विश्वास-प्रस्तुतिः
रागु आसा महला ५ घरु १७ आसावरी ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
रागु आसा महला ५ घरु १७ आसावरी ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
गोबिंद गोबिंद करि हां ॥ हरि हरि मनि पिआरि हां ॥ गुरि कहिआ सु चिति धरि हां ॥ अन सिउ तोरि फेरि हां ॥ ऐसे लालनु पाइओ री सखी ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
गोबिंद गोबिंद करि हां ॥ हरि हरि मनि पिआरि हां ॥ गुरि कहिआ सु चिति धरि हां ॥ अन सिउ तोरि फेरि हां ॥ ऐसे लालनु पाइओ री सखी ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करि = कह, जप। मनि = मन में। पिआरि = प्यार कर। गुरि = गुरु ने। चिति = चिक्त कर। धरि = रख। अन सिउ = (परमात्मा के बिना) और से। तोरी = (प्रेम) तोड़ के। फेरि = (औरों से मन को) मोड़ ले। ऐसे = इस तरह। लालनु = प्यारा प्रभु। री सखी = हे सहेली!।1। रहाउ।
अर्थ: (हे सखी!) सदा परमात्मा का स्मरण करती रह, (इस तरह अपने) मन में परमात्मा से प्यार बना। जो कुछ गुरु ने बताया वह अपने चिक्त में बसा। परमात्मा के बिना औरों के साथ बनाई प्रीति तोड़ दे, औरों से अपने मन को फेर ले। हे सहेली! (जिसने भी) परमात्मा को (पाया है) इस तरीके से ही पाया है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पंकज मोह सरि हां ॥ पगु नही चलै हरि हां ॥ गहडिओ मूड़ नरि हां ॥ अनिन उपाव करि हां ॥ तउ निकसै सरनि पै री सखी ॥१॥
मूलम्
पंकज मोह सरि हां ॥ पगु नही चलै हरि हां ॥ गहडिओ मूड़ नरि हां ॥ अनिन उपाव करि हां ॥ तउ निकसै सरनि पै री सखी ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पंकज = कीचड़ (पंक = कीचड़)। सरि = सर में, संसार सरोवर में। पगु = पैर। गहडिओ = गडा हुआ, फसा हुआ। मूढ़ नरि = मूर्ख मनुष्य ने। अनिन = अनन्य, केवल एक। तउ = तब। निकसै = निकल आता है।1।
अर्थ: हे सहेली! संसार समुंदर में मोह का कीचड़ है (इसमें फसा हुआ) पैर परमात्मा की ओर नहीं चल सकता। मूर्ख मनुष्य ने (अपना पैर मोह के कीचड़ में) फंसाया हुआ है। हे सखी! केवल एक परमात्मा के स्मरण का ही आहर कर, और परमात्मा की शरण पड़, तभी (मोह के कीचड़ में फंसा हुआ पैर) निकल सकता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
थिर थिर चित थिर हां ॥ बनु ग्रिहु समसरि हां ॥ अंतरि एक पिर हां ॥ बाहरि अनेक धरि हां ॥ राजन जोगु करि हां ॥ कहु नानक लोग अलोगी री सखी ॥२॥१॥१५७॥
मूलम्
थिर थिर चित थिर हां ॥ बनु ग्रिहु समसरि हां ॥ अंतरि एक पिर हां ॥ बाहरि अनेक धरि हां ॥ राजन जोगु करि हां ॥ कहु नानक लोग अलोगी री सखी ॥२॥१॥१५७॥
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ये शब्द आसा और आसावरी दोनों मिश्रित रागों में गाए जाने हैं।
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: थिर = अडोल, स्थिर। बनु = जंगल। ग्रिह = घर। समसरि = बराबर। अंतरि = हृदय में। बाहरि = जगत में। अनेक धरि = अनेक काम काज कर। राजन जोगु = राज जोग। लोग अलोगी = संसार से निराला।2।
अर्थ: हे सहेली! अपने चिक्त को (माया के मोह से) अडोल बना ले (इतना स्थिर कि) जंगल और घर एक समान प्रतीत हों। अपने दिल में एक परमात्मा की याद टिकाए रख, और, जगत में बेशक कई तरह के काम-काज किए जा (इस तरह) राज भी कर और जोग भी कमा।
(पर) हे नानक! कह: हे सखी! (काम-काज करते हुए ही निर्लिप रहना-ये) संसार से निराला रास्ता है।2।1।157।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: घर 17 के शबदों का आरम्भ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आसावरी महला ५ ॥ मनसा एक मानि हां ॥ गुर सिउ नेत धिआनि हां ॥ द्रिड़ु संत मंत गिआनि हां ॥ सेवा गुर चरानि हां ॥ तउ मिलीऐ गुर क्रिपानि मेरे मना ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
आसावरी महला ५ ॥ मनसा एक मानि हां ॥ गुर सिउ नेत धिआनि हां ॥ द्रिड़ु संत मंत गिआनि हां ॥ सेवा गुर चरानि हां ॥ तउ मिलीऐ गुर क्रिपानि मेरे मना ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनसा = (मनीषा) इच्छा। मनि = मान, पक्की कर। सिउ = साथ। नेड़ = नित्य, सदा। धिआनि = ध्यान में। गिआनि = गहरी सांझ में। चरानि = चरण में। तउ = तभी। क्रिपानि = कृपा से।1। रहाउ।
अर्थ: (हे मेरे मन!) एक (परमात्मा के मिलाप) की तमन्ना (अपने अंदर) कायम कर। गुरु के चरणों में जुड़ के सदा (परमात्मा के) ध्यान में टिका रह। गुरु के उपदेश की जान-पहिचान में मजबूत-चिक्त हो। गुरु चरणों में (रहके) सेवा-भक्ति कर। हे मेरे मन! तब ही गुरु की कृपा से (परमात्मा को) मिल सकते हैं।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
टूटे अन भरानि हां ॥ रविओ सरब थानि हां ॥ लहिओ जम भइआनि हां ॥ पाइओ पेड थानि हां ॥ तउ चूकी सगल कानि ॥१॥
मूलम्
टूटे अन भरानि हां ॥ रविओ सरब थानि हां ॥ लहिओ जम भइआनि हां ॥ पाइओ पेड थानि हां ॥ तउ चूकी सगल कानि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भरानि = भरांति, भटकना। अन = अन्य, और। थानि = स्थान में। सरब थानि = हरेक जगह में। भइआनि = भयानक, डरावनी। लहिओ = उतर जाता है। पेड थानि = संसार रूपी वृक्ष के आदि हरि के हजूरी में। कानि = अधीनता।1।
अर्थ: हे मेरे मन! जब और भटकनें खत्म हो जाती हैं, तब हरेक जगह में परमात्मा ही व्यापक दिखता है, तब डरावने जम का सहम उतर जाता है, संसार-वृक्ष के आदि-हरि के चरणों में ठिकाना मिल जाता है, तब हरेक किस्म की मुहताजी खत्म हो जाती है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
लहनो जिसु मथानि हां ॥ भै पावक पारि परानि हां ॥ निज घरि तिसहि थानि हां ॥ हरि रस रसहि मानि हां ॥ लाथी तिस भुखानि हां ॥ नानक सहजि समाइओ रे मना ॥२॥२॥१५८॥
मूलम्
लहनो जिसु मथानि हां ॥ भै पावक पारि परानि हां ॥ निज घरि तिसहि थानि हां ॥ हरि रस रसहि मानि हां ॥ लाथी तिस भुखानि हां ॥ नानक सहजि समाइओ रे मना ॥२॥२॥१५८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लहनो = लेना, भाग्य। मथानि = माथे पर। पावक = आग। पारि परानि = पार पड़ जाता है। निज घरि = अपने (असल) घर में। तिसहि = उस को। रसहि = रस को। मानि = माणता है, भोगता है। तिस = प्यास, तृष्णा।2।
दर्पण-टिप्पनी
(नोट: शब्द ‘तिसु’ सर्वनाम है जबकि ‘तिस’ संज्ञा है) सहजि = आत्मिक अडोलता में।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे नानक! (कह:) हे मेरे मन! जिस मनुष्य के माथे पर भाग्य जागते हैं वह विकारों की आग के खतरे से पार लांघ जाता है, उसको अपने असल घर (प्रभु चरणों में) जगह मिल जाती है, वह रसों में श्रेष्ठ हरि-नाम रस को हमेशा भोगता है, उसकी (माया की) प्यास भूख दूर हो जाती है, और वह सदा आत्मिक अडोलता में लीन रहता है।2।2।158।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आसावरी महला ५ ॥ हरि हरि हरि गुनी हां ॥ जपीऐ सहज धुनी हां ॥ साधू रसन भनी हां ॥ छूटन बिधि सुनी हां ॥ पाईऐ वड पुनी मेरे मना ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
आसावरी महला ५ ॥ हरि हरि हरि गुनी हां ॥ जपीऐ सहज धुनी हां ॥ साधू रसन भनी हां ॥ छूटन बिधि सुनी हां ॥ पाईऐ वड पुनी मेरे मना ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुनी = सारे गुणों का मालिक। सहज धुनी = आत्मिक अडोलता की रोंअ में। साधू = गुरु (की शरण पड़ के)। रसन = जीभ (से)। भनी = भणि, उचार के। बिधि = ढंग। सुनी = सुन के। वड पुनी = भाग्यों से।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! आत्मिक अडोलता की लहर में लीन हो के उस परमात्मा का नाम सदा जपना चाहिए जो सारे गुणों का मालिक है। (हे भाई!) गुरु की शरण पड़ कर (अपनी) जीभ से परमात्मा के गुण उचार। हे मेरे मन! सुन, यही है विकारों से बचने का तरीका, पर ये बड़े भाग्यों से प्राप्त होता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
खोजहि जन मुनी हां ॥ स्रब का प्रभ धनी हां ॥ दुलभ कलि दुनी हां ॥ दूख बिनासनी हां ॥ प्रभ पूरन आसनी मेरे मना ॥१॥
मूलम्
खोजहि जन मुनी हां ॥ स्रब का प्रभ धनी हां ॥ दुलभ कलि दुनी हां ॥ दूख बिनासनी हां ॥ प्रभ पूरन आसनी मेरे मना ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: खोजहि = खोजते हैं। जन मुनी = मुनि जन। स्रब = सरब। धनी = मालिक। कलि दुनी = विवाद वाली दुनिया में। दुख बिनासनी = दुखों का नाश करने वाला। पूरन आसनी = आशाएं पूरी करने वाला।1।
अर्थ: हे मेरे मन! सारे ऋषि मुनि उस परमात्मा को खोजते आ रहे हैं, जो सारे जीवों का मालिक है जो इस माया-ग्रसित दुनिया में ढूँढना मुश्किल है, जो सारे दुखों का नाश करने वाला है, और जो सबकी आशाएं पूरी करने वाला है।1।
[[0410]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन सो सेवीऐ हां ॥ अलख अभेवीऐ हां ॥ तां सिउ प्रीति करि हां ॥ बिनसि न जाइ मरि हां ॥ गुर ते जानिआ हां ॥ नानक मनु मानिआ मेरे मना ॥२॥३॥१५९॥
मूलम्
मन सो सेवीऐ हां ॥ अलख अभेवीऐ हां ॥ तां सिउ प्रीति करि हां ॥ बिनसि न जाइ मरि हां ॥ गुर ते जानिआ हां ॥ नानक मनु मानिआ मेरे मना ॥२॥३॥१५९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मन = हे मन! सो = उस प्रभु को। अलख = जिस का सही स्वरूप बयान ना किया जा सके। अभेवीऐ = अभेव, जिसका भेद नहीं पाया जा सकता। सिउ = साथ। न जाइ = पैदा नहीं होता। ते = से। मानिआ = पतीज जाता है।2।
अर्थ: हे (मेरे) मन! उस परमात्मा की सेवा-भक्ति करनी चाहिए, जिसका सही स्वरूप बताया नहीं जा सकता, जिसका भेद पाया नहीं जा सकता। हे मेरे मन! उस परमात्मा से प्यार डाल, जो कभी नाश नहीं होता जो ना पैदा होता है ना मरता है।
हे नानक! (कह:) हे मेरे मन! जिस मनुष्य ने गुरु के जरिएउस परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल ली, उसका मन सदा (उसकी याद में) रमा रहता है।2।3।159।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आसावरी महला ५ ॥ एका ओट गहु हां ॥ गुर का सबदु कहु हां ॥ आगिआ सति सहु हां ॥ मनहि निधानु लहु हां ॥ सुखहि समाईऐ मेरे मना ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
आसावरी महला ५ ॥ एका ओट गहु हां ॥ गुर का सबदु कहु हां ॥ आगिआ सति सहु हां ॥ मनहि निधानु लहु हां ॥ सुखहि समाईऐ मेरे मना ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: एका ओट = एक परमात्मा का आसरा। गहु = पकड़। कहु = उचार। आगिआ = रजा, हुक्म। सहु = सह, मान। सति = ठीक, सच्ची (जान के)। मनहि = मन में। निधानु = (सारे पदार्थों का) खजाना। लहु = ले। सुखहि = आत्मिक आनंद में।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! एक परमात्मा का ही पल्ला पकड़, सदा गुरु की वाणी उचारता रह। हे मेरे मन! परमात्मा की रजा को मीठी करके मान। (हे भाई!) अपने मन में बसते सारे गुणों के खजाने प्रभु को पा ले। हे मेरे मन! (इस तरह सदा) आत्मिक आनंद में लीन रहना है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जीवत जो मरै हां ॥ दुतरु सो तरै हां ॥ सभ की रेनु होइ हां ॥ निरभउ कहउ सोइ हां ॥ मिटे अंदेसिआ हां ॥ संत उपदेसिआ मेरे मना ॥१॥
मूलम्
जीवत जो मरै हां ॥ दुतरु सो तरै हां ॥ सभ की रेनु होइ हां ॥ निरभउ कहउ सोइ हां ॥ मिटे अंदेसिआ हां ॥ संत उपदेसिआ मेरे मना ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जो = जो। मरै = (माया के मोह से) अछोह हो जाता है। दुतरु = (दुष्तर) जिससे पार लांघना मुश्किल हो। रैनु = चरण धूल। होइ = हो जाता है। कहउ = मैं कहता हूँ। सोइ = उस परमात्मा को ही।1।
अर्थ: हे मेरे मन! जो मनुष्य काम-काज करता हुआ माया के मोह से अछोह रहता है, वह मनुष्य इस संसार-समुंदर से पार लांघ जाता है। जिसमें से पार लांघना बहुत मुश्किल है, वह मनुष्य सभी के चरणों की धूल हुआ रहता है। (हे मेरे मन! अगर गुरु की कृपा हो तो) मैं भी उस निरभय परमात्मा की महिमा करता रहूँ। हे मेरे मन! जिस मनुष्य को सतिगुरु की शिक्षा प्राप्त हो जाती है उसके सारे चिन्ता-फिक्र मिट जाते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिसु जन नाम सुखु हां ॥ तिसु निकटि न कदे दुखु हां ॥ जो हरि हरि जसु सुने हां ॥ सभु को तिसु मंने हां ॥ सफलु सु आइआ हां ॥ नानक प्रभ भाइआ मेरे मना ॥२॥४॥१६०॥
मूलम्
जिसु जन नाम सुखु हां ॥ तिसु निकटि न कदे दुखु हां ॥ जो हरि हरि जसु सुने हां ॥ सभु को तिसु मंने हां ॥ सफलु सु आइआ हां ॥ नानक प्रभ भाइआ मेरे मना ॥२॥४॥१६०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिसु जन = जिस मनुष्य को। तिसु निकटि = उसके नजदीक। सभु को = हरेक जीव। मंने = आदर देता है। सु = वह मनुष्य। सफल = कामयाब। प्रभू भाइआ = प्रभु को प्यारा लगा।2।
अर्थ: हे मेरे मन! जिस मनुष्य को परमात्मा के नाम का अनंद प्राप्त हो जाता है, कभी कोई दुख उसके नजदीक नहीं फटकता। हे मेरे मन! जो मनुष्य परमात्मा की महिमा सदा सुनता रहता है (दुनिया में) हरेक मनुष्य उसका आदर-सत्कार करता है।
हे नानक! (कह:) हे मेरे मन! जगत में पैदा हुआ वही मनुष्य कामयाब जीवन वाला है जो परमात्मा को प्यारा लग गया है।2।4।160।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आसावरी महला ५ ॥ मिलि हरि जसु गाईऐ हां ॥ परम पदु पाईऐ हां ॥ उआ रस जो बिधे हां ॥ ता कउ सगल सिधे हां ॥ अनदिनु जागिआ हां ॥ नानक बडभागिआ मेरे मना ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
आसावरी महला ५ ॥ मिलि हरि जसु गाईऐ हां ॥ परम पदु पाईऐ हां ॥ उआ रस जो बिधे हां ॥ ता कउ सगल सिधे हां ॥ अनदिनु जागिआ हां ॥ नानक बडभागिआ मेरे मना ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मिलि = मिल के। जसु = महिमा के गीत। गाईऐ = गाना चाहिए। परम पदु = सबसे ऊँचा आत्मिक दर्जा। पाईऐ = हासिल हो जाता है। उआ रस = उस स्वाद में। बिधे = समा गया। ता कउ = उस (मनुष्य) को। सिधे = सिद्धियां। अनदिनु = हर रोज। जागिआ = (माया के हमलों से) सुचेत रहता है। बड भागिआ = बड़े भाग्यों वाला।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (साधु-संगत में) मिल के परमात्मा के महिमा के गीत गाने चाहिए, (इस तरह) आत्मिक जीवन का सबसे ऊँचा दर्जा हासिल हो जाता है। जो मनुष्य (महिमा के) उस स्वाद में रम जाता है, उसे (मानो) सारी ही सिद्धियां प्राप्त हो जाती हैं। हे नानक! (कह) हे मेरे मन! (जो मनुष्य प्रभु की महिमा करता है, वह मनुष्य) बहुत बड़ा भाग्यशाली हो जाता है, वह हर समय (विकारों के हमलों से) सुचेत रहता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
संत पग धोईऐ हां ॥ दुरमति खोईऐ हां ॥ दासह रेनु होइ हां ॥ बिआपै दुखु न कोइ हां ॥ भगतां सरनि परु हां ॥ जनमि न कदे मरु हां ॥ असथिरु से भए हां ॥ हरि हरि जिन्ह जपि लए मेरे मना ॥१॥
मूलम्
संत पग धोईऐ हां ॥ दुरमति खोईऐ हां ॥ दासह रेनु होइ हां ॥ बिआपै दुखु न कोइ हां ॥ भगतां सरनि परु हां ॥ जनमि न कदे मरु हां ॥ असथिरु से भए हां ॥ हरि हरि जिन्ह जपि लए मेरे मना ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पग = पैर, चरण। धोईऐ = आओ धोएं। दुरमति = खोटी मति। खोईऐ = दूर कर लेते हैं। दासह रेनु = (प्रभु के) दासों की चरण धूल। बिआपै न = जोर नहीं डाल सकता। परु = पड़। सरनि परु = आसरा ले। जनमि = जनम ले के। न मरु = नहीं मरेगा। से = वह बंदे। असथिरु = अडोल आत्मिक अवस्था वाले।1।
अर्थ: हे भाई! संत जनों के चरण धोने चाहिए (स्वैभाव त्याग के संतों के चरण पड़ना चाहिए, इस तरह मन की) खोटी मति दूर हो जाती है। हे भाई! प्रभु के सेवकों की चरण धूल बना रह (इस तरह) कोई दुख अपना जोर नहीं डाल सकता। हे भाई! संत जनों की शरण पड़ा रह, जनम-मरण का चक्कर नहीं रहेगा। हे मेरे मन! जो मनुष्य सदा परमात्मा का नाम जपते हैं, वे अडोल आत्मिक जीवन वाले बन जाते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साजनु मीतु तूं हां ॥ नामु द्रिड़ाइ मूं हां ॥ तिसु बिनु नाहि कोइ हां ॥ मनहि अराधि सोइ हां ॥ निमख न वीसरै हां ॥ तिसु बिनु किउ सरै हां ॥ गुर कउ कुरबानु जाउ हां ॥ नानकु जपे नाउ मेरे मना ॥२॥५॥१६१॥
मूलम्
साजनु मीतु तूं हां ॥ नामु द्रिड़ाइ मूं हां ॥ तिसु बिनु नाहि कोइ हां ॥ मनहि अराधि सोइ हां ॥ निमख न वीसरै हां ॥ तिसु बिनु किउ सरै हां ॥ गुर कउ कुरबानु जाउ हां ॥ नानकु जपे नाउ मेरे मना ॥२॥५॥१६१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साजनु = सज्जन। मूं = मुझे। द्रिढ़ाइ = पक्का कर दे। मनहि = मन में। सोइ = उस (परमात्मा) को। अराधि = याद किया कर। निमख = आँख झपकने जितना समय। किउ सरै = अच्छा नहीं लग सकता। कउ = को, से। जाउ = मैं जाता हूँ, जाऊँ। नानक जपे = नानक जपता है।2।
अर्थ: (हे मेरे प्रभु!) तू ही (मेरा) सज्जन है, तू ही (मेरा) मित्र है, मुझे (मेरे दिल में अपना) नाम पक्का करके टिका दे। (हे भाई!) उस परमात्मा के बिना और कोई (असल सज्जन-मित्र) नहीं है, सदा उस (प्रभु) को ही स्मरण करता रह। (वह परमात्मा) आँख झपकने जितने समय के लिए भी भूलना नहीं चाहिए (क्योंकि) उस (की याद) के बिना जीवन सुखी नहीं गुजरता। हे मेरे मन! मैं (नानक) गुरु से सदके जाता हूँ (क्योंकि गुरु की कृपा से ही) नानक (परमात्मा का) नाम जपता है।2।5।161।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आसावरी महला ५ ॥ कारन करन तूं हां ॥ अवरु ना सुझै मूं हां ॥ करहि सु होईऐ हां ॥ सहजि सुखि सोईऐ हां ॥ धीरज मनि भए हां ॥ प्रभ कै दरि पए मेरे मना ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
आसावरी महला ५ ॥ कारन करन तूं हां ॥ अवरु ना सुझै मूं हां ॥ करहि सु होईऐ हां ॥ सहजि सुखि सोईऐ हां ॥ धीरज मनि भए हां ॥ प्रभ कै दरि पए मेरे मना ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कारन = साधन, बनाने वाला। करन = जगत। मूं = मुझे। करहि = (जो कुछ) तू करता है। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुखि = आनंद में। सोईऐ = लीन रहें। मनि = मन में। दरि = दर पे।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! (प्रभु दर पर ऐसे अरदास कर- हे प्रभु!) तू सारे जगत का रचनहार है (तेरे बिना) मुझे कोई और नहीं सूझता (जो ये ताकत रखता हो)। हे प्रभु! जो कुछ तू करता है वही (जगत में) वरतता है। हे मेरे मन! (अगर अपनी चतुराईआं छोड़ के) परमात्मा के दर पर गिर पड़ें तो मन में हौसला बंध जाता है, आत्मिक अडोलता में, आनंद में लीन रह सकते हैं।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साधू संगमे हां ॥ पूरन संजमे हां ॥ जब ते छुटे आप हां ॥ तब ते मिटे ताप हां ॥ किरपा धारीआ हां ॥ पति रखु बनवारीआ मेरे मना ॥१॥
मूलम्
साधू संगमे हां ॥ पूरन संजमे हां ॥ जब ते छुटे आप हां ॥ तब ते मिटे ताप हां ॥ किरपा धारीआ हां ॥ पति रखु बनवारीआ मेरे मना ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: संगमे = मेल में, संगति में। साधू = गुरु। संजमे = संजम में। आपा = स्वै भाव। ताप = दुख-कष्ट। पति = इज्जत। नवारीआ = हे जगत के मालिक प्रभु! धारीआ = धार के।1।
अर्थ: हे मेरे मन! गुरु की संगति में रहने से वह जुगति पूरी तरह से आ जाती है जिससे ज्ञान-इंद्रिय वश में आ जाती हैं। हे मन! जिस वक्त (मनुष्य के अंदर से) अहंकार समाप्त हो जाता है (और गुरु की ओट ठीक लगने लगती है) उस वक्त से (मन के) सारे दुख-कष्ट दूर हो जाते हैं। सो हे मेरे मन! (गुरु की संगति में रहके प्रभु-दर पर अरदास कर, कह:) हे जगत के मालिक प्रभु! मेरे पर मेहर कर, मेरी (शरण पड़े की) इज्जत रख।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इहु सुखु जानीऐ हां ॥ हरि करे सु मानीऐ हां ॥ मंदा नाहि कोइ हां ॥ संत की रेन होइ हां ॥ आपे जिसु रखै हां ॥ हरि अम्रितु सो चखै मेरे मना ॥२॥
मूलम्
इहु सुखु जानीऐ हां ॥ हरि करे सु मानीऐ हां ॥ मंदा नाहि कोइ हां ॥ संत की रेन होइ हां ॥ आपे जिसु रखै हां ॥ हरि अम्रितु सो चखै मेरे मना ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मानीऐ = स्वीकार करें। रेन = चरण धूल। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल।2।
अर्थ: हे मेरे मन! जो कुछ परमात्मा करता है उसे (मीठा करके) मानना चाहिए, इसे ही सुख (का मूल) समझना चाहिए। हे मन! जो मनुष्य संत जनों की चरण-धूल बनता है उसको (जगत में) कोई बुरा नहीं दिखता। हे मेरे मन! परमात्मा स्वयं ही जिस मनुष्य को (विकारों से) बचाता है वह मनुष्य आत्मिक जीवन देने वाला हरि-नाम-जल पीता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिस का नाहि कोइ हां ॥ तिस का प्रभू सोइ हां ॥ अंतरगति बुझै हां ॥ सभु किछु तिसु सुझै हां ॥ पतित उधारि लेहु हां ॥ नानक अरदासि एहु मेरे मना ॥३॥६॥१६२॥
मूलम्
जिस का नाहि कोइ हां ॥ तिस का प्रभू सोइ हां ॥ अंतरगति बुझै हां ॥ सभु किछु तिसु सुझै हां ॥ पतित उधारि लेहु हां ॥ नानक अरदासि एहु मेरे मना ॥३॥६॥१६२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंतरगति = अंदर की छुपी बात, दिल की बात। पतित = विकारों में गिरे हुए। उधारि लेहु = बचा ले।3।
अर्थ: हे मेरे मन! जिस मनुष्य का कोई भी सहाई नहीं बनता (अगर वह प्रभु की शरण में आ पड़े तो) वह प्रभु उसका रखवाला बन जाता है। वह परमात्मा हरेक के दिल की बात जान लेता है, उसको हरेक जीव की हरेक मनोकामना की समझ आ जाती है। (इस वास्ते) हे मेरे मन! परमात्मा के दर पर यूँ अरजोई कर- हे प्रभु! (हमें विकारों में) गिरे हुए जीवों को (विकारों से) बचा ले, (तेरे दर पर, मेरी) नानक की यही अरदास है।3।6।162।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आसावरी महला ५ इकतुका ॥ ओइ परदेसीआ हां ॥ सुनत संदेसिआ हां ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
आसावरी महला ५ इकतुका ॥ ओइ परदेसीआ हां ॥ सुनत संदेसिआ हां ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ओइ परदेसीआ = हे परदेसी! हे जगत में चार दिन के लिए आए जीव! सुनत = सुनता है?।1। रहाउ।
अर्थ: जगत में चार दिनों के लिए आए हे जीव! ये संदेश ध्यान से सुन।1। रहाउ।
[[0411]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
जा सिउ रचि रहे हां ॥ सभ कउ तजि गए हां ॥ सुपना जिउ भए हां ॥ हरि नामु जिन्हि लए ॥१॥
मूलम्
जा सिउ रचि रहे हां ॥ सभ कउ तजि गए हां ॥ सुपना जिउ भए हां ॥ हरि नामु जिन्हि लए ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जा सिउ = जिस (माया) से। रचि रहे = मस्त रहे। सभ कउ = उस सारी को। सुपना जिउ = सपने जैसा। जिन्हि लए = (तू) कयूँ नहीं लेता?।1।
अर्थ: (हे भाई! तुझसे पहले यहाँ पर आए हुए जीव) जिस माया के मोह में फंसे रहे, आखिर उस सारी को छोड़ के यहाँ से चले गए, (अब वह) सपने की तरह हो गए हैं (कोई उन्हें याद भी नहीं करता)। (फिर) तू क्यों (माया का मोह छोड़ के) परमात्मा का नाम नहीं याद करता?।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि तजि अन लगे हां ॥ जनमहि मरि भगे हां ॥ हरि हरि जनि लहे हां ॥ जीवत से रहे हां ॥ जिसहि क्रिपालु होइ हां ॥ नानक भगतु सोइ ॥२॥७॥१६३॥२३२॥
मूलम्
हरि तजि अन लगे हां ॥ जनमहि मरि भगे हां ॥ हरि हरि जनि लहे हां ॥ जीवत से रहे हां ॥ जिसहि क्रिपालु होइ हां ॥ नानक भगतु सोइ ॥२॥७॥१६३॥२३२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तजि = त्याग के। अन = अन्य (पदार्थ)। जनमहि = जनम में। मरि = मर के। भगे = दौड़ते रहे। जनि = जन के, जिस जिस जन ने। से = वह लोग। जिसहि = जिस पर।2।
अर्थ: (हे भाई!) जो मनुष्य परमात्मा को भुला के अन्य पदार्थों के मोह में फसे रहते हैं वह जनम-मरण के चक्कर में भटकते फिरते हैं। जिस मनुष्य ने परमात्मा को पा लिया है वे आत्मिक जीवन के मालिक बन गए।
(पर) हे नानक! (जीव के अपने वश के बात नहीं) जिस मनुष्य पर प्रभु दयावान होता है वही उसका भक्त बनता है।2।7।163।232।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: इक तुका = हरेक बंद में एक-एक तुक वाला।