विश्वास-प्रस्तुतिः
भ्रमत फिरत बहु जनम बिलाने तनु मनु धनु नही धीरे ॥ लालच बिखु काम लुबध राता मनि बिसरे प्रभ हीरे ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भ्रमत फिरत बहु जनम बिलाने तनु मनु धनु नही धीरे ॥ लालच बिखु काम लुबध राता मनि बिसरे प्रभ हीरे ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भ्रमत = भटकते हुए। बिलाने = गुजर गए। नही धीरे = नहीं टिकता। बिखु = जहर। लुबध = लोभी। राता = रंगा हुआ। मनि = मन में से। रहाउ।
अर्थ: (माया के मोह में) भटकते हुए कई जनम गुजर जाते हैं, ये शरीर नाश हो जाता है, मन भटकता रहता है और धन भी टिका नहीं रहता। लोभी जीव जहर-रूपी पदार्थों की लालच में, काम-वासना में, रंगा रहता है, इसके मन में से अमोलक प्रभु बिसर जाता है। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बिखु फल मीठ लगे मन बउरे चार बिचार न जानिआ ॥ गुन ते प्रीति बढी अन भांती जनम मरन फिरि तानिआ ॥१॥
मूलम्
बिखु फल मीठ लगे मन बउरे चार बिचार न जानिआ ॥ गुन ते प्रीति बढी अन भांती जनम मरन फिरि तानिआ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चार = सुंदर। ते = से, की ओर से हट के। अन भांती = और-और किस्म की।1।
अर्थ: हे कमले मन! ये जहर रूपी फल तुझे मीठे लगते हैं, तुझमें अच्छे विचार नहीं पनपते, गुणों से अलग और ही किस्म की प्रीति तेरे अंदर बढ़ रही है, और तेरे जनम-मरण का ताना तना जा रहा है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जुगति जानि नही रिदै निवासी जलत जाल जम फंध परे ॥ बिखु फल संचि भरे मन ऐसे परम पुरख प्रभ मन बिसरे ॥२॥
मूलम्
जुगति जानि नही रिदै निवासी जलत जाल जम फंध परे ॥ बिखु फल संचि भरे मन ऐसे परम पुरख प्रभ मन बिसरे ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जुगति = जीवन जुगति। निवासी = टिकाई। जलत = (तृष्णा में) जलते। संगि = एकत्र करके।2।
अर्थ: हे मन! अगर तूने जीवन की जुगति समझ के यह जुगति अपने अंदर पक्की ना की, तो तृष्णा में जलते हुए (तेरे अस्तित्व) को जमों का जाल, जमों के फाहे बर्बाद कर देंगे। हे मन! तू अब तक विषौ-रूप जहर के फल ही इकट्ठे करके संभालता रहा, और ऐसा संभालता रहा कि तुझे परम-पुरख प्रभु भूल गया।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गिआन प्रवेसु गुरहि धनु दीआ धिआनु मानु मन एक मए ॥ प्रेम भगति मानी सुखु जानिआ त्रिपति अघाने मुकति भए ॥३॥
मूलम्
गिआन प्रवेसु गुरहि धनु दीआ धिआनु मानु मन एक मए ॥ प्रेम भगति मानी सुखु जानिआ त्रिपति अघाने मुकति भए ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरहि = गुरु ने। मनु = यकीन, श्रद्धा। अघाने = तृप्त हो गया।3।
अर्थ: जिस मनुष्य को गुरु ने ज्ञान का प्रवेश-रूप धन दिया, उसकी तवज्जो प्रभु में जुड़ गई, उसके अंदर श्रद्धा बन गई, उसका मन प्रभु से एक-मेक हो गया; उसे प्रभु का प्यार, प्रभु की भक्ति अच्छी लगी, उसकी सुख से सांझ बन गई, वह माया की ओर से अच्छी तरह तृप्त हो गया, और बंधनों से मुक्त हो गया।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जोति समाइ समानी जा कै अछली प्रभु पहिचानिआ ॥ धंनै धनु पाइआ धरणीधरु मिलि जन संत समानिआ ॥४॥१॥
मूलम्
जोति समाइ समानी जा कै अछली प्रभु पहिचानिआ ॥ धंनै धनु पाइआ धरणीधरु मिलि जन संत समानिआ ॥४॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जा कै = जिस मनुष्य में। अछली = ना छले जाने वाला। धंनै = धन्ने ने। मिलि जन = संत जनों को मिल के।4।
अर्थ: जिस मनुष्य के अंदर प्रभु की सर्व-व्यापक ज्योति टिक गई, उसने माया में ना छले जाने वाले प्रभु को पहचान लिया।
मैं धन्ने ने भी उस प्रभु का नाम-रूपी धन कोढूँढ लिया है जो सारी धरती का आसरा है; मैं धन्ना भी संत-जनों को मिल के प्रभु में लीन हो गया हूँ।4।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: भक्त धन्ना जी अपनी जुबानी कहते हैं कि मुझे गुरु ने नाम-धन दिया है, संतों की संगति में मुझे धरणीधर मिला है। पर, स्वार्थी लोगों ने अपना धार्मिक जुल्ला अंजान लोगों के कंधे पर डाले रखने के लिए ये कहानी चला दी कि धन्ने ने एक ब्राहमण से एक ठाकुर ले के उसकी पूजा की, और उस ठाकुर-पूजा से उसे परमात्मा मिला।
इस भुलेखे को दूर करने के लिए और भक्त धन्ना जी के शब्द की आखिरी तुक को अच्छी तरह सिखों के सामने स्पष्ट करने के लिए गुरु अरजन साहिब जी ने अगला शब्द अपनी ओर से उचार के दर्ज किया है।
भक्त-वाणी के विरोधी धन्ना जी के आसा राग में दर्ज शब्द के बारे में यूँ लिखते हैं: “तीन शब्द राग आसा में आए हैं जो इस तरह हैं।
‘पहला शब्द ‘भ्रमत फिरत बहु जनम बिलाने, तनमन धन नहीं धीरे’ से आरंभ होता है। दूसरा, जिसमें भक्त जी अपने गुरु रामानंद जी के आगे जोदड़ी करते हैं। अंत में गोसाई रामानंद जी से मेल होने पर, ‘धंनै धनु पाइआ धरणीधरु, मिलि जन संत समाइआ’ की खुशी प्रगट करते हैं।
‘गोबिंद गोबिंद गोबिंद संगि नामदेउ मन लीना’ वाले शब्द का शीर्षक ‘महला ५’ से आरम्भ होता है, जिसमें कई भक्तों का नाम ले के बताया गया है कि अमुक-अमुक नाम जपने के कारण पार लांघ गए। पर, उन भक्तों को जात-पात के ध्रुवों से याद किया है। सारे भक्तों को गिन के आखिर में निर्णय किया गया है, ‘इह बिधि सुनि कै जाटरो, उठि भक्ति लागा। मिले प्रतखि गुसाईआ धंना वडभागा।4।’ जाटरों के लिए ‘प्रतखि गुसाईआ’ स्वामी रामानंद था। पर ये शब्द भक्त जी के मुख पर फबता नहीं था। इसी लिए महला ५ लिखा है। भगतों की प्रसिद्धि के लिए बाद में भी उनके नाम पर उनके श्रद्धालु करते रहते थे।
‘भक्त धन्ना जी के कई सिद्धांत गुरमति के विरुद्ध हैं।’
इस शब्द में धन्ना जी साफ शब्दों में कह रहे हैं कि मुझे गुरु ने नाम-धन दिया है। पर पाठकों की नजरों में भक्त जी के बरते गए गुरु पद की कद्र घटाने की खातिर विरोधी सज्जन जान-बूझ के शब्द ‘गुरु रामानंद’, गुसाई रामानंद’ बरत रहा है। वरना, इस शब्द का कोई भी सिद्धांत गुरमति विरोधी नहीं है। पता नहीं, इस सज्जन को कौन से ‘कई सिद्धांत गुरमति विरुद्ध’ दिख रहे हैं।
अगले शब्द को गुरु अरजन साहिब का शब्द मानने से साफ इन्कार किया गया है, चाहे इसका शीर्षक ‘महला ५’ है। दलील बड़ी आश्चर्यपूर्ण दी है कि ‘जाति-पात के ध्रुवों से भक्तों को याद किया गया है। क्या जहाँ कहीं भी गुरु साहिब ने किसी भक्त की जाति लिख के वर्णन किया है, हमारा ये विरोधी सज्जन उस शब्द को नहीं मानेगा? देखें;
“नीच जाति हरि जपतिआ, उतम पदवी पाइ। पूछहु बिदर दासी सुतै, किसनु उतरिआ घरि जिसु जाइ।1।
… … … … …
रविदासु चमारु उसतति करे, हरि कीरति निमख इक गाइ। पतित जाति उतमु भइआ, चार वरन पऐ पगि आइ।2।1।8। (सूही महला ४ घरु ६)
नामा छीबा कबीरु जुोलाहा, पूरे गुर ते गति पाई। ब्रहम के बेते सबदु पछाणहि, हउमै जाति गवाई। सुरि नर तिन की वाणी गावहि, कोइ न मेटै भाई।3।5।22। (स्री रागु महला ३ असटपदीआ)
आखिरी तुक ‘मिले प्रतखि गुसाईआ, धंना वडभागा’, लिख के विरोधी सज्जन ने झट-पट साथ ही लिख दिया है ‘जाटरो’ के लिए ‘प्रतखि गुसाईआ’ रामानंद था। सज्जन जी! गुरमत के विरुद्ध मन-घड़ंत कहानियों के लिए तो बेशक मुंह मोड़ें, पर ये दलीलबाजी अनुचित और खोटी है। क्या गुरु ग्रंथ साहिब के शबदों में आए शब्द ‘गोसाई’ का अर्थ भी ‘गुसाई रामानंद’ ही करोगे?
हउ गोसाई का पहिलवानड़ा। मै गुर मिलि उच दुमालड़ा। सभ होई छिंझ इकठीआ, दयु बैठा वेखै आपि जीउ।17। (सिरी रागु महला ५ पन्ना 74)
पहले तो ‘महला ५’ शीर्षक होते हुए भी इस शब्द को गुरु अरजन देव जी का शब्द मानने से इन्कार किया है, फिर इसको भक्त धन्ना जी का भी नहीं माना और कह दिया कि ‘ये शब्द भक्त जी के मुख पर फबता नहीं था। इसी लिए ‘महला ५’ लिख दिया है। भक्तों की प्रसिद्धि के लिए बाद में भी उनके नामों पर उनके श्रद्धालु रचना करते रहते थे।
यहाँ ये विरोधी सज्जन कहानी साजों की कहानी का ही आसरा ले के कह रहा है कि भक्त तो कहाँ रहे, आम लोगों की रचना भी किसी ढंग से श्री गुरु ग्रंथ साहिब में दर्ज कर ली गई थी।
पाठक सज्जन अगले शब्द के अर्थ और उसकी व्याख्या ध्यान से पढ़ें;
विश्वास-प्रस्तुतिः
महला ५ ॥ गोबिंद गोबिंद गोबिंद संगि नामदेउ मनु लीणा ॥ आढ दाम को छीपरो होइओ लाखीणा ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
महला ५ ॥ गोबिंद गोबिंद गोबिंद संगि नामदेउ मनु लीणा ॥ आढ दाम को छीपरो होइओ लाखीणा ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गोबिंद गोबिंद गोबिंद संगि = हर समय गोबिंद के साथ, बार बार गोबिंद के साथ। लीणा = लीन हुआ, जुड़ा। आढ = आधी। दाम = कौडी। को = का। छीपरो = गरीब छींबा, धोबी। रहाउ।
अर्थ: (भक्त) नामदेव जी का मन सदा परमात्मा के साथ जुड़ा रहता था (उस हर वक्त की याद की इनायत से) आधी कौड़ी का गरीब छींबा (धोबी), मानो, लखपति बन गया (क्योंकि उसे किसी की अधीनता ना रही)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बुनना तनना तिआगि कै प्रीति चरन कबीरा ॥ नीच कुला जोलाहरा भइओ गुनीय गहीरा ॥१॥
मूलम्
बुनना तनना तिआगि कै प्रीति चरन कबीरा ॥ नीच कुला जोलाहरा भइओ गुनीय गहीरा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जोलाहरा = गरीब जुलाहा। गहीरा = गंभीर, गहरा (समुंदरवत्)। गुनीय गहीरा = गुणों का समुंदर।1।
अर्थ: (कपड़ा) उनने (ताना) तानने (की लगन) छोड़ के कबीर ने प्रभु-चरणों से लगन लगा ली; नीच जाति का गरीब जुलाहा था, गुणों का समुंदर बन गया।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रविदासु ढुवंता ढोर नीति तिनि तिआगी माइआ ॥ परगटु होआ साधसंगि हरि दरसनु पाइआ ॥२॥
मूलम्
रविदासु ढुवंता ढोर नीति तिनि तिआगी माइआ ॥ परगटु होआ साधसंगि हरि दरसनु पाइआ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तिन्हि = उस ने। साध संगि = सत्संग में।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: “तिनि्” में अक्षर ‘न’ के नीचे आधा ‘ह’ है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: रविदास (पहले) नित्य मरे हुए पशु ढोता था, (पर जब से) उसने माया (का मोह) त्याग दिया, साधु-संगत में रहके प्रसिद्ध हो गया, उसको परमात्मा के दर्शन हो गए।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सैनु नाई बुतकारीआ ओहु घरि घरि सुनिआ ॥ हिरदे वसिआ पारब्रहमु भगता महि गनिआ ॥३॥
मूलम्
सैनु नाई बुतकारीआ ओहु घरि घरि सुनिआ ॥ हिरदे वसिआ पारब्रहमु भगता महि गनिआ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बुतकारीआ = बुक्तियां कढ़ने वाला, दूर नजदीक के छोटे-मोटे काम करने वाला। घरि घरि = घर घर में, हरेक घर में। सुनिआ = सुना गया, शोभा हुई।3।
अर्थ: सैण (जाति का) नाई लोगों के अंदर-बाहर के छोटे-मोटे काम करता था, उसकी घर-घर शोभा हो चली, उसके हृदय में परमात्मा बस गया और वह भक्तों में गिना जाने लगा।3।
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विश्वास-प्रस्तुतिः
इह बिधि सुनि कै जाटरो उठि भगती लागा ॥ मिले प्रतखि गुसाईआ धंना वडभागा ॥४॥२॥
मूलम्
इह बिधि सुनि कै जाटरो उठि भगती लागा ॥ मिले प्रतखि गुसाईआ धंना वडभागा ॥४॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: इह बिधि = इस तरह (की बात)। जाटरो = गरीब जाट। प्रतखि = साक्षात तौर पर।4।
अर्थ: इस तरह (की बात) सुन के गरीब धन्ना जट भी उठके भक्ति करने लगा, उसको पामात्मा के साक्षात दीदार हुए और वह अति भाग्यशाली बन गया।4।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: इस शब्द से पहले के शब्द का शीर्षक ‘आसा वाणी भक्त धंने की’। इस शीर्षक तले 3 शब्द है; पर इस दूसरे शब्द का एक और शीर्षक है ‘महला ५’। इस का भाव ये है कि इन तीनों शबदों में ये दूसरा शब्द गुरु अरजन साहिब का अपना उचारा हुआ है। इसमें उन्होंने शब्द ‘नानक’ आखिर में नहीं बरता। भगतों के शब्द शलोकों के संबंध में उचारे हुए और भी ऐसे वचन मिलते हैं जिनमें गुरु जी ने ‘नानक’ शब्द का इस्तेमाल नहीं किया।
(देखें शलोक फरीद जी नं: 75, 82, 83, 105, 108, 109, 110, 111)
शीर्षक ‘महला ५’ इस विचार के बारे में किसी भी शक की गुंजायश नहीं रहने देता कि इस शब्द के उचारने वाले गुरु अरजन साहिब जी हैं। आसा राग में गुरु अरजन साहिब के अपने सिर्फ शब्द ही 163 है। (देखें 1430सफे वाली बीड़ पन्ना 300 से 411)
फिर ये शब्द धन्ने भक्त के शबदों में क्यों दर्ज किया गया? शब्द के आखिर लाइन में ‘नानक’ की जगह ‘धंना’ क्यों बरता गया? इसका उक्तर स्पष्ट है: फरीद जी के शलोकों में गुरु अरजन साहिब ने कुछ शलोक ‘फरीद’ जी के नाम पर उचारे हैं, उनकी पहचान सिर्फ यही है कि उनके ऊपर शीर्षक ‘महला ५’ लिखा है; वे शलोक फरीद जी के उचारे शलोकों के साथ संबंध रखते हैं। इसी तरह गुरु अरजन देव जी का उच्चारा ये शब्द धन्ने भक्त जी के साथ संबंध रखता है।
वह कौन सा संबंध है? ये ढूँढने के लिए शब्द के चौथे बंद की पहिली तुक ध्यान से पढ़ें: ‘इह बिधि सुनि कै जाटरो उठि भक्ति लागा’। क्या सुन के? इस प्रश्न का उक्तर पाठको हरेक बंद पढ़ने पर मिलता जाएगा। सो हरेक बंद पढ़ के ‘इह बिधि’ वाली तुक से जोड़ें। धंने ने नामदेव की शोभा सुनी, कबीर का हाल सुना; ये सुन केउसे भी चाव पैदा हुआ भक्ति करने का। इस शब्द को जान-बूझ के धन्ने भक्त की वाणी में दर्ज करने से स्पष्ट होता है कि उस समय धन्ना जी की भक्ति में लगन बारे अंजान लोगों में स्वार्थी मूर्ति-पूजक पण्डित लोगों ने मन-घड़ंत कहानियां उड़ाई हुई थीं; उन कहानियों की जोरदार तरदीद इस शब्द में की गई है; लिखा है कि धन्ने की प्रभु-भक्ति में लगन लगने के असल कारण थे नामदेव, कबीर, रविदास और सैण की सुनी हुई शोभा।
अगर हमने गुरु ग्रंथ साहिब की वाणी में से सही राह तलाशना है, तो लोगों की लिखीं कहानियों को मिला के शब्द के अर्थ करने की बजाय सीधे शब्द का ही आसरा लें; वरना, गलती होने की पूरी संभावना बनी रहती है।
अगर धंने भक्त ने पत्थर पूज के ईश्वर को पाया होता, तो इसका भाव ये निकलता कि पत्थर पूज के ईश्वर को मिलने वाले की वाणी दर्ज करके गुरु अरजन साहिब इस असूल को स्वीकार कर बैठे हैं कि पत्थर पूजने से भी ईश्वर मिल सकता है; पर उनका अपना हुक्म ऐसे है;
‘जिस पाहन कउ ठाकुरु कहता। उहु पाहनु लै उस कउ डुबता।2।
गुनहगारु लूण हरामी। पाहन नाव न पारगरामी।3। (सूही महला ५)
विश्वास-प्रस्तुतिः
रे चित चेतसि की न दयाल दमोदर बिबहि न जानसि कोई ॥ जे धावहि ब्रहमंड खंड कउ करता करै सु होई ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
रे चित चेतसि की न दयाल दमोदर बिबहि न जानसि कोई ॥ जे धावहि ब्रहमंड खंड कउ करता करै सु होई ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चेतसि की न = तू क्यों याद नहीं करता? दमोदर = (संस्कृत: दामोदर, an epithet of ज्ञrishna) परमात्मा। बिबहि = और। न जानसि = तू ना जानना। धावहि = तू दौड़ेगा। ब्रहमंड खंड कउ = सारी सृष्टि के अलग अलग देशों में। रहाउ।
अर्थ: हे (मेरे) मन! दया के घर परमात्मा को तू क्यों नही स्मरण करता? (देखना) किसी और की आस ना लगाए रखना। अगर तू सारी सृष्टि के देसों-परदेसों में भी भटकता फिरेगा, तो भी वही कुछ होगा जो कर्तार करेगा।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जननी केरे उदर उदक महि पिंडु कीआ दस दुआरा ॥ देइ अहारु अगनि महि राखै ऐसा खसमु हमारा ॥१॥
मूलम्
जननी केरे उदर उदक महि पिंडु कीआ दस दुआरा ॥ देइ अहारु अगनि महि राखै ऐसा खसमु हमारा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जननी = माँ। केरे = के। उदर = पेट। उदक = पानी। पिंडु = शरीर। दस दुआरा = दस दरवाजों वाला (2कान, 2 आँखें, 2 नासिकाएं, 1 मुंह, 1 गुदा, 1 लिंग, 1 तालू)। देइ = दे के। अहारु = खुराक।1।
अर्थ: माँ के पेट के जल में उस प्रभु ने हमारा दस सोतों वाला शरीर बना दिया; खुराक दे के माँ के पेट की आग में वह हमारी रक्षा करता है (देख, हे मन!) वह हमारा मालिक ऐसा (दयालु) है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कुमी जल माहि तन तिसु बाहरि पंख खीरु तिन नाही ॥ पूरन परमानंद मनोहर समझि देखु मन माही ॥२॥
मूलम्
कुमी जल माहि तन तिसु बाहरि पंख खीरु तिन नाही ॥ पूरन परमानंद मनोहर समझि देखु मन माही ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कुंमी = कुछआ। माहि = में। तिसु तन = उसके बच्चे। पंख = खंभ। खीरु = दूध (वाले थन)। तिन्ह = उनको। मनोहर = सुंदर। समझि = समझ के।2।
अर्थ: कछुआ पानी में रहता है, उसके बच्चे बाहर (रेत पर रहते हैं), ना (बच्चों के) पंख हैं (कि उड़ के कुछ खा लें), ना (कछुए के) थन (हैं कि बच्चों को दूध पिलाए); (पर हे जीवात्मा!) मन में विचार के देख, वह सुंदर परमानंद पूर्ण प्रभु (उनकी पालना करता है)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पाखणि कीटु गुपतु होइ रहता ता चो मारगु नाही ॥ कहै धंना पूरन ताहू को मत रे जीअ डरांही ॥३॥३॥
मूलम्
पाखणि कीटु गुपतु होइ रहता ता चो मारगु नाही ॥ कहै धंना पूरन ताहू को मत रे जीअ डरांही ॥३॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पाखणि = पत्थर में। कीट = कीड़ा। गुपतु = छुपा। ता चो = उसका। मारगु = (निकलने का) राह। ताहू को = उस कीड़े का भी। रे जीअ = हे जीव! 3।
अर्थ: पत्थर में कीड़ा छुपा हुआ रहता है (पत्थर में से बाहर जाने के लिए) उसका कोई रास्ता नहीं; पर उसको (पालने वाला) भी पूर्ण परमात्मा है; धंना कहता है: हे जीवात्मा! तू भी ना डर।3।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ये तीनों शब्द राग आसा में हैं। पहला और तीसरा शब्द भक्त धंना जी के हैं। यहाँ कोई भी सिद्धांत गुरमति के विरुद्ध नहीं दिख रहा।