरि रही भरपूरे ॥ नानक कामणि सा पिर भावै सबदे रहै हदूरे ॥२॥
मूलम्
निरगुणवंतड़ीए पिरु देखि हदूरे राम ॥ गुरमुखि जिनी राविआ मुईए पिरु रवि रहिआ भरपूरे राम ॥ पिरु रवि रहिआ भरपूरे वेखु हजूरे जुगि जुगि एको जाता ॥ धन बाली भोली पिरु सहजि रावै मिलिआ करम बिधाता ॥ जिनि हरि रसु चाखिआ सबदि सुभाखिआ हरि सरि रही भरपूरे ॥ नानक कामणि सा पिर भावै सबदे रहै हदूरे ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निरगुणवंतड़ीए = हे गुणों से वंचित जीवात्मा! हदूरे = हाजिर नाजर, अंग संग। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ के। राविआ = हृदय में बसाया। मुईए = हे आत्मिक मौत सह रही जीवात्मा! रवि रहिआ = व्यापक है। हजूरे = अंग संग। जुगि जुगि = हरेक युग में। एको = एक प्रभु ही। जाता = प्रसिद्ध। धन = जीव-स्त्री। बाली = बाल स्वभाव वाली, बालिका। भोली = भोले स्वभाव वाली। सहजि = आत्मिक अडोलता में। करम विधाता = जीवों के किए कर्मों के अनुसार पैदा करने वाला। जिनि = जिस ने। सबदि = गुरु के शब्द द्वारा। सुभाखिआ = उचारा, महिमा की। हरि सरि = हरि सरोवर में। कामणि = कामिनी, जीव-स्त्री। सा = वह (स्त्रीलिंग)। पिर भावै = पति को अच्छी लगती है।2।
अर्थ: हे गुण-हीन जीवात्मा! प्रभु-पति को अपने अंग-संग बसता देखा कर। हे जिंदे! प्रभु-पति जर्रे-जर्रे में व्यापक है; उसे हर जगह हाजर-नाजर (विद्यमान, मौजूद) देख। वह प्रभु ही हरेक युग में (जीता-जागता) प्रसिद्ध है। जो जीव-स्त्री बाल स्वभाव हो के भोले सवभाव वाली बन के आत्मिक अडोलता में टिक के उस प्रभु पति को याद करती रहती है, उसे वह विधाता मिल जाता है। हे जीवात्मा! जिस जीव-स्त्री ने हरि-नाम का स्वाद चख लिया है, जिसने गुरु के शब्द के माध्यम से उस प्रभु की महिमा करनी शुरू कर दी, वह उस सरोवर-प्रभु में हर समय डुबकी लगाए रखती है। हे नानक! (कह:) वही जीव-स्त्री प्रभु-पति को प्यारी लगती है जो गुरु के शब्द द्वारा हर वक्त उसके चरणों में जुड़ी रहती है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सोहागणी जाइ पूछहु मुईए जिनी विचहु आपु गवाइआ ॥ पिर का हुकमु न पाइओ मुईए जिनी विचहु आपु न गवाइआ ॥ जिनी आपु गवाइआ तिनी पिरु पाइआ रंग सिउ रलीआ माणै ॥ सदा रंगि राती सहजे माती अनदिनु नामु वखाणै ॥ कामणि वडभागी अंतरि लिव लागी हरि का प्रेमु सुभाइआ ॥ नानक कामणि सहजे राती जिनि सचु सीगारु बणाइआ ॥३॥
मूलम्
सोहागणी जाइ पूछहु मुईए जिनी विचहु आपु गवाइआ ॥ पिर का हुकमु न पाइओ मुईए जिनी विचहु आपु न गवाइआ ॥ जिनी आपु गवाइआ तिनी पिरु पाइआ रंग सिउ रलीआ माणै ॥ सदा रंगि राती सहजे माती अनदिनु नामु वखाणै ॥ कामणि वडभागी अंतरि लिव लागी हरि का प्रेमु सुभाइआ ॥ नानक कामणि सहजे राती जिनि सचु सीगारु बणाइआ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सोहागणी = वह जीव स्त्रीयां जिन्होंने प्रभु पति को प्रसन्न कर लिया है। जाइ = जा के। मुईए = हे आत्मिक मौत सह रही जीवात्मा! आपु = स्वै भाव। रंग सिउ = आनंद से। रंगि = प्रेम रंग में। राती = रंगी हुई। सहजे = आत्मिक अडोलता में। माती = मस्त। अनदिनु = हर रोज, हर समय। सुभाइआ = पसंद आया। जिनि = जिस ने। सचु = सदा स्थिर हरि नाम।3।
अर्थ: हे आत्मिक मौत सह रही जीवात्मा! जा के (उन) सुहागनों से (जीवन-जुगति) पूछ, जिन्होंने अपने अंदर से स्वैभाव दूर कर लिया है। पर जिन्होंने अपने अंदर से स्वै भाव दूर नहीं किया उन्होंने प्रभु की रजा (में चलने की विधि) नहीं सीखी। जिन्होंने स्वै भाव दूर कर लिया, उन्होंने (अपने अंदर ही) प्रभु-पति को पा लिया, प्रभु-पति प्रेम से उन्हें अपने मिलाप के आनंद में रखता है। जो जीव-स्त्री सदा प्रभु के प्रेम रंग में रंगी रहती है, आत्मिक अडोलता में मस्त रहती है, वह हर समय प्रभु-पति का नाम सिमरती रहती है। वह जीव-स्त्री बहुत भाग्यशाली है, उसके हृदय में प्रभु-चरणों की लगन बनी रहती है, उसको प्रभु का प्यार अच्छा लगता है। हे नानक! जिस जीव-स्त्री ने सदा-स्थिर प्रभु के नाम को अपनी जिंदगी का श्रृंगार बना लिया है वह सदा आत्मिक अडोलता में लीन रहती है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउमै मारि मुईए तू चलु गुर कै भाए ॥ हरि वरु रावहि सदा मुईए निज घरि वासा पाए ॥ निज घरि वासा पाए सबदु वजाए सदा सुहागणि नारी ॥ पिरु रलीआला जोबनु बाला अनदिनु कंति सवारी ॥ हरि वरु सोहागो मसतकि भागो सचै सबदि सुहाए ॥ नानक कामणि हरि रंगि राती जा चलै सतिगुर भाए ॥४॥१॥
मूलम्
हउमै मारि मुईए तू चलु गुर कै भाए ॥ हरि वरु रावहि सदा मुईए निज घरि वासा पाए ॥ निज घरि वासा पाए सबदु वजाए सदा सुहागणि नारी ॥ पिरु रलीआला जोबनु बाला अनदिनु कंति सवारी ॥ हरि वरु सोहागो मसतकि भागो सचै सबदि सुहाए ॥ नानक कामणि हरि रंगि राती जा चलै सतिगुर भाए ॥४॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुर कै भाए = गुरु के अनुसार, गुरु के प्रेम में। वरु = पति। रावहि = तू मिलाप प्राप्त कर लेगी। निज घरि = अपने असल घर में, प्रभु की हजूरी में। पाए = पा के। वजाए = बजाती है, प्रभाव हृदय में बसाती है। रलीआला = रलियों का घर, आनंद का श्रोत। बाला = जवान। कंति = कंत ने। अनदिनु = हर रोज। मसतकि = माथे पर। कामणि = जीव-स्त्री। रंगि = प्रेम में।4।
अर्थ: हे आत्मिक मौत सह रही जीव-स्त्री! तू (अपने अंदर से) अहंकार को दूर कर, और गुरु के अनुसार चल (जीवन चला)। (अगर तू गुरु के मुताबिक चलेगी, तो) प्रभु की हजूरी में निवास हासिल करके तू सदा के लिए प्रभु-पति के मिलाप का आनंद लेती रहेगी।
हे जीवात्मा! जो जीव-स्त्री अपने दिल में गुरु शब्द बसा लेती है, वह प्रभु की हजूरी में जगह प्राप्त कर लेती है, वह सदा के लिए भाग्यशाली हो जाती है (उसे समझ आ जाती है कि) प्रभु-पति ही आनंद का श्रोत है, प्रभु-पति का यौवन सदा कायम रहने वाला है, उस जीव-स्त्री को प्रभु-कंत ने सदा के लिए सुंदर जीवन वाली बना दिया।
हे नानक! जब जीव-स्त्री गुरु के अनुसार चलती है, तब वह प्रभु के प्रेम-रंग में रंगी जाती है, उसको प्रभु-पति सोहाग मिल जाता है, उसके माथे पर भाग्य जाग जाते हैं, गुरु के शब्द के माध्यम से वह सदा-स्थिर प्रभु में लीन हो के सोहाने आत्मिक जीवन वाली बन जाती है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ ॥ गुरमुखि सभु वापारु भला जे सहजे कीजै राम ॥ अनदिनु नामु वखाणीऐ लाहा हरि रसु पीजै राम ॥ लाहा हरि रसु लीजै हरि रावीजै अनदिनु नामु वखाणै ॥ गुण संग्रहि अवगण विकणहि आपै आपु पछाणै ॥ गुरमति पाई वडी वडिआई सचै सबदि रसु पीजै ॥ नानक हरि की भगति निराली गुरमुखि विरलै कीजै ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ ॥ गुरमुखि सभु वापारु भला जे सहजे कीजै राम ॥ अनदिनु नामु वखाणीऐ लाहा हरि रसु पीजै राम ॥ लाहा हरि रसु लीजै हरि रावीजै अनदिनु नामु वखाणै ॥ गुण संग्रहि अवगण विकणहि आपै आपु पछाणै ॥ गुरमति पाई वडी वडिआई सचै सबदि रसु पीजै ॥ नानक हरि की भगति निराली गुरमुखि विरलै कीजै ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ के। वापारु = नाम का व्यापार। सहजे = आत्मिक अडोलता में। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। वखाणीऐ = उचारना चाहिए। लाहा = लाभ। पीजै = पीना चाहिए। रावीजै = हृदय में बसाना चाहिए। वखाणै = उचारता है। संग्रहि = इकट्ठे करके। आपै आपु = अपने आप को। विकणहि = बिक जाते हैं, दूर हो जाते हैं। निराली = अनोखी।1।
अर्थ: हे भाई! अगर गुरु के माध्यम से आत्मिक अडोलता में टिक के (हरि-नाम का) व्यापार किया जाए, तो ये सारा व्यापार मनुष्य के लिए फलदायक होता है। हे भाई! परमात्मा का नाम हर वक्त उचारना चाहिए, प्रभु के नाम का रस पीना चाहिए- यही है मानव जन्म की कमाई। हरि-नाम का स्वाद लेना चाहिए, हरि नाम हृदय में बसाना चाहिए- यही मानव जन्म का लाभ है। जो मनुष्य हर वक्त प्रभु का नाम उचारता है, वह (अपने अंदर आत्मिक) गुण एकत्र करके अपने आत्मिक जीवन को परखता रहता है, (इस तरह उसके सारे) अवगुण दूर हो जाते हैं।
हे भाई! जिस मनुष्य ने गुरु की शिक्षा हासिल कर ली, उसे बड़ा आदर मिला। हे भाई! सदा-स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द में जुड़ के हरि-नाम-रस पीना चाहिए। हे नानक! परमात्मा की भक्ति एक आश्चर्यजनक दाति है (कृपा है), पर किसी दुर्लभ मनुष्य ने ही गुरु की शरण पड़ कर ही भक्ति की है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखि खेती हरि अंतरि बीजीऐ हरि लीजै सरीरि जमाए राम ॥ आपणे घर अंदरि रसु भुंचु तू लाहा लै परथाए राम ॥ लाहा परथाए हरि मंनि वसाए धनु खेती वापारा ॥ हरि नामु धिआए मंनि वसाए बूझै गुर बीचारा ॥ मनमुख खेती वणजु करि थाके त्रिसना भुख न जाए ॥ नानक नामु बीजि मन अंदरि सचै सबदि सुभाए ॥२॥
मूलम्
गुरमुखि खेती हरि अंतरि बीजीऐ हरि लीजै सरीरि जमाए राम ॥ आपणे घर अंदरि रसु भुंचु तू लाहा लै परथाए राम ॥ लाहा परथाए हरि मंनि वसाए धनु खेती वापारा ॥ हरि नामु धिआए मंनि वसाए बूझै गुर बीचारा ॥ मनमुख खेती वणजु करि थाके त्रिसना भुख न जाए ॥ नानक नामु बीजि मन अंदरि सचै सबदि सुभाए ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु के सन्मुख रह के। अंतरि = (मन के) अंदर। सरीरि = शरीर में, दिल में। लीजै जमाए = उगा लेनी चाहिए। घर = हृदय। भुंचु = खा। लाहा = लाभ। परथाए = परलोक का। मंनि = मन में। धनु = धन्य, सराहनीय। बूझै = (आत्मिक जीवन को) समझ लेता है। मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य। न जाए = दूर नहीं होती। सुभाए = सु+भाव से, प्रेम से। सबदि = शब्द में (जुड़ के)।2।
अर्थ: हे भाई! गुरु के सन्मुख रह के हरि-नाम की खेती अपने मन में बीजनी चाहिए, हरि-नाम बीज अपने हृदय में उगाना चाहिए। हे भाई! तू अपने हृदय में हरि-नाम का स्वाद चखा कर, और, इस तरह परलोक का लाभ कमा। जो मनुष्य परमात्मा का नाम अपने मन में बसाता है वह परलोक का लाभ (भी) कमा लेता है, उसकी नाम-खेती उसका नाम-व्यापार सराहनीय है। जो मनुष्य परमात्मा का नाम स्मरण करता है, जो हरि-नाम अपने मन में बसाता है वह गुरु शब्द की विचार की इनायत से (आत्मिक जीवन को) समझ लेता है।
हे भाई! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य निरी संसारिक खेती निरा दुनियावी व्यापार करके थक जाते हैं, उनकी माया की तृष्णा नहीं मिटती, माया की भूख दूर नहीं होती। हे नानक! (कह: हे भाई!) तू प्रेम से सदा-स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द में जुड़ के अपने मन में परमात्मा का नाम-बीज बीजा कर।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि वापारि से जन लागे जिना मसतकि मणी वडभागो राम ॥ गुरमती मनु निज घरि वसिआ सचै सबदि बैरागो राम ॥ मुखि मसतकि भागो सचि बैरागो साचि रते वीचारी ॥ नाम बिना सभु जगु बउराना सबदे हउमै मारी ॥ साचै सबदि लागि मति उपजै गुरमुखि नामु सोहागो ॥ नानक सबदि मिलै भउ भंजनु हरि रावै मसतकि भागो ॥३॥
मूलम्
हरि वापारि से जन लागे जिना मसतकि मणी वडभागो राम ॥ गुरमती मनु निज घरि वसिआ सचै सबदि बैरागो राम ॥ मुखि मसतकि भागो सचि बैरागो साचि रते वीचारी ॥ नाम बिना सभु जगु बउराना सबदे हउमै मारी ॥ साचै सबदि लागि मति उपजै गुरमुखि नामु सोहागो ॥ नानक सबदि मिलै भउ भंजनु हरि रावै मसतकि भागो ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वापारि = व्यापार में। मसतकि = माथे पर। निज घरि = प्रभु की हजूरी में। बैरागो = लगन। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। वीचारी = विचारवान। बउराना = झल्ला, कमला, बावरा। सबदे = शब्द से ही। भउ भंजन = डर नाश करने वाला।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘सुोहागो’ के बारे में। शब्द ‘सोहागो’ है, यहाँ ‘सुहागो’ पढ़ना है। अक्षर ‘स’ के साथ दो मात्राएं ‘ु’ और ‘ो’ लगी हैं।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे भाई! हरि-नाम स्मरण के व्यापार में वही मनुष्य लगते हैं जिनके माथे पर अहो भाग्य की मणि चमक पड़ती है। गुरु की मति की इनायत से उनका मन प्रभु की हजूरी में टिक जाता है, सदा स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द के द्वारा उनको हरि नाम की लगन लग जाती है। जिस मनुष्यों के मुंह पर माथे पर भाग्य जाग जाते हैं, सदा स्थिर हरि में उनकी लगन लग जाती है, सदा-स्थिर प्रभु (के प्रेम-रंग) में रंगे हुए वे विचारवान बन जाते हैं।
पर, हे भाई! परमात्मा के नाम के बिना सारा जगत (अहंकार में) बावरा हुआ फिरता है (ये) अहंकार गुरु के शब्द के द्वारा ही दूर किया जा सकता है।
सदा-स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द में जुड़ के (मनुष्य के अंदर उच्च) बुद्धि का प्रकाश हो जाता है, गुरु की शरण पड़ने से हरि-नाम का सोहाग प्राप्त हो जाता है। हे नानक! जिस मनुष्य के माथे के भाग्य जाग उठते हैं, उसको गुरु शब्द के द्वारा डर नाश करने वाला परमात्मा मिल जाता है, वह मनुष्य सदा हरि-नाम को हृदय में बसाए रखता है।3।
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विश्वास-प्रस्तुतिः
खेती वणजु सभु हुकमु है हुकमे मंनि वडिआई राम ॥ गुरमती हुकमु बूझीऐ हुकमे मेलि मिलाई राम ॥ हुकमि मिलाई सहजि समाई गुर का सबदु अपारा ॥ सची वडिआई गुर ते पाई सचु सवारणहारा ॥ भउ भंजनु पाइआ आपु गवाइआ गुरमुखि मेलि मिलाई ॥ कहु नानक नामु निरंजनु अगमु अगोचरु हुकमे रहिआ समाई ॥४॥२॥
मूलम्
खेती वणजु सभु हुकमु है हुकमे मंनि वडिआई राम ॥ गुरमती हुकमु बूझीऐ हुकमे मेलि मिलाई राम ॥ हुकमि मिलाई सहजि समाई गुर का सबदु अपारा ॥ सची वडिआई गुर ते पाई सचु सवारणहारा ॥ भउ भंजनु पाइआ आपु गवाइआ गुरमुखि मेलि मिलाई ॥ कहु नानक नामु निरंजनु अगमु अगोचरु हुकमे रहिआ समाई ॥४॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हुकमे = हुक्म में ही (रह के)। मंनि = मन में, (हुक्म को) मन में (बसा के)। मेलि = मेल में, प्रभु चरणों में। हुकमि = हुक्म में। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सची = सदा स्थिर रहने वाली। ते = से। सचु = सदा स्थिर रहने वाला। आपु = स्वै भाव। कहु = कह, उचार।4।
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य ने परमात्मा की रजा को अपनी खेती बनाया है अपना व्यापार बनाया है, वह प्रभु की रजा में रह के, रजा को मन में बसा के (लोक-परलोक में) आदर हासिल करता है। हे भाई! गुरु की मति पर चलने से ही परमात्मा की रजा को समझा जा सकता है, रजा में चलने से ही प्रभु-चरणों में मिलाप होता है।
हे भाई! जिस मनुष्य को गुरु का शब्द प्रभु की रजा में जोड़ता है आत्मिक अडोलता में लीन करता है वह अपार प्रभु को मिल जाता है। वह मनुष्य गुरु के माध्यम से सदा टिकी रहने वाला सम्मान प्राप्त कर लेता है, गुरु के माध्यम से ही सदा-स्थिर प्रभु को, सुंदर जीवन बनाने वाले प्रभु को मिल जाता है। जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ कर स्वै भाव दूर कर लेता है वह हरेक डर को नाश करने वाले प्रभु से मिल लेता है, वह प्रभु-चरणों में लीन हो जाता है।
हे नानक! तू भी उस प्रभु का नाम स्मरण कर जो माया के प्रभाव से रहित है जो अगम्य (पहुँच से परे) है (मनुष्य की बुद्धि के पहुँच से परे है) जिस तक ज्ञान-इंद्रिय की पहुँच नहीं हो सकती, और जो अपनी रजा अनुसार हर जगह व्यापक है।4।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ ॥ मन मेरिआ तू सदा सचु समालि जीउ ॥ आपणै घरि तू सुखि वसहि पोहि न सकै जमकालु जीउ ॥ कालु जालु जमु जोहि न साकै साचै सबदि लिव लाए ॥ सदा सचि रता मनु निरमलु आवणु जाणु रहाए ॥ दूजै भाइ भरमि विगुती मनमुखि मोही जमकालि ॥ कहै नानकु सुणि मन मेरे तू सदा सचु समालि ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ ॥ मन मेरिआ तू सदा सचु समालि जीउ ॥ आपणै घरि तू सुखि वसहि पोहि न सकै जमकालु जीउ ॥ कालु जालु जमु जोहि न साकै साचै सबदि लिव लाए ॥ सदा सचि रता मनु निरमलु आवणु जाणु रहाए ॥ दूजै भाइ भरमि विगुती मनमुखि मोही जमकालि ॥ कहै नानकु सुणि मन मेरे तू सदा सचु समालि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मन = हे मन! सचु = सदा स्थिर प्रभु। समालि = हृदय में बसाए रख। घरि = हृदय में। सुखि = आनंद से। जमकालु = मौत, आत्मिक मौत। जोहि न साकै = देख नहीं सकता। लिव = लगन। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। आवणु जाणु = जनम मरण का चक्कर। रहाए = खत्म हो जाता है। दूजै भाइ = माया के प्यार में। विगुती = ख्वार हो रही है। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाली दुनिया। जमकालि = मौत ने, आत्मिक मौत ने। मोही = मोह में फसा रखी है।1।
अर्थ: हे मेरे मन! सदा कायम रहने वाले परमात्मा को तू सदा अपने अंदर बसाए रख, (इसकी इनायत से) तू अपनी अंतरात्मा में आनंद से टिका रहेगा, आत्मिक मौत तेरे आगे अपना जोर नहीं डाल सकेगी।
जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु में, गुरु के शब्द में, तवज्जो जोड़े रखता है, मौत (आत्मिक मौत) उसकी ओर देख भी नहीं सकती, उसका मन सदा-स्थिर प्रभु के रंग में सदा रंगा रह के पवित्र हो जाता है, उस मनुष्य के जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो जाता है।
पर, अपने मन के पीछे चलने वाली दुनिया माया के प्यार में माया की भटकना में दुखी होती रहती है, आत्मिक मौत ने उसे अपने मोह में फसा के रखा होता है। (इस वास्ते) नानक कहता है: हे मेरे मन! (मेरी बात) सुन, तू सदा स्थिर प्रभु को सदा अपने अंदर बसाए रख।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरिआ अंतरि तेरै निधानु है बाहरि वसतु न भालि ॥ जो भावै सो भुंचि तू गुरमुखि नदरि निहालि ॥ गुरमुखि नदरि निहालि मन मेरे अंतरि हरि नामु सखाई ॥ मनमुख अंधुले गिआन विहूणे दूजै भाइ खुआई ॥ बिनु नावै को छूटै नाही सभ बाधी जमकालि ॥ नानक अंतरि तेरै निधानु है तू बाहरि वसतु न भालि ॥२॥
मूलम्
मन मेरिआ अंतरि तेरै निधानु है बाहरि वसतु न भालि ॥ जो भावै सो भुंचि तू गुरमुखि नदरि निहालि ॥ गुरमुखि नदरि निहालि मन मेरे अंतरि हरि नामु सखाई ॥ मनमुख अंधुले गिआन विहूणे दूजै भाइ खुआई ॥ बिनु नावै को छूटै नाही सभ बाधी जमकालि ॥ नानक अंतरि तेरै निधानु है तू बाहरि वसतु न भालि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंतरि = अंदर। निधानु = खजाना। भालि = ढूंढ। जो भावै = जो (प्रभु को) अच्छा लगता है, जो प्रभु की रजा है। सो भुंचि = उस को खा, उसे अपनी खुराक बना। निहालि = देख। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख रहने वाले। गुरमुखि नदरि निहालि = गुरु के सन्मुख रहने वाले लोगों की निगाह के साथ देख। सखाई = मित्र। मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाले। अंधुले = अंधे। दूजै भाइ = माया के मोह में। खुआई = ख्वारी, परेशानी, दुख संताप। जमकालि = मौत ने, आत्मिक मौत ने।2।
अर्थ: हे मेरे मन! (सारे सुखों का) खजाना (परमात्मा) तेरे अंदर बस रहा है, तू इस पदार्थ को बाहर (जंगल आदि में) ना ढूँढता फिर। हे मन! परमात्मा की रजा को अपनी खुराक बना, और गुरु के सन्मुख रहने वाले बंदों की निगाह की तरफ देख। हे मेरे मन! गुरमुखों वाली नजर से देख, तेरे अंदर ही तुझे हरि-नाम-मित्र (मिल जाएगा)। आत्मिक जीवन की समझ से वंचित, माया के मोह में अंधे हुए, अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्यों को माया के मोह के कारण परेशानियां ही होतीं हैं।
हे नानक! (कह:) आत्मिक मौत ने सारी दुनिया को (अपने जाल में) बांध रखा है, परमात्मा के नाम के बिना कोई जीव (इस जाल में से) खलासी हासिल नहीं कर सकता। (हे मन!) तेरे अंदर ही नाम-खजाना मौजूद है, तू इस खजाने को बाहर (जंगल आदि में) ना ढूँढता फिर।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरिआ जनमु पदारथु पाइ कै इकि सचि लगे वापारा ॥ सतिगुरु सेवनि आपणा अंतरि सबदु अपारा ॥ अंतरि सबदु अपारा हरि नामु पिआरा नामे नउ निधि पाई ॥ मनमुख माइआ मोह विआपे दूखि संतापे दूजै पति गवाई ॥ हउमै मारि सचि सबदि समाणे सचि रते अधिकाई ॥ नानक माणस जनमु दुल्मभु है सतिगुरि बूझ बुझाई ॥३॥
मूलम्
मन मेरिआ जनमु पदारथु पाइ कै इकि सचि लगे वापारा ॥ सतिगुरु सेवनि आपणा अंतरि सबदु अपारा ॥ अंतरि सबदु अपारा हरि नामु पिआरा नामे नउ निधि पाई ॥ मनमुख माइआ मोह विआपे दूखि संतापे दूजै पति गवाई ॥ हउमै मारि सचि सबदि समाणे सचि रते अधिकाई ॥ नानक माणस जनमु दुल्मभु है सतिगुरि बूझ बुझाई ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पाइ कै = प्राप्त करके, पा कर। इकि = कई। सचि = सदा स्थिर प्रभु के नाम में। सेवनि = सेवते हैं। सबदु अपारा = बेअंत हरि की महिमा के शब्द। नामे = नाम ही, नाम में ही। नउनिधि = नौ खजाने। माहि = मोह में। विआपे = फसे हुए। दूखि = दुख में। संतापे = व्याकुल। दूजै = माया (के मोह) में। पति = इज्जत। सतिगुरि = गुरु ने। बूझ बुझाई = समझ दी।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘इकि’ है ‘इक/एक’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे मेरे मन! कई (भाग्यशाली ऐसे) हैं जो इस कीमती मानव जन्म को हासिल करके सदा-स्थिर परमात्मा के स्मरण के व्यापार में लग जाते हैं, वे अपने गुरु की बताई हुई सेवा करते हैं, और, बेअंत प्रभु की महिमा का शब्द अपने हृदय में बसाते हैं। वह मनुष्य बेअंत हरि की महिमा की वाणी अपने अंदर बसाते हैं, परमात्मा का नाम उनको प्यारा लगता है, प्रभु के नाम में ही उन्होंने (जैसे, दुनिया के) नौ खजाने प्राप्त कर लिए होते हैं।
पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य माया के मोह में फसे रहते हैं, दुख में (ग्रसे हुए) व्याकुल हुए रहते हैं, माया के मोह में फंस के उन्होंने अपनी इज्जत गवा ली होती है।
हे नानक! जिस मनुष्यों को सतिगुरु ने ये समझ बख्श दी होती है कि मानव जन्म बड़ी मुश्किल से मिलता है, वे मनुष्य (अपने अंदर से) अहंकार को दूर करके सदा स्थिर हरि की महिमा के शब्द में लीन रहते हैं, वे मनुष्य सदा स्थिर प्रभु (के प्रेम-रंग में) खूब रंगे रहते हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे सतिगुरु सेवनि आपणा से जन वडभागी राम ॥ जो मनु मारहि आपणा से पुरख बैरागी राम ॥ से जन बैरागी सचि लिव लागी आपणा आपु पछाणिआ ॥ मति निहचल अति गूड़ी गुरमुखि सहजे नामु वखाणिआ ॥ इक कामणि हितकारी माइआ मोहि पिआरी मनमुख सोइ रहे अभागे ॥ नानक सहजे सेवहि गुरु अपणा से पूरे वडभागे ॥४॥३॥
मूलम्
मन मेरे सतिगुरु सेवनि आपणा से जन वडभागी राम ॥ जो मनु मारहि आपणा से पुरख बैरागी राम ॥ से जन बैरागी सचि लिव लागी आपणा आपु पछाणिआ ॥ मति निहचल अति गूड़ी गुरमुखि सहजे नामु वखाणिआ ॥ इक कामणि हितकारी माइआ मोहि पिआरी मनमुख सोइ रहे अभागे ॥ नानक सहजे सेवहि गुरु अपणा से पूरे वडभागे ॥४॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: से जन = वे लोग। मारहि = मार लेते हैं, वश कर लेते हैं। बैरागी = निर्मोह। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। लिव = लगन। आपणा आपु = अपने आत्मिक जीवन को। मति = बुद्धि। निहचल = अडोल। गूढ़ी = (प्रेम रंग में) गूढ़ी (रंगी हुई)। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख रहके। सहजे = आत्मिक अडोलता में। इकि = कई। कामणि = स्त्री। हितकारी = हित करने वाले। मोहि = मोह में। पिआरी = प्यार करने वाली।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘इकि’ है ‘इक/एक’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे मेरे मन! वे मनुष्य अति भाग्यशाली होते हैं जो अपने गुरु की बताई हुई सेवा करते हैं, जो अपने मन को वश में रखते हैं, वे मनुष्य (दुनियावी कार्य-व्यवहार करते हुए भी माया की ओर से) निर्मोह रहते हैं, वे मनुष्य दुनिया की ओर से विरक्त रहते हैं, सदा स्थिर प्रभु में उनकी तवज्जो जुड़ी रहती है, अपने आत्मिक जीवन को वह (सदा) पड़तालते रहते हैं (आत्म चिंतन करते रहते हैं), गुरु की शरण पड़ कर उनकी मति (माया से) अडोल रहती है, प्रेम रंग में गूढ़ी रंगी रहती है, आत्मिक अडोलता में टिक के वे परमात्मा का नाम स्मरण करते रहते हैं।
(पर, हे मन!) कई ऐसे बद्-नसीब होते हैं जो (काम के वश हो के) स्त्री से (ही) हित करते हैं जो माया के मोह में ही मगन रहते हैं जो अपने मन के पीछे चलते हुए (गफ़लत की नींद में) सोए रहते हैं।
हे नानक! (कह:) वे मनुष्य अति भाग्यशाली होते हैं जो आत्मिक अडोलता में टिक के अपने गुरु की बताई हुई सेवा करते रहते हैं।4।3।
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विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ ॥ रतन पदारथ वणजीअहि सतिगुरि दीआ बुझाई राम ॥ लाहा लाभु हरि भगति है गुण महि गुणी समाई राम ॥ गुण महि गुणी समाए जिसु आपि बुझाए लाहा भगति सैसारे ॥ बिनु भगती सुखु न होई दूजै पति खोई गुरमति नामु अधारे ॥ वखरु नामु सदा लाभु है जिस नो एतु वापारि लाए ॥ रतन पदारथ वणजीअहि जां सतिगुरु देइ बुझाए ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ ॥ रतन पदारथ वणजीअहि सतिगुरि दीआ बुझाई राम ॥ लाहा लाभु हरि भगति है गुण महि गुणी समाई राम ॥ गुण महि गुणी समाए जिसु आपि बुझाए लाहा भगति सैसारे ॥ बिनु भगती सुखु न होई दूजै पति खोई गुरमति नामु अधारे ॥ वखरु नामु सदा लाभु है जिस नो एतु वापारि लाए ॥ रतन पदारथ वणजीअहि जां सतिगुरु देइ बुझाए ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रतन पदारथ = कीमती रत्न। वणजीअहि = व्यापार किए जाते हैं, खरीदे जाते हैं। सतिगुरि = गुरु ने। गुण महि = (परमात्मा की) महिमा में (जुड़ के)। गुणी = गुणों के मालिक प्रभु में। समाई = लीनता। समाए = लीन हो जाता है। संसारे = जगत में (आ के)। दूजै = माया में। अधारे = आसरा। एतु = इस में। वापारि = व्यापर में। एतु वापारि = इस व्यापार में।1।
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्य को गुरु ने (आत्मिक जीवन की) सूझ बख्श दी (उसके हृदय-नगर में सदा परमात्मा की महिमा के) कीमती रत्नों का व्यापार होता रहता है, उसको परमात्मा की भक्ति की कमाई प्राप्त होती रहती है, परमात्मा की महिमा में जुड़ के उसकी लीनता गुणों के मालिक प्रभु में हो जाती है।
हे भाई! जिस मनुष्य को परमात्मा खुद (आत्मिक जीवन की) समझ देता है वह मनुष्य प्रभु की महिमा में टिक के गुणों के मालिक प्रभु में लीन हो जाता है, वह जगत में (जन्म ले के) प्रभु की भक्ति का लाभ कमाता है। गुरु की मति पर चल के वह हरि-नाम को (अपनी जिंदगी का) आसरा बनाए रखता है (उसे निश्चय रहता है कि) भक्ति के बिना आत्मिक आनंद नहीं मिल सकता, माया के मोह में फसने वाले ने (लोक-परलोक में अपनी) इज्जत गवा ली।
हे भाई! जिस मनुष्य को परमात्मा इस (नाम-) व्यापार में लगा देता है वह सदा नाम का व्यापार करता है, नाम का ही लाभ कमाता है। भाई! जब गुरु (आत्मिक जीवन की) समझ बख्शता है तो (मनुष्य के हृदय-शहर में) प्रभु की महिमा के कीमती रत्नों का व्यापार होने लगता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
माइआ मोहु सभु दुखु है खोटा इहु वापारा राम ॥ कूड़ु बोलि बिखु खावणी बहु वधहि विकारा राम ॥ बहु वधहि विकारा सहसा इहु संसारा बिनु नावै पति खोई ॥ पड़ि पड़ि पंडित वादु वखाणहि बिनु बूझे सुखु न होई ॥ आवण जाणा कदे न चूकै माइआ मोह पिआरा ॥ माइआ मोहु सभु दुखु है खोटा इहु वापारा ॥२॥
मूलम्
माइआ मोहु सभु दुखु है खोटा इहु वापारा राम ॥ कूड़ु बोलि बिखु खावणी बहु वधहि विकारा राम ॥ बहु वधहि विकारा सहसा इहु संसारा बिनु नावै पति खोई ॥ पड़ि पड़ि पंडित वादु वखाणहि बिनु बूझे सुखु न होई ॥ आवण जाणा कदे न चूकै माइआ मोह पिआरा ॥ माइआ मोहु सभु दुखु है खोटा इहु वापारा ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभु दुखु = निरा दुख। खोटा = (आत्मिक जीवन में) घाटा डालने वाला। बोलि = बोल के। बिखु = (आत्मिक जीवन को खत्म करने वाली माया के मोह का) जहर। वधहि = बढ़ते हैं। सहसा = सहम। पति = इज्जत। वादु = झगड़ा, बहस। वखाणहि = उचारते हैं। न चूकै = नहीं समाप्त होता।2।
अर्थ: हे भाई! माया का मोह निरा दुख ही (पैदा करता) है (निरी माया की खातिर दौड़-भाग) आत्मिक जीवन में घाटा डालने वाला व्यापार है, (इस तरह) झूठ बोल बोल के (आत्मिक मौत लाने वाले मोह का) जहर खाया जाता है, (जिसके कारण मनुष्य के अंदर) अनेक विकार बढ़ते जाते हैं। अनेक विकार बढ़ते जाते हैं, ये जगत भी (निरा) सहम (का घर ही प्रतीत होता) है, परमात्मा के नाम से टूट के मनुष्य (लोक-परलोक में) इज्जत गवा लेता है।
जिस मनुष्य को सदा माया का मोह प्यारा लगता है उसके जनम-मरण का चक्र कभी समाप्त नहीं होता। हे भाई! माया का मोह निरा दुख ही (पैदा करता) है, (निरी माया की खातिर दौड़-भाग) आत्मिक जीवन में घाटा डालने वाला व्यापार है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
खोटे खरे सभि परखीअनि तितु सचे कै दरबारा राम ॥ खोटे दरगह सुटीअनि ऊभे करनि पुकारा राम ॥ ऊभे करनि पुकारा मुगध गवारा मनमुखि जनमु गवाइआ ॥ बिखिआ माइआ जिनि जगतु भुलाइआ साचा नामु न भाइआ ॥ मनमुख संता नालि वैरु करि दुखु खटे संसारा ॥ खोटे खरे परखीअनि तितु सचै दरवारा राम ॥३॥
मूलम्
खोटे खरे सभि परखीअनि तितु सचे कै दरबारा राम ॥ खोटे दरगह सुटीअनि ऊभे करनि पुकारा राम ॥ ऊभे करनि पुकारा मुगध गवारा मनमुखि जनमु गवाइआ ॥ बिखिआ माइआ जिनि जगतु भुलाइआ साचा नामु न भाइआ ॥ मनमुख संता नालि वैरु करि दुखु खटे संसारा ॥ खोटे खरे परखीअनि तितु सचै दरवारा राम ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभि = सारे। परखीअनि = परखे जाते हैं। तितु = उस में। तितु दरबारा = उस दरबार में। सुटीअनि = परे फेंके जाते हैं, रद्द किए जाते हैं। ऊभे = खड़े हुए। करनि = करते हैं। मुगध = मूर्ख। मनमुखि = अपने मन के पीछे चल के। बिखिआ = जहर। जिनि = जिस (माया) ने। भुलाइआ = गलत रास्ते पर डाल दिया। साचा = सदा कायम रहने वाला। भाइआ = पसंद आया। करि = करके। तितु सचै दरवारा = उस सदा कायम रहने वाले दरबार में।3।
अर्थ: हे भाई! बुरे और अच्छे सारे (जीव) उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा के दरबार में परखे जाते हैं। बुरे लोग तो दरबार में रद्द कर दिए जाते हैं, वे वहां खड़े हो के पुकार करते हैं। जिस मनुष्यों ने अपने मन के पीछे चल के अपना मानव जन्म गवा लिया, वह मूर्ख गवार (प्रभु की दरगाह में परे फेंके जाने पर) खड़े पुकार करते हैं (तरले-मिन्नतें करते हैं)। (आत्मिक जीवन को खत्म करने वाली) जिस जहर-माया ने जगत को गलत रास्ते पर डाल रखा है (उस में फंस के उनको) सदा कायम रहने वाला हरि-नाम अच्छा नहीं था लगा। (संत-जन ऐसे मनुष्यों को उपदेश तो करते हैं, पर) अपने मन के पीछे चलने वाला जगत सेंत-जनों के साथ वैर करके दुख सहेड़ता रहता है।
हे भाई! बुरे और अच्छे (सारे जीव) उस सदा कायम रहने वाले के दरबार में परखे जाते हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपि करे किसु आखीऐ होरु करणा किछू न जाई राम ॥ जितु भावै तितु लाइसी जिउ तिस दी वडिआई राम ॥ जिउ तिस दी वडिआई आपि कराई वरीआमु न फुसी कोई ॥ जगजीवनु दाता करमि बिधाता आपे बखसे सोई ॥ गुर परसादी आपु गवाईऐ नानक नामि पति पाई ॥ आपि करे किसु आखीऐ होरु करणा किछू न जाई ॥४॥४॥
मूलम्
आपि करे किसु आखीऐ होरु करणा किछू न जाई राम ॥ जितु भावै तितु लाइसी जिउ तिस दी वडिआई राम ॥ जिउ तिस दी वडिआई आपि कराई वरीआमु न फुसी कोई ॥ जगजीवनु दाता करमि बिधाता आपे बखसे सोई ॥ गुर परसादी आपु गवाईऐ नानक नामि पति पाई ॥ आपि करे किसु आखीऐ होरु करणा किछू न जाई ॥४॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: होरु = (उसकी रजा के उलट कोई) अन्य (काम)। जितु = जिस (काम) में। तितु = उस (काम) में।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘तिस दी’ में से शब्द ‘तिसु’ की ‘ु’ की मात्रा संबंधक ‘दी’ के कारण हटा दी गई है।
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वरीआमु = शूरवीर। फुसी = कमजोर। करमि = (जीव के किए) कर्म अनुसार। बिधाता = पैदा करने वाला। परसादी = कृपा से। आपु = स्वै भाव। नामि = नाम में (जुड़ के)। पति = इज्जत।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘आपि’ और ‘आपु’ में अंतर का ध्यान रखें।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (हे भाई! जीवों को ‘खोटे-खरे’ परमात्मा) खुद ही बनाता है। (किसी जीव के खोटे अथवा खरे होने का गिला) किसी के पास नहीं किया जा सकता। (प्रभु की रजा के उलट) और कुछ भी नहीं किया जा सकता। जिस काम में (जीवों को लगाने की प्रभु की) मर्जी होती है उस काम में लगा देता है, जैसे उसकी रजा होती है (वैसे करवाता है)। जैसे उस प्रभु की रजा होती है वैसे ही (जीवों से काम) करवाता है (अपने आप में) ना कोई जीव शूरवीर है ना ही कोई कमजोर है। जगत का सहारा दातार जो जीवों के किए कर्मों के अनुसार जीवों को पैदा करने वाला है वह स्वयं ही कृपा करता है (और जीवों को सही जीवन-राह बताता है)।
हे नानक! (कह: हे भाई!) गुरु की कृपा से ही स्वै भाव दूर किया जा सकता है (जिसने स्वै भाव दूर कर लिया, उसने) परमात्मा के नाम में जुड़ के (लोक-परलोक में) सम्मान पा लिया है। (हे भाई! जीवों को खोटे-खरे परमात्मा) खुद ही बनाता है (किसी जीव के खोटे या खरे होने का गिला) किसी के पास नहीं किया जा सकता। (प्रभु की रजा के उलट) और कुछ भी नहीं किया जा सकता।4।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ ॥ सचा सउदा हरि नामु है सचा वापारा राम ॥ गुरमती हरि नामु वणजीऐ अति मोलु अफारा राम ॥ अति मोलु अफारा सच वापारा सचि वापारि लगे वडभागी ॥ अंतरि बाहरि भगती राते सचि नामि लिव लागी ॥ नदरि करे सोई सचु पाए गुर कै सबदि वीचारा ॥ नानक नामि रते तिन ही सुखु पाइआ साचै के वापारा ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ ॥ सचा सउदा हरि नामु है सचा वापारा राम ॥ गुरमती हरि नामु वणजीऐ अति मोलु अफारा राम ॥ अति मोलु अफारा सच वापारा सचि वापारि लगे वडभागी ॥ अंतरि बाहरि भगती राते सचि नामि लिव लागी ॥ नदरि करे सोई सचु पाए गुर कै सबदि वीचारा ॥ नानक नामि रते तिन ही सुखु पाइआ साचै के वापारा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचा = सदा साथ निभने वाला। वणजीऐ = खरीदा जा सकता है। अफारा = बहुत। सचि वापारि = सदा स्थिर हरि के नाम स्मरण के व्यापार में। अंतरि = हृदय में। बाहरि = दुनिया के साथ कार्य व्यवहार करते हुए। लिव = लगन। सच = सदा स्थिर हरि नाम। सबदि = शब्द में। नामि = नाम में। साचै = सदा कायम रहने वाले प्रभु के।1।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा का नाम ही सदा साथ निभने वाला सौदा है व्यापार है। ये हरि नाम गुरु की मति पे चल कर कमाया जा सकता है, इसका मूल्य बहुत ही ज्यादा है (दुनिया का कोई भी पदार्थ इसकी बराबरी नहीं कर सकता)। सदा स्थिर प्रभु के नाम का व्यापार बहुत अनमोल है, जो मनुष्य इस व्यापार में लगते हैं वे भाग्यशाली हो जाते हैं। वे मनुष्य अंतरात्मे भक्ति रंग में रंगे रहते हैं, दुनिया के कार्य-व्यवहार करते हुए भी वे भक्ति रंग में रंगे रहते हैं, सदा-स्थिर हरि-नाम में उनकी लगन लगी रहती है।
पर, हे भाई! वही मनुष्य गुरु के शब्द द्वारा विचार करके सदा-स्थिर हरि-नाम सौदा हासिल करता है जिस पर परमात्मा मेहर की नजर करता है। हे नानक! (कह:) जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रंग में रंगे जाते हैं उन्होंने ही सदा-स्थिर प्रभु के नाम व्यापार में आत्मिक आनंद प्राप्त किया है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हंउमै माइआ मैलु है माइआ मैलु भरीजै राम ॥ गुरमती मनु निरमला रसना हरि रसु पीजै राम ॥ रसना हरि रसु पीजै अंतरु भीजै साच सबदि बीचारी ॥ अंतरि खूहटा अम्रिति भरिआ सबदे काढि पीऐ पनिहारी ॥ जिसु नदरि करे सोई सचि लागै रसना रामु रवीजै ॥ नानक नामि रते से निरमल होर हउमै मैलु भरीजै ॥२॥
मूलम्
हंउमै माइआ मैलु है माइआ मैलु भरीजै राम ॥ गुरमती मनु निरमला रसना हरि रसु पीजै राम ॥ रसना हरि रसु पीजै अंतरु भीजै साच सबदि बीचारी ॥ अंतरि खूहटा अम्रिति भरिआ सबदे काढि पीऐ पनिहारी ॥ जिसु नदरि करे सोई सचि लागै रसना रामु रवीजै ॥ नानक नामि रते से निरमल होर हउमै मैलु भरीजै ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भरीजै = भर जाती है, लिबड़ जाती है, मैला हो जाता है। रसना = जीभ (से)। पीजै = पीना चाहिए। अंतरु = अंदरूनी, हृदय (शब्द ‘अंतरु’ और ‘अंतरि’ में फर्क याद रखें)। अंतरि = अंदर, मन में। खूहटा = सुंदर सा कूँआ, चश्मा। अंम्रिति = अमृत से, आत्मिक जीवन देने वाले नाम जल से। पीऐ = पीई जाती है। पनिहारी = पानी भरने वाली। सचि = सदा स्थिर हरि नाम में। रवीजै = स्मरणा चाहिए। होर = बाकी की दुनिया।2।
अर्थ: हे भाई! अहंकार और माया (की ममता मनुष्य के आत्मिक जीवन को मैला करने वाली) मैल है, मनुष्य का मन माया (की ममता) की मैल से लिबड़ा रहता है। गुरु की मति पर चलने से मन पवित्र हो जाता है (इस वास्ते, हे भाई! गुरु की मति पर चल के) जीभ से परमात्मा का नाम-जल पीते रहना चाहिए। जीभ हरि-नाम-जल पीते रहना चाहिए, (इस नाम जल से) हृदय तरो-तर हो जाता है, और सदा-स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द से विचारवान हो जाता है।
हे भाई! आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल से भरा हुआ चश्मा (कुई) मनुष्य के अंदर ही है, जिस मनुष्य की तवज्जो गुरु के शब्द के द्वारा ये नाम-जल भरना जानती है वह मनुष्य (अंदर के चश्मे में से नाम-जल) निकाल के पीता रहता है।
(पर, हे भाई!) वही मनुष्य सदा-स्थिर हरि-नाम में लगता है जिस पर परमात्मा मेहर की निगाह करता है। (हे भाई!) जीभ से परमात्मा का नाम स्मरण करते रहना चाहिए। हे नानक! जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रंग में रंगे जाते हैं, वे पवित्र हो जाते हैं, बाकी की दुनिया अहंकार की मैल से लिबड़ी रहती है।2।
[[0571]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
पंडित जोतकी सभि पड़ि पड़ि कूकदे किसु पहि करहि पुकारा राम ॥ माइआ मोहु अंतरि मलु लागै माइआ के वापारा राम ॥ माइआ के वापारा जगति पिआरा आवणि जाणि दुखु पाई ॥ बिखु का कीड़ा बिखु सिउ लागा बिस्टा माहि समाई ॥ जो धुरि लिखिआ सोइ कमावै कोइ न मेटणहारा ॥ नानक नामि रते तिन सदा सुखु पाइआ होरि मूरख कूकि मुए गावारा ॥३॥
मूलम्
पंडित जोतकी सभि पड़ि पड़ि कूकदे किसु पहि करहि पुकारा राम ॥ माइआ मोहु अंतरि मलु लागै माइआ के वापारा राम ॥ माइआ के वापारा जगति पिआरा आवणि जाणि दुखु पाई ॥ बिखु का कीड़ा बिखु सिउ लागा बिस्टा माहि समाई ॥ जो धुरि लिखिआ सोइ कमावै कोइ न मेटणहारा ॥ नानक नामि रते तिन सदा सुखु पाइआ होरि मूरख कूकि मुए गावारा ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जोतकी = ज्योतिषी। सभि = सारे। कूकदे = ऊँचा ऊँचा बोल के (और लोगों को ही) सुनाते हैं। पहि = पास, साथ। अंतरि = (उनके) अंदर। जगति = जगत में। आवणि = आने मे। जाणि = जाने में। आवणि जाणि = जनम मरन के चक्र में। बिखु = जहर, आत्मिक मौत लाने वाला माया के मोह का जहर। सिउ = साथ। समाई = समा जाता है, गर्क हो जाता है, आत्मिक जीवन समाप्त कर लेता है। धुर = धुर दरगाह से। नामि = नाम में। होरि = बाकी के मनुष्य। कूकि = ऊँचा ऊँचा (और लोगों को) उपदेश कर करके। मुए = आत्मिक मौत मरते हैं।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘होरि’ है ‘होर’ का बहुवचन है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: पंडित और ज्योतिषी, ये सारे (ज्योतिषि आदि की पुस्तकें) पढ़-पढ़ के ऊँचा ऊँचा और लोगों को उपदेश करते रहते हैं, पर ये ऊँची आवाज में किसको सुनाते हैं? इनके अपने अंदर तो माया का मोह (प्रबल) है, (इनके अपने मन को तो माया की) मैल लगी रहती है, (इनके सारे उपदेश) माया के ही व्यापार हैं। (ऐसे मनुष्य को) जगत में (ये धर्म उपदेश) माया के व्यापार (की तरह ही) प्यारे हैं, (और लोगों को उपदेश करता है, पर स्वयं) जनम-मरन के चक्र में दुख पाता रहता है। (ऐसा मनुष्य सारी उम्र आत्मिक मौत लाने वाला मोह-) जहर का कीड़ा बना रहता है, इसी जहर से चिपका रहता है, इसी गंद में आत्मिक जीवन समाप्त कर लेता है। (परमात्मा ने ऐसे मनुष्य के पिछले किए कर्मों के अनुसार) जो कुछ धुर से (उसके माथे पर) लिख दिया है (जगत में आ के) ये वही कुछ कमाता रहता है। कोई मनुष्य (उसके माथे के उन लेखों को) मिटा नहीं सकता।
हे नानक! जो मनुष्य माया के नाम-रंग में रंगे रहते हैं वे सदा ही आनंद भोगते हैं, बाकी के वो मूर्ख हैं गवार हैं जो और लोगों को उपदेश कर करके खुद आत्मिक मौत सहेड़ लेते हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
माइआ मोहि मनु रंगिआ मोहि सुधि न काई राम ॥ गुरमुखि इहु मनु रंगीऐ दूजा रंगु जाई राम ॥ दूजा रंगु जाई साचि समाई सचि भरे भंडारा ॥ गुरमुखि होवै सोई बूझै सचि सवारणहारा ॥ आपे मेले सो हरि मिलै होरु कहणा किछू न जाए ॥ नानक विणु नावै भरमि भुलाइआ इकि नामि रते रंगु लाए ॥४॥५॥
मूलम्
माइआ मोहि मनु रंगिआ मोहि सुधि न काई राम ॥ गुरमुखि इहु मनु रंगीऐ दूजा रंगु जाई राम ॥ दूजा रंगु जाई साचि समाई सचि भरे भंडारा ॥ गुरमुखि होवै सोई बूझै सचि सवारणहारा ॥ आपे मेले सो हरि मिलै होरु कहणा किछू न जाए ॥ नानक विणु नावै भरमि भुलाइआ इकि नामि रते रंगु लाए ॥४॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मोहि = मोह में। सुधि = (आत्मिक जीवन की) समझ। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ कर। जाई = दूर हो जाती है। साचि = सदा स्थिर हरि नाम में। सचि = सदा स्थिर हरि नाम धन से। भरमि = भटकना में (पड़ के)। इकि = कई मनुष्य। लाए = लगा के।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘इकि’ है ‘इक/एक’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे भाई! माया के मोह में (इस मनुष्य का) मन रंगा जाता है, मोह में (फंस के उसको आत्मिक जीवन की) कोई समझ नहीं आती। अगर इस मन को गुरु की शरण पड़ के (नाम-रंग से) रंग लिया जाए, तो (इससे) माया के मोह का रंग उतर जाता है। (जब मनुष्य के मन से) माया के मोह का रंग उतर जाता है, तब (मनुष्य) सदा-स्थिर हरि नाम में लीन हो जाता है, सदा स्थिर हरि नाम धन से (उसके आत्मिक) खजाने भरे जाते हैं।
हे भाई! जो मनुष्य गुरु के सन्मुख रहता है वही (इस भेद को) समझता है। वह सदा-स्थिर हरि-नाम से अपने जीवन को सुंदर बना लेता है।
पर, हे भाई! जिस मनुष्य को परमात्मा खुद (अपने साथ) मिलाता है वही परमात्मा को मिल सकता है (परमात्मा की अपनी मेहर के अतिरिक्त) और कोई उपाय बताया नहीं जा सकता।
हे नानक! जगत, नाम के बिना भटकना में पड़ के गलत राह पर पड़ा रहता है। कई ऐसे भी हैं जो (प्रभु चरणों से) प्रीति जोड़ के प्रभु के नाम-रंग में रंगे रहते हैं।4।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ ॥ ए मन मेरिआ आवा गउणु संसारु है अंति सचि निबेड़ा राम ॥ आपे सचा बखसि लए फिरि होइ न फेरा राम ॥ फिरि होइ न फेरा अंति सचि निबेड़ा गुरमुखि मिलै वडिआई ॥ साचै रंगि राते सहजे माते सहजे रहे समाई ॥ सचा मनि भाइआ सचु वसाइआ सबदि रते अंति निबेरा ॥ नानक नामि रते से सचि समाणे बहुरि न भवजलि फेरा ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ ॥ ए मन मेरिआ आवा गउणु संसारु है अंति सचि निबेड़ा राम ॥ आपे सचा बखसि लए फिरि होइ न फेरा राम ॥ फिरि होइ न फेरा अंति सचि निबेड़ा गुरमुखि मिलै वडिआई ॥ साचै रंगि राते सहजे माते सहजे रहे समाई ॥ सचा मनि भाइआ सचु वसाइआ सबदि रते अंति निबेरा ॥ नानक नामि रते से सचि समाणे बहुरि न भवजलि फेरा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आवागउणु = (जगत में) आना और (जगत से) जाना, जनम मरन। संसारि = जगत (का मोह)। अंति = आखिर को। सचि = सदा कायम रहने वाले परमात्मा में (जुड़ने से)। निबेड़ा = (आवगवन का) खात्मा। सचा = सदा स्थिर रहने वाला प्रभु। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ने से। रंगि = प्रेम रंग में। राते = रंगे हुए। सहजे = आत्मिक अडोलता में। माते = मस्त। मनि = मन में। सचु = सदा स्थिर प्रभु। सबदि = गुरु के शब्द में। नामि = नाम में। बहुरि = दुबारा, फिर। भवजलि = संसार समुंदर में।1।
अर्थ: हे मेरे मन! जगत (का मोह जीव के वास्ते) जनम-मरन (के चक्कर लाता) है, आखिर सदा कायम रहने वाले परमात्मा में जुड़ने से (जनम-मरण के चक्कर का) खात्मा हो जाता है। जिस मनुष्य को सदा स्थिर रहने वाला प्रभु खुद ही बख्शता है उसको जगत में बार बार फेरा नहीं डालना पड़ता। उसको बार बार जनम मरण के चक्कर नहीं मिलते, सदा स्थिर हरि-नाम में रंगे जाते हैं, वे आत्मिक अडोलता में मस्त रहते हैं, और आत्मिक अडोलता के द्वारा ही परमात्मा में लीन हो जाते हैं।
हे मेरे मन! जिस मनुष्यों को सदा स्थिर रहने वाला प्रभु प्यारा लगने लग जाता है, जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु को अपने मन में बसा लेते हैं, जो मनुष्य गुरु के शब्द में रंगे जाते हैं, उनके जनम-मरण का आखिर खात्मा हो जाता है। हे नानक! प्रभु के नाम-रंग में रंगे हुए मनुष्य सदा-स्थिर प्रभु में लीन हो जाते हैं, उनको संसार-समुंदर में बार-बार फेरा नहीं डालना पड़ता।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
माइआ मोहु सभु बरलु है दूजै भाइ खुआई राम ॥ माता पिता सभु हेतु है हेते पलचाई राम ॥ हेते पलचाई पुरबि कमाई मेटि न सकै कोई ॥ जिनि स्रिसटि साजी सो करि वेखै तिसु जेवडु अवरु न कोई ॥ मनमुखि अंधा तपि तपि खपै बिनु सबदै सांति न आई ॥ नानक बिनु नावै सभु कोई भुला माइआ मोहि खुआई ॥२॥
मूलम्
माइआ मोहु सभु बरलु है दूजै भाइ खुआई राम ॥ माता पिता सभु हेतु है हेते पलचाई राम ॥ हेते पलचाई पुरबि कमाई मेटि न सकै कोई ॥ जिनि स्रिसटि साजी सो करि वेखै तिसु जेवडु अवरु न कोई ॥ मनमुखि अंधा तपि तपि खपै बिनु सबदै सांति न आई ॥ नानक बिनु नावै सभु कोई भुला माइआ मोहि खुआई ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभु = सारा, निरा। बरलु = पागलपन। दूजै भाइ = माया के मोह में। खुआई = गलत रास्ते पर पड़ी हुई है। हेतु = मोह। हेते = मोह में ही। पलचाई = उलझी हुई, फसी हुई। पुरबि = पहले जनम में। जिनि = जिस (कर्तार) ने। करि = कर के, माया का मोह रच के। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाला। तपि तपि = जल जल के। खपै = दुखी होता है। मोहि = मोह में।2।
अर्थ: माया का मोह पूरी तरह पागलपन है (जो दुनिया को चिपका हुआ है, दुनिया इस) माया के मोह में सही रास्ते से टूटती जा रही है। (ये मेरी) माँ (है, ये मेरा) पिता (है, ये मेरी स्त्री है, ये मेरा पुत्र है’ ये भी) निरा मोह है, इस मोह में ही दुनिया उलझी पड़ी है। पूबर्लि जनम में किए कर्मों के अनुसार (दुनिया संन्धियों के) मोह में फँसी रहती है, (अपनी किसी समझदारी-चतुराई से पूबर्लि कर्मों के संस्कारों को) कोई मनुष्य मिटा नहीं सकता। जिस कर्तार ने ये सृष्टि पैदा की है, वह यह माया का मोह रच के (तमाशा) देख रहा है (कोई उसके रास्ते पर रुकावट नहीं खड़ी कर सकता, क्योंकि) उसके बराबर का कोई और नहीं। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य माया के मोह में अंधा हो के (मोह में) जल-जल के दुखी होता है, गुरु के शब्द के बिना उसको शांति नहीं मिल सकती। हे नानक! परमात्मा के नाम के बिना हरेक जीव गलत रास्ते पर पड़ा हुआ है, माया के मोह के कारण सही जीवन-राह से टूटा हुआ है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
एहु जगु जलता देखि कै भजि पए हरि सरणाई राम ॥ अरदासि करीं गुर पूरे आगै रखि लेवहु देहु वडाई राम ॥ रखि लेवहु सरणाई हरि नामु वडाई तुधु जेवडु अवरु न दाता ॥ सेवा लागे से वडभागे जुगि जुगि एको जाता ॥ जतु सतु संजमु करम कमावै बिनु गुर गति नही पाई ॥ नानक तिस नो सबदु बुझाए जो जाइ पवै हरि सरणाई ॥३॥
मूलम्
एहु जगु जलता देखि कै भजि पए हरि सरणाई राम ॥ अरदासि करीं गुर पूरे आगै रखि लेवहु देहु वडाई राम ॥ रखि लेवहु सरणाई हरि नामु वडाई तुधु जेवडु अवरु न दाता ॥ सेवा लागे से वडभागे जुगि जुगि एको जाता ॥ जतु सतु संजमु करम कमावै बिनु गुर गति नही पाई ॥ नानक तिस नो सबदु बुझाए जो जाइ पवै हरि सरणाई ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देखि कै = देख के। करीं = मैं करता हूँ। वडाई = इज्जत। दाता = बख्शिशें करने वाला। अवरु = कोई और। जुगि जुगि एको = जो हरेक युग में एक खुद ही खुद है। जाता = गहरी सांझ डाली। जतु = काम-वासना रोकने का प्रयत्न। सतु = उच्च आचरण। संजमु = इन्द्रियों को वश में करने का यत्न। गति = ऊँची आत्मिक अवस्था।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘तिस नो’ में से शब्द ‘तिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण हटा दी गई है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे भाई! इस संसार को (विकारों में) जलता देख के (जो मनुष्य) दौड़ के परमात्मा की शरण जा पड़ते हैं (वे जलने से बच जाते हैं)। मैं (भी) पूरे गुरु के आगे अरजोई करता हूँ- मुझे (विकारों में जलने से) बचा ले, मुझे (ये) बड़प्पन बख्श। मुझे अपनी शरण में रख परमात्मा का नाम जपने की बड़ाई बख्श। ये दाति बख्शने की सामर्थ्य रखने वाला तेरे जितना और कोई नहीं। हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा की सेवा भक्ति में लगते हैं, वे बहुत भाग्यशाली हैं, वह उस परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल लेते हैं जो हरेक युग में एक स्वयं ही स्वयं है।
(हे भाई! जो कोई मनुष्य) जत सत संजम (आदि) कर्म करता है (उसका ये उद्यम व्यर्थ जाता है), गुरु की शरण पड़े बिना ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त नहीं हो सकती। हे नानक! जो मनुष्य परमात्मा की शरण जा पड़ता है, परमात्मा उसको गुरु का शब्द समझने की दाति बख्शता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जो हरि मति देइ सा ऊपजै होर मति न काई राम ॥ अंतरि बाहरि एकु तू आपे देहि बुझाई राम ॥ आपे देहि बुझाई अवर न भाई गुरमुखि हरि रसु चाखिआ ॥ दरि साचै सदा है साचा साचै सबदि सुभाखिआ ॥ घर महि निज घरु पाइआ सतिगुरु देइ वडाई ॥ नानक जो नामि रते सेई महलु पाइनि मति परवाणु सचु साई ॥४॥६॥
मूलम्
जो हरि मति देइ सा ऊपजै होर मति न काई राम ॥ अंतरि बाहरि एकु तू आपे देहि बुझाई राम ॥ आपे देहि बुझाई अवर न भाई गुरमुखि हरि रसु चाखिआ ॥ दरि साचै सदा है साचा साचै सबदि सुभाखिआ ॥ घर महि निज घरु पाइआ सतिगुरु देइ वडाई ॥ नानक जो नामि रते सेई महलु पाइनि मति परवाणु सचु साई ॥४॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देइ = देता है। देहि = तू देता है। बुझाई = समझ। न भाई = पसंद नहीं आती। दरि = दर से। साचै दरि = सदा स्थिर प्रभु के दर से। साचै सबदि = प्रभु की महिमा के शब्द के द्वारा। सुभाखिआ = महिमा करता है। घर महि = हृदय में। निज घरु = अपना असल घर, प्रभु की हजुरी। नामि = नाम में। सेई = वे लोग ही। पाइनि = पा लेते हैं। सचु = सदा स्थिर रहने वाला प्रभु। साई मति = वही बुद्धि।4।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा जो बुद्धि (मनुष्य को) देता है (उसके अंदर) वही मति प्रकट होती है। (प्रभु की दी हुई मति के बिना) और कोई मति (मनुष्य ग्रहण) नहीं (कर सकता)।
हे प्रभु! (हरेक जीव के) अंदर और बाहर सिर्फ तू ही तू बसता है, तू खुद ही जीव को समझ बख्शता है। (हे प्रभु!) तू खुद ही (जीव को) अक्ल देता है (तेरी दी हुई अक्ल के बिना) कोई और (अकल जीव को) पसंद ही नहीं आ सकती। (तभी तो, हे भाई!) गुरु की शरण पड़ने वाला मनुष्य परमात्मा के नाम का स्वाद चखता है। गुरु के शब्द के माध्यम से जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु की महिमा करता है, वह सदा-स्थिर प्रभु के दर पर सदा अडोल-चिक्त टिका रहता है। हे भाई! जिस मनुष्य को सतिगुरु बड़ाई देता है वह अपने हृदय में ही प्रभु की हजूरी हासिल कर लेता है।
हे नानक! जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रंग में रंगे जाते हैं, वह ही परमात्मा की हजूरी प्राप्त करते हैं, सदा स्थिर प्रभु उनकी वह (नाम स्मरण करने वाली) बुद्धि स्वीकार करता है।4।6।
[[0572]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ४ छंत ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
वडहंसु महला ४ छंत ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरै मनि मेरै मनि सतिगुरि प्रीति लगाई राम ॥ हरि हरि हरि हरि नामु मेरै मंनि वसाई राम ॥ हरि हरि नामु मेरै मंनि वसाई सभि दूख विसारणहारा ॥ वडभागी गुर दरसनु पाइआ धनु धनु सतिगुरू हमारा ॥ ऊठत बैठत सतिगुरु सेवह जितु सेविऐ सांति पाई ॥ मेरै मनि मेरै मनि सतिगुर प्रीति लगाई ॥१॥
मूलम्
मेरै मनि मेरै मनि सतिगुरि प्रीति लगाई राम ॥ हरि हरि हरि हरि नामु मेरै मंनि वसाई राम ॥ हरि हरि नामु मेरै मंनि वसाई सभि दूख विसारणहारा ॥ वडभागी गुर दरसनु पाइआ धनु धनु सतिगुरू हमारा ॥ ऊठत बैठत सतिगुरु सेवह जितु सेविऐ सांति पाई ॥ मेरै मनि मेरै मनि सतिगुर प्रीति लगाई ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मेरै मनि = मेरे मन में। सतिगुरि = गुरु ने। मेरै मंनि = मेरे मन में। सभि = सारे। विसारणहारा = दूर करने लायक। धनु धनु = धन्य धन्य, साराहनीय। सेवह = हम सेवा करते हैं। जितु = जिस के द्वारा। जितु सेविऐ = जिस सेवा से, जिसकी सेवा से। सतिगुर प्रीति = गुरु की प्रीति।1।
अर्थ: हे भाई! गुरु ने मेरे मन में (अपने चरणों की) प्रीति पैदा की है। गुरु ने मेरे मन में परमात्मा का नाम बसा दिया है। (गुरु ने) मेरे मन में (वह) हरि-नाम बसा दिया है जो सारे दुख दूर करने की सामर्थ्य वाला है। बड़े भाग्यों से मैंने सतिगुरु के दर्शन कर लिए हैं। मेरा गुरु बहुत ही सराहनीय है। अब मैं उठता-बैठता हर वक्त गुरु की बताई हुई सेवा करता हूँ जिस सेवा की इनायत से मैंने आत्मिक शांति हासिल कर ली है। हे भाई! मेरे मन में गुरु का प्यार पैदा हो गया है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ जीवा हउ जीवा सतिगुर देखि सरसे राम ॥ हरि नामो हरि नामु द्रिड़ाए जपि हरि हरि नामु विगसे राम ॥ जपि हरि हरि नामु कमल परगासे हरि नामु नवं निधि पाई ॥ हउमै रोगु गइआ दुखु लाथा हरि सहजि समाधि लगाई ॥ हरि नामु वडाई सतिगुर ते पाई सुखु सतिगुर देव मनु परसे ॥ हउ जीवा हउ जीवा सतिगुर देखि सरसे ॥२॥
मूलम्
हउ जीवा हउ जीवा सतिगुर देखि सरसे राम ॥ हरि नामो हरि नामु द्रिड़ाए जपि हरि हरि नामु विगसे राम ॥ जपि हरि हरि नामु कमल परगासे हरि नामु नवं निधि पाई ॥ हउमै रोगु गइआ दुखु लाथा हरि सहजि समाधि लगाई ॥ हरि नामु वडाई सतिगुर ते पाई सुखु सतिगुर देव मनु परसे ॥ हउ जीवा हउ जीवा सतिगुर देखि सरसे ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हउ = मैं। जीवा = जीऊँ, मुझे आत्मिक जीवन मिल जाता है, (मेरा मन) रस से भर जाता है। द्रिढ़ाए = (हृदय में) पक्का टिका देता है। जपि = जप के। विगसे = खिल उठता है। कमल = कमल का फूल। परगासे = खिलता है। नवं निधि = नौ निधियां, दुनिया के सारे नौ खजाने। सहजि = आत्मिक अडोलता में। समाधि = स्थिर तवज्जो, ध्यान। ते = से। परसे = परस, छू के।2।
अर्थ: हे भाई! गुरु के दर्शन करके मुझे आत्मिक जीवन मिल जाता है, (मेरा मन) रस से भर जाता है। गुरु मेरे मन में परमात्मा का नाम पक्का करके टिका देता है, (उस) हरि-नाम को जप-जप के मेरा मन खिला रहता है। परमात्मा का नाम जप-जप के मेरा हृदय कमल फूल की तरह खिल उठता है, हरि-नाम ढूँढ के (मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि) मैंने दुनिया के नौ खजाने हासिल कर लिए हैं। मेरे अंदर से अहंकार का रोग दूर हो गया है, मेरा सारा दुख उतर गया है, हरि-नाम ने आत्मिक अडोलता में मेरी तवज्जो स्थाई तौर पर जोड़ दी है। हे भाई! यह हरि-नाम (जो मेरे वास्ते बड़ी) इज्जत (है), मैंने गुरु से हासिल की है, गुर-देव (के चरणों) को छूह के मेरा मन आनंद का अनुभव करता है। हे भाई! गुरु के दर्शन करके मुझे आत्मिक जीवन मिल जाता है, (मेरा मन आनंद) रस से भर जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कोई आणि कोई आणि मिलावै मेरा सतिगुरु पूरा राम ॥ हउ मनु तनु हउ मनु तनु देवा तिसु काटि सरीरा राम ॥ हउ मनु तनु काटि काटि तिसु देई जो सतिगुर बचन सुणाए ॥ मेरै मनि बैरागु भइआ बैरागी मिलि गुर दरसनि सुखु पाए ॥ हरि हरि क्रिपा करहु सुखदाते देहु सतिगुर चरन हम धूरा ॥ कोई आणि कोई आणि मिलावै मेरा सतिगुरु पूरा ॥३॥
मूलम्
कोई आणि कोई आणि मिलावै मेरा सतिगुरु पूरा राम ॥ हउ मनु तनु हउ मनु तनु देवा तिसु काटि सरीरा राम ॥ हउ मनु तनु काटि काटि तिसु देई जो सतिगुर बचन सुणाए ॥ मेरै मनि बैरागु भइआ बैरागी मिलि गुर दरसनि सुखु पाए ॥ हरि हरि क्रिपा करहु सुखदाते देहु सतिगुर चरन हम धूरा ॥ कोई आणि कोई आणि मिलावै मेरा सतिगुरु पूरा ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आणि = ला के। हउ = मैं। देवा = देऊँ। तिसु = उसको। काटि = काट के। देई = मैं दूँ। मनि = मन में। बैरागु = मिलने की तमन्ना। बैरागी मनि = वैरागी मन में। मिलि गुर = गुरु को मिल के। दरसनि = (गुरु के) दर्शनों से। हरि हरि = हे हरि! हम = मुझे। धूरा = धल।3।
अर्थ: अगर कोई गुरमुख मुझे पूरा गुरु ला के मिला दे, मैं अपना मन अपना शरीर उसके हवाले कर दूँ, अपना शरीर काट के उसे दे दूँ। जो कोई गुरमुख मुझे गुरु के वचन सुनाए, मैं अपना मन काट के अपना तन काट के (मन और तन के अपनत्व का मोह काट के) उसके हवाले कर दूँ। मेरे उतावले हो रहे मन में गुरु के दर्शनों की तमन्ना पैदा हो रही है। गुरु को मिल के, गुरु के दर्शनों से मेरा मन सुख अनुभव करता है।
हे हरि! हे सुखदाते हरि! मेहर कर, मुझे पूरे गुरु के चरणों की धूल बख्श। (मेहर कर, कोई गुरमुख सज्जन) मुझे पूरा गुरु ला के मिला दे।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर जेवडु गुर जेवडु दाता मै अवरु न कोई राम ॥ हरि दानो हरि दानु देवै हरि पुरखु निरंजनु सोई राम ॥ हरि हरि नामु जिनी आराधिआ तिन का दुखु भरमु भउ भागा ॥ सेवक भाइ मिले वडभागी जिन गुर चरनी मनु लागा ॥ कहु नानक हरि आपि मिलाए मिलि सतिगुर पुरख सुखु होई ॥ गुर जेवडु गुर जेवडु दाता मै अवरु न कोई ॥४॥१॥
मूलम्
गुर जेवडु गुर जेवडु दाता मै अवरु न कोई राम ॥ हरि दानो हरि दानु देवै हरि पुरखु निरंजनु सोई राम ॥ हरि हरि नामु जिनी आराधिआ तिन का दुखु भरमु भउ भागा ॥ सेवक भाइ मिले वडभागी जिन गुर चरनी मनु लागा ॥ कहु नानक हरि आपि मिलाए मिलि सतिगुर पुरख सुखु होई ॥ गुर जेवडु गुर जेवडु दाता मै अवरु न कोई ॥४॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जेवडु = जितना, बराबर का। मै = मुझे। दानो = दानु। निरंजनु = (निर+अंजनु) माया के मोह की कालिख से रहित। जिनी = जिन्होंने। सेवक भाइ = सेवक वाली भावना से, सेवक वाले प्यार से। मिलि = मिल के।1।
अर्थ: हे भाई! गुरु के बराबर का दाता मुझे और कोई नहीं (दिखता) (क्योंकि) गुरु (उस परमात्मा के नाम का) दान बख्शता है जो सर्व-व्यापक है और जो माया के प्रभाव से परे है। (गुरु की कृपा से) जिस मनुष्यों ने परमात्मा का नाम स्मरण किया है, उनका (हरेक किस्म का) दुख, भ्रम और डर दूर हो गया। जिस भाग्यशाली मनुष्यों का मन गुरु के चरणों में जुड़ गया, वह सेवक भावना के द्वारा (परमात्मा में) मिल गए।
हे नानक! कह: परमातमा खुद ही (जीव को अपने साथ) मिलाता है, और, गुरु को मिल के (जीव के अंदर) आत्मिक आनंद पैदा होता है। हे भाई! गुरु के बराबर का दाता मुझे और कोई नहीं दिखता।4।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ४ ॥ हंउ गुर बिनु हंउ गुर बिनु खरी निमाणी राम ॥ जगजीवनु जगजीवनु दाता गुर मेलि समाणी राम ॥ सतिगुरु मेलि हरि नामि समाणी जपि हरि हरि नामु धिआइआ ॥ जिसु कारणि हंउ ढूंढि ढूढेदी सो सजणु हरि घरि पाइआ ॥ एक द्रिस्टि हरि एको जाता हरि आतम रामु पछाणी ॥ हंउ गुर बिनु हंउ गुर बिनु खरी निमाणी ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ४ ॥ हंउ गुर बिनु हंउ गुर बिनु खरी निमाणी राम ॥ जगजीवनु जगजीवनु दाता गुर मेलि समाणी राम ॥ सतिगुरु मेलि हरि नामि समाणी जपि हरि हरि नामु धिआइआ ॥ जिसु कारणि हंउ ढूंढि ढूढेदी सो सजणु हरि घरि पाइआ ॥ एक द्रिस्टि हरि एको जाता हरि आतम रामु पछाणी ॥ हंउ गुर बिनु हंउ गुर बिनु खरी निमाणी ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हंउ = मैं। खरी = बहुत। निमाणी = आजिज, निम्न सी, तुच्छ सी। जगजीवनु = जगत का जीवन, जगत को जिंद देने वाला। गुर मेलि = गुरु के मिलाप से। मेलि हरी = हरि के मिलाप में। नामि = नाम में। जपि = जपने से। जिसु कारणि = जिस (हरि सज्जन को मिलने) की खातिर। घरि = हृदय में। द्रिस्टि = दृष्टि, निगाह। एको = एक को जपो। जाता = पहचाना। आतम रामु = सर्व व्यापक प्रभु।1।
अर्थ: गुरु के बिना मैं बहुत ही तुच्छ हूँ। (जब गुरु मिल गया तब मुझे) जगत-जीवन दातार प्रभु (मिल गया), गुरु के मिलाप की इनायत से मैं (जगजीवन प्रभु में) लीन हो गई। (जब) गुरु (मिला) तब मैं परमात्मा के मिलाप में परमात्मा के नाम में लीन हो गई, मैंने परमात्मा का नाम जपना आरम्भ कर दिया, नाम आराधना शुरू कर दिया। जिस सज्जन प्रभु को मिलने के लिए मैं इतनी तलाश कर रही थी उस सज्जन हरि को मैंने अपने दिल में पा लिया। मैंने एक निगाह से एक परमात्मा को (हर जगह बसता) समझ लिया, मैंने सर्व-व्यापक राम को पहचान लिया। गुरु के बगैर मैं (पहले) बहुत ही छोटी थी (आजिज थी)।1।
[[0573]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिना सतिगुरु जिन सतिगुरु पाइआ तिन हरि प्रभु मेलि मिलाए राम ॥ तिन चरण तिन चरण सरेवह हम लागह तिन कै पाए राम ॥ हरि हरि चरण सरेवह तिन के जिन सतिगुरु पुरखु प्रभु ध्याइआ ॥ तू वडदाता अंतरजामी मेरी सरधा पूरि हरि राइआ ॥ गुरसिख मेलि मेरी सरधा पूरी अनदिनु राम गुण गाए ॥ जिन सतिगुरु जिन सतिगुरु पाइआ तिन हरि प्रभु मेलि मिलाए ॥२॥
मूलम्
जिना सतिगुरु जिन सतिगुरु पाइआ तिन हरि प्रभु मेलि मिलाए राम ॥ तिन चरण तिन चरण सरेवह हम लागह तिन कै पाए राम ॥ हरि हरि चरण सरेवह तिन के जिन सतिगुरु पुरखु प्रभु ध्याइआ ॥ तू वडदाता अंतरजामी मेरी सरधा पूरि हरि राइआ ॥ गुरसिख मेलि मेरी सरधा पूरी अनदिनु राम गुण गाए ॥ जिन सतिगुरु जिन सतिगुरु पाइआ तिन हरि प्रभु मेलि मिलाए ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिन = जिन्होंने। मेलि = मेल में, अपने चरणों के मिलाप में। सरेवह = हम सेवा करते हैं, हम सेवा करने को तैयार हैं। लागह = हम लगते हैं, हम लगने को तैयार हैं। कै पाए = के चरणों में। हरि हरि = हे हरि! ध्याइआ = ध्याया, आराधा, दिल में बसाया। अंतरजामी = दिल की जानने वाला। सरधा = तमन्ना। पूरि = पूरी कर। हरि राइआ = हे प्रभु बाहशाह! गुरसिख मेलि = गुरसिखों के मिलाप में। पूरी = पूरी हो सकती है। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। गाए = गाता है।2।
अर्थ: हे भाई! जिस (भाग्यशालियों ने) गुरु को पा लिया, उन्हें हरि-प्रभु अपने चरणों में जोड़ लेता है। मैं उनके चरणों की सेवा करने को तैयार हूँ, उनके चरण लगने को तैयार हूँ। हे हरि! जिस मनुष्यों ने गुरु को अपने हृदय में बसा लिया है (तुझे) प्रभु को दिल में टिका लिया है, मैं उनकी सेवा करनी चाहता हूँ। हे प्रभु पातशाह! तू बड़ा दातार है, तू सबके दिल की जानने वाला है, मेरी ये चाहत पूरी कर।
हे भाई! मेरी ये चाहत गुरसिखों की संगति में पूरी हो सकती है (जिसको गुरसिखों की संगति प्राप्त होती है, वह) हर वक्त परमात्मा के गुण गाने लग जाता है। जिस (भाग्यशालियों) ने गुरु पा लिया, उन्हें हरि-प्रभु अपने चरणों में जोड़ लेता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हंउ वारी हंउ वारी गुरसिख मीत पिआरे राम ॥ हरि नामो हरि नामु सुणाए मेरा प्रीतमु नामु अधारे राम ॥ हरि हरि नामु मेरा प्रान सखाई तिसु बिनु घड़ी निमख नही जीवां ॥ हरि हरि क्रिपा करे सुखदाता गुरमुखि अम्रितु पीवां ॥ हरि आपे सरधा लाइ मिलाए हरि आपे आपि सवारे ॥ हंउ वारी हंउ वारी गुरसिख मीत पिआरे ॥३॥
मूलम्
हंउ वारी हंउ वारी गुरसिख मीत पिआरे राम ॥ हरि नामो हरि नामु सुणाए मेरा प्रीतमु नामु अधारे राम ॥ हरि हरि नामु मेरा प्रान सखाई तिसु बिनु घड़ी निमख नही जीवां ॥ हरि हरि क्रिपा करे सुखदाता गुरमुखि अम्रितु पीवां ॥ हरि आपे सरधा लाइ मिलाए हरि आपे आपि सवारे ॥ हंउ वारी हंउ वारी गुरसिख मीत पिआरे ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हंउ = मैं। वारी = सदके, कुर्बान। नामो = नाम ही। अधारे = आसरा। प्रान सुखाई = प्राण का साथी। निमख = आँख झपकने जितना समय। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख हो के। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल। आपे = खुद ही। सरधा = श्रद्धा, निश्चय, चाहत, तमन्ना। सवारे = जीवन सोहाना बनाता है।3।
अर्थ: मैं उस प्यारे मित्र गरासिख से सदके जाता हूँ कुर्बान जाता हूँ, जो मुझे सदैव परमात्मा का नाम सुनाता रहे। परमात्मा का नाम ही मेरा मित्र है, (मेरी जिंदगी का) आसरा है परमात्मा का नाम मेरी जीवात्मा का साथी है, उस (नाम) के बिना मैं एक घड़ी भर आँख झपकने जितने समय के लिए भी नहीं रह सकता। सुखों को देने वाला प्रभु अगर मेहर करे, तो ही मैं गुरु के सन्मुख रहके आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल पी सकता हूँ।
हे भाई! परमात्मा स्वयं ही अपने (मिलाप की) चाहत पैदा करता है खुद ही (अपने चरणों में) जोड़ता है। परमात्मा स्वयं ही (अपना नाम दे के मनुष्य का जीवन) सुंदर बनाता है। मैं गुरु के सिख से, प्यारे मित्र से सदके जाता हूँ, कुर्बान जाता हूँ।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि आपे हरि आपे पुरखु निरंजनु सोई राम ॥ हरि आपे हरि आपे मेलै करै सो होई राम ॥ जो हरि प्रभ भावै सोई होवै अवरु न करणा जाई ॥ बहुतु सिआणप लइआ न जाई करि थाके सभि चतुराई ॥ गुर प्रसादि जन नानक देखिआ मै हरि बिनु अवरु न कोई ॥ हरि आपे हरि आपे पुरखु निरंजनु सोई ॥४॥२॥
मूलम्
हरि आपे हरि आपे पुरखु निरंजनु सोई राम ॥ हरि आपे हरि आपे मेलै करै सो होई राम ॥ जो हरि प्रभ भावै सोई होवै अवरु न करणा जाई ॥ बहुतु सिआणप लइआ न जाई करि थाके सभि चतुराई ॥ गुर प्रसादि जन नानक देखिआ मै हरि बिनु अवरु न कोई ॥ हरि आपे हरि आपे पुरखु निरंजनु सोई ॥४॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आपे = खुद ही। पुरखु = सवै व्यापक। निरंजनु = (निर+अंजन) माया के प्रभाव से रहित। प्रभ भावै = प्रभु को अच्छा लगता है। अवरु = कुछ और। सभि = सारे। प्रसादि = कृपा से।4।
अर्थ: हे भाई! सवै-व्यापक और माया के प्रभाव से रहित परमात्मा (सब कुछ करने के लायक) खुद ही खुद है। वह परमात्मा स्वयं ही (जीवों को अपने चरणों में) मिलाता है, जो कुछ वह करता है वही होता है। हे भाई! जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है वही होता है (उसकी रजा के उलट) और कुछ भी नहीं किया जा सकता।
हे दास नानक! (कह:) मैंने गुरु की कृपा से (उस परमात्मा के) दर्शन किए हैं। मुझे परमात्मा के बिना और कोई (सहारा) नहीं (दिखाई देता)। हे भाई! सर्व-व्यापक और माया के प्रभाव से रहित परमात्मा स्वयं ही (सब कुछ करने योग्य) है।4।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ४ ॥ हरि सतिगुर हरि सतिगुर मेलि हरि सतिगुर चरण हम भाइआ राम ॥ तिमर अगिआनु गवाइआ गुर गिआनु अंजनु गुरि पाइआ राम ॥ गुर गिआन अंजनु सतिगुरू पाइआ अगिआन अंधेर बिनासे ॥ सतिगुर सेवि परम पदु पाइआ हरि जपिआ सास गिरासे ॥ जिन कंउ हरि प्रभि किरपा धारी ते सतिगुर सेवा लाइआ ॥ हरि सतिगुर हरि सतिगुर मेलि हरि सतिगुर चरण हम भाइआ ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ४ ॥ हरि सतिगुर हरि सतिगुर मेलि हरि सतिगुर चरण हम भाइआ राम ॥ तिमर अगिआनु गवाइआ गुर गिआनु अंजनु गुरि पाइआ राम ॥ गुर गिआन अंजनु सतिगुरू पाइआ अगिआन अंधेर बिनासे ॥ सतिगुर सेवि परम पदु पाइआ हरि जपिआ सास गिरासे ॥ जिन कंउ हरि प्रभि किरपा धारी ते सतिगुर सेवा लाइआ ॥ हरि सतिगुर हरि सतिगुर मेलि हरि सतिगुर चरण हम भाइआ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हरि = हे हरि! मेलि = मिलाप में। सतिगुर मेलि = सतिगुरु के मिलाप में (रख), गुरु के चरणों में रख। हम = मुझे, हमें। भाइआ = अच्छे लगते हैं। तिमर = अंधेरा। अगिआनु = बेसमझी, आत्मिक जीवन की ओर से अज्ञानता। गिआनु = ज्ञान, आत्मिक जीवन की समझ। अंजनु = सुरमा। गुरि = गुरु के द्वारा। सतिगुरु = गुरु के माध्यम से। अंधेर = अंधकार। सेवि = सेवा करके। परम पदु = सबसे ऊँचा दर्जा। सास गिरासे = हरेक सांस और ग्रास से। प्रभि = प्रभु ने। ते = वे लोग।1।
अर्थ: हे हरि! मुझे गुरु के चरणों में रख, मुझे गुरु के चरणों में रख। गुरु के चरण मुझे प्यारे लगते हैं। (जिस मनुष्य ने) गुरु के माध्यम से आत्मिक जीवन की सूझ (का) अंजन हासिल कर लिया, (उसने अपने अंदर से) आत्मिक जीवन की ओर से बेसमझी (अज्ञानता का) अंधकार दूर कर लिया।
जिस मनुष्य ने गुरु से ज्ञान का सुरमा ले लिया उस मनुष्य के अज्ञान के अंधेरे नाश हो जाते हैं। गुरु की बताई सेवा करके वह मनुष्य सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लेता है, वह मनुष्य हरेक सांस से हरेक ग्रास से परमात्मा का नाम जपता रहता है।
हे भाई! हरि-प्रभु ने जिस मनुष्यों पर मेहर की, उनको उसने गुरु सेवा में जोड़ दिया। हे हरि! मुझे गुरु चरणों में रख, गुरु के चरणों में रख, गुरु के चरण मुझे प्यारे लगते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरा सतिगुरु मेरा सतिगुरु पिआरा मै गुर बिनु रहणु न जाई राम ॥ हरि नामो हरि नामु देवै मेरा अंति सखाई राम ॥ हरि हरि नामु मेरा अंति सखाई गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ ॥ जिथै पुतु कलत्रु कोई बेली नाही तिथै हरि हरि नामि छडाइआ ॥ धनु धनु सतिगुरु पुरखु निरंजनु जितु मिलि हरि नामु धिआई ॥ मेरा सतिगुरु मेरा सतिगुरु पिआरा मै गुर बिनु रहणु न जाई ॥२॥
मूलम्
मेरा सतिगुरु मेरा सतिगुरु पिआरा मै गुर बिनु रहणु न जाई राम ॥ हरि नामो हरि नामु देवै मेरा अंति सखाई राम ॥ हरि हरि नामु मेरा अंति सखाई गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ ॥ जिथै पुतु कलत्रु कोई बेली नाही तिथै हरि हरि नामि छडाइआ ॥ धनु धनु सतिगुरु पुरखु निरंजनु जितु मिलि हरि नामु धिआई ॥ मेरा सतिगुरु मेरा सतिगुरु पिआरा मै गुर बिनु रहणु न जाई ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नामो = नाम ही। अंति = आखिरी समय। सखाई = मित्र। गुरि = गुरु ने। सतिगुरि = सतिगुरु ने। कलत्र = स्त्री। बेली = मददगार। नामि = नाम ने। जितु = जिस में। मिलि = मिल के।2।
अर्थ: हे भाई! मुझे मेरा गुरु बहुत प्यारा लगता है, गुरु के बिना मै रह नहीं सकता। गुरु मुझे हरि-नाम देता है जो आखिरी वक्त में मेरा साथी बनेगा। गुरु ने वह हरि-नाम मेरे दिल में पक्का कर दिया है जो अंत समय मेरा मित्र बनने वाला है, जहाँ पे पुत्र, स्त्री कोई भी मददगार नहीं बनता, वहाँ हरि-नाम ने ही (जीव को बिपता से) छुड़वाना है।
धन्य है गुरु, गुरु निर्लिप परमात्मा का रूप है, उस गुरु में लीन हो के मैं परमात्मा का नाम स्मरण करता हूँ। हे भाई! मुझे गुरु बहुत प्यारा लगता है, गुरु के बिना मैं रह नहीं सकता।2।
[[0574]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनी दरसनु जिनी दरसनु सतिगुर पुरख न पाइआ राम ॥ तिन निहफलु तिन निहफलु जनमु सभु ब्रिथा गवाइआ राम ॥ निहफलु जनमु तिन ब्रिथा गवाइआ ते साकत मुए मरि झूरे ॥ घरि होदै रतनि पदारथि भूखे भागहीण हरि दूरे ॥ हरि हरि तिन का दरसु न करीअहु जिनी हरि हरि नामु न धिआइआ ॥ जिनी दरसनु जिनी दरसनु सतिगुर पुरख न पाइआ ॥३॥
मूलम्
जिनी दरसनु जिनी दरसनु सतिगुर पुरख न पाइआ राम ॥ तिन निहफलु तिन निहफलु जनमु सभु ब्रिथा गवाइआ राम ॥ निहफलु जनमु तिन ब्रिथा गवाइआ ते साकत मुए मरि झूरे ॥ घरि होदै रतनि पदारथि भूखे भागहीण हरि दूरे ॥ हरि हरि तिन का दरसु न करीअहु जिनी हरि हरि नामु न धिआइआ ॥ जिनी दरसनु जिनी दरसनु सतिगुर पुरख न पाइआ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सतिगुर दरसनु = गुरु के दर्शन। निहफलु = बिना फायदे के। सभु = सारे। ब्रिथा = व्यर्थ। ते = वे लोग (बहुवचन)। साकत = ईश्वर से टूटे हुए। मुए = आत्मिक मौत मर गए। मरि = आत्मिक मौत का संताप ले के। झूरे = दुखी होते रहे। घरि होदै रतनि = घर में रत्न होते हुए। भूखे = तृष्णा के अधीन। करीअहु = तुम ना करना।3।
अर्थ: हे भाई! जिस मनुष्यों ने गुरु महापुरुष के दर्शन नहीं किए, उनका जन्म व्यर्थ गया, उन्होंने सारा जीवन बे-अर्थ गवा लिया। उन्होंने अपना जनम अकारथ गवा लिया, परमात्मा से टूटे हुए वे मनुष्य आत्मिक मौत मर गए, आत्मिक मौत सहेड़ के वे (सारी उम्र) दुखी ही रहे। हृदय-गृह में कीमती हरि-नाम होते हुए भी वे बद्-नसीब मरूँ-मरूँ करते रहे, और, परमात्मा से विछुड़े रहे।
हे भाई! जिस मनुष्यों ने परमात्मा का नाम नहीं स्मरण किया, जिन्होंने गुरु महापुरुष के दर्शन नहीं किए, खुदा के लिए तुम (भी) उनके दर्शन ना करना।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हम चात्रिक हम चात्रिक दीन हरि पासि बेनंती राम ॥ गुर मिलि गुर मेलि मेरा पिआरा हम सतिगुर करह भगती राम ॥ हरि हरि सतिगुर करह भगती जां हरि प्रभु किरपा धारे ॥ मै गुर बिनु अवरु न कोई बेली गुरु सतिगुरु प्राण हम्हारे ॥ कहु नानक गुरि नामु द्रिड़्हाइआ हरि हरि नामु हरि सती ॥ हम चात्रिक हम चात्रिक दीन हरि पासि बेनंती ॥४॥३॥
मूलम्
हम चात्रिक हम चात्रिक दीन हरि पासि बेनंती राम ॥ गुर मिलि गुर मेलि मेरा पिआरा हम सतिगुर करह भगती राम ॥ हरि हरि सतिगुर करह भगती जां हरि प्रभु किरपा धारे ॥ मै गुर बिनु अवरु न कोई बेली गुरु सतिगुरु प्राण हम्हारे ॥ कहु नानक गुरि नामु द्रिड़्हाइआ हरि हरि नामु हरि सती ॥ हम चात्रिक हम चात्रिक दीन हरि पासि बेनंती ॥४॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चात्रिक = पपीहा। हम = हम लोग। दीन = निमाणे। गुर मिलि = गुरु को मिल के। मेलि = मिला। करह = हम करें, मैं करूँगा। जां = जब। प्राण हमारे = मेरे प्राण। गुरि = गुरु ने। सती = सति, सदा कायम रहने वाला।4।
अर्थ: (हे भाई! परमात्मा हमारा बादल है) हम निमाणे से (तुच्छ से) पपीहे हैं (मैं छोटा सा पपीहा हूँ), मैं अदना सा पपीहा हूँ, मैं परमात्मा के पास विनती करता हूँ कि मुझे मेरा प्यारा गुरु मिला, गुरु सतिगुरु को मिल के मैं परमात्मा की भक्ति करूँगा। हे भाई! गुरु को मिल के परमात्मा की भक्ति हम तभी कर सकते हैं जब परमात्मा कृपा करता है। गुरु के बिना मुझे और कोई मददगार नहीं दिखाई देता, गुरु ही मेरी जिंदगी (का आसरा) है।
हे नानक! (कह:) गुरु ने ही परमात्मा के सदा कायम रहने वाला नाम (मेरे) दिल में पक्का किया है। मैं पपीहा हूँ (परमात्मा मेरा बादल है) मैं परमात्मा के पास विनती करता हूँ (कि मुझे गुरु मिला दे)।4।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ४ ॥ हरि किरपा हरि किरपा करि सतिगुरु मेलि सुखदाता राम ॥ हम पूछह हम पूछह सतिगुर पासि हरि बाता राम ॥ सतिगुर पासि हरि बात पूछह जिनि नामु पदारथु पाइआ ॥ पाइ लगह नित करह बिनंती गुरि सतिगुरि पंथु बताइआ ॥ सोई भगतु दुखु सुखु समतु करि जाणै हरि हरि नामि हरि राता ॥ हरि किरपा हरि किरपा करि गुरु सतिगुरु मेलि सुखदाता ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ४ ॥ हरि किरपा हरि किरपा करि सतिगुरु मेलि सुखदाता राम ॥ हम पूछह हम पूछह सतिगुर पासि हरि बाता राम ॥ सतिगुर पासि हरि बात पूछह जिनि नामु पदारथु पाइआ ॥ पाइ लगह नित करह बिनंती गुरि सतिगुरि पंथु बताइआ ॥ सोई भगतु दुखु सुखु समतु करि जाणै हरि हरि नामि हरि राता ॥ हरि किरपा हरि किरपा करि गुरु सतिगुरु मेलि सुखदाता ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हरि = हे हरि! मेलि = मिला। सुखदाता = आत्मिक आनंद देने वाला (गुरु)। हम पूछह = हम पूछते हैं, मैं पूछूँगा। हरि बाता = परमात्मा की महिमा की बातें। जिनि = जिस (गुरु) ने। पाइ लगह = हम पैरों को छूते हैं, मैं पाँव लगूँगा। करह = हम करते हैं, मैं करूँगा। गुरि = गुरु ने। पंथु = (जीवन का सही) रास्ता। सोई = वह (गुरु) ही। समतु = एक जैसा, बराबर। नामि = नाम में।1।
अर्थ: हे हरि! मेहर कर, मुझे आत्मिक आनंद देने वाला गुरु मिला, मैं गुरु से परमात्मा की महिमा की बीतें पूछा करूँगा। जिस गुरु ने परमात्मा का अमूल्य नाम-रत्न हासिल किया हुआ है उस गुरु से मैं परमात्मा की महिमा की बातें किया करूँगा। जिस गुरु ने (गलत रास्ते पर जा रहे जगत को जीवन का सही) रास्ता बताया है, मैं सदा ही उस गुरु के चरणों में लगूँगा, मैं उस गुरु के आगे विनती करूँगा (कि वह मुझे भी सही जीवन-राह बताए)।
वह (गुरु) ही (दरअसल) भक्त है, गुरु दुख और सुख को एक समान करके जानता है, गुरु सदा परमात्मा के नाम-रंग में रंगा रहता है। हे हरि! मेहर कर, मुझे आत्मिक आनंद देने वाला गुरु मिला।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुणि गुरमुखि सुणि गुरमुखि नामि सभि बिनसे हंउमै पापा राम ॥ जपि हरि हरि जपि हरि हरि नामु लथिअड़े जगि तापा राम ॥ हरि हरि नामु जिनी आराधिआ तिन के दुख पाप निवारे ॥ सतिगुरि गिआन खड़गु हथि दीना जमकंकर मारि बिदारे ॥ हरि प्रभि क्रिपा धारी सुखदाते दुख लाथे पाप संतापा ॥ सुणि गुरमुखि सुणि गुरमुखि नामु सभि बिनसे हंउमै पापा ॥२॥
मूलम्
सुणि गुरमुखि सुणि गुरमुखि नामि सभि बिनसे हंउमै पापा राम ॥ जपि हरि हरि जपि हरि हरि नामु लथिअड़े जगि तापा राम ॥ हरि हरि नामु जिनी आराधिआ तिन के दुख पाप निवारे ॥ सतिगुरि गिआन खड़गु हथि दीना जमकंकर मारि बिदारे ॥ हरि प्रभि क्रिपा धारी सुखदाते दुख लाथे पाप संतापा ॥ सुणि गुरमुखि सुणि गुरमुखि नामु सभि बिनसे हंउमै पापा ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु के माध्यम से, गुरु की शरण पड़ के। नामि = नाम से। सभि = सारे। लथिअड़े = उतर गए। जगि = जगत में। तापा = दुख-कष्ट। निवारे = दूर कर देता है। सतिगुरि = गुरु ने। खड़गु = खण्डा, तलवार। हथि = हाथ में। कंकर = किंकर, सेवक। मारि = मार के। बिदारे = नाश कर देता है, चीर दिए। प्रभि = प्रभु ने। संतापा = कष्ट।2।
अर्थ: हे भाई! गुरु की शरण पड़ कर (परमात्मा का नाम) सुन, (जो मनुष्य नाम सुनता है) नाम के द्वारा उसका अहंकार आदि सारे पाप नाश हो जाते हैं। हे भाई! सदा परमात्मा का नाम जपा कर, जगत में (जितने भी) दुख-कष्ट (है वे सारे) उतर जाते हैं।
जिस मनुष्यों ने परमात्मा का नाम स्मरण किया है, (नाम) उनके सारे दुख-पाप दूर कर देता है। गुरु ने (जिस मनुष्य के) हाथ में आत्मिक जीवन की सूझ की तलवार पकड़ा दी उसने यमराज के दूत खत्म कर डाले (अर्थात, मौत का आत्मिक मौत का खतरा समाप्त कर दिया)।
सुखों के दाते हरि-प्रभु ने जिस मनुष्य पे मेहर की, उसके सारे दुख-पाप-कष्ट उतर गए। हे भाई! गुरु की शरण पड़ के परमात्मा का नाम सुना कर (जो सुनता है उसके) अहंकार आदि सारे पाप नाश हो जाते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जपि हरि हरि जपि हरि हरि नामु मेरै मनि भाइआ राम ॥ मुखि गुरमुखि मुखि गुरमुखि जपि सभि रोग गवाइआ राम ॥ गुरमुखि जपि सभि रोग गवाइआ अरोगत भए सरीरा ॥ अनदिनु सहज समाधि हरि लागी हरि जपिआ गहिर ग्मभीरा ॥ जाति अजाति नामु जिन धिआइआ तिन परम पदारथु पाइआ ॥ जपि हरि हरि जपि हरि हरि नामु मेरै मनि भाइआ ॥३॥
मूलम्
जपि हरि हरि जपि हरि हरि नामु मेरै मनि भाइआ राम ॥ मुखि गुरमुखि मुखि गुरमुखि जपि सभि रोग गवाइआ राम ॥ गुरमुखि जपि सभि रोग गवाइआ अरोगत भए सरीरा ॥ अनदिनु सहज समाधि हरि लागी हरि जपिआ गहिर ग्मभीरा ॥ जाति अजाति नामु जिन धिआइआ तिन परम पदारथु पाइआ ॥ जपि हरि हरि जपि हरि हरि नामु मेरै मनि भाइआ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मेरै मनि = मेरे मन में। भाइआ = अच्छा लगा। मुखि = मुंह से। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ के। सभि = सारे। अरोगत = आरोग्य, निरोग। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। सहज = आत्मिक अडोलता। गहिर = गहरा। गंभीर = बड़े जिगरे वाला। अजाति = नीच जाति। परम = सबसे ऊँचा।3।
अर्थ: हे भाई! सदा परमात्मा का नाम जपा कर, मेरे मन को (तो) परमात्मा का नाम प्यारा लग रहा है। हे भाई! गुरु की शरण पड़ कर मुंह से हरि-नाम जपा कर, ये हरि-नाम सारे रोग दूर कर देता है। गुरु के द्वारा हरि-नाम जपा कर, ये हरि नाम सारे रोग दूर कर देता है, शरीर निरोग हो जाता है। गहरे और बड़े जिगरे वाला हरि का नाम जपने से हर वक्त आत्मिक अडोलता में तवज्जो जुड़ी रहती है। ऊँची जाति के हों चाहे नीच जाति के, जिन्होंने हरि-नाम स्मरण किया है उन्होंने सबसे श्रेष्ठ नाम-पदार्थ हासिल कर लिया है।
हे भाई! सदा परमात्मा का नाम जपा कर। मेरे मन को (तो) परमात्मा का नाम प्यारा लग रहा है।3।
[[0575]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि धारहु हरि धारहु किरपा करि किरपा लेहु उबारे राम ॥ हम पापी हम पापी निरगुण दीन तुम्हारे राम ॥ हम पापी निरगुण दीन तुम्हारे हरि दैआल सरणाइआ ॥ तू दुख भंजनु सरब सुखदाता हम पाथर तरे तराइआ ॥ सतिगुर भेटि राम रसु पाइआ जन नानक नामि उधारे ॥ हरि धारहु हरि धारहु किरपा करि किरपा लेहु उबारे राम ॥४॥४॥
मूलम्
हरि धारहु हरि धारहु किरपा करि किरपा लेहु उबारे राम ॥ हम पापी हम पापी निरगुण दीन तुम्हारे राम ॥ हम पापी निरगुण दीन तुम्हारे हरि दैआल सरणाइआ ॥ तू दुख भंजनु सरब सुखदाता हम पाथर तरे तराइआ ॥ सतिगुर भेटि राम रसु पाइआ जन नानक नामि उधारे ॥ हरि धारहु हरि धारहु किरपा करि किरपा लेहु उबारे राम ॥४॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हरि = हे हरि! लेहु उबारे = उबार लो, (विकारों से) बचा ले। निरगुण = गुणहीन। दीन = आजिज। दैआल = हे दया के घर! दुख भंजन = दुखों का नाश करने वाला। पाथर = कठोर चिक्त। तराइआ = तेरे पार उतारे हुए। सतिगुर भेटि = गुरु को मिल के। नामि = नाम ने। उधारे = पार लंघा लिए।4।
अर्थ: हे हरि! कृपा कर, (हमें विकारों से) बचा ले। हम पापी हैं, गुणहीन हैं, दीन हैं, (पर फिर भी) तेरे हैं। हे दया के घर हरि! हम विकारी हैं, गुणों से हीन हैं, (आत्मिक जीवन से भी) कंगाल हैं, पर हम है तेरे, और, तेरी शरण आए हैं। तू दुखों का नाश करने वाला है, तू सारे सुख देने वाला है। हम कठोर-चिक्त हैं, तेरे तैराए हुए ही तैर सकते हैं।
हे नानक (कह:) गुरु को मिल के जिन्होंने परमात्मा के नाम का स्वाद चखा है, उनको हरि-नाम ने (विकारों में डूबतों को) बचा लिया है। हे हरि! कृपा कर, (हमें विकारों से) बचा ले।4।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ४ घोड़ीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
वडहंसु महला ४ घोड़ीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
देह तेजणि जी रामि उपाईआ राम ॥ धंनु माणस जनमु पुंनि पाईआ राम ॥ माणस जनमु वड पुंने पाइआ देह सु कंचन चंगड़ीआ ॥ गुरमुखि रंगु चलूला पावै हरि हरि हरि नव रंगड़ीआ ॥ एह देह सु बांकी जितु हरि जापी हरि हरि नामि सुहावीआ ॥ वडभागी पाई नामु सखाई जन नानक रामि उपाईआ ॥१॥
मूलम्
देह तेजणि जी रामि उपाईआ राम ॥ धंनु माणस जनमु पुंनि पाईआ राम ॥ माणस जनमु वड पुंने पाइआ देह सु कंचन चंगड़ीआ ॥ गुरमुखि रंगु चलूला पावै हरि हरि हरि नव रंगड़ीआ ॥ एह देह सु बांकी जितु हरि जापी हरि हरि नामि सुहावीआ ॥ वडभागी पाई नामु सखाई जन नानक रामि उपाईआ ॥१॥
दर्पण-टिप्पनी
नोट: घोड़ीआ–घोड़ियां। जब दूल्हा घर से ब्याहने चलता है, घोड़ी पर चढ़ता है, तब उसकी बहनें घोड़ी की बागडोर पकड़ के गीत गाती हैं। वे गीत ‘घोड़ियां’ कहलवाते हैं। गुरु रामदास जी ने ये दो ‘छंद’ उन गीतों ‘घोड़ियों’ की चाल में लिखे हैं, और इन छंदों का शीर्षक भी ‘घोड़ीआं’ ही लिखा है।
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देह = शरीर, मानव देह। तेजणि = घोड़ी। रामि = राम ने, परमात्मा ने। उपाईआ = उपाई, पैदा की। धंनु = धन्य। पुंनि = पुण्य से, अच्छी किस्मत से। पाईआ = पाई है, तलाशी है (ये देह)। वड पुंने = बड़ी किस्मत से। देह = काया। कंचन = सोना। गुरमुखि = गुरु के द्वारा। चलूला = गाढ़ा। नव रंगड़ीआ = नए रंग से रंगी गई। बांकी = सुंदर। जितु = जिसकी इनायत से। जापी = मैं जप सकती हूँ। नामि = नाम से। पाई = पाई (ये देह)। सखाई = साथी।1।
अर्थ: हे भाई! (मनुष्य की) ये काया (जैसे) घोड़ी है (इसको) परमात्मा ने पैदा किया है। मानव जन्म भाग्यशाली है (जिसमें ये काया प्राप्त होती है) सौभाग्य से ही (जीव ने ये काया) पाई है। हे भाई! मानव जन्म बड़ी किस्मत से ही मिलता है। पर उसी मनुष्य की काया सोने जैसी व सुंदर है जो गुरु की शरण पड़ कर हरि-नाम का गाढ़ा रंग हासिल करता है, उस मनुष्य की काया हरि-नाम के नए रंग से रंगी जाती है।
हे भाई! ये काया सुंदर है क्योंकि इस काया से मैं परमात्मा का नाम जप सकता हूँ, हरि नाम की इनायत से यह काया सोहणी बन जाती है। हे भाई! उस अति भाग्यशाली मनुष्य ने ही यह काया (असल में) प्राप्त की समझ, परमात्मा का नाम जिस मनुष्य का मित्र बन जाता है। हे दास नानक! (नाम स्मरण करने के लिए ही ये काया) परमात्मा ने पैदा की है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
देह पावउ जीनु बुझि चंगा राम ॥ चड़ि लंघा जी बिखमु भुइअंगा राम ॥ बिखमु भुइअंगा अनत तरंगा गुरमुखि पारि लंघाए ॥ हरि बोहिथि चड़ि वडभागी लंघै गुरु खेवटु सबदि तराए ॥ अनदिनु हरि रंगि हरि गुण गावै हरि रंगी हरि रंगा ॥ जन नानक निरबाण पदु पाइआ हरि उतमु हरि पदु चंगा ॥२॥
मूलम्
देह पावउ जीनु बुझि चंगा राम ॥ चड़ि लंघा जी बिखमु भुइअंगा राम ॥ बिखमु भुइअंगा अनत तरंगा गुरमुखि पारि लंघाए ॥ हरि बोहिथि चड़ि वडभागी लंघै गुरु खेवटु सबदि तराए ॥ अनदिनु हरि रंगि हरि गुण गावै हरि रंगी हरि रंगा ॥ जन नानक निरबाण पदु पाइआ हरि उतमु हरि पदु चंगा ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जीनु = जीन, काठी। पावउ = मैं पाता हूँ। बुझि = समझ के, परख के। चंगा = अच्छाईयां, गुण। चढ़ि = चढ़ के। लंघा = लांघ के, मैं लांघता हूँ। जी = हे भाई! बिखमु = मुश्किल। भुइअंगा = संसार समुंदर (भुइ+अंग, धरती का अंग)। अनत तरंगा = बेअंत लहरों वाला। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख रहने वाला मनुष्य। बोहिथि = जहाज में। खेवटु = मल्लाह। सबदि = शब्द के माध्यम से। रंगि = रंग में। अनदिनु = हर रोज। रंगी = रंग वाला। निरबाण = वासना रहित। पद = दर्जा।2।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा के गुणों को विचार के मैं (अपनी शरीर घोड़ी पर, महिमा की) काठी डालता हूँ, (उस काठी वाली घोड़ी पर) चढ़ के (काया को वश में कर के) मैं इस मुश्किल (से तैरे जाने वाले) संसार समुंदर से पार लांघता हूँ।
(हे भाई! कोई विरला) गुरु के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (ही) इस मुश्किल संसार-समुंदर से पार लांघता है (क्योंकि इसमें विकारों की) बेअंत लहरें पड़ रही हैं। कोई दुर्लभ अति भाग्यशाली मनुष्य हरि-नाम के जहाज में चढ़ के पार लांघता है, गुरु-मल्लाह अपने शब्द के साथ जोड़ के पार लंघा लेता है।
हे नानक! जो मनुष्य हर वक्त परमात्मा के प्रेम रंग में (टिक के) परमात्मा की महिमा के गीत गाता रहता है, वह हरि नाम रंग में रंगा जाता है, वह मनुष्य वह ऊँचा और स्वच्छ आत्मिक स्तर हासिल कर लेता है जहाँ वासना छू नहीं सकती।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कड़ीआलु मुखे गुरि गिआनु द्रिड़ाइआ राम ॥ तनि प्रेमु हरि चाबकु लाइआ राम ॥ तनि प्रेमु हरि हरि लाइ चाबकु मनु जिणै गुरमुखि जीतिआ ॥ अघड़ो घड़ावै सबदु पावै अपिउ हरि रसु पीतिआ ॥ सुणि स्रवण बाणी गुरि वखाणी हरि रंगु तुरी चड़ाइआ ॥ महा मारगु पंथु बिखड़ा जन नानक पारि लंघाइआ ॥३॥
मूलम्
कड़ीआलु मुखे गुरि गिआनु द्रिड़ाइआ राम ॥ तनि प्रेमु हरि चाबकु लाइआ राम ॥ तनि प्रेमु हरि हरि लाइ चाबकु मनु जिणै गुरमुखि जीतिआ ॥ अघड़ो घड़ावै सबदु पावै अपिउ हरि रसु पीतिआ ॥ सुणि स्रवण बाणी गुरि वखाणी हरि रंगु तुरी चड़ाइआ ॥ महा मारगु पंथु बिखड़ा जन नानक पारि लंघाइआ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कड़ीआलु = लगाम। मुखे = मुख में, (काया रूपी घोड़ी के) मुंह में। गुरि = गुरु ने। गिआनु = आत्मिक जीवन की सूझ। द्रिढ़ाइआ = हृदय में पक्का कर दिया है। तनि = शरीर में, हृदय में। लाइ = लगाता है। जिणै = जीतता है। गुरमुखि = गुरु के द्वारा। जीतिआ = जीता जा सकता है। अघड़ो = ना घड़ा हुआ, अल्हड़ (मन)। घड़ावै = (जात, धीरज आदि की कुठाली में) घड़ता है। अपिउ = अमृत, आत्मिक जीवन देने वाला। सुणि = सुन के। स्रवण = कानों से। तुरी = (काया) घोड़ी। तुरी चढ़ाइआ = (काया) घोड़ी पर सवार होता है, काया को वश में करता है। मारगु = रास्ता। पंथु = रास्ता। बिखड़ा = मुश्किल।3।
अर्थ: जिस मनुष्य के हृदय में गुरु ने आत्मिक जीवन की समझ पक्की कर दी, उसने ये सूझ (अपनी काया घोड़ी के) मुंह में (जैसे) लगाम दे दी है। उस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का प्यार पैदा होता है, ये प्यार वह मनुष्य अपनी काया-घोड़ी को (जैसे) चाबुक मारता रहता है। हृदय में पैदा हरि नाम का प्रेम में लीन वह मनुष्य अपनी काया घोड़ी को चाबुक मारता रहता है, और अपने मन को वश में किए रखता है। पर, ये मन गुरु की शरण पड़ के ही जीता जा सकता है। वह मनुष्य गुरु का शब्द प्राप्त करता है, आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम-रस पीता रहता है, और (जत, धैर्य आदि की कुठाली में) अल्हड़ मन को घड़ लेता है (परिपक्व बना लेता है)। गुरु की जो वाणी उचारी हुई है इस को अपने कानों से सुन के (भाव, ध्यान से सुन के वह मनुष्य अपने अंदर) परमात्मा का प्यार पैदा करता है, और इस तरह काया-घोड़ी पर सवार होता है (काया को वश में करता है)। हे दास नानक! (ये मनुष्य जीवन) बड़ा मुश्किल रास्ता है, (पर, गुरु की शरण पड़े मनुष्य को) पार लंघा लेता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
घोड़ी तेजणि देह रामि उपाईआ राम ॥ जितु हरि प्रभु जापै सा धनु धंनु तुखाईआ राम ॥ जितु हरि प्रभु जापै सा धंनु साबासै धुरि पाइआ किरतु जुड़ंदा ॥ चड़ि देहड़ि घोड़ी बिखमु लघाए मिलु गुरमुखि परमानंदा ॥ हरि हरि काजु रचाइआ पूरै मिलि संत जना जंञ आई ॥ जन नानक हरि वरु पाइआ मंगलु मिलि संत जना वाधाई ॥४॥१॥५॥
मूलम्
घोड़ी तेजणि देह रामि उपाईआ राम ॥ जितु हरि प्रभु जापै सा धनु धंनु तुखाईआ राम ॥ जितु हरि प्रभु जापै सा धंनु साबासै धुरि पाइआ किरतु जुड़ंदा ॥ चड़ि देहड़ि घोड़ी बिखमु लघाए मिलु गुरमुखि परमानंदा ॥ हरि हरि काजु रचाइआ पूरै मिलि संत जना जंञ आई ॥ जन नानक हरि वरु पाइआ मंगलु मिलि संत जना वाधाई ॥४॥१॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तेजणि = घोड़ी। देह = शरीर, काया। रामि = राम ने। जितु = जिस (काया) के द्वारा। जापै = जपता है। सा = वह (काया)। धनु धंनु = भाग्यशाली। तुखाईआ = ताक्र्ष, तुखाई, घोड़ी। धुरि = धुर दरगाह से। किरतु = पिछले किए कर्मों का संस्कार। जुड़ंदा = इकट्ठा किया हुआ। किरतु जुड़ंदा = पिछले किए कर्मों के इकट्ठे हुए संस्कार। देहड़ि = सुंदर देह, सोहनी काया। बिखमु = मुश्किल (संसार समुंदर)। गुरमुखि = गुरु के द्वारा। परमानंदा = परम आनंद का मालिक प्रभु। हरि पूरै = पूरे हरि ने। मिलि = मिल के (शब्द ‘मिलु’ व ‘मिलि’ का फर्क देखें)। वरु = पति। काजु = विवाह का काम। मंगलु = खुशी।4।
अर्थ: हे भाई! ये मनुष्य शरीर रूपी घोड़ी परमात्मा ने पैदा की है (कि इस घोड़ी पर चढ़ कर जीव जीवन-यात्रा को सफलता से तय करे, सो) जिस (शरीर-घोड़ी) के द्वारा मनुष्य परमात्मा का नाम जपता है, वह धन्य है, उसे शाबाशी मिलती है, (इससे) पिछले किए कर्मों के संस्कारों का समूह सामने आ जाता है।
हे भाई! इस सुंदर काया-घोड़ी पर चढ़, (ये घोड़ी) मुश्किल संसार-समुंदर से पार लंघा लेती है, (इसके द्वारा) गुरु की शरण पड़ कर परम आनंद के मालिक परमात्मा को मिल।
पूरन परमात्मा ने जिस जीव-स्त्री का विवाह रच दिया (जिस जीव-वधू को अपने साथ मिलाने का अवसर बना दिया), सत्संगियों के साथ मिल के (मानो, उसकी) बारात आ गई। हे दास नानक! संत जनों से मिल के उस जीव-स्त्री ने प्रभु-पति (का मिलाप) हासिल कर लिया, उसने आत्मिक आनंद पा लिया, उसके अंदर आत्मिक मंगल के गीत (शादी के मंगलमयी गीत) बज पड़े।4।1।5।
[[0576]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ४ ॥ देह तेजनड़ी हरि नव रंगीआ राम ॥ गुर गिआनु गुरू हरि मंगीआ राम ॥ गिआन मंगी हरि कथा चंगी हरि नामु गति मिति जाणीआ ॥ सभु जनमु सफलिउ कीआ करतै हरि राम नामि वखाणीआ ॥ हरि राम नामु सलाहि हरि प्रभ हरि भगति हरि जन मंगीआ ॥ जनु कहै नानकु सुणहु संतहु हरि भगति गोविंद चंगीआ ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ४ ॥ देह तेजनड़ी हरि नव रंगीआ राम ॥ गुर गिआनु गुरू हरि मंगीआ राम ॥ गिआन मंगी हरि कथा चंगी हरि नामु गति मिति जाणीआ ॥ सभु जनमु सफलिउ कीआ करतै हरि राम नामि वखाणीआ ॥ हरि राम नामु सलाहि हरि प्रभ हरि भगति हरि जन मंगीआ ॥ जनु कहै नानकु सुणहु संतहु हरि भगति गोविंद चंगीआ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तेजनड़ी = सोहणी तेजणि, सुंदर घोड़ी। नव रंगीआ = नए रंग वाली। चंगी = बढ़िया। गति = उच्च आत्मि्क अवस्था। मिति = मर्यादा, माप। करतै = कर्तार ने। नामि = नाम में। वखाणीआ = उचारी। सलाहि = सलाह के। हरि जन = हरि के भक्त।1।
अर्थ: हे भाई! वह काया सुंदर घोड़ी है (जीव-राही की जीवन-यात्रा के लिए बढ़िया घोड़ी है) जो परमात्मा के प्रेम के नए रंग में रंगी रहती है, जो गुरु से आत्मिक जीवन की श्रेष्ठ समझ मांगती रहती है, जो (गुरु से) आत्मिक जीवन की सूझ मांगती है, परमात्मा की सोहणी महिमा करती है, परमात्मा का नाम जपती है, जो ये समझने का यत्न करती है कि परमात्मा कैसा और कितना बड़ा है। कर्तार ने (ऐसी काया घोड़ी का) सारा जन्म सफल कर दिया है, क्योंकि वह परमात्मा के नाम में लीन रहती है, परमात्मा की महिमा उचारती रहती है।
हे भाई! परमात्मा के भक्त परमात्मा के नाम की महिमा गा के परमात्मा की भक्ति (की दाति) मांगते रहते हैं। दास नानक कहता है: हे संत जनो! (ये सुंदर काया-घोड़ी प्राप्त करके) परमात्मा की सुंदर भक्ति (करते रहो)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
देह कंचन जीनु सुविना राम ॥ जड़ि हरि हरि नामु रतंना राम ॥ जड़ि नाम रतनु गोविंद पाइआ हरि मिले हरि गुण सुख घणे ॥ गुर सबदु पाइआ हरि नामु धिआइआ वडभागी हरि रंग हरि बणे ॥ हरि मिले सुआमी अंतरजामी हरि नवतन हरि नव रंगीआ ॥ नानकु वखाणै नामु जाणै हरि नामु हरि प्रभ मंगीआ ॥२॥
मूलम्
देह कंचन जीनु सुविना राम ॥ जड़ि हरि हरि नामु रतंना राम ॥ जड़ि नाम रतनु गोविंद पाइआ हरि मिले हरि गुण सुख घणे ॥ गुर सबदु पाइआ हरि नामु धिआइआ वडभागी हरि रंग हरि बणे ॥ हरि मिले सुआमी अंतरजामी हरि नवतन हरि नव रंगीआ ॥ नानकु वखाणै नामु जाणै हरि नामु हरि प्रभ मंगीआ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देह = शरीर, काया (-घोड़ी)। जीनु = काठी। सुविना = सोने की। जड़ि = जड़ के। घणे = बहुत। नव तन = नया। नव रंगीआ = नवरंगी, नए रंग वाली।2।
अर्थ: वह काया (-घोड़ी, जैसे) सोने की है (बहुत कीमती बन जाती है, जिस पर) परमात्मा का नाम-रत्न जड़ के सोने की काठी डाली जाती है (जिस पर परमात्मा के नाम से भरपूर गुरु-शब्द की काठी डाली जाती है)।
(हे भाई! जिस मनुष्य ने) परमात्मा का नाम रत्न जड़ के गुरु-शब्द की काठी डाल दी, उसको परमात्मा मिल गया, उसने परमात्मा के गुण (अपने अंदर बसा लिए), उसे सुख ही सुख प्राप्त हो गए। हे भाई! जिस मनुष्य ने गुरु का शब्द हासिल कर लिया, जिसने परमात्मा का नाम-स्मरण करना आरम्भ कर दिया, वह अति भाग्यशाली हो गया, उसके अंदर परमात्मा का प्रेम उघड़ पड़ा।
नानक कहता है: (हे भाई! जो मनुष्य) परमात्मा के नाम से गहरी सांझ डालता है, जो मनुष्य हर वक्त परमात्मा का नाम मांगता है, उसे वह मालिक हरि मिल जाता है जो हरेक के दिल की जानने वाला है, जो सदा नया-नरोया रहने वाला है, जो सदा नए करिश्मों का मालिक है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कड़ीआलु मुखे गुरि अंकसु पाइआ राम ॥ मनु मैगलु गुर सबदि वसि आइआ राम ॥ मनु वसगति आइआ परम पदु पाइआ सा धन कंति पिआरी ॥ अंतरि प्रेमु लगा हरि सेती घरि सोहै हरि प्रभ नारी ॥ हरि रंगि राती सहजे माती हरि प्रभु हरि हरि पाइआ ॥ नानक जनु हरि दासु कहतु है वडभागी हरि हरि धिआइआ ॥३॥
मूलम्
कड़ीआलु मुखे गुरि अंकसु पाइआ राम ॥ मनु मैगलु गुर सबदि वसि आइआ राम ॥ मनु वसगति आइआ परम पदु पाइआ सा धन कंति पिआरी ॥ अंतरि प्रेमु लगा हरि सेती घरि सोहै हरि प्रभ नारी ॥ हरि रंगि राती सहजे माती हरि प्रभु हरि हरि पाइआ ॥ नानक जनु हरि दासु कहतु है वडभागी हरि हरि धिआइआ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कड़ीआलु = लगाम। मुखे = मुखि, (काया घोड़ी के) मुंह में। गुरि = गुरु ने। अंकसु = अंकुश, हाथी को चलाने के लिए बरता जाता लोहे का कुंडा। मैगलु = हाथी (मदकल)। सबदि = शब्द द्वारा। वसि = वश में। वसगति = वश में। परम पदु = सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा। सा धन = जीव-स्त्री। कंति = कंत ने। अंतरि = अंदर, हृदय में। हरि सेती = हरि के साथ। घरि = घर में, प्रभु की हजूरी में। सोहै = सोहणी लगती है। रंगि = प्रेम रंग में। राती = रंगी हुई। सहजे = सहज, आत्मिक अडोलता में। माती = मस्त। हरि दासु = हरि का सेवक। जनु = दास।3।
अर्थ: हे भाई! गुरु ने (जिस मनुष्य की काया-घोड़ी के) मुंह में लगाम दे दी, अंकुश रख दिया, उसका मन-हाथी गुरु के शब्द की इनायत से वश में आ गया।
जिस जीव-स्त्री का मन वश में आ गया, उसने सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा हासिल कर लिया, प्रभु कंत ने उस जीव-स्त्री को प्यार करना शुरू कर दिया, उसके हृदय में परमात्मा से प्रेम पैदा हो गया, वह जीव-स्त्री प्रभु की हजूरी में सुंदर लगती है। जो जीव-स्त्री प्रभु के प्रेम रंग में रंगी जाती है, जो आत्मिक अडोलता में मस्त रहती है, वह परमात्मा का मिलाप हासिल कर लेती है।
हरि का सेवक नानक दास कहता है: हे भाई! अति भाग्यशाली जीव ही परमात्मा का नाम स्मरण करते हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
देह घोड़ी जी जितु हरि पाइआ राम ॥ मिलि सतिगुर जी मंगलु गाइआ राम ॥ हरि गाइ मंगलु राम नामा हरि सेव सेवक सेवकी ॥ प्रभ जाइ पावै रंग महली हरि रंगु माणै रंग की ॥ गुण राम गाए मनि सुभाए हरि गुरमती मनि धिआइआ ॥ जन नानक हरि किरपा धारी देह घोड़ी चड़ि हरि पाइआ ॥४॥२॥६॥
मूलम्
देह घोड़ी जी जितु हरि पाइआ राम ॥ मिलि सतिगुर जी मंगलु गाइआ राम ॥ हरि गाइ मंगलु राम नामा हरि सेव सेवक सेवकी ॥ प्रभ जाइ पावै रंग महली हरि रंगु माणै रंग की ॥ गुण राम गाए मनि सुभाए हरि गुरमती मनि धिआइआ ॥ जन नानक हरि किरपा धारी देह घोड़ी चड़ि हरि पाइआ ॥४॥२॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देह = काया, शरीर। जी = हे भाई! जितु = जिस (काया-घोड़ी) से। मिलि सतिगुर = गुरु को मिल के। मंगलु = आत्मिक आनंद देने वाला गीत। सेवकी = सेवक भावना से। जाइ = जा के। प्रभ रंग महली = परमात्मा की आनंद भरी हजूरी में। मनि = मन में। सुभाए = सु भाए, प्रेम से। चढ़ि = चढ़ के।4।
अर्थ: हे भाई! वह काया (मनुष्य की जीवन-यात्रा में, मानो) घोड़ी है जिस (काया) के माध्यम से मनुष्य परमात्मा का मिलाप हासिल कर लेता है, और, गुरु को मिल के परमात्मा के महिमा के गीत गाता रहता है। सेवक-भाव से जो मनुष्य परमात्मा की महिमा के गीत गा के परमात्मा की सेवा भक्ति करता है वह परमात्मा की आनंद भरी हजूरी में जा पहुँचता है और परमात्मा के मिलाप का आनंद लेता है। वह मनुष्य प्रेम से अपने मन में परमात्मा के गुण गाता है, गुरु की मति पर चल कर मन में परमात्मा का ध्यान धरता है।
हे नानक! जिस दास पर परमात्मा मेहर करता है वह अपनी काया-घोड़ी पर चढ़ कर परमात्मा को मिल जाता है।4।2।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रागु वडहंसु महला ५ छंत घरु ४ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
रागु वडहंसु महला ५ छंत घरु ४ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर मिलि लधा जी रामु पिआरा राम ॥ इहु तनु मनु दितड़ा वारो वारा राम ॥ तनु मनु दिता भवजलु जिता चूकी कांणि जमाणी ॥ असथिरु थीआ अम्रितु पीआ रहिआ आवण जाणी ॥ सो घरु लधा सहजि समधा हरि का नामु अधारा ॥ कहु नानक सुखि माणे रलीआं गुर पूरे कंउ नमसकारा ॥१॥
मूलम्
गुर मिलि लधा जी रामु पिआरा राम ॥ इहु तनु मनु दितड़ा वारो वारा राम ॥ तनु मनु दिता भवजलु जिता चूकी कांणि जमाणी ॥ असथिरु थीआ अम्रितु पीआ रहिआ आवण जाणी ॥ सो घरु लधा सहजि समधा हरि का नामु अधारा ॥ कहु नानक सुखि माणे रलीआं गुर पूरे कंउ नमसकारा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुर मिलि = गुरु को मिल के। लधा = ढूँढता है। जी = हे भाई! वारो वारा = वार वार के, सदके करके। भवजलु = संसार समुंदर। चूकी = खत्म हो जाती है। कांणि = अधीनता। जमाणी = यमों की। असथिरु = अडोल चिक्त। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल। रहिआ = खत्म हो गया। सहजि = आत्मिक अडोलता में। समधा = समा गया, लीनता हो गई। अधारा = आसरा। सुखि = आनंद से। रलीआं = खुशियां। कंउ = को।1।
अर्थ: हे भाई! गुरु को मिल के (ही) प्यारा प्रभु मिलता है, (जिसे गुरु के माध्यम से प्रभु मिल जाता है वह) अपना ये शरीर ये मन (गुरु के) हवाले करता है। जो मनुष्य अपना तन-मन गुरु के हवाले करता है, वह संसार समुंदर को जीत लेता है, उसकी यमों की अधीनता खत्म हो जाती है वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (गुरु से ले के) पीता है, और, अडोल चिक्त हो जाता है, उसके जनम-मरन का चक्र समाप्त हो जाता है। उस मनुष्य को वह घर (प्रभु के चरणों में ठिकाना) मिल जाता है (जिसकी इनायत से) वह आत्मिक अडोलता में लीन रहता है, परमात्मा का नाम (उसकी जिंदगी का) आसरा बन जाता है। हे नानक! कह: वह मनुष्य सुख में रह कर आत्मिक खुशियां पाता है (ये सारी इनायत गुरु की ही है) पूरे गुरु को (सदा) नमस्कार करनी चाहिए।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुणि सजण जी मैडड़े मीता राम ॥ गुरि मंत्रु सबदु सचु दीता राम ॥ सचु सबदु धिआइआ मंगलु गाइआ चूके मनहु अदेसा ॥ सो प्रभु पाइआ कतहि न जाइआ सदा सदा संगि बैसा ॥ प्रभ जी भाणा सचा माणा प्रभि हरि धनु सहजे दीता ॥ कहु नानक तिसु जन बलिहारी तेरा दानु सभनी है लीता ॥२॥
मूलम्
सुणि सजण जी मैडड़े मीता राम ॥ गुरि मंत्रु सबदु सचु दीता राम ॥ सचु सबदु धिआइआ मंगलु गाइआ चूके मनहु अदेसा ॥ सो प्रभु पाइआ कतहि न जाइआ सदा सदा संगि बैसा ॥ प्रभ जी भाणा सचा माणा प्रभि हरि धनु सहजे दीता ॥ कहु नानक तिसु जन बलिहारी तेरा दानु सभनी है लीता ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सजण = हे सज्जन! मैडड़े = मेरे। गुरि = गुरु ने। सबदु सचु = सदा स्थिर प्रभु की महिमा वाला शब्द। मंगलु = महिमा का गीत। मनहु = मन से। अदेसा = अंदेशा, चिन्ता फिक्र। कतहि = किसी भी और जगह। संगि = (प्रभु के) साथ। बैसा = बैठा रहता है, टिका रहता है। प्रभ भाणा = प्रभु को प्यारा लगता है। प्रभि = प्रभु ने। सहजे = आत्मिक अडोलता में (टिका के)। बलिहारी = सदके। सभनी = और सब जीवों ने।1।
अर्थ: हे मेरे सज्जन! हे मेरे मित्र! सुन, (किसी भाग्यशाली मनुष्य को) गुरु ने प्रभु की सदा स्थिर प्रभु की महिमा वाला शब्द-मंत्र दिया है। जो मनुष्य सदा-स्थिर प्रभु की महिमा वाले शब्द को सदा हृदय में बसाता है, जो मनुष्य परमात्मा की महिमा के गीत (सदा) गाता है, उसके मन से चिन्ता-फिक्र उतर जाते हैं, वह मनुष्य परमात्मा का मिलाप हासिल कर लेता है, (प्रभु को छोड़ के) किसी और जगह वह नहीं भटकता वह सदा ही प्रभु चरणों में लीन रहता है। वह मनुष्य प्रभु को (सदा) प्यारा लगता है, सदा स्थिर प्रभु का ही उसको मान-आसरा रहता है, परमात्मा ने उसको आत्मिक अडोलता में टिका के अपना नाम-धन बख्श दिया है।
हे नानक! कह: (हे प्रभु!) मैं उस सेवक से सदके जाता हूँ, तेरे नाम की दाति उससे सब जीव लेते हैं।2।
[[0577]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
तउ भाणा तां त्रिपति अघाए राम ॥ मनु थीआ ठंढा सभ त्रिसन बुझाए राम ॥ मनु थीआ ठंढा चूकी डंझा पाइआ बहुतु खजाना ॥ सिख सेवक सभि भुंचण लगे हंउ सतगुर कै कुरबाना ॥ निरभउ भए खसम रंगि राते जम की त्रास बुझाए ॥ नानक दासु सदा संगि सेवकु तेरी भगति करंउ लिव लाए ॥३॥
मूलम्
तउ भाणा तां त्रिपति अघाए राम ॥ मनु थीआ ठंढा सभ त्रिसन बुझाए राम ॥ मनु थीआ ठंढा चूकी डंझा पाइआ बहुतु खजाना ॥ सिख सेवक सभि भुंचण लगे हंउ सतगुर कै कुरबाना ॥ निरभउ भए खसम रंगि राते जम की त्रास बुझाए ॥ नानक दासु सदा संगि सेवकु तेरी भगति करंउ लिव लाए ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भउ भाणा = (अगर) तुझे अच्छा लगे, यदि तेरी रजा हो। अघाए = तृप्त हो जाता है, पेट भर जाता है। ठंढा = शांत। त्रिसन = माया की प्यास। डंझा = भड़की, ना कभी खत्म होने वाली प्यास। सभि = सारे। भुंचण लगे = खाने लग पड़ते हैं। हंउ = मैं। कै कुरबाना = से सदके। रंगि = रंग में। राते = रंगे जाते हैं। त्रास = सहज, डर। संगि = साथ। करंउ = मैं करूँ। लाए = लगा के।3।
अर्थ: हे प्रभु! मैं गुरु से सदके जाता हूँ। अगर तेरी मर्जी हो तो (गुरु की शरण पड़ कर जीव माया की भूख से) पूरी तरह से तृप्त हो जाता है। (जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ता है, उस का) मन शांत हो जाता है, कभी ना खत्म होने वाली माया की प्यास (उसके अंदर से) बुझ जाती है (गुरु के माध्यम से वह) (बड़ा नाम-) खजाना प्राप्त कर लेता है। (जो भी गुरु की शरण आते हैं, वह) सारे सिख सेवक नाम-खजाने बरतने लग पड़ते हैं। (गुरु की शरण पड़ने वाले मनुष्य दुनिया के सहमों की ओर से) निडर हो जाते हैं, प्रभु पति के प्रेम रंग में रंगे जाते हैं, जमों का सहम मिटा लेते हैं। हे नानक! (कह: हे प्रभु! मेहर कर, मैं) दास सदा (गुरु के) चरणों में टिका रहूँ, (गुरु का) सेवक बना रहूँ, और तवज्जो जोड़ के तेरी भक्ति करता रहूँ।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पूरी आसा जी मनसा मेरे राम ॥ मोहि निरगुण जीउ सभि गुण तेरे राम ॥ सभि गुण तेरे ठाकुर मेरे कितु मुखि तुधु सालाही ॥ गुणु अवगुणु मेरा किछु न बीचारिआ बखसि लीआ खिन माही ॥ नउ निधि पाई वजी वाधाई वाजे अनहद तूरे ॥ कहु नानक मै वरु घरि पाइआ मेरे लाथे जी सगल विसूरे ॥४॥१॥
मूलम्
पूरी आसा जी मनसा मेरे राम ॥ मोहि निरगुण जीउ सभि गुण तेरे राम ॥ सभि गुण तेरे ठाकुर मेरे कितु मुखि तुधु सालाही ॥ गुणु अवगुणु मेरा किछु न बीचारिआ बखसि लीआ खिन माही ॥ नउ निधि पाई वजी वाधाई वाजे अनहद तूरे ॥ कहु नानक मै वरु घरि पाइआ मेरे लाथे जी सगल विसूरे ॥४॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जी = हे प्रभु जी! मनसा = मन की कामना (मनीषा)। मोहि = मैं। जीउ = हे प्रभु जी! सभि = सारे। ठाकुर मेरे = हे ठाकुर! कितु = किस के द्वारा? मुखि = मुंह से। कितु मुखि = किस मुंह से? सालाही = मैं स्तुति करूँ? खिन माही = एक छिन में। नउ निधि = (दुनिया के सारे ही) नौ खजाने। वाजे = बज गए। अनहद = एक रस, बिना बजाए। तूरे = बाजे। घरि = हृदय घर में। विसूरे = झोरे। चिंता = फिक्र।4।
अर्थ: हे प्रभु जी! (तेरी मेहर से मेरी हरेक) आशा और कामना पूरी हो गई है। हे प्रभु जी! मैं गुणहीन था (मेरे अंदर कोई भी गुण नहीं था) तेरे अंदर सारे ही गुण हैं। हे मेरे मालिक! तेरे अंदर सारे ही गुण हैं। मैं किस मुंह से तेरी महिमा गाऊँ? तूने मेरा कोई अवगुण नहीं विचारा, तूने मेरा कोई गुण नहीं देखा, और, एक पल में ही तूने मुझ पर मेहर कर दी। (तेरी मेहर से मैंने, मानो) सारे ही नौ खजाने हासिल कर लिए हैं, मेरे अंदर आत्मिक आनंद की चढ़दीकला बन गई है मेरे अंदर आत्मिक आनंद के एक-रस बाजे बजने लगे हैं।
हे नानक! (कह:) हे प्रभु जी! मैंने (तुझे) पति को अपने हृदय-गृह में ही पा लिया है, मेरे सारे ही चिन्ता-फिक्र उतर गए हैं।4।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु ॥ किआ सुणेदो कूड़ु वंञनि पवण झुलारिआ ॥ नानक सुणीअर ते परवाणु जो सुणेदे सचु धणी ॥१॥
मूलम्
सलोकु ॥ किआ सुणेदो कूड़ु वंञनि पवण झुलारिआ ॥ नानक सुणीअर ते परवाणु जो सुणेदे सचु धणी ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कूड़ु = झूठ, झूठे पदार्थों की बात। वंञनि = वंजन, चले जाते हैं। झुलारिआ = बुल बुलों की तरह। सुणीअर = कान। ते = (बहुवचन) वे। सचु = सदा कायम रहने वाला। धणी = मालिक प्रभु।1।
अर्थ: हे भाई! नाशवान पदार्थों की बात क्या सुनता है? (ये पदार्थ तो) हवा के बुल-बुलों की तरह उड़ जाते हैं। हे नानक (सिर्फ) वह कान (परमात्मा की हजूरी में) स्वीकार हैं जो सदा स्थिर रहने वाले मालिक प्रभु (की महिमा) को सुनते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
छंतु ॥ तिन घोलि घुमाई जिन प्रभु स्रवणी सुणिआ राम ॥ से सहजि सुहेले जिन हरि हरि रसना भणिआ राम ॥ से सहजि सुहेले गुणह अमोले जगत उधारण आए ॥ भै बोहिथ सागर प्रभ चरणा केते पारि लघाए ॥ जिन कंउ क्रिपा करी मेरै ठाकुरि तिन का लेखा न गणिआ ॥ कहु नानक तिसु घोलि घुमाई जिनि प्रभु स्रवणी सुणिआ ॥१॥
मूलम्
छंतु ॥ तिन घोलि घुमाई जिन प्रभु स्रवणी सुणिआ राम ॥ से सहजि सुहेले जिन हरि हरि रसना भणिआ राम ॥ से सहजि सुहेले गुणह अमोले जगत उधारण आए ॥ भै बोहिथ सागर प्रभ चरणा केते पारि लघाए ॥ जिन कंउ क्रिपा करी मेरै ठाकुरि तिन का लेखा न गणिआ ॥ कहु नानक तिसु घोलि घुमाई जिनि प्रभु स्रवणी सुणिआ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
छंतु। घोलि घुमाई = मैं कुर्बान जाता हूँ। स्रवणी = कानों से। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुहेले = सुखी। रसना = जीभ (से)। उधारण = उद्धार करने के लिए। भै सागर = भय का सागर, भयानक समुंदर। बोहिथ = जहाज। केते = बेअंत। कंउ = को। ठाकुरि = ठाकुर ने। जिनि = जिस ने (जिन = जिन्होंने)।1।
अर्थ: छंत। हे भाई! जिस मनुष्यों ने अपने कानों से प्रभु (का नाम) सुना है, उनसे मैं सदके कुर्बान जाता हूँ। जो मनुष्य अपनी जीभ से परमात्मा का नाम जपते हैं वे आत्मिक अडोलता में टिक के सुखी रहते हैं। वे मनुष्य आत्मिक अडोलता में रह के सुखी जीवन जीते हैं, वे अमूल्य गुणवान हो जाते हैं, वे तो जगत को संसार-समुंदर से पार लंघाने के लिए आते हैं। हे भाई! इस भयानक संसार-समुंदर से पार लांघने के वास्ते परमात्मा के चरण जहाज हैं (खुद नाम जपने वाले मनुष्य) अनेक को (प्रभु-चरणों में जोड़ के) पार लंघा देते हैं। मेरे मालिक प्रभु ने जिस पर मेहर (की निगाह) की, उनके कर्मों के हिसाब करने उसने छोड़ दिए। हे नानक! कह: मैं उस मनुष्य से सदके कुर्बान जाता हूँ जिसने अपने कानों से परमात्मा (की महिमा) को सुना है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु ॥ लोइण लोई डिठ पिआस न बुझै मू घणी ॥ नानक से अखड़ीआं बिअंनि जिनी डिसंदो मा पिरी ॥१॥
मूलम्
सलोकु ॥ लोइण लोई डिठ पिआस न बुझै मू घणी ॥ नानक से अखड़ीआं बिअंनि जिनी डिसंदो मा पिरी ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लोइणि = आँखो (से)। लोई = जगत, लोक। पिआस = देखने की लालसा। मू = मुझे। घणी = बहुत। बिअंनि = और किस्मों की। मा पिरी = मेरा प्यारा।1।
अर्थ: मैंने अपनी आँखों से जगत को देखा है, (अभी भी) मुझे (जगत को देखने की प्यास) बहुत है, ये प्यास बुझती नहीं। हे नानक! जिस आँखों ने मेरे प्यारे प्रभु को देखा, वे आँखें और किस्म की हैं (उन आँखों को दुनियावी पदार्थ देखने की लालसा नहीं होती)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
छंतु ॥ जिनी हरि प्रभु डिठा तिन कुरबाणे राम ॥ से साची दरगह भाणे राम ॥ ठाकुरि माने से परधाने हरि सेती रंगि राते ॥ हरि रसहि अघाए सहजि समाए घटि घटि रमईआ जाते ॥ सेई सजण संत से सुखीए ठाकुर अपणे भाणे ॥ कहु नानक जिन हरि प्रभु डिठा तिन कै सद कुरबाणे ॥२॥
मूलम्
छंतु ॥ जिनी हरि प्रभु डिठा तिन कुरबाणे राम ॥ से साची दरगह भाणे राम ॥ ठाकुरि माने से परधाने हरि सेती रंगि राते ॥ हरि रसहि अघाए सहजि समाए घटि घटि रमईआ जाते ॥ सेई सजण संत से सुखीए ठाकुर अपणे भाणे ॥ कहु नानक जिन हरि प्रभु डिठा तिन कै सद कुरबाणे ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: छंत। कुरबाणे = सदके। से = (बहुवचन) वे। भाणे = पसंद आते हैं। ठाकुरि = ठाकुर ने। माने = आदर दिया। परधाने = आदरणीय, जाने माने व्यक्ति। सेती = साथ। रंगि = प्रेम रंग में। राते = रंगे रहते हैं। रसहि = रस से। अघाणे = तृप्त। सहजि = आत्मिक अडोलता में। घटि घटि = हरेक घट में। तिन कै = उन से। सद = सदा।2।
अर्थ: छंतु। मैं उनसे सदके हूँ, जिन्होंने परमात्मा के दर्शन किए हैं, वे (भाग्यशाली) लोग सदा-स्थिर प्रभु की हजूरी में शोभा देते हैं। जिस जीवों को मालिक प्रभु ने आदर-मान दिया है, (हर जगह) जाने माने जाते हैं, वे परमात्मा के चरणों में जुड़े रहते हैं, परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। वे मनुष्य परमात्मा के नाम-रस से (दुनियावी पदार्थों की तरफ से) तृप्त रहते हैं वे आत्मिक अडोलता में लीन रहते हैं, वे मनुष्य परमात्मा को हरेक शरीर में बसता पहचानते हैं।
हे भाई! वही मनुष्य भले हैं, संत हैं, सुखी हैं, जो अपने मालिक प्रभु को पसंद हैं। हे नानक! कह: जिस मनुष्यों ने हरि प्रभु के दर्शन कर लिए हैं, मैं उनसे सदा सदके जाता हूँ।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु ॥ देह अंधारी अंध सुंञी नाम विहूणीआ ॥ नानक सफल जनमु जै घटि वुठा सचु धणी ॥१॥
मूलम्
सलोकु ॥ देह अंधारी अंध सुंञी नाम विहूणीआ ॥ नानक सफल जनमु जै घटि वुठा सचु धणी ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देह = शरीर। अंधारी अंध = (मोह के) अंधकार में अंधी। विहूणीआ = विहीन। जै घटि = जिस हृदय में। वुठा = आ बसा। सचु धणी = सदा कायम रहने वाला मालिक प्रभु।1।
अर्थ: हे भाई! जो शरीर परमात्मा के नाम से वंचित रहता है, वह माया के मोह के अंधेरे में अंधा हुआ रहता है। हे नानक! उस मनुष्य का जीवन कामयाब है जिसके दिल में सदा कायम रहने वाला मालिक-प्रभु आ बसता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
छंतु ॥ तिन खंनीऐ वंञां जिन मेरा हरि प्रभु डीठा राम ॥ जन चाखि अघाणे हरि हरि अम्रितु मीठा राम ॥ हरि मनहि मीठा प्रभू तूठा अमिउ वूठा सुख भए ॥ दुख नास भरम बिनास तन ते जपि जगदीस ईसह जै जए ॥ मोह रहत बिकार थाके पंच ते संगु तूटा ॥ कहु नानक तिन खंनीऐ वंञा जिन घटि मेरा हरि प्रभु वूठा ॥३॥
मूलम्
छंतु ॥ तिन खंनीऐ वंञां जिन मेरा हरि प्रभु डीठा राम ॥ जन चाखि अघाणे हरि हरि अम्रितु मीठा राम ॥ हरि मनहि मीठा प्रभू तूठा अमिउ वूठा सुख भए ॥ दुख नास भरम बिनास तन ते जपि जगदीस ईसह जै जए ॥ मोह रहत बिकार थाके पंच ते संगु तूटा ॥ कहु नानक तिन खंनीऐ वंञा जिन घटि मेरा हरि प्रभु वूठा ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: छंतु। वंञां = वंजां, मैं जाता हूँ। खंनीऐ वंञां = मैं टुकड़े टुकड़े हो के सदके जाता हूँ। चाखि = (नाम रस) चख के। अघाणे = पेट भर जाता है। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल। मनहि = मन में। तूठा = प्रसन्न होता। अमिउ = अमृत। तन ते = तन से। जगदीस = जगत का मालिक। ईसह जै जए = मालिक की जैकार। जपि = जप के, कह के। संगु = साथ। जिन घटि = जिनके हृदय में।3।
अर्थ: छंतु। मैं उन मनुष्यों पर से सदा सदके कुर्बान जाता हूँ जिन्होंने मेरे हरि-प्रभु के दर्शन कर लिए हैं। वे मनुष्य (परमात्मा का नाम-रस) चख के (दुनियावी पदार्थों की ओर से) तृप्त हो जाते हैं, उनको आत्मिक जीवन देने वाला परमात्मा का नाम-जल मीठा लगता है। परमात्मा उनके मन को भाता है, परमात्मा उन पर प्रसन्न हो जाता है, उनके अंदर आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल आ बसता है, उनको सारे आनंद प्राप्त हो जाते हैं। जगत के मालिक प्रभु की जै-जैकार कह कह के उनके शरीर से दुख व भ्रम दूर हो जाते हैं। वे मनुष्य मोह से रहित हो जाते हैं, उनके अंदर से विकार समाप्त हो जाते हैं, कामादिक पाँचों से उनका साथ टूट जाता है।
हे नानक! कह: जिस मनुष्यों के हृदय में मेरा हरि-प्रभु आ बसा है मैं उनसे सदके कुर्बान जाता हूँ।3।
[[0578]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु ॥ जो लोड़ीदे राम सेवक सेई कांढिआ ॥ नानक जाणे सति सांई संत न बाहरा ॥१॥
मूलम्
सलोकु ॥ जो लोड़ीदे राम सेवक सेई कांढिआ ॥ नानक जाणे सति सांई संत न बाहरा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लोड़ीदे राम = राम को अच्छे लगते हैं। सेई = वही (बहुवचन)। कांढिआ = कहलवाते हैं। जाणे = समझ। सति = सच। बाहरा = अलग।1।
अर्थ: हे नानक! जो मनुष्य परमात्मा को प्यारे लगते हैं, वही (असल) सेवक कहलवाते हैं। (हे भाई!) सच जान, मालिक प्रभु संतों से अलग नहीं है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
छंतु ॥ मिलि जलु जलहि खटाना राम ॥ संगि जोती जोति मिलाना राम ॥ समाइ पूरन पुरख करते आपि आपहि जाणीऐ ॥ तह सुंनि सहजि समाधि लागी एकु एकु वखाणीऐ ॥ आपि गुपता आपि मुकता आपि आपु वखाना ॥ नानक भ्रम भै गुण बिनासे मिलि जलु जलहि खटाना ॥४॥२॥
मूलम्
छंतु ॥ मिलि जलु जलहि खटाना राम ॥ संगि जोती जोति मिलाना राम ॥ समाइ पूरन पुरख करते आपि आपहि जाणीऐ ॥ तह सुंनि सहजि समाधि लागी एकु एकु वखाणीऐ ॥ आपि गुपता आपि मुकता आपि आपु वखाना ॥ नानक भ्रम भै गुण बिनासे मिलि जलु जलहि खटाना ॥४॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: छंतु। मिलि = मिल के। जलहि = जल में। खटाना = एक रूप हो जाता है। संगि = साथ। जोनी = परमात्मा। जोति = जीव की आत्मा। संमाइ = समा लिए हैं, मिला लिए हैं। करते = कर्तार ने। आपहि = आप ही। जाणीऐ = जाना जाता है। तह = वहाँ, उनके दिल में। सुंनि = विकारों से शून्य। सहजि = आत्मिक अडोलता में। वखाणीऐ = बखान किया जाता है, महिमा होती है। गुपता = छुपा हुआ। मुकता = माया के मोह से रहित। आपु = अपने आप को (शब्द ‘आपि’ व ‘आपु’ का फर्क देखें)। गुण = माया के तीन गुण।4।
अर्थ: छंतु। (हे भाई! जैसे) पानी पानी में मिल के एक-रूप हो जाता है (वैसे ही सेवक की) आत्मा परमात्मा के साथ मिली रहती है। पूर्ण सर्व-व्यापक कर्तार ने जिस सेवक को अपने में लीन कर लिया, उसके अंदर ये समझ पैदा हो जाती है कि (हर जगह) परमात्मा खुद ही खुद है, उसका हृदय (विकारों से) शून्य हो जाता है, आत्मिक अडोलता में उसकी समाधि लगी रहती है, उसके हृदय में एक परमात्मा की ही महिमा होती रहती है। (उसको निश्चय बना रहता है कि) परमात्मा सारे संसार में खुद ही छुपा हुआ है, फिर भी वह खुद माया के मोह से रहित है (हर जगह व्यापक होने के कारण) वह खुद ही अपने आप को स्मरण कर रहा है। हे नानक! उस मनुष्य के अंदर से भ्रम-डर और माया के तीन गुण नाश हो जाते हैं, (वह ऐसे परमात्मा के साथ एक-रूप हुआ रहता है, जैसे) पानी पानी में मिल के एक-रूप हो जाता है।4।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ५ ॥ प्रभ करण कारण समरथा राम ॥ रखु जगतु सगल दे हथा राम ॥ समरथ सरणा जोगु सुआमी क्रिपा निधि सुखदाता ॥ हंउ कुरबाणी दास तेरे जिनी एकु पछाता ॥ वरनु चिहनु न जाइ लखिआ कथन ते अकथा ॥ बिनवंति नानक सुणहु बिनती प्रभ करण कारण समरथा ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ५ ॥ प्रभ करण कारण समरथा राम ॥ रखु जगतु सगल दे हथा राम ॥ समरथ सरणा जोगु सुआमी क्रिपा निधि सुखदाता ॥ हंउ कुरबाणी दास तेरे जिनी एकु पछाता ॥ वरनु चिहनु न जाइ लखिआ कथन ते अकथा ॥ बिनवंति नानक सुणहु बिनती प्रभ करण कारण समरथा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करण = सृष्टि। कारण = मूल। समरथा = सब ताकतों वाला। सगल = सारा। दे = दे के। सरणा जोगु = शरण आए की सहायता कर सकने वाला। निधि = खजाना। हंउ = मैं। जिनी = जिन्होंने। वरनु = वर्ण, रंग। चिहनु = चिन्ह, निशान। कथन ते = बयान से।1।
अर्थ: हे जगत के मूल प्रभु! हे सब ताकतों के मालिक! (अपना) हाथ दे के सारे जगत की रक्षा कर। हे सब ताकतों के मालिक! हे शरण पड़े की सहायता कर सकने वाले मालिक! हे कृपा के खजाने! हे सुखदाते! मैं तेरे उन सेवकों से सदके जाता हूँ जिन्होंने तेरे साथ सांझ डाली है। हे प्रभु! तेरा कोई रंग तेरा कोई निशान बताया नहीं जा सकता, तेरा स्वरूप बयान से बाहर है। नानक विनती करता है: हे प्रभु! हे जगत के मूल हे सब ताकतों के मालिक! मेरी विनती सुन।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
एहि जीअ तेरे तू करता राम ॥ प्रभ दूख दरद भ्रम हरता राम ॥ भ्रम दूख दरद निवारि खिन महि रखि लेहु दीन दैआला ॥ मात पिता सुआमि सजणु सभु जगतु बाल गोपाला ॥ जो सरणि आवै गुण निधान पावै सो बहुड़ि जनमि न मरता ॥ बिनवंति नानक दासु तेरा सभि जीअ तेरे तू करता ॥२॥
मूलम्
एहि जीअ तेरे तू करता राम ॥ प्रभ दूख दरद भ्रम हरता राम ॥ भ्रम दूख दरद निवारि खिन महि रखि लेहु दीन दैआला ॥ मात पिता सुआमि सजणु सभु जगतु बाल गोपाला ॥ जो सरणि आवै गुण निधान पावै सो बहुड़ि जनमि न मरता ॥ बिनवंति नानक दासु तेरा सभि जीअ तेरे तू करता ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: एहि = ये। जीअ = जीव। रहता = रहत करने वाला, बचाने वाला। निवारि = दूर करके। रखि लेहु = बचा लेता है। दीन दैआल = दीनों पर दया करने वाले! सुआमी = मालिक। गोपाला = हे गोपाल! निधान = खजाना। बहुड़ि = दुबारा। सभि = सारे।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘एहि’ है ‘इह/यह’ का बहुवचन।
नोट: ‘जीअ’ है ‘जीउ’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे प्रभु! (संसार के) ये सारे जीव तेरे हैं, तू इनको पैदा करने वाला है, तू सब जीवों को दुख-कष्ट-भ्रमों से बचाने वाला है। हे दीनों पर दया करने वाले! तू (सारे जीवों के) भ्रम-दुख-कष्ट एक छिन में दूर करके बचा लेता है। हे गोपाल! तू (सब जीवों का) माता-पिता, मालिक व सज्जन है, सारा जगत तेरा बच्चा है। हे प्रभु! जो जीव तेरी शरण आता है वह (तेरे दर से तेरे) गुणों के खजाने हासिल कर लेता है, वह दुबारा ना मरता है ना पैदा होता है। हे प्रभु! तेरा दास नानक विनती करता है: जगत के सारे जीव तेरे हैं, तू सबको पैदा करने वाला है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आठ पहर हरि धिआईऐ राम ॥ मन इछिअड़ा फलु पाईऐ राम ॥ मन इछ पाईऐ प्रभु धिआईऐ मिटहि जम के त्रासा ॥ गोबिदु गाइआ साध संगाइआ भई पूरन आसा ॥ तजि मानु मोहु विकार सगले प्रभू कै मनि भाईऐ ॥ बिनवंति नानक दिनसु रैणी सदा हरि हरि धिआईऐ ॥३॥
मूलम्
आठ पहर हरि धिआईऐ राम ॥ मन इछिअड़ा फलु पाईऐ राम ॥ मन इछ पाईऐ प्रभु धिआईऐ मिटहि जम के त्रासा ॥ गोबिदु गाइआ साध संगाइआ भई पूरन आसा ॥ तजि मानु मोहु विकार सगले प्रभू कै मनि भाईऐ ॥ बिनवंति नानक दिनसु रैणी सदा हरि हरि धिआईऐ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: धिआईऐ = स्मरणा चाहिए। इछिअड़ा = चितवा हुआ। पाईऐ = पा लेते हैं। मन इछ = मन की कामना। मिटि हि = मिट जाते हैं। त्रासा = डर। साध संगाइआ = साधु-संगत में। तजि = त्याग के। सगले = सारे। मनि = मन में। भाईऐ = भा जाता है, प्यारा लगने लगता है। रैणी = रात।3।
अर्थ: हे भाई! आठों पहर (हर वक्त) परमात्मा का स्मरण करना चाहिए, (नाम-जपने की इनायत से प्रभु के दर से) मन चितवा हुआ फल प्राप्त कर लेते हैं। हे भाई परमात्मा का स्मरण करना चाहिए, (स्मरण करने से) मनो-कामना हासिल कर ली जाती है, यमराज के सारे सहम भी समाप्त हो जाते हैं। हे भाई! जिस मनुष्य ने साधु-संगत में जा के गोबिंद की महिमा की, उसकी (हरेक) आशा पूरी हो गई। हे भाई! अहंकार, मोह, सारे विकार दूर करके परमात्मा के मन को भा जाना है। नानक विनती करता है: हे भाई! दिन-रात सदा परमात्मा का स्मरण करना चाहिए।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दरि वाजहि अनहत वाजे राम ॥ घटि घटि हरि गोबिंदु गाजे राम ॥ गोविद गाजे सदा बिराजे अगम अगोचरु ऊचा ॥ गुण बेअंत किछु कहणु न जाई कोइ न सकै पहूचा ॥ आपि उपाए आपि प्रतिपाले जीअ जंत सभि साजे ॥ बिनवंति नानक सुखु नामि भगती दरि वजहि अनहद वाजे ॥४॥३॥
मूलम्
दरि वाजहि अनहत वाजे राम ॥ घटि घटि हरि गोबिंदु गाजे राम ॥ गोविद गाजे सदा बिराजे अगम अगोचरु ऊचा ॥ गुण बेअंत किछु कहणु न जाई कोइ न सकै पहूचा ॥ आपि उपाए आपि प्रतिपाले जीअ जंत सभि साजे ॥ बिनवंति नानक सुखु नामि भगती दरि वजहि अनहद वाजे ॥४॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दरि = दर में, हृदय में। वाजहि = बजते हैं। अनहद = एक रस, लगातार, हर वक्त। वाजे = प्रभु की महिमा के बाजे। घटि घटि = हरेक घट में। गाजे = गरजता (दिखता) है, प्रतयक्ष बसता दिखाई देता है। बिराजे = बसता। अगम = अगम्य (पहुँच से परे)। अगोचरु = (अ+गो+चरु। गो = ज्ञान-इंद्रिय। चरु = पहुँच) जिस तक ज्ञान-इंद्रिय की पहुँच ना हो सके। न सकै पहूचा = पहुँच नहीं सकता। उपाए = पैदा करता है। सभि = सारे। नामि = नाम में (जुड़ने से)। वजहि = बजते हैं।4।
अर्थ: (हे भाई! जिस मनुष्य के) हृदय में परमात्मा की महिमा के बाजे सदा बजते हैं (जिस मनुष्य के दिल में महिमा का प्रभाव प्रबल रहता है) उसको परमात्मा हरेक शरीर में प्रत्यक्ष बसता दिखाई देता है।
हे भाई! परमात्मा सदा हरेक शरीर में साफ तौर पर बस रहा है, पर (किसी चतुराई समझदारी के सहारे) उस तक पहुँच नहीं हो सकती, उस तक मनुष्य की ज्ञान-इंद्रिय की पहुँच नहीं है, वह सबसे ऊँचा है। हे भाई! परमात्मा में बेअंत गुण हैं, उसके स्वरूप के बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता, कोई मनुष्य उसके गुणों के आखिर तक नहीं पहुँच सकता।
हे भाई! परमात्मा खुद सबको पैदा करता है, खुद ही पालना करता है, सारे जीव-जंतु उसके खुद के ही बनाए हुए हैं। नानक विनती करता है परमात्मा के नाम में जुड़ने से परमात्मा की भक्ति करने से आनंद प्राप्त होता है, हृदय में परमात्मा की महिमा के एक-रस, जैसे बाजे बज पड़ते हैं।4।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रागु वडहंसु महला १ घरु ५ अलाहणीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
रागु वडहंसु महला १ घरु ५ अलाहणीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
धंनु सिरंदा सचा पातिसाहु जिनि जगु धंधै लाइआ ॥ मुहलति पुनी पाई भरी जानीअड़ा घति चलाइआ ॥ जानी घति चलाइआ लिखिआ आइआ रुंने वीर सबाए ॥ कांइआ हंस थीआ वेछोड़ा जां दिन पुंने मेरी माए ॥ जेहा लिखिआ तेहा पाइआ जेहा पुरबि कमाइआ ॥ धंनु सिरंदा सचा पातिसाहु जिनि जगु धंधै लाइआ ॥१॥
मूलम्
धंनु सिरंदा सचा पातिसाहु जिनि जगु धंधै लाइआ ॥ मुहलति पुनी पाई भरी जानीअड़ा घति चलाइआ ॥ जानी घति चलाइआ लिखिआ आइआ रुंने वीर सबाए ॥ कांइआ हंस थीआ वेछोड़ा जां दिन पुंने मेरी माए ॥ जेहा लिखिआ तेहा पाइआ जेहा पुरबि कमाइआ ॥ धंनु सिरंदा सचा पातिसाहु जिनि जगु धंधै लाइआ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: धंनु = धन्यतायोग्य, साराहनीय। सिरंदा = पैदा करने वाला, विधाता। सचा = सदा स्थिर रहने वाला। जिनि = जिस (बादशाह) ने। धंधै = (माया के) आहर में। मुहलति = मिला हुआ समय। पुनी = पुनी, पहुँच गई, पूरी हो गई। पाई = पन घड़ी की प्याली। इसके नीचे छेद होता है जिससे प्याली में पानी आता रहता है। पूरे एक घण्टे में प्याली पानी से भर के पानी में डूब जाती है। खाली करके प्याली फिर पानी पर रख दी जाती है, और इस तरह एक-एक घण्टे के समय पता चलता रहता है। जानीअड़ा = प्यारी साथी जीवात्मा। घति = पकड़ के। चलाइआ = आगे लगा लिया जाता है। वीर सबाए = सारे वीर, सारे सज्जन संबन्धि। हंस = जीवात्मा। पुंने = पुग गए, समाप्त हो गए। माए = हे माँ! पुरबि = मरने से पहले के समय में।1।
अर्थ: जिस (प्रभु) ने जगत को माया के चक्कर में लगा रखा है वही विधाता पातशाह सलाहने-योग्य है। (क्योंकि वही) सदा कायम रहने वाला है। (जीव बिचारे की कोई बिसात नहीं) जब जीव को मिला हुआ समय समाप्त हो जाता है जब इसकी उम्र की प्याली भर जाती है तो (शरीर के) प्यारे साथी को पकड़ के आगे लगा लिया जाता है। (उम्र के खत्म होने पर) जब परमात्मा का लिखा हुक्म आता है, शरीर के प्यारे साथी जीवात्मा को पकड़ के आगे लगा लिया जाता है, और सारे सजजन-संबंधी रोते हैं। हे मेरी माँ! जब उम्र के दिन पूरे हो जाते हैं, तो शरीर और जीवात्मा का (सदा के लिए) विछोड़ा हो जाता है। (उस अंत समय से) पहले-पहले जो कर्म जीव ने कमाए होते हैं (उस उस के अनुसार) जैसे जैसे संस्कारों का लेख (उसके माथे पर) लिखा जाता है वैसा ही फल जीव पाता है।
जिसने जगत को माया की आहर में लगा रखा है वही विधाता पातशाह सराहने-योग्य है वही सदा कायम रहने वाला है।1।
[[0579]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
साहिबु सिमरहु मेरे भाईहो सभना एहु पइआणा ॥ एथै धंधा कूड़ा चारि दिहा आगै सरपर जाणा ॥ आगै सरपर जाणा जिउ मिहमाणा काहे गारबु कीजै ॥ जितु सेविऐ दरगह सुखु पाईऐ नामु तिसै का लीजै ॥ आगै हुकमु न चलै मूले सिरि सिरि किआ विहाणा ॥ साहिबु सिमरिहु मेरे भाईहो सभना एहु पइआणा ॥२॥
मूलम्
साहिबु सिमरहु मेरे भाईहो सभना एहु पइआणा ॥ एथै धंधा कूड़ा चारि दिहा आगै सरपर जाणा ॥ आगै सरपर जाणा जिउ मिहमाणा काहे गारबु कीजै ॥ जितु सेविऐ दरगह सुखु पाईऐ नामु तिसै का लीजै ॥ आगै हुकमु न चलै मूले सिरि सिरि किआ विहाणा ॥ साहिबु सिमरिहु मेरे भाईहो सभना एहु पइआणा ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पइआणा = पयाना, कूच। एथै = यहाँ, इस संसार में। सरपर = जरूर। मिहमाणा = मेहमान। गारबु = गर्व, अहंकार। जितु सेविऐ = जिसका स्मरण करने से। मूले = बिल्कुल। सिरि सिरि = हरेक के सिर पर। किआ = किया, अपना अपना किया कर्म। विहाणा = बिहाना, बीतता है।2।
अर्थ: हे मेरे भाईयो! (सदा स्थिर) मालिक प्रभु का स्मरण करो। (दुनिया से) कूच तो सभी ने करना है। दुनिया में माया का आहर चार दिनों के लिए ही है, (हरेक ने ही) यहाँ से आगे (परलोक में) अवश्य चले जाना है। यहाँ से आगे जरूर (हरेक ने) चले जाना है, (यहाँ जगत में) हम मेहमान की तरह ही हैं, (किसी भी धन-पदार्थ आदि का) गुमान करना व्यर्थ है। उस परमात्मा का ही नाम स्मरणा चाहिए जिसके स्मरण करने से परमात्मा की हजूरी में आत्मिक आनंद मिलता है। (जगत में तो धन-पदार्थ वाले का हुक्म चल सकता है, पर) परलोक में किसी का भी हुक्म बिल्कुल नहीं चल सकता, वहाँ तो हरेक के सिर पर (अपने-अपने) किए अनुसार बीतती है।
हे मेरे भाईयो! (सदा स्थिर) मालिक प्रभु का स्मरण करो। (दुनिया से) सभी ने ही चले जाना है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जो तिसु भावै सम्रथ सो थीऐ हीलड़ा एहु संसारो ॥ जलि थलि महीअलि रवि रहिआ साचड़ा सिरजणहारो ॥ साचा सिरजणहारो अलख अपारो ता का अंतु न पाइआ ॥ आइआ तिन का सफलु भइआ है इक मनि जिनी धिआइआ ॥ ढाहे ढाहि उसारे आपे हुकमि सवारणहारो ॥ जो तिसु भावै सम्रथ सो थीऐ हीलड़ा एहु संसारो ॥३॥
मूलम्
जो तिसु भावै सम्रथ सो थीऐ हीलड़ा एहु संसारो ॥ जलि थलि महीअलि रवि रहिआ साचड़ा सिरजणहारो ॥ साचा सिरजणहारो अलख अपारो ता का अंतु न पाइआ ॥ आइआ तिन का सफलु भइआ है इक मनि जिनी धिआइआ ॥ ढाहे ढाहि उसारे आपे हुकमि सवारणहारो ॥ जो तिसु भावै सम्रथ सो थीऐ हीलड़ा एहु संसारो ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: संम्रथ = सर्व शक्तिमान। हीलड़ा = बहाना। संसारो = (भाव) संसारी जीवों का प्रयास। महीअलि = मही तलि, धरती के तल पर, धरती के ऊपरी अंतरिक्ष में, आकाश में। अलख = अदृष्ट। इक मनि = एक मन से, तवज्जो/ध्यान जोड़ के। ढाहि = गिरा के। हुकमि = हुक्म अनुसार।3।
अर्थ: जगत के जीवों का उद्यम तो एक बहाना ही है, होता वही कुछ है जो उस सर्व-शक्तिमान प्रभु को भाता है। वह सदा-स्थिर रहने वाला विधाता पानी में धरती पर आकाश में हर जगह मौजूद है। वह प्रभु सदा स्थिर रहने वाला है, सबको पैदा करने वाला है, अदृष्ट है, बेअंत है, कोई भी जीव उसके गुणों का अंत नहीं पा सकता। जगत में पैदा उनका ही सफल कहा जाता है जिन्होंने उस बेअंत प्रभु को तवज्जो जोड़ के स्मरण किया है। वह परमात्मा स्वयं ही जगत-रचना को गिरा देता है, गिरा के खुद ही फिर बना लेता है, वह अपने हुक्म में जीवों को अच्छे जीवन वाले बनाता है।
जगत के जीवों का उद्यम तो एक बहाना ही है, होता वही कुछ है जो उस सर्व-शक्तिमान प्रभु को अच्छा लगता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक रुंना बाबा जाणीऐ जे रोवै लाइ पिआरो ॥ वालेवे कारणि बाबा रोईऐ रोवणु सगल बिकारो ॥ रोवणु सगल बिकारो गाफलु संसारो माइआ कारणि रोवै ॥ चंगा मंदा किछु सूझै नाही इहु तनु एवै खोवै ॥ ऐथै आइआ सभु को जासी कूड़ि करहु अहंकारो ॥ नानक रुंना बाबा जाणीऐ जे रोवै लाइ पिआरो ॥४॥१॥
मूलम्
नानक रुंना बाबा जाणीऐ जे रोवै लाइ पिआरो ॥ वालेवे कारणि बाबा रोईऐ रोवणु सगल बिकारो ॥ रोवणु सगल बिकारो गाफलु संसारो माइआ कारणि रोवै ॥ चंगा मंदा किछु सूझै नाही इहु तनु एवै खोवै ॥ ऐथै आइआ सभु को जासी कूड़ि करहु अहंकारो ॥ नानक रुंना बाबा जाणीऐ जे रोवै लाइ पिआरो ॥४॥१॥
दर्पण-टिप्पनी
अलाहणीईआ: किसी के मरने पर गाए जाने वाले गीत। जब कोई प्राणी मरता है तो भाईचारे की औरतें मिल के रोती हैं। मरासणें उस मरे प्राणी की तारीफ में कविता सी कोई तुक सुर में पढ़ती हैं, उसके पीछे वही तुक सारी औरतें मिल के सुर में पढ़ती हैं और साथ बिलखती हैं। ये बिलखना भी ताल में ही होता है। मिरासन के उस गीत को ‘अलाहणियां’ कहा जाता है। सतिगुरु जी ने इस रोने-धोने को मना किया है और परमात्मा की रजा में चलने व उसकी महिमा करने का उपदेश देते हैं।
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बाबा = हे भाई! रुंना जाणीऐ = सही मायने में वैराग में आया समझो। वालेवे कारणि = धन पदार्थ की खातिर। बिकारो = बे कार, व्यर्थ। गाफलु = बेखबर, लापरवाह। खोवै = नाश करता है। कूड़ि = नाशवान जगत की खातिर।4।
अर्थ: हे नानक! (कह: विछुड़े संबन्धियों की मौत पर तो हर कोई वैराग में आ जाता है, पर इस वैराग के कोई मायने नहीं) हे भाई! उसी मनुष्य को सही (रूप में) वैराग में आया समझो, जो प्यार से (परमात्मा के मिलाप की खातिर) वैराग में आता है। हे भाई! दुनिया के धन पदार्थों की खातिर जो रोते हैं वह रोना सारा ही व्यर्थ जाता है। परमात्मा से भूला हुआ जगत की माया की खातिर रोता है ये सारा ही रुदन व्यर्थ है। (इस रोने से) मनुष्य को अच्छे-बुरे काम की पहचान नहीं आती, (माया की खातिर रो-रो के) इस शरीर को व्यर्थ ही नाश कर लेता है। हे भाई! हरेक जीव जो जगत में (जन्म ले के) आया है (अपना समय गुजार के) चला जाएगा, नाशवान जगत के मोह में फंस के (व्यर्थ) गुमान करते हो।
हे नानक! (कह:) हे भाई! उसी मनुष्य को सही वैराग में आया समझो जो (परमात्मा के मिलाप की खातिर) प्यार से वैराग में आता है।4।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला १ ॥ आवहु मिलहु सहेलीहो सचड़ा नामु लएहां ॥ रोवह बिरहा तन का आपणा साहिबु सम्हालेहां ॥ साहिबु सम्हालिह पंथु निहालिह असा भि ओथै जाणा ॥ जिस का कीआ तिन ही लीआ होआ तिसै का भाणा ॥ जो तिनि करि पाइआ सु आगै आइआ असी कि हुकमु करेहा ॥ आवहु मिलहु सहेलीहो सचड़ा नामु लएहा ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला १ ॥ आवहु मिलहु सहेलीहो सचड़ा नामु लएहां ॥ रोवह बिरहा तन का आपणा साहिबु सम्हालेहां ॥ साहिबु सम्हालिह पंथु निहालिह असा भि ओथै जाणा ॥ जिस का कीआ तिन ही लीआ होआ तिसै का भाणा ॥ जो तिनि करि पाइआ सु आगै आइआ असी कि हुकमु करेहा ॥ आवहु मिलहु सहेलीहो सचड़ा नामु लएहा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लएहां = हम लें। सचड़ा = सदा स्थिर रहने वाला। रोवह = हम रोएं, हम अफसोस करें। बिरहा = विछोड़ा। तन = शरीर। समालिह = हम याद करें। पंथु = रास्ता। निहालहि = हम देखें। कीआ = पैदा किया। लीआ = वापस ले लिया। भाणा = रजा। तिनि = उस जीव ने।1।
अर्थ: हे सहेलियो! (हे सत्संगी सज्जनों!) आओ, मिल के बैठें और परमात्मा का सदा स्थिर रहने वाला नाम स्मरण करें। आओ, प्रभु से अपने विछोड़े का बारंबार अफसोस से चेता करें, (वह वियोग दूर करने के लिए) मालिक प्रभु को याद करें। आओ, हम मालिक को दिल में बसाएं, और उस रास्ते को देखें (जिस रास्ते सब जा रहे हैं)। हमने भी (आखिर) उस परलोक में जाना है (जहाँ अनेक जा चुके हैं)। (किसी के मरने पर रोना व्यर्थ है) जिस प्रभु का ये पैदा किया हुआ था, उसने जीवात्मा वापस ले ली है, उसकी की रजा हुई है। यहाँ जगत में जीव ने जो कुछ किया, (मरने पर) उसके आगे आ जाता है। (इस ईश्वरीय नियम के आगे) हमारा कोई जोर नहीं चल सकता।
(इस वास्ते) हे सहेलियो! आओ, मिल के बैठें और सदा स्थिर रहने वाले प्रभु का नाम स्मरण करें।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मरणु न मंदा लोका आखीऐ जे मरि जाणै ऐसा कोइ ॥ सेविहु साहिबु सम्रथु आपणा पंथु सुहेला आगै होइ ॥ पंथि सुहेलै जावहु तां फलु पावहु आगै मिलै वडाई ॥ भेटै सिउ जावहु सचि समावहु तां पति लेखै पाई ॥ महली जाइ पावहु खसमै भावहु रंग सिउ रलीआ माणै ॥ मरणु न मंदा लोका आखीऐ जे कोई मरि जाणै ॥२॥
मूलम्
मरणु न मंदा लोका आखीऐ जे मरि जाणै ऐसा कोइ ॥ सेविहु साहिबु सम्रथु आपणा पंथु सुहेला आगै होइ ॥ पंथि सुहेलै जावहु तां फलु पावहु आगै मिलै वडाई ॥ भेटै सिउ जावहु सचि समावहु तां पति लेखै पाई ॥ महली जाइ पावहु खसमै भावहु रंग सिउ रलीआ माणै ॥ मरणु न मंदा लोका आखीऐ जे कोई मरि जाणै ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लोका = हे लोगो! ऐसा = एसी मौत। संम्रथु = सब ताकतों वाला। सुहेला = आसान। पंथि सुहेलै = आसान रास्ते पर। आगै = प्रभु की हजूरी में। वडाई = इज्जत। भेटै सिउ = (नाम की) भेटा ले के। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। लेखै = किए कर्मों के हिसाब के समय। महली = हजूरी में। रंग सिउ = प्रेम से।2।
अर्थ: हे लोगो! मौत को बुरा ना कहो (मौत अच्छी है, पर तब ही) अगर कोई मनुष्य उस तरीके से (जी के) मरना जानता हो। (वह तरीका ये है कि) अपने सर्व-शक्तिमान मालिक को स्मरण करो, (ताकि जीवन के सफर में) रास्ता आसान हो जाए (नाम-जपने की इनायत से) आसान जीवन-राह पर चलोगे तो इसका फल भी मिलेगा प्रभु की हजूरी में सम्मान मिलेगा। अगर प्रभु के नाम की भेटा ले के जाओगे तो उस सदा स्थिर प्रभु में एक-रूप हो जाओगे, किए कर्मों के हिसाब के समय इज्जत मिलेगी, प्रभु की हजूरी में स्थान प्राप्त करोगे, और पति-प्रभु को अच्छे लगोगे। (जो जीव ये भेटा ले के जाता है वह) प्रेम से आत्मिक आनंद लेता है।
हे लोगो! मौत को बुरा ना कहो (पर इस बात को वही समझता है) जो इस तरह मरना जानता हो।2।
[[0580]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
मरणु मुणसा सूरिआ हकु है जो होइ मरनि परवाणो ॥ सूरे सेई आगै आखीअहि दरगह पावहि साची माणो ॥ दरगह माणु पावहि पति सिउ जावहि आगै दूखु न लागै ॥ करि एकु धिआवहि तां फलु पावहि जितु सेविऐ भउ भागै ॥ ऊचा नही कहणा मन महि रहणा आपे जाणै जाणो ॥ मरणु मुणसां सूरिआ हकु है जो होइ मरहि परवाणो ॥३॥
मूलम्
मरणु मुणसा सूरिआ हकु है जो होइ मरनि परवाणो ॥ सूरे सेई आगै आखीअहि दरगह पावहि साची माणो ॥ दरगह माणु पावहि पति सिउ जावहि आगै दूखु न लागै ॥ करि एकु धिआवहि तां फलु पावहि जितु सेविऐ भउ भागै ॥ ऊचा नही कहणा मन महि रहणा आपे जाणै जाणो ॥ मरणु मुणसां सूरिआ हकु है जो होइ मरहि परवाणो ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हकु = बर हक, स्वीकार। जो = जो। सूरे = शूरवीर। माणो = इज्जत। पति = इज्जत। करि = कर के, मान के। ऊचा = अहंकार भरी बात। जाणो = जानने वाला प्रभु।3।
अर्थ: जो मनुष्य (जीते जी ही प्रभु की नजरों में) स्वीकार हो के मरते हैं वे शूरवीर हैं उनका मरना भी (लोक-परलोक में) सराहा जाता है। प्रभु की हजूरी में वही बंदे सूरमे कहे जाते हैं, वही बंदे सदा स्थिर प्रभु की दरगाह में आदर पाते हैं। वे दरगाह में सम्मान पाते हैं, सम्मान से (यहाँ से) जाते हैं और आगे परलोक में उन्हें कोई दुख नहीं व्यप्तता। वे लोग परमात्मा को (हर जगह) व्यापक समझ के स्मरण करते हैं, उस प्रभु के दर से फल प्राप्त करते हैं जिसका स्मरण करने से (हरेक किस्म का) डर दूर हो जाता है।
(हे भाई!) अहंकार के बोल नहीं बोलने चाहिए, अपने आप को काबू में रखना चाहिए, वह अंतरजामी प्रभु हरेक के दिल की खुद ही जानता है।
जो मनुष्य (जीते जी ही प्रभु की नजरों में) स्वीकार हो के मरते हैं वे शूरवीर है, उनका मरना (लोक-परलोक में) सराहा जाता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक किस नो बाबा रोईऐ बाजी है इहु संसारो ॥ कीता वेखै साहिबु आपणा कुदरति करे बीचारो ॥ कुदरति बीचारे धारण धारे जिनि कीआ सो जाणै ॥ आपे वेखै आपे बूझै आपे हुकमु पछाणै ॥ जिनि किछु कीआ सोई जाणै ता का रूपु अपारो ॥ नानक किस नो बाबा रोईऐ बाजी है इहु संसारो ॥४॥२॥
मूलम्
नानक किस नो बाबा रोईऐ बाजी है इहु संसारो ॥ कीता वेखै साहिबु आपणा कुदरति करे बीचारो ॥ कुदरति बीचारे धारण धारे जिनि कीआ सो जाणै ॥ आपे वेखै आपे बूझै आपे हुकमु पछाणै ॥ जिनि किछु कीआ सोई जाणै ता का रूपु अपारो ॥ नानक किस नो बाबा रोईऐ बाजी है इहु संसारो ॥४॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बाजी = खेल। वेखै = संभाल करता है। कुदरति = रची हुई सृष्टि। धारण धारे = आसरा देता है।4।
अर्थ: हे नानक! (कह:) हे भाई! ये जगत एक खेल है (खेल बनती-बिगड़ती ही रहती है) किसी के मरने पर रोना व्यर्थ है। मालिक प्रभु अपने पैदा किए जगत की स्वयं ही संभाल करता है, अपनी रची हुई रचना का खुद ही ध्यान रखता है। प्रभु अपनी रची रचना का ख्याल रखता है, इसको आसरा सहारा देता है, जिसने जगत रचा है वही इसकी जरूरतें भी जानता है। प्रभु स्वयं ही सबके किए कर्मों को देखता है, खुद ही सबके दिलों की समझता है, खुद ही अपने हुक्म को पहचानता है (कि कैसे ये हुक्म जगत में बरता जाना है)।
जिस प्रभु ने ये जगत-रचना की हुई है वही इसकी जरूरतें (भी) जानता है। उस प्रभु का स्वरूप बेअंत है।
हे नानक! (कह:) हे भाई! ये जगत एक खेल है (यहाँ जो घड़ा गया है उसने टूटना भी है) किसी के मरने पर रोना व्यर्थ है।4।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला १ दखणी ॥ सचु सिरंदा सचा जाणीऐ सचड़ा परवदगारो ॥ जिनि आपीनै आपु साजिआ सचड़ा अलख अपारो ॥ दुइ पुड़ जोड़ि विछोड़िअनु गुर बिनु घोरु अंधारो ॥ सूरजु चंदु सिरजिअनु अहिनिसि चलतु वीचारो ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला १ दखणी ॥ सचु सिरंदा सचा जाणीऐ सचड़ा परवदगारो ॥ जिनि आपीनै आपु साजिआ सचड़ा अलख अपारो ॥ दुइ पुड़ जोड़ि विछोड़िअनु गुर बिनु घोरु अंधारो ॥ सूरजु चंदु सिरजिअनु अहिनिसि चलतु वीचारो ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचु = सदा स्थिर रहने वाला। सिरंदा = विधाता, पैदा करने वाला। सचा = सदा स्थिर। परवदगारो = पालनहार। जिनि = जिस (विधाता) ने। आपीनै = (आप ही ने) खुद ही। आपु = अपने आप को। अलख = अदृष्ट। दुइ पुड़ = दोनों पुड़ (धरती और आकाश)। विछोड़िअनु = उसने विछोड़ दिए हैं, उसने अलग-अलग कर दिए हैं। घोरु अंधारे = घोर अंधेरा। सिरजिअनु = उसने पैदा किए हैं। अहि = दिन। निसि = रात। चलतु = (जगत) तमाशा।1।
अर्थ: (हे भाई!) निष्चय करो कि जगत को पैदा करने वाला परमात्मा ही सदा स्थिर रहने वाला है, वह सदा स्थिर प्रभु (जीवों की) पालना करने वाला है, जिस सदा स्थिर ने खुद ही अपने आप को (जगत के रूप में) प्रकट किया हुआ है, वह अदृश्य है और बेअंत है।
(धरती और आकाश जगत के) दोनों पुड़ जोड़ के (भाव, जगत रचना करके) उस प्रभु ने जीवों को माया के मोह में फसा के अपने से विछोड़ दिया है (भाव, ये प्रभु की रजा है कि जीव मोह में फंस के प्रभु को भुला बैठे हैं)। गुरु के बिना (जगत में माया के मोह का) घोर अंधेरा है।
उस परमात्मा ने ही सूरज और चंद्रमा बनाए हैं, (सूर्य) दिन के समय (चंद्रमा) रात को (प्रकाश देता है)। (हे भाई!) याद रख कि प्रभु का बनाया हुआ ये जगत तमाशा है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचड़ा साहिबु सचु तू सचड़ा देहि पिआरो ॥ रहाउ॥
मूलम्
सचड़ा साहिबु सचु तू सचड़ा देहि पिआरो ॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देहि = तू देता है। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! तू सदा ही स्थिर रहने वाला मालिक है। तू खुद ही सब जीवों को सदा स्थिर रहने वाले प्यार की दाति देता है। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तुधु सिरजी मेदनी दुखु सुखु देवणहारो ॥ नारी पुरख सिरजिऐ बिखु माइआ मोहु पिआरो ॥ खाणी बाणी तेरीआ देहि जीआ आधारो ॥ कुदरति तखतु रचाइआ सचि निबेड़णहारो ॥२॥
मूलम्
तुधु सिरजी मेदनी दुखु सुखु देवणहारो ॥ नारी पुरख सिरजिऐ बिखु माइआ मोहु पिआरो ॥ खाणी बाणी तेरीआ देहि जीआ आधारो ॥ कुदरति तखतु रचाइआ सचि निबेड़णहारो ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सिरजी = पैदा की। मेदनी = धरती। सिरजिऐ = पैदा करने से। बिखु = जहर। खाणी = उत्पक्ति के चारों वसीले (अण्डज, जेरज, सेतज, उत्भुज)। बाणी = जीवों की बोलियां। जीआ = जीवों को। आधारो = आसरा। सचि = सदा स्थिर नाम में (जोड़ के)। निबेडणहारो = फैसला करने वाला, लेखा समाप्त करने वाला।2।
अर्थ: हे प्रभु! तूने ही सृष्टि पैदा की है (जीवों को) दुख और सुख देने वाला भी तू ही है। (जगत में) स्त्रीयां और मर्द भी तूने ही पैदा किए है, माया जहर का मोह और प्यार भी तूने ही बनाए हैं। जीव उत्पक्ति की चार खाणियां और जीवों की बोलियां भी तेरी ही रची हुई हैं। सब जीवों को तू ही आसरा देता है। हे प्रभु! ये सारी रचना (-रूप) तख़त तूने (अपने बैठने के लिए) बनाया है, अपने सदा स्थिर नाम में (जोड़ के जीवों के कर्मों के लेख भी) तू खुद ही खत्म करने वाला है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आवा गवणु सिरजिआ तू थिरु करणैहारो ॥ जमणु मरणा आइ गइआ बधिकु जीउ बिकारो ॥ भूडड़ै नामु विसारिआ बूडड़ै किआ तिसु चारो ॥ गुण छोडि बिखु लदिआ अवगुण का वणजारो ॥३॥
मूलम्
आवा गवणु सिरजिआ तू थिरु करणैहारो ॥ जमणु मरणा आइ गइआ बधिकु जीउ बिकारो ॥ भूडड़ै नामु विसारिआ बूडड़ै किआ तिसु चारो ॥ गुण छोडि बिखु लदिआ अवगुण का वणजारो ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आवागवणु = जनम मरन का चक्र। थिरु = सदा कायम रहने वाला। आइ गइआ = पैदा हुआ और मर गया। बधिकु = बँधा हुआ। जीउ = जीवात्मा। भूडड़ै = बुरे ने। बूडड़ै = डूबे हुए ने। चारे = चारा, जोर। वणजारो = व्यापारी।3।
अर्थ: हे करणहार कर्तार! (जीवों के लिए) जनम-मरण का चक्कर तूने ही पैदा किया है, पर तू खुद सदा कायम रहने वाला है (तुझे ये चक्कर व्याप नहीं सकता)। (माया के मोह के कारण) विकारों में बँधा हुआ जीव नित्य पैदा होता है और मरता है, इसे जनम-मरण का चक्कर पड़ा ही रहता है। (माया के मोह में फंसे) बुरे जीव ने (तेरा) नाम भुला दिया है, मोह में डूबे हुए की कोई पेश नहीं चलती। गुणों को छोड़ के (विकारों का) जहर इस जीव ने एकत्र कर लिया है (जगत में आ के सारी उम्र) अवगुणों का ही बणज करता रहता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सदड़े आए तिना जानीआ हुकमि सचे करतारो ॥ नारी पुरख विछुंनिआ विछुड़िआ मेलणहारो ॥ रूपु न जाणै सोहणीऐ हुकमि बधी सिरि कारो ॥ बालक बिरधि न जाणनी तोड़नि हेतु पिआरो ॥४॥
मूलम्
सदड़े आए तिना जानीआ हुकमि सचे करतारो ॥ नारी पुरख विछुंनिआ विछुड़िआ मेलणहारो ॥ रूपु न जाणै सोहणीऐ हुकमि बधी सिरि कारो ॥ बालक बिरधि न जाणनी तोड़नि हेतु पिआरो ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जानीआ = (शरीर के साथी) जीवात्मा को। हुकमि = हुक्म अनुसार। सोहणीऐ = सुंदरी का। सिरि = सिर पे।4।
अर्थ: जब सदा स्थिर रहने वाले कर्तार के हुक्म में उन प्यारों को (यहाँ से कूच करने के) बुलावे आते हैं (जो यहाँ इकट्ठे जीवन निर्बाह कर रहे होते हैं) तो (एक साथ रहने वाले) स्त्री-मर्दों के विछोड़े हो जाते हैं (इस विछोड़े को कोई मिटा नहीं सकता)। विछुड़ों को तो परमात्मा खुद ही मिलाने में समर्थ है। यमराज के सिर पर भी परमात्मा के हुक्म में ही (मौत के माध्यम से जीवों के विछोड़े करने की) जिंमेदारी सौंपी गई है, कोई यम किसी सुंदरी के रूप की परवाह नहीं कर सकता (कि इस सुंदरी की मौत ना लाऊँ)। यम बच्चों और बुढों की भी परवाह नहीं करते। सब का (आपस में) मोह प्यार तोड़ देते हैं।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नउ दर ठाके हुकमि सचै हंसु गइआ गैणारे ॥ सा धन छुटी मुठी झूठि विधणीआ मिरतकड़ा अंङनड़े बारे ॥ सुरति मुई मरु माईए महल रुंनी दर बारे ॥ रोवहु कंत महेलीहो सचे के गुण सारे ॥५॥
मूलम्
नउ दर ठाके हुकमि सचै हंसु गइआ गैणारे ॥ सा धन छुटी मुठी झूठि विधणीआ मिरतकड़ा अंङनड़े बारे ॥ सुरति मुई मरु माईए महल रुंनी दर बारे ॥ रोवहु कंत महेलीहो सचे के गुण सारे ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नउ दर = नौ दरवाजे, नौ गोलकें (मुंह, 2 कान, 2 नासिकाएं, 2 आँखें, गुदा, लिंग)। ठाके = बंद किए गए। हंसु = जीवात्मा। गैणारे = आकाश में। सा धन = स्त्री, काया (जीवात्मा की स्त्री)। छूटी = अकेली रह गई। विधणीआ = (वि+धणी) निखसमी, बगैर पति के। मिरतकड़ा = लाश। अंञनड़े = आंगन में। माईए = हे माँ! मरु = मौत। महल = स्त्री। दरबारे = दहलीजों में। सारे = सारि, संभाल के याद करके।5।
अर्थ: जब सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के हुक्म में (मौत का बुलावा आता है तो शरीर के) नौ दरवाजे बंद हो जाते हैं, जीवात्मा (कहीं) आकाश में चली जाती है। (जिस स्त्री का पति मर जाता है) वह स्त्री अकेली रह जाती है, वह माया के मोह में लुट चुकी होती है, वह विधवा हो जाती है (उसके पति की) लाश घर के आंगन में पड़ी होती है (जिसे देख-देख के) वह स्त्री दहलीजों में बैठी रोती है (और कहती है:) हे माँ! इस मौत (को देख के) मेरी अक्ल ठिकाने नहीं रह गई।
हे प्रभु-पति की सि्त्रयो! (हे जीव-सि्त्रयो! शरीर के विछोड़े का ये सिलसिला बना ही रहना है, किसी ने भी यहाँ सदा बैठे नहीं रहना) तुम सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा की महिमा हृदय में संभाल के (प्रभु-कंत को याद करके) वैराग अवस्था में आओ (तब ही जीवन सफल होगा)।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जलि मलि जानी नावालिआ कपड़ि पटि अ्मबारे ॥ वाजे वजे सची बाणीआ पंच मुए मनु मारे ॥ जानी विछुंनड़े मेरा मरणु भइआ ध्रिगु जीवणु संसारे ॥ जीवतु मरै सु जाणीऐ पिर सचड़ै हेति पिआरे ॥६॥
मूलम्
जलि मलि जानी नावालिआ कपड़ि पटि अ्मबारे ॥ वाजे वजे सची बाणीआ पंच मुए मनु मारे ॥ जानी विछुंनड़े मेरा मरणु भइआ ध्रिगु जीवणु संसारे ॥ जीवतु मरै सु जाणीऐ पिर सचड़ै हेति पिआरे ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जलि = पानी में। मलि = मल के। जानी = प्यारे संबन्धियों ने। पटि = रेशम से। अंबारे = अंबरि, कपड़े से। सची बाणी = सदा स्थिर रहने वाली वाणी, ‘राम नाम सति है’। वाजे वजे = बोल बोले जाने लग पड़े। पंच = (माता पिता भाई स्त्री पुत्र) संबंधि। मुए = चिन्ता में मरे जैसे हो गए। मनु मारे = मन मारि, मन मार के, गम खा के।6।
अर्थ: साक-संबंधी (मरे हुए प्राणी की लाश को) मल-मल के स्नान करवाते हैं, और रेशम (आदि) कपड़े से (लपेटते हैं)। (उसे शमशान में ले जाने के लिए) ‘राम नाम सत्य है’ के बोल शुरू हो जाते हैं (माता, पिता भाई, पुत्र, स्त्री आदि) निकटवर्ती दुख में मृतक समान हो जाते हैं। (उसकी स्त्री रोती है और कहती है:) साथी के मरने से मैं भी मरे जैसी हो गई हूँ, अब संसार में मेरे जीने को भी धिक्कार है।
(पर ये मोह तो अवश्य ही दुखदाई है, ये शारीरिक विछोड़े तो होने ही हैं, हाँ) जो जीव, सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के प्यार में प्रेम में टिक के जगत में कार्य-व्यवहार करते हुए ही मोह से मरता (मुक्त रहता) है, वह (परमात्मा की हजूरी में) आदर पाता है।6।
[[0581]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
तुसी रोवहु रोवण आईहो झूठि मुठी संसारे ॥ हउ मुठड़ी धंधै धावणीआ पिरि छोडिअड़ी विधणकारे ॥ घरि घरि कंतु महेलीआ रूड़ै हेति पिआरे ॥ मै पिरु सचु सालाहणा हउ रहसिअड़ी नामि भतारे ॥७॥
मूलम्
तुसी रोवहु रोवण आईहो झूठि मुठी संसारे ॥ हउ मुठड़ी धंधै धावणीआ पिरि छोडिअड़ी विधणकारे ॥ घरि घरि कंतु महेलीआ रूड़ै हेति पिआरे ॥ मै पिरु सचु सालाहणा हउ रहसिअड़ी नामि भतारे ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: झूठि = झूठे मोह ने। मुठी = लूटा है। हउ = मैं। धावणीआ = माया की दौड़ भाग में। धंधै = माया के चक्कर में। पिरि = पिया ने, पति प्रभु ने। विधण = (वि+धणी) निखसमी। विधण कार = निखसमों वाली कार, पति प्रभु से टूट के किए जाने वाले काम। घरि घरि = हरेक हृदय में। महेलीआ जीव-स्त्रीयां। रुड़ै = सुंदर (प्रभु) के। हेति = प्रेम में। सहु = सदा स्थिर रहने वाला। हउ = मैं। रहसिअड़ी = खिली हुई, प्रसन्न। नामि = नाम में (जुड़ के)।7।
अर्थ: हे जीव-सि्त्रयो! जब तक संसार में तुम्हें माया के मोह ने ठगा हुआ है, तुम दुखी ही रहोगी, (यही समझा जाएगा कि) तुम दुखी होने के लिए ही जगत में आई हो।
जब तक मैं माया की आहर में माया की दौड़-भाग में ठगी जा रही हूँ, तब तक पति-विहीन स्त्री वाले कर्मों के कारण पति-प्रभु ने मुझे त्यागा हुआ है।
पति-प्रभु तो हरेक जीव-स्त्री के हृदय में बस रहा है। उसकी असल स्त्रीयां वही हैं जो उस सुंदर प्रभु के प्यार में प्रेम में मगन रहती हैं।
जितना समय मैं सदा स्थिर प्रभु-पति की महिमा करती हूँ उस पति के नाम में जुड़े रहने के कारण मेरा तन-मन खिला रहता है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरि मिलिऐ वेसु पलटिआ सा धन सचु सीगारो ॥ आवहु मिलहु सहेलीहो सिमरहु सिरजणहारो ॥ बईअरि नामि सुोहागणी सचु सवारणहारो ॥ गावहु गीतु न बिरहड़ा नानक ब्रहम बीचारो ॥८॥३॥
मूलम्
गुरि मिलिऐ वेसु पलटिआ सा धन सचु सीगारो ॥ आवहु मिलहु सहेलीहो सिमरहु सिरजणहारो ॥ बईअरि नामि सुोहागणी सचु सवारणहारो ॥ गावहु गीतु न बिरहड़ा नानक ब्रहम बीचारो ॥८॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरि मिलिऐ = अगर गुरु मिल जाए। वेसु = काया। सा धन = जीव-स्त्री। बईअरि = स्त्री। नामि = नाम में (जुड़ के)। बिरहड़ा = विछोड़ा। ब्रहम बीचारो = परमात्मा के गुणों का विचार।8।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘सुोहागणी’ में से अक्षर ‘स’ के साथ दो मात्राएं ‘ु’ और ‘ो’ लगी हैं। असल शब्द ‘सोहागणी’ है यहाँ पढ़ना है ‘सुहागणी’।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: अगर गुरु मिल जाए तो जीव-स्त्री की काया ही पलट जाती है, जीव-स्त्री सदा-स्थिर प्रभु के नाम को अपना श्रृंगार बना लेती है।
हे सहेलियो! (हे सत्संगियो!) आओ, मिल के बैठें। मिल जुल के विधाता का स्मरण करो। जो जीव-स्त्री प्रभु के नाम में जुड़ती है वह सुहाग-भाग वाली हो जाती है, सदा स्थिर प्रभु उसके जीवन को खूबसूरत बना देता है। हे नानक! (कह: हे सहेलियो!) प्रभु-पति की महिमा के गीत गाओ, प्रभु के गुणों को अपने हृदय में बसाओ, फिर कभी उससे विछोड़ा नहीं होगा (दुनिया वाले विछोड़े तो एक अटल नियम है, ये तो होते ही रहने हैं)।8।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला १ ॥ जिनि जगु सिरजि समाइआ सो साहिबु कुदरति जाणोवा ॥ सचड़ा दूरि न भालीऐ घटि घटि सबदु पछाणोवा ॥ सचु सबदु पछाणहु दूरि न जाणहु जिनि एह रचना राची ॥ नामु धिआए ता सुखु पाए बिनु नावै पिड़ काची ॥ जिनि थापी बिधि जाणै सोई किआ को कहै वखाणो ॥ जिनि जगु थापि वताइआ जालुो सो साहिबु परवाणो ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला १ ॥ जिनि जगु सिरजि समाइआ सो साहिबु कुदरति जाणोवा ॥ सचड़ा दूरि न भालीऐ घटि घटि सबदु पछाणोवा ॥ सचु सबदु पछाणहु दूरि न जाणहु जिनि एह रचना राची ॥ नामु धिआए ता सुखु पाए बिनु नावै पिड़ काची ॥ जिनि थापी बिधि जाणै सोई किआ को कहै वखाणो ॥ जिनि जगु थापि वताइआ जालुो सो साहिबु परवाणो ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिनि = जिस परमात्मा ने। सिरजि = पैदा करके। समाइआ = (अपने आप में) लीन कर लिया। कुदरति जाणो = कुदरत में बसता जान (हे भाई!)। सचड़ा = सदा स्थिर रहने वाला। घटि घटि = हरेक घट में। सबदु पछाणो = (हे भाई!) उस परमात्मा का शब्द पहचान। सबदु = हुक्म। सचु = सदा स्थिर। सचु = सदा स्थिर। जिनि = जिस परमात्मा ने। राची = रची, बनाई। पिढ़ काची = पिढ़ की कच्ची, विकारों से मुकाबले में जीतने से असमर्थ। बिधि = तरीका। वखाणो = उपदेश। वताइआ = बिछाया। जालुो = (असल उच्चारण ‘जालु’ है यहाँ ‘जालो’ पढ़ना है)।1।
अर्थ: (हे भाई!) जिस परमात्मा ने जगत पैदा करके इसको अपने आप में लीन करने की ताकत भी अपने पास रखी है उस मालिक को इस कुदरति में बसता समझ। (हे भाई!) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा को (रची कुदरत से) दूर (किसी और जगह) तलाशने का यत्न नहीं करना चाहिए। हरेक शरीर में उसी का हुक्म बरतता पहचान। (हे भाई!) जिस परमात्मा ने ये रचना रची है उसको इससे दूर (कहीं अलग) ना समझो, (हरेक शरीर में) उसका अटल हुक्म बरतता पहचानो।
जब मनुष्य परमात्मा का नाम स्मरण करता है तब आत्मिक आनंद पाता है (और विकारों का जोर भी इस पर नहीं पड़ सकता, पर) प्रभु के नाम के बिना दुनिया विकारों से मुकाबला जीतने में असमर्थ हो जाती है।
जिस परमात्मा ने रचना रची है वही इसकी रक्षा की विधि भी जानता है, कोई जीव (उसके उलट) कोई (और) उपदेश नहीं कर सकता। जिस प्रभु ने जगत पैदा करके (इसके ऊपर माया के मोह का) जाल बिछा रखा है वही जाना-माना मालिक है (और वही इस जाल में से जीवों को बचाने के समर्थ है)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाबा आइआ है उठि चलणा अध पंधै है संसारोवा ॥ सिरि सिरि सचड़ै लिखिआ दुखु सुखु पुरबि वीचारोवा ॥ दुखु सुखु दीआ जेहा कीआ सो निबहै जीअ नाले ॥ जेहे करम कराए करता दूजी कार न भाले ॥ आपि निरालमु धंधै बाधी करि हुकमु छडावणहारो ॥ अजु कलि करदिआ कालु बिआपै दूजै भाइ विकारो ॥२॥
मूलम्
बाबा आइआ है उठि चलणा अध पंधै है संसारोवा ॥ सिरि सिरि सचड़ै लिखिआ दुखु सुखु पुरबि वीचारोवा ॥ दुखु सुखु दीआ जेहा कीआ सो निबहै जीअ नाले ॥ जेहे करम कराए करता दूजी कार न भाले ॥ आपि निरालमु धंधै बाधी करि हुकमु छडावणहारो ॥ अजु कलि करदिआ कालु बिआपै दूजै भाइ विकारो ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बाबा = हे भाई! अध पंधै = आधे रास्ते पर, जनम मरण में। संसारो = संसार, जगत। सिरि सिरि = हरेक के सिर पर। सचड़ै = सदा स्थिर रहने वाले प्रभु ने। पूरबि विचारो = पूर्बले समय में किए कर्मों का विचार। जेहा कीआ = जैसा किसी ने कर्म किया। दूजी = कोई और। निरालमु = निर्लिप। बाधी = बँधी हुई। कालु विआपै = मौत आ दबाती है। भाइ = प्यार में। विकारो = विकार, व्यर्थ कर्म।2।
अर्थ: हे भाई! जो भी जीव (जगत में जन्म ले के) आया है उसने जरूर (यहाँ से) चले जाना है (जीव आया है यहाँ प्रभु का नाम-धन का व्यापार करने। नाम के बिना) जगत जन्म-मरण के चक्कर में पड़ा रहता है। सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा ने हरेक जीव के सिर पर उसके पूर्बले समय के किए कर्मों के विचार अनुसार दुख और सुख (भोगने) के लेख लिख दिए हैं। जैसा कर्म जीव ने किया वैसा ही सुख और दुख उसको परमात्मा ने दे दिया है। हरेक जीव के किए कर्मों का समूह उसके साथ ही निभता है।
(पर जीवों के भी क्या वश?) ईश्वर स्वयं ही जैसे कर्म जीवों से करवाता है (वैसे ही कर्म जीव करते हैं) कोई भी जीव (प्रभु की मर्जी से बाहर जा के) कोई और कर्म नहीं कर सकता। परमात्मा खुद तो (कर्मों से) निर्लिप है, दुनिया (अपने-अपने किए कर्मों के मुताबिक माया के) आहर में बँधी हुई है। (माया के इन बंधनो से भी) परमात्मा खुद ही हुक्म करके छुड़वाने के समर्थ है। (जीव माया के प्रभाव में नाम-स्मरण से आलस करता रहता है) आज स्मरण करते हैं, सवेरे करेंगे (यही टाल-मटोल) करते मौत आ दबोचती है। (प्रभु को बिसार के) और ही मोह में फंसा हुआ व्यर्थ के काम करता रहता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जम मारग पंथु न सुझई उझड़ु अंध गुबारोवा ॥ ना जलु लेफ तुलाईआ ना भोजन परकारोवा ॥ भोजन भाउ न ठंढा पाणी ना कापड़ु सीगारो ॥ गलि संगलु सिरि मारे ऊभौ ना दीसै घर बारो ॥ इब के राहे जमनि नाही पछुताणे सिरि भारो ॥ बिनु साचे को बेली नाही साचा एहु बीचारो ॥३॥
मूलम्
जम मारग पंथु न सुझई उझड़ु अंध गुबारोवा ॥ ना जलु लेफ तुलाईआ ना भोजन परकारोवा ॥ भोजन भाउ न ठंढा पाणी ना कापड़ु सीगारो ॥ गलि संगलु सिरि मारे ऊभौ ना दीसै घर बारो ॥ इब के राहे जमनि नाही पछुताणे सिरि भारो ॥ बिनु साचे को बेली नाही साचा एहु बीचारो ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मारगु = रास्ता। पंथु = रास्ता। उझड़ु = उजाड़। अंध गुबारो = अंध गुबार, घोर अंधेरा। परकारो = किस्म, प्रकार। ना भोजन परकारो = ना किसी किस्म का भोजन। गलि = गले में। सिरि = सिर पर। ऊभौ = खड़ा हुआ। घर बार = घर घाट, कोई आसरा। इब के राहे = अब के बीजे हुए। जंमनि नाही = नहीं उगते।3।
अर्थ: (सारी उम्र माया की दौड़-भाग में रह के परमात्मा का नाम भुलाने के कारण आखिर मौत आने पर) जीव यम वाला रास्ता पकड़ता है (जो इसके लिए) उजाड़ ही उजाड़ है जहाँ इसे घोर अंधकार प्रतीत होता है, जीव को कुछ नहीं सूझता (कि इस बिपता में से कैसे निकलूँ)। (सारी उम्र दुनिया के पदार्थ एकत्र करता रहा, पर यम के राह पर पड़ के) ना पानी, ना लेफ, ना तुलाई, ना किसी किस्म का भोजन, ना ठंडा पानी, ना ही सुंदर कपड़ा (ये सारे पदार्थ मौत ने छीन लिए, दुनिया में ही धरे रह गए)।
जमराज जीव के गले में (माया के मोह का) संगल डाल के इसके सिर पर खड़ा चोटें मारता है, (इन चोटों से बचने के लिए) इसको कोई आसरा नहीं दिखाई देता। (जब जम की चोटें पड़ रही होती हैं) उस वक्त बीजे हुए (स्मरण सेवा आदि के बीज) उग नहीं सकते। तब पछताता है, किए पापों का भार सिर पर पड़ा है (जो उतर नहीं सकता)।
हे भाई! इस अटल सच्चाई को याद रखो कि सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के बिना और कोई साथी नहीं बनता।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाबा रोवहि रवहि सु जाणीअहि मिलि रोवै गुण सारेवा ॥ रोवै माइआ मुठड़ी धंधड़ा रोवणहारेवा ॥ धंधा रोवै मैलु न धोवै सुपनंतरु संसारो ॥ जिउ बाजीगरु भरमै भूलै झूठि मुठी अहंकारो ॥ आपे मारगि पावणहारा आपे करम कमाए ॥ नामि रते गुरि पूरै राखे नानक सहजि सुभाए ॥४॥४॥
मूलम्
बाबा रोवहि रवहि सु जाणीअहि मिलि रोवै गुण सारेवा ॥ रोवै माइआ मुठड़ी धंधड़ा रोवणहारेवा ॥ धंधा रोवै मैलु न धोवै सुपनंतरु संसारो ॥ जिउ बाजीगरु भरमै भूलै झूठि मुठी अहंकारो ॥ आपे मारगि पावणहारा आपे करम कमाए ॥ नामि रते गुरि पूरै राखे नानक सहजि सुभाए ॥४॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बाबा = हे भाई! रोवहि = जो वैराग में आते हैं। रवहि = जो नाम स्मरण करते हैं। सु = वह लोग। जाणीअहि = आदर पाते हैं। मिलि = (साधु-संगत में) मिल बैठ के। रोवै = जो वैरागवान होता है। सारे = संभालता है। रोवै = दुखी होता है। मुठड़ी = लुटी हुई। सुपनंतरु = सुपन+अंतर, एक और सपना। मारगि = रास्ते पर। नामि = नाम में। गुरि = गुरु ने। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाए = श्रेष्ठ प्रेम में।4।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा का नाम स्मरण करते हैं और वैरागवान होते हैं वह (लोक-परलोक में) आदर पाते हैं। जो भी जीव साधु-संगत में मिल के प्रभु के गुण हृदय में बसाता है और वैरागवान होता है (वह आदर पाता है)।
पर जिस जीव-स्त्री को माया के मोह ने लूट लिया है वही दुखी होती है। (मोह में फसे हुए जीव सारी उम्र) धंधा ही पिटते हें और दुखी होते हैं।
जो जीव (सारी उम्र) माया का आहर करता ही दुखी रहता है, और कभी (अपने मन की) माया की मैल नहीं धोता, उसके वास्ते संसार (भाव, सारी ही उम्र) एक सपना ही बना रहा (भाव उसने यहाँ कमाया कुछ भी नहीं, जैसे मनुष्य सपने में दौड़-भाग तो करता है पर जाग आने पर उसके पल्ले कुछ भी नहीं रहता)। जैसे बाजीगर (तमाशा दिखाता है, देखने वाला दर्शक उसके तमाशे में खो जाता है, वैसे ही) झूठे मोह में ठगी हुई (खोई हुई) जीव-स्त्री भटकन में पड़ कर गलत रास्ते पड़ी रहती है, (झूठी माया का) मान करती है।
(पर, जीवों के भी कया वश?) परमात्मा स्वयं ही (जीवों को) सही राह पर डालने वाला है, स्वयं ही (जीवों में व्याप के) कर्म कर रहा है।
हे नानक! जो लोग परमात्मा के नाम-रंग में रंगे रहते हैं, उन्हें पूरे गुरु ने (माया के मोह से) बचा लिया है, वे आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं, वे प्रभु के प्रेम में जुड़े रहते हैं।4।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला १ ॥ बाबा आइआ है उठि चलणा इहु जगु झूठु पसारोवा ॥ सचा घरु सचड़ै सेवीऐ सचु खरा सचिआरोवा ॥ कूड़ि लबि जां थाइ न पासी अगै लहै न ठाओ ॥ अंतरि आउ न बैसहु कहीऐ जिउ सुंञै घरि काओ ॥ जमणु मरणु वडा वेछोड़ा बिनसै जगु सबाए ॥ लबि धंधै माइआ जगतु भुलाइआ कालु खड़ा रूआए ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला १ ॥ बाबा आइआ है उठि चलणा इहु जगु झूठु पसारोवा ॥ सचा घरु सचड़ै सेवीऐ सचु खरा सचिआरोवा ॥ कूड़ि लबि जां थाइ न पासी अगै लहै न ठाओ ॥ अंतरि आउ न बैसहु कहीऐ जिउ सुंञै घरि काओ ॥ जमणु मरणु वडा वेछोड़ा बिनसै जगु सबाए ॥ लबि धंधै माइआ जगतु भुलाइआ कालु खड़ा रूआए ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बाबा = हे भाई! झूठु = नाशवान। पसारो = खिलारा। सचा = सदा स्थिर रहने वाला। सचड़ै = सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा को। सचु = सदा स्थिर प्रभु। खरा = खालिस, असली, निर्मल। सचिआरो = सचिआर, (सच+आलय) सदा स्थिर प्रभु के प्रकाश के लिए योग्य। कूड़ि = माया के मोह में। लबि = लोभ में। थाइ न पासी = स्वीकार नहीं होता। थाइ = जगह में। ठाओ = जगह। काओ = कौआ। वडा विछोड़ा = परमात्मा से लंबा विछोड़ा। बिनसै = आत्मिक मौत मरता है। सबाए = सारे जीव। रूआए = रुलाता है।1।
अर्थ: हे भाई! (जगत में जो भी जीव जनम ले के) आया है उसने (आखिर यहाँ से) कूच कर जाना है (किसी ने यहाँ सदा बैठे नहीं रहना) ये जगत है ही नाशवान पसारा। यदि सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का स्मरण करें तो सदा-स्थिर रहने वाला ठिकाना मिल जाता है। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु को स्मरण करता है वह पवित्र जीवन वाला हो जाता है, वह सदा-स्थिर प्रभु के प्रकाश के योग्य बन जाता है।
जो मनुष्य माया के मोह में अथवा माया के लालच में फसा रहता है वह परमात्मा की दरगाह में स्वीकार नहीं होता, उसको प्रभु की हजूरी में जगह नहीं मिलती। जैसे सूने घर में गए कौए को (किसी ने रोटी की गिराही आदि नहीं डालनी) (वैसे ही माया के मोह में फंसे जीव को प्रभु की हजूरी में) किसी ने ये नहीं कहना - आओ जी, अंदर आ जाओ बैठ जाओ। उस मनुष्य को जनम-मरन के चक्र भुगतने पड़ जाते हैं, उसको (इस चक्कर के कारण प्रभु-चरणों से) लंबा विछोड़ा हो जाता है। (माया के मोह में फंस के) जगत आत्मिक मौत सहेड़ रहा है (जो भी मोह में फंसते हैं वे) सारे (आत्मिक मौत मरते हैं)। लालच के कारण माया के ही आहर में पड़ा हुआ जगत सही जीवन-राह से टूटा रहता है। इस सिर पर खड़ा काल इसे दुखी करता रहता है।1।
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विश्वास-प्रस्तुतिः
बाबा आवहु भाईहो गलि मिलह मिलि मिलि देह आसीसा हे ॥ बाबा सचड़ा मेलु न चुकई प्रीतम कीआ देह असीसा हे ॥ आसीसा देवहो भगति करेवहो मिलिआ का किआ मेलो ॥ इकि भूले नावहु थेहहु थावहु गुर सबदी सचु खेलो ॥ जम मारगि नही जाणा सबदि समाणा जुगि जुगि साचै वेसे ॥ साजन सैण मिलहु संजोगी गुर मिलि खोले फासे ॥२॥
मूलम्
बाबा आवहु भाईहो गलि मिलह मिलि मिलि देह आसीसा हे ॥ बाबा सचड़ा मेलु न चुकई प्रीतम कीआ देह असीसा हे ॥ आसीसा देवहो भगति करेवहो मिलिआ का किआ मेलो ॥ इकि भूले नावहु थेहहु थावहु गुर सबदी सचु खेलो ॥ जम मारगि नही जाणा सबदि समाणा जुगि जुगि साचै वेसे ॥ साजन सैण मिलहु संजोगी गुर मिलि खोले फासे ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भाईहो = हे भाईयो! गलि मिलह = आओ एक दूसरे के गले से मिलें, प्यार से मिल बैठें। देह = आओ, हम दें। सचड़ा = सदा टिके रहने वाला। देवहो = हे भाई! दो। करेवहो = करो। इकि = अनेक (जीव)। नावहु = नाम से। खेलो = खेल, जीवन क्रीड़ा। मारगि = रास्ते पर। सबदि = गुरु के शब्द में। साचै वेसे = उस प्रभु में जिसका स्वरूप सदा-स्थिर रहने वाला है। साजन सैण = हे सज्जन मित्रो! संजोगी = सत्संग में।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘इकि’ है ‘इक/एक’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे भाई! हे भाईयो! आओ, हम प्यार से मिल के बैठें, और मिल के (अपने विछुड़े साथी को) आसीसें दें (उसके वास्ते प्रभु दर पर अरदासें करें) प्रीतम-प्रभु से मिलने की आशीशें दें (प्रार्थनाएं करें। सदा-स्थिर मेल सिर्फ परमात्मा से ही होता है और अरदास की इनायत से वह) सदा स्थिर रहने वाला मिलाप कभी खत्म नहीं होता।
(हे सत्संगी भाईयो! मिल के विछुड़े साथी के लिए) अरदासें करो (और खुद भी) परमात्मा की भक्ति करो (भक्ति की इनायत से परमात्मा के चरणों में मिलाप हो जाता है) जो एक बार प्रभु चरणों से मिल जाते हैं उनका फिर कभी विछोड़ा नहीं होता।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाबा नांगड़ा आइआ जग महि दुखु सुखु लेखु लिखाइआ ॥ लिखिअड़ा साहा ना टलै जेहड़ा पुरबि कमाइआ ॥ बहि साचै लिखिआ अम्रितु बिखिआ जितु लाइआ तितु लागा ॥ कामणिआरी कामण पाए बहु रंगी गलि तागा ॥ होछी मति भइआ मनु होछा गुड़ु सा मखी खाइआ ॥ ना मरजादु आइआ कलि भीतरि नांगो बंधि चलाइआ ॥३॥
मूलम्
बाबा नांगड़ा आइआ जग महि दुखु सुखु लेखु लिखाइआ ॥ लिखिअड़ा साहा ना टलै जेहड़ा पुरबि कमाइआ ॥ बहि साचै लिखिआ अम्रितु बिखिआ जितु लाइआ तितु लागा ॥ कामणिआरी कामण पाए बहु रंगी गलि तागा ॥ होछी मति भइआ मनु होछा गुड़ु सा मखी खाइआ ॥ ना मरजादु आइआ कलि भीतरि नांगो बंधि चलाइआ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लेखु = किए कर्मों के अनुसार प्रभु द्वारा वह हुक्म जो आगे जगत में भोगना है। साहा = वह समय जो जीव की मौत के लिए नीयत हो चुका है।
दर्पण-टिप्पनी
(नोट: हिन्दुओं में लड़की-लड़के के ब्याह का समय पण्डित शास्त्रों को विचार के निश्चित करता है। ये नियम ‘साहा’ आगे-पीछे नहीं किया जा सकता। जैसे विवाह करके लड़की को माँ-बाप के घर से निहित ‘साहे’ के मुताबिक ससुराल भेज दिया जाता है, वैसे ही जीव-स्त्री जगत रूपी माता-पिता के के घर से चल पड़ती है)।
दर्पण-भाषार्थ
पुरबि = पूर्बले समय में। बहि = बैठ के, विचार के। साचै = सदा स्थिर प्रभु ने। अंम्रितु = नाम अमृत। बिखिआ = माया जहर। जितु = जिस ओर। कामणिआरी = जादम टूणे करने वाली (माया)। कामण = टूणे, जादू। गलि = गले में। होछी = तुच्छ बुद्धि। सा = जैसे। नामरजादु = (ना+मरजादु) मर्यादा रहित, नंगा। कलि = जगत। बंधि = बाँध के।3।
अर्थ: पर, कई ऐसे हैं जो परमात्मा के नाम से टूटे फिरते हैं जो सदा-कायम रहने वाले ठिकाने से उखड़े फिरते हैं। सदा-स्थिर प्रभु का नाम स्मरणा सही जीवन-खेल है जो गुरु के शब्द में जुड़ के खेली जा सकती है। जो मनुष्य गुरु के शब्द में लीन रहते हैं वे जम के रास्ते पर नहीं जाते, वे सदा के लिए ही उस परमात्मा में जुड़े रहते हैं जिसका स्वरूप (भेस) सदा के लिए अटल है।
हे सज्जन मित्र सत्संगियो! सत्संग में मिल बैठो। जो लोग सत्संग में आए हैं उन्होंने गुरु को मिल के माया के मोह के बंधन काट लिए हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाबा रोवहु जे किसै रोवणा जानीअड़ा बंधि पठाइआ है ॥ लिखिअड़ा लेखु न मेटीऐ दरि हाकारड़ा आइआ है ॥ हाकारा आइआ जा तिसु भाइआ रुंने रोवणहारे ॥ पुत भाई भातीजे रोवहि प्रीतम अति पिआरे ॥ भै रोवै गुण सारि समाले को मरै न मुइआ नाले ॥ नानक जुगि जुगि जाण सिजाणा रोवहि सचु समाले ॥४॥५॥
मूलम्
बाबा रोवहु जे किसै रोवणा जानीअड़ा बंधि पठाइआ है ॥ लिखिअड़ा लेखु न मेटीऐ दरि हाकारड़ा आइआ है ॥ हाकारा आइआ जा तिसु भाइआ रुंने रोवणहारे ॥ पुत भाई भातीजे रोवहि प्रीतम अति पिआरे ॥ भै रोवै गुण सारि समाले को मरै न मुइआ नाले ॥ नानक जुगि जुगि जाण सिजाणा रोवहि सचु समाले ॥४॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रोवहु = रो धो लो। जानीअड़ा = प्यारा संबंधी। पठाइआ है = यहाँ से चला दिया है। दरि = (प्रभु के) दर से। हाकारड़ा = बुलावा। जा = जब। तिसु = उस प्रभु को। रोवणहारे = रोने वाले। भै = (अपनी किसी मुसीबत के) डर के कारण। सारि = याद करके। को = कोई जीव। जुगि जुगि = हरेक युग में, सदा ही। सि = वह लोग। जाण जाणा = समझदार से समझदार। रोवहि = वैराग में आते हैं, प्रभु से विछोड़ा अनुभव करते हैं। सचु = सदा स्थिर प्रभु। समाले = समाल, याद कर के।4।
अर्थ: हे भाई! (जीव अपने पूर्बले किए कर्मों के अनुसार नए जीवन में भोगने के लिए) दुख और सुख रूपी लेख (परमातमा की दरगाह में से अपने माथे पर) लिखा के जगत में नंगा ही आता है (जनम के समय ही वह समय भी नियत किया जाता है जब जीव ने जगत से वापस चले जाना होता है) वह निश्चित किया हुआ समय आगे-पीछे नहीं हो सकता (ना ही वह दुख-सुख घटित होने से हट सकता है) जो पूर्बले जनम में कर्म करके (कमाई के रूप में) कमाया है। (जीव के किए कर्मों के अनुसार) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा ने सोच-विचार के लिख दिया होता है कि जीव के नए जीव-सफर में नाम-अमृत का व्यापार करना है अथवा माया-जहर की कमाई करनी है। (पिछले किए कर्मों के अनुसार ही प्रभु की रजा में) जिधर जीव को लगाया जाता है उधर ये लग पड़ता है। (उसी लेख अनुसार ही) जादू-टूणे वाली माया, जीव पर जादू कर देती है, इसके गले में कई रंगों वाला धागा डाल देती है (भाव, विभिन्न तरीकों से माया इसे मोह लेती है)। (इस मोहनी माया के प्रभाव में ही) जीव की मति तुच्छ हो जाती है, जीव का मन छोटा रह जाता है (भाव, इसमें भेद भाव और तेर मेर आ जाती है, अपने छोटे से स्वार्थ से बाहर सोच नहीं सकता देख नहीं सकता), जैसे मक्खी गुड़ खाती है (और गुड़ से चिपक के ही मर जाती है, वैसे ही जीव माया से चिपक के आत्मिक मौत मर जाता है)। जीव जगत में नंगा ही आता है और नंगा ही बाँध के आगे लगा लिया जाता है।3।
हे भाई! (जिस जीव को यहाँ से चले जाने का बुलावा आ जाता है, रो रो के उस बुलावे को टाला नहीं जा सकता, ये अटल नियम है, पर फिर भी) अगर किसी ने (इस बुलावे को टालने के लिए) रोना ही है तो रो-रो के देख ले। प्यारा संबन्धी बाँध के आगे चला दिया जाता है। (उसके यहाँ से कूच करने के लिए परमात्मा की दरगाह का) लिखा हुक्म मिटाया नहीं जा सकता, प्रभु के दर से बुलावा आ जाता है (वह बुलावा अमिट है)।
जब परमात्मा को (अपनी रजा में) अच्छा लगता है, तो (जीव के लिए जाने का) बुलावा आ जाता है, रोने वाले संबन्धी रोते हैं। पुत्र, भाई, भतीजे, बड़े प्यारे सम्बन्धी (सभी ही) रोते हैं।
जीव (कूच कर जाने वाले अपने सम्बन्धी के पीछे दुनिया में घटित होने वाले दुखों के) सहम में रोता है, और उसके गुणों (सुखों) को बार-बार याद करता है, पर कभी भी कोई जीव मरे हुए प्राणियों के साथ मरता नहीं है (जीना हरेक को प्यारा लगता है, आई के बिना कोई मर भी नहीं सकता)।
हे नानक! (ये मरने और पैदा होने का सिलसिला तो जारी ही रहना है) वे लोग सदा ही बहुत समझदार हैं जो सदा-स्थिर-प्रभु के गुण हृदय में बसा के माया के मोह से उपराम रहते हैं।4।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ महला तीजा ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ महला तीजा ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रभु सचड़ा हरि सालाहीऐ कारजु सभु किछु करणै जोगु ॥ सा धन रंड न कबहू बैसई ना कदे होवै सोगु ॥ ना कदे होवै सोगु अनदिनु रस भोग सा धन महलि समाणी ॥ जिनि प्रिउ जाता करम बिधाता बोले अम्रित बाणी ॥ गुणवंतीआ गुण सारहि अपणे कंत समालहि ना कदे लगै विजोगो ॥ सचड़ा पिरु सालाहीऐ सभु किछु करणै जोगो ॥१॥
मूलम्
प्रभु सचड़ा हरि सालाहीऐ कारजु सभु किछु करणै जोगु ॥ सा धन रंड न कबहू बैसई ना कदे होवै सोगु ॥ ना कदे होवै सोगु अनदिनु रस भोग सा धन महलि समाणी ॥ जिनि प्रिउ जाता करम बिधाता बोले अम्रित बाणी ॥ गुणवंतीआ गुण सारहि अपणे कंत समालहि ना कदे लगै विजोगो ॥ सचड़ा पिरु सालाहीऐ सभु किछु करणै जोगो ॥१॥
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शीर्षक के अंक ३ को ‘तीजा’ पढ़ना है। ये इशारे मात्र निर्देश है। हर जगह महला के अंक १, २, ३ आदि को पहला, दूजा, तीजा पढ़ना है।
नोट: इस वाणी का कोई नाम नहीं दिया गया। पर इससे पहले गुरु नानक देव जी की वाणी ‘अलाहणीआं’ नाम की है। महला ३ की ये वाणी भी उसी तरह ‘अलाहणीआ’ ही है।
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचड़ा = सदा कायम रहने वाला। सालाहीऐ = महिमा करनी चाहिए। करणै जोग = करने की सामर्थ्य रखने वाला। सा धन = जीव-स्त्री। न बैसई = न बैठे, नहीं बैठती। सोगु = ग़म। अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। महलि = परमात्मा की हजूरी में। जिनि = जिस (जीव-स्त्री) ने। प्रिउ जाता = प्रीतम प्रभु के साथ गहरी सांझ डाल ली। करम बिधाता = जीवों के कर्मों के अनुसार पैदा करने वाला। अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाली। सारहि = संभालती हैं। समालहि = दिल में बसाती हैं। विजोगो = विछोड़ा।1।
अर्थ: हे भाई! सदा कायम रहने वाले हरि-प्रभु की महिमा करनी चाहिए, वह सब कुछ हरेक काम करने की सामर्थ्य रखने वाला है।
हे भाई! जिस जीव-स्त्री ने विधाता प्रीतम प्रभु से गहरी सांझ डाल ली, जो जीव-स्त्री उस प्रभु की आत्मिक जीवन देने वाली वाणी उच्चारती है, वह जीव-स्त्री कभी पति-हीन नहीं होती, ना ही उसे कोई चिन्ता व्याप्तती है, उसे कभी कोई ग़म नहीं व्याप्तता, वह हर वक्त परमात्मा का नाम-रस का आनंद लेती है, और सदा प्रभु के चरणों में लीन रहती है।
हे भाई! गुणवान जीव-स्त्रीयां परमात्मा के गुणों को याद करती रहती हैं, पति-प्रभु को अपने हृदय में बसाए रखती हैं, उनका परमात्मा से कभी विछोड़ा नहीं होता। हे भाई! उस सदा स्थिर रहने वाले प्रभु-पति की महिमा करनी चाहिए, वह प्रभु सब कुछ करने की ताकत रखता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचड़ा साहिबु सबदि पछाणीऐ आपे लए मिलाए ॥ सा धन प्रिअ कै रंगि रती विचहु आपु गवाए ॥ विचहु आपु गवाए फिरि कालु न खाए गुरमुखि एको जाता ॥ कामणि इछ पुंनी अंतरि भिंनी मिलिआ जगजीवनु दाता ॥ सबद रंगि राती जोबनि माती पिर कै अंकि समाए ॥ सचड़ा साहिबु सबदि पछाणीऐ आपे लए मिलाए ॥२॥
मूलम्
सचड़ा साहिबु सबदि पछाणीऐ आपे लए मिलाए ॥ सा धन प्रिअ कै रंगि रती विचहु आपु गवाए ॥ विचहु आपु गवाए फिरि कालु न खाए गुरमुखि एको जाता ॥ कामणि इछ पुंनी अंतरि भिंनी मिलिआ जगजीवनु दाता ॥ सबद रंगि राती जोबनि माती पिर कै अंकि समाए ॥ सचड़ा साहिबु सबदि पछाणीऐ आपे लए मिलाए ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सबदि = (गुरु के) शब्द में (जुड़ने से)। आपे = आप ही। सा धन = जीव-स्त्री। प्रिअ कै रंगि = प्यारे के प्रेम रंग। रती = रंगी। आपु = स्वै भाव। कालु = मौत, मौत का डर, आत्मिक मौत। गुरमुखि = गुरु के द्वारा। एको = एक परमात्मा को ही। कामणि इछ = जीव-स्त्री की इच्छा। पुंनी = पूरी हो गई। भिंनी = भीगी हुई। जोबनि = (नाम के) जोबन में। माती = मस्त। अंकि = अंक में, गोद में।2।
अर्थ: हे भाई! गुरु के शब्द में जुड़ के सदा कायम रहने वाले मालिक प्रभु के साथ सांझ पड़ सकती है, प्रभु खुद ही (जीव को) अपने साथ मिला लेता है। हे भाई! जो जीव-स्त्री अपने अंदर से स्वै भाव दूर कर लेती है वह प्रभु-पति के प्रेम-रंग में रंगी जाती है। जो जीव-स्त्री अपने अंदर से स्वै भाव गवाती है, उसे दुबारा कभी आत्मिक मौत नहीं आती, गुरु की शरण पड़ के वह जीव-स्त्री एक परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाले रखती है, उस जीव-स्त्री की (चिरों की प्रभु मिलाप की) इच्छा पूरी हो जाती है, वह अंदर से (नाम-रस से) भीग जाती है, उसको जगत का जीवन दातार प्रभु मिल जाता है। हे भाई! जो जीव-स्त्री गुरु-शब्द के रंग में रंगी जाती है, वह नाम की चढ़ती-जवानी में मस्त रहती है, वह प्रभु-पति की गोद में लीन रहती है। हे भाई! गुरु के शब्द के द्वारा ही सदा-स्थिर-मालिक-प्रभु से जान-पहचान बनती है। प्रभु खुद ही अपने साथ मिला लेता है।2।
[[0583]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनी आपणा कंतु पछाणिआ हउ तिन पूछउ संता जाए ॥ आपु छोडि सेवा करी पिरु सचड़ा मिलै सहजि सुभाए ॥ पिरु सचा मिलै आए साचु कमाए साचि सबदि धन राती ॥ कदे न रांड सदा सोहागणि अंतरि सहज समाधी ॥ पिरु रहिआ भरपूरे वेखु हदूरे रंगु माणे सहजि सुभाए ॥ जिनी आपणा कंतु पछाणिआ हउ तिन पूछउ संता जाए ॥३॥
मूलम्
जिनी आपणा कंतु पछाणिआ हउ तिन पूछउ संता जाए ॥ आपु छोडि सेवा करी पिरु सचड़ा मिलै सहजि सुभाए ॥ पिरु सचा मिलै आए साचु कमाए साचि सबदि धन राती ॥ कदे न रांड सदा सोहागणि अंतरि सहज समाधी ॥ पिरु रहिआ भरपूरे वेखु हदूरे रंगु माणे सहजि सुभाए ॥ जिनी आपणा कंतु पछाणिआ हउ तिन पूछउ संता जाए ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिनी = जिन्होंने। कंतु = पति, पति प्रभु। हउ = मैं। पूछउ = पूछूँ, मैं पूछता हूँ। जाए = जा के। आपु = स्वै भाव। करी = मैं करता हूँ। सचड़ा = सदा कायम रहने वाला। सहजि = आत्मिक अडोलता से। सुभाए = प्यार से। आए = आ के। साचु = सदा स्थिर हरि नाम। साचि = सदा स्थिर हरि नाम में। सबदि = शब्द में। धन = जीव-स्त्री। भरपूरे = हर जगह व्यापक। हदूरे = अंग संग। माणे = माणि।3।
अर्थ: हे सखी! जिस संत जनों ने अपने पति-प्रभु के साथ सांझ डाल ली है, मैं जा के उनको पूछती हूँ। स्वै भाव त्याग के मैं उनकी सेवा करती हूँ। हे सखी! सदा कायम रहने वाला प्रभु-पति आत्मिक अडोलता में टिकने से प्रेम में जुड़ने से ही मिलता है। सदा-स्थिर प्रभु आ के उस जीव-स्त्री को मिल जाता है, जो सदा-स्थिर हरि-नाम जपने की कमाई करती है, जो सदा स्थिर हरि-नाम स्मरण में जुड़ी रहती है, जो गुरु के शब्द में रंगी रहती है। वह जीव-स्त्री सदा सुहाग वाली रहती है, वह कभी पति-विहीन नहीं होती, उसके अंदर आत्मिक अडोलता की समाधि लगी रहती है।
हे सखी! प्रभु-पति हर जगह मौजूद है, उसे तू अपने अंग-संग बसता देख, आत्मिक अडोलता में टिक के, प्रेम में जुड़ के उसके मिलाप का आनंद ले।
हे सखी! जिस संत-जनों ने अपने प्रभु-पति के साथ सांझ डाल ली है, मैं जा के उनसे पूछती हूँ (कि उसका मिलाप किस तरह हो सकता है?)।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पिरहु विछुंनीआ भी मिलह जे सतिगुर लागह साचे पाए ॥ सतिगुरु सदा दइआलु है अवगुण सबदि जलाए ॥ अउगुण सबदि जलाए दूजा भाउ गवाए सचे ही सचि राती ॥ सचै सबदि सदा सुखु पाइआ हउमै गई भराती ॥ पिरु निरमाइलु सदा सुखदाता नानक सबदि मिलाए ॥ पिरहु विछुंनीआ भी मिलह जे सतिगुर लागह साचे पाए ॥४॥१॥
मूलम्
पिरहु विछुंनीआ भी मिलह जे सतिगुर लागह साचे पाए ॥ सतिगुरु सदा दइआलु है अवगुण सबदि जलाए ॥ अउगुण सबदि जलाए दूजा भाउ गवाए सचे ही सचि राती ॥ सचै सबदि सदा सुखु पाइआ हउमै गई भराती ॥ पिरु निरमाइलु सदा सुखदाता नानक सबदि मिलाए ॥ पिरहु विछुंनीआ भी मिलह जे सतिगुर लागह साचे पाए ॥४॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पिरहु = प्रभु पति से। भी = दुबारा भी। मिलह = हम मिल सकती हैं। जे लागह = अगर हम लगें। साचे सतिगुर पाए = सच्चे सतिगुरु के चरणों में। सबदि = शब्द में (जोड़ के)। दूजा भाउ = माया का प्यार। सचे ही सचि = सदा कायम रहने वाले प्रभु में ही। राती = मस्त। भराती = भटकना। निरमाइलु = पवित्र।4।
अर्थ: हे सखी! हम जीव-स्त्रीयां प्रभु-पति से विछुड़ी हुई फिर भी उसको मिल सकती हैं अगर हम सच्चे सतिगुरु के चरणों में लगें। हे सखी! गुरु सदा दयावान है, वह (शरण पड़े के) अवगुण (अपने) शब्द में (जोड़ के) जला देता है। (हे सखी! गुरु की शरण पड़ने वाले के अवगुण शब्द द्वारा जला देता है, माया का प्यार दूर कर देता है)। (गुरु के चरणों में लगी हुई जीव-स्त्री) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा (की याद) में ही रंगी रहती है। सदा-स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द में जुड़ के वह सदा आनंद लेती है, उसका अहंकार उसकी भटकना दूर हो जाती है।
हे नानक! प्रभु-पति पवित्र करने वाला है, सदा सुख देने वाला है, (अपने गुरु) शब्द के माध्यम से उससे मिला देता है।
हे सखी! हम जीव-स्त्रीयां प्रभु-पति से विछुड़ी हुई फिर भी उसको मिल सकती हैं, यदि हम सच्चे सतिगुरु के चरण लगें।4।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ ॥ सुणिअहु कंत महेलीहो पिरु सेविहु सबदि वीचारि ॥ अवगणवंती पिरु न जाणई मुठी रोवै कंत विसारि ॥ रोवै कंत समालि सदा गुण सारि ना पिरु मरै न जाए ॥ गुरमुखि जाता सबदि पछाता साचै प्रेमि समाए ॥ जिनि अपणा पिरु नही जाता करम बिधाता कूड़ि मुठी कूड़िआरे ॥ सुणिअहु कंत महेलीहो पिरु सेविहु सबदि वीचारे ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ ॥ सुणिअहु कंत महेलीहो पिरु सेविहु सबदि वीचारि ॥ अवगणवंती पिरु न जाणई मुठी रोवै कंत विसारि ॥ रोवै कंत समालि सदा गुण सारि ना पिरु मरै न जाए ॥ गुरमुखि जाता सबदि पछाता साचै प्रेमि समाए ॥ जिनि अपणा पिरु नही जाता करम बिधाता कूड़ि मुठी कूड़िआरे ॥ सुणिअहु कंत महेलीहो पिरु सेविहु सबदि वीचारे ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: महेली = महिला, स्त्री। कंत महेलिहो = हे प्रभु पति की जीव स्त्रीयो! सबदि = शब्द से। जाणई = जाने, जानती। मुठी = ठगी हुई, जिसने आत्मिक जीवन लुटा लिया है। रोवै = दुखी होती है। संमालि = सम्भाल के, दिल में बसा के। सारि = संभाल के। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख रहने वाली जीव-स्त्री। प्रेमि = प्रेम में। जिनि = जिस ने। करम बिधाता = जीवों के किए कर्मों के अनुसार पैदा होने वाला। कूड़ि = झूठ में, माया के पसारे में।1।
अर्थ: हे प्रभु-पति की जीव सि्त्रयो! (मेरी बात) सुन लेनी (वह ये है कि) गुरु शब्द के द्वारा प्रभु के गुणों पर विचार करके प्रभु-पति की सेवा-भक्ति किया करो। जो जीव-स्त्री प्रभु-पति के साथ गहरी सांझ नहीं डालती, वह अवगुणों से भरी रहती है, प्रभु-पति को भुला के वह आत्मिक जीवन लुटा बैठती है, और, दुखी होती है। पर, जो जीव-स्त्री पति को हृदय में बसा के प्रभु के गुण सदा याद कर कर के (प्रभु के दर पर सदा) आरजू करती रहती है, उसका पति (-प्रभु) कभी मरता नहीं, उसे कभी छोड़ के नहीं जाता।
जो जीव-स्त्री गुरु की शरण पड़ कर प्रभु के साथ गहरी सांझ बना लेती है, गुरु के शब्द के माध्यम से प्रभु के साथ जान-पहचान बनाती है, वह सदा कायम रहने वाले प्रभु के प्रेम में लीन रहती है। जिस जीव-स्त्री ने अपने उस प्रभु-पति के साथ सांझ नहीं बनाई जो सब जीवों को उनके कर्मों के अनुसार पैदा करने वाला है, उस झूठ की बंजारन को माया का मोह ठग रखता है (इस वास्ते) हे प्रभु-पति की जीव-सि्त्रयो! (मेरी विनती) सुन लेनी- गुरु शब्द के द्वारा प्रभु के गुणों की विचार करके प्रभु की सेवा-भक्ति किया करो।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभु जगु आपि उपाइओनु आवणु जाणु संसारा ॥ माइआ मोहु खुआइअनु मरि जमै वारो वारा ॥ मरि जमै वारो वारा वधहि बिकारा गिआन विहूणी मूठी ॥ बिनु सबदै पिरु न पाइओ जनमु गवाइओ रोवै अवगुणिआरी झूठी ॥ पिरु जगजीवनु किस नो रोईऐ रोवै कंतु विसारे ॥ सभु जगु आपि उपाइओनु आवणु जाणु संसारे ॥२॥
मूलम्
सभु जगु आपि उपाइओनु आवणु जाणु संसारा ॥ माइआ मोहु खुआइअनु मरि जमै वारो वारा ॥ मरि जमै वारो वारा वधहि बिकारा गिआन विहूणी मूठी ॥ बिनु सबदै पिरु न पाइओ जनमु गवाइओ रोवै अवगुणिआरी झूठी ॥ पिरु जगजीवनु किस नो रोईऐ रोवै कंतु विसारे ॥ सभु जगु आपि उपाइओनु आवणु जाणु संसारे ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: उपाइओनु = उसने पैदा किया है। आवण जाणु = पैदा होना मरना। खुआइअनु = उसने गलत रास्ते पर डाल दिए हैं। वारो वारा = बार बार। मरि जंमै = मर के पैदा होना है। वधहि = बढ़ते हैं। विहूणी = विहीन। गिआन = आत्मिक जीवन की समझ। मूठी = लूटी जाती है। रोवै = दुखी होती है। अवगुणिआरी = अवगुणों से भरी हुई। झूठी = झूठे मोह में फंसी हुई। जग जीवनु = जगत का जीवन। किस नो रोईऐ = किस पर रोएं, किसी के मरने पर रोने की आवश्यक्ता नहीं। विसारे = भूल के।2।
अर्थ: हे भाई! सारा जगत और जगत का जनम मरण परमात्मा ने खुद बनाया है। माया का मोह (पैदा करके इस मोह में जगत को परमात्मा ने) आप ही भुलाया हुआ है (तभी तो) बार बार पैदा होता मरता रहता है। (माया के मोह में फंस के जीव) बार बार पैदा होता मरता रहता है, (इसमें) विकार बढ़ते रहते हैं। आत्मिक जीवन की सूझ से वंचित दुनिया आत्मिक जीवन की राशि-पूंजी लुटा बैठती है। गुरु के शब्द के बिना जीव-स्त्री प्रभु-पति का मिलाप हासिल नहीं कर सकती। अपना जन्म व्यर्थ गवा लेती है; अवगुणों से भरी हुई, और झूठे मोह में फसी हुई दुखी होती रहती है।
पर, हे भाई! प्रभु खुद ही जगत का जीवन (-आधार) है, किसी की आत्मिक मौत मरने पर रोना भी क्या हुआ? (जीव-स्त्री) प्रभु-पति को भुला के दुखी होती रहती है। हे भाई! सारे जगत को प्रभु ने खुद ही पैदा किया है, जगत का जनम-मरण भी प्रभु ने खुद ही बनाया है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सो पिरु सचा सद ही साचा है ना ओहु मरै न जाए ॥ भूली फिरै धन इआणीआ रंड बैठी दूजै भाए ॥ रंड बैठी दूजै भाए माइआ मोहि दुखु पाए आव घटै तनु छीजै ॥ जो किछु आइआ सभु किछु जासी दुखु लागा भाइ दूजै ॥ जमकालु न सूझै माइआ जगु लूझै लबि लोभि चितु लाए ॥ सो पिरु साचा सद ही साचा ना ओहु मरै न जाए ॥३॥
मूलम्
सो पिरु सचा सद ही साचा है ना ओहु मरै न जाए ॥ भूली फिरै धन इआणीआ रंड बैठी दूजै भाए ॥ रंड बैठी दूजै भाए माइआ मोहि दुखु पाए आव घटै तनु छीजै ॥ जो किछु आइआ सभु किछु जासी दुखु लागा भाइ दूजै ॥ जमकालु न सूझै माइआ जगु लूझै लबि लोभि चितु लाए ॥ सो पिरु साचा सद ही साचा ना ओहु मरै न जाए ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचा = सदा जीवित। सद ही = हमेशा ही। न जाए = ना पैदा होता है। भूली फिरै = भूली फिरती है। धन = जीव-स्त्री। रंड = विछुड़ी हई, पति विहीन, रंडी। दूजै भाए = माया के प्यार में। आव = उम्र। तनु = शरीर। छीजै = कमजोर होता जाता है। जासी = नाश हो जाएगा। लूझै = झगड़ता है। लबि = लोभ में।3।
अर्थ: हे भाई! वह प्रभु-पति सदा जीवित है, सदा ही जीता है, वह ना मरता है ना पैदा होता है। अंजान जीव-स्त्री उससे वंचित हुई फिरती है, माया के मोह में फंस के प्रभु से विछुड़ी रहती है। औरों के प्यार के कारण प्रभु से विछुड़ी रहती है, माया के मोह में फंस के दुख सहती है, (इस मोह में इसकी) उम्र गुजरती जाती है, और, शरीर कमजोर होता जाता है। (जगत का नियम तो है ही ये कि) जो कुछ यहाँ पैदा हुआ है वह सब कुछ नाश हो जाता है, पर माया के मोह के कारण (इस अटल नियम को भुला के जीव को किसी के मरने पर) दुख होता है। जगत (सदैव) माया की खातिर लड़ता-झगड़ता है, उसको (सिर पर) मौत नहीं सूझती, लब में लोभ में चिक्त लगाए रखता है।
हे भाई! वह प्रभु-पति सदा जीता है, सदा ही जीवित है, वह ना मरता है ना पैदा होता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इकि रोवहि पिरहि विछुंनीआ अंधी ना जाणै पिरु नाले ॥ गुर परसादी साचा पिरु मिलै अंतरि सदा समाले ॥ पिरु अंतरि समाले सदा है नाले मनमुखि जाता दूरे ॥ इहु तनु रुलै रुलाइआ कामि न आइआ जिनि खसमु न जाता हदूरे ॥ नानक सा धन मिलै मिलाई पिरु अंतरि सदा समाले ॥ इकि रोवहि पिरहि विछुंनीआ अंधी न जाणै पिरु है नाले ॥४॥२॥
मूलम्
इकि रोवहि पिरहि विछुंनीआ अंधी ना जाणै पिरु नाले ॥ गुर परसादी साचा पिरु मिलै अंतरि सदा समाले ॥ पिरु अंतरि समाले सदा है नाले मनमुखि जाता दूरे ॥ इहु तनु रुलै रुलाइआ कामि न आइआ जिनि खसमु न जाता हदूरे ॥ नानक सा धन मिलै मिलाई पिरु अंतरि सदा समाले ॥ इकि रोवहि पिरहि विछुंनीआ अंधी न जाणै पिरु है नाले ॥४॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: इकि = कई, बहुत। रोवहि = दुखी होती हैं। पिरहि = प्रभु पति से। अंधी = माया के मोह में अंधी हो चुकी जीव-स्त्री। परसादी = कृपा से। अंतरि = हृदय में। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री। जाता = समझती है। कामि = किसी काम में। जिनि = जिस (जीव-स्त्री) ने। हदूरे = अंग संग बसता। सा धन = जीव-स्त्री।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘इकि’ है ‘इक/एक’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: कई जीव-स्त्रीयां ऐसी हैं जो प्रभु-पति से विछुड़ के दुखी रहती हैं। माया के मोह में अंधी हुई जीव-स्त्री ये नहीं समझती कि प्रभु-पति हर वक्त साथ बसता है। गुरु की कृपा से जो जीव-स्त्री प्रभु-पति को सदा अपने हृदय में बसाए रखती है, उसे सदा जीता-जागता प्रभु मिल जाता है, वह जीव-स्त्री सदा प्रभु-पति को अपने दिल में बसाए रखती है उसको वह सदा अंग-संग दिखाई देता है। पर, अपने मन के पीछे चलने वाली प्रभु को दूर बसता समझती है। हे भाई! जिस जीव-स्त्री ने प्रभु-पति को अंग-संग बसता नहीं समझा, उसका ये शरीर (विकारों में) बेकार होता रहता है, और किसी काम नहीं आता। हे नानक! जो जीव-स्त्री (गुरु की कृपा से) प्रभु-पति को सदा अपने हृदय में बसाए रखती है, वह (गुरु की) मिलाई हुई प्रभु से मिल जाती है।
कई जीव-स्त्रीयां ऐसी हैं जो प्रभु-पति से विछुड़ के दुख पाती हैं। माया के मोह में अंधी हो चुकी जीव-स्त्री ये नहीं समझती कि प्रभु-पति हर वक्त साथ बसता है।4।2।
[[0584]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु मः ३ ॥ रोवहि पिरहि विछुंनीआ मै पिरु सचड़ा है सदा नाले ॥ जिनी चलणु सही जाणिआ सतिगुरु सेवहि नामु समाले ॥ सदा नामु समाले सतिगुरु है नाले सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ ॥ सबदे कालु मारि सचु उरि धारि फिरि आवण जाणु न होइआ ॥ सचा साहिबु सची नाई वेखै नदरि निहाले ॥ रोवहि पिरहु विछुंनीआ मै पिरु सचड़ा है सदा नाले ॥१॥
मूलम्
वडहंसु मः ३ ॥ रोवहि पिरहि विछुंनीआ मै पिरु सचड़ा है सदा नाले ॥ जिनी चलणु सही जाणिआ सतिगुरु सेवहि नामु समाले ॥ सदा नामु समाले सतिगुरु है नाले सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ ॥ सबदे कालु मारि सचु उरि धारि फिरि आवण जाणु न होइआ ॥ सचा साहिबु सची नाई वेखै नदरि निहाले ॥ रोवहि पिरहु विछुंनीआ मै पिरु सचड़ा है सदा नाले ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रोवहि = दुखी होती हैं। पिरहि = पिर से, प्रभु पति से। मै पिरु = मेरा प्रभु पति। सचड़ा = सदा जीता जागता। चलणु = चलना, कूच, मौत। सेवहि = सेवा करती हैं। समाले = संभाल हृदय में बसा के। सबदे = शब्द द्वारा। कालु = मौत, मौत का डर, आत्मिक मौत। मारि = मार के। उरि = हृदय में। धारि = रख के। सदा = सदा कायम रहने वाला। सची = सदा कायम रहने वाली। नाई = (स्ना से ‘असनाई’ और ‘नाई’ दो रूप हैं) बड़ाई, महिमा। नदरि = मेहर की निगाह। निहाले = देखता है।1।
अर्थ: प्रभु-पति से विछुड़ी हुई जीव-स्त्रीयां सदा दुखी रहती हैं (वे नहीं जानती कि) मेरा प्रभु-पति सदा जीता-जागता है, और, सदा हमारे साथ बसता है। हे भाई! जिस जीवों ने (जगत से आखिर) चले जाने को ठीक मान लिया है वे परमात्मा का नाम हृदय में बसा के गुरु की बताई हुई सेवा करते हैं। हे भाई! जो मनुष्य प्रभु के नाम को दिल में सदा बसाए रखता है, गुरु उस के अंग-संग बसता है, वह गुरु के द्वारा बताई हुई सेवा करके सुख लेता है। गुरु के शब्द की इनायत से मौत के डर को दूर करके वह मनुष्य सदा स्थिर प्रभु को अपने हृदय में बसाता है, उसको दुबारा जनम-मरन का चक्कर नहीं पड़ता। हे भाई! मालिक प्रभु सदा कायम रहने वाला है, उसकी बड़ाई सदा कायम रहने वाली है, वह मेहर की निगाह करके (सब जीवों की) संभाल करता है। (पर) प्रभु-पति से विछुड़ी हुई जीव-स्त्रीयां सदा दुखी रहती हैं (वह नहीं जानतीं कि) मेरा प्रभु-पति सदा जीता-जागता है, और सदा हमारे साथ बसता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रभु मेरा साहिबु सभ दू ऊचा है किव मिलां प्रीतम पिआरे ॥ सतिगुरि मेली तां सहजि मिली पिरु राखिआ उर धारे ॥ सदा उर धारे नेहु नालि पिआरे सतिगुर ते पिरु दिसै ॥ माइआ मोह का कचा चोला तितु पैधै पगु खिसै ॥ पिर रंगि राता सो सचा चोला तितु पैधै तिखा निवारे ॥ प्रभु मेरा साहिबु सभ दू ऊचा है किउ मिला प्रीतम पिआरे ॥२॥
मूलम्
प्रभु मेरा साहिबु सभ दू ऊचा है किव मिलां प्रीतम पिआरे ॥ सतिगुरि मेली तां सहजि मिली पिरु राखिआ उर धारे ॥ सदा उर धारे नेहु नालि पिआरे सतिगुर ते पिरु दिसै ॥ माइआ मोह का कचा चोला तितु पैधै पगु खिसै ॥ पिर रंगि राता सो सचा चोला तितु पैधै तिखा निवारे ॥ प्रभु मेरा साहिबु सभ दू ऊचा है किउ मिला प्रीतम पिआरे ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साहिबु = मालिक। सभदू = सबसे। किव = किस तरह? सतिगुरि = सतिगुरु ने। सहजि = आत्मिक अडोलता में (टिक के)। उर = हृदय। ते = से, के द्वारा। दिसै = दिखाई देता है, दर्शन होते हैं। कचा चोला = कच्चे रंग वाला चोला। तितु = उसके द्वारा। तितु पैधै = उसके पहनने से। पगु = पैर। खिसै = खिसकता है, फिसलता है, डोलता है। रंगि = रंग में। राता = रंगा हुआ। सचा चोला = पक्के रंग वाला चोला। तिखा = माया की तृष्णा। निवारे = दूर कर देता है।2।
अर्थ: हे भाई! मेरा मालिक प्रभु सबसे ऊँचा है (पर मैं जीव-स्त्री बड़े नीचे जीवन वाली हूँ) मैं उस प्यारे-प्रीतम को कैसे मिल सकती हूँ? जब गुरु ने (किसी जीव-स्त्री को उस प्रभु में) मिलाया, तो वह आत्मिक अडोलता में टिक के प्रभु के साथ मिल गई, उस जीव-स्त्री ने प्रभु-पति को अपने हृदय में बसा लिया। वह जीव-स्त्री प्रभु को सदा अपने हृदय में बसाए रखती है वह सदा प्यारे-प्रभु से प्यार बनाए रखती है। हे भाई! गुरु के माध्यम से प्रभु-पति के दर्शन होते हैं। माया का मोह, जैसे कच्चे रंग वाला चोला है, अगर ये चोला पहने रखें, (आत्मिक जीवन के राह में मनुष्य का) पैर फिसलता ही रहता है। प्रभु-पति के प्रेम-रंग में रंगा हुआ चोला पक्के रंग वाला है, अगर ये चोला पहन लें, तो (प्रभु का प्यार मनुष्य के हृदय में से माया की) तृष्णा दूर कर देता है।
हे भाई! मेरा मालिक प्रभु सबसे ऊँचा है (पर मैं जीव-स्त्री बहुत ही तुच्छ जीवन वाली हूँ) मैं उस प्यारे पति को कैसे मिल सकती हूँ?।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मै प्रभु सचु पछाणिआ होर भूली अवगणिआरे ॥ मै सदा रावे पिरु आपणा सचड़ै सबदि वीचारे ॥ सचै सबदि वीचारे रंगि राती नारे मिलि सतिगुर प्रीतमु पाइआ ॥ अंतरि रंगि राती सहजे माती गइआ दुसमनु दूखु सबाइआ ॥ अपने गुर कंउ तनु मनु दीजै तां मनु भीजै त्रिसना दूख निवारे ॥ मै पिरु सचु पछाणिआ होर भूली अवगणिआरे ॥३॥
मूलम्
मै प्रभु सचु पछाणिआ होर भूली अवगणिआरे ॥ मै सदा रावे पिरु आपणा सचड़ै सबदि वीचारे ॥ सचै सबदि वीचारे रंगि राती नारे मिलि सतिगुर प्रीतमु पाइआ ॥ अंतरि रंगि राती सहजे माती गइआ दुसमनु दूखु सबाइआ ॥ अपने गुर कंउ तनु मनु दीजै तां मनु भीजै त्रिसना दूख निवारे ॥ मै पिरु सचु पछाणिआ होर भूली अवगणिआरे ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचु = सदा कायम रहने वाला। पछाणिआ = सांझ डाली। अवगणिआरे = अवगुणों से भरी हुई। रावे = आत्मिक आनंद बख्शता है, चरणों से जोड़े रखता है। सबदि = शब्द से। वीचारे = विचार करके। रंगि = प्रेम रंग में। नारे = नारी, जीव-स्त्री। मिलि सतिगुर = गुरु को मिल के। सहजे = आत्मिक टडोलता में। माती = मस्त। सबाइआ = सारा। कंउ = को। दीजै = दे देना चाहिए। भीजै = भीग जाता है, रस जाता है।3।
अर्थ: (गुरु ने मेरे पर मेहर की, तब) मैंने सदा कायम रहने वाले परमात्मा के साथ सांझ डाल ली (पहचान बना ली)। जिसे गुरु का मिलाप नसीब ना हुआ वह अवगुण में फंसी रही और प्रभु-चरणों से वंचित रही। गुरु के शब्द से सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के गुणों की विचार करने के कारण मेरा प्रभु-पति मुझे सदा अपने चरणों में जोड़े रखता है।
जो जीव-स्त्री गुरु के शब्द द्वारा सदा-स्थिर प्रभु के गुणों की विचार अपने मन में बसाती है, वह प्रभु के प्रेम-रंग में रंगी रहती है, गुरु को मिल के वह प्रभु-प्रीतम को (अपने अंदर ही) पा लेती है, वह अपने अंतरात्मे परमात्मा के प्यार-रंग में रंगी रहती है, वह सदा आत्मिक अडोलता में मस्त रहती है, (उसके विकार आदि) हरेक दुश्मन और दुख दूर हो जाते हैं।
हे भाई! ये शरीर और ये मन अपने गुरु के हवाले कर देना चाहिए (जब तन-मन गुरु को दे दें) तब मन (हरि-नाम-रस से) भीग जाता है (गुरु मनुष्य के) तृष्णा आदि दुख दूर कर देता है। (गुरु ने मेरे पर मेहर की तब) मैंने सदा कायम रहने वाले परमात्मा के साथ सांझ डाली। जिसे गुरु का मिलाप नसीब ना हुआ वह अवगुणों में फंसी रही और प्रभु-चरणों से वंचित रही।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचड़ै आपि जगतु उपाइआ गुर बिनु घोर अंधारो ॥ आपि मिलाए आपि मिलै आपे देइ पिआरो ॥ आपे देइ पिआरो सहजि वापारो गुरमुखि जनमु सवारे ॥ धनु जग महि आइआ आपु गवाइआ दरि साचै सचिआरो ॥ गिआनि रतनि घटि चानणु होआ नानक नाम पिआरो ॥ सचड़ै आपि जगतु उपाइआ गुर बिनु घोर अंधारो ॥४॥३॥
मूलम्
सचड़ै आपि जगतु उपाइआ गुर बिनु घोर अंधारो ॥ आपि मिलाए आपि मिलै आपे देइ पिआरो ॥ आपे देइ पिआरो सहजि वापारो गुरमुखि जनमु सवारे ॥ धनु जग महि आइआ आपु गवाइआ दरि साचै सचिआरो ॥ गिआनि रतनि घटि चानणु होआ नानक नाम पिआरो ॥ सचड़ै आपि जगतु उपाइआ गुर बिनु घोर अंधारो ॥४॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचड़ै = सदा कायम रहने वाले प्रभु ने। घोर अंधारो = घोर अंधेरा। आपे = आप ही। देइ = देता है। सहजि = आत्मिक अडोलता में। वापारो = व्यापार, नाम का वणज। गुरमुखि = गुरु के द्वारा। धनु = सफल, धन्य। आपु = स्वै भाव। दरि = दर से। सचिआरो = सुर्ख रू। गिआनि = ज्ञान से, आत्मिक जीवन की सूझ से। रतनि = रतन से। घटि = हृदय में। नाम पिआरो = नाम का प्यार।4।
अर्थ: हे भाई! सदा कायम रहने वाले परमात्मा ने खुद यह जगत पैदा किया है, पर गुरु की शरण पड़े बिना जीव को (इसमें आत्मिक जीवन की ओर से) घोर अंधकार (बना रहता) है। (गुरु की शरण पा कर) परमात्मा स्वयं ही (जीव को अपने साथ) मिला लेता है, खुद (ही जीव को) मिलाता है, खुद ही (अपने चरणों का) प्यार बख्शता है। प्रभु खुद ही (अपना) प्यार देता है, (जीव को) आत्मिक अडोलता में टिका के (अपने नाम का) व्यापार करवाता है, और गुरु की शरण पा कर (जीव का) जनम सँवारता है। (जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ कर अपने अंदर से) स्वै भाव दूर करता है, उसका जगत में आना सफल हो जाता है, वह सदइा-स्थिर रहने वाले प्रभु के दर पर सही स्वीकार हो जाता है। हे नानक! (गुरु से मिले) ज्ञान-रत्न की इनायत से उसके हृदय में (आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो जाता है। हे भाई! सदा कायम रहने वाले परमात्मा ने स्वयं ये जगत पैदा किया है, पर गुरु की शरण पड़े बिना (जीव को इसमें आत्मिक जीवन की ओर से) घोर अंधकार बना ही रहता है।4।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंसु महला ३ ॥ इहु सरीरु जजरी है इस नो जरु पहुचै आए ॥ गुरि राखे से उबरे होरु मरि जमै आवै जाए ॥ होरि मरि जमहि आवहि जावहि अंति गए पछुतावहि बिनु नावै सुखु न होई ॥ ऐथै कमावै सो फलु पावै मनमुखि है पति खोई ॥ जम पुरि घोर अंधारु महा गुबारु ना तिथै भैण न भाई ॥ इहु सरीरु जजरी है इस नो जरु पहुचै आई ॥१॥
मूलम्
वडहंसु महला ३ ॥ इहु सरीरु जजरी है इस नो जरु पहुचै आए ॥ गुरि राखे से उबरे होरु मरि जमै आवै जाए ॥ होरि मरि जमहि आवहि जावहि अंति गए पछुतावहि बिनु नावै सुखु न होई ॥ ऐथै कमावै सो फलु पावै मनमुखि है पति खोई ॥ जम पुरि घोर अंधारु महा गुबारु ना तिथै भैण न भाई ॥ इहु सरीरु जजरी है इस नो जरु पहुचै आई ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जजरी = नाश हो जाने वाला, जर्जर।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘इस नो’ में से ‘इसु’ शब्द की ‘ु’ की मात्रा संबंधक ‘की’ के कारण हट गई है।
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जर = बुढ़ापा। पहुचै आइ = आ पहुँचता है। गुरि = गुरु ने। से = वह मनुष्य (बहुवचन)। उबरे = बच जाते हैं। होरु = जो मनुष्य गुरु की शरण नहीं आता। आवै = पैदा होता है। जाए = मरता है। होरि = और लोग, वे लोग जो गुरु की शरण नहीं आते। जंमहि = पैदा होते हैं। आवहि = पैदा होते हैं। जावहि = मर जाते हैं। अंति = आखिर में। गए = जाते हैं। ऐथै = इस जगत में। कमावै = (मनुष्य जो) कर्म करता है। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य। पति = इज्जत। जम पुरि = यमराज की पुरी में। घोरु अंधारु = घुप अंधेरा। महा गुबारु = बहुत अंधेरा। तिथै = उस जगह पर।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘होरि’ है ‘होर’ का बहुवचन है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे भाई! ये शरीर पुराना हो जाने वाला है, इसे बुढ़ापा (अवश्य) आ दबोचता है (पर मनुष्य इस शरीर के मोह में फंसा रहता है) जिस मनुष्यों की गुरु ने रक्षा की, वह (मोह में गर्क होने से) बच जाते हैं। जो मनुष्य गुरु की शरण नहीं आता, वह (इस शरीर के मोह में फंस के) पैदा होता और मरता है, मरता है पैदा होता है। गुरु की शरण ना पड़ने वाले मनुष्य (शारीरिक मोह में फंस के) बार बार पैदा होते हैं मरते हैं, अंत में जाते हुए हाथ मलते ही जाते हैं, परमात्मा के नाम के स्मरण के बिना उन्हें (कभी) सुख नसीब नहीं होता।
हे भाई! इस लोक में मनुष्य जो करणी करता है वही फल भोगता है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (इस लोक में) अपनी इज्जत गवा लेता है। यमराज की पुरी में भी (परलोक में भी उसके आत्मिक जीवन के लिए) घोर अंधेरा बहुत अंधकार ही टिका रहता है, (इस दुनिया वाला कोई) भाई-बहन उस लोक में सहायता नहीं कर सकता।
हे भाई! ये शरीर पुराना हो जाने वाला है, इसको बुढ़ापा (जरूर) आता है (पर, मनुष्य इस शरीर के मोह में फंसा रहता है)।1।
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विश्वास-प्रस्तुतिः
काइआ कंचनु तां थीऐ जां सतिगुरु लए मिलाए ॥ भ्रमु माइआ विचहु कटीऐ सचड़ै नामि समाए ॥ सचै नामि समाए हरि गुण गाए मिलि प्रीतम सुखु पाए ॥ सदा अनंदि रहै दिनु राती विचहु हंउमै जाए ॥ जिनी पुरखी हरि नामि चितु लाइआ तिन कै हंउ लागउ पाए ॥ कांइआ कंचनु तां थीऐ जा सतिगुरु लए मिलाए ॥२॥
मूलम्
काइआ कंचनु तां थीऐ जां सतिगुरु लए मिलाए ॥ भ्रमु माइआ विचहु कटीऐ सचड़ै नामि समाए ॥ सचै नामि समाए हरि गुण गाए मिलि प्रीतम सुखु पाए ॥ सदा अनंदि रहै दिनु राती विचहु हंउमै जाए ॥ जिनी पुरखी हरि नामि चितु लाइआ तिन कै हंउ लागउ पाए ॥ कांइआ कंचनु तां थीऐ जा सतिगुरु लए मिलाए ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: काइआ = शरीर। कंचनु = सोना, सोने जैसा पवित्र। तां = तब। लए मिलाए = मिला लिए। भ्रमु = भटकना। नामि = नाम में। समाए = लीन हो जाता है। मिलि प्रीतम = प्रीतम को मिल के। अनंदि = आनंद में। पुरखी = पुरखों ने। हंउ = मैं। तिन कै पाए = उनके चरणों में। लागउ = लगूँ, मैं लगता हूँ।2।
अर्थ: हे भाई! (मनुष्य का) ये शरीर तब सोने जैसा पवित्र होता है जब गुरु (मनुष्य को) परमात्मा के चरणों में जोड़ देता है। (तब मनुष्य) सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम में लीन हो जाता है, और इसके अंदर माया के प्रति भटकना दूर हो जाती है। मनुष्य सदा-स्थिर प्रभु के नाम में लीन हो जाता है, परमात्मा के गुण गाता रहता है, प्रभु-प्रीतम को मिल के आनंद लेता है। इस आनंद में दिन-रात टिका रहता है और इसके अंदर से अहंकार दूर हो जाता है।
हे भाई! जिस मनुष्यों ने परमात्मा के नाम में चिक्त जोड़ा हुआ है, मैं उनके चरण लगता हूँ। (मनुष्य का ये) शरीर तब सोने की तरह पवित्र हो जाता है, जब गुरु मनुष्य को परमात्मा के चरणों में जोड़ देता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सो सचा सचु सलाहीऐ जे सतिगुरु देइ बुझाए ॥ बिनु सतिगुर भरमि भुलाणीआ किआ मुहु देसनि आगै जाए ॥ किआ देनि मुहु जाए अवगुणि पछुताए दुखो दुखु कमाए ॥ नामि रतीआ से रंगि चलूला पिर कै अंकि समाए ॥ तिसु जेवडु अवरु न सूझई किसु आगै कहीऐ जाए ॥ सो सचा सचु सलाहीऐ जे सतिगुरु देइ बुझाए ॥३॥
मूलम्
सो सचा सचु सलाहीऐ जे सतिगुरु देइ बुझाए ॥ बिनु सतिगुर भरमि भुलाणीआ किआ मुहु देसनि आगै जाए ॥ किआ देनि मुहु जाए अवगुणि पछुताए दुखो दुखु कमाए ॥ नामि रतीआ से रंगि चलूला पिर कै अंकि समाए ॥ तिसु जेवडु अवरु न सूझई किसु आगै कहीऐ जाए ॥ सो सचा सचु सलाहीऐ जे सतिगुरु देइ बुझाए ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साच सचु = सदा कायम रहने वाला प्रभु। सलाहीऐ = सलाहा जा सकता है। देइ बुझाए = समझा दे, महिमा की समझ बख्श दे। भरमि = (माया की) भटकना में। भुलाणीआ = गलत रास्ते पड़ जाती है। देसनि = देंगी। आगै = परलोक में। जाए = जा के। देनि = देती हैं। अवगुणि = अवगुणों के कारण। पछुताए = (जीव-स्त्री) पछताती है। कमाए = कमा लेती है, ऊपर ले लेती है। नामि = नाम में। रंगि = रंग में। चलूला = गाढ़ा। अंकि = गोद में, गले से। समाए = समा के, लीन हो के। तिसु जेवडु = उस (परमात्मा) के बराबर का। जाए = जाइ, जा के।3।
अर्थ: हे भाई! उस सदा रहने वाले परमात्मा की महिमा तब ही की जा सकती है, अगर गुरु (महिमा करने की) बुद्धि दे। गुरु की शरण के बिना (जीव-सि्त्रयाँ माया की) भटकना में गलत रास्ते पर पड़ जाती हैं, और परलोक में जा के शर्म-सार होती हैं। परलोक में जा के वे मुँह नहीं दिखा सकतीं।
हे भाई! जो जीव-स्त्री अवगुण में फंस जाती है, वह आखिर पछताती है, वह सदा दुख ही दुख सहेड़ती है। परमात्मा के नाम में रंगी हुई जीव-स्त्रीयां परमात्मा के चरणों में लीन हो के गाढ़े प्रेम-रंग में (मस्त रहती हैं)।
हे भाई! उस परमात्मा के बराबर का (जगत में) कोई और नहीं दिखता (इस वास्ते परमात्मा के बिना) किसी और के आगे (कोई दुख-सुख) बताया नहीं जा सकता। (पर) उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा की महिमा तभी की जा सकती है, अगर गुरु (महिमा करने की) समझ बख्श दे।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनी सचड़ा सचु सलाहिआ हंउ तिन लागउ पाए ॥ से जन सचे निरमले तिन मिलिआ मलु सभ जाए ॥ तिन मिलिआ मलु सभ जाए सचै सरि नाए सचै सहजि सुभाए ॥ नामु निरंजनु अगमु अगोचरु सतिगुरि दीआ बुझाए ॥ अनदिनु भगति करहि रंगि राते नानक सचि समाए ॥ जिनी सचड़ा सचु धिआइआ हंउ तिन कै लागउ पाए ॥४॥४॥
मूलम्
जिनी सचड़ा सचु सलाहिआ हंउ तिन लागउ पाए ॥ से जन सचे निरमले तिन मिलिआ मलु सभ जाए ॥ तिन मिलिआ मलु सभ जाए सचै सरि नाए सचै सहजि सुभाए ॥ नामु निरंजनु अगमु अगोचरु सतिगुरि दीआ बुझाए ॥ अनदिनु भगति करहि रंगि राते नानक सचि समाए ॥ जिनी सचड़ा सचु धिआइआ हंउ तिन कै लागउ पाए ॥४॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचे = सदा स्थिर, अडोल चिक्त। सरि = सरोवर में। नाए = नहाए, स्नान कर लेता है। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाए = प्रेम में। सतिगुरि = गुरु ने। अनदिनु = हर रोज। सचि = सदा स्थिर हरि में। समाए = लीन रह के।4।
अर्थ: जिन्होंने सदा स्थिर-प्रभु की महिमा की, मैं उनके चरणों में लगता हूँ। वह मनुष्य अडोल-चिक्त हो जाते हैं, पवित्र हो जाते हैं, उनके दर्शन करने से (विकारों की) सारी मैल उतर जाती है। (जो मनुष्य उनका दर्शन करता है, वह मनुष्य) सदा-स्थिर प्रभु के नाम सरोवर मे स्नान करता है, वह सदा-स्थिर हरि में लीन हो जाता है, आत्मिक अडोलता में टिक जाता है, प्रेम-रंग में मस्त रहता है। हे भाई! परमात्मा का नाम माया की कालिख से रहित (करने वाला) है, पर प्रभु (समझदारी चतुराई से) नहीं पाया जा सकता (पहुँच से परे है), ज्ञान-इंद्रिय की भी उस तक पहुँच नहीं। जिनको गुरु ने (प्रभु की) सूझ दी, वे, हे नानक! सदा-स्थिर प्रभु में लीन हो के हर वक्त नाम-रंग में रंगे हुए प्रभु की भक्ति करते रहते हैं।
हे भाई! जिन्होंने सदा कायम रहने वाले परमात्मा की महिमा करने का उद्यम पकड़ लिया, मैं उनके चरणों में लगता हूँ।4।4।
दर्पण-भाव
वार का भाव
पउड़ी वार:
जिस परमात्मा ने अदृश्य रूप से स्वरूप वाला हो के यह जगत रचा है, जो सब कुछ करने के समर्थ है और जो सब जीवों को बिन मांगे ही दान देता है उसकी बंदगी की ख़ैर सतिगुरु से ही मिलती है।
सतिगुरु के अंदर परमात्मा प्रत्यक्ष प्रकट है, क्योंकि गुरु अपनत्व मिटा के परमात्मा के साथ एक-रूप हो जाता है। गुरु और लोगों को भी परमात्मा के नजदीक अंग-संग दिखा के विकारों से बचा लेता है और सुंदर राह पर डाल देता है।
सतिगुरु ही मनुष्य को परमात्मा से मिलने के राह बताता है, मनुष्य के मन में मोह का अंधेरा दूर करके उसको प्रभु की याद में जोड़ता है।
सतिगुरु सिख को सत्संग में सांझीवाल बनाता है, क्योंकि सत्संग में जा के सहज स्वभाव ही मनुष्य स्मरण में लग जाता है, वहाँ होती ही परमात्मा के गुणों की विचार है।
परमात्मा की महिमा की बातें सुनकर गुरु मनुष्य को परमात्मा के अस्तित्व की सूझ डाल देता है, बंदगी में जोड़ के तृष्णा आदि से बचाता है और संतोष वाला जीवन जीने की विधि सिखाता है।
सतिगुरु के उपदेश की इनायत से मनुष्य पराई आस त्यागता है; गुरु की वाणी के द्वारा प्रभु की महिमा करके मनुष्य के सारे दुख दूर हो जाते हैं; क्योंकि इसके अंदर एक परमात्मा की याद की चाहत बढ़ जाती है।
सतिगुरु की रहिनुमाई में ज्यों-ज्यों मनुष्य प्रभु का नाम स्मरण करता है, इसके अंदर से अहंकार दूर होता जाता है, अवगुण मिटते हैं और जीवन का आसरा परमात्मा नजदीक अंग-संग दिखने लग पड़ता है।
परमात्मा इन आँखों से दिखता नहीं; पर सतिगुरु मनुष्य को उसके गुण सुना-सुना के ये दृढ़ करवा देता है कि वह सब जीवों का मालिक हरेक दिल की जानता है और सब कुछ करने के समर्थ है। इस तरह गुरु मनुष्य के मन में परमात्मा के अंग-संग होने का विश्वास पैदा कर देता है।
सतिगुरु का मन पवित्र होता है, गुरु शाहों का शाह है जिसके पास प्रभु के नाम का खजाना है; गुरु के अंदर विवेक-मति होने के कारण उसको हर जगह परमात्मा ही परमात्मा दिखता है।
जरूरतों का मारा हुआ मनुष्य लोगों के दर पर जा के गुहार लगाता है; पर, सब जीवों का एक परमात्मा ही है; जो मनुष्य उसके दर पर सवाली होता है, उसी की मुराद भी पूरी होती है और प्रभु के नाम-जपने की इनायत से उसकी माया वाली भूख ही मिट जाती है।
ये ‘नाम’ सतिगुरु से ही मिलता है; गुरु नाम का, जैसे, खजाना है, भाग्यशाली मनुष्य ही गुरु से इस पदार्थ को पाते हैं, ‘नाम’ का वयापार करते हैं और जग में असल लाभ कमा के जाते हैं।
गुरु जिस मनुष्य के हृदय में ‘नाम’ दृढ़ करता है, उसके अंदर से अहंकार और दुविधा निकल जाती है उसका मन प्रेम के रंग से रंगा जाता है। उसे यकीन आ जाता है कि जगत में असल संगी प्रभु का नाम ही है।
बीते समय के महांपुरुषों की तरफ ही देख लो; प्रहलाद, जनक, वशिष्ट आदि सबको गुरु की शरण पड़ने पर ही नाम-जपने की दाति मिली; गुरु के बिना किसी को नहीं मिली।
जिस मनुष्य के मन में प्रभु का नाम बस जाए, सारा जगत उसके आगे झुकता है; उस मनुष्य को जगत में किसी की अधीनता नहीं रहती; पर ये इनायत प्रभु की मेहर से उसे ही नसीब होती है जो गुरु की शरण पड़े।
बंदगी करने वाला मनुष्य इस श्रद्धा पे आ टिकता है कि असल संग-साक परमात्मा ही है, दुख सुख के समय असली सलाहकार और साथी उसका नाम ही है। नतीजा ये निकलता है कि जितना समय यहाँ जीता है मनुष्य विकारों से बचा रहता है, और यहाँ से चलने के वक्त भी विकारों की कोई पोटली ले के नहीं चलता।
बंदगी वाले को प्रभु का नाम ही हर जगह रक्षक दिखता है, जगत से चलने के वक्त भी ‘नाम’ ही उसे माया की जंजीरों से छुड़वाता है; पर इस हरि नाम की समझ सतिगुरु परोपकारी से ही पड़ती है।
जगत में कोई तो सुंदर स्वादिष्ट पकवान खाने में मस्त है, कोई सुंदर कपड़े पहनने में मगन है, कोई निरा वणज-व्यापार में मशगूल है; पर, बंदगी वाले को जो रस -नाम’ में है, वह इन चीजों में नहीं मिलता। हाँ, इस लगन वाला होता कोई विरला ही है जिस पर मेहर हो और जो गुरु की शरण आए।
वह मनुष्य भाग्यशाली है जो गुरु की शरण पड़ कर गुरु की रजा में चल के परमात्मा का नाम स्मरण करता है, नाम-जपने की इनायत से उसके मन में खुशी और खिड़ाव पैदा होता है।
सतिगुरु की शरण पड़ने से मन में शांति पैदा होती है, परमात्मा के नाम में तवज्जो जुड़ती है और वैरी से भी मित्र भावना बन जाती है।
जो मनुष्य परमात्मा के नाम को जिंदगी का आसरा बनाता है, उसकी और सारी लालसाएं मिट जाती हैं, उसे हरेक जीव प्रभु में बसता दिखाई देता है।
जो मनुष्य गुरु के सन्मुख हो के नाम जपता है उसे ये निश्चय हो जाता है कि परमात्मा स्वयं ही सब जीवों को पैदा करने वाला है, हरेक में मौजूद है, मारने वाला भी वह खुद ही है और रखने वाला भी वह ही है। इस श्रद्धा से ज्यों-ज्यों स्मरण करता है, त्यों-त्यों कोई चिन्ता-फिक्र उससे दूर होते जाते हैं।
समूचा भाव:
(पउड़ी नंबर 1 और 2) प्रभु हरेक जीव में मौजूद है, पर ये प्रत्यक्ष विश्वास केवल गुरु को होता है, इस वास्ते प्रभु की बंदगी की खैर गुरु से ही मिल सकती है।
(पउड़ी नंबर 3 से 13 तक) गुरु की संगति में रह के ज्यों-ज्यों मनुष्य प्रभु की याद में जुड़ता है त्यों-त्यों इसके अंदर से मोह का अंधेरा, माया की तृष्णा व अहंकार मिट जाता है, प्रभु अंग-संग दिखाई देने लग पड़ता है, ये यकीन बन जाता है कि जगत में असल संगी हरि-नाम ही है। पिछले महापुरुष प्रहलाद, जनक, वशिष्ट आदि की ओर ही देख लो, गुरु के बिना किसी को प्राप्ति नहीं हुई।
(पउड़ी नंबर 14 से 21 तक) गुरु की शरण में रह कर नाम जपने से किसी की अधीनता नहीं रहती, असल संग-साक प्रभु ही है प्रतीत होने लगता है (ये समझ आ जाती है), वही हर जगह रक्षक दिखता है, नाम-रस जगत के अन्य सभी रसों से मीठा लगने लगता है, मन हर समय खिला रहता है, मित्र-वैरी एक समान प्रतीत होते हैं, हरेक जीव में ईश्वर ही दिखता है, मारने वाला भी वही और जीवित रखने वाला भी वही नजर आता है, इसलिए जगत का कोई डर छू नहीं सकता।
मुख्य भाव:
केवल गुरु की शरण पड़ने से ही मनुष्य सर्वव्यापक प्रभु की बंदगी कर सकता है, गुरु के बिना प्राप्ति नहीं हो सकती।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडहंस की वार महला ४ ललां बहलीमा की धुनि गावणी
मूलम्
वडहंस की वार महला ४ ललां बहलीमा की धुनि गावणी
दर्पण-टिप्पनी
काँगड़े के इलाके में (हिमाचल) दो छोटे-छोटे राजपूत राजे ललां और बहलीमा थे। एक बार ललां के क्षेत्र में मुश्किल आ बनी, उसने अपनी पैदावार का छेवाँ हिस्सा देने का इकरार करके बहलीमा की नहर से पानी लिया। पैदावार के समय अपने इस वादे को पूरा नहीं किया। दोनों में लड़ाई हो गई, जिसमें बहलीमा को विजय प्राप्त हुई। इस लड़ाई का वर्णन कवियों ने ‘वार’ के रूप में गाया, जिसका एक नमूना यहाँ दिया जा रहा है;
काल ललां दे देश दा खोया बहलीमा॥
हिस्सा छटा मनाय कै जलु नहरों दीना॥
फिराऊन होय ललां ने रण मंडिआ धीमा॥
भेड़ दुहू दिस मचिया सट पई अजीमा॥
सिर धड़ डिगे खेत विच जिउ वाहण ढीमा॥
देखि मारे ललां बहलीम ने रण महि बर्छीमा॥
सतिगुरु जी ने आज्ञा की है कि उक्त वार की सुर में गुरु रामदास जी की ये वडहंस की वार गायन करनी है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सलोक मः ३ ॥
मूलम्
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सलोक मः ३ ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
सबदि रते वड हंस है सचु नामु उरि धारि ॥ सचु संग्रहहि सद सचि रहहि सचै नामि पिआरि ॥ सदा निरमल मैलु न लगई नदरि कीती करतारि ॥ नानक हउ तिन कै बलिहारणै जो अनदिनु जपहि मुरारि ॥१॥
मूलम्
सबदि रते वड हंस है सचु नामु उरि धारि ॥ सचु संग्रहहि सद सचि रहहि सचै नामि पिआरि ॥ सदा निरमल मैलु न लगई नदरि कीती करतारि ॥ नानक हउ तिन कै बलिहारणै जो अनदिनु जपहि मुरारि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वडहंस = बड़े हंस, बड़े विवेकी। उरि = हृदय में। संग्रहहि = इकट्ठा करते हैं। सचि = सच में। पिआरि = प्यार के कारण। करतारि = कर्तार ने। मुरारि = परमात्मा।
अर्थ: जो मनुष्य सच्चे नाम को हृदय में परो के सतिगुरु के शब्द में रंगे हुए हैं, वे बड़े विवेकी (संत) हैं; वे सच्चा नाम (रूपी धन) एकत्र करते हैं, और सच्चे नाम में प्यार के कारण सच में ही लीन रहते हैं; कर्तार ने उन पर मेहर की नजर की है; (इसलिए) वे सदा पवित्र हैं उनको (विकारों की) मैल नहीं लगती। हे नानक! (कह:) जो मनुष्य हर वक्त प्रभु को स्मरण करते हैं, मैं उनके सदके हूँ।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ मै जानिआ वड हंसु है ता मै कीआ संगु ॥ जे जाणा बगु बपुड़ा त जनमि न देदी अंगु ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ मै जानिआ वड हंसु है ता मै कीआ संगु ॥ जे जाणा बगु बपुड़ा त जनमि न देदी अंगु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बगु = बगुला, पाखण्डी मनुष्य। जनमि = जनम से ही, आरम्भ से ही। अंगु न देई = पास नही बैठती।2।
अर्थ: मैंने समझा था कि ये कोई बड़ा संत है, इस वास्ते मैंने इससे साथ किया था; अगर मुझे पता होता कि ये बेचारा पाखण्डी मनुष्य है तो मैं शुरू से ही इसके पास ना बैठती।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ हंसा वेखि तरंदिआ बगां भि आया चाउ ॥ डुबि मुए बग बपुड़े सिरु तलि उपरि पाउ ॥३॥
मूलम्
मः ३ ॥ हंसा वेखि तरंदिआ बगां भि आया चाउ ॥ डुबि मुए बग बपुड़े सिरु तलि उपरि पाउ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तलि = नीचे। सिरु तलि, उपर पाउ = सिर नीचे और पैर ऊपर को पैर, सिर के बल हो के।3।
अर्थ: हंसों को तैरता देख के बगुलों को भी शौक पैदा हो गया (और वे भी हंस की नकल करके तैरने का प्रदर्शन करने लगे, पर हुआ क्या) बगुले बेचारे सिर के बल उलटे हो के डूब के मर गए।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ तू आपे ही आपि आपि है आपि कारणु कीआ ॥ तू आपे आपि निरंकारु है को अवरु न बीआ ॥ तू करण कारण समरथु है तू करहि सु थीआ ॥ तू अणमंगिआ दानु देवणा सभनाहा जीआ ॥ सभि आखहु सतिगुरु वाहु वाहु जिनि दानु हरि नामु मुखि दीआ ॥१॥
मूलम्
पउड़ी ॥ तू आपे ही आपि आपि है आपि कारणु कीआ ॥ तू आपे आपि निरंकारु है को अवरु न बीआ ॥ तू करण कारण समरथु है तू करहि सु थीआ ॥ तू अणमंगिआ दानु देवणा सभनाहा जीआ ॥ सभि आखहु सतिगुरु वाहु वाहु जिनि दानु हरि नामु मुखि दीआ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कारणु = मुढ, आरम्भ। निरंकारु = निर्गुण रूप, जिसका कोई खास रूप नहीं। बीआ = दूसरा। वाहु वाहु = धन्य।1।
अर्थ: हे प्रभु! संसार का आरम्भ तूने स्वयं किया, (क्योंकि इससे पहले भी) तू खुद ही है, तू स्वयं ही है; तेरा कोई खास स्वरूप नहीं है (जो मैं बयान कर सकूँ), तेरे जैसा कोई दूसरा नहीं है। सृष्टि की उत्पक्ति करने में तू ही समर्थ है, जो कुछ तू करता है वही होता है; तू सारे जीवों को (उनके) मांगे बिना ही सब दातें दे रहा है।
(हे भाई!) सभी कहो- सतिगुरु (भी) धन्य है जिसने (ऐसे) प्रभु की नाम-रूपी दात (हमारे) मुँह में डाली है (भाव, हमें नाम की दाति बख्शी है)।1।
[[0586]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु मः ३ ॥ भै विचि सभु आकारु है निरभउ हरि जीउ सोइ ॥ सतिगुरि सेविऐ हरि मनि वसै तिथै भउ कदे न होइ ॥ दुसमनु दुखु तिस नो नेड़ि न आवै पोहि न सकै कोइ ॥ गुरमुखि मनि वीचारिआ जो तिसु भावै सु होइ ॥ नानक आपे ही पति रखसी कारज सवारे सोइ ॥१॥
मूलम्
सलोकु मः ३ ॥ भै विचि सभु आकारु है निरभउ हरि जीउ सोइ ॥ सतिगुरि सेविऐ हरि मनि वसै तिथै भउ कदे न होइ ॥ दुसमनु दुखु तिस नो नेड़ि न आवै पोहि न सकै कोइ ॥ गुरमुखि मनि वीचारिआ जो तिसु भावै सु होइ ॥ नानक आपे ही पति रखसी कारज सवारे सोइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सतिगुरि सेविऐ = अगर गुरु की बताई कार करें, अगर गुरु के बताए हुए राह पर चलें। गुरमुखि = जो मनुष्य गुरु के राह पर चलता है, गुरु के सन्मुख मनुष्य। तिसु = उस (प्रभु) को।1।
अर्थ: (जगत का) सारा आकार (भाव, जगत में जो कुछ दिखाई दे रहा है) डर के अधीन है, एक वह परमात्मा ही (जिसने ये जगत बनाया है) डर से रहित है। अगर गुरु के बताए हुए राह पर चलें तो (वह डर रहित) प्रभु मन में आ बसता है, (फिर) उस मन में कभी (कोई) डर नहीं व्यप्तता, कोई वैरी उसके नजदीक नहीं फटकता, कोई दुख उसे छू नहीं सकता।
हे नानक! गुरमुखों के मन में ये विचार उठती है कि जो कुछ प्रभु को अच्छा लगता है वही होता है; हमारी इज्जत वह खुद ही रखेगा, (हमारे) काम वह स्वयं ही सँवारेगा।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ इकि सजण चले इकि चलि गए रहदे भी फुनि जाहि ॥ जिनी सतिगुरु न सेविओ से आइ गए पछुताहि ॥ नानक सचि रते से न विछुड़हि सतिगुरु सेवि समाहि ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ इकि सजण चले इकि चलि गए रहदे भी फुनि जाहि ॥ जिनी सतिगुरु न सेविओ से आइ गए पछुताहि ॥ नानक सचि रते से न विछुड़हि सतिगुरु सेवि समाहि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: कुछ सज्जन जाने को तैयार हैं, कुछ चले गए हैं, और बाकी के भी चले जाएंगे (भाव, जगत में जो भी आया है वह यहाँ सदा नहीं रह सकता); पर जिस मनुष्यों ने गुरु की बताई हुई कार नहीं की, वह जगत में आ के यहाँ से पछताते ही चले जाते हैं। हे नानक! जो मनुष्य सच्चे नाम में रंगे हुए हैं वह (परमात्मा से) नहीं विछुड़ते, वे गुरु की बताई हुई सेवा करके (प्रभु में) जुड़े रहते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ तिसु मिलीऐ सतिगुर सजणै जिसु अंतरि हरि गुणकारी ॥ तिसु मिलीऐ सतिगुर प्रीतमै जिनि हंउमै विचहु मारी ॥ सो सतिगुरु पूरा धनु धंनु है जिनि हरि उपदेसु दे सभ स्रिस्टि सवारी ॥ नित जपिअहु संतहु राम नामु भउजल बिखु तारी ॥ गुरि पूरै हरि उपदेसिआ गुर विटड़िअहु हंउ सद वारी ॥२॥
मूलम्
पउड़ी ॥ तिसु मिलीऐ सतिगुर सजणै जिसु अंतरि हरि गुणकारी ॥ तिसु मिलीऐ सतिगुर प्रीतमै जिनि हंउमै विचहु मारी ॥ सो सतिगुरु पूरा धनु धंनु है जिनि हरि उपदेसु दे सभ स्रिस्टि सवारी ॥ नित जपिअहु संतहु राम नामु भउजल बिखु तारी ॥ गुरि पूरै हरि उपदेसिआ गुर विटड़िअहु हंउ सद वारी ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भउजल = संसार समुंदर। बिखु = जहर। उपदेसिआ = नजदीक दिखाया है (दिश = हाथ आदि के इशारे से दिखाना। उप = नजदीक। उपदिश = नजदीक दिखा देना)।2।
अर्थ: उस प्यारे गुरु को मिलना चाहिए, जिसके हृदय में गुणों का श्रोत परमात्मा बस रहा है, उस प्रीतम सतिगुरु की शरण पड़ना चाहिए जिसने अपने अंदर से अहंकार दूर कर लिया है।
‘हे संत जनो! संसार-समुंदर के (माया रूपी) जहर से पार लंघाने वाला हरि-नाम जपो’ - प्रभु नाम-जपने की ये शिक्षा दे के जिस सतिगुरु ने सारी सृष्टि को सुंदर बना दिया है, वह सतिगुरु धन्य है, वह गुरु धन्य है। अपने सतिगुरु से मैं सदके हूँ, पूरे सतिगुरु ने मुझे परमात्मा नजदीक दिखा दिया है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु मः ३ ॥ सतिगुर की सेवा चाकरी सुखी हूं सुख सारु ॥ ऐथै मिलनि वडिआईआ दरगह मोख दुआरु ॥ सची कार कमावणी सचु पैनणु सचु नामु अधारु ॥ सची संगति सचि मिलै सचै नाइ पिआरु ॥ सचै सबदि हरखु सदा दरि सचै सचिआरु ॥ नानक सतिगुर की सेवा सो करै जिस नो नदरि करै करतारु ॥१॥
मूलम्
सलोकु मः ३ ॥ सतिगुर की सेवा चाकरी सुखी हूं सुख सारु ॥ ऐथै मिलनि वडिआईआ दरगह मोख दुआरु ॥ सची कार कमावणी सचु पैनणु सचु नामु अधारु ॥ सची संगति सचि मिलै सचै नाइ पिआरु ॥ सचै सबदि हरखु सदा दरि सचै सचिआरु ॥ नानक सतिगुर की सेवा सो करै जिस नो नदरि करै करतारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सारु = तत्व, निचोड़। सुखी हूँ सुख = अच्छे से अच्छे सुख का। ऐथै = जगत में।1।
अर्थ: गुरु की बताई चाकरी करनी बढ़िया से बढ़िया सुख का सार है (गुरु की बताई हुई सेवा करने से) जगत में आदर मिलता है, और प्रभु की हजूरी में सुर्खरूई का द्वार। (गुरु सेवा की यही) सच्ची कार कमाने के लायक है, (इससे) मनुष्य को (पर्दे ढकने के लिए) नाम-रूपी पोशाक मिल जाती है, सच्चा नाम-रूपी आसरा मिल जाता है, सच्ची संगति की प्राप्ति होती है, सच्चे नाम में प्यार पड़ता है और सच्चे प्रभु में समाई हो जाती है।
(गुरु के) सच्चे शब्द की इनायत से (मनुष्य के मन में) सदा खुशी बनी रहती है, और प्रभु की हजूरी में मनुष्य सही स्वीकार हो जाता है।
पर, हे नानक! सतिगुरु का बताया हुआ काम वही मनुष्य करता है, जिस पर प्रभु स्वयं मेहर की नजर करता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ होर विडाणी चाकरी ध्रिगु जीवणु ध्रिगु वासु ॥ अम्रितु छोडि बिखु लगे बिखु खटणा बिखु रासि ॥ बिखु खाणा बिखु पैनणा बिखु के मुखि गिरास ॥ ऐथै दुखो दुखु कमावणा मुइआ नरकि निवासु ॥ मनमुख मुहि मैलै सबदु न जाणनी काम करोधि विणासु ॥ सतिगुर का भउ छोडिआ मनहठि कमु न आवै रासि ॥ जम पुरि बधे मारीअहि को न सुणे अरदासि ॥ नानक पूरबि लिखिआ कमावणा गुरमुखि नामि निवासु ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ होर विडाणी चाकरी ध्रिगु जीवणु ध्रिगु वासु ॥ अम्रितु छोडि बिखु लगे बिखु खटणा बिखु रासि ॥ बिखु खाणा बिखु पैनणा बिखु के मुखि गिरास ॥ ऐथै दुखो दुखु कमावणा मुइआ नरकि निवासु ॥ मनमुख मुहि मैलै सबदु न जाणनी काम करोधि विणासु ॥ सतिगुर का भउ छोडिआ मनहठि कमु न आवै रासि ॥ जम पुरि बधे मारीअहि को न सुणे अरदासि ॥ नानक पूरबि लिखिआ कमावणा गुरमुखि नामि निवासु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (प्रभु की बंदगी छोड़ के) और बेगानी कार (करने वालों का) जीना और बसना धिक्कारयोग्य है (क्योंकि) वह मनुष्य अंमृत छोड़ के (माया रूप) जहर (एकत्र करने) में लगे हुए हैं, जहर ही उनकी कमाई है और जहर ही उनकी पूंजी है, जहर ही उनकी खुराक है जहर ही उनकी पोशाक है और जहर की ही वे मनुष्य मुंह में ग्रास डाल रहे हैं, ऐसे लोग जगत में निरा दुख ही भोगते हैं और मरने के बाद भी उनका वास नर्क में होता है। मुंह से मैले होने के कारण मन के पीछे चलने वाले मनुष्य गुरु के शब्द को नहीं पहचानते, काम-क्रोध आदि में उनकी (आत्मिक) मौत हो जाती है; सतिगुरु का अदब छोड़ देने के कारण, मन के हठ से किया हुआ उनका कोई भी काम सिरे नहीं चढ़ता, (इस वास्ते) मनमुख मनुष्य जम-पुरी में बँधे हुए मार खाते हैं, कोई उनकी पुकार नहीं सुनता (भाव, कोई उनकी सहायता नहीं कर सकता)।
पर, हे नानक! (ये किसी के वश की बात नहीं) आरम्भ से ही (किए कर्मों) के अनुसार लिखेलेख जीव कमाते हैं (भाव, पिछले किए कर्मों के अनुसार काम किए जाते हैं) (इस तरह) गुरु के सन्मुख रहने वाले बँदों की तवज्जो नाम में जुड़ी रहती है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ सो सतिगुरु सेविहु साध जनु जिनि हरि हरि नामु द्रिड़ाइआ ॥ सो सतिगुरु पूजहु दिनसु राति जिनि जगंनाथु जगदीसु जपाइआ ॥ सो सतिगुरु देखहु इक निमख निमख जिनि हरि का हरि पंथु बताइआ ॥ तिसु सतिगुर की सभ पगी पवहु जिनि मोह अंधेरु चुकाइआ ॥ सो सतगुरु कहहु सभि धंनु धंनु जिनि हरि भगति भंडार लहाइआ ॥३॥
मूलम्
पउड़ी ॥ सो सतिगुरु सेविहु साध जनु जिनि हरि हरि नामु द्रिड़ाइआ ॥ सो सतिगुरु पूजहु दिनसु राति जिनि जगंनाथु जगदीसु जपाइआ ॥ सो सतिगुरु देखहु इक निमख निमख जिनि हरि का हरि पंथु बताइआ ॥ तिसु सतिगुर की सभ पगी पवहु जिनि मोह अंधेरु चुकाइआ ॥ सो सतगुरु कहहु सभि धंनु धंनु जिनि हरि भगति भंडार लहाइआ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: द्रिढ़ाइआ = पक्का कर दिया है। जगदीसु = (जगत+ईश) जगत का मालिक। निमख निमख = (भाव,) हर वक्त। निमख = आँख झपकने जितना समय। पंथु = रास्ता। पगी = पैरों पर। भंडार = खजाने।3।
अर्थ: (हे भाई!) जिस सतिगुरु ने मेरे प्रभु का नाम (मनुष्य के हृदय में) पक्का करवाया है, उस साधु-गुरु की सेवा करो, जिस गुरु ने जगत के मालिक का नाम (जीवों से) जपाया है, उसकी दिन-रात पूजा करो। (हे भाई!) जिस गुरु ने परमात्मा (के मिलने) का राह बताया है, उसका हर वक्त दर्शन करो; जिस सतिगुरु ने (जीवों के दिल में माया के) मोह का अंधेरा दूर किया है, सारे उसी के चरणों में लगो। (हे भाई!) जिस गुरु ने प्रभु की भक्ति के खजाने ढुँढवा दिए हैं, कहो- वह गुरु धन्य है, वह गुरु धन्य है।3।
[[0587]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु मः ३ ॥ सतिगुरि मिलिऐ भुख गई भेखी भुख न जाइ ॥ दुखि लगै घरि घरि फिरै अगै दूणी मिलै सजाइ ॥ अंदरि सहजु न आइओ सहजे ही लै खाइ ॥ मनहठि जिस ते मंगणा लैणा दुखु मनाइ ॥ इसु भेखै थावहु गिरहो भला जिथहु को वरसाइ ॥ सबदि रते तिना सोझी पई दूजै भरमि भुलाइ ॥ पइऐ किरति कमावणा कहणा कछू न जाइ ॥ नानक जो तिसु भावहि से भले जिन की पति पावहि थाइ ॥१॥
मूलम्
सलोकु मः ३ ॥ सतिगुरि मिलिऐ भुख गई भेखी भुख न जाइ ॥ दुखि लगै घरि घरि फिरै अगै दूणी मिलै सजाइ ॥ अंदरि सहजु न आइओ सहजे ही लै खाइ ॥ मनहठि जिस ते मंगणा लैणा दुखु मनाइ ॥ इसु भेखै थावहु गिरहो भला जिथहु को वरसाइ ॥ सबदि रते तिना सोझी पई दूजै भरमि भुलाइ ॥ पइऐ किरति कमावणा कहणा कछू न जाइ ॥ नानक जो तिसु भावहि से भले जिन की पति पावहि थाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भेखी = भेख धारण करने से। अगै = परलोक में। सहज = अडोलता, संतोख। दुखु मनाइ = दुख पैदा करके। थावहु = से तो। वरसाइ = काम सँवारता है। पावहि = तू पाता है।1।
अर्थ: गुरु को मिलने से ही (मनुष्य के मन की) भूख दूर हो सकती है, भेस (धारने से) तृष्णा नहीं जाती; (भेखी साधु तृष्णा के) दुख में कलपता है, घर घर भटकता फिरता है, और परलोक में इससे भी ज्यादा सजा भुगतता है।
भेखी साधु के मन में शांति नहीं आती, (चाहिए तो ये कि) जिस शांति की इनायत से उसे जो कुछ किसी से मिले वह उसे ले के खा ले (भाव, तृप्त हो जाए); पर मन के हठ के आसरे (भिक्षा) माँगने से (दरअसल, दोनों धड़ों में) कष्ट पैदा करके ही भिक्षा ली जाती है। ऐसे भेस से तो गृहस्थ बेहतर है, क्योंकि यहाँ पे मनुष्य अपनी आस (तो) पूरी कर सकता है।
जो मनुष्य गुरु के शब्द में रंगे जाते हैं, उन्हें ऊँची सूझ प्राप्त होती है, पर, जो मनुष्य माया में फंसे रहते हैं, वे भटकते हैं। (इस बारे में कि कोई ठीक राह पड़ा है और कोई बुरी राह) कुछ कहा नहीं जा सकता, (पिछले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार ही) कार कमानी पड़ती है।
हे नानक! जो जीव उस प्रभु को प्यारे लगते हैं, वही अच्छे हैं, क्योकि, हे प्रभु! तू उनकी इज्जत रखता है (इज्जत रखता है)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ सतिगुरि सेविऐ सदा सुखु जनम मरण दुखु जाइ ॥ चिंता मूलि न होवई अचिंतु वसै मनि आइ ॥ अंतरि तीरथु गिआनु है सतिगुरि दीआ बुझाइ ॥ मैलु गई मनु निरमलु होआ अम्रित सरि तीरथि नाइ ॥ सजण मिले सजणा सचै सबदि सुभाइ ॥ घर ही परचा पाइआ जोती जोति मिलाइ ॥ पाखंडि जमकालु न छोडई लै जासी पति गवाइ ॥ नानक नामि रते से उबरे सचे सिउ लिव लाइ ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ सतिगुरि सेविऐ सदा सुखु जनम मरण दुखु जाइ ॥ चिंता मूलि न होवई अचिंतु वसै मनि आइ ॥ अंतरि तीरथु गिआनु है सतिगुरि दीआ बुझाइ ॥ मैलु गई मनु निरमलु होआ अम्रित सरि तीरथि नाइ ॥ सजण मिले सजणा सचै सबदि सुभाइ ॥ घर ही परचा पाइआ जोती जोति मिलाइ ॥ पाखंडि जमकालु न छोडई लै जासी पति गवाइ ॥ नानक नामि रते से उबरे सचे सिउ लिव लाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जनम मरण दुखु = पैदा होने से ले के मरने तक का दुख, सारी उम्र का दुख, मौत का सहम जो सारी उम्र पड़ा रहता है।2।
अर्थ: गुरु के बताए हुए राह में चलने से सदा सुख मिलता है, सारी उम्र का दुख दूर हो जाता है; बिल्कुल ही चिन्ता नहीं रहती (क्योंकि) चिन्ता से रहित प्रभु मन में आ बसता है। मनुष्य के अंदर ही ज्ञान (-रूपी) तीर्थ है, (जिस मनुष्य को) सतिगुरु ने (इस तीर्थ की) समझ बख्शी है वह मनुष्य नाम-अमृत के सरोवर में, अमृत के तीर्थ पर नहाता है, और उसका मन पवित्र हो जाता है (मन के विकारों की) मैल दूर हो जाती है। सतिगुरु के सच्चे शब्द की इनायत से सहज ही सत्संगी सत्संगियों को मिलते हैं, (सत्संग से) प्रभु में तवज्जो जोड़ के, हृदय-रूप घर में उनको (प्रभु-स्मरण रूप) आहर मिल जाता है।
पर, पाखण्ड करने से मौत का सहम नहीं छोड़ता, (पाखण्ड की) इज्जत गवा के मौत इसे ले के चली जाती है। हे नानक! जो मनुष्य नाम में रंगे हुए हैं वे सदा-स्थिर प्रभु (के चरणों) में तवज्जो जोड़ के (इस सहम से) बच जाते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ तितु जाइ बहहु सतसंगती जिथै हरि का हरि नामु बिलोईऐ ॥ सहजे ही हरि नामु लेहु हरि ततु न खोईऐ ॥ नित जपिअहु हरि हरि दिनसु राति हरि दरगह ढोईऐ ॥ सो पाए पूरा सतगुरू जिसु धुरि मसतकि लिलाटि लिखोईऐ ॥ तिसु गुर कंउ सभि नमसकारु करहु जिनि हरि की हरि गाल गलोईऐ ॥४॥
मूलम्
पउड़ी ॥ तितु जाइ बहहु सतसंगती जिथै हरि का हरि नामु बिलोईऐ ॥ सहजे ही हरि नामु लेहु हरि ततु न खोईऐ ॥ नित जपिअहु हरि हरि दिनसु राति हरि दरगह ढोईऐ ॥ सो पाए पूरा सतगुरू जिसु धुरि मसतकि लिलाटि लिखोईऐ ॥ तिसु गुर कंउ सभि नमसकारु करहु जिनि हरि की हरि गाल गलोईऐ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बिलोईऐ = मथा जाता है, विचार किया जाता है। सहजे = अडोलता में, टिके हुए मन से। ततु = असली चीज। लिलाटि = माथे पर। गलोईऐ = कहता है।4।
अर्थ: (हे भाई!) उस सत्संग में जा के बैठो, जहाँ प्रभु के नाम की विचार होती है, (वहाँ जा के) मन टिका के हरि का नाम जपो, ताकि नाम-तत्व छूट ना जाए। (सत्संग में) सदा दिन रात हरि का नाम जपो, ये नाम-रूप (पोटली का) ढोआ ले के प्रभु की हजूरी में पहुँचना है।
(पर, सत्संगति में भी) उसी मनुष्य को पूरा गुरु मिलता है, जिसके माथे पर धुर से (भले कर्मों के संस्कारों का लेख) लिखा हुआ है।
(हे भाई!) सारे उस गुरु को सिर झुकाओ, जो सदा प्रभु के महिमा की बातें करता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ सजण मिले सजणा जिन सतगुर नालि पिआरु ॥ मिलि प्रीतम तिनी धिआइआ सचै प्रेमि पिआरु ॥ मन ही ते मनु मानिआ गुर कै सबदि अपारि ॥ एहि सजण मिले न विछुड़हि जि आपि मेले करतारि ॥ इकना दरसन की परतीति न आईआ सबदि न करहि वीचारु ॥ विछुड़िआ का किआ विछुड़ै जिना दूजै भाइ पिआरु ॥ मनमुख सेती दोसती थोड़ड़िआ दिन चारि ॥ इसु परीती तुटदी विलमु न होवई इतु दोसती चलनि विकार ॥ जिना अंदरि सचे का भउ नाही नामि न करहि पिआरु ॥ नानक तिन सिउ किआ कीचै दोसती जि आपि भुलाए करतारि ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ सजण मिले सजणा जिन सतगुर नालि पिआरु ॥ मिलि प्रीतम तिनी धिआइआ सचै प्रेमि पिआरु ॥ मन ही ते मनु मानिआ गुर कै सबदि अपारि ॥ एहि सजण मिले न विछुड़हि जि आपि मेले करतारि ॥ इकना दरसन की परतीति न आईआ सबदि न करहि वीचारु ॥ विछुड़िआ का किआ विछुड़ै जिना दूजै भाइ पिआरु ॥ मनमुख सेती दोसती थोड़ड़िआ दिन चारि ॥ इसु परीती तुटदी विलमु न होवई इतु दोसती चलनि विकार ॥ जिना अंदरि सचे का भउ नाही नामि न करहि पिआरु ॥ नानक तिन सिउ किआ कीचै दोसती जि आपि भुलाए करतारि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करतारि = कर्तार ने। दूजै भाइ = (प्रभु के बिना) अन्य के प्यार में। विलमु = देर, ढील, विलम्ब। चलनि = पैदा होते हैं।1।
अर्थ: जिस (सत्संगियों) का गुरु से प्रेम होता है, वह सत्संगियों को मिलते हैं; सत्संगियों को मिल के वही मनुष्य प्रभु प्रीतम को स्मरण करते हैं क्योंकि सच्चे प्यार में उनकी तवज्जो जुड़ी रहती है; सतिगुरु के अपार शब्द की इनायत से उनका मन खुद-ब-खुद ही प्रभु में पतीज जाता है; ऐसे सत्संगी मनुष्य (एक बार) मिले हुए फिर विछुड़ते नहीं हैं, क्योंकि कर्तार ने खुद इनको मिला दिया है।
एक (विछुड़े हुओं) को प्रभु के दीदार का यकीन ही नहीं होता, क्योंकि वे गुरु के शब्द का कभी विचार ही नहीं करते। पर, जिस मनुष्यों की तवज्जो सदा माया के मोह में जुड़ी रहती है, उन (प्रभु से) विछुड़े हुओं का और विछोड़ा भी क्या होना हुआ? (भाव, माया में फंसे रहने के कारण वे परमात्मा से विछोड़ा महसूस ही नहीं करते)।
जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है उससे मित्रता थोड़े ही दो-चार दिन के लिए ही रह सकती है, इस मित्रता के टूटते हुए देरी नहीं लगती, (वैसे भी) इस मित्रता में से बुराईयां ही जन्म लेती हैं। हे नानक! जिस मनुष्यों के हृदय में परमात्मा का डर नहीं, जो परमात्मा के नाम से कभी प्यार नहीं करते उनके साथ कभी अपनत्व डालना ही नहीं चाहिए।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ इकि सदा इकतै रंगि रहहि तिन कै हउ सद बलिहारै जाउ ॥ तनु मनु धनु अरपी तिन कउ निवि निवि लागउ पाइ ॥ तिन मिलिआ मनु संतोखीऐ त्रिसना भुख सभ जाइ ॥ नानक नामि रते सुखीए सदा सचे सिउ लिव लाइ ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ इकि सदा इकतै रंगि रहहि तिन कै हउ सद बलिहारै जाउ ॥ तनु मनु धनु अरपी तिन कउ निवि निवि लागउ पाइ ॥ तिन मिलिआ मनु संतोखीऐ त्रिसना भुख सभ जाइ ॥ नानक नामि रते सुखीए सदा सचे सिउ लिव लाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: इकि = कई मनुष्य। इकतै रंगि = एक रंग में ही। अरपी = मैं हवाले कर दूँ। पाइ = पैरों पर।2।
अर्थ: कई (भाग्यशाली) मनुष्य एक (प्रभु के) रंग में ही (मस्त) रहते हैं, मैं उनसे कुर्बान हूँ; (मेरा चिक्त करता है) उपना तन-मन-धन उनकी भेटा कर दूँ और झुक-झुक के उनके पैरों पर लगूँ। उनको मिल के मन को ठंडक पड़ती है, सारी तृष्णा और भूख दूर हो जाती है।
हे नानक! नाम में भीगे हुए मनुष्य सच्चे प्रभु के साथ चिक्त जोड़ के सदा सुखी रहते हैं।2।
[[0588]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ तिसु गुर कउ हउ वारिआ जिनि हरि की हरि कथा सुणाई ॥ तिसु गुर कउ सद बलिहारणै जिनि हरि सेवा बणत बणाई ॥ सो सतिगुरु पिआरा मेरै नालि है जिथै किथै मैनो लए छडाई ॥ तिसु गुर कउ साबासि है जिनि हरि सोझी पाई ॥ नानकु गुर विटहु वारिआ जिनि हरि नामु दीआ मेरे मन की आस पुराई ॥५॥
मूलम्
पउड़ी ॥ तिसु गुर कउ हउ वारिआ जिनि हरि की हरि कथा सुणाई ॥ तिसु गुर कउ सद बलिहारणै जिनि हरि सेवा बणत बणाई ॥ सो सतिगुरु पिआरा मेरै नालि है जिथै किथै मैनो लए छडाई ॥ तिसु गुर कउ साबासि है जिनि हरि सोझी पाई ॥ नानकु गुर विटहु वारिआ जिनि हरि नामु दीआ मेरे मन की आस पुराई ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बणत = रीत, मर्यादा। जिथै किथै = हर जगह।5।
अर्थ: मैं सदके हूँ उस सतिगुरु से जिसने प्रभु की बात सुनाई है, और जिसने प्रभु की भक्ति की रीत चलाई है। वह प्यारा सतिगुरु मेरे अंग-संग है, हर जगह मुझे (विकारों से) छुड़वा लेता है; शाबाश है उस सतिगुरु को जिसने मुझे परमात्मा की समझ दी है।
जिस गुरु ने मुझे परमात्मा का नाम दिया है और मेरे मन की आस पूरी की है मैं नानक उससे सदके हूँ।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ त्रिसना दाधी जलि मुई जलि जलि करे पुकार ॥ सतिगुर सीतल जे मिलै फिरि जलै न दूजी वार ॥ नानक विणु नावै निरभउ को नही जिचरु सबदि न करे वीचारु ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ त्रिसना दाधी जलि मुई जलि जलि करे पुकार ॥ सतिगुर सीतल जे मिलै फिरि जलै न दूजी वार ॥ नानक विणु नावै निरभउ को नही जिचरु सबदि न करे वीचारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दाधी = जलाई हुई। सीतलु = ठंडक देने वाली।
अर्थ: दुनिया तृष्णा की जली हुई दुखी हो रही है, जल जल के बिलख रही है; अगर ये ठंढक देने वाले गुरु से मिल जाए, तो फिर ये फिर दुबारा ना जले; (क्योंकि) हे नानक! जब तक गुरु के शब्द से मनुष्य प्रभु-विचार (चिंतन) ना करे तब तक (नाम नहीं मिलता, और) नाम के बिना किसी का डर भी खत्म नहीं होता (ये डर और सहम ही बारंबार तृष्णा के अधीन करता है)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ भेखी अगनि न बुझई चिंता है मन माहि ॥ वरमी मारी सापु ना मरै तिउ निगुरे करम कमाहि ॥ सतिगुरु दाता सेवीऐ सबदु वसै मनि आइ ॥ मनु तनु सीतलु सांति होइ त्रिसना अगनि बुझाइ ॥ सुखा सिरि सदा सुखु होइ जा विचहु आपु गवाइ ॥ गुरमुखि उदासी सो करे जि सचि रहै लिव लाइ ॥ चिंता मूलि न होवई हरि नामि रजा आघाइ ॥ नानक नाम बिना नह छूटीऐ हउमै पचहि पचाइ ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ भेखी अगनि न बुझई चिंता है मन माहि ॥ वरमी मारी सापु ना मरै तिउ निगुरे करम कमाहि ॥ सतिगुरु दाता सेवीऐ सबदु वसै मनि आइ ॥ मनु तनु सीतलु सांति होइ त्रिसना अगनि बुझाइ ॥ सुखा सिरि सदा सुखु होइ जा विचहु आपु गवाइ ॥ गुरमुखि उदासी सो करे जि सचि रहै लिव लाइ ॥ चिंता मूलि न होवई हरि नामि रजा आघाइ ॥ नानक नाम बिना नह छूटीऐ हउमै पचहि पचाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आपु = स्वै भाव, अपनत्व, स्वार्थ। अघाइ रजा = अच्छी तरह तृप्त रहता है। पचहि = जलते हैं।2।
अर्थ: भेस धारण करने से (तृष्णा की) आग नहीं बुझती, मन में चिन्ता टिकी रहती है; जैसे साँप की वरमी को मारने से साँप नहीं मरता वैसे ही गुरु की शरण आए बगैर किए गए कर्म व्यर्थ हैं (गुरु की शरण पड़ कर स्वै भाव मिटाए बगैर तृष्णा की आग नहीं मिटती)। अगर (नाम की दाति) देने वाले गुरु के बताए हुए कर्म करें तो गुरु की शब्द मन में आ बसता है, मन-तन ठंडा-ठार हो जाता है, तृष्णा की अग्नि बुझ जाती है और मन में शांति पैदा हो जाती है (गुरु की सेवा में) जब मनुष्य अहंकार दूर करता है तब सबसे श्रेष्ठ सुख मिलता है। गुरु के सन्मुख होया हुआ मनुष्य ही (तृष्णा से) त्याग करता है जो सच्चे नाम में तवज्जो जोड़े रखता है, उसे बिल्कुल ही चिन्ता नहीं होती, वह प्रभु के साथ ही पूरी तरह तृप्त हो रहता है।
हे नानक! प्रभु का नाम स्मरण के बिना (तृष्णा की आग से) बचा नहीं जा सकता, (नाम के बिना) जीव अहंकार में पड़े सड़ते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ जिनी हरि हरि नामु धिआइआ तिनी पाइअड़े सरब सुखा ॥ सभु जनमु तिना का सफलु है जिन हरि के नाम की मनि लागी भुखा ॥ जिनी गुर कै बचनि आराधिआ तिन विसरि गए सभि दुखा ॥ ते संत भले गुरसिख है जिन नाही चिंत पराई चुखा ॥ धनु धंनु तिना का गुरू है जिसु अम्रित फल हरि लागे मुखा ॥६॥
मूलम्
पउड़ी ॥ जिनी हरि हरि नामु धिआइआ तिनी पाइअड़े सरब सुखा ॥ सभु जनमु तिना का सफलु है जिन हरि के नाम की मनि लागी भुखा ॥ जिनी गुर कै बचनि आराधिआ तिन विसरि गए सभि दुखा ॥ ते संत भले गुरसिख है जिन नाही चिंत पराई चुखा ॥ धनु धंनु तिना का गुरू है जिसु अम्रित फल हरि लागे मुखा ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चिंत = आस। चुखा = रक्ती भर भी।6।
अर्थ: जिस मनुष्यों ने प्रभु का नाम स्मरण किया है, उनको सारे सुख मिल गए हैं, उनका सारा मानव जीवन सफल हो गया है जिनके मन में प्रभु के नाम की भूख लगी हुई है (भाव, ‘नाम’ जिनकी जिंदगी का आसरा हो जाता है)। जिन्होंने गुरु के शब्द के माध्यम से प्रभु का स्मरण किया है, उनके सारे दुख दूर हो गए।
वे गुरसिख अच्छे संत हैं जिन्होंने (प्रभु के बिना) किसी और की रक्ती भर भी आस नहीं रखी; उनका गुरु भी धन्य है, भाग्यशाली है, जिसके मुँह को (प्रभु की महिमा रूपी) अमर करने वाले फल लगे हुए हैं (भाव, जिसके मुँह से प्रभु के स्तुति के वचन ही निकलते हैं)।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ कलि महि जमु जंदारु है हुकमे कार कमाइ ॥ गुरि राखे से उबरे मनमुखा देइ सजाइ ॥ जमकालै वसि जगु बांधिआ तिस दा फरू न कोइ ॥ जिनि जमु कीता सो सेवीऐ गुरमुखि दुखु न होइ ॥ नानक गुरमुखि जमु सेवा करे जिन मनि सचा होइ ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ कलि महि जमु जंदारु है हुकमे कार कमाइ ॥ गुरि राखे से उबरे मनमुखा देइ सजाइ ॥ जमकालै वसि जगु बांधिआ तिस दा फरू न कोइ ॥ जिनि जमु कीता सो सेवीऐ गुरमुखि दुखु न होइ ॥ नानक गुरमुखि जमु सेवा करे जिन मनि सचा होइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कलि = दुविधा वाला स्वभाव, प्रभु से विछोड़े वाली हालत (“इक घड़ी न मिलते त कलिजुगु होता”)। जंदारु = गवार, अवैड़ा (फारसी)। फरू = रक्षक।1।
अर्थ: दुविधा वाली हालत में (मनुष्य के सिर पर) मौत का सहम टिका रहता है; (पर वह जम भी) प्रभु के हुक्म में ही काम करता है, जिन्हें गुरु ने (‘कलि’ से) बचा लिया है वे (जम के सहम से) बच जाते हैं, मन के पीछे चलने वाले बँदों को (सहम की) सजा देता है।
जगत (भाव, प्रभु से विछुड़ा हुआ जीव) जमकाल के वश में बँधा पड़ा है, उसका कोई रक्षक नहीं बनता; अगर गुरु के सन्मुख हो के उस प्रभु की बँदगी करें जिसने जम को पैदा किया है (तो फिर जम का) दुख नहीं व्यापता, (बल्कि) हे नानक! जिस गुरमुखों के मन में सच्चा प्रभु बसता है उनकी यम भी सेवा करता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ एहा काइआ रोगि भरी बिनु सबदै दुखु हउमै रोगु न जाइ ॥ सतिगुरु मिलै ता निरमल होवै हरि नामो मंनि वसाइ ॥ नानक नामु धिआइआ सुखदाता दुखु विसरिआ सहजि सुभाइ ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ एहा काइआ रोगि भरी बिनु सबदै दुखु हउमै रोगु न जाइ ॥ सतिगुरु मिलै ता निरमल होवै हरि नामो मंनि वसाइ ॥ नानक नामु धिआइआ सुखदाता दुखु विसरिआ सहजि सुभाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: काइआ = शरीर। रोगि = रोग से। मंनि = मन में।2।
अर्थ: ये शरीर (अहंकार के) रोग से भरा पड़ा है, गुरु के शब्द के बिना अहंम रोग रूपी दुख दूर नहीं होता; अगर गुरु मिल जाए तो मनुष्य का मन पवित्र हो जाता है (क्योंकि गुरु के मिलने से मनुष्य) परमात्मा का नाम मन में बसाता है। हे नानक! जिन्होंने सुखदाई हरि-नाम स्मरण किया है उनका अहम्-दुख सहज सुभाय ही दूर हो जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ जिनि जगजीवनु उपदेसिआ तिसु गुर कउ हउ सदा घुमाइआ ॥ तिसु गुर कउ हउ खंनीऐ जिनि मधुसूदनु हरि नामु सुणाइआ ॥ तिसु गुर कउ हउ वारणै जिनि हउमै बिखु सभु रोगु गवाइआ ॥ तिसु सतिगुर कउ वड पुंनु है जिनि अवगण कटि गुणी समझाइआ ॥ सो सतिगुरु तिन कउ भेटिआ जिन कै मुखि मसतकि भागु लिखि पाइआ ॥७॥
मूलम्
पउड़ी ॥ जिनि जगजीवनु उपदेसिआ तिसु गुर कउ हउ सदा घुमाइआ ॥ तिसु गुर कउ हउ खंनीऐ जिनि मधुसूदनु हरि नामु सुणाइआ ॥ तिसु गुर कउ हउ वारणै जिनि हउमै बिखु सभु रोगु गवाइआ ॥ तिसु सतिगुर कउ वड पुंनु है जिनि अवगण कटि गुणी समझाइआ ॥ सो सतिगुरु तिन कउ भेटिआ जिन कै मुखि मसतकि भागु लिखि पाइआ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: (दिश = हाथ से इशारा करके दिखलाना। उप = नजदीक।) उपदिश = नजदीक दिखाना। जिन उपदेसिआ = जिस गुरु ने ईश्वर नजदीक करके दिखा दिया है। गुणी = गुणों का खजाना।7।
अर्थ: मैं उस गुरु से सदा कुर्बान हूँ जिसने जगत का सहारा नजदीक करके दिखा दिया है, जिसने अहंकार दैत्य को मारने वाले प्रभु का नाम सुनाया है (भाव, नाम-जपने की शिक्षा दी है), जिसने अहम् रूपी जहर व अन्य सारे (विकारों का) रोग दूर किया है।
जिस गुरु ने (जीव के) पाप काट के गुणों के खजाने प्रभु की समझ दी है, उसका (जीवों पर) ये बहुत बड़ा उपकार है। ऐसा गुरु उन्हें मिला है जिनके माथे पर मुँह पर (पिछले किए अच्छे कर्मों के संस्कारों के) भाग्य लिखे हुए हैं।7।
[[0589]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु मः ३ ॥ भगति करहि मरजीवड़े गुरमुखि भगति सदा होइ ॥ ओना कउ धुरि भगति खजाना बखसिआ मेटि न सकै कोइ ॥ गुण निधानु मनि पाइआ एको सचा सोइ ॥ नानक गुरमुखि मिलि रहे फिरि विछोड़ा कदे न होइ ॥१॥
मूलम्
सलोकु मः ३ ॥ भगति करहि मरजीवड़े गुरमुखि भगति सदा होइ ॥ ओना कउ धुरि भगति खजाना बखसिआ मेटि न सकै कोइ ॥ गुण निधानु मनि पाइआ एको सचा सोइ ॥ नानक गुरमुखि मिलि रहे फिरि विछोड़ा कदे न होइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निधान = खजाना। पाइआ = पा लिया।1।
अर्थ: (संसार की ओर से) मर के (ईश्वर की ओर) जीने वाले मनुष्य (ही सच्ची) भक्ति करते हैं, असल भक्ति उनके पास ही हो सकती है जो अपने आप को गुरु के हवाले कर देते हैं; ऐसे लोगों को धुर से परमात्मा ने भक्ति के खजाने की दाति बख्शी हुई है, कोई उस बख्शिश को मिटा नहीं सकता; उन्होंने उस गुणों के खजाने प्रभु को अपने मन में पा लिया है जो एक खुद ही खुद है और सदा-स्थिर रहने वाला है। हे नानक! जो मनुष्य अपने आप को गुरु के हवाले कर देते हैं, वे प्रभु में जुड़े रहते हैं, और फिर कभी उनको (प्रभु चरणों से) विछोड़ा नहीं होता।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ सतिगुर की सेव न कीनीआ किआ ओहु करे वीचारु ॥ सबदै सार न जाणई बिखु भूला गावारु ॥ अगिआनी अंधु बहु करम कमावै दूजै भाइ पिआरु ॥ अणहोदा आपु गणाइदे जमु मारि करे तिन खुआरु ॥ नानक किस नो आखीऐ जा आपे बखसणहारु ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ सतिगुर की सेव न कीनीआ किआ ओहु करे वीचारु ॥ सबदै सार न जाणई बिखु भूला गावारु ॥ अगिआनी अंधु बहु करम कमावै दूजै भाइ पिआरु ॥ अणहोदा आपु गणाइदे जमु मारि करे तिन खुआरु ॥ नानक किस नो आखीऐ जा आपे बखसणहारु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जिस मनुष्य ने गुरु द्वारा बताए हुए कर्म नहीं किए, वह और क्या सोचता है? (भाव, उसके और किसी विचार की जरूरत नहीं), वह मूर्ख जहर (को देख के) भूला हुआ गुरु के शब्द की कद्र नहीं जानता, वह अंधा-अज्ञानी (अन्य) बहुत सारे कर्म करता है (कर्म-धार्मिक रस्में) पर उसकी तवज्जो माया के प्यार में (ही लगी रहती है)।
जो मनुष्य अपने अंदर कोई गुण ना होते हुए अपने आप को (बड़ा) जताते हैं, उन्हें मन की मार ख्वार करती है; पर, हे नानक! किसी को क्या कहना? परमात्मा खुद ही बख्शिशें करने वाला है (भाव, इस मनमुखता से प्रभु खुद बचाने में समर्थ है, और कोई जीव सहायता नहीं कर सकता)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ तू करता सभु किछु जाणदा सभि जीअ तुमारे ॥ जिसु तू भावै तिसु तू मेलि लैहि किआ जंत विचारे ॥ तू करण कारण समरथु है सचु सिरजणहारे ॥ जिसु तू मेलहि पिआरिआ सो तुधु मिलै गुरमुखि वीचारे ॥ हउ बलिहारी सतिगुर आपणे जिनि मेरा हरि अलखु लखारे ॥८॥
मूलम्
पउड़ी ॥ तू करता सभु किछु जाणदा सभि जीअ तुमारे ॥ जिसु तू भावै तिसु तू मेलि लैहि किआ जंत विचारे ॥ तू करण कारण समरथु है सचु सिरजणहारे ॥ जिसु तू मेलहि पिआरिआ सो तुधु मिलै गुरमुखि वीचारे ॥ हउ बलिहारी सतिगुर आपणे जिनि मेरा हरि अलखु लखारे ॥८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभु किछु = (जीवों के दिल की) हरेक बात। भावै = चाहे। करण = जगत। कारण = मूल, करने वाला। अलखु = अदृश्य।8।
अर्थ: हे विधाता! तू सब कुछ जानता है और सारे जीव तेरे हैं। जीव बिचारों के वश में क्या है? जो तुझे अच्छा लगता है उसे तू (अपने चरणों में) मिला लेता है। हे सदा कायम रहने वाले कर्तार! तू सब कुछ करने की ताकत रखता है, हे प्यारे! जिसे तू खुद मिलाता है वह गुरु के (शब्द) के माध्यम से तेरे गुणों का विचार करके तुझे मिल जाता है।
मैं प्यारे सतिगुरु पर से सदके हूं जिसने मुझे अदृश्य परमात्मा की समझ बख्श दी है।8।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ रतना पारखु जो होवै सु रतना करे वीचारु ॥ रतना सार न जाणई अगिआनी अंधु अंधारु ॥ रतनु गुरू का सबदु है बूझै बूझणहारु ॥ मूरख आपु गणाइदे मरि जमहि होइ खुआरु ॥ नानक रतना सो लहै जिसु गुरमुखि लगै पिआरु ॥ सदा सदा नामु उचरै हरि नामो नित बिउहारु ॥ क्रिपा करे जे आपणी ता हरि रखा उर धारि ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ रतना पारखु जो होवै सु रतना करे वीचारु ॥ रतना सार न जाणई अगिआनी अंधु अंधारु ॥ रतनु गुरू का सबदु है बूझै बूझणहारु ॥ मूरख आपु गणाइदे मरि जमहि होइ खुआरु ॥ नानक रतना सो लहै जिसु गुरमुखि लगै पिआरु ॥ सदा सदा नामु उचरै हरि नामो नित बिउहारु ॥ क्रिपा करे जे आपणी ता हरि रखा उर धारि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पारखु = परख करने वाला, कद्र करने वाला। सार = कद्र। बूझणहारु = समझवाला। आपु = अपने आप को। होइ खुआरु = दुखी हो हो के। लहै = प्राप्त करता है। रखा = मैं रखूँ। उरधारि = हृदय में टिका के।1।
अर्थ: जो मनुष्य रत्नों की कद्र जानता है, वही रत्नों की सोच-विचार कर (सकता) है, पर अंधा अज्ञानी मनुष्य रत्नों की कद्र नहीं पा सकता। कोई समझ वाला मनुष्य ही समझता है कि (असल) रत्न सतिगुरु का शब्द है। पर, मूर्ख बँदे (गुरु शब्द को समझने की बजाए) अपने आप को ही बड़ा जताते हैं और दुखी होते हो हो के पैदा होते मरते रहते हैं।
हे नानक! वही मनुष्य (गुरु-शब्द रूप) रत्नों को हासिल करता है जिसे गुरु के माध्यम से (गुरु के शब्द की) लगन लगती है; वह मनुष्य सदा प्रभु का नाम जपता है, नाम जपना ही उसका नित्य का व्यवहार बन जाता है।
अगर परमात्मा अपनी मेहर करे, तो मैं भी उसका नाम हृदय में परो के रखूँ।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ सतिगुर की सेव न कीनीआ हरि नामि न लगो पिआरु ॥ मत तुम जाणहु ओइ जीवदे ओइ आपि मारे करतारि ॥ हउमै वडा रोगु है भाइ दूजै करम कमाइ ॥ नानक मनमुखि जीवदिआ मुए हरि विसरिआ दुखु पाइ ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ सतिगुर की सेव न कीनीआ हरि नामि न लगो पिआरु ॥ मत तुम जाणहु ओइ जीवदे ओइ आपि मारे करतारि ॥ हउमै वडा रोगु है भाइ दूजै करम कमाइ ॥ नानक मनमुखि जीवदिआ मुए हरि विसरिआ दुखु पाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नामि = नाम में। ओइ = वह लोग। करतारि = कर्तार ने। कमाइ = कमा के।2।
अर्थ: जिस बँदों ने गुरु द्वारा बताए हुए कर्म नहीं किए, जिनकी लगन प्रभु के नाम में नहीं बनी, ये ना समझो कि वे लोग जीवित हैं, उनको कर्तार ने खुद ही (आत्मिक मौत) मार दिया है; माया के मोह में कर्म कर कर के उन्हें अहंकार का रोग (चिपका हुआ) है; हे नानक! मन के पीछे चलने वाले लोग जीवित ही मरे हुए जानो। जो मनुष्य ईश्वर को भुलाता है; वह दुख पाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ जिसु अंतरु हिरदा सुधु है तिसु जन कउ सभि नमसकारी ॥ जिसु अंदरि नामु निधानु है तिसु जन कउ हउ बलिहारी ॥ जिसु अंदरि बुधि बिबेकु है हरि नामु मुरारी ॥ सो सतिगुरु सभना का मितु है सभ तिसहि पिआरी ॥ सभु आतम रामु पसारिआ गुर बुधि बीचारी ॥९॥
मूलम्
पउड़ी ॥ जिसु अंतरु हिरदा सुधु है तिसु जन कउ सभि नमसकारी ॥ जिसु अंदरि नामु निधानु है तिसु जन कउ हउ बलिहारी ॥ जिसु अंदरि बुधि बिबेकु है हरि नामु मुरारी ॥ सो सतिगुरु सभना का मितु है सभ तिसहि पिआरी ॥ सभु आतम रामु पसारिआ गुर बुधि बीचारी ॥९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंतरु = अंदरूनी। बिबेकु = परख। मुरारी = परमात्मा। गुर बुधि = गुरु की बुद्धि ने। बीचारी = विचारा है।9।
अर्थ: जिसका अंदरूनी हृदय पवित्र है, उसे सारे जीव नमस्कार करते हैं; जिसके हृदय में नाम (रूप) खजाना है उससे मैं सदके हूँ। जिसके अंदर (भली) मति है, (अच्छे बुरे की) पहचान है और हरि मुरारी का नाम है, वह सतिगुरु सब जीवों का मित्र है और सारी सृष्टि उसे प्यारी लगती है (क्योंकि) सतिगुरु की समझ ने तो ये समझा है कि सब जगह परमात्मा ने अपना आप पसारा हुआ है।9।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ बिनु सतिगुर सेवे जीअ के बंधना विचि हउमै करम कमाहि ॥ बिनु सतिगुर सेवे ठउर न पावही मरि जमहि आवहि जाहि ॥ बिनु सतिगुर सेवे फिका बोलणा नामु न वसै मन माहि ॥ नानक बिनु सतिगुर सेवे जम पुरि बधे मारीअनि मुहि कालै उठि जाहि ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ बिनु सतिगुर सेवे जीअ के बंधना विचि हउमै करम कमाहि ॥ बिनु सतिगुर सेवे ठउर न पावही मरि जमहि आवहि जाहि ॥ बिनु सतिगुर सेवे फिका बोलणा नामु न वसै मन माहि ॥ नानक बिनु सतिगुर सेवे जम पुरि बधे मारीअनि मुहि कालै उठि जाहि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ठउर = ठिकाना, स्थिति, भटकना से निजात। मुहि कालै = काले मुँह से, मुकालख कमा के।1।
अर्थ: मनुष्य सतिगुरु की सेवा से वंचित हो के अहंकार के आसरे कर्म करते हैं, पर वह कर्म उनकी आत्मा के लिए बंधन हो जाते हैं, सतिगुरु के बताए हुए कर्म ना करने के कारण उन्हें कहीं भी जगह नहीं मिलती, वे मरते हैं (फिर) पैदा होते हैं, (संसार में) आते हैं, (फिर) चले जाते हैं; सतिगुरु द्वारा निर्देशित सेवा से वंचित रह कर उनके बोल भी फीके होते हैं और ‘नाम’ उनके मन में बसता नहीं। हे नानक! सतिगुरु की सेवा के बिना काले मुँह (संसार से) चले जाते हैं और जम-पुरी में बँधे हुए मार खाते हैं (भाव, इस लोक में काला मुँह करवाते हैं और आगे भी दुखी होते हैं)।1।
[[0590]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
महला १ ॥ जालउ ऐसी रीति जितु मै पिआरा वीसरै ॥ नानक साई भली परीति जितु साहिब सेती पति रहै ॥२॥
मूलम्
महला १ ॥ जालउ ऐसी रीति जितु मै पिआरा वीसरै ॥ नानक साई भली परीति जितु साहिब सेती पति रहै ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जालउ = मैं जला दूँ। मैं = मुझे। जितु = जिससे।2।
अर्थ: मैं ऐसी रीति को जला डालूँ जिसके कारण प्यारा प्रभु मुझे बिसर जाए, हे नानक! प्रेम वह ही अच्छा है जिससे पति से इज्जत बनी रहे।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ हरि इको दाता सेवीऐ हरि इकु धिआईऐ ॥ हरि इको दाता मंगीऐ मन चिंदिआ पाईऐ ॥ जे दूजे पासहु मंगीऐ ता लाज मराईऐ ॥ जिनि सेविआ तिनि फलु पाइआ तिसु जन की सभ भुख गवाईऐ ॥
मूलम्
पउड़ी ॥ हरि इको दाता सेवीऐ हरि इकु धिआईऐ ॥ हरि इको दाता मंगीऐ मन चिंदिआ पाईऐ ॥ जे दूजे पासहु मंगीऐ ता लाज मराईऐ ॥ जिनि सेविआ तिनि फलु पाइआ तिसु जन की सभ भुख गवाईऐ ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भुख = तृष्णा।
अर्थ: एक ही दातार कर्तार की सेवा करनी चाहिए, एक परमात्मा को ही स्मरणा चाहिए, एक हरि से ही दान माँगना चाहिए, जिस के पास से मन-मांगी मुराद मिल जाए; अगर किसी और से मांगें तो ये शर्म से मर जाएं (भाव, किसी और से माँगने से बेहतर है शर्म से मर जाएं)। जिस भी मनुष्य ने हरि की सेवा की है उसने फल पा लिया है, उस मनुष्य की सारी तृष्णा मिट गई है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानकु तिन विटहु वारिआ जिन अनदिनु हिरदै हरि नामु धिआईऐ ॥१०॥
मूलम्
नानकु तिन विटहु वारिआ जिन अनदिनु हिरदै हरि नामु धिआईऐ ॥१०॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: नानक कुर्बान जाता है उन मनुष्यों से, जो हर वक्त हृदय में हरि का नाम स्मरण करते हैं।10।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु मः ३ ॥ भगत जना कंउ आपि तुठा मेरा पिआरा आपे लइअनु जन लाइ ॥ पातिसाही भगत जना कउ दितीअनु सिरि छतु सचा हरि बणाइ ॥ सदा सुखीए निरमले सतिगुर की कार कमाइ ॥
मूलम्
सलोकु मः ३ ॥ भगत जना कंउ आपि तुठा मेरा पिआरा आपे लइअनु जन लाइ ॥ पातिसाही भगत जना कउ दितीअनु सिरि छतु सचा हरि बणाइ ॥ सदा सुखीए निरमले सतिगुर की कार कमाइ ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लइअनु = लगा लिए हैं उसने। दितीअनु = दी है उसने। (देखें ‘गुरबाणी व्याकरण)।
अर्थ: प्यारा प्रभु अपने भक्तों पर खुद प्रसन्न होता है और खुद ही उसने उनको अपने साथ जोड़ लिया है, भक्तों के सिर पर सच्चा छत्र झुला के उसने भक्तों को बादशाहियत् बख्शी है; सतिगुरु की बताई हुई सेवा कमा के वे सदा सुखी तथा पवित्र रहते हैं।
विश्वास-प्रस्तुतिः
राजे ओइ न आखीअहि भिड़ि मरहि फिरि जूनी पाहि ॥ नानक विणु नावै नकीं वढीं फिरहि सोभा मूलि न पाहि ॥१॥
मूलम्
राजे ओइ न आखीअहि भिड़ि मरहि फिरि जूनी पाहि ॥ नानक विणु नावै नकीं वढीं फिरहि सोभा मूलि न पाहि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: राजे उनको नहीं कहते जो आपस में लड़ मरते हैं और फिर जूनियों में पड़ जाते हैं, (क्योंकि) हे नानक! नाम से वंचित राजे भी नाक कटाए फिरते हैं और कभी शोभा नहीं पाते।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ सुणि सिखिऐ सादु न आइओ जिचरु गुरमुखि सबदि न लागै ॥ सतिगुरि सेविऐ नामु मनि वसै विचहु भ्रमु भउ भागै ॥
मूलम्
मः ३ ॥ सुणि सिखिऐ सादु न आइओ जिचरु गुरमुखि सबदि न लागै ॥ सतिगुरि सेविऐ नामु मनि वसै विचहु भ्रमु भउ भागै ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जब तक सतिगुरु के सन्मुख हो के मनुष्य सतिगुरु के शब्द में नहीं जुड़ता तब तक सतिगुरु की शिक्षा निरी सुन के स्वाद नहीं आता, सतिगुरु की बताई हुई सेवा करके ही नाम मन में बसता है और अंदर से भ्रम और डर दूर हो जाता है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जेहा सतिगुर नो जाणै तेहो होवै ता सचि नामि लिव लागै ॥ नानक नामि मिलै वडिआई हरि दरि सोहनि आगै ॥२॥
मूलम्
जेहा सतिगुर नो जाणै तेहो होवै ता सचि नामि लिव लागै ॥ नानक नामि मिलै वडिआई हरि दरि सोहनि आगै ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जब मनुष्य जैसा अपने सतिगुरु को समझता है, वैसा ही खुद बन जाए (भाव, जब अपने सतिगुरु वाले गुण धारण करे) तब उसकी तवज्जो सच्चे नाम में जुड़ती है; हे नानक! (ऐसे जीवों को) नाम के कारण यहाँ आदर मिलता है और आगे हरि की दरगाह में वे शोभा पाते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ गुरसिखां मनि हरि प्रीति है गुरु पूजण आवहि ॥ हरि नामु वणंजहि रंग सिउ लाहा हरि नामु लै जावहि ॥
मूलम्
पउड़ी ॥ गुरसिखां मनि हरि प्रीति है गुरु पूजण आवहि ॥ हरि नामु वणंजहि रंग सिउ लाहा हरि नामु लै जावहि ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: गुरसिखों के मन में हरि के प्रति प्यार होता है और (उस प्यार के सदका वे) अपने सतिगुरु की सेवा करते आते हैं; (सतिगुरु के पास आ के) प्यार से हरि-नाम का व्यापार करते हैं और हरि नाम का लाभ कमा के ले जाते हैं।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरसिखा के मुख उजले हरि दरगह भावहि ॥
मूलम्
गुरसिखा के मुख उजले हरि दरगह भावहि ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: अर्थ- (ऐसे) गुरसिखों के मुँह उज्जवल होते हैं और हरि की दरगाह में वे प्यारे लगते हैं।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरु सतिगुरु बोहलु हरि नाम का वडभागी सिख गुण सांझ करावहि ॥ तिना गुरसिखा कंउ हउ वारिआ जो बहदिआ उठदिआ हरि नामु धिआवहि ॥११॥
मूलम्
गुरु सतिगुरु बोहलु हरि नाम का वडभागी सिख गुण सांझ करावहि ॥ तिना गुरसिखा कंउ हउ वारिआ जो बहदिआ उठदिआ हरि नामु धिआवहि ॥११॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बोहलु = दानों का ढेर, फसल की सफाई करके तूड़ी वगैरह अलग कर के साफ किया हुआ अनाज, भण्डार। सांझ = भाईवाली।11।
अर्थ: गुरु सतिगुरु हरि के नाम का (जैसे) बोहल है, बड़े भाग्यशाली सिख आ के गुणों की सांझ पाते हैं; सदके हूँ उन गुरसिखों से, जो बैठते-उठते (भाव, हर वक्त) हरि का नाम स्मरण करते हैं।11।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ नानक नामु निधानु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥ मनमुख घरि होदी वथु न जाणनी अंधे भउकि मुए बिललाइ ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ नानक नामु निधानु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥ मनमुख घरि होदी वथु न जाणनी अंधे भउकि मुए बिललाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे नानक! नाम (ही असल) खजाना है, जो सतिगुरु के सन्मुख हो के मिल सकता है; अंधे मनमुख (हृदय-रूप) घर में होती (इस) वस्तु को नहीं पहचानते, और (बाहर माया के पीछे) बिलकते और भौंकते मर जाते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ कंचन काइआ निरमली जो सचि नामि सचि लागी ॥ निरमल जोति निरंजनु पाइआ गुरमुखि भ्रमु भउ भागी ॥ नानक गुरमुखि सदा सुखु पावहि अनदिनु हरि बैरागी ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ कंचन काइआ निरमली जो सचि नामि सचि लागी ॥ निरमल जोति निरंजनु पाइआ गुरमुखि भ्रमु भउ भागी ॥ नानक गुरमुखि सदा सुखु पावहि अनदिनु हरि बैरागी ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कंचन = सोना। नामि = नाम से, हरि नाम द्वारा। निरंजनु = माया से रहत प्रभु। बैरागी = वैराग वान हो के।2।
अर्थ: जो शरीर सच्चे नाम के द्वारा सच्चे प्रभु में जुड़ा हुआ है, वह सोने जैसा शुद्ध है; उसको निर्मल ज्योति (रूपी) माया से रहित प्रभु मिल जाता है और सतिगुरु के सन्मुख हो के उसका भ्रम और डर दूर हो जाता है; हे नानक! सतिगुरु के सन्मुख मनुष्य हर वक्त परमात्मा के वैरागी हो के सदा सुख पाते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ से गुरसिख धनु धंनु है जिनी गुर उपदेसु सुणिआ हरि कंनी ॥ गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ तिनि हंउमै दुबिधा भंनी ॥
मूलम्
पउड़ी ॥ से गुरसिख धनु धंनु है जिनी गुर उपदेसु सुणिआ हरि कंनी ॥ गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ तिनि हंउमै दुबिधा भंनी ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कंनी सुणिआ = ध्यान से सुना है। तिनि = उस ने। भंनी = नाश की है।
अर्थ: धन्य हैं वे गुरसिख जिन्होंने सतिगुरु का उपदेश ध्यान से सुना है; सतिगुरु ने (जिसके भी हृदय में) नाम दृढ़ किया है उसने अहंकार और दुविधा (हृदय में से) तोड़ डाली है।
[[0591]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
बिनु हरि नावै को मित्रु नाही वीचारि डिठा हरि जंनी ॥ जिना गुरसिखा कउ हरि संतुसटु है तिनी सतिगुर की गल मंनी ॥
मूलम्
बिनु हरि नावै को मित्रु नाही वीचारि डिठा हरि जंनी ॥ जिना गुरसिखा कउ हरि संतुसटु है तिनी सतिगुर की गल मंनी ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: प्रभु का स्मरण करने वाले (गुरसिखों) ने ये बात विचार के देख ली है कि परमात्मा के नाम के बिना कोई (सच्चा) मित्र नहीं है; जिस गुरसिखों पर प्रभु प्रसन्न होता है, वह सतिगुरु की शिक्षा पे चलते हैं।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जो गुरमुखि नामु धिआइदे तिनी चड़ी चवगणि वंनी ॥१२॥
मूलम्
जो गुरमुखि नामु धिआइदे तिनी चड़ी चवगणि वंनी ॥१२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वंनी = रंगत।12।
अर्थ: जो मनुष्य सतिगुरु के सन्मुख हो के नाम जपते हैं, उनको (प्रेम की) चौगुनी रंगत चढ़ती है।12।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ मनमुखु काइरु करूपु है बिनु नावै नकु नाहि ॥ अनदिनु धंधै विआपिआ सुपनै भी सुखु नाहि ॥ नानक गुरमुखि होवहि ता उबरहि नाहि त बधे दुख सहाहि ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ मनमुखु काइरु करूपु है बिनु नावै नकु नाहि ॥ अनदिनु धंधै विआपिआ सुपनै भी सुखु नाहि ॥ नानक गुरमुखि होवहि ता उबरहि नाहि त बधे दुख सहाहि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करूपु = खराब मुंह वाला।1।
अर्थ: मन के अधीन मनुष्य डरपोक और बद्शकल होता है, नाम के बिना कहीं उसे आदर नहीं मिलता, हर वक्त माया के चक्कर में फंसा रहता है और (इसके कारण) उसे सपने में भी सुख नहीं होता। हे नानक! मनमुख मनुष्य अगर सतिगुरु के सन्मुख हो जाए तो (जंजाल से) बच जाते हैं, वरना (माया के मोह में) बँधे हुए दुख सहते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ गुरमुखि सदा दरि सोहणे गुर का सबदु कमाहि ॥ अंतरि सांति सदा सुखु दरि सचै सोभा पाहि ॥ नानक गुरमुखि हरि नामु पाइआ सहजे सचि समाहि ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ गुरमुखि सदा दरि सोहणे गुर का सबदु कमाहि ॥ अंतरि सांति सदा सुखु दरि सचै सोभा पाहि ॥ नानक गुरमुखि हरि नामु पाइआ सहजे सचि समाहि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: सतिगुरु के सन्मुख होए हुए मनुष्य दरगाह में सदा सुशोभित होते हैं (क्योंकि) वे सतिगुरु का शब्द कमाते हैं; उनके हृदय में सदा शांति व सुख होता है, (इस के कारण) सच्ची दरगाह में शोभा पाते हैं। हे नानक! सतिगुरु के सन्मुख मनुष्यों को हरि का नाम मिला हुआ होता है, (इसलिए) वे सहज ही सच्चे में लीन हो जाते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ गुरमुखि प्रहिलादि जपि हरि गति पाई ॥ गुरमुखि जनकि हरि नामि लिव लाई ॥ गुरमुखि बसिसटि हरि उपदेसु सुणाई ॥
मूलम्
पउड़ी ॥ गुरमुखि प्रहिलादि जपि हरि गति पाई ॥ गुरमुखि जनकि हरि नामि लिव लाई ॥ गुरमुखि बसिसटि हरि उपदेसु सुणाई ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु के सन्मुख हो के।
अर्थ: सतिगुरु के सन्मुख हो के प्रहलाद ने हरि का नाम जप के ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त की, सतिगुरु के सन्मुख हो के जनक ने हरि के नाम में तवज्जो जोड़ी, सतिगुरु के सन्मुख हो के वशिष्ट (मुनि) ने हरि का उपदेश (और लोगों को) सुनाया।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बिनु गुर हरि नामु न किनै पाइआ मेरे भाई ॥ गुरमुखि हरि भगति हरि आपि लहाई ॥१३॥
मूलम्
बिनु गुर हरि नामु न किनै पाइआ मेरे भाई ॥ गुरमुखि हरि भगति हरि आपि लहाई ॥१३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लहाई = दी, ढूँढवाई।13।
अर्थ: हे मेरे भाई! सतिगुरु के बिना किसी ने नाम नहीं पाया। सतिगुरु के सन्मुख हुए मनुष्य को प्रभु ने अपनी भक्ति स्वयं बख्शी है।13।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु मः ३ ॥ सतिगुर की परतीति न आईआ सबदि न लागो भाउ ॥ ओस नो सुखु न उपजै भावै सउ गेड़ा आवउ जाउ ॥ नानक गुरमुखि सहजि मिलै सचे सिउ लिव लाउ ॥१॥
मूलम्
सलोकु मः ३ ॥ सतिगुर की परतीति न आईआ सबदि न लागो भाउ ॥ ओस नो सुखु न उपजै भावै सउ गेड़ा आवउ जाउ ॥ नानक गुरमुखि सहजि मिलै सचे सिउ लिव लाउ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जिस मनुष्य का सतिगुरु पर भरोसा नहीं बना और सतिगुरु के शब्द में जिसका मन न लगा उसे कभी सुख नहीं, चाहे (गुरु के पास) सौ बार आए जाए। हे नानक! अगर गुरु के सन्मुख हो के सच्चे में लगन जोड़ें तो प्रभु सहज ही मिल जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ ए मन ऐसा सतिगुरु खोजि लहु जितु सेविऐ जनम मरण दुखु जाइ ॥ सहसा मूलि न होवई हउमै सबदि जलाइ ॥ कूड़ै की पालि विचहु निकलै सचु वसै मनि आइ ॥ अंतरि सांति मनि सुखु होइ सच संजमि कार कमाइ ॥
मूलम्
मः ३ ॥ ए मन ऐसा सतिगुरु खोजि लहु जितु सेविऐ जनम मरण दुखु जाइ ॥ सहसा मूलि न होवई हउमै सबदि जलाइ ॥ कूड़ै की पालि विचहु निकलै सचु वसै मनि आइ ॥ अंतरि सांति मनि सुखु होइ सच संजमि कार कमाइ ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जनम मरण = पैदा होने से मरने तक का। सहसा = तौखला, संशय, शंका। मूलि = कभी भी। पालि = दीवार। मनि = मन में। संजमि = जुगति से।
अर्थ: हे मेरे मन! ऐसे सतिगुरु ढूँढ ले, जिसकी सेवा करने से तेरा सारी उम्र का दुख दूर हो जाए। कभी बिल्कुल ही चिन्ता ना हो और (उस सतिगुरु के) शब्द से तेरा अहंकार जल जाए; तेरे अंदर से झूठ की दीवार हट जाए और मन में सच्चा हरि आ बसे, और, हे मन! (उस सतिगुरु के बताए हुए) संयम में सच्चे कर्म करके तेरे अंदर शांति और सुख (का वासा) हो जाए।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक पूरै करमि सतिगुरु मिलै हरि जीउ किरपा करे रजाइ ॥२॥
मूलम्
नानक पूरै करमि सतिगुरु मिलै हरि जीउ किरपा करे रजाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करमि = बख्शिश से। रजाइ = (अपनी) रजा के मुताबिक।2।
अर्थ: हे नानक! जब हरि अपनी रजा में मेहर करता है तब (ऐसा) सतिगुरु पूरी कृपा से ही मिलता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ जिस कै घरि दीबानु हरि होवै तिस की मुठी विचि जगतु सभु आइआ ॥ तिस कउ तलकी किसै दी नाही हरि दीबानि सभि आणि पैरी पाइआ ॥
मूलम्
पउड़ी ॥ जिस कै घरि दीबानु हरि होवै तिस की मुठी विचि जगतु सभु आइआ ॥ तिस कउ तलकी किसै दी नाही हरि दीबानि सभि आणि पैरी पाइआ ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दीबानु = हाकम। तलकी = अधीनता, गुलामी। दीबानि = हाकम ने।
अर्थ: जिस मनुष्य के हृदय में (सबका) हाकम प्रभु बसता हो, सारा संसार उसके वश में आ जाता है, उसे किसी की गुलामी नहीं होती, (बल्कि) परमात्मा हाकम ने सभी को ला के उसके चरणों में डाला (होता) है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
माणसा किअहु दीबाणहु कोई नसि भजि निकलै हरि दीबाणहु कोई किथै जाइआ ॥ सो ऐसा हरि दीबानु वसिआ भगता कै हिरदै तिनि रहदे खुहदे आणि सभि भगता अगै खलवाइआ ॥
मूलम्
माणसा किअहु दीबाणहु कोई नसि भजि निकलै हरि दीबाणहु कोई किथै जाइआ ॥ सो ऐसा हरि दीबानु वसिआ भगता कै हिरदै तिनि रहदे खुहदे आणि सभि भगता अगै खलवाइआ ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तिनि = उस हरि ने। रहदे खुहदे = बाकी बचे हुए जो अभी तक भगतों के चरण लगने से झिझकते थे। आणि = ला के। खलवालिआ = खड़े कर दिए।
अर्थ: मनुष्य की कचहरी में से तो मनुष्य भाग के कहीं खिसक सकता है, पर ईश्वर की हकूमत में से कोई भाग के कहाँ जाएगा? ऐसा हाकम हरि भक्तों के दिल में बसा हुआ है, उसने ‘बचे खुचे’ सारे जीवों को ला के भक्त जनों के आगे खड़ा कर दिया है (भाव, चरणों में ला डाला है)।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि नावै की वडिआई करमि परापति होवै गुरमुखि विरलै किनै धिआइआ ॥१४॥
मूलम्
हरि नावै की वडिआई करमि परापति होवै गुरमुखि विरलै किनै धिआइआ ॥१४॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: प्रभु की खास मेहर से ही प्रभु के नाम की उपमा (करने का गुण) प्राप्त होता है; सतिगुरु के सन्मुख हो के कोई विरला ही (नाम) स्मरण करता है।14।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु मः ३ ॥ बिनु सतिगुर सेवे जगतु मुआ बिरथा जनमु गवाइ ॥ दूजै भाइ अति दुखु लगा मरि जमै आवै जाइ ॥ विसटा अंदरि वासु है फिरि फिरि जूनी पाइ ॥ नानक बिनु नावै जमु मारसी अंति गइआ पछुताइ ॥१॥
मूलम्
सलोकु मः ३ ॥ बिनु सतिगुर सेवे जगतु मुआ बिरथा जनमु गवाइ ॥ दूजै भाइ अति दुखु लगा मरि जमै आवै जाइ ॥ विसटा अंदरि वासु है फिरि फिरि जूनी पाइ ॥ नानक बिनु नावै जमु मारसी अंति गइआ पछुताइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: सतिगुरु के बताए राह पर चले बिना मानव जनम व्यर्थ गवा के संसार मुर्दे के समान है; माया के प्यार में बहुत कष्ट बना हुआ है और (इसमें ही) मरता है फिर पैदा होता है, आता है फिर जाता है; (जब तक जीता है, इसका विकारों के) गंद में वास रहता है, (मर के) पलट-पलट के जूनियों में पड़ता है; हे नानक! आखिरी समय पछताता हुआ जाता है (क्योंकि उस वक्त याद आता है) कि नाम के बिना जम सजा देगा।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ इसु जग महि पुरखु एकु है होर सगली नारि सबाई ॥ सभि घट भोगवै अलिपतु रहै अलखु न लखणा जाई ॥
मूलम्
मः ३ ॥ इसु जग महि पुरखु एकु है होर सगली नारि सबाई ॥ सभि घट भोगवै अलिपतु रहै अलखु न लखणा जाई ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पुरखु = पति, मर्द। सगली = सारी सृष्टि। सबाई = सारी। सभि घट = सारे शरीर। अलिपतु = अलग, निराला।
अर्थ: इस संसार में पति एक परमात्मा ही है, और सारी सृष्टि (उसकी) स्त्रीयां हैं; परमात्मा पति सारे घटों को भोगता है (भाव, सारे शरीरों में व्यापक है) और निर्लिप भी है, इस अलख प्रभु की समझ नहीं पड़ती।
[[0592]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
पूरै गुरि वेखालिआ सबदे सोझी पाई ॥ पुरखै सेवहि से पुरख होवहि जिनी हउमै सबदि जलाई ॥
मूलम्
पूरै गुरि वेखालिआ सबदे सोझी पाई ॥ पुरखै सेवहि से पुरख होवहि जिनी हउमै सबदि जलाई ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरि = गुरु ने। सबदे = गुरु शब्द के द्वारा। सेवहि = स्मरण करते हैं। जिनी = जिस मनुष्यों ने। जलाई = जला दी है।
अर्थ: (जिस मनुष्य को) पूरे सतिगुरु ने (उस अलख प्रभु के) दर्शन करवा दिए, उसको सतिगुरु के शब्द द्वारा समझ पड़ गई; जिस मनुष्यों ने शब्द के माध्यम से अहंकार दूर किया है, जो प्रभु पुरुख को जपते हैं, वे भी उस पुरुष का रूप हो जाते हैं।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तिस का सरीकु को नही ना को कंटकु वैराई ॥ निहचल राजु है सदा तिसु केरा ना आवै ना जाई ॥
मूलम्
तिस का सरीकु को नही ना को कंटकु वैराई ॥ निहचल राजु है सदा तिसु केरा ना आवै ना जाई ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कंटकु = काँटा।
अर्थ: उस अलख हरि का कोई शरीक नहीं, ना ही कोई दुखी करने वाला (काँटा) उस का वैरी है; उसका राज सदा अटल है, ना वह पैदा होता है ना मरता है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अनदिनु सेवकु सेवा करे हरि सचे के गुण गाई ॥ नानकु वेखि विगसिआ हरि सचे की वडिआई ॥२॥
मूलम्
अनदिनु सेवकु सेवा करे हरि सचे के गुण गाई ॥ नानकु वेखि विगसिआ हरि सचे की वडिआई ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: विगसिआ = खिल रहा है।2।
अर्थ: (सच्चा) सेवक उस सच्चे हरि की महिमा करके हर वक्त उसका स्मरण करता है; नानक (भी उस) सच्चे की महिमा देख के प्रसन्न हो रहा है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ जिन कै हरि नामु वसिआ सद हिरदै हरि नामो तिन कंउ रखणहारा ॥ हरि नामु पिता हरि नामो माता हरि नामु सखाई मित्रु हमारा ॥
मूलम्
पउड़ी ॥ जिन कै हरि नामु वसिआ सद हिरदै हरि नामो तिन कंउ रखणहारा ॥ हरि नामु पिता हरि नामो माता हरि नामु सखाई मित्रु हमारा ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हमारा = भाव, भक्त जनों का।
अर्थ: जिस मनुष्यों के दिल में सदैव हरि नाम बसता है, उन्हें रखने वाला हरि का नाम ही होता है। (उन्हें विश्वास हो जाता है कि) हरि का नाम ही हमारा माता-पिता है और नाम ही हमारा सखा और मित्र है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि नावै नालि गला हरि नावै नालि मसलति हरि नामु हमारी करदा नित सारा ॥ हरि नामु हमारी संगति अति पिआरी हरि नामु कुलु हरि नामु परवारा ॥
मूलम्
हरि नावै नालि गला हरि नावै नालि मसलति हरि नामु हमारी करदा नित सारा ॥ हरि नामु हमारी संगति अति पिआरी हरि नामु कुलु हरि नामु परवारा ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मसलति = सालाह।
अर्थ: हरि के नाम से ही हमारी बातें, और नाम से ही सलाह हैं; नाम ही सदा हमारी सार लेता है; हरि का नाम ही हमारी प्यारी संगति है, और नाम ही हमारा कुल व परिवार है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जन नानक कंउ हरि नामु हरि गुरि दीआ हरि हलति पलति सदा करे निसतारा ॥१५॥
मूलम्
जन नानक कंउ हरि नामु हरि गुरि दीआ हरि हलति पलति सदा करे निसतारा ॥१५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरि = गुरु ने। हलति = इस लोक में। पलति = परलोक में।15।
अर्थ: दास नानक को भी गुरु ने (उस) हरि का नाम दिया है जो इस लोक में और परलोक में पार उतारा करता है।15।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु मः ३ ॥ जिन कंउ सतिगुरु भेटिआ से हरि कीरति सदा कमाहि ॥ अचिंतु हरि नामु तिन कै मनि वसिआ सचै सबदि समाहि ॥
मूलम्
सलोकु मः ३ ॥ जिन कंउ सतिगुरु भेटिआ से हरि कीरति सदा कमाहि ॥ अचिंतु हरि नामु तिन कै मनि वसिआ सचै सबदि समाहि ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जिन्हें सतिगुरु मिला है, वे सदा हरि की महिमा करते हैं; चिन्ता से विहीन (करने वाले) हरि का नाम उनके मन में बसता है और वह सतिगुरु के सच्चे शब्द में लीन रहते हैं।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कुलु उधारहि आपणा मोख पदवी आपे पाहि ॥ पारब्रहमु तिन कंउ संतुसटु भइआ जो गुर चरनी जन पाहि ॥
मूलम्
कुलु उधारहि आपणा मोख पदवी आपे पाहि ॥ पारब्रहमु तिन कंउ संतुसटु भइआ जो गुर चरनी जन पाहि ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मोख = (विकारों से) मोक्ष, मुक्ति। पदवी = दर्जा। पाहि = पा लेते हैं
अर्थ: वह मनुष्य अपने कुल का उद्धार कर लेते हैं और खुद भी मुक्ति का रुतबा हासिल कर लेते हैं। जो मनुष्य सतिगुरु के चरणों में लगते हैं, उन पर परमात्मा प्रसन्न हो जाता है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जनु नानकु हरि का दासु है करि किरपा हरि लाज रखाहि ॥१॥
मूलम्
जनु नानकु हरि का दासु है करि किरपा हरि लाज रखाहि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: दास नानक (भी) उस हरि का दास है, हरि मेहर करके (अपने दास की) इज्जत रखता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ हंउमै अंदरि खड़कु है खड़के खड़कि विहाइ ॥ हंउमै वडा रोगु है मरि जमै आवै जाइ ॥
मूलम्
मः ३ ॥ हंउमै अंदरि खड़कु है खड़के खड़कि विहाइ ॥ हंउमै वडा रोगु है मरि जमै आवै जाइ ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: अहंकार में रहने से मनुष्य के मन में अशांति बनी रहती है और उसकी उम्र इस अशांति में ही गुजर जाती है; अहंकार (मनुष्य के लिए) एक बहुत बड़ा रोग है (इस रोग में ही) मनुष्य मरता है, पैदा होता है, आता है फिर जाता है (भाव, जनम-मरन के चक्कर में पड़ा रहता है)।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिना सतगुरु मिलिआ प्रभु आइ ॥ नानक गुर परसादी उबरे हउमै सबदि जलाइ ॥२॥
मूलम्
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिना सतगुरु मिलिआ प्रभु आइ ॥ नानक गुर परसादी उबरे हउमै सबदि जलाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जिनके दिल में शुरू से ही (किए कर्मों के संस्कार-रूपी लेख) उकरे हुए हैं, उनको सतिगुरु मिलता है (और सतिगुरु के मिलने से) परमात्मा (भी) आ मिलता है; हे नानक! वह मनुष्य सतिगुरु के शब्द द्वारा अहंकार को दूर करके सतिगुरु की कृपा से (‘अहम् रोग’ से) बच जाते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ हरि नामु हमारा प्रभु अबिगतु अगोचरु अबिनासी पुरखु बिधाता ॥ हरि नामु हम स्रेवह हरि नामु हम पूजह हरि नामे ही मनु राता ॥
मूलम्
पउड़ी ॥ हरि नामु हमारा प्रभु अबिगतु अगोचरु अबिनासी पुरखु बिधाता ॥ हरि नामु हम स्रेवह हरि नामु हम पूजह हरि नामे ही मनु राता ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अबिगतु = अव्यक्त, अदृष्ट। अगोचर = अ+गो+चर, इन्द्रियों की पहुँच से परे। बिधाता = पैदा करने वाला।
अर्थ: जो हरि अदृष्य है, जो इन्द्रियों की पहुँच से परे है, नाश से रहित है, हर जगह व्यापक है और विधाता है, उसका नाम हमारा (रक्षक) है; हम उस हरि-नाम की सेवा करते हैं, नाम को पूजते हैं, नाम में ही हमारा मन रंगा हुआ है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि नामै जेवडु कोई अवरु न सूझै हरि नामो अंति छडाता ॥ हरि नामु दीआ गुरि परउपकारी धनु धंनु गुरू का पिता माता ॥
मूलम्
हरि नामै जेवडु कोई अवरु न सूझै हरि नामो अंति छडाता ॥ हरि नामु दीआ गुरि परउपकारी धनु धंनु गुरू का पिता माता ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंति = आखिरी समय। गुरि = गुरु ने।
अर्थ: हरि के नाम जितना मुझे और कोई नहीं सूझता, नाम ही आखिरी समय में छुड़वाता है। धन्य है उस परोपकारी सतिगुरु के माता-पिता, जिस गुरु ने हमें नाम बख्शा है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हंउ सतिगुर अपुणे कंउ सदा नमसकारी जितु मिलिऐ हरि नामु मै जाता ॥१६॥
मूलम्
हंउ सतिगुर अपुणे कंउ सदा नमसकारी जितु मिलिऐ हरि नामु मै जाता ॥१६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जाता = समझा, पहचाना।16।
अर्थ: मैं अपने सतिगुरु को सदा नमस्कार करता हूँ, जिसके मिलने से मुझे हरि का नाम समझ आया है।16।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु मः ३ ॥ गुरमुखि सेव न कीनीआ हरि नामि न लगो पिआरु ॥ सबदै सादु न आइओ मरि जनमै वारो वार ॥ मनमुखि अंधु न चेतई कितु आइआ सैसारि ॥
मूलम्
सलोकु मः ३ ॥ गुरमुखि सेव न कीनीआ हरि नामि न लगो पिआरु ॥ सबदै सादु न आइओ मरि जनमै वारो वार ॥ मनमुखि अंधु न चेतई कितु आइआ सैसारि ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कितु = किस लिए? सैसारि = संसार में।
अर्थ: अंधे मनमुख ने सतिगुरु के सन्मुख हो के ना सेवा की, ना परमात्मा के नाम में उसका प्यार ही लगा, शब्द में रस भी न आया, (तभी तो) घड़ी-पल पैदा होता मरता है; अगर अंधा मनुष्य हरि को याद नहीं करता तो संसार में आने का भी क्या लाभ (उसने क्या कमाया)?
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक जिन कउ नदरि करे से गुरमुखि लंघे पारि ॥१॥
मूलम्
नानक जिन कउ नदरि करे से गुरमुखि लंघे पारि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे नानक! जिस मनुष्यों पे मेहर की नजर करता है, वह सतिगुरु के सन्मुख हो के (संसार सागर से) पार उतरते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ इको सतिगुरु जागता होरु जगु सूता मोहि पिआसि ॥ सतिगुरु सेवनि जागंनि से जो रते सचि नामि गुणतासि ॥
मूलम्
मः ३ ॥ इको सतिगुरु जागता होरु जगु सूता मोहि पिआसि ॥ सतिगुरु सेवनि जागंनि से जो रते सचि नामि गुणतासि ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुणतासि = तासि+गुण, गुणों के खजाने उस प्रभु में।
अर्थ: एक सतिगुरु ही सचेत है, और सारा संसार (माया के) मोह में तृष्णा में सोया हुआ है; जो मनुष्य सतिगुरु की सेवा करते हैं और गुणों के खजाने सच्चे नाम में रंगे हुए हैं, (वे) जागते हैं।
[[0593]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनमुखि अंध न चेतनी जनमि मरि होहि बिनासि ॥ नानक गुरमुखि तिनी नामु धिआइआ जिन कंउ धुरि पूरबि लिखिआसि ॥२॥
मूलम्
मनमुखि अंध न चेतनी जनमि मरि होहि बिनासि ॥ नानक गुरमुखि तिनी नामु धिआइआ जिन कंउ धुरि पूरबि लिखिआसि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: अंधे मनमुख हरि को स्मरण करते नहीं, जनम-मरन के चक्कर में पड़ कर तबाह हो रहे हैं; हे नानक! गुरु के सन्मुख हो के उन्होंने नाम स्मरण किया है, जिनके हृदय में धुर आरम्भ से ही (किए भले कर्मों के संस्कारों के अनुसार लेख) लिखे हुए हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ हरि नामु हमारा भोजनु छतीह परकार जितु खाइऐ हम कउ त्रिपति भई ॥ हरि नामु हमारा पैनणु जितु फिरि नंगे न होवह होर पैनण की हमारी सरध गई ॥
मूलम्
पउड़ी ॥ हरि नामु हमारा भोजनु छतीह परकार जितु खाइऐ हम कउ त्रिपति भई ॥ हरि नामु हमारा पैनणु जितु फिरि नंगे न होवह होर पैनण की हमारी सरध गई ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: त्रिपति = तृप्ति, अघाना। पैनणु = पोशाक। सरध = चाह, इच्छा।
अर्थ: हरि का नाम हमारा छक्तीस (36) तरह का (भाव, कई स्वादों वाला) भोजन है, जिसे खा के हम तृप्त हो गए हैं (भाव, मायावी पदार्थों से तृप्त हो गए हैं) हरि का नाम ही हमारी पोशाक है जिसे पहन के (हम) कभी बे-पर्दा नहीं होंगे, तथा अन्य (सुंदर) पोशाकें पहनने की हमारी चाह दूर हो गई है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि नामु हमारा वणजु हरि नामु वापारु हरि नामै की हम कंउ सतिगुरि कारकुनी दीई ॥ हरि नामै का हम लेखा लिखिआ सभ जम की अगली काणि गई ॥
मूलम्
हरि नामु हमारा वणजु हरि नामु वापारु हरि नामै की हम कंउ सतिगुरि कारकुनी दीई ॥ हरि नामै का हम लेखा लिखिआ सभ जम की अगली काणि गई ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कारकुनी = अधिकार। अगली = पहली। काणि = अधीनता, गुलामी।
अर्थ: हरि का नाम हमारा वणज, नाम ही हमारा व्यापार है और सतिगुरु ने हमें नाम की ही हकदारी दी है; हरि के नाम का ही हमने लेखा लिखा है, (जिस लेखे के कारण) जम की पहली खुशामद दूर हो गई है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि का नामु गुरमुखि किनै विरलै धिआइआ जिन कंउ धुरि करमि परापति लिखतु पई ॥१७॥
मूलम्
हरि का नामु गुरमुखि किनै विरलै धिआइआ जिन कंउ धुरि करमि परापति लिखतु पई ॥१७॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: पर किसी विरले गुरमुख ने नाम स्मरण किया है (वही स्मरण करते हैं) जिनको धुर से बख्शिश द्वारा (पिछले किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार उकरे हुए) लेख की प्राप्ति हुई है।17।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ जगतु अगिआनी अंधु है दूजै भाइ करम कमाइ ॥ दूजै भाइ जेते करम करे दुखु लगै तनि धाइ ॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ जगतु अगिआनी अंधु है दूजै भाइ करम कमाइ ॥ दूजै भाइ जेते करम करे दुखु लगै तनि धाइ ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तनि = शरीर में।
अर्थ: संसार अंधा और अज्ञानी है माया के मोह में काम कर रहा है; (पर) माया के मोह में जितने भी कर्म करता है (उतने ही) शरीर को दुख लगते हैं।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर परसादी सुखु ऊपजै जा गुर का सबदु कमाइ ॥ सची बाणी करम करे अनदिनु नामु धिआइ ॥
मूलम्
गुर परसादी सुखु ऊपजै जा गुर का सबदु कमाइ ॥ सची बाणी करम करे अनदिनु नामु धिआइ ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: अगर जगत गुरु का शब्द कमाए, सच्ची वाणी के द्वारा हर समय नाम स्मरण के कर्म करे, तो सतिगुरु की मेहर से सुख उपजता है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक जितु आपे लाए तितु लगे कहणा किछू न जाइ ॥१॥
मूलम्
नानक जितु आपे लाए तितु लगे कहणा किछू न जाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे नानक! कोई बात कही नहीं जा सकती, जिधर आप हरि (जीवों को) जोड़ता है, उधर ही जुड़ते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ हम घरि नामु खजाना सदा है भगति भरे भंडारा ॥ सतगुरु दाता जीअ का सद जीवै देवणहारा ॥
मूलम्
मः ३ ॥ हम घरि नामु खजाना सदा है भगति भरे भंडारा ॥ सतगुरु दाता जीअ का सद जीवै देवणहारा ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जीअ का दाता = जिंद दाता, आत्मिक जीवन देने वाला।
अर्थ: हमारे (हृदय रूप) घर में सदा नाम (रूपी) खजाना (मौजूद) है और भक्ति के भण्डार भरे हुए हैं, (क्योंकि) आत्मिक जीवन देने वाला सतिगुरु हमेशा हमारे सिर पर मौजूद है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अनदिनु कीरतनु सदा करहि गुर कै सबदि अपारा ॥ सबदु गुरू का सद उचरहि जुगु जुगु वरतावणहारा ॥
मूलम्
अनदिनु कीरतनु सदा करहि गुर कै सबदि अपारा ॥ सबदु गुरू का सद उचरहि जुगु जुगु वरतावणहारा ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अनदिनु = हर रोज। जुगु जुगु = हरेक युग में।
अर्थ: (नाम खजाने की इनायत से) हम सतिगुरु के अपार शब्द के द्वारा सदा हर वक्त हरि के गुण गाते हैं, और सतिगुरु का शब्द जो हरेक युग में (नाम की दाति) बाँटने वाला है, सदा उच्चारते हैं।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इहु मनूआ सदा सुखि वसै सहजे करे वापारा ॥ अंतरि गुर गिआनु हरि रतनु है मुकति करावणहारा ॥
मूलम्
इहु मनूआ सदा सुखि वसै सहजे करे वापारा ॥ अंतरि गुर गिआनु हरि रतनु है मुकति करावणहारा ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (सतिगुरु के शब्द से) हमारा ये मन सदा सुखी रहता है और सहज ही (भाव, किसी खास यत्न के बिना ही) नाम का व्यापार करता है और मन के अंदर सतिगुरु का (बख्शा हुआ) ज्ञान और मुक्ति कराने वाला हरि-नाम (रूपी) रत्न बसता है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक जिस नो नदरि करे सो पाए सो होवै दरि सचिआरा ॥२॥
मूलम्
नानक जिस नो नदरि करे सो पाए सो होवै दरि सचिआरा ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे नानक! जिस पर कृपा दृष्टि करता है, उसको (ये दाति) मिलती है और दरगाह में वह सही स्वीकार हो जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जो सतिगुर चरणी जाइ पइआ ॥ धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जिनि हरि नामा मुखि रामु कहिआ ॥
मूलम्
पउड़ी ॥ धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जो सतिगुर चरणी जाइ पइआ ॥ धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जिनि हरि नामा मुखि रामु कहिआ ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पइआ = का उच्चारण ‘पया’।
अर्थ: उस गुरसिख को धन्य धन्य कहना चाहिए जो अपने सतिगुरु के चरणों में जा लगता है, उस गुरसिख को धन्य धन्य कहना चाहिए जिसने मुंह से हरि का नाम उचारा है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जिसु हरि नामि सुणिऐ मनि अनदु भइआ ॥ धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जिनि सतिगुर सेवा करि हरि नामु लइआ ॥
मूलम्
धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जिसु हरि नामि सुणिऐ मनि अनदु भइआ ॥ धंनु धंनु सो गुरसिखु कहीऐ जिनि सतिगुर सेवा करि हरि नामु लइआ ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: उस गुरसिख को धन्य धन्य कहना चाहिए, जिसके मन को हरि का नाम सुन कर चाव पैदा होता है, उस गुरसिख को धन्य धन्य कहना चाहिए जिसने सेवा करके परमात्मा का नाम पा लिया है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तिसु गुरसिख कंउ हंउ सदा नमसकारी जो गुर कै भाणै गुरसिखु चलिआ ॥१८॥
मूलम्
तिसु गुरसिख कंउ हंउ सदा नमसकारी जो गुर कै भाणै गुरसिखु चलिआ ॥१८॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: मैं सदा उस गुरसिख के आगे अपना सिर निवाता हूँ, जो गुरसिख सतिगुरु के भाणे में चलता है।18।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु मः ३ ॥ मनहठि किनै न पाइओ सभ थके करम कमाइ ॥ मनहठि भेख करि भरमदे दुखु पाइआ दूजै भाइ ॥
मूलम्
सलोकु मः ३ ॥ मनहठि किनै न पाइओ सभ थके करम कमाइ ॥ मनहठि भेख करि भरमदे दुखु पाइआ दूजै भाइ ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: किसी भी मनुष्य ने मन के हठ से ईश्वर को नहीं पाया, सारे जीव (भाव, कई मनुष्य) (हठ से) कर्म करके थक गए हैं; मन के हठ से (कई तरह के) भेख कर करके भटकते हैं और माया के मोह में दुख उठाते हैं।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रिधि सिधि सभु मोहु है नामु न वसै मनि आइ ॥
मूलम्
रिधि सिधि सभु मोहु है नामु न वसै मनि आइ ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: रिद्धियां और सिद्धियां भी बिलकुल मोह (रूप) हैं, (इनसे) हरि का नाम हृदय में नहीं बस सकता।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर सेवा ते मनु निरमलु होवै अगिआनु अंधेरा जाइ ॥ नामु रतनु घरि परगटु होआ नानक सहजि समाइ ॥१॥
मूलम्
गुर सेवा ते मनु निरमलु होवै अगिआनु अंधेरा जाइ ॥ नामु रतनु घरि परगटु होआ नानक सहजि समाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: सतिगुरु की सेवा से ही मन साफ होता है और अज्ञान (रूप) अंधकार दूर होता है, हे नानक! नाम (रूप) रत्न हृदय में प्रत्यक्ष हो जाता है और सहज अवस्था में (भाव सहज ही नाम जपने वाली दशा में) मनुष्य लीन हो जाता है।1।
[[0594]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ सबदै सादु न आइओ नामि न लगो पिआरु ॥ रसना फिका बोलणा नित नित होइ खुआरु ॥ नानक किरति पइऐ कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ सबदै सादु न आइओ नामि न लगो पिआरु ॥ रसना फिका बोलणा नित नित होइ खुआरु ॥ नानक किरति पइऐ कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जिस मनुष्य को सतिगुरु के शब्द में रस नहीं आता, नाम में जिसका प्यार नहीं जुड़ा, वह मनुष्य जीभ से फीके वचन ही बोलता है और सदा ख्वार होता है; (पर) हे नानक! (उस के भी क्या वश?) (पिछले किए कर्मों के) उकरे हुए (संस्कारों के) अनुसार उसको (अब भी वैसा ही) कर्म करना पड़ता है; कोई मनुष्य (उसके संस्कारों को) मिटा नहीं सकता।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ धनु धनु सत पुरखु सतिगुरू हमारा जितु मिलिऐ हम कउ सांति आई ॥ धनु धनु सत पुरखु सतिगुरू हमारा जितु मिलिऐ हम हरि भगति पाई ॥
मूलम्
पउड़ी ॥ धनु धनु सत पुरखु सतिगुरू हमारा जितु मिलिऐ हम कउ सांति आई ॥ धनु धनु सत पुरखु सतिगुरू हमारा जितु मिलिऐ हम हरि भगति पाई ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हमारा सतपुरुख सतिगुरु धन्य है, जिसके मिलने से हमारे हृदय में ठंड पड़ी है, और जिसके मिलने से हमें परमात्मा की भक्ति मिली है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
धनु धनु हरि भगतु सतिगुरू हमारा जिस की सेवा ते हम हरि नामि लिव लाई ॥ धनु धनु हरि गिआनी सतिगुरू हमारा जिनि वैरी मित्रु हम कउ सभ सम द्रिसटि दिखाई ॥
मूलम्
धनु धनु हरि भगतु सतिगुरू हमारा जिस की सेवा ते हम हरि नामि लिव लाई ॥ धनु धनु हरि गिआनी सतिगुरू हमारा जिनि वैरी मित्रु हम कउ सभ सम द्रिसटि दिखाई ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हरि का भक्त हमारा सतिगुरु धन्य है, जिसकी सेवा करके हमने हरि के नाम में तवज्जो जोड़ी है; हरि के ज्ञान वाला हमारा सतिगुरु धन्य है जिसने वैरी क्या और सज्जन क्या- सबकी ओर हमें एकता की नजर (से देखने की विधि) सिखाई है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
धनु धनु सतिगुरू मित्रु हमारा जिनि हरि नाम सिउ हमारी प्रीति बणाई ॥१९॥
मूलम्
धनु धनु सतिगुरू मित्रु हमारा जिनि हरि नाम सिउ हमारी प्रीति बणाई ॥१९॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हमारा सज्जन सतिगुरु धन्य है, जिसने हरि के नाम से हमारा प्यार बना दिया है।19।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु मः १ ॥ घर ही मुंधि विदेसि पिरु नित झूरे सम्हाले ॥ मिलदिआ ढिल न होवई जे नीअति रासि करे ॥१॥
मूलम्
सलोकु मः १ ॥ घर ही मुंधि विदेसि पिरु नित झूरे सम्हाले ॥ मिलदिआ ढिल न होवई जे नीअति रासि करे ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुंधि = स्त्री।1।
अर्थ: पति का घर (भाव, हृदय) में ही है, (पर उसको) परदेस में (समझते हुए) कमली स्त्री सदा झुरती है और (उसे) याद करती है; अगर नीयत को साफ करे तो मिलते हुए ढील नहीं लगती।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः १ ॥ नानक गाली कूड़ीआ बाझु परीति करेइ ॥ तिचरु जाणै भला करि जिचरु लेवै देइ ॥२॥
मूलम्
मः १ ॥ नानक गाली कूड़ीआ बाझु परीति करेइ ॥ तिचरु जाणै भला करि जिचरु लेवै देइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे नानक! (हरि से) प्यार के बिना (अर्थात, जब तक प्यार से वंचित रहे) और बातें (करनी) झूठी हैं; (क्योंकि इस तरह) तब तक (हरि को जीव) अच्छा समझता है जब तक (हरि) देता है और (जीव) लेता है (भाव, जब तक जीव को कुछ मिलता रहता है)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ जिनि उपाए जीअ तिनि हरि राखिआ ॥ अम्रितु सचा नाउ भोजनु चाखिआ ॥ तिपति रहे आघाइ मिटी भभाखिआ ॥
मूलम्
पउड़ी ॥ जिनि उपाए जीअ तिनि हरि राखिआ ॥ अम्रितु सचा नाउ भोजनु चाखिआ ॥ तिपति रहे आघाइ मिटी भभाखिआ ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिनि = जिस ने। तिनि = उसने। भभाखिआ = खाने की इच्छा।
अर्थ: जिस हरि ने जीव पैदा किए हैं, उसने उनकी रक्षा की है; जो जीव उस हरि का आत्मिक जीवन देने वाला सच्चा नाम (रूप) भोजन खाते हैं और (इस भोजन से) वह बहुत अघा (तृप्त हो) जाते हैं उनकी और खाने की इच्छा समाप्त हो जाती है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभ अंदरि इकु वरतै किनै विरलै लाखिआ ॥ जन नानक भए निहालु प्रभ की पाखिआ ॥२०॥
मूलम्
सभ अंदरि इकु वरतै किनै विरलै लाखिआ ॥ जन नानक भए निहालु प्रभ की पाखिआ ॥२०॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: सारे जीवों में एक प्रभु स्वयं व्यापक है, पर किसी विरले ने समझा है; और हे नानक! (वह विरला) दास प्रभु का पक्ष करके खिला रहता है (प्रभु के साथ दृढता से जुड़ा रहके आनंदमयी रहता है)।20।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु मः ३ ॥ सतिगुर नो सभु को वेखदा जेता जगतु संसारु ॥ डिठै मुकति न होवई जिचरु सबदि न करे वीचारु ॥ हउमै मैलु न चुकई नामि न लगै पिआरु ॥
मूलम्
सलोकु मः ३ ॥ सतिगुर नो सभु को वेखदा जेता जगतु संसारु ॥ डिठै मुकति न होवई जिचरु सबदि न करे वीचारु ॥ हउमै मैलु न चुकई नामि न लगै पिआरु ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जितना ये सारा संसार है (इसमें) हरेक जीव सतिगुरु के दर्शन करता है (पर) निरे दर्शन करने से मुक्ति नहीं मिलती, जब तक जीव सतिगुरु के शब्द में विचार नहीं करता, (क्योंकि विचार किए बिना) अहंकार (-रूपी मन की) मैल नहीं उतरती और नाम के प्रति प्यार उत्पन्न नहीं होता।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इकि आपे बखसि मिलाइअनु दुबिधा तजि विकार ॥ नानक इकि दरसनु देखि मरि मिले सतिगुर हेति पिआरि ॥१॥
मूलम्
इकि आपे बखसि मिलाइअनु दुबिधा तजि विकार ॥ नानक इकि दरसनु देखि मरि मिले सतिगुर हेति पिआरि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मिलाइअनु = मिला लिए उसने। दुबिधा = दुचिक्तापन, मेर तेर।1।
अर्थ: कई मनुष्यों को प्रभु ने खुद ही मेहर करके मिला लिया है जिन्होंने मेर-तेर और विकार छोड़े हैं। हे नानक! कई मनुष्य (सतिगुरु के) दर्शन करके सतिगुरु के प्यार में तवज्जो जोड़ के मर के (भाव, स्वैभाव का अहंकार गवा के) हरि में मिल गए हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ सतिगुरू न सेविओ मूरख अंध गवारि ॥ दूजै भाइ बहुतु दुखु लागा जलता करे पुकार ॥ जिन कारणि गुरू विसारिआ से न उपकरे अंती वार ॥
मूलम्
मः ३ ॥ सतिगुरू न सेविओ मूरख अंध गवारि ॥ दूजै भाइ बहुतु दुखु लागा जलता करे पुकार ॥ जिन कारणि गुरू विसारिआ से न उपकरे अंती वार ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गावारि = गवार ने। जिन कारणि = जिस की खातिर। उपकरे = पुकरे, आए।
अर्थ: अंधे मूर्ख गवार ने अपने सतिगुरु की सेवा नहीं की, माया के प्यार में जब बहुत दुखी हुआ तब जलता हुआ विरलाप करता है; और जिनके लिए सतिगुरु को विसारा था वे आखिरी वक्त पर (मुश्किल में) नहीं (उसका साथ देने पुकारने पर भी) नहीं आते।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक गुरमती सुखु पाइआ बखसे बखसणहार ॥२॥
मूलम्
नानक गुरमती सुखु पाइआ बखसे बखसणहार ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे नानक! गुरु की मति ले के ही सुख मिलता है और बख्शने वाला हरि बख्शता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ तू आपे आपि आपि सभु करता कोई दूजा होइ सु अवरो कहीऐ ॥ हरि आपे बोलै आपि बुलावै हरि आपे जलि थलि रवि रहीऐ ॥
मूलम्
पउड़ी ॥ तू आपे आपि आपि सभु करता कोई दूजा होइ सु अवरो कहीऐ ॥ हरि आपे बोलै आपि बुलावै हरि आपे जलि थलि रवि रहीऐ ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे हरि! तू स्वयं ही स्वयं है और स्वयं ही सब कुछ पैदा करता है, किसी और दूसरे को जन्मदाता तब कहें, जो कोई और हो ही। हरि खुद ही (सब जीवों में) बोलता है, खुद ही सबको बुलाता है और खुद ही जल में थल व्याप रहा है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि आपे मारै हरि आपे छोडै मन हरि सरणी पड़ि रहीऐ ॥ हरि बिनु कोई मारि जीवालि न सकै मन होइ निचिंद निसलु होइ रहीऐ ॥
मूलम्
हरि आपे मारै हरि आपे छोडै मन हरि सरणी पड़ि रहीऐ ॥ हरि बिनु कोई मारि जीवालि न सकै मन होइ निचिंद निसलु होइ रहीऐ ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे मन! हरि खुद ही मारता है और खुद ही बख्शता है, (इस वास्ते) हरि की शरण में पड़ा रह। हे मन! हरि के बिना कोई और ना मार सकता है ना जीवित कर सकता है (इसलिए) निश्चिंत हो के लंबी तान ले (बेफिक्र हो जा, किसी और की ओट ना देख और सबसे बड़े हरि की आस रख)।
विश्वास-प्रस्तुतिः
उठदिआ बहदिआ सुतिआ सदा सदा हरि नामु धिआईऐ जन नानक गुरमुखि हरि लहीऐ ॥२१॥१॥ सुधु
मूलम्
उठदिआ बहदिआ सुतिआ सदा सदा हरि नामु धिआईऐ जन नानक गुरमुखि हरि लहीऐ ॥२१॥१॥ सुधु
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे दास नानक! अगर उठते-बैठते सोए हुए हर वक्त हरि का नाम स्मरण करें तो सतिगुरु के सन्मुख हो के हरि मिल जाता है।21।1। सुधु।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ये वार गुरु रामदास जी की उचारी हुई है; 21 पौड़ियां हैं; पहली पौड़ी के साथ 3 सलोक हैं, बाकी पौड़ियों के साथ दो-दो सलोक हैं; कुल 43 सलोक हैं।