विश्वास-प्रस्तुतिः
रागु सिरीरागु महला पहिला १ घरु १ ॥
मूलम्
रागु सिरीरागु महला पहिला १ घरु १ ॥
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘महला १’ के अंक से पहले शब्द ‘पहिला’ से स्पष्ट है कि अंक १ को पढ़ना है ‘पहला’। इसी तरह ‘घर १’ के अंक १ को भी पढ़ना है ‘पहला’। देखें पृष्ठ 23 पे शब्द नं: 25 का शीर्षक ‘सिरीरागु महला १ घर दूजा २’। यहाँ ‘घर २’ के अंक 2 को लिखा है ‘दूजा’। देखें पृष्ठ 163 के शीर्षक ‘गउड़ी गुआरेरी महला ४ चउथा’। यहां, महला ४ के अंक को लिखा है ‘चउथा’। इसी तरह और भी ज्यादा तसल्ली वास्ते पाठक 1430 पन्नों वाली श्री गुरु ग्रंथ साहिब की बीड़ के पंन्ना नं: 892, 524, 582, 605, 636, 661, 664 और 1169 पर देख सकते हैं।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मोती त मंदर ऊसरहि रतनी त होहि जड़ाउ ॥ कसतूरि कुंगू अगरि चंदनि लीपि आवै चाउ ॥ मतु देखि भूला वीसरै तेरा चिति न आवै नाउ ॥१॥
मूलम्
मोती त मंदर ऊसरहि रतनी त होहि जड़ाउ ॥ कसतूरि कुंगू अगरि चंदनि लीपि आवै चाउ ॥ मतु देखि भूला वीसरै तेरा चिति न आवै नाउ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: त = यदि। उसरहि = उसर पड़ना, बन जाना। कुंगू = केसर। अगरि = अगर से, ऊद की सुगंध भरी लकड़ी के साथ। चंदनि = चंदन से। लीपि = लिपाई करके। देखि = देख के। चिति = चिक्त में।1।
अर्थ: अगर (मेरे लिए) मोतियों के महल बन जाएं, यदि (वह महल-माड़ियां) रत्नों से जड़ी हों, (उन महल-माड़ियों को) कस्तूरी केसर व चंदन आदि से लिपाई करके (मेरे अंदर) चाव चढ़े, (तो भी यह सब कुछ व्यर्थ है, मुझे खतरा है कि महल माड़ियों) को देख के मैं कहीं (हे प्रभु!) तुझे भुला ना बैठूँ, कहीं तू मुझे विसर ना जाए, कहीं तेरा नाम मेरे चिक्त में टिके ही ना।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि बिनु जीउ जलि बलि जाउ ॥ मै आपणा गुरु पूछि देखिआ अवरु नाही थाउ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
हरि बिनु जीउ जलि बलि जाउ ॥ मै आपणा गुरु पूछि देखिआ अवरु नाही थाउ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: मैंने अपने गुरु को पूछ के देख लिया है (मैंने अपने गुरु को पूछा है और मुझे यकीन भी आ गया है) कि प्रभु से बिछुड़ के ये जिंद जल-बल जाती है (तथा प्रभु की याद के बिना) और कोई जगह भी नहीं है (जहाँ वह जलन खतम हो सके)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
धरती त हीरे लाल जड़ती पलघि लाल जड़ाउ ॥ मोहणी मुखि मणी सोहै करे रंगि पसाउ ॥ मतु देखि भूला वीसरै तेरा चिति न आवै नाउ ॥२॥
मूलम्
धरती त हीरे लाल जड़ती पलघि लाल जड़ाउ ॥ मोहणी मुखि मणी सोहै करे रंगि पसाउ ॥ मतु देखि भूला वीसरै तेरा चिति न आवै नाउ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पलघि = पलंग पे। मोहणी = मोहक स्त्री, सुंदर स्त्री। मुखि = मुह पर। रंगि = प्यार से। पसाओ = पसारा, खेल। रंगि पसाओ = प्यार भरी खेल। हाव = भाव।2।
अर्थ: यदि (मेरे रहने के वास्ते) धरती हीरे लालों से जड़ी जाए, अगर (मेरे सोने वाले) पलंघ पर लाल जड़े हों, यदि (मेरे सामने) वह सुंदर स्त्री हाव-भाव करे जिसके माथे पे मणी शोभायमान हो, (तो भी यह सब कुछ व्यर्थ है, मुझे खतरा है कि ऐसे सुंदर स्थान पे ऐसी सुंदरी को) देख के मैं कहीं (हे प्रभु!) तुझे भुला ना बैठूँ, कहीं तू मुझे बिसर ना जाए, कहीं तेरा नाम मेरे चिक्त में टिके ही ना।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिधु होवा सिधि लाई रिधि आखा आउ ॥ गुपतु परगटु होइ बैसा लोकु राखै भाउ ॥ मतु देखि भूला वीसरै तेरा चिति न आवै नाउ ॥३॥
मूलम्
सिधु होवा सिधि लाई रिधि आखा आउ ॥ गुपतु परगटु होइ बैसा लोकु राखै भाउ ॥ मतु देखि भूला वीसरै तेरा चिति न आवै नाउ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सिधु = योग साधना में खचित योगी। सिधि = योग कमाई में कामयाबी। लाई = लगाऊँ। रिधि = योग से प्राप्त हुई बरकतें। बैसा = मैं बैठूँ। भाउ = आदर, सत्कार।3।
अर्थ: अगर मैं माहिर जोगी बन जाऊँ, अगर मैं योग-समाधियों की कामयाबियां हासिल कर लूँ, अगर मैं योग से प्राप्त हो सकने वाली बरकतों को आवाज मारूँ और वे (मेरे पास) आ जाएं, अगर (योग की ताकत से) मैं कभी छुप सकूँ कभी प्रत्यक्ष हो के बैठ जाऊँ, यदि (सारा) जगत मेरा आदर करे, (तो भी ये सब कुछ व्यर्थ है मुझे खतरा है कि इन रिद्धियों-सिद्धियों को देख के) मैं कहीं (हे प्रभु!) तुझे भुला ना बैठूँ, कहीं तू मुझे बिसर ना जाए, कहीं तेरा नाम मेरे चिक्त में टिके ही ना।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुलतानु होवा मेलि लसकर तखति राखा पाउ ॥ हुकमु हासलु करी बैठा नानका सभ वाउ ॥ मतु देखि भूला वीसरै तेरा चिति न आवै नाउ ॥४॥१॥
मूलम्
सुलतानु होवा मेलि लसकर तखति राखा पाउ ॥ हुकमु हासलु करी बैठा नानका सभ वाउ ॥ मतु देखि भूला वीसरै तेरा चिति न आवै नाउ ॥४॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मेलि = एकत्र करके। लसकर = फौजें। तखति = तख़्त पे। हासलु करी = मैं हासल करूँ, मैं चलाऊँ। वाउ = हवा समान, व्यर्थ। करी = मैं करूँ।4।
अर्थ: अगर मैं फौजें इकट्ठी करके बादशाह बन जाऊँ, यदि मैं (तख़्त पे) बैठा (बादशाही का) हुक्म चला सकूँ, तो भी, हे नानक! (ये) सब कुछ व्यर्थ है (मुझे खतरा है कि ये राज-भाग) देख के मैं कहीं (हे प्रभु!) तुझे भुला ना बैठूँ, कहीं तू मुझे बिसर ना जाए, कहीं तेरा नाम मेरे चिक्त में टिके ही ना।4।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: इस शब्द के 4 बंद हैं। आखिरी बंद के बाद अंक 1 का भाव है कि यह पहला शब्द समाप्त हुआ है।
दर्पण-भाव
भाव: प्रभु की याद भुला के जिंद जल-बल जाती है। योग की रिद्धियां-सिद्धियां, व बादशाहियत् प्रभु के विछोड़े से पैदा हुई उस जलन को शांत नहीं कर सकते। ये तो बल्कि, परमात्मा से दूरी और बढ़ा के जलन पैदा करते हैं।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ कोटि कोटी मेरी आरजा पवणु पीअणु अपिआउ ॥ चंदु सूरजु दुइ गुफै न देखा सुपनै सउण न थाउ ॥ भी तेरी कीमति ना पवै हउ केवडु आखा नाउ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ कोटि कोटी मेरी आरजा पवणु पीअणु अपिआउ ॥ चंदु सूरजु दुइ गुफै न देखा सुपनै सउण न थाउ ॥ भी तेरी कीमति ना पवै हउ केवडु आखा नाउ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कोटी = कोटि। कोटी कोटि = करोड़ों ही (साल)। आरजा = उम्र। पीअणु = पीना। अपिआउ = खाना, भोजन। गुफै = गुफा में (रह के)। सउणु थाउ = सोने की जगह। भी = फिर भी। हउ = मैं। केवडु = कितना बड़ा। नाउ = मशहूरी, शोभा।1।
अर्थ: यदि मेरी उम्र करोडों ही साल हो जाए, अगर हवा मेरा खाना-पीना (भोजन) बन जाए (यदि मैं हवा के आसरे जी सकूँ), यदि (किसी) गुफा में (बैठ के) चाँद सूरज दोनों को कभी ना देखूँ (भाव, कि रात-दिन गुफा में बैठ के मैं समाधि लगाए रखूँ), अगर सपनों में भी सोने की जगह ना मिले (यदि कभी ना सो सकूँ) तो भी (हे प्रभु! इतनी लम्बी समाधियां लगा के भी) मैं तेरा मुल्य नहीं पा सकता (तेरे बराबर का मैं किसी और को नहीं ढूँढ सकता), मैं तेरी कितनी महानता बयान करूँ? (मैं तेरी बड़ाई महानता बताने के काबिल नहीं हूँ)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साचा निरंकारु निज थाइ ॥ सुणि सुणि आखणु आखणा जे भावै करे तमाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
साचा निरंकारु निज थाइ ॥ सुणि सुणि आखणु आखणा जे भावै करे तमाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: थाइ = जगह में, स्वरूप में। निज थाइ = अपने आप में, अपने स्वरूप में। सुणि सुणि = बार बार सुन के। आखणु = बयान। जे भावै = जो प्रभु को ठीक लगे। तमाइ = आकर्षण, (जीव के अंदर महिमा करने की) ललक। करे = पैदा कर देता है।1। रहाउ।
अर्थ: सदा कायम रहने वाला निराकार परमात्मा अपने आप में टिका हुआ है (उस को किसी और के आसरे की अधीनता नहीं है) हम जीव एक दूसरे से सुन सुन के ही (उस की प्रतिभा का) बयान कर देते हैं। (पर ये कोई नहीं कह सकता कि वह कितना बड़ा है)। अगर प्रभु को ठीक लगे तो (जीव के अंदर अपनी महिमा की) उमंग पैदा कर देता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कुसा कटीआ वार वार पीसणि पीसा पाइ ॥ अगी सेती जालीआ भसम सेती रलि जाउ ॥ भी तेरी कीमति ना पवै हउ केवडु आखा नाउ ॥२॥
मूलम्
कुसा कटीआ वार वार पीसणि पीसा पाइ ॥ अगी सेती जालीआ भसम सेती रलि जाउ ॥ भी तेरी कीमति ना पवै हउ केवडु आखा नाउ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कुसा = कोह दूँ, यदि मैं (अपने शरीर को) कष्ट दे दे के घायल कर दूँ। कटीआ = कटा दूँ, यदि मैं (अपने आप को) कटा डालूँ। वार वार = बार बार, दुबारा। पीसणि = चक्की में। पाइ = पा के। सेती = साथ। जालीआ = यदि मैं जला दूँ।2।
अर्थ: यदि मैं (तप द्वारा अपने शरीर को कष्ट) दे दे के घायल कर लूँ, बारंबार रत्ती-रत्ती कटा दूँ, चक्की में डाल के पीस दूँ, आग से जला दूँ, और (स्वयं को) राख में मिला डालूँ (इतना तप साधु के भी हे प्रभु!) तेरे बराबर का किसी और को मैं ढूँढ नहीं सकता, मैं तेरी बड़ाई महानता बताने के काबिल नहीं हूँ।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पंखी होइ कै जे भवा सै असमानी जाउ ॥ नदरी किसै न आवऊ ना किछु पीआ न खाउ ॥ भी तेरी कीमति ना पवै हउ केवडु आखा नाउ ॥३॥
मूलम्
पंखी होइ कै जे भवा सै असमानी जाउ ॥ नदरी किसै न आवऊ ना किछु पीआ न खाउ ॥ भी तेरी कीमति ना पवै हउ केवडु आखा नाउ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सै = सैकड़ो। नदरी न आवऊ = मैं ना दिखूँ।3।
अर्थ: अगर मैं पंछी बन के उड़ सकूँ और सैकड़ों आसमानों तक पहुँच सकूँ, अगर (उड़ के इतना ऊँचा चला जाऊं कि) मैं किसी को दिखाई ही ना दे सकूँ, खाऊं-पीऊँ भी कुछ नहीं (इतनी पहुँच रखते हुए) भी हे प्रभु! मैं तेरे बराबर का कोई और नहीं ढूँढ सकता, मैं तेरी बड़ाई महानता बताने के काबिल नहीं हूँ।3।
[[0015]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक कागद लख मणा पड़ि पड़ि कीचै भाउ ॥ मसू तोटि न आवई लेखणि पउणु चलाउ ॥ भी तेरी कीमति ना पवै हउ केवडु आखा नाउ ॥४॥२॥
मूलम्
नानक कागद लख मणा पड़ि पड़ि कीचै भाउ ॥ मसू तोटि न आवई लेखणि पउणु चलाउ ॥ भी तेरी कीमति ना पवै हउ केवडु आखा नाउ ॥४॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कागद = कागज। कीचै = किया जाए। भाउ = अर्थ। मसू = (शब्द ‘मसु’ का संबंधकारक) मसु की, स्याही की। न आवई = न आए। लेखणि = कलम। पवणु = हवा। चलाउ = मैं चलाऊँ।4।
अर्थ: हे नानक! (कह: हे प्रभु! अगर मेरे पास तेरी वडियाईयों से भरे हुए) लाखों मन कागज़ हों, उनको बार बार पढ़ के विचार भी की जाए, यदि (तेरी वडियाई लिखने के वास्ते) मैं हवा को कलम बना लूँ (लिखते-लिखते) स्याही की भी कभी कमी ना आए, तो भीहे प्रभु! मैं तेरा मुल्य नहीं पा सकता, मैं तेरी बड़ाई महानता बताने के काबिल नहीं हूँ।4।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: आखीरले अंक 2 का भाव ये है कि ये दूसरे शब्द की समाप्ति है।
दर्पण-भाव
भाव: यदि करोड़ों साल अटूट समाधि लगा के और बड़े-बड़े तप बर्दाश्त करके कोई दिव्य दृष्टि हासिल कर लें, अगर उड़ने की स्मर्था हासिल करके परमात्मा की रची हुई रचना का आखिरी छोर ढूँढने के लिए सैकड़ों आसमानों तक हो आए। यदि कभी ना खत्म होने वाली स्याही से लाखों मन कागजों पे प्रभु की महानता का लेखा निरंतर लिखते जाएं, तो भी कोई जीव उसकी वडिआईयों का अंत पाने के काबिल नहीं है। वह निरंकार प्रभु अपने सहारे खुद कायम है, उस को सहारा देने वाला कोई उसका शरीक नहीं है। वह जिस पर मेहर करे उसको अपनी महिमा की दात बख्शता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ लेखै बोलणु बोलणा लेखै खाणा खाउ ॥ लेखै वाट चलाईआ लेखै सुणि वेखाउ ॥ लेखै साह लवाईअहि पड़े कि पुछण जाउ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ लेखै बोलणु बोलणा लेखै खाणा खाउ ॥ लेखै वाट चलाईआ लेखै सुणि वेखाउ ॥ लेखै साह लवाईअहि पड़े कि पुछण जाउ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लेखै = लेखे में, गिनती मिनती में, थोड़े ही समय के लिए। बोलणु बोलणा = बोल चाल। खाणा खाउ = खाना पीना। वाट = जिंदगी का सफर। चलाइआ = जो चलाई हुई है। सुणि वेखाउ = सुनना और देखना। लवाईअहि = जो लिये जा रहे हैं। पढ़े = पढ़े हुए मनुष्य को। कि = क्या? पढ़े कि पुछण जाउ = मैं (इस बारे) किसी पढ़े लिखे को क्या पूछने जाऊँ? इस बारे में किसी से पूछने की जरूरत नहीं, हर कोई जानता है।1।
अर्थ: ये बात हर कोई जानता है कि हम जिंदगी की सांसे गिने-चुने समय के लिए ही ले रहे हैं, हमारा बोल-चाल, हमारा खाना पीना थोड़े ही समय के लिए है। जिस जीवन सफर पर हम चले हुए हैं ये सफर भी थोड़े ही समय के लिए है, (दुनिया के राग-रंग और रंग-तमाशे) सुनने देखने भी थोड़े ही समय के लिये हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाबा माइआ रचना धोहु ॥ अंधै नामु विसारिआ ना तिसु एह न ओहु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
बाबा माइआ रचना धोहु ॥ अंधै नामु विसारिआ ना तिसु एह न ओहु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बाबा = हे भाई! रचना = खेल। धोहु = खेल, चार दिन की खेल। अंधै = अंधे ने, माया की खेल में अंधे हुए आदमी ने। एह = माया। ओहु = प्रभु का नाम।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! माया की खेल (जीवों के लिये) चार दिन की ही खेल है। पर इस चार दिन की खेल में अंधे हुए मनुष्य ने प्रभु का नाम विसार दिया है, ना माया साथ ही निभती है ना प्रभु का नाम ही मिलता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जीवण मरणा जाइ कै एथै खाजै कालि ॥ जिथै बहि समझाईऐ तिथै कोइ न चलिओ नालि ॥ रोवण वाले जेतड़े सभि बंनहि पंड परालि ॥२॥
मूलम्
जीवण मरणा जाइ कै एथै खाजै कालि ॥ जिथै बहि समझाईऐ तिथै कोइ न चलिओ नालि ॥ रोवण वाले जेतड़े सभि बंनहि पंड परालि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जीवण मरणा = पैदा होने से ले के मरने तक। जाइ कै = जनम ले के, पैदा हो के। एथै = इस दुनिया में। खाजै = खाने की कोशिशें, पदार्थ एकत्र करने की धुन। कालि = (सारे) समय में, सारी उम्र। बहि = बैठ के। समझाईऐ = (जिंदगी में किए कामों का लेखा) समझाया जाता है। सभि = सारे ही। पंड परालि = पराली की गठड़ी, बेकार के भार।2।
अर्थ: जगत में जनम से ले कर मरने तक सारी उम्र (मनुष्य) पदार्थ एकत्र करने की कोशिश में लगा रहता है। (जिनकी खातिर ये दौड़-भाग करता है, उनमें से) कोई भी उस जगह तक साथ नहीं निभाता जहाँ इसको (सारी जिंदगी किये कामों का लेखा) समझाया जाता है। (इसके मरने के बाद) इसको रोने वाले सारे ही संबंधी (इसके भार की) पराली की गठड़ी उठाते हैं (कयोंकि मरने वाले को कोई लाभ नहीं होता)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभु को आखै बहुतु बहुतु घटि न आखै कोइ ॥ कीमति किनै न पाईआ कहणि न वडा होइ ॥ साचा साहबु एकु तू होरि जीआ केते लोअ ॥३॥
मूलम्
सभु को आखै बहुतु बहुतु घटि न आखै कोइ ॥ कीमति किनै न पाईआ कहणि न वडा होइ ॥ साचा साहबु एकु तू होरि जीआ केते लोअ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभ को = हरेक जीव। आखै = कहता है, मांगता है। आखै बहुतु बहुतु = बहुत माया मांगता है। कहणि = कहने से। कहणि न वडा होइ = अपने कहने से कोई बड़ा नहीं बना, मुंह मांगे धन से कभी कोई तृप्त नहीं हुआ। कीमति…पाईआ = किसी ने कभी अपने मांगने की कोई कीमत नहीं डाली। मांगने की कभी कोई सीमा नहीं मिली, बस नहीं की। साचा = सदा स्थिर रहने वाला। साहिब = मालिक। होरि केते = बाकी सारे बेअंत जीव। लोअ = लोक, सृष्टियां।3।
अर्थ: (हे प्रभु!) हरेक जीव (तुझे) बहुत बहुत धन वास्ते ही कहता है, कोई भी थोड़ा नहीं मांगता, किसी ने भी कभी मांगने से बस नहीं की, मांग मांग के कभी कोई तृप्त नहीं हुआ (पर वह सारा ही धन यहाँ रह जाता है)। हे प्रभु! तू एक ही सदा कायम रहने वाला खालक है, और सारे जीअ-जंतु और सारे जगत मण्डल नाशवान हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नीचा अंदरि नीच जाति नीची हू अति नीचु ॥ नानकु तिन कै संगि साथि वडिआ सिउ किआ रीस ॥ जिथै नीच समालीअनि तिथै नदरि तेरी बखसीस ॥४॥३॥
मूलम्
नीचा अंदरि नीच जाति नीची हू अति नीचु ॥ नानकु तिन कै संगि साथि वडिआ सिउ किआ रीस ॥ जिथै नीच समालीअनि तिथै नदरि तेरी बखसीस ॥४॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हू = से। तिन कै संगि = उन के साथ है। वडिआं सिउ = माया धारियों से। रीस = बराबरी, तुलना, किसी और राह पे चलना। वडिआं सिउ किआ रीस = माया धारियों की राह पे नहीं चलना। समालिअनि = सम्भाले जाते हैं, सार ली जाती है।4।
अर्थ: (हे प्रभु! मैं तुझसे यही मांगता हूँ कि तेरा) नानक उन लोगों से साथ बनाये जो नीच से नीच जाति के हैं जो नीचों से भी अति नीच कहलाते हैं। मुझे मायाधारियों के राह पर चलने की कोई तमन्ना नहीं है (क्योंकि मुझे पता है कि) तेरी मंहर की नजर वहाँ है जहाँ गरीबों की सार ली जाती है।4।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: अंक 3 बताता है कि तीसरा शब्द समाप्त हुआ है।
दर्पण-भाव
भाव: चार दिनों की खेल की खातिर जीव प्रभु का नाम विसार कर जीवन व्यर्थ गवाते हैं। जिंदगी के दिन गिने चुने हैं, ये भी गवा लिए खाने के पदार्तों की कोशिशों में, सदा धनही मांगते रहे जो साथ नहीं निभता। पर प्रभु की मेहर उन पर है जो मायाधारियों की राह पर नहीं चलते।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: गुरु नानक देव जी के ख्याल अनुसार निरी जगत की प्राप्तियां ही जीवन का सही रास्ता नहीं है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ लबु कुता कूड़ु चूहड़ा ठगि खाधा मुरदारु ॥ पर निंदा पर मलु मुख सुधी अगनि क्रोधु चंडालु ॥ रस कस आपु सलाहणा ए करम मेरे करतार ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ लबु कुता कूड़ु चूहड़ा ठगि खाधा मुरदारु ॥ पर निंदा पर मलु मुख सुधी अगनि क्रोधु चंडालु ॥ रस कस आपु सलाहणा ए करम मेरे करतार ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लबु = खाने का लालच। कूड़ु = झूठ बोलना। ठगि = ठग के। पर मलु = पराई मैल। मुखि = मुँह में। सुधी = सारी की सारी, समूची। अगनि = आग। रस कस = चसके। आपु सलाहणा = अपने आप को सलाहना, स्वै-प्रशंसा करनी। ए = ये, यह।1।
अर्थ: हे मेरे कर्तार! मेरी तो ये करतूतें हैं; खाने का लालच (मेरे अंदर) कुत्ता है (जो हर वक्त खाने को मांगता है भौंकता है), झूठ (बोलने की आदत मेरे अंदर) चूहड़ा है (जिसने मुझे बहुत नीच कर दिया है), (दूसरों को) ठग के खाना (मेरे अंदर) मुरदार है (जो स्वार्थ की बदबू बढ़ा रहा है), पराई निंदा मेरे मुंह में समूची पराई मैल है, क्रोधाग्नि (मेरे अंदर) चंडाल (बनी हुई है), मुझे कई चसके हैं, मैं अपने आप को वडिआता हूँ, स्वै-प्रशंसा में लिप्त हूँ।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाबा बोलीऐ पति होइ ॥ ऊतम से दरि ऊतम कहीअहि नीच करम बहि रोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
बाबा बोलीऐ पति होइ ॥ ऊतम से दरि ऊतम कहीअहि नीच करम बहि रोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बाबा = हे भाई! बोलिऐ = वह बोल बोलें, प्रभु की महिमा ही करें। पति = इज्जत। से = वही बंदे। दरि = हरि की हजूरी में। कहीअहि = कहे जाते हैं। नीच करम = मंदकर्मी बंदे।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! वे बोल बोलने चाहिए (जिससे प्रभु की हजूरी में) इज्जत मिले। वही मनुष्य (असल में) अच्छे हैं, जो परमेश्वर की हजूरी में अच्छे कहे जाते हैं, मंदकर्मी बंदे चिन्ता मेंझुरते ही हैं।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रसु सुइना रसु रुपा कामणि रसु परमल की वासु ॥ रसु घोड़े रसु सेजा मंदर रसु मीठा रसु मासु ॥ एते रस सरीर के कै घटि नाम निवासु ॥२॥
मूलम्
रसु सुइना रसु रुपा कामणि रसु परमल की वासु ॥ रसु घोड़े रसु सेजा मंदर रसु मीठा रसु मासु ॥ एते रस सरीर के कै घटि नाम निवासु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रसु = चसका। रूपा = चाँदी। कामणि = स्त्री। परमल = सुगंधि। परमल की वास = सुगंध सूंघनी। मंदर = सुंदर घर। एते = इतने, कई। कै घटि = किस हृदय में?।2।
अर्थ: सोना चांदी (एकत्र करने) का चस्का, स्त्री (भाव, काम) का चस्का, सुगंधियों की लगन, घोड़ों (की सवारी) का शौक, (नर्म नर्म) सेजों (सुंदर) महलों की लालसा, (स्वाद भरपूर) मीठे पदार्थ, तथा मास (खाने) का चस्का- अगर मनुष्य के शरीर को इतने चस्के लगे हुये हैं, तो परमात्मा के नाम का ठिकाना किस हृदय में हो सकता है? 2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जितु बोलिऐ पति पाईऐ सो बोलिआ परवाणु ॥ फिका बोलि विगुचणा सुणि मूरख मन अजाण ॥ जो तिसु भावहि से भले होरि कि कहण वखाण ॥३॥
मूलम्
जितु बोलिऐ पति पाईऐ सो बोलिआ परवाणु ॥ फिका बोलि विगुचणा सुणि मूरख मन अजाण ॥ जो तिसु भावहि से भले होरि कि कहण वखाण ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जितु बोलिऐ = जिस बोल के बोलने से। जितु = जिस (बोल) के द्वारा। परवाणु = स्वीकार, कुशलता वाला, सुलक्षणा। बोलि = बोल के। विगुचणा = खुआर होता है। मन = हे मन! भावहि = अच्छे लगते हैं। तिसु = उस प्रभु को। कि = क्या? कहण वखाण = कहना कहाना, फालतू बातें। कि = किस अर्थ का? , कोई लाभ नहीं।2।
अर्थ: बोल वही बोले हुए बढ़िया हैं जिस बोल के बोलने से (प्रभु की हजूरी में) आदर मिलता है। हे मूर्ख अन्जान मन! सुन, फीके बोल (नाम रस विहीन) बोलने से दुख मिलता है (भाव, यदि सारी उम्र सिर्फ निरी-कोरी बातें ही करते रहे, जो प्रभु की याद से खाली हों तो दूखी ही रहते हैं) प्रभु की महिमा के बिना और सब बातें व्यर्थ हैं। जो मनुष्य (प्रभु की महिमा करके) उस प्रभु को प्यारे लगते हैं वही अच्छे हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तिन मति तिन पति तिन धनु पलै जिन हिरदै रहिआ समाइ ॥ तिन का किआ सालाहणा अवर सुआलिउ काइ ॥ नानक नदरी बाहरे राचहि दानि न नाइ ॥४॥४॥
मूलम्
तिन मति तिन पति तिन धनु पलै जिन हिरदै रहिआ समाइ ॥ तिन का किआ सालाहणा अवर सुआलिउ काइ ॥ नानक नदरी बाहरे राचहि दानि न नाइ ॥४॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तिन पलै = उन लोगों के पास। जिन हिरदै = जिनके हृदय में। सुआलिउ = सुंदर। काइ = कौन? नानक = हे नानक! नदरी बाहरे = प्रभु की मेहर के नजर से वंचित रहना। दानि = दान में, प्रभु के दिये हुए पदार्थ में। नाइ = प्रभु के नाम मे।4।
अर्थ: जो लोगों के हृदय में प्रभु हर वक्त बस रहा है, वे अक्ल वाले हैं, इज्जत वाले हैं और धनवान हैं। ऐसे भले मनुष्यों की सिफतिनहीं की जा सकती। उनके जैसा खूबसूरत और कौन है? हे नानक! प्रभु की नज़र से वंचित लोग उसके नाम से नहीं जुड़ते, बल्कि, उसके दिए धन-पदार्तों में मस्त रहते हैं।4।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: आखिरी अंक 4 बताता है कि ये चौथा शब्द है।
दर्पण-भाव
भाव: जिस मनुष्य के मन में दुनियावी चस्कों और विकारों का जोर हो वे प्रमात्मा के नाम में नहीं जुड़ सकते। चस्के-विकार व भक्ति एक ही हृदय में इकट्ठे नहीं हो सकते। ऐसा मनुष्य यद्यपि, कितना ही बुद्धिमान, मशहूर व धनवान क्यूँ ना हो उसका जीवन दुखों में ही व्यतीत होता है।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द के अंक नं: 2 को ध्यान से देखिए। चस्का कोई भी हो बुरा है। आदमी तभी गलत रास्ते पर पड़ता है जब शारीरिक जरूरतों से आगे बढ़ के चस्के में फंस जाता है। ये चस्का चाहे धन जोड़ने का है, चाहे काम-वासना का है, चाहे सुंदर घर बनाने का है, चाहे मिठाईयां चखने का है व चाहे मास खाने का है। इस तरह, बाकी चस्कों की तरह मास खाना भी तभी दुष्ट करतूत है जब ये जरूरत पार कर के चस्का बन जाता है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ अमलु गलोला कूड़ का दिता देवणहारि ॥ मती मरणु विसारिआ खुसी कीती दिन चारि ॥ सचु मिलिआ तिन सोफीआ राखण कउ दरवारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ अमलु गलोला कूड़ का दिता देवणहारि ॥ मती मरणु विसारिआ खुसी कीती दिन चारि ॥ सचु मिलिआ तिन सोफीआ राखण कउ दरवारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अमलु = नशा (अफीम आदि का)। गलोला = गोला। कूड़ = नाशवान जगत (मोह का)। देवणहारि = देवनहार ने। मती = मस्त हुई ने। सचु = सदा स्थिर रहने वाला प्रभु। सोफी = जो नशे से परहेज करते हैं, जिन्होंने नाशवान जगत के मोह रूपी नशे का त्याग किया है। राखण कउ = रखने के लिए, कब्जे के लिए। दरवारु = प्रभु का दर।1।
अर्थ: देनहार प्रभु ने स्वयं ही जगत को मोह रूपी अफीम का गोला जीवों को दिया हुआ है। (इस मोह अफीम को खा के) मस्त हुई जीवात्मा ने मौत को भुला दिया है, चार दिन की जिंदगी में रंग-रलियां मना रही है। जिन्होंने मोह का नशा त्याग के प्रमात्मा के दर पर पहुँचने की कोशिश की है, उन्हें स्थाई प्रभु मिल गया।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक साचे कउ सचु जाणु ॥ जितु सेविऐ सुखु पाईऐ तेरी दरगह चलै माणु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
नानक साचे कउ सचु जाणु ॥ जितु सेविऐ सुखु पाईऐ तेरी दरगह चलै माणु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जितु सेविऐ = जिसका स्मरण करने से। चलै माणु = आदर मिले।1। रहाउ।
अर्थ: हे नानक! सदा कायम रहने वाले परमात्मा के साथ सच्ची सांझ बना जिसका स्मरण करने से सुख मिलता है। (और अरदास कर कि हे प्रभु! अपना नाम दे जिस करके) तेरी हजूरी में आदर मिल सके।1। रहाउ।
[[0016]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचु सरा गुड़ बाहरा जिसु विचि सचा नाउ ॥ सुणहि वखाणहि जेतड़े हउ तिन बलिहारै जाउ ॥ ता मनु खीवा जाणीऐ जा महली पाए थाउ ॥२॥
मूलम्
सचु सरा गुड़ बाहरा जिसु विचि सचा नाउ ॥ सुणहि वखाणहि जेतड़े हउ तिन बलिहारै जाउ ॥ ता मनु खीवा जाणीऐ जा महली पाए थाउ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सरा = शराब। गुड़ बाहरा = गुड़ डाले बिना बनाया हुआ। वखाणहि = उच्चारते हैं। जेतड़े = जो जो मनुष्य। हउ = मैं। खीवा = मस्त। महली = प्रमात्मा की हजूरी में।2।
अर्थ: सदा की मस्ती कायम रखने वाली शराब गुड़ के बिना ही तैयार की जाती है। उस (शराब) में प्रभु का नाम होता है (प्रभु का नाम ही शराब है जो दुनिया से बेपरवाह कर देता है)। मैं उन लोगों से सदके हूँ जो प्रभु का नाम सुनते व उचारते है। मन को तभी मस्त हुआ जानों, जब ये प्रभु की याद में टिक जाए (और मन टिकता है नाम जपने की बरकत से)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नाउ नीरु चंगिआईआ सतु परमलु तनि वासु ॥ ता मुखु होवै उजला लख दाती इक दाति ॥ दूख तिसै पहि आखीअहि सूख जिसै ही पासि ॥३॥
मूलम्
नाउ नीरु चंगिआईआ सतु परमलु तनि वासु ॥ ता मुखु होवै उजला लख दाती इक दाति ॥ दूख तिसै पहि आखीअहि सूख जिसै ही पासि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नाउ = प्रभु का नाम। नीरु = (स्नान के लिए) पानी। चंगिआईआ = प्रभु के गुण, महिमा। सतु = उच्च आचरण। परमलु = सुगंधि। तनि = तन पे, तन में। वासु = सुगंधि। उजला = रौशन, साफ सुथरा। आखीअहि = कहे जाते हैं।3।
अर्थ: प्रमात्मा का नाम व महिमा बाकी सभी दातों से बेहतर दात है। महिमा से ही मनुष्य का मुँह सुंदर लगता है। प्रभु के नाम और महिमा ही (मुख उज्जवल) करने के लिए पानी है, और (महिमा की बरकत से बना हुआ) स्वच्छ आचरण शरीर पर लगाने वाली सुगंधि है। दुखों की निर्वर्ती और सुखों की प्राप्ति की अरजोई परमात्मा के आगे ही करनी चाहिए।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सो किउ मनहु विसारीऐ जा के जीअ पराण ॥ तिसु विणु सभु अपवित्रु है जेता पैनणु खाणु ॥ होरि गलां सभि कूड़ीआ तुधु भावै परवाणु ॥४॥५॥
मूलम्
सो किउ मनहु विसारीऐ जा के जीअ पराण ॥ तिसु विणु सभु अपवित्रु है जेता पैनणु खाणु ॥ होरि गलां सभि कूड़ीआ तुधु भावै परवाणु ॥४॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनहु = मन से। जीअ = जिंद, जीवात्मा। पराण = श्वास, सांस। जीअ पराण = जिंद जान। जेता = जितना भी, सारा ही। कूड़ीआ = झूठ में फसाने वालियां, जगत के मोह में फसाने वालियां। परवाणु = स्वीकार, निपुण, अच्छी, स्वीकार करने योग्य।4।
अर्थ: जिस प्रभु की बख्शी हुई ये जिंदगी हैं, उसे कभी मन से भुलाना नहीं चाहिये। प्रभु को विसार के, खाने-पीने का सारा ही उद्यम मन को और-और मलीन करता है। (क्योंकि) और सारी बातें (मन को) नाशवान संसार के मोहपाश में फंसाती हैं। (हे प्रभु!) वही उद्यम ठीक है जो तेरे साथ प्रीत बनाता है।4।5।
दर्पण-भाव
भाव: प्रभु की याद भुलाने से जगत का मोह आ दबोचता है। मोह अधीन हो के किये काम मन को और मलीन करते जाते हैं। प्रभु का नाम सबसे ऊँची बख्शिश है, ये एक ऐसा उल्लास पैदा करता हैजिसके सदका मनुष्य मोह से विरक्त रह के स्वच्छ आचरण वाला हो जाता है और प्रभु की हजूरी में आदर प्राप्त करता है।5।
दर्पण-टिप्पनी
सिरी रागु महलु १॥ (नोट: यहाँ शब्द ‘महला’ की जगह शब्द ‘महलु’ है। यदि शब्द ‘महला’ का उच्चारण: महला करें, तो शब्द ‘महलु’ का उच्चारण ‘महल’ करना पड़ेगा;और ‘महला’ और ‘महलु’ के अर्थ में फर्क प्रत्यक्ष है। सो, ठीक उच्चारण शब्द ‘बहरा’ ‘गहला’ की तरह है। ज्यादा जानकारी के लिए पढ़ें पुस्तक ‘गुरबाणी व्याकरण’)।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महलु १ ॥ जालि मोहु घसि मसु करि मति कागदु करि सारु ॥ भाउ कलम करि चितु लेखारी गुर पुछि लिखु बीचारु ॥ लिखु नामु सालाह लिखु लिखु अंतु न पारावारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महलु १ ॥ जालि मोहु घसि मसु करि मति कागदु करि सारु ॥ भाउ कलम करि चितु लेखारी गुर पुछि लिखु बीचारु ॥ लिखु नामु सालाह लिखु लिखु अंतु न पारावारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जालि = जला के। घसि = घसा के। मसु = स्याही। सारु = बढ़िया। भाउ = प्रेम। पुछि = पूछ के। पारावार = पार+उरवार, उसपार इसपार का छोर।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘मसु’ स्त्रीलिंग है व सदा ु की मात्रा के साथ अंत होता है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (हे भाई! माया का) मोह जला के (उसको) घिसा के स्याही बना के (अपनी) अक्ल को सुंदर कागज़ बना। प्रेम को कलम, और अपने मन को लिखारी बना। गुरु की शिक्षा ले के (परमात्मा के गुणों की) विचार करनी लिख। प्रभु का नाम लिख, प्रभु की महिमा लिख, यह लिख कि प्रभु के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता, इस पार उसपार का आखिरी छोर नहीं ढूँढा जा सकता।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाबा एहु लेखा लिखि जाणु ॥ जिथै लेखा मंगीऐ तिथै होइ सचा नीसाणु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
बाबा एहु लेखा लिखि जाणु ॥ जिथै लेखा मंगीऐ तिथै होइ सचा नीसाणु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लिखि जाणु = लिखने का तरीका सीख। नीसाणु = राहदारी, परवाना।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! ऐसा लेखा लिखने की विधि सीख। जिस जगह (जिंदगी में किये कामों का) हिसाब मांगा जाता है, वहाँ ये लेखा सच्ची राहदारी बनता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिथै मिलहि वडिआईआ सद खुसीआ सद चाउ ॥ तिन मुखि टिके निकलहि जिन मनि सचा नाउ ॥ करमि मिलै ता पाईऐ नाही गली वाउ दुआउ ॥२॥
मूलम्
जिथै मिलहि वडिआईआ सद खुसीआ सद चाउ ॥ तिन मुखि टिके निकलहि जिन मनि सचा नाउ ॥ करमि मिलै ता पाईऐ नाही गली वाउ दुआउ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मिलहि = मिलती हैं। सद = सदा। तिन मुखि = उन बंदों के मुँह पर। निकलहि = लगते हैं। मनि = मन में। करमि = (परमात्मा की) मेहर से। गली वाउ दुआउ = हवाई फजूल की बातों से।2।
अर्थ: जो मनुष्यों के मन में (प्रभु का) सदा स्थिर नाम बसता है (लेखा मांगे जाने वाली जगह) उनके माथे पे टीके लगते है, उन्हें आदर मिलता है। उन्हें हमेशा के लिए खुशियां और आत्म हुलारे मिलते हैं। पर प्रभु का नाम प्रभु की मेहर से मिलता है, फजूल की हवाई बातों से नहीं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इकि आवहि इकि जाहि उठि रखीअहि नाव सलार ॥ इकि उपाए मंगते इकना वडे दरवार ॥ अगै गइआ जाणीऐ विणु नावै वेकार ॥३॥
मूलम्
इकि आवहि इकि जाहि उठि रखीअहि नाव सलार ॥ इकि उपाए मंगते इकना वडे दरवार ॥ अगै गइआ जाणीऐ विणु नावै वेकार ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: इकि = कई जीव। रखीअहि = रखे जाते हैं। नाव = नाम। सलार = सरदार। इकना = कईयों ने। अगै = प्रमात्मा की हजूरी में। जाणीऐ = पता लगता है। वेकार = व्यर्थ।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘नाव’ है ‘नाउ’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (संसार में) बेअंत जीव आते हैं (और जीवन सफर खत्म करके यहाँ से) कूच कर जाते हैं, (कईयों के) सरदार (आदि बड़े बड़े नाम) रखे जाते हैं, कई (जगत में) भिखारी ही पैदा हुए, कईयों के बड़े बड़े दरबार लगते है। (पर दरबारों वाले सरदार हों या कंगाल हों) जीवन सफर खत्म करने पर समझ आता है कि प्रमात्मा के नाम स्मरण के बिना (ये सभ) जीवन व्यर्थ (गवां जाते हैं)।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भै तेरै डरु अगला खपि खपि छिजै देह ॥ नाव जिना सुलतान खान होदे डिठे खेह ॥ नानक उठी चलिआ सभि कूड़े तुटे नेह ॥४॥६॥
मूलम्
भै तेरै डरु अगला खपि खपि छिजै देह ॥ नाव जिना सुलतान खान होदे डिठे खेह ॥ नानक उठी चलिआ सभि कूड़े तुटे नेह ॥४॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भै तेरे = तेरे से भय करने से, तुझसे दूर रहने से। अगला = बहुत। खपि = खप के खिझ के। देह = शरीर। उठी चलीआ = उठ चलने वाले, उठ चलने से। सभि कूड़े नेह = सारे झूठे मोह प्यार।4।
अर्थ: हे नानक! (कह, हे प्रभु!) तुमसे दूर दूर रहने पर संसार का तौखला और सताता है। (इस तौखले में) खिझ खिझ के शरीर भी जर्जर होता जाता है। (तेरी याद के बग़ैर धन-सम्पदा का भी क्या गर्व?) जिनके नाम खान सुल्तान हैं सभी यहाँ मिट्टी में मिल जाते हैं (जगत से जाने के वक्त सारे झूठे मोह प्यार खत्म हो जाते हैं)।4।6।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: आखिरी अंक 6 बताता है कि ये छेवें शब्द की समाप्ति है।
दर्पण-भाव
भाव: असली साथ निभाने वाला पदार्थ प्रभु का नाम है। जो प्रभु की मेहर से गुरु द्वारा मिलता है। सरदारियां और बादशाहियां यहीं धरी धराई रह जाती हैं, प्रभु की याद से वंचित रह कर इनका कोई मुल्य नहीं पड़ता। सारी जिंदगी ही व्यर्थ चली जाती है। इस लिए, जगत का मोह छोड़ के प्यार के साथ प्रभु की महिमा हृदय में बसाओ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ सभि रस मिठे मंनिऐ सुणिऐ सालोणे ॥ खट तुरसी मुखि बोलणा मारण नाद कीए ॥ छतीह अम्रित भाउ एकु जा कउ नदरि करेइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ सभि रस मिठे मंनिऐ सुणिऐ सालोणे ॥ खट तुरसी मुखि बोलणा मारण नाद कीए ॥ छतीह अम्रित भाउ एकु जा कउ नदरि करेइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभि = सारे। रस = स्वाद। मंनीऐ = अगर (मन) मान जाए। सुणिऐ = अगर सुन ले, यदि ध्यान जुड़ जाए। सालोणे = नमकीन। खट तुरसी = खट्टे तुर्श। मुखि = मुंह से। मारण = मसाले। नाद = रागु, कीरतन। भाउ = प्रेम।1।
अर्थ: अगर मन प्रभु की याद में परच जाए, तो इसको (दुनिया के) सारे मीठे स्वाद वाले पदार्थ समझो। यदि ध्यान हरि के नाम में जुड़ने लग जाए, तो इसे नमकीन पदार्थ जानो। मुंह के साथ प्रभु का नाम उचारना खट्टे स्वाद वाले पदार्तों जैसा है। परमात्मा की महिमा का कीरतन मसाले (के समान) जानो। परमात्मा के साथ एक रस प्रेम छत्तीस किस्मों के स्वादिष्ट भोजन हैं। (पर यह उच्च दात उसीको मिलती है) जिस पे (प्रभु मेहर की) नज़र करता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाबा होरु खाणा खुसी खुआरु ॥ जितु खाधै तनु पीड़ीऐ मन महि चलहि विकार ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
बाबा होरु खाणा खुसी खुआरु ॥ जितु खाधै तनु पीड़ीऐ मन महि चलहि विकार ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बाबा = हे भाई! खुआर = जलील। जितु = जिसके द्वारा। जितु खाधै = जिस (पदार्थ) के खाने से। पीड़ीऐ = पीड़ा होती है, मुश्किल होती है। चलहि = चल पड़ते हैं।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! जिस पदार्तों के खाने से शरीर रोगी हो जाता है, और मन में (भी कई) बुरे ख्याल चल पड़ते हैं, उन पदार्तों को खाने से खुआर होते है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रता पैनणु मनु रता सुपेदी सतु दानु ॥ नीली सिआही कदा करणी पहिरणु पैर धिआनु ॥ कमरबंदु संतोख का धनु जोबनु तेरा नामु ॥२॥
मूलम्
रता पैनणु मनु रता सुपेदी सतु दानु ॥ नीली सिआही कदा करणी पहिरणु पैर धिआनु ॥ कमरबंदु संतोख का धनु जोबनु तेरा नामु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रता = रंगा हुआ। सुपेदी = सफेद कपड़ा। सतु = दान। नीली = नीली पोशाक। सिआही = मन की कालख। कदा करणी = काट देनी। पहिरणु = जामा, पहनने वाला चोगा। कमर बंद = कमर पर बांधने वाला कपड़ा।2।
अर्थ: प्रभु प्रीत में मन रंगा जाए, ये लाल पोशाक (समान) है। दान-पुण्य करना (जरूरतमंदों की सेवा करनी) ये सफेद पोशाक समझो। अपने मन में से कालख़ काट देनी नीले रंग की पोशाक समझो। प्रभु चरणों का ध्यान चोगा है। हे प्रभु! संतोष को मैंने अपनी कमर का पटका (कमरबंद) बनाया है, तेरा नाम ही मेरा धन है मेरी जवानी है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाबा होरु पैनणु खुसी खुआरु ॥ जितु पैधै तनु पीड़ीऐ मन महि चलहि विकार ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
बाबा होरु पैनणु खुसी खुआरु ॥ जितु पैधै तनु पीड़ीऐ मन महि चलहि विकार ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे भाई! जिस पहनने से शरीर दुखी हो, और मन में भी बुरे ख्याल चल पड़ें, ऐसे पहनने का शौक और चाव खुआर करते हैं।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
घोड़े पाखर सुइने साखति बूझणु तेरी वाट ॥ तरकस तीर कमाण सांग तेगबंद गुण धातु ॥ वाजा नेजा पति सिउ परगटु करमु तेरा मेरी जाति ॥३॥
मूलम्
घोड़े पाखर सुइने साखति बूझणु तेरी वाट ॥ तरकस तीर कमाण सांग तेगबंद गुण धातु ॥ वाजा नेजा पति सिउ परगटु करमु तेरा मेरी जाति ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पाखर = काठी। साखत = दुमची। तेरी वाट = तेरे चरणों तक पहुँचने का रास्ता। तरकस = तीर रखने वाला थैला (भत्था)। सांग = बरछी। तेगबंद = तलवार का गातरा। धातु = दौड़ भाग, प्रयत्न। पति = इज्जत। करमु = बख्शिश।3।
अर्थ: हे प्रभु! तेरे चरणों में जुड़ने का जीवन-राह समझना (मेरे वास्ते) सोने की दुमची वाले और (सुंदर) काठी वाले घोड़ों की सवारी (के बराबर) है। तेरी महिमा का उद्यम करना (मेरे वास्ते) भत्थे, तीर कमान, बरछी और तलवार के गातरे के समान है। (तेरे दर पे) इज्जत के साथ आजाद होना (मेरे वास्ते) वाजा व नेजा हैं। तेरी मेहर (की नजर) मेरे लिए ऊँचा कुल (जाति) है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाबा होरु चड़णा खुसी खुआरु ॥ जितु चड़िऐ तनु पीड़ीऐ मन महि चलहि विकार ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
बाबा होरु चड़णा खुसी खुआरु ॥ जितु चड़िऐ तनु पीड़ीऐ मन महि चलहि विकार ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे भाई! जिस घुडसवारी के करने से शरीर दुखी हो, मन में (अहंकार आदि के) कई विकार पैदा हो जाएं, वह घुड़सवारी और उसका चाव खुआर करता है।1। रहाउ।
[[0017]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
घर मंदर खुसी नाम की नदरि तेरी परवारु ॥ हुकमु सोई तुधु भावसी होरु आखणु बहुतु अपारु ॥ नानक सचा पातिसाहु पूछि न करे बीचारु ॥४॥
मूलम्
घर मंदर खुसी नाम की नदरि तेरी परवारु ॥ हुकमु सोई तुधु भावसी होरु आखणु बहुतु अपारु ॥ नानक सचा पातिसाहु पूछि न करे बीचारु ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तुधु भावसी = तेरी रजा में रहना। होरु आखणु = और हुक्म करने का वचन। पूछि = पूछ के।4।
अर्थ: महलों का बसेरा (मेरे वास्ते) तेरा नाम जपने से पैदा हुई खुशी ही है। तेरी मेहर की नजर मेरा कुटंब है (जो खुशी मुझे अपना परिवार देख के होती है, वही तेरी मेहर की नज़र में से मिलेगी)। (दुनिया से अपना) हुक्म (मनवाना) तथा (हुक्म के) और-और बोल बोलने (और इसमें खुशी महसूस करनी मेरे वास्ते) तेरी रजा में राजी रहना है।
हे नानक! सदा स्थिर रहने वाला प्रभु पातशाह ऐसे जीवन वाले से (कोई) सवाल जवाब नहीं करता (भाव, उसका जीवन उसकी नज़रों में स्वीकार है)।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाबा होरु सउणा खुसी खुआरु ॥ जितु सुतै तनु पीड़ीऐ मन महि चलहि विकार ॥१॥ रहाउ॥४॥७॥
मूलम्
बाबा होरु सउणा खुसी खुआरु ॥ जितु सुतै तनु पीड़ीऐ मन महि चलहि विकार ॥१॥ रहाउ॥४॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सउणा = दुनियावी मौजे मनानी। जितु सुतै = जिस शौ-ईश्रत के द्वारा। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (प्रभु की महिमा की खुशी छोड़ के) अन्य ऐशौ-ईश्रत की खुशी खुआर करती है, क्योंकि, और-और ऐशौ-ईश्रत शरीर को रोगी करते हैंऔर मन में भी विकार चल पड़ते हैं।1। रहाउ।4।7। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ कुंगू की कांइआ रतना की ललिता अगरि वासु तनि सासु ॥ अठसठि तीरथ का मुखि टिका तितु घटि मति विगासु ॥ ओतु मती सालाहणा सचु नामु गुणतासु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ कुंगू की कांइआ रतना की ललिता अगरि वासु तनि सासु ॥ अठसठि तीरथ का मुखि टिका तितु घटि मति विगासु ॥ ओतु मती सालाहणा सचु नामु गुणतासु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कुंगू = केसर। कांइआ = काया, शरीर। रतन = (भाव) प्रभु की महिमा। ललिता = जीभ। अगरि = ऊद की लकड़ी से। वासु = सुगंधि। तनि = शरीर में। सासु = (हरेक) सुआस। अठसठि = अढ़सठ। मुखि = मुंह पे, माथे पे। तितु घ्टि = उस शरीर में, उस मनुष्य के अंदर। विगासु = आनन्द, खुशी। ओतु मती = उस मति से ही। गुण तासु = गुणों का खजाना प्रभु।1।
अर्थ: जिस मनुष्य का शरीर केसर (जैसा शुद्ध विकार रहित) हो, जिसकी जिहवा (प्रभु की महिमा के) रतनों से जड़ी हो, जिसके शरीर के हरेक श्वासउस की लकड़ी की सुगंधि वाली हो (भाव, प्रभु के नाम की याद से सुगन्धित हों), जिस मनुष्य के माथे पे अढ़सठ तीर्थों का टीका लगा हो (भाव, जो प्रभु का नाम जप के अढ़सठ तीरथों से भी ज्यादा पवित्र हो चुका हो) उस मनुष्य के अंदर मति खिलती है, उस प्रफूल्लित हुई बुद्धि से ही सच्चा नाम सलाहा जा सकता है, गुणों का खजाना प्रभु सराहा जा सकता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाबा होर मति होर होर ॥ जे सउ वेर कमाईऐ कूड़ै कूड़ा जोरु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
बाबा होर मति होर होर ॥ जे सउ वेर कमाईऐ कूड़ै कूड़ा जोरु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बाबा = हे भाई! कमाईऐ = कमाई करें, उद्यम करें। कूड़ै = झूठ के साथ। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! प्रभु के नाम से वंचित हुई बुद्धि (आदमी को) और-और ही तरफ ले जाती है। महिमा छोड़ के अगर और कर्म सैकड़ों बार भी करें (तो कुछ नहीं बनता, क्योंकि,) झूठा कर्म करने से झूठ का ही जोर बढ़ता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पूज लगै पीरु आखीऐ सभु मिलै संसारु ॥ नाउ सदाए आपणा होवै सिधु सुमारु ॥ जा पति लेखै ना पवै सभा पूज खुआरु ॥२॥
मूलम्
पूज लगै पीरु आखीऐ सभु मिलै संसारु ॥ नाउ सदाए आपणा होवै सिधु सुमारु ॥ जा पति लेखै ना पवै सभा पूज खुआरु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पूज = पूजा, मान्यता। सभु = सारा। सिधु = योग साधनों में निपुण योगी। सभा = सारी। लेखै = किये कर्मों का हिसाब होने के समय।2।
अर्थ: अगर कोई मनुष्य पीर कहलाने लगे, सारा संसार आ के उसके दर्शन करे, उसकी पूजा होने लग जाए, यदि वह पहुँचा हुआ (करामाती) योगी गिना जाने लगे, बहुत नामवर मशहूर हो जाए (तो भी ये सब कुछ किसी अर्थ के नहीं, क्योंकि) अगर प्रभु की हजूरी में किये कर्मों का हिसाब होने के समय उसको इज्जत नहीं मिलती, तो (दुनिया में हुई) सारी पूजा खुआर ही करती है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिन कउ सतिगुरि थापिआ तिन मेटि न सकै कोइ ॥ ओना अंदरि नामु निधानु है नामो परगटु होइ ॥ नाउ पूजीऐ नाउ मंनीऐ अखंडु सदा सचु सोइ ॥३॥
मूलम्
जिन कउ सतिगुरि थापिआ तिन मेटि न सकै कोइ ॥ ओना अंदरि नामु निधानु है नामो परगटु होइ ॥ नाउ पूजीऐ नाउ मंनीऐ अखंडु सदा सचु सोइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सतिगुरि = गुरु ने। थापिआ = थापना दी, दिलासा दी। नामो = नाम ही। अखण्ड = एकरस, सदा, लगातार।3।
अर्थ: जिस लोगों को सत्गुरू ने साबाशी दी है, उनकी उस इज्जत को कोई मिटा नहीं सकता (क्योंकि) उनके हृदय में प्रभु के नाम का खजाना बसता है उनके अंदर नाम ही बसता है। (ये पक्का नियम जानो कि) प्रभु का नाम ही पूजा जाता है, नाम हीसत्कारा जाता है। प्रभु ही सदा एक रस सदा स्थिर रहने वाला है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
खेहू खेह रलाईऐ ता जीउ केहा होइ ॥ जलीआ सभि सिआणपा उठी चलिआ रोइ ॥ नानक नामि विसारिऐ दरि गइआ किआ होइ ॥४॥८॥
मूलम्
खेहू खेह रलाईऐ ता जीउ केहा होइ ॥ जलीआ सभि सिआणपा उठी चलिआ रोइ ॥ नानक नामि विसारिऐ दरि गइआ किआ होइ ॥४॥८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: खेह = मिट्टी। जिउ = जान। केहा होइ = बुरी हालत होती है। सभि = सारी। रोइ = दुखी हो के। नाम विसारिऐ = यदि प्रभु का नाम विसार दिया जाए। दरि = (प्रभु के) दर पे। किआ होइ = बुरी हालत ही होती है।4।
अर्थ: (जो मनुष्यों ने कभी नाम नहीं जपा, उनका) शरीर जब मिट्टी हो के मिट्टी में मिल गया, तो नामहीन जिंद का हाल बुरा ही होता है। (दुनियां में की) सारी चतुराईयां राख हो जातीं हैं, जगत से जीव दुखी हो के ही चलता है।
हे नानक! अगर प्रभु का नाम भुला दें, तो प्रभु के दर पे पहुँच के बुरा हाल ही होता है।4।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ गुणवंती गुण वीथरै अउगुणवंती झूरि ॥ जे लोड़हि वरु कामणी नह मिलीऐ पिर कूरि ॥ ना बेड़ी ना तुलहड़ा ना पाईऐ पिरु दूरि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ गुणवंती गुण वीथरै अउगुणवंती झूरि ॥ जे लोड़हि वरु कामणी नह मिलीऐ पिर कूरि ॥ ना बेड़ी ना तुलहड़ा ना पाईऐ पिरु दूरि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुणवंती = गुणवान स्त्री। वीथरे = विथार करती है, कथन करती है। झूरि = झुरती है, चिंतित रहती है। वरु = वर, खसम, प्रभु। कामणी = हे जीव-स्त्री! नह मिलिऐ पिर = पति को नहीं मिल सकते। कूरि = झूठ द्वारा, झूठे मोह में पड़े रहने से। तुलहड़ा = तुलहा, लकड़ी का बना हुआ आसरा जिस पे बैठ के नदी के किनारे रहने वाले नदी पार कर लेते हैं।1।
अर्थ: जिस जीव-स्त्री ने अपने हृदय में प्रभु की महिमा बसाई हई है वह प्रभु के गुणों की ही कथा वारता करती है। पर, जिसके अंदर (माया के मोह के कारण) औगुण ही औगुण हैं वह (अपने ही औगुणों के प्रभाव से) सदा चिंतातुर रहती है। हे जीव-स्त्री! तू प्रभु पति को मिलना चाहती है, तो (याद रख कि) झूठे मोह में फसे रहने से प्रभु-पति को नहीं मिल सकती। (तू तो मोह के समुंदर में गोते खा रही है) तेरे पास ना बेड़ी (नाव) है ना तुलहा है, इस तरह प्रभु पति नहीं मिल सकता, (क्योंकि) वह तो (इस संसार समुंदर से पार है) दूर है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे ठाकुर पूरै तखति अडोलु ॥ गुरमुखि पूरा जे करे पाईऐ साचु अतोलु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे ठाकुर पूरै तखति अडोलु ॥ गुरमुखि पूरा जे करे पाईऐ साचु अतोलु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मेरे ठाकुर अडोलु = मेरे ठाकुर का अहिल ठिकाना। तखति = तख्त पर। गुरमुखि पूरा = पूरा गुरु। जे करे = यदि मेहर करे।1। रहाउ।
अर्थ: मेरे पालनहार प्रभु का अहिल ठिकाना उस तख्त पर है जो (प्रभु की तरह ही) संपूर्ण है (जिसमें कोई कमी नहीं है)। वह प्रभु सदा स्थिर रहने वाला है, उसका तौल माप बताया नहीं जा सकता। पूरा गुरु यदि मेहर करे, तोही वह मिल सकता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रभु हरिमंदरु सोहणा तिसु महि माणक लाल ॥ मोती हीरा निरमला कंचन कोट रीसाल ॥ बिनु पउड़ी गड़ि किउ चड़उ गुर हरि धिआन निहाल ॥२॥
मूलम्
प्रभु हरिमंदरु सोहणा तिसु महि माणक लाल ॥ मोती हीरा निरमला कंचन कोट रीसाल ॥ बिनु पउड़ी गड़ि किउ चड़उ गुर हरि धिआन निहाल ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तिसु महि = उस (हरिमंदर में)। माणक = मोती। कंचन कोट = सोने के किले। रीसाल = सुंदर, आनन्द का घर, आनंद देने वाले। गढ़ि = किले पर। गुर धिआन = गुरु (चरणों का) ध्यान। निहाल = दिखा देता है।2।
अर्थ: हरि प्रमात्मा (मानों) एक खूबसूरत सा मन्दिर है जिसमें माणक लाल मोती व चमकते हीरे हैं (जिसके चारों तरफ) सोने के सुन्दर किले हैं। पर उस (मंदिर) किले पर सीढ़ी के बिना चढ़ा नही जा सकता। हाँ, यदि गुरु चरणों का ध्यान धरा जाए, जो प्रभु चरणों का ध्यान धरा जाए, तो दर्शन हो जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरु पउड़ी बेड़ी गुरू गुरु तुलहा हरि नाउ ॥ गुरु सरु सागरु बोहिथो गुरु तीरथु दरीआउ ॥ जे तिसु भावै ऊजली सत सरि नावण जाउ ॥३॥
मूलम्
गुरु पउड़ी बेड़ी गुरू गुरु तुलहा हरि नाउ ॥ गुरु सरु सागरु बोहिथो गुरु तीरथु दरीआउ ॥ जे तिसु भावै ऊजली सत सरि नावण जाउ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सरु = तालाब। सागरु = समुंदर। बोहिथो = जहाज़। तिसु भावै = उस (गुरु) को अच्छा लगे। ऊजली = मति उज्जवल हो जाती है। सतसरि = सत्संग सरोवर में। नावण = स्नान करने के लिए, मन धोने के लिए।3।
अर्थ: उस (हरि मंदिर किले के ऊपर चढ़ने के लिए) गुरु सीढ़ी है। (इस संसार समुंदर से पार लांघने के वास्ते) गुरु नाव है, प्रभु का नाम (देने वाला) गुरु तुलहा है। गुरु सरोवर है, गुरु समुंदर है, गुरु ही जहाज है, गुरु ही तीर्थ है, और दरिया है। यदि प्रभु की रजा हो, तो (गुरु को मिल के) मनुष्य की बुद्धि शुद्ध हो जाती है। (क्योंकि) मनुष्य साधु-संगत सरोवर में (मानसिक) स्नान करने जाने लग पड़ता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पूरो पूरो आखीऐ पूरै तखति निवास ॥ पूरै थानि सुहावणै पूरै आस निरास ॥ नानक पूरा जे मिलै किउ घाटै गुण तास ॥४॥९॥
मूलम्
पूरो पूरो आखीऐ पूरै तखति निवास ॥ पूरै थानि सुहावणै पूरै आस निरास ॥ नानक पूरा जे मिलै किउ घाटै गुण तास ॥४॥९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: थानि = जगह पर। पूरै = पूरी करता है। आस निरास = निराशों की आस। किउ घटै = नहीं घटते। तास = उस (जीव) के।4।
अर्थ: हर कोई कहता है कि परमात्मा में कोई कमी नही है, उसका निवास भी ऐसे तख्त पर है जिसमें कोई कमी नहीं है। वह पूरा प्रभु सुंदर कमी रहित जगह पर बैठा हैऔर टूटे दिल वालों की उम्मीदें पूरी करता है। हे नानक! वह पूर्ण प्रभु अगर मनुष्य को मिल जाए तो उसके गुणों में भी कैसे कोई कमी आ सकती है? 4।9।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ आवहु भैणे गलि मिलह अंकि सहेलड़ीआह ॥ मिलि कै करह कहाणीआ सम्रथ कंत कीआह ॥ साचे साहिब सभि गुण अउगण सभि असाह ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ आवहु भैणे गलि मिलह अंकि सहेलड़ीआह ॥ मिलि कै करह कहाणीआ सम्रथ कंत कीआह ॥ साचे साहिब सभि गुण अउगण सभि असाह ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गलि = गले से। अंकि = अंक में, जफी में, अंग लगा के। भैणे सहेलड़ीआह = हे बहनो! हे सहेलियो! करह = आओ हम करें। संम्रथ = सभ ताकतों हवाले। सभि = सारे। असाह = हमारे ही।1।
अर्थ: हे सत्संगी सहेलियो व बहनों! आओ, प्यार से (सत्संग में) इकट्ठे हों, सत्संग में मिल के उस प्रभु-पति की बातें करें जो सर्व-शक्तिमान है। (हे सहेलिओ!) उस सदा स्थिर मालक में सारे ही गुण हैं (उस से विछुड़ के ही) सारे अवगुण हमारे में आ जाते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
करता सभु को तेरै जोरि ॥ एकु सबदु बीचारीऐ जा तू ता किआ होरि ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
करता सभु को तेरै जोरि ॥ एकु सबदु बीचारीऐ जा तू ता किआ होरि ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करता = हे कर्तार! सभु को = हरेक जीव। तेरै जोरि = तेरे हुक्म में। एकु सबदु = प्रभु की महिमा की वाणी। किआ = क्या (बिगाड़ सकते हैं)? ।1। रहाउ।
अर्थ: हे कर्तार! हरेक जीव तेरे हुक्म में (ही चल सकता है)। जब तेरी महिमा की वाणी का विचार करते हैं (तब ये समझ आती है कि) जब तू (हमारे सिर पर रक्षक है, रखवाला है), तो और कोई हमारा क्या बिगाड़ सकते हैं।1 रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जाइ पुछहु सोहागणी तुसी राविआ किनी गुणीं ॥ सहजि संतोखि सीगारीआ मिठा बोलणी ॥ पिरु रीसालू ता मिलै जा गुर का सबदु सुणी ॥२॥
मूलम्
जाइ पुछहु सोहागणी तुसी राविआ किनी गुणीं ॥ सहजि संतोखि सीगारीआ मिठा बोलणी ॥ पिरु रीसालू ता मिलै जा गुर का सबदु सुणी ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जाइ = जा के। राविआ = रचा मचा, व्याप्त, मिलाप हासिल किया। गुणी = गुणों से। सहजि = सहजता से, अडोल अवस्था से। रीसालु = सुंदर रस का घर, आनन्द दाता।2।
अर्थ: (हे सत्संगी बहिनों! बेशक) जा के सुहागन (जीव-स्त्री) को पूछ लो कि तुमने किन गुणों से प्रभु मिलाप हासिल किया है। वहाँ से यही पता लगेगा कि वे अडोलता से, संतोष से और मीठे बोलों से श्रिंगारी हुई हैं (तभी उन्हें मिल गया)। वह आनन्द दाता प्रभु-पति तभी मिलता है, जब गुरु का उपदेश ध्यान से सुना जाए (तथा संतोष, मृदुभाषी मीठे बोलों वाले गुण धारण किये जाएं)।2।
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विश्वास-प्रस्तुतिः
केतीआ तेरीआ कुदरती केवड तेरी दाति ॥ केते तेरे जीअ जंत सिफति करहि दिनु राति ॥ केते तेरे रूप रंग केते जाति अजाति ॥३॥
मूलम्
केतीआ तेरीआ कुदरती केवड तेरी दाति ॥ केते तेरे जीअ जंत सिफति करहि दिनु राति ॥ केते तेरे रूप रंग केते जाति अजाति ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कुदरती = कुदरतें। दाति = दातें। केते = बेअंत। जाति अजाति = ऊँची जातियों व नीच जाति के जीव।3।
अर्थ: हे प्रभु! तेरी बेअंत ताकतें हैं, तेरी बेअंत बख्शिशें हैं। बेअंत जीव दिन रात तेरी तारीफ कर रहे हैं। तेरे बेअंत ही रूप-रंग हैं, तेरे पैदा किये बेअंत जीव हैं, जो कोई ऊँची व कोई नीच जातियों में हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचु मिलै सचु ऊपजै सच महि साचि समाइ ॥ सुरति होवै पति ऊगवै गुरबचनी भउ खाइ ॥ नानक सचा पातिसाहु आपे लए मिलाइ ॥४॥१०॥
मूलम्
सचु मिलै सचु ऊपजै सच महि साचि समाइ ॥ सुरति होवै पति ऊगवै गुरबचनी भउ खाइ ॥ नानक सचा पातिसाहु आपे लए मिलाइ ॥४॥१०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साचि = सच द्वारा, स्मरण से। सच महि = सदा स्थिर प्रभु में। भउ खाइ = दुनिया वाला सहम डर खत्म कर लेता है।4।
अर्थ: हे नानक! यदि मनुष्य स्मरण करते हुए अडोल प्रभु में लीन रहे, तो उसे प्रमात्मा मिल जाता है। परमात्मा (उसके हृदय में) प्रगट हो जाता है, उसकी तवज्जो (प्रभु चरणों में) जुड़ी रहती है, (प्रभु के दर पर) उसे आदर मिलता है, गुरु के वचन पर चल के वह संसारिक डर खत्म कर लेता है, तथा सदा स्थिर रहने वाला अडोल प्रभु-पातशाह उसको स्वयं ही अपने चरणों में जोड़ लेता है।4।10।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ भली सरी जि उबरी हउमै मुई घराहु ॥ दूत लगे फिरि चाकरी सतिगुर का वेसाहु ॥ कलप तिआगी बादि है सचा वेपरवाहु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ भली सरी जि उबरी हउमै मुई घराहु ॥ दूत लगे फिरि चाकरी सतिगुर का वेसाहु ॥ कलप तिआगी बादि है सचा वेपरवाहु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सरी = फब गई। उबरी = बच गई। घराहु = घर से, हृदय में से। दूत = विकार। वेसाहु = भरोसा, दिलासा। कलप = कल्पना। बादि = व्यर्थ।1।
अर्थ: (मेरे वास्ते बहुत) अच्छा हुआ कि मेरी जिंद विकारों से बच गई, मेरे हृदय में से अहम् मर गया। मुझे अपने गुरु का थापड़ा (पीठ पे शाबाशी भरा हाथ) मिला, और विकार (मुझे खुआर करने की बजाए) उल्टे मेरे बस में हो गये। अडोल बेपरवाह प्रभु (मुझे मिल गया), मैंने (माया मोह की) व्यर्थ की कल्पना छोड़ दी।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे सचु मिलै भउ जाइ ॥ भै बिनु निरभउ किउ थीऐ गुरमुखि सबदि समाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे सचु मिलै भउ जाइ ॥ भै बिनु निरभउ किउ थीऐ गुरमुखि सबदि समाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचु = सदा स्थिर रहने वाला प्रभु। भै बिनु = (निरमल) बगैर डर के।1। रहाउ।
अर्थ: हे (मेरे) मन! जब वह अडोल प्रभु मिल जाता है, तो दुनिया का डर सहम दूर हो जाता है। जब तक प्रमात्मा का भय अदब मन में ना हो, मनुष्य दुनिया के डरों से बच नहीं सकता। (और परमात्मा का भय-अदब तब ही पैदा होता है जब जीव) गुरु के द्वारा शब्द से जुड़ता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
केता आखणु आखीऐ आखणि तोटि न होइ ॥ मंगण वाले केतड़े दाता एको सोइ ॥ जिस के जीअ पराण है मनि वसिऐ सुखु होइ ॥२॥
मूलम्
केता आखणु आखीऐ आखणि तोटि न होइ ॥ मंगण वाले केतड़े दाता एको सोइ ॥ जिस के जीअ पराण है मनि वसिऐ सुखु होइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: केता आखणु आखीऐ = (दुनिया वाली) मांग कितनी ही मांगते हैं। मनि वसिऐ = यदि मन में बस जाए।2।
अर्थ: मनुष्य दुनिया वाली मांग कितनी ही मांगता रहता है, मांगें मांगने में कमी होती ही नहीं (भाव, दुनियावी मांगें खत्म नहीं होतीं) (फिर) बेअंत जीव हैं मांगे मांगने वाले, और देने वाला सिर्फ एक परमात्मा है (पर इस मांगने में सुख भी नहीं है)। जिस परमात्मा ने जिंद प्राण सुख दिये हुए हैं, यदि वह मन में बस जाए, तब ही सुख होता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जगु सुपना बाजी बनी खिन महि खेलु खेलाइ ॥ संजोगी मिलि एकसे विजोगी उठि जाइ ॥ जो तिसु भाणा सो थीऐ अवरु न करणा जाइ ॥३॥
मूलम्
जगु सुपना बाजी बनी खिन महि खेलु खेलाइ ॥ संजोगी मिलि एकसे विजोगी उठि जाइ ॥ जो तिसु भाणा सो थीऐ अवरु न करणा जाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बाजी = खेल। खेलु खेलाइ = खेल खिला देता है, खेल खत्म कर देता है। एकसे = इकट्टे हो जाते हैं। जाइ = चला जाता है।3।
अर्थ: जगत (मानों) सपना है, जगत एक खेल बना हुआ है। जीव एक छिन में (जिंदगी की) खेल खेल के चला जाता है। (प्रभु की) संजोग-सत्य से प्राणी मिल के इकट्टे होते हैं। विजोग-सत्य अनुसार जीव (यहां से) उठ के चले जाते हैं। जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है, वही होता है (उसके उलट) और कुछ नहीं किया जा सकता।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखि वसतु वेसाहीऐ सचु वखरु सचु रासि ॥ जिनी सचु वणंजिआ गुर पूरे साबासि ॥ नानक वसतु पछाणसी सचु सउदा जिसु पासि ॥४॥११॥
मूलम्
गुरमुखि वसतु वेसाहीऐ सचु वखरु सचु रासि ॥ जिनी सचु वणंजिआ गुर पूरे साबासि ॥ नानक वसतु पछाणसी सचु सउदा जिसु पासि ॥४॥११॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वेसाहीऐ = काम काज में खचित रखते हैं। वखरु = सौदा। रासि = पूंजी, राशि। साबासि = प्रसंन्नता, आदर। पछाणसी = पहचानता है, कद्र पाता है।4।
अर्थ: सदा स्थिर रहने वाले प्रभु का नाम ही असल सौदा है और पूंजी है (जिसके व्यापार के लिए जीव यहां आया है)। ये सौदा गुरु के द्वारा ही खरीदा जा सकता है। जिस लोगों ने यह सौदा खरीदा है उनको पूरे गुरु की शाबाशी मिलती है। हे नानक! जिस के पास यह सच्चा सौदा होता है, इस वस्तु की कद्र भी वही जानता है।4।11।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: देखें इसी लड़ी के शब्द 6 पे वहां भी शीर्षक ‘महला’ के बजाए ‘महलु’ ही है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महलु १ ॥ धातु मिलै फुनि धातु कउ सिफती सिफति समाइ ॥ लालु गुलालु गहबरा सचा रंगु चड़ाउ ॥ सचु मिलै संतोखीआ हरि जपि एकै भाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महलु १ ॥ धातु मिलै फुनि धातु कउ सिफती सिफति समाइ ॥ लालु गुलालु गहबरा सचा रंगु चड़ाउ ॥ सचु मिलै संतोखीआ हरि जपि एकै भाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: फुनि = पुनः , दुबारा। धातु = सोना आदि धातु से बना हुआ गहना। सिफती = सिफतों के मालिक परमात्मा। गुलालु = लाल फूल। गहबरा = गाढ़ा। सचा = सदा टिका रहने वाला, पक्का। भाइ = भाव में, प्रेम में। एकै भाइ = एकरस प्रेम में।1।
अर्थ: प्रभु की महिमा करके गुणों के मालिक प्रभु में मनुष्य इस तरह लीन हो जाता है, जैसे (सोना आदि धातु का बना हुआ जेवर ढल के) मुड़ (उसी) धातु के साथ एकरूप हो जाता है। (महिमा की इनायत से) मनुष्य पर गाढ़ा लाल रंग चढ़ जाता है (मनुष्य का चेहरा चमक उठता है)। पर वह अडोल प्रभु उन संतोखी जीवन वालों को ही मिलता है जो परमेश्वर की महिमा करते करते उस एक के प्रेम में ही (मगन रहते) हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे संत जना की रेणु ॥ संत सभा गुरु पाईऐ मुकति पदारथु धेणु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे संत जना की रेणु ॥ संत सभा गुरु पाईऐ मुकति पदारथु धेणु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रेणु = चरण-धूल। धेणु = धेनु, गाय। मुकति = विकारों से मुक्ति, खलासी।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (अगर प्रभु का दर्शन करना है तो) संत जनों के चरणों की धूल बनो। संत जनों की सभा में (सत्संग में) गुरु मिलता है जो विकारों से बचा लेता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ऊचउ थानु सुहावणा ऊपरि महलु मुरारि ॥ सचु करणी दे पाईऐ दरु घरु महलु पिआरि ॥ गुरमुखि मनु समझाईऐ आतम रामु बीचारि ॥२॥
मूलम्
ऊचउ थानु सुहावणा ऊपरि महलु मुरारि ॥ सचु करणी दे पाईऐ दरु घरु महलु पिआरि ॥ गुरमुखि मनु समझाईऐ आतम रामु बीचारि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुरारि = परमात्मा। करणी = आचरण। दरु घरु = प्रभु का दर, प्रभु का घर। पिआरि = प्यार से। आतम रामु = सब की आत्मा में व्यापक प्रभु। बीचारि = विचार के। आतमु रामु बीचारि = सर्व व्यापी प्रभु (के गुणों) को विचार के।2।
अर्थ: परमात्मा (के रहने) का सुंदर स्थल ऊँचा है, उस का महल (सब से) ऊपर है। उस का दर उसका घर महल प्यार से मिलता है। टिके हुए (अच्छे) आचरण से उसे ढूँढना है (पर ऊँचा आचरण भी कोई आसान खेल नहीं, मन विकारों की ओर ही प्रेरता रहता है, तथा) मन को गुरु के द्वारा सीधे रास्ते लगाना, सर्व-व्यापी प्रभु के गुणों की विचार से समझाना है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
त्रिबिधि करम कमाईअहि आस अंदेसा होइ ॥ किउ गुर बिनु त्रिकुटी छुटसी सहजि मिलिऐ सुखु होइ ॥ निज घरि महलु पछाणीऐ नदरि करे मलु धोइ ॥३॥
मूलम्
त्रिबिधि करम कमाईअहि आस अंदेसा होइ ॥ किउ गुर बिनु त्रिकुटी छुटसी सहजि मिलिऐ सुखु होइ ॥ निज घरि महलु पछाणीऐ नदरि करे मलु धोइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: त्रिबिधि = तीन किस्मों के, माया के तीन गुण (रजो, सतो व तमो) वाले। कमाईअहि = कमाये जाते हैं, किए जाते हैं। अंदेसा = सहसा,शंका। त्रिकुटी = (त्रि = तीन, कुटी = टेढ़ी लकीर), तीन टेढ़ी लकीरें, तियौड़ी, खिझ। सहजि मिलिऐ = अगर अडोल अवस्था में टिके रहें। निज घरि = अपने घर में, अडोल अवस्था में जब मन बाहर भटकने से हट जाता है।3।
अर्थ: (दुनियां में आम तौर पे) माया के तीन गुणों के अधीन रह के ही कर्म किए जाते हैं, जिस करके आशाओं व शंकाओं का चक्र बना रहता है। (इनके कारण मन भी अशांत रहता है) ये अशांति गुरु की शरण पड़े बिना नहीं हटती। (गुरु के द्वारा ही अडोलता पैदा होती है), अडोलता में टिके रह के ही आत्मिक आनन्द मिलता है। जब प्रभु मेहर की नजर करता है, मनुष्य (अपने मन की) मैल साफ करता है (और मन भटकने से हट जाता है) और अडोलता में परमात्मा के ठिकाने को (अपने अंदर ही) पहचान लेता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बिनु गुर मैलु न उतरै बिनु हरि किउ घर वासु ॥ एको सबदु वीचारीऐ अवर तिआगै आस ॥ नानक देखि दिखाईऐ हउ सद बलिहारै जासु ॥४॥१२॥
मूलम्
बिनु गुर मैलु न उतरै बिनु हरि किउ घर वासु ॥ एको सबदु वीचारीऐ अवर तिआगै आस ॥ नानक देखि दिखाईऐ हउ सद बलिहारै जासु ॥४॥१२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: घर वासु = घर का बसेवा, अडोल अवस्था, वे हालात जब मन बाहर भटकने से रुक जाता है। एको = एक राज़क प्रभु का। देखि = देख के। दिखाईऐ = दिखाया जा सकता है। जासु = जाता है।4।
अर्थ: गुरु के बगैर मन की मैल नहीं धुलती। परमात्मा में जुड़े बिना मानसिक अडोलता नही मिलती। (हे भाई!) (रिजक देने वाले) एक प्रभु की ही महिमा विचारनी चाहिए। (जो महिमा करता है वह) और-और आशाएं त्याग देता है। हे नानक! (कह:) जो गुरु स्वयं प्रभु के दर्शन करके मुझे दर्शन करवाता है, मैं उससे सदा सदके जाता हूँ।4।12।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ ध्रिगु जीवणु दोहागणी मुठी दूजै भाइ ॥ कलर केरी कंध जिउ अहिनिसि किरि ढहि पाइ ॥ बिनु सबदै सुखु ना थीऐ पिर बिनु दूखु न जाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ ध्रिगु जीवणु दोहागणी मुठी दूजै भाइ ॥ कलर केरी कंध जिउ अहिनिसि किरि ढहि पाइ ॥ बिनु सबदै सुखु ना थीऐ पिर बिनु दूखु न जाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ध्रिगु = धिक्कार के लायक। दोहागणी = बुरे भाग्य वाली, पति से विछुड़ी हुई। मुठी = ठगी हुई। दूजै भाइ = (प्रभु के बिना) किसी और के प्रेम में। केरी = की। अहि = दिन। निसि = रात। किरि = किर के, झड़ना।1।
अर्थ: जो भाग्यहीन जीव-स्त्री (प्रभु-पति के बिना माया आदि) और दूसरे प्यार में ठगी रहती है उसका जीना धिक्कार ही है। जैसे कल्लर की दीवार (धीरे-धीरे) झर-झर के नष्ट होती है, वैसे ही उसका आत्मिक जीवन भी दिन रात (माया के मोह में) धीरे धीरे क्षय हो जाता है। (सुख की खातिर वह दौड़-भाग करती है, पर) गुरु की शरण के बिना सुख नहीं मिल सकता (माया का मोह तो बल्कि दुख ही दुख पैदा करता है, और) प्रभु-पति को मिले बिना मानसिक दुख दूर नहीं होता।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मुंधे पिर बिनु किआ सीगारु ॥ दरि घरि ढोई न लहै दरगह झूठु खुआरु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मुंधे पिर बिनु किआ सीगारु ॥ दरि घरि ढोई न लहै दरगह झूठु खुआरु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुंधे = हे मूर्ख! ढोई = आसरा, सहारा।1। रहाउ।
अर्थ: हे मूर्ख जीव-स्त्री! अगर पति ना मिले तो श्रृंगार करने का कोई लाभ नहीं होता। (अगर जीव-स्त्री प्रेम से वंचित रह के ही धार्मिक उद्यम कर्म आदि किये जा रही है, पर उसके अंदर माया मोह प्रबल है) वह प्रभु के दर पर प्रभु के घर में आसरा नहीं ले सकती, (क्योंकि) झूठ (भाव, माया का मोह) प्रभु की हजूरी में दुरकारा ही जाता है।1। रहाउ।
[[0019]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपि सुजाणु न भुलई सचा वड किरसाणु ॥ पहिला धरती साधि कै सचु नामु दे दाणु ॥ नउ निधि उपजै नामु एकु करमि पवै नीसाणु ॥२॥
मूलम्
आपि सुजाणु न भुलई सचा वड किरसाणु ॥ पहिला धरती साधि कै सचु नामु दे दाणु ॥ नउ निधि उपजै नामु एकु करमि पवै नीसाणु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुजाणु = सयाना, चतुर, सुजान। साधि कै = साफ कर के, तैयार करके। दे = देता है। दाणु = दाना, कण, बीज। करमि = बख्शिश द्वारा। नीसाणु = परवाना, राहदारी, पर्वानगी।2।
अर्थ: (किसान अपने रोजमर्रा के तजरबे से जानता है कि बीज बीजने से पहले धरती को कैसे तैयार करना है ता कि बढ़िया फसल हो, इसी तरह) सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा बड़ा किसान है, वह (बड़ा) सुजान किसान है, वह गलती नहीं करता (जिस हृदय-रूपी धरती में नाम-बीज बीजना होता है) वह उस हृदय-धरा को पहले अच्छी तरह से तैयार करता है फिर उसमें सच्चे नाम का बीज बोता है। वहाँ नाम उगता है, (मानों) नौ खजाने पैदा हो जाते हैं, प्रभु की मेहर से (उस हृदय में की मेहनत) स्वीकार हो जाती है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर कउ जाणि न जाणई किआ तिसु चजु अचारु ॥ अंधुलै नामु विसारिआ मनमुखि अंध गुबारु ॥ आवणु जाणु न चुकई मरि जनमै होइ खुआरु ॥३॥
मूलम्
गुर कउ जाणि न जाणई किआ तिसु चजु अचारु ॥ अंधुलै नामु विसारिआ मनमुखि अंध गुबारु ॥ आवणु जाणु न चुकई मरि जनमै होइ खुआरु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जाणि = जानबूझ के। चजु अचारु = रवईआ। अंधुलै = अंधे ने। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाला। अंधु गुबारु = वह अंधा जिसके सामने घुप अंधेरा ही है। न चुकई = खतम नहीं होता।3।
अर्थ: जो मनुष्य जानबूझ के गुरु (की प्रतिभा) को नहीं समझता उसका सारा जीवन ढंग व्यर्थ है, (आत्मिक रौशनी के पक्ष से अगर परखें तो) उस अंधे ने प्रभु का नाम बिसारा है, अपने मन के पीछे चलने वाले के (जीवन में) अंधकार ही अंधकार रहता है। उसका जन्म-मरण का चक्कर नहीं खतम होता, वह नित्य पैदा होता है मरता है, पैदा होता है, मरता है, और खुआर होता रहता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
चंदनु मोलि अणाइआ कुंगू मांग संधूरु ॥ चोआ चंदनु बहु घणा पाना नालि कपूरु ॥ जे धन कंति न भावई त सभि अड्मबर कूड़ु ॥४॥
मूलम्
चंदनु मोलि अणाइआ कुंगू मांग संधूरु ॥ चोआ चंदनु बहु घणा पाना नालि कपूरु ॥ जे धन कंति न भावई त सभि अड्मबर कूड़ु ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मोलि = मूल्य दे के, खरीद के। अणाइआ = मंगाया। कुंगू = केसर। मांग = केसों के बीच बनाया हुआ चीर। चोआ = इत्र। धन = स्त्री। कंत न भावई = पति को अच्छी ना लगी। सभि = सारे।4।
अर्थ: (किसी स्त्री ने अपने पति को प्रसन्न करने के लिए अपने शारीरिक श्रृंगार के वास्ते) खरीद के चंदन मंगाया, केसर मंगाया, सिर के केसों को सुंदर बनाने के लिए मांग का सिंदूर मंगवाया, इत्र, चंदन व अन्य सुगन्धियां मंगवाईं, पान मंगवाए और कपूर मंगवाया, पर अगर वह स्त्री पति को (फिर भी) अच्छी ना लगी, तोउस के वह दिखावे के सारे उद्यम व्यर्थ हो गये, (आडंबर बनके रह गये)। (यही हाल जीव-स्त्री का है, पति-प्रभु दिखावे के धार्मिक कर्मों, उद्यमों से नहीं रीझता)।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभि रस भोगण बादि हहि सभि सीगार विकार ॥ जब लगु सबदि न भेदीऐ किउ सोहै गुरदुआरि ॥ नानक धंनु सुहागणी जिन सह नालि पिआरु ॥५॥१३॥
मूलम्
सभि रस भोगण बादि हहि सभि सीगार विकार ॥ जब लगु सबदि न भेदीऐ किउ सोहै गुरदुआरि ॥ नानक धंनु सुहागणी जिन सह नालि पिआरु ॥५॥१३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बादि = व्यर्थ। विकार = बेकार। धनु = धन्य, भाग्यशाली। सह नालि = खसम के साथ।5।
अर्थ: जब तक मनुष्य का मन गुरु के शब्द (तीर) से विच्छेदित नहीं होता, तब तक गुरु के दर पे शोभा नहीं मिलती, ऐसे मनुष्य के द्वारा बरते गये सारे सुंदर पदार्थ व्यर्थ चले जाते हैं (क्योंकि, पदार्तों को भोगने वाला शरीर तो आखिर में राख हो जाता है) सारी शारीरिक सजावटें भी बेकार हो जाती हैं। हे नानक! वही भाग्यशाली जीव-स्त्रीयां मुबारक हैं जिनका प्रभु-पति सेप्रेम बना रहता है।5।13।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ सुंञी देह डरावणी जा जीउ विचहु जाइ ॥ भाहि बलंदी विझवी धूउ न निकसिओ काइ ॥ पंचे रुंने दुखि भरे बिनसे दूजै भाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ सुंञी देह डरावणी जा जीउ विचहु जाइ ॥ भाहि बलंदी विझवी धूउ न निकसिओ काइ ॥ पंचे रुंने दुखि भरे बिनसे दूजै भाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुञीं = अकेली, उजड़ी हुई। देह = काया,शरीर। जा = जब। जीउ = जिंद, जान, जीवात्मा। भाहि = आग (जीवन-सत्ता)। विझवी = बुझ गई। धूअ = धूआं, स्वास। पंचे = पांचों ज्ञान-इंद्रिय। दूजे भाइ = माया के मोह में।1।
अर्थ: जब जीवात्मा शरीर में से निकल जाती है तो ये शरीर उजड़ जाता है, इससे डर लगने लग पड़ता है। जो जीवन-अग्नि (पहले इसमें) जलती थी वह बुझ जाती है (जीवन सत्ता समाप्त हो जाती है)। कोई भी श्वास नहीं आता जाता। (आंख, कान आदि) जो पाँचों ज्ञान-इंद्रिय (पर तन, निंदा आदि) माया के मोह में नाश होते रहे, वह भी दुखी हो हो के रोए (भाव, नकारे हो हो के मजबूर हो गए)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मूड़े रामु जपहु गुण सारि ॥ हउमै ममता मोहणी सभ मुठी अहंकारि ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मूड़े रामु जपहु गुण सारि ॥ हउमै ममता मोहणी सभ मुठी अहंकारि ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सारि = संभाल के, याद कर करके। सभ = सारी सृष्टि। मुठी = ठगी जा रही है। अहंकारि = अहंकार में।1। रहाउ।
अर्थ: हे मूर्ख जीव! (उस अंतिम दशा को सामने ला के) परमात्मा के गुण याद कर, प्रभु का नाम जप। सारी सृष्टि (गाफिल हो के) मोहनी माया की ममता में झूठे अहंकार में ठगी जा रही है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनी नामु विसारिआ दूजी कारै लगि ॥ दुबिधा लागे पचि मुए अंतरि त्रिसना अगि ॥ गुरि राखे से उबरे होरि मुठी धंधै ठगि ॥२॥
मूलम्
जिनी नामु विसारिआ दूजी कारै लगि ॥ दुबिधा लागे पचि मुए अंतरि त्रिसना अगि ॥ गुरि राखे से उबरे होरि मुठी धंधै ठगि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लगि = लग के। दुबिधा = दुचित्तापन, मेर तेर। पचि = खुआर हो के। मुए = आत्मिक जीवन गवा बैठे। गुरि = गुरु ने। उबरे = बच गए। मुठी = ठग ली। ठगि = ठग ने।2।
अर्थ: जिस लोगों ने और-और निरे दुनियावी कामों में लग के परमात्मा का नाम भुला दिया, वो सदा मेर-तेर में फंसे रहे, उनके अंदर तृष्णा की आग भड़कती रही, जिस में खिझ-जल के वो आत्मिक मौत मर गए। जिस की रक्षा गुरु ने की, वे तृष्णा की आग से बच गए। बाकी सभी को दुनिया के सारे ठगों ने ठग लिया।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मुई परीति पिआरु गइआ मुआ वैरु विरोधु ॥ धंधा थका हउ मुई ममता माइआ क्रोधु ॥ करमि मिलै सचु पाईऐ गुरमुखि सदा निरोधु ॥३॥
मूलम्
मुई परीति पिआरु गइआ मुआ वैरु विरोधु ॥ धंधा थका हउ मुई ममता माइआ क्रोधु ॥ करमि मिलै सचु पाईऐ गुरमुखि सदा निरोधु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुई = खतम हो गई। हउ = अहंकार। ममता माइआ = माया की ममता, माया जोड़ने की लालसा। करमि = (प्रभु की) मेहर से। गुरमुखि = गुरु के द्वारा। निरोधु = (विकारों से) रोक।3।
अर्थ: पर, जो गुरमुखि ज्ञान-इंद्रिय को सदा सयंम में रखता हैउसे प्रभु की कृपा से उस प्रभु का मिलाप हो जाता है, उसकी दुनियावी प्रीत खतम हो जाती है, उसका माया वाले पदार्तों से प्यार समाप्त हो जाता है। उसका किसी के साथ विरोध नहीं रह जाता। उसकी माया वाली दौड़-भाग खत्म हो जाती है, अहंकार मर जाता है, माया की ममता मर जाती है और क्रोध भी मरजाता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सची कारै सचु मिलै गुरमति पलै पाइ ॥ सो नरु जमै ना मरै ना आवै ना जाइ ॥ नानक दरि परधानु सो दरगहि पैधा जाइ ॥४॥१४॥
मूलम्
सची कारै सचु मिलै गुरमति पलै पाइ ॥ सो नरु जमै ना मरै ना आवै ना जाइ ॥ नानक दरि परधानु सो दरगहि पैधा जाइ ॥४॥१४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कारै = काम में (लग के)। पलै पाइ = प्राप्ति हो जाए। दरि = (प्रभु के) दर पे। परधानु = जाना माना, आजाद। पैधा = सरोपा ले के, आदर ले के।4।
अर्थ: जो मनुष्य (स्मरण की) सदा टिके रहने वाले कर्म में लगा रहता है उसको सदा स्थिर प्रभु मिल जाता है, उसको गुरु की शिक्षा प्राप्त हो जाती है। वह मनुष्य बार बार मरता पैदा नहीं होता। वह जनम मरन के चक्रव्यूह से बच जाता है। हे नानक! वह मनुष्य प्रभु के दर पे आजाद होता है और वह प्रभु की हजूरी में सरोपा ले के जाता है।4।14।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महल १ ॥ तनु जलि बलि माटी भइआ मनु माइआ मोहि मनूरु ॥ अउगण फिरि लागू भए कूरि वजावै तूरु ॥ बिनु सबदै भरमाईऐ दुबिधा डोबे पूरु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महल १ ॥ तनु जलि बलि माटी भइआ मनु माइआ मोहि मनूरु ॥ अउगण फिरि लागू भए कूरि वजावै तूरु ॥ बिनु सबदै भरमाईऐ दुबिधा डोबे पूरु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मोहि = मोह में। मनूर = जला हुआ लोहा, लोहे की मैल, जंग लगा। फिरि = फिर भी। लागू = वैरी। कूरि = झूठ में (मस्त रह के)। तूर = बाजा (विकारों का)। भरमाईऐ = भटकनों में पड़ा रहता है। दुबिधा = दो चित्ता पन। पूर = सारा परिवार (सारे ज्ञानेन्द्रिये)।1।
अर्थ: (जिसने नाम नहीं स्मरण किया, उसका) शरीर (विकारों में ही) जल के मिट्टी हो जाता है (व्यर्थ चला जाता है)। उसका मन माया के मोह में फंस के (मानो) जला हुआ लोहा बन जाता है। फिर भी विकार उसकी खलासी नहीं करते, वह अभी भी झूठ में मस्त रह के (माया के मोह का) बाजा बजाता है। गुरु शब्द से वंचित रह के वह भटकता रहता है। दुबिधा उस मनुष्य के (ज्ञानंन्द्रियों के) सारे ही परिवार को (मोह के समुंदर में) डुबा देती है।1
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे सबदि तरहु चितु लाइ ॥ जिनि गुरमुखि नामु न बूझिआ मरि जनमै आवै जाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे सबदि तरहु चितु लाइ ॥ जिनि गुरमुखि नामु न बूझिआ मरि जनमै आवै जाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सबदि = (गुरु के) शब्द में। जिनि = जिस मनुष्य ने। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ के।1। रहाउ।
अर्थ: हे (मेरे) मन! गुरु केशबद में चित्त जोड़ (और इस तरह संसार समुंदर के विकारों से) पार लांघ। जिस मनुष्य ने गुरु की शरण पड़ कर परमात्मा के नाम के साथ सांझ नहीं डाली, वह मरता है पैदा होता है, पैदा होता है मरता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तनु सूचा सो आखीऐ जिसु महि साचा नाउ ॥ भै सचि राती देहुरी जिहवा सचु सुआउ ॥ सची नदरि निहालीऐ बहुड़ि न पावै ताउ ॥२॥
मूलम्
तनु सूचा सो आखीऐ जिसु महि साचा नाउ ॥ भै सचि राती देहुरी जिहवा सचु सुआउ ॥ सची नदरि निहालीऐ बहुड़ि न पावै ताउ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सूचा = स्वच्छ, पवित्र। भै = भय, निर्मल डर में, अदब में। सचि = सदा स्थिर प्रभु की याद में। राती = रति हुई, रंगी हुई। देहुरी = सुंदर देह। सचु = सदा स्थिर प्रभु का नाम। सुआउ = स्वार्थ, उद्देश्य। निहालिऐ = देखा जाता है। न पावै ताउ = गरमी नहीं बर्दाश्त करता।2।
अर्थ: जो सुंदर शरीर परमात्मा के अदब-प्यार में परमात्मा की याद में रंगा रहता है, जिसकी जीभ को नाम जपना ही (अपने अस्तित्व का) असल उद्देश्य प्रतीत होता है, जिस शरीर में अडोल प्रभु का नाम टिका रहता है वही शरीर पवित्र कहला सकता है। जिस पे प्रभु के मेहर की नजर होती है, वह बार-बार (चौरासी के चक्कर की कुठाली में पड़ के) तपशनहीं सहता।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साचे ते पवना भइआ पवनै ते जलु होइ ॥ जल ते त्रिभवणु साजिआ घटि घटि जोति समोइ ॥ निरमलु मैला ना थीऐ सबदि रते पति होइ ॥३॥
मूलम्
साचे ते पवना भइआ पवनै ते जलु होइ ॥ जल ते त्रिभवणु साजिआ घटि घटि जोति समोइ ॥ निरमलु मैला ना थीऐ सबदि रते पति होइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साचे ते = सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा से। पवनै ते = पवन से। त्रिभवणु = सारा जगत (तीनों भवन)। साजिआ = रचा गया। समोइ = समाई हुई है। सबदि रते = गुर शब्द में रंगे रह के।3।
अर्थ: गुरु के शब्द में रंगे हुए को (लोक-परलोक) आदर मिलता है वह सदा पवित्र रहता है। उसे विकारों की मैल नहीं लगती। (उसे ये यकीन बना रहता है कि) परमात्मा से (सूक्ष्म तत्व) पवन बनी, पवन से जल अस्तित्व में आया, जल से ये सारा जगत रचा गया, (तथा, इस रचे संसार के) हरेक घट में परमात्मा की ज्योति समाई हुई है।3।
[[0020]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
इहु मनु साचि संतोखिआ नदरि करे तिसु माहि ॥ पंच भूत सचि भै रते जोति सची मन माहि ॥ नानक अउगण वीसरे गुरि राखे पति ताहि ॥४॥१५॥
मूलम्
इहु मनु साचि संतोखिआ नदरि करे तिसु माहि ॥ पंच भूत सचि भै रते जोति सची मन माहि ॥ नानक अउगण वीसरे गुरि राखे पति ताहि ॥४॥१५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पंच भूत = पाँचों तत्व, सारा शरीर। गुरि = गुरु ने। ताहि = उसकी।4।
अर्थ: हे नानक! जिस मनुष्य की गुरु ने रक्षा की, उसको (लोक-परलोक) में इज्जत मिली। विकार उस से परे हट गये, उसका मन अडोल प्रभु में टिक के संतोष की धारणी हो जाता है। उस पे प्रभु की मेहर की नजर बनी रहती है। उसका सारा शरीर प्रभु की याद में प्रभु के अदब में रंगा रहता है। सदा स्थिर प्रभु की ज्योति सदा उसके मन में टिकी रहती है।4।15।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ नानक बेड़ी सच की तरीऐ गुर वीचारि ॥ इकि आवहि इकि जावही पूरि भरे अहंकारि ॥ मनहठि मती बूडीऐ गुरमुखि सचु सु तारि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ नानक बेड़ी सच की तरीऐ गुर वीचारि ॥ इकि आवहि इकि जावही पूरि भरे अहंकारि ॥ मनहठि मती बूडीऐ गुरमुखि सचु सु तारि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नानक = हे नानक! सच = सदा स्थिर प्रभु का नाम स्मरण। गुर वीचारि = गुरु की बताई विचार के द्वारा, गुरु के बताए उपदेश का आसरा ले के। इकि = अनेक जीव। पूर = बेअंत जीव (भरी हुई नाव के सारे मुसाफिरों के समूह को ‘पूर’ कहते हैं)। भरे अहंकारि = अहंकार से भरे हुए, अहंकारी। मन हठि = मन के हठ में। मन हठि मती = हठ बुद्धि से, अपनी अक्ल के हठ पे चलने से। गुरमुखि = वह मनुष्य जो गुरु का आसरा लेता है। तारि = तैरा लेता है,तैराना।1।
अर्थ: हे नानक! (संसार एक अथाह समुंदर है) अगर गुरु की शिक्षा पर चल के नाम जपने की किश्ती बना लें तो (इस संसार समुंदर से) पार हो सकते हैं। पर अनेक ही अहंकारी जीव है (जो अपनी ही अक्ल पे गर्व में रहके कुराहे पड़ के) पैदा होते हैं और मरते हैं (जनम मरन के चक्रव्यूह में फंसे रहते हैं) अपनी अक्ल के हठ पर चलने से (संसार समुंदर के विकारों में) मनुष्य डूबता ही है। जो मनुष्य गुरु की राह पर चलता है उस को परमात्मा पार लंघा लेता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर बिनु किउ तरीऐ सुखु होइ ॥ जिउ भावै तिउ राखु तू मै अवरु न दूजा कोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
गुर बिनु किउ तरीऐ सुखु होइ ॥ जिउ भावै तिउ राखु तू मै अवरु न दूजा कोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: किउ तरीऐ = नहीं तैरा जा सकता।1। रहाउ।
अर्थ: गुरु की शरण के बिना ना ही (इस संसार समुंदर से) पार लांघ सकते है, ना ही आत्मिक आनंद ही मिलता है। (इस वास्ते, हे मन! प्रभु दर पे अरदास कर और कह: हे प्रभु!) जैसे भी हो सके तू मुझे (गुरु की शरण में) रख, (इस संसार सागर से पार लंघाने के वास्ते) मुझे कोई और (आसरा) नहीं सूझता।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आगै देखउ डउ जलै पाछै हरिओ अंगूरु ॥ जिस ते उपजै तिस ते बिनसै घटि घटि सचु भरपूरि ॥ आपे मेलि मिलावही साचै महलि हदूरि ॥२॥
मूलम्
आगै देखउ डउ जलै पाछै हरिओ अंगूरु ॥ जिस ते उपजै तिस ते बिनसै घटि घटि सचु भरपूरि ॥ आपे मेलि मिलावही साचै महलि हदूरि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आगै = सामने की ओर। डउ = जंगल की आग। डउ जले = मसाणों की आग जल रही है,बेअंत जीव मर रहे हैं। हरिओ अंगूर = हरे नए नए कोमल पौधे, नवजन्मा बच्चा। जिस ते = जिस परमात्मा से। सचु = सदा-स्थिर प्रभु। मिलावही = (हे प्रभु!) तू मिला लेता है। महलि = महल में।2।
अर्थ: (जगत एक जंगल के समान है जिस में आगे आगे तो आग लगी हुई है जो पले पलाए बड़े बड़े वृक्षों को जलाती जा रही है; और पीछे पीछे नये नये कोमल पौधे उगते जा रहे हैं), पीछे पीछे नये कोमल बच्चे पैदा होते आ रहे हैं। जिस परमात्मा से यह जगत पैदा होता जाता है, उसी के (हुक्म) अनुसार नाश भी होता रहता है। और, सदा स्थिर प्रभु हरेक शरीर में प्रचुर लबलब भरपूर है। हे प्रभु! तू खुद ही जीवों को अपने चरणों में जोड़ता है, तू खुद ही अपने सदा स्थिर महल में हजूरी में रखता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साहि साहि तुझु समला कदे न विसारेउ ॥ जिउ जिउ साहबु मनि वसै गुरमुखि अम्रितु पेउ ॥ मनु तनु तेरा तू धणी गरबु निवारि समेउ ॥३॥
मूलम्
साहि साहि तुझु समला कदे न विसारेउ ॥ जिउ जिउ साहबु मनि वसै गुरमुखि अम्रितु पेउ ॥ मनु तनु तेरा तू धणी गरबु निवारि समेउ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साहि = साँस से। साहि साहि = हरेक साँस से। संमला = संमलां, मैं याद करूँ। मनि = मन में। पेउ = पीऊँ, मैं पीऊँ। धणी = मालिक, खसम। गरबु = अहंकार। निवारि = दूर करके। समेउ = समा जाऊँ, लीन रहूँ।3।
अर्थ: (हे प्रभु! मेहर कर) मैं हरेक साँस के साथ तुझे याद करता रहूँ, तुझे कभी भी ना भुलाऊँ। (हे भाई! अगर मालिक प्रभु की मेहर हो तो) गुरु की शरण पड़ के (वह) ज्यों-ज्यों मालिक (मेरे) मन में बसता जाए, और मैं आत्मिक जीवन देने वाला (उसका) नाम-जल पीता रहूँ। (हे प्रभु! मेरा) मन (मेरा) तन, तेरा ही दिया हुआ है, तू ही मेरा मालिक है। (मेहर कर, मैं अपने अंदर से) अहंकार दूर करके (तेरी याद में) लीन रहूँ।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनि एहु जगतु उपाइआ त्रिभवणु करि आकारु ॥ गुरमुखि चानणु जाणीऐ मनमुखि मुगधु गुबारु ॥ घटि घटि जोति निरंतरी बूझै गुरमति सारु ॥४॥
मूलम्
जिनि एहु जगतु उपाइआ त्रिभवणु करि आकारु ॥ गुरमुखि चानणु जाणीऐ मनमुखि मुगधु गुबारु ॥ घटि घटि जोति निरंतरी बूझै गुरमति सारु ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिनि = जिस (प्रभु) ने। त्रिभवणु = तीनों भवन। आकारु = दिखता जगत। चानणु = ज्योति-रूप प्रभु। मुगधु = मूर्ख। गुबार = अंधेरा। निरंतरि = (निर+अंतर निर = बगैर, अंतर = दूरी), दूरी के बिना, एकरस। सारु = असलीयत।4।
अर्थ: जिस (ज्योति-स्वरूप प्रभु) ने यह जगत पैदा किया है, ये त्रिभवणी स्वरूप बनाया है, गुरु की शरण पड़ने से उस ज्योति से सांझ बनाई जा सकती है (उससे संपर्क साधा जा सकता है)। पर अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को ये ज्याति नहीं दिखती, उसे तो आत्मिक अंधकार ही अंधकार है। (यद्यपि) ईश्वरीय-ज्योति हरेक शरीर में एकरस व्यापक है, (पर) गुरु के मार्ग दर्शन से ही (गुरु की मति लेने से ये) असलियत समझी जा सकती है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखि जिनी जाणिआ तिन कीचै साबासि ॥ सचे सेती रलि मिले सचे गुण परगासि ॥ नानक नामि संतोखीआ जीउ पिंडु प्रभ पासि ॥५॥१६॥
मूलम्
गुरमुखि जिनी जाणिआ तिन कीचै साबासि ॥ सचे सेती रलि मिले सचे गुण परगासि ॥ नानक नामि संतोखीआ जीउ पिंडु प्रभ पासि ॥५॥१६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु के द्वारा, गुरु की शरण पड़ के। कीचै = की जाती है, मिलती है। सेती = नाल। सचे गुण = सदा स्थिर रहने वाले प्रभु के गुण। नामि = नाम में (जुड़ के)। संतोखीआ = आत्मिक शांति प्राप्त होती है। जीउ = जीवात्मा। पिंड = शरीर। प्रभ पासि = प्रभु के हवाले करते (हैं)।5।
अर्थ: जो मनुष्यों ने गुरु की शरण पड़ के सर्व-व्यापी ज्योति से सांझ बना ली, उन्हें साबाश मिलती है। वे सदा स्थिर प्रभु के साथ ऐक-मेक हो जाते हैं, सदा स्थिर प्रभु के गुण उनमें अंकुरित हो उठते हैं। हे नानक! नाम में जुड़ के वे मनुष्य आत्मिक शांति का आनंद लेते हैं, वे अपनी जीवात्मा अपना शरीर प्रभु के हवालेकिए रहते हैं।5।16।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ सुणि मन मित्र पिआरिआ मिलु वेला है एह ॥ जब लगु जोबनि सासु है तब लगु इहु तनु देह ॥ बिनु गुण कामि न आवई ढहि ढेरी तनु खेह ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ सुणि मन मित्र पिआरिआ मिलु वेला है एह ॥ जब लगु जोबनि सासु है तब लगु इहु तनु देह ॥ बिनु गुण कामि न आवई ढहि ढेरी तनु खेह ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जोबनि = जवानी में। जब लग = जब तक। देह = शरीर। आवई = आए, आता। ढहि = गिर के। ढेरी खेह = राख/मिट्टी की ढेरी।1।
अर्थ: हे प्यारे मित्र मन! (मेरा उपदेश) सुन। परमात्मा को मिल, (मिलने का) यही (मानव जन्म) ही समय है। जब तक जवानी में (हूँ, और) सांस चल रही है, तब तक ये शरीर काम दे रहा है। यदि प्रभु के गुण अपने अंदर ना बसाए, तो ये शरीर किस काम का? ये तो आखिर गिर के मिट्टी की ढेरी ही हो जाएगा।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन लै लाहा घरि जाहि ॥ गुरमुखि नामु सलाहीऐ हउमै निवरी भाहि ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन लै लाहा घरि जाहि ॥ गुरमुखि नामु सलाहीऐ हउमै निवरी भाहि ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लाहा = लाभ। लै = लेकर। घरि = (अपने) घर में। निवरी = निरर्विति, दूर हो जाएगी। भाहि = आग।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! (यहाँ से आत्मिक) लाभ कमा के (अपने परलोक) घर में जा। गुरु की शरण पड़ कर (यहाँ) प्रभु का नाम सलाहना चाहिए। नाम की इनायत से अहंकार की आग अंदर से मिट जाती है (आग ये कि मैं बड़ा हूँ, मैं बड़ा बन जाऊँ- बुझ जाती है)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुणि सुणि गंढणु गंढीऐ लिखि पड़ि बुझहि भारु ॥ त्रिसना अहिनिसि अगली हउमै रोगु विकारु ॥ ओहु वेपरवाहु अतोलवा गुरमति कीमति सारु ॥२॥
मूलम्
सुणि सुणि गंढणु गंढीऐ लिखि पड़ि बुझहि भारु ॥ त्रिसना अहिनिसि अगली हउमै रोगु विकारु ॥ ओहु वेपरवाहु अतोलवा गुरमति कीमति सारु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुणि = सुन के। गंढणु गंढीऐ = गाँठे बाँधनी, व्यर्थ के प्रयत्न करने, लोगों को रिझाने वाला उद्यम करना। लिखि = लिख के। बुझहि = विचारते है। भारु = पुस्तकों का भार, बहुत पुस्तकें। अहि = दिन। निसि = रात। अगली = बहुत। अतोलवा = जो तौला ना जा सके। जिसके बराबर ना ढूँढा जा सके। सारु = संभाल, समझ के। कीमति = कद्र।2।
अर्थ: (पढ़े-लिखे लोग) बेअंत पुस्तकें लिख लिख के पढ़-पढ़ के विचारते हैं, (ज्ञान की बातें) सुन-सुन के लोगों की नजरों में विचारवान (दिखने का) व्यर्थ प्रयत्न करते हैं। परअंदर से दिन रात त्रिष्णा व्याप रही है। अहम् रोग, अहंकार के विकार अंदर (कायम) है। (दूसरी तरफ) वह परमात्मा (इस थोथी ज्ञान चातुर्य की) परवाह नहीं करता, (हमारे ज्ञान) उस को तौल भी नहीं सकते। (इसलिए) गुरु की मति ले के उस की कद्र समझ।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
लख सिआणप जे करी लख सिउ प्रीति मिलापु ॥ बिनु संगति साध न ध्रापीआ बिनु नावै दूख संतापु ॥ हरि जपि जीअरे छुटीऐ गुरमुखि चीनै आपु ॥३॥
मूलम्
लख सिआणप जे करी लख सिउ प्रीति मिलापु ॥ बिनु संगति साध न ध्रापीआ बिनु नावै दूख संतापु ॥ हरि जपि जीअरे छुटीऐ गुरमुखि चीनै आपु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करी = करना, मैं करूँ। सिउ = साथ। ध्रापीआ = भूख मिटती, तसल्ली होती। बिनु नावै = प्रभु का नाम जपने के बिना। संताप = कष्ट। जीअ रे! = हे जीवात्मा! चीनै = पहचानता है। आपु = खुद को।3।
अर्थ: यदि मैं लाख चतुराईआं करूँ, अगर मैं लाखों लोगों के साथ प्रीत करूँ, मिलाप पैदा करूँ, गुरु की संगत के बिना अंदर की तृष्णा खतम नहीं होती। प्रभु का नाम जपे बिना दुख-कष्ट बना ही रहता है। हे मेरी जीवात्मा! परमात्मा का नाम जप के ही (इस तृष्णा से) मुक्ति मिल सकती है। (क्यूँकि) जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ करनाम जपता है, वह अपने असल को पहचान लेता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तनु मनु गुर पहि वेचिआ मनु दीआ सिरु नालि ॥ त्रिभवणु खोजि ढंढोलिआ गुरमुखि खोजि निहालि ॥ सतगुरि मेलि मिलाइआ नानक सो प्रभु नालि ॥४॥१७॥
मूलम्
तनु मनु गुर पहि वेचिआ मनु दीआ सिरु नालि ॥ त्रिभवणु खोजि ढंढोलिआ गुरमुखि खोजि निहालि ॥ सतगुरि मेलि मिलाइआ नानक सो प्रभु नालि ॥४॥१७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पाहि = पास। वेचिआ = (नाम के बदले) हवाले कर दिया। नालि = भी। खोजि = खोज के। गुरमुखि = गुरु के द्वारा। निहालि = निहालना, देख लिया। सतिगुरि = सतिगुरु ने। मेलि = (अपने चरणों में) मिला के।4।
अर्थ: जिस मनुष्य ने (नाम के बदले) अपना तन और अपना मनगुरू के हवाले कर दिया, जिसने मन हवाले किया और सिर भी हवाले कर दिया, उसने गुरु के द्वारा खोज करके उस प्रभु को (अपने अंदर ही) देख लिया, जिसको ढूँढने के लिए सारा जहान तलाश लिया था। हे नानक! शरण आए को गुरु ने अपने चरणों में जोड़ के प्रभु से मिला दिया, और वह प्रभु (अपने अंदर) अंग-संग ही दिखा दिया।4।17।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ मरणै की चिंता नही जीवण की नही आस ॥ तू सरब जीआ प्रतिपालही लेखै सास गिरास ॥ अंतरि गुरमुखि तू वसहि जिउ भावै तिउ निरजासि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ मरणै की चिंता नही जीवण की नही आस ॥ तू सरब जीआ प्रतिपालही लेखै सास गिरास ॥ अंतरि गुरमुखि तू वसहि जिउ भावै तिउ निरजासि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सास = साँस। गिरास = ग्रास, खाना खाते मुंह में डाला जाने वाला कौर। निरजासु = देखता है, संभाल करता है।1।
अर्थ: (जो मनुष्य गुरु के संमुख रहता है, नाम जपने की बरकत से उसको) मौत का डर नहीं रहता, और-और लम्बी उम्र की वो आकांक्षाएं नहीं बनाता, (उसे यकीन होता है कि हे प्रभु!) तू सारे जीवों की पालना करता है, जीवों के हरेक स्वास हरेक ग्रास तेरे हिसाब में (तेरी नजर में) है। (हे प्रभु!) गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य के अंदर तू प्रगट हो जाता है, (उसको ये यकीन बना रहता है कि) जैसे तेरी रजा है तैसे ही तू (सभ की) संभाल करता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जीअरे राम जपत मनु मानु ॥ अंतरि लागी जलि बुझी पाइआ गुरमुखि गिआनु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
जीअरे राम जपत मनु मानु ॥ अंतरि लागी जलि बुझी पाइआ गुरमुखि गिआनु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जीअ रे = हे (मेरी) जीवात्मा! मानु = मनाओ। जलि = जलन। गिआनु = जान पहिचान, सांझ।1। रहाउ।
अर्थ: हे (मेरी) जीवात्मा! (ऐसा उद्यम कर कि) प्रमात्मा का नाम स्मरण करते स्मरण करते मन (स्मरण में) पसीज जाए। गुरु की शरण पड़ के (स्मरण के द्वारा) जिस मनुष्य ने परमात्मा के साथ गहरी सांझ बना ली है, उसके अंदर की तृष्णा की जलन बुझ जाती है।1। रहाउ।
[[0021]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
अंतर की गति जाणीऐ गुर मिलीऐ संक उतारि ॥ मुइआ जितु घरि जाईऐ तितु जीवदिआ मरु मारि ॥ अनहद सबदि सुहावणे पाईऐ गुर वीचारि ॥२॥
मूलम्
अंतर की गति जाणीऐ गुर मिलीऐ संक उतारि ॥ मुइआ जितु घरि जाईऐ तितु जीवदिआ मरु मारि ॥ अनहद सबदि सुहावणे पाईऐ गुर वीचारि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गति = हालत। गुर मिलीऐ = गुरु को मिलना चाहिए। संक उतारि = शंका उतार के, पूरी श्रद्धा से। जितु घरि = जिस घर में। मुइआ = मर के, आखिर को। मुइआ जितु घरि जाईऐ = जिस मौत के वश अंत को पड़ना है। मरु = मौत, मौत का डर। मारि = मार लेते हैं। अनहद = (हन = मारना,चोट मारनी) बिना चोट लगाए बजने वाला, एकरस। सबदि = शब्द के द्वारा। गुर वीचारि = गुरु की बताई विचार से, गुरु की शिक्षा पर चल के।2।
अर्थ: पूरी श्रद्धा के साथ गुरु की शरण पड़ जाना चाहिए, (इस तरह) अंदर बसते प्रमात्मा की समझ आ जाती है। मरने से पहले ही उस मौत का डर मर जाता है, जिस मौत के वश आखिर में पड़ना ही होता है। (पर ये अवस्था तभी) प्राप्त होती है जब गुरु की बताई शिक्षा पर चलें, और (प्रभु की महिमा वाले) सुंदर शब्द में एकरस जुड़े रहें।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अनहद बाणी पाईऐ तह हउमै होइ बिनासु ॥ सतगुरु सेवे आपणा हउ सद कुरबाणै तासु ॥ खड़ि दरगह पैनाईऐ मुखि हरि नाम निवासु ॥३॥
मूलम्
अनहद बाणी पाईऐ तह हउमै होइ बिनासु ॥ सतगुरु सेवे आपणा हउ सद कुरबाणै तासु ॥ खड़ि दरगह पैनाईऐ मुखि हरि नाम निवासु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अनहद बाणी = एक रस महिमा करने वाली अवस्था। बाणी = महिमा। तह = वहां,उस अवस्था में। तासु = उस से। खड़ि = ले जा के,पहुँचा के। पैनाईऐ = सरोपे से आदर किया जाता है। मुखि = (जिस के) मुंह में।3।
अर्थ: जब एकरस महिमा कर सकने वाली अवस्था प्राप्त हो जाए, तो उस अवस्था में (मनुष्य के अंदर के) अहम् का नाश हो जाता है (मैं बड़ा हूँ, मैं बड़ा हो जाऊँ-ये हो खतम हो जाती है)। मैं सदा सदके हूँ उस मनुष्य के जो अपने गुरु की सेवा करता है (भाव, गुरु के बताए मार्ग पर चलता है), उसके मुंह में सदा प्रभु का नाम बसता है। उसे प्रभु की हजूरी में जा के आदर मिलता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जह देखा तह रवि रहे सिव सकती का मेलु ॥ त्रिहु गुण बंधी देहुरी जो आइआ जगि सो खेलु ॥ विजोगी दुखि विछुड़े मनमुखि लहहि न मेलु ॥४॥
मूलम्
जह देखा तह रवि रहे सिव सकती का मेलु ॥ त्रिहु गुण बंधी देहुरी जो आइआ जगि सो खेलु ॥ विजोगी दुखि विछुड़े मनमुखि लहहि न मेलु ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देखा = मैं देखता हूँ। रवि रहे = मशगूल हैं, व्यस्त रहता है। सिव = जीवात्मा। सकती = माया। त्रिह गुण = माया के तीनों गुणों में। बंधी = बंधी हुई। जगि = जगत में। विजोग = बिछुड़े हुए। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाला। न लहहि = नहीं लेते, ले नहीं सकते।4।
अर्थ: (पर संसार की हालत और तरह की बन रही है) मैं जिधर देखता हूँ उधर ही (मनमुख) जीव माया में मस्त हो रहे हैं। (हर तरफ) माया और जीवों का गठजोड़ बना हुआ है। मनमुखों का शरीर माया के तीन गुणों में बंधा हुआ है। अपने मन के पीछे चलने वाले जो भी जीव जगत में आयेवो यही खेल खेलते रहे। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग परमात्मा से मिलाप हासिल नहीं कर सकते, क्योंकि वे विछुड़े हुए (सदा) बिछुड़े ही रहते हैं और हमेशा दुख पाते हैं।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनु बैरागी घरि वसै सच भै राता होइ ॥ गिआन महारसु भोगवै बाहुड़ि भूख न होइ ॥ नानक इहु मनु मारि मिलु भी फिरि दुखु न होइ ॥५॥१८॥
मूलम्
मनु बैरागी घरि वसै सच भै राता होइ ॥ गिआन महारसु भोगवै बाहुड़ि भूख न होइ ॥ नानक इहु मनु मारि मिलु भी फिरि दुखु न होइ ॥५॥१८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बैरागी = माया से वैरागी। घरि = घर में, अपने स्वरूप में। सच भै = सच के निर्मल भय में। राता = रंगा हुआ। भोगवै = भोगता है। भूख = तृष्णा, लालच। मारि = मार के, बस में करके।5।
अर्थ: (माया से) वैरागा हुआ मन (भटकनों से बचा रह के) अपने स्वरूप में ही टिका रहता है, (क्योंकि) वह परमात्मा के अदब में रंगा रहता है। वह मन (सदा) परमात्मा के साथ गहरी सांझ का आनंद लेता है, और उसे पुनः माया की तृष्णा नहीं सताती।
हे नानक! तू भी इस मन को (माया के मोह से) मार के (प्रभु चरणों में) जुड़ारह, फिर कभी (तुझे प्रभु से विछुड़ने का) संताप नहीं व्यापेगा।5।18।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ एहु मनो मूरखु लोभीआ लोभे लगा लुोभानु ॥ सबदि न भीजै साकता दुरमति आवनु जानु ॥ साधू सतगुरु जे मिलै ता पाईऐ गुणी निधानु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ एहु मनो मूरखु लोभीआ लोभे लगा लुोभानु ॥ सबदि न भीजै साकता दुरमति आवनु जानु ॥ साधू सतगुरु जे मिलै ता पाईऐ गुणी निधानु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लोभे = लोभ में ही। मनो = मन। सबदि = शब्द में। न भीजै = पतीजता नहीं। साकता = माया में लिप्त। दुरमति = बुरी मति के कारण। आवनु जानु = जनम मरन का चक्र। साधू = गुरु। गुणी निधानु = गुणों का खजाना, परमात्मा।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘लुोभानु’ में अक्षर ‘ल’ के साथ दो मात्राएं हैं: ‘ु’ और ‘ो’। असल शब्द ‘लोभानु’ है, पर यहां तुक की चाल ठीक करने के लिए ‘ो’ की जगह ‘ु’ का इस्तेमाल करके ‘लुभान’ पढ़ना है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: पर माया में लिप्त मनुष्य का ये मन मूर्ख है लालची है, हर वक्त लोभ में फंसा रहता है। गुरु के शब्द में इसकी रुचि ही नहीं बनती। इस कुमति के कारण जनम मरन का चक्र बना रहता है। अगर इसे गुरु सतिगुरु मिल जाए, तो गुणों का खजाना प्रभु इसे मिल जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे हउमै छोडि गुमानु ॥ हरि गुरु सरवरु सेवि तू पावहि दरगह मानु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे हउमै छोडि गुमानु ॥ हरि गुरु सरवरु सेवि तू पावहि दरगह मानु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सरवरु = श्रेष्ठ तालाब।1। रहाउ।
अर्थ: हे (मेरे) मन! मैं (ही चतुर सुजान) हूँ, मैं (ही चतुर सुजान) हूँ- यह अहंकार छोड़, और परमात्मा रूप गुरु की शरण पड़ जो (आत्मा को पवित्र करने वाला) सरोवर है। (इस तरह) प्रभु की हजूरी में आदर हासल करेगा।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
राम नामु जपि दिनसु राति गुरमुखि हरि धनु जानु ॥ सभि सुख हरि रस भोगणे संत सभा मिलि गिआनु ॥ निति अहिनिसि हरि प्रभु सेविआ सतगुरि दीआ नामु ॥२॥
मूलम्
राम नामु जपि दिनसु राति गुरमुखि हरि धनु जानु ॥ सभि सुख हरि रस भोगणे संत सभा मिलि गिआनु ॥ निति अहिनिसि हरि प्रभु सेविआ सतगुरि दीआ नामु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु के चरण पड़ के। जानु = पहचान, सांझ डाल। सभि = सारे। मिलि = मिल के। गिआनु = गहरी सांझ। अहि = दिन। निसि = रात। सतिगुरि = सतिगुर ने।2।
अर्थ: हे मन! प्रमात्मा का नाम दिन रात जपा कर। गुरु की शरण पड़ के हरि नाम धन की कद्र समझ। साधु-संगत में मिल के हरि-नाम के साथ सांझ डाल, सारे आत्मिक आनन्द प्राप्त हो जाएंगे। (पर जिसको) सतिगुरु ने नाम की दात बख्शी, उसी ने सदा दिन-रात हरि प्रभु का स्मरण किया है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कूकर कूड़ु कमाईऐ गुर निंदा पचै पचानु ॥ भरमे भूला दुखु घणो जमु मारि करै खुलहानु ॥ मनमुखि सुखु न पाईऐ गुरमुखि सुखु सुभानु ॥३॥
मूलम्
कूकर कूड़ु कमाईऐ गुर निंदा पचै पचानु ॥ भरमे भूला दुखु घणो जमु मारि करै खुलहानु ॥ मनमुखि सुखु न पाईऐ गुरमुखि सुखु सुभानु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कूकर = कुत्ता। पचै = खुआर होता है। पचै पचानु = हर वक्त खुआर ही होता रहता है, पचता ही पचता है। घणों = बहुत। मारि = मार मार के। खुलहानु करै = (जैसे खलियान में किसान कूट कूट के धान का छिलका निकालाता है उसका), भोह/भूसा कर देता है। खुलहानु = खुलना, गहरी अप्रगट चोटें मारनी। सुभानु = सुबहान, आश्चर्य।3।
अर्थ: जो मनुष्य अपने लोभी मन के पीछे चलता हैवह कुत्तों की तरह (टुकड़े-टुकड़े के वास्ते दर-दर भटकता) है, वह सदा माया वाली दौड़-भाग ही करता है। (यहां तक नीचे गिर जाता है कि) गुरु की निंदा में हर वक्त खुआर होता है। माया वाली भटकन में गलत रास्ते पर पड़ता है, बहुत दुख पाता है, (आखिर) यमराज उसे गहरी मार मार के उसका भूसा बना देता है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य कभी सुख नहीं पाता, पर गुरु की शरण में पड़ते सार ही आश्चर्यजनक आत्मिक आनन्द की प्राप्ति होती है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ऐथै धंधु पिटाईऐ सचु लिखतु परवानु ॥ हरि सजणु गुरु सेवदा गुर करणी परधानु ॥ नानक नामु न वीसरै करमि सचै नीसाणु ॥४॥१९॥
मूलम्
ऐथै धंधु पिटाईऐ सचु लिखतु परवानु ॥ हरि सजणु गुरु सेवदा गुर करणी परधानु ॥ नानक नामु न वीसरै करमि सचै नीसाणु ॥४॥१९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ऐथै = इस लोक में, इस जनम में। धंधु = जंजाल। धंधु पिटाईऐ = दुनिया के ही जंजालों में ही खचित रहते हैं। गुर करणी = गुरु वाली करनी। परधानु = श्रेष्ठ। करमि = बख्शिश से। करमि सचै = सदा स्थिर प्रभु की मेहर से। नीसाणु = परवाना, लेख।4।
अर्थ: (लोभी मनुष्य) इस लोक में दुनिया के जंजालों में खचित रहता है, (पर प्रभु की हजूरी में) स्मरण का लेखा स्वीकार होता है। गुरु असल मित्र परमात्मा का स्मरण करता है (और-और लोगों को भी यही प्रेरणा करता है)। गुरु वाली ये करनी (दरगाह में) स्वीकार है मानी जाती है। हे नानक! सदा कायम रहने वाले प्रभु की मेहर से (जिस मनुष्य के मस्तक पे) लेख उघड़ता है उसे कभी प्रभु का नाम नहीं भूलता।4।19।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ इकु तिलु पिआरा वीसरै रोगु वडा मन माहि ॥ किउ दरगह पति पाईऐ जा हरि न वसै मन माहि ॥ गुरि मिलिऐ सुखु पाईऐ अगनि मरै गुण माहि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ इकु तिलु पिआरा वीसरै रोगु वडा मन माहि ॥ किउ दरगह पति पाईऐ जा हरि न वसै मन माहि ॥ गुरि मिलिऐ सुखु पाईऐ अगनि मरै गुण माहि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: इकु तिलु = रत्ती भर समय भी। माहि = में। पति = इज्जत। गुरि मिलिऐ = अगर गुरु मिल जाए। अगनि = तृष्णा की आग।1।
अर्थ: (ऐसे भाग्यशाली लोगों को) जो रत्ती भर समय के लिए भी प्रीतम प्रभु विसर जाए, तो वह अपने मन में बड़ा रोग (पैदा हो गया समझते हैं)। (वैसे भी) यदि परमात्मा के नाम मन में ना बसे, तो परमात्मा की दरगाह में इज्जत नहीं मिल सकती। अगर गुरु मिल जाए (तो वह प्रभु की महिमा की दात देता है, इसकी बरकत से) आत्मिक आनंद प्राप्त होता है (क्योंकि) महिमा में जुड़ने से तृष्णा की आग बुझ जाती है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे अहिनिसि हरि गुण सारि ॥ जिन खिनु पलु नामु न वीसरै ते जन विरले संसारि ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे अहिनिसि हरि गुण सारि ॥ जिन खिनु पलु नामु न वीसरै ते जन विरले संसारि ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अहि निसि = दिन रात। सारि = संभाल, याद कर। जिन = जो लोगों को
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘जिन’ बहुवचन है, इसका एकवचन ‘जिनि’ है, जिसका अर्थ है: जिसने।
दर्पण-भाषार्थ
ते जन = वे लोग।1। रहाउ।
अर्थ: हे (मेरे) मन! दिन रात (हर समय) परमात्मा के गुण याद करता रह। जगत में वे (भाग्यशाली) मनुष्य कम ही होते हैं जिस को प्रभु का नाम छिनमात्र भी नहीं भूलता।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जोती जोति मिलाईऐ सुरती सुरति संजोगु ॥ हिंसा हउमै गतु गए नाही सहसा सोगु ॥ गुरमुखि जिसु हरि मनि वसै तिसु मेले गुरु संजोगु ॥२॥
मूलम्
जोती जोति मिलाईऐ सुरती सुरति संजोगु ॥ हिंसा हउमै गतु गए नाही सहसा सोगु ॥ गुरमुखि जिसु हरि मनि वसै तिसु मेले गुरु संजोगु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जोती = ज्योति का मालिक हरि। सुरती = ध्यान का मालिक प्रभु। हिंसा = निर्दयता। गतु = (धातु ‘गम’ का भूतकाल। गम = जाना) बीता हुआ। गतु गए = पूर्ण तौर पे दूर हो गए। मनि = मन में। संजोगु = अवसर, मौका।2।
अर्थ: अगर प्रभु की ज्योति में अपनी जीवात्मा मिला दें, उस में अपनी तवज्जो का मेल कर दें तो कठोरता और अहम् दूर हो जाते हैं, कोई सहम व चिन्ता भी नहीं रह जाती। गुरु की शरण में पड़ कर जिस मनुष्य के मन में प्रभु की याद टिकती है, गुरु उसको परमात्मा के साथ मिलने का पूरा अवसर प्रदान करता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
काइआ कामणि जे करी भोगे भोगणहारु ॥ तिसु सिउ नेहु न कीजई जो दीसै चलणहारु ॥ गुरमुखि रवहि सोहागणी सो प्रभु सेज भतारु ॥३॥
मूलम्
काइआ कामणि जे करी भोगे भोगणहारु ॥ तिसु सिउ नेहु न कीजई जो दीसै चलणहारु ॥ गुरमुखि रवहि सोहागणी सो प्रभु सेज भतारु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कामणि = स्त्री। काइआ = काया,शरीर। करी = मैं करूँ। न कीजई = नहीं करना चाहिए। रवहि = रति रहना, मिलाप का सुख पाती हैं। सोहागणी = भाग्यशाली जीव-स्त्रीयां। सेज भतारु = (हृदय) सेज का पति।3।
अर्थ: जैसे स्त्री अपने आप को अपने पति के हवाले करती है, वैसे ही मैं काया को स्त्री बनाऊँ, काया स्त्री (भाव, ज्ञान-इंद्रिय) को प्रभु की ओर करूँ, तो प्रभु पति का मिलाप हो। इस शरीर से इतना मोह नहीं करना चाहिए (कि इसे विकारों की ओर आजादी मिली रहे), यह तो प्रत्यक्ष तौर पर नाशवान है। गुरु के राह पर चलने वाली जीव-स्त्रीयां प्रभु को सिमरती हैं, और वह प्रभु उनके हृदय सेज पर बैठता है।3।
[[0022]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
चारे अगनि निवारि मरु गुरमुखि हरि जलु पाइ ॥ अंतरि कमलु प्रगासिआ अम्रितु भरिआ अघाइ ॥ नानक सतगुरु मीतु करि सचु पावहि दरगह जाइ ॥४॥२०॥
मूलम्
चारे अगनि निवारि मरु गुरमुखि हरि जलु पाइ ॥ अंतरि कमलु प्रगासिआ अम्रितु भरिआ अघाइ ॥ नानक सतगुरु मीतु करि सचु पावहि दरगह जाइ ॥४॥२०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चारे अगनि = चारों अग्नि (हंस, हेतु, लोभ तथा कोप अग्नि) निर्दयता, मोह, लोभ व क्रोध। प्रगासिआ = खिलता है। अघाइ = पेट भर के, पूरे तौर पे।4।
अर्थ: हे नानक! गुरु के द्वारा नाम जल प्राप्त कर के (हृदय में) सुलग रहीं चारों अग्नियों को बुझा के (तृष्णा की ओर से) मर जा। (इस तरह) तेरे अंदर (हृदय) कमल खिल जाएगा। (तेरे हृदय में) आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल भर जाएगा। गुरु को मित्र बना, यकीनी तौर पे परमात्मा की हजूरी प्राप्त कर लेगा।4।20।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ हरि हरि जपहु पिआरिआ गुरमति ले हरि बोलि ॥ मनु सच कसवटी लाईऐ तुलीऐ पूरै तोलि ॥ कीमति किनै न पाईऐ रिद माणक मोलि अमोलि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ हरि हरि जपहु पिआरिआ गुरमति ले हरि बोलि ॥ मनु सच कसवटी लाईऐ तुलीऐ पूरै तोलि ॥ कीमति किनै न पाईऐ रिद माणक मोलि अमोलि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लै = ले के। बोलि = उचार, स्मरण कर। सच कसवटी = सत्य की कसवटी पर, सदा स्थिर हरि नाम की कसवटी पे। कसवटी = वह वट्टी जिस ऊपर सोने को कस लगाई जाती है जिस पे सोना परखने के लिए रगड़ा जाता है। लाईऐ = लगाया जाता है। तुलीऐ = तुलता है। पूरै तोलि = पूरे तोल से। तुलीऐ पूरै तोलि = पूरे तोल से तुलता है, तोल में पूरा उतरता है। किनै = किसी ने भी। रिद माणक = हृदय मोती। मोलि = मुल्य में।1।
अर्थ: हे प्यारे! हरि नाम जपो, गुरु की मति ऊपर चल के हरि का स्मरण करो। जब मन नाम जपने की कसवटी पे लगाया जाता है (तब नाम जपने की बरकत के साथ) ये तोल पूरा उतरता है। तब हृदय रूपी माणक अपने मुल्य से अमुल्य हो जाता है, इसका कोई मुल्य नहीं पा सकता।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे हरि हीरा गुर माहि ॥ सतसंगति सतगुरु पाईऐ अहिनिसि सबदि सलाहि ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे हरि हीरा गुर माहि ॥ सतसंगति सतगुरु पाईऐ अहिनिसि सबदि सलाहि ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुर माहि = गुरु में, गुरु के पास। सबदि = शब्द में (जुड़ के)। सलाहि = महिमा करो।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! यह कीमती हरि नाम गुरु के पास है। गुरु साधु-संगत में मिलता है। (सो, हे भाई! साधु-संगत में जा के) गुरु के शब्द में जुड़ के दिन रात परमात्मा की महिमा कर।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचु वखरु धनु रासि लै पाईऐ गुर परगासि ॥ जिउ अगनि मरै जलि पाइऐ तिउ त्रिसना दासनि दासि ॥ जम जंदारु न लगई इउ भउजलु तरै तरासि ॥२॥
मूलम्
सचु वखरु धनु रासि लै पाईऐ गुर परगासि ॥ जिउ अगनि मरै जलि पाइऐ तिउ त्रिसना दासनि दासि ॥ जम जंदारु न लगई इउ भउजलु तरै तरासि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लै = इकट्ठा करके। गुर परगासि = गुरु की दी हुई रौशनी से। जलि = जल से। पाईऐ = डालना। जलि पाईऐ = डाले हुए जल से, अगर जल डाल दें। दासनि दासि = दासों का दास (बना)। जंदारु = अवैड़ा। तरै तरासि = पूरे तौर पर पार हो जाता है।2।
अर्थ: (हे भाई!) सदा कायम रहने वाली सौदा धन संपत्ति एकत्र कर। यह धन गुरु के बख्शे आत्मिक प्रकाश से प्राप्त होता है। जैसे पानी डालने से आग बुझ जाती है, वैसे ही प्रभु के दासों के दास बनने से तृष्णा (रूपी आग) बुझ जाती है। (जो आदमी नाम धन इकट्ठा करता है) उसका भयानक यमराज भी कुछ बिगाड़ नहीं सकता। इस तरह वह मनुष्य संसार सागर से सही सलामत पार लांघ जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखि कूड़ु न भावई सचि रते सच भाइ ॥ साकत सचु न भावई कूड़ै कूड़ी पांइ ॥ सचि रते गुरि मेलिऐ सचे सचि समाइ ॥३॥
मूलम्
गुरमुखि कूड़ु न भावई सचि रते सच भाइ ॥ साकत सचु न भावई कूड़ै कूड़ी पांइ ॥ सचि रते गुरि मेलिऐ सचे सचि समाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = जो मनुष्य गुरु के सन्मुख हैं। भावई = अच्छा लगता है, पसंद आता है। भाइ = भाव में, प्रेम में। सच भाइ = सदा स्थिर प्रभु के प्रेम में। पांइ = पाया, इज्जत। गुरि मेलिऐ = अगर गुरु मिला दे। समाइ = समायी, लीनता।3।
अर्थ: गुरु की राह पर चलने वाले लोगों को झूठा पदार्थ पसंद नहीं आता। (भाव, वे दुनियावी पदार्तों में चित्त नहीं जोड़ते) वे सच्चे प्रभु में जुड़े रहते हैं, वे सदा सदा स्थिर प्रभु के प्यार में जुड़े रहते हैं। (पर) माया में लिप्त मनुष्य को प्रभु कानाम अच्छा नहीं लगता। झूठ में फंसे हुए की इज्जत भी झूठी ही होती है (इज्जत भी चार दिनों की ही होती है)। (पर ये अपने बस की खेल नहीं) जिस को गुरु (प्रभु चरणों में) मिला ले, वे प्रभु में रंगे रहते हैं। उनकी लीनता सदा प्रभु याद में ही रहती है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन महि माणकु लालु नामु रतनु पदारथु हीरु ॥ सचु वखरु धनु नामु है घटि घटि गहिर ग्मभीरु ॥ नानक गुरमुखि पाईऐ दइआ करे हरि हीरु ॥४॥२१॥
मूलम्
मन महि माणकु लालु नामु रतनु पदारथु हीरु ॥ सचु वखरु धनु नामु है घटि घटि गहिर ग्मभीरु ॥ नानक गुरमुखि पाईऐ दइआ करे हरि हीरु ॥४॥२१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हीरु = हीरा। घटि घटि = हरेक घट में। गहिर गंभीरु = अथाह प्रभु।4।
अर्थ: प्रभु का नाम (जो मानों) माणक है, लाल है, रतन है, हीरा है, हरेक मनुष्य के अंदर बसता है। अथाह प्रभु हरेक के शरीर में बिराजमान है। उसका नाम ही सदा स्थिर रहने वाला सौदा है धन है। (पर) हे नानक! जिस मनुष्य पे हीरा प्रभु मेहर करता है उसको उसका नाम गुरु के द्वारा मिलता है।4।21।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ भरमे भाहि न विझवै जे भवै दिसंतर देसु ॥ अंतरि मैलु न उतरै ध्रिगु जीवणु ध्रिगु वेसु ॥ होरु कितै भगति न होवई बिनु सतिगुर के उपदेस ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ भरमे भाहि न विझवै जे भवै दिसंतर देसु ॥ अंतरि मैलु न उतरै ध्रिगु जीवणु ध्रिगु वेसु ॥ होरु कितै भगति न होवई बिनु सतिगुर के उपदेस ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भरमै = भ्रमण करने से। भाहि = आग। विझवै = बुझती। देसु दिसंतर = देश देशांतर में। अंतरि = अंदर की। ध्रिग = धिक्कार योग्य। वेसु = भेस, त्याग वाला लिबास। होरु कितै = किसी और जगह।1।
अर्थ: (गुरु की शरण को छोड़ के) अगर मनुष्य (सन्यासी वेष धारण करके) देशों-देशांतरों में भ्रमण करता फिरे, (जगह-जगह) घूमने से (तृष्णा की) आग बुझ नहीं सकती, अंदर से विकारों की मैल नहीं उतरती। ऐसा जीवन धिक्कार-योग्य ही रहता है। ऐसा वेष फिटकारें ही खाता है। (ये बात पक्की हो जाए कि) सत्गुरू की शिक्षा ग्रहण करने के बिना और किसी स्थान पे प्रमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती (और भक्ति के बिना तृष्णा खत्म नहीं होती)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे गुरमुखि अगनि निवारि ॥ गुर का कहिआ मनि वसै हउमै त्रिसना मारि ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे गुरमुखि अगनि निवारि ॥ गुर का कहिआ मनि वसै हउमै त्रिसना मारि ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु के सन्मुख हो के। निवारि = दूर कर। कहिआ = कहा हुआ वचन। मनि = मन में। हउमै = अहम् में, मैं बड़ा बन जाऊँ, मैं बड़ा बन जाऊँ।1। रहाउ।
अर्थ: हे मन! गुरु के चरण पड़ के (तृष्णा की) आग दूर कर सकते हैं। जब गुरु का बताया हुआ उपदेश मन में टिक जाए, तो मैं बड़ा हो जाऊँ, मैं बड़ा हो जाऊँ -ये लालच खत्म हो जाता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनु माणकु निरमोलु है राम नामि पति पाइ ॥ मिलि सतसंगति हरि पाईऐ गुरमुखि हरि लिव लाइ ॥ आपु गइआ सुखु पाइआ मिलि सललै सलल समाइ ॥२॥
मूलम्
मनु माणकु निरमोलु है राम नामि पति पाइ ॥ मिलि सतसंगति हरि पाईऐ गुरमुखि हरि लिव लाइ ॥ आपु गइआ सुखु पाइआ मिलि सललै सलल समाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: माणकु = मोती। नामि = नाम में (जुड़ने से)। पति = इज्जत। मिलि = मिल के। आपु = स्वयं भाव, स्वार्थ। सलल = सलिल, जल, पानी।2।
अर्थ: परमात्मा के नाम में जुड़ के ये मन बहुमूल्य मोती बन जाता है। इसे (हर जगह) आदर मिलता है। (पर) परमात्मा का नाम साधु-संगत में मिल के ही प्राप्त होता है। गुरु की शरण पड़ने से ही प्रमात्मा (के चरणों में) तवज्जो जुड़ती है। (प्रभु चरणों में तवज्जो जुड़ने से मनुष्य के अंदर से) स्वै-भाव, अहम् भाव दूर हो जाता है, आत्मिक आनंद मिलता है (परमात्मा से मनुष्य इस तरह एकमेक हो जाता है) जैसे पानी से पानी मिल के एक-रूप हो जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनि हरि हरि नामु न चेतिओ सु अउगुणि आवै जाइ ॥ जिसु सतगुरु पुरखु न भेटिओ सु भउजलि पचै पचाइ ॥ इहु माणकु जीउ निरमोलु है इउ कउडी बदलै जाइ ॥३॥
मूलम्
जिनि हरि हरि नामु न चेतिओ सु अउगुणि आवै जाइ ॥ जिसु सतगुरु पुरखु न भेटिओ सु भउजलि पचै पचाइ ॥ इहु माणकु जीउ निरमोलु है इउ कउडी बदलै जाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिनि = जिस मनुष्य ने। सु = वह (मनुष्य)। अउगुणि = औगुण में (टिका रह के) आवै जाइ = जन्मता है मरता है। जिसु = जिस मनुष्य को। भेटिओ = मिला। भउजलि = भउजल में, संसार समुंदर में। पचै पचाइ = नित खुआर होता रहता है।3।
अर्थ: जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम नहीं स्मरण किया, वह विकारी जीवन में रह के मरता-पैदा होता है। जिस मनुष्य को सत्गुरू नहीं मिलावह संसार समुंदर (के विकारों) में ही खुआर होते रहते हैं। (प्रभु की अंश) ये जीवात्माएक बहुमुल्य मोती है, (जो) इस तरह (विकारों में खचित हो के) कौड़ी के बदले ही बर्बाद हो जाता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिंना सतगुरु रसि मिलै से पूरे पुरख सुजाण ॥ गुर मिलि भउजलु लंघीऐ दरगह पति परवाणु ॥ नानक ते मुख उजले धुनि उपजै सबदु नीसाणु ॥४॥२२॥
मूलम्
जिंना सतगुरु रसि मिलै से पूरे पुरख सुजाण ॥ गुर मिलि भउजलु लंघीऐ दरगह पति परवाणु ॥ नानक ते मुख उजले धुनि उपजै सबदु नीसाणु ॥४॥२२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रसि = प्रेम से। सुजाण = सिआणे। से = वह लोग। गुर मिलि = गुरु को मिल के। ते = वह (बहुवचन)। धुनि = आवाज, गूँज, लहर। नीसाणु = धौंसा।4।
अर्थ: जो मनुष्यों को प्रेम के कारण सत्गुरू मिलता है, वह पूरे (बरतन) हैं, वे चतुर सुजान हैं (क्योंकि) गुरु को मिल के ही संसार समुंदर से पार लांघ सकते हैं। प्रभु की हजूरी में इज्जत मिलती है, स्वीकार होते हैं। हे नानक! वे लोग ही उज्जवल-मुख व सुर्ख-रू हैं, जिनके अंदर गुरु का शब्द-बाजा बजता है (भाव, गुरु का शब्द अपना पूरा प्रभाव डाले रखता है), (स्मरण की) लहर उठी रहती है।4।22।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ वणजु करहु वणजारिहो वखरु लेहु समालि ॥ तैसी वसतु विसाहीऐ जैसी निबहै नालि ॥ अगै साहु सुजाणु है लैसी वसतु समालि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ वणजु करहु वणजारिहो वखरु लेहु समालि ॥ तैसी वसतु विसाहीऐ जैसी निबहै नालि ॥ अगै साहु सुजाणु है लैसी वसतु समालि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वणजारा = वणज करने वाला, व्यापारी (आम तौर पे वणजारे घूम फिर के गांव-गांव में सौदा बेचते हैं। जीव को वणजारा कहा गया है क्योंकि यहां इसने सदा नहीं बैठे रहना)। वखरु = सौदा। विसाहीऐ = खरीदनी चाहिए। साहु = शाहूकार (जिस ने राशि पूंजी देकर वणजारे भेजे हैं)। सुजाणु = सुजान, सिआने। समालि लैसी = संभाल के लेगा, परख के लेगा।1।
अर्थ: हे (राम नाम का) व्यापार करने आए जीवो! (नाम का) व्यापार करो, नाम सौदा संभाल लो। वैसा सौदा ही खरीदना चाहिए जो सदा के लिए साथ निभाए। परलोक में बैठा शाहूकार सुजान है वह (हमारे खरीदे हुए) सौदे की पूरी परख करके स्वीकार करेगा।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे रामु कहहु चितु लाइ ॥ हरि जसु वखरु लै चलहु सहु देखै पतीआइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे रामु कहहु चितु लाइ ॥ हरि जसु वखरु लै चलहु सहु देखै पतीआइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जसु = शोभा। सहु = खसम, प्रभु। पतिआइ = तसल्ली करके।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! चित्त लगा के (प्रेम सहित) परमात्मा का नाम जपो। (यहां से अपने साथ) परमात्मा की महिमा का सौदाले के चलो, प्रभु पति खुश हो के देखेगा।1। रहाउ।
[[0023]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिना रासि न सचु है किउ तिना सुखु होइ ॥ खोटै वणजि वणंजिऐ मनु तनु खोटा होइ ॥ फाही फाथे मिरग जिउ दूखु घणो नित रोइ ॥२॥
मूलम्
जिना रासि न सचु है किउ तिना सुखु होइ ॥ खोटै वणजि वणंजिऐ मनु तनु खोटा होइ ॥ फाही फाथे मिरग जिउ दूखु घणो नित रोइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: खोटै = खोटे से। खोटै वणजि = खोटे व्यापार से। वणंजिऐ = व्यापार करें। मिरग = हिरन। घणों = बहुत। रोइ = रोता है, दुखी होता है।2।
अर्थ: जिस लोगों के पास सदा कायम रहने वाले प्रभु के नाम की पूंजी नहीं, उन्हें कभी आत्मिक आनन्द नहीं मिल सकता। अगर नित्य खोटा व्यापार ही करते रहें तो मन भी खोटा हो जाता है तथा शरीर भी खोटा (भाव, खोट मनुष्य के अंदर रच जाता है)। जैसे, जाल में फंसा हुआ हिरन दुखी होता है, वैसे ही (खोट की फाँसी में फंस के) जीव को बहुत दुख होता है, वह नित्य दुखी होता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
खोटे पोतै ना पवहि तिन हरि गुर दरसु न होइ ॥ खोटे जाति न पति है खोटि न सीझसि कोइ ॥ खोटे खोटु कमावणा आइ गइआ पति खोइ ॥३॥
मूलम्
खोटे पोतै ना पवहि तिन हरि गुर दरसु न होइ ॥ खोटे जाति न पति है खोटि न सीझसि कोइ ॥ खोटे खोटु कमावणा आइ गइआ पति खोइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: खोटे = खोटे (सिक्के)। पोतै = खजाने में। गुर दरसु = गुरु का दर्शन। खोटि = खोट के द्वारा। न सीझसि = कामयाब नहीं होता। खोटु कमावणा = खोटा काम ही करना। खोइ = गवा के।3।
अर्थ: खोटे सिक्के (सरकारी) खजाने में नहीं लिए जाते (वैसे ही खोटे बंदे दरगाह में आदर नहीं पाते) उन्हें हरि का गुरु का दीदार नहीं होता। खोटे मनुष्य की असलियत ठीक नहीं होती। खोटे को इज्जत नहीं मिलती। खोट करने से कोई जीव (आत्मिक जीवन में) कामयाब नहीं हो सकता। खोटे मनुष्य ने सदा खोट ही कमाना है। (उसे खोट कमाने की आदत बन जाती है)। वह अपनी इज्जत गवा के सदा जन्मता मरता रहता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक मनु समझाईऐ गुर कै सबदि सालाह ॥ राम नाम रंगि रतिआ भारु न भरमु तिनाह ॥ हरि जपि लाहा अगला निरभउ हरि मन माह ॥४॥२३॥
मूलम्
नानक मनु समझाईऐ गुर कै सबदि सालाह ॥ राम नाम रंगि रतिआ भारु न भरमु तिनाह ॥ हरि जपि लाहा अगला निरभउ हरि मन माह ॥४॥२३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सबदि सालाह = महिमा वाले शब्द द्वारा। रंगि = रंग में। भारु = बोझ। भरमु = भटकन। जपि = जप के। अगला लाहा = बहुत नफा। मन माह = मन में।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘सालाह’, ‘तिनाह’ के साथ मिलाने के लिए ‘माहि’ की जगह ‘माह’ है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे नानक! परमात्मा की महिमा वाले गुर-शब्द के द्वारा अपने मन को समझाना चाहिए। जो लोग परमात्मा के नाम के प्यार में रंगे रहते हैं, उनको खोटे कामों का भार सहना नहीं पड़ता। उनका मन खोटे कामों की ओर नहीं दौड़ता। परमात्मा का नाम जप के बहुत सारा आत्मिक लाभ कमा लेते हैं, और वह प्रभु जो निरभय है, जो किसी डर के अधीन नहीं, मन में आ बसता है।4।23।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ घरु २ ॥ धनु जोबनु अरु फुलड़ा नाठीअड़े दिन चारि ॥ पबणि केरे पत जिउ ढलि ढुलि जुमणहार ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ घरु २ ॥ धनु जोबनु अरु फुलड़ा नाठीअड़े दिन चारि ॥ पबणि केरे पत जिउ ढलि ढुलि जुमणहार ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अरु = और।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘अरु’ जिसके बाद में ‘ु’ की मात्रा है इसका अर्थ है: और। जबकि शब्द ‘अरि’ के अंत में मात्रा है ‘ि’उसका अर्थ है ‘वैरी’।
दर्पण-भाषार्थ
फुलड़ा = सुंदर सा फूल। नाठीअड़े = मेहमान, पराहुणे। पबणि = पानी के किनारे उगी हुई बनस्पति। केरे = के। पत = पत्र (बहुवचन)। ढलि ढुलि = कुम्हला के, सूख के। जुंमणहार = (सिंधी शब्द) चले जाने वाले, नाशवान।1।
अर्थ: धन, जवानी और छोटा सा फूल- ये चार दिनों के ही मेहमान होते हैं। जैसे बनस्पति के पत्ते पानी के ढल जाने के बाद सूख के नाश हो जाते हैं, ऐसे ही ये भी नाश हो जाते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रंगु माणि लै पिआरिआ जा जोबनु नउ हुला ॥ दिन थोड़ड़े थके भइआ पुराणा चोला ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
रंगु माणि लै पिआरिआ जा जोबनु नउ हुला ॥ दिन थोड़ड़े थके भइआ पुराणा चोला ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रंगु = आत्मिक आनंद। जा = जब तक। नउहुला = नये हुलारे वाला, नवयौवन। थके = रह गए। चोला = शरीर।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्यारे! जब तक नई जवानी हैतब तक आत्मिक आनन्द ले ले। जब उम्र के दिन थोड़े रह गए, शारीरिक चोला पुराणा हो जाएगा (फिर स्मरण नहीं हो सकेगा)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सजण मेरे रंगुले जाइ सुते जीराणि ॥ हं भी वंञा डुमणी रोवा झीणी बाणि ॥२॥
मूलम्
सजण मेरे रंगुले जाइ सुते जीराणि ॥ हं भी वंञा डुमणी रोवा झीणी बाणि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रंगुले = प्यारे। जीराणि = कब्रिस्तान में। हंभी = हम भी। वंझा = जाऊँगी। डुमनी = दु+मनी, दो मन, दुचित्ती में हो के। रोवा = रोती हूँ। झीणी = मध्यम, धीमी। बाणि = वाणी, आवाज।2।
अर्थ: मेरे प्यारे सज्जन कब्रिस्तान में जा के सो गए हैं, (मैं उनके विजोग में) धीमी आवाज में रो रही हूँ (पर मुझे ये समझ नहीं आ रही कि) मैं भी दुचित्ती में हो के (उधर को ही) चल पड़ूंगी।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
की न सुणेही गोरीए आपण कंनी सोइ ॥ लगी आवहि साहुरै नित न पेईआ होइ ॥३॥
मूलम्
की न सुणेही गोरीए आपण कंनी सोइ ॥ लगी आवहि साहुरै नित न पेईआ होइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गोरीए = हे सुंदर जीव-स्त्री! आनण कंनी = अपने कानों से, ध्यान से। सोइ = खबर। लगी आवहि = जरूर आएगी। पेईआ = पिता का घर, यह जगत।3।
अर्थ: हे सुंदर जीव-स्त्री! तू ध्यान से ये खबर क्यूँ नहीं सुनती कि पेका घर (इस लोक का बसेवा) सदा नहीं रह सकता, सहुरे घर (परलोक में) जरूर जाना पड़ेगा।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक सुती पेईऐ जाणु विरती संनि ॥ गुणा गवाई गंठड़ी अवगण चली बंनि ॥४॥२४॥
मूलम्
नानक सुती पेईऐ जाणु विरती संनि ॥ गुणा गवाई गंठड़ी अवगण चली बंनि ॥४॥२४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुती = गाफल, बेपरवाह हो रही। पेईऐ = पेके घर में। जाण = समझ। विरती = वि+रात्रि, रात के उट, दिन दिहाड़े। गंठड़ी = छोटी सी पोटली। बंनि = बांध के, इकट्टे करके। संनि = सेंध, दीवार भेद कर चोरी के लिए रास्ता।4।
अर्थ: हे नानक! जो जीव-स्त्री पेके घर (इस लोक में गफ़लत की नींद) सोई रही, ऐसे जानों कि (उसके गुणों को) दिन दिहाड़े ही सेंध लगी रही। उसने गुणों की गठड़ी गवा ली। वह (यहां से) अवगुणों की गठड़ी बांध के ले चली।4।24।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ घरु दूजा २ ॥ आपे रसीआ आपि रसु आपे रावणहारु ॥ आपे होवै चोलड़ा आपे सेज भतारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ घरु दूजा २ ॥ आपे रसीआ आपि रसु आपे रावणहारु ॥ आपे होवै चोलड़ा आपे सेज भतारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रसीआ = रस से भरा हुआ। रावणुहारु = रस को भोगने वाला। चोलड़ा = स्त्री की चोली, स्त्री। भतारु = खसम, पति।1।
अर्थ: प्रभु स्वयं ही रस भरा पदार्थ है, स्वयं ही (उस में) रस है, और स्वये ही उस स्वाद का आनंद लेने वाला है। प्रभु खुद ही स्त्री बनता है, खुद ही सेज, और खुद ही (भोगने वाला) पति है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रंगि रता मेरा साहिबु रवि रहिआ भरपूरि ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
रंगि रता मेरा साहिबु रवि रहिआ भरपूरि ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रंगि = रंग में, प्रेम में। रता = रंगा हुआ। रवि रहिआ = व्यापक है। भरपूर = प्रचुर।1। रहाउ।
अर्थ: मेरा मालिक प्रभु प्यार में रंगा हुआ है, वह (सारी सृष्टि में) पूर्ण तौर पर व्यापक है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपे माछी मछुली आपे पाणी जालु ॥ आपे जाल मणकड़ा आपे अंदरि लालु ॥२॥
मूलम्
आपे माछी मछुली आपे पाणी जालु ॥ आपे जाल मणकड़ा आपे अंदरि लालु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: माछी = मछली पकड़ने वाला। जाल मणकड़ा = जाल के मणके (लोहे आदि के मणके जो जाल को भारा करने के लिए निचली तरफ लगाए जाते हैं ता कि जाल पानी में डूबा रहे)। लालु = मास की बोटी (मछली को फसाने के लिए चारा)।2।
अर्थ: प्रभु खुद ही मछलियां पकड़ने वाला है, खुद ही मछली है। खुद ही पानी है (जिसमें मछली रहती है), खुद ही जाल है (जिससे मछली पकड़ी जाती है)। प्रभु ही उस जाल के मणके है, खुद ही उस जाल में मास की बोटी है (जो मछली को जाल की ओर प्रेरती है)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपे बहु बिधि रंगुला सखीए मेरा लालु ॥ नित रवै सोहागणी देखु हमारा हालु ॥३॥
मूलम्
आपे बहु बिधि रंगुला सखीए मेरा लालु ॥ नित रवै सोहागणी देखु हमारा हालु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बहु बिधि = कई तरीकां से। रंगुला = रंगीला, अटखेलियां करने वाला। लालु = प्यारा। रवै = मिलता है, भोगता है। सोहागणी = भाग्य वालियों को।3।
अर्थ: हे सहेलियो! मेरा प्यारा प्रभु स्वयं ही कई तरीकों से अटखेलियां करने वाला है। भाग्यशाली जीव-स्त्रीयों को वह पति प्रभु सदा मिलता है। पर मेरे जैसियों का हाल देख (कि हमें कभी दीदार नहीं होता)।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रणवै नानकु बेनती तू सरवरु तू हंसु ॥ कउलु तू है कवीआ तू है आपे वेखि विगसु ॥४॥२५॥
मूलम्
प्रणवै नानकु बेनती तू सरवरु तू हंसु ॥ कउलु तू है कवीआ तू है आपे वेखि विगसु ॥४॥२५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: प्रणवै = विनती करता है, विनिम्रता से कहता है। कउल = सूर्य की रौशनी में खिलने वाला कमल का फूल। कवीआ = (चाँद की चाँदनी में खिलने वाली) कंमी। वेखि = देख के। विगसु = खिलता है, खुश होता है।4।
अर्थ: हे प्रभु! नानक (तेरे दर पर) अरदास करता है (तू हर जगह मौजूद है, मुझे भी दीदार दे) तू ही सरोवर है, तू ही सरोवर पे रहने वाला हंस है। सूरज की रौशनी में खिलने वाला कमल का फूल भी तू ही है और चाँद की चाँदनी में खिलने वाली कमीं भी तू ही है (अपने जमाल को ओर अपने जलाल को) देख के तू खुद ही खुश होने वाला है।4।24।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ घरु ३ ॥ इहु तनु धरती बीजु करमा करो सलिल आपाउ सारिंगपाणी ॥ मनु किरसाणु हरि रिदै जमाइ लै इउ पावसि पदु निरबाणी ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ घरु ३ ॥ इहु तनु धरती बीजु करमा करो सलिल आपाउ सारिंगपाणी ॥ मनु किरसाणु हरि रिदै जमाइ लै इउ पावसि पदु निरबाणी ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करमा = रोजमर्रा के काम। करो = करो, बनाओ। सलिल = पानी। आपाउ = सींचना। सलिल आपाउ = पानी से सीचनां। सारिंगपाणी = परमात्मा (का नाम)। किरसाणु = किसान। रिदै = हृदय में। जंमाइ लै = उगा ले। इउं = इस तरह। निरबाण = वासना रहित, निर्वाण, बुझा हुआ,जिस में से वासना खत्म हो जाए।1।
अर्थ: (हे भाई!) इस शरीर को धरती बना, अपने (रोजमर्रा के) कामों को बीज बना, परमात्मा के नाम के पानी से (इस जमीन की) सिंचाई कर। अपने मन को किसान बना, परमात्मा का नाम अपने हृदय में उगा। इस तरह (हे भाई!) वह आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेगा जहां कोई वासना पहुँच नहीं कर सकती।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
काहे गरबसि मूड़े माइआ ॥ पित सुतो सगल कालत्र माता तेरे होहि न अंति सखाइआ ॥ रहाउ॥
मूलम्
काहे गरबसि मूड़े माइआ ॥ पित सुतो सगल कालत्र माता तेरे होहि न अंति सखाइआ ॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गरबासि = अहंकार करता है। मूढ़े = हे मूर्ख! सुतो = सुत,पुत्र। पित = पिता। सगल = सारे। कालत्र = कलत्र, स्त्री। अंति = आखिरी समय। सखाइआ = मित्र। रहाउ।
अर्थ: हेमूर्ख! माया का गुमान कयों करता है? पिता, पुत्र, स्त्री, मां-ये सारे अंत में तेरे सहायक नहीं बन सकते। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बिखै बिकार दुसट किरखा करे इन तजि आतमै होइ धिआई ॥ जपु तपु संजमु होहि जब राखे कमलु बिगसै मधु आस्रमाई ॥२॥
मूलम्
बिखै बिकार दुसट किरखा करे इन तजि आतमै होइ धिआई ॥ जपु तपु संजमु होहि जब राखे कमलु बिगसै मधु आस्रमाई ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दुसट = बेरे। किरखा करे = उखाड़ देना (जैसे किसान खेतों में से नदीन उखाड़ देता है)। तजि = छोड़ के। आतमै होइ = अपने अंदर एक चित्त हो के। संजमु = मन को विकारों की तरफ से रोकना। होहि = बन जाना। मधु = शहद,रस, आत्मिक आनन्द। आस्रमाई = सृमना, चूता है।2।
अर्थ: जो मनुष्य गलत विषौ-विकारों को हृदय रूपी भूमि में से इस तरह उखाड़ फेंकता है जैसे खेतों में से नदीन। इन विकारों का त्याग करके जो मनुष्य अपने अंदर एक-चित्त हो के प्रभु को स्मरण करता है, जब जप, तप व संजम (उसके आत्मिक जीवन के) रक्षक बनते हैं, तो उसका हृदय कमल खिल उठता है। उसके अंदर आत्मिक आनंद का रस मानों सिमने लगता है, चूने लगता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बीस सपताहरो बासरो संग्रहै तीनि खोड़ा नित कालु सारै ॥ दस अठार मै अपर्मपरो चीनै कहै नानकु इव एकु तारै ॥३॥२६॥
मूलम्
बीस सपताहरो बासरो संग्रहै तीनि खोड़ा नित कालु सारै ॥ दस अठार मै अपर्मपरो चीनै कहै नानकु इव एकु तारै ॥३॥२६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बीस = गिनती के बीस। सप्त = सात। बीस सप्ताहरो = 27 दिन 27 नछत्र। बासरो = दिन। संग्रहै = इकट्ठा करे। तीनि खोड़ा = तीन अवस्थाएं (बाल, जवानी और बुढ़ापा)। सारै = याद रखे। दस = चार वेद और छह शास्त्र। अठारमै = अठारह पुराणों में। अपरंपरो = अपरंपर, परमात्मा। चीनै = खोजे, पहिचाने। इव = इस तरह। एक = प्रभु।3।
अर्थ: हे नानक! जो मनुष्य 27 ही नक्षत्रों में (भाव) हर रोज (प्रभु का नाम धन) एकत्र कर रहे हैं, जो मनुष्य अपनी तीनों ही अवस्थाओं (बालपन, जवानी और बुढ़ापा) में मौत को याद रखे, जो चार वेदों, छह शास्त्रो और अठारह पुराणों (आदि सारी धार्मिक पुस्तकों) में परमात्मा (के नाम) को ही खोजें तो इस तरह परमात्मा उस को (संसार समुंदर से) पार लंघा लेता है।3।26।
[[0024]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ घरु ३ ॥ अमलु करि धरती बीजु सबदो करि सच की आब नित देहि पाणी ॥ होइ किरसाणु ईमानु जमाइ लै भिसतु दोजकु मूड़े एव जाणी ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ घरु ३ ॥ अमलु करि धरती बीजु सबदो करि सच की आब नित देहि पाणी ॥ होइ किरसाणु ईमानु जमाइ लै भिसतु दोजकु मूड़े एव जाणी ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अमलु = करणी, आचरण। धरती = भूमि (जिसमें बीज बीजना है)। सबदो = शब्द, गुरु का शब्द। आब = चमक, खूबसूरती। इमान = श्रद्धा। जंमाइ लै = उगा ले। एव = इस तरह।1।
अर्थ: (हे काजी!) अपने (रोजमर्रा के) हरेक कर्म को जमीन बना, (इस कर्म-भूमि में) गुरु के शब्द का बीज डाल, स्मरण से पैदा होने वाली आत्मिक सुंदरता का पानी (उस कर्म-भूमि में) सदा देता रह। किसान (जैसा उद्यमी बन), (तेरी इस किरसानी में) श्रद्धा (की खेती) उगेगी। हे मूर्ख! सिर्फ इस तरीके से समझ आएगी कि बहिश्त क्या है और दोजक क्या।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मतु जाण सहि गली पाइआ ॥ माल कै माणै रूप की सोभा इतु बिधी जनमु गवाइआ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मतु जाण सहि गली पाइआ ॥ माल कै माणै रूप की सोभा इतु बिधी जनमु गवाइआ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मतु जाणसहि = ये ना समझना। गली = सिर्फ बातें करके। माणै = अहंकार में। इतु = इसके द्वारा। इतु बिधि = इस तरह।1। रहाउ।
अर्थ: (हे काजी!) ये ना समझना कि सिर्फ बातों से ही (रब) मिल जाता है। अगर (बेईमानियां करके इकट्ठे किये हुए) धन के अहंकार में टिके रहे, अगर (कामातुर हो के) रूप की शोभा में (मन जुड़ा रहा) तो (बाहर से की गई मजहब की बातें कुछ नहीं सवार सकतीं)। इस तरह मानव जन्म बेकार चला जाता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ऐब तनि चिकड़ो इहु मनु मीडको कमल की सार नही मूलि पाई ॥ भउरु उसतादु नित भाखिआ बोले किउ बूझै जा नह बुझाई ॥२॥
मूलम्
ऐब तनि चिकड़ो इहु मनु मीडको कमल की सार नही मूलि पाई ॥ भउरु उसतादु नित भाखिआ बोले किउ बूझै जा नह बुझाई ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तनि = शरीर में। मीडको = मेंढक। सार = कद्र। मूलि = बिल्कुल। उस्तादु = गुरु। भाखिआ = बोली, उपदेश। बुझाई = समझ।2।
अर्थ: (जब तक) शरीर के अंदर विकारों का कीचड़ है, और ये मन (उस कीचड़ में) मेंढक (बन के रहता है), (कीचड़ में उगे हुए) कमल के फूल की कद्र (इस मेंढक मन) को नहीं पड़ सकती (हृदय में बसते प्रभु की सूझ नहीं आ सकती)। (भंवरा आ के कमल फूल पर गुँजार डालता है, पर कमल फूल के पास ही कीचड़ में मस्त मेंढक फूल की कद्र नहीं जानता) गुरु भंवरा सदैव (हरि स्मरण का) उपदेश करता है, पर ये मेंढक-मन उस उपदेश को नहीं समझता, इसे ऐसी समझ ही नहीं है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आखणु सुनणा पउण की बाणी इहु मनु रता माइआ ॥ खसम की नदरि दिलहि पसिंदे जिनी करि एकु धिआइआ ॥३॥
मूलम्
आखणु सुनणा पउण की बाणी इहु मनु रता माइआ ॥ खसम की नदरि दिलहि पसिंदे जिनी करि एकु धिआइआ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पउण की वाणी = हवा जैसी, एक कान में आकर दूसरे कान से निकल गई, बे-असर। रता = रंगा हुआ। दिलहि पसिंदे = दिल में पसंद। करि एक = एक करके पूरी श्रद्धा से।3।
अर्थ: (हे काजी! जब तक) ये मन माया के रंग में ही रंगा हुआ है (मजहबी किताब के मसले) सुनने सुनाने बे-असर हैं। वही बंदे मालिक-रब की नजर में हैं, वही बंदे उसकी नजर में प्यारे हैं जिन्होंने पूरी श्रद्धा से उसको स्मरण किया है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तीह करि रखे पंज करि साथी नाउ सैतानु मतु कटि जाई ॥ नानकु आखै राहि पै चलणा मालु धनु कित कू संजिआही ॥४॥२७॥
मूलम्
तीह करि रखे पंज करि साथी नाउ सैतानु मतु कटि जाई ॥ नानकु आखै राहि पै चलणा मालु धनु कित कू संजिआही ॥४॥२७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तीह = तीस रोजे। पंज = पाँच नमाजें। मतु कटि जाई = शायद इस तरह कट जाए, शायद इस तरह मुझे कोई शैतान (बुरा आदमी) न कहे। राहि = रास्ते पे। कित कू = किस लिए? संजिआही = तूने एक़त्र किया है।4।
अर्थ: (हे काजी!) तू तीस रोज़े गिन के रखता है, पाँच नमाजों को साथी बनाता है। (पर, ये सब कुछ दिखावे के लिए करता है, ता कि) शायद इस तरीके से लोग मुझे उच्छा मुसलमान कहने लग जाएं। पर, नानक कहता है (हे काजी!) जीवन के सही रास्ते पर चलना चाहिए, तू (ठगी फरेब करके) माल-धन क्यूँ इकट्ठा कर रहा है? (तू निरी बाते करके लोगों को खुश करता है, पर अंदर से धन के लालच में और काम-वासना में अंधा हुआ पड़ा है,ये रास्ता आत्मिक मौत का है)।4।27।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ घरु ४ ॥ सोई मउला जिनि जगु मउलिआ हरिआ कीआ संसारो ॥ आब खाकु जिनि बंधि रहाई धंनु सिरजणहारो ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ घरु ४ ॥ सोई मउला जिनि जगु मउलिआ हरिआ कीआ संसारो ॥ आब खाकु जिनि बंधि रहाई धंनु सिरजणहारो ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मउला = मालिक। जिनि = जिस (मौला) ने। मउलिआ = खिलाया है, प्रफुल्लित किया है। आब = पानी। खाकु = मिट्टी। बंधि रहाई = बांध के रख दी है।1।
अर्थ: जिस मालिक ने सारा जगत प्रफुल्लित किया है, जिस ने सारे संसार को हरा-भरा किया है, जिसने पानी और मिट्टी (विरोधी तत्व) इकट्ठे करके रख दिए हैं, वह निर्माता धन्य है (उसकी महिमा करो), वही (असल) मालिक है (मौत का मालिक भी वही है, विरोधी तत्वों वाली खेल आखिर खत्म होनी है, और वही खत्म करता है)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मरणा मुला मरणा ॥ भी करतारहु डरणा ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मरणा मुला मरणा ॥ भी करतारहु डरणा ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुला = हे मुल्ला! मरणा = मौत, मौत का डर। भी = उससे। करतारहु = कर्तार से।1। रहाउ।
अर्थ: हे मुल्ला! मौत (का डर) हरेक के सिर पर है, इस वास्ते रब से ही डरना चाहिए (रब के डर में रहना ही फबता है। अर्थात, रब के डर में रहने से मौत का डर दूर हो सकता है)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ता तू मुला ता तू काजी जाणहि नामु खुदाई ॥ जे बहुतेरा पड़िआ होवहि को रहै न भरीऐ पाई ॥२॥
मूलम्
ता तू मुला ता तू काजी जाणहि नामु खुदाई ॥ जे बहुतेरा पड़िआ होवहि को रहै न भरीऐ पाई ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नामु खुदाई = खुदा का नाम। भरीऐ पाई = जब घड़ा भर जाता है, जब स्वास पूरे भर जाते हैं। पाई = पन घड़ी (उस के नीचे छेद होता है, जिस के रास्ते उस घड़ी में पानी आता रहता है, और आखिर जब सारा पानी से भर जाती है, तो पानी में डूब जाती है। वक्त का हिसाब रखने का एक यह पुरातन तरीका था)।2।
अर्थ: (सिर्फ मजहबी किताबें पढ़ लेने से असली काजी-मुल्ला नहीं बन सकते) तभी तू अपने आप को मुल्ला समझ और तभी काजी, जब तू रब के नाम के साथ गहरी सांझ पा लेगा (और मौत का डर खत्म कर लेगा, नही तो) चाहे तू कितनी ही (मजहबी किताबें) पढ़ जाएं (मौत फिर भी नहीं टलेगी), जब स्वास पूरे हो जाते है, कोई यहां रह नहीं सकता।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सोई काजी जिनि आपु तजिआ इकु नामु कीआ आधारो ॥ है भी होसी जाइ न जासी सचा सिरजणहारो ॥३॥
मूलम्
सोई काजी जिनि आपु तजिआ इकु नामु कीआ आधारो ॥ है भी होसी जाइ न जासी सचा सिरजणहारो ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
आपु = स्वै भाव। आधारो = आसरा। होसी = कायम रहेगा। जाइन = ना पैदा होता है। सचा = सदा स्थिर रहने वाला।3।
अर्थ: वही मनुष्य काजी है जिसने स्वैभाव त्याग दिया है, और जिसने उस रब के नाम को अपनी जिंदगी का आसरा बनाया है। जो अब भी है, आगे भी रहेगा। जो ना जन्मता है ना ही मरता है। जो सदा कायम रहने वाला है और सभ को पैदा करने वाला है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पंज वखत निवाज गुजारहि पड़हि कतेब कुराणा ॥ नानकु आखै गोर सदेई रहिओ पीणा खाणा ॥४॥२८॥
मूलम्
पंज वखत निवाज गुजारहि पड़हि कतेब कुराणा ॥ नानकु आखै गोर सदेई रहिओ पीणा खाणा ॥४॥२८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निवाज गुजारहि = तू नमाज पढ़ता है। कतेब = मुसलमानी मत की किताबें। गोर = कब्र। सदेई = पुकारी जाती है। गोर सदेई = जब कब्र बुलाती है, जब मौत आती है। रहिओ = रहि जाती है, खतम हो जाती है।4।
अर्थ: (हे काजी!) तू पाँचों वक्त नमाज़ पढ़ता है, तू कुरान व अपनी अन्य मजहबी किताबें भी पढ़ता है (फिर भी स्वार्थ में बंधा रह के मौत से डरता है)। नानक कहता है (हे काजी!) जब मौत आवाज देती है तो दाना-पानी यहीं का यहीं धरा धराया रह जाता है (सो, मौत के डर से बचने के लिए रब के डर में टिका रह)।4।28।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ घरु ४ ॥ एकु सुआनु दुइ सुआनी नालि ॥ भलके भउकहि सदा बइआलि ॥ कूड़ु छुरा मुठा मुरदारु ॥ धाणक रूपि रहा करतार ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ घरु ४ ॥ एकु सुआनु दुइ सुआनी नालि ॥ भलके भउकहि सदा बइआलि ॥ कूड़ु छुरा मुठा मुरदारु ॥ धाणक रूपि रहा करतार ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुआनु = कुत्ता, लोभ। दुइ = दो। सुआनी = कुत्तियां (आशा और तृष्णा)। भलके = नित्य। बइआलि = सवेरे। कूड़ु = झूठ। मुठा = माया में ठगा जा रहा हूँ। धाणक = सांहसी कबीला। रूपि = रूप वाला, भेस वाला।1।
अर्थ: हे कर्तार! मैं सहंसियों वाले रूप में रहता हूँ। मेरे साथ एक कुत्ता (लोभ) है, दो कुत्तियां (आशा और तृष्णा) हैं। (मेरे हाथ में) झूठ रूपी छुरा है, मैं माया में ठगा जा रहा हूँ (और पराया हक) मुरदार (खाता हूँ)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मै पति की पंदि न करणी की कार ॥ हउ बिगड़ै रूपि रहा बिकराल ॥ तेरा एकु नामु तारे संसारु ॥ मै एहा आस एहो आधारु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मै पति की पंदि न करणी की कार ॥ हउ बिगड़ै रूपि रहा बिकराल ॥ तेरा एकु नामु तारे संसारु ॥ मै एहा आस एहो आधारु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पंदि = नसीहत, शिक्षा। करणी की कार = जो कर्म करने चाहिए, उत्तम करनी। बिकराल = डरावना। आधारु = आसरा।1। रहाउ।
अर्थ: हे पति-प्रभु! ना मैं तेरी नसीहत पे चलता हूँ, ना मेरी करनी बढ़िया है, मैं सदा डरावने विगड़े रूप वाला बना रहता हूँ। मुझे अब सिर्फ यही आस है यही आसरा है कि तेरा जो नाम सारे संसार को पार लंघाता है (वह मुझे भी पार लंघा लेगा)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मुखि निंदा आखा दिनु राति ॥ पर घरु जोही नीच सनाति ॥ कामु क्रोधु तनि वसहि चंडाल ॥ धाणक रूपि रहा करतार ॥२॥
मूलम्
मुखि निंदा आखा दिनु राति ॥ पर घरु जोही नीच सनाति ॥ कामु क्रोधु तनि वसहि चंडाल ॥ धाणक रूपि रहा करतार ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुखि = मुंह से। पर घरु = पराया घर। जोही = जोहना, मैं देखता हूँ। सनाति = नीच असलियत वाला, नीच कर्मों वाला। तनि = तन में, शरीर में।2।
अर्थ: मैं दिन-रात मुंह से (दूसरों की) निंदा करता रहता हूँ, मैं नीच और नीची असलीयत वाला हो गया हूँ, पराया घर देखता हूँ। मेरे शरीर में काम व क्रोध जैसे चण्डाल बस रहे हैं। हे कर्तार! मैं साहंसियों वाले रूप में ही घूमता फिरता हूँ।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
फाही सुरति मलूकी वेसु ॥ हउ ठगवाड़ा ठगी देसु ॥ खरा सिआणा बहुता भारु ॥ धाणक रूपि रहा करतार ॥३॥
मूलम्
फाही सुरति मलूकी वेसु ॥ हउ ठगवाड़ा ठगी देसु ॥ खरा सिआणा बहुता भारु ॥ धाणक रूपि रहा करतार ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुरति = ध्यान। फाही सुरति = ध्यान इस तरफ है कि लोगों को फसा लूँ। मलूकी वेसु = फरिश्तों वाला पहिरावा, फकीरों वाला लिबास। ठगवाड़ा = ठगी का अड्डा। ठगी = ठगीं, मैं ठगता हूँ। खरा = बहुत। भारु = पापों का बोझ।3।
अर्थ: मेरा ध्यान इस तरफ रहता है कि लोगों को किसी ठगी में फसाऊँ। और मैंने फकीरों वाला लिबास पहना हुआ ह। मैंने ठगी का अड्डा बनाया हुआ है, देश को ठग रहा हूँ। (ज्यों ज्यों) मैं बहुत चतुर बनता हूँ, पापों का और-और भार (अपने सिर पर उठाता जाता हूँ)। हे कर्तार! मैं सांसियों वाला रूप धारण किये बैठा हूँ।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मै कीता न जाता हरामखोरु ॥ हउ किआ मुहु देसा दुसटु चोरु ॥ नानकु नीचु कहै बीचारु ॥ धाणक रूपि रहा करतार ॥४॥२९॥
मूलम्
मै कीता न जाता हरामखोरु ॥ हउ किआ मुहु देसा दुसटु चोरु ॥ नानकु नीचु कहै बीचारु ॥ धाणक रूपि रहा करतार ॥४॥२९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हरामखोरु = पराया हक खाने वाला। हउ = मैं। किआ मुहु देसा = मैं क्या मुंह दूंगा, मैं किस मुंह से तेरे सामने हाजिर होऊँगा? तेरे सामने पेश होते हुए मुझे बड़ी शर्म आएगी। नीच = मंद कर्मी। करतार = हे कर्तार! 4।
अर्थ: हे कर्तार! मैंने तेरी दातों की कद्र नहीं जानी, मैं पराया हक खाता हूँ। मैं विकारी हूँ, मैं (तेरा) चोर हूँ, तेरे सामने मैं किस मुंह से हाजिर होऊँगा? मंदकर्मी नानक यही बात कहता है: हे कर्तार! मैं तो सांहसीं रूप में जीवन व्यतीत कर रहा हूँ।4।29।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ घरु ४ ॥ एका सुरति जेते है जीअ ॥ सुरति विहूणा कोइ न कीअ ॥ जेही सुरति तेहा तिन राहु ॥ लेखा इको आवहु जाहु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ घरु ४ ॥ एका सुरति जेते है जीअ ॥ सुरति विहूणा कोइ न कीअ ॥ जेही सुरति तेहा तिन राहु ॥ लेखा इको आवहु जाहु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुरति = सूझ। एका सुरति = एक (परमात्मा की दी हुई) सूझ। जीअ = जीव। जेते = जितने। विहूणा = बगैर। कीअ = पैदा किया। तिन राहु = उन जीवों का जीवन रास्ता। लेखा इको = एक परमात्मा ही ये लेखा रखता है। आवहु जाहु = (मिली सुरति अनुसार) जीव आते हैं जाते हैं।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जीअ’ है ‘जीउ’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जितने भी जीव हैं (इन सबके अंदर) एक परमात्मा की ही बख्शी हुई सूझ काम कर रही है, (परमात्मा ने) कोई भी ऐसा जीव पैदा नहीं किया जिसे सूझ से वंचित रखा हो। जैसी सूझ (प्रभु जीवों को देता है) वैसा ही जीवन रास्ता वे पकड़ लेते हैं। (उसी मिली सूझ अनुसार) जीव (जगत में) आते हैं और (यहां) से चले जाते हैं। ये मर्यादा चलाने वाला प्रभु खुद ही है।1।
[[0025]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
काहे जीअ करहि चतुराई ॥ लेवै देवै ढिल न पाई ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
काहे जीअ करहि चतुराई ॥ लेवै देवै ढिल न पाई ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जीअ = हे जीव! लेवै = (जीव से सूझ) छीन लेता है।1। रहाउ।
अर्थ: हे जीव! तू (अपनी अच्छी सूझ दिखाने के लिए) क्यूँ चालाकी करता है? वह परमात्मा ही (जीवों को सूझ) देता है और ले भी लेता है। रत्ती मात्र भी समय नहीं लगाता।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तेरे जीअ जीआ का तोहि ॥ कित कउ साहिब आवहि रोहि ॥ जे तू साहिब आवहि रोहि ॥ तू ओना का तेरे ओहि ॥२॥
मूलम्
तेरे जीअ जीआ का तोहि ॥ कित कउ साहिब आवहि रोहि ॥ जे तू साहिब आवहि रोहि ॥ तू ओना का तेरे ओहि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: (ष्भ) तोहि = तू। कित = क्यूँ? साहिब = हे साहिब! रोहि = रोह में, गुस्से में। ओहि = वह सारे जीव।2।
अर्थ: हे मालिक प्रभु! सारे जीव तेरे पैदा किये हुए हैं। सभी जीवों का तू ही पति है। (अगर जीव तुझसे मिली सूझ अक्ल का गुमान भी करें फिर भी तू) गुस्से में नहीं आता (क्योंकि आखिर ये जीव तेरे ही हैं)। हे मालक प्रभु! अगर तू गुस्से में भी आये (तो किस पे आए?) तू उनका मालिक है वो सारे तेरे ही बनाये हुए हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
असी बोलविगाड़ विगाड़ह बोल ॥ तू नदरी अंदरि तोलहि तोल ॥ जह करणी तह पूरी मति ॥ करणी बाझहु घटे घटि ॥३॥
मूलम्
असी बोलविगाड़ विगाड़ह बोल ॥ तू नदरी अंदरि तोलहि तोल ॥ जह करणी तह पूरी मति ॥ करणी बाझहु घटे घटि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बोलविगाड़ = बड़बोले, विगड़े बोल बोलने वाले। विगाड़ह = हम बिगाड़ते हैं। विगाड़ह बोल = हम फीके बोल बोलते हैं। नदरी अंदरि = मेहर की निगाह से। तोलहि = तू तोलता है, तू परखता है। जह = जहां, जिस मनुष्य के अंदर। करणी = गुरु का बताया हुआ आचरण। घटे घटि = घट ही घट, मति कमजोर ही कमजोर।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘विगाड़ह’ वर्तमान उत्तम पुरख, बहुवचन है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (हे प्रभु!) हम जीव बड़बोले हैं, (तुझसे मिली सूझ अकल पर मान करके अनेक बार) फीके बोल बोल देते हैं। पर तू (हमारे कुबोलों को) मेहर की निगाह से परखता है। (गुरु के द्वारा बताए रास्ते पर चल के) जिस मनुष्य के अंदर ऊँचा आचरण बन जाता है उसकी सोच-समझ भी गंभीर हो जाती है (और वह बड़बोला नहीं बनता)। ऊँचे आचरण के बगैर आदमी की सूझ-बूझ भी नीची ही रहती है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रणवति नानक गिआनी कैसा होइ ॥ आपु पछाणै बूझै सोइ ॥ गुर परसादि करे बीचारु ॥ सो गिआनी दरगह परवाणु ॥४॥३०॥
मूलम्
प्रणवति नानक गिआनी कैसा होइ ॥ आपु पछाणै बूझै सोइ ॥ गुर परसादि करे बीचारु ॥ सो गिआनी दरगह परवाणु ॥४॥३०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: प्रणवति = विनती करता है। आपु = स्वयं को, अपनी असलीयत को। परसादि = कृपा से।4।
अर्थ: नानक बेनती करता है: असल ज्ञानवान मनुष्य वह है जो अपने असल को पहचानता है, जो उस परमात्मा को ही (अक्लदाता) समझता है। जो गुरु की मेहर से (अपनी चतुराई छोड़ के बुद्धि-दाता प्रभु के गुणों का) विचार करता है। ऐसा ज्ञानवान मनुष्य प्रभु की हजूरी में स्वीकार हो जाता है।4।30।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ घरु ४ ॥ तू दरीआउ दाना बीना मै मछुली कैसे अंतु लहा ॥ जह जह देखा तह तह तू है तुझ ते निकसी फूटि मरा ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ घरु ४ ॥ तू दरीआउ दाना बीना मै मछुली कैसे अंतु लहा ॥ जह जह देखा तह तह तू है तुझ ते निकसी फूटि मरा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दाना = जानने वाला। बीना = देखने वाला (बीनाई = नजर)। मछुली = छोटी सी मछली। मै कैसे लहा = लहां, ढूँढू, मैं कैसे ढूँढू? मैं नहीं ढूंढ सकती। जह जह = जिधर जिधर। देखा = देखूं, मैं देखती हूँ। ते = से। निकसी = निकली हुई, विछुड़ी हुई। फूटि मरा = मैं फूट के मर जाती हूं।1।
अर्थ: हे प्रभु! तू (एक) दरिया के (समान) है, मैं (तेरे में रहने वाली) एक छोटी सी मछली हूं। मैं तेरा आखिरी छोर नहीं ढूंढ सकती। (मेरी हालत) तू ही जानता है, तू ही (नित्य) देखता है। मैं (मछली और दरिया में) जहां देखती हूं उधर तू ही तू (दरिया ही दरिया) है। अगर मैं दरिया में से बाहर निकल जाऊँ, तो उस वक्त तड़फ के मर जाती हूं (मेरा जीवन तेरे ही आसरे है)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
न जाणा मेउ न जाणा जाली ॥ जा दुखु लागै ता तुझै समाली ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
न जाणा मेउ न जाणा जाली ॥ जा दुखु लागै ता तुझै समाली ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मेउ = मल्लाह, माछी।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: दरियाओं के किनारे आमतौर पे मल्लाह मछली पकड़ने का काम भी करते हैं।
दर्पण-भाषार्थ
समाली = मैं याद करती हूं।1। रहाउ।
अर्थ: (हे दरिया रूपी प्रभु! तुझसे विछोड़ने वाले) ना मुझे माछी की समझ है, ना ही एसके जाल की (उनसे बचना मेरे बस की बात नहीं)। (तुझसे बिछोड़ने के वास्ते) जब मुझे कोई (आत्मिक) दुख व्यापता है, तो मैं तुझे याद करती हूं।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तू भरपूरि जानिआ मै दूरि ॥ जो कछु करी सु तेरै हदूरि ॥ तू देखहि हउ मुकरि पाउ ॥ तेरै कमि न तेरै नाइ ॥२॥
मूलम्
तू भरपूरि जानिआ मै दूरि ॥ जो कछु करी सु तेरै हदूरि ॥ तू देखहि हउ मुकरि पाउ ॥ तेरै कमि न तेरै नाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भरपूरि = हर जगह मौजूद। करी = मैं करता हूं। तेरै हदूरि = तेरी हाजरी में। तू देख लेता है। मुकरि पाउ = मैं मुकर जाता हूं। तेरै कंमि = तेरे काम में। तेरै नाइ = तेरे नाम में।2।
अर्थ: हे प्रभु! तू (इस जगत में) हर जगह मौजूद है। मैंने तुझे कहीं दूर बसा हुआ समझा हुआ है (असलीयत ये है कि) जो कुछ मैं करता हूँ, वह तेरी हजूरी में ही कर रहा हूँ। तू सब कुछ देखता है। (फिर भी) मैं अपने किये काम से मुकर जाता हूँ। मैं ना उस काम में लगता हूँ जो तुझे स्वीकार हों, ना ही मैं तेरे नाम में जुड़ता हूँ।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जेता देहि तेता हउ खाउ ॥ बिआ दरु नाही कै दरि जाउ ॥ नानकु एक कहै अरदासि ॥ जीउ पिंडु सभु तेरै पासि ॥३॥
मूलम्
जेता देहि तेता हउ खाउ ॥ बिआ दरु नाही कै दरि जाउ ॥ नानकु एक कहै अरदासि ॥ जीउ पिंडु सभु तेरै पासि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जेता = जितना कुछ। देहि = तू देता है। हउ = मैं। बिआ = दूसरा। दरु = दरवाजा, घर। कै दरि = किस के दर पे? जाउ = जाऊँ। तेरै पासि = तेरे पास, तेरे हवाले हैं, तेरे ही आसरे हैं।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: मिआनुो, जहानुो, परवानुो (असल शब्द है ‘मिआनु जहानु और परवानु’)। छंद की चाल पूरी रखने के लिए एक मात्रा बढ़ाई गई है, इनको पढ़ना है: मिआनो, जहानो व परवानो।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे प्रभु! जो कुछ तू मुझे देता है, मैं वही खाता हूँ। कोई और दरवाजा नहीं है जहां मैं जाऊँ (और सवाली बनूँ)। नानक सिर्फ इतनी विनती करता है कि ये जीवात्मा तेरी ही दी हुई हैये शरीर भी तेरा ही दिया हुआ है, ये सब कुछ तेरे ही आसरे रह सकता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपे नेड़ै दूरि आपे ही आपे मंझि मिआनुो ॥ आपे वेखै सुणे आपे ही कुदरति करे जहानुो ॥ जो तिसु भावै नानका हुकमु सोई परवानुो ॥४॥३१॥
मूलम्
आपे नेड़ै दूरि आपे ही आपे मंझि मिआनुो ॥ आपे वेखै सुणे आपे ही कुदरति करे जहानुो ॥ जो तिसु भावै नानका हुकमु सोई परवानुो ॥४॥३१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मंझि = बीच में। मिआनु = दरमिआन, बीच का हिस्सा। तिसु भावै = जो उस प्रभु को ठीक लगे। कुदरति = सत्य, ताकत।4।
अर्थ: प्रभु खुद ही हरेक जीव के नजदीक है, खुद ही दूर भी है। खुद ही सारे जगत में मौजूद है। प्रभु खुद ही हरेक जीव की संभाल करता है, खुद ही हरेक की अरजोई सुनता है, खुद ही अपनी कुदरत से सत्ता से जगत को पैदा करता है। हे नानक! जो हुकमउसको ठीक लगता है, वही हरेक जीव को स्वीकार करना पड़ता है।4।31।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ घरु ४ ॥ कीता कहा करे मनि मानु ॥ देवणहारे कै हथि दानु ॥ भावै देइ न देई सोइ ॥ कीते कै कहिऐ किआ होइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ घरु ४ ॥ कीता कहा करे मनि मानु ॥ देवणहारे कै हथि दानु ॥ भावै देइ न देई सोइ ॥ कीते कै कहिऐ किआ होइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कीता = पैदा किया हुआ जीव। मनि = मन में। कहा मानु करे = क्या मान कर सकता है? कै हथि = के हाथ में। भावै = यदि ठीक लगे,अगर उसकी मर्जी हो। कै कहीऐ = के कहने से।1।
अर्थ: (दुनिया के पदार्तों का) बटवारा (की ताकत) दातार प्रभु के अपने हाथ में है। प्रभु का पैदा किया हुआ जीव अपने मन में (माया का) क्या मान कर सकता है? उसकी मर्जी है कि धन पदार्थ दे या ना दे। पैदा किये जीव के कहने से कुछ नहीं बन सकता।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपे सचु भावै तिसु सचु ॥ अंधा कचा कचु निकचु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
आपे सचु भावै तिसु सचु ॥ अंधा कचा कचु निकचु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचु = सदा स्थिर रहने वाला। तिसु = उस को। अंधा = ज्ञानहीन। कचा = कच्चा, होछा। कचु = होछा। निकचु = बिल्कुल होछा।1। रहाउ।
अर्थ: परमात्मा सदा स्थिर रहने वाला है। उसे सदा स्थिर रहने वाला (अपना नाम) ही पसंद आता है। पर ज्ञानहीन जीव (माया की मलकियत के कारण) होछा है, सदा होछा ही रहता है (प्रभु को ये होछापन पसंद नहीं आ सकता)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जा के रुख बिरख आराउ ॥ जेही धातु तेहा तिन नाउ ॥ फुलु भाउ फलु लिखिआ पाइ ॥ आपि बीजि आपे ही खाइ ॥२॥
मूलम्
जा के रुख बिरख आराउ ॥ जेही धातु तेहा तिन नाउ ॥ फुलु भाउ फलु लिखिआ पाइ ॥ आपि बीजि आपे ही खाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आराउ = आरास्तगी, सजावट। जा के = जिस के (पैदा किये हुए)। धातु = असलीयत। भाउ = भावना, रुचि। बीजि = बीज के। खाइ = खाता है।2।
अर्थ: जिस परमात्मा के (पैदा किये हुए यह) पेड़-पौधे हैं वह ही इन्हें सजावट देता है। जैसी वृक्षों की असलियत होती है वैसा ही उनका नाम पड़ जाता है। (वैसे ही उनमें फल-फूल पनपते हैं)। (इस तरह जैसी) भावना के फूल (किसी मनुष्य के अंदर है) उसी अनुसार उसको जीवन फल लगता है। (उसका जीवन बनता है)। हरेक इन्सान जो कुछ खुद बीजता है, खुद ही खाता है (जैसे कर्म करता है वैसा ही जीवन बनता है)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कची कंध कचा विचि राजु ॥ मति अलूणी फिका सादु ॥ नानक आणे आवै रासि ॥ विणु नावै नाही साबासि ॥३॥३२॥
मूलम्
कची कंध कचा विचि राजु ॥ मति अलूणी फिका सादु ॥ नानक आणे आवै रासि ॥ विणु नावै नाही साबासि ॥३॥३२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कंध = (जीवन निर्माण की) दीवार। राजु = (जीवन निर्माण बनाने वाला) मन। अलूणी = गुण हीन। सादु = स्वाद (भाव, जीवन)। आणे रासि = यदि रासि लाए, अगर सुधार दे। आवै रासि = सुधर जाता है। साबासि = आदर, इज्जत।3।
अर्थ: जिस मनुष्य के अंदर अन्जान मन (जीवन निर्माण करने वाला) राज-मिस्त्री (कारीगर) है, उसकी जीवन निर्माण की दीवार भी कच्ची (कमजोर) ही बनती है। उसकी अक्ल भी फीकी व उसका सारा जीवन भी फीका (बे-रसा) ही रहता है। (पर जीव के क्या बस?) हे नानक! अगर प्रभु खुद जीव के जीवन को सुधारे तोही सुधरता है। (वर्ना) प्रभु के नाम से वंचित रहके उसकी हजूरी में आदर नहीं मिलता।3।32।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ घरु ५ ॥ अछल छलाई नह छलै नह घाउ कटारा करि सकै ॥ जिउ साहिबु राखै तिउ रहै इसु लोभी का जीउ टल पलै ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ घरु ५ ॥ अछल छलाई नह छलै नह घाउ कटारा करि सकै ॥ जिउ साहिबु राखै तिउ रहै इसु लोभी का जीउ टल पलै ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अछल = जो छली ना जा सके, जिसे कोई ठग ना सके। न छलै = नहीं ठगी जाती, धोखा नहीं खाती। छलाई नह छलै = जो कोई छलने का यत्न करे भी, तो भी वह छली नहीं जा सकती। घाउ = जख्म। साहिबु = मालिक, प्रभु। टलपलै = डोलता है।1।
अर्थ: अछल माया, जिसको कोई छलने का प्रयत्न करे तो भी वह छली नहीं जाती। जिसको किसी की कटार कोई जख्म नहीं कर सकती (जिसे कोई मार नहीं सकता) - के आगे लोभी जीव का मन डोल जाता है। मालिक प्रभु की रजा इसी तरह की है (भाव, जगत में नियम ही ये है कि जहां नाम नहीं वहां मन माया के आगे डोल जाता है)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बिनु तेल दीवा किउ जलै ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
बिनु तेल दीवा किउ जलै ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: किउ जलै = जलता नहीं रह सकता।1। रहाउ।
अर्थ: (स्मरण के) तेल के बिना (आत्मिक जीवन का) दिया कैसे टहकता रह सकता है? (माया मोह की अंधेरी के झोके जीवात्मा को अडोल नहीं रहने देते) 1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पोथी पुराण कमाईऐ ॥ भउ वटी इतु तनि पाईऐ ॥ सचु बूझणु आणि जलाईऐ ॥२॥
मूलम्
पोथी पुराण कमाईऐ ॥ भउ वटी इतु तनि पाईऐ ॥ सचु बूझणु आणि जलाईऐ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कमाईऐ = कमाई करें, जीवन बनाएं। इतु = इस में। तनि = तन में। इतु तनि = इस तन में। सचु बूझणु = सच को समझना, सदा स्थिर प्रभु से सांझ डालना। आणि = ला के।2।
अर्थ: धर्म पुस्तकों के हिसाब से जीवन बनाएं (ये हो तेल), परमात्मा का डर-ये शरीर (दिए, दीपक) में बाती डाल दें, परमात्मा के साथ गहरी सांझ (ये हो आग) के साथ जलाएं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इहु तेलु दीवा इउ जलै ॥ करि चानणु साहिब तउ मिलै ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
इहु तेलु दीवा इउ जलै ॥ करि चानणु साहिब तउ मिलै ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: ये नाम तेल हो, तभी इस जीवन का दीपक टहकता है। (हे भाई!) प्रभु के नाम का प्रकाश कर, तभी मालिक प्रभु के दर्शन होते हैं।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इतु तनि लागै बाणीआ ॥ सुखु होवै सेव कमाणीआ ॥ सभ दुनीआ आवण जाणीआ ॥३॥
मूलम्
इतु तनि लागै बाणीआ ॥ सुखु होवै सेव कमाणीआ ॥ सभ दुनीआ आवण जाणीआ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बाणीआ = गुरु की वाणी। लागै = असर करे।3।
अर्थ: (जिस मनुष्य को) इस शरीर में गुरु का उपदेश असर करता है। (प्रभु की) सेवा करने से (स्मरण करने से) उसको आत्मिक आनंद मिलता है। जगत उसको नाशवान दिखाई देता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
विचि दुनीआ सेव कमाईऐ ॥ ता दरगह बैसणु पाईऐ ॥ कहु नानक बाह लुडाईऐ ॥४॥३३॥
मूलम्
विचि दुनीआ सेव कमाईऐ ॥ ता दरगह बैसणु पाईऐ ॥ कहु नानक बाह लुडाईऐ ॥४॥३३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बैसणु = बैठने की जगह। बाह लुडाईऐ = बे-फिक्र हो जाना।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: इस शब्द में ‘रहाउ’ के दो बंद है। पहले ‘रहाउ’ में प्रश्न किया गया है और दूसरे ‘रहाउ’ में प्रश्न का उत्तर है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (हे भाई!) दुनिया में (आ के) प्रभु की सेवा (स्मरण) करना चाहिए तभी उसकी हजूरी में बैठने की जगह मिलती है। हे नानक! कह: (नाम जपने की इनायत से) बे-फिक्र हो जाते हैं। (फिर कोई चिन्ता-सोग नही व्याप्त होता)।4।33।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: सिरी राग में गुरु नानक देव जी के ये 33 शब्द हैं।
[[0026]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ घरु १ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ सतिगुरु सेवी आपणा इक मनि इक चिति भाइ ॥ सतिगुरु मन कामना तीरथु है जिस नो देइ बुझाइ ॥ मन चिंदिआ वरु पावणा जो इछै सो फलु पाइ ॥ नाउ धिआईऐ नाउ मंगीऐ नामे सहजि समाइ ॥१॥
मूलम्
हउ सतिगुरु सेवी आपणा इक मनि इक चिति भाइ ॥ सतिगुरु मन कामना तीरथु है जिस नो देइ बुझाइ ॥ मन चिंदिआ वरु पावणा जो इछै सो फलु पाइ ॥ नाउ धिआईऐ नाउ मंगीऐ नामे सहजि समाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हउ = मैं। सेवी = मैं सेवा करता हूं। इक मनि = एक मन हो के, एकाग्र हो के। भाइ = प्रेम से। भाउ = प्रेम। कामना = इच्छा। मन कामना = मन की कामनाएं। देइ बुझाइ = समझा देता है। मन चिंदिआ = मन इच्छित। वरु = मांग, बख्शीश। नामे = नाम ही, नाम से ही। सहजि = आत्मिक अडोलता में।1।
अर्थ: मैं एकाग्र मन हो के, एकाग्र चित्त हो केप्रेम से अपने सतिगुरु की शरण लेता हूँ। सत्गुरू मन की इच्छाएं पूरी करने वाला तीर्थ है (पर ये समझ उस मनुष्य को ही आता है) जिस को (गुरु स्वयं) समझाए। (गुरु के द्वारा) मन-इच्छित मांग मिल जाती है। मनुष्य जो इच्छा धारण करता है वही फल हासिल कर लेता है। (पर) परमात्मा का नाम ही स्मरणा चाहिए और (गुरु की ओर से) नाम ही मांगना चाहिए। नाम में जुड़ा हुआ मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे हरि रसु चाखु तिख जाइ ॥ जिनी गुरमुखि चाखिआ सहजे रहे समाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे हरि रसु चाखु तिख जाइ ॥ जिनी गुरमुखि चाखिआ सहजे रहे समाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तिख = तृखा, प्यास, तृष्णा। जाइ = दूर हो जाए। गुरमुखि = गुरु के द्वारा।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! परमात्मा (के नाम) का स्वाद चख, (तेरी माया वाली) तृष्णा दूर हो जाएगी। जिस लोगों ने गुरु की शरण पड़ के ‘हरि जस’ चखा है, वे आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनी सतिगुरु सेविआ तिनी पाइआ नामु निधानु ॥ अंतरि हरि रसु रवि रहिआ चूका मनि अभिमानु ॥ हिरदै कमलु प्रगासिआ लागा सहजि धिआनु ॥ मनु निरमलु हरि रवि रहिआ पाइआ दरगहि मानु ॥२॥
मूलम्
जिनी सतिगुरु सेविआ तिनी पाइआ नामु निधानु ॥ अंतरि हरि रसु रवि रहिआ चूका मनि अभिमानु ॥ हिरदै कमलु प्रगासिआ लागा सहजि धिआनु ॥ मनु निरमलु हरि रवि रहिआ पाइआ दरगहि मानु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निधानु = खजाना। अंतरि = (उनके) अंदर। रवि रहिआ = रचा हुआ, रमिया। मनि = मन में से। हिरदे कमल-हृदय का कमल फूल।2।
अर्थ: जिस लोगों ने सत्गुरू की शरण ली है, उन्होंने (सभ पदार्तों का) खजाना प्रभु नाम प्राप्त कर लिया है। उनके हृदय में नाम रस रच गया है, उनके मन से अहंकार दूर हो गया है। उनके हृदय में कमल फूल खिल गया है। उनकी तवज्जो आत्मिक अडोलता में लग गई है। उनका पवित्र (हो चुका) मन हर वक्त परमात्मा का नाम स्मरण करता है, उनको परमात्मा की हजूरी में आदर मिलता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतिगुरु सेवनि आपणा ते विरले संसारि ॥ हउमै ममता मारि कै हरि राखिआ उर धारि ॥ हउ तिन कै बलिहारणै जिना नामे लगा पिआरु ॥ सेई सुखीए चहु जुगी जिना नामु अखुटु अपारु ॥३॥
मूलम्
सतिगुरु सेवनि आपणा ते विरले संसारि ॥ हउमै ममता मारि कै हरि राखिआ उर धारि ॥ हउ तिन कै बलिहारणै जिना नामे लगा पिआरु ॥ सेई सुखीए चहु जुगी जिना नामु अखुटु अपारु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सेवनि = (जो) सेवा करते हैं। संसारि = संसार में। मम = मेरा। ममता = मलकीअत की लालसा। उरधारि = हृदय में टिका के। उर = हृदय। सेई = वही। चहुं जुगी = चारों युगों में, सदा ही। अखुटु = कभी ना खत्म होने वाला। अपारु = बेअंत, जिसका पार न पड़ सके।3।
अर्थ: (पर) जगत में वह लोग बिरले हैं जो सत्गुरू की शरण लेते हैं, जो अहंकार व मल्कियत की लालसा को मार के अपने हृदय में परमात्मा को टिकाते हैं। मैं उन लोगों के सदके हूँ जिनका सदा परमात्मा के नाम में ही प्रेम बना रहता है। वही लोग सदा सुखी रहते हैं जिनके पास कभी ना खत्म होने वाला बेअंत नाम (का खजाना) है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर मिलिऐ नामु पाईऐ चूकै मोह पिआस ॥ हरि सेती मनु रवि रहिआ घर ही माहि उदासु ॥ जिना हरि का सादु आइआ हउ तिन बलिहारै जासु ॥ नानक नदरी पाईऐ सचु नामु गुणतासु ॥४॥१॥३४॥
मूलम्
गुर मिलिऐ नामु पाईऐ चूकै मोह पिआस ॥ हरि सेती मनु रवि रहिआ घर ही माहि उदासु ॥ जिना हरि का सादु आइआ हउ तिन बलिहारै जासु ॥ नानक नदरी पाईऐ सचु नामु गुणतासु ॥४॥१॥३४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरि मिलिऐ = अगर गुरु मिल जाए। चूकै = दूर हो जाता है। सेती = साथ। रवि रहिआ = एक मेक हुआ रहता है। घर ही माहि = घर में ही। उदासु = निर्लिप,उपराम। सादु = स्वाद। हउ जासु = मैं जाता हूं। बलिहारै = कुर्बान। नदरी = मेहर की नजर से। गुणतासु = गुणों का खजाना।4।
अर्थ: अगर गुरु मिल जाए तो परमात्मा का नाम प्राप्त हो जाता है। (नाम की इनायत से) माया का मोह दूर हो जाता है, माया की तृष्णा खत्म हो जाती है। मनुष्य का मन परमात्मा (की याद) में एकमेक होया रहता है, दुनिया के काम काज करता हुआ ही (माया से) उपराम रहता है।
मैं उन लोगों पर बलिहार जाता हूँ। जिन्हें परमात्मा के नाम का स्वाद आ गया है।
हे नानक! परमात्मा की मेहर की नजर से ही परमात्मा का सदा स्थिर रहने वाले व सारे गुणों का खजाना नाम प्राप्त होता है।4।1।34।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: अंक 34 का भाव ये है गुरु नानक देव जी के 33 और गुरु अमरदास जी का ये एक शब्द मिला के सारा जोड़ 34 बना।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ बहु भेख करि भरमाईऐ मनि हिरदै कपटु कमाइ ॥ हरि का महलु न पावई मरि विसटा माहि समाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ बहु भेख करि भरमाईऐ मनि हिरदै कपटु कमाइ ॥ हरि का महलु न पावई मरि विसटा माहि समाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भेख करि = धार्मिक पहनावे पहन कर। करि = कर के। भरमाईऐ = भटकन में पड़ जाते हैं। मनि = मन में। हिरदै = हृदय में। कपटु = धोखा। कमाइ = कमा के, करके। महलु = टिकाना। पावई = प्राप्त करता है, ढूंढ लेता है। मरि = (आत्मिक मौत) मर के। विसटा माहि = गंद में, विकार रूपी गंद में।1।
अर्थ: बहुत सारे धार्मिक पहरावे पहन के (दूसरों को ठगने के लिए अपने) मन में दिल में खोट कमा के (मनुष्य खुद ही) भटकन में उलझ के रह जाता है। (जो मनुष्य ये दिखावा ठगी करता है वह) परमात्मा की हजूरी प्राप्त नहीं कर सकता। (बल्कि वह) आत्मिक मौत मर कर (ठगी आदि) विकारों के गंद में फसा रहता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे ग्रिह ही माहि उदासु ॥ सचु संजमु करणी सो करे गुरमुखि होइ परगासु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे ग्रिह ही माहि उदासु ॥ सचु संजमु करणी सो करे गुरमुखि होइ परगासु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचु = सदा स्थिर प्रभु का नाम। संजमु = विकारों से परहेज। करणी = करनी, कर्तव्य, करने योग्य काम। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ के। परगासु = (आत्मिक) प्रकाश, सूझ।1। रहाउ।
अर्थ: हे (मेरे) मन! गृहस्थ में (रहते हुए) ही (माया के मोह से) निर्लिप (रह)। (पर जिस मनुष्य के हृदय में) गुरु की शरण पड़ के समझ पैदा होती है, वह मनुष्य (ही) सदा स्थिर प्रभु नाम नाम जपने की कमाई करता है और विकारों से संकोच करता है (इस वास्ते, हे मन! गुरु की शरण पड़ के ये करने योग्य कामों को करने का ढंग सीखो)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर कै सबदि मनु जीतिआ गति मुकति घरै महि पाइ ॥ हरि का नामु धिआईऐ सतसंगति मेलि मिलाइ ॥२॥
मूलम्
गुर कै सबदि मनु जीतिआ गति मुकति घरै महि पाइ ॥ हरि का नामु धिआईऐ सतसंगति मेलि मिलाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सबदि = शब्द द्वारा। गति = ऊँची आत्मिक अवस्था। मुकति = विकारों से खलासी। घरै = घर ही। घरै महि = घर ही में। मेलि = मेल में, जब लोगों का समारोह हुआ हो, उसमें। मिलाइ = मिल के।2।
अर्थ: जिस मनुष्य ने गुरु के शब्द में जुड़ के अपने मन को वस में कर लिया है, वह गृहस्थ में रहते हुए भी ऊँची आत्मिक अवस्था प्राप्त कर लेता है, विकारों से खलासी पा लेता है। (इस वास्ते हे मन!) साधु-संगत के एकत्र में मिल के परमात्मा के नाम का स्मरण करना चाहिए।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जे लख इसतरीआ भोग करहि नव खंड राजु कमाहि ॥ बिनु सतगुर सुखु न पावई फिरि फिरि जोनी पाहि ॥३॥
मूलम्
जे लख इसतरीआ भोग करहि नव खंड राजु कमाहि ॥ बिनु सतगुर सुखु न पावई फिरि फिरि जोनी पाहि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नवखंड राजु = सारी धरती का राज। न पावही = तू प्राप्त नही करेगा।3।
अर्थ: (हे भाई!) अगर तू (काम-वासना पूरी करने के लिए) लाखों स्त्रीयां भी भोग ले, अगर तू सारी धरती का राज भी कर ले, तो भी सत्गुरू की शरण के बिना आत्मिक सुख नहीं मिल सकेगा, (बल्कि) बारम्बार योनियों में पड़ा रहेगा।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि हारु कंठि जिनी पहिरिआ गुर चरणी चितु लाइ ॥ तिना पिछै रिधि सिधि फिरै ओना तिलु न तमाइ ॥४॥
मूलम्
हरि हारु कंठि जिनी पहिरिआ गुर चरणी चितु लाइ ॥ तिना पिछै रिधि सिधि फिरै ओना तिलु न तमाइ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कंठि = गले में। लाइ = लगा के। रिधि सिधि = करामाती ताकतें। तिलु = रत्ती भर। तमाइ = तमा, लालच।4।
अर्थ: जिस लोगों ने गुरु के चरणों में मन जोड़ के परमात्मा के नाम स्मरण का हार अपने गले में पहन लिया है, करामाती ताकतें उनके पीछे पीछे चलतीं हैं, पर उनहें उसका रत्ती मात्र भी लालच नहीं होता।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जो प्रभ भावै सो थीऐ अवरु न करणा जाइ ॥ जनु नानकु जीवै नामु लै हरि देवहु सहजि सुभाइ ॥५॥२॥३५॥
मूलम्
जो प्रभ भावै सो थीऐ अवरु न करणा जाइ ॥ जनु नानकु जीवै नामु लै हरि देवहु सहजि सुभाइ ॥५॥२॥३५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: प्रभ भावै = हे प्रभु! तुझे पसंद हो। जीवै = आत्मिक जीवन प्राप्त कर सके। हरि = हे हरि! स्हजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाइ = प्रेम में।5।
अर्थ: (पर, हम जीवों के भी क्या बस?) हे प्रभु! जो कुछ तुझे ठीक लगता है वही होता है। (तेरी मर्जी के बग़ैर) और कुछ नहीं किया जा सकता। हे हरि! (मुझे) अपना नाम बख्श, ता कि आत्मिक अडोलता में टिक के, तेरे प्रेम में जुड़ के (तेरा) दास नानक (तेरा) नाम स्मरण करके आत्मिक जीवन प्राप्त कर सके।5।2।35।
[[0027]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ घरु १ ॥ जिस ही की सिरकार है तिस ही का सभु कोइ ॥ गुरमुखि कार कमावणी सचु घटि परगटु होइ ॥ अंतरि जिस कै सचु वसै सचे सची सोइ ॥ सचि मिले से न विछुड़हि तिन निज घरि वासा होइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ घरु १ ॥ जिस ही की सिरकार है तिस ही का सभु कोइ ॥ गुरमुखि कार कमावणी सचु घटि परगटु होइ ॥ अंतरि जिस कै सचु वसै सचे सची सोइ ॥ सचि मिले से न विछुड़हि तिन निज घरि वासा होइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सिरकार = राज। सभ कोइ = हरेक जीव। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख हो के। सचु = सदा स्थिर रहने वाला प्रभु। घटि = हृदय में। सोइ = शोभा। सचे सोइ = सच्चे की शोभा, सदा स्थिर प्रभु का रूप हो चुके बंदे की शोभा। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। निज घरु = अपने घर में, अपनी आत्मा में (भाव, बाहर माया के पीछे भटकन खत्म हो जाती है)।1।
अर्थ: (जिस देश में) जिस (बादशाह) की हकूमत हो (उस देश का) हरेक जीव उसी (बादशाह) का हो के रहता है (इसी तरह अगर) गुरु के सन्मुख हो के कर्म किया जाए तो सदा स्थिर रहने रहने वाला प्रभु हृदय में प्रगट हो जाता है (और गुरु के सन्मुख हो के) जिस मनुष्य के हृदय में सदा स्थिर रहने वाला प्रभु प्रगट हो जाए वह सदा स्थिर प्रभु का रूप हो जाता है, और सदा स्थिर शोभा पाता है।
जो लोग सदा स्थिर प्रभु से जुड़े रहते हैं, वह उससे दुबारा कभी विछड़ते नहीं, उनका निवास सदा अपने अंतरात्मे में रहता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे राम मै हरि बिनु अवरु न कोइ ॥ सतगुरु सचु प्रभु निरमला सबदि मिलावा होइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे राम मै हरि बिनु अवरु न कोइ ॥ सतगुरु सचु प्रभु निरमला सबदि मिलावा होइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मै = मेरे वास्ते, मेरा। सबदि = शब्द द्वारा।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे राम! प्रभु के बिना मेरा और कोई आसरा नहीं है। (हे भाई!) उस प्रभु के साथ मिलाप उस गुरु के शब्द में जुड़ने से ही हो सकता है जो पवित्र स्वरूप है और जो सदा स्थिर प्रभु का रूप है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सबदि मिलै सो मिलि रहै जिस नउ आपे लए मिलाइ ॥ दूजै भाइ को ना मिलै फिरि फिरि आवै जाइ ॥ सभ महि इकु वरतदा एको रहिआ समाइ ॥ जिस नउ आपि दइआलु होइ सो गुरमुखि नामि समाइ ॥२॥
मूलम्
सबदि मिलै सो मिलि रहै जिस नउ आपे लए मिलाइ ॥ दूजै भाइ को ना मिलै फिरि फिरि आवै जाइ ॥ सभ महि इकु वरतदा एको रहिआ समाइ ॥ जिस नउ आपि दइआलु होइ सो गुरमुखि नामि समाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नउ = को। आपे = (प्रभु) खुद ही। भाइ = प्यार में। दूजै भाइ = प्रभु के बिना किसी और के प्यार में। आवै जाइ = पैदा होता है मरता है। इकु = परमात्मा ही। नामु = नाम में।2।
अर्थ: जो मनुष्य गुरु के शब्द में जुड़ता है, वह प्रभु चरणों में जुड़ा रहता है (पर वही मनुष्य मिलता है) जिसे परमात्मा खुद ही (अपने चरणों में) मिलाता है। (प्रभु को विसार के) किसी और (माया आदि) के प्यार में रहने से कोई भी परमात्मा को नहीं मिल सकता। वह तो बार-बार पैदा होता और मरता रहता है। (यद्यपि) सभी जीवों में परमात्मा ही बसता है, और हर जगह परमात्मा ही मौजूद है, फिर भी वही मनुष्य गुरु के सन्मुख हो के उस के नाम में लीन होता है जिसके ऊपर प्रभु खुद दयावान हो।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पड़ि पड़ि पंडित जोतकी वाद करहि बीचारु ॥ मति बुधि भवी न बुझई अंतरि लोभ विकारु ॥ लख चउरासीह भरमदे भ्रमि भ्रमि होइ खुआरु ॥ पूरबि लिखिआ कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥३॥
मूलम्
पड़ि पड़ि पंडित जोतकी वाद करहि बीचारु ॥ मति बुधि भवी न बुझई अंतरि लोभ विकारु ॥ लख चउरासीह भरमदे भ्रमि भ्रमि होइ खुआरु ॥ पूरबि लिखिआ कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जोतकी = ज्योतिषी। वाद = झगड़े, बहस। वाद वीचारु = बहस की विचार। भवी = भटक जाती है, गलत रास्ते पड़ जाना। न बुझई = वह समझते नहीं हैं। भ्रमि = भटक के। होइ खुआरु = खुआर हो के। पूरबि = पहिले किये अनुसार।3।
अर्थ: पंडित और ज्योतिषी लोग (शास्त्र) पढ़-पढ़ के (सिर्फ) बहसें ही विचार करते हैं, (इस तरह) उनकी मति उनकी अक्ल कुराहे पड़ जाती है, वह (जीवन के सही रास्ते को) नहीं समझते। उनके अंदर लोभ-विकार (प्रबल होता) है। वह (माया के पीछे) भटक-भटक के (लोभ लहर में) खुआर हो हो के चौरासी लाख जोनियों के चक्कर में भटकते रहते हैं। पर उनके भी क्या वस? पूर्वले जीवन में किये करमों से अंकुरित संस्कारों के अनुसार ही कमाई करनी है। कोई (अपने उद्यम से उन संस्कारों को) मिटा नहीं सकता।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतगुर की सेवा गाखड़ी सिरु दीजै आपु गवाइ ॥ सबदि मिलहि ता हरि मिलै सेवा पवै सभ थाइ ॥ पारसि परसिऐ पारसु होइ जोती जोति समाइ ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन सतगुरु मिलिआ आइ ॥४॥
मूलम्
सतगुर की सेवा गाखड़ी सिरु दीजै आपु गवाइ ॥ सबदि मिलहि ता हरि मिलै सेवा पवै सभ थाइ ॥ पारसि परसिऐ पारसु होइ जोती जोति समाइ ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन सतगुरु मिलिआ आइ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गाखड़ी = मुश्किल, कठिन। दीजै = देना पड़ता है। आपु = स्वै भाव। गवाइ = गवा के, दूर करके। थाइ पवै = स्वीकार होती है। पारसि परसिऐ = यदि पारस को छू लें। पारसि = पारस द्वारा। परसिऐ = परसे हुए के द्वारा। पारस = वह पत्थर जो सभ धातुओं को अपनी छूह से सोना बना देने वाला माना जाता है। जोती = परमात्मा की ज्योति में। समाइ = लीन हो जाती है।4।
अर्थ: (ये संस्कार मिटते हैं गुरु की शरण पड़ने से, पर) गुरु की बताई सेवा बहुत कठिन है, स्वै-भाव गवा के सिर देना पड़ता है। जब कोई जीव गुरु के शब्द में जुड़ते हैं, तो उनको परमात्मा मिल जाता है, उनकी सेवा स्वीकार हो जाती है। (गुरु) पारस को मिलने से पारस ही हो जाते हैं। (गुरु की सहायता से) परमात्मा की ज्योति में मनुष्य की ज्योति मिल जाती है। पर, गुरु भी उनको ही मिलता है, जिनके भाग्य में धुर से ही (बख्शिश के लेख) लिखे हों।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन भुखा भुखा मत करहि मत तू करहि पूकार ॥ लख चउरासीह जिनि सिरी सभसै देइ अधारु ॥ निरभउ सदा दइआलु है सभना करदा सार ॥ नानक गुरमुखि बुझीऐ पाईऐ मोख दुआरु ॥५॥३॥३६॥
मूलम्
मन भुखा भुखा मत करहि मत तू करहि पूकार ॥ लख चउरासीह जिनि सिरी सभसै देइ अधारु ॥ निरभउ सदा दइआलु है सभना करदा सार ॥ नानक गुरमुखि बुझीऐ पाईऐ मोख दुआरु ॥५॥३॥३६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मन = हे मन! मत करहि = ना करना। पुकार = शिकायत, गिला, गुजारिश। जिनि = जिस (प्रभु) ने। सिरी = पैदा की है। सभसै = हरेक जीव को। देइ = देता है। अधारु = आसरा, रोजी। सार = संभाल। मोख दुआरु = विकारों से खलासी का दरवाजा।5।
अर्थ: हे (मेरे) मन! हर वक्त तृष्णा के अधीन ना टिका रह, और गिले-शिकवे ना करता रह। जिस परमात्मा ने चौरासी लाख जूनें पैदा की हैं, वह हरेक जीव को (रोजी का) आसरा (भी) देता है। वह प्रभु जिसे किसी का डर नहीं और जो दया का स्रोत है सभजीवों की संभालकरता है।
हे नानक! गुरु की शरण पड़ने पर ये समझ आती है, और (माया के बंधनों से) खलासी का राह मिलता है।5।3।36।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ जिनी सुणि कै मंनिआ तिना निज घरि वासु ॥ गुरमती सालाहि सचु हरि पाइआ गुणतासु ॥ सबदि रते से निरमले हउ सद बलिहारै जासु ॥ हिरदै जिन कै हरि वसै तितु घटि है परगासु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ जिनी सुणि कै मंनिआ तिना निज घरि वासु ॥ गुरमती सालाहि सचु हरि पाइआ गुणतासु ॥ सबदि रते से निरमले हउ सद बलिहारै जासु ॥ हिरदै जिन कै हरि वसै तितु घटि है परगासु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निज घरि = अपने घर में, अंतरात्मे। सालाहि = महिमा करके। सचु = सदा स्थिर प्रभु। गुणतासु = गुणों का खजाना। हउ = मैं। जासु = जाता है। तितु = उस में। घरि = हृदय में। तितु घटि = (उनके) उस हृदय में। परगासु = रोशनी।1।
अर्थ: जिस लोगों ने (परमात्मा का नाम) सुन के मान लिया (भाव, अपने मन को उस नाम स्मरण में डुबो लिया है) उनका अपने अंतरात्मे निवास बना रहता है (भाव, उनका मन बाहर भटकने से हट जाता है)। गुरु की शिक्षा मुताबिक सदा स्थिर प्रभु की महिमा करके वो गुणों के खजाने परमात्मा को ढूंढ लेते हैं। जो लोग गुरु के शब्द में रंगे जाते हैं, वो पवित्र (आचरण) वाले हो जाते हैं, मैं उनके सदा सदके जाता हूं। जो मनुष्यों के हृदय में परमात्मा आ बसता है, (उनके) उस हृदय में प्रकाश हो जाता है। (भाव, सही जीवन जीने की उन्हें सूझ आ जाती है)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे हरि हरि निरमलु धिआइ ॥ धुरि मसतकि जिन कउ लिखिआ से गुरमुखि रहे लिव लाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे हरि हरि निरमलु धिआइ ॥ धुरि मसतकि जिन कउ लिखिआ से गुरमुखि रहे लिव लाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मन = हे मन! धुरि = प्रभु की दरगाह से। मसतकि = माथे पर। कउ = को, वास्ते। सो = वह लोग।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! पवित्र हरि नाम स्मरण कर। धुरों (परमात्मा की हजूरी में से) जिस लोगों को अपने माथे पे (स्मरण का लेख) लिखा (मिल जाता) है, वह गुरु की शरण पड़ के (परमात्मा की याद में) तवज्जो जोड़ के रखते हैं।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि संतहु देखहु नदरि करि निकटि वसै भरपूरि ॥ गुरमति जिनी पछाणिआ से देखहि सदा हदूरि ॥ जिन गुण तिन सद मनि वसै अउगुणवंतिआ दूरि ॥ मनमुख गुण तै बाहरे बिनु नावै मरदे झूरि ॥२॥
मूलम्
हरि संतहु देखहु नदरि करि निकटि वसै भरपूरि ॥ गुरमति जिनी पछाणिआ से देखहि सदा हदूरि ॥ जिन गुण तिन सद मनि वसै अउगुणवंतिआ दूरि ॥ मनमुख गुण तै बाहरे बिनु नावै मरदे झूरि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नदरि करि = ध्यान से। निकटि = नजदीक। हदूरि = हाजर-नाजर, अंग संग। तिन मनि = उनके मन में। सच = सदा। गुण ते = गुणों से। झूरि = झुर झुर के। मरदे = आत्मिक मौत मरते हैं।2।
अर्थ: हे प्रभु के संत जनो! ध्यान से देखो, परमात्मा हर जगह व्यापक हरेक के नजदीक बसता है। जिस लोगों ने गुरु की मति ले के उस को (हर जगह व्यापक) पहचान लिया है, वह उसको सदा अपने अंग संग देखते हैं। जिस मनुष्यों ने गुण ग्रहण कर लिए हैं परमात्मा उनके मन में सदा बसता है। पर, जिन्होंने औगुण इकट्ठे किये हैं, उन्हें कहीं दूर बसता प्रतीत होता है। अपने मन के पीछे चलने वाले लोगगुणों से वंचित रह जाते हैं, वह प्रभु के नाम के बिना (माया की तपष में) तप तप के आत्मिक मौत को आमंत्रित करते है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिन सबदि गुरू सुणि मंनिआ तिन मनि धिआइआ हरि सोइ ॥ अनदिनु भगती रतिआ मनु तनु निरमलु होइ ॥ कूड़ा रंगु कसु्मभ का बिनसि जाइ दुखु रोइ ॥ जिसु अंदरि नाम प्रगासु है ओहु सदा सदा थिरु होइ ॥३॥
मूलम्
जिन सबदि गुरू सुणि मंनिआ तिन मनि धिआइआ हरि सोइ ॥ अनदिनु भगती रतिआ मनु तनु निरमलु होइ ॥ कूड़ा रंगु कसु्मभ का बिनसि जाइ दुखु रोइ ॥ जिसु अंदरि नाम प्रगासु है ओहु सदा सदा थिरु होइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सबदि = शब्द द्वारा। सोइ = वह। अनदिनु = हर रोज। कूड़ = झूठा, नाशवान। रोइ = रोता है।3।
अर्थ: जिस मनुष्यों ने गुरु के शब्द द्वारा परमात्मा का नाम सुन के मान लिया है (नाम में स्वयं को ढाल लिया है), उन्होंने अपने मन में उस हरि को (हर वक्त) स्मरण किया है। हर समय प्रभु भक्ति में रंगे हुए बंदों का मन पवित्र हो जाता है, शरीर भी पवित्र हो जाता है।
कुसंभ का रंग जल्दी नाश होने वाला है वह नाश हो जाता है (इसी तरह माया का साथ भी चार दिनों का है, और उसके मोह में फंसा मनुष्य वियोग के) दुख में दुखी होता है।
जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा के नाम का प्रकाश है वह सदा अडोल चित्त रहता है।3।
[[0028]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
इहु जनमु पदारथु पाइ कै हरि नामु न चेतै लिव लाइ ॥ पगि खिसिऐ रहणा नही आगै ठउरु न पाइ ॥ ओह वेला हथि न आवई अंति गइआ पछुताइ ॥ जिसु नदरि करे सो उबरै हरि सेती लिव लाइ ॥४॥
मूलम्
इहु जनमु पदारथु पाइ कै हरि नामु न चेतै लिव लाइ ॥ पगि खिसिऐ रहणा नही आगै ठउरु न पाइ ॥ ओह वेला हथि न आवई अंति गइआ पछुताइ ॥ जिसु नदरि करे सो उबरै हरि सेती लिव लाइ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पदारथु = कीमती चीज। लिव लाइ = तवज्जो/ध्यान जोड़ के। पगि खिसिऐ = जब पैर खिसक गया। ठउरु = जगह, आसरा। हथि = हाथ में। आवई = आता है। अंति = आखिर। जिसु = जिस (मनुष्य) पर। ऊबरै = बच जाता है। सेती = साथ।4।
अर्थ: यह कीमती मनुष्य जन्म हासिल करके भी (मूर्ख मनुष्य) तवज्जो जोड़ के परमात्मा का नाम नहीं स्मरण करता; पर जब पैर फिसल गया (जब शरीर ढह पड़ा) यहाँ जगत में टिका नहीं रह सकेगा (नाम से वंचित रहने के कारण) आगे दरगाह में भी जगह नहीं मिलती। (मौत आने से) स्मरण का समय नहीं मिल सकता, आखिर (मूर्ख जीव) पछताता जाता है। जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर की नजर करता है वह परमात्मा (के चरणों) में तवज्जो जोड़ के (माया के कुसंभ मोह से) बच जाता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
देखा देखी सभ करे मनमुखि बूझ न पाइ ॥ जिन गुरमुखि हिरदा सुधु है सेव पई तिन थाइ ॥ हरि गुण गावहि हरि नित पड़हि हरि गुण गाइ समाइ ॥ नानक तिन की बाणी सदा सचु है जि नामि रहे लिव लाइ ॥५॥४॥३७॥
मूलम्
देखा देखी सभ करे मनमुखि बूझ न पाइ ॥ जिन गुरमुखि हिरदा सुधु है सेव पई तिन थाइ ॥ हरि गुण गावहि हरि नित पड़हि हरि गुण गाइ समाइ ॥ नानक तिन की बाणी सदा सचु है जि नामि रहे लिव लाइ ॥५॥४॥३७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देखा देखी = और लोगों को करता देख के, दिखावे की खातिर। बूझ = समझ। पई थाइ = स्वीकार हो जाती है। समाइ = लीन हो के। बाणी सचु है = परमात्मा का नाम जपना ही (उनकी) वाणी है, सदा महिमा ही करते हैं।5।
अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य सब कुछ दिखावे की खातिर करता है, उसे सही जीवन जीने की समझ नहीं आती। (पर) गुरु के सन्मुख हो के जिस मनुष्यों का हृदय पवित्र हो जाता है, उन की घाल-कमाई (प्रभु दर पे) स्वीकार हो जाती है। वह मनुष्य हरि के गुण गा के हरि के चरणों में लीन हो के नित्य हरि गुण गाते हैं, पढ़ते हैं।
हे नानक! जो मनुष्य प्रभु के नाम में तवज्जो जोड़ के रखते हैं, सदा स्थिर प्रभु की महिमा ही उनकी जीभ पे सदा विराजमान रहती है।5।4।37।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ जिनी इक मनि नामु धिआइआ गुरमती वीचारि ॥ तिन के मुख सद उजले तितु सचै दरबारि ॥ ओइ अम्रितु पीवहि सदा सदा सचै नामि पिआरि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ जिनी इक मनि नामु धिआइआ गुरमती वीचारि ॥ तिन के मुख सद उजले तितु सचै दरबारि ॥ ओइ अम्रितु पीवहि सदा सदा सचै नामि पिआरि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनि = मन से। इक मनि = एक मन से, एकाग्र हो के। वीचारि = (नाम को) विचार के, सोच मंडल में टिका के। सद = सदा। उजले = साफ,सुंदर। तितु = उस में। तितु सचै दरबारि = उस सदा स्थिर के दरबार में। ओइ = वह लोग (बहुवचन)। नामि पिआरि = नाम में प्यार से।1।
अर्थ: जिस लोगों ने गुरु की मति के द्वारा (परमात्मा के नाम को अपने सोच मंडल में टिका के) नाम को एकाग्र चित्त हो के स्मरण किया है, वे सदा ही स्थिर रहने वाले प्रभु के दरबार में आजाद होते है। वह मनुष्य सदा स्थिर प्रभु के नाम में प्यार से सदा आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल पीते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे गुरमुखि सदा पति होइ ॥ हरि हरि सदा धिआईऐ मलु हउमै कढै धोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे गुरमुखि सदा पति होइ ॥ हरि हरि सदा धिआईऐ मलु हउमै कढै धोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ने से। पति = इज्जत। धोइ = धो के।1। रहाउ।
अर्थ: अर्थ- हे भाई! गुरु की शरण पड़ने से इज्जत मिलती है। (गुरु की शरण पड़ के) परमात्मा का नाम सदा स्मरणा चाहिए। (गुरु मनुष्य के मन में से) अहंकार की मैल धो के निकाल देता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनमुख नामु न जाणनी विणु नावै पति जाइ ॥ सबदै सादु न आइओ लागे दूजै भाइ ॥ विसटा के कीड़े पवहि विचि विसटा से विसटा माहि समाइ ॥२॥
मूलम्
मनमुख नामु न जाणनी विणु नावै पति जाइ ॥ सबदै सादु न आइओ लागे दूजै भाइ ॥ विसटा के कीड़े पवहि विचि विसटा से विसटा माहि समाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाले। जाणनी = जानते। विणु = बगैर, बिना। विणु नावै = नाम के बिना। जाइ = चली जाती है। सबदै सादु = शब्द का स्वाद। भाइ = प्यार में। भाउ = प्यार। विसटा = गंद, विष्टा। समाइ = समा के रच के।2।
अर्थ: (पर) अपने मन के पीछे चलने वाले लोग परमात्मा के नाम के साथ रिश्ता नहीं जोड़ पाते, और नाम के बग़ैर उनका आदर सत्कार जाता रहता है। उन्हें सत्गुरू के शब्द का आनन्द नहीं आता। (इस वास्ते) वह (प्रभु को विसार के) किसी और प्यार में मस्त रहते हैं। वह लोग (विकारों के) गंद में लीन रह कर गंदगी के कीड़े की तरह (विकारों के) गंद में ही पड़े रहते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तिन का जनमु सफलु है जो चलहि सतगुर भाइ ॥ कुलु उधारहि आपणा धंनु जणेदी माइ ॥ हरि हरि नामु धिआईऐ जिस नउ किरपा करे रजाइ ॥३॥
मूलम्
तिन का जनमु सफलु है जो चलहि सतगुर भाइ ॥ कुलु उधारहि आपणा धंनु जणेदी माइ ॥ हरि हरि नामु धिआईऐ जिस नउ किरपा करे रजाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सफलु = कामयाब। भाइ = प्रेम में, अनुसार। कुलु = खानदान। धंनु = भाग्यशाली। जणेदी माइ = पैदा करने वाली माँ। धिआइऐ = स्मरणा चाहिए। नउ = को। रजाइ = मर्जी से।3।
अर्थ: जो मनुष्य गुरु के प्रेम में जीवन व्यतीत करते हैं उनका जीवन कामयाब हो जाता है, वह अपना सारा खानदान (ही विकारों से) बचा लेते हैं, उनको पैदा करने वाली माँ शोभा कमाती है। (इस वास्ते, हे भाई!) परमात्मा का नाम स्मरणा चाहिए। (पर वही मनुष्य नाम स्मरण करता है) जिस पर परमात्मा अपनी रजा अनुसार मेहर करता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनी गुरमुखि नामु धिआइआ विचहु आपु गवाइ ॥ ओइ अंदरहु बाहरहु निरमले सचे सचि समाइ ॥ नानक आए से परवाणु हहि जिन गुरमती हरि धिआइ ॥४॥५॥३८॥
मूलम्
जिनी गुरमुखि नामु धिआइआ विचहु आपु गवाइ ॥ ओइ अंदरहु बाहरहु निरमले सचे सचि समाइ ॥ नानक आए से परवाणु हहि जिन गुरमती हरि धिआइ ॥४॥५॥३८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आपु = स्वैभाव, अहम्। गवाइ = दूर कर के। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। समाइ = लीन हो के। परवाणु = स्वीकार। हहि = हैं (‘है’ का बहुवचन)।4।
अर्थ: जिस लोगों ने गुरु की शरण पड़ के अपने अंदर से अहम् भाव दूर कर के परमात्मा का नाम स्मरण किया है, वह लोग सदा स्थिर प्रभु में लीन हो के उसी का रूप बन के अंदर-बाहर से पवित्र हो जाते हैं। (भाव, उनका आत्मिक जीवन पवित्र हो जाता है, और वे खलकत के साथ भी प्यार-व्यवहार ठीक रखते हैं)।
हे नानक! जगत में आए (पैदा हुए) वही लोग स्वीकार हैं जिन्होंने गुरु की मति ले के परमात्मा का नाम स्मरण किया है।4।5।38।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ हरि भगता हरि धनु रासि है गुर पूछि करहि वापारु ॥ हरि नामु सलाहनि सदा सदा वखरु हरि नामु अधारु ॥ गुरि पूरै हरि नामु द्रिड़ाइआ हरि भगता अतुटु भंडारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ हरि भगता हरि धनु रासि है गुर पूछि करहि वापारु ॥ हरि नामु सलाहनि सदा सदा वखरु हरि नामु अधारु ॥ गुरि पूरै हरि नामु द्रिड़ाइआ हरि भगता अतुटु भंडारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हरि धनु = परमातमा (के नाम रूपी) धन। रासि = संपत्ति, धन-दौलत, पूंजी। गुर पूछि = गुरु की शिक्षा ले के। सालाहनि = सराहना करते हैं। वखरु = सौदा। अधारु = आसरा। गुरि = गुरु के। अतुटु = ना खत्म होने वाला। भण्डार = खजाना।1।
अर्थ: परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदों के पास परमात्मा का नाम ही धन है नाम ही संपत्ति है, वह अपने गुरु की शिक्षा ले के (नाम का ही) व्यापार करते हैं। भक्तजन सदा परमात्मा का नाम की ही सराहना करते हैं। परमात्मा का नाम का व्यापार ही उनके जीवन का आसरा है। पूरे सत्गुरू ने परमात्मा का नामउनके हृदय में पक्का कर दिया है। परमात्मा का नाम ही उनके लिए ना समाप्त होने वाला खजाना है।1!
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे इसु मन कउ समझाइ ॥ ए मन आलसु किआ करहि गुरमुखि नामु धिआइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे इसु मन कउ समझाइ ॥ ए मन आलसु किआ करहि गुरमुखि नामु धिआइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कउ = को। ए मन! = हे मन! गुरमुखि = गुरु की शरण पड़के।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (अपने) इस मन को समझा (और कह) हे मन! क्यूँ आलस करता है? गुरु की शरण पड़ के (परमात्मा का) नाम सिर।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि भगति हरि का पिआरु है जे गुरमुखि करे बीचारु ॥ पाखंडि भगति न होवई दुबिधा बोलु खुआरु ॥ सो जनु रलाइआ ना रलै जिसु अंतरि बिबेक बीचारु ॥२॥
मूलम्
हरि भगति हरि का पिआरु है जे गुरमुखि करे बीचारु ॥ पाखंडि भगति न होवई दुबिधा बोलु खुआरु ॥ सो जनु रलाइआ ना रलै जिसु अंतरि बिबेक बीचारु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पाखंडि = पाखण्ड से, दिखावे से। होवई = होए होती, होना। दुबिधा = दु-किस्मा। दुबिधा बोल = दुचित्ती बोल, पाखण्डी वचन। बिबेक = परख। बिबेक विचार = परख करने की सोच।2।
अर्थ: अगर मनुष्य गुरु की शरण में पड़ के (गुरु की दी हुई शिक्षा की) विचार करते रहे तो उसके अंदर प्रमात्मा की भक्ति बस जाती है। परमात्मा का प्यार टिक जाता है। पर पाखण्ड करने से भक्ति नहीं हो सकती। पाखण्ड का बोल खुआर ही करता है। जिस मनुष्य के अंदर (खरे-खोटे) परखने की सूझ पैदा हो जाती है, वह मनुष्य (पाखण्डियों में) मिलाने से मिल नही सकता।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सो सेवकु हरि आखीऐ जो हरि राखै उरि धारि ॥ मनु तनु सउपे आगै धरे हउमै विचहु मारि ॥ धनु गुरमुखि सो परवाणु है जि कदे न आवै हारि ॥३॥
मूलम्
सो सेवकु हरि आखीऐ जो हरि राखै उरि धारि ॥ मनु तनु सउपे आगै धरे हउमै विचहु मारि ॥ धनु गुरमुखि सो परवाणु है जि कदे न आवै हारि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: उरि = हृदय। धारि = टिका के। सउपे = सौंप के, भेटा करके। विचहु = (अपने) अंदर से। धनु = भाग्यशाली। जे = जो।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘जि’ और ‘जे’ में फर्क याद रखने योग्य है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: वही मनुष्य परमात्मा का सेवक कहा जा सकता है, जो परमात्मा को (की याद) अपने हृदय में टिकाई रखता है। जो अपने अंदर से अहम् दूर करके अपना मन अपना शरीर परमात्मा के हवाले कर देता है, परमात्मा के आगे रख देता है। जो मनुष्य (विकारों से टक्कर व मानव जनम की बाजी) कभी हार के नहीं आता, गुरु के सन्मुख हुआ वह मनुष्य भाग्यशाली है वह (प्रभु की हजूरी में) स्वीकार होता है।3।
[[0029]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
करमि मिलै ता पाईऐ विणु करमै पाइआ न जाइ ॥ लख चउरासीह तरसदे जिसु मेले सो मिलै हरि आइ ॥ नानक गुरमुखि हरि पाइआ सदा हरि नामि समाइ ॥४॥६॥३९॥
मूलम्
करमि मिलै ता पाईऐ विणु करमै पाइआ न जाइ ॥ लख चउरासीह तरसदे जिसु मेले सो मिलै हरि आइ ॥ नानक गुरमुखि हरि पाइआ सदा हरि नामि समाइ ॥४॥६॥३९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करमि = (प्रभु की) कृपा से। विणु करमै = मेहर के बिना।4।
अर्थ: परमात्मा (मनुष्य को) अपनी मेहर से ही मिले तो मिलता है। मेहर के बगैर वह प्राप्त नहीं हो सकता। चौरासी लाख जूनियों के जीव (परमात्मा का मिलने के लिए) तरसते हैं। पर वही जीव परमात्मा से मिल सकता है जिस को वह खुद (अपने साथ) मिलाता है।
हे नानक! जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ता है वह परमात्मा को ढूँढ लेता है। वह सदा परमात्मा के नाम में लीन रहता है।4।6।39।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ सुख सागरु हरि नामु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥ अनदिनु नामु धिआईऐ सहजे नामि समाइ ॥ अंदरु रचै हरि सच सिउ रसना हरि गुण गाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ सुख सागरु हरि नामु है गुरमुखि पाइआ जाइ ॥ अनदिनु नामु धिआईऐ सहजे नामि समाइ ॥ अंदरु रचै हरि सच सिउ रसना हरि गुण गाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सागरु = समुंदर। गुरमुखि = गुरु की तरफ मुंह करने से। अनदिनु = हर रोज। धिआईऐ = स्मरणा चाहिए। सहजे = आत्मिक अडोलता में (टिक के)। समाइ = लीन हो के। अंदरु = हृदय।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘अंदरु’ संज्ञा है, जबकि ‘अंदरि’ संबंधक है।
दर्पण-भाषार्थ
रसना = जीभ। गाइ = गा के।1।
अर्थ: परमात्मा का नाम सुखों का समुंदर है, पर यह मिलता है गुरु की शरण पड़ने से। प्रभु नाम से आत्मिक अडोलता में लीन हो के हर वक्त परमात्मा का नाम स्मरणा चाहिए। जीभ से हरि के गुण गा के हृदय सदा स्थिर प्रभु के साथ एक-मेक हो जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे जगु दुखीआ दूजै भाइ ॥ गुर सरणाई सुखु लहहि अनदिनु नामु धिआइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे जगु दुखीआ दूजै भाइ ॥ गुर सरणाई सुखु लहहि अनदिनु नामु धिआइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दूजै भाइ = परमात्मा के बगैर और किसी के प्यार में। लहहि = प्राप्त करेगा।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (परमात्मा को भुला के माया आदि) और प्यार में पड़ के जगत दुखी हो रहा है। तू गुरु की शरण पड़ के हर रोज परमात्मा का नाम स्मरण कर; (इस तरह) सुख प्राप्त करेगा।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साचे मैलु न लागई मनु निरमलु हरि धिआइ ॥ गुरमुखि सबदु पछाणीऐ हरि अम्रित नामि समाइ ॥ गुर गिआनु प्रचंडु बलाइआ अगिआनु अंधेरा जाइ ॥२॥
मूलम्
साचे मैलु न लागई मनु निरमलु हरि धिआइ ॥ गुरमुखि सबदु पछाणीऐ हरि अम्रित नामि समाइ ॥ गुर गिआनु प्रचंडु बलाइआ अगिआनु अंधेरा जाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लागई = लगता है। धिआइ = स्मरण करके। सबदु पछाणीऐ = महिमा की वाणी से सांझ डालनी चाहिए। नामि = नाम में। प्रचंडु = तेज। बलाइआ = जगाया।2।
अर्थ: सदा स्थिर परमात्मा को (विकारों की) मैल नहीं लग सकती। (उस) परमात्मा का नाम स्मरण करने से (नाम-जपने वाले मनुष्य का) मन (भी) पवित्र हो जाता है। गुरु की शरण पड़ के परमात्मा की महिमा की वाणी के साथ गहरी सांझ डालनी चाहिए। (जो ये सांझ डालता है वह) आत्मिक जीवन देने वाले हरि नाम में लीन हो जाता है (जिस मनुष्य ने अपने अंदर) गुरु का ज्ञान अच्छी तरह रौशन कर लिया है (उसके अंदर से) अज्ञानता का अंधेरा दूर हो जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनमुख मैले मलु भरे हउमै त्रिसना विकारु ॥ बिनु सबदै मैलु न उतरै मरि जमहि होइ खुआरु ॥ धातुर बाजी पलचि रहे ना उरवारु न पारु ॥३॥
मूलम्
मनमुख मैले मलु भरे हउमै त्रिसना विकारु ॥ बिनु सबदै मैलु न उतरै मरि जमहि होइ खुआरु ॥ धातुर बाजी पलचि रहे ना उरवारु न पारु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मर जंमहि = (आत्मिक मौत) मर के (बार बार) पैदा होते हैं। होइ = हो के। विकारु = रोग। धातुर = नासवंत। बाजी = खेल। पलचि रहे = फस रहे हैं। उरवारु = इधर का छोर।3।
अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाले लोग मलीन मन रहते हैं, विकारों की मैल के साथ लिबड़े रहते हैं। उनके अंदर अहम् की लालच का रोग टिका रहता है। यह मैल गुरु के शब्द के बिना नहीं उतरती। (शब्द के बिना) आत्मिक मौत में खुआर हो के जन्म-मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं। वह इस नाशवान जगत खेल में फंसे रहते हैं। इसमें से उनका ना इस पार का ना ही उस पार की प्राप्ति होती है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखि जप तप संजमी हरि कै नामि पिआरु ॥ गुरमुखि सदा धिआईऐ एकु नामु करतारु ॥ नानक नामु धिआईऐ सभना जीआ का आधारु ॥४॥७॥४०॥
मूलम्
गुरमुखि जप तप संजमी हरि कै नामि पिआरु ॥ गुरमुखि सदा धिआईऐ एकु नामु करतारु ॥ नानक नामु धिआईऐ सभना जीआ का आधारु ॥४॥७॥४०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जप तप संजमी = जपी, तपी, संजमी, स्मरण करने वाले, सेवा करने वाले। मन को विकारों से रोकने वाले। आधारु = आसरा।4।
अर्थ: जो मनुष्य गुरु के सन्मुख रहता हैवह स्मरण करता है वह सेवा करता है वह अपने आपको विकारों से बचा के रखता है। वह परमात्मा के नाम में प्यार पाता है। (हे भाई!) गुरु की शरण पड़ कर सदा ही कर्तार के नाम को स्मरणा चाहिए।
हे नानक! परमात्मा का नाम (ही) स्मरणा चाहिए, (परमात्मा का नाम) सभ जीवों (की जिंदगी) का आसरा है।4।7।40।
विश्वास-प्रस्तुतिः
स्रीरागु महला ३ ॥ मनमुखु मोहि विआपिआ बैरागु उदासी न होइ ॥ सबदु न चीनै सदा दुखु हरि दरगहि पति खोइ ॥ हउमै गुरमुखि खोईऐ नामि रते सुखु होइ ॥१॥
मूलम्
स्रीरागु महला ३ ॥ मनमुखु मोहि विआपिआ बैरागु उदासी न होइ ॥ सबदु न चीनै सदा दुखु हरि दरगहि पति खोइ ॥ हउमै गुरमुखि खोईऐ नामि रते सुखु होइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनमुखु = अपने मन की ओर मुँह रखने वाला। विआपिआ = फसा हुआ। उदासी = उपरामता। चीनै = पहचानता है। पति = इज्जत। खोइ = गवा लेता है। खोइऐ = नाश की जाती है।1।
अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य माया के मोह में फंसा ही रहता है। (उसके अंदर) ना परमात्मा की लगन पैदा होती है ना ही माया की तरफ से उपरामता। वह मनुष्य गुरु के शब्द को नहीं विचारता, (इस वास्ते उसको) सदा दुख घेर के रखते हैं। परमात्मा की दरगाह में भी वह अपनी इज्जत गवा लेता है। पर, गुरु की बताई राह में चलने से अहम् दूर हो जाता है, नाम में रंग जाता है और सुख प्राप्त होता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन अहिनिसि पूरि रही नित आसा ॥ सतगुरु सेवि मोहु परजलै घर ही माहि उदासा ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन अहिनिसि पूरि रही नित आसा ॥ सतगुरु सेवि मोहु परजलै घर ही माहि उदासा ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अहि = दिन। निसि = रात। सेवि = सेवा करके। परजलै = प्रज्वलित, अच्छी तरह जलना।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! (तेरे अंदर तो) दिन रात सदा (माया की) आस भरी रहती है। (हे मन!) सतिगुरु की बतायी हुई सेवा कर (तभी माया का) मोह अच्छी तरह जल सकता है। (तभी) गृहस्थ में रहते हुए ही (माया से) उपराम हो सकते हैं।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखि करम कमावै बिगसै हरि बैरागु अनंदु ॥ अहिनिसि भगति करे दिनु राती हउमै मारि निचंदु ॥ वडै भागि सतसंगति पाई हरि पाइआ सहजि अनंदु ॥२॥
मूलम्
गुरमुखि करम कमावै बिगसै हरि बैरागु अनंदु ॥ अहिनिसि भगति करे दिनु राती हउमै मारि निचंदु ॥ वडै भागि सतसंगति पाई हरि पाइआ सहजि अनंदु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बिगसै = खिला हुआ। हरि बैरागु = परमात्मा का प्रेम। निचंदु = निचिंत, बेफिक्र। सहजि = आत्मिक अडोलता में।2।
अर्थ: गुरु के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (गुरु के बताए हुये) कर्म करता है व (भीतर से) आनन्दित रहता है। (क्योंकि उसके अंदर) परमात्मा का प्रेम है और आत्मिक सुख है। वह दिन रात हर समय परमात्मा की भक्ति करता है। (अपने अंदर से) अहम् को दूर करके वह बेफिक्र रहता है। बड़ी किस्मत से उसको साधु-संगत प्राप्त हो जाती है, जहां उसको परमात्मा का मिलाप हो जाता है, और वह आत्मिक अडोलता में (टिका हुआ) सुख भोगता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सो साधू बैरागी सोई हिरदै नामु वसाए ॥ अंतरि लागि न तामसु मूले विचहु आपु गवाए ॥ नामु निधानु सतगुरू दिखालिआ हरि रसु पीआ अघाए ॥३॥
मूलम्
सो साधू बैरागी सोई हिरदै नामु वसाए ॥ अंतरि लागि न तामसु मूले विचहु आपु गवाए ॥ नामु निधानु सतगुरू दिखालिआ हरि रसु पीआ अघाए ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बैरागी = विरक्त। न लागि = नहीं लगती। तामसु = (विकारों की) कालख। मूले = बिल्कुल। आपु = स्वै भाव, अहम्। निधानु = खजाना। अघाए = पेट भर के, तृप्त हो के।3।
अर्थ: वह मनुष्य (असल) साधु है वही बैरागी हैजो अपने हृदय में प्रभु का नाम बसाता है। उसके अंदर विकारों की कालिख कभी भी असर नहीं करती, वह अपने अंदर से अहम् भाव गवा के रखता है। सतिगुरु ने उसको परमात्मा का नाम खजाना (उसके अंदर ही) दिखा दिया होता है और वह नाम-रस पूरी तृप्ति से पीता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनि किनै पाइआ साधसंगती पूरै भागि बैरागि ॥ मनमुख फिरहि न जाणहि सतगुरु हउमै अंदरि लागि ॥ नानक सबदि रते हरि नामि रंगाए बिनु भै केही लागि ॥४॥८॥४१॥
मूलम्
जिनि किनै पाइआ साधसंगती पूरै भागि बैरागि ॥ मनमुख फिरहि न जाणहि सतगुरु हउमै अंदरि लागि ॥ नानक सबदि रते हरि नामि रंगाए बिनु भै केही लागि ॥४॥८॥४१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिनि = जिस ने। जिनि मिनै = जिस किसी ने। बैरागि = प्रेम में (टिक के)। लागि = लगी रहती है। लागि = पाह।4।
अर्थ: परमात्मा को जिस किसी ने ढूंढा है साधु संगति में ही बड़ी किस्मत से प्रभु-प्रेम में जुड़ के ढूंढा है। पर अपने मन के पीछे चलने वाले लोग (बाहर जंगलों आदि में) घूमते फिरते हैं। वे सत्गुरू की (वडियाई को, बड़ेपन को) नहीं समझते, उनके अंदर अहम् (की मैल) लगी रहती है।
हे नानक! जो मनुष्य गुरु के शब्द में रंगे गये हैं वे परमात्मा नाम-रंग में रंगे जाते हैं (पर, पाह के बिना पक्का रंग नहीं चढ़ता, और नाम-रंग में रंगे जाने के वास्ते प्रभु के) भय-अदब के बिना पाह नहीं मिल सकती।4।8।41।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ घर ही सउदा पाईऐ अंतरि सभ वथु होइ ॥ खिनु खिनु नामु समालीऐ गुरमुखि पावै कोइ ॥ नामु निधानु अखुटु है वडभागि परापति होइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ घर ही सउदा पाईऐ अंतरि सभ वथु होइ ॥ खिनु खिनु नामु समालीऐ गुरमुखि पावै कोइ ॥ नामु निधानु अखुटु है वडभागि परापति होइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: घर ही = घर में ही। वथु = वस्तु, चीज, पदार्थ। समालीऐ = स्मरणा चाहिए। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख हो के। निधानु = खजाना। अखुटु = ना खत्म होने वाला।1।
अर्थ: (परमात्मा का नाम रूप) सारा (उत्तम) पदार्थ (मनुष्य के) हृदय में ही है। (गुरु की शरण पड़ने से) ये सौदा हृदय में से ही मिल जाता है। (गुरु की शरण पड़ के) स्वास स्वास परमात्मा नाम स्मरणा चाहिए। जो कोई नाम प्राप्त करता है गुरु के द्वारा ही प्राप्त करता है। जिसे बड़ी किस्मत से ये खजाना मिलता है (उससे कभी खत्म नहीं होता) (क्योंकि) नाम खजाना कभी खत्म होने वाला नहीं है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन तजि निंदा हउमै अहंकारु ॥ हरि जीउ सदा धिआइ तू गुरमुखि एकंकारु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन तजि निंदा हउमै अहंकारु ॥ हरि जीउ सदा धिआइ तू गुरमुखि एकंकारु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मन = हे मन! तजि = त्याग। एकंकारु = एक व्यापक प्रभु को।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! निंदा करनी छोड़ दे, (अपने अंदर से) अहम् दूर कर। गुरु की शरण पड़ कर तू सर्व-व्यापक परमात्मा को स्मरण करता रह।1। रहाउ।
[[0030]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखा के मुख उजले गुर सबदी बीचारि ॥ हलति पलति सुखु पाइदे जपि जपि रिदै मुरारि ॥ घर ही विचि महलु पाइआ गुर सबदी वीचारि ॥२॥
मूलम्
गुरमुखा के मुख उजले गुर सबदी बीचारि ॥ हलति पलति सुखु पाइदे जपि जपि रिदै मुरारि ॥ घर ही विचि महलु पाइआ गुर सबदी वीचारि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बीचारि = विचार करके। हलति = इस लोक में, अत्र। पलति = पर लोक में परत्र। मुरारि = (मुर+अरि) परमात्मा। महल = टिकाना।2।
अर्थ: जो लोग गुरु के सन्मुख रहते हैं गुरु के शब्द के द्वारा (परमात्मा के गुणों को) विचार के (वह) सदा आजाद रहते हैं। वह अपने हृदय में परमात्मा का नाम स्मरण कर-कर के लोक परलोक में सुख भोगते हैं। गुरु के शब्द की इनायत से परमात्मा के नाम को याद करके उन्होंने अपने हृदय में परमात्मा का निवास स्थान ढूंढ लिया होता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतगुर ते जो मुह फेरहि मथे तिन काले ॥ अनदिनु दुख कमावदे नित जोहे जम जाले ॥ सुपनै सुखु न देखनी बहु चिंता परजाले ॥३॥
मूलम्
सतगुर ते जो मुह फेरहि मथे तिन काले ॥ अनदिनु दुख कमावदे नित जोहे जम जाले ॥ सुपनै सुखु न देखनी बहु चिंता परजाले ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ते = से, द्वारा। फेरहि = घूमते हैं। तिन = उनके। जोहे = ताक में रहते है। जम जाले = जम जाल, जम के जाल ने। देखनी = देखते। परजालै = अच्छी तरह जलती है।3।
अर्थ: जो मनुष्य गुरु से बेमुख होते हैं उनके माथे भ्रष्ट हो जाते हैं। (उन्हें अपने अंदर से फिटकार ही पड़ती रहती है)। वह सदा वही करतूतें करते हैं जिनका फल दुख होता है। वह सदा जम के जाल में जम की ताक में रहते हैं। कभी सपने में भी उन्हें सुख नहीं मिलता। बहुत सारी चिंताएं उन्हें जलाती रहती हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभना का दाता एकु है आपे बखस करेइ ॥ कहणा किछू न जावई जिसु भावै तिसु देइ ॥ नानक गुरमुखि पाईऐ आपे जाणै सोइ ॥४॥९॥४२॥
मूलम्
सभना का दाता एकु है आपे बखस करेइ ॥ कहणा किछू न जावई जिसु भावै तिसु देइ ॥ नानक गुरमुखि पाईऐ आपे जाणै सोइ ॥४॥९॥४२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बखस = बख्शिश। करेइ = करता है। जावई = जाते हैं। सोइ = वह प्रभु ही।4।
अर्थ: पर कुछ कहा नहीं जा सकता (कि मनमुख क्यूँ नाम चेते नहीं करता और गुरमुख क्यूँ स्मरण करता है?) जिस पर वह प्रसंन्न होता है उसको नाम की दात देता है। वह परमात्मा सभ जीवों को दातें देने वाला है, वह स्वयं ही बख्शिश करता है। वह स्वयं ही (हरेक जीव के दिल की) जानता है। हे नानक! (उसकी मेहर से) गुरु की शरण पड़ने से उससे मिलाप होता है।4।9।42।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ सचा साहिबु सेवीऐ सचु वडिआई देइ ॥ गुर परसादी मनि वसै हउमै दूरि करेइ ॥ इहु मनु धावतु ता रहै जा आपे नदरि करेइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ सचा साहिबु सेवीऐ सचु वडिआई देइ ॥ गुर परसादी मनि वसै हउमै दूरि करेइ ॥ इहु मनु धावतु ता रहै जा आपे नदरि करेइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचा = सदा स्थिर रहने वाला प्रभु। सेवीऐ = स्मरणा चाहिए। सचु = सदा स्थिर प्रभु। देइ = देता है। मनि = मन में। करेइ = करता है। धावतु = दौड़ता है, भटकता है, माया के पीछे दौड़ता है। ता = तब ही। रहै = टिकता है।1।
अर्थ: (हे भाई!) सदा स्थिर रहने वाले मालिक प्रभु को स्मरणा चाहिए (जो स्मरण करता है उसे) सदा स्थिर प्रभु आदर देता है। गुरु की मेहर से जिसके मन में प्रभु बसता है वह अपने अंदर अहंकार दूर कर लेता है। (पर किसी के बस की बात नहीं। माया बड़ी मोहनी है) जब प्रभु खुद ही मेहर की निगाह करता है तभी ये मन (माया के पीछे) दौड़ने से हटता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे गुरमुखि हरि नामु धिआइ ॥ नामु निधानु सद मनि वसै महली पावै थाउ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे गुरमुखि हरि नामु धिआइ ॥ नामु निधानु सद मनि वसै महली पावै थाउ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सद = सदा। महली = प्रभु के महल में।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! गुरु की शरण में पड़ कर परमात्मा का नाम स्मरण कर। जिस मनुष्य के मन में नाम खजाना सदा बसता है वह परमात्मा के चरणों में ठिकाना ढूंढ लेता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनमुख मनु तनु अंधु है तिस नउ ठउर न ठाउ ॥ बहु जोनी भउदा फिरै जिउ सुंञैं घरि काउ ॥ गुरमती घटि चानणा सबदि मिलै हरि नाउ ॥२॥
मूलम्
मनमुख मनु तनु अंधु है तिस नउ ठउर न ठाउ ॥ बहु जोनी भउदा फिरै जिउ सुंञैं घरि काउ ॥ गुरमती घटि चानणा सबदि मिलै हरि नाउ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंधु = अंधा। नउ = को। घरि = घर में। घटि = हृदय में।2।
अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य का मन (माया के मोह में) अंधा हो जाता है। शरीर भी (भाव, हरेक ज्ञान-इंद्रिय भी) अंधा हो जाता है। उसे (आत्मिक शान्ति के लिए) कोई जगह नहीं मिलती। (माया के मोह में फंस के) वह अनेक जोनियों में भटकता है (कहीं भी उसे आत्मिक शांति नहीं मिलती) जैसे किसी खाली घर में कौआ जाता है (तो वहां उसे मिलता कुछ नहीं)। गुरु की मति पर चलने से हृदय में प्रकाश (हो जाता है) (भाव, सही जीवन की समझ आ जाती है), गुरु-शब्द में जुड़ने से परमात्मा का नाम प्राप्त हो जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
त्रै गुण बिखिआ अंधु है माइआ मोह गुबार ॥ लोभी अन कउ सेवदे पड़ि वेदा करै पूकार ॥ बिखिआ अंदरि पचि मुए ना उरवारु न पारु ॥३॥
मूलम्
त्रै गुण बिखिआ अंधु है माइआ मोह गुबार ॥ लोभी अन कउ सेवदे पड़ि वेदा करै पूकार ॥ बिखिआ अंदरि पचि मुए ना उरवारु न पारु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: त्रैगुण बिखिआ = (रजो तमो व सतो) तीन गुणों वाली माया। गुबार = अंधेरा। अन कउ = किसी और को। पढ़ि = पढ़ के। पचि मुए = खुआर हो के आत्मिक मौत मरते हैं।3।
अर्थ: त्रैगुणी माया के प्रभाव में जगत अंधा हो रहा है, माया के मोह का अंधेरा (चारों ओर पसरा हुआ है)। लोभ ग्रसे जीव (वैसे तो) वेदों को पढ़ के (उनके उपदेशों का) ढंढोरा देते हैं, (पर अंदर से प्रभु को विसार के) औरों की (भाव, माया की) सेवा करते हैं। माया के मोह में खुआर हो हो के आत्मिक मौत मर जाते हैं। (माया के मोह के घोर अंधकार में उनको) ना इस पार का कुछ दिखता है ना ही अगले पार का।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
माइआ मोहि विसारिआ जगत पिता प्रतिपालि ॥ बाझहु गुरू अचेतु है सभ बधी जमकालि ॥ नानक गुरमति उबरे सचा नामु समालि ॥४॥१०॥४३॥
मूलम्
माइआ मोहि विसारिआ जगत पिता प्रतिपालि ॥ बाझहु गुरू अचेतु है सभ बधी जमकालि ॥ नानक गुरमति उबरे सचा नामु समालि ॥४॥१०॥४३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मेहि = मोह में। अचेतु = गाफिल। सभ = सारी लुकाई। जम कालि = यम काल ने। उबरे = बचते हैं। समालि = संभाल के, याद करके।4।
अर्थ: माया के मोह में फंस के जीवों ने जगत-पिता पालणहार प्रभु को बिसार दिया है। गुरु (की शरण) के बगैर जीव गाफिल हो रहा है। (परमात्मा से बिछुड़ी हुई) सारी सृष्टि को आत्मिक मौत ने (अपने बंधनों में) जकड़ा हुआ है। हे नानक! गुरु की शिक्षा की इनायत से सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम हृदय में बसा के ही जीव (आत्मिक मौत के बंधनों से) बच सकते हैं।4।10।43।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ त्रै गुण माइआ मोहु है गुरमुखि चउथा पदु पाइ ॥ करि किरपा मेलाइअनु हरि नामु वसिआ मनि आइ ॥ पोतै जिन कै पुंनु है तिन सतसंगति मेलाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ त्रै गुण माइआ मोहु है गुरमुखि चउथा पदु पाइ ॥ करि किरपा मेलाइअनु हरि नामु वसिआ मनि आइ ॥ पोतै जिन कै पुंनु है तिन सतसंगति मेलाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु के सन्मुख रहने वाला मनुष्य। चउथा पद = चौथा दर्जा, वह आत्मिक अवस्था जहां माया के तीन गुण जोर नहीं डाल सकते। मेलाइअनु = उस (प्रभु) ने मिलाए हैं। मनि = मन में। पोतै = पोतै में, खजाने में। पुंनु = नेकी।1।
अर्थ: (जगत में) त्रिगुणी माया का मोह (पसर रहा) है जो मनुष्य गुरु के सन्मुख रहता है वह उस आत्मिक दर्जे को हासिल कर लेता है जहां माया के तीनों गुणों का जोर नहीं पड़ सकता। परमात्मा ने मेहर करके जिस मनुष्यों को अपने चरणों में मिलाया है उनके मन में परमात्मा का नाम आ बसता है। जिनके भाग्य में नेकी है, परमात्मा उनको साधु संगति में मिलता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे गुरमति साचिरहाउ ॥ साचो साचु कमावणा साचै सबदि मिलाउ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे गुरमति साचिरहाउ ॥ साचो साचु कमावणा साचै सबदि मिलाउ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साचि = सदा स्थिर प्रभु में। रहाउ = टिके रहो। साचो साचु = सच ही सच, सदा स्थिर प्रभु (का स्मरण) ही। साचै सबदि = सदा स्थिर प्रभु की महिमा में। मिलाउ = मिले रहो।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! गुरु की मति ले के सदा स्थिर प्रभु में टिके रहो। सदा स्थिर प्रभु के नाम जपने की ही कमाई करो, सदा स्थिर प्रभु की महिमा में जुड़े रहो।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनी नामु पछाणिआ तिन विटहु बलि जाउ ॥ आपु छोडि चरणी लगा चला तिन कै भाइ ॥ लाहा हरि हरि नामु मिलै सहजे नामि समाइ ॥२॥
मूलम्
जिनी नामु पछाणिआ तिन विटहु बलि जाउ ॥ आपु छोडि चरणी लगा चला तिन कै भाइ ॥ लाहा हरि हरि नामु मिलै सहजे नामि समाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नामु पछाणिआ = प्रभु के नाम की कद्र पहचानी है। विटहुं = से। जाउ = जाऊँ, मैं जाता हूं। आपु = स्वै भाव। लगा = लगूं, मैं लगता हूँ। भाइ = प्रेम में, रजा में। लाहा = लाभ। सहजे = सहज, आत्मिक अडोलता से। समाइ = लीन हो जाता है।2।
अर्थ: मैं उन गुरमुखों के सदके जाता हूँ, जिन्होंने परमात्मा के नाम की कद्र समझी है। स्वै-भाव त्याग के मैं उनके चरणों में नत्मस्तक हूँ, मैं उनके अनुसार हो के चलता हूँ। (जो मनुष्य नाम जपने वालों की शरण लेता है वह) आत्मिक अडोलता से परमात्मा के नाम में लीन हो जाता है, उसको प्रभु का नाम रूपी लाभ हासिल हो जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बिनु गुर महलु न पाईऐ नामु न परापति होइ ॥ ऐसा सतगुरु लोड़ि लहु जिदू पाईऐ सचु सोइ ॥ असुर संघारै सुखि वसै जो तिसु भावै सु होइ ॥३॥
मूलम्
बिनु गुर महलु न पाईऐ नामु न परापति होइ ॥ ऐसा सतगुरु लोड़ि लहु जिदू पाईऐ सचु सोइ ॥ असुर संघारै सुखि वसै जो तिसु भावै सु होइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: महलु = परमात्मा का दर। लोड़ि लहु = ढूंढ लो। जिदू = जिससे। सचु सोइ = वह सदा स्थिर प्रभु। असुर = कामादिक दैंतों को। संघारै = संघार देता है।3।
अर्थ: गुरु की शरण के बिना परमात्मा का दर नहीं मिलता, प्रभु का नाम नहीं मिलता (हे भाई! तू भी) ऐसा गुरु ढूंढ ले, जिससे वह सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा मिल जाए। (जो मनुष्य गुरु के द्वारा परमात्मा को ढूंढ लेता है) वह कामादिक दैंतों को मार लेता है। वह आत्मिक आनन्द में टिका रहता है। (उसको निष्चय हो जाता है कि) जो कुछ परमात्मा को अच्छा लगता है वही होता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जेहा सतगुरु करि जाणिआ तेहो जेहा सुखु होइ ॥ एहु सहसा मूले नाही भाउ लाए जनु कोइ ॥ नानक एक जोति दुइ मूरती सबदि मिलावा होइ ॥४॥११॥४४॥
मूलम्
जेहा सतगुरु करि जाणिआ तेहो जेहा सुखु होइ ॥ एहु सहसा मूले नाही भाउ लाए जनु कोइ ॥ नानक एक जोति दुइ मूरती सबदि मिलावा होइ ॥४॥११॥४४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सहसा = शक। मूले = बिल्कूल। भाउ = पिआर। जनु कोइ = कोई भी मनुष्य। सबदि = शब्द द्वारा।4।
अर्थ: कोई भी मनुष्य (गुरु चरणों में) श्रद्धा बना के देख ले, सत्गुरू को जैसा भी जिस किसी ने समझा है उसे वैसा आत्मिक आनन्द प्राप्त हुआ है। इस में रत्ती भर भी शक नहीं है (क्योंकि) हे नानक! (जिस सिख का गुरु के) शब्द द्वारा मिलाप हो जाता है, (उस सिख और गुरु की) ज्योति एक हो जाती है, शरीर चाहे दो होते हैं।4।11।44।
[[0031]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ अम्रितु छोडि बिखिआ लोभाणे सेवा करहि विडाणी ॥ आपणा धरमु गवावहि बूझहि नाही अनदिनु दुखि विहाणी ॥ मनमुख अंध न चेतही डूबि मुए बिनु पाणी ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ अम्रितु छोडि बिखिआ लोभाणे सेवा करहि विडाणी ॥ आपणा धरमु गवावहि बूझहि नाही अनदिनु दुखि विहाणी ॥ मनमुख अंध न चेतही डूबि मुए बिनु पाणी ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंम्रितु = आत्मक जीवन देने वाला नाम रस। बिखिआ = माया। बिडाणी = बेगानी। धरमु = (मनुष्य जीवन के) फर्ज। अनदिनु = हर रोज। विहाणी = बीतती है। मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाला। अंध = (माया के मोह में) अंधे। चेतही = याद करते हैं।1।
अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाले लोग आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस छोड़ के माया में मस्त रहते हैं। (और माया की खातिर) औरों की (सेवा खुशामद) करते फिरते हैं। (इस तरह वह) अपना (मनुष्य जनम का) फर्ज भुला बैठते हैं। (पर) समझते नहीं, और (उनकी उम्र) हर वक्त दुख में बीतती जाती है। (माया के मोह में) अंधे हुए मनमुख परमात्मा को नहीं याद करते। पानी के बिना ही डूब मरते हैं। (भाव, विकारों में गलतान हो के आत्मिक मौत मरते हैं और प्राप्त भी कुछ नहीं होता)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे सदा भजहु हरि सरणाई ॥ गुर का सबदु अंतरि वसै ता हरि विसरि न जाई ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे सदा भजहु हरि सरणाई ॥ गुर का सबदु अंतरि वसै ता हरि विसरि न जाई ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भजहु = भागो, जाओ। अंतरि = हृदय में।1। रहाउ।
अर्थ: हे (मेरे) मन! सदा परमात्मा की शरण पड़ा रह। (पर परमात्मा की शरण गुरु के शब्द द्वारा ही प्राप्त होती है) जब गुरु का शब्द हृदय में आ बसे, तब परमात्मा (हृदय में से) नहीं बिसरता।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इहु सरीरु माइआ का पुतला विचि हउमै दुसटी पाई ॥ आवणु जाणा जमणु मरणा मनमुखि पति गवाई ॥ सतगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ जोती जोति मिलाई ॥२॥
मूलम्
इहु सरीरु माइआ का पुतला विचि हउमै दुसटी पाई ॥ आवणु जाणा जमणु मरणा मनमुखि पति गवाई ॥ सतगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ जोती जोति मिलाई ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दुसटी = दुष्टता, बदी, नीचता। पति = इज्जत। मनमुखि = मनमुख ने।2।
अर्थ: मनमुख का ये शरीर माया का पुतला बना रहता है (भाव, मनमुख माया के हाथों में नाचता रहता है)। मनमुख के हृदय में अहम् भाव टिका रहता है और विकारों की बुराई टिकी रहती है। उसका जगत में आना-जाना पैदा होना मरना हमेशा बना रहता है। मनमुख ने (लोक परलोक में) आदर-सत्कार भी गवा लिया।
जिस ने सत्गुरू की बताई हुई सेवा की, उसने आत्मक आनन्द प्राप्त कर लिया। उसकी ज्योति प्रभु की ज्योति में मिली रहती है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतगुर की सेवा अति सुखाली जो इछे सो फलु पाए ॥ जतु सतु तपु पवितु सरीरा हरि हरि मंनि वसाए ॥ सदा अनंदि रहै दिनु राती मिलि प्रीतम सुखु पाए ॥३॥
मूलम्
सतगुर की सेवा अति सुखाली जो इछे सो फलु पाए ॥ जतु सतु तपु पवितु सरीरा हरि हरि मंनि वसाए ॥ सदा अनंदि रहै दिनु राती मिलि प्रीतम सुखु पाए ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुखाली = सुख+आलय, सुखों का घर, सुख देने वाली। जतु = विकारों की ओर से रोक। सतु = ऊँचा आचरण। तपु = सेवा। मंनि = मन में। अनंदि = आनंद में।3।
अर्थ: सतगुय की बताई हुई सेवा बहुत सुख देने वाली है (जो मनुष्य सेवा करता है वह) जो कुछ इच्छा करता है वही फल हासिल कर लेता है। गुरु की बताई सेवा ही जत सत तप (का मूल) है। (गुरमुख का) शरीर पवित्र हो जाता है। वह परमात्मा के नाम को अपने मन में बसा लेता है। गुरमुख दिन रात हर वक्त आत्मिक आनन्द में टिका रहता है, प्रीतम प्रभु को मिल के वह आत्मक सुख भोगता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जो सतगुर की सरणागती हउ तिन कै बलि जाउ ॥ दरि सचै सची वडिआई सहजे सचि समाउ ॥ नानक नदरी पाईऐ गुरमुखि मेलि मिलाउ ॥४॥१२॥४५॥
मूलम्
जो सतगुर की सरणागती हउ तिन कै बलि जाउ ॥ दरि सचै सची वडिआई सहजे सचि समाउ ॥ नानक नदरी पाईऐ गुरमुखि मेलि मिलाउ ॥४॥१२॥४५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हउ = मैं। बलि जाउ = सदके जाता हूँ। दरि = दर पे। सची = सदा स्थिर रहने वाली। वडिआई = इज्जत। सहजे = सहज, आत्मक अडोलता से। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। समाउ = समाई, लीनता। मेलि = एकत्रता में। मिलाउ = मिलाप।4।
अर्थ: जो मनुष्य सत्गुरू की शरण पड़ते हैं, मैं उनसे कुर्बान जाता हूँ। उनको सदा स्थिर प्रभु के दर पे सदा ही आदर-सत्कार मिलता है। आत्मिक अडोलता की इनायत से उनको सदा स्थिर प्रभु में लीनता प्राप्त हो जाती है। हे नानक! ऐसे गुरमुखों की संगति में मिलाप परमात्मा की मेहर की नजर से ही मिलता है।4।12।45।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ मनमुख करम कमावणे जिउ दोहागणि तनि सीगारु ॥ सेजै कंतु न आवई नित नित होइ खुआरु ॥ पिर का महलु न पावई ना दीसै घरु बारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ मनमुख करम कमावणे जिउ दोहागणि तनि सीगारु ॥ सेजै कंतु न आवई नित नित होइ खुआरु ॥ पिर का महलु न पावई ना दीसै घरु बारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करम = (धार्मिक) कर्म। दोहागण = दुभार्गिनी, दुर्भाग्यपूर्ण स्त्री, त्यागी हुई स्त्री। तनि = शरीर पे। न आवई = ना आए, नहीं आता। पावई = पाता है। बारु = दरवाजा।1।
अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य के (धार्मिक) कार्य करने यूँ हैं जैसे कोई त्यागी हुई स्त्री (अपने) शरीर का श्रृंगार करती है। उस का पति (उस की) सेज पर कभी नहीं आता, (वह व्यर्थ श्रृंगार करके) सदा खुआर होती है। (इस तरह मनमुख मनुष्य दिखावे के धार्मिक कामों से) प्रभु-पति की हजूरी प्राप्त नहीं कर सकता, उसे प्रभु का दर-घर नहीं दिखता।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे इक मनि नामु धिआइ ॥ संता संगति मिलि रहै जपि राम नामु सुखु पाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे इक मनि नामु धिआइ ॥ संता संगति मिलि रहै जपि राम नामु सुखु पाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: इक मनि = एक मन से, एकाग्रता से। जपि = जप के।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! एकाग्र मन हो के परमात्मा का नाम स्मरण कर। जो मनुष्य साधु संगति में टिका रहता हैवह परमात्मा का नाम स्मरण करके सुख प्राप्त करता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखि सदा सोहागणी पिरु राखिआ उर धारि ॥ मिठा बोलहि निवि चलहि सेजै रवै भतारु ॥ सोभावंती सोहागणी जिन गुर का हेतु अपारु ॥२॥
मूलम्
गुरमुखि सदा सोहागणी पिरु राखिआ उर धारि ॥ मिठा बोलहि निवि चलहि सेजै रवै भतारु ॥ सोभावंती सोहागणी जिन गुर का हेतु अपारु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सोहागणी = सौभाग्यनी, अच्छे भाग्यों वाली। उर धारि = हृदय में टिका के। भतारु = खसम। हेतु = प्यार। अपारु = बहुत, अथाह।2।
अर्थ: सदा गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सुहागनों (की तरह) हैं, वे प्रभु पति को अपने हृदय में बसा के रखते हैं। वे (सभी से) मीठे बोल बोलते हैं। झुक के (अहम् भाव से हट के, गरीब स्वभाव में) चलते हैं, उनकी हृदय सेज को प्रभु-पति भोगता है। जिस मनुष्यों ने गुरु का अटूट प्यार (अपने हृदय में बसाया है) वह उन सुहागनों की तरह हैं जिन्होंने शोभा कमाई है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पूरै भागि सतगुरु मिलै जा भागै का उदउ होइ ॥ अंतरहु दुखु भ्रमु कटीऐ सुखु परापति होइ ॥ गुर कै भाणै जो चलै दुखु न पावै कोइ ॥३॥
मूलम्
पूरै भागि सतगुरु मिलै जा भागै का उदउ होइ ॥ अंतरहु दुखु भ्रमु कटीऐ सुखु परापति होइ ॥ गुर कै भाणै जो चलै दुखु न पावै कोइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: उदउ = उदय, प्रगटावा। भ्रम = भटकना।3।
अर्थ: जब किसी मनुष्य के भाग्य जाग पड़ें, तो अति किस्मत से उसे सत्गुरू मिल जाता है। (गुरु के मिलने से) हृदय में से दुख काटा जाता है, भटकन दूर हो जाती है, आत्मिक आनन्द की प्राप्ति होती है। जो भी मनुष्य गुरु के हुक्म में है, वह कभी भी दुख नहीं पाता।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर के भाणे विचि अम्रितु है सहजे पावै कोइ ॥ जिना परापति तिन पीआ हउमै विचहु खोइ ॥ नानक गुरमुखि नामु धिआईऐ सचि मिलावा होइ ॥४॥१३॥४६॥
मूलम्
गुर के भाणे विचि अम्रितु है सहजे पावै कोइ ॥ जिना परापति तिन पीआ हउमै विचहु खोइ ॥ नानक गुरमुखि नामु धिआईऐ सचि मिलावा होइ ॥४॥१३॥४६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सहजे = सहिज ही, आत्मिक अडोलता में। खेइ = नाश करके। सचि = सदा स्थिर रहने वाला प्रभु।4।
अर्थ: गुरु की रजा में नाम-अमृत है (जो रजा में चलता है) वह आत्मिक अडोलता में टिक के अंम्रित पीता है। जिस मनुष्यों को अमृत मिल गया, उन्होंने अपने अंदर के अहंकार को दूर करके ही इसे पीया।
हे नानक! गुरु की शरण पड़ कर प्रभु का नाम स्मरणा चाहिए। (नाम जपने की इनायत से) सदा स्थिर प्रभु में मेल हो जाता है।4।13।46।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ जा पिरु जाणै आपणा तनु मनु अगै धरेइ ॥ सोहागणी करम कमावदीआ सेई करम करेइ ॥ सहजे साचि मिलावड़ा साचु वडाई देइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ जा पिरु जाणै आपणा तनु मनु अगै धरेइ ॥ सोहागणी करम कमावदीआ सेई करम करेइ ॥ सहजे साचि मिलावड़ा साचु वडाई देइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जा = जब। पिरु जाणै = प्रभु-पति को जान लेती है, प्रभुपति के साथ गहरा अपनत्व बना लेती है। अगै धरेइ = हवाले कर देती है। सोहागणी = सुहाग भाग वालियां जीव स्त्रीयां, भक्त जन। सहजे = आत्मिक अडोलता में टिक के। साचि = सदा स्थिर प्रभु में। साचु = सदा स्थिर प्रभु।1।
अर्थ: जब (कोई जीव-स्त्री) प्रभु-पति को अपना समझ लेती है (भाव, प्रभु-पति के साथ याद कर करके गहरा अपनत्व डाल लेती है) तो वह अपना मन उस के हवाले कर देती है (भाव, अपने मन के पीछे चलना छोड़ देती है)। अपना शरीर भी हवाले कर देती है। (भाव, ज्ञान-इंद्रिय माया की ओर से हट जाती हैं)। वह जीव-स्त्री वही उद्यम करती है जो भक्त जन करते हैं। (इस तरह) आत्मक अडोलता में टिकने से सदा स्थिर प्रभु में उसका मिलाप हो जाता है, सदा स्थिर परमात्मा उसे (अपने घर में) आदर-सत्कार देता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे गुर बिनु भगति न होइ ॥ बिनु गुर भगति न पाईऐ जे लोचै सभु कोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे गुर बिनु भगति न होइ ॥ बिनु गुर भगति न पाईऐ जे लोचै सभु कोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभ कोइ = हरेक जीव।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! गुरु की शरण पड़ने के बिना परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती। अगर हरेक जीव भी (परमात्मा की भक्ति वास्ते) लालसा करे, तो भी गुरु की शरण के, बिना भक्ति (की दात) नहीं मिल सकती।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
लख चउरासीह फेरु पइआ कामणि दूजै भाइ ॥ बिनु गुर नीद न आवई दुखी रैणि विहाइ ॥ बिनु सबदै पिरु न पाईऐ बिरथा जनमु गवाइ ॥२॥
मूलम्
लख चउरासीह फेरु पइआ कामणि दूजै भाइ ॥ बिनु गुर नीद न आवई दुखी रैणि विहाइ ॥ बिनु सबदै पिरु न पाईऐ बिरथा जनमु गवाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: फेरु = फेरा, चक्कर, गेड़ा। कामणि = जीव-स्त्री। दूजै भाइ = माया के प्यार में। नीद = शान्ति। रैणि = (जिंदगी की) रात।2।
अर्थ: पर, जो जीव-स्त्री माया के प्यार में रहती है। उसे चौरासी लाख योनियों का फेरा भुगतना पड़ता है। गुरु की शरण पड़ने के बिना आत्मिक शान्ति प्राप्त नहीं होती। उसकी (जिंदगी की रात) दुखों में गुजरती है। गुरु के शब्द के बिना प्रभु-पति नहीं मिलता। (जो मनुष्य गुरु के शब्द से वंचित रहता है) वह अपना मानव जीवन व्यर्थ कर लेता है।2।
[[0032]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ हउ करती जगु फिरी ना धनु स्मपै नालि ॥ अंधी नामु न चेतई सभ बाधी जमकालि ॥ सतगुरि मिलिऐ धनु पाइआ हरि नामा रिदै समालि ॥३॥
मूलम्
हउ हउ करती जगु फिरी ना धनु स्मपै नालि ॥ अंधी नामु न चेतई सभ बाधी जमकालि ॥ सतगुरि मिलिऐ धनु पाइआ हरि नामा रिदै समालि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हउ हउ करती = ममता जाल में फंसी हुई। संपै = धन पदार्थ। जमकालि = जम के काल ने, आत्मिक मौत ने। सतिगुरि मिलिऐ = अगर गुरु मिल जाए। रिदै = हृदय।3।
अर्थ: (संसार आम तौर पर) ममता-जाल में फंसा हुआ (माया की खातिर) ढूंढता फिरता है। पर (एकत्र किया गया) धन पदार्थ किसी के साथ नहीं जाता। (माया के मोह में) अंधा हुआ संसार परमात्मा का नाम नहीं स्मरण करता और (स्मरण हीन जगत को) आत्मिक मौत ने अपने बंधनों में बांधा हुआ है। अगर गुरु मिल जाए तो हरि नाम धन प्राप्त हो जाता है (गुरु की शरण पड़ के जीव) परमात्मा का नाम अपने हृदय में संभाल के रखता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नामि रते से निरमले गुर कै सहजि सुभाइ ॥ मनु तनु राता रंग सिउ रसना रसन रसाइ ॥ नानक रंगु न उतरै जो हरि धुरि छोडिआ लाइ ॥४॥१४॥४७॥
मूलम्
नामि रते से निरमले गुर कै सहजि सुभाइ ॥ मनु तनु राता रंग सिउ रसना रसन रसाइ ॥ नानक रंगु न उतरै जो हरि धुरि छोडिआ लाइ ॥४॥१४॥४७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नामि = नाम में। गुरु कै = गुरु के शब्द से। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाइ = प्रेम में। रसना = जीभ। रसन रसाइ = नाम रस में रसी जाती है। धुरि = धुर से ही अपने हुक्म में।4।
अर्थ: गुरु के शब्द की इनायत से जो मनुष्य परमात्मा के नाम (-रंग) में रंगे जाते हैं वह पवित्र (जीवन वाले) हो जाते हैं। वह आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं, वह प्रभु-प्रेम में जुड़े रहते हैं। उनका मन, उनका शरीर प्रभु के प्रेम-रंग से रंगा जाता है। उनकी जीभ नाम रस में रसी रहती है। हे नानक! जिन्हें परमात्मा धुर से ही अपनी रजा से नाम-रंग चढ़ा देता है, उनका वह रंग कभी उतरता नहीं।4।14।47।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ गुरमुखि क्रिपा करे भगति कीजै बिनु गुर भगति न होई ॥ आपै आपु मिलाए बूझै ता निरमलु होवै सोई ॥ हरि जीउ साचा साची बाणी सबदि मिलावा होई ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ गुरमुखि क्रिपा करे भगति कीजै बिनु गुर भगति न होई ॥ आपै आपु मिलाए बूझै ता निरमलु होवै सोई ॥ हरि जीउ साचा साची बाणी सबदि मिलावा होई ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु द्वारा। कीजै = की जा सकती है। आपै = (गुरु के) स्वयं में। आपु = अपने आप को। साचा = सदा स्थिर। बाणी = महिमा। सबदि = महिमा की वाणी में (जुड़ने से)।1।
अर्थ: अगर परमात्मा गुरु के द्वारा (जीव पर) कृपा करे तो (जीव द्वारा) भक्ति की जा सकती है। (गुरु की शरण पड़े) बगैर परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती। जो मनुष्य अपने आप को (गुरु के) अस्तित्व में जोड़ दे (इस भेद को) समझ ले, तो वह पवित्र जीवन वाला हो जाता है। परमात्मा सदा स्थिर रहने वाला है, (उसकी महिमा भी सदा स्थिर रहने वाली है) महिमा की वाणी के द्वारा ही उससे मिलाप हो सकता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे भगतिहीणु काहे जगि आइआ ॥ पूरे गुर की सेव न कीनी बिरथा जनमु गवाइआ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे भगतिहीणु काहे जगि आइआ ॥ पूरे गुर की सेव न कीनी बिरथा जनमु गवाइआ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जगि = जगत में। काहे आइआ = आने का कोई लाभ नहीं हुआ।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा की भक्ति से वंचित रहा, उसे जगत में आने का कोई लाभ नहीं हुआ। जिस मनुष्य ने पूरे गुरु की बताई सेवा ना की, उसने मानुख जन्म व्यर्थ गवा लिया।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपे जगजीवनु सुखदाता आपे बखसि मिलाए ॥ जीअ जंत ए किआ वेचारे किआ को आखि सुणाए ॥ गुरमुखि आपे देइ वडाई आपे सेव कराए ॥२॥
मूलम्
आपे जगजीवनु सुखदाता आपे बखसि मिलाए ॥ जीअ जंत ए किआ वेचारे किआ को आखि सुणाए ॥ गुरमुखि आपे देइ वडाई आपे सेव कराए ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जग जीवन = जगत की जीवन, जीवों की जिंदगी का सहारा। बखसि = बख्शिश करके। आपे = (प्रभु) खुद ही।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘बखस’ और ‘बखसि’ में फर्क याद रखने योग्य है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: परमात्मा स्वयं ही जगत के जीवों की जिन्दगी का सहारा है, स्वयं ही (जीवों को) सुख देने वाला है, स्वयं ही मेहर करके (जीवों को) अपने साथ जोड़ता है। (अगर वह खुद मेहर ना करे तो उसके चरणों में जुड़ने के वास्ते) विचारे जीव बिल्कुल अस्मर्थ है। (प्रभु की मेहर के बिना) ना कोई जीव (उसकी कीर्ति) कह सकता है ना ही सुना सकता है। परमात्मा स्वयं ही गुरु के द्वारा (अपने नाम की बड़ाई) देता है, और स्वयं अपनी सेवा भक्ति कराता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
देखि कुट्मबु मोहि लोभाणा चलदिआ नालि न जाई ॥ सतगुरु सेवि गुण निधानु पाइआ तिस दी कीम न पाई ॥ हरि प्रभु सखा मीतु प्रभु मेरा अंते होइ सखाई ॥३॥
मूलम्
देखि कुट्मबु मोहि लोभाणा चलदिआ नालि न जाई ॥ सतगुरु सेवि गुण निधानु पाइआ तिस दी कीम न पाई ॥ हरि प्रभु सखा मीतु प्रभु मेरा अंते होइ सखाई ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देखि = देख के। मोहि = मोह में। गुण निधान = गुणों का खजाना, प्रभु। तिस दी = उस मनुष्य (आत्मिक उच्चता) की। कीम = कीमत। सखा = साथी, मित्र। सखाई = सहाई।3।
अर्थ: जीव अपने परिवार को देख के इस के मोह में फंस जाता है। (पर, परिवार का कोई साथी) जगत से चलने के वक्त जीव के साथ नहीं जाता। जिस मनुष्य ने गुरु की बताई सेवा करके गुणों के खजाने परमात्मा को ढूंढ लिया, उस की (आत्मिक उच्चता की) कीमत नहीं पड़ सकती। परमात्मा उस मनुष्य का दोस्त बन जाता है मित्र बन जाता है, अंत समय भी उसका साथी बनता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपणै मनि चिति कहै कहाए बिनु गुर आपु न जाई ॥ हरि जीउ दाता भगति वछलु है करि किरपा मंनि वसाई ॥ नानक सोभा सुरति देइ प्रभु आपे गुरमुखि दे वडिआई ॥४॥१५॥४८॥
मूलम्
आपणै मनि चिति कहै कहाए बिनु गुर आपु न जाई ॥ हरि जीउ दाता भगति वछलु है करि किरपा मंनि वसाई ॥ नानक सोभा सुरति देइ प्रभु आपे गुरमुखि दे वडिआई ॥४॥१५॥४८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनि = मन में। आपु = स्वै भाव, अहम्। भगति वछलु = भक्ति से प्यार करने वाला। मंनि = मन में। सुरति = समझ।4।
अर्थ: अपने मन में अपने चित्त में जीव बेशक कहता रहे, दूसरों से भी कहलवाता फिरे (कि मेरे अंदर अहंकार नहीं है) पर यह अहम् अहंकार गुरु की शरण पड़े बगैर दूर नहीं हो सकता। जो प्रभु सब जीवों को दातें देने वाला है तथा भक्ति से प्यार करता है वह कृपा करके खुद ही (अपनी भक्ती जीव के) हृदय में बसाता है। हे नानक! प्रभु स्वयं ही (अपनी भक्ति की) तवज्जो बख्शता है व शोभा बख्शता है। स्वयं ही गुरु की शरण में डाल के (अपने दर पे उसे) आदर सत्कार देता है।4।15।48।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ धनु जननी जिनि जाइआ धंनु पिता परधानु ॥ सतगुरु सेवि सुखु पाइआ विचहु गइआ गुमानु ॥ दरि सेवनि संत जन खड़े पाइनि गुणी निधानु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ धनु जननी जिनि जाइआ धंनु पिता परधानु ॥ सतगुरु सेवि सुखु पाइआ विचहु गइआ गुमानु ॥ दरि सेवनि संत जन खड़े पाइनि गुणी निधानु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: धनु = (धन्य) भाग्य वाली। जननी = मां। जिनि = जिस (मां) ने। जाइआ = जनम दिया। धंनु = (धन्य) भाग्य वाला। सेवि = सेव कर, शरण ले के। दरि = (गुरु के) दर पे। सेवनि = सेवा करते हैं। खड़े = सावधान हो के। पाइनि = पाते हैं। गुणी निधानु = गुणों का खजाना, प्रभु।1।
अर्थ: वह माँ भाग्यशाली है जिस ने (गुरु को) जन्म दिया। (गुरु का) पिता भी भाग्यवान है (और मनुष्य जाति में) श्रेष्ठ है। सतिगुरु की शरण लेने से आत्मिक आनन्द प्राप्त होता है (जो मनुष्य गुरु की शरण में आता है उसके) अंदर से अहंकार दूर हो जाता है। (जो) संतजन (गुरु के) दर पर सावधान हो के सेवा करते हैं, वे गुणों के खजाने परमात्मा को मिल लेते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन गुर मुखि धिआइ हरि सोइ ॥ गुर का सबदु मनि वसै मनु तनु निरमलु होइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन गुर मुखि धिआइ हरि सोइ ॥ गुर का सबदु मनि वसै मनु तनु निरमलु होइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ के। सोइ = वह। मलि = मन में।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! गुरु की शरण पड़ के उस परमात्मा को स्मरण कर। (जिस मनुष्य के) मन में गुरु का शब्द बस जाता है उस का मन पवित्र हो जाता है। उसका शरीर पवित्र हो जाता है। (अर्थात्, ज्ञान-इंद्रिय विकारों से हट जाती हैं।)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
करि किरपा घरि आइआ आपे मिलिआ आइ ॥ गुर सबदी सालाहीऐ रंगे सहजि सुभाइ ॥ सचै सचि समाइआ मिलि रहै न विछुड़ि जाइ ॥२॥
मूलम्
करि किरपा घरि आइआ आपे मिलिआ आइ ॥ गुर सबदी सालाहीऐ रंगे सहजि सुभाइ ॥ सचै सचि समाइआ मिलि रहै न विछुड़ि जाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करि = कर के। घरि = हृदय रूपी घर में। आपे = स्वयं ही। सालाहीऐ = सलाहा जा सकता है। रंगे = रंग देता है। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाइ = प्रेम में। सचै = सदा स्थिर प्रभु में ही, सत्य ही।2।
अर्थ: (गुरु की शरण पड़ने से ही) परमात्मा (जीव के) हृदय घर में आकर प्रगट होता है, स्वयं ही आ के मिलता है। गुरु के शब्द द्वारा ही परमात्मा की महिमा की जा सकती है (जो मनुष्य महिमा करता है उसको प्रभु) आत्मिक अडोलता में व (अपने) प्रेम में रंग देता है। (गुरु की शरण पड़ के) मनुष्य सदा स्थिर प्रभु में ही लीन रहता है, सदैव प्रभु चरणों में विलीन रहता है, कभी विछुड़ता नहीं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जो किछु करणा सु करि रहिआ अवरु न करणा जाइ ॥ चिरी विछुंने मेलिअनु सतगुर पंनै पाइ ॥ आपे कार कराइसी अवरु न करणा जाइ ॥३॥
मूलम्
जो किछु करणा सु करि रहिआ अवरु न करणा जाइ ॥ चिरी विछुंने मेलिअनु सतगुर पंनै पाइ ॥ आपे कार कराइसी अवरु न करणा जाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मेलिअनु = उस (प्रभु) ने मिलाए हैं। सतगुर पंनै = गुरु के पन्ने में, गुरु के लेखे में, गुरु के साथ (लग के)। कराइसी = कराएगा।3।
अर्थ: (परमात्मा की रजा ही ऐसी है कि उसको मिलने के वास्ते जीव सत्गुरू की शरण पड़े, इस रजा का उलंघन नहीं हो सकता) वह परमात्मा वही कुछ कर रहा है जो उसकी रजा है। (उस रजा के उलट) और कुछ किया ही नहीं जा सकता। सत्गुरू के साथ लग के परमात्मा ने चिरों से बिछुड़े जीवों को अपने चरणों में मिला लिया है। प्रभु स्वयं ही (गुरु की शरण पड़ने वाला) कर्म (जीवों से) करवाता है, इसके उलट नहीं चला जा सकता।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनु तनु रता रंग सिउ हउमै तजि विकार ॥ अहिनिसि हिरदै रवि रहै निरभउ नामु निरंकार ॥ नानक आपि मिलाइअनु पूरै सबदि अपार ॥४॥१६॥४९॥
मूलम्
मनु तनु रता रंग सिउ हउमै तजि विकार ॥ अहिनिसि हिरदै रवि रहै निरभउ नामु निरंकार ॥ नानक आपि मिलाइअनु पूरै सबदि अपार ॥४॥१६॥४९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तजि = छोड़ के। अहि = दिन। निसि = रात। निरभउ = भय दूर करने वाला। मिलाइअनु = उस (प्रभु) ने मिलाए हैं। सबदि = गुरु के शब्द द्वारा।4।
अर्थ: (गुरु की शरण पड़ के ही) अहम् का विकार दूर करके मनुष्य का मन और शरीर भी परमात्मा के प्रेम रंग से रंगा जाता है। (अगर जीव गुरु की शरण पड़े तो) आकार-रहित परमात्मा का निर्भैता देने वाला नाम दिन रात उसके हृदय में टिका रहता है।
हे नानक! बेअंत पूर्ण प्रभु ने गुरु के शब्द के द्वारा स्वयं जीवों को (अपने चरणों में) मिलाया है।4।16।49।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ गोविदु गुणी निधानु है अंतु न पाइआ जाइ ॥ कथनी बदनी न पाईऐ हउमै विचहु जाइ ॥ सतगुरि मिलिऐ सद भै रचै आपि वसै मनि आइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ गोविदु गुणी निधानु है अंतु न पाइआ जाइ ॥ कथनी बदनी न पाईऐ हउमै विचहु जाइ ॥ सतगुरि मिलिऐ सद भै रचै आपि वसै मनि आइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गोविदु = धरती के जीवों के दिलों की जानने वाला परमात्मा। निधानु = खजाना। कथनी = (सिर्फ) कहने मात्र से। बदनी = (वद् बोलना) बोलने से। सतिगुरि मिलिऐ = अगर गुरु मिल जाए। सद = सदा। भै = डर में, अदब में। रचै = रच जाए, एकमेक हो जाए। मनि = मन में।1।
अर्थ: परमात्मा सभ गुणों का खजाना है। (उसके गुणों का) आखिरी छोर ढूंढा नहीं जा सकता। सिर्फ यही कहने से कथन करने से (कि मैंने परमात्मा को ढूंढ लिया है) परमात्मा को प्राप्त नहीं किया जा सकता। (परमात्मा तभी मिलता है यदि) मनुष्य के अंदर से अहम् खत्म हो जाए। गुरु के मिलने से मनुष्य का हृदय सदा परमत्मा के डर-अदब में भीगा रहता है। (और इस तरह) परमात्मा स्वयं मनुष्य के हृदय में आ बसता है।1।
[[0033]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे गुरमुखि बूझै कोइ ॥ बिनु बूझे करम कमावणे जनमु पदारथु खोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे गुरमुखि बूझै कोइ ॥ बिनु बूझे करम कमावणे जनमु पदारथु खोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ कर। खोइ = गवा लेते हैं।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! जो कोई मनुष्य (सही जीवन जुगति) समझता है वह गुरु के द्वारा ही समझता है। (सही जीवन जुगति) समझने के बिना (निहित धार्मिक) कर्म करने से मनुष्य कीमती मानव जनम गवा लेता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनी चाखिआ तिनी सादु पाइआ बिनु चाखे भरमि भुलाइ ॥ अम्रितु साचा नामु है कहणा कछू न जाइ ॥ पीवत हू परवाणु भइआ पूरै सबदि समाइ ॥२॥
मूलम्
जिनी चाखिआ तिनी सादु पाइआ बिनु चाखे भरमि भुलाइ ॥ अम्रितु साचा नामु है कहणा कछू न जाइ ॥ पीवत हू परवाणु भइआ पूरै सबदि समाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सादु = स्वाद। भरमि = भटकन में। भुलाइ = गलत रास्ते पड़ जाते हैं। कछू = कोई (स्वाद)। हू = ही। पीवत हू = पीते ही।2।
अर्थ: परमात्मा का सदा स्थिर एक नाम आत्मिक जीवन देने वाला रस है। इसके स्वाद का वर्णन नहीं किया जा सकता। जिन्होंने ये अमृत चखा हैउन्होंने इसके स्वाद का आनन्द लिया है। (नाम अमृत का स्वाद) चखने के बिना मनुष्य माया की भटकन में पड़ कर गलत रास्ते पर पड़ जाता है। पूरे गुरु के शब्द में लीन हो के नाम अमृत पीते ही मनुष्य (प्रभु की हजूरी में) स्वीकार हो जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपे देइ त पाईऐ होरु करणा किछू न जाइ ॥ देवण वाले कै हथि दाति है गुरू दुआरै पाइ ॥ जेहा कीतोनु तेहा होआ जेहे करम कमाइ ॥३॥
मूलम्
आपे देइ त पाईऐ होरु करणा किछू न जाइ ॥ देवण वाले कै हथि दाति है गुरू दुआरै पाइ ॥ जेहा कीतोनु तेहा होआ जेहे करम कमाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देइ = देता है, अगर दे। कै हथि = के हाथ में। गुरू दुआरै = गुरु के द्वारा। कीतोनु = उन कीतो, उस (प्रभु) ने किया। जेहे = उ+जेहे, उस जैसे।3।
अर्थ: (नाम अमृत की दात) अगर परमात्मा खुद ही दे तो मिलती है। (अगर उसकी मेहर ना हो तो) और कोई चारा नहीं किया जा सकता। (नाम की दाति) देने वाले परमात्मा के अपने हाथ में यह दात है। (उसकी रजा के अनुसार) गुरु के दर से ही मिलती है। (परमात्मा ने जीव को) जिस तरह का बनाया, जीव वैसा ही बन गया। (फिर) वैसे ही कर्म जीव करता है। (उसकी रजा अनुसार ही जीव गुरु के दर पर आता है)।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जतु सतु संजमु नामु है विणु नावै निरमलु न होइ ॥ पूरै भागि नामु मनि वसै सबदि मिलावा होइ ॥ नानक सहजे ही रंगि वरतदा हरि गुण पावै सोइ ॥४॥१७॥५०॥
मूलम्
जतु सतु संजमु नामु है विणु नावै निरमलु न होइ ॥ पूरै भागि नामु मनि वसै सबदि मिलावा होइ ॥ नानक सहजे ही रंगि वरतदा हरि गुण पावै सोइ ॥४॥१७॥५०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जतु = कामनाओं से बचने के उद्यम। सतु = ऊँचा आचरण। संजमु = इन्द्रियों को विकारों से रोकने का यत्न। विणु नावै = नाम (स्मरण) के बिना। मनि = मन में। सबदि = (गुरु के) शब्द द्वारा। सहजे = आत्मिक अडोलता में। रंगि = (प्रभु के) प्रेम में। वरतदा = जीवन व्यतीत करता है। सोइ = वही मनुष्य।4।
अर्थ: (मनुष्य अपने जीवन को पवित्र करने के लिए जत सत संजम साधनाएं करता है, पर नाम स्मरण के बिना ये किसी काम के नहीं।) परमात्मा का नाम-अमृत ही जत है, नाम ही सत है और नाम ही संजम है। नाम के बिना मनुष्य पवित्र जीवन वाला नहीं हो सकता। बहुत किस्मत के साथ जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम आ बसता है, गुरु के शब्द द्वारा मनुष्य का प्रभु से मिलाप हो जाता है।
हे नानक! (गुरु के शब्द की इनायत से) जो मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा के प्रेम रंग में जीवन व्यतीत करता है वह मनुष्य परमात्मा के गुण अपने अंदर बसा लेता है।4।17।50।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ कांइआ साधै उरध तपु करै विचहु हउमै न जाइ ॥ अधिआतम करम जे करे नामु न कब ही पाइ ॥ गुर कै सबदि जीवतु मरै हरि नामु वसै मनि आइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ कांइआ साधै उरध तपु करै विचहु हउमै न जाइ ॥ अधिआतम करम जे करे नामु न कब ही पाइ ॥ गुर कै सबदि जीवतु मरै हरि नामु वसै मनि आइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कांइआ = शरीर। साधै = साधता है, बस में रखने के यत्न करता है। उरध = उल्टा लटक के। अधिआतम कर्म-आत्मा संबंधी धार्मिक कर्म। आध्यात्म = आत्मा संबंधी। कब ही = कभी भी। जीवतु मरै = जीता हुआ मर जाए, दुनिया का कार्य-व्यवहार करता हुआ ही विकारों से बचा रहे। मनि = मन में।1।
अर्थ: मानव शरीर को (ज्ञान-इंद्रिय को) अपने बस में रखने के कई प्रयत्न करता है। उल्टा लटक के तप करता है। (पर इस तरह) अंदर का अहम् दूर नहीं होता। अगर मनुष्य आत्मिक उन्नति संबंधी (ऐसे नियत धार्मिक) कर्म करता रहे, तो कभी भी वह परमात्मा का नाम प्राप्त नहीं कर सकता। जो मनुष्य गुरु के शब्द की सहायता से दुनिया की कृत कार करता हुआ ही विकारों से बचता है, उसके मन में प्रभु का नाम आ बसता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुणि मन मेरे भजु सतगुर सरणा ॥ गुर परसादी छुटीऐ बिखु भवजलु सबदि गुर तरणा ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
सुणि मन मेरे भजु सतगुर सरणा ॥ गुर परसादी छुटीऐ बिखु भवजलु सबदि गुर तरणा ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भजु सरणा = शरण पड़ो। छुटीऐ = (माया के प्रभाव से) बचना है। बिखु = जहर, माया की जहरीला असर। भव जल = संसार समुंदर।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! (मेरी बात) सुन। सत्गुरू की शरण पड़। (माया के प्रभाव से) गुरु की कृपा से बचते हैं। ये जहर (भरा) संसार समुंदर गुरु के शब्द द्वारा ही तैर सकते हैं।1 रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
त्रै गुण सभा धातु है दूजा भाउ विकारु ॥ पंडितु पड़ै बंधन मोह बाधा नह बूझै बिखिआ पिआरि ॥ सतगुरि मिलिऐ त्रिकुटी छूटै चउथै पदि मुकति दुआरु ॥२॥
मूलम्
त्रै गुण सभा धातु है दूजा भाउ विकारु ॥ पंडितु पड़ै बंधन मोह बाधा नह बूझै बिखिआ पिआरि ॥ सतगुरि मिलिऐ त्रिकुटी छूटै चउथै पदि मुकति दुआरु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: त्रै गुण = माया के तीन गुण = रजो गुण तमो गुण व सतो गुण। धातु = माया। दूजा भाउ = (प्रभु के बिना) और प्यार। बिखिआ पिआरि = माया के प्यार में। त्रिकुटी = माथे की लकीरें, अंदर का खिज। चउथे पद = उस आत्मिक दर्जे में जो माया के तीन गुणों से ऊपर है।2।
अर्थ: तीन गुणों के अधीन रह कर काम करना, यह सारा माया का ही प्रभाव है। और माया का ही प्यार (मन में) विकार पैदा करता है। माया के बंधनों के मोह में फंसा हुआ पंडित (धर्म पुस्तकें) पढ़ता है, पर माया के प्यार में (फंसा रहने के कारण वह जीवन का सही रास्ता) नहीं समझ सकता। अगर सतिगुरु मिल जाए तो (माया मोह के कारण पैदा हुई अंदर की खिज) दूर हो जाती है। माया के तीन गुणों से ऊपर के आत्मिक दर्जे में (पहुँचने से) (माया के मोह से खलासी) का दरवाजा मिल जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर ते मारगु पाईऐ चूकै मोहु गुबारु ॥ सबदि मरै ता उधरै पाए मोख दुआरु ॥ गुर परसादी मिलि रहै सचु नामु करतारु ॥३॥
मूलम्
गुर ते मारगु पाईऐ चूकै मोहु गुबारु ॥ सबदि मरै ता उधरै पाए मोख दुआरु ॥ गुर परसादी मिलि रहै सचु नामु करतारु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ते = से। मारगु = (जीवन का सही) रास्ता। गुबार = अंधेरा। सबदि = गुरु के शब्द से। उधरै = बच जाता है। मोख दुआरु = (विकारों से) बचने का रास्ता, मोक्ष द्वार। मिलि रहै = जुड़ा रहे।3।
अर्थ: गुरु से जीवन का सही राह मिल जाता है। (मन में से) मोह का अंधेरा दूर हो जाता है। अगर मनुष्य गुरु के शब्द से जुड़ के माया के मोह से मर जाए तो (संसार समुंदर में डूबने से बच जाता है)।
और विकारों से खलासी का राह मिल जाता है। गुरु की कृपा से ही मनुष्य (प्रभु चरणों में) जुड़ा रह सकता है और प्रभु का सदा स्थिर नाम प्राप्त कर सकता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इहु मनूआ अति सबल है छडे न कितै उपाइ ॥ दूजै भाइ दुखु लाइदा बहुती देइ सजाइ ॥ नानक नामि लगे से उबरे हउमै सबदि गवाइ ॥४॥१८॥५१॥
मूलम्
इहु मनूआ अति सबल है छडे न कितै उपाइ ॥ दूजै भाइ दुखु लाइदा बहुती देइ सजाइ ॥ नानक नामि लगे से उबरे हउमै सबदि गवाइ ॥४॥१८॥५१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सबल = बलवान। कितै उपाइ = किसी भी तरह से। दूजै भाइ = माया के प्रेम में। देइ = देता है। सबदि = शब्द से। जलाइ = जला के।4।
अर्थ: (नहीं तो) यह मन (तो) बड़ा बलवान है (गुरु की शरण के बिना और) किसी भी तरीके से ये (गलत रास्ते पड़ने से) हटता नहीं। माया के प्यार में फसा के (मनुष्य को) दुख चिपका लेता है, तथा बड़ी सजा देता है।
हे नानक! जो लोग गुरु के शब्द से अहम् दूर करके परमात्मा के नाम में जुड़ते हैं वह (इसके पंजे से) बचते हैं।4।18।51।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ किरपा करे गुरु पाईऐ हरि नामो देइ द्रिड़ाइ ॥ बिनु गुर किनै न पाइओ बिरथा जनमु गवाइ ॥ मनमुख करम कमावणे दरगह मिलै सजाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ किरपा करे गुरु पाईऐ हरि नामो देइ द्रिड़ाइ ॥ बिनु गुर किनै न पाइओ बिरथा जनमु गवाइ ॥ मनमुख करम कमावणे दरगह मिलै सजाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नामो = नामु। देइद्रिड़ाइ = हृदय में पक्का कर देता है। किनै = किसी ने भी।1।
अर्थ: (जब परमात्मा) कृपा करता है (तो) गुरु मिलता है (गुरु मनुष्य के हृदय में) परमात्मा का नाम पक्का कर देता है। (कभी भी) किसी मनुष्य ने गुरु के बिना (परमात्मा को) नहीं प्राप्त किया। (जो मनुष्य गुरु की शरण नहीं आता वह) अपना मानव जन्म व्यर्थ गवा लेता है। अपने मन के पीछे चल के (नीयत धार्मिक) कर्म (भी) करने से प्रभु की दरगाह में सजा ही मिलती है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे दूजा भाउ चुकाइ ॥ अंतरि तेरै हरि वसै गुर सेवा सुखु पाइ ॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे दूजा भाउ चुकाइ ॥ अंतरि तेरै हरि वसै गुर सेवा सुखु पाइ ॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंतरि तेरै = तेरे अंदर।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! (गुरु की शरण पड़ कर अपने अंदर से) माया का प्यार दूर कर। परमात्मा तेरे अंदर बसता है (फिर भी तू सुखी नहीं है) गुरु द्वारा बताई सेवा भक्ति करने से ही आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचु बाणी सचु सबदु है जा सचि धरे पिआरु ॥ हरि का नामु मनि वसै हउमै क्रोधु निवारि ॥ मनि निरमल नामु धिआईऐ ता पाए मोख दुआरु ॥२॥
मूलम्
सचु बाणी सचु सबदु है जा सचि धरे पिआरु ॥ हरि का नामु मनि वसै हउमै क्रोधु निवारि ॥ मनि निरमल नामु धिआईऐ ता पाए मोख दुआरु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचु = यथार्थ, ठीक। जा = जब। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। निवारि = दूर करके। मनि = मन में। धिआईऐ = स्मरण किया जा सकता है।2।
अर्थ: जब मनुष्य सदा स्थिर प्रभु में प्यार जोड़ता है, तब उस को गुरु की वाणी गुरु का शब्द यर्थाथ प्रतीत होता है (गुरु के शब्द द्वारा अंदर से) अहम् व क्रोध दूर करके परमात्मा का नाम मनुष्य के मन में आ बसता है। परमात्मा का नाम पवित्र मन के द्वारा ही स्मरण किया जा सकता है (जब मनुष्य स्मरण करता है) तब विकारों से निजात की राह ढूँढ लेता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउमै विचि जगु बिनसदा मरि जमै आवै जाइ ॥ मनमुख सबदु न जाणनी जासनि पति गवाइ ॥ गुर सेवा नाउ पाईऐ सचे रहै समाइ ॥३॥
मूलम्
हउमै विचि जगु बिनसदा मरि जमै आवै जाइ ॥ मनमुख सबदु न जाणनी जासनि पति गवाइ ॥ गुर सेवा नाउ पाईऐ सचे रहै समाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बिनसदा = आत्मिक मौत मरता है। जाणनी = जानते। जासनि = जाएंगे। पति = इज्जत। सचे = सच ही, सदा स्थिर प्रभु में ही।3।
अर्थ: जगत अहम् में फंस कर आत्मिक मौत सहता है और बारंबार पैदा होता मरता रहता है। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग गुरु के शब्द (की कद्र) नहीं जानते। वह अपनी इज्जत गवा के ही (जगत में से) जाऐंगे। गुरु की बताई सेवा-भक्ति करने से परमात्मा का नाम प्राप्त होता है (जो मनुष्य गुरु की बताई सेवा करता है वह) सदा स्थिर परमात्मा में लीन रहता है।3।
[[0034]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सबदि मंनिऐ गुरु पाईऐ विचहु आपु गवाइ ॥ अनदिनु भगति करे सदा साचे की लिव लाइ ॥ नामु पदारथु मनि वसिआ नानक सहजि समाइ ॥४॥१९॥५२॥
मूलम्
सबदि मंनिऐ गुरु पाईऐ विचहु आपु गवाइ ॥ अनदिनु भगति करे सदा साचे की लिव लाइ ॥ नामु पदारथु मनि वसिआ नानक सहजि समाइ ॥४॥१९॥५२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सबदि मंनिऐ = अगर गुरु के शब्द में श्रद्धा बन जाए। आपु = स्वै भाव। अनदिनु = हर रोज। मनि = मन में। सहजि = आत्मिक अडोलता में।4।
अर्थ: अगर गुरु के शब्द में श्रद्धा बन जाए तो गुरु मिल जाता है (जो मनुष्य गुरु के शब्द में श्रद्धा बनाता है वह अपने) अंदर से अहम् दूर कर लेता है। वह हर वक्त सदा स्थिर प्रभु के चरणों में तवज्जो जोड़ के सदा उसकी भक्ति करता है। हे नानक! उस के मन में परमात्मा का अमुल्य नाम आ बसता है। वह आत्मिक अडोलता में भी टिका रहता है।4।19।52।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ जिनी पुरखी सतगुरु न सेविओ से दुखीए जुग चारि ॥ घरि होदा पुरखु न पछाणिआ अभिमानि मुठे अहंकारि ॥ सतगुरू किआ फिटकिआ मंगि थके संसारि ॥ सचा सबदु न सेविओ सभि काज सवारणहारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ जिनी पुरखी सतगुरु न सेविओ से दुखीए जुग चारि ॥ घरि होदा पुरखु न पछाणिआ अभिमानि मुठे अहंकारि ॥ सतगुरू किआ फिटकिआ मंगि थके संसारि ॥ सचा सबदु न सेविओ सभि काज सवारणहारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पुरखी = पुरखों ने, पुरुषों ने। सेविओ = सेवा की। जुग चारि = चारों युगों में।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘चारि’ और ‘चार’ में फर्क स्मरणीय है: ‘वडिआईआ चारि’, चार = सुंदर।
दर्पण-भाषार्थ
घरि = हृदय घर में। होदा = बसता। पुरखु = परमात्मा। अभिमानि = अभिमान में। मुठे = ठगे गए, लूटे गए। फिटकिआ = फिटे हुए, दुत्कारे हुए। सतिगुरू किआ फिटकिआ = गुरु द्वारा दुत्कारे हुए। संसारि = संसार में। सचा = सदा स्थिर रहने वाला। सभि काज = सारे कार्य।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘काज’ बहुवचन है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जिस लोगों ने गुरु की बताई हुई सेवा नहीं की, वह चारों युगों में दुखी रहते हैं। (अर्थात, युग चाहे कोई भी हो गुरु की शरण के बिना दुख है)। वो मनुष्य हृदय घर में बसते परमात्मा को नहीं पहिचान सकते, वह अहंकार में अभिमान में (फंसे रहके आत्मिक जीवन की राशि पूंजी) लुटा बैठते हैं। गुरु द्वारा बेमुख मनुष्य जगत में मांगते फिरते है। (माया खातिर भटकते फिरते हैं)। वह बंदे उस अटल गुर शब्द को नहीं स्मरण करते जो सारे कार्य सवारने में समर्थ है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे सदा हरि वेखु हदूरि ॥ जनम मरन दुखु परहरै सबदि रहिआ भरपूरि ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे सदा हरि वेखु हदूरि ॥ जनम मरन दुखु परहरै सबदि रहिआ भरपूरि ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हदूरि = हाजर नाजर, अंग संग। परहरै = दूर करता है। सबदि = शब्द में, महिमा की वाणी में।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! परमात्मा को सदा (अपने) अंग संग देख। परमात्मा (जीवों का) जन्म-मरन का दूख दूर कर देता है। वह गुरु के शब्द में भरपूर बस रहा है (इस वास्ते, हे मन! गुरु का शब्द अपने अंदर धारण कर)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचु सलाहनि से सचे सचा नामु अधारु ॥ सची कार कमावणी सचे नालि पिआरु ॥ सचा साहु वरतदा कोइ न मेटणहारु ॥ मनमुख महलु न पाइनी कूड़ि मुठे कूड़िआर ॥२॥
मूलम्
सचु सलाहनि से सचे सचा नामु अधारु ॥ सची कार कमावणी सचे नालि पिआरु ॥ सचा साहु वरतदा कोइ न मेटणहारु ॥ मनमुख महलु न पाइनी कूड़ि मुठे कूड़िआर ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचु = सदा स्थिर प्रभु। सलाहनि = सलाते हैं। अधारु = आसरा। सची = सदा स्थिर रहने वाली। वरतदा = (जिसका हुक्म) चलता है। मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य। पाइनी = पाते हैं। कूड़ि = झूठ में, झूठ से। कूड़िआर = झूठ के व्यापारी, नाशवान चीजों के व्यापारी।2।
अर्थ: जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु की महिमा करते हैं वह उस सदा स्थिर का ही रूप हो जाते हैं। परमात्मा का सदा स्थिर नाम उनकी (जिंदगी का) आसरा बन जाता है। जिन्होंने नाम जपने की ये सदा स्थिर रहने वाली कार की है, उनका प्यार सदा स्थिर प्रभु से बन जाता है। परमात्मा ही सदा स्थिर रहने वाला शाह है, (जिसका हुक्म जगत में) चल रहा है। कोई भी जीव उसके हुक्म की उलंघना नहीं कर सकता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य परमात्मा का दर घर नहीं ढूंढ सकता। नाशवान जगत के व्यापारी झूठे मोह में ही (आत्मिक जीवन की राशि पूंजी) ठगा बैठते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउमै करता जगु मुआ गुर बिनु घोर अंधारु ॥ माइआ मोहि विसारिआ सुखदाता दातारु ॥ सतगुरु सेवहि ता उबरहि सचु रखहि उर धारि ॥ किरपा ते हरि पाईऐ सचि सबदि वीचारि ॥३॥
मूलम्
हउमै करता जगु मुआ गुर बिनु घोर अंधारु ॥ माइआ मोहि विसारिआ सुखदाता दातारु ॥ सतगुरु सेवहि ता उबरहि सचु रखहि उर धारि ॥ किरपा ते हरि पाईऐ सचि सबदि वीचारि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुआ = आत्मिक मौत सहता है। घोर अंधारु = घोर अंधकार। मोहि = मोह में (फस के)। सेवहि = (अगर) सेवा करते हैं। उर धारि = हृदय में टिका के। ते = से, साथ। सचि सबदि = सदा स्थिर शब्द के द्वारा।3।
अर्थ: जगत ‘मैं मैं’ करता ही (भाव, मैं बड़ा हूं, मैं बड़ा हूं- इस अहंकार में) जीव आत्मिक मौत ले लेता है। गुरु की शरण से वंचित रह कर (उसके जीवन में) घोर अंधकार (बना रहता) है। माया के मोह में फंस के (इस ने) सुखदायक और सभ दातें देने वाले परमात्मा को विसार दिया है।
जब जीव गुरु की बताई हुई सेवा करते हैं, तब (माया के मोह के घोर अंधेरे में) बच जाते हैं तथा सदा स्थिर प्रभु को अपने दिल में बसा के रखते हैं।
प्रभु अपनी मेहर से ही मिलता है। (स्मरण से ही) सदा स्थिर गुरु-शब्द के द्वारा (उस के गुणों की) विचार की जा सकती है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतगुरु सेवि मनु निरमला हउमै तजि विकार ॥ आपु छोडि जीवत मरै गुर कै सबदि वीचार ॥ धंधा धावत रहि गए लागा साचि पिआरु ॥ सचि रते मुख उजले तितु साचै दरबारि ॥४॥
मूलम्
सतगुरु सेवि मनु निरमला हउमै तजि विकार ॥ आपु छोडि जीवत मरै गुर कै सबदि वीचार ॥ धंधा धावत रहि गए लागा साचि पिआरु ॥ सचि रते मुख उजले तितु साचै दरबारि ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सेवि = सेवा करके। तजि = त्याग के। आपु = स्वै भाव। मरै = विकारों से हट जाता है। धंधा = संसारक झमेले। धावत = दौड़ भाग करनी। साचि = सदा स्थिर रहने वाले प्रभु में। उजले = निर्मल। मुख उजल = उज्जवल मुंहवाले, सुर्ख-रू।4।
अर्थ: गुरु द्वारा बताई सेवा करके अहम् से पैदा होने वाले विकार छोड़ के (मनुष्य का) मन पवित्र हो जाता है। गुरु के शब्द द्वारा (प्रभु के गुणों के) विचार (हृदय में टिका के), और स्वै-भाव दूर करके मनुष्य दुनिया के कार्य-व्यवहार करता हुआ विकारों से बचा रहता है।
जिस मनुष्यों का सदा स्थिर प्रभु (के चरणों में) प्यार बन जाता है, वह मोह के झमेलों की भटकनों से बच जाते हैं। सदा स्थिर प्रभु के रंग में रंगे हुए लोग सदा स्थिर प्रभु के दरबार में आजाद हो जाते हैं।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतगुरु पुरखु न मंनिओ सबदि न लगो पिआरु ॥ इसनानु दानु जेता करहि दूजै भाइ खुआरु ॥ हरि जीउ आपणी क्रिपा करे ता लागै नाम पिआरु ॥ नानक नामु समालि तू गुर कै हेति अपारि ॥५॥२०॥५३॥
मूलम्
सतगुरु पुरखु न मंनिओ सबदि न लगो पिआरु ॥ इसनानु दानु जेता करहि दूजै भाइ खुआरु ॥ हरि जीउ आपणी क्रिपा करे ता लागै नाम पिआरु ॥ नानक नामु समालि तू गुर कै हेति अपारि ॥५॥२०॥५३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मंनिओ = माना, श्रद्धा बनाई। जेता = जितना। दूजै भाइ = (प्रभु के बिनो) और प्यार में। समालि = सम्भाल के रख। अपारि हेति = अटूट प्रेम से।5।
अर्थ: जिस लोगों ने सतगुरू को (अपने जीवन का रहिबर) नहीं माना, जिस का गुरु-शब्द में प्यार नहीं बना, वे जितना भी (तीर्थ) स्नान करते हैं, जितना भी दान-पुण्य करते हैं, माया के प्यार के कारण वह सारा उन्हें खुआर ही करता है।
जब परमात्मा खुद अपनी मेहर करे, तब ही जीव का उसके नाम से प्यार बनता है। हे नानक! गुरु के अटुट प्रेम की इनायत सेतू परमात्मा का नाम (अपने हृदय में) सम्भाल के रख।5।20।43।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ किसु हउ सेवी किआ जपु करी सतगुर पूछउ जाइ ॥ सतगुर का भाणा मंनि लई विचहु आपु गवाइ ॥ एहा सेवा चाकरी नामु वसै मनि आइ ॥ नामै ही ते सुखु पाईऐ सचै सबदि सुहाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ किसु हउ सेवी किआ जपु करी सतगुर पूछउ जाइ ॥ सतगुर का भाणा मंनि लई विचहु आपु गवाइ ॥ एहा सेवा चाकरी नामु वसै मनि आइ ॥ नामै ही ते सुखु पाईऐ सचै सबदि सुहाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हउ = मैं। सेवी = मैं सेवा करूँ। करी = मैं करूँ। जाइ = जा के। पूछउ = मैं पूछता हूँ। मंनि लई = मैं मान लूँ। आपु = स्वै भाव। मनि = मन में। सुहाइ = सुहाना लगता है।1।
अर्थ: जब मैं अपने गुरु से पूछता हूँ कि (विकारों से बचनेके लिए) मैं किस की सेवा करूँ और कौन सा जप करूँ। (तो गुरु की ओर से उपदेश मिलता है कि) मैं अपने अंदर के अहंकार को दूर करके गुरु का हुक्म मानूं। (गुरु का हुक्म मानना ही एक) ऐसी सेवा है एैसी चाकरी है (जिसकी इनायत से परमात्मा का) नाम मन में आ बसता है। परमात्मा के नाम से ही आत्मिक आनन्द मिलता है, और परमात्मा की महिमा की वाणी से ही आत्मिक जीवन खूबसूरत बन जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे अनदिनु जागु हरि चेति ॥ आपणी खेती रखि लै कूंज पड़ैगी खेति ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे अनदिनु जागु हरि चेति ॥ आपणी खेती रखि लै कूंज पड़ैगी खेति ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अनदिनु = हर रोज। जागु = (माया के हमले से) सुचेत हो। चेति = स्मरण कर। खेति = खेत में। खेती = फसल, आत्मिक जीवन। कूँज = (भाव) वृद्ध अवस्था।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! हर वक्त (विकारों के हमले से) सुचेत रह और परमात्मा का नाम स्मरण कर। इस तरह अपने आत्मिक जीवन की फसल (इन विकारों से) बचा ले। अंत को तेरे उम्र के खेत में कूँज आ पड़ेगी (भाव, वृद्ध अवस्था आ पहुँचेगी)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन कीआ इछा पूरीआ सबदि रहिआ भरपूरि ॥ भै भाइ भगति करहि दिनु राती हरि जीउ वेखै सदा हदूरि ॥ सचै सबदि सदा मनु राता भ्रमु गइआ सरीरहु दूरि ॥ निरमलु साहिबु पाइआ साचा गुणी गहीरु ॥२॥
मूलम्
मन कीआ इछा पूरीआ सबदि रहिआ भरपूरि ॥ भै भाइ भगति करहि दिनु राती हरि जीउ वेखै सदा हदूरि ॥ सचै सबदि सदा मनु राता भ्रमु गइआ सरीरहु दूरि ॥ निरमलु साहिबु पाइआ साचा गुणी गहीरु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: इछा = इच्छाएं, भावनियां। सबदि = शब्द में (जुड़ के)। भै = अदब में (रह के)। भाइ = प्रेम में। हदूरि = हाजर नाजर। भ्रमु = भटकन। सरीरहु = शरीर में से। गुणी गहीर = गुणों का खजाना।2।
अर्थ: जो लोग परमात्मा के अदब व प्रेम में रह के उसकी भक्ति दिन रात करते हैं, उनके मन की इच्छाएं पूरी हो जाती हैं (अर्थात, मन कामना रहित हो जाता है)। गुरु के शब्द की इनायत से उनको परमात्मा हर जगह व्यापक दिखता है (उन्हें यकीन बन जाता है कि) परमात्मा हर जगह हाजर-नाजर (हो के सभ जीवों की) संभाल करता है। उनका मन सदा स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी में रंगा रहता है। भटकन उनके शरीर में से बिल्कुल ही खत्म हो जाती है। वह सदा स्थिर रहने वाले गुणों के खजाने पवित्र स्वरूपमालक प्रभु को मिल जाते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जो जागे से उबरे सूते गए मुहाइ ॥ सचा सबदु न पछाणिओ सुपना गइआ विहाइ ॥ सुंञे घर का पाहुणा जिउ आइआ तिउ जाइ ॥ मनमुख जनमु बिरथा गइआ किआ मुहु देसी जाइ ॥३॥
मूलम्
जो जागे से उबरे सूते गए मुहाइ ॥ सचा सबदु न पछाणिओ सुपना गइआ विहाइ ॥ सुंञे घर का पाहुणा जिउ आइआ तिउ जाइ ॥ मनमुख जनमु बिरथा गइआ किआ मुहु देसी जाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गए मुहाए = (आत्मिक जीवन) लुटा के (यहां से) गए। विहाइ गइआ = बीत गया। पाहुणा = मेहमान। जाइ = जा के।3।
अर्थ: जो लोग (माया के हमलों से) सुचेत रहते हैं, वह (विकारों से) बच जाते हैं। जो (माया की) नींद में सो जाते हैं, वे आत्मिक जीवन की राशि पूंजी लुटा जाते हैं। वो सदा स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी की सार नहीं जानते। उनकी जिंदगी सुपने की तरह (व्यर्थ) बीत जाती है। वह जगत से ठीक उसी तरह खाली हाथ चले जाते हैं जैसे किसी सूने घर से कोई मेहमान आ के चला जाता है।
अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य का जीवन व्यर्थ बीत जाता है। वह यहां से जा के आगे क्या मुँह दिखाएगा? (भाव, प्रभु की हाजिरी में शर्मिन्दा ही होएगा)।3।
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विश्वास-प्रस्तुतिः
सभ किछु आपे आपि है हउमै विचि कहनु न जाइ ॥ गुर कै सबदि पछाणीऐ दुखु हउमै विचहु गवाइ ॥ सतगुरु सेवनि आपणा हउ तिन कै लागउ पाइ ॥ नानक दरि सचै सचिआर हहि हउ तिन बलिहारै जाउ ॥४॥२१॥५४॥
मूलम्
सभ किछु आपे आपि है हउमै विचि कहनु न जाइ ॥ गुर कै सबदि पछाणीऐ दुखु हउमै विचहु गवाइ ॥ सतगुरु सेवनि आपणा हउ तिन कै लागउ पाइ ॥ नानक दरि सचै सचिआर हहि हउ तिन बलिहारै जाउ ॥४॥२१॥५४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कहनु न जाइ = कहा नहीं जा सकता। सबदि = शब्द से। लागउ = मैं लगता हूँ। हहि = हैं। दरि = दर से।4।
अर्थ: (जीवों के भी क्या बस?) परमात्मा खुद ही सब कुछ करने के समर्थ है। (वैसे) अहम् में फसे हुए द्वारा (यह सच्चाई) नहीं बयान की जा सकती (भाव, अहंकार में फंसे जीव को यह समझ नहीं आती कि परमात्मा खुद ही सब कुछ करने योग्य है)। गुरु के शब्द की इनायत से अपने अंदर अहंकार का दुख दूर करके ये समझ आती है।
जो लोग अपने गुरु की सेवा करते हैं (भाव, गुरु के बताए राह पर चलते हैं), मैं उनके चरण छूता हूँ। हे नानक! (कह) मैं उन लोगों से कुर्बान जाता हूँ, जो सदा स्थिर प्रभु के दर पे स्वीकार होते हैं।4।21।54।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ जे वेला वखतु वीचारीऐ ता कितु वेला भगति होइ ॥ अनदिनु नामे रतिआ सचे सची सोइ ॥ इकु तिलु पिआरा विसरै भगति किनेही होइ ॥ मनु तनु सीतलु साच सिउ सासु न बिरथा कोइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ जे वेला वखतु वीचारीऐ ता कितु वेला भगति होइ ॥ अनदिनु नामे रतिआ सचे सची सोइ ॥ इकु तिलु पिआरा विसरै भगति किनेही होइ ॥ मनु तनु सीतलु साच सिउ सासु न बिरथा कोइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कितु = किस में? कितु वेला = किस समय? अनदिनु = हर रोज, हर वक्त। नामे = नाम में ही। सोइ = शोभा। सची = सदा स्थिर रहने वाली। किनेही = कैसी? साचु सिउ = सदा स्थिर प्रभु के साथ। सासु = स्वास।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘कितु’ शब्द ‘किस’ का अधिकरण कारक एकवचन है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: अगर (भक्ति करने के लिए) कोई खास बेला, खास वक्त नियत करना विचारते रहें, तो किसी वक्त भी भक्ति नहीं हो सकती। हर समय ही परमात्मा के नाम रंग में रंगे रह के सदा स्थिर प्रभु का रूप हो जाना है तभी सदा स्थिर रहने वाली शोभा मिलती है। वह कैसी भक्ति हुई अगर एक छिन भर भी प्यारा परमात्मा बिसर जाए? अगर एक श्वास भी परमात्मा की याद से खाली ना जाए तो सदा स्थिर प्रभु के साथ जुड़ा मन शांत हो जाता है, शरीर भी शांत हो जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन हरि का नामु धिआइ ॥ साची भगति ता थीऐ जा हरि वसै मनि आइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन हरि का नामु धिआइ ॥ साची भगति ता थीऐ जा हरि वसै मनि आइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ता = तब। थीऐ = हो सकती है। जा = जब। मनि = मन में।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! परमात्मा का नाम स्मरण कर। सदा स्थिर रहने वाले प्रभु की भक्ति तभी हो सकती है जब (नाम जपने की इनायत से) परमात्मा मनुष्य के मन में आ बसे।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सहजे खेती राहीऐ सचु नामु बीजु पाइ ॥ खेती जमी अगली मनूआ रजा सहजि सुभाइ ॥ गुर का सबदु अम्रितु है जितु पीतै तिख जाइ ॥ इहु मनु साचा सचि रता सचे रहिआ समाइ ॥२॥
मूलम्
सहजे खेती राहीऐ सचु नामु बीजु पाइ ॥ खेती जमी अगली मनूआ रजा सहजि सुभाइ ॥ गुर का सबदु अम्रितु है जितु पीतै तिख जाइ ॥ इहु मनु साचा सचि रता सचे रहिआ समाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सहजे = आत्मिक अडोलता में। राहीऐ = बीजनी चाहिए। सचु = सदा स्थिर रहने वाला। पाइ = डाल के, बीज के। अगली = बहुत, अधिक। सुभाइ = प्रेम में (टिक के)। जितु = जिसके द्वारा। जितु पीतै = जिस के पीने से। तिख = प्यास। सचि = सदा स्थिर प्रभु में।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जितु’ शब्द ‘जित’ का अधिकरण कारक एकवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: अगर आत्मिक अडोलता में टिक के प्रभु का सदा स्थिर नाम बीज बीज के (आत्मिक जीवन की) फसल बीजें; तो यह फसल बहुत उगती है। इस फसल को बीजने वाले मनुष्य का मन आत्मिक अडोलता व प्रेम में जुड़ के (तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाता है। सतिगुरु का शब्द ऐसा अंमृत है (आत्मिक जीवन देने वाला जल है) जिसके पीने से (माया की) तृष्णा दूर हो जाती है। (नाम अंमृत पीने वाले मनुष्य का) यह मन अडोल हो जाता है। सदा स्थिर प्रभु में रंगा जाता है। और सदा स्थिर प्रभु की याद में ही लीन रहता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आखणु वेखणु बोलणा सबदे रहिआ समाइ ॥ बाणी वजी चहु जुगी सचो सचु सुणाइ ॥ हउमै मेरा रहि गइआ सचै लइआ मिलाइ ॥ तिन कउ महलु हदूरि है जो सचि रहे लिव लाइ ॥३॥
मूलम्
आखणु वेखणु बोलणा सबदे रहिआ समाइ ॥ बाणी वजी चहु जुगी सचो सचु सुणाइ ॥ हउमै मेरा रहि गइआ सचै लइआ मिलाइ ॥ तिन कउ महलु हदूरि है जो सचि रहे लिव लाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सबदे = शब्द मेंही, महिमा की वाणी में ही। वजी = मशहूर हो गई। चहु जुगी = चारों युगों में, सदा के लिए। सचो सचु = सत्य ही सत्य, सदा स्थिर प्रभु का नाम ही। रहि गइआ = समाप्त हो गया। सचै = सदा स्थिर प्रभु ने। महलु = टिकाना।3।
अर्थ: जिस मनुष्यों का कहना, देखना और बोलना (प्रभु की महिमा वाले) शब्द में ही लीन रहता है (भाव, जो लोग सदा महिमा में ही मगन रहते हैं) व हर तरफ परमात्मा को ही देखते हैं। सदा स्थिर प्रभु का नाम ही (और लोगों को) सुना सुना के उनकी शोभा (सारे संसार में) सदा के लिए कायम हो जाती है। सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा उनको अपनी याद में जोड़े रखता है। इस वास्ते उनका अहम् समाप्त हो जाता है उनकी अपनत्व दूर हो जाती है।
जो लोग सदा स्थिर रहने वाले प्रभु में लगन लगा के रखते हैं, उनको प्रभु की हजूरी में जगह मिलती है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नदरी नामु धिआईऐ विणु करमा पाइआ न जाइ ॥ पूरै भागि सतसंगति लहै सतगुरु भेटै जिसु आइ ॥ अनदिनु नामे रतिआ दुखु बिखिआ विचहु जाइ ॥ नानक सबदि मिलावड़ा नामे नामि समाइ ॥४॥२२॥५५॥
मूलम्
नदरी नामु धिआईऐ विणु करमा पाइआ न जाइ ॥ पूरै भागि सतसंगति लहै सतगुरु भेटै जिसु आइ ॥ अनदिनु नामे रतिआ दुखु बिखिआ विचहु जाइ ॥ नानक सबदि मिलावड़ा नामे नामि समाइ ॥४॥२२॥५५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नदरी = (परमात्मा के मेहर की) निगाह से। करम = बख्शिश। विणु करमा = परमात्मा की मेहर के बिना। भेटे जिसु = जिसको मिलता है। आइ = आ के। बिखिआ = माया का मोह रूप दुख। सबदि = गुरु के शब्द से। नामे नामि = नाम में ही।4।
अर्थ: परमात्मा के मेहर की नजर से ही परमात्मा का नाम स्मरण किया जा सकता है। परमात्मा की मेहर के बिना वह मिल नहीं सकता। जिस मनुष्य की बड़िया किस्मत से साधु-संगत मिल जाती है, जिस को गुरु आ के मिलता है (इसकी इनायत से) हर वक्त प्रभु के नाम (रंग) में रंगे रहने के कारण उस मनुष्य के अंदर माया (के मोह) का दुख दूर हो जाता है।
हे नानक! गुरु के शब्द द्वारा (परमात्मा से) मिलाप होता है (जिस मनुष्य को गुरु का शब्द प्राप्त हो जाता है वह) परमात्मा के नाम में ही लीन रहता है।4।22।55।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ आपणा भउ तिन पाइओनु जिन गुर का सबदु बीचारि ॥ सतसंगती सदा मिलि रहे सचे के गुण सारि ॥ दुबिधा मैलु चुकाईअनु हरि राखिआ उर धारि ॥ सची बाणी सचु मनि सचे नालि पिआरु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ आपणा भउ तिन पाइओनु जिन गुर का सबदु बीचारि ॥ सतसंगती सदा मिलि रहे सचे के गुण सारि ॥ दुबिधा मैलु चुकाईअनु हरि राखिआ उर धारि ॥ सची बाणी सचु मनि सचे नालि पिआरु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पाइओनु = पाया+उन, उस परमात्मा ने पाया। भउ = डर अदब। तिन = उनके (हृदय में)। सचे के = सदा स्थिर प्रभु के। सारि = (हृदय में) संभाल के। दुबिधा = दु किस्मापन, मेर तेर, डावांडोल हालत। चुकाइअनु = चुकाई+उन उस पमात्मा ने चुका दिया/दूर कर दिया। उर धारि = हृदय में धार के। सचु = सदा स्थिर प्रभु। मनि = मन में।1।
अर्थ: उस परमात्मा ने अपना डर-अदब उन लोगों के हृदय में डाल दिया है, जिन्होंने गुरु के शब्द को अपने सोच-मण्डल में टिकाया है। वह लोग सदा स्थिर प्रभु के गुणों को (अपने हृदय में) सम्भाल के साधु-संगत में मिल के रहते हैं।
उस (परमात्मा) ने खुद उन लोगों की दुबिधा की मैल दूर कर कर दी है, वह लोग परमात्मा के नाम को अपने हृदय में टिका के रखते हैं। सदा स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी एनके मन में बसती है। सदा स्थिर प्रभु खुद उनके मन में बसता है, उन लोगों का सदा स्थिर प्रभु से प्यार हो जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे हउमै मैलु भर नालि ॥ हरि निरमलु सदा सोहणा सबदि सवारणहारु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे हउमै मैलु भर नालि ॥ हरि निरमलु सदा सोहणा सबदि सवारणहारु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भरनालि = भरनाल में, समुंदर में, संसार समुंदर में (देखें भाई गुरदास जी की वार 26, पौड़ी 8)। सबदि = गुरु के शब्द में (जोड़ के)। सवारणहार = सवांरने के समर्थ।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! संसार समुंदर में अहम् की मैल (प्रबल) है। परमात्मा (इस) मैल के बगैर है और (इस वास्ते) सदा सुंदर है। (वह निर्मल परमात्मा जीवों को गुरु के) शब्द में जोड़ के सुंदर बनाने के समरथ है (हे मन! तू भी गुरु के शब्द में जुड़)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचै सबदि मनु मोहिआ प्रभि आपे लए मिलाइ ॥ अनदिनु नामे रतिआ जोती जोति समाइ ॥ जोती हू प्रभु जापदा बिनु सतगुर बूझ न पाइ ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ सतगुरु भेटिआ तिन आइ ॥२॥
मूलम्
सचै सबदि मनु मोहिआ प्रभि आपे लए मिलाइ ॥ अनदिनु नामे रतिआ जोती जोति समाइ ॥ जोती हू प्रभु जापदा बिनु सतगुर बूझ न पाइ ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ सतगुरु भेटिआ तिन आइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचै सबदि = सदा स्थिर प्रभु की महिमा की वाणी में। प्रभि = प्रभु ने। अनदिनु = हर रोज। जोती = परमात्मा की ज्योति में। हू = से ही। जोती हू = अंदर के प्रकाश से ही। जापदा = प्रतीत होता, दिखता है। बूझ = समझ। भेटिआ = मिला।2।
अर्थ: जिस मनुष्यों का मन सदा स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द में मस्त रहता है, उनको सदा स्थिर प्रभु ने स्वयं ही (अपने चरणों में) जोड़ लिया है। हर वक्त प्रभु के नाम में रंगे रहने के कारण उनकी ज्योति प्रभु की ज्योति में लीन रहती है। परमात्मा उस अंदरूनी ज्योति के द्वारा ही दिखाई देता है। पर गुरु के बिना उस ज्योति (प्रकाश) की समझ नहीं पड़तीऔर गुरु उन लोगों को आ के मिलता है जिनके भाग्य में धुर (प्रभु की दरगाह) से ही लेख लिखे हों।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
विणु नावै सभ डुमणी दूजै भाइ खुआइ ॥ तिसु बिनु घड़ी न जीवदी दुखी रैणि विहाइ ॥ भरमि भुलाणा अंधुला फिरि फिरि आवै जाइ ॥ नदरि करे प्रभु आपणी आपे लए मिलाइ ॥३॥
मूलम्
विणु नावै सभ डुमणी दूजै भाइ खुआइ ॥ तिसु बिनु घड़ी न जीवदी दुखी रैणि विहाइ ॥ भरमि भुलाणा अंधुला फिरि फिरि आवै जाइ ॥ नदरि करे प्रभु आपणी आपे लए मिलाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: डुमणी = दु+मनी, दुबिधा में फंसी हुई। दूजे भाइ = और प्यार में। खुआइ = वंचित रह जाना, कुराहे पड़ जाना। तिसु बिन = उस (नाम) के बिना। जीवदी = आत्मिक जीवन प्राप्त करती। रैणि = (जिंदगी की) रात। दुखी = दुखों में। अंधुला = (माया के मोह में) अंधा।3।
दर्पण-टिप्पनी
प्रभु आपे लए मिलाइ: (नोट: देखें दूसरे बंद में “प्रभि आपे लए मिलाइ॥ ” इनके अर्तों में व्याकर्णक फर्कों के ध्यान रखने की जरूरत है।)।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: सारा ही संसार परमात्मा के नाम के बिना दुबिधा में फंसा रहता है, और माया के प्यार में (पड़ के सही जीवन-राह से) वंचित रह जाता है। उस (प्रभु नाम) के बिनां एक घड़ी भर भी आत्मिक जीवन नहीं जी सकते, दुखों में ही जिंदगी की रात बीत जाती है।
माया के मोह में अंधा हुआ जीव भटकनों में पड़ कर जीवन-राह से भटक जाता है और बार बार पैदा होता रहता है। जब प्रभु मेहर की निगाह करता है, तब, खुद ही (उसको अपने चरणों में) जोड़ लेता है।3।
[[0036]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभु किछु सुणदा वेखदा किउ मुकरि पइआ जाइ ॥ पापो पापु कमावदे पापे पचहि पचाइ ॥ सो प्रभु नदरि न आवई मनमुखि बूझ न पाइ ॥ जिसु वेखाले सोई वेखै नानक गुरमुखि पाइ ॥४॥२३॥५६॥
मूलम्
सभु किछु सुणदा वेखदा किउ मुकरि पइआ जाइ ॥ पापो पापु कमावदे पापे पचहि पचाइ ॥ सो प्रभु नदरि न आवई मनमुखि बूझ न पाइ ॥ जिसु वेखाले सोई वेखै नानक गुरमुखि पाइ ॥४॥२३॥५६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पापो पापु = पाप ही पाप। पचहि = खुआर होते हैं। पापे = पाप में ही। पाइ = (समझ) पाए, समझ हासिल करता है।4।
अर्थ: (हम जीव जो कुछ करते हैं अथवा बोलते, चितवते हैं) वह सब कुछ परमात्मा देखता सुनता है (इस वास्ते उसकी हजूरी में अपने किये व चितवे बुरे कर्मों से) मुकरा नहीं जा सकता। (इसी लिए) जो लोग (सारी उम्र) पाप ही पाप कमाते रहते हैं, वह (सदा) पाप में जलते-भुनते रहते हैं।
अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को (यह) समझ नहीं पड़ती, उन को वह (सब कुछ देखने सुनने वाला) परमात्मा नजर नहीं आता। (पर, किसी जीव के भी क्या बस?) हे नानक! जिस मनुष्य को परमात्मा अपना आप दिखाता है, वही (उस को) देख सकता है, उसी मनुष्य को गुरु की शरण पड़ कर ये समझ आती है।4।23।56।
विश्वास-प्रस्तुतिः
स्रीरागु महला ३ ॥ बिनु गुर रोगु न तुटई हउमै पीड़ न जाइ ॥ गुर परसादी मनि वसै नामे रहै समाइ ॥ गुर सबदी हरि पाईऐ बिनु सबदै भरमि भुलाइ ॥१॥
मूलम्
स्रीरागु महला ३ ॥ बिनु गुर रोगु न तुटई हउमै पीड़ न जाइ ॥ गुर परसादी मनि वसै नामे रहै समाइ ॥ गुर सबदी हरि पाईऐ बिनु सबदै भरमि भुलाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तुटई = टूटता। मनि = मन में। नामे = नाम में ही। भरमि = भटकन में। भुलाइ = भूला रहता है, वंचित रहता है।1।
अर्थ: गुरु (की शरण) के बगैर (जनम-मरन) का रोग दूर नहीं हो सकता, अहंकार की पीड़ा नहीं जाती। गुरु की कृपा से (जिस मनुष्य के) मन में (परमात्मा का नाम) बस जाता है वह नाम में ही टिका रहता है। गुरु के शब्द में जुड़ने से ही परमात्मा मिलता है। गुरु के शब्द के बिना मनुष्य भटक के (सही जीवन-राह से) वंचित हो जाते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे निज घरि वासा होइ ॥ राम नामु सालाहि तू फिरि आवण जाणु न होइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे निज घरि वासा होइ ॥ राम नामु सालाहि तू फिरि आवण जाणु न होइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निज घरि = अपने घर में, अंतर आत्मे, प्रभु चरणों में। सालाहि = सिफित सलाह कर।1। रहाउ।
अर्थ: हे (मेरे) मन! परमात्मा के नाम की महिमा करता रह। प्रभु चरणों में मेरा निवास बना रहेगा, तथा दुबारा जन्म-मरन का चक्कर नहीं होगा।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि इको दाता वरतदा दूजा अवरु न कोइ ॥ सबदि सालाही मनि वसै सहजे ही सुखु होइ ॥ सभ नदरी अंदरि वेखदा जै भावै तै देइ ॥२॥
मूलम्
हरि इको दाता वरतदा दूजा अवरु न कोइ ॥ सबदि सालाही मनि वसै सहजे ही सुखु होइ ॥ सभ नदरी अंदरि वेखदा जै भावै तै देइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वरतदा = इस्तेमाल कर रहा है, काम कर रहा है, स्मर्था वाला है। सबदि = (गुरु के) शब्द द्वारा। सालाही = अगर मैं सराहूँ। सहजे ही = आसानी से। सुखु = आत्मिक आनंद। नदरी अंदरि = मेहर की निगाह से। सभ = सारी सृष्टि। जै = जिस को। तै = उसको। देइ = देता है।2।
अर्थ: सभ दातें देने वाला सिर्फ परमात्मा ही सारी स्मर्था वाला है, उस जैसा और कोई नहीं है। अगर मैं गुरु के शब्द से उसकी महिमा करूँ, तो वह मन में आ बसता है और सहज ही आत्मिक आनंद बन जाता है। वह दातार हरि सारी सृष्टि को अपनी मेहर की निगाह से देखता है। जिसको उसकी मर्जी हो उसे ही (यह आत्मिक आनंद) देता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउमै सभा गणत है गणतै नउ सुखु नाहि ॥ बिखु की कार कमावणी बिखु ही माहि समाहि ॥ बिनु नावै ठउरु न पाइनी जमपुरि दूख सहाहि ॥३॥
मूलम्
हउमै सभा गणत है गणतै नउ सुखु नाहि ॥ बिखु की कार कमावणी बिखु ही माहि समाहि ॥ बिनु नावै ठउरु न पाइनी जमपुरि दूख सहाहि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गणत = चिन्ता। नउ = को। बिखु = जहर, विकारों का विष।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘बिखु’ स्त्रीलिंग है पर यह ‘ु’ की मात्रा आखिर में। संबंधक के साथ भी यह ‘ु’ कायम रहता है।
दर्पण-भाषार्थ
ठउर = जगह, शांति। पाइनी = पाते हैं। जमपुरि = यम की पुरी में। सहहि = सहते हैं।3।
अर्थ: (जहां) अहम् है (वहां) चिन्ता है। चिन्ता को सुख नहीं हो सकता। (अहम् के अधीन रह कर आत्मिक मौत लाने वाले विकारों के) जहर वाले काम करने से जीव उस जहर में ही, मगन रहते है। परमात्मा के नाम के बिना वह शांति वाली जगह प्राप्त नहीं कर सकते, और जम के दर पर दु: ख सहते रहते हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जीउ पिंडु सभु तिस दा तिसै दा आधारु ॥ गुर परसादी बुझीऐ ता पाए मोख दुआरु ॥ नानक नामु सलाहि तूं अंतु न पारावारु ॥४॥२४॥५७॥
मूलम्
जीउ पिंडु सभु तिस दा तिसै दा आधारु ॥ गुर परसादी बुझीऐ ता पाए मोख दुआरु ॥ नानक नामु सलाहि तूं अंतु न पारावारु ॥४॥२४॥५७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जीउ = जीवात्मा। पिंड = शरीर। तिसु दा = उस (परमात्मा) का। आधारु = आसरा। परसादी = कृपा से। परसाद = प्रसाद, कृपा। बुझीऐ = समझ आती है। मोख दुआरु = (विकारों से) छूटने का द्वार। पारावारु = पार+उरवार, इस पार और उस पार का छोर।4।
अर्थ: जब, गुरु की कृपा से ये बात समझ आ जाती है कि ये जीवात्मा और ये शरीर सब कुछ उस परमात्मा का ही है। तथा परमात्मा का ही (सभ जीवों को) आसरा, सहारा है। तब जीव विकारों से निजात पाने का राह ढूंढ लेता है।
हे नानक! उस परमात्मा के नाम की महिमा करता रह जिसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जिसकी स्मर्था का उरवार पार भी नहीं ढूंढा जा सकता।4।24।57।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ तिना अनंदु सदा सुखु है जिना सचु नामु आधारु ॥ गुर सबदी सचु पाइआ दूख निवारणहारु ॥ सदा सदा साचे गुण गावहि साचै नाइ पिआरु ॥ किरपा करि कै आपणी दितोनु भगति भंडारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ तिना अनंदु सदा सुखु है जिना सचु नामु आधारु ॥ गुर सबदी सचु पाइआ दूख निवारणहारु ॥ सदा सदा साचे गुण गावहि साचै नाइ पिआरु ॥ किरपा करि कै आपणी दितोनु भगति भंडारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आधारु = आसरा। सचु = सदा स्थिर रहने वाला। निवारणहारु = दूर करने की ताकत रखने वाला। गावहि = गाते हैं। नाइ = नाम में। दितोनु = दिता+उन, उस (प्रभु) ने दिया। भंडार = खजाना।1।
अर्थ: परमात्मा का सदा स्थिर नाम जिस मनुष्यों (की जिंदगी) का आसरा बनता है, उनको सदा आनंद मिलता है, सदा सुख मिलता है। (क्योंकि) गुरु के शब्द में जुड़ के उन्होंने वह सदा स्थिर परमात्मा पा लिया होता हैजो सारे दुख दूर करने की स्मर्था रखता है। वह मनुष्य सदा ही सदा स्थिर प्रभु के गुण गाते हैं, वह सदा स्थिर प्रभु के नाम से प्यार करते हैं।
परमात्मा ने अपनी कृपा करके उन्हें अपनी भक्ति का खजाना बख्श दिया है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे सदा अनंदु गुण गाइ ॥ सची बाणी हरि पाईऐ हरि सिउ रहै समाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे सदा अनंदु गुण गाइ ॥ सची बाणी हरि पाईऐ हरि सिउ रहै समाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सची बाणी = सदा स्थिर प्रभु की महिमा में (जुड़ने से)। सिउ = साथ।1। रहाउ।
अर्थ: हे (मेरे) मन! परमात्मा के गुण गाता रह। (गुण गाने से) सदा खुशी बनी रहती है। सदा स्थिर रहने वाले प्रभु की महिमा में जुड़ने से ही प्रभु मिलता है। (जो जीव महिमा करता है वह) परमात्मा की (याद में) लीन रहता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सची भगती मनु लालु थीआ रता सहजि सुभाइ ॥ गुर सबदी मनु मोहिआ कहणा कछू न जाइ ॥ जिहवा रती सबदि सचै अम्रितु पीवै रसि गुण गाइ ॥ गुरमुखि एहु रंगु पाईऐ जिस नो किरपा करे रजाइ ॥२॥
मूलम्
सची भगती मनु लालु थीआ रता सहजि सुभाइ ॥ गुर सबदी मनु मोहिआ कहणा कछू न जाइ ॥ जिहवा रती सबदि सचै अम्रितु पीवै रसि गुण गाइ ॥ गुरमुखि एहु रंगु पाईऐ जिस नो किरपा करे रजाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: थीआ = हो जाता है। सहजि = आत्मिक अडोलता में। सुभाइ = प्रेम में। रसि = रस से, प्रेम से। गाइ = गा के। गुरमुखि = गुरु के सन्मुखि हो के। रजाइ = रजा अनुसार।2।
अर्थ: सदा स्थिर प्रभु की भक्ति (के रंग) में जिस मनुष्य का रंग गाढ़ा रंगा जाता है, वह आत्मिक अडोलता में प्रभु प्रेम में मस्त रहता है। गुरु के शब्द में जुड़ के उस का मन (प्रभु चरणों में ऐसा) मस्त होता है कि उस (मस्ती) का बयान नहीं किया जा सकता। उसकी जीभ सदा स्थिर प्रभु की महिमा में रंगी जाती हैं, प्रेम से प्रभु के गुण गा के वह आत्मिक जीवन देने वाला रस पीता है। पर ये रंग गुरु की शरण पड़ने से ही मिलता है (वही मनुष्य प्राप्त करता है) जिस पर प्रभु अपनी रजा मुताबिक मेहर करता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
संसा इहु संसारु है सुतिआ रैणि विहाइ ॥ इकि आपणै भाणै कढि लइअनु आपे लइओनु मिलाइ ॥ आपे ही आपि मनि वसिआ माइआ मोहु चुकाइ ॥ आपि वडाई दितीअनु गुरमुखि देइ बुझाइ ॥३॥
मूलम्
संसा इहु संसारु है सुतिआ रैणि विहाइ ॥ इकि आपणै भाणै कढि लइअनु आपे लइओनु मिलाइ ॥ आपे ही आपि मनि वसिआ माइआ मोहु चुकाइ ॥ आपि वडाई दितीअनु गुरमुखि देइ बुझाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: स्ंसा = सहम। रैणि = (जिंदगी रूप) रात। इकि = कइ। जीव। कढि लइअनु = उस (प्रभु ने) निकाल लिए। लइओनु मिलाइ = उस ने मिला लिया। मनि = मन में। चुकाइ = दूर करके। दितीअनु = उस ने दी। देइ बुझाइ = समझा देता है।3।
अर्थ: जगत (का मोह) तौखले का मूल है। (मोह की नींद में) सोए हुए ही (जिंदगी रूपी) रात व्यतीत हो जाती है। कई (भाग्यशाली) जीवों को परमात्मा ने अपनी रजा में (जोड़ के इस मोह में से) निकाल लिया और खुद ही (अपने चरणों में) मिला लिया है। खुद ही (उनके अंदर से) माया का मोह दूर करके खुद ही उनके मन में आ बसा है। प्रभु ने खुद (ही) उनको इज्जत दी है। (भाग्यशाली लोगों को) परमात्मा गुरु की शरण में ला के (जीवन का सही राह) समझा देता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभना का दाता एकु है भुलिआ लए समझाइ ॥ इकि आपे आपि खुआइअनु दूजै छडिअनु लाइ ॥ गुरमती हरि पाईऐ जोती जोति मिलाइ ॥ अनदिनु नामे रतिआ नानक नामि समाइ ॥४॥२५॥५८॥
मूलम्
सभना का दाता एकु है भुलिआ लए समझाइ ॥ इकि आपे आपि खुआइअनु दूजै छडिअनु लाइ ॥ गुरमती हरि पाईऐ जोती जोति मिलाइ ॥ अनदिनु नामे रतिआ नानक नामि समाइ ॥४॥२५॥५८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: खुआइनु = उसने गवा दिये हैं। दूजे = और (प्रेम) में। छडिअनु लाइ = लगा छोड़े हैं उसने। जोति = तवज्जो, ध्यान। अनदिनु = प्रतिदिन। नामि = नाम में।4।
अर्थ: परमात्मा ही सभ जीवों को दातें देने वाला है। जीवन-राह से भटके हुओं को भी सूझ देता है। कई जीवों को उस प्रभु ने खुद ही अपने आप से दूर किया हुआ है और माया के मोह जाल में फंसा के रखा है।
गुरु की मति पर चलने से परमात्मा मिलता है (गुरु की मति पर चलके जीव) अपनी तवज्जो को परमात्मा की ज्योति में मिलाता है, और हे नानक! हर वक्त नाम के रंग में रंगे रह क रनाम में ही लीन रहता है।4।25।58।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ गुणवंती सचु पाइआ त्रिसना तजि विकार ॥ गुर सबदी मनु रंगिआ रसना प्रेम पिआरि ॥ बिनु सतिगुर किनै न पाइओ करि वेखहु मनि वीचारि ॥ मनमुख मैलु न उतरै जिचरु गुर सबदि न करे पिआरु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ गुणवंती सचु पाइआ त्रिसना तजि विकार ॥ गुर सबदी मनु रंगिआ रसना प्रेम पिआरि ॥ बिनु सतिगुर किनै न पाइओ करि वेखहु मनि वीचारि ॥ मनमुख मैलु न उतरै जिचरु गुर सबदि न करे पिआरु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुणवंती = गुणवान जीव-स्त्री। सचु = सदा स्थिर प्रभु। तजि = त्याग के। रसना = जीभ। पिआरि = प्यार में। मनि = मन में। करि वीचारि = विचार करके। सबदि = शब्द में।1।
अर्थ: (हृदय में) गुण धारण करने वाली जीव-सत्री ने तृष्णा आदि विकार छोड़ के सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा को ढूंढ लिया है। उस का मन गुरु के शब्द में रंगा गया है, उसकी जीभ प्रभु के प्रेम-प्यार में रंगी गई है।
(हे भाई!) अपने मन में विचार करके देख लो, सतिगुरु (की शरण) के बिना किसी ने भी परमात्मा को नहीं ढूंढा। (क्योंकि) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य जब तक गुरु के शब्द से प्यार नहीं डालता, उस के मन के (विकारों की) मैल नहीं उतरती।1।
[[0037]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे सतिगुर कै भाणै चलु ॥ निज घरि वसहि अम्रितु पीवहि ता सुख लहहि महलु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे सतिगुर कै भाणै चलु ॥ निज घरि वसहि अम्रितु पीवहि ता सुख लहहि महलु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भाणै = भाणे में, रजा में। निज घरि = अपने घर में। सुख महलु = सुख का ठिकाना।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! सतिगुरु की रजा में चल। (गुरु की रजा में चल के) अपने अंतरात्मे टिका रहेगा (अर्थात, भटकनों से बच जाएगा)। आत्मिक जीवन देने वाला नाम-धन पीएगा, उस की इनायत से सुखें का ठिकाना ढूंढ लेगा।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अउगुणवंती गुणु को नही बहणि न मिलै हदूरि ॥ मनमुखि सबदु न जाणई अवगणि सो प्रभु दूरि ॥ जिनी सचु पछाणिआ सचि रते भरपूरि ॥ गुर सबदी मनु बेधिआ प्रभु मिलिआ आपि हदूरि ॥२॥
मूलम्
अउगुणवंती गुणु को नही बहणि न मिलै हदूरि ॥ मनमुखि सबदु न जाणई अवगणि सो प्रभु दूरि ॥ जिनी सचु पछाणिआ सचि रते भरपूरि ॥ गुर सबदी मनु बेधिआ प्रभु मिलिआ आपि हदूरि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हदूरि = परमात्मा की हजूरी में। जाणई = जानती है। अवगणि = औगुण के कारण। जिनी = जो लोगों ने। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। बेधिआ = भेदना।2।
अर्थ: जिस जीव-स्त्री के भीतर औगुण ही औगुण हों और गुण कोई भी नहीं, उसको परमात्मा की हजूरी में जगह नहीं मिलती। अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री गुरु के शब्द की कद्र नहीं जानती, औगुणों के कारण वह परमात्मा उसे कहीं दूर ही प्रतीत होता है।
जिस लोगों ने सदा स्थिर परमात्मा को हर जगह बसता पहिचान लिया है वह उस सदा स्थिर प्रभु (के प्यार रंग) में रंगे रहते है। उनका मन गुरु के शब्द में परोया रहता है। उनको परमात्मा मिल जाता हैऔर अंग-संग बसता दिखाई देता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपे रंगणि रंगिओनु सबदे लइओनु मिलाइ ॥ सचा रंगु न उतरै जो सचि रते लिव लाइ ॥ चारे कुंडा भवि थके मनमुख बूझ न पाइ ॥ जिसु सतिगुरु मेले सो मिलै सचै सबदि समाइ ॥३॥
मूलम्
आपे रंगणि रंगिओनु सबदे लइओनु मिलाइ ॥ सचा रंगु न उतरै जो सचि रते लिव लाइ ॥ चारे कुंडा भवि थके मनमुख बूझ न पाइ ॥ जिसु सतिगुरु मेले सो मिलै सचै सबदि समाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रंगणि = साधु-संगत में (रख के)। लइओनु मिलाइ = उस (प्रभु) ने मिला लिया। सचा = सदा कायम रहने वाला। कुंडा = पासे। बूझ = समझ, सूझ। सचै सबदि = सदा स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द में।3।
अर्थ: (पर, जीवों के भी क्या बस?) जिस जीवों को प्रभु ने खुद ही साधु-संगत में (रख के नाम रंग से) रंगा है, गुरु-शब्द में जोड़ के उनको अपने (चरणों) में मिला लिया है। जो लोग सदा स्थिर प्रभु में तवज्जो जोड़ के (नाम रंग से) रंगे जाते हैं, उनका ये सदा स्थिर रहने वाला रंग कभी नहीं उतरता।
अपने मन के पीछे चलने वाले लोग (माया की खातिर) चारों तरफ भटक भटक के थक जाते हैं (अर्थात, आत्मिक जीवन कमजोर कर लेते हैं) उनको (सही जीवन-राह की) सूझ नहीं होती। जिस मनुष्य को गुरु मिलाता है वह प्रभु प्रीतम को मिल जाता है। वह सदा स्थिर प्रभु की महिमा बकी वाणी में लीन रहता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मित्र घणेरे करि थकी मेरा दुखु काटै कोइ ॥ मिलि प्रीतम दुखु कटिआ सबदि मिलावा होइ ॥ सचु खटणा सचु रासि है सचे सची सोइ ॥ सचि मिले से न विछुड़हि नानक गुरमुखि होइ ॥४॥२६॥५९॥
मूलम्
मित्र घणेरे करि थकी मेरा दुखु काटै कोइ ॥ मिलि प्रीतम दुखु कटिआ सबदि मिलावा होइ ॥ सचु खटणा सचु रासि है सचे सची सोइ ॥ सचि मिले से न विछुड़हि नानक गुरमुखि होइ ॥४॥२६॥५९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: घनेरे = बहुत ज्यादा। करि = कर के। रासि = संपत्ति, राशि, पूंजी। सोइ = शोभा। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख।4।
अर्थ: (दुनिया के) बहुत सारे (सम्बंधियों) को मित्र बना बना के मैं थक चुकी हूँ (मैं समझती रही कि कोई साक-संबंधी) मेरा दुख काट सकेगा। प्रभु-प्रीतम को मिल के ही दुख काटा जाता है, गुरु के शब्द द्वारा ही उसका मिलाप होता है।
हे नानक! गुरु के सन्मुख हो के जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु में मिल जाते हैं वह (दुबारा उस से) जुदा नहीं होते। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु का रूप हो जाता है सदा स्थिर प्रभु का नाम ही उसकी लाभ कमायी हो जाती है, नाम ही उसकी राशि पूंजी बन जाती है तथा उसको सदा कायम रहने वाली शोभा मिलती है।4।26।59।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ आपे कारणु करता करे स्रिसटि देखै आपि उपाइ ॥ सभ एको इकु वरतदा अलखु न लखिआ जाइ ॥ आपे प्रभू दइआलु है आपे देइ बुझाइ ॥ गुरमती सद मनि वसिआ सचि रहे लिव लाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ आपे कारणु करता करे स्रिसटि देखै आपि उपाइ ॥ सभ एको इकु वरतदा अलखु न लखिआ जाइ ॥ आपे प्रभू दइआलु है आपे देइ बुझाइ ॥ गुरमती सद मनि वसिआ सचि रहे लिव लाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आपे = स्वयं ही। कारणु = मूल। देखै = संभाल करता है। उपाइ = पैदा करके। सभ = हर जगह। अलखु = अलक्ष्य, समझ में ना आ सकने वाला। बुझाइ देइ = समझा देता है। सद = सदा। मनि = मन में। सचि = सदा स्थिर प्रभु में।1।
अर्थ: कर्तार खुद ही (जगत का) मूल रचता है तथा फिर जगत पैदा करके स्वयं ही उसकी संभाल करता है। (इस जगत में) हर जगह कर्तार स्वयं ही व्यापक है (फिर भी) वह (जीवों की) समझ में नहीं आ सकता। वह प्रभु खुद ही (जब) दयाल होता है (तब) स्वयं ही (सही जीवन की) समझ बख्शता है। जिस मनुष्यों के मन में गुरु की मति की इनायत से परमात्मा बस जाता है। वह मनुष्य उस सदा स्थिर प्रभु में सदा तवज्जो जोड़ के रखते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे गुर की मंनि लै रजाइ ॥ मनु तनु सीतलु सभु थीऐ नामु वसै मनि आइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे गुर की मंनि लै रजाइ ॥ मनु तनु सीतलु सभु थीऐ नामु वसै मनि आइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रजाइ = मर्जी, हुक्म। थीऐ = हो जाता है।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! गुरु के हुक्म में चल। (जो मनुष्य गुरु का हुक्म मानता है उस का) मन (उसका शरीर) शांत हो जाता है। (उस के) मन में परमात्मा का नाम आ बसता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनि करि कारणु धारिआ सोई सार करेइ ॥ गुर कै सबदि पछाणीऐ जा आपे नदरि करेइ ॥ से जन सबदे सोहणे तितु सचै दरबारि ॥ गुरमुखि सचै सबदि रते आपि मेले करतारि ॥२॥
मूलम्
जिनि करि कारणु धारिआ सोई सार करेइ ॥ गुर कै सबदि पछाणीऐ जा आपे नदरि करेइ ॥ से जन सबदे सोहणे तितु सचै दरबारि ॥ गुरमुखि सचै सबदि रते आपि मेले करतारि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिनि = जिस (कर्तार) ने। करि = कर के। सार = संभाल। करेइ = करता है। तितु = उस में। तितु दरबारि = उस दरबार में। करतारि = कर्तार ने।2।
अर्थ: जिस कर्तार ने जगत का मूल रच के जगत को पैदा किया है, वही इसकी संभाल करता है। पर उसकी कद्र गुरु के शब्द द्वारा तब पड़ती है जबवह स्वयं ही मेहर की निगाह करता है। (जिनपे मेहर की निगाह करता है) वह मनुष्य गुरु के शब्द में जुड़ के उस सदा स्थिर प्रभु के दरबार में शोभा पाते हैं। जिस को कर्तार ने खुद ही (गुरु चरणों में) जोड़ा है वह गुरु के सन्मुख रह कर सदा स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द में रंगे रहते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमती सचु सलाहणा जिस दा अंतु न पारावारु ॥ घटि घटि आपे हुकमि वसै हुकमे करे बीचारु ॥ गुर सबदी सालाहीऐ हउमै विचहु खोइ ॥ सा धन नावै बाहरी अवगणवंती रोइ ॥३॥
मूलम्
गुरमती सचु सलाहणा जिस दा अंतु न पारावारु ॥ घटि घटि आपे हुकमि वसै हुकमे करे बीचारु ॥ गुर सबदी सालाहीऐ हउमै विचहु खोइ ॥ सा धन नावै बाहरी अवगणवंती रोइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचु = सदा स्थिर प्रभु। पारावारु = उरवार+पार, इस पार, उस पार। घटि = घट में। घटि घटि = हरेक घट में। हुकमि = हुक्म में। खोइ = दूर करके। साधन = जीवस्त्री। नावै बाहरी = नाम से जुदा। रोइ = रोती है, दुखी होती है।3।
अर्थ: (हे भाई!) गुरु की मति ले के उस सदा स्थिर परमात्मा की महिमा करनी चाहिए जिसके (गुणों का) अंत नहीं पड़ सकता, इस पार उस पार का सिरा नहीं ढूंढा जा सकता। (वह सदा स्थिर प्रभु) खुद ही अपने हुक्म अनुसार हरेक शरीर में बसता है, और अपने हुक्म में ही (जीवों की संभाल की) विचार करता है।
(हे भाई!) गुरु के शब्द में जुड़ के अपने अंदर से अहम् दूर करके परमात्मा की महिमा करनी चाहिए। जो जीव-स्त्री प्रभु के नाम से वंचित रहती है वह औगुणों से भर जाती है और दुखी होती है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचु सलाही सचि लगा सचै नाइ त्रिपति होइ ॥ गुण वीचारी गुण संग्रहा अवगुण कढा धोइ ॥ आपे मेलि मिलाइदा फिरि वेछोड़ा न होइ ॥ नानक गुरु सालाही आपणा जिदू पाई प्रभु सोइ ॥४॥२७॥६०॥
मूलम्
सचु सलाही सचि लगा सचै नाइ त्रिपति होइ ॥ गुण वीचारी गुण संग्रहा अवगुण कढा धोइ ॥ आपे मेलि मिलाइदा फिरि वेछोड़ा न होइ ॥ नानक गुरु सालाही आपणा जिदू पाई प्रभु सोइ ॥४॥२७॥६०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सलाही = सराहूँ, सराहना करूँ। लगा = लगूँ, मैं जुड़ा रहूँ। नाइ = नाम से। त्रिपति = तृप्त होना, तृष्णा का अभाव। वीचारी = मैं विचार करूँ। संग्रहा = मैं संग्रह करूं। धोइ = धो के। जिदू = जिस (गुरु) से। पाई = पा लूं, मैं ढूंढ लूं।4।
अर्थ: हे नानक! (कह, मेरी यही अरदास है कि) मैं सदा स्थिर प्रभु की महिमा करता रहूँ। सदा स्थिर प्रभु (की याद) में जुड़ा रहूँ। सदा स्थिर प्रभु के नाम में जुड़ा रह के ही तृष्णा मिटती है। (मेरी अरदास है कि) मैं परमात्मा के गुणों को विचारता रहूँ। उनके गुणों को (अपने हृदय में) इकट्ठा करता रहूँ तथा (इस तरह अपने अंदर से) औगुणों को धो के निकाल दूँ।
जिस मनुष्य को प्रभु खुद ही अपने चरणों में जोड़ता है, उसे दुबारा कभी प्रभु से विछोड़ा नहीं होता।
(मेरी अरदास है कि) मैं अपने गुरु की कीर्ति करता रहूँ, क्योंकि गुरु के द्वारा ही वह प्रभु मिल सकता है।4।27।60।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ सुणि सुणि काम गहेलीए किआ चलहि बाह लुडाइ ॥ आपणा पिरु न पछाणही किआ मुहु देसहि जाइ ॥ जिनी सखीं कंतु पछाणिआ हउ तिन कै लागउ पाइ ॥ तिन ही जैसी थी रहा सतसंगति मेलि मिलाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ सुणि सुणि काम गहेलीए किआ चलहि बाह लुडाइ ॥ आपणा पिरु न पछाणही किआ मुहु देसहि जाइ ॥ जिनी सखीं कंतु पछाणिआ हउ तिन कै लागउ पाइ ॥ तिन ही जैसी थी रहा सतसंगति मेलि मिलाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: काम = स्वार्थ। गहेली = पकड़ी हुई, फसी हुई। काम गहेलीए = हे स्वार्थ में फंसी हुई जीव-स्त्री! बाह लुडाइ = बांहें उलार के, मस्ती में। न पछाणही = तू नहीं पहचानती। जाइ = जा के। सखी = सखियों ने, सत्संगी जीव स्त्रीयों ने। हउ = मैं। पाइ = चरणों में। लागउ = मैं लगती हूँ। थी रहा = मैं हो जाऊँ।1।
अर्थ: हे स्वार्थ में फंसी हुई जीव-स्त्री! ध्यान से सुन! क्यूँ इतनी लापरवाही से (जीवन-राह में) चल रही है? (स्वार्थ में फंस के) तू अपने प्रभु पति को (अब) पहचानती नहीं, परलोक में जा के क्या मुंह दिखाएगी? जिस सत्संगी जीव स्त्रीयों ने अपने खसम प्रभु के साथ जान-पहिचान बना रखी है (वह भाग्यशाली हैं) मैं उनके चरण छूती हूँ। (मेरा चित्त करता है कि) मैं उनके सत्संग के एकत्र में मिल के उन जैसी ही बन जाऊँ।1।
[[0038]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
मुंधे कूड़ि मुठी कूड़िआरि ॥ पिरु प्रभु साचा सोहणा पाईऐ गुर बीचारि ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मुंधे कूड़ि मुठी कूड़िआरि ॥ पिरु प्रभु साचा सोहणा पाईऐ गुर बीचारि ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुंधे = मुग्धे, हे अपने आप में मुग्ध हुई जीव-स्त्री! कूड़िआरि = झूठ की वंजारन। कूड़ि = झूठ ने, माया के पसारे ने। साचा = सदा स्थिर।1। रहाउ।
अर्थ: हे स्वै भाव में मस्त व झूठ की बंजारन जीव-स्त्री! तुझे माया के पसारे ने लूट लिया है। (इस तरह प्रभु पति के साथ तेरा मेल नहीं हो सकता)। सदा स्थिर रहने वाला सुहाना पति गुरु की बताई विचार पे चलने से ही मिलता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनमुखि कंतु न पछाणई तिन किउ रैणि विहाइ ॥ गरबि अटीआ त्रिसना जलहि दुखु पावहि दूजै भाइ ॥ सबदि रतीआ सोहागणी तिन विचहु हउमै जाइ ॥ सदा पिरु रावहि आपणा तिना सुखे सुखि विहाइ ॥२॥
मूलम्
मनमुखि कंतु न पछाणई तिन किउ रैणि विहाइ ॥ गरबि अटीआ त्रिसना जलहि दुखु पावहि दूजै भाइ ॥ सबदि रतीआ सोहागणी तिन विचहु हउमै जाइ ॥ सदा पिरु रावहि आपणा तिना सुखे सुखि विहाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाली जीव स्त्रीयों (को)। न पछाणई = ना पहचाने।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘पछाणही’ और ‘पछाणई’ का फर्क ध्यान रखने योग्य है।
दर्पण-भाषार्थ
रैणि = (जिंदगी रूप) रात। गरबि = अहंकार में। अटीआ = नाको नाक भरी हुईं। दूजे भाइ = और के प्यार में। विहाइ = (उम्र) बीतती है।2।
अर्थ: जो जीव स्त्रीयां अपने ही मन के पीछे चलती हैं, खसम प्रभु उन्हें पहचाता भी नहीं। उनकी (जिंदगी रूपी) रात कैसे बीतती होगी? (भाव, वह सारी उम्र दुखी ही रहती हैं)। वह अहंकार में पूरी तरह भरी हुई तृष्णा की आग में जलती हैं, वह माया के मोह में पड़ कर दुख बर्दाश्त करती हैं।
(जो जीव स्त्रीयां गुरु के) शब्द में रंगी रहती हैं वह भाग्यशाली हैं (शब्द की इनायत से) उनके अंदर से अहम् दूर हो जाता है। वह सदा अपने प्रभु पति से मिली रहती हैं, उनकी उम्र पूरी तरह सुख में ही बीतती है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गिआन विहूणी पिर मुतीआ पिरमु न पाइआ जाइ ॥ अगिआन मती अंधेरु है बिनु पिर देखे भुख न जाइ ॥ आवहु मिलहु सहेलीहो मै पिरु देहु मिलाइ ॥ पूरै भागि सतिगुरु मिलै पिरु पाइआ सचि समाइ ॥३॥
मूलम्
गिआन विहूणी पिर मुतीआ पिरमु न पाइआ जाइ ॥ अगिआन मती अंधेरु है बिनु पिर देखे भुख न जाइ ॥ आवहु मिलहु सहेलीहो मै पिरु देहु मिलाइ ॥ पूरै भागि सतिगुरु मिलै पिरु पाइआ सचि समाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुतीआ = विछुड़ी हुई, त्यागी हुई स्त्री। पिर = पति। पिरमु = प्रेम। अंधेरु = (मोह का) अंधेरा। भुख = तृष्णा, माया की लालसा। सहेलिहो = हे सत्संगी जीव स्त्रीयो! मै = मुझे। सचि = सदा स्थिर प्रभु में।3।
अर्थ: जो जीव-स्त्री प्रभु पति के साथ गहरी सांझ डाले बगैर ही रही, वह प्रभु-पति से त्यागी हुई ही रह जाती है। वह प्रभु-पति का प्यार हासल नहीं कर सकती। अज्ञान में माती हुई जीव-स्त्री को (माया के मोह का) अंधेरा व्याप्त रहता है। पति प्रभु के दर्शन के बिना उसकी यह माया की भूख तृप्त नहीं होती।
हे सत्संगी जीव सि्त्रयो! आओ, मुझे मिलो और मुझे प्रभु पति मिला दो। जिस जीव-स्त्री के सौभाग्य से गुरु मिल जाता है, वह प्रभु पति को मिल जाती है। वह सदा स्थिर प्रभु में लीन रहती है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
से सहीआ सोहागणी जिन कउ नदरि करेइ ॥ खसमु पछाणहि आपणा तनु मनु आगै देइ ॥ घरि वरु पाइआ आपणा हउमै दूरि करेइ ॥ नानक सोभावंतीआ सोहागणी अनदिनु भगति करेइ ॥४॥२८॥६१॥
मूलम्
से सहीआ सोहागणी जिन कउ नदरि करेइ ॥ खसमु पछाणहि आपणा तनु मनु आगै देइ ॥ घरि वरु पाइआ आपणा हउमै दूरि करेइ ॥ नानक सोभावंतीआ सोहागणी अनदिनु भगति करेइ ॥४॥२८॥६१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सहीआ = सखिआं, सहेलियां, सत्संगी जीव स्त्रीयां। देइ = दे के, अर्पण करके। घरि = हृदय में। करेइ = करती है। अनदिनु = प्रतिदिन।4।
अर्थ: वह सत्संगी जीव स्त्रीयां भाग्यशाली हैं जिस पर प्रभु पति मेहर की निगाह करता है। वह अपना तन अपना मन उसके आगे भेट रख के अपने प्रभु पति से सांझ पाती हैं।
जो जीव-स्त्री अपने अंदर से अहंकार दूर करती है वह अपने हृदय घर में (ही) प्रभु-पति को ढूँढ लेती है। हे नानक! वह शोभनीय हैं वह भाग्यशाली हैं, वह हर वक्त प्रभु-पति की भक्ति करती हैं।4।28।61।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ इकि पिरु रावहि आपणा हउ कै दरि पूछउ जाइ ॥ सतिगुरु सेवी भाउ करि मै पिरु देहु मिलाइ ॥ सभु उपाए आपे वेखै किसु नेड़ै किसु दूरि ॥ जिनि पिरु संगे जाणिआ पिरु रावे सदा हदूरि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ इकि पिरु रावहि आपणा हउ कै दरि पूछउ जाइ ॥ सतिगुरु सेवी भाउ करि मै पिरु देहु मिलाइ ॥ सभु उपाए आपे वेखै किसु नेड़ै किसु दूरि ॥ जिनि पिरु संगे जाणिआ पिरु रावे सदा हदूरि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: इकि = कई (जीव स्त्रीयां)। रावहि = माणना, भोगना, प्रसंन्न करना। हउ = मैं। कै दरि = किस दर पे? जाइ = जा के। सेवी = सेवा करूं। भाउ = प्रेम। मैं = मुझे। पिरु = पति। सभु = सारा जगत। वेखै = संभाल करता है। किसु नेड़े किसु दूरि = किस से नजदीक? और किस से दूर? (अर्थात, हरेक जीव में एक समान है)। जिनि = जिस ने। हदूरि = हाजर नाजर, अंग संग।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘इकि’ शब्द ‘इक’ का बहुवचन है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: कई (भाग्यशाली जीवस्त्रीयां) अपने प्रभु पति को प्रसन्न करती हैं (उनको देख के मेरे मन अंदर भी चाह पैदा होती है कि) मैं किस के दर पे जा के (प्रभु पति को प्रसंन्न करने का तरीका) पूछूँ। मैं श्रद्धा से प्रभु के चरण पकड़ती हूँ (और गुरु के आगे विनती करती हूँ कि) प्रभु खुद ही सारा जगत पैदा करता है तथा (सभ की) संभाल करता है, हरेक जीव में एक समान मौजूद है। जिस (जीव-स्त्री) ने (गुरु की शरण पड़ के) उस प्रभु पति को अपने अंग-संग जान लिया है, वह उस हाजिर नाजिर बसते को सदा अपने हृदय में बसा के रखती है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मुंधे तू चलु गुर कै भाइ ॥ अनदिनु रावहि पिरु आपणा सहजे सचि समाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मुंधे तू चलु गुर कै भाइ ॥ अनदिनु रावहि पिरु आपणा सहजे सचि समाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुंधे = हे जीव स्त्रीयां! भाइ = प्रेम में। भाउ = प्रेम। अनदिनु = हर रोज। सहजे = आत्मिक अडोलता में टिक के। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। समाइ = लीन हो के।1। रहाउ।
अर्थ: हे जीव-स्त्री! तू गुरु के प्रेम में (रह कर जीवन सफर पे) चल। (जो जीव स्त्रीयां गुरु के प्रेम में चलती हैं वह) आत्मक अडोलता से सदा स्थिर प्रभु में लीन हो के हर वक्त अपने प्रभु पति को मिली रहती हैं।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सबदि रतीआ सोहागणी सचै सबदि सीगारि ॥ हरि वरु पाइनि घरि आपणै गुर कै हेति पिआरि ॥ सेज सुहावी हरि रंगि रवै भगति भरे भंडार ॥ सो प्रभु प्रीतमु मनि वसै जि सभसै देइ अधारु ॥२॥
मूलम्
सबदि रतीआ सोहागणी सचै सबदि सीगारि ॥ हरि वरु पाइनि घरि आपणै गुर कै हेति पिआरि ॥ सेज सुहावी हरि रंगि रवै भगति भरे भंडार ॥ सो प्रभु प्रीतमु मनि वसै जि सभसै देइ अधारु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सबदि = शब्द में। सोहागणी = भाग्यशाली स्त्रीयां। सचै सबदि = सदा स्थिर प्रभु के महिमा के शब्द द्वारा। सीगारि = श्रृंगार के, अपने जीवन को सुहाना बना के। वरु = खसम। पाइनि = प्राप्त कर लेती है। घरि = हृदय घर में। हेति = हित में। पिआरि = प्यार में। सेज = हृदय। रंगि = प्यार से। सभसै = हरेक जीव को। अधारु = आसरा।2।
अर्थ: जो जीव स्त्रीयां गुरु के शब्द में रंगी रहती हैं, वह भाग्यशाली हो जाती हैं। वह सदा महिमा की वाणी से अपने जीवन को सवार लेती हैं। वह अपने गुरु के प्रेम में, प्यार में टिक के प्रभु पति को अपने हृदय घर में ढूंढ लेती हैं। प्रभु (पति) उनके सुंदर हृदय सेज पर प्रेम से आकर प्रगट होता है। उनके भक्ति के खजाने भर जाते है। उनके मन में वह प्रभु प्रीतम आ बसता है, जो हरेक जीव को आसरा दे रहा है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पिरु सालाहनि आपणा तिन कै हउ सद बलिहारै जाउ ॥ मनु तनु अरपी सिरु देई तिन कै लागा पाइ ॥ जिनी इकु पछाणिआ दूजा भाउ चुकाइ ॥ गुरमुखि नामु पछाणीऐ नानक सचि समाइ ॥३॥२९॥६२॥
मूलम्
पिरु सालाहनि आपणा तिन कै हउ सद बलिहारै जाउ ॥ मनु तनु अरपी सिरु देई तिन कै लागा पाइ ॥ जिनी इकु पछाणिआ दूजा भाउ चुकाइ ॥ गुरमुखि नामु पछाणीऐ नानक सचि समाइ ॥३॥२९॥६२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सालाहनि = सराहती हैं। हउ = मैं। सद = सदा। जाउ = जाऊँ, मैं जाता हूँ। अरपी = मैं भेंट करता हूं। देई = मैं देता हूं। लागा = मैं लगता हूं। पाइ = पांय, चरणों में। चुकाइ = चुकता करके, दूर करके। सचि = सदा स्थिर प्रभु में।3।
अर्थ: जो जीव स्त्रीयां अपने प्रभु पति की महिमा करती हैं, मैं उन से सदा कुर्बान जाती हूँ।
मैं उनके आगे अपना तन भेटा करती हूँ। मैं (उनके चरणों में) अपना शीश रखती हूं। मैं उनके चरण लगती हूं, क्योंकि उन्होंने माया का प्यार (अपने अंदर से) दूर करके सिर्फ प्रभु पति से जान-पहिचान बना ली है।
हे नानक! गुरु के सन्मुख हो के सदा स्थिर प्रभु में लीन हो के उसके नाम के साथ जान पहिचान बन सकती है।3।29।62।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ हरि जी सचा सचु तू सभु किछु तेरै चीरै ॥ लख चउरासीह तरसदे फिरे बिनु गुर भेटे पीरै ॥ हरि जीउ बखसे बखसि लए सूख सदा सरीरै ॥ गुर परसादी सेव करी सचु गहिर ग्मभीरै ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ हरि जी सचा सचु तू सभु किछु तेरै चीरै ॥ लख चउरासीह तरसदे फिरे बिनु गुर भेटे पीरै ॥ हरि जीउ बखसे बखसि लए सूख सदा सरीरै ॥ गुर परसादी सेव करी सचु गहिर ग्मभीरै ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचा = सदा स्थिर रहने वाला। चीरै = किनारे पे, बस में। बिनु भेटे = मिलने के बिना। सरीरै = शरीर में। करी = मैं करूँ। गुर परसादी = गुरु की कृपा से।1।
अर्थ: हे प्रभु जी! तू (ही) सदा स्थिर रहने वाला है। और सारा जगत तेरे वस में है। (पर तू मिलता है गुरु के द्वारा) गुरु पीर को मिले बिना (अर्थात, गुरु की शरण आए बिना) चौरासी लाख योनियों के जीव (तेरे दर्शन को) तरसते फिरते हैं।
जिस जीव पे परमात्मा खुद मेहर करता है बख्शिश करता है, उसके हृदय में सदा आत्मिक आनन्द बना रहता है।
(मेरे अंदर भी चाह है कि) मैं गुरु की मेहर से सदा स्थिर व गहरे जिगरे वाले परमात्मा का स्मरण करता रहूँ।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे नामि रते सुखु होइ ॥ गुरमती नामु सलाहीऐ दूजा अवरु न कोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे नामि रते सुखु होइ ॥ गुरमती नामु सलाहीऐ दूजा अवरु न कोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नामि = नाम में। रते = रंगे जाएं। अवरु = और (तरीका)।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! अगर परमात्मा के नाम रंग में रंगे जाएं, तो आत्मिक आनन्द मिलता है। (पर,) गुरु की मति पर चल के ही परमात्मा का नाम सलाहना चाहिए। (नाम स्मरण का) और कोई तरीका नहीं है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
धरम राइ नो हुकमु है बहि सचा धरमु बीचारि ॥ दूजै भाइ दुसटु आतमा ओहु तेरी सरकार ॥ अधिआतमी हरि गुण तासु मनि जपहि एकु मुरारि ॥ तिन की सेवा धरम राइ करै धंनु सवारणहारु ॥२॥
मूलम्
धरम राइ नो हुकमु है बहि सचा धरमु बीचारि ॥ दूजै भाइ दुसटु आतमा ओहु तेरी सरकार ॥ अधिआतमी हरि गुण तासु मनि जपहि एकु मुरारि ॥ तिन की सेवा धरम राइ करै धंनु सवारणहारु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नो = को। बहि = बैठ के। दूजे भाइ = माया के प्यार में। दुसटु = बुरा, विकारी। ओह = वह बंदा। सरकार = रईअत, शासन। अधिआतमी = आत्मिक जीवन का मालिक। गुणतासु = गुणों का तोशा, गुणों का खजाना, परमात्मा। मनि = मन में। मुरारि = मुर+अरि, परमात्मा। धंनु = सराहनीय।2।
अर्थ: धरमराज को (भी परमात्मा का) हुक्म है (हे धर्मराज! तू!) बैठ के (यह) अटल धर्म (न्याय) याद रख कि वह विकारी मनुष्य तेरी सरकार है, रईअत है, जो माया के प्यार में (फंसा) रहता है।
आत्मिक जीवन वाले बंदों के मन में गुणों का खजाना परमात्मा खुद बसता है, वह परमात्मा को ही स्मरण करते रहते है। धर्मराज (भी) उन लोगों की सेवा करता है। धन्य है वह परमात्मा जो (अपने सेवकों का जीवन) इतना सुहाना बना देता है (कि खुद धर्मराज भी उनका आदर करते हैं)।2।
[[0039]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन के बिकार मनहि तजै मनि चूकै मोहु अभिमानु ॥ आतम रामु पछाणिआ सहजे नामि समानु ॥ बिनु सतिगुर मुकति न पाईऐ मनमुखि फिरै दिवानु ॥ सबदु न चीनै कथनी बदनी करे बिखिआ माहि समानु ॥३॥
मूलम्
मन के बिकार मनहि तजै मनि चूकै मोहु अभिमानु ॥ आतम रामु पछाणिआ सहजे नामि समानु ॥ बिनु सतिगुर मुकति न पाईऐ मनमुखि फिरै दिवानु ॥ सबदु न चीनै कथनी बदनी करे बिखिआ माहि समानु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनहि = मन में से। तजै = छोड़ दे। मनि = मन मे। आतमु रामु = सर्व व्यापक प्रभु। सहजे = आत्मिक अडोलता द्वारा। समानु = लीनता, विलीन हो जाना। मुकति = विकारों से खलासी। दिवानु = दिवाना, पागल। चीनै = पहचानता। कथनी बदनी = (कोरी) बातें। बिखिआ = माया।3।
अर्थ: जो मनुष्य अपने मन में से मन के विकार छोड़ देता है, जिसके मन में से माया का अहंकार दूर हो जाता है, वह सर्व व्यापक परमात्मा के साथ जान पहिचान बना लेता है। वह आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा के नाम में लीनता हासिल कर लेता है।
(पर,) गुरु की शरण के बिना (विकारों से) छुटकारा नहीं मिल सकता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (विकारों के पीछे) पागल हुआ फिरता है, वह गुरु के शब्द (की कद्र) को नहीं समझता। वह (जबानी-जबानी धार्मिक) बातें चाहे जितनी करता फिरे, पर माया के मोह में ही गरक रहता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभु किछु आपे आपि है दूजा अवरु न कोइ ॥ जिउ बोलाए तिउ बोलीऐ जा आपि बुलाए सोइ ॥ गुरमुखि बाणी ब्रहमु है सबदि मिलावा होइ ॥ नानक नामु समालि तू जितु सेविऐ सुखु होइ ॥४॥३०॥६३॥
मूलम्
सभु किछु आपे आपि है दूजा अवरु न कोइ ॥ जिउ बोलाए तिउ बोलीऐ जा आपि बुलाए सोइ ॥ गुरमुखि बाणी ब्रहमु है सबदि मिलावा होइ ॥ नानक नामु समालि तू जितु सेविऐ सुखु होइ ॥४॥३०॥६३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जा = जब। बुलाए = बोलने की प्रेरणा करता है, (जब वह) बुलवाए। सोइ = वह (प्रभु) ही। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख हो के। बाणी = महिमा से। ब्रहमु = परमात्मा। सबदि = (गुरु के) शब्द द्वारा। नानक = हे नानक! जितु = जिस के द्वारा। जितु सेवीऐ = जिसकी सेवा करने से, जिसका स्मरण करने से। सुखु = आत्मिक आनंद।4।
अर्थ: (जीवों के भी क्या बस?) परमात्मा खुद ही सभ कुछ कराने वाला है, और कोई जीव दम नहीं मार सकता। (अपनी महिमा वह खुद ही करवाता है) जैसे परमात्मा बोलने की प्रेरणा करे वैसे ही जीव बोल सकता है। (जीव तब ही महिमा कर सकता है) जबवह परमात्मा खुद प्रेरता है।
गुरु की शरण पड़ कर महिमा की वाणी में जुड़ने से प्रभु मिलता है, गुरु के शब्द के द्वारा (ही प्रभु से) मिलाप होता है। हे नानक! (गुरु की शरण पड़ कर) परमात्मा के नाम को हृदय में संभाल, इस नाम के स्मरण से ही आत्मिक आनन्द प्राप्त होता है।4।30।63।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ जगि हउमै मैलु दुखु पाइआ मलु लागी दूजै भाइ ॥ मलु हउमै धोती किवै न उतरै जे सउ तीरथ नाइ ॥ बहु बिधि करम कमावदे दूणी मलु लागी आइ ॥ पड़िऐ मैलु न उतरै पूछहु गिआनीआ जाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ जगि हउमै मैलु दुखु पाइआ मलु लागी दूजै भाइ ॥ मलु हउमै धोती किवै न उतरै जे सउ तीरथ नाइ ॥ बहु बिधि करम कमावदे दूणी मलु लागी आइ ॥ पड़िऐ मैलु न उतरै पूछहु गिआनीआ जाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जगि = जगत ने, माया मोहे जीव ने। दूजे भाइ = माया के प्यार में। भाउ = प्यार। किवै = किसी तरीके के साथ भी। तीरथ = तीर्तों पर। नाइ = नाए, स्नान करे। बहु बिधि = कई किसमों के। करम = धार्मिक कर्म। आइ = आ कर। पढ़िऐ = (विद्या) पढ़ने से। जाइ = जा के। गिआनीआ = ज्ञानियों को, ज्ञान वालों को।1।
अर्थ: जगत में अहम् की मैल (के कारण सदा) दुख (ही) सहना पड़ा है (क्योंकि) माया में प्यार के कारन जगत को (विकारों की) मैल चिपकी रहती है।
अगर मनुष्य सौ तीर्तों पर भी स्नान करे तो भी (ऐसे) किसी तरीके से यह अहंकार की मैल धोने से (मन से) दूर नहीं होती। लोग कई किस्मों के (नियत) धार्मिक कर्म करते हैं। (इस तरह बल्कि पहले से) दुगनी (अहं की) मैल आ लगती है। (विद्या आदि) पढ़ने से भी यह मैल दूर नहीं होती, बेशक, पढ़े-लिखे लोगों को जा के पूछ लो (अर्थात, पढ़े हुए लोगों को विद्या का गुमान ही बना रहता है)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे गुर सरणि आवै ता निरमलु होइ ॥ मनमुख हरि हरि करि थके मैलु न सकी धोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे गुर सरणि आवै ता निरमलु होइ ॥ मनमुख हरि हरि करि थके मैलु न सकी धोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मन = हे मन! होइ = होता है। मनमुख = अपने मन की ओर मुंह रखने वाला।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! (जब मनुष्य) गुरु की शरण में आता है तब (ही) पवित्र होता है। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग राम राम कह कह के थक जाते हैं (फिर भी अहम् की) मैल (उनसे) धोई नहीं जा सकती।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनि मैलै भगति न होवई नामु न पाइआ जाइ ॥ मनमुख मैले मैले मुए जासनि पति गवाइ ॥ गुर परसादी मनि वसै मलु हउमै जाइ समाइ ॥ जिउ अंधेरै दीपकु बालीऐ तिउ गुर गिआनि अगिआनु तजाइ ॥२॥
मूलम्
मनि मैलै भगति न होवई नामु न पाइआ जाइ ॥ मनमुख मैले मैले मुए जासनि पति गवाइ ॥ गुर परसादी मनि वसै मलु हउमै जाइ समाइ ॥ जिउ अंधेरै दीपकु बालीऐ तिउ गुर गिआनि अगिआनु तजाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनि मैलै = मैलै मन से। होवई = हो। मुए = आत्मिक मौत मर जाते हैं। जासनि = जाएंगे। पति = इज्जत। मनि = मन में। जाइ = दूर हो जाती है। समाइ = लीन हो जाती है। दीपकु = दीया। गिआनि = ज्ञान से। तजाइ = दूर किया जाता है।2।
अर्थ: अहम् की मैल से भरे हुए मन से परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती, (इस तरह) परमात्मा का नाम हासिल नहीं होता (हृदय में टिक नहीं सकता)। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग सदा अहंकार के कारण मलीन मन रहते हैं, और आत्मिक मौत मरे रहते हैं, (वह दुनिया से) इज्जत गवा के ही जाएंगे।
गुरु की कृपा से जिस मनुष्य के मन में परमात्मा का नाम बस जाता है, उस का अहंकार दूर हो जाता है, वह प्रभु चरणों में लीन रहता है। जैसे अगर अंधेरे में दिया जला दें (तो अंधेरा दूर हो जाता है) ऐसे ही गुरु की बख्शी हुई समझ की इनायत से (अहम्-रूप) बेसमझी (का अंधकार) दूर हो जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हम कीआ हम करहगे हम मूरख गावार ॥ करणै वाला विसरिआ दूजै भाइ पिआरु ॥ माइआ जेवडु दुखु नही सभि भवि थके संसारु ॥ गुरमती सुखु पाईऐ सचु नामु उर धारि ॥३॥
मूलम्
हम कीआ हम करहगे हम मूरख गावार ॥ करणै वाला विसरिआ दूजै भाइ पिआरु ॥ माइआ जेवडु दुखु नही सभि भवि थके संसारु ॥ गुरमती सुखु पाईऐ सचु नामु उर धारि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गवार = उजड्ड। सभि = सारे जीव। भवि = भटक भटक के। उर = हृदय।3।
अर्थ: (यह काम) ‘हमने’ किया है, ‘हम’ ही कर सकते हैं। इस तरह “मैं मैं’ ‘हम हम’ कहने वाले लोग मूर्ख उजड्ड होते हैं उन्हें पैदा करने वाला परमात्मा भूला रहता है। वे सदा माया से ही प्यार डाल के रखते हैं। (दुनिया में) माया के मोह जितना (और कोई) दुख नहीं है। माया के मोह में फंस के सारे जीव (माया) की खातर भटक भटक के खपते रहते हैं।
गुरु की मति पर चलने से सदा स्थ्रि प्रभु का नाम हृदय में टिका के ही आत्मिक आनन्द मिलता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिस नो मेले सो मिलै हउ तिसु बलिहारै जाउ ॥ ए मन भगती रतिआ सचु बाणी निज थाउ ॥ मनि रते जिहवा रती हरि गुण सचे गाउ ॥ नानक नामु न वीसरै सचे माहि समाउ ॥४॥३१॥६४॥
मूलम्
जिस नो मेले सो मिलै हउ तिसु बलिहारै जाउ ॥ ए मन भगती रतिआ सचु बाणी निज थाउ ॥ मनि रते जिहवा रती हरि गुण सचे गाउ ॥ नानक नामु न वीसरै सचे माहि समाउ ॥४॥३१॥६४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जाउ = मैं जाता हूं। ए = हे! सचु = सदा स्थिर प्रभु का नाम। निज = अपना, (जहां से कोई धक्का नहीं दे सकता)। मनि = मन में। सचे = सदा स्थिर प्रभु के। समाउ = समाई।4।
अर्थ: (पर, जीवों के भी क्या बस?) जिस भाग्यशाली मनुष्य को प्रभु (अपने चरणों में) जोड़ता है, वही प्रभु को मिलता है। मैं ऐसे शख्स से कुर्बान जाता हूं।
हे मन! (परमात्मा की कृपा) जो मनुष्य प्रभु की भक्ति (के रंग) में रंगे जाते हैं, प्रभु का सदा स्थिर नाम ही जिस की वाणी बन जाती है। उनको ‘अपना घर’ प्राप्त हो जाता है (अर्थात, वह सदा उस आत्मिक ठिकाने में टिके रहते हैं, जहां माया का मोह उन्हें धक्का नहीं दे सकता)। वह अपने मन में (परमात्मा के प्रेम रंग में) रंगे रहते हैं। उनकी जीभ नाम-रस में मस्त रहती है। वह सदा स्थिर प्रभु के गुण गाते रहते हैं। उनको, हे नानक! परमात्मा का नाम कभी नहीं भूलता, वह सदा स्थिर प्रभु में लीन रहते हैं।4।33।31।64।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: अंक33 गुरु नानक देव जी के सारे शबदों का जोड़ बताता है। अंक 31 गुरु अमरदास जी के सारे शबदों का। इस तरह कुल जोड़ 64 बना।
नोट: यहां गुरु अमरदास जी के शब्द समाप्त हो गए हैं।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ४ घरु १ ॥ मै मनि तनि बिरहु अति अगला किउ प्रीतमु मिलै घरि आइ ॥ जा देखा प्रभु आपणा प्रभि देखिऐ दुखु जाइ ॥ जाइ पुछा तिन सजणा प्रभु कितु बिधि मिलै मिलाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ४ घरु १ ॥ मै मनि तनि बिरहु अति अगला किउ प्रीतमु मिलै घरि आइ ॥ जा देखा प्रभु आपणा प्रभि देखिऐ दुखु जाइ ॥ जाइ पुछा तिन सजणा प्रभु कितु बिधि मिलै मिलाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मै मनि = मुझे (अपने) मन में। बिरहु = बिछोड़े का दर्द। अगला = बहुत। किउ = कैसे? घरि = हृदय घर में। आइ = आ के। जा = जब। देखा = देखूं। प्रभि देखिऐ = प्रभु के दर्शनों के द्वारा। पुछा = पूछूं। कितु बिधि = किस तरीके से? कितु = किस के द्वारा।1।
अर्थ: मेरे मन में, शरीर में (प्रीतम प्रभु के) बिछोड़े का भारी दर्द है। (मेरा मन तड़प रहा है कि) कैसे प्रीतम प्रभु मेरे हृदय घर में मुझे आ मिले। जब मैं प्यारे प्रभु के दर्शन करता हूँ प्रभु के दर्शन करने से मेरा (विछोड़े का) दुख दूर हो जाता है। (जिस सत्संगी सज्जनों ने प्रीतम प्रभु का दर्शन किया है) मैं उन सज्जनों को जा के पूछता हूँ कि प्रभु किस तरीके से मिलाए मिलता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे सतिगुरा मै तुझ बिनु अवरु न कोइ ॥ हम मूरख मुगध सरणागती करि किरपा मेले हरि सोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे सतिगुरा मै तुझ बिनु अवरु न कोइ ॥ हम मूरख मुगध सरणागती करि किरपा मेले हरि सोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अवरु = कोई और (सहारा)। मुगध = मूर्ख, अन्जान। सरणागती = शरण आए हुए। करि = कर के।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे सतिगुरु! तेरे बगैर मेरा और कोई (सहारा) नहीं है। हम जीव मूर्ख हैं, अन्जान है। (पर) तेरी शरण आए हैं (जो भाग्यशाली गुरु की शरण में आता है उस को) वह परमात्मा खुद मेहर करके (अपने चरणों में) मिला लेता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतिगुरु दाता हरि नाम का प्रभु आपि मिलावै सोइ ॥ सतिगुरि हरि प्रभु बुझिआ गुर जेवडु अवरु न कोइ ॥ हउ गुर सरणाई ढहि पवा करि दइआ मेले प्रभु सोइ ॥२॥
मूलम्
सतिगुरु दाता हरि नाम का प्रभु आपि मिलावै सोइ ॥ सतिगुरि हरि प्रभु बुझिआ गुर जेवडु अवरु न कोइ ॥ हउ गुर सरणाई ढहि पवा करि दइआ मेले प्रभु सोइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सोइ = वह ही। सतिगुरि = सतगुर ने। जेवडु = जितना। पवा = पड़ूं।2।
अर्थ: गुरु हरि नाम की दात देने वाला है (जिस को गुरु से यह दात मिलती है उस को) वह प्रभु अपने आप साथ मिला लेता है। गुरु ने हरि प्रभु के साथ गहरी सांझ डाली हुई है (इस वास्ते) गुरु जितनी (ऊँची आत्मिक अवस्था वाला) और कोई नहीं। (मेरी यही तमन्ना है कि) मैं गुरु की शरण, अहं भाव मिटा के आ पड़ूं। (गुरु की शरण पड़ने से ही) वह प्रभु मेहर करके अपने साथ मिला लेता है।2।
[[0040]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनहठि किनै न पाइआ करि उपाव थके सभु कोइ ॥ सहस सिआणप करि रहे मनि कोरै रंगु न होइ ॥ कूड़ि कपटि किनै न पाइओ जो बीजै खावै सोइ ॥३॥
मूलम्
मनहठि किनै न पाइआ करि उपाव थके सभु कोइ ॥ सहस सिआणप करि रहे मनि कोरै रंगु न होइ ॥ कूड़ि कपटि किनै न पाइओ जो बीजै खावै सोइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मन हठि = मन के हठ से। उपाव = कई उपाय। सभु कोइ = हरेक जीव। मनि कोरे = कोरे मन से। कूड़ि = माया के मोह में (फंसे रह के)। कपटि = ठगी से।3।
अर्थ: मन के हठ से (किए तप आदि के साधनों से) कभी किसी ने परमात्मा को नहीं ढूढा। (ऐसे) उपाय करके सभ थक ही जाते हैं। (तप आदि वाली) हजारों होशियारियां (जो लोग) करते हैं (उनका मन प्रभु प्रेम की ओर से कोरा ही रहता है, तथा) अगर मन (प्रभु प्रेम से) कोरा ही रहे तो नाम रंग नहीं चढ़ता। माया के मोह में फंसे रह के (बाहर से हठ कर्मों की) ठगी से कभी किसी ने परमात्मा को नहीं पाया। (यह पक्का नियम है कि) जो कुछ कोई बीजता है वही कुछ वो खाता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभना तेरी आस प्रभु सभ जीअ तेरे तूं रासि ॥ प्रभ तुधहु खाली को नही दरि गुरमुखा नो साबासि ॥ बिखु भउजल डुबदे कढि लै जन नानक की अरदासि ॥४॥१॥६५॥
मूलम्
सभना तेरी आस प्रभु सभ जीअ तेरे तूं रासि ॥ प्रभ तुधहु खाली को नही दरि गुरमुखा नो साबासि ॥ बिखु भउजल डुबदे कढि लै जन नानक की अरदासि ॥४॥१॥६५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: प्रभ = हे प्रभु! रासि = राशि, पूंजी, संपत्ति। दरि = (तेरे) दर पे। साबासि = आदर। बिखु = (विकारों का) विष। भउजल = संसार समुंदर।4।
अर्थ: हे प्रभु! (संसार समुंदर से बचने के वास्ते) सभ जीवों को तेरी (सहायता की) आस है, सभ जीव तेरे ही (पैदा किए हुए) हैं, तू ही (सभ जीवों की आत्मिक) राशि पूंजी है। हे प्रभु! तेरे दर से कोई खाली नहीं मुड़ता। गुरु शरण में पड़ने वाले लोगों को तेरे दर पे आदर मान मिलता हैं। हे प्रभु! तेरे दास नानक की तेरे आगे अरजोई है कि तू संसार समुंदर के (विकारों के) जहर में डूबते हुए जीवों को निकाल ले।4।1।65।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ४ ॥ नामु मिलै मनु त्रिपतीऐ बिनु नामै ध्रिगु जीवासु ॥ कोई गुरमुखि सजणु जे मिलै मै दसे प्रभु गुणतासु ॥ हउ तिसु विटहु चउ खंनीऐ मै नाम करे परगासु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ४ ॥ नामु मिलै मनु त्रिपतीऐ बिनु नामै ध्रिगु जीवासु ॥ कोई गुरमुखि सजणु जे मिलै मै दसे प्रभु गुणतासु ॥ हउ तिसु विटहु चउ खंनीऐ मै नाम करे परगासु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: त्रिपतीऐ = तृप्त हो जाता है, माया की तृष्णा से तृप्त हो जाता है। ध्रिगु = धिक्कारयोग्य। जीवसु = जीवन+आशय, जीवन मनारथ। मै = मुझे। गुणतास = गुणों का खजाना। विटहु = में से। चउ खनीऐ = चार टुकड़े होता हूं। नाम परगासु = नाम का प्रकाश।1।
अर्थ: (जिस मनुष्य को परमात्मा का) नाम मिल जाता है (उस का) मन (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाता है। नाम विहीन जीना धिक्कारयोग्य है (नाम से खाली रह कर जिंदगी को गुजारने से तिरस्कार ही प्राप्त होता है)। यदि गुरु के सन्मुख रहने वाला कोई भला मनुष्य मुझे मिल जाए, और मुझे गुणों के खजाने परमात्मा के बारे में बता दे, मैं उस पर से कुर्बान होने को तैयार हूँ।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे प्रीतमा हउ जीवा नामु धिआइ ॥ बिनु नावै जीवणु ना थीऐ मेरे सतिगुर नामु द्रिड़ाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे प्रीतमा हउ जीवा नामु धिआइ ॥ बिनु नावै जीवणु ना थीऐ मेरे सतिगुर नामु द्रिड़ाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हउ = मैं। जीवा = जीऊँ, आत्मिक जीवन हासिल कर लेता हूं। थीऐ = हो सकता है। जीवणु = आत्मिक जीवन। सतिगुर = हे सतिगुरु! द्रिड़ाइ = हृदय में दृढ़ करके, पक्का करके।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे प्रीतम प्रभु! तेरा नाम स्मरण करके ही मैं आत्मिक जीवन जीअ सकता हूँ। हे मेरे सतिगुरु! (मेरे हृदय में परमात्मा का) नाम पक्का कर दे (क्योंकि) प्रभु नाम के बिना आत्मिक जीवन नहीं बन सकता।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नामु अमोलकु रतनु है पूरे सतिगुर पासि ॥ सतिगुर सेवै लगिआ कढि रतनु देवै परगासि ॥ धंनु वडभागी वड भागीआ जो आइ मिले गुर पासि ॥२॥
मूलम्
नामु अमोलकु रतनु है पूरे सतिगुर पासि ॥ सतिगुर सेवै लगिआ कढि रतनु देवै परगासि ॥ धंनु वडभागी वड भागीआ जो आइ मिले गुर पासि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अमोलकु = अमुल्य वस्तु, जितनी कीमती और कोई चीज ना हो। कढि = निकाल के। परगासि = प्रकाश करके, आत्मिक रौशनी करके। धंनु = सराहनीय।2।
अर्थ: परमात्मा का नाम एक ऐसा रतन है, जिस जितनी कीमती शै और कोई नहीं है। यह नाम पूरे गुरु के पास ही है। अगर गुरु की बताई सेवा में लग जाएं, तो वह हृदय में ज्ञान का प्रकाश करके (अपने पास से नाम) रतन निकाल के देता है। (इस वास्ते) वह मनुष्य भाग्यशाली हैं, सराहनीय हैं, जो आ कर गुरु की शरण में पड़ते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिना सतिगुरु पुरखु न भेटिओ से भागहीण वसि काल ॥ ओइ फिरि फिरि जोनि भवाईअहि विचि विसटा करि विकराल ॥ ओना पासि दुआसि न भिटीऐ जिन अंतरि क्रोधु चंडाल ॥३॥
मूलम्
जिना सतिगुरु पुरखु न भेटिओ से भागहीण वसि काल ॥ ओइ फिरि फिरि जोनि भवाईअहि विचि विसटा करि विकराल ॥ ओना पासि दुआसि न भिटीऐ जिन अंतरि क्रोधु चंडाल ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिना = जिनको। भेटिओ = मिला। वसि काल = काल के वस में, आत्मिक मौत के काबू में। ओए = वह लोग। भवाईअहि = भटकते फिरते हैं। विसटा = विकारों का गंद। विकराल = डरावने (जीवन वाले)। पासि दुआसि = आस पास। न भिटीऐ = ना छूना, पास ना फटकना।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘ओए’, ‘ओह’ का बहुवचन है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (पर,) जिस लोगों को अकाल-पुरख का रूप सतिगुरु कभी नहीं मिला, वह दुर्भाग्यशाली हैं वह आत्मिक मौत के बस में रहते हैं। वह विकारों के गंद में पड़े रहने के कारण भयानक आत्मिक जीवन वाले बना के बार बार जन्म व मरन के चक्क्र में डाले जाते हैं। (हे भाई! नाम से वंचित) जिस लोगों के अंदर चण्डाल क्रोध बसता रहता है उनके कभी भी नजदीक नहीं फटकना चाहिए।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतिगुरु पुरखु अम्रित सरु वडभागी नावहि आइ ॥ उन जनम जनम की मैलु उतरै निरमल नामु द्रिड़ाइ ॥ जन नानक उतम पदु पाइआ सतिगुर की लिव लाइ ॥४॥२॥६६॥
मूलम्
सतिगुरु पुरखु अम्रित सरु वडभागी नावहि आइ ॥ उन जनम जनम की मैलु उतरै निरमल नामु द्रिड़ाइ ॥ जन नानक उतम पदु पाइआ सतिगुर की लिव लाइ ॥४॥२॥६६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंम्रितसरु = नाम अमृत का सरोवर। आइ = आ के। द्रिड़ाइ = हृदय में पक्का करके। पदु = आत्मिक जीवन का दर्जा। लिव लाइ = तवज्जो/ध्यान जोड़ के, ध्यान धर के।4।
अर्थ: (पर यह विकारों का गंद, यह चण्डाल क्रोध आदि का प्रभाव तीर्तों से स्नान आदि से दूर नहीं हो सकता) अकाल-पुरख का रूप सत्गुरू ही अंमृत का सरोवर है। जो लोग इन तीर्तों पे आ के स्नान करते हैं वह बड़े भाग्यशाली हैं। (गुरु की शरण पड़ कर) पवित्र प्रभु नाम हृदय में पक्का करने के कारण उनकी (भाग्यशालियों की) जन्मों जन्मांतरों की (विकारों की) मैल उतर जाती है। हे दास नानक! (कह) सतिगुरु की शिक्षा में तवज्जो जोड़ के वह मनुष्य सब से श्रेष्ठ आत्मिक जीवन का दर्जा हासिल कर लेते हैं।4।2।66।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ४ ॥ गुण गावा गुण विथरा गुण बोली मेरी माइ ॥ गुरमुखि सजणु गुणकारीआ मिलि सजण हरि गुण गाइ ॥ हीरै हीरु मिलि बेधिआ रंगि चलूलै नाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ४ ॥ गुण गावा गुण विथरा गुण बोली मेरी माइ ॥ गुरमुखि सजणु गुणकारीआ मिलि सजण हरि गुण गाइ ॥ हीरै हीरु मिलि बेधिआ रंगि चलूलै नाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गावा = मैं गाऊँ। विथरा = मैं विस्तार करूँ। बोली = मैं बोलूं। माइ = हे माँ। गुणकारीआ = गुण पैदा करने वाला। मिलि सजण = (उस) सज्जन को मिल के। हीरै = हीरे (गुरु) को। हीरु = (मन) हीरा। बेधिआ = विच्छेदित। रंगि चलूलै = गूढ़े रंग में। नाइ = नाम से।1।
अर्थ: हे मेरी माँ! (मेरा मन तरसता है कि) मैं (प्रभु के) गुण गाता रहूँ। गुणों का विस्तार करता रहूँ और प्रभु के गुण उचारता रहूँ। गुरु के सन्मुख रहने वाला कोई संत जन ही (प्रभु के गुण गाने की यह) कीर्ति पैदा कर सकता है। किसी गुरमुख को ही मिल के प्रभु के गुण कोई गा सकता है। (जो मनुष्य प्रभु के गुण गाता है, उसका) मन-हीरा, गुरु हीरे को मिल के (उस में) मिल जाता है, प्रभु के नाम में (लीन हो के) वह प्रभु के गाढ़े प्यार रंग में (रंगा) जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे गोविंदा गुण गावा त्रिपति मनि होइ ॥ अंतरि पिआस हरि नाम की गुरु तुसि मिलावै सोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे गोविंदा गुण गावा त्रिपति मनि होइ ॥ अंतरि पिआस हरि नाम की गुरु तुसि मिलावै सोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: त्रिपति = तृप्ति, संतोख। मनि = मन में। तुसि = प्रसन्न हो के।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे गोबिंद! (कृपा करो कि) मैं तेरे गुण गाता रहूँ। (तेरे गुण गाते ही) मन में (माया की) तृष्णा से खलासी होती है। हे गोबिंद! मेरे अंदर तेरे नाम की प्यास है (मुझे गुरु मिला) गुरु प्रसन्न हो के उस नाम का मिलाप कराता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनु रंगहु वडभागीहो गुरु तुठा करे पसाउ ॥ गुरु नामु द्रिड़ाए रंग सिउ हउ सतिगुर कै बलि जाउ ॥ बिनु सतिगुर हरि नामु न लभई लख कोटी करम कमाउ ॥२॥
मूलम्
मनु रंगहु वडभागीहो गुरु तुठा करे पसाउ ॥ गुरु नामु द्रिड़ाए रंग सिउ हउ सतिगुर कै बलि जाउ ॥ बिनु सतिगुर हरि नामु न लभई लख कोटी करम कमाउ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तुठा = प्रसन्न हुआ हुआ। पसाउ = प्रसाद, कृपा। रंग सिउ = प्यार से। कोटी = करोड़ों।2।
अर्थ: हे बड़े भाग्य वालो! (गुरु की शरण पड़ कर अपना) मन (प्रभु के नाम रंग में) रंग लो। गुरु प्रसन्न हो के (नाम की यह) बख्शिश करता है। गुरु प्यार से परमात्मा का नाम (शरण आए सिख के हृदय में) पक्का कर देता है। (इस वजह से) मैं गुरु से सदके जाता हूँ। अगर मैं लाखों करोड़ों (और-और धार्मिक) कर्म करूँ तो भी सतगुरू की शरण के बिना परमात्मा का नाम प्राप्त नहीं होता।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बिनु भागा सतिगुरु ना मिलै घरि बैठिआ निकटि नित पासि ॥ अंतरि अगिआन दुखु भरमु है विचि पड़दा दूरि पईआसि ॥ बिनु सतिगुर भेटे कंचनु ना थीऐ मनमुखु लोहु बूडा बेड़ी पासि ॥३॥
मूलम्
बिनु भागा सतिगुरु ना मिलै घरि बैठिआ निकटि नित पासि ॥ अंतरि अगिआन दुखु भरमु है विचि पड़दा दूरि पईआसि ॥ बिनु सतिगुर भेटे कंचनु ना थीऐ मनमुखु लोहु बूडा बेड़ी पासि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: घरि = घर में। निकटि = नजदीक। नित = सदा। भरमु = भटकना। पड़दा = दूरी, पर्दा। कंचन = सोना। थीऐ = होता है। मनमुखु = अपने मन के पीछे चलने वाला। बूडा = डूब गया।3।
अर्थ: अच्छी किस्मत के बगैर गुरु नहीं मिलता (और गुरु के बिना परमात्मा का मिलाप नहीं होता, चाहे) हमारे हृदय में बैठा हर वक्त हमारे नजदीक है, हमारे पास है। जिस जीव के अंदर अज्ञानता (के अंधेरे) का दुख टिका रहे, जिसको माया भटकाती रहे, उसके अंदर परमात्मा से माया के मोह का व भटकने का पर्दा बना रहता है। उसकी जीवात्मा अंदर बसते प्रभु से दूर पड़ी रहती है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (मानो) लोहा है जो गुरु पारस को मिले बगैर सोना नहीं बन सकता। गुरु-बेड़ी उस मनमुख लोहे के पास ही है, पर वह (विकारों की नदी में) डूबता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतिगुरु बोहिथु हरि नाव है कितु बिधि चड़िआ जाइ ॥ सतिगुर कै भाणै जो चलै विचि बोहिथ बैठा आइ ॥ धंनु धंनु वडभागी नानका जिना सतिगुरु लए मिलाइ ॥४॥३॥६७॥
मूलम्
सतिगुरु बोहिथु हरि नाव है कितु बिधि चड़िआ जाइ ॥ सतिगुर कै भाणै जो चलै विचि बोहिथ बैठा आइ ॥ धंनु धंनु वडभागी नानका जिना सतिगुरु लए मिलाइ ॥४॥३॥६७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बोहिथ = जहाज। नाव = नाम में। कितु बिधि = किस तरीके से? भाणे = रजा में।4।
अर्थ: सत्गुरू, परमात्मा के नाम का जहाज है (पर उस जहाज में चढ़ने का भी तरीका होना चाहिए, फिर) किस तरह (उस जहाज में) चढ़ा जाए? जो मनुष्य सतिगुरु के हुक्म में चलता है वह उस जहाज में सवार हो गया समझो।
हे नानक! वे मनुष्य बड़े भाग्यवान हैं, धन्य हैं, धन्य हैं, जिस को सतिगुरु (प्रभु चरणों में) मिला लेता है।4।3।67।
[[0041]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ४ ॥ हउ पंथु दसाई नित खड़ी कोई प्रभु दसे तिनि जाउ ॥ जिनी मेरा पिआरा राविआ तिन पीछै लागि फिराउ ॥ करि मिंनति करि जोदड़ी मै प्रभु मिलणै का चाउ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ४ ॥ हउ पंथु दसाई नित खड़ी कोई प्रभु दसे तिनि जाउ ॥ जिनी मेरा पिआरा राविआ तिन पीछै लागि फिराउ ॥ करि मिंनति करि जोदड़ी मै प्रभु मिलणै का चाउ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हउ = मैं। पंथ = रास्ता। दसाई = पूछती हूँ। तिनी = उसकी सहायता से। जाउ = जाऊँ, मैं जाऊँ। राविआ = रमा हुआ। लागि = लग के। फिराउ = घूमूं। मिंनत = विनती, अर्ज। जोदड़ी = सेवा मुशक्कत।1।
अर्थ: मै सदा (चाह में) खड़ी हुई (परमात्मा के देश का) राह पूछती हूँ (मैं सदा लोचती रहती हूँ कि) कोई मुझे प्रभु के बारे में बताए, और उस के द्वारा (उसकी सहायता से प्रभु के चरणों में) पहुँचू। जिस (सत्संगी सहेलियों) ने प्यारे प्रभु का मिलाप हासिल किया है मैं उनके आगे तरला विनती करूँ, उनकी सेवा करके उनके पीछे लगी फिरूँ। क्योंकि, मेरे अंदर प्रभु मिलन की चाह है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे भाई जना कोई मो कउ हरि प्रभु मेलि मिलाइ ॥ हउ सतिगुर विटहु वारिआ जिनि हरि प्रभु दीआ दिखाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे भाई जना कोई मो कउ हरि प्रभु मेलि मिलाइ ॥ हउ सतिगुर विटहु वारिआ जिनि हरि प्रभु दीआ दिखाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मो कउ = मुझे। विटहु = से। वारिआ = सदके। जिनि = जिस ने।1। रहाउ।?
अर्थ: हे मेरे भाईओ! कोई मुझे परमात्मा से मिला दे। (पर गुरु के बिना और कौन मिला सकता है?) मैं सतिगुरु से सदके जाता हूँ, जिसने परमात्मा दिखा दिया (जो दिखा देता है)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
होइ निमाणी ढहि पवा पूरे सतिगुर पासि ॥ निमाणिआ गुरु माणु है गुरु सतिगुरु करे साबासि ॥ हउ गुरु सालाहि न रजऊ मै मेले हरि प्रभु पासि ॥२॥
मूलम्
होइ निमाणी ढहि पवा पूरे सतिगुर पासि ॥ निमाणिआ गुरु माणु है गुरु सतिगुरु करे साबासि ॥ हउ गुरु सालाहि न रजऊ मै मेले हरि प्रभु पासि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साबासि = शाबासी, आदर। पासि = नजदीकही।2।
अर्थ: (मेरा मन चाहता है कि) मैं और मान-सम्मान आसरे छोड़ के पूरे सतिगुरु के चरणों पे गिर जाऊँ। गुरु उनका मान आसरा है, जिनका और कोई आसरा नहीं होता। (निमाणियों को) गुरु दिलासा देता है। गुरु की महानताओं का बयान कर कर के मेरा मन नहीं भरता। गुरु मुझे मेरे पास ही बसते परमात्मा को मिलाने के समर्थ है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतिगुर नो सभ को लोचदा जेता जगतु सभु कोइ ॥ बिनु भागा दरसनु ना थीऐ भागहीण बहि रोइ ॥ जो हरि प्रभ भाणा सो थीआ धुरि लिखिआ न मेटै कोइ ॥३॥
मूलम्
सतिगुर नो सभ को लोचदा जेता जगतु सभु कोइ ॥ बिनु भागा दरसनु ना थीऐ भागहीण बहि रोइ ॥ जो हरि प्रभ भाणा सो थीआ धुरि लिखिआ न मेटै कोइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नो = को। सभु को = हरेक जीव। जेता = जितना। थीऐ = होता। भागहीण = मंद भाग्य वाली जीव-स्त्री। बहि = बैठ के।3।
अर्थ: जितना ये सारा जगत है हरेक जीव सत्गुरू को मिलने की चाह रखता है, पर खुश-किस्मती के बगैर सतिगुरु के दर्शन नहीं होते (गुरु की कद्र नहीं पड़ती)। (गुरु से विछुड़ के) दुर्भाग्यवान जीव-स्त्री बैठी दुखी होती है। (पर, जीवों के भी क्या बस?) जो कुछ परमात्मा को ठीक लगता है वही होता है। धुर से प्रभु की दरगाह से लिखे हुक्म को कोई मिटा नहीं सकता।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपे सतिगुरु आपि हरि आपे मेलि मिलाइ ॥ आपि दइआ करि मेलसी गुर सतिगुर पीछै पाइ ॥ सभु जगजीवनु जगि आपि है नानक जलु जलहि समाइ ॥४॥४॥६८॥
मूलम्
आपे सतिगुरु आपि हरि आपे मेलि मिलाइ ॥ आपि दइआ करि मेलसी गुर सतिगुर पीछै पाइ ॥ सभु जगजीवनु जगि आपि है नानक जलु जलहि समाइ ॥४॥४॥६८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करि = कर के। मेलसी = मिलाएगा। पाइ = पा के। सभु = हर जगह। जग जीवन = जगत का जीवन। जगि = जगत में। जलहि = जल ही, जल में ही।4।
अर्थ: परमात्मा खुद ही सतिगुरु मिलाता है (और गुरु के द्वारा) अपने चरणों में मिलाता है। प्रभु (जीवों को) स्वयं ही सतिगुरु से जोड़ के मेहर करके अपने साथ मिलाने के समर्थ है। हे नानक! जगत (के जीवों) का सहारा परमात्मा जगत में हर जगह खुद ही खुद है (जिस जीव को वह अपने चरणों से जोड़ता है वह उस से इस प्रकार घुल-मिल के एक हो जाता है जैसे) पानी पानी में एक रूप हो जाता है।4।4।68।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ४ ॥ रसु अम्रितु नामु रसु अति भला कितु बिधि मिलै रसु खाइ ॥ जाइ पुछहु सोहागणी तुसा किउ करि मिलिआ प्रभु आइ ॥ ओइ वेपरवाह न बोलनी हउ मलि मलि धोवा तिन पाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ४ ॥ रसु अम्रितु नामु रसु अति भला कितु बिधि मिलै रसु खाइ ॥ जाइ पुछहु सोहागणी तुसा किउ करि मिलिआ प्रभु आइ ॥ ओइ वेपरवाह न बोलनी हउ मलि मलि धोवा तिन पाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंम्रित = अमर करने वाला, आत्मिक जीवन देने वाला। अति भला = बहुत अच्छा। कितु बिधि = किस तरीके से? जाइ = जा के। सोहागणी = अच्छे भाग्यवाली जीव स्त्रीयां, वह जीव स्त्रीयां जिन्होंने प्रभु पति को खुश कर लिया। किउकरि = किस तरह? ओए = वे। बोलनी = बोलतीं। मलि = मल के। तिन पाइ = उनके पैर।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘ओए’ है ‘ओह’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: परमात्मा का नाम बड़ा श्रेष्ठ रस है, आत्मिक जीवन देने वाला है। ये रस किस तरह मिल सकता है? कैसे कोई मनुष्य यह रस खा सकता है? (अगर यह भेद समझना है तो हे भाई!) उन जीव स्त्रीयों को जा के पूछो, जिन्होंने प्रभु पति को प्रसन्न कर लिया है। (उनको पूछो कि तुम्हें) प्रभु कैसे आ के मिला है।
(जिस जीव स्त्रीयों ने प्रभु पति को प्रसन्न कर लिया है) वह (दुनियां की शोभा आदि से) बेमुहताज हो जाती हैं (इस वास्ते वह ज्यादा) नहीं बोलतीं। मैं उनके पैर मल मल के धोती हूँ।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे मिलि सजण हरि गुण सारि ॥ सजणु सतिगुरु पुरखु है दुखु कढै हउमै मारि ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे मिलि सजण हरि गुण सारि ॥ सजणु सतिगुरु पुरखु है दुखु कढै हउमै मारि ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मिलि सजणु = सज्जन (गुरु) को मिल के। सारि = (हृदय में) संभाल।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (गुरु) सज्जन को मिल के परमात्मा के गुण (अपने हृदय में) संभाल। सज्जन गुरु अकाल-पुरख का रूप है, वह (शरण आए मनुष्य के हृदय में से) अहंकार का दुख मार के निकाल देता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखीआ सोहागणी तिन दइआ पई मनि आइ ॥ सतिगुर वचनु रतंनु है जो मंने सु हरि रसु खाइ ॥ से वडभागी वड जाणीअहि जिन हरि रसु खाधा गुर भाइ ॥२॥
मूलम्
गुरमुखीआ सोहागणी तिन दइआ पई मनि आइ ॥ सतिगुर वचनु रतंनु है जो मंने सु हरि रसु खाइ ॥ से वडभागी वड जाणीअहि जिन हरि रसु खाधा गुर भाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखीआ = गुरु के सन्मुख रहने वालीयां। मनि = मन में। दइआ = तरस। रतंनु = कीमती पदार्थ। जाणीअहि = जाने जाते हैं। गुर भाइ = गुरु के प्रेम में (रह के)।2।
अर्थ: जे जीव स्त्रीयां गुरु के सन्मुख रहती हैं, वही सुहाग भाग वाली हो जाती हैं। (उनसे जीनव युक्ति पूछने से) उनके मन में तरस आ जाता है (और वह बताती हैं कि) सतिगुरु के वचन एक कीमती रतन है, जो जीव (गुरु के वचन पर) श्रद्धा बना लेता है वह परमात्मा का रस चख लेता है।
जिस मनुष्यों ने गुरु के अनुसार रहके परमात्मा का नाम रस चखा है वह बड़े भाग्यशाली समझे जीते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इहु हरि रसु वणि तिणि सभतु है भागहीण नही खाइ ॥ बिनु सतिगुर पलै ना पवै मनमुख रहे बिललाइ ॥ ओइ सतिगुर आगै ना निवहि ओना अंतरि क्रोधु बलाइ ॥३॥
मूलम्
इहु हरि रसु वणि तिणि सभतु है भागहीण नही खाइ ॥ बिनु सतिगुर पलै ना पवै मनमुख रहे बिललाइ ॥ ओइ सतिगुर आगै ना निवहि ओना अंतरि क्रोधु बलाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वणि = वन में। तिणि = तृण में, तीले में। सभतु = हर जगह। भागहीण = दुर्भाग्यपूर्ण जीव स्त्री। मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाले लोग। बलाय = आफत।3।
अर्थ: (जैसे जल सारी बनस्पति को हरा भरा कर देने वाला है, वैसे ही) परमात्मा का यह नाम-रस वन-तृण में हर जगह मौजूद है (और सारी सृष्टि की जीवात्मा का आसरा है) पर दुर्भाग्यपूर्ण जीव-स्त्री इस नाम रस को नहीं चखती।
गुरु की शरण पड़े बिना ये नाम-रस नहीं प्राप्त होता। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग (नाम रस से वंचित रह कर) बिलकते ही रहते हैं। उनके अंदर क्रोध की आफ़त टिकी रहती है, वे सतिगुरु के आगे सिर नहीं झुकाते।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि हरि हरि रसु आपि है आपे हरि रसु होइ ॥ आपि दइआ करि देवसी गुरमुखि अम्रितु चोइ ॥ सभु तनु मनु हरिआ होइआ नानक हरि वसिआ मनि सोइ ॥४॥५॥६९॥
मूलम्
हरि हरि हरि रसु आपि है आपे हरि रसु होइ ॥ आपि दइआ करि देवसी गुरमुखि अम्रितु चोइ ॥ सभु तनु मनु हरिआ होइआ नानक हरि वसिआ मनि सोइ ॥४॥५॥६९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आपे = स्वयं ही। देवसी = देगा। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख करके। चोइ = चोअ के।4।
अर्थ: (परमात्मा व परमात्मा के नाम रस में कोई फर्क नहीं है) परमात्मा खुद ही (सब जीवों की जीवात्मा का सहारा) रस है।
परमात्मा खुद ही मेहर करके यह नाम रस देता है (जैसे शहद के छत्ते में से शहद चूता है, वैसे ही) गुरु की शरण पड़ने से आत्मिक जीवन देने वाला रस (जीव के अंदर से) टपकता है। हे नानक! जिस मनुष्य के मन में वह परमात्मा आ बसता है (नाम आ बसता है) उसका सारा शरीर, उसका मन हरा हो जाता है (खिल पड़ता है)।4।5।69।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ४ ॥ दिनसु चड़ै फिरि आथवै रैणि सबाई जाइ ॥ आव घटै नरु ना बुझै निति मूसा लाजु टुकाइ ॥ गुड़ु मिठा माइआ पसरिआ मनमुखु लगि माखी पचै पचाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ४ ॥ दिनसु चड़ै फिरि आथवै रैणि सबाई जाइ ॥ आव घटै नरु ना बुझै निति मूसा लाजु टुकाइ ॥ गुड़ु मिठा माइआ पसरिआ मनमुखु लगि माखी पचै पचाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आथवै = डूब जाता है। रैणि = रात। सबाई = सारी। आंव = उम्र। नरु = मनुष्य। निति = सदा। मूसा = चूहा। लाजु = रस्सी। पसरिया = पसरा हुआ है,प्रभाव डाल रहा है, बिखरा हुआ है। मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाला। पचै पचाइ = खुआर होता है।1।
अर्थ: दिन चढ़ता है फिर डूब जाता है, सारी रात भी गुजर जाती है (इस तरह धीरे-धीरे) वह घटती जाती है पर मनुष्य समझता नहीं (गुजरता समय मनुष्य की उम्र को इस तरह काटता जा रहा है, जैसे) चूहा सदा रस्सी को कुतरता जाता है। (जैसे) गुड़ (जीवों को) मीठा (लगता है, तैसे ही) माया का मीठा मोह प्रभाव डाल रहा है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य माया की मिठास में फंस के खुआर होता है जैसे मक्खी गुड़ पर चिपक कर मर जाती है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे मै मीतु सखा प्रभु सोइ ॥ पुतु कलतु मोहु बिखु है अंति बेली कोइ न होइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे मै मीतु सखा प्रभु सोइ ॥ पुतु कलतु मोहु बिखु है अंति बेली कोइ न होइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मै = मेरे वास्ते, मेरा। सखा = साथी, मित्र। कलतु = कलत्र, स्त्री, पत्नी। बिखु = जहर।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! मेरे वास्ते तो वह परमात्मा ही मित्र है, साथी है। पुत्र का, स्त्री का मोह जहर है। (जो आत्मिक जीवन को खत्म कर देता है, और पुत्र स्त्री में से) अंत में कोई भी साथी नहीं बनता।1। रहाउ।
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विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमति हरि लिव उबरे अलिपतु रहे सरणाइ ॥ ओनी चलणु सदा निहालिआ हरि खरचु लीआ पति पाइ ॥ गुरमुखि दरगह मंनीअहि हरि आपि लए गलि लाइ ॥२॥
मूलम्
गुरमति हरि लिव उबरे अलिपतु रहे सरणाइ ॥ ओनी चलणु सदा निहालिआ हरि खरचु लीआ पति पाइ ॥ गुरमुखि दरगह मंनीअहि हरि आपि लए गलि लाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: उबरे = बच जाते हैं। अलिपतु = निर्लिप। ओनी = उन्होंने। निहालिआ = देख लिया है। पति = इज्जत। मंनीअहि = माने जाते हैं। गलि = गले से।2।
अर्थ: (जो मनुष्य गुरु की मति ले के परमात्मा में तवज्जो जोड़ते हैं) वह (इस मौत से) बच जाते हैं, प्रभु की शरण पड़ के वह निर्लिप रहते हैं। उन मनुष्यों ने (जगत से आखिर) चले जाने को सदा (सामने) देखा है, उन्होंने परमात्मा का नाम (जीवन के सफर वास्ते) खर्च एकत्र किया है और (लोक परलोक में) इज्जत पाई है। गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य प्रभु की हजूरी में सत्कारे जाते हैं, परमात्मा स्वयं उन्हें अपने गले से लगा लेता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखा नो पंथु परगटा दरि ठाक न कोई पाइ ॥ हरि नामु सलाहनि नामु मनि नामि रहनि लिव लाइ ॥ अनहद धुनी दरि वजदे दरि सचै सोभा पाइ ॥३॥
मूलम्
गुरमुखा नो पंथु परगटा दरि ठाक न कोई पाइ ॥ हरि नामु सलाहनि नामु मनि नामि रहनि लिव लाइ ॥ अनहद धुनी दरि वजदे दरि सचै सोभा पाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पंथु = रास्ता। परगटा = साफ। दरि = दर पे। ठाक = रुकावट। सलाहनि = सराहते हैं। मनि = मन में। नामि = नाम में। अनहद धुनि = एक रस सुर में बजने वाले। अनहद = अनाहत, बिना बजाए बजने वाले। दरि = (उनके) दर पे, उनके हृदय में।3।
अर्थ: गुरु के सन्मुख रहने वाले लोगों को (जीवन का) रास्ता साफ साफ दिखाई देता है। परमात्मा के दर पे उनके पहुँचने के राह में कोई रुकावट नहीं पड़ती। वह परमात्मा की महिमा करते रहते हैं। परमात्मा का नाम उनके मन में बसा रहता है, वह सदा प्रभु नाम में तवज्जो जोड़ के रखते हैं। उनके अंदर एक रस सुर से प्रभु की सिफति के (मानो, बाजे) बजते रहते हैं। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के दर पे उनको शोभा मिलती है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनी गुरमुखि नामु सलाहिआ तिना सभ को कहै साबासि ॥ तिन की संगति देहि प्रभ मै जाचिक की अरदासि ॥ नानक भाग वडे तिना गुरमुखा जिन अंतरि नामु परगासि ॥४॥३३॥३१॥६॥७०॥
मूलम्
जिनी गुरमुखि नामु सलाहिआ तिना सभ को कहै साबासि ॥ तिन की संगति देहि प्रभ मै जाचिक की अरदासि ॥ नानक भाग वडे तिना गुरमुखा जिन अंतरि नामु परगासि ॥४॥३३॥३१॥६॥७०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कहै साबासि = शाबास कहता है, आदर देता है, वडिआता है। प्रभ = हे प्रभु। जाचकि = भिखारी। परगासि = प्रकाश, रोशनी करता है।4।
अर्थ: जिस मनुष्यों ने गुरु के सन्मुख हो के परमात्मा के नाम की महिमा की है, हर कोई उनकी वाह वाह करता है। हे प्रभु! मैं भिखारी की तेरे आगेअरजोई है कि मुझे उन की संगति बख्श।
हे नानक! गुरु के सन्मुख रहने वाले उन मनुष्यों के अहो भाग्य जाग पड़ते है, जिनके हृदय में परमात्मा का नाम (आत्मिक) प्रकाश पैदा कर देता है।4।33।31।6।70।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ घरु १ ॥ किआ तू रता देखि कै पुत्र कलत्र सीगार ॥ रस भोगहि खुसीआ करहि माणहि रंग अपार ॥ बहुतु करहि फुरमाइसी वरतहि होइ अफार ॥ करता चिति न आवई मनमुख अंध गवार ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ घरु १ ॥ किआ तू रता देखि कै पुत्र कलत्र सीगार ॥ रस भोगहि खुसीआ करहि माणहि रंग अपार ॥ बहुतु करहि फुरमाइसी वरतहि होइ अफार ॥ करता चिति न आवई मनमुख अंध गवार ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रता = से भीगा, मस्त। भोगहि = तूं भोगता है। अपार = बेअंत। फुरमाइसी = हुक्म। अफार = आफरा हुआ, अहंकारी। चिति = (तेरे) चिक्त में। आवई = आए, आता। मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाला। अंध = हे अंधे! गवार = हे मूर्ख।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘फुरमाइसी’ है ‘फुरमायश’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य! हे (माया के मोह में) अंधे हुए मनुष्य! हे मूर्ख! तू (अपने) पुत्रों को देख के, (अपनी) स्त्री के हाव-भाव को देख के क्यूँ मस्त हो रहा है? तू (दुनिया के कई) रस भोगता है, तू (कई तरह की) खुशियों का आनन्द लेता है, तू अनेक (किस्म की) मौजें करता है। तू बड़े हुक्म (भी) देता है, तू अहंकारी हो के (लोगों के साथ अहंकारी) बरताव करता है। तुझे कर्तार याद ही नहीं रहा।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन सुखदाता हरि सोइ ॥ गुर परसादी पाईऐ करमि परापति होइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन सुखदाता हरि सोइ ॥ गुर परसादी पाईऐ करमि परापति होइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सोइ = वह ही। गुर परसादी = गुरु की कृपा से। करमि = (करमु = बख्शिश) मेहर से।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! वह परमात्मा स्वयं ही सुख देने वाला है। (वह परमात्मा) गुरु की कृपा से मिलता है (अपनी ही) मेहर से मिलता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कपड़ि भोगि लपटाइआ सुइना रुपा खाकु ॥ हैवर गैवर बहु रंगे कीए रथ अथाक ॥ किस ही चिति न पावही बिसरिआ सभ साक ॥ सिरजणहारि भुलाइआ विणु नावै नापाक ॥२॥
मूलम्
कपड़ि भोगि लपटाइआ सुइना रुपा खाकु ॥ हैवर गैवर बहु रंगे कीए रथ अथाक ॥ किस ही चिति न पावही बिसरिआ सभ साक ॥ सिरजणहारि भुलाइआ विणु नावै नापाक ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कपड़ि = कपड़े में, कपड़े इस्तेमाल में। भोगि = भोग में, खाने में। लपटाइआ = मस्त, फंसा हुआ। रुपा = चांदी। खाकु = धरती। हैवर = (हय+वर) बढ़ीया घोड़े। गैवर = (गज+वर) बढ़ीया हाथी। बहु रंगे = कई रंगों में, कई किस्मों में। अथाक = (अ+थक), ना थकने वाले। पावही = पाना, प्राप्ति, तू पाता है, लाता है। साक-संबंधी। सिरजणहारि = निर्माता ने। नापाक = गंदा, मलीन, अपवित्र।2।
अर्थ: (हे मूर्ख!) तू खाने में, पहनने में मस्त हो रहा है, तू सोना, चांदी धरती एकत्र कर रहा है। तूने कई किस्मों के बढ़ीया घोड़े, बढ़ीया हाथी और कभी ना थकने वाले रथ इकट्ठे कर लिए हैं। (माया की मस्ती में) तू अपने साक संबंधियों को भी भुला बैठा है, किसी को तू अपने चिक्त में नहीं लाता।
परमात्मा के नाम के बिना तू (आत्मिक जीवन में) गंदा है। निर्माता प्रभु ने तुझे अपने मन से उतार दिया है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
लैदा बद दुआइ तूं माइआ करहि इकत ॥ जिस नो तूं पतीआइदा सो सणु तुझै अनित ॥ अहंकारु करहि अहंकारीआ विआपिआ मन की मति ॥ तिनि प्रभि आपि भुलाइआ ना तिसु जाति न पति ॥३॥
मूलम्
लैदा बद दुआइ तूं माइआ करहि इकत ॥ जिस नो तूं पतीआइदा सो सणु तुझै अनित ॥ अहंकारु करहि अहंकारीआ विआपिआ मन की मति ॥ तिनि प्रभि आपि भुलाइआ ना तिसु जाति न पति ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बद दुआइ = बद् असीसें। इकत = एकत्र, इकट्ठी। जिस नो = जिस (कुटंब) को। पतिआइदा = खुश करता है। सणु = समेत। सणु तुझे = तेरे सहित। अनित = ना नित्य रहने वाला, नाशवान। विआपिआ = व्याप्त, फसा हुआ, दबाव में आया हुआ। तिनि = उस ने। प्रभि = प्रभु ने। तिनि प्रभि = उस प्रभु ने। पति = (दुनिआवी) इज्जत।3।
अर्थ: (हे मूर्ख!) तू (धक्केशाही करके) संपक्ति एकत्र करता है (जिस करके लोगों की) बद्-दुआएं लेता है। (पर) जिस (परिवार) को तू (इस सम्पदा से) खुश करता है वह तेरे समेत ही नाशवान है। हे अहंकारी! तू अपने मन की मति के दबाव में आया हुआ है और (धन-सम्पक्ति) का गुमान करता है।
जिस (दुर्भाग्य वाले जीव) को उस प्रभु ने स्वयं ही गुमराह किया हो (प्रभु की हजूरी में) ना उसकी (ऊँची) जाति (किसी काम की) ना (दुनिया वाली कोई) इज्जत।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतिगुरि पुरखि मिलाइआ इको सजणु सोइ ॥ हरि जन का राखा एकु है किआ माणस हउमै रोइ ॥ जो हरि जन भावै सो करे दरि फेरु न पावै कोइ ॥ नानक रता रंगि हरि सभ जग महि चानणु होइ ॥४॥१॥७१॥
मूलम्
सतिगुरि पुरखि मिलाइआ इको सजणु सोइ ॥ हरि जन का राखा एकु है किआ माणस हउमै रोइ ॥ जो हरि जन भावै सो करे दरि फेरु न पावै कोइ ॥ नानक रता रंगि हरि सभ जग महि चानणु होइ ॥४॥१॥७१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सतिगुरि = सतिगुर ने। पुरखि = पुरख ने। सतिगुर पुरखि = अकाल-पुरख के रूप गुरु ने। माणह = (बहुवचन) मनुष्य। रोइ = रोता है। दरि = दर पे। फेरु = फेरा, मोड़ा। रंगि = प्रेम में। चानणु = प्रकाश (-मीनार)।4।
अर्थ: अकाल-पुरख के रूप सतिगुरु ने जिस मनुष्य को वह प्रभु सज्जन ही मिला दिया है, प्रभु के उस सेवक का रखवाला (हर जगह) प्रभु खुद ही बनता ळै। दुनिया के लोग उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकते। (पर अपनी) अहम् में (फंसा मनुष्य) दुखी (ही) रहता है।
परमात्मा के सेवक को जो अच्छा लगता है, परमात्मा वही करता है। परमात्मा के दर पे उसकी बात कोई काट नहीं सकता। हे नानक! जो मनुष्य परमात्मा के प्यार रंग में रंगा रहता है, वह सारे जगत में प्रकाश (-मीनार) बन जाता है।4।1।71।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: अंक नं: 1 बताता है कि महला 5 का यह पहिला शब्द है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ मनि बिलासु बहु रंगु घणा द्रिसटि भूलि खुसीआ ॥ छत्रधार बादिसाहीआ विचि सहसे परीआ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ मनि बिलासु बहु रंगु घणा द्रिसटि भूलि खुसीआ ॥ छत्रधार बादिसाहीआ विचि सहसे परीआ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनि = मन में। बिलासु = खेल तमाशा। बहु रंगु = कई रंगों का। घणा = बहुत। द्रिसटि = नजर, निगाह। भूलि = भूल के। छत्रधार बादसाहीआ = वह बादशाहियां जिनकी रहमत से सिर पे छत्र टिके हुए हों। सहसा = फिक्र, सहम, संशय।1।
अर्थ: अगर किसी मनुष्य के मन में कई किस्म की बहुत सी चाव-उमंगें हों, अगर उसकी निगाह (दुनियां की) खुशियों में ही भूली रहें, अगर ऐसी बादशाहियां मिलती हों कि सिर पर छत्र टिके रहें, तो भी (साधु-संगत के बिना ये सभ मौजें) सहम में डाल के रखती हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे सुखु साधसंगि पाइआ ॥ लिखिआ लेखु तिनि पुरखि बिधातै दुखु सहसा मिटि गइआ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे सुखु साधसंगि पाइआ ॥ लिखिआ लेखु तिनि पुरखि बिधातै दुखु सहसा मिटि गइआ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साध संगि = साधु संग में। तिनि = उस ने। पुरखि = (अकाल) पुरख ने। बिधातै = निर्माता ने।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! साधु संगति में ही सुख मिलता है। उस अकाल-पुरख निर्माता ने (जिसके माथे पर अच्छे भाग्यों का) लेख लिख दिया (उस को सत्संग मिलता है तथा उसका) दुख सहम दूर हो जाता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जेते थान थनंतरा तेते भवि आइआ ॥ धन पाती वड भूमीआ मेरी मेरी करि परिआ ॥२॥
मूलम्
जेते थान थनंतरा तेते भवि आइआ ॥ धन पाती वड भूमीआ मेरी मेरी करि परिआ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: थान थनंतरा = थान थान अंतरा। धरती की और-और जगह। भवि आइआ = देख के आया। धनपाती = धनपति, धनाढ। भूमीआ = भुमि का मालिक।2।
अर्थ: धरती पे जितनी भी सुंदर सुंदर जगहें हैं (अगर कोई मनुष्य) वह सारे ही स्थल घूम घूम के देख आया हो, अगर कोई बहुत धनाड हो, बहुत सारी धरती का मालिक हो, तो भी (साधु-संगत के बिना) “मेरा पैसा” “मेरी जमीन” कह कह के दुखी रहता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हुकमु चलाए निसंग होइ वरतै अफरिआ ॥ सभु को वसगति करि लइओनु बिनु नावै खाकु रलिआ ॥३॥
मूलम्
हुकमु चलाए निसंग होइ वरतै अफरिआ ॥ सभु को वसगति करि लइओनु बिनु नावै खाकु रलिआ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निसंग = संग के बिना, बिना शर्म के। अफरिआ = अफरा हुआ, अहंकारी। सभ को = हरेक जीव को। वसगति = बस में। लइओनि = लिया है उसने। खाकु = मिट्टी (में)।3।
अर्थ: अगर कोई मनुष्य डर-खतरा-झिझक उतार के (लोगों पे) अपना हुक्म चलाए, लोगों से बड़ी अकड़ वाला सलूक करे, अगर उसने हरेक को अपने वस में कर लिया हो तो भी (साधु-संगत से वंचित रह के परमात्मा के) नाम के बगैर (सुख नहीं मिलता, और आखिर) मिट्टी में मिल जाता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कोटि तेतीस सेवका सिध साधिक दरि खरिआ ॥ गिर्मबारी वड साहबी सभु नानक सुपनु थीआ ॥४॥२॥७२॥
मूलम्
कोटि तेतीस सेवका सिध साधिक दरि खरिआ ॥ गिर्मबारी वड साहबी सभु नानक सुपनु थीआ ॥४॥२॥७२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कोटि तेतीस = तेतीस करोड़ देवते। दरि = दर से। गिरंबारी = गिरां बारी, भारी जिम्मेवारी वाली। गिरां = भारी। बार = बोझ, जिंमेवारी। साहबी = हकूमत। थीआ = हो जाता है।4।
अर्थ: अगर कोई इतनी बड़ी हकूमत का मालिक बन जाए, कि भारी जिंमेवारी भी मिल जाए, और तेतीस करोड़ देवते उसके सेवक बन जाएं, सिद्ध और साधक उसके दर पर खड़े रहें, तो भी, हे नानक! (साधु-संगत के बिना सुख नहीं मिलता, और) ये सभ कुछ आखिर सपना बन के रह जाता है।4।2।72।
[[0043]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ भलके उठि पपोलीऐ विणु बुझे मुगध अजाणि ॥ सो प्रभु चिति न आइओ छुटैगी बेबाणि ॥ सतिगुर सेती चितु लाइ सदा सदा रंगु माणि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ भलके उठि पपोलीऐ विणु बुझे मुगध अजाणि ॥ सो प्रभु चिति न आइओ छुटैगी बेबाणि ॥ सतिगुर सेती चितु लाइ सदा सदा रंगु माणि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भलके = नित्य हर रोज। उठि = उठ के,उद्यम से। पपोलीऐ = पालना पोसना है। मुगध = मूर्ख। अजाणि = बेसमझ। चिति = चिक्त में। छुटैगी = अकेली छोड़ दी जाएगी। बेबाणि = बीआबान में, जंगल में, मसाणों में। सेती = साथ। रंगु = आत्मिक आनंद।1।
अर्थ: हर रोज उद्यम से इस शरीर को पालते पोसते हैं, (जिंदगी का उद्देश्य) समझे बगैर यह मूर्ख ही रह जाता है। इसे कभी उस परमात्मा (जिसने इसे पैदा किया है) याद नहीं आता, और आखिर में इसे मसाणों में फेक दिया जाएगा।
(हे प्राणी! अभी भी वक्त है, अपने) गुरु के साथ चिक्त जोड़ ले, और (परमात्मा का नाम स्मरण करके) सदा कायम रहने वाला आत्मिक आनंद ले।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्राणी तूं आइआ लाहा लैणि ॥ लगा कितु कुफकड़े सभ मुकदी चली रैणि ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
प्राणी तूं आइआ लाहा लैणि ॥ लगा कितु कुफकड़े सभ मुकदी चली रैणि ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लाहा = लाभ। लैणि = लेने के वास्ते। कितु = किस में? कुफकड़े = फक्करी पड़ने वाले काम में, खुआरी पड़ने वाले काम में। रैणि = (उम्र की) रात।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्राणी! तू (जगत में परमात्मा के नाम का) लाभ लेने के लिए आया है। तू किस खुआरी वाले काम में उलझा हुआ है? तेरी जिंदगी की सारी रात खत्म होती जा रही है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कुदम करे पसु पंखीआ दिसै नाही कालु ॥ ओतै साथि मनुखु है फाथा माइआ जालि ॥ मुकते सेई भालीअहि जि सचा नामु समालि ॥२॥
मूलम्
कुदम करे पसु पंखीआ दिसै नाही कालु ॥ ओतै साथि मनुखु है फाथा माइआ जालि ॥ मुकते सेई भालीअहि जि सचा नामु समालि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कुदमु = कलोल। पंखीआं = पक्षी। काल = मौत। ओतै साथि = उस टोले में, उस तरह का। जालि = जाल में। मुकते = (जाल में से) आजाद। सेई = वही लोग। भालीअहि = मिलते हैं। जि = जो।2।
अर्थ: पशु कलोल करते हैं, पंक्षी कलोल करते हैं। (पशु और पंक्षी को) मौत नहीं दिखती। (पर) मनुष्य भी उसके साथ ही जा मिला है (पशु पक्षी की तरह इसे भी मौत याद नहीं, और यह) माया के जाल में फंसा हुआ है। माया के जाल से बचे हुए वही लोग दिखते हैं जो परमात्मा का सदा कायम रहने वाला नाम हृदय में बसाते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जो घरु छडि गवावणा सो लगा मन माहि ॥ जिथै जाइ तुधु वरतणा तिस की चिंता नाहि ॥ फाथे सेई निकले जि गुर की पैरी पाहि ॥३॥
मूलम्
जो घरु छडि गवावणा सो लगा मन माहि ॥ जिथै जाइ तुधु वरतणा तिस की चिंता नाहि ॥ फाथे सेई निकले जि गुर की पैरी पाहि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तुधु = तू। चिंता = ख्याल। पाहि = पड़ते हैं।3।
अर्थ: (हे प्राणी!) जो (ये) घर छोड़ के सदा के लिए चले जाना है, वह तुझे अपने मन में (प्यारा) लग रहा है। और जहां जा के तेरा वास्ता पड़ना है, उसका तूझे (रत्ती भर भी) फिक्र नहीं। (सभ जीव माया के मोह में फंसे हुए हैं, इस मोह में) फंसे हुए वही बंदे निकलते हैं जो गुरु के चरणों में पड़ जाते हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कोई रखि न सकई दूजा को न दिखाइ ॥ चारे कुंडा भालि कै आइ पइआ सरणाइ ॥ नानक सचै पातिसाहि डुबदा लइआ कढाइ ॥४॥३॥७३॥
मूलम्
कोई रखि न सकई दूजा को न दिखाइ ॥ चारे कुंडा भालि कै आइ पइआ सरणाइ ॥ नानक सचै पातिसाहि डुबदा लइआ कढाइ ॥४॥३॥७३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: न दिखाइ = नहीं दिखाई देता। चारे कुंडा = चारों तरफ, सारी दुनिया (कुंड)। सचै पातशाहि = सच्चे पातशाह ने, सत्गुरू ने।4।
अर्थ: (पर, माया का मोह है ही बड़ा प्रबल, इस में से गुरु के बिना) और कोई बचा नहीं सकता। (गुरु के बिना ऐसी स्मर्था वाला) कोई दिखाई नहीं देता। मैं तो सारी सृष्टि ढूंढ के गुरु की शरण आ पड़ा हूँ। हे नानक (कह) सच्चे पातशाह ने, गुरु ने मुझे (माया के मोह समुंदर में) डूब रहे को निकाल लिया है।4।3।73।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ घड़ी मुहत का पाहुणा काज सवारणहारु ॥ माइआ कामि विआपिआ समझै नाही गावारु ॥ उठि चलिआ पछुताइआ परिआ वसि जंदार ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ घड़ी मुहत का पाहुणा काज सवारणहारु ॥ माइआ कामि विआपिआ समझै नाही गावारु ॥ उठि चलिआ पछुताइआ परिआ वसि जंदार ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुहत = मुहुर्त, दो घड़ीआं। पाहुणा = प्राहुणा। कामि वासना = काम-वासना में। विआपिआ = फसा हुआ। गावारु = मूर्ख। उठि = उठ के। वसि जंदार = जंदार के बस में, यम के वस में। जंदार = जंदाल, अवैड़ा, यम।1।
अर्थ: (किसी के घर घड़ी दो घड़ी के लिये गया हुआ मेहमान उस घर के काम संवारने वाला बन बैठे तो हास्यास्पद ही होता है, उसी तरह से जीव इस जगत में) घड़ी दो घड़ियों का मेहमान ही है, पर इस के ही काम-धंधे निपटाने वाला बन जाता है। मूर्ख (जीवन का सही रास्ता) नहीं समझता, माया के मोह में और कामवासना में फंसा रहता है। जब (यहां से) उठ के चल पड़ता है तो पछताता है (पर, उस वक्त पछताने से क्या होता है?) यमों के तो बस पड़ जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अंधे तूं बैठा कंधी पाहि ॥ जे होवी पूरबि लिखिआ ता गुर का बचनु कमाहि ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
अंधे तूं बैठा कंधी पाहि ॥ जे होवी पूरबि लिखिआ ता गुर का बचनु कमाहि ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कंधी = नदी का किनारा। पाहि = पास। पूरबि = शुरू से।1। रहाउ।
अर्थ: हे (माया के मोह में) अंधे हुए जीव! (जैसे कोई पेड़ नदी के किनारे पर उगा हुआ हो तो किसी भी समय नदी के किनारे के टूटने से वृक्ष नदी में बह सकता है, ठीक उसी तरह) तू (मौत रूपी नदी के) किनारे पर बैठा हुआ है (पता नहीं किस वक्त मौत आ जाए)। अगर (तेरे माथे पर) पूर्व जन्म में (की हुई कमाई के अच्छे लेख) लिखे हुए हों तो तू गुरु का उपदेश कमा ले (गुरु के उपदेश मुताबक अपना जीवन बनाए, और आत्मिक मौत से बच जाए)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरी नाही नह डडुरी पकी वढणहार ॥ लै लै दात पहुतिआ लावे करि तईआरु ॥ जा होआ हुकमु किरसाण दा ता लुणि मिणिआ खेतारु ॥२॥
मूलम्
हरी नाही नह डडुरी पकी वढणहार ॥ लै लै दात पहुतिआ लावे करि तईआरु ॥ जा होआ हुकमु किरसाण दा ता लुणि मिणिआ खेतारु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: डडुरी = वह खेती जिसमें दाने पड़ चुके हैं पर अभी कच्चे और नर्म हैं। दात = दातरी, हसिया। पहुतिआ = पहुँच गए। लावे = फसल काटने वाले। करि = कर के। किरसाण = किसान, खेत का मालिक। लुणि = काट के। खेतारु = सारा खेत।2।
अर्थ: यह जरूरी नहीं कि हरी खेती ना काटी जाए, डोडियों पर आई अधपकी फसल ना काटी जाए, और सिर्फ पकी हुई ही काटी जाए। जब खेत के मालिक का हुक्म होता है, वह काटने वाले तैयार करता है जो हसिए ले ले के (खेत में) आ पहुंचते हैं। (वह काटने वाले खेत को) काट के सारा खेत नाप लेते हैं। (इस तरह जगत का मालिक प्रभु जब हुक्म करता है जम आ के जीवों को ले जाते हैं, चाहे बाल उम्र हो, चाहे जवान हो और चाहे बुजुर्ग हो चुके हों)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पहिला पहरु धंधै गइआ दूजै भरि सोइआ ॥ तीजै झाख झखाइआ चउथै भोरु भइआ ॥ कद ही चिति न आइओ जिनि जीउ पिंडु दीआ ॥३॥
मूलम्
पहिला पहरु धंधै गइआ दूजै भरि सोइआ ॥ तीजै झाख झखाइआ चउथै भोरु भइआ ॥ कद ही चिति न आइओ जिनि जीउ पिंडु दीआ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: धंधे = धंधे में, जंजाल में। भरि = भर के, अघा के, पेट भर के। झाख झखाइआ = विषौ भोगे। भोरु = भोर, सुबहु, दिन। चिति = चित्त में। जिनि = जिस प्रभु ने। जीउ = जिंद। पिंडु = शरीर।3।
अर्थ: (माया में ग्रसे मूर्ख मनुष्य की जीवन की रात का) पहिला पहर दुनिया के धंधों में बीत जाता है। दूसरे पहर (मोह की नींद में) जी भर के सोता रहता है, तीसरे पहर विषय भोगता रहता है। और चौथे पहर (आखिर) दिन चढ़ जाता है (बुढ़ापा आ के मौत आ पुकारती है)। जिस प्रभु ने ये जीवात्मा और शरीर दिया है वह कभी भी इसके चिक्त में नहीं आता (उसे कभी भी याद नहीं करता)।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साधसंगति कउ वारिआ जीउ कीआ कुरबाणु ॥ जिस ते सोझी मनि पई मिलिआ पुरखु सुजाणु ॥ नानक डिठा सदा नालि हरि अंतरजामी जाणु ॥४॥४॥७४॥
मूलम्
साधसंगति कउ वारिआ जीउ कीआ कुरबाणु ॥ जिस ते सोझी मनि पई मिलिआ पुरखु सुजाणु ॥ नानक डिठा सदा नालि हरि अंतरजामी जाणु ॥४॥४॥७४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वारिआ = कुर्बान, सदके। मनि = मन मे। सुजाण = सियाना, होशियार। पाणु = सियाना।4।
अर्थ: हे नानक! (कह) मैं साधु-संगत पर सदके जाता हूं, साधु-संगत के ऊपर अपनी जीवात्मा कुर्बान करता हूं। क्योंकि, साधु-संगत से ही मन में (प्रभु के स्मरण की) सूझ पैदा होती है, (साधु-संगत द्वारा ही) सभ के दिल की जानने वाला अकाल-पुरख मिलता है। अंतरयामी सुजान प्रभु को (साधु संगति की कृपा से ही) मैंने सदा अपने अंग-संग देखा है।4।4।74।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ सभे गला विसरनु इको विसरि न जाउ ॥ धंधा सभु जलाइ कै गुरि नामु दीआ सचु सुआउ ॥ आसा सभे लाहि कै इका आस कमाउ ॥ जिनी सतिगुरु सेविआ तिन अगै मिलिआ थाउ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ सभे गला विसरनु इको विसरि न जाउ ॥ धंधा सभु जलाइ कै गुरि नामु दीआ सचु सुआउ ॥ आसा सभे लाहि कै इका आस कमाउ ॥ जिनी सतिगुरु सेविआ तिन अगै मिलिआ थाउ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: विसरनु = बेशक विसर जाएं। गुरि = गुरु के। सचु = सदा स्थिर रहने वाला। सुआउ = उद्देश्य। लाहि कै = दूर कर के। कमाउ = मैं कमाता हूं। जिनी = जिस मनुष्यों ने। तिन = उनको। अगै = प्रभु की दरगाह में। थाउ = जगह, आदर।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘विसरनि’ और ‘विसरनु’ का फर्क समझने योग्य है। ‘विसरनु’ हुकमी भविष्यत अन पुरख बहुवचन है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (मेरी तो सदा यही अरदास है कि) और सारी बातें बे-शक भूल जाएं, पर एक परमात्मा का नाम मुझे (कभी) ना भूले। गुरु ने (दुनिया के) धंधों से मेरा सारा मोह जला के मुझे प्रभु का नाम दिया है। यह सदा स्थिर नाम ही अब मेरा (जीवन) उद्देश्य है। मैं (दुनिया की) सारी आशाएं मन से दूर करके एक परमात्मा की आस (अपने अंदर) पक्की करता हूं।
जिस लोगों ने सतिगुरु का आसरा लिया है उनको परलोक में (प्रभु की दरगाह में) आदर मिलता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे करते नो सालाहि ॥ सभे छडि सिआणपा गुर की पैरी पाहि ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे करते नो सालाहि ॥ सभे छडि सिआणपा गुर की पैरी पाहि ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नो = को। पाहि = पड़ जाना।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! कर्तार की महिमा कर। (पर, यह महिमा की दात गुरु से ही मिलती है। सो तू) सभी चतुराईयां छोड़ के गुरु के चरणों पर गिर जा।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दुख भुख नह विआपई जे सुखदाता मनि होइ ॥ कित ही कमि न छिजीऐ जा हिरदै सचा सोइ ॥ जिसु तूं रखहि हथ दे तिसु मारि न सकै कोइ ॥ सुखदाता गुरु सेवीऐ सभि अवगण कढै धोइ ॥२॥
मूलम्
दुख भुख नह विआपई जे सुखदाता मनि होइ ॥ कित ही कमि न छिजीऐ जा हिरदै सचा सोइ ॥ जिसु तूं रखहि हथ दे तिसु मारि न सकै कोइ ॥ सुखदाता गुरु सेवीऐ सभि अवगण कढै धोइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: विआपई = जोर डाल सकता। मनि = मन में। कितु = किसी में। कंमि = काम में। कित ही कंमि = किसी भी काम में।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘कितु’ की ‘ु’ की मात्रा ‘ही’ लगने के कारण नहीं लगाई गई।
दर्पण-भाषार्थ
छिजीऐ = (आत्मिक जीवन में) कमजोर होते हैं। दे = दे के। सभि = सारे। धोइ = धो के।2।
अर्थ: अगर, सुख देने वाला परमात्मा मन में बस जाए, तो ना दुनिया के दुख जोर डाल सकते हैं, ना माया की तृष्णा ही कमजोर कर सकती है। जब, हृदय में वह सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा बसता हो, तो किसी भी काम में लगें आत्मिक जीवन कमजोर नहीं होता।
हे प्रभु! जिस मनुष्य को तू अपना हाथ दे के (विकारों से) बचाता है, कोई (विकार) उसे (आत्मिक मौत) मार नहीं सकते। (हे भाई!) आत्मिक आनंद देने वाले सतिगुरु की शरण लेनी चाहिए, सत्गुरू (मन में से) सारे अवगुण निकाल के धो देता है।2।
[[0044]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सेवा मंगै सेवको लाईआं अपुनी सेव ॥ साधू संगु मसकते तूठै पावा देव ॥ सभु किछु वसगति साहिबै आपे करण करेव ॥ सतिगुर कै बलिहारणै मनसा सभ पूरेव ॥३॥
मूलम्
सेवा मंगै सेवको लाईआं अपुनी सेव ॥ साधू संगु मसकते तूठै पावा देव ॥ सभु किछु वसगति साहिबै आपे करण करेव ॥ सतिगुर कै बलिहारणै मनसा सभ पूरेव ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मसकते = मुशक्कति, मेहनत। तूठै = अगर तू प्रसंन्न हो। देव = हे प्रभु! वसगति = वस में। करण करेव = करण कारण योग्य। मनसा = मनीषा, मन+आसा, जरूरतें। पूरेव = पूरी करता है।3।
अर्थ: हे प्रकाश स्वरूप प्रभु! मैं सेवक (तेरे से) उन (जीव-स्त्रीयों) की सेवा (का दान) मांगता हूं, जिनको तूने अपनी सेवा में लगाया हुआ है। हे प्रभु! अगर, तू ही मेहर करे, तो मुझे साधु-संगत की प्राप्ति हो और सेवा की दात मिले।
हे भाई! हरेक (दात) मालिक के अपने इख्तियार में है। वह खुद ही सब कुछ करन कारण योग्य है। मैं अपने सतिगुरु से सदके जाता हूं। सतिगुरु मेरी सारी जरूरतें पूरी करने वाला है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इको दिसै सजणो इको भाई मीतु ॥ इकसै दी सामगरी इकसै दी है रीति ॥ इकस सिउ मनु मानिआ ता होआ निहचलु चीतु ॥ सचु खाणा सचु पैनणा टेक नानक सचु कीतु ॥४॥५॥७५॥
मूलम्
इको दिसै सजणो इको भाई मीतु ॥ इकसै दी सामगरी इकसै दी है रीति ॥ इकस सिउ मनु मानिआ ता होआ निहचलु चीतु ॥ सचु खाणा सचु पैनणा टेक नानक सचु कीतु ॥४॥५॥७५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: इको = एक ही। सामगरी = सामग्री, सारे पदार्थ। रीति = मर्यादा। सिउ = से, साथ। सचु = सदा स्थिर प्रभु का नाम। खाणा = आत्मिक खुराक। टेक = आसरा।4।
अर्थ: (हे भाई! जगत में) एक परमात्मा ही असल सज्जन दिखाई देता हैं वही एक (असली) भाई है और मित्र है। दुनिया का सारा धन पदार्थ उस एक परमात्मा का ही दिया हुआ है। उस ही की मर्यादा जगत में चल रही है।
हे नानक! जब मनुष्य का मन एक परमात्मा (की याद) में रच जाता है, जब उसका चिक्त (माया की ओर) डोलने से हट जाता है। वह परमात्मा के सदा स्थिर नाम को अपनी आत्मा की खुराक बना लेता है। नाम को ही अपनी (आत्मिक) पोशाक बनाता है और सदा स्थिर नाम को ही अपना आसरा बनाता है।4।5।75।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ सभे थोक परापते जे आवै इकु हथि ॥ जनमु पदारथु सफलु है जे सचा सबदु कथि ॥ गुर ते महलु परापते जिसु लिखिआ होवै मथि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ सभे थोक परापते जे आवै इकु हथि ॥ जनमु पदारथु सफलु है जे सचा सबदु कथि ॥ गुर ते महलु परापते जिसु लिखिआ होवै मथि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: थोक = पदार्थ, चीजें। हथि आवै = हाथ में आ जाए, मिल जाए। जनमु पदारथु = कीमती मानव जनम। सफलु = फल सहित, कामयाब। कथि = कहूं, मैं उचारूं। सचा = सदा स्थिर रहने वाला। महलु = (परमात्मा के चरणों में) निवास। जिसु मथि = जिस (मनुष्य) के माथे पे।1।
अर्थ: अगर, एक परमात्मा मिल जाए, तो (दुनियां के और) सारे पदार्थ मिल जाते हैं (देने वाला जो खुद ही हुआ)। अगर मैं सदा स्थिर रहने वाले प्रभु की महिमा करता रहूं, तो ये कीमती मानव जनम सफल हो जाए।
(पर, उसी मनुष्य को) गुरु की ओर से (परमात्मा के चरणों का) निवास प्राप्त होता है जिसके माथे पर (अच्छे भाग्य) लिखे हुए हों।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन एकस सिउ चितु लाइ ॥ एकस बिनु सभ धंधु है सभ मिथिआ मोहु माइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन एकस सिउ चितु लाइ ॥ एकस बिनु सभ धंधु है सभ मिथिआ मोहु माइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: एकस सिउ = सिर्फ एक से। धंधु = जंजाल। मोहु माइ = माया का मोह।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! सिर्फ एक परमात्मा के साथि तवज्जो जोड़। एक परमात्मा (के प्यार) के बिनां (दुनियां की) सारी (दौड़ भाग) जंजाल बन जाती है। और माया का मोह है भी सारा व्यर्थ।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
लख खुसीआ पातिसाहीआ जे सतिगुरु नदरि करेइ ॥ निमख एक हरि नामु देइ मेरा मनु तनु सीतलु होइ ॥ जिस कउ पूरबि लिखिआ तिनि सतिगुर चरन गहे ॥२॥
मूलम्
लख खुसीआ पातिसाहीआ जे सतिगुरु नदरि करेइ ॥ निमख एक हरि नामु देइ मेरा मनु तनु सीतलु होइ ॥ जिस कउ पूरबि लिखिआ तिनि सतिगुर चरन गहे ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नदरि = मेहर की निगाह। निमख = निमेष, आंख झपकने जितना समय। देइ = देता है। सीतलु = ठंडा, शांत। पूरबि = पहिले जनम में (किए कर्मों अनुसार)। तिनि = उस (मनुष्य) ने। गहे = पकड़ लिए।2।
अर्थ: अगर, (मेरा) सतिगुरु (मेरे पे) मेहर की (एक) निगाह करे, तो (मैं समझता हूं कि मुझे) लाखों बादशाहत की खुशियां मिल गई हैं। (क्योंकि, जब गुरु मुझे) आँख के झपकने के जितने समय वास्ते भी परमात्मा का नाम बख्शता है, तो मेरा मन शांत हो जाता है। मेरा शरीर शांत हो जाता है। (मेरी सारी ज्ञान-इंद्रिय विकारों की भड़काहट से हट जाती हैं)।
पर उसी मनुष्य ने सतिगुरु के चरण पकड़े हैं (वही मनुष्य सतिगुरु का आसरा लेता है), जिस को पूर्व जन्म का लिखा हुआ (अच्छा लेख) मिलता है (जिसके सौभाग्य जागते हैं)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सफल मूरतु सफला घड़ी जितु सचे नालि पिआरु ॥ दूखु संतापु न लगई जिसु हरि का नामु अधारु ॥ बाह पकड़ि गुरि काढिआ सोई उतरिआ पारि ॥३॥
मूलम्
सफल मूरतु सफला घड़ी जितु सचे नालि पिआरु ॥ दूखु संतापु न लगई जिसु हरि का नामु अधारु ॥ बाह पकड़ि गुरि काढिआ सोई उतरिआ पारि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मूरतु = महूर्त, समय। जितु = जिस में। लगई = लगे। अधारु = आसरा। गुरि = गुरु ने।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘मूरतु’ और ‘मूरति’ में अंतर स्मरणीय है। ‘मूरति’ अर्थात ‘मूर्ती’, ‘स्वरूप’॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: वह समय कामयाब समझो, वह घड़ी सौभाग्यपूर्ण जानो, जिसमें सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के साथ प्यार बने। जिस मनुष्य को परमात्मा के नाम का (जिंदगी का) आसरा मिल जाता है, उस को कोई दुख, कोई कष्ट छू नहीं सकता।
जिस मनुष्य की गुरु ने बाँह पकड़ के (विकारों में से बाहर) निकाल लिया, वह (संसार समुंदर में से सही सलामत) पार लांघ गए।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
थानु सुहावा पवितु है जिथै संत सभा ॥ ढोई तिस ही नो मिलै जिनि पूरा गुरू लभा ॥ नानक बधा घरु तहां जिथै मिरतु न जनमु जरा ॥४॥६॥७६॥
मूलम्
थानु सुहावा पवितु है जिथै संत सभा ॥ ढोई तिस ही नो मिलै जिनि पूरा गुरू लभा ॥ नानक बधा घरु तहां जिथै मिरतु न जनमु जरा ॥४॥६॥७६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: संत सभा = साधु-संगत। ढोई = आसरा। नो = को। जिनि = जिस ने। बधा घरु = पक्का ठिकाना बना लिया। मिरतु = आत्मिक मौत। जनमु = जनम मरण का चक्कर। जरा = बुढ़ापा, आतिमक जीवन को बुढ़ापा।4।
अर्थ: (ये सारी बरकत है गुरु की, साधु-संगत की) जहां साधु-संगत जुड़ती है वह जगह सुंदर है पवित्र है। (साधु-संगत में आ के) जिसने पूरा गुरु ढूंढ लिया है, उसी को ही (परमात्मा की हजूरी में) आसरा मिलता है। हे नानक! उस मनुष्य ने अपना पक्का ठिकाना उस जगह पे बना लिया, जहां आत्मिक मौत नहीं, जहां जन्म मरण का चक्कर नहीं, जहां आत्मिक जीवन कभी कमजोर नहीं होता।4।6।76।
विश्वास-प्रस्तुतिः
स्रीरागु महला ५ ॥ सोई धिआईऐ जीअड़े सिरि साहां पातिसाहु ॥ तिस ही की करि आस मन जिस का सभसु वेसाहु ॥ सभि सिआणपा छडि कै गुर की चरणी पाहु ॥१॥
मूलम्
स्रीरागु महला ५ ॥ सोई धिआईऐ जीअड़े सिरि साहां पातिसाहु ॥ तिस ही की करि आस मन जिस का सभसु वेसाहु ॥ सभि सिआणपा छडि कै गुर की चरणी पाहु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सोई = वही। जीअड़े = हे जीवात्मा। सिरि = सिर पे। मन = हे मन! सभसु = सभ जीवों को। वेसाहु = भरोसा। सभि = सारीआं। पाहु = पड़ जाऊं।1।
अर्थ: हे मेरी जीवात्मा! उसी प्रभु (के चरणों) का ध्यान धरना चाहिए जो सभ शाहों के ऊपर पातशाह है। हे (मेरे) मन! सिर्फ उस परमात्मा की (सहायता की) आस बना, जिस का सभ जीवों को भरोसा है। (हे मन!) सारी चतुराईयां छोड़ के गुरु के चरण पड़ (गुरु की शरण पड़ने से ही परमात्मा का मिलाप होता है)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे सुख सहज सेती जपि नाउ ॥ आठ पहर प्रभु धिआइ तूं गुण गोइंद नित गाउ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे सुख सहज सेती जपि नाउ ॥ आठ पहर प्रभु धिआइ तूं गुण गोइंद नित गाउ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सहज = आत्मिक अडोलता। सेती = साथ।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! आनंद से और आत्मिक अडोलता से परमात्मा का नाम स्मरण कर। आठों पहर प्रभु को स्मरण करता रह, सदा गोविंद के गुण गाता रह।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तिस की सरनी परु मना जिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥ जिसु सिमरत सुखु होइ घणा दुखु दरदु न मूले होइ ॥ सदा सदा करि चाकरी प्रभु साहिबु सचा सोइ ॥२॥
मूलम्
तिस की सरनी परु मना जिसु जेवडु अवरु न कोइ ॥ जिसु सिमरत सुखु होइ घणा दुखु दरदु न मूले होइ ॥ सदा सदा करि चाकरी प्रभु साहिबु सचा सोइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: परु = पड़ जाऊं। घणा = बहुत। मूले = बिल्कुल, पूरी तरह से। चाकरी = सेवा, भक्ती। साहिबु = मालिक। सचा = सदा कायम रहने वाला।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘जिसु’ और ‘जिसका’ के ‘जिस’ में फर्क गौर करने योग्य है। शब्द ‘जिसु तिसु किसु इसु उसु में से ‘ु’ की मात्रा खास खास संबंधकों तथा क्रिया विषोशण ‘ही’ लगने से हट जाती है। देखें गुरबाणी व्याकरण।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे (मेरे) मन! उस परमात्मा की शरण पड़ जिसके बराबर और कोई नहीं है। जिसका नाम स्मरण करने से बहुत आत्मिक आनंद मिलता है, और कोई भी दुख-कष्ट बिल्कुल पास नहीं फटकता। (हे मन!) परमात्मा ही सदा कायम रहने वाला मालिक है, सदा उसकी ही सेवा भक्ति करता रह।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साधसंगति होइ निरमला कटीऐ जम की फास ॥ सुखदाता भै भंजनो तिसु आगै करि अरदासि ॥ मिहर करे जिसु मिहरवानु तां कारजु आवै रासि ॥३॥
मूलम्
साधसंगति होइ निरमला कटीऐ जम की फास ॥ सुखदाता भै भंजनो तिसु आगै करि अरदासि ॥ मिहर करे जिसु मिहरवानु तां कारजु आवै रासि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: फास = फासी। निरमला = पवित्र जीवन वाला। भै भंजनो = सारे डर नाश करने वाला। आवै रासि = सिरे चढ़ जाना।3।
अर्थ: साधु-संगत में रहने से (आचरन) पवित्र हो जाता है, और जमों की फासी कटी जाती है। (हे मन! साधु-संगत का आसारा ले के) उस परमात्मा के आगे अरदास करता रह, जो सारे सुख देने वाला हैऔर सारे डर सहम का नाश करने वाला है।
मेहर करने वाला परमात्मा जिस मनुष्य पे जब मेहर की निगाह करता है, जब उसकी मनुष्य जीवन की भारी जिमेंदारी (पूरी हो) जाती है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बहुतो बहुतु वखाणीऐ ऊचो ऊचा थाउ ॥ वरना चिहना बाहरा कीमति कहि न सकाउ ॥ नानक कउ प्रभ मइआ करि सचु देवहु अपुणा नाउ ॥४॥७॥७७॥
मूलम्
बहुतो बहुतु वखाणीऐ ऊचो ऊचा थाउ ॥ वरना चिहना बाहरा कीमति कहि न सकाउ ॥ नानक कउ प्रभ मइआ करि सचु देवहु अपुणा नाउ ॥४॥७॥७७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वखाणीऐ = कहा जाता है, हर कोई कहता है। कहि न सकाउ = मैं कह नहीं सकता। मइआ = दया। सचु = सदा स्थिर रहने वाला।4।
अर्थ: हर कोई कहता है कि परमात्मा बहुत ऊंचा है, बहुत ऊँचा है, उसका ठिकाना बहुत ऊँचा है। उस प्रभु का कोई खास रंग नहीं है कोई खास रूप-रेखा नहीं है। मैं उसकी कोई कीमत नहीं बता सकता। (भाव, दुनिया के किसी भी पदार्थ के बदले उसकी प्राप्ति नहीं हो सकती)।
हे प्रभु! मेहर कर और मुझे नानक को अपना सदा कायम रहने वाला नाम बख्श (क्यूँकि, जिस को तेरा नाम मिल जाता है उस को तेरा मेल हो जाता है)।4।7।77।
विश्वास-प्रस्तुतिः
स्रीरागु महला ५ ॥ नामु धिआए सो सुखी तिसु मुखु ऊजलु होइ ॥ पूरे गुर ते पाईऐ परगटु सभनी लोइ ॥ साधसंगति कै घरि वसै एको सचा सोइ ॥१॥
मूलम्
स्रीरागु महला ५ ॥ नामु धिआए सो सुखी तिसु मुखु ऊजलु होइ ॥ पूरे गुर ते पाईऐ परगटु सभनी लोइ ॥ साधसंगति कै घरि वसै एको सचा सोइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सो = वह मनुष्य। तिसु = उस का। ऊजलु = रोशन, चमक वाला। ते = से। सभनी लोइ = सारे भवनों में। घरि = घर में। सचा = सदा स्थिर रहने वाला प्रभु।
अर्थ: जो मनुष्य परमात्मा का नाम स्मरण करता है वही सुखी रहता है। उसका मुख (परलोक में) उजला रहता है। (यह नाम) पूरे गुरु से ही मिलता है। (यद्यपि नाम का मालिक प्रभु) सारे ही भवनों में प्रत्यक्ष बसता है। वह सदा कायम रहने वाला प्रभु साधु-संगत के घर में बसता है।1।
[[0045]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन हरि हरि नामु धिआइ ॥ नामु सहाई सदा संगि आगै लए छडाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन हरि हरि नामु धिआइ ॥ नामु सहाई सदा संगि आगै लए छडाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सहाई = सहायता करने वाला। अगै = परलोक विच।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! सदा परमात्मा का नाम स्मरण कर। परमात्मा का नाम (जीवात्मा की) सहायता करने वाला है। (सदा जीवात्मा के) साथ रहता है, और परलोक में (किये हुए कर्मों का लेखा होने के वक्त) छुड़ा लेता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दुनीआ कीआ वडिआईआ कवनै आवहि कामि ॥ माइआ का रंगु सभु फिका जातो बिनसि निदानि ॥ जा कै हिरदै हरि वसै सो पूरा परधानु ॥२॥
मूलम्
दुनीआ कीआ वडिआईआ कवनै आवहि कामि ॥ माइआ का रंगु सभु फिका जातो बिनसि निदानि ॥ जा कै हिरदै हरि वसै सो पूरा परधानु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कवनै कामि = कौन से काम? फिका = बे स्वाद, होछा। जातो = जाता है। निदानि = समाधान। परधानु = जाना माना।2।
अर्थ: (हे मेरे मन!) दुनिया के बड़प्पन किसी काम नहीं आते। माया के कारण (मुंह पे दिखता) रंग फीका पड़ जाता है। क्योंकि, ये रंग आखिर नाश हो जाता है। जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा (का नाम) बसता है, वह सभ गुणों वाला हो जाता है तथा (हर जगह) जाना माना जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साधू की होहु रेणुका अपणा आपु तिआगि ॥ उपाव सिआणप सगल छडि गुर की चरणी लागु ॥ तिसहि परापति रतनु होइ जिसु मसतकि होवै भागु ॥३॥
मूलम्
साधू की होहु रेणुका अपणा आपु तिआगि ॥ उपाव सिआणप सगल छडि गुर की चरणी लागु ॥ तिसहि परापति रतनु होइ जिसु मसतकि होवै भागु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रेणुका = चरण धूल। आपु = स्वै भाव, अहंकार। तिसहि = तिस ही, उसी को ही। मसतकि = माथे पे।3।
अर्थ: (हे मेरे मन!) गुरु के चरणों की धूल बन और अपना अहं भाव छोड़ दे। (हे मन! और) सारे तरीके व चतुराईयां छोड़ के गुरु की शरण पड़ा रह। जिस मनुष्य के माथे पे (पूर्बले) भाग्य जागते हैं (वही गुरु की शरण पड़ता है तथा उसको) परमात्मा का नाम-रतन मिल जाता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तिसै परापति भाईहो जिसु देवै प्रभु आपि ॥ सतिगुर की सेवा सो करे जिसु बिनसै हउमै तापु ॥ नानक कउ गुरु भेटिआ बिनसे सगल संताप ॥४॥८॥७८॥
मूलम्
तिसै परापति भाईहो जिसु देवै प्रभु आपि ॥ सतिगुर की सेवा सो करे जिसु बिनसै हउमै तापु ॥ नानक कउ गुरु भेटिआ बिनसे सगल संताप ॥४॥८॥७८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भाई हो = हे भाईयो! जिसु हउमै = जिस का अहंकार। कउ = को। भेटिआ = मिला।4।
अर्थ: हे भाईयो! प्रभु का नाम उसी मनुष्य को मिलता है जिसको (गुरु के द्वारा) प्रभु खुद देता है। गुरु की सेवा भी वही मनुष्य करता है जिसके अंदर अहम् का ताप नाश हो जाता है।
हे नानक! जिस मनुष्य को गुरु मिलता है उसके सारे कष्ट दूर हो जाते हैं।4।8।78।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ इकु पछाणू जीअ का इको रखणहारु ॥ इकस का मनि आसरा इको प्राण अधारु ॥ तिसु सरणाई सदा सुखु पारब्रहमु करतारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ इकु पछाणू जीअ का इको रखणहारु ॥ इकस का मनि आसरा इको प्राण अधारु ॥ तिसु सरणाई सदा सुखु पारब्रहमु करतारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पछाणू = मित्र। जीअ का = जीवात्मा का। इको = एक (प्रभु) ही। मनि = मन में। प्राण अधारु = प्राणों का आसरा, जीवात्मा का सहारा।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘जीउ’ से ‘जीअ’ बन जाता है संबंधक के प्रयोग से।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (हे भाई!) जीवात्मा का मित्र सिर्फ परमात्मा ही है। परमात्मा ही जीवात्मा को (विकार आदि से) बचाने वाला है। (इस वास्ते) अपने मन में सिर्फ परमात्मा का आसरा रख, सिर्फ परमात्मा ही जीवात्मा का सहारा है। वह पारब्रहम कर्तार (ही सहारा है) उसकी शरण पड़ने से सदा सुख मिलता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे सगल उपाव तिआगु ॥ गुरु पूरा आराधि नित इकसु की लिव लागु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे सगल उपाव तिआगु ॥ गुरु पूरा आराधि नित इकसु की लिव लागु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: उपाव = उपाय। लिव = लगन। लागु = लगाए रख।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! और सारे उपाय त्याग दे। सिर्फ पूरे गुरु को हमेशा याद रख। (सिर्फ गुरु के शब्द का आसरा ले, और) एक परमात्मा (के चरणों) की लगन (अपने अंदर) लगा के रख।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इको भाई मितु इकु इको मात पिता ॥ इकस की मनि टेक है जिनि जीउ पिंडु दिता ॥ सो प्रभु मनहु न विसरै जिनि सभु किछु वसि कीता ॥२॥
मूलम्
इको भाई मितु इकु इको मात पिता ॥ इकस की मनि टेक है जिनि जीउ पिंडु दिता ॥ सो प्रभु मनहु न विसरै जिनि सभु किछु वसि कीता ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: टेक = सहारा। जिनि = जिस (प्रभु) ने। जीउ = जीवात्मा। पिंडु = शरीर। मनहु = मन से। वसि = वस में।2।
अर्थ: (हे मन!) सिर्फ परमात्मा ही (असल) भाई है मित्र है। सिर्फ परमात्मा ही (असल) माता-पिता है। (भाव, माता पिता की तरह पालणहार है)। (मुझे तो) उस परमात्मा का ही मन में सहारा है, जिसने यह जीवात्मा दी है, जिसने यह शरीर दिया है। (मेरी सदा यही अरदास है कि) जिस प्रभु ने सभ कुछ अपने बस में रखा हुआ है वह कभी मेरे मन से ना बिसरे।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
घरि इको बाहरि इको थान थनंतरि आपि ॥ जीअ जंत सभि जिनि कीए आठ पहर तिसु जापि ॥ इकसु सेती रतिआ न होवी सोग संतापु ॥३॥
मूलम्
घरि इको बाहरि इको थान थनंतरि आपि ॥ जीअ जंत सभि जिनि कीए आठ पहर तिसु जापि ॥ इकसु सेती रतिआ न होवी सोग संतापु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: घरि = घर में,हृदय में। थान थनंतरि = स्थान स्थान का अंतर, हरेक स्थान में। सभि = सारे। सेती = साथ। रतिआ = रंगे रहने से। संतापु = कष्ट।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जीअ’ शब्द ‘जीउ’ का बहुवचन है।
नोट: ‘तिस का’ में शब्द ‘तिसु’ में से ‘ु’ की मात्रा, संबंधक ‘का’ के कारण हट गया है। देखें गुरबाणी व्याकरण।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (हे भाई! तेरे) हृदय में भी और बाहर हर जगह पर भी सिर्फ परमात्मा ही बस रहा है। (हे भाई!) आठों पहर उस प्रभु को स्मरण कर, जिस ने सारे जीव-जन्तु पैदा किए हैं। अगर सिर्फ परमात्मा के (प्यार रंग) में रंगे रहें, तो कभी कोई दुख-कष्ट नहीं आता।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पारब्रहमु प्रभु एकु है दूजा नाही कोइ ॥ जीउ पिंडु सभु तिस का जो तिसु भावै सु होइ ॥ गुरि पूरै पूरा भइआ जपि नानक सचा सोइ ॥४॥९॥७९॥
मूलम्
पारब्रहमु प्रभु एकु है दूजा नाही कोइ ॥ जीउ पिंडु सभु तिस का जो तिसु भावै सु होइ ॥ गुरि पूरै पूरा भइआ जपि नानक सचा सोइ ॥४॥९॥७९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरि = गुरु के द्वारा। सचा = सदा स्थिर रहने वाला प्रभु।4।
अर्थ: पारब्रहम परमात्मा ही (सारे संसार का मालिक) है, कोई और उसके बराबर का नहीं है। (सभ जीवों का) शरीर उस परमात्मा का ही दिया हुआ है, (जगत में) वही कुछ होता है जो उस को अच्छा लगता है।
हे नानक! जो मनुष्य पूरे गुरु के द्वारा उस सदा स्थिर प्रभु को स्मरण करता है, वह (सभ गुणों से) मुकम्मल हो जाता है।4।9।79।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ जिना सतिगुर सिउ चितु लाइआ से पूरे परधान ॥ जिन कउ आपि दइआलु होइ तिन उपजै मनि गिआनु ॥ जिन कउ मसतकि लिखिआ तिन पाइआ हरि नामु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ जिना सतिगुर सिउ चितु लाइआ से पूरे परधान ॥ जिन कउ आपि दइआलु होइ तिन उपजै मनि गिआनु ॥ जिन कउ मसतकि लिखिआ तिन पाइआ हरि नामु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सिउ = साथ। से = वह लोग। पूरे = सर्व गुण संपन्न। परधान = जाने माने। मनि = मन में। उपजै = प्रगट होता है। गिआनु = परमात्मा से जान पहिचान। मसतकि = माथे पे।1।
अर्थ: जिस लोगों ने सत्गुरू के साथ अपना मन जोड़ा है, वह सारे गुणों वाले हो जाते हैं। वह (लोक परलोक में) जाने माने जाते हैं। जिस पे परमात्मा खुद दयाल होता है, उनके मन में परमात्मा के साथ गहरी सांझ पैदा हो जाती है। जिनके माथे पे (धुर से ही बख्शिश का लेख) लिखा हुआ उघड़ता है, वह परमात्मा का नाम प्राप्त कर लेते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे एको नामु धिआइ ॥ सरब सुखा सुख ऊपजहि दरगह पैधा जाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे एको नामु धिआइ ॥ सरब सुखा सुख ऊपजहि दरगह पैधा जाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: उपजहि = पैदा होते हैं। पैधा = सिरोपा ले के, आदर सहित। जाइ = जाता है।1। रहाउ।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘उपजै’ एकवचन है, ‘उपजहि’ बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे मेरे मन! सिर्फ परमात्मा का नाम स्मरण कर। (जो मनुष्य स्मरण करता है, उसके अंदर) सारे श्रेष्ठ सुख पैदा हो जाते हैं। वह परमात्मा की दरगाह में आदर के साथ जाता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जनम मरण का भउ गइआ भाउ भगति गोपाल ॥ साधू संगति निरमला आपि करे प्रतिपाल ॥ जनम मरण की मलु कटीऐ गुर दरसनु देखि निहाल ॥२॥
मूलम्
जनम मरण का भउ गइआ भाउ भगति गोपाल ॥ साधू संगति निरमला आपि करे प्रतिपाल ॥ जनम मरण की मलु कटीऐ गुर दरसनु देखि निहाल ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भउ = डर। भाउ = प्यार। गोपाल = संसार की पालना करने वाला। प्रतिपाल = रक्षा। कटीऐ = काटी जाती है। देखि = देख के। निहाल = प्रसंन्न।2।
अर्थ: जो मनुष्य गोपाल प्रभु की भक्ति करता है, प्रभु से प्र्रेम करता है, उसका जनम-मरन (के चक्कर में पड़ने का) डर दूर हो जाता है। साधु-संगत में रहके वह पवित्र हो जाता है। परमात्मा खुद (विकारों से उसकी) रखवाली करता है। गुरु के दर्शन करके (उसका तन मन) खिल जाता है, जनम मरन के चक्कर में डालने वाली उसकी विकारों की मैल काटी जाती है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
थान थनंतरि रवि रहिआ पारब्रहमु प्रभु सोइ ॥ सभना दाता एकु है दूजा नाही कोइ ॥ तिसु सरणाई छुटीऐ कीता लोड़े सु होइ ॥३॥
मूलम्
थान थनंतरि रवि रहिआ पारब्रहमु प्रभु सोइ ॥ सभना दाता एकु है दूजा नाही कोइ ॥ तिसु सरणाई छुटीऐ कीता लोड़े सु होइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: थान थनंतरि = हरेक जगह में, स्थान स्थान का फर्क। सोइ = वही। छुटीऐ = (विकारो की मैल से) बचते हैं। कीता लोड़े = करना पसंद करता है।3।
अर्थ: (हे मेरे मन!) वह पारब्रहम परमात्मा हरेक जगह व्यापक है। वह खुद ही सब जीवों को दातें देने वाला है, उस के बराबर और कोई नहीं। (जगत में वही कुछ होता है जो वह करना चाहता है, उसकी शरण पड़ने से (विकारों से) खलासी होती है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिन मनि वसिआ पारब्रहमु से पूरे परधान ॥ तिन की सोभा निरमली परगटु भई जहान ॥ जिनी मेरा प्रभु धिआइआ नानक तिन कुरबान ॥४॥१०॥८०॥
मूलम्
जिन मनि वसिआ पारब्रहमु से पूरे परधान ॥ तिन की सोभा निरमली परगटु भई जहान ॥ जिनी मेरा प्रभु धिआइआ नानक तिन कुरबान ॥४॥१०॥८०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिनी = जिन्होंने। कुरबान = सदके।4।
अर्थ: (हे भाई!) जिस मनुष्यों के मन में पारब्रहम परमेश्वर का नाम बस जाता है, उनके अंदर सारे गुण पैदा हो जाते हैं। वह हर जगह आदर पाते हैं। उनकी बे-दाग शोभा-बड़प्पन सारे जगत में जाहिर हो जाती है।
हे नानक! (कह) जिस मनुष्यों ने प्रभु का स्मरण किया है, मैं उनसे सदके जाता हूं।4।10।80।
[[0046]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ मिलि सतिगुर सभु दुखु गइआ हरि सुखु वसिआ मनि आइ ॥ अंतरि जोति प्रगासीआ एकसु सिउ लिव लाइ ॥ मिलि साधू मुखु ऊजला पूरबि लिखिआ पाइ ॥ गुण गोविंद नित गावणे निरमल साचै नाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ मिलि सतिगुर सभु दुखु गइआ हरि सुखु वसिआ मनि आइ ॥ अंतरि जोति प्रगासीआ एकसु सिउ लिव लाइ ॥ मिलि साधू मुखु ऊजला पूरबि लिखिआ पाइ ॥ गुण गोविंद नित गावणे निरमल साचै नाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभु = सारा। हरि सुखु = परमात्मा (के मिलाप) का सुख। मनि = मन में। आइ = आ के। अंतरि = अंदर, मन में। एकसु सिउ = एक (परमात्मा) से। लाइ = लगा के। मिलि = मिल के। साधू = गुरु। ऊजला = रोशन। पूरबि = पहिले (जनम के) समय में। साचै नाइ = सदा स्थिर प्रभु के नाम में (जुड़ के)।1।
अर्थ: सतिगुरु को मिल के (मनुष्य का) सारा दुख दूर हो जाता है। परमात्मा के (चरणों) में तवज्जो जोड़ के मनुष्य के मन में परमात्मा की ज्योति का प्रकाश हो जाता है। गुरु को मिल के मनुष्य का मुंह रोशन हो जाता है (चेहरे पर अंदर के आत्मिक जीवन की लाली आ जाती है), पहिले जनम में की गई नेक कमाई के लिखे हुए लेख सामने आ जाते हैं। सदा स्थिर प्रभु के पवित्र नाम में (जुड़ के) मनुष्य सदा गोविंद के गुण गाने की उत्सुक्ता रखता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन गुर सबदी सुखु होइ ॥ गुर पूरे की चाकरी बिरथा जाइ न कोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन गुर सबदी सुखु होइ ॥ गुर पूरे की चाकरी बिरथा जाइ न कोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मन = हे मन! चाकरी = सेवा। बिरथा = वृथा, खाली।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! गुरु के शब्द में जुड़ने से आत्मिक आनंद मिलता है जो भी कोई मनुष्य पूरे गुरु की सेवा करता है (भाव, पूरे गुरु के शब्द अनुसार चलता है) वह (गुरु के दर से) खाली नहीं जाता।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन कीआ इछां पूरीआ पाइआ नामु निधानु ॥ अंतरजामी सदा संगि करणैहारु पछानु ॥ गुर परसादी मुखु ऊजला जपि नामु दानु इसनानु ॥ कामु क्रोधु लोभु बिनसिआ तजिआ सभु अभिमानु ॥२॥
मूलम्
मन कीआ इछां पूरीआ पाइआ नामु निधानु ॥ अंतरजामी सदा संगि करणैहारु पछानु ॥ गुर परसादी मुखु ऊजला जपि नामु दानु इसनानु ॥ कामु क्रोधु लोभु बिनसिआ तजिआ सभु अभिमानु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निधानु = खजाना। अंतरजामी = (जीवों के दिल के) अंदर पहुँच जाने वाला। संगि = अंग-संग। पछानु = जान पहिचान का, मित्र। परसादी = प्रसाद से, कृपा से। जपि = जप के। दानु = सेवा। इसनानु = पवित्र आचरण। अभिमानु = अहंकार।2।
अर्थ: (गुरु के शब्द में जुड़ के जो मनुष्य) परमात्मा के नाम का खजाना ढूंढ लेता है, उसके मन की सारी ख्वाहिशें पूरी हो जाती हैं। (अर्थात, उसका मन दुनियावी वासनाओं पीछे दौड़ने से हट जाता है)। हरेक के दिल की जानने वाला परमात्मा उस मनुष्य को सदा अपने अंग-संग दिखता है, निर्माता प्रभु उसको अपना मित्र प्रतीत होता है। गुरु की कृपा से परमात्मा का नाम जपके (दूसरों की) सेवा (कर के) पवित्र आचरण (बना के) उसका मुंह चमक उठता है। उस मनुष्य के अंदर से काम-क्रोध-लोभ का नाश हो जाता है। वह मनुष्य अहंकार तो बिल्कुल ही त्याग देता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पाइआ लाहा लाभु नामु पूरन होए काम ॥ करि किरपा प्रभि मेलिआ दीआ अपणा नामु ॥ आवण जाणा रहि गइआ आपि होआ मिहरवानु ॥ सचु महलु घरु पाइआ गुर का सबदु पछानु ॥३॥
मूलम्
पाइआ लाहा लाभु नामु पूरन होए काम ॥ करि किरपा प्रभि मेलिआ दीआ अपणा नामु ॥ आवण जाणा रहि गइआ आपि होआ मिहरवानु ॥ सचु महलु घरु पाइआ गुर का सबदु पछानु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लाहा = लाभ, नफा। काम = (सारे) काम। करि = कर के। प्रभि = प्रभु ने। रहि गइआ = समाप्त हो गया। सचु = सदा स्थिर रहने वाला। महलु = ठिकाना। पछानु = जाना हुआ, साथी।3।
अर्थ: प्रभु ने कृपा करके जिस मनुष्य को (अपने चरणों में) जोड़ लिया और अपना नाम बख्शा, उस ने (जब) परमात्मा का नाम (जीवन के व्यापार में) बतौर लाभ हासिल कर लिया, तो उस के सारे काम सफल हो गए (तृष्णा अधीन हो रही दौड़ भाग खत्म हो गई)।
जिस मनुष्य पर परमात्मा खुद मेहर करता है, उसके जन्म मरण का चक्कर समाप्त हो जाता है। गुरु का शब्द उस मनुष्य का (जीवन-) साथी बन जाता है। सदा स्थिर प्रभु के चरण उस को ऐसा ठिकाना मिल जाता है, जिस को वह अपना (आत्मिक) घर बना लेता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भगत जना कउ राखदा आपणी किरपा धारि ॥ हलति पलति मुख ऊजले साचे के गुण सारि ॥ आठ पहर गुण सारदे रते रंगि अपार ॥ पारब्रहमु सुख सागरो नानक सद बलिहार ॥४॥११॥८१॥
मूलम्
भगत जना कउ राखदा आपणी किरपा धारि ॥ हलति पलति मुख ऊजले साचे के गुण सारि ॥ आठ पहर गुण सारदे रते रंगि अपार ॥ पारब्रहमु सुख सागरो नानक सद बलिहार ॥४॥११॥८१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कउ = को। धारि = धारण करके। हलति = इस लोक में, अत्र। पलति = परलोक में, परत्र। सारि = संभाल के। सारदे = संभालते। रंगि = रंग में, प्रेम में। सुख सागरो = सुख का समुंदर, सुख का स्रोत। सद = सदा।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘मुख’ शब्द ‘मुख’ बहुवचन व ‘मुखु’ एकवचन है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: अपनी कृपा करके परमात्मा अपने भक्तों को (काम-क्रोध-लोभ आदि विकारों से) बचा के रखता है। सदा स्थिर प्रभु के गुण (हृदय में) संभाल के उन (भक्तों) के मुंह इस लोक में और परलोक में रोशन हो जाते हैं। वह (भक्त) बेअंत प्रभु के (प्यार-) रंग में रंगे रहते हैं और आठों पहर उस के गुण (अपने दिल में) संभालते हैं। हे नानक! पारब्रहम परमात्मा उनको सारे सुखों का समुंदर दिखता है, और वो उससे सदा सदके होते रहते हैं।4।11।81।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ पूरा सतिगुरु जे मिलै पाईऐ सबदु निधानु ॥ करि किरपा प्रभ आपणी जपीऐ अम्रित नामु ॥ जनम मरण दुखु काटीऐ लागै सहजि धिआनु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ पूरा सतिगुरु जे मिलै पाईऐ सबदु निधानु ॥ करि किरपा प्रभ आपणी जपीऐ अम्रित नामु ॥ जनम मरण दुखु काटीऐ लागै सहजि धिआनु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सबदु = महिमा की वाणी। निधानु = खजाना। प्रभ = हे प्रभु! अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाला। जनम मरण दुखु = जनम मरन (के चक्कर का) दुख। सहजि = आत्मिक अडोलता मे।1।
अर्थ: (हे मन!) अगर पूरा गुरु मिल जाए, तो (उससे) परमात्मा की महिमा का खजाना मिल जाता है। हे प्रभु! अपनी मेहर कर (गुरु मिला, ता कि) आत्मिक जीवन देने वाला (तेरा) नाम (हम) जप सकें। जनम मरन के चक्कर में पड़ने का हम अपना दुख दूर कर सकें और हमारी तवज्जो आत्मिक अडोलता में टिक जाए।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन प्रभ सरणाई पाइ ॥ हरि बिनु दूजा को नही एको नामु धिआइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन प्रभ सरणाई पाइ ॥ हरि बिनु दूजा को नही एको नामु धिआइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: प्रभ सरणाई = प्रभु की शरण में। पाइ = पड़ो।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! प्रभु की शरण पड़। प्रभु के बिना कोई और (रक्षक) नहीं है। (हे मन!) प्रभु का नाम स्मरण कर।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कीमति कहणु न जाईऐ सागरु गुणी अथाहु ॥ वडभागी मिलु संगती सचा सबदु विसाहु ॥ करि सेवा सुख सागरै सिरि साहा पातिसाहु ॥२॥
मूलम्
कीमति कहणु न जाईऐ सागरु गुणी अथाहु ॥ वडभागी मिलु संगती सचा सबदु विसाहु ॥ करि सेवा सुख सागरै सिरि साहा पातिसाहु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सागरु गुणी = गुणों का सागर। वडभागी = हे भाग्यशाली मन! विसाहु = विहाझ। सुख सागरै = सुखों के सागर प्रभु की। सिरि = सिर पे।2।
अर्थ: परमात्मा (सारे) गुणों का समुंदर है, (ऐसा समुंदर है जिसकी) गहराई का अंत नहीं मिल सकता। उसका मुल्य ही नहीं बताया जा सकता (अर्थात, कीमती से कीमती कोई ऐसी चीज नहीं जिसके बदले परमात्मा मिल सके)। हे (मेरे) भाग्यशाली (मन!) साधु-संगत में मिल बैठ, (और वहां) सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा की महिमा की वाणी (का सौदा) खरीद। (साधु-संगत में विधि, तरीका सीख के) सुखों के सागर प्रभु की सेवा भक्ति कर। वह प्रभु (दुनिया के) शाहों के सिर पर बादशाह है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
चरण कमल का आसरा दूजा नाही ठाउ ॥ मै धर तेरी पारब्रहम तेरै ताणिरहाउ ॥ निमाणिआ प्रभु माणु तूं तेरै संगि समाउ ॥३॥
मूलम्
चरण कमल का आसरा दूजा नाही ठाउ ॥ मै धर तेरी पारब्रहम तेरै ताणिरहाउ ॥ निमाणिआ प्रभु माणु तूं तेरै संगि समाउ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चरण कमल = कमल के फूल जैसे सुंदर चरण। ठाउ = जगह, आसरा। मै = मुझे। धर = आसरा। तेरै ताणि = तेरे आसरे। रहाउ = रहूं, मैं रहता हूं। प्रभ = हे प्रभु! 3।
अर्थ: (हे पारब्रह्म! मुझे तेरे ही) सुंदर चरणों का आसरा है। (तेरे बिना) मेरे लिए और कोई जगह नहीं है, मुझे तेरी ही ओट है, मैं तेरे (दिये) बल से ही जीता हूँ। हे प्रभु! जिनको जगत में कोई आदर-सत्कार नहीं देता, तूं उनका भी सम्मान (का जरीआ) है। (मेहर कर) मैं तेरे चरणों में लीन रहूँ।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि जपीऐ आराधीऐ आठ पहर गोविंदु ॥ जीअ प्राण तनु धनु रखे करि किरपा राखी जिंदु ॥ नानक सगले दोख उतारिअनु प्रभु पारब्रहम बखसिंदु ॥४॥१२॥८२॥
मूलम्
हरि जपीऐ आराधीऐ आठ पहर गोविंदु ॥ जीअ प्राण तनु धनु रखे करि किरपा राखी जिंदु ॥ नानक सगले दोख उतारिअनु प्रभु पारब्रहम बखसिंदु ॥४॥१२॥८२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जीअ प्राण = जीवों के प्राण। दोख = पाप। उतारिअनु = उतारे+उन, उस ने उतार दिए हैं।4।
अर्थ: (हे मेरे मन!) आठों पहर परमात्मा का नाम जपना चाहिए, गोबिंद को आराधना चाहिए। परमात्मा (शरण आए) जीवों के प्राणों को (विकारों से) बचाता है। ज्ञान इन्द्रियों को (विकारों से) बचाता है, उनके नाम-धन की रक्षा करता है। (शरण आए जीव की) जीवात्मा को मेहर करके (विकारों से) बचाता है। हे नानक! प्रभु पारब्रह्म बख्शणहार है, वह (शरण में आए के) सारे पाप दूर कर देता है।4।12।82।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ प्रीति लगी तिसु सच सिउ मरै न आवै जाइ ॥ ना वेछोड़िआ विछुड़ै सभ महि रहिआ समाइ ॥ दीन दरद दुख भंजना सेवक कै सत भाइ ॥ अचरज रूपु निरंजनो गुरि मेलाइआ माइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ प्रीति लगी तिसु सच सिउ मरै न आवै जाइ ॥ ना वेछोड़िआ विछुड़ै सभ महि रहिआ समाइ ॥ दीन दरद दुख भंजना सेवक कै सत भाइ ॥ अचरज रूपु निरंजनो गुरि मेलाइआ माइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सच सिउ = सदा स्थिर प्रभु से। जाइ = जाता, नाश होता है। आवै = पैदा होना। भंजना = नाश करने वाला। भाउ = प्रेम। सत भाइ = भली भावना से। निरंजनु = निर+अंजन, माया के प्रभाव से रहित। गुरि = गुरु ने। माइ = हे माँ!।1।
अर्थ: हे मां! मेरी प्रीति (अब) उस सदा स्थिर रहने वाले प्रभु के साथ लग गई है, जो कभी मरता नहीं, जो ना पैदा होता है ना मरता है। वह विछुड़ने से नहीं विछुड़ता। (हे मां!) वह परमात्मा सभ जीवों में समा रहा है। (हे मां!) गरीबों के दुख नाश करने वाला वह प्रभु सेवक को उसकी भली भावना के साथ मिलता है। उस प्रभु का सुंदर रूप है, उसपे माया का प्रभाव नहीं पड़ता। हे मां! वह परमात्मा मुझे मेरे गुरु ने मिला दिया है।1।
[[0047]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे मीतु करहु प्रभु सोइ ॥ माइआ मोह परीति ध्रिगु सुखी न दीसै कोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे मीतु करहु प्रभु सोइ ॥ माइआ मोह परीति ध्रिगु सुखी न दीसै कोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ध्रिगु = तिरस्कार योग्य।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (तू भी) उसी परमात्मा को अपना मित्र बना। माया का मोह माया की प्रीत धिक्कारयोग्य है (इसे त्याग के, माया के मोह में फंसा हुआ) कोई भी आदमी सुखी नहीं दिखता।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दाना दाता सीलवंतु निरमलु रूपु अपारु ॥ सखा सहाई अति वडा ऊचा वडा अपारु ॥ बालकु बिरधि न जाणीऐ निहचलु तिसु दरवारु ॥ जो मंगीऐ सोई पाईऐ निधारा आधारु ॥२॥
मूलम्
दाना दाता सीलवंतु निरमलु रूपु अपारु ॥ सखा सहाई अति वडा ऊचा वडा अपारु ॥ बालकु बिरधि न जाणीऐ निहचलु तिसु दरवारु ॥ जो मंगीऐ सोई पाईऐ निधारा आधारु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दाना = (सब कुछ) जानने वाला। सीलवंतु = अच्छे स्वभाव वाला। अपारु रूप = बहुत ही संदर रूप वाला। सखा = मित्र। बिरधि = बुढा। निहचलु = अटल। निधारा आधारु = निआसरों का आसरा।2।
अर्थ: (हे भाई!) वह परमात्मा सब के दिलों की जानने वाला है, सब को दातें देने वाला है। मीठे स्वभाव वाला है। पवित्र स्वरूप है, बेअंत सुंदर रूप वाला है,वही सभसे बड़ा मित्र है और सहायता करने वाला है, ऊँचा है, बड़ा है, बेअंत है।
न वह कभी बाल उम्र वाला होता है, ना वह कभी बुड्ढा होता है। (भाव, जीवों की तरह उसकी अवस्था घटती-बढ़ती नहीं)। उस प्रभु का दरबार अटल है। (उसका हुक्म मोड़ा नहीं जा सकता)। (उस परमात्मा के दर से) जो कुछ मांगते हैं वही कुछ मिल जाता है। परमात्मा निआसरों का आसरा है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिसु पेखत किलविख हिरहि मनि तनि होवै सांति ॥ इक मनि एकु धिआईऐ मन की लाहि भरांति ॥ गुण निधानु नवतनु सदा पूरन जा की दाति ॥ सदा सदा आराधीऐ दिनु विसरहु नही राति ॥३॥
मूलम्
जिसु पेखत किलविख हिरहि मनि तनि होवै सांति ॥ इक मनि एकु धिआईऐ मन की लाहि भरांति ॥ गुण निधानु नवतनु सदा पूरन जा की दाति ॥ सदा सदा आराधीऐ दिनु विसरहु नही राति ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: किलविख = पाप। हिरहि = नाश हो जाते हैं। मनि = मन में। तनि = शरीर में। इक मनि = एकाग्र मन से, मन लगा के। भरांति = भ्रांति, भटकना। नवतनु = नया निरोया। विसरहु = भुलाओ।3।
अर्थ: (हे भाई!) जिस परमात्मा का दर्शन करने से (सारे) पाप नाश हो जाते हैं, (जिसके दर्शनों से) मन में और शरीर में (आत्मिक) ठंड पड़ जाती है, अपने मन की (माया के ओर की) भटकन दूर करके उस परमात्मा को मन लगा के स्मरणा चाहिए। ना दिन में,ना रात को, कभी भी उसको ना भुलाओ।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन का सखा गोविंदु ॥ तनु मनु धनु अरपी सभो सगल वारीऐ इह जिंदु ॥ देखै सुणै हदूरि सद घटि घटि ब्रहमु रविंदु ॥ अकिरतघणा नो पालदा प्रभ नानक सद बखसिंदु ॥४॥१३॥८३॥
मूलम्
जिन कउ पूरबि लिखिआ तिन का सखा गोविंदु ॥ तनु मनु धनु अरपी सभो सगल वारीऐ इह जिंदु ॥ देखै सुणै हदूरि सद घटि घटि ब्रहमु रविंदु ॥ अकिरतघणा नो पालदा प्रभ नानक सद बखसिंदु ॥४॥१३॥८३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पूरबि = पहिले जनम के समय में। अरपी = मैं अर्पण करता हूँ। वारीऐ = समर्पित कर दें, सदके कर दें। हदूरि = हाजर नाजर, अंग संग। घटि घटि = हरेक घट मे। रविंदु = रव रहा है। अकिरतघन = (कृतघ्न = किए को नाश करने वाला) किए उपकार को भुला देने वाला। नो = को। प्रभ = हे प्रभु! नानक = हे नानक! 4।
अर्थ: (हे भाई!) जिस लोगों के माथे पे पहिले जन्म में की नेक कमाई के लेख उघड़ते हैं, परमात्मा उनका मित्र बन जाता है। मैं तो अपना शरीर, अपना मन, अपना धन (सब कुछ उसका प्यार हासिल करने के लिए) अर्पण करने को तैयार हूं। (हे भाई! प्रभु का प्रेम प्राप्त करने के लिए) ये सारी जीवात्मा कुर्बान कर देनी चाहिए। वह परमात्मा अंग-संग रह कर (हरेक जीव के किये कर्मों को) देखता है (हरेक जीव की अरदासें) सुनता है, परमात्मा हरेक शरीर में व्यापक है।
हे नानक! (अरदास कर और कह) हे प्रभु! तू उनको भी पालता है, जो तेरे किए उपकारों को भुला देते हैं। तू सदा ही (जीवों की भूलें) बख्शने वाला है।4।13।83।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ मनु तनु धनु जिनि प्रभि दीआ रखिआ सहजि सवारि ॥ सरब कला करि थापिआ अंतरि जोति अपार ॥ सदा सदा प्रभु सिमरीऐ अंतरि रखु उर धारि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ मनु तनु धनु जिनि प्रभि दीआ रखिआ सहजि सवारि ॥ सरब कला करि थापिआ अंतरि जोति अपार ॥ सदा सदा प्रभु सिमरीऐ अंतरि रखु उर धारि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिनि = जिस ने। प्रभि = प्रभु ने। सहजि = अडोलता में। सवारि = संवार के, सजा के। कला = ताकतें। उर धारि = हृदय में टिका के।1।
अर्थ: जिस प्रभु ने यह मन दिया है, (बरतनें के लिए) धन दिया है। जिस प्रभु ने मनुष्य के शरीर को सवार बना के रखा है, जिस ने (शरीर में) सारी (शारीरिक) ताकतें पैदा करके शरीर रचा है, और शरीर में अपनी बेअंत ज्योति टिका दी है। (हे भाई!) उस प्रभु को सदा ही स्मरण करते रहना चाहिए। (हे भाई!) अपने हृदय में उसकी याद टिका रख।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन हरि बिनु अवरु न कोइ ॥ प्रभ सरणाई सदा रहु दूखु न विआपै कोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन हरि बिनु अवरु न कोइ ॥ प्रभ सरणाई सदा रहु दूखु न विआपै कोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: न विआपै = जोर नहीं डाल सकता।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! परमात्मा के बिना और कोई (असल रक्षक) नहीं। तू सदा परमात्मा की शरण पड़ा रह, कोई भी दुख तेरे पर जोर नहीं डाल सकेगा।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रतन पदारथ माणका सुइना रुपा खाकु ॥ मात पिता सुत बंधपा कूड़े सभे साक ॥ जिनि कीता तिसहि न जाणई मनमुख पसु नापाक ॥२॥
मूलम्
रतन पदारथ माणका सुइना रुपा खाकु ॥ मात पिता सुत बंधपा कूड़े सभे साक ॥ जिनि कीता तिसहि न जाणई मनमुख पसु नापाक ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रूपा = चाँदी। माणक = मोती। खाकु = मिट्टी (समान), नाशवान। सुत = पुत्र। बंधपा = रिश्तेदार। कूड़े = झूठे, साथ छोड़ जाने वाले। तिसहि = उस को। जाणई = जाने, जानता है। मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाला। नापाक = अपवित्र, गंदे जीवन वाला।2।
अर्थ: रतन, मोती आदि कीमती पदार्थ, सोना चांदी (ये सभ) मिट्टी के समान ही हैं (क्योंकि यहीं पड़े रह जाएंगे)। माता-पिता-पुत्र व और संबंधी - ये सारे साक-संबंधी भी साथ छोड़ जाने वाले हैं। (ये देख के भी) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य, गंदे जीवन का पशु स्वभाव मनुष्य, उस परमात्मा के साथ सांझ नहीं डालता जिसने इसको पैदा किया है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अंतरि बाहरि रवि रहिआ तिस नो जाणै दूरि ॥ त्रिसना लागी रचि रहिआ अंतरि हउमै कूरि ॥ भगती नाम विहूणिआ आवहि वंञहि पूर ॥३॥
मूलम्
अंतरि बाहरि रवि रहिआ तिस नो जाणै दूरि ॥ त्रिसना लागी रचि रहिआ अंतरि हउमै कूरि ॥ भगती नाम विहूणिआ आवहि वंञहि पूर ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रवि रहिआ = मौजूद है। तिस नो = उस को। कूरि = झूठी। वंञहि = वंजहि, चले जाते हैं। पूर = भरी हुई किश्ती के सारे मुसाफिर, अनेक जीव।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘तिस नो’ में ‘तिसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण हट गई है (देखें गुरबाणी व्याकरण)।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (मूर्ख मनुष्य) उस परमात्मा को कहीं दूर बसता समझता है, जो इसके अंदर और बाहर हर जगह मौजूद है। जीव को माया की तृष्णा चिपकी हुई है। (माया के मोह में) जीव मस्त हो रहा है, (माया के कारण) इसके अंदर झूठा अहंकार टिका हुआ है।
परमात्मा की भक्ति से परमात्मा के नाम से विहीन भर भरके नावों में जीव (इस संसार समुंदर में) आते हैं और खाली चले जाते हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
राखि लेहु प्रभु करणहार जीअ जंत करि दइआ ॥ बिनु प्रभ कोइ न रखनहारु महा बिकट जम भइआ ॥ नानक नामु न वीसरउ करि अपुनी हरि मइआ ॥४॥१४॥८४॥
मूलम्
राखि लेहु प्रभु करणहार जीअ जंत करि दइआ ॥ बिनु प्रभ कोइ न रखनहारु महा बिकट जम भइआ ॥ नानक नामु न वीसरउ करि अपुनी हरि मइआ ॥४॥१४॥८४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: प्रभ = हे प्रभु! करि = कर के। बिकट = कठिन। जम भइआ = जम का डर। वीसरउ = मैं भूलूं। मइआ = दया।4।
अर्थ: (पर, जीवों के भी क्या बस? माया के सामने ये बे-बस हैं) हे जीवों को पैदा करने वाले प्रभु! तू खुद ही मेहर करके सारे जीव-जन्तुओं को (इस तृष्णा से) बचा ले। हे प्रभु! तेरे बगैर कोई रक्षा करने वाला नहीं है। यम राज जीवों के वास्ते बड़ा डरावना बन रहा है। हे नानक! (अरदास कर और कह) हे हरि! अपनी मेहर कर, मैं तेरा नाम कभी भी ना भुलाऊँ।4।14।84।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ मेरा तनु अरु धनु मेरा राज रूप मै देसु ॥ सुत दारा बनिता अनेक बहुतु रंग अरु वेस ॥ हरि नामु रिदै न वसई कारजि कितै न लेखि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ मेरा तनु अरु धनु मेरा राज रूप मै देसु ॥ सुत दारा बनिता अनेक बहुतु रंग अरु वेस ॥ हरि नामु रिदै न वसई कारजि कितै न लेखि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तनु = शरीर। अरु = और। मै = मेरा। सुत = पुत्र। दारा = स्त्री। रंग = मौजें। वेस = पहिरावे। रिदै = हृदय में। वसई = बसे। कारजि कितै = किसी काम में। लेखि = पहचान, समझ।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘अरु’ और ‘अरि’ में फर्क ध्यान में रखें: अरु = और; अरि = वैरी, शत्रु।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (मनुष्य गर्व करता है और कहता है कि) ये शरीर मेरा है, यह राज मेरा है, यह देश मेरा है, मैं रूपवान हूँ, मेरे पुत्र हैं, मेरी स्त्रीयां हैं, मुझे बड़ी मौजें हैं और मेरे पास कई पोशाकें हैं। अगर, उसके हृदय में परमात्मा का नाम नहीं बसता तो (ये सभ पदार्थ जिनपे मनुष्य घमण्ड करता है) किसी भी काम के ना समझो।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन हरि हरि नामु धिआइ ॥ करि संगति नित साध की गुर चरणी चितु लाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन हरि हरि नामु धिआइ ॥ करि संगति नित साध की गुर चरणी चितु लाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नित = सदा। साध = गुरु।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! सदा परमात्मा का नाम स्मरण कर। सदा गुरु की संगति कर और गुरु के चरणों में चिक्त जोड़।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नामु निधानु धिआईऐ मसतकि होवै भागु ॥ कारज सभि सवारीअहि गुर की चरणी लागु ॥ हउमै रोगु भ्रमु कटीऐ ना आवै ना जागु ॥२॥
मूलम्
नामु निधानु धिआईऐ मसतकि होवै भागु ॥ कारज सभि सवारीअहि गुर की चरणी लागु ॥ हउमै रोगु भ्रमु कटीऐ ना आवै ना जागु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निधानु = खजाना। मसतकि = माथे पे। सभि = सारे। सवारीअहि = संवारे जाते हैं। लागु = लगना। भ्रम = भटकना। जागु = जाएगा, मरेगा।2।
अर्थ: परमात्मा का नाम (जो सब पदार्तों का) खजाना है, स्मरणा चाहिए। (पर, वही मनुष्य स्मरण कर सकता है जिस के) माथे पे बढ़िया किस्मत उघड़ आए। (हे भाई!) सतिगुरु के चरणों में टिका रह, तेरे सारे काम भी संबर जाएंगे। (जो मनुष्य गुरु शरण रह के नाम स्मरण करता है उस का) अहम् रोग काटा जाता है, उसकी भटकना दूर हो जाती है, वह ना (बार-बार) पैदा होता है ना मरता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
करि संगति तू साध की अठसठि तीरथ नाउ ॥ जीउ प्राण मनु तनु हरे साचा एहु सुआउ ॥ ऐथै मिलहि वडाईआ दरगहि पावहि थाउ ॥३॥
मूलम्
करि संगति तू साध की अठसठि तीरथ नाउ ॥ जीउ प्राण मनु तनु हरे साचा एहु सुआउ ॥ ऐथै मिलहि वडाईआ दरगहि पावहि थाउ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अठसठि = अढ़सठ, साठ और आठ। नाउ = स्नान। हरे = आत्मिक जीवन वाले। साचा = सदा स्थिर। सुआउ = उद्देश्य। थाउ = आदर, जगह।3।
अर्थ: (हे भाई!) गुरु की संगति कर- यही अढ़सठ तीर्तों का स्नान है। (गुरु की शरण में रहने से) जीवात्मा, प्राण, मन, शरीर सभ आत्मिक जीवन वाले हो जाते हैं। और मानव जीवन का असल उद्देश्य भी यही है। इस जगत में (सभी किस्म के) आदर मान मिलेंगे, परमात्मा की दरगाह में भी आदर पाएगा।3।
[[0048]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
करे कराए आपि प्रभु सभु किछु तिस ही हाथि ॥ मारि आपे जीवालदा अंतरि बाहरि साथि ॥ नानक प्रभ सरणागती सरब घटा के नाथ ॥४॥१५॥८५॥
मूलम्
करे कराए आपि प्रभु सभु किछु तिस ही हाथि ॥ मारि आपे जीवालदा अंतरि बाहरि साथि ॥ नानक प्रभ सरणागती सरब घटा के नाथ ॥४॥१५॥८५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तिस ही हाथि = उसी के हाथ में। मारि = मार के। प्रभ = हे प्रभु! नाथ = हे नाथ! 4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘तिस ही हाथि’ में ‘तिसु’ की ‘ु’ मात्रा, क्रिया विशेषण ‘ही’ के कारण नहीं लगी है (देखें “गुरबाणी व्याकरण”)।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (पर, जीवों के कुछ बस में नहीं) प्रभु स्वयं ही सब कुछ करता है, स्वयं ही जीवों से करवाता है। हरेक खेल उस प्रभु के अपने ही हाथ में है। प्रभु खुद ही आत्मिक मौत मारता है, खुद ही आत्मिक जीवन देता है, जीवों के अंदर-बाहर हर जगह उनके साथ रहता है।
हे नानक! (अरदास कर और कह) हे प्रभु! हे सब जीवों के खसम पति! मैं तेरी शरण आया हूं (मुझे अपने नाम की दात दे।4।15।85।)
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ सरणि पए प्रभ आपणे गुरु होआ किरपालु ॥ सतगुर कै उपदेसिऐ बिनसे सरब जंजाल ॥ अंदरु लगा राम नामि अम्रित नदरि निहालु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ सरणि पए प्रभ आपणे गुरु होआ किरपालु ॥ सतगुर कै उपदेसिऐ बिनसे सरब जंजाल ॥ अंदरु लगा राम नामि अम्रित नदरि निहालु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सरणि प्रभु = प्रभु की श्रण में। अंदरु = हृदय। नामि = नाम में। अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाला। निहाल = प्रसन्न, हरा भरा।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘अंदरु’ संज्ञा है। उसमें और ‘अंदरि’ में फर्क याद रखने वाला है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जिस मनुष्य पर गुरु दयावान होता है, वह अपने परमात्मा की शरण पड़ता है। गुरु के उपदेश की इनायत से उस मनुष्य के (माया मोह वाले) सारे जंजाल नाश हो जाते हैं। उसका हृदय परमात्मा के नाम में जुड़ा रहता है। परमात्मा की मेहर की निगाह से उसका हृदय आनन्दित रहता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे सतिगुर सेवा सारु ॥ करे दइआ प्रभु आपणी इक निमख न मनहु विसारु ॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे सतिगुर सेवा सारु ॥ करे दइआ प्रभु आपणी इक निमख न मनहु विसारु ॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सारु = संभाल। निमख = आँख झपकने जितना समय, निमेष।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! गुरु की (बताई हुई) सेवा ध्यान से कर, परमात्मा को आंख झपकने जितने समय के लिए भी अपने मन से ना भुला। जो मनुष्य ये उद्यम करता है, परमात्मा उस पर अपनी मेहर करता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुण गोविंद नित गावीअहि अवगुण कटणहार ॥ बिनु हरि नाम न सुखु होइ करि डिठे बिसथार ॥ सहजे सिफती रतिआ भवजलु उतरे पारि ॥२॥
मूलम्
गुण गोविंद नित गावीअहि अवगुण कटणहार ॥ बिनु हरि नाम न सुखु होइ करि डिठे बिसथार ॥ सहजे सिफती रतिआ भवजलु उतरे पारि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गावीअहि = गाए जाने चाहिए। कटणहार = काटने में समर्थ। बिस्थार = विस्थार, (माया का) पसारा, खिलारा। सहजे = सहज, आत्मिक अडोलता में (टिक के)। भवजलु = संसार समुंदर।2।
अर्थ: (हे भाई!) सदा परमात्मा के गुण गाने चाहिए। परमात्मा के गुण सारे अवगुणों को काटने में समर्थ हैं। हमने माया के अनेक पसारे करके देख लिए हैं (अर्थात, ये यकीन जानों कि माया के अनेक खिलारों के खिलारने पर) परमात्मा के नाम के बिना आत्मिक आनन्द नहीं मिलता। आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा की महिमा में प्यार डालने से जीव संसार समुंदर से पार लांघ जाते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तीरथ वरत लख संजमा पाईऐ साधू धूरि ॥ लूकि कमावै किस ते जा वेखै सदा हदूरि ॥ थान थनंतरि रवि रहिआ प्रभु मेरा भरपूरि ॥३॥
मूलम्
तीरथ वरत लख संजमा पाईऐ साधू धूरि ॥ लूकि कमावै किस ते जा वेखै सदा हदूरि ॥ थान थनंतरि रवि रहिआ प्रभु मेरा भरपूरि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: संजमा = इन्द्रियों को विकारों से बचाने के साधन। साधू = गुरु। लूकि = छुप के। किस ते = किस से? जा = क्यूंकि। थान थनंतरि = हर जगह, स्थान स्थान में अंतर। भरपूरि = पूरी तौर पे।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘किस ते’ में ‘किसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘ते’ के कारण नहीं लगी है। देखें ‘गुरबाणी व्याकरण’।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (हे भाई!) गुरु के चरणों की धूर प्राप्त करनी चाहिए। यही है तीर्तों के स्नान, यही है बरत रखने, यही है इन्द्रियों को बस में रखने वाले लाखों उद्यम (परमात्मा इन बाहरले धार्मिक संजमों से नहीं पतीजता, वह तो) जीवों के अंग-संग रह के सदा (जीवों के सभ छुप के किए काम भी) देखता है (फिर भी मूर्ख मनुष्य) किस से छुप के (गलत काम) करता है? परमात्मा तो हरेक जगह पर पूरी तौर पर व्यापक है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचु पातिसाही अमरु सचु सचे सचा थानु ॥ सची कुदरति धारीअनु सचि सिरजिओनु जहानु ॥ नानक जपीऐ सचु नामु हउ सदा सदा कुरबानु ॥४॥१६॥८६॥
मूलम्
सचु पातिसाही अमरु सचु सचे सचा थानु ॥ सची कुदरति धारीअनु सचि सिरजिओनु जहानु ॥ नानक जपीऐ सचु नामु हउ सदा सदा कुरबानु ॥४॥१६॥८६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचु = सदा स्थिर रहने वाला। अमरु = हुक्म। सचे = सदा स्थिर रहने वाले का। धारीअनु = धारी है उसने, उसने निष्चय किया है। सचि = सदा स्थिर प्रभु ने। सिरजिओनु = पैदा किया है उसने।4।
अर्थ: परमात्मा की पातशाही सदा कायम रहने वाली है। परमात्मा का हुक्म अटल है। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का स्थान भी सदा कायम रहने वाला है! उस सदा स्थिर परमात्मा ने अटल कुदरत रची हुई है और ये सारा जगत पैदा किया हुआ है। उस सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम स्मरणा चाहिए। हे नानक! (कह) मैं उस परमात्मा से सदा ही सदके जाता हूं।4।16।86।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ उदमु करि हरि जापणा वडभागी धनु खाटि ॥ संतसंगि हरि सिमरणा मलु जनम जनम की काटि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ उदमु करि हरि जापणा वडभागी धनु खाटि ॥ संतसंगि हरि सिमरणा मलु जनम जनम की काटि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करि = कर के। वडभागी = बड़े भाग्यों वाले। खाटि = कमाना, एकत्र करना। संगि = संगति में।1।
अर्थ: (हे मन!) उद्यम कर के परमात्मा का नाम स्मरण कर। बड़े भाग्यों से परमात्मा का नाम धन इकट्ठा कर। साधु-संगत में रहके प्रभु के नाम का स्मरण करने से जन्मों-जन्मों में किये विकारों की मैल दूर कर लेगा।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे राम नामु जपि जापु ॥ मन इछे फल भुंचि तू सभु चूकै सोगु संतापु ॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे राम नामु जपि जापु ॥ मन इछे फल भुंचि तू सभु चूकै सोगु संतापु ॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मन इछे = मन चाहे। भुंचि = खा। चूके = खत्म हो जाएगा। सोगु = चिन्ता। संतापु = दुख। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! परमात्मा का नाम जप, परमात्मा (के नाम) का जाप जप। (नाम जपने की बरकत से) तू मन भावन फल प्राप्त करेगा और तेरा सारा दुख-कष्ट-सहम दूर हो जाएगा। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिसु कारणि तनु धारिआ सो प्रभु डिठा नालि ॥ जलि थलि महीअलि पूरिआ प्रभु आपणी नदरि निहालि ॥२॥
मूलम्
जिसु कारणि तनु धारिआ सो प्रभु डिठा नालि ॥ जलि थलि महीअलि पूरिआ प्रभु आपणी नदरि निहालि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिसु कारणि = जिस उद्देश्य के लिए, जिस उद्देश्य वास्ते। तनु धारिया = जनम लिया। जलि = जल में। थलि = धरती में। महीअलि = मही+तल, मही (धरती) के तल पर, आकाश में, पाताल में। निहालि = निहारे, देखता है।2।
अर्थ: (हे भाई!) इस उद्देश्य के लिएतूने ये मपनस जन्म हासिल किया है (जिस मनुष्य ने ये उद्देश्य पूरा किया है, प्रभु का नाम स्मरण किया है, उस ने) उस परमात्मा को अपने अंग-संग बसता देख लिया है। (उसे यह निष्चय हो गया है कि) प्रभु जल में, धरती में, आकाश में, हर जगह मौजूद है और (सभ जीवों को) अपनी मेहर की निगाह से देखता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनु तनु निरमलु होइआ लागी साचु परीति ॥ चरण भजे पारब्रहम के सभि जप तप तिन ही कीति ॥३॥
मूलम्
मनु तनु निरमलु होइआ लागी साचु परीति ॥ चरण भजे पारब्रहम के सभि जप तप तिन ही कीति ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निरमलु = पवित्र। साच = सदा स्थिर प्रभु। सभि = सारे। तिन ही = उसी ने।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘तिन ही’ में ‘तिनि’ की ‘न’ की ‘ि’ की मात्रा क्रिया विशेषण ‘ही’ के कारण उड़ गई है। देखें ‘गुरबाणी व्याकरण’।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जिस मनुष्य की प्रीति सदा स्थिर परमात्मा के साथ बन जाती है, उसका मन पवित्र हो जाता है, उसका शरीर भी पवित्र हो जाता है (भाव, उसकी सारी ज्ञान-इंद्रिय विकारों से हट जाती हैं)। जिस मनुष्य ने अकाल-पुरख के चरण सेवे हैं, मानों, सारे जप, सारे तप उस ने ही कर लिए हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रतन जवेहर माणिका अम्रितु हरि का नाउ ॥ सूख सहज आनंद रस जन नानक हरि गुण गाउ ॥४॥१७॥८७॥
मूलम्
रतन जवेहर माणिका अम्रितु हरि का नाउ ॥ सूख सहज आनंद रस जन नानक हरि गुण गाउ ॥४॥१७॥८७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: माणिका = मोती। अंम्रितु = अटल आत्मिक देने वाला। सहज = आत्मिक अडोलता। जन नानक = हे दास नानक! 4।
अर्थ: परमात्मा का अटल आत्मिक जीवन देने वाला नाम ही असली जवाहर रतन व मोती है। (क्योंकि, नाम की बरकत से ही) आत्मिक अडोलता के सुख आनंद के रस प्राप्त होते हैं। हे दास नानक! सदा प्रभु के गुण गा।4।17।87।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ सोई सासतु सउणु सोइ जितु जपीऐ हरि नाउ ॥ चरण कमल गुरि धनु दीआ मिलिआ निथावे थाउ ॥ साची पूंजी सचु संजमो आठ पहर गुण गाउ ॥ करि किरपा प्रभु भेटिआ मरणु न आवणु जाउ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ सोई सासतु सउणु सोइ जितु जपीऐ हरि नाउ ॥ चरण कमल गुरि धनु दीआ मिलिआ निथावे थाउ ॥ साची पूंजी सचु संजमो आठ पहर गुण गाउ ॥ करि किरपा प्रभु भेटिआ मरणु न आवणु जाउ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सोई = वह (गुरु) ही। सासतु = शास्त्र। सउण = शौणक का बनाया हुआ ज्योतिष शास्त्र। जितु = जिस (गुरु) से। चरण कमल = कमल के फूल जैसे सुंदर चरण। गुरि = गुरु ने। साची = सदा स्थिर रहने वाली। पूंजी = राशि, संपत्ति, धन-दौलत। संजमो = संजम, इन्द्रियों को बस में करने का यत्न। आवणु जाउ = पैदा होना मरना।1।
अर्थ: (पर, हे मन! गुरु की शरण पड़ने से ही नाम स्मरण किया जा सकता है) वह गुरु ही शास्त्र है, क्योंकि उस गुरु के द्वारा ही नाम स्मरण किया जा सकता है। जिस नि-आसरे को भी गुरु ने परमात्मा के सुंदर चरणों की प्रीति का धन दिया है, उस को (लोक परलोक में) आदर मिल जाता है। (हे मेरे मन!) आठ पहर परमात्मा के गुण गाता रह। यह सदा कायम रहने वाली संपत्ति है। यही इन्द्रियों को काबू रखने का अटल साधन है। (जो मनुष्य गुरु की शरण में आ के प्रभु का नाम स्मरण करता है उसको) प्रभु मेहर कर के मिल जाता है। उसे फिर आत्मिक मौत नहीं आती, उसका जन्म-मरण खत्म हो जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन हरि भजु सदा इक रंगि ॥ घट घट अंतरि रवि रहिआ सदा सहाई संगि ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन हरि भजु सदा इक रंगि ॥ घट घट अंतरि रवि रहिआ सदा सहाई संगि ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: इक रंगि = एक के रंग में, प्रभु के प्यार में।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! परमात्मा के प्यार में (जुड़ के) सदा परमात्मा का भजन कर। वह परमात्मा हरेक शरीर में व्यापक है, वह सदा सहायता करने वाला है, और वह सदा अंग-संग रहता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुखा की मिति किआ गणी जा सिमरी गोविंदु ॥ जिन चाखिआ से त्रिपतासिआ उह रसु जाणै जिंदु ॥ संता संगति मनि वसै प्रभु प्रीतमु बखसिंदु ॥ जिनि सेविआ प्रभु आपणा सोई राज नरिंदु ॥२॥
मूलम्
सुखा की मिति किआ गणी जा सिमरी गोविंदु ॥ जिन चाखिआ से त्रिपतासिआ उह रसु जाणै जिंदु ॥ संता संगति मनि वसै प्रभु प्रीतमु बखसिंदु ॥ जिनि सेविआ प्रभु आपणा सोई राज नरिंदु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मिती = मिनती, नाप, हदबंदी। गणी = मैं गिनूं। सिमरी = मैं स्मरण करूँ। जिन = जिन्हों (लोगों) ने। जिनि = जिस ने। नरिंदु = राजा। राज नरिंदु = राजाओं का राजा।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: लफ्ज़ ‘जिन’ है बहुवचन, लफ्ज़ ‘जिनि’ एकवचन।
नोट: ‘जिन’ लफ्ज़ स्त्रीलिंग होने की वजह से लफ्ज़ ‘जिंदु’ का विशेषण है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जब मैं धरती के मालिक प्रभु को स्मरण करता हूं (उस वक्त इतने सुख अनुभव होते हैं कि) मैं उन सुखों का अंदाजा नहीं लगा सकता। जिस लोगों ने नाम रस चखा है, वह (माया की तृष्णा की ओर से) तृप्त हो जाते हैं। (पर, जो जीवात्मा नाम रस चखती है) वही जीवात्मा उस नाम रस को समझती है। प्रीतम बख्शणहार प्रभु साधु-संगत में टिकने से ही मन में बसता है। जिस मनुष्य ने प्यारे प्रभु का स्मरण किया है, वह राजाओं का राजा बन गया है।2।
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विश्वास-प्रस्तुतिः
अउसरि हरि जसु गुण रमण जितु कोटि मजन इसनानु ॥ रसना उचरै गुणवती कोइ न पुजै दानु ॥ द्रिसटि धारि मनि तनि वसै दइआल पुरखु मिहरवानु ॥ जीउ पिंडु धनु तिस दा हउ सदा सदा कुरबानु ॥३॥
मूलम्
अउसरि हरि जसु गुण रमण जितु कोटि मजन इसनानु ॥ रसना उचरै गुणवती कोइ न पुजै दानु ॥ द्रिसटि धारि मनि तनि वसै दइआल पुरखु मिहरवानु ॥ जीउ पिंडु धनु तिस दा हउ सदा सदा कुरबानु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अउसरि = अवसर, समय में। जितु अउसरि = जिस समय में। मजन = स्नान। रसना = जीभ। गुणवती रसना = भाग्यशाली जीभ। धारि = धार के। मनि = मन में। जीउ = जीवात्मा। पिंडु = शरीर। तिस दा = उस प्रभु का (दिया हुआ)। हउ = मैं।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘तिस’ की ‘ु’ की मात्रा नहीं लगी है क्योंकि सम्बंधक ‘दा’ लगा है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जिस समय में परमात्मा की महिमा की जाए, परमात्मा के गुण याद किये जाएं (उस समय मानों) करोड़ों तीरथों के स्नान हो जाते हैं। अगर कोई भाग्यशाली जिहवा परमात्मा के गुण उचारती है, तो और कोई दान (इस काम की) बराबरी नहीं कर सकता। (जो मनुष्य स्मरण करता है उस के) मन में, शरीर में मेहरवान,दयाल अकाल-पुरख मेहर की निगाह करके आ बसता है। यह जीवात्मा, यह शरीर, यह धन सब कुछ उस परमात्मा का ही दिया हुआ है, मैं सदा ही उस के सदके जाता हूँ।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मिलिआ कदे न विछुड़ै जो मेलिआ करतारि ॥ दासा के बंधन कटिआ साचै सिरजणहारि ॥ भूला मारगि पाइओनु गुण अवगुण न बीचारि ॥ नानक तिसु सरणागती जि सगल घटा आधारु ॥४॥१८॥८८॥
मूलम्
मिलिआ कदे न विछुड़ै जो मेलिआ करतारि ॥ दासा के बंधन कटिआ साचै सिरजणहारि ॥ भूला मारगि पाइओनु गुण अवगुण न बीचारि ॥ नानक तिसु सरणागती जि सगल घटा आधारु ॥४॥१८॥८८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करतारि = कर्तार ने। साचै = सदा स्थिर रहने वाले ने। सिरजणहारि = निर्माता ने। मारगि = (सही) रास्ते पे। पइओनु = पाइआ उनि, उस ने डाल दिया। बीचारि = विचार के। जि = जो। घटा = घटों, शरीरों का। आधारु = आसरा।4।
अर्थ: जिस मनुष्य को कर्तार ने (अपने चरणों में) जोड़ लिया है, प्रभु चरणों में जुड़ा वह मनुष्य (कभी माया के बंधनों में नहीं फंसता, और) कभी (प्रभु से) नहीं विछुड़ता। सदा स्थिर रहने वाले निर्माता ने अपने दासों के (माया के) बंधन (सदा के वास्ते) काट दिये हुए हैं।
(अगर उसका दास पहिले) गलत रास्ते पर भी पड़ गया (था और फिर उसकी शरण आया है तो) उस प्रभु ने उस के (पहले) गुण-अवगुण ना विचार के उसे सही राह पे डाल दिया है। हे नानक! उस प्रभु की शरण पड़, जो सारे शरीरों का (जीवों का) आसरा है।4।18।88।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ रसना सचा सिमरीऐ मनु तनु निरमलु होइ ॥ मात पिता साक अगले तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ मिहर करे जे आपणी चसा न विसरै सोइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ रसना सचा सिमरीऐ मनु तनु निरमलु होइ ॥ मात पिता साक अगले तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ मिहर करे जे आपणी चसा न विसरै सोइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रसना = जीभ (साथ)। सचा = सदा स्थिर रहने वाला रमात्मा। होइ = हो जाता है। अगले = बहुत। तिसु बिनु = उस (परमात्मा) के बिना। चसा = रत्ती भर समय के लिए भी। सोइ = वह प्रभु।1।
अर्थ: (हे भाई!) जीभ से सदा कायम रहने वाले परमात्मा का स्मरण करना चाहिए। (नाम जपने की इनायत से) मन पवित्र हो जाता है, शरीर पवित्र हो जाता है। (जगत में) माता-पिता (आदि) साक-संबंधी होते हैं। पर उस परमात्मा के बिना और कोई (सदा साथ निभने वाला संबन्धी) नहीं होता। (स्मरण भी उसकी मेहर से ही हो सकता है), अगर वह प्रभु अपनी मेहर करे, तो वह (जीव को) रत्ती भर समय के लिए भी नहीं भूलता।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे साचा सेवि जिचरु सासु ॥ बिनु सचे सभ कूड़ु है अंते होइ बिनासु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे साचा सेवि जिचरु सासु ॥ बिनु सचे सभ कूड़ु है अंते होइ बिनासु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिचरु = जितना समय भी। कूड़ु = झूठा परपंच। अंतै = आखिर को।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! जितने समय तक (तेरे शरीर में) सांस (आता) है (उतने समय तक) सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का स्मरण कर। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के अलावाऔर सारा झूठा परपंच है, ये आखिर को नाश हो जाने वाला है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साहिबु मेरा निरमला तिसु बिनु रहणु न जाइ ॥ मेरै मनि तनि भुख अति अगली कोई आणि मिलावै माइ ॥ चारे कुंडा भालीआ सह बिनु अवरु न जाइ ॥२॥
मूलम्
साहिबु मेरा निरमला तिसु बिनु रहणु न जाइ ॥ मेरै मनि तनि भुख अति अगली कोई आणि मिलावै माइ ॥ चारे कुंडा भालीआ सह बिनु अवरु न जाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साहिबु = मालक। रहणु न जाइ = रहा नहीं जा सकता, धरवास नहीं आती। मनि = मन में। अगली = ज्यादा, बहुत। आणि = ले आ के। माइ = हे मां! स्ह बिनु = पति (प्रभु) के बिना। जाइ = (आसरे की) जगह, आसरा।2।
अर्थ: हे (मेरी) मां! मेरा मालिक प्रभु पवित्र स्वरूप है। उसके स्मरण के बिना मुझसे रहा नहीं जा सकता। (उसके दीदार के वास्ते) मेरे मन में, मेरे तन में बहुत ही ज्यादा तड़प है। (हे मां! मेरे अंदर तड़प है कि) कोई (गुरमुख) उसे ला के मुझसे मिला दे। मैंने चारों दिशाऐ ढूंढ के देख ली हैं, खसम-पति के बिना मेरा कोई आसरा नहीं (सूझता)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तिसु आगै अरदासि करि जो मेले करतारु ॥ सतिगुरु दाता नाम का पूरा जिसु भंडारु ॥ सदा सदा सालाहीऐ अंतु न पारावारु ॥३॥
मूलम्
तिसु आगै अरदासि करि जो मेले करतारु ॥ सतिगुरु दाता नाम का पूरा जिसु भंडारु ॥ सदा सदा सालाहीऐ अंतु न पारावारु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तिसु आगै = उस (गुरु) के आगे। पूरा = अमुक। भंडारु = खजाना। पारावारु = पार+अवार, उस पार इस पार का किनारा।3।
अर्थ: (हे मेरे मन!) तू उस गुरु के दर पे अरदास कर, जो कर्तार (को) मिला सकता है। गुरु नाम (की दात) देने वाला है, उस (गुरु) का (नाम का) खजाना कभी ना खत्म होने वाला है। (गुरु की शरण पड़ के ही) सदा उस परमात्मा की महिमा करनी चाहिए जिसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जिसके गुणों का इस पार उस पार का किनारा नहीं ढूंढा जा सकता।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
परवदगारु सालाहीऐ जिस दे चलत अनेक ॥ सदा सदा आराधीऐ एहा मति विसेख ॥ मनि तनि मिठा तिसु लगै जिसु मसतकि नानक लेख ॥४॥१९॥८९॥
मूलम्
परवदगारु सालाहीऐ जिस दे चलत अनेक ॥ सदा सदा आराधीऐ एहा मति विसेख ॥ मनि तनि मिठा तिसु लगै जिसु मसतकि नानक लेख ॥४॥१९॥८९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: परवदगारु = पालने वाला। चलत = चरित्र, चोज, चमत्कार। विसेख = विशेष, खास। जिसु मसतकि = जिस के माथे पे।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जिसु’ और ‘जिस’ में फर्क याद रखने योग्य है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (हे भाई! गुरु की शरण पड़ के ही) उस पालनहार परमात्मा की महिमा करनी चाहिए जिसके अनेक चमत्कार (दिखाई दे रहे हैं)। उसका नाम सदा ही स्मरणा चाहिए, यही सबसे उत्तम अक्ल है।
(पर, जीव के भी क्या बस?) हे नानक! जिस मनुष्य के माथे पर (सौभाग्य का) लेख (अंकुरित हो आए), उस को (परमात्मा) मन में, हृदय में प्यारा लगता है।4।19।89।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ संत जनहु मिलि भाईहो सचा नामु समालि ॥ तोसा बंधहु जीअ का ऐथै ओथै नालि ॥ गुर पूरे ते पाईऐ अपणी नदरि निहालि ॥ करमि परापति तिसु होवै जिस नो होइ दइआलु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ संत जनहु मिलि भाईहो सचा नामु समालि ॥ तोसा बंधहु जीअ का ऐथै ओथै नालि ॥ गुर पूरे ते पाईऐ अपणी नदरि निहालि ॥ करमि परापति तिसु होवै जिस नो होइ दइआलु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: संत जनहु = हे संत जनों! मिलि = (साधु-संगत में) मिल के। भाईहो = हे भाईयो! सचा = सदा स्थिर। समालि = संभाल के, हृदय में टिका के। तोसा = (जीवन सफर का) खर्च। बंधहु = एकत्र करो। जीअ का = जीवात्मा वास्ते। ऐथै ओथै = इस लोक में परलोक में। ते = से। निहालि = निहाले, देखता है। करमि = बख्शिश के द्वारा। जिस नो = जिस का।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जिस नो’ में ‘जिसु’ में से संबंधक के कारन ‘ु’ मात्रा हट गई है; देखें ‘गुरबाणी व्याकरण’।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे संत जनों! (साधु संगति में) मिल के सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम हृदय में बसा के अपनी जीवात्मा के वास्ते (जीवन सफर का) खजाना एकत्र करो। यह नाम रूप सफर खर्च इस लोक में और परलोक में (जीवात्मा के साथ) निभता है। (जब प्रभु) अपनी मेहर की निगाह से देखता है (तब ये नाम खजाना) पूरे गुरु से मिलता है। प्रभु की मेहर से यह उस मनुष्य को प्राप्त होता है जिस पे प्रभु दयाल होता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन गुर जेवडु अवरु न कोइ ॥ दूजा थाउ न को सुझै गुर मेले सचु सोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन गुर जेवडु अवरु न कोइ ॥ दूजा थाउ न को सुझै गुर मेले सचु सोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मन = हे मन! जेवडु = जितना बड़ा। गुर मेले = गुरु मिलाता है। सोइ = वही।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! गुरु जितना बड़ा (ऊँचे जीवन वाला जगत में) और कोई नहीं है। (गुरु के बिना मुझे) और कोई दूसरा आसरा नहीं दिखाई देता। (पर) वह सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा खुद ही गुरु से मिलाता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सगल पदारथ तिसु मिले जिनि गुरु डिठा जाइ ॥ गुर चरणी जिन मनु लगा से वडभागी माइ ॥ गुरु दाता समरथु गुरु गुरु सभ महि रहिआ समाइ ॥ गुरु परमेसरु पारब्रहमु गुरु डुबदा लए तराइ ॥२॥
मूलम्
सगल पदारथ तिसु मिले जिनि गुरु डिठा जाइ ॥ गुर चरणी जिन मनु लगा से वडभागी माइ ॥ गुरु दाता समरथु गुरु गुरु सभ महि रहिआ समाइ ॥ गुरु परमेसरु पारब्रहमु गुरु डुबदा लए तराइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सगल = सारे। जिनि = जिस ने। जाइ = जा के। माइ = हे मां।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: लफ्ज़ ‘जिन’ बहुवचन, ‘जिनि’ एकवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जिस मनुष्य ने जा के गुरु का दर्शन किया है, उसे सारे (कीमती) पदार्थ मिल गए (समझो)। हे माँ! जिस मनुष्यों का मन गुरु के चरणों में जुडता है, वह बड़े भागयशाली हैं। गुरु (जो उस परमात्मा का रूप है) सभ दातें देने वाला है जो सभ ताकतों का मालिक है जो सभ जीवों में व्यापक है। गुरु परमेश्वर (का रूप) है। गुरु पारब्रह्म (का रूप) है। गुरु (संसार समुंदर में) डूबते जीव को पार लंघा देता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कितु मुखि गुरु सालाहीऐ करण कारण समरथु ॥ से मथे निहचल रहे जिन गुरि धारिआ हथु ॥ गुरि अम्रित नामु पीआलिआ जनम मरन का पथु ॥ गुरु परमेसरु सेविआ भै भंजनु दुख लथु ॥३॥
मूलम्
कितु मुखि गुरु सालाहीऐ करण कारण समरथु ॥ से मथे निहचल रहे जिन गुरि धारिआ हथु ॥ गुरि अम्रित नामु पीआलिआ जनम मरन का पथु ॥ गुरु परमेसरु सेविआ भै भंजनु दुख लथु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कितु = किस से? मुखि = मुंह से। कितु मुखि = किस मुंह से? करण = संसार। समरथु = ताकत वाला। निहचल = अडोल, सदा संतुलित। गुरि = गुरु ने। पथु = परहेज। भै भंजन = सारे डर दूर करने वाला। दुख लथु = सारे दुख उतार देने वाला।3।
अर्थ: किस मुंह से गुरु की स्तुति की जाए? गुरु (उस प्रभु का रूप है जो) जगत को पैदा करने की ताकत रखता है। वह माथे (गुरु चरणों में) सदा टिके रहते हैं, जिस पे गुरु ने (अपनी मेहर का) हाथ रखा है।
(परमात्मा का नाम) जनम-मरण के चक्कर रूप रोग का परहेज है। आत्मिक जीवन देने वाला यह नाम जल जिस (भाग्यशालियों) को गुरु ने पिलाया है वह परमेश्वर के रूप गुरु को, हमारे डर दूर करने वाले गुरु को, सारे दुख नाश करने वाले गुरु को अपने हृदय में बसाते है।3।
[[0050]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतिगुरु गहिर गभीरु है सुख सागरु अघखंडु ॥ जिनि गुरु सेविआ आपणा जमदूत न लागै डंडु ॥ गुर नालि तुलि न लगई खोजि डिठा ब्रहमंडु ॥ नामु निधानु सतिगुरि दीआ सुखु नानक मन महि मंडु ॥४॥२०॥९०॥
मूलम्
सतिगुरु गहिर गभीरु है सुख सागरु अघखंडु ॥ जिनि गुरु सेविआ आपणा जमदूत न लागै डंडु ॥ गुर नालि तुलि न लगई खोजि डिठा ब्रहमंडु ॥ नामु निधानु सतिगुरि दीआ सुखु नानक मन महि मंडु ॥४॥२०॥९०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गहिर = गहरा। गंभीरु = गंभीर, बड़े जिगरे वाला। सागरु = समुंदर। अघ खंडु = पापों को नाश करने वाला। डंडु = डंडा, सजा। तुलि = बराबर। ब्रहमंडु = जहान, संसार। निधानु = खजाना। सतिगुरि = सतिगुरु ने। मंडु = धरा है, रखा है, निहित किया है।4।
अर्थ: स्तिगुरू (मानों, एक) गहरा (समुंदर) है, गुरु बड़े जिगरे वाला है, गुरु सारे सुखों का समुंदर है। गुरु पापों का नाश करने वाला है। जिस मनुष्य ने अपने गुरु की सेवा की है यमदूतों का डंडा (उस के सिर पे) नहीं बजता। मैंने सारा सेसार ढूंढ के देख लियाहै, कोई भी गुरु के बराबर का नहीं है। हे नानक! सतिगुरु ने जिस मनुष्य को परमातमा का नाम खजाना दिया हे, उसने आत्मिक आनन्द (सदा के लिए) अपने मन में पिरो लिया है।4।20।90।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ मिठा करि कै खाइआ कउड़ा उपजिआ सादु ॥ भाई मीत सुरिद कीए बिखिआ रचिआ बादु ॥ जांदे बिलम न होवई विणु नावै बिसमादु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ मिठा करि कै खाइआ कउड़ा उपजिआ सादु ॥ भाई मीत सुरिद कीए बिखिआ रचिआ बादु ॥ जांदे बिलम न होवई विणु नावै बिसमादु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: उपजिआ = पैदा हुआ। सादु = स्वाद, नतीजा। सुरदि = सुहृद, मित्र। बिखिआ = धन संपदा। बादु = झगड़ा। बिलम = देर। होवई = हुए। बिसमादु = आश्चर्य।1।
अर्थ: जीव दुनिया के पदार्तों को स्वाद-दार समझ के इस्तेमाल करता है। पर, इन (भोगों) का स्वाद (अंत में) कड़वा (दुखदाई) साबित होता है (विकार और रोग पैदा हो जाते हैं)। मनुष्य (जगत में) भाई-मित्र-दोस्त आदि बनाता है और (यह) माया का झगड़ा खड़ा किये रखता है। पर आश्चर्य की बात यह है कि परमात्मा के नाम के बिना किसी भी चीज के नाश होने में समय नहीं लगता।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे मन सतगुर की सेवा लागु ॥ जो दीसै सो विणसणा मन की मति तिआगु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे मन सतगुर की सेवा लागु ॥ जो दीसै सो विणसणा मन की मति तिआगु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: विणसणा = नाशवान।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! गुरु की (बताई हुई) सेवा में व्यस्त रह। (हे भाई!) अपने मन के पीछे चलना छोड़ दे और (दुनिया के पदार्तों का मोह त्याग, क्योंकि) जो कुछ दिख रहा है सभ नाशवान है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिउ कूकरु हरकाइआ धावै दह दिस जाइ ॥ लोभी जंतु न जाणई भखु अभखु सभ खाइ ॥ काम क्रोध मदि बिआपिआ फिरि फिरि जोनी पाइ ॥२॥
मूलम्
जिउ कूकरु हरकाइआ धावै दह दिस जाइ ॥ लोभी जंतु न जाणई भखु अभखु सभ खाइ ॥ काम क्रोध मदि बिआपिआ फिरि फिरि जोनी पाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कूकर = कुक्ता। हरकाइआ = हलकाया हुआ। दह = दस। दिस = दिशाएं। जाइ = जाता है। अभखु = जो चीज खाने के लायक नहीं। मदि = नशे में। बिआपिआ = व्याप्त, फंसा हुआ।2।
अर्थ: जैसे हलकाया कुक्ता दौड़ता है और हर तरफ को दौड़ता है। (उसी तरह) लोभी जीव को भी कुछ नहीं सूझता, अच्छी-बुरी हरेक चीज खा लेता है। काम के और क्रोध के नशे में फंसा हुआ मनुष्य मुड़-मुड़ योनियों में पड़ता रहता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
माइआ जालु पसारिआ भीतरि चोग बणाइ ॥ त्रिसना पंखी फासिआ निकसु न पाए माइ ॥ जिनि कीता तिसहि न जाणई फिरि फिरि आवै जाइ ॥३॥
मूलम्
माइआ जालु पसारिआ भीतरि चोग बणाइ ॥ त्रिसना पंखी फासिआ निकसु न पाए माइ ॥ जिनि कीता तिसहि न जाणई फिरि फिरि आवै जाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पसारिआ = बिखरा हुआ। भीतरि = में। फासिआ = फसाया हुआ। निकसु = निकास, खलासी। माइ = हे मां! जिनि = जिस (परमात्मा) ने।3।
अर्थ: माया के विषयों का चोगा जाल में तैयार करके वह जाल बिखेरा हुआ है। माया की तृष्णा ने जीव पक्षी को (उस जाल में) फंसाया हुआ है। हे (मेरी) मां! (जीव उस जाल में से) छुटकारा प्राप्त नहीं कर सकता, (क्योंकि) जिस ईश्वर ने (यह सभ कुछ) पैदा किया है उस से सांझ नहीं डालता।, और बार बार पैदा होता मरता रहता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अनिक प्रकारी मोहिआ बहु बिधि इहु संसारु ॥ जिस नो रखै सो रहै सम्रिथु पुरखु अपारु ॥ हरि जन हरि लिव उधरे नानक सद बलिहारु ॥४॥२१॥९१॥
मूलम्
अनिक प्रकारी मोहिआ बहु बिधि इहु संसारु ॥ जिस नो रखै सो रहै सम्रिथु पुरखु अपारु ॥ हरि जन हरि लिव उधरे नानक सद बलिहारु ॥४॥२१॥९१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बहु बिधि = बहुत तरीकों से। संम्रिथु = ताकत वाला। अपारु = बेअंत। उधरे = बच गए।4।
अर्थ: इस जगत को (माया के) अनेक किस्म के रूपों रंगों में कई तरीकों से मोह रखा है। इस में से वही बच सकता है, जिसको सर्व समर्थ बेअंत अकाल-पुरख खुद बचाए। (परमात्मा की मेहर से) परमात्मा के भक्त ही परमात्मा (के चरणों) में तवज्जो जोड़ के बचते हैं। हे नानक! तू सदा उस परमात्मा से सदके रह।4।25।91।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ घरु २ ॥ गोइलि आइआ गोइली किआ तिसु ड्मफु पसारु ॥ मुहलति पुंनी चलणा तूं समलु घर बारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ घरु २ ॥ गोइलि आइआ गोइली किआ तिसु ड्मफु पसारु ॥ मुहलति पुंनी चलणा तूं समलु घर बारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गोइलि = नदियों के किनारे घास वाली वह हरियाली जगह जहां लोग पशु चराने ले जाते हैं। गोइलि = चरागाह में। गोइली = मवेशियों का मालिक ग्वाला। तिसु = उस (गोइली) को। डंफु = (अपने किसी बड़प्पन का) दिखावा, ढंढोरा। पसारु = खिलारा। मुहलति = मिला हुआ समय। संमलु = संभाल। घर बारु = घर घाट।1।
अर्थ: (मुसीबत के समय थोड़े समय के लिए) ग्वाला (अपने माल-मवेशी ले के) किसी चरने वाली जगह पे चला जाता है, वहां उसे अपने किसी बड़ेपन का दिखावा-पसारा शोभा नहीं देता। (वैसे ही, हे जीव! जब तुम्हारा यहां जगत में रहने के लिए) मिला हुआ समय समाप्त हो जाएगा, तू (यहां से) चल पड़ेगा। (इसलिए, अपना असली) घर घाट संभाल (याद रख)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि गुण गाउ मना सतिगुरु सेवि पिआरि ॥ किआ थोड़ड़ी बात गुमानु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
हरि गुण गाउ मना सतिगुरु सेवि पिआरि ॥ किआ थोड़ड़ी बात गुमानु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पिआरि = प्यार से। बात = बातें। गुमान = अहम्।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! परमात्मा के गुण गाया कर। प्यार से गुरु की (बताई) सेवा करा कर। थोड़ी जितनी बात के पीछे (इस थोड़े से जीवन समय के वास्ते) क्यूँ गुमान करता है? 1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जैसे रैणि पराहुणे उठि चलसहि परभाति ॥ किआ तूं रता गिरसत सिउ सभ फुला की बागाति ॥२॥
मूलम्
जैसे रैणि पराहुणे उठि चलसहि परभाति ॥ किआ तूं रता गिरसत सिउ सभ फुला की बागाति ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रैणि = रात। उठि = उठ के। चलसहि = चले जाएंगे। सिउ = साथ। बागाति = बगीची।2।
अर्थ: जैसे रात के समय (किसी के घर आए हुए) मेहमान दिन चढ़ने पे (वहां से उठ के) चल पड़ेंगे। (उसी तरह, हे जीव! जिंदगी की रात खत्म होने पर तू भी इस जगत से चल पड़ेगा)। तू इस गृहस्थ से (बाग परिवार से) क्यूँ मस्त हुआ पड़ा है? यह सारी फूलों की बगीची के समान है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरी मेरी किआ करहि जिनि दीआ सो प्रभु लोड़ि ॥ सरपर उठी चलणा छडि जासी लख करोड़ि ॥३॥
मूलम्
मेरी मेरी किआ करहि जिनि दीआ सो प्रभु लोड़ि ॥ सरपर उठी चलणा छडि जासी लख करोड़ि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिनि = जिस (परमात्मा) ने। लोड़ि = ढूंढ। सरपर = जरूर। जासी = जाएगा।3।
अर्थ: यह चीज मेरी है, यह जयदाद मेरी है, क्यूं ऐसा गुमान कर रहा है? जिस परमात्मा ने यह सभ कुछ दिया है, उसको ढूंढ। यहां से जरूर कूच कर जाना है। (लाखों करोड़ों का मालिक भी) लाखों करोड़ों रूपए छोड़ के चला जाएगा।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
लख चउरासीह भ्रमतिआ दुलभ जनमु पाइओइ ॥ नानक नामु समालि तूं सो दिनु नेड़ा आइओइ ॥४॥२२॥९२॥
मूलम्
लख चउरासीह भ्रमतिआ दुलभ जनमु पाइओइ ॥ नानक नामु समालि तूं सो दिनु नेड़ा आइओइ ॥४॥२२॥९२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भ्रमतिआं = भटकते हुए। दुलभ = बड़ी मुश्किल से मिला हुआ। समालि = संभाल, हृदय में बसा।4।
अर्थ: (हे भाई!) चौरासी लाख जूनियों में भटक भटक के अब ये मानव जन्म बड़ी मुश्किल से मिला है।
हे नानक! (परमात्मा का) नाम हृदय में बसा, वह दिन नजदीक आ रहा है (जब यहां से कूच करना है)।4।22।92।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ तिचरु वसहि सुहेलड़ी जिचरु साथी नालि ॥ जा साथी उठी चलिआ ता धन खाकू रालि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ तिचरु वसहि सुहेलड़ी जिचरु साथी नालि ॥ जा साथी उठी चलिआ ता धन खाकू रालि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तिचरु = उतने समय तक। वसहि = तू बसेगी। सुहेलड़ी = सरल। साथी = (जीवात्मा) साथी। जा = जग। धन = हे धन! हे काया! खाकू रालि = मिट्टी में मिल गई।1।
अर्थ: हे काया! तू उतना समय ही सुखी बसेगी, जितना समय (जीवात्मा तेरा) साथी (तेरे) साथ है। जब (तेरा) साथी (जीवात्मा) उठ के चल पड़ेगा, तब, हे काया! तू मिट्टी में मिल जाएगी।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनि बैरागु भइआ दरसनु देखणै का चाउ ॥ धंनु सु तेरा थानु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मनि बैरागु भइआ दरसनु देखणै का चाउ ॥ धंनु सु तेरा थानु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनि = मन में। बैरागु = प्रेम। धंनु = भाग्यशाली। सु = वह (शरीर)। थानु = निवास।1। रहाउ।
अर्थ: (हे हरि!) वह शरीर भाग्यशाली है जिसमें तेरा निवास है (जहां तुझे याद किया जा रहा है)। (वह मनुष्य भाग्यवान है जिसके) मन में तेरा प्यार पैदा हो गया है। जिसके मन में तेरे दर्शन की तड़प पैदा हुई है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिचरु वसिआ कंतु घरि जीउ जीउ सभि कहाति ॥ जा उठी चलसी कंतड़ा ता कोइ न पुछै तेरी बात ॥२॥
मूलम्
जिचरु वसिआ कंतु घरि जीउ जीउ सभि कहाति ॥ जा उठी चलसी कंतड़ा ता कोइ न पुछै तेरी बात ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: घरि = घर में। कंतु = पति, जीवात्मा। जीउ जीउ = जी जी, आदर के वचन। उठी = उठ के। चलसी = चला जाएगा। कंतड़ा = विचारा कंत, विचारी जीवात्मा।2।
अर्थ: हे काया! जितने समय तेरा पति (जीवात्मा तेरे) घर में बसता है, सभी लोग तुम्हें ‘जी’ ‘जी’ करते हैं (सारे तेरा आदर करते हैं)। पर जब निमाणी कंत (जीवात्मा) उठ के चल पड़ेगा, तब कोई भी तेरी बात नहीं पूछता।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पेईअड़ै सहु सेवि तूं साहुरड़ै सुखि वसु ॥ गुर मिलि चजु अचारु सिखु तुधु कदे न लगै दुखु ॥३॥
मूलम्
पेईअड़ै सहु सेवि तूं साहुरड़ै सुखि वसु ॥ गुर मिलि चजु अचारु सिखु तुधु कदे न लगै दुखु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पेईअड़ै = पिता के घर में, इस लोक में। सहु = पति। सेवि = स्मरण कर। साहुरड़ै = ससुराल में, परलोक में। सुखि = सुख से। गुर मिलि = गुरु से मिल के। चजु = काम करने का तरीका, जीवन विधि। आचारु = अच्छा चलन। सिखु = सीख।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘सिखु’ शब्द क्रिया है, हुकमी भविष्यत, मध्यम पुरख, एकवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (हे जीवात्मा! जब तक तू,) पेके घर में (संसार में है, तब तक) पति प्रभु को सिमरती रह। ससुराल में (परलोक में जाकर) तू सुखी बसेगी। (हे जीवात्मा!) गुरु को मिल के जीवन विधि सीख, अच्छा आचरण बनाना सीख, तुझे कभी कोई दुख नहीं व्यापेगा।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभना साहुरै वंञणा सभि मुकलावणहार ॥ नानक धंनु सोहागणी जिन सह नालि पिआरु ॥४॥२३॥९३॥
मूलम्
सभना साहुरै वंञणा सभि मुकलावणहार ॥ नानक धंनु सोहागणी जिन सह नालि पिआरु ॥४॥२३॥९३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वंञणा = जाना। सभि = सारी जीव स्त्रीयां। सह नालि = पति के साथ।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘सहु’ और ‘सह’ में फर्क स्माणीय हैं।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: सभी जीव-स्त्रीयों ने ससुराल (परलोक में अपनी अपनी बारी से) चले जाना है, सभी ने मुकलावे जाना है। हे नानक! वह वह जीवस्त्री सुहाग-भाग वाली है जिनका पति प्रभु से प्यार (बन गया) है।4।23।93।
[[0051]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ घरु ६ ॥ करण कारण एकु ओही जिनि कीआ आकारु ॥ तिसहि धिआवहु मन मेरे सरब को आधारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ घरु ६ ॥ करण कारण एकु ओही जिनि कीआ आकारु ॥ तिसहि धिआवहु मन मेरे सरब को आधारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करण = जगत। कारण = मूल। जिनि = जिस ने। आकारु = दिखता जगत। के = का। आधारु = आसरा।1।
अर्थ: हे मेरे मन! जिस परमात्मा ने यह दिखाई देता जगत बनाया है, सिर्फ वही सृष्टि का रचनहार है, और जीवों का रचनहार है, तथा जीवों का आसरा है। उसी को सदा स्मरण करते रहो।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर के चरन मन महि धिआइ ॥ छोडि सगल सिआणपा साचि सबदि लिव लाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
गुर के चरन मन महि धिआइ ॥ छोडि सगल सिआणपा साचि सबदि लिव लाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साचि = सदा स्थ्रि रहने वाले परमात्मा में। शबदि = (गुरु के) शब्द से।1। रहाउ।
अर्थ: (हे भाई!) गुरु के चरण अपने मन में टिका के रख (भाव, अहम् को छोड़ के गुरु में श्रद्धा बना)। (अपनी) सारी चतुराईयां छोड़ दे। गुरु के शब्द द्वारा सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा में तवज्जो जोड़।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दुखु कलेसु न भउ बिआपै गुर मंत्रु हिरदै होइ ॥ कोटि जतना करि रहे गुर बिनु तरिओ न कोइ ॥२॥
मूलम्
दुखु कलेसु न भउ बिआपै गुर मंत्रु हिरदै होइ ॥ कोटि जतना करि रहे गुर बिनु तरिओ न कोइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: न बिआपै = दबाव नहीं डालता। गुर मंत्र = गुरु का उपदेश। कोटि = करोड़ों।2।
अर्थ: जिस मनुष्य के हृदय में गुरु का उपदेश (सदा) बसता है। उसको कोई दुख कोई कष्ट कोई डर सता नहीं सकता। लोग करोडों (और-और) यत्न करके थक जाते हैं, पर गुरु की शरण के बिनां (उन दुख-कष्टों से) कोई मनुष्य पार नहीं लांघ सकता।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
देखि दरसनु मनु साधारै पाप सगले जाहि ॥ हउ तिन कै बलिहारणै जि गुर की पैरी पाहि ॥३॥
मूलम्
देखि दरसनु मनु साधारै पाप सगले जाहि ॥ हउ तिन कै बलिहारणै जि गुर की पैरी पाहि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साधारै = आधर सहित होता है। पाहि = पहने जाते हैं।3।
अर्थ: गुरु का दर्शन करके जिस मनुष्य का मन (गुरु का) आसरा पकड़ लेता है, उसके सारे (पहले किए) पाप नाश हो जाते हैं। मैं उन (भाग्यशाली) लोगों से कुर्बान जाता हूँ जो गुरु के चरणों में गिर पड़ते हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साधसंगति मनि वसै साचु हरि का नाउ ॥ से वडभागी नानका जिना मनि इहु भाउ ॥४॥२४॥९४॥
मूलम्
साधसंगति मनि वसै साचु हरि का नाउ ॥ से वडभागी नानका जिना मनि इहु भाउ ॥४॥२४॥९४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनि = मन में। साचु = सदा स्थिर रहने वाला। भाउ = प्रेम।4।
अर्थ: साधु-संगत में रहने से सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का नाम मन में बस जाता है। हे नानक! वह लोग भाग्यशाली हैं, जिनके मन में (साधु संगति में टिकने का) यह प्रेम है।4।24।94।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ संचि हरि धनु पूजि सतिगुरु छोडि सगल विकार ॥ जिनि तूं साजि सवारिआ हरि सिमरि होइ उधारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ संचि हरि धनु पूजि सतिगुरु छोडि सगल विकार ॥ जिनि तूं साजि सवारिआ हरि सिमरि होइ उधारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: संचि = एकत्र कर। पूजि = आदर सत्कार से हृदय में बसा। जिनि = जिस (परमात्मा) ने। तूं = तूझे। साजि = पैदा कर के। सवारिआ = सुंदर बनाया। उधारु = (विकारों से) बचाव।1।
अर्थ: (हे भाई!) परमात्मा का नाम धन इकट्ठा कर। अपने गुरु का आदर सत्कार हृदय में बसा (और इस तरह) सारे विकार छोड़। जिस परमात्मा ने तुझे पैदा करके सुंदर बनाया है, उसका स्मरण कर, (विकारों से तेरा) बचाव हो जाएगा।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जपि मन नामु एकु अपारु ॥ प्रान मनु तनु जिनहि दीआ रिदे का आधारु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
जपि मन नामु एकु अपारु ॥ प्रान मनु तनु जिनहि दीआ रिदे का आधारु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अपारु = बेअंत। जिनहि = जिसने। रिदे का = हृदय का। आधारु = आसरा।1। रहाउ।
अर्थ: अर्थ- हे मन! उस परमात्मा का नाम जप। जो एक खुद ही खुद है और जो बेअंत है। जिसने ये जीवात्मा दी है मन दिया है और शरीर दिया है, जो सभ जीवों के हृदय का आसरा है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कामि क्रोधि अहंकारि माते विआपिआ संसारु ॥ पउ संत सरणी लागु चरणी मिटै दूखु अंधारु ॥२॥
मूलम्
कामि क्रोधि अहंकारि माते विआपिआ संसारु ॥ पउ संत सरणी लागु चरणी मिटै दूखु अंधारु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कामि = काम में। माते = मस्त। विआपिआ = जोर डाले रखता है। संसारु = जगत (का मोह)। अंधारु = घोर अंधकार।2।
अर्थ: जिस लोगों पे जगत का मोह दबाव डाले रखता है, वह काम में, क्रोध में, अहंकार में मस्त रहते हैं। (इन विकारों से बचने के लिए, हे भाई!) गुरु की शरण पड़, गुरु की चरणी लग (गुरु का आसरा लेने से अज्ञानता का) घोर अंधकार रूप दुख मिट जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतु संतोखु दइआ कमावै एह करणी सार ॥ आपु छोडि सभ होइ रेणा जिसु देइ प्रभु निरंकारु ॥३॥
मूलम्
सतु संतोखु दइआ कमावै एह करणी सार ॥ आपु छोडि सभ होइ रेणा जिसु देइ प्रभु निरंकारु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सतु = दान, सेवा। सार = श्रेष्ठ। आपु = स्वैभाव। रेणा = चरणधूड़। देइ = देता है।3।
अर्थ: जिस (भाग्यशाली मनुष्य) को निरंकार प्रभु (अपने नाम की दात) देता है, वह स्वै भाव छोड़के सभ की चरण धूल बनता है। वह सेवा, संतोख व दया (की कमाई) कमाता है, और यही है श्रेष्ठ करणी।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जो दीसै सो सगल तूंहै पसरिआ पासारु ॥ कहु नानक गुरि भरमु काटिआ सगल ब्रहम बीचारु ॥४॥२५॥९५॥
मूलम्
जो दीसै सो सगल तूंहै पसरिआ पासारु ॥ कहु नानक गुरि भरमु काटिआ सगल ब्रहम बीचारु ॥४॥२५॥९५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पसरिआ = बिखरा हुआ। गुरि = गुरु ने। बीचारु = सोच।4।
अर्थ: हे नानक! कह: गुरु ने जिस मनुष्य के मन की भटकन दूर कर दी है, उस को, हे प्रभु! जो ये जगत दिखाई देता है सारा तेरा ही रूप दिखता है। तेरा ही पसारा हुआ ये पसारा दिखता है। उसे यही सोच बनी रहती है कि हर जगह तू ही तू है।4।25।95।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ दुक्रित सुक्रित मंधे संसारु सगलाणा ॥ दुहहूं ते रहत भगतु है कोई विरला जाणा ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ दुक्रित सुक्रित मंधे संसारु सगलाणा ॥ दुहहूं ते रहत भगतु है कोई विरला जाणा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दुक्रित = (शास्त्रों अनुसार नीयत) बुरे काम। सुक्रित = (नीयत) अच्छे काम। मंधे = बीच। सगलाणा = सारा। जाणा = जाना।1।
अर्थ: (हे भाई!) सारा जगत (शास्त्रों के अनुसार नीयत) बुरे कर्मों और अच्छे कर्मों (की विचार) में ही डूबा हुआ है। परमात्मा की भक्ति करने वाला मनुष्य इन दोनों विचारों से ही मुक्त रहता है (कि शास्त्रों अनुसार ‘दुक्रित’ कौन से हैं और ‘सुक्रित’ कौन से हैं), पर ऐसा कोई विरला ही मिलता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ठाकुरु सरबे समाणा ॥ किआ कहउ सुणउ सुआमी तूं वड पुरखु सुजाणा ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
ठाकुरु सरबे समाणा ॥ किआ कहउ सुणउ सुआमी तूं वड पुरखु सुजाणा ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ठाकुरु = पालणहार। सरबे = सभ जीवों मे। किआ कहउ = मैं क्या कहूँ? किआ सुणउ = मैं क्या सुनूँ? सुआमी = हे स्वामी। सुजाणा = सबके दिल की जानने वाला।1। रहाउ।
अर्थ: हे स्वामी! तू सब जीवों में समाया हुआ है और सबको पालनेवाला है। तू सबसे बड़ा है, सभ में व्यापक है। सबके दिल की जानने वाला है। (हे स्वामी! इससे ज्यादा तेरे बाबत) मैं (क्या) कहूँ और क्या सुनूँ?।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मान अभिमान मंधे सो सेवकु नाही ॥ तत समदरसी संतहु कोई कोटि मंधाही ॥२॥
मूलम्
मान अभिमान मंधे सो सेवकु नाही ॥ तत समदरसी संतहु कोई कोटि मंधाही ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मान = आदर। अभिमान = अपमान, निरादर। तत = मूल-प्रभु। तत दरसी = हर जगह मूल प्रभु को देखने वाला। सम दरसी = सभी को एक जैसा देखने वाला। कोटि = करोड़ों। मंधाही = में।2।
अर्थ: हे संत जनों! हर जगह जगत के मूल-प्रभु को देखने वाला और सभी को एक-सी प्रेम निगाह से देखने वाला करोड़ों में कोई एक होता है। जो मनुष्य (जगत में मिलते) आदर या निरादरी (के अहसास) में फंसा रहता है, वह परमात्मा का असल सेवक नहीं (कहला सकता)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कहन कहावन इहु कीरति करला ॥ कथन कहन ते मुकता गुरमुखि कोई विरला ॥३॥
मूलम्
कहन कहावन इहु कीरति करला ॥ कथन कहन ते मुकता गुरमुखि कोई विरला ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कीरति = शोभा, स्तुति। करला = रास्ता। ते = से। मुकता = आजाद, बचा हुआ। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ा हुआ मनुष्य।3।
अर्थ: (ज्ञान आदि की बातें निरी) कहनी या कहलानी- ये रास्ता है दुनिया से शोभा कमाने का। गुरु की शरण पड़ा हुआ कोई विरला ही मनुष्य होता है जो (ज्ञान की यह जबानी जबानी बातें) कहने से आजाद रहता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गति अविगति कछु नदरि न आइआ ॥ संतन की रेणु नानक दानु पाइआ ॥४॥२६॥९६॥
मूलम्
गति अविगति कछु नदरि न आइआ ॥ संतन की रेणु नानक दानु पाइआ ॥४॥२६॥९६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गति = मुक्ति। अविगति = मुक्ति के विपरीत हालत। रेणु = चरण धूल।4।
अर्थ: हे नानक! जिस मनुष्य ने संत जनों के चरणों कीधूड़ (का) दान प्राप्त कर लिया है, उसे इस बात की ओर ध्यानही नहीं होता कि मुक्ति क्या है और ना-मुक्ति क्या है (उसे प्रभु ही हर जगह दिखता है, प्रभु की याद ही उस का निशाना है)।4।26।96।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ घरु ७ ॥ तेरै भरोसै पिआरे मै लाड लडाइआ ॥ भूलहि चूकहि बारिक तूं हरि पिता माइआ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ घरु ७ ॥ तेरै भरोसै पिआरे मै लाड लडाइआ ॥ भूलहि चूकहि बारिक तूं हरि पिता माइआ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लाड लडाइआ = लाड करता रहा, लाडों में दिन व्यतीत करता रहा। चूकहि = चूकना। माइआ = मईया, मां।1।
अर्थ: हे प्यारे (प्रभु-पिता)! तेरे प्यार के भरोसे पे मैंने लाडों में ही दिन गुजार दिए हैं। (मुझे यकीन है कि) तू हमारा माता-पिता है, और बच्चे भूल-चूक करते ही रहते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुहेला कहनु कहावनु ॥ तेरा बिखमु भावनु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
सुहेला कहनु कहावनु ॥ तेरा बिखमु भावनु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुहेला = आसान। बिखमु = मुश्किल। भावनु = होनी को मानना।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! तेरा भाणा मानना (तेरी रजा में रहना, तेरी मर्जी में चलना) कठिन है। (पर यह) कहना और कहलाना आसान है (कि हम तेरा भाणा मानते हैं)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ माणु ताणु करउ तेरा हउ जानउ आपा ॥ सभ ही मधि सभहि ते बाहरि बेमुहताज बापा ॥२॥
मूलम्
हउ माणु ताणु करउ तेरा हउ जानउ आपा ॥ सभ ही मधि सभहि ते बाहरि बेमुहताज बापा ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हउ करउ = मैं करता हूं। जानउ आपा = मुझे अपना जानता हूं। मधि = बीच में।2।
अर्थ: हे मेरे बे-मुथाज पिता (प्रभु)! मैं तेरा (ही) मान (गर्व) करता हूं (मुझे ये फखर है कि तू मेरे सिर पर है), मैं तेरा ही आसरा रखता हूं। मैं जानता हूं कि तू मेरा अपना है। तू सभ जीवों के अंदर बसता है, और सभी से बाहर भी है (निरलेप भी है)।2।
[[0052]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
पिता हउ जानउ नाही तेरी कवन जुगता ॥ बंधन मुकतु संतहु मेरी राखै ममता ॥३॥
मूलम्
पिता हउ जानउ नाही तेरी कवन जुगता ॥ बंधन मुकतु संतहु मेरी राखै ममता ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जुगता = युक्ति, तरीका। तेरी कवन जुगता = तुझे प्रसन्न करने का कौन सा तरीका है? बंधन मुकतु = बंधनों से आजाद करने वाला। ममता = ‘मेरा’ कहने का दावा।3।
अर्थ: हे पिता प्रभु! मुझे पता नहीं कि तुझे प्रसंन्न करने का तरीका क्या है? हे संत जनों! पिता प्रभु मुझे माया के बंधनों से आजाद करने वाला है। वह मुझे अपना जानता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भए किरपाल ठाकुर रहिओ आवण जाणा ॥ गुर मिलि नानक पारब्रहमु पछाणा ॥४॥२७॥९७॥
मूलम्
भए किरपाल ठाकुर रहिओ आवण जाणा ॥ गुर मिलि नानक पारब्रहमु पछाणा ॥४॥२७॥९७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आवण जाणा = पैदा होना मरना। गुर मिलि = गुरु को मिल के।4।
अर्थ: हे नानक! पालणहार प्रभु जी जिस मनुष्य पर दया करते हैं, उसके जनम-मरन का चक्कर खत्म हो जाता है। गुरु को मिल के ही वह मनुष्य उस बेअंत परमात्मा के साथ गहरी सांझ पा लेता है।4।27।97।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ घरु १ ॥ संत जना मिलि भाईआ कटिअड़ा जमकालु ॥ सचा साहिबु मनि वुठा होआ खसमु दइआलु ॥ पूरा सतिगुरु भेटिआ बिनसिआ सभु जंजालु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ घरु १ ॥ संत जना मिलि भाईआ कटिअड़ा जमकालु ॥ सचा साहिबु मनि वुठा होआ खसमु दइआलु ॥ पूरा सतिगुरु भेटिआ बिनसिआ सभु जंजालु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मिलि = मिल के। जमकालु = मौत, मौत का डर, आत्मिक मौत का खतरा। सचा = सदा स्थिर रहने वाला। मनि = मन में। वुठा = आ बसा है। भेटिआ = मिला। सभु = सारा। जंजालु = माया के बंधन।1।
अर्थ: (जिस मनुष्य को) पूरा गुरु मिल जाता है, उसका सारा माया मोह का जाल नाश हो जाता है। संत जन भाईयों से मिल के उसकी आत्मिक मौत का खतरा दूर हो जाता है। पति परमेश्वर उस पर दयावान होता है और सदा स्थिर मालिक प्रभु उसके मन में आ बसता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे सतिगुरा हउ तुधु विटहु कुरबाणु ॥ तेरे दरसन कउ बलिहारणै तुसि दिता अम्रित नामु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे सतिगुरा हउ तुधु विटहु कुरबाणु ॥ तेरे दरसन कउ बलिहारणै तुसि दिता अम्रित नामु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हउ = मैं। तुसि = प्रसन्न हो के। अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाला।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे सतिगुरु! मैं तूझसे कुर्बान जाता हूं, मैं तेरे दर्शनों से सदके जाता हूं। तूने प्रसन्न हो के मुझे (प्रभु का) आत्मिक जीवन देने वाला नाम बख्शा है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिन तूं सेविआ भाउ करि सेई पुरख सुजान ॥ तिना पिछै छुटीऐ जिन अंदरि नामु निधानु ॥ गुर जेवडु दाता को नही जिनि दिता आतम दानु ॥२॥
मूलम्
जिन तूं सेविआ भाउ करि सेई पुरख सुजान ॥ तिना पिछै छुटीऐ जिन अंदरि नामु निधानु ॥ गुर जेवडु दाता को नही जिनि दिता आतम दानु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तूं = तुझे। भाउ = प्रेम। सुजान = सयाने। पिछै = अनुसार हो के, शरण पड़ कर। छुटीऐ = (विकारों से) बचते हैं। निधानु = खजाना। जिनि = जिस ने।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जिनि’ बहुवचन है, ‘जिन’ एकवचन है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (हे प्रभु!) जिन्होंने प्रेम से तुझे स्मरण किया है, वही सयाने मनुष्य हैं। जिस के हृदय में (तेरा) नाम खजाना बसता है। उन की ही शरन पड़ के (विकारों से बच जाते हैं)। (पर नाम की यह दात गुरु से ही मिलती है)। गुरु जितना और कोई दाता नहीं है क्योंकि उसने आत्मिक जीवन की दात दी है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आए से परवाणु हहि जिन गुरु मिलिआ सुभाइ ॥ सचे सेती रतिआ दरगह बैसणु जाइ ॥ करते हथि वडिआईआ पूरबि लिखिआ पाइ ॥३॥
मूलम्
आए से परवाणु हहि जिन गुरु मिलिआ सुभाइ ॥ सचे सेती रतिआ दरगह बैसणु जाइ ॥ करते हथि वडिआईआ पूरबि लिखिआ पाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हहि = है। सुभाइ = प्यार से। सेती = साथ। बैसणु = बैठने को। जाइ = जगह। हथि = हाथ में।3।
अर्थ: जिनको प्यार की इनायत से गुरु आ मिलता है, जगत में आए हुउ वही स्वीकार हैं। (गुरु की सहायता से) सदा स्थिर प्रभु (के नाम) में रंग के उनको परमात्मा की हजूरी में बैठने को जगह मिल जाती है। (पर यह सभ) आदर-सत्कार परमात्मा के (अपने) हाथ में हैं (जिस पे वह मेहर करता है, वह मनुष्य) पहले जनम में की गई नेक कमाई का लिखा लेख प्राप्त कर लेता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचु करता सचु करणहारु सचु साहिबु सचु टेक ॥ सचो सचु वखाणीऐ सचो बुधि बिबेक ॥ सरब निरंतरि रवि रहिआ जपि नानक जीवै एक ॥४॥२८॥९८॥
मूलम्
सचु करता सचु करणहारु सचु साहिबु सचु टेक ॥ सचो सचु वखाणीऐ सचो बुधि बिबेक ॥ सरब निरंतरि रवि रहिआ जपि नानक जीवै एक ॥४॥२८॥९८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचु = सदा स्थिर। टेक = आसरा। वखाणऐ = कहा जाता है, हर कोई कहता है। बिबेक बुधि = विवेक की बुद्धि वाला, सकारात्मक तीक्ष्ण बुद्धि वाला। जपि = जप के। एक = (उस) एक (का नाम)।4।
अर्थ: जगत का कर्ता जो सब कुछ करने के समर्थ है और सबका मालिक है। सदा ही कायम रहने वाला है, वही सबका सहारा है। हरेक जीव उसी को ही सदा स्थिर रहने वाला कहता है। वह सदा स्थिर प्रभु ही (असली) परख की बुद्धि रखने वाला है, सभ जीवों के अंदर व्यापक है। हे नानक! जो मनुष्य उस एक प्रभु (का नाम) जपता है उसको आत्मिक जीवन प्राप्त होता है।4।28।98।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ गुरु परमेसुरु पूजीऐ मनि तनि लाइ पिआरु ॥ सतिगुरु दाता जीअ का सभसै देइ अधारु ॥ सतिगुर बचन कमावणे सचा एहु वीचारु ॥ बिनु साधू संगति रतिआ माइआ मोहु सभु छारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ गुरु परमेसुरु पूजीऐ मनि तनि लाइ पिआरु ॥ सतिगुरु दाता जीअ का सभसै देइ अधारु ॥ सतिगुर बचन कमावणे सचा एहु वीचारु ॥ बिनु साधू संगति रतिआ माइआ मोहु सभु छारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पूजीऐ = पूजना चाहिए। लाइ = लगा के। जीअ का = जीवात्मा का, आत्मिक जीवन का। सभसै = (शरण आए) हरेक को। देइ = देता है। अधारु = आसरा। साधू = गुरु। छारु = राख, व्यर्थ।1।
अर्थ: गुरु परमात्मा (का रूप) है। (गुरु के वास्ते अपने) मन में हृदय में प्यार बना के (उसको) अपने हृदय में आदर की जगह देनी चाहिए। गुरु आत्मिक जीवन देने वाला है। (गुरु) हरेक (शरण आए) जीव को (परमात्मा के नाम का) आसरा देता है। सबसे उत्तम यही है कि गुरु के वचन कमाए जाएं (गुरु के उपदेश के अनुसार जीवन का सृजना की जाए)। गुरु की संगति में प्यार पाए बिना (यह) माया का मोह (जो) सारे का सारा व्यर्थ है (जीव पर अपना जोर डाले रखता है)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे साजन हरि हरि नामु समालि ॥ साधू संगति मनि वसै पूरन होवै घाल ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे साजन हरि हरि नामु समालि ॥ साधू संगति मनि वसै पूरन होवै घाल ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: समालि = हृदय में बसाओ। मनि = मन में। घाल = मेहनत। पूरन = सफल।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मित्र! परमात्मा का नाम (अपने) हृदय में बसा (और गुरु चरणों में टिका रह)। गुरु की संगति में रहने से (परमात्मा का नाम) मन में बसता है, और मेहनत सफल हो जाती है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरु समरथु अपारु गुरु वडभागी दरसनु होइ ॥ गुरु अगोचरु निरमला गुर जेवडु अवरु न कोइ ॥ गुरु करता गुरु करणहारु गुरमुखि सची सोइ ॥ गुर ते बाहरि किछु नही गुरु कीता लोड़े सु होइ ॥२॥
मूलम्
गुरु समरथु अपारु गुरु वडभागी दरसनु होइ ॥ गुरु अगोचरु निरमला गुर जेवडु अवरु न कोइ ॥ गुरु करता गुरु करणहारु गुरमुखि सची सोइ ॥ गुर ते बाहरि किछु नही गुरु कीता लोड़े सु होइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अगोचरु = (अ+गो+चरु, गो = ज्ञानेंद्रिय) जिस तक ज्ञानेंद्रियों की पहुँच ना हो सके। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ने से। सोइ = शोभा। ते = से। बाहिर = परे। लोड़े = चाहे।2।
अर्थ: गुरु सभ ताकतों का मालिक है, गुरु बेअंत (गुणों वाला) है। सौभाग्यशाली मनुष्य को (ही) गुरु का दर्शन प्राप्त होता है। गुरु (उस प्रभु का रूप है जो) ज्ञानेंद्रियों की पहुँच से परे हैं, गुरु पवित्र स्वरूप है। गुरु जितना बड़ा (व्यक्तित्व वाला) और कोई नही है। गुरु कर्तार (का रूप) है। गुरु (उस परमात्मा का रूप है जो) सब कुछ करने के समर्थ है। गुरु की शरण पड़ने से सदा कायम रहने वाली शोभा मिलती है। गुरु से बे-मुख हो के (आकी हो के) कोई काम नहीं किया जा सकता। जो कुछ गुरु करना चाहता है वही होता है (भाव, गुरु उस प्रभु का रूप है जिससे कोई आकी नहीं हो सकता, और जो कुछ वह करना चाहता है वही होता है)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरु तीरथु गुरु पारजातु गुरु मनसा पूरणहारु ॥ गुरु दाता हरि नामु देइ उधरै सभु संसारु ॥ गुरु समरथु गुरु निरंकारु गुरु ऊचा अगम अपारु ॥ गुर की महिमा अगम है किआ कथे कथनहारु ॥३॥
मूलम्
गुरु तीरथु गुरु पारजातु गुरु मनसा पूरणहारु ॥ गुरु दाता हरि नामु देइ उधरै सभु संसारु ॥ गुरु समरथु गुरु निरंकारु गुरु ऊचा अगम अपारु ॥ गुर की महिमा अगम है किआ कथे कथनहारु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पारजातु = पारिजात (स्वर्ग के पाँच वृक्षों में से एक ‘पारिजात’ वृक्ष है, जो मनोकामनाएं पूरी करता है। वह पांच वृक्ष ये हैं: मंदार, पारजात, संतान, कल्पवृक्ष और हरिचंदन)।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: समुंदर मंथन पर ये पारिजात वृक्ष देवताओं को चौदह रत्नों में ही मिला था। बंटवारे के समय यह इन्द्र के कब्जे में आया। कृष्ण ने उससे छीन के अपनी प्यारी ‘सत्यभामा’ के आँगन में लगा दिया।
“पारमस्या स्तीति पारी समुद्र स्तत्र जात:, तस्य समुद्रौत्पन्नत्वात्”।
दर्पण-भाषार्थ
मनसा = मनीषा,इच्छा। उधरै = (विकारों से) बचालेता है। अगम = अगम्य (पहुँच से परे)।3।
अर्थ: गुरु (ही असल) तीर्थ है। गुरु ही पारजात वृक्ष है, गुरु ही सारी कामनाएं पूरी करने वाला है। गुरु ही (वह) दाता है (जो) परमात्मा का नाम देता है (जिसकी इनायत से) सारा संसार (विकारों से) वचता है। गुरु (उस परमात्मा का रूप है जो) सभ ताकतों का मालिक है, जिसका कोई खास स्वरूप नहीं बताया जा सकता, जो सबसे ऊँचा है, अपहुंच है और बेअंत है। गुरु की उपमा तक (शब्दों द्वारा) पहुँचा नहीं जा सकता। कोई भी (विद्वान से विद्वान) बयान करने वाला बयान नहीं कर सकता।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जितड़े फल मनि बाछीअहि तितड़े सतिगुर पासि ॥ पूरब लिखे पावणे साचु नामु दे रासि ॥ सतिगुर सरणी आइआं बाहुड़ि नही बिनासु ॥ हरि नानक कदे न विसरउ एहु जीउ पिंडु तेरा सासु ॥४॥२९॥९९॥
मूलम्
जितड़े फल मनि बाछीअहि तितड़े सतिगुर पासि ॥ पूरब लिखे पावणे साचु नामु दे रासि ॥ सतिगुर सरणी आइआं बाहुड़ि नही बिनासु ॥ हरि नानक कदे न विसरउ एहु जीउ पिंडु तेरा सासु ॥४॥२९॥९९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बाछीअहि = जिनकी इच्छा की जाती है। तितड़े = वह सारे। दे = देता है। रासि = राशि, संपत्ति, धन-दौलत। बिनासु = (आत्मिक) मौत। विसरउ = मैं भूलूं। जीउ = जीवात्मा। पिंडु = शरीर। सासु = साँस, श्वास।4।
अर्थ: जितने भी पदार्तों की मन में इच्छा धारी जाए, वह सारे गुरु से प्राप्त हो जाते हैं। पहिले जनम में की नेक कमाई के लिखे लेख अनुसार (गुरु की शरण पड़ने से) मिल जाते हैं। गुरु सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम की पूंजी देता है।
अगर, गुरु की शरण आ पड़ें, तो उससे मिले आत्मिक जीवन का फिर कभी नाश नहीं होता। हे नानक! (कह) हे हरि! (गुरु की शरण पड़ के) मैं तुझे कभी ना भुलाऊँ। मेरी ये जीवात्मा, मेरा यह शरीर और (शरीर में आते) श्वास, सभ तेरा ही दिया हुआ है।4।29।99।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ संत जनहु सुणि भाईहो छूटनु साचै नाइ ॥ गुर के चरण सरेवणे तीरथ हरि का नाउ ॥ आगै दरगहि मंनीअहि मिलै निथावे थाउ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ संत जनहु सुणि भाईहो छूटनु साचै नाइ ॥ गुर के चरण सरेवणे तीरथ हरि का नाउ ॥ आगै दरगहि मंनीअहि मिलै निथावे थाउ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुणि = सुनो। भाईहो = हे भाईयो! छूटनु = (विकारों से) खलासी। नाइ = नाम से। सचै नाइ = सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम में (जुड़ के)। सरेवणे = पूजने। आगै = परलोक में। मंनीअहि = माने जाते हैं, आदर पाते हैं।1।
अर्थ: हे भाईयो! हे संत जनों! (ध्यान से) सुनो। सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम में जुड़ने से ही (विकारों से) खलासी होती है। (पर यह नाम गुरु के पास से ही मिल सकता है) गुरु के चरण पूजने (भाव, अहम् त्याग के गुरु की शरण पड़ना और गुरु के सन्मुख रह कर) परमात्मा का नाम (जपना) ही (सारे) तीर्तों (का तीर्थ) है। (इसकी इनायत से) परलोक में परमात्मा की दरगाह में (भाग्यशाली जीव) आदर पाते हैं। जिस मनुष्य को और कहीं भी आसरा नहीं मिलता, उसको (प्रभु की दरगाह में) आसरा मिल जाता है।1।
[[0053]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे साची सतिगुर सेव ॥ सतिगुर तुठै पाईऐ पूरन अलख अभेव ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे साची सतिगुर सेव ॥ सतिगुर तुठै पाईऐ पूरन अलख अभेव ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साची = सदा स्थिर रहने वाली, अटल, सफल। सतिगुर तुठै = यदि गुरु मेहरबान हो जाए। अलख = अलक्ष्य, अदृष्ट। अभेव = जिसका भेद ना पाया जा सके।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! गुरु की सेवा जरूर फल देती है। (क्योंकि) गुरु प्रसन्न हो जाए तो वह परमात्मा मिल जाता है जो सब में व्यापक है जो अदृष्ट है और जिस का भेद नहीं पाया जा सकता।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतिगुर विटहु वारिआ जिनि दिता सचु नाउ ॥ अनदिनु सचु सलाहणा सचे के गुण गाउ ॥ सचु खाणा सचु पैनणा सचे सचा नाउ ॥२॥
मूलम्
सतिगुर विटहु वारिआ जिनि दिता सचु नाउ ॥ अनदिनु सचु सलाहणा सचे के गुण गाउ ॥ सचु खाणा सचु पैनणा सचे सचा नाउ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: विटहु = से। जिनि = जिस ने। सचु = सदा स्थिर। अनदिनु = हर रोज।2।
अर्थ: हे भाई! मैं उस गुरु के सदके जाता हूँ, जिस ने (मुझे) सदा कायम रहने वाला हरि नाम दिया है। (जिस गुरु की कृपा से) मैं हर वक्त सदा स्थिर प्रभु को सलाहता रहता हूँ और सदा स्थिर प्रभु के गुण गाता रहता हूँ। (हे भाई! गुरु की मेहर से अब) सदा स्थिर हरि नाम (मेरी आत्मिक) खुराक बन गया है। सदा स्थिर हरि नाम (मेरी) पोशाक हो चुका है (आदर-सत्कार का कारण बन चुका है)। (अब मैं) सदा कायम रहने वाले प्रभु का सदा स्थिर नाम (हर वक्त जपता हूँ)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सासि गिरासि न विसरै सफलु मूरति गुरु आपि ॥ गुर जेवडु अवरु न दिसई आठ पहर तिसु जापि ॥ नदरि करे ता पाईऐ सचु नामु गुणतासि ॥३॥
मूलम्
सासि गिरासि न विसरै सफलु मूरति गुरु आपि ॥ गुर जेवडु अवरु न दिसई आठ पहर तिसु जापि ॥ नदरि करे ता पाईऐ सचु नामु गुणतासि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सासि = हरेक श्वास में। गिरासि = (हरेक) ग्रास में। सासि गिरासि = हरेक साँस व ग्रास के साथ। सफल मूरति = वह व्यक्तित्व जो सारे फल देने के समर्थ है। तिसु = उस (गुरु) को। ता = तब। गुणतासि = गुणों का खजाना।3।
अर्थ: हे भाई! गुरु वह व्यक्तित्व है (सख्शियत है) जो सारे फल देने के समर्थ है (गुरु की शरण पड़ने से हरेक) श्वास के साथ (हरेक) ग्रास के साथ (कभी भी परमात्मा) नहीं भूलता। हे भाई! गुरु के बराबर और कोई (दाता) नहीं दिखता, आठों पहर उस (गुरु को) याद रख। जब गुरु मेहर की निगाह करता है, तो सारे गुणों के खजाने परमात्मा का सदा स्थिर रहने वाला नाम प्राप्त हो जाता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरु परमेसरु एकु है सभ महि रहिआ समाइ ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ सेई नामु धिआइ ॥ नानक गुर सरणागती मरै न आवै जाइ ॥४॥३०॥१००॥
मूलम्
गुरु परमेसरु एकु है सभ महि रहिआ समाइ ॥ जिन कउ पूरबि लिखिआ सेई नामु धिआइ ॥ नानक गुर सरणागती मरै न आवै जाइ ॥४॥३०॥१००॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पूरबि = पहले जन्म में। सेई = वही लोग। धिआइ = ध्यान करके, स्मरण करके।4।
अर्थ: हे भाई! जो परमात्मा सारी सृष्टि में व्यापक है, वह और गुरु एक रूप हैं। जिस मनुष्यों की पूर्व जन्म की नेक कमाई के संसकारों का लेखा अंकुरित होता है वही मनुष्य (गुरु की शरण पड़ के) परमात्मा का नाम स्मरण करके (ये श्रद्धा बनाते हैं कि परमात्मा सभ में व्यापक है)।
हे नानक! जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ता है, वह मनुष्य आत्मिक मौत नहीं मरता। वह जनम मरण के चक्कर में नहीं पड़ता।4।30।100।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सिरीरागु महला १ घरु १ असटपदीआ ॥
मूलम्
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सिरीरागु महला १ घरु १ असटपदीआ ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
आखि आखि मनु वावणा जिउ जिउ जापै वाइ ॥ जिस नो वाइ सुणाईऐ सो केवडु कितु थाइ ॥ आखण वाले जेतड़े सभि आखि रहे लिव लाइ ॥१॥
मूलम्
आखि आखि मनु वावणा जिउ जिउ जापै वाइ ॥ जिस नो वाइ सुणाईऐ सो केवडु कितु थाइ ॥ आखण वाले जेतड़े सभि आखि रहे लिव लाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: असटपदी = (अष्ट+पद), आठ बंद वाली रचना। आखि = कह के। वावणा = खपाना, खुआर करना। जापै = प्रतीत होता है, समझ पड़ती है। वाइ जापै = बोलने की समझ पड़ती है। वाइ = वाय, घ्वनि, बोल। कितु = किस में? थाइ = जगह में। कितु थाइ = किस जगह में? किस स्थान पर? सभि = सारे। रहे = रह गये, थक गये। लिव लाइ = तवज्जो/ध्यान जोड़ के।1।
अर्थ: ज्यों ज्यों किसी जीव को (प्रभु के गुणों) को बोलने की समझ पड़ती है (त्यों त्यों ये समझ भी आती जाती है कि उसके गुण) बयान कर कर के मन को खपाना ही है। जिस प्रभु को बोल के सुनाते हैं (जिस प्रभु के गुणों के बारे में बोल के और लोगों को बताते हैं, उसकी बाबत ये तो पता ही नहीं लगता कि) वह कितना बड़ा है और किस जगह पे (निवास रखता) है। वह सारे बयान करते थक जाते हैं, (गुणों में) तवज्जो जोड़ते रह जाते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाबा अलहु अगम अपारु ॥ पाकी नाई पाक थाइ सचा परवदिगारु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
बाबा अलहु अगम अपारु ॥ पाकी नाई पाक थाइ सचा परवदिगारु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बाबा = हे भाई! अलहु = अल्ला, रब, परमात्मा। अगम = अपहुंच, जिस तक पहुंच ना हो सके, जिस को समझा ना जा सके। अपारु = जिसके गुणों का पार न पाया जा सके। पाकी = पवित्र। नाई = बड़ाई (‘नाई’ का अरबी रूप ‘स्ना’ है जिसका अर्थ है “वडिआई, सिफति, उपमा, स्तुति”। पंजाबी में इसके दो रूप हैं: ‘असनाई’ और ‘नाई’। जैसे संस्कृत शब्द ‘स्थान’ से पंजाबी के दो रूप = ‘थान’ और ‘असथान’)। थाइ = जगह में, स्थान पे। परविदगारु = (सब) को पालने वाला परमात्मा।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! परमात्मा के गुणों तक पहुँच नहीं हो सकती, उसके गुणों का परला छोर नहीं ढूंढा जा सकता। उसकी उपमा पवित्र है, वह पवित्र स्थान पर (शोभायमान) है। वह सदा कायम रहने वाला प्रभु (सब जीवों को) पालने वाला है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तेरा हुकमु न जापी केतड़ा लिखि न जाणै कोइ ॥ जे सउ साइर मेलीअहि तिलु न पुजावहि रोइ ॥ कीमति किनै न पाईआ सभि सुणि सुणि आखहि सोइ ॥२॥
मूलम्
तेरा हुकमु न जापी केतड़ा लिखि न जाणै कोइ ॥ जे सउ साइर मेलीअहि तिलु न पुजावहि रोइ ॥ कीमति किनै न पाईआ सभि सुणि सुणि आखहि सोइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: न जापी = समझ में नहीं आता। केतड़ा = कितना (अटल)? लिखि न जाणै = लिखा नहीं जा सकता। साइर = शायर, कवि। मेलीअहि = इकट्ठे किए जाएं। रोइ = खप के, बयान करने का व्यर्थ प्रयत्न करके। पुजावहि = पहुंचना। किनै = किसी ने भी। सोइ = सूह, खबर।2।
अर्थ: हे प्रभु! किसी को भी ये समझ नहीं पड़ी कि तेरा हुक्म कितना अटल है। कोई भी तेरे हुक्म को बयान नहीं कर सकता। अगर सौ कवि भी एकत्र कर लिए जाएंतो भी वह बयान करने का व्यर्थ प्रयत्न करके तेरे गुणों तक एक तिल मात्र नहीं पहुँच सकते। किसी भी जीव ने तेरा मुल्य नहीं पाया, सारे जीव तेरी बाबत (दूसरों से) सुन सुन के ही कह देते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पीर पैकामर सालक सादक सुहदे अउरु सहीद ॥ सेख मसाइक काजी मुला दरि दरवेस रसीद ॥ बरकति तिन कउ अगली पड़दे रहनि दरूद ॥३॥
मूलम्
पीर पैकामर सालक सादक सुहदे अउरु सहीद ॥ सेख मसाइक काजी मुला दरि दरवेस रसीद ॥ बरकति तिन कउ अगली पड़दे रहनि दरूद ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पैकामर = पैगंबर। सालक = रास्ता दिखाने वाला। सादक = सिदक वाले। सुहदे = शोहदे, मस्त फकीर। मसाइक = अनेक शेख। दरि = (प्रभु के) दर पे। रसीद = पहुँचे हुए। अगली = बहुत। दरूद = नमाज के बाद की दुआ।3।
अर्थ: (दनिया में) अनेक पीर पैग़ंबर, और लोगों को जीवन-राह बताने वाले, अनेक शेख, काजी, मुल्ला और तेरे दरवाजे तक पहुंचे हुए दरवेश आए (किसी को, हे प्रभु! तेरे गुणों का अंत नहीं मिला, हाँ सिर्फ) उनको बहुत इनायत मिली। (उनके ही भाग्य जागे) जो (तेरे दर पे) दुआ (अरजोई) करते रहते हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पुछि न साजे पुछि न ढाहे पुछि न देवै लेइ ॥ आपणी कुदरति आपे जाणै आपे करणु करेइ ॥ सभना वेखै नदरि करि जै भावै तै देइ ॥४॥
मूलम्
पुछि न साजे पुछि न ढाहे पुछि न देवै लेइ ॥ आपणी कुदरति आपे जाणै आपे करणु करेइ ॥ सभना वेखै नदरि करि जै भावै तै देइ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करण = सृष्टि। नदरि = मेहर की निगाह। जै = जो उसे। तै = तिसको।4।
अर्थ: प्रभु ये जगत ना किसी से सलाह ले के बनाता है ना ही पूछ के नाश करता है। ना ही किसी की सलाह से शरीर में जीवात्मा डालता है, ना निकालता है। परमात्मा अपनी कुदरति स्वयं ही जानता है, स्वयं ही यह जगत रचना करता है। मेहर की निगाह करके सब जीवों की संभाल स्वयं ही करता है। जो उसे भाता है, उसको (अपने गुणों की कद्र) बख्शता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
थावा नाव न जाणीअहि नावा केवडु नाउ ॥ जिथै वसै मेरा पातिसाहु सो केवडु है थाउ ॥ अ्मबड़ि कोइ न सकई हउ किस नो पुछणि जाउ ॥५॥
मूलम्
थावा नाव न जाणीअहि नावा केवडु नाउ ॥ जिथै वसै मेरा पातिसाहु सो केवडु है थाउ ॥ अ्मबड़ि कोइ न सकई हउ किस नो पुछणि जाउ ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: थावा नाव = अनेक स्थानों के नाम। केवडु = कितना बड़ा? अंबड़ि न सकई = पहुंच नहीं सकता।5।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘नाउ’ का बहुवचन ‘नाव’।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (बेअंत पुरियां, धरतियां आदि हैं। इतनी बेअंत रचना है कि) सब जगहों के (पदार्तों के) नाम जाने नहीं जा सकते। बेअंत नामों में से वह कौन सा नाम हो सकता है जो इतना बड़ा हो कि परमात्मा के असल बडेपन को बयान कर सके? यह बात कोई नहीं बता सकता कि जहां सुष्टि का पातशाह प्रभु बसता है, वह जगह कितनी बड़ी है। किसी से भी ये पूछा नहीं जा सकता, क्योंकि, कोई जीव उस अवस्था तक पहुँच ही नहीं सकता (जहां वह परमात्मा की प्रतिभा सही सही बता सके)।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वरना वरन न भावनी जे किसै वडा करेइ ॥ वडे हथि वडिआईआ जै भावै तै देइ ॥ हुकमि सवारे आपणै चसा न ढिल करेइ ॥६॥
मूलम्
वरना वरन न भावनी जे किसै वडा करेइ ॥ वडे हथि वडिआईआ जै भावै तै देइ ॥ हुकमि सवारे आपणै चसा न ढिल करेइ ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वरनावरन = वर्ण+आवर्ण, ऊंच नीच जातियां। किसै = किसी खास जाति को। हुकमि = हुक्म में। चसा = रत्ती भर भी समय।6।
अर्थ: (ये भी नहीं कहा जा सकता कि) परमात्मा को कोई खास ऊँची या नीची जाति भाती है या नहीं भाती और इस तरह वह किसी एक जाति को ऊंचा कर देता है। सब वडिआईआं बड़े प्रभु के अपने हाथ में हैं। जो जीव उसे अच्छा लगता है उसे बड़ाई बख्श देता है। अपनी रजा में ही वह जीव के जीवन को संवार देता है, रत्ती भर भी ढील नहीं करता।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभु को आखै बहुतु बहुतु लैणै कै वीचारि ॥ केवडु दाता आखीऐ दे कै रहिआ सुमारि ॥ नानक तोटि न आवई तेरे जुगह जुगह भंडार ॥७॥१॥
मूलम्
सभु को आखै बहुतु बहुतु लैणै कै वीचारि ॥ केवडु दाता आखीऐ दे कै रहिआ सुमारि ॥ नानक तोटि न आवई तेरे जुगह जुगह भंडार ॥७॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभु को = हरेक जीव को। वीचारि = विचार से, ख्याल से। लैणै के वीचारि = प्रभु से लेने के ख्याल से। सुमारि = शुमार से, गिनती से। भंडारे = खजाने।7।
अर्थ: परमात्मा से दातें लेने के ख्याल से हरेक जीव बहुत बहुत मांगे मांगता है। यह बताया नहीं जा सकता कि परमात्मा कितना बड़ा दाता है। वह दातें दे रहा है, पर दातें गिनती से परे हैं। हे नानक! (कह, हे प्रभु!) तेरे खजाने सदा ही भरे रहते हैं, इनमें कभी भी कमी नहीं आ सकती।7।1।
[[0054]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
महला १ ॥ सभे कंत महेलीआ सगलीआ करहि सीगारु ॥ गणत गणावणि आईआ सूहा वेसु विकारु ॥ पाखंडि प्रेमु न पाईऐ खोटा पाजु खुआरु ॥१॥
मूलम्
महला १ ॥ सभे कंत महेलीआ सगलीआ करहि सीगारु ॥ गणत गणावणि आईआ सूहा वेसु विकारु ॥ पाखंडि प्रेमु न पाईऐ खोटा पाजु खुआरु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कंत महेलीआ = पति (प्रभु) की (जीव) स्त्रीयां। गणत = गिनती मिनतीए दिखावा। सूहा = लाल, मन को खीचने वाला गाढ़ा लाल रंग। वेसु = पहिरावा। पाखंडि = पाखण्ड से। पाजु = दिखावा।1।
अर्थ: सारी जीव-स्त्रीयां प्रभु पति की ही हैं, सारी ही (उस प्रभु पति को प्रसन्न करने के लिए) श्रृंगार करती हैं। पर, जो अपने श्रृंगार का दिखावा मान करती हैं उनका गाढ़ा लाल पहिरावा भी विकार (ही) पैदा करता है। क्योकि, दिखावा करने से प्रभु का प्यार नहीं मिलता। (अंदर खोट हो और बाहर से प्रेम का दिखावा हो) यह खोटा दिखावा खुआर ही करता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि जीउ इउ पिरु रावै नारि ॥ तुधु भावनि सोहागणी अपणी किरपा लैहि सवारि ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
हरि जीउ इउ पिरु रावै नारि ॥ तुधु भावनि सोहागणी अपणी किरपा लैहि सवारि ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हरि जीउ = हे प्रभु जी! इउ = इस तरीके से, इस श्रद्धा से, ऐसी श्रद्धा रखने से। रावै = मिलता है, प्यार करता है। तुधु = तुझे। सोहागणी = सुहागन, भाग्यशाली। लैहि सवारि = तू सवार लेता है।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु जी! व्ह जीव-स्त्रीयां सुहाग भाग वालियां हैं जो तुझे अच्छी लगती हैं। जिनको तू अपनी मेहर से खुद सुचज्जियां बना लेता है, यह श्रद्धा धारी प्रभु पति जीव-स्त्रीयों को प्यार करता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर सबदी सीगारीआ तनु मनु पिर कै पासि ॥ दुइ कर जोड़ि खड़ी तकै सचु कहै अरदासि ॥ लालि रती सच भै वसी भाइ रती रंगि रासि ॥२॥
मूलम्
गुर सबदी सीगारीआ तनु मनु पिर कै पासि ॥ दुइ कर जोड़ि खड़ी तकै सचु कहै अरदासि ॥ लालि रती सच भै वसी भाइ रती रंगि रासि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सीगारीआ = जो जीव-स्त्री श्रृंगारी गई है। कर = हाथ। खड़ी = खड़ी हुई, सावधान हो के, सुचेत रह के। लालि = लाल में, प्यारे के प्रेम में। सच भै = सच्चे प्रभु के डर अदब में। भाइ = (प्रभु के) प्रेम में। रंगि = रंग में। रासि = रसी हुई।2।
अर्थ: पर, जो जीव-स्त्री गुरु के शब्द के द्वारा (अपने जीवन को) संवारती है, जिसका शरीर पति प्रभु के हवाले है, जिसका मन पति प्रभु के हवाले है (भाव, जिसका मन और जिसकी ज्ञानेद्रियां प्रभु की याद से अलग कुराहे नहीं जाते), जो दोनों हाथ जोड़ के पूरी श्रद्धा से (प्रभु पति का आसरा ही) देखती है, जो सदा स्थिर प्रभु को ही याद करती है और उसके दर पे अरजोईयां करती है, वह प्रभु प्रीतम (के प्यार) में रंगी रहती है। वह सदा स्थिर प्रभु के डर अदब में टिकी रहती है, वह प्रभु के प्रेम में रंगी रहती है, तथा उस के रंग में रसी रहती है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रिअ की चेरी कांढीऐ लाली मानै नाउ ॥ साची प्रीति न तुटई साचे मेलि मिलाउ ॥ सबदि रती मनु वेधिआ हउ सद बलिहारै जाउ ॥३॥
मूलम्
प्रिअ की चेरी कांढीऐ लाली मानै नाउ ॥ साची प्रीति न तुटई साचे मेलि मिलाउ ॥ सबदि रती मनु वेधिआ हउ सद बलिहारै जाउ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चेरी = दासी। कांढीऐ = कही जाती है। लाली = चेरी, दासी। मेलि = मेल में, संगति में। मिलाउ = मिलाप। वेधिआ = छेद किया हुआ, बेधा हुआ।3।
अर्थ: जो (प्रभु चरणों की) सेविका प्रभु के नाम को मानती है (प्रभु के नाम को ही अपनी जिंदगी का आसरा बनाती है) वह प्रभु पति की दासी कही जाती है, प्रभु के साथ उसकी प्रीति सदा कायम रहती है। कभी टूटती नहीं, सदा स्थिर प्रभु की संगति में (चरणों में) उसका मिलाप बना रहता है। प्रभु की महिमा के शब्द में वह रंगी रहती है, उसका मन परोया रहता है। मैं ऐसी जीव-स्त्री से कुर्बान हूँ।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सा धन रंड न बैसई जे सतिगुर माहि समाइ ॥ पिरु रीसालू नउतनो साचउ मरै न जाइ ॥ नित रवै सोहागणी साची नदरि रजाइ ॥४॥
मूलम्
सा धन रंड न बैसई जे सतिगुर माहि समाइ ॥ पिरु रीसालू नउतनो साचउ मरै न जाइ ॥ नित रवै सोहागणी साची नदरि रजाइ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साधन = जीव-स्त्री। रीसालू = रसों का घर, आनंद का श्रोत। नउतनो = नया, जिसका प्यार कभी पुराना नहीं होता। न जाइ = पैदा नहीं होता।4।
अर्थ: अगर, जीव-स्त्री गुरु (के शब्द) में तवज्जो जोड़ के रखे, तो वह कभी विधवा (हो के) नहीं बेठती। (भाव, खसम सांई का हाथ सदा उसके सिर पर टिका रहता है, फिर वह) खसम (भी ऐसा है जो) आनंद का स्रोत है (जिसका प्यार नित्य) नया है, (जो) सदा कायम रहने वाला (है, जो) ना मरता है ना पैदा होता है। वह अपनी सदा स्थिर मेहर की नजर से अपनी रजा के मुताबिक सदा उस सुहागन जीव-स्त्री को प्यार करता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साचु धड़ी धन माडीऐ कापड़ु प्रेम सीगारु ॥ चंदनु चीति वसाइआ मंदरु दसवा दुआरु ॥ दीपकु सबदि विगासिआ राम नामु उर हारु ॥५॥
मूलम्
साचु धड़ी धन माडीऐ कापड़ु प्रेम सीगारु ॥ चंदनु चीति वसाइआ मंदरु दसवा दुआरु ॥ दीपकु सबदि विगासिआ राम नामु उर हारु ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: धड़ी = पट्टियां। माडीऐ = सजाती है। चीति = चिक्त में। दीपकु = दीया। सबदि = गुरु के शब्द में। विगासिआ = (अपना हृदय) हुलारे में ले आया है। उर हारु = हृदय का हार।5।
अर्थ: जो जीव-स्त्री सदा स्थिर प्रभु (की याद अपने हृदय में टिकाती है, यह मानो, पति प्रभु को प्रसन्न करने के लिए) केसों की लटें संवारती है, प्रभु के प्यार को (सुंदर) कपड़ा और (गहनों का) श्रृंगार बनाती है, जिसने प्रभु को अपने चिक्त में बसाया है (और यह जैसे उसके माथे पर) चंदन (का टीका लगाया) है, जिसने अपने दसवें द्वार (दिमाग, चिक्त-आकाश) को (पति प्रभु के रहने के लिए) सुंदर घर बनाया है। जो गुरु के शब्द द्वारा (अपने हृदय को) हिलोरों में ले आई है। (और यह जैसे, उसके हृदय में) दीआ (जलाया है), जिसने परमात्मा के नाम को अपने गले का हार बना लिया है।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नारी अंदरि सोहणी मसतकि मणी पिआरु ॥ सोभा सुरति सुहावणी साचै प्रेमि अपार ॥ बिनु पिर पुरखु न जाणई साचे गुर कै हेति पिआरि ॥६॥
मूलम्
नारी अंदरि सोहणी मसतकि मणी पिआरु ॥ सोभा सुरति सुहावणी साचै प्रेमि अपार ॥ बिनु पिर पुरखु न जाणई साचे गुर कै हेति पिआरि ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मसतकि = माथे पे। मणी = रतन, जड़ाऊं टिक्का। हेति = प्रेम में।6।
अर्थ: जिसने अपने माथे पर प्रभु के प्यार का जड़ाऊ टिका लगाया हुआ है। जिसने सदा स्थिर रहने वाले बेअंत प्रभु के प्रेम में अपनी तवज्जो (जोड़ के) खबसूरति बना ली है (और, इसको वह अपनी) शोभा समझती है। वह जीव-स्त्री और जीव स्त्रीयों (जानी मानी) खूबसूरति है, वह अपने गुरु के शब्द के प्रेम प्यार में रह के सदा स्थिर सर्व-व्यापक प्रभु पति के बिना और किसी से जान-पहिचान नहीं डालती।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
निसि अंधिआरी सुतीए किउ पिर बिनु रैणि विहाइ ॥ अंकु जलउ तनु जालीअउ मनु धनु जलि बलि जाइ ॥ जा धन कंति न रावीआ ता बिरथा जोबनु जाइ ॥७॥
मूलम्
निसि अंधिआरी सुतीए किउ पिर बिनु रैणि विहाइ ॥ अंकु जलउ तनु जालीअउ मनु धनु जलि बलि जाइ ॥ जा धन कंति न रावीआ ता बिरथा जोबनु जाइ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निसि अंधिआरी = अंधेरी रात में, माया के मोह की अंधेरी रात में। रैणि = जिंदगी की रात। अंकु = हृदय। जलउ = जल जाए। जालीअउ = जलाया जाए। जा = जब। कंति = कंत ने। न राविआ = प्यार ना किया।7।
अर्थ: माया के मोह की काली अंधियारी रात में सो रही जीव-स्त्री! प्रभु पति के मिलाप के बगैर जिंदगी की रात आसान नहीं गुजर सकती। जल जाए वह हृदय और वह शरीर (जिसमें प्रभु की याद नहीं)। प्रभु की याद के बिना मन (विकारों में) जल-बल जाता है, माया धन भी व्यर्थ ही जाता है। अगर, जीव-स्त्री को प्रभु पति ने प्यार नहीं किया, तो उसकी जवानी व्यर्थ ही चली जाती है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सेजै कंत महेलड़ी सूती बूझ न पाइ ॥ हउ सुती पिरु जागणा किस कउ पूछउ जाइ ॥ सतिगुरि मेली भै वसी नानक प्रेमु सखाइ ॥८॥२॥
मूलम्
सेजै कंत महेलड़ी सूती बूझ न पाइ ॥ हउ सुती पिरु जागणा किस कउ पूछउ जाइ ॥ सतिगुरि मेली भै वसी नानक प्रेमु सखाइ ॥८॥२॥
दर्पण-टिप्पनी
नोट: इस शब्द के शीर्षक में शब्द ‘सिरीरागु’ नहीं है।
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सैजे कंत = कंत की सेज पर। महेलड़ी = भोली जीव-स्त्री। बूझ = समझ। पूछउ = मैं पूछूं। सतिगुरि = सत्गुरू ने। सखाइ = सखा, मित्र, साथी।8।
अर्थ: भाग्यहीन जीव-स्त्री खसम प्रभु की सेज पर सो रही है, पर उसे ये समझ नहीं (कि हृदय सेज पर जीवात्मा और परमात्मा का इकट्ठा निवास है, पर माया के मोह में ग्रसित जीवात्मा को इस की सार नहीं है)।
हे प्रभु पति! मैं जीव-स्त्री (माया की मोह की नींद में) सोई रहती हूँ, तू पति सदा जागता है (तुझे माया व्याप नहीं सकती); मैं किससे जा के पूछूँ (कि मैं किस तरह माया की नींद में से जाग के तुझे मिल सकती हूँ)? हे नानक! जिस जीव-स्त्री को सतिगुरु ने (प्रभु के चरणों में) मिला लिया है, वह परमात्मा के भय-अदब में रहती है, परमात्मा का प्यार उसका (जीवन) साथी बन जाता है।8।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ आपे गुण आपे कथै आपे सुणि वीचारु ॥ आपे रतनु परखि तूं आपे मोलु अपारु ॥ साचउ मानु महतु तूं आपे देवणहारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ आपे गुण आपे कथै आपे सुणि वीचारु ॥ आपे रतनु परखि तूं आपे मोलु अपारु ॥ साचउ मानु महतु तूं आपे देवणहारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आपे = (प्रभु) खुद ही। कथै = कहता है। सुणि = सुन के। परखि = परखता है। साचउ = सदा कायम रहने वाला। महतु = महत्वता।1।
अर्थ: प्रभु खुद ही (अपने) गुण है, खुद ही (अपने गुणों को) बयान करता है, खुद ही (अपनी महिमा) सुन के उस को विचारता है (उस में तवज्जो जोड़ता है)। हे प्रभु तू खुद ही (अपना नाम रूप) रत्न है। तू स्वयं ही उस रत्न का मुल्य डालने वाला है, तू स्वयं ही (अपने नाम रूपी रत्न का) बेअंत मूल्य है। तू स्वयं ही सदा कायम रहने वाला गर्व है, बड़प्पन है, तू स्वयं ही (जीवों को आदर सत्कार) देने वाला है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि जीउ तूं करता करतारु ॥ जिउ भावै तिउ राखु तूं हरि नामु मिलै आचारु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
हरि जीउ तूं करता करतारु ॥ जिउ भावै तिउ राखु तूं हरि नामु मिलै आचारु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आचारु = धार्मिक रस्म।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु जी! (हरेक चीज को) पैदा करने वाला तू स्वयं ही है। हे प्रभु! जैसे तूझे ठीक लगे, मुझे (अपने नाम में जोड़ के) रख। हे हरि! (मेहर कर) मुझे तेरा नाम मिल जाए। तेरा नाम ही मेरे वास्ते (बढ़िया से बढ़िया) कर्तव्य है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपे हीरा निरमला आपे रंगु मजीठ ॥ आपे मोती ऊजलो आपे भगत बसीठु ॥ गुर कै सबदि सलाहणा घटि घटि डीठु अडीठु ॥२॥
मूलम्
आपे हीरा निरमला आपे रंगु मजीठ ॥ आपे मोती ऊजलो आपे भगत बसीठु ॥ गुर कै सबदि सलाहणा घटि घटि डीठु अडीठु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: उजलो = चमकीला। बसीठु = वकील, विचौला। डीठु = दिखता। अडीठु = अदृष्ट।2।
अर्थ: हे प्रभु! तू खुद ही चमकता हीरा है, तू खंद ही मजीठ का रंग है, तू खुद ही चमकता मोती है, तू खुद ही (अपने) भक्तों का विचोला है। सत्गुरू के शब्द से तेरी महिमा हो सकती है। हरेक शरीर में तू ही दिखाई दे रहा है और तू ही अदृष्ट है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपे सागरु बोहिथा आपे पारु अपारु ॥ साची वाट सुजाणु तूं सबदि लघावणहारु ॥ निडरिआ डरु जाणीऐ बाझु गुरू गुबारु ॥३॥
मूलम्
आपे सागरु बोहिथा आपे पारु अपारु ॥ साची वाट सुजाणु तूं सबदि लघावणहारु ॥ निडरिआ डरु जाणीऐ बाझु गुरू गुबारु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बोहिथा = जहाज। अपारु = इधर का छोर। वाट = रास्ता। सबदि = शब्द के द्वारा। गुबारु = घुप अंधेरा।3।
अर्थ: हे प्रभु! (यह संसार-) समुंदर तू खुद ही है, (इस में से पार लंघाने वाला) जहाज़ भी तू खुद ही है। (इस संसार-समुंदर का) इस पार का और उसपार का छोर भी तू स्वयं ही है। (हे प्रभु! तेरी भक्ति-रूप) मार्ग भी तू स्वयं ही है, तू सब कुछ जानता है। गुरु-शब्द के द्वारा (इस संसार समुंदर में से भक्ति द्वारा) पार लंघाने वाला भी तू ही है। गुरु की शरण के बिना (ये जीवन-यात्रा, जीवों के लिए) घोर अंधेरा है। हे प्रभु! जो जीव तेरा डर-भय नही रखते, उनको दुनिया का सहम सहना पड़ता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
असथिरु करता देखीऐ होरु केती आवै जाइ ॥ आपे निरमलु एकु तूं होर बंधी धंधै पाइ ॥ गुरि राखे से उबरे साचे सिउ लिव लाइ ॥४॥
मूलम्
असथिरु करता देखीऐ होरु केती आवै जाइ ॥ आपे निरमलु एकु तूं होर बंधी धंधै पाइ ॥ गुरि राखे से उबरे साचे सिउ लिव लाइ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: केती = बेअंत (सृष्टि)। धंधे = धंधे में, बंधन में। गुरि = गुरु ने।4।
अर्थ: (इस जगत में) एक कर्तार ही सदा स्थिर रहने वाला दिखाई देता है, और बेअंत सृष्टि पैदा होती मरती रहती है। हे प्रभु! एक तू ही (माया के मोह की) मैल से साफ है, बाकी सारी दुनिया (माया के मोह के) बंधन में बंधी हुई है। जिनको गुरु ने (इस मोह से) बचा लिया है, वह सदा स्थिर प्रभु (के चरणों) में तवज्जो जोड़ के बच गए हैं।4।
[[0055]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि जीउ सबदि पछाणीऐ साचि रते गुर वाकि ॥ तितु तनि मैलु न लगई सच घरि जिसु ओताकु ॥ नदरि करे सचु पाईऐ बिनु नावै किआ साकु ॥५॥
मूलम्
हरि जीउ सबदि पछाणीऐ साचि रते गुर वाकि ॥ तितु तनि मैलु न लगई सच घरि जिसु ओताकु ॥ नदरि करे सचु पाईऐ बिनु नावै किआ साकु ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वाकि = वाक से। तितु तनि = उस शरीर में। ओताकु = बैठक, टिकाणा।5।
अर्थ: सदा कायम रहने वाले प्रभु (के नाम) में रंगे हुए गुरु के वाक्य द्वारा,शब्द के द्वारापरमात्मा के साथ जान-पहिचान पड़ सकती है। (गुरु के द्वारा) जिस मनुष्य की बैठक सदा स्थिर प्रभु के घर में (चरणों में) हो जाती है, उस के शरीर में (माया की) मैल नहीं लगती। वह सदा स्थिर प्रभु जिस पर मेहर की निगाह करता है, उसीको उसकी प्राप्ति होती है। उसका नाम स्मरण करने के बिनाउस से संबंध नहीं बन सकता।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनी सचु पछाणिआ से सुखीए जुग चारि ॥ हउमै त्रिसना मारि कै सचु रखिआ उर धारि ॥ जग महि लाहा एकु नामु पाईऐ गुर वीचारि ॥६॥
मूलम्
जिनी सचु पछाणिआ से सुखीए जुग चारि ॥ हउमै त्रिसना मारि कै सचु रखिआ उर धारि ॥ जग महि लाहा एकु नामु पाईऐ गुर वीचारि ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जुग चारि = सदा ही। उर = हृदय। लाहा = लाभ।6।
अर्थ: जिस लोगों ने सदा स्थिर प्रभु के साथ सांझ डाल ली है, वह सदा ही आत्मिक आनंद में रहते हैं। वह अपने अहम् और (माया वाली) तृष्णा मार के सदा स्थिर प्रभु (के नाम) को अपने हृदय में टिका के रखते हैं।
जगत में (आने का) परमात्मा का एक नाम ही लाभ है (जो मनुष्य को कमाना चाहिए, और यह नाम) गुरु की बताई हुई शिक्षा से ही मिल सकता है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साचउ वखरु लादीऐ लाभु सदा सचु रासि ॥ साची दरगह बैसई भगति सची अरदासि ॥ पति सिउ लेखा निबड़ै राम नामु परगासि ॥७॥
मूलम्
साचउ वखरु लादीऐ लाभु सदा सचु रासि ॥ साची दरगह बैसई भगति सची अरदासि ॥ पति सिउ लेखा निबड़ै राम नामु परगासि ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रासि = राशि, पूंजी। बैसई = बैठता है। पति = इज्जत।7।
अर्थ: (हे व्यापारी जीव!) सदा स्थिर रहने वाली (नाम की) राशि-पूंजी ही जोड़नी चाहिए, (इसमें वह) नफा (पड़ता है जो) सदा (कायम रहता है)। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु की भक्ति करता है, (उसके आगे) अरदास करता है, वह उसकी सदा स्थिर हजूरी में बैठता है। उसका (जीवन सफर का) लेखा (बा-इज्जत) साफ हो जाता है (क्योंकि, उसके अंदर) प्रभु का नाम उजागर हो जाता है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ऊचा ऊचउ आखीऐ कहउ न देखिआ जाइ ॥ जह देखा तह एकु तूं सतिगुरि दीआ दिखाइ ॥ जोति निरंतरि जाणीऐ नानक सहजि सुभाइ ॥८॥३॥
मूलम्
ऊचा ऊचउ आखीऐ कहउ न देखिआ जाइ ॥ जह देखा तह एकु तूं सतिगुरि दीआ दिखाइ ॥ जोति निरंतरि जाणीऐ नानक सहजि सुभाइ ॥८॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कहउ = मैं कहता हूँ। देखा = मैं देखता हूं। सतिगुरि = सत्गुरू ने। निरंतरि = अंतर के बिना, एक रस। सहजि = सहज अवस्था में टिक के। सुभाइ = प्रभु के प्रेम में जुड़ के।8।
अर्थ: परमात्मा सबसे ऊँचा है, परमात्मा सबसे ऊूंचा है, (हर ओर से) यही कहा जाता है, मैं (भी) कहता हूं (कि परमात्मा सबसे ऊूंचा है, पर निरा कहने से) उसका दर्शन नहीं किया जा सकता। जब सत्गुरू ने मुझे, (हे प्रभु! तेरा) दर्शन करा दिया, तो अब मैं जिधर देखता हूँ, तू ही तू दिखाई देता है।
हे नानक! (गुरु की शरण पड़ के) आत्मिक अडोलता वाली अवस्था में टिक के प्रेम में जुड़ के ये समझ आ जाती है कि परमात्मा की ज्योति एक-रस हर जगह मौजूद है।8।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ मछुली जालु न जाणिआ सरु खारा असगाहु ॥ अति सिआणी सोहणी किउ कीतो वेसाहु ॥ कीते कारणि पाकड़ी कालु न टलै सिराहु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ मछुली जालु न जाणिआ सरु खारा असगाहु ॥ अति सिआणी सोहणी किउ कीतो वेसाहु ॥ कीते कारणि पाकड़ी कालु न टलै सिराहु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सर = सरोवर, सागर, समुंदर। असगाहु = बहुत गहरा। अति = बहुत। वेसाहु = एतबार, विश्वास। कीते कारणि = एकबार करने के कारण। पाकड़ी = पकड़ी गई। सिराहु = सिर से।1।
अर्थ: भोली (नादान) मछली ने जाल को नहीं समझा (कि जाल उसकी मौत का कारण बनता है) और ना ही उसने गहरे खारे समुंदर को ही समझा (कि समुंदर में टिके रहने से ही उसकी जिंदगी कायम रह सकती है)। (देखने को मछली) बड़ी सुंदर और अकलमंद लगती है, पर उसको जाल पर एतबार नहीं करना चाहिए था। (जाल पर) ऐतबार करने के कारण हीवह पकड़ी जाती है, और उस के सिर पर से मौत नहीं टलती। (जीव यह भूल जाता है कि जिंदगी के अथाह समुंदर प्रभु में लीन रहने से ही आत्मिक जीवन कायम रहता है। आदमी मोहनी माया का ऐतबार कर बैठता है और आत्मिक मौत सहता है, मौत का सहम हर वक्तइसके सिर पे सवार रहता है)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे इउ सिरि जाणहु कालु ॥ जिउ मछी तिउ माणसा पवै अचिंता जालु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे इउ सिरि जाणहु कालु ॥ जिउ मछी तिउ माणसा पवै अचिंता जालु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: इउ = इस तरह ही। सिरि = सिर पर। माणसा = मनुष्य को। अचिंता = अचानक।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! अपने सिर पर मौत को ऐसे समझो जैसे मछली को अचानक (मछुआरे का) जाल आ पड़ता है, वैसे ही मनुष्यों के सिर पर अचानक मौत आ पड़ती है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभु जगु बाधो काल को बिनु गुर कालु अफारु ॥ सचि रते से उबरे दुबिधा छोडि विकार ॥ हउ तिन कै बलिहारणै दरि सचै सचिआर ॥२॥
मूलम्
सभु जगु बाधो काल को बिनु गुर कालु अफारु ॥ सचि रते से उबरे दुबिधा छोडि विकार ॥ हउ तिन कै बलिहारणै दरि सचै सचिआर ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बाधो काल को = काल का बंधा हुआ। अफारु = अमोड़, अमिट। सचि = सच में, सदा स्थिर प्रभु में। दुबिधा = मेर-तेर, दुचिक्ता पन, मन की डांवाडोल अवस्था। सचिआर = सही रास्ते पर।2।
अर्थ: सारा जगत मौत के डर में बंधा हुआ है। गुरु की शरण आने के बिना मौत का सहम (हरेक के सिर पर) अमिट है। जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु (के प्यार) में रंगे रहते हैं, वह विकार छोड़ के मन की माया की ओर डावांडोल हालत छोड़ के मौत के सहम से बच जाते हैं।
मैं उनसे सदके जाता हूँ, जो (गुरु की शरण पड़ कर) प्रभु के दर पर स्वीकार होते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सीचाने जिउ पंखीआ जाली बधिक हाथि ॥ गुरि राखे से उबरे होरि फाथे चोगै साथि ॥ बिनु नावै चुणि सुटीअहि कोइ न संगी साथि ॥३॥
मूलम्
सीचाने जिउ पंखीआ जाली बधिक हाथि ॥ गुरि राखे से उबरे होरि फाथे चोगै साथि ॥ बिनु नावै चुणि सुटीअहि कोइ न संगी साथि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साचीना = (सीचुग़नह) एक शिकारी पंछी जो बाज से छोटा होता है। बधिक हाथि = शिकारी के हाथ में। गुरि = गुरु ने। साथि = साथ। संगी साथि = संगी साथी।3।
अर्थ: जैसे बाज और शिकारी के हाथ में पकड़ी हुई जाली पंछियों के वास्ते (मौत का संदेशा है, वैसे ही माया का मोह मनुष्यों के लिए आत्मिक मौत का कारण है), जिनकी गुरु ने रक्षा की, वह माया जाल में से बच निकले, बाकी सारे माया के चोगे के साथमोह की जाली में फंस गए। जिन्हों के पल्ले नाम नहीं वह चुन-चुन के माया जाल में फेंके जाते हैं, उनका कोई भी ऐसा संगी-साथी नहीं बनता (जो उन्हें इस जाल में से निकाल सके)।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचो सचा आखीऐ सचे सचा थानु ॥ जिनी सचा मंनिआ तिन मनि सचु धिआनु ॥ मनि मुखि सूचे जाणीअहि गुरमुखि जिना गिआनु ॥४॥
मूलम्
सचो सचा आखीऐ सचे सचा थानु ॥ जिनी सचा मंनिआ तिन मनि सचु धिआनु ॥ मनि मुखि सूचे जाणीअहि गुरमुखि जिना गिआनु ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनि = मन में। मुखि = मुंह में।4।
अर्थ: (मौत के सहम और आत्मिक मौत से बचने के लिए, हे भाई!) उस सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा को स्मरणा चाहिए जिसका तख्त अटल है। जिनका मन स्मरण में लग जाता है, उनके मन में परमात्मा की याद की लगन लग जाती है। गुरु की शरण पड़ के जिस के मन में और मुंह में परमात्मा के साथ गहरी सांझ टिक जाती है, वह लोग पवित्र समझे जाते हैं।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतिगुर अगै अरदासि करि साजनु देइ मिलाइ ॥ साजनि मिलिऐ सुखु पाइआ जमदूत मुए बिखु खाइ ॥ नावै अंदरि हउ वसां नाउ वसै मनि आइ ॥५॥
मूलम्
सतिगुर अगै अरदासि करि साजनु देइ मिलाइ ॥ साजनि मिलिऐ सुखु पाइआ जमदूत मुए बिखु खाइ ॥ नावै अंदरि हउ वसां नाउ वसै मनि आइ ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देइ मिलाइ = मिला देता है। साजनि मिलिऐ = यदि सज्जन प्रभु मिल जाए। बिख = जहर। हउ = मैं।5।
अर्थ: (हे मेरे मन! सज्जन प्रभु को मिलने के वास्ते सदा अपने) गुरु के आगे अरदास करता रह, (गुरु) सज्जन प्रभु मिला देता है। अगर सज्जन प्रभु मिल जाए तो आत्मिक आनंद मिल जाता है। जमदूत तो (यूँ समझो कि) जहर खा के मर जाते हैं (भाव, यमदूत नजदीक भी नहीं फटकते)।
(अगर, सज्जन प्रभु मिल जाए तो) मैं उसके नाम में सदा टिका रह सकता हूँ। उसका नाम (सदा के लिए) मेरे मन में आ बसता है।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाझु गुरू गुबारु है बिनु सबदै बूझ न पाइ ॥ गुरमती परगासु होइ सचि रहै लिव लाइ ॥ तिथै कालु न संचरै जोती जोति समाइ ॥६॥
मूलम्
बाझु गुरू गुबारु है बिनु सबदै बूझ न पाइ ॥ गुरमती परगासु होइ सचि रहै लिव लाइ ॥ तिथै कालु न संचरै जोती जोति समाइ ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुबारु = (माया के मोह का) अंधेरा। बूझ = समझ। संचरै = पहुँचता।6।
अर्थ: गुरु की शरण पड़े बिना (जीव वास्ते चारों तरफ माया के मोह का) घोर अंधकार (रहता) है। गुरु के शब्द के बिना समझ नहीं पड़ती (कि मैं माया के मोह में फंसा हुआ हूँ)। जिस मनुष्य के हृदय में गुरु की शिक्षा के साथ आत्मिक प्रकाश होता है, वह सदा स्थिर प्रभु में अपनी तवज्जो जोड़ के रखता है। उस आत्मिक अवस्था में मौत का डर पहुँचता ही नहीं, (क्योंकि) जीव की ज्योति परमात्मा की ज्योति में लीन रहती है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तूंहै साजनु तूं सुजाणु तूं आपे मेलणहारु ॥ गुर सबदी सालाहीऐ अंतु न पारावारु ॥ तिथै कालु न अपड़ै जिथै गुर का सबदु अपारु ॥७॥
मूलम्
तूंहै साजनु तूं सुजाणु तूं आपे मेलणहारु ॥ गुर सबदी सालाहीऐ अंतु न पारावारु ॥ तिथै कालु न अपड़ै जिथै गुर का सबदु अपारु ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पारावार = पार अवार, इस पार उस पार का छोर।7।
अर्थ: हे प्रभु! तू ही मेरा मित्र है। तू ही (मेरे दुख दर्द) जानने वाला है। तू खुद ही मुझे (अपने चरणों में) मिलाने में समर्थ है। गुरु के शब्द के द्वारा ही तेरी महिमा की जा सकती है। (वैसे तो) तेरे गुणों का अंत, तेरे गुणों के इस पार उस पार का छोर नहीं ढूंढा जा सकता।
जिस हृदय में गुरु का शब्द टिका हुआ है, बेअंत प्रभु स्वयं टिका हुआ है वहां परमात्मा का डर पहुँच नहीं सकता।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हुकमी सभे ऊपजहि हुकमी कार कमाहि ॥ हुकमी कालै वसि है हुकमी साचि समाहि ॥ नानक जो तिसु भावै सो थीऐ इना जंता वसि किछु नाहि ॥८॥४॥
मूलम्
हुकमी सभे ऊपजहि हुकमी कार कमाहि ॥ हुकमी कालै वसि है हुकमी साचि समाहि ॥ नानक जो तिसु भावै सो थीऐ इना जंता वसि किछु नाहि ॥८॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ऊपजहि = पैदा होते हैं। कालै वसि = मौत के बस में।8।
अर्थ: (माया के मोह जाल में से निकलना जीवों के बस की बात नहीं है) परमात्मा के हुक्म में सारे जीव पैदा होते हैं। उसके हुक्म में ही कार-व्यवहार करते हैं। प्रभु के हुक्म में ही सृष्टि मौत के डर के अधीन है। हुक्म अनुसार ही जीव सदा स्थिर प्रभु की याद में टिकते हैं। हे नानक! वही कुछ होता है जो उस परमात्मा को ठीक लगता है। इन जीवों के बस में कुछ भी नहीं।8।4।
[[0056]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ मनि जूठै तनि जूठि है जिहवा जूठी होइ ॥ मुखि झूठै झूठु बोलणा किउ करि सूचा होइ ॥ बिनु अभ सबद न मांजीऐ साचे ते सचु होइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ मनि जूठै तनि जूठि है जिहवा जूठी होइ ॥ मुखि झूठै झूठु बोलणा किउ करि सूचा होइ ॥ बिनु अभ सबद न मांजीऐ साचे ते सचु होइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनि = मन से। जूठै = जूठे से। मनि जूठै = जूठे मन से, यदि मन जूठा है। (शब्द ‘जूठै’, ‘जूठा’ से बना है। ‘जूठा’ विशेषण है और शब्द ‘जूठि’ संज्ञा है)। तनि = शरीर में। जिहवा = जीभ। अभ = पानी। अभ शबद = गुरु-शब्द रूप पानी (अंभस् = पानी)।1।
अर्थ: अगर, जीव का मन (विकारों की छूह से) जूठा हो चुका है, तो उसके शरीर में भी जूठ ही जूठ है (सारी ज्ञानेद्रियां विकारों की ओर ही दौड़ती हैं) उसकी जीभ (खाने के चस्को के साथ) जूठी हुई रहती है। झूठे मुंह से झूठ बोलने का ही स्वभाव बन जाता है। ऐसा जीव (किसी बाहरी स्वच्छता आदि कर्मां से अंदर) की स्वच्छता कभी भी नहीं हो सकता। गुरु के शब्द जल के बिनां (मन) मांजा नहीं जा सकता, (तथा) यह सच (स्मरण) सदा स्थिर प्रभु से ही मिलता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मुंधे गुणहीणी सुखु केहि ॥ पिरु रलीआ रसि माणसी साचि सबदि सुखु नेहि ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मुंधे गुणहीणी सुखु केहि ॥ पिरु रलीआ रसि माणसी साचि सबदि सुखु नेहि ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुंधे = हे भोली जीव-स्त्री! केहि = किसके बीच? पिरु रलीआ = पति मिलाप के सुख। रसि = आनंद के साथ। नेहि = प्यार में।1। रहाउ।
अर्थ: हे भोली जीव-स्त्री! जो (अपने अंदर, आत्मिक सुख देने वाले) गुणों से वंचित है उसको (बाहर से) किसी और तरीके से आत्मिक सुख नहीं मिल सकता। आत्मिक सुख उसको है जो सदा कायम रहने वाले प्रभु में (लीन रहती है)। जो गुरु के शब्द में (जुड़ी हुई) है। जो प्रभु के प्यार में (मस्त) है। पति प्रभु के मिलाप के सुख का (वही जीव-स्त्री) आनंद लेती है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पिरु परदेसी जे थीऐ धन वांढी झूरेइ ॥ जिउ जलि थोड़ै मछुली करण पलाव करेइ ॥ पिर भावै सुखु पाईऐ जा आपे नदरि करेइ ॥२॥
मूलम्
पिरु परदेसी जे थीऐ धन वांढी झूरेइ ॥ जिउ जलि थोड़ै मछुली करण पलाव करेइ ॥ पिर भावै सुखु पाईऐ जा आपे नदरि करेइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: धन = जीव-स्त्री। वांढी = परदेसन, विछुड़ी हुई। करणु पलाव = करुणा+प्रलाप, वह रोना जो सुनने वाले के मन में तरस पैदा कर दें, तरले, मिन्नतें। पिर भावै = पति को अच्छी लगे।2।
अर्थ: यदि पति प्रभु (जीव-स्त्री के हृदय देश में प्रगट नहीं, उसके हृदय को छोड़ के) और-और हृदय देश का निवासी है, तो पति से बिछुड़ी हुई वह जीव-स्त्री झुरती (सतत् निराशा की ओर अग्रसर होती) रहती है (अंदर ही अंदर से चिन्ता से खाई जाती है)। जिस प्रकार थोड़े पानी में मछुली तड़फती है, उसी प्रकार वह भी प्रलाप करती है। आत्मिक सुख तभी मिलता है जब प्रभु पति को (जीव-स्त्री) अच्छी लगे। जब वह खुद (उस पर) मेहर की नजर करे।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पिरु सालाही आपणा सखी सहेली नालि ॥ तनि सोहै मनु मोहिआ रती रंगि निहालि ॥ सबदि सवारी सोहणी पिरु रावे गुण नालि ॥३॥
मूलम्
पिरु सालाही आपणा सखी सहेली नालि ॥ तनि सोहै मनु मोहिआ रती रंगि निहालि ॥ सबदि सवारी सोहणी पिरु रावे गुण नालि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सालाही = सालाह, महिमा कर। तनि = तन में। निहालि = निहाले, देखती है। रावै = माणती है, भोगती है।3।
अर्थ: (हे जीव-स्त्री!) तू सखियों सहेलियों के साथ मिल के (भाव, साधु-संगत में बैठ के) अपने पति प्रभु की महिमा कर। (जो जीव-स्त्री महिमा करती है, उस के) हृदय में प्रभु प्रगट हो जाता है। उसका मन (प्रभु के प्रेम में) मोहा जाता है। वह प्रभु के प्रेम रंग में रंगी हुई उसका दर्शन करती है। गुरु के शब्द (की इनायत) से उसका जीवन संवर जाता है। गुणों से वह सुंदर बन जाती है, और पति प्रभु उसको प्यार करता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कामणि कामि न आवई खोटी अवगणिआरि ॥ ना सुखु पेईऐ साहुरै झूठि जली वेकारि ॥ आवणु वंञणु डाखड़ो छोडी कंति विसारि ॥४॥
मूलम्
कामणि कामि न आवई खोटी अवगणिआरि ॥ ना सुखु पेईऐ साहुरै झूठि जली वेकारि ॥ आवणु वंञणु डाखड़ो छोडी कंति विसारि ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कामणि = स्त्री। कामि न आवई = किसी काम नहीं आती, जीवन व्यर्थ जाता है। पेईऐ = पेके घर में, इस जगत में। जली = सड़ी हुई। आवणु वंञणु = जनम मरन (का चक्कर)। डाखड़े = मुश्किल, दुखदाई। कंति = कंत ने। विसारि छोडी = भुला दी।4।
अर्थ: (गुरु से वंचित होने के कारण) जो जीव-स्त्री (अंदर से) खोटी है और अवगुणों से भरी हुई है, उसका जीवन व्यर्थ चला जाता है। ना इस लोक में ना ही परलोक में, कहीं भी उसको आत्मिक सुख नहीं मिलता। झूठ में विकारों में वह जल जाती है (उसका आत्मिक जीवन जल जाता है); (उसके वास्ते) जनम मरन का मुश्किल चक्कर बना रहता है। (क्योंकि) कंत प्रभु ने उसको भुला दिया होता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पिर की नारि सुहावणी मुती सो कितु सादि ॥ पिर कै कामि न आवई बोले फादिलु बादि ॥ दरि घरि ढोई ना लहै छूटी दूजै सादि ॥५॥
मूलम्
पिर की नारि सुहावणी मुती सो कितु सादि ॥ पिर कै कामि न आवई बोले फादिलु बादि ॥ दरि घरि ढोई ना लहै छूटी दूजै सादि ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुती = छोड़ी हुई, त्यागी हुई। कितु सादि = किस स्वाद के कारण? फादिलु = फजूल के बोल। बादि = व्यर्थ ही। दरि = दर पे। घरि = घर में। छुटी = त्यागी गई।5।
अर्थ: पर वह प्रभु-पति की खूबसूरत नारी थी, वह किस स्वाद में (फंसने के कारण) त्याग हो गई? वह क्यों व्यर्थ फजूल बोल बोलती है जो पति प्रभु के साथ मिलाप के लिए काम नहीं दे सकता? वह जीव-स्त्री (प्रभु को भुला के) माया के स्वाद में (फंसने के कारण) त्यागी गई है, (तभी उसको) प्रभु के दर पर प्रभु के महल में (टिकने के लिए) आसरा नहीं मिलता (माया का मोह उसे भटकनों में डाले रखता है)।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पंडित वाचहि पोथीआ ना बूझहि वीचारु ॥ अन कउ मती दे चलहि माइआ का वापारु ॥ कथनी झूठी जगु भवै रहणी सबदु सु सारु ॥६॥
मूलम्
पंडित वाचहि पोथीआ ना बूझहि वीचारु ॥ अन कउ मती दे चलहि माइआ का वापारु ॥ कथनी झूठी जगु भवै रहणी सबदु सु सारु ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वाचहि = पढ़ते हैं। अन कउ = और लोगों को। भवै = भटकता है। सबदु = गुरु का शब्द (हृदय में टिकाना), परमात्मा की महिमा। सारु = श्रेष्ठ।6।
अर्थ: पंडित लोग धार्मिक पुस्तकें पढ़ते हैं (पर अंदर से गुणहीन होने के कारण उन पुस्तकों की) विचार नहीं समझते। और लोगों को ही उपदेश दे के (जगत से) चले जाते हैं (उनका ये सारा उद्यम) माया कमाने के लिए व्यापार ही बना रह जाता है।
सारा जगत झूठी कथनी में ही भटकता रहता है (भाव, आम तौर पे जीवों के अंदर झूठ-फरेब है, और बाहर ज्ञान की बातें करते हैं)। प्रभु की महिमा का शब्द (हृदय में टिकाए रखना) ही श्रेष्ठ रहन सहन है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
केते पंडित जोतकी बेदा करहि बीचारु ॥ वादि विरोधि सलाहणे वादे आवणु जाणु ॥ बिनु गुर करम न छुटसी कहि सुणि आखि वखाणु ॥७॥
मूलम्
केते पंडित जोतकी बेदा करहि बीचारु ॥ वादि विरोधि सलाहणे वादे आवणु जाणु ॥ बिनु गुर करम न छुटसी कहि सुणि आखि वखाणु ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जोतकी = ज्योतिषी। करहि = करते हैं। वादि = झगड़े बहस में। वादे = वाद में ही। करम = बख्शिश। न छुटसी = खलासी प्राप्त नहीं करेगा। कहि = कह के। सुणि = सुन के। वखाणु = व्याख्यान, उपदेश।7।
अर्थ: अनेक ही पंडित ज्योतिषी (आदि) वेदों (के मंत्रों) को विचारते हैं, अपने आप में मतभेद होने के कारण (चर्चा करते हैं और दृढ़ता के कारण) वाह वाह कहलवाते हैं। पर, सिर्फ इस मतभेद में रह के ही उनका जन्म मरन बना रहता है।
कोई भी मनुष्य (निरा अच्छा) व्याख्यान करके या सुन के (आत्मिक आनंद नहीं ले सकता, और जन्म मरन के चक्कर में से) मुक्ति प्राप्त नहीं कर सकता। हउमै, अहंकार छोड़ के गुरु के शरण पड़ने की जरूरत है। गुरु की बख्शिश के बगैर (माया के मोह से) मुक्ति नहीं होती।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभि गुणवंती आखीअहि मै गुणु नाही कोइ ॥ हरि वरु नारि सुहावणी मै भावै प्रभु सोइ ॥ नानक सबदि मिलावड़ा ना वेछोड़ा होइ ॥८॥५॥
मूलम्
सभि गुणवंती आखीअहि मै गुणु नाही कोइ ॥ हरि वरु नारि सुहावणी मै भावै प्रभु सोइ ॥ नानक सबदि मिलावड़ा ना वेछोड़ा होइ ॥८॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभि = सारी। वरु = वर, खसम।8।
अर्थ: (जो जीव-स्त्रीयां प्रभु-पति को प्यारी लगती हैं वही) सारे गुणों वाली कहलाती हैं। पर, मेरे अंदर ऐसा कोई गुण नहीं है (जिसकी इनायत से मैं प्रभु प्रेम को अपने दिल में बसा सकूँ)। अगर वह हरि पति प्रभु मुझे प्यारा लगने लग जाए, तो मैं भी उसकी सुंदर नारी बन जाऊँ।
हे नानक! गुरु के शब्द में (जुड़ के जिसने प्रभु चाणों से) खूबसूरत मिलाप हासिल कर लिया है उसका उससे फिर विछोड़ा नहीं होता।8।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ जपु तपु संजमु साधीऐ तीरथि कीचै वासु ॥ पुंन दान चंगिआईआ बिनु साचे किआ तासु ॥ जेहा राधे तेहा लुणै बिनु गुण जनमु विणासु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ जपु तपु संजमु साधीऐ तीरथि कीचै वासु ॥ पुंन दान चंगिआईआ बिनु साचे किआ तासु ॥ जेहा राधे तेहा लुणै बिनु गुण जनमु विणासु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जपु = मंत्रों का पाठ (किसी सिद्धि आदि की प्राप्ति के लिए)। तपु = उल्टा लटक के या धूणियां आदि तपा के शरीर को कष्ट देना। संजमु = इन्द्रियों को काबू में रखने का कोई साधन। तीरथि = तीर्थ पर। किआ तासु = उसका क्या (लाभ)? राधे = बीजता है। लुणै = फल प्राप्त करता है, कटता है।1।
अर्थ: अगर (किसी सिद्धि आदि वास्ते मंत्रों का) पाठ किया जाए, (धूणियां आदि तपा के) शरीर को कष्ट दिया जाए, इन्द्रियों को वस में करने का कोई साधन किया जाए, किसी तीर्थ पर निवास किया जाए, (अगर खलकत के भले के वास्ते) दान-पुंन्न आदि अच्छे काम किए जांए (पर परमात्मा का स्मरण ना किया जाए, तो) प्रभु स्मरण के बिना उपरोक्त सारे ही उद्यमों का कोई लाभ नहीं। मनुष्य जैसा बीज बीजता है, वैसा ही फल काटता है (यदि स्मरण नहीं किया तो आत्मिक गुण कहां से आ जाएं, तथा) आत्मिक गुणों के बिना जिंदगी व्यर्थ है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मुंधे गुण दासी सुखु होइ ॥ अवगण तिआगि समाईऐ गुरमति पूरा सोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मुंधे गुण दासी सुखु होइ ॥ अवगण तिआगि समाईऐ गुरमति पूरा सोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुंधे = हे भोली जीव-स्त्री! तिआगि = त्याग के। समाईऐ = लीन होते हैं। सोइ = वह परमात्मा।1। रहाउ।
अर्थ: हे भोली जीव-स्त्री! (आत्मिक गुणों के बिनां आत्मिक सुख नहीं हो सकता, और परमात्मा के नाम के बिना गुण पैदा नहीं हो सकते) गुणों की खातर परमात्मा के गुणों की दासी बन, तभी आत्मिक सुख सुख होगा। औगुणों को त्याग के ही प्रभु चरणों में लीन हो सकते हैं। गुरु की मति पे चल कर ही वह पूरा प्रभु मिलता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
विणु रासी वापारीआ तके कुंडा चारि ॥ मूलु न बुझै आपणा वसतु रही घर बारि ॥ विणु वखर दुखु अगला कूड़ि मुठी कूड़िआरि ॥२॥
मूलम्
विणु रासी वापारीआ तके कुंडा चारि ॥ मूलु न बुझै आपणा वसतु रही घर बारि ॥ विणु वखर दुखु अगला कूड़ि मुठी कूड़िआरि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रासी = राशि, पूंजी, संपत्ति, धन-दौलत। कुंडा = तरफें, पासे। वसतु = (असल) सौदा। रही = पड़ी रही, बेकद्री पड़ी रही। घर बारि = अंदर ही। वखर = सौदा। अगला = बहुत। कूड़िआर = नाशवान पदार्तों की गाहक।2।
अर्थ: सरमाये के बिना व्यापारी (नफे के लिए व्यर्थ ही) चारों तरफ देखता है। जो मनुष्य (अपनी जिंदगी के) मूल प्रभु को नहीं समझता, उसकी असल संपत्ति उसके हृदय घर के अंदर ही (बे-पहिचान सा) पड़ा रहता है। नाशवान पदार्थ की व्यापारिन (जीव-स्त्री) झूठ में लग के (आत्मिक गुणों से) लूटी जा रही है। नाम धन से वंचित रह के उसे बहुत आत्मिक कष्ट व्यापता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
लाहा अहिनिसि नउतना परखे रतनु वीचारि ॥ वसतु लहै घरि आपणै चलै कारजु सारि ॥ वणजारिआ सिउ वणजु करि गुरमुखि ब्रहमु बीचारि ॥३॥
मूलम्
लाहा अहिनिसि नउतना परखे रतनु वीचारि ॥ वसतु लहै घरि आपणै चलै कारजु सारि ॥ वणजारिआ सिउ वणजु करि गुरमुखि ब्रहमु बीचारि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लाहा = लाभ। अहि = दिन। निसि = रात। नउतना = नया। वीचारि = विचार के। घरि = घर में। सारि = संभाल के, संवार के, सिरे चढ़ा के। करि = कर के। गुरमुखि = गुरु के सन्मुख हो के। ब्रहम बीचारि = परमात्मा (के गुणों) को सोच मंडजल में ला के।3।
अर्थ: जो मनुष्य सोच समझ के नाम रतन को परखता है (नाम की कीमत जानता व समझता है) उसको दिन रात (आत्मिक गुणों का नित्य) नया नफा होता रहता है। जो मनुष्य नाम के व्यापारी सत्संगियों के साथ मिल के नाम का व्यापार करता है, जो गुरु की शरण पड़ के परमात्मा (के गुणों) को अपने सोच मण्डल मेंलाता है, वह अपने दिल में ही अपनी असल संपत्ति ढूंढ लेता है, और अपनी जिंदगी का उद्देश्य सिरे चढ़ा के यहां से जाता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
संतां संगति पाईऐ जे मेले मेलणहारु ॥ मिलिआ होइ न विछुड़ै जिसु अंतरि जोति अपार ॥ सचै आसणि सचि रहै सचै प्रेम पिआर ॥४॥
मूलम्
संतां संगति पाईऐ जे मेले मेलणहारु ॥ मिलिआ होइ न विछुड़ै जिसु अंतरि जोति अपार ॥ सचै आसणि सचि रहै सचै प्रेम पिआर ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिसु अंतरि = जिस (मनुष्य) के अंदर। सचै आसणि = अडोल आसन पे।4।
अर्थ: (परमात्मा खुद ही आत्मिक गुणों का खजाना ढुंढवा सकता है) अगर उस खजाने के साथ मिलाप करवाने के समर्थ प्रभु खुद मिलाप करवा दे तो वह खजाना संतो की संगति में रह के मिल सकता है, और जिस मनुष्य के अंदर बेअंत प्रभु की ज्योति (एक बार जाग जाए) वह प्रभु चरणों में मिल के फिर नहीं बिछुड़ता। क्योंकि, वह अडोल (आत्मिक) आसन पर बैठ जाता है। वह सदा स्थिर प्रभु में लगन लगा लेता है। वह अपना प्रेम प्यार सदा स्थिर प्रभु में लगा लेता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिनी आपु पछाणिआ घर महि महलु सुथाइ ॥ सचे सेती रतिआ सचो पलै पाइ ॥ त्रिभवणि सो प्रभु जाणीऐ साचो साचै नाइ ॥५॥
मूलम्
जिनी आपु पछाणिआ घर महि महलु सुथाइ ॥ सचे सेती रतिआ सचो पलै पाइ ॥ त्रिभवणि सो प्रभु जाणीऐ साचो साचै नाइ ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आपु = अपने आप को। महलु = परमात्मा का महल। सुथाइ = (ष्) सु+थाइ, श्रेष्ठ जगह में (हृदय-रूपी)। पलै पाइ = प्राप्त कर लेता है। त्रिभवणि = तिनों भवनों वाले सारे जगत में। साचै नाइ = सदा स्थिर प्रभु के नाम में (जुड़ के)।5।
अर्थ: (गुरु की मति पर चल के) जिन्होंने अपने आप को पहिचान लिया है, उनको अपने हृदय-रूप सुंदर स्थान में ही परमात्मा का निवास स्थान मिल जाता है। सदा स्थिर प्रभु के प्यार रंग में रंगे रहने के कारण उन्हे वह सदा कायम रहने वाला प्रभु मिल जाता है। (हे भोली जीव-स्त्री!) यदि सच्चे प्रभु के नाम में जुड़े रहें, तो उस सदा स्थिर प्रभु की तीनों भवनों में सर्व-व्यापकता को पहचान लेते हैं।5।
[[0057]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सा धन खरी सुहावणी जिनि पिरु जाता संगि ॥ महली महलि बुलाईऐ सो पिरु रावे रंगि ॥ सचि सुहागणि सा भली पिरि मोही गुण संगि ॥६॥
मूलम्
सा धन खरी सुहावणी जिनि पिरु जाता संगि ॥ महली महलि बुलाईऐ सो पिरु रावे रंगि ॥ सचि सुहागणि सा भली पिरि मोही गुण संगि ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साधन = जीव-स्त्री। खरी = बहुत। जिनि = जिस (साधन) ने। महली = वह जीव-स्त्री। महिल = प्रभु के महल में। रावै = प्यार करता है, माणता है। रंगि = प्रेम में (आ के)। सचि = सच में, सदा स्थिर प्रभु में, अमर प्रभु में। पिरि = पिर ने।6।
अर्थ: (गुरु की शरण पड़ के) जिस जीव-स्त्री ने पति प्रभु को अपने अंग-संग समझ लिया है, वह जीव-स्त्री सचमुच सुंदर (सुंदर जीवन वाली) हो जाती है। वह जीव-स्त्री प्रभु के महल में बुलाई जाती है, वह प्रभु पति प्रेम रंग में आकर उससे प्यार करता है, पति प्रभु ने आत्मिक गुणों से उसको ऐसा मोह लिया होता है कि वह सदा स्थिर प्रभु में लीन हो के सुहाग भाग वाली नेक बन जाती है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भूली भूली थलि चड़ा थलि चड़ि डूगरि जाउ ॥ बन महि भूली जे फिरा बिनु गुर बूझ न पाउ ॥ नावहु भूली जे फिरा फिरि फिरि आवउ जाउ ॥७॥
मूलम्
भूली भूली थलि चड़ा थलि चड़ि डूगरि जाउ ॥ बन महि भूली जे फिरा बिनु गुर बूझ न पाउ ॥ नावहु भूली जे फिरा फिरि फिरि आवउ जाउ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: थलि = धरती पे। चढ़ि = चढ़ के। डूगरि = पहाड़ों पे। जाउ = जाऊं, मैं जाऊँ। बूझ = समझ। नावहु = (प्रभु के) नाम से। आवउ जाउ = मैं आती और जाती हूँ, पैदा होती व मरती हूँ।7।
अर्थ: (आत्मिक गुणों के व्यापार से वंचित हो के, जीवन के सही रास्ते से) भूल के अगर मैं (दुनिया छोड़ के भी) सारी धरती पर घूमती रहूँ, धरती पे भ्रमण करके फिर यदि मैं पहाड़ों पर भी जा चढ़ूँ (यदि मैं किसी पहाड़ की गुफा में भी जा टिकूं) (सही रास्ते से) भटक के अगर मैं जंगलों में भटकती फिरूँ, तो भी मुझे (आत्मिक रास्ते की) सही समझ नहीं पड़ सकती। क्योंकि, गुरु के बिना इस रास्ते की सूझ नहीं पड़ती। यदि मैं परमात्मा के नाम से वंचित हुई (जंगलों पहाड़ों में) फिरती रही, तो मैं मुड़-मुड़ जनम मरन के चक्कर सहेड़ लूंगी।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पुछहु जाइ पधाऊआ चले चाकर होइ ॥ राजनु जाणहि आपणा दरि घरि ठाक न होइ ॥ नानक एको रवि रहिआ दूजा अवरु न कोइ ॥८॥६॥
मूलम्
पुछहु जाइ पधाऊआ चले चाकर होइ ॥ राजनु जाणहि आपणा दरि घरि ठाक न होइ ॥ नानक एको रवि रहिआ दूजा अवरु न कोइ ॥८॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पधाऊ = मुसाफिर, राही, पांधी। चाकर = सेवक, दास। राजनु = राजा, परमात्मा। दरि = दर से। घरि = घर में। ठाक = रोक। रवि रहिआ = व्यापक है।8।
अर्थ: (हे भोली जीव-स्त्री! यदि जीवन का सही रास्ता ढूंढना है तो) जा के उन (आत्म) राहियों से पूछ जो (प्रभु दर के) सेवक बन के (जीवन-राह पे) चल रहे हैं, वह (इस सृष्टि के मालिक) पातशाह को अपना समझते हैं। उनको प्रभु पातशाह के दर और घर में (जाने की) कोई रोक नहीं होती। हे नानक! उनको हर जगह एक परमात्मा ही मौजूद दिखाई देता है। कहीं भी उन्हें उसके बिनां और कोई नहीं दिखता।8।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ गुर ते निरमलु जाणीऐ निरमल देह सरीरु ॥ निरमलु साचो मनि वसै सो जाणै अभ पीर ॥ सहजै ते सुखु अगलो ना लागै जम तीरु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ गुर ते निरमलु जाणीऐ निरमल देह सरीरु ॥ निरमलु साचो मनि वसै सो जाणै अभ पीर ॥ सहजै ते सुखु अगलो ना लागै जम तीरु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ते = से, के द्वारा। देह = शरीर, काया। मनि = मन में। अभ पीर = अंदरूनी वेदना, हृदय की पीड़ा। सहजै ते = सहज अवस्था से। अगलो = बहुत। जम तीरु = यम का तीर।1।
अर्थ: (हे भाई!) गुरु के द्वारा ही पवित्र नाम जल से सांझ पड़ती है, और मनुष्य का शरीर पवित्र हो जाता है (भाव, सारी ज्ञान इद्रियां विकारों की मैल से बचे रहते हैं)। (गुरु की कृपा से) वह सदा स्थिर पवित्र प्रभु जो मनुष्य की अंदर की वेदना जानता है मनुष्य के मन में आ प्रगटता है (इस प्रकाश की इनायत से मन सहज अवस्था में टिक जाता है) सहज अवस्था से बहुतआत्मिक आनंद उत्पन्न होता है, जम का तीर भी नहीं लगता (ष्मौत का डर नहीं व्यापता)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे मैलु नाही निरमल जलि नाइ ॥ निरमलु साचा एकु तू होरु मैलु भरी सभ जाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे मैलु नाही निरमल जलि नाइ ॥ निरमलु साचा एकु तू होरु मैलु भरी सभ जाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जलि = जल में। नाइ = नहा के, नहाने से। जाइ = जगह।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (जैसे साफ पानी में नहाने से शरीर की मैल उतर जाती है, वैसे ही परमात्मा के) पवित्र नाम जल में स्नान करने से मन पर (विकारों की) मैल नहीं रह जाती। इस वास्ते, हे भाई! उस आत्मिक स्नान की खातिर परमात्मा की महिमा करके कह: हे प्रभु! सिर्फ तू सदा स्थिर प्रभु ही पवित्र है, बाकी और हरेक जगह (माया के मोह की) मैल से भरी हुई है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि का मंदरु सोहणा कीआ करणैहारि ॥ रवि ससि दीप अनूप जोति त्रिभवणि जोति अपार ॥ हाट पटण गड़ कोठड़ी सचु सउदा वापार ॥२॥
मूलम्
हरि का मंदरु सोहणा कीआ करणैहारि ॥ रवि ससि दीप अनूप जोति त्रिभवणि जोति अपार ॥ हाट पटण गड़ कोठड़ी सचु सउदा वापार ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हरि का मंदरु = मनुष्य का शरीर। करणै हारि = (जगत) की रचना करने वाले कर्तार ने। रवि = सूर्य, तेज (अज्ञानता का अंधेरा दूर करने वाला आत्म) प्रकाश। ससि = चंद्रमा, शीतलता, शांत अवस्था (जो काम, क्रोध आदि तपश को बुझाने के समर्थ है)। दीप = दीए आत्मिक प्रकाश देने वाले। अनूप = बेमिसाल। त्रिभवणि जोति = तीनों भवनों को प्रकाशमय करने वाली ईश्वरीय ज्योति। पटण = शहर। गढ़ = किले।2।
अर्थ: (जिस मनुष्य पे गुरु मेहरबान है, उसके दिल में सृष्टि के रचनहार) कर्तार ने (अपने रहने के लिए) सुंदर महल बना लिया है। तीनों भवनों में व्याप्त बेअंत प्रभु की अनूप ज्योति उसके अंदर जाग पड़ती है। उसके अंदर सूर्य और चाँद (मानों) दिए जल पड़ते हैं (भाव, उसके अंदर अज्ञानता का अंधेरा दूर करने वाला ज्ञान सूर्य व काम क्रोध आदि की तपश को बुझाने वाली शांत अवस्था का चाँद प्रगट हो जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गिआन अंजनु भै भंजना देखु निरंजन भाइ ॥ गुपतु प्रगटु सभ जाणीऐ जे मनु राखै ठाइ ॥ ऐसा सतिगुरु जे मिलै ता सहजे लए मिलाइ ॥३॥
मूलम्
गिआन अंजनु भै भंजना देखु निरंजन भाइ ॥ गुपतु प्रगटु सभ जाणीऐ जे मनु राखै ठाइ ॥ ऐसा सतिगुरु जे मिलै ता सहजे लए मिलाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंजनु = सुरमा। भै भंजना = दुनिया के डर नाश करने वाला। निरंजन भाइ = माया रहित प्रभु के प्रेम में। ठाइ = स्थान पर, एक ठिकाने पे। सहज = आत्मिक अडोलता में (जुड़ के)।3।
अर्थ: अगर मनुष्य अपने मन को ठिकाने पर रखे, तो उसे दृश्य-अदृश्य जगत में हर जगह परमात्मा ही बसता प्रतीत होता है। (तू भी, हे भाई!) प्रभु की रजा में रहके सब डर नाश करने वाला ज्ञान का सुरमा (अंजन) देने वाला गुरु यदि मिल जाए तो उस मनुष्य को अडोल आत्मिक अवस्था में जोड़ देता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कसि कसवटी लाईऐ परखे हितु चितु लाइ ॥ खोटे ठउर न पाइनी खरे खजानै पाइ ॥ आस अंदेसा दूरि करि इउ मलु जाइ समाइ ॥४॥
मूलम्
कसि कसवटी लाईऐ परखे हितु चितु लाइ ॥ खोटे ठउर न पाइनी खरे खजानै पाइ ॥ आस अंदेसा दूरि करि इउ मलु जाइ समाइ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कसि = (सोने को परखने वाली कसवटी पर) घिसाना। हितु = प्यार, ध्यान। नाइ = नहा के। ठउर = जगह। न पाइनी = नहीं पाते, नहीं प्राप्त करते।4।
अर्थ: (जैसे सोने को परखने के लिए) कसवटी ऊपर कस लेते हैं (वैसे ही ईश्वर अपने पैदा किए हुए लोगों के आत्मिक जीवन को) बड़े प्यार से ध्यान लगा के परखता है। खोटों को (उसके दर पर) जगह नहीं मिलती, खरों को वह अपने खजाने में शामिल कर लेता है। (हे भाई! गुरु की शरण पड़ के अपने अंदर से दुनिया वाली) उम्मीदें और सहम निकाल दे। ऐसा उद्यम करने से (मन के विकारों की) मैल दूर हो जाएगी, (और मन प्रभु चरणों में लीन हो जाएगा)।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुख कउ मागै सभु को दुखु न मागै कोइ ॥ सुखै कउ दुखु अगला मनमुखि बूझ न होइ ॥ सुख दुख सम करि जाणीअहि सबदि भेदि सुखु होइ ॥५॥
मूलम्
सुख कउ मागै सभु को दुखु न मागै कोइ ॥ सुखै कउ दुखु अगला मनमुखि बूझ न होइ ॥ सुख दुख सम करि जाणीअहि सबदि भेदि सुखु होइ ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभु को = हरेक जीव। कउ = को। अगला = बहुत। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य। बूझ = समझ। सम = बराबर, एक जैसे। जाणीअहि = (जब) जान लिए जाते हैं। सबदि = गुरु के शब्द के द्वारा। भेदि = भेद के (मन को)।5।
अर्थ: हरेक जीव (दुनिया के) सुख मांगता है, कोई भी दुख नहीं मांगता। पर, (संसारिक) सुखों को दुख-रूप फल बहुत लगता है, अपने मन के पीछे चलने वाले आदमी को इस (भेद) की समझ नहीं आती (वह दुनिया के सुख ही मांगता रहता हैऔर नाम से वंचित रहता है)। (दरअसल दुनिया के) सुख और दुख एक जैसे ही समझने चाहिए। असल आत्मिक सुख तभी मिलता है यदि गुरु के शब्द के द्वारा मन को भेद लिया जाए (मन को नाथ के दुनिया के मौज मेलों से रोक के रखा जाए)।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बेदु पुकारे वाचीऐ बाणी ब्रहम बिआसु ॥ मुनि जन सेवक साधिका नामि रते गुणतासु ॥ सचि रते से जिणि गए हउ सद बलिहारै जासु ॥६॥
मूलम्
बेदु पुकारे वाचीऐ बाणी ब्रहम बिआसु ॥ मुनि जन सेवक साधिका नामि रते गुणतासु ॥ सचि रते से जिणि गए हउ सद बलिहारै जासु ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वाचीऐ = पढ़नी चाहिए। बाणी ब्रहम = ब्रहम की वाणी, परमेश्वर के महिमा की वाणी। बिआसु = व्यास (ऋषि)। मुनि जन = मुनि लोग। नामि = नाम में। गुण तासु = गुणों का खजाना प्रभु। जिणि गए = जीत के (यहां से) गए। जासु = मैं जाता हूं।6।
अर्थ: व्यास ऋषि (तो बारंबार) वेद को ही ऊँचा ऊँचा उचारता है, (पर, हे भाई!) परमात्मा की महिमा की वाणी पढ़नी चाहिए। असली मुनि लोग सेवक और साधिक वही हैंजो गुणों के खजाने परमात्मा के नाम में रंगे हुए हैं। जो लोग सदा कायम रहने वाले नाम रंग में रंगे जाते हैं, वह (संसार से जीवन की बाजी) जीत के जाते हैं। मैं भी उनसे कुर्बान जाता हूँ।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
चहु जुगि मैले मलु भरे जिन मुखि नामु न होइ ॥ भगती भाइ विहूणिआ मुहु काला पति खोइ ॥ जिनी नामु विसारिआ अवगण मुठी रोइ ॥७॥
मूलम्
चहु जुगि मैले मलु भरे जिन मुखि नामु न होइ ॥ भगती भाइ विहूणिआ मुहु काला पति खोइ ॥ जिनी नामु विसारिआ अवगण मुठी रोइ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चहु जुगि = सदा ही। मैलु भरे = (विकारों की) मैल से लिबड़े हुए। पति = इज्जत। खोइ = गवा के। जिस जिस जीव-स्त्री ने। मुठी = ठगी हुई, लुटी हुई।7।
अर्थ: पर जिनके मुंह में प्रभु का नाम नहीं है वह सदा ही मैले (मन वाले) हैं, (उनके मन विकारों की) मैल से भरे रहते हैं। परमात्मा की भक्ति और प्यार से वंचित लोगों का मुंह (उसकी हजूरी में) काला (दिखाई देता है।) वह अपनी इज्जत गवा के (जाते हैं)। जिस जिस जीव-स्त्री ने प्रभु का नाम भुला दिया है, (उसके आत्मिक सरमाए को औगुणों ने लूट लिया है, वह रोती पछताती है)।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
खोजत खोजत पाइआ डरु करि मिलै मिलाइ ॥ आपु पछाणै घरि वसै हउमै त्रिसना जाइ ॥ नानक निरमल ऊजले जो राते हरि नाइ ॥८॥७॥
मूलम्
खोजत खोजत पाइआ डरु करि मिलै मिलाइ ॥ आपु पछाणै घरि वसै हउमै त्रिसना जाइ ॥ नानक निरमल ऊजले जो राते हरि नाइ ॥८॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आपु = अपने आप को। घरि = घर में। हरि नाइ = हरि के नाम में।8।
अर्थ: (गुरु के द्वारा) तलाश करते करते यह बात मिल जाती है कि परमात्मा का डर अदब हृदय में धारण करने से परमात्मा गुरु के मिलाने से मिल जाता है। जो मनुष्य (गुरु की शरण पड़ के) अपने आप को पहचानता है, उसका मन बाहर भटकने से हट कर अंतर-आत्मे टिक जाता है, उसका अहम् दूर हो जाता है, उसकी तृष्णा मिट जाती है।
हे नानक! जो मनुष्य प्रभु के नाम रंग में रंगे जाते हैं, उनके जीवन पवित्र व रौशन हो जाते हैं।8।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ सुणि मन भूले बावरे गुर की चरणी लागु ॥ हरि जपि नामु धिआइ तू जमु डरपै दुख भागु ॥ दूखु घणो दोहागणी किउ थिरु रहै सुहागु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ सुणि मन भूले बावरे गुर की चरणी लागु ॥ हरि जपि नामु धिआइ तू जमु डरपै दुख भागु ॥ दूखु घणो दोहागणी किउ थिरु रहै सुहागु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बावरे = हे पागल! दुख भागु = दुखों को भगदड़ (पड़ जाती है)। दोहागणी = दुर्भाग्यपूर्ण स्त्री।1।
अर्थ: हे पथ भ्रष्ट पागल मन! (मेरी शिक्षा) सुन। (शिक्षा ये है कि) गुरु की शरण पड़ (गुरु से परमात्मा का नाम मिलता है, तू भी वह) हरि नाम जप। (हरि चरणों में) तवज्जो जोड़ (प्रभु का नाम स्मरण करने से) यमराज भी डर जाता है और दुखों को भगदड़ पड़ जाती है। (पर, जो) भाग्यहीन जीवस्त्री (नाम नहीं सिमरती, उसे) बहुत दुख-कष्टों का सामना करना पड़ता है (दुखों में भगदड़ तभी मच सकती है, जब सिर पर खसम सांई हो, पर जो खसम का नाम कभी याद ही नहीं करती, उसके सिर पे) खसम सांई कैसे टिका हुआ प्रतीत हो?।1।
[[0058]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे अवरु नाही मै थाउ ॥ मै धनु नामु निधानु है गुरि दीआ बलि जाउ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे अवरु नाही मै थाउ ॥ मै धनु नामु निधानु है गुरि दीआ बलि जाउ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निधानु = खजाना। गुरि = गुरु ने। बलि = कुरबान, सदके।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! मेरे वास्ते तो प्रभु नाम ही धन है, नाम ही खजाना है (ये खजाना जिस किसी को दिया है) गुरु ने (ही) दिया है। मैं गुरु पे कुर्बान हूँ। (नाम खजाना हासिल करने के लिए) मुझे (गुरु के बिनां) और कोई जगह नहीं दिखती।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमति पति साबासि तिसु तिस कै संगि मिलाउ ॥ तिसु बिनु घड़ी न जीवऊ बिनु नावै मरि जाउ ॥ मै अंधुले नामु न वीसरै टेक टिकी घरि जाउ ॥२॥
मूलम्
गुरमति पति साबासि तिसु तिस कै संगि मिलाउ ॥ तिसु बिनु घड़ी न जीवऊ बिनु नावै मरि जाउ ॥ मै अंधुले नामु न वीसरै टेक टिकी घरि जाउ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पति = इज्जत। मरि जाउ = मैं आत्मिक मौत मर जाता हूँ।2।
अर्थ: साबाश है उस (गुरु) को जिस गुरु की मति मिलने से इज्जत मिलती है। (प्रभु मेहर करे) मैं उस (गुरु) की संगति में जुड़ा रहूँ। (नाम की दाति देने वाले) उस गुरु के बिना मैं एक घड़ी भी नहीं रह सकता। क्योंकि, नाम के बिना मेरी आत्मिक मौत हो जाती है। (नाम के बिना मैं माया के मोह में अंधा हो जाता हूँ, प्रभु मेहर करे) मुझ अंधे को उसका नाम ना भूल जाए। मैं गुरु के आसरे की टेक ले के प्रभु चरणों में जुड़ा रहूँ।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरू जिना का अंधुला चेले नाही ठाउ ॥ बिनु सतिगुर नाउ न पाईऐ बिनु नावै किआ सुआउ ॥ आइ गइआ पछुतावणा जिउ सुंञै घरि काउ ॥३॥
मूलम्
गुरू जिना का अंधुला चेले नाही ठाउ ॥ बिनु सतिगुर नाउ न पाईऐ बिनु नावै किआ सुआउ ॥ आइ गइआ पछुतावणा जिउ सुंञै घरि काउ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुआउ = स्वार्थ, जीवन उद्देश्य। काउ = कौआ।3।
अर्थ: (पर गुरु भी हो तो आँखों वाला हो) जिनका गुरु (खुद ही माया के मोह में) अंधा हो गया हो, उनके चेलों को (आत्मिक सुख का) स्थान टिकाना नहीं मिल सकता। (पूरे) गुरु के बिना प्रभु का नाम नहीं मिलता। नाम के बिना और कोई (बढ़िया) जीवन उद्देश्य हो ही नहीं सकता। नाम से वंचित रहा मनुष्य दुनिया में आया और चला गया, पछतावा ही (साथ ले गया, खाली हाथ ही जग से गया)। जैसे सूने घर में आया कौआ (भी खली ही जाता है)।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बिनु नावै दुखु देहुरी जिउ कलर की भीति ॥ तब लगु महलु न पाईऐ जब लगु साचु न चीति ॥ सबदि रपै घरु पाईऐ निरबाणी पदु नीति ॥४॥
मूलम्
बिनु नावै दुखु देहुरी जिउ कलर की भीति ॥ तब लगु महलु न पाईऐ जब लगु साचु न चीति ॥ सबदि रपै घरु पाईऐ निरबाणी पदु नीति ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देहुरी = शरीर (को)। भीति = दीवार। चीति = चिक्त में। रपै = रंगा जाए। निरबाणी पदु = वह आत्मक दर्जा जहां कोई वासना असर नहीं करती। निरबाणी = निर्वाण अवस्था, वासना रहित।4।
अर्थ: नाम स्मरण के बिना शरीर को (चिन्ता आदि इतना) दुख सताते हैं (कि शारीरिक क्षमता इस प्रकार छीण होती जाती है) जैसे कलर की दीवार (झड़ती जाती है)। (इस झुरने को बचाने के लिए) तब तक (प्रभु का) महल (रूपी सहारा) नहीं मिलता, जब तक वह सदा स्थिर प्रभु (जीव के) चिक्त में नहीं आ बसता। यदि गुरु के शब्द में मन रंगा जाए, तो प्रभु की हजूरी (की ओट) मिल जाती है, और वह आत्मिक अवस्था सदा के लिए प्राप्त हो जाती है जहां कोई वासना अपना प्रभाव नहीं डाल सकती।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ गुर पूछउ आपणे गुर पुछि कार कमाउ ॥ सबदि सलाही मनि वसै हउमै दुखु जलि जाउ ॥ सहजे होइ मिलावड़ा साचे साचि मिलाउ ॥५॥
मूलम्
हउ गुर पूछउ आपणे गुर पुछि कार कमाउ ॥ सबदि सलाही मनि वसै हउमै दुखु जलि जाउ ॥ सहजे होइ मिलावड़ा साचे साचि मिलाउ ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पुछि = पूछ के। सबदि = गुरु के शब्द द्वारा। मनि = मन मे।5।
अर्थ: (सो, हे भाई! इस निर्वाण पद की प्राप्ति के वास्ते) मैं अपने गुरु को पूछूँगी। गुरु से पूछ के (उस द्वारा बताए) कर्म करूँगी। मैं गुरु के शब्द में जुड़ के प्रभु की महिमा करूँगी। (भला कहीं प्रभु मेरे) मन में आ बसे (प्रभु की मेहर हो, मेरा) अहम् का दुख जल जाए, सहज अवस्था में टिक के मेरा प्रभु से सुंदर मिलाप हो जाए। सदा टिके रहने वाले प्रभु में मेरा सदा के लिए मेल हो जाए।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सबदि रते से निरमले तजि काम क्रोधु अहंकारु ॥ नामु सलाहनि सद सदा हरि राखहि उर धारि ॥ सो किउ मनहु विसारीऐ सभ जीआ का आधारु ॥६॥
मूलम्
सबदि रते से निरमले तजि काम क्रोधु अहंकारु ॥ नामु सलाहनि सद सदा हरि राखहि उर धारि ॥ सो किउ मनहु विसारीऐ सभ जीआ का आधारु ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तजि = त्याग के। सलाहनि = सराहते हैं। उरि धारि = दिल में टिका के। आधारु = आसरा।6।
अर्थ: जो लोग गुरु के शब्द में रंगे जाते हैं वह काम क्रोध (आदि विकारों) को त्याग के पवित्र (जीवन वाले) हो जाते हैं। वह सदा प्रभु का नाम सलाहते हैं, वे परमात्मा की याद को सदैव अपने दिल में टिका के रखते हैं।
(हे भाई!) जो प्रभु सारे जीवों (की जिंदगी का) आसरा है, उसे कभी भी मन से भुलाना नहीं चाहिए।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सबदि मरै सो मरि रहै फिरि मरै न दूजी वार ॥ सबदै ही ते पाईऐ हरि नामे लगै पिआरु ॥ बिनु सबदै जगु भूला फिरै मरि जनमै वारो वार ॥७॥
मूलम्
सबदि मरै सो मरि रहै फिरि मरै न दूजी वार ॥ सबदै ही ते पाईऐ हरि नामे लगै पिआरु ॥ बिनु सबदै जगु भूला फिरै मरि जनमै वारो वार ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सबदि = शब्द में (जुड़ के)। मरै = (विकारों की ओर से) मरता है।7।
अर्थ: जो मनुष्य गुरु के शब्द में जुड़ के (विकारों की ओर से) मर जाता है (बेअसर हो जाता है) वह (ऐसी मरनी) मर के स्थिर हो जाता है (विकारों से टक्कर के लिए तगड़ा हो जाता है, वह मनुष्य विकारों की जकड़ में आ के) फिर कभी आत्मिक मौत नहीं मरता। (ये अटल आत्मिक जीवन) गुरु के शब्द से ही मिलता है। (गुरु के शब्द से ही) प्रभु के नाम में प्यार बनता है। गुरु के शब्द के बिनां जगत (जीवन-राह से) गुमराह हो के भटकता है, और बारंबार जन्म मरण के चक्रव्यूह में फंसा रहता है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभ सालाहै आप कउ वडहु वडेरी होइ ॥ गुर बिनु आपु न चीनीऐ कहे सुणे किआ होइ ॥ नानक सबदि पछाणीऐ हउमै करै न कोइ ॥८॥८॥
मूलम्
सभ सालाहै आप कउ वडहु वडेरी होइ ॥ गुर बिनु आपु न चीनीऐ कहे सुणे किआ होइ ॥ नानक सबदि पछाणीऐ हउमै करै न कोइ ॥८॥८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आप कउ = अपने आप को। ना चीनीऐ = परखा नहीं जा सकता, ना पहचाना जा सके।8।
अर्थ: सारी दुनिया अपने आप को सालाहती है कि हमारी ज्यादा से ज्यादा प्रशंसा सत्कार हो (अपने आप की सूझ के बिना ही यह लालसा बनी रहती है)। गुरु की शरण पड़े बगैर अपने आप की पहिचान नहीं हो सकती। ज्ञान की बातें निरी कहने सुनने से कुछ नहीं बनता।
हे नानक! गुरु के शब्द से ही अपने आप को पहचाना जा सकता है (और जो मनुष्य अपने आप की पहिचान कर लेता है) वहअपनी प्रशंसा की बातें नहीं करता।8।8।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ बिनु पिर धन सीगारीऐ जोबनु बादि खुआरु ॥ ना माणे सुखि सेजड़ी बिनु पिर बादि सीगारु ॥ दूखु घणो दोहागणी ना घरि सेज भतारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ बिनु पिर धन सीगारीऐ जोबनु बादि खुआरु ॥ ना माणे सुखि सेजड़ी बिनु पिर बादि सीगारु ॥ दूखु घणो दोहागणी ना घरि सेज भतारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: धन = स्त्री। सीगारीऐ = (अगर) श्रृंगारी जाए, यदि गहने आदि से सजाई जाए। जोबनु = जवानी। बादि = व्यर्थ। खुआरु = दुखी। सुखि = सुख से, आनंद से। सेजड़ी = सुंदर सेज। घणे = बहुत। घरि = घर में। सेज भतारु = सेज का मालिक खसम।1।
अर्थ: (अगर, स्त्री गहनों आदि से) अपने आप को सजा ले, पर उसे पति ना मिले तो उसकी जवानी व्यर्थ जाती है। उसकी आत्मा भी दुखी होती है। क्योंकि, आनंद से पति की सुंदर सेज का आनंद नहीं ले सकती। पति मिलाप के बगैर उसका सारा श्रृंगार व्यर्थ जाता है। उस दुर्भाग्यपूर्ण स्त्री को बहुत दुख होता है, उसके घर में सेज का मालिक खसम नहीं आता (जीवस्त्री के सारे बाहरमुखी धार्मिक कर्म व्यर्थ जाते हैं, अगर हृदय सेज का मालिक प्रभु हृदय में प्रगट ना हो)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे राम जपहु सुखु होइ ॥ बिनु गुर प्रेमु न पाईऐ सबदि मिलै रंगु होइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे राम जपहु सुखु होइ ॥ बिनु गुर प्रेमु न पाईऐ सबदि मिलै रंगु होइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सबदि = गुरु के शब्द में (जुड़ने से)। रंगु = नाम का रंग।1। रहाउ।
अर्थ: हे मन! परमात्मा का नाम स्मरण कर, (तुझे) सुख होगा। (पर मन भी क्या करे? जिसके साथ प्यार ना हो, उसको बार बार कैसे याद किया जाए? परमात्मा के साथ ये) प्यार गुरु के बिनां नहीं बन सकता। जो मन गुरु के शब्द में जुड़ता है उसको प्रभु के नाम का रंग चढ़ जाता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर सेवा सुखु पाईऐ हरि वरु सहजि सीगारु ॥ सचि माणे पिर सेजड़ी गूड़ा हेतु पिआरु ॥ गुरमुखि जाणि सिञाणीऐ गुरि मेली गुण चारु ॥२॥
मूलम्
गुर सेवा सुखु पाईऐ हरि वरु सहजि सीगारु ॥ सचि माणे पिर सेजड़ी गूड़ा हेतु पिआरु ॥ गुरमुखि जाणि सिञाणीऐ गुरि मेली गुण चारु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सहजि = अडोल आत्मिक अवस्था में। सचि = सदा स्थिर प्रभु में (जुड़ के)। पिर सेजड़ी = पति की सुंदर सेज। हेतु = हित, प्रेम। जाणि = जान के, गहरी सांझ डालके। गुरि = गुरु ने। चारु = सुंदर। गुण चारु = सुंदर गुणों वाला प्रभु।2।
अर्थ: गुरु द्वारा बताई सेवा से ही आत्मिक आनंद मिलता है। प्रभु पति उसी जीव-स्त्री को प्राप्त होता है जिसने अडोल आत्मिक अवस्था में (जुड़के) अपने आप को श्रृंगारा हैं वही जीव-स्त्री प्रभु पति की सुंदर सेज का आनंद ले सकती है जो उस सदा स्थिर प्रभु में (जुड़ी रहती है), जिसका प्रभु पति के साथ गहरा हित है, गहरा प्यार है। गुरु के सन्मुख रहके ही प्रभु के साथ गहरी सांझ डाल के उसे मनाया जा सकता है (भाव, ये समझ आती है कि वह हमारा है), वह सुंदर गुणों का मालिक प्रभु (जिस जीव-स्त्री को मिला है) गुरु ने मिलाया है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचि मिलहु वर कामणी पिरि मोही रंगु लाइ ॥ मनु तनु साचि विगसिआ कीमति कहणु न जाइ ॥ हरि वरु घरि सोहागणी निरमल साचै नाइ ॥३॥
मूलम्
सचि मिलहु वर कामणी पिरि मोही रंगु लाइ ॥ मनु तनु साचि विगसिआ कीमति कहणु न जाइ ॥ हरि वरु घरि सोहागणी निरमल साचै नाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वर कामणी = हे प्रभु पति की जीव-स्त्री! पिरि = पिर ने। विगसिआ = खिल पड़ा। साचै नाइ = सच्चे प्रभु के नाम में (जुड़ के)।3।
अर्थ: हे प्रभु पति की सुंदर स्त्री! उस सदा स्थिर प्रभु (के चरणों) में (सदा) मिली रह। पति प्रभु ने (जिस जीव-स्त्री के मन को अपने प्यार का) रंग चढ़ा के (अपनी ओर) खींच लिया है, उसका मन, उसका तन सदा स्थिर प्रभु में जुड़के खिल पड़ा है (उसका जीवन इतना अमोलक बन जाता है कि) उसका मुल्य नहीं पड़ सकता। वह सोहाग भाग वाली जीव-स्त्री सदा स्थिर हरि के नाम में (जुड़ के) पवित्र आत्मा हो जाती है, और प्रभु पति को अपने (दिल) घर में (ही ढूंढ लेती है)।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन महि मनूआ जे मरै ता पिरु रावै नारि ॥ इकतु तागै रलि मिलै गलि मोतीअन का हारु ॥ संत सभा सुखु ऊपजै गुरमुखि नाम अधारु ॥४॥
मूलम्
मन महि मनूआ जे मरै ता पिरु रावै नारि ॥ इकतु तागै रलि मिलै गलि मोतीअन का हारु ॥ संत सभा सुखु ऊपजै गुरमुखि नाम अधारु ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनूआ = होछा मन, भुलक्कड़ मन। रावै = प्यार करता है। इकतु = एक में। इकतु तागै = एक ही धागे में। रलि = मिल-जुलके, एकमेक हो के। अधारु = आसरा।4।
अर्थ: यदि (जीव-स्त्री का) छोटा सा मन (प्रभु पति के विशाल) मन में (छोटे स्वाभाव से) मर जाए, तो जैसे एक ही धागे में परोए हुए मोतियों का हार गले में डाल लेते हैं, उसी तरह यदि (जीव-स्त्री प्रभु के ही) एक-तवज्जो धागे एक मेक हो के प्रभु में लीन हो जाए तो प्रभु पति उस जीव नारी को प्यार करता है। पर यह आत्मिक आनंद सत्संग में टिकने से ही मिलता है, और सत्संग में गुरु की शरण पड़ के (मन को) प्रभु के नाम का सहारा मिलता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
खिन महि उपजै खिनि खपै खिनु आवै खिनु जाइ ॥ सबदु पछाणै रवि रहै ना तिसु कालु संताइ ॥ साहिबु अतुलु न तोलीऐ कथनि न पाइआ जाइ ॥५॥
मूलम्
खिन महि उपजै खिनि खपै खिनु आवै खिनु जाइ ॥ सबदु पछाणै रवि रहै ना तिसु कालु संताइ ॥ साहिबु अतुलु न तोलीऐ कथनि न पाइआ जाइ ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: उपजै = पैदा हो जाता है, प्रोत्साहित हो जाता है। खिनि = छिन में। खपै = खपता है, दुखी होता है। रवि रहे = (गुरु के शब्द में) जुड़ा रहे। ना संताइ = नहीं सताता।5।
अर्थ: (अगर मन नाम से वंचित रहे, तो माया, धन-संपदा आदि के लाभ से) एक छिन में ही (ऐसे होता है जैसे) जी पड़ता है (और माया आदि की कमी से) एक पल में ही दुखी हो जाता है। एक छिन (गुजरता है तो) वह पैदा हो जाता है, एक छिन (गुजरता है तो) वह मर जाता है (भाव, नाम के सहारे के बिना माया जीव के जीवन का आसरा बन जाती है। अगर माया आए तो उत्साह, अगर जाए तो सहम)। जो मनुष्य गुरु के शब्द से सांझ डालता है (प्रभु के चरणों में जुड़ने से ये तो नहीं हो सकता कि) उस मालिक (की हस्ती) को तोला जा सके। वह तौल से परे है (हां, ये जरूर है कि वह मिलता स्मरण से ही है) निरी बातों से नहीं मिलता।5।
[[0059]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
वापारी वणजारिआ आए वजहु लिखाइ ॥ कार कमावहि सच की लाहा मिलै रजाइ ॥ पूंजी साची गुरु मिलै ना तिसु तिलु न तमाइ ॥६॥
मूलम्
वापारी वणजारिआ आए वजहु लिखाइ ॥ कार कमावहि सच की लाहा मिलै रजाइ ॥ पूंजी साची गुरु मिलै ना तिसु तिलु न तमाइ ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वजहु = तनखाह, रोजीना। लाहा = लाभ। तमाइ = लालच।6।
अर्थ: सारे जीव बंजारे जीव व्यापारी (परमात्मा के दर से) दिहाड़ी (तनखाह) लिखा के (जगत में आते हैं। भाव, हरेक को जिंदगी के स्वाश व सारे पदार्तों की दाति प्रभु दर से मिलती है)। जो जीव व्यापारी सदा स्थिर प्रभु के नाम जपने की कार करते हैं, उनको प्रभु की रजा के अनुसार (आत्मिक जीवन का) लाभ मिलता है। (पर ये लाभ वही कमा सकते हैं जिनको) वह गुरु मिल जाता है जिस को (अपनी प्रशंसा आदि का) तिल जिनता भी लालच नहीं है। (जिस को गुरु मिलता है उनकी आत्मिक जीवन वाली) राशि पूंजी सदा के लिए स्थिर हो जाती है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखि तोलि तुोलाइसी सचु तराजी तोलु ॥ आसा मनसा मोहणी गुरि ठाकी सचु बोलु ॥ आपि तुलाए तोलसी पूरे पूरा तोलु ॥७॥
मूलम्
गुरमुखि तोलि तुोलाइसी सचु तराजी तोलु ॥ आसा मनसा मोहणी गुरि ठाकी सचु बोलु ॥ आपि तुलाए तोलसी पूरे पूरा तोलु ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तोलि तुोलाइसी = तोल में पूरा उतरवाएगा।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘तोलाइसी’ के अक्षर ‘त’के साथ दो मात्राएं हैं: ‘ु’ और ‘ो’। असल शब्द ‘तुोलाइसी’ ही है, जिसे यहां तुलाइसी पढ़ना है।
दर्पण-भाषार्थ
तराजी = तीरजू। गुरि = गुरु ने। ठाकी = रोक दी है।7।
अर्थ: (इन्सानी जीवन की सफलता की परख के वास्ते) सच ही तराजू है और सच ही बाँट है (जिसके पल्ले सच है वही सफल है)। इस परख तोल में वही मनुष्य पूरा उतरता है जो गुरु के सन्मुख रहता है। क्योंकि, गुरु ने (परमात्मा की महिमा की) सच्ची वाणी दे के मन को मोह लेने वाली आशाओं और मन के माया के फुरनों को (मन पर वार करने से) रोक रखा होता है। पूरे प्रभु का यह तोल (का रुतबा) कभी घटता-बढ़ता नहीं। वही जीव (इस तोल में) पूरा तुलता है जिसको प्रभु (नाम जपने की दात दे के) खुद (मेहर की निगाह से) तुलवाता है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कथनै कहणि न छुटीऐ ना पड़ि पुसतक भार ॥ काइआ सोच न पाईऐ बिनु हरि भगति पिआर ॥ नानक नामु न वीसरै मेले गुरु करतार ॥८॥९॥
मूलम्
कथनै कहणि न छुटीऐ ना पड़ि पुसतक भार ॥ काइआ सोच न पाईऐ बिनु हरि भगति पिआर ॥ नानक नामु न वीसरै मेले गुरु करतार ॥८॥९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कहणि = जबानी बातें करने से। पढ़ि = पढ़ के। सोच = स्वच्छता। करतार = कर्तार (का मेल)।8।
अर्थ: निरी बातें करने से या पुस्तकों के ढेरों के ढेर पढ़ने से आसा-मनसा से बचा नहीं जा सकता। (यदि हृदय में) परमात्मा की भक्ति नहीं, प्रभु का प्रेम नहीं, तो निरे शरीर की पवित्रता से परमात्मा नहीं मिलता।
हे नानक! जिस को (गुरु की शरण पड़ के परमात्मा का) नाम नहीं भूलता, उसको गुरु परमात्मा के मेल में मिला देता है।8।9।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ सतिगुरु पूरा जे मिलै पाईऐ रतनु बीचारु ॥ मनु दीजै गुर आपणे पाईऐ सरब पिआरु ॥ मुकति पदारथु पाईऐ अवगण मेटणहारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ सतिगुरु पूरा जे मिलै पाईऐ रतनु बीचारु ॥ मनु दीजै गुर आपणे पाईऐ सरब पिआरु ॥ मुकति पदारथु पाईऐ अवगण मेटणहारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सरब पिआरु = सबसे प्यार करने वाला परमात्मा। मुकति = विकारों से खलासी। पदारथु = कीमती चीज।1
अर्थ: परमात्मा के गुणों की विचार (जैसे, कीमती) रत्न है (यह रत्न तभी) मिलता है यदि पूरा गुरु मिल जाए। अपना मन गुरु के हवाले कर देना चाहिए। (इस तरह) सब से प्यार करने वाला प्रभु मिलता है। (गुरु की कृपा से) नाम पदार्थ मिलता है, जो विकारों से निजात दिलवाता है और जो अवगुण मिटाने के समर्थ है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे गुर बिनु गिआनु न होइ ॥ पूछहु ब्रहमे नारदै बेद बिआसै कोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे गुर बिनु गिआनु न होइ ॥ पूछहु ब्रहमे नारदै बेद बिआसै कोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गिआनु = आत्मक जीवन की समझ, परमात्मा से गहरी सांझ।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! (बेशक) कोई ब्रह्मा को, नारद को, वेदों वाले ऋषि ब्यास को पूछ लो, गुरु के बिना परमात्मा के साथ गहरी सांझ नहीं पड़ सकती।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गिआनु धिआनु धुनि जाणीऐ अकथु कहावै सोइ ॥ सफलिओ बिरखु हरीआवला छाव घणेरी होइ ॥ लाल जवेहर माणकी गुर भंडारै सोइ ॥२॥
मूलम्
गिआनु धिआनु धुनि जाणीऐ अकथु कहावै सोइ ॥ सफलिओ बिरखु हरीआवला छाव घणेरी होइ ॥ लाल जवेहर माणकी गुर भंडारै सोइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कहावै = स्मरण कराता है। सोइ = वह गुरु ही। सफलिओ = फल देने वाला। माणिक = मनकों से (भरपूर)। सोइ = वह परमात्मा।2।
अर्थ: परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालनी, परमात्मा की याद में तवज्जो जोड़नी, परमात्मा के चरणों में लगन लगानी- (गुरु से ही) यह समझ आती है। गुरु ही उस प्रभु की महिमा करवाता है जिसके गुण बयान नहीं हो सकते। गुरु (मानों) एक हरा व फलदार वृक्ष है, जिसकी गहरी सघन छाया है। लालों, जवाहरों और मोतियों से भरपूर (भाव, ऊँचे व स्वच्छ आत्मिक गुण) वह परमात्मा गुरु के खजाने से ही मिलता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर भंडारै पाईऐ निरमल नाम पिआरु ॥ साचो वखरु संचीऐ पूरै करमि अपारु ॥ सुखदाता दुख मेटणो सतिगुरु असुर संघारु ॥३॥
मूलम्
गुर भंडारै पाईऐ निरमल नाम पिआरु ॥ साचो वखरु संचीऐ पूरै करमि अपारु ॥ सुखदाता दुख मेटणो सतिगुरु असुर संघारु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भंडारे = खजाने में। संचीऐ = एकत्र किया जा सकता है। करमि = मिहर से। असुर = कामादिक दैंत।3।
अर्थ: परमात्मा के पवित्र नाम का प्यार गुरु के खजाने में ही प्राप्त होता है। बेअंत प्रभु का नाम रूप सदा स्थिर सौदा पूरे गुरु की मेहर से ही एकत्र किया जा सकता है। गुरु (नाम की बख्शिश से) सुखों को देने वाला है। दुखों को मिटाने वाला है। गुरु (कामादिक) दैंतों का नाश करने वाला है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भवजलु बिखमु डरावणो ना कंधी ना पारु ॥ ना बेड़ी ना तुलहड़ा ना तिसु वंझु मलारु ॥ सतिगुरु भै का बोहिथा नदरी पारि उतारु ॥४॥
मूलम्
भवजलु बिखमु डरावणो ना कंधी ना पारु ॥ ना बेड़ी ना तुलहड़ा ना तिसु वंझु मलारु ॥ सतिगुरु भै का बोहिथा नदरी पारि उतारु ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भवजलु = संसार समुंदर। बिखमु = मुश्किल। कंधी = कंढा,किनारा। मलारु = मल्लाह। भै का बोहिथा = डरों से बचाने वाला जहाज। पारु = उस पार का इलाका।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘पारु’और ‘पारि’ में फर्क ध्यानयोग्य है। {पारु = उस पार का इलाका (संज्ञा); पारि = उस तरफ ‘क्रिया विशेषण’}।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: ये संसार समुंदर बहुत बिखड़ा है बड़ा डरावना है। इसका ना कोई किनारा दिखाई देता है ना ही दूसरा छोर। ना कोई बेड़ी (नाव) ना कोई तुलहा ना कोई मल्लाह आर ना ही मल्लाह का चप्पू- कोई भी इस संसार समुंदर से पार लंघा नहीं सकता। (संसार समुंदर के) खतरों से बचाने वाला जहाज गुरु ही है। गुरु की मेहर की नजर से इस समुंदर के उस पार उतारा हो सकता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इकु तिलु पिआरा विसरै दुखु लागै सुखु जाइ ॥ जिहवा जलउ जलावणी नामु न जपै रसाइ ॥ घटु बिनसै दुखु अगलो जमु पकड़ै पछुताइ ॥५॥
मूलम्
इकु तिलु पिआरा विसरै दुखु लागै सुखु जाइ ॥ जिहवा जलउ जलावणी नामु न जपै रसाइ ॥ घटु बिनसै दुखु अगलो जमु पकड़ै पछुताइ ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जाइ = चला जाता है। जलउ = जल जाए (हुकमी भविष्यत)। जलावणी = जलने योग्य। रसाइ = रस से, स्वाद से। अगलो = ज्यादा।5।
अर्थ: जब एक रत्ती जितने पल के लिए भी प्यारा प्रभु (स्मृति से) भूल जाता है, तब जीव को दुख आ घेरता है और उसका सुख आनंद दूर हो जाता है। जल जाए वह जलने योग्य जिहवा जो स्वाद से प्रभु का नाम नहीं जपती। (स्मरणहीन बंदे का जब) शरीर नाश होता है, उसे बहुत दुख व्यापता है। जब उसे जम आ पकड़ता है तबवह पछताता है (पर उस वक्त पछताने का क्या लाभ?)।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरी मेरी करि गए तनु धनु कलतु न साथि ॥ बिनु नावै धनु बादि है भूलो मारगि आथि ॥ साचउ साहिबु सेवीऐ गुरमुखि अकथो काथि ॥६॥
मूलम्
मेरी मेरी करि गए तनु धनु कलतु न साथि ॥ बिनु नावै धनु बादि है भूलो मारगि आथि ॥ साचउ साहिबु सेवीऐ गुरमुखि अकथो काथि ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कलतु = स्त्री। बादि = व्यर्थ। मारगि = रास्ते पर। आथि = अर्थ, माया। मारगि आथि = माया के रास्ते पे। अकथो = जिसके गुण बयान नहीं किए जा सकते। काथि = कहते हैं, महिमा करते हैं।6।
अर्थ: (संसार में बेअंत ही जीव आए, जो यह) कह कह के चले गए कि यह मेरा शरीर है, यह मेरा धन है, ये मेरी स्त्री है; पर ना शरीर ना धन ना स्त्री (कोई भी) साथ नहीं निभा। परमात्मा के नाम के बिना धन किसी अर्थ का नहीं। माया के रास्ते पड़ के (मनुष्य जिंदगी के सही राह से) भटक जाता है। (इस वास्ते, हे भाई!) सदा कायम रहने वाले मालिक को याद करना चाहिए। पर, उस बेअंत गुणों वाले मालिक की महिमा गुरु के द्वारा ही की जा सकती है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आवै जाइ भवाईऐ पइऐ किरति कमाइ ॥ पूरबि लिखिआ किउ मेटीऐ लिखिआ लेखु रजाइ ॥ बिनु हरि नाम न छुटीऐ गुरमति मिलै मिलाइ ॥७॥
मूलम्
आवै जाइ भवाईऐ पइऐ किरति कमाइ ॥ पूरबि लिखिआ किउ मेटीऐ लिखिआ लेखु रजाइ ॥ बिनु हरि नाम न छुटीऐ गुरमति मिलै मिलाइ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पइऐ किरति = पिछले किए कर्मों के संस्कार अनुसार। उस कर्म के अनुसार जो संस्कार रूप हो के मन में टिकी पड़ी है। कमाइ = कर्म करता है।7।
अर्थ: जीव अपने पिछले किये कर्मों के संस्कारों के अनुसार (आगे भी वैसे ही) कर्म कमाता रहता है। (इसका नतीजा ये निकलता है कि) जीव पैदा होता है मरता है, पैदा होता है मरता है। इस चक्कर में पड़ा रहता है। पिछले कर्मों के अनुसार लिखा (माथे का) लेख परमात्मा के हुक्म में लिखा जाता है। इसे कैसे मिटाया जा सकता है? (इन लिखे लेखों की संगली की जकड़ में से) परमात्मा के नाम के बिना खलासी नहीं हो सकती। जब गुरु की मति मिलती है तब ही (प्रभु जीव को अपने चरणों में जोड़ता है)।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तिसु बिनु मेरा को नही जिस का जीउ परानु ॥ हउमै ममता जलि बलउ लोभु जलउ अभिमानु ॥ नानक सबदु वीचारीऐ पाईऐ गुणी निधानु ॥८॥१०॥
मूलम्
तिसु बिनु मेरा को नही जिस का जीउ परानु ॥ हउमै ममता जलि बलउ लोभु जलउ अभिमानु ॥ नानक सबदु वीचारीऐ पाईऐ गुणी निधानु ॥८॥१०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जीउ = जीव, जीवात्मा। पुरानु = प्राण,श्वास। जलि बलउ = (हुकमी भविष्यत) जल बल जाए। जलउ = जल जाए। गुणी निधानु = गुणों का खजाना प्रभु।8।
अर्थ: (हे भाई! गुरु की शरण पड़ कर मुझे यह समझ आती है कि) जिस परमात्मा की दी हुई ये जीवात्मा है प्राण हैं, उस के बिनां (संसार में) मेरा कोई और आसरा नहीं है। मेरा यह अहम् जल जाए, मेरी यह अपणत जल जाए, मेरा यह लोभ जल जाए और मेरा यह अहंकार जल बल जाए (जिन्होंने मुझे परमात्मा के नाम से विछोड़ा है)।
हे नानक! गुरु के शब्द को विचारना चाहिए, (गुरु के शब्द में जुड़ने से ही) गुणों का खजाना परमात्मा मिलता है।8।10।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी जल कमलेहि ॥ लहरी नालि पछाड़ीऐ भी विगसै असनेहि ॥ जल महि जीअ उपाइ कै बिनु जल मरणु तिनेहि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी जल कमलेहि ॥ लहरी नालि पछाड़ीऐ भी विगसै असनेहि ॥ जल महि जीअ उपाइ कै बिनु जल मरणु तिनेहि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कमलेहि = कमल में। विगसै = खिलता है। असनेहि = प्यार से (संस्कृत शबद = स्नेह है। इसके पंजाबी रूप दो हैं: नेह और असनेह)। जीअ = जीवात्मा। तिनेह = उनका। पछाड़िऐ = धक्के खाता है।1।
अर्थ: हे मन! परमात्मा के साथ ऐसा प्यार कर, जैसा पानी और कमल के फूल का है (और कमल फूल का पानी के साथ)। कमल का फूल पानी की लहरों से धक्के खाता है, फिर भी (परस्पर) प्यार के कारण कमल फूल खिलता (ही) है (धक्कों से गुस्से नहीं होता)। पानी में (कमल के फूलों को) पैदा करके (परमात्मा ऐसी खेल खेलता है कि) पानी के बगैर उनकी (कमल फूलों) की मौत हो जाती है।1।
[[0060]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे किउ छूटहि बिनु पिआर ॥ गुरमुखि अंतरि रवि रहिआ बखसे भगति भंडार ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे किउ छूटहि बिनु पिआर ॥ गुरमुखि अंतरि रवि रहिआ बखसे भगति भंडार ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु के सन्मुख रहने वाला मनुष्य। अंतरि = अंदर, दिल से। रवि रहिआ = हर वक्त मौजूद है।1। रहाउ।
अर्थ: हे मन! (प्रभु के साथ) प्यार पाने के बगैर तू (माया के हमलों से) बच नहीं सकता। (पर, ये प्यार गुरु की शरण पड़े बगैर नहीं मिलता) गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्यों के अंदर (गुरु की कृपा से ऐसी प्यार-सांझ बनती है कि) परमात्मा हर वक्त मौजूद रहता है, गुरु उन्हें प्रभु भक्ति के खजाने ही बख्श देता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी मछुली नीर ॥ जिउ अधिकउ तिउ सुखु घणो मनि तनि सांति सरीर ॥ बिनु जल घड़ी न जीवई प्रभु जाणै अभ पीर ॥२॥
मूलम्
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी मछुली नीर ॥ जिउ अधिकउ तिउ सुखु घणो मनि तनि सांति सरीर ॥ बिनु जल घड़ी न जीवई प्रभु जाणै अभ पीर ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नीर = पानी। अधिकउ = बहुत। घणों = बहुत। मनि = मन में। अभ पीर = आंतरिक पीड़ा।2।
अर्थ: हे मन! परमात्मा के साथ ऐसा प्रेम कर, जैसा मछली का पानी के साथ है। पानी जितना ही बढ़ता है, मछली को उतना ही सुख आनंद मिलता है। उसके मन में तन में शरीर में ठंड पड़ती है। पानी के बगैर एक घड़ी भी जी नहीं सकती। मछली के दिल की यह वेदना परमात्मा (स्वयं) जानता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी चात्रिक मेह ॥ सर भरि थल हरीआवले इक बूंद न पवई केह ॥ करमि मिलै सो पाईऐ किरतु पइआ सिरि देह ॥३॥
मूलम्
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी चात्रिक मेह ॥ सर भरि थल हरीआवले इक बूंद न पवई केह ॥ करमि मिलै सो पाईऐ किरतु पइआ सिरि देह ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मेह = बरखा, वर्षा। चात्रिक = पपीहा। भरि = भरे हुए। केह = क्या अर्थ? करमि = मेहर से। किरतु पाइआ = पूर्बला कमाया हुआ, (पूर्वला) किया हुआ (जो संस्कार रूप में) एकत्रित किए हुए (अंदर मौजूद) है। सिरि = सिर पर। देह = शरीर पर।3।
अर्थ: हे मन! परमात्मा के साथ ऐसा प्रेम कर, जैसा पपीहे का बरसात के साथ है। (पानी से) सरोवर भरे हुए होते हैं, धरती (पानी की बरकत से) हरी भरी हो जाती है। पर यदि (स्वाति नक्षत्र में पड़ी वर्षा की) एक बूँद (पपीहे के मुंह में) ना पड़े, तो उसको इस सारे पानी से कोई सरोकार नहीं। (पर, हे मन! तेरे भी क्या बस! परमात्मा) अपनी मेहर से ही मिले तो मिलता है, (नहीं तो) पूर्बला कमाया हुआ सिर पर शरीर पर झेलना ही पड़ता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी जल दुध होइ ॥ आवटणु आपे खवै दुध कउ खपणि न देइ ॥ आपे मेलि विछुंनिआ सचि वडिआई देइ ॥४॥
मूलम्
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी जल दुध होइ ॥ आवटणु आपे खवै दुध कउ खपणि न देइ ॥ आपे मेलि विछुंनिआ सचि वडिआई देइ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आवटणु = उबाला। खवै = बर्दाश्त करता है। सचि = सच में। देइ = देता है।4।
अर्थ: हे मन! हरि के साथ ऐसा प्यार बना, जैसा पानी और दूध का है। (पानी दूध में आ मिलता है, दूध की शरण पड़ता है, दूध उसकों अपना रूप बना लेता है। जब उस पानी मिले दूध को आग पर रखते हैं तो) उबाला (पानी) स्वयं ही बर्दाश्त करता है, दूध को जलने नहीं देता। (इसी तरह यदि जीव अपने आप को कुर्बान करे, तो प्रभु) विछुड़े जीवों कोअपने सदा स्थिर नाम में मिला के (लोक परलोक में) आदर सत्कार देता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी चकवी सूर ॥ खिनु पलु नीद न सोवई जाणै दूरि हजूरि ॥ मनमुखि सोझी ना पवै गुरमुखि सदा हजूरि ॥५॥
मूलम्
रे मन ऐसी हरि सिउ प्रीति करि जैसी चकवी सूर ॥ खिनु पलु नीद न सोवई जाणै दूरि हजूरि ॥ मनमुखि सोझी ना पवै गुरमुखि सदा हजूरि ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सूर = सूर्य।5।
अर्थ: हे मन! परमात्मा के साथ ऐसा प्यार कर, जैसा कि चकवी का (प्यार) सूरज से है। (जब सूरज डूब जाता है, चकवी की नजरों से परे हो जाता है, तो वह चकवी) एक छिन भर एक पल भर नींद (के बस में आ के) नहीं सोती, दूर (छुपे सूर्य) को अपने अंग-संग समझती है।
जो मनुष्य गुरु के सन्मुख रहता है, उसको परमात्मा अपने अंग संग दिखाई देता है, पर अपने मन के पीछे चलने वाले को ये बात समझ नहीं आती।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनमुखि गणत गणावणी करता करे सु होइ ॥ ता की कीमति ना पवै जे लोचै सभु कोइ ॥ गुरमति होइ त पाईऐ सचि मिलै सुखु होइ ॥६॥
मूलम्
मनमुखि गणत गणावणी करता करे सु होइ ॥ ता की कीमति ना पवै जे लोचै सभु कोइ ॥ गुरमति होइ त पाईऐ सचि मिलै सुखु होइ ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गणत गणावणी = अपनी प्रशंसा करता है।6।
अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य अपनी ही प्रशंसा करता रहता है (पर जीव के भी क्या वश?) वही कुछ होता हैजो कर्तार (स्वयं) करता (कराता) है। (कर्तार की मेहर के बिनां) यदि कोई जीव (अपनी उस्ततें छोड़ने का प्रयत्न भी करे, और परमात्मा के गुणों की कद्र पहचानने का उद्यम करे, तो भी) उस प्रभु के गुणों की कद्र नहीं पड़ सकती। (परमात्मा के गुणों की कद्र) तभी पड़ती है, जब गुरु की शिक्षा प्राप्त हो। (गुरु की मति मिलने से ही मनुष्य प्रभु के सदा स्थिर नाम में जुड़ता है और आत्मिक आनंद का सुख पाता है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचा नेहु न तुटई जे सतिगुरु भेटै सोइ ॥ गिआन पदारथु पाईऐ त्रिभवण सोझी होइ ॥ निरमलु नामु न वीसरै जे गुण का गाहकु होइ ॥७॥
मूलम्
सचा नेहु न तुटई जे सतिगुरु भेटै सोइ ॥ गिआन पदारथु पाईऐ त्रिभवण सोझी होइ ॥ निरमलु नामु न वीसरै जे गुण का गाहकु होइ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भेटै = मिल जाए। गिआन पदारथु = (परमात्मा के साथ) गहरी सांझ देने वाला (नाम) पदार्थ। त्रिभवण सोझी = तीनों भवनों में व्याप्त प्रभु की सूझ।7।
अर्थ: (प्रभु चरणों में जोड़ने वाला) यदि वह गुरु मिल जाए, तो (उसकी मेहर के सदका प्रभु के साथ ऐसा) पक्का प्यार (पड़ता है जो कभी भी) टूटता नहीं। (गुरु की कृपा से) परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालने वाला नाम पदार्थ मिलता है। ये समझ भी पड़ती है कि प्रभु तीनों भवनों में मौजूद है। यदि मनुष्य (गुरु की मेहर सदका) परमात्मा के गुणों (के सौदे) को खरीदने वाला बन जाए, तो इस को प्रभु का पवित्र नाम (फिर कभी) नहीं भूलता।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
खेलि गए से पंखणूं जो चुगदे सर तलि ॥ घड़ी कि मुहति कि चलणा खेलणु अजु कि कलि ॥ जिसु तूं मेलहि सो मिलै जाइ सचा पिड़ु मलि ॥८॥
मूलम्
खेलि गए से पंखणूं जो चुगदे सर तलि ॥ घड़ी कि मुहति कि चलणा खेलणु अजु कि कलि ॥ जिसु तूं मेलहि सो मिलै जाइ सचा पिड़ु मलि ॥८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: खेलि गए = लद गए, खेल के चले गए। पंखणूं = (जीव) पंछी। सर तलि = (संसार) सरोवर पर। अजु कि कलि = आज या कल में, एक-दो दिनों में। मलि = जीत के,कब्जा करके। पिड़ = खिलाड़ियों के खेलने का स्थान। पिड़ मलि = बाजी जीत के।8।
अर्थ: (हे मन! देख) जो जीव पंछी इस (संसार) सरोवर पर (चोगा) चुगते हैं वह (आपो अपनी जीवन) खेल खोलके चले जाते हैं। हरेक जीव पंछी ने घड़ी पल की खेल खेलके यहाँ से चले जाना है। यह,खेल एक-दो दिनों में ही (जल्दी ही) खत्म हो जाती है। (हे मन! प्रभु के दर पे सदा अरदास कर और कह: हे प्रभु!) जिसको तू खुद मिलाता है, वही तेरे चरणों में जुड़ता है। वह यहां से सच्ची जीवन बाजी जीत के जाता है।8।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बिनु गुर प्रीति न ऊपजै हउमै मैलु न जाइ ॥ सोहं आपु पछाणीऐ सबदि भेदि पतीआइ ॥ गुरमुखि आपु पछाणीऐ अवर कि करे कराइ ॥९॥
मूलम्
बिनु गुर प्रीति न ऊपजै हउमै मैलु न जाइ ॥ सोहं आपु पछाणीऐ सबदि भेदि पतीआइ ॥ गुरमुखि आपु पछाणीऐ अवर कि करे कराइ ॥९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सोहं = वह मैं हूँ। आपु = अपना आप। सोहं आपु = वह मैं हूँ और मेरा स्वै। सोहं आपु पछाणीऐ = यह पहिचान आती है कि कि मेरा और प्रभु का स्वै (भाव, स्वभाव) मिला है या नहीं। सबदि = गुरु के शब्द के साथ। भेदि = राज।9।
अर्थ: गुरु (की शरण पड़े) बिनां (प्रभु चरणों में) प्रीत पैदा नहीं होती (क्योंकि मनुष्य के अपने प्रयास से ही मन में से) अहंकार की मैल दूर हो सकती है। जब मनुष्य का मन गुरु के शब्द में भेदा जाता है, गुरु के शब्द में पतीज जाता है, तब ये पता चलता है कि मेरा और प्रभु का स्वभाव मेल खाता है या नहीं। गुरु की शरण पड़ के ही मनुष्य अपने आप को (अपनी असलियत को) पहचानता है। (गुरु की शरण के बिनां) जीव अन्य कोई प्रयासा कर करा नहीं सकता।9।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मिलिआ का किआ मेलीऐ सबदि मिले पतीआइ ॥ मनमुखि सोझी ना पवै वीछुड़ि चोटा खाइ ॥ नानक दरु घरु एकु है अवरु न दूजी जाइ ॥१०॥११॥
मूलम्
मिलिआ का किआ मेलीऐ सबदि मिले पतीआइ ॥ मनमुखि सोझी ना पवै वीछुड़ि चोटा खाइ ॥ नानक दरु घरु एकु है अवरु न दूजी जाइ ॥१०॥११॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: किआ मेलीऐ = मिलने वाली कोई और बात नहीं रह जाती, कभी नहीं विछुड़ते। पतीआइ = मान के, पतीज के, पलोस के। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाला। दरु घरु एकु = एक ही दर और एक ही घर, एक ही आसरा। जाइ = जगह।10।
अर्थ: जो जीव गुरु के शब्द में पतीज के प्रभु चरणों में मिलते हैं, उनके अंदर कोई ऐसा विछोड़ा नहीं रह जाता जिसको दूर करके उन्हें पुनः प्रभु से जोड़ा जाए। पर अपने मन के पीछे चलने वाले बंदे कोये समझ नहीं पड़ती, वह प्रभु चरणों से विछुड़ के (माया के मोह की) चोटें खाता है।
हे नानक! जो मनुष्य प्रभु चरणों में मिल गया है उसका प्रभु ही एक आसरा दृढ़ (दिखता) है। प्रभु के बिनां उसे और कोई सहारा नहीं (दिखाई देता) अन्य कोई जगह नहीं दिखती।10।11।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ मनमुखि भुलै भुलाईऐ भूली ठउर न काइ ॥ गुर बिनु को न दिखावई अंधी आवै जाइ ॥ गिआन पदारथु खोइआ ठगिआ मुठा जाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ मनमुखि भुलै भुलाईऐ भूली ठउर न काइ ॥ गुर बिनु को न दिखावई अंधी आवै जाइ ॥ गिआन पदारथु खोइआ ठगिआ मुठा जाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री। भूलै = राह से विछुड़ जाती है। भुलाईऐ = गलत रास्ते डाली जाती है। ठउर = जगह, सहारा। अंधी = माया के मोह में अंधी हुई। आवै जाइ = आती है जाती है, भटकती फिरती है। गिआन पदारथु = परमात्मा के साथ गहरी सांझ पैदा करने वाला नाम पदार्थ।1।
अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाली स्त्री (जीवन के) सही रास्ते से भटक जाती है, माया उसे गलत रास्ते पे डाल देती है। राह से भटकी हुई (गुरु के बिना) कोइ (ऐसा) स्थान नहीं मिलता (जो उसको रास्ता दिखा दे)। गुरु के बिना और कोई भी (सही रास्ता) दिख नहीं सकता। (माया में) अंधी हुई जीव-स्त्री भटकती फिरती है।
जिस भी जीव ने (माया के प्रलोभन में फंस के) परमात्मा के साथ गहरी सांझ पैदा करने वाले नाम-धन को गवा लिया है, वह ठगा जाता है, वह (आत्मिक जीवन की ओर से) लूटा जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाबा माइआ भरमि भुलाइ ॥ भरमि भुली डोहागणी ना पिर अंकि समाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
बाबा माइआ भरमि भुलाइ ॥ भरमि भुली डोहागणी ना पिर अंकि समाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भरमि = भुलेखे में। डोहागणी = खराब किस्मत वाली। पिर अंकि = पिया के अंक में, पति की बाँहों में।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! माया (जीवों को) छलावे में डाल के गलत रास्ते पे डाल देती है। जो भाग्यहीन जीव-स्त्री भुलावे में पड़कर गलत रास्ते पड़ जाती है, वह (कभी भी) प्रभु पति के चरणों में लीन नहीं हो सकती।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भूली फिरै दिसंतरी भूली ग्रिहु तजि जाइ ॥ भूली डूंगरि थलि चड़ै भरमै मनु डोलाइ ॥ धुरहु विछुंनी किउ मिलै गरबि मुठी बिललाइ ॥२॥
मूलम्
भूली फिरै दिसंतरी भूली ग्रिहु तजि जाइ ॥ भूली डूंगरि थलि चड़ै भरमै मनु डोलाइ ॥ धुरहु विछुंनी किउ मिलै गरबि मुठी बिललाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दिसंतरी = (देस+अंतरी) और-और देशों में। तजि जाइ = छोड़ जाती है। डूंगरि = पहाड़ पे। विछुंनी = बिछुड़ी हुई। गरबि = अहंकार से।2।
अर्थ: जीवन के राह से भटकी हुई जीव-स्त्री गृहस्थ त्याग के देस-देसांतरों में घूमती फिरती है। भटकी हुई कभी किसी पहाड़ (की गुफा) में बैठती है कभी किसी टीले पे चढ़ बैठती है। भटकती फिरती है, उसका मन (माया के असर में) डोलता है। (अपने किए कर्मों के कारण) धर से ही प्रभु के हुक्म अनुसार विछुड़ी हुई (प्रभु चरणों में) जुड़ नहीं सकती। वह तो (त्याग आदि के) अहंकार आदि में लूटी जा रही है, और (विछोड़े में) तड़पती है।2।
[[0061]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
विछुड़िआ गुरु मेलसी हरि रसि नाम पिआरि ॥ साचि सहजि सोभा घणी हरि गुण नाम अधारि ॥ जिउ भावै तिउ रखु तूं मै तुझ बिनु कवनु भतारु ॥३॥
मूलम्
विछुड़िआ गुरु मेलसी हरि रसि नाम पिआरि ॥ साचि सहजि सोभा घणी हरि गुण नाम अधारि ॥ जिउ भावै तिउ रखु तूं मै तुझ बिनु कवनु भतारु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रसि = रस में। पिआरि = प्यार में। सहजि = अडोल अवस्था में (टिक के)। अधारि = आसरे के कारण।3।
अर्थ: प्रभु से विछुड़ों को गुरु हरि नाम के आनंद में जोड़ के, नाम के प्यार में जोड़ के (पुनः प्रभु के साथ) मिलाता है। हरि के गुणों की इनायत से हरि-नाम के आसरे से सदा स्थिर प्रभु में (जुड़ने से) अडोल अवस्था में (टिके रहने से) बहुत शोभा (भी मिलती है)।
(मैं तेरा दास विनती करता हूं- हे प्रभु) जैसे तेरी रजा हो सके, मुझे अपने चरणों में रख। तेरे बिना मेरा खसम सांई और कोई नहीं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अखर पड़ि पड़ि भुलीऐ भेखी बहुतु अभिमानु ॥ तीरथ नाता किआ करे मन महि मैलु गुमानु ॥ गुर बिनु किनि समझाईऐ मनु राजा सुलतानु ॥४॥
मूलम्
अखर पड़ि पड़ि भुलीऐ भेखी बहुतु अभिमानु ॥ तीरथ नाता किआ करे मन महि मैलु गुमानु ॥ गुर बिनु किनि समझाईऐ मनु राजा सुलतानु ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अखर = विद्या। किनि = किस ने?।4।
अर्थ: विद्या पढ़ पढ़ के (भी विद्या के अहंकार के कारण) कुमार्ग पर ही पड़ता है (गृहस्थ-त्यागियों के) भेषों से भी (मन में) बड़ा गुमान पैदा होता है। तीर्तों पर स्नान करने से भी कुछ नहीं संवार सकता। क्योंकि, मन में (इस) अहंकार की मैल टिकी रहती है (कि मैं तीर्थ स्नानी हूँ)। (हरेक भटके हुए रास्ते में) मन (इस शरीर नगरी का) राजा बना रहता है, सुल्तान बना रहता है। गुरु के बिनां इसको किसी और ने मति नहीं दी (कोई इसे समझा नहीं सका)।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रेम पदारथु पाईऐ गुरमुखि ततु वीचारु ॥ सा धन आपु गवाइआ गुर कै सबदि सीगारु ॥ घर ही सो पिरु पाइआ गुर कै हेति अपारु ॥५॥
मूलम्
प्रेम पदारथु पाईऐ गुरमुखि ततु वीचारु ॥ सा धन आपु गवाइआ गुर कै सबदि सीगारु ॥ घर ही सो पिरु पाइआ गुर कै हेति अपारु ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साधन = जीव-स्त्री। आपु = स्वैभाव। घर ही = घर में ही। गुर कै हेति = गुरु के प्यार से।5।
अर्थ: (हे बाबा!) गुरु की शरण पड़ के अपने मूल प्रभु (के गुणों) को विचार। गुरु की शरण पड़ने से ही (प्रभु चरणों से) प्रेम पैदा करने वाला नाम धन मिलता है। जिस जीव-स्त्री ने स्वै भाव दूर किया है, गुरु के शब्द में (जुड़ के आत्मिक जीवन को स्वैभाव दूर करने का) श्रृंगार किया है। उसने गुरु के बख्शे प्रेम से अपने हृदय रूपी घर में उस बेअंत प्रभु पति को ढूंढ लिया है।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर की सेवा चाकरी मनु निरमलु सुखु होइ ॥ गुर का सबदु मनि वसिआ हउमै विचहु खोइ ॥ नामु पदारथु पाइआ लाभु सदा मनि होइ ॥६॥
मूलम्
गुर की सेवा चाकरी मनु निरमलु सुखु होइ ॥ गुर का सबदु मनि वसिआ हउमै विचहु खोइ ॥ नामु पदारथु पाइआ लाभु सदा मनि होइ ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चाकरी = सेवा। मनि = मन में। विचहु = अपने अंदर से।6।
अर्थ: गुरु की बताई हुई सेवा करने से चाकरी करने सेमन पवित्र हो जाता है, आत्मिक आनंद मिलता है। जिस मनुष्य के मन में गुरु का शब्द (उपदेश) बस जाता है, वह अपने अंदर से अहम् दूर कर लेता है। जिस मनुष्य ने (गुरु की शरण पड़ के) नाम-धन हासिल कर लिया है, उसके मन मेंसदा लाभ होता है। (उसके मन में आत्मक गुणों की सदैव बढ़होतरी ही होती है)।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
करमि मिलै ता पाईऐ आपि न लइआ जाइ ॥ गुर की चरणी लगि रहु विचहु आपु गवाइ ॥ सचे सेती रतिआ सचो पलै पाइ ॥७॥
मूलम्
करमि मिलै ता पाईऐ आपि न लइआ जाइ ॥ गुर की चरणी लगि रहु विचहु आपु गवाइ ॥ सचे सेती रतिआ सचो पलै पाइ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करमि = मेहर से। आपि = अपने उद्यम से। सेती = साथ। सचे = सच ही। पलै पाइ = मिलता है।7।
अर्थ: परमात्मा मिलता है तो अपनी मेहर से मिलता है। मनुष्य के अपने उद्यम से नहीं मिल सकता। (इस वास्ते, हे भाई!) अपने अंदर से स्वैभाव दूर करके गुरु के चरणों में टिका रह। (गुरु की शरण की इनायत से) सदा कायम रहने वाले प्रभु के रंग में रंगे रहें, तब वह सदा स्थिर प्रभु मिल जाता है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भुलण अंदरि सभु को अभुलु गुरू करतारु ॥ गुरमति मनु समझाइआ लागा तिसै पिआरु ॥ नानक साचु न वीसरै मेले सबदु अपारु ॥८॥१२॥
मूलम्
भुलण अंदरि सभु को अभुलु गुरू करतारु ॥ गुरमति मनु समझाइआ लागा तिसै पिआरु ॥ नानक साचु न वीसरै मेले सबदु अपारु ॥८॥१२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भुलण अंदरि = (माया के असर में आ के) गलत रास्ते पड़ने में। सभु को = हरेक जीव। अभुलु = वह जो माया के असर में जीवन सफर में गलत कदम नहीं उठाता। अपारु = बेअंत प्रभु।8।
अर्थ: (हे बाबा! माया ऐसी प्रबल है कि इसके चक्कर में फंस के) हरेक जीव गलती खा जाता है। सिर्फ गुरु है कर्तार है जो (ना माया के असर में आता है, और) ना गलती खाता है। जिस मनुष्य ने गुरु का मति पर चल कर अपने मन को समझा लिया है, उसके अंदर (परमात्मा का) प्रेम बन जाता है। हे नानक! जिस मनुष्य को गुरु का शब्द अपार प्रभु मिला देता है उसे सदा स्थिर प्रभु कभी भूलता नहीं।8।12।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ त्रिसना माइआ मोहणी सुत बंधप घर नारि ॥ धनि जोबनि जगु ठगिआ लबि लोभि अहंकारि ॥ मोह ठगउली हउ मुई सा वरतै संसारि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ त्रिसना माइआ मोहणी सुत बंधप घर नारि ॥ धनि जोबनि जगु ठगिआ लबि लोभि अहंकारि ॥ मोह ठगउली हउ मुई सा वरतै संसारि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुत = पुत्र। बंधप = रिश्तेदार। नारि = स्त्री। धनि = धन ने। जोबनि = जोबन ने। लबि = लब ने। लोभि = लोभ ने। अहंकारि = अहंकार ने। ठगउली = ठग मूरी, ठग बुटी, धतूरा आदि वह बूटी जो पिला के ठग किसी को ठगता है। हउ = मैं। मुई = ठगी गई हूं। सा = वह (ठग-बूटा)। संसारि = संसार में।1।
अर्थ: पुत्र, रिश्तेदार, घर, स्त्री (आदि के मोह) के कारण मोहनी माया की तृष्णा जीवों में व्याप रही है। धन ने, जवानी ने, लोभ ने, अहंकार ने (सारे) जगत को लूट लिया है। मोह की ठग-बूटी ने मुझे भी ठग लिया है यही मोह ठग-बूटी सारे संसार पर अपना जोर डाल रही है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे प्रीतमा मै तुझ बिनु अवरु न कोइ ॥ मै तुझ बिनु अवरु न भावई तूं भावहि सुखु होइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मेरे प्रीतमा मै तुझ बिनु अवरु न कोइ ॥ मै तुझ बिनु अवरु न भावई तूं भावहि सुखु होइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: न भावई = ठीक नहीं लगता।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे प्रीतम प्रभु! (इस ठग-बूटी से बचाने के लिए) मुझे तेरे बिनां और कोई (समर्थ) नहीं (दिखता)। मुझे तेरे बिनां कोई और प्यारा नहीं लगता। जब तू मुझे प्यारा लगता है, तब मुझे आत्मिक सुख मिलता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नामु सालाही रंग सिउ गुर कै सबदि संतोखु ॥ जो दीसै सो चलसी कूड़ा मोहु न वेखु ॥ वाट वटाऊ आइआ नित चलदा साथु देखु ॥२॥
मूलम्
नामु सालाही रंग सिउ गुर कै सबदि संतोखु ॥ जो दीसै सो चलसी कूड़ा मोहु न वेखु ॥ वाट वटाऊ आइआ नित चलदा साथु देखु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सालाही = तूं महिमा कर। रंग सिउ = प्रेम से। कूड़ा = झूठा, नाशवान। वाट = रास्ता। वटाऊ = राही, मुसाफिर।2।
अर्थ: (हे मन!) गुरु के शब्द से संतोख धारण करके (तृष्णा के पंजे में से निकल के) प्रेम से (परमात्मा के) नाम की महिमा कर। इस नाशवान मोह को ना देख। ये तो जो कुछ दिखाई दे रहा है सभ नाश हो जाएगा। (यहां जीव) रास्ते का मुसाफिर (बन के) आया है, यह सारा साथ नित्य चलने वाला समझ।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आखणि आखहि केतड़े गुर बिनु बूझ न होइ ॥ नामु वडाई जे मिलै सचि रपै पति होइ ॥ जो तुधु भावहि से भले खोटा खरा न कोइ ॥३॥
मूलम्
आखणि आखहि केतड़े गुर बिनु बूझ न होइ ॥ नामु वडाई जे मिलै सचि रपै पति होइ ॥ जो तुधु भावहि से भले खोटा खरा न कोइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आखणि = कहने को, कहने मात्र। केतड़े = कितने जीव? , बेअंत जीव। बूझ = समझ। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। रपै = रंगा जाए। पति = इज्जत।3।
अर्थ: बताने को तो बेअंत जीव बता देते हैं (कि माया की तृष्णा से इस प्रकार बच सकते हैं, पर) गुरु के बगैर सही समझ नहीं पड़ती। (गुरु की शरण पड़ के) अगर परमात्मा का नाम मिल जाए, परमात्मा की महिमा मिल जाए अगर (मनुष्य का मन) सदा स्थिर प्रभु (के प्यार) में रंगा जाए, तो उस लोक (परलोक में) इज्जत मिलती है।
(पर, हे प्रभु! अपने प्रयास से कोई जीव) ना खरा बन सकता है, ना ही खोटा रह जाता है। जो तुझे प्यारे लगते हैं वही भले हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर सरणाई छुटीऐ मनमुख खोटी रासि ॥ असट धातु पातिसाह की घड़ीऐ सबदि विगासि ॥ आपे परखे पारखू पवै खजानै रासि ॥४॥
मूलम्
गुर सरणाई छुटीऐ मनमुख खोटी रासि ॥ असट धातु पातिसाह की घड़ीऐ सबदि विगासि ॥ आपे परखे पारखू पवै खजानै रासि ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: खोटी रासि = वह पूंजी जो प्रभु पातशाह के दर पे खोटी समझी जाती है। असट धातु = आठ धातुओं से बना शरीर। विगासि = खिलता है, प्रफुल्लित होना।4।
अर्थ: गुरु की शरण पड़ के ही (तृष्णा के पंजे में से) निजात पायी जाती है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य खोटी पूंजी ही जोड़ता है। परमात्मा की रची हुई ये आठ धातुओं वाली मानव कायाअगर गुरु के शब्द (की टकसाल) में घढ़ी जाए (सुचज्जी बनाई जाए, तो ही यह) खिलती है (आत्मिक उल्लास में आती है)। परखने वाला प्रभु खुद ही (इसकी मेहनत मुश्क्कत को) परख लेता है और (इसके आत्मिक गुणों की) संपत्ति (उसके) खजाने में (स्वीकार) पड़ता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तेरी कीमति ना पवै सभ डिठी ठोकि वजाइ ॥ कहणै हाथ न लभई सचि टिकै पति पाइ ॥ गुरमति तूं सालाहणा होरु कीमति कहणु न जाइ ॥५॥
मूलम्
तेरी कीमति ना पवै सभ डिठी ठोकि वजाइ ॥ कहणै हाथ न लभई सचि टिकै पति पाइ ॥ गुरमति तूं सालाहणा होरु कीमति कहणु न जाइ ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तेरी कीमति ना पवै = तेरा मुल्य नहीं पड़ सकता, तेरे बराबर का और कोई नहीं मिल सकता। ठोकि वजाइ = ठोक बजा के, अच्छी तरह परख के। हाथ = गहराई। तूं = तुझे। होरु कहणु = कोई और बोल।5।
अर्थ: (हे प्रभु!) मैंने सारी सृष्टि अच्छी तरह परख कर देख ली है, मुझे तेरे बराबर कोई नहीं दिखता (जो मुझे माया के पंजे से बचा सके। तूं बेअंत गुणों का मालिक है) ये बयान करने से तेरे गुण की थाह नहीं पाई जा सकती। जो जीव सदा स्थिर स्वरूप में टिकता है उसको इज्जत मिलती है। गुरु की मति ले के ही तेरी महिमा की जा सकती है। पर, तेरे बराबर का ढूंढने के वास्ते कोई बोल नहीं बोला जा सकता।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जितु तनि नामु न भावई तितु तनि हउमै वादु ॥ गुर बिनु गिआनु न पाईऐ बिखिआ दूजा सादु ॥ बिनु गुण कामि न आवई माइआ फीका सादु ॥६॥
मूलम्
जितु तनि नामु न भावई तितु तनि हउमै वादु ॥ गुर बिनु गिआनु न पाईऐ बिखिआ दूजा सादु ॥ बिनु गुण कामि न आवई माइआ फीका सादु ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जितु = जिस में। जितु तनि = जिस शरीर में। वादु = झगड़ा। बिखिआ = माया। सादु = स्वाद।6।
अर्थ: जिस शरीर को परमात्मा का नाम प्यारा नहीं लगता, उस शरीर में अहम् बढ़ता है, उस शरीर में तृष्णा का बखेड़ा भी बढ़ता है। गुरु के बिनां परमात्मा से जान पहिचान नहीं बन सकती। माया का प्रभाव पड़ के परमात्मा के बिनां और तरफ का स्वाद मन में उपजता है। आत्मिक गुणों से वंचित रह कर यह मानव देह व्यर्थ जाती है और अंत को माया वाला स्वाद भी बे-रस हो जाता है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आसा अंदरि जमिआ आसा रस कस खाइ ॥ आसा बंधि चलाईऐ मुहे मुहि चोटा खाइ ॥ अवगणि बधा मारीऐ छूटै गुरमति नाइ ॥७॥
मूलम्
आसा अंदरि जमिआ आसा रस कस खाइ ॥ आसा बंधि चलाईऐ मुहे मुहि चोटा खाइ ॥ अवगणि बधा मारीऐ छूटै गुरमति नाइ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बंधि = बांध के। चलाईऐ = चलाया जाता है। मुहे मुहि = मुंह मुंह, मुड़ मुड़ के मुँह पर। नाइ = नाम में (जुड़ के)।7।
अर्थ: जीव आशा (तृष्णा) में बंधा हुआ जन्म लेता है (जब तक जगत में जीता है) आशा के प्रभाव में ही (मीठे) कसैले (आदिक) रसों (वाले पदार्थ) खाता रहता है। (उम्र खत्म हो जाने पर) आशा (तृष्णा) के (बंधन में) बंधा हुआ यहां से भेजा जाता है। (सारी उम्र आशा तृष्णा में ही फंसे रहने करके) मुड़ मुड़ मुंह पर चोटें खाता है। विकारमयी जीवन के कारण (आशा तृष्णा में) जकड़ा हुआ मार खाता है। यदि गुरु की शिक्षा लेकर प्रभु के नाम में जुड़ें, तो ही (आसा तृष्णा के जाल में से) खलासी पा सकता है।7।
[[0062]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सरबे थाई एकु तूं जिउ भावै तिउ राखु ॥ गुरमति साचा मनि वसै नामु भलो पति साखु ॥ हउमै रोगु गवाईऐ सबदि सचै सचु भाखु ॥८॥
मूलम्
सरबे थाई एकु तूं जिउ भावै तिउ राखु ॥ गुरमति साचा मनि वसै नामु भलो पति साखु ॥ हउमै रोगु गवाईऐ सबदि सचै सचु भाखु ॥८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पति = इज्जत। साथु = साथी।8।
अर्थ: (जीवों के भी क्या वश? हे प्रभु!) सब जीवों में तो तू स्वयं ही बसता है। जैसी तेरी मर्जी हो, हे प्रभु! तू स्वयं ही (जीवों को आसा तृष्णा के जाल से) बचा। हे प्रभु! तेरा सदा स्थिर नाम ही (जीव का) भला साथी है, तेरा नाम ही जीव की इज्जत है, तेरा नाम, गुरु की मति ले के ही, जीव के मन में बस सकता है।
(हे भाई!) गुरु के सच्चे शब्द के द्वारा सदा स्थिर नाम स्मरण कर। नाम स्मरण करने से ही अहंकार का रोग दूर होता है।8।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आकासी पातालि तूं त्रिभवणि रहिआ समाइ ॥ आपे भगती भाउ तूं आपे मिलहि मिलाइ ॥ नानक नामु न वीसरै जिउ भावै तिवै रजाइ ॥९॥१३॥
मूलम्
आकासी पातालि तूं त्रिभवणि रहिआ समाइ ॥ आपे भगती भाउ तूं आपे मिलहि मिलाइ ॥ नानक नामु न वीसरै जिउ भावै तिवै रजाइ ॥९॥१३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: त्रिभवणि = तीनों भवनों वाले संसार में।9।
अर्थ: हे प्रभु! आकाश में पाताल में तीनों ही भवनों में तू स्वयं ही व्यापक है। तू खुद ही (जीवों को अपनी) भक्ति बख्शता है, अपना प्रेम बख्शता है। तू खुद ही जीवों को अपने साथ मिला के मिलाता है।
हे नानक! (प्रभु के दर पे अरदास कर) और कह: (हे प्रभु!) जैसे तुझे ठीक लगे, वैसे तेरी रजा वर्तती है। (पर मेहर कर) मुझे तेरा नाम कभी ना भूले।9।13।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ राम नामि मनु बेधिआ अवरु कि करी वीचारु ॥ सबद सुरति सुखु ऊपजै प्रभ रातउ सुख सारु ॥ जिउ भावै तिउ राखु तूं मै हरि नामु अधारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ राम नामि मनु बेधिआ अवरु कि करी वीचारु ॥ सबद सुरति सुखु ऊपजै प्रभ रातउ सुख सारु ॥ जिउ भावै तिउ राखु तूं मै हरि नामु अधारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अवरु वीचारु = और विचार। कि करी = मैं क्या करूँ? प्रभ रातउ = प्रभु के नाम में रंगा हुआ। सारु = श्रेष्ठ। अधारु = आसरा। मैं = मुझे।1।
अर्थ: जिस मनुष्य का मन परमात्मा के नाम में परोया जाए, (उसके संबंध में) मैं और क्या विचार करूँ (मैं और क्या बताऊँ? इस में कोई शक नहीं कि) जो मनुष्य प्रभु के (नाम में) रंगा जाता है, उसको श्रेष्ठ (आत्मिक) सुख मिलता है। जिसकी तवज्जो शब्द के (विचार में) जुड़ी हुई है, उसके अंदर आनंद पैदा होता है। (हे प्रभु!) जैसी भी तेरी रजा हो, मुझे भी तू (अपने चरणों में) रख। तेरा नाम (मेरे जीवन का) आसरा बन जाए।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे साची खसम रजाइ ॥ जिनि तनु मनु साजि सीगारिआ तिसु सेती लिव लाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे साची खसम रजाइ ॥ जिनि तनु मनु साजि सीगारिआ तिसु सेती लिव लाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साची = सदा स्थिर रहने वाली (कार), सच्ची कार। जिनि = जिस (प्रभु) ने।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! खसम प्रभु की रजा में चलना सही कार है। (हे मन!) तू उस प्रभु (के चरणों) से लगन जोड़, जिसने ये शरीर और मन पैदा करके इन्हें सुंदर बनाया है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तनु बैसंतरि होमीऐ इक रती तोलि कटाइ ॥ तनु मनु समधा जे करी अनदिनु अगनि जलाइ ॥ हरि नामै तुलि न पुजई जे लख कोटी करम कमाइ ॥२॥
मूलम्
तनु बैसंतरि होमीऐ इक रती तोलि कटाइ ॥ तनु मनु समधा जे करी अनदिनु अगनि जलाइ ॥ हरि नामै तुलि न पुजई जे लख कोटी करम कमाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बैसंतरि = आग में। होमीऐ = अपर्ण करें (जैसे हवन करने के वक्त घी आग में डालते हैं)। तोलि = तोल के। इक रती कटाइ = रक्ती रक्ती कटा के। समधा = हवन में इस्तेमाल की जाने वाली लकड़ी। करी = मैं करूँ। अनदिनु = हर रोज। कोटी = करोड़ों।12
अर्थ: अगर अपने शरीर को काट काट के एक-एक रक्ती भर तोल तोल के आग में हवन कर दिया जाए। अगर मैं अपने शरीर व मन को हवन सामग्री बनां दूं और हर रोज इन्हें आग में जलाऊँ। यदि इस प्रकार के अन्य लाखों करोड़ों कर्म किए जाएं, तो भी कोई कर्म परमात्मा के नाम की बराबरी तक नहीं पहुँच सकता।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अरध सरीरु कटाईऐ सिरि करवतु धराइ ॥ तनु हैमंचलि गालीऐ भी मन ते रोगु न जाइ ॥ हरि नामै तुलि न पुजई सभ डिठी ठोकि वजाइ ॥३॥
मूलम्
अरध सरीरु कटाईऐ सिरि करवतु धराइ ॥ तनु हैमंचलि गालीऐ भी मन ते रोगु न जाइ ॥ हरि नामै तुलि न पुजई सभ डिठी ठोकि वजाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अरध = अर्ध, आधा, दो फाड़। सिरि = सिर पर। करवतु = आरा। हैमंचलि = हिमालय (की बर्फ) में। भी = तो भी। ठोकि वजाइ = ठोक बजा के, अच्छी तरह परख के।3।
अर्थ: यदि सिर के ऊपर आरा रखा के शरीर को दो फाड़ चिरवा लिया जाए, यदि शरीर को हिमालय पर्वत (की बरफ) में गला दिया जाए, तो भी मन में से (अहम् आदिक) रोग दूर नहीं होते। (कर्मकाण्डों की) सारी (ही मर्यादा) मैंने अच्छी तरह परख के देख ली है। कोई करम प्रभु नाम जपने की बराबरी तक नहीं पहुँचता।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कंचन के कोट दतु करी बहु हैवर गैवर दानु ॥ भूमि दानु गऊआ घणी भी अंतरि गरबु गुमानु ॥ राम नामि मनु बेधिआ गुरि दीआ सचु दानु ॥४॥
मूलम्
कंचन के कोट दतु करी बहु हैवर गैवर दानु ॥ भूमि दानु गऊआ घणी भी अंतरि गरबु गुमानु ॥ राम नामि मनु बेधिआ गुरि दीआ सचु दानु ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कंचन = सोना। कोट = किले। दतु करी = मैं दान करूँ। हैवर = हय+वर बढ़िया घोड़े। गैवर = गज+वर, बढ़िया हाथी। भूमि = जमीन। घणीं = ज्यादा। गरबु = अहंकार। बेधिआ = छेद कर दिया। गुरि = गुरु ने।4।
अर्थ: यदि मैं सोने के किले दान करूँ, बहुत सारे बढ़िया घोड़े व हाथी दान करूँ, जमीन दान करूँ, बहुत सारी गाऐं दान करूँ, फिर भी (बल्कि इस दान का ही) मन में अहंकार गुमान बन जाता है। जिस मनुष्य को सतिगुरु ने सदा स्थिर प्रभु (का नाम जपने की) बख्शिश की है, उसका मन परमात्मा के नाम में परोया रहता है (और यही है सही करनी)।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनहठ बुधी केतीआ केते बेद बीचार ॥ केते बंधन जीअ के गुरमुखि मोख दुआर ॥ सचहु ओरै सभु को उपरि सचु आचारु ॥५॥
मूलम्
मनहठ बुधी केतीआ केते बेद बीचार ॥ केते बंधन जीअ के गुरमुखि मोख दुआर ॥ सचहु ओरै सभु को उपरि सचु आचारु ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ने से, गुरु की ओर मुंह करने से। मोख = (माया के मोह आदि से) छुटकारा, मोक्ष। दुआरु = दरवाजा। सचहु = सच से, सदा स्थिर प्रभु के नाम स्मरण से। ओरै = पीछे, घटिआ। उपरि = (हा किस्म के कर्मकांड से) ऊपर, बढ़िया, उत्तम। सचु आचारु = सदा स्थिर प्रभु के नाम स्मरण का कर्म। आचारु = कर्म।5।
अर्थ: अनेक ही लोगों की अक्ल (तप आदि कर्मों की ओर प्रेरती है जो) मन के हठ से (किये जाते हैं), अनेक ही लोग वेद आदि धर्म-पुस्तकों के अर्थ-विचार करते हैं (और इस वाद-विवाद को ही जीवन का सही राह समझते हैं), ऐसे और भी अनेक ही कर्म हैं जो जीवात्मा के वास्ते फांसी का रूप बन जाते हैं, (पर अहंकार आदि बंधनों से) निजात का दरवाजा गुरु के सन्मुख होने से ही मिलता है (क्योंकि, गुरु प्रभु का नाम जपने की हिदायत करता है)।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभु को ऊचा आखीऐ नीचु न दीसै कोइ ॥ इकनै भांडे साजिऐ इकु चानणु तिहु लोइ ॥ करमि मिलै सचु पाईऐ धुरि बखस न मेटै कोइ ॥६॥
मूलम्
सभु को ऊचा आखीऐ नीचु न दीसै कोइ ॥ इकनै भांडे साजिऐ इकु चानणु तिहु लोइ ॥ करमि मिलै सचु पाईऐ धुरि बखस न मेटै कोइ ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभ को = हरेक जीव। इकनै = एक परमात्मा से। भांडै साजिऐ = भांडे साजे जाने करके। तिहु लोइ = तीनों भवनों में। करमि = (प्रभु की) मेहर से। सचु = नाम का स्मरण। बखस = बख्शिश।6।
अर्थ: हरेक कर्म सदा स्थिर प्रभु के नाम स्मरण से नीचे है, घटिआ है। स्मरण रूपी कर्म सब कर्मों धर्मों से श्रेष्ठ है।
(पर कर्मकांड के जाल में फंसे उच्च जाति के लोगों को भी निंदना ठीक नहीं है), हरेक जीव को ठीक ही कहना चाहिए। (जगत में) कोई नीच नहीं दिखाई नहीं देता, क्योंकि, एक कर्तार ने ही सारे जीव रचे हैं और तीनों लोकों (के जीवों) में उसे (कर्तार की ज्योति) का ही प्रकाश है। स्मरण (का खैर) प्रभु की गुरु की मेहर से ही मिलता है और धुर से ही प्रभु की हुक्म अनुसार जिस मनुष्य को नाम जपने की दात मिलती है, कोई पक्ष उस (दात) के राह में रोक नहीं डाल सकता।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साधु मिलै साधू जनै संतोखु वसै गुर भाइ ॥ अकथ कथा वीचारीऐ जे सतिगुर माहि समाइ ॥ पी अम्रितु संतोखिआ दरगहि पैधा जाइ ॥७॥
मूलम्
साधु मिलै साधू जनै संतोखु वसै गुर भाइ ॥ अकथ कथा वीचारीऐ जे सतिगुर माहि समाइ ॥ पी अम्रितु संतोखिआ दरगहि पैधा जाइ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सादु = गुरमुखि। गुर भाइ = गुरु के अनुसार रहने से। अकथ कथा = अकथ प्रभु की कथा। पी = पी के। पैधा = सिरोपा ले के, आदर सहित।7।
अर्थ: जो गुरमुख मनुष्य गुरमुखों की संगति में मिल बैठता है, गुरु आशै के अनुसार चलने से (उसके मन में) संतोष आ बसता है। (क्योंकि,) यदि मनुष्य सतिगुरु के उपदेश में लीन रहे तो बेअंत गुणों वाले करतारकी महिमा की जा सकती है। और, महिमा रूपी अंमृत पीने से मन संतोष ग्रहण कर लेता है और (जगत में से) आदर सत्कार कमा के प्रभु की हजूरी में पहुँचता है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
घटि घटि वाजै किंगुरी अनदिनु सबदि सुभाइ ॥ विरले कउ सोझी पई गुरमुखि मनु समझाइ ॥ नानक नामु न वीसरै छूटै सबदु कमाइ ॥८॥१४॥
मूलम्
घटि घटि वाजै किंगुरी अनदिनु सबदि सुभाइ ॥ विरले कउ सोझी पई गुरमुखि मनु समझाइ ॥ नानक नामु न वीसरै छूटै सबदु कमाइ ॥८॥१४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: घटि घटि = हरेक घट में। वाजै = बजती है। किंगुरी = बीन, वीणा, जीवन लहर। सुभाइ = स्वभाव में (जुड़ने से), स्वभाव में एक होने से।8।
अर्थ: गुरु के शब्द के द्वारा प्रभु के स्वभाव में हरवक्त एक-मेक होने से यह यकीन बन जाता है कि (रूहानी लहर की) वीणा हरेक शरीर में बज रही है। पर ये समझ किसी विरले को ही पड़ती है। हे नानक! जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ कर अपने मन को ऐसे समझा लेता है, उसको परमात्मा का नाम कभी नहीं भूलता। वह गुरु के उपदेश को कमा के (गुरु के शब्द मुताबिक जीवन बना के, अहम् आदि रोगों से) बचा रहता है।8।14।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ चिते दिसहि धउलहर बगे बंक दुआर ॥ करि मन खुसी उसारिआ दूजै हेति पिआरि ॥ अंदरु खाली प्रेम बिनु ढहि ढेरी तनु छारु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ चिते दिसहि धउलहर बगे बंक दुआर ॥ करि मन खुसी उसारिआ दूजै हेति पिआरि ॥ अंदरु खाली प्रेम बिनु ढहि ढेरी तनु छारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चिते = चित्रित। धउलहर = महिल माढ़ीआं। बगे = सफेद। बंक = बांके। करि खुसी = खुशियां करके, चाव से। मन = हे मन! दूजै हेति = माया के प्रेम में। अंदरु = अंदर का, हृदय। ढहि = गिर के। छारु = राख।1।
अर्थ: जैसे बड़े चाव से बनाए हुए चित्रित किए हुए महल-माढियां (सुंदर) दिखाई देते हैं, उनके सफेद बांके दरवाजे होते हैं। (पर यदि वे अंदर से खाली रहें तो गिर के ढेरी हो जाते हैं, वैसे ही माया के मोह में प्यार में (ये शरीर) पालते हैं, पर यदि हृदय नाम से वंचित है, प्रेम के बगैर है, तो ये शरीर भी गिर के ढेरी हो जाता है (व्यर्थ जाता है।)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे तनु धनु साथि न होइ ॥ राम नामु धनु निरमलो गुरु दाति करे प्रभु सोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे तनु धनु साथि न होइ ॥ राम नामु धनु निरमलो गुरु दाति करे प्रभु सोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निरमलो = पवित्र। सोइ = वह।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! यह शरीर यह धन (जगत से चलने के वक्त) साथ नहीं निभता। परमात्मा का नाम ऐसा पवित्र धन है (जो सदा साथ निभता है, पर ये मिलता उसको ही है) जिसे गुरु देता है जिसको वह परमात्मा दात करता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
राम नामु धनु निरमलो जे देवै देवणहारु ॥ आगै पूछ न होवई जिसु बेली गुरु करतारु ॥ आपि छडाए छुटीऐ आपे बखसणहारु ॥२॥
मूलम्
राम नामु धनु निरमलो जे देवै देवणहारु ॥ आगै पूछ न होवई जिसु बेली गुरु करतारु ॥ आपि छडाए छुटीऐ आपे बखसणहारु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पूछ = पूछ पड़ताल, रोक। बेली = सहयोगी।2।
अर्थ: परमात्मा का नाम पवित्र धन है (तब ही मिलता है) अगर देने के समर्थ हरि खुद दे। (नाम धन हासिल करने में) जिस मनुष्य का सहयोगी गुरु खुद बने, कर्तार खुद बने, परलोक में उस पर कोई एतराज नहीं होता। पर माया के मोह से प्रभु स्वयं ही बचाए तो बच सकते हैं। प्रभु खुद ही बख्शिश करने वाला है।2।
[[0063]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनमुखु जाणै आपणे धीआ पूत संजोगु ॥ नारी देखि विगासीअहि नाले हरखु सु सोगु ॥ गुरमुखि सबदि रंगावले अहिनिसि हरि रसु भोगु ॥३॥
मूलम्
मनमुखु जाणै आपणे धीआ पूत संजोगु ॥ नारी देखि विगासीअहि नाले हरखु सु सोगु ॥ गुरमुखि सबदि रंगावले अहिनिसि हरि रसु भोगु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: संजोग = मेल। देखि = देख के। विगासीअहि = खुश होते हैं। हरखु = खुशी। सोगु = चिन्ता, सहम। सबदि = (गुरु के) शब्द में (जुड़ के)। अहि = दिन। निसि = रात। भोगु = (आत्मिक) भोजन।3।
अर्थ: (प्रभु की रजा मुताबिक जगत में) बेटी बेटों का मेल (आ बनता है), पर अपने मन के पीछे चलने वाला आदमी इनको अपने समझ लेता है। (मनमुख लोग अपनी अपनी) स्त्री को देख के खुश होते हैं, (देख के) खुशी भी होती है सहम भी होता है (कि कहीं ये बच्चे स्त्री मर ना जाएं)। गुरु के बताए रास्ते पर चलने वाले लोग गुरु के शब्द के द्वारा आत्मिक सुख पाते हैं। परमात्मा का नाम रस दिन रात उनकी आत्मिक खुराक होता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
चितु चलै वितु जावणो साकत डोलि डोलाइ ॥ बाहरि ढूंढि विगुचीऐ घर महि वसतु सुथाइ ॥ मनमुखि हउमै करि मुसी गुरमुखि पलै पाइ ॥४॥
मूलम्
चितु चलै वितु जावणो साकत डोलि डोलाइ ॥ बाहरि ढूंढि विगुचीऐ घर महि वसतु सुथाइ ॥ मनमुखि हउमै करि मुसी गुरमुखि पलै पाइ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चलै = डोलता है। वितु = धन। डोलाइ = बारंबार डोलता है। विगुचीऐ = परेशान होता है, खुआर होता है। वसतु = नाम धन। सुथाइ = नीयत स्थान पे। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री। मुसी = ठगी जाती है, लूटी जाती है। पलै पाइ = (वस्तु को) हासिल कर लेती है।4।
अर्थ: (मनुष्य धन को सुख का मूल समझता है, जब) धन जाने लगता है तो साकत का मन डोलता है। (सुख को) बाहर से ढूंढने से खुआर ही होते हैं। (साकत मनुष्य यह नहीं समझता कि सुख का मूल) परमात्मा का नाम धन घर में ही, हृदय में ही है। अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री “मैं मैं” कर के ही लुटी जाती है (अंदर से नाम धन लुटा बैठती है)। (जबकि) गुरु के मार्ग पर चलने वाली ये धन हासिल कर लेती है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साकत निरगुणिआरिआ आपणा मूलु पछाणु ॥ रकतु बिंदु का इहु तनो अगनी पासि पिराणु ॥ पवणै कै वसि देहुरी मसतकि सचु नीसाणु ॥५॥
मूलम्
साकत निरगुणिआरिआ आपणा मूलु पछाणु ॥ रकतु बिंदु का इहु तनो अगनी पासि पिराणु ॥ पवणै कै वसि देहुरी मसतकि सचु नीसाणु ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साकत = हे साकत! , हे प्रभु चरणों से विछुड़े जीव! रकतु = (माँ का) लहू। बिंदु = पिता वीर्य। पिराण = पहचान, याद रख। पवण = श्वास। मसतकि = माथे पर। नीसाणु = अटल हुक्म।5।
अर्थ: हे गुणहीन साकत मनुष्य! (तू गुमान करता है अपने शरीर का) अपना असल तो पहचान। ये शरीर माँ के लहू और पिता के वीर्य से बना है। याद रख, (आखिर इसने) आग में (जल जाना है)। हरेक जीव के माथे पे यह अटल हुक्म है कि यह शरीर स्वासों के अधीन है (हरेक के गिने चुने श्वास हैं)।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बहुता जीवणु मंगीऐ मुआ न लोड़ै कोइ ॥ सुख जीवणु तिसु आखीऐ जिसु गुरमुखि वसिआ सोइ ॥ नाम विहूणे किआ गणी जिसु हरि गुर दरसु न होइ ॥६॥
मूलम्
बहुता जीवणु मंगीऐ मुआ न लोड़ै कोइ ॥ सुख जीवणु तिसु आखीऐ जिसु गुरमुखि वसिआ सोइ ॥ नाम विहूणे किआ गणी जिसु हरि गुर दरसु न होइ ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिसु = जिस (मनि), जिसके मन में। सोइ = वह प्रभु। किआ गणी = मैं क्या (जीता) समझूं?।6।
अर्थ: लम्बी लम्बी उम्र मांगी जाती है। कोई भी जल्दी मरना नहीं चाहता। पर उसी मनुष्य का जीवन सुखी कह सकते हैं, जिसके मन में, गुरु की शरण पड़ कर, परमात्मा आ बसता है। जिस मनुष्य को कभी गुरु के दर्शन नहीं हुए, कभी परमात्मा के दीदार नहीं हुए, उस प्रभु नाम से वंचित मनुष्य को मैं (जीवित) क्या समझूँ?।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिउ सुपनै निसि भुलीऐ जब लगि निद्रा होइ ॥ इउ सरपनि कै वसि जीअड़ा अंतरि हउमै दोइ ॥ गुरमति होइ वीचारीऐ सुपना इहु जगु लोइ ॥७॥
मूलम्
जिउ सुपनै निसि भुलीऐ जब लगि निद्रा होइ ॥ इउ सरपनि कै वसि जीअड़ा अंतरि हउमै दोइ ॥ गुरमति होइ वीचारीऐ सुपना इहु जगु लोइ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भुलीऐ = भुलेखा खा जाते हैं। निद्रा = नींद। सरपनि = सपणीं, माया। जीअड़ा = कमजोर जीवात्मा। दोइ = द्वैत, मेर तेर। वीचारिऐ = समझ पड़ती है। लोइ = लोक, दुनिया।7।
अर्थ: जैसे रात को (सोते हुए को) सुपने में (कई चीजें देख के) भुलेखा पड़ जाता है (कि जो कुछ देख रहे हैं यह सचमुच ठीक है, और यह भुलेखा तब तक टिका रहता है) जब तक नींद टिकी रहती है। इसी तरह कमजोर जीव माया नागिन के बस में (जब तक) है (तब तक) इसके अंदर अहम् और मेर तेर बनी रहती है। (और इस अहम् और मेर तेर को यह जीवन सही जीवन समझता है)। जब गुरु की मति प्राप्त हो तो यह समझ पड़ती है कि ये जगत (का मोह) यह दुनिया (वाली मेर तेर) निरा स्वपन ही है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अगनि मरै जलु पाईऐ जिउ बारिक दूधै माइ ॥ बिनु जल कमल सु ना थीऐ बिनु जल मीनु मराइ ॥ नानक गुरमुखि हरि रसि मिलै जीवा हरि गुण गाइ ॥८॥१५॥
मूलम्
अगनि मरै जलु पाईऐ जिउ बारिक दूधै माइ ॥ बिनु जल कमल सु ना थीऐ बिनु जल मीनु मराइ ॥ नानक गुरमुखि हरि रसि मिलै जीवा हरि गुण गाइ ॥८॥१५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दूधै माइ = मां के दूध से। ना थीऐ = नहीं रह सकता। मीनु = मछली। रसि = रस में।8।
अर्थ: जैसे बालक की आग (पेट की आग, भूख) माँ का दूध पीने से शांत होती है, वैसे ही ये तृष्णा की आग तभी बुझती है जब प्रभु के नाम का जल इस ऊपर डालते हैं। पानी के बिनां कमल काफूल नहीं रह सकता। पानी के बिना मछुली मर जाती है। वैसे ही गुरु के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (प्रभु नाम के बिना जी नहीं सकता। उसका आत्मिक जीवन तभी प्रफुल्लित होता है जब) वह परमात्मा के नाम रस में लीन होता है। हे नानक! (प्रभु दर पे अरदास कर और कह: हे प्रभु! मेहर कर), मैं तेरे गुण गा के (आत्मिक जीवन) जीऊँ।8।15।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ डूंगरु देखि डरावणो पेईअड़ै डरीआसु ॥ ऊचउ परबतु गाखड़ो ना पउड़ी तितु तासु ॥ गुरमुखि अंतरि जाणिआ गुरि मेली तरीआसु ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ डूंगरु देखि डरावणो पेईअड़ै डरीआसु ॥ ऊचउ परबतु गाखड़ो ना पउड़ी तितु तासु ॥ गुरमुखि अंतरि जाणिआ गुरि मेली तरीआसु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: डूंगरु = पहाड़। पेईअड़ै = पेके घर में। गाखड़े = कठिन। तितु = उस में। तासु = तस्य, उसकी। गुरि = गुरु ने।1।
अर्थ: (एक तरफ संसार समुंदर है, दूसरी तरफ, इस में से पार लांघने के लिए गुरमुखों वाला रास्ता है। पर आत्मिक जीवन वाला वह रास्ता पहाड़ी रास्ता है। आत्मिक जीवन के शिखर पर पहुँचना, मानो एक बड़े ऊँचे डरावने पहाड़ पर चढ़ने के समान है। उस) डरावने पहाड़ को देख के पेके घर में (माँ-बाप भाई बहन आदि के मोह में ग्रसित जीव-स्त्री) डर गई (कि इस पहाड़ पर चढ़ा नहीं जा सकता, जगत का मोह दूर नहीं किया जा सकता, स्वै को न्यौछावर नहीं किया जा सकता)। (आत्मिक जीवन के शिखर पे पहुँचना, मानों) बहुत ऊंचा और मुश्किल पर्वत है; उस पर्वत पर चढ़ने के लिए उस (जीव-स्त्री) के पास कोई सीढ़ी भी नहीं है।
गुरु के सन्मुख रहने वाली जिस जीव-स्त्री को गुरु ने (प्रभु चरणों में) मिला लिया, उसने अपने अंदर ही बसते प्रभु को पहिचान लिया। और, वह इस संसार समुंदर से पार लांघ गई।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे भवजलु बिखमु डरांउ ॥ पूरा सतिगुरु रसि मिलै गुरु तारे हरि नाउ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे भवजलु बिखमु डरांउ ॥ पूरा सतिगुरु रसि मिलै गुरु तारे हरि नाउ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भवजलु = संसार समुंदर। बिखमु = मुश्किल। डराउ = डरावणा। रसि = आनंद से।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! ये संसार समुंदर बड़ा डरावणा है और (तैरना) मुश्किल है। जिस मनुष्य को पूरा गुरु प्रेम से मिलता है उसको वह गुरु परमात्मा का नाम दे के (इस समुंदर में से) पार लंघा लेता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
चला चला जे करी जाणा चलणहारु ॥ जो आइआ सो चलसी अमरु सु गुरु करतारु ॥ भी सचा सालाहणा सचै थानि पिआरु ॥२॥
मूलम्
चला चला जे करी जाणा चलणहारु ॥ जो आइआ सो चलसी अमरु सु गुरु करतारु ॥ भी सचा सालाहणा सचै थानि पिआरु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चला = चलूं। अमर = मौत रहित। भी = तो। सचै थानि = सच्चे स्थान में, सत्संग में।2।
अर्थ: अगर मैं सदा याद रखूं कि मैंने जगत में से जरूर चले जाना है। यदि मैं समझ लूं कि सारा जगत ही चले जाने वाला है। जगत में जो भी आया है, वह आखिर चला जाएगा। मौत-रहित एक गुरु परमात्मा ही है, तो फिर सत्संग में (प्रभु चरणों के साथ) प्यार डाल के सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा की महिमा करनी चाहिए (बस! यही है संसार समुंदर के विकारों भारी लहरों से बचने का तरीका)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दर घर महला सोहणे पके कोट हजार ॥ हसती घोड़े पाखरे लसकर लख अपार ॥ किस ही नालि न चलिआ खपि खपि मुए असार ॥३॥
मूलम्
दर घर महला सोहणे पके कोट हजार ॥ हसती घोड़े पाखरे लसकर लख अपार ॥ किस ही नालि न चलिआ खपि खपि मुए असार ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कोट = किले। हसती = हाथी। पाखरे = काठीआं। असार = जिनको सार नहीं, बेसमझ।3।
अर्थ: सुंदर दरवाजों वाले सुंदर घर व महल, हजारों पक्के किले, हाथी घोड़े, काठियां, लाखों तथा बेअंत लशकर- इनमें कोई भी किसी के साथ नहीं गए। बेसमझ ऐसे ही खप खप के आत्मिक मौत मरते रहे (इनकी खातिर आत्मिक जीवन गवा गए)।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुइना रुपा संचीऐ मालु जालु जंजालु ॥ सभ जग महि दोही फेरीऐ बिनु नावै सिरि कालु ॥ पिंडु पड़ै जीउ खेलसी बदफैली किआ हालु ॥४॥
मूलम्
सुइना रुपा संचीऐ मालु जालु जंजालु ॥ सभ जग महि दोही फेरीऐ बिनु नावै सिरि कालु ॥ पिंडु पड़ै जीउ खेलसी बदफैली किआ हालु ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: संचीऐ = एकत्र करें। दोही = दुहाई, ढंढोरा। सिरि = सिर पर। खेलसी = खेल खेल जाएगा, खेल खत्म कर जाएगा। पिंडु = सरीर। पड़ै = गिर जाता है। बदफैली = विकारी।4।
अर्थ: अगर सोना-चाँदी इकट्ठा करते जाएं, तो यह माल धन (जीवात्मा को मोह में फंसाने के लिए) जाल बनता है, फांसी बनता है। यदि अपनी ताकत की दुहाई सारे जगत में फिरा सकें, तो भी परमात्मा का नाम स्मरण के बिनां सिर पर मौत का डर (कायम रहता) है। जब जीवात्मा जिंदगी की खेल खेल जाती है और शरीर (मिट्टी हो के) गिर पड़ता है, तब (धन पदार्थ की खातिर) गंदे काम करने वालों का बुरा हाल होता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पुता देखि विगसीऐ नारी सेज भतार ॥ चोआ चंदनु लाईऐ कापड़ु रूपु सीगारु ॥ खेहू खेह रलाईऐ छोडि चलै घर बारु ॥५॥
मूलम्
पुता देखि विगसीऐ नारी सेज भतार ॥ चोआ चंदनु लाईऐ कापड़ु रूपु सीगारु ॥ खेहू खेह रलाईऐ छोडि चलै घर बारु ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: विगसीऐ = खुश होते हैं। चोआ = इत्र। खेह = मिट्टी। घर बारु = घर का सामान।5।
अर्थ: पिता (अपने) पुत्रों को देख के खुश होता है। पति (अपनी) सेज पर स्त्री को देख कर प्रसन्न होता है। (इस शरीर को) इत्र व चंदन लगाते हैं। सुंदर कपड़ा, रूप, गहना आदि (देख के मन खुश होता है)। पर आखिर में शरीर मिट्टी हो के मिट्टी में मिल जाता है, और गुमान करने वाला जीव घर बार छोड़ के (संसार से) चला जाता है।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
महर मलूक कहाईऐ राजा राउ कि खानु ॥ चउधरी राउ सदाईऐ जलि बलीऐ अभिमान ॥ मनमुखि नामु विसारिआ जिउ डवि दधा कानु ॥६॥
मूलम्
महर मलूक कहाईऐ राजा राउ कि खानु ॥ चउधरी राउ सदाईऐ जलि बलीऐ अभिमान ॥ मनमुखि नामु विसारिआ जिउ डवि दधा कानु ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: महर = चौधरी, सरदार। मलूक = बादशाह। राउ = राजा। कि = अथवा। डवि = दावानल, जंगल की आग से। दधा = जला हुआ। कानु = तिनका।6।
अर्थ: सरदार, बादशाह, राजा, राव औा खान कहलवाते हैं। (अपने आप को) चौधरी, राय (साहिब आदि) बुलवाते हैं। (इस बड़प्पन के) अहंकार में जल मरते हैं (यदि कोई पूरा मान आदर ना करे)। (पर इतना कुछ होते हुए भी) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य ने परमात्मा का नाम भुला दिया, और (और ऐसे बताया) जैसे जंगल की आग में जला हुआ तिनका है (बाहर से चमकदार, अंदर से काला स्याह)।6।
[[0064]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउमै करि करि जाइसी जो आइआ जग माहि ॥ सभु जगु काजल कोठड़ी तनु मनु देह सुआहि ॥ गुरि राखे से निरमले सबदि निवारी भाहि ॥७॥
मूलम्
हउमै करि करि जाइसी जो आइआ जग माहि ॥ सभु जगु काजल कोठड़ी तनु मनु देह सुआहि ॥ गुरि राखे से निरमले सबदि निवारी भाहि ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देहि = सरीर। गुरि = गुरु ने। सबदि = शब्द के द्वारा। भाहि = आग, तृष्णा।7।
अर्थ: जगत में जो भी आया है, “मैं बड़ा मैं बड़ा” कह कह के आखिर यहां से चला जाएगा। ये सारा जगत काजल की कोठरी (के समान) है (जो भी इसके मोह में फंसता है, उसका) तन मन शरीर राख में मिल जाता है। गुरु ने अपने शब्द के द्वारा, जिनकी तृष्णा आग दूर कर दी, वह (इस काजल कोठरी में) साफ-सुथरे ही रहे।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक तरीऐ सचि नामि सिरि साहा पातिसाहु ॥ मै हरि नामु न वीसरै हरि नामु रतनु वेसाहु ॥ मनमुख भउजलि पचि मुए गुरमुखि तरे अथाहु ॥८॥१६॥
मूलम्
नानक तरीऐ सचि नामि सिरि साहा पातिसाहु ॥ मै हरि नामु न वीसरै हरि नामु रतनु वेसाहु ॥ मनमुख भउजलि पचि मुए गुरमुखि तरे अथाहु ॥८॥१६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वेसाहु = पूंजी। सिरि साहा = शाहों के सिर पर। पचि = खुआर हो के। अथाहु = जिसकी गहराई ना मिल सके।8।
अर्थ: जो परमात्मा सभी शाहों के ऊपर बादशाह है, उसके सदा स्थिर नाम में जुड़ के (इस संसार समुंदर में से) पार लंघते हैं। हे नानक! (अरदास करके कह) मुझे परमात्मा का नाम कभी ना भूले। परमात्मा का नाम रतन नाम पूंजी (मेरे पास सदा स्थिर रहे)। अपने मन के पीछे चलने वाले लोग संसार समुंदर में खप खप के आत्मिक मौत मरते हैं, और गुरु के सन्मुख रहने वाले इस बेअंत गहरे समुंदर को पार कर जाते हैं (वह विकारों की लहरों में नहीं डूबते)।8।16।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ घरु २ ॥ मुकामु करि घरि बैसणा नित चलणै की धोख ॥ मुकामु ता परु जाणीऐ जा रहै निहचलु लोक ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ घरु २ ॥ मुकामु करि घरि बैसणा नित चलणै की धोख ॥ मुकामु ता परु जाणीऐ जा रहै निहचलु लोक ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुकामु = पक्का ठिकाना, तकिया। करि = कर के, बना के। घरि = घर में। धोख = धुक धुकी, चिन्ता। ता परु = तभी। लोक = जगत। निहचलु = अटल।1।
अर्थ: (दुनिया को अपने रहने के लिए) पक्का ठिकाना समझ के घर में बैठ जाना भी (मनुष्य को मौत से बे-फिक्र नहीं कर सकता, क्यूँकि यहां से) चले जाने की चिन्ता तो सदा लगी रहती है। जगत में जीव का पक्का ठिकाना तो तभी समझना चाहिए, यदि ये जगत भी सदा कायम रहने वाला हो (पर ये तो सब कुछ ही नाशवान है)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दुनीआ कैसि मुकामे ॥ करि सिदकु करणी खरचु बाधहु लागि रहु नामे ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
दुनीआ कैसि मुकामे ॥ करि सिदकु करणी खरचु बाधहु लागि रहु नामे ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कैसि = किस तरह? मुकामे = पक्का ठिकाना। सिदकु = श्रद्धा। करणी = उच्च आचरण। नामे = नाम में।1। रहाउ।
अर्थ: (हे भाई!) यह जगत (जीवों के वास्ते) सदा रहने वाली जगह नहीं हो सकती। (इस वास्ते अपने दिल में) श्रद्धा धारण करके उच्च आत्मिक जीवन को (अपने जीवन सफर के लिए) खर्च (तैयार करके पल्ले) बांध। सदा परमात्मा के नाम में जुड़ा रह।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जोगी त आसणु करि बहै मुला बहै मुकामि ॥ पंडित वखाणहि पोथीआ सिध बहहि देव सथानि ॥२॥
मूलम्
जोगी त आसणु करि बहै मुला बहै मुकामि ॥ पंडित वखाणहि पोथीआ सिध बहहि देव सथानि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मकामि = तकिए में। देव सथानि = देवते के मन्दिर में। सिध = करामाती योगी।2।
अर्थ: जोगी आसन जमा के बैठता है। सांई फकीर तकिये में डेरा लगाते हैं, पंडित (धर्म स्थलों में बैठ के) धर्म पोथिआं (और लोगों को) सुनाते है, करामाती योगी शिव आदि के मंदिर में बैठते हैं (पर अपनी अपनी बारी सब जगत से कूच करते जा रहे हैं)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुर सिध गण गंधरब मुनि जन सेख पीर सलार ॥ दरि कूच कूचा करि गए अवरे भि चलणहार ॥३॥
मूलम्
सुर सिध गण गंधरब मुनि जन सेख पीर सलार ॥ दरि कूच कूचा करि गए अवरे भि चलणहार ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुर = देवते। गण = शिवजी के उपासक। गंधर्व = देवताओं के रागी। सलार = सरदार। दरि कूच कूचा = अपनी अपनी बारी कूच। अवरे भी = बाकी और भी।3।
अर्थ: देवते, योग साधना में लीन योगी, (शिव के उपासक) गण, देवताओं के गवईए (गंधर्व), (समाधियों में मौन टिके रहने वाले) मुनि जन, शेख, पीर और सरदार (कहलाने वाले) अपनी अपनी बारी सभी जगत से कूच कर गए, (जो इस वक्त यहां दिखाई दे रहे हैं) ये भी सारे यहां से चले जाने वाले हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुलतान खान मलूक उमरे गए करि करि कूचु ॥ घड़ी मुहति कि चलणा दिल समझु तूं भि पहूचु ॥४॥
मूलम्
सुलतान खान मलूक उमरे गए करि करि कूचु ॥ घड़ी मुहति कि चलणा दिल समझु तूं भि पहूचु ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मलूक = राजे, मलक। उमरे = अमीर लोग। मुहति = दो घड़ी के समय में। दिल = हे दिल! पहूचु = पहुँचने वाला।4।
अर्थ: बादशाह, खान, राजे, अमीर, वजीर अपना अपना डेरा कूच कर के चले गए। घड़ी दो घड़ी में हरेक ने यहां से चले जाना है। हे मन! दिमाग से काम ले (मूर्ख ना बन, गाफिल ना हो) तूने भी (परलोक) पहुँच जाना है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सबदाह माहि वखाणीऐ विरला त बूझै कोइ ॥ नानकु वखाणै बेनती जलि थलि महीअलि सोइ ॥५॥
मूलम्
सबदाह माहि वखाणीऐ विरला त बूझै कोइ ॥ नानकु वखाणै बेनती जलि थलि महीअलि सोइ ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सबदाह माहि = शब्दों में, जुबानी जुबानी, बातों से। वखाणै = कहता है। महीअलि = मही+तल, धरती के तल पर, आकाश में।5।
अर्थ: नानक बेनती करता है, जबानी जबानी तो हर कोई कहता है, पर कोई एक आध ही यकीन लाता है (कि हरेक ने यहां से चले जाना है और यहां सिर्फ) वही परमात्मा (अटल रहने वाला है जो) जल में, धरती में, आकाश में (हर जगह मौजूद है)।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अलाहु अलखु अगमु कादरु करणहारु करीमु ॥ सभ दुनी आवण जावणी मुकामु एकु रहीमु ॥६॥
मूलम्
अलाहु अलखु अगमु कादरु करणहारु करीमु ॥ सभ दुनी आवण जावणी मुकामु एकु रहीमु ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अगंम = अगम्य (पहुँच से परे)। कादरु = कुदरति का मालिक। करीमु = बख्शिश करने वाला। मुकामु = पक्का ठिकाना,सदा कायम। रहीमु = रहिम करने वाला प्रभु।6।
अर्थ: सारी दुनिया आने जाने वाली है (नाशवान है)। सदा कायम रहने वाला सिर्फ एक वही है जो अल्लाह (कहलाता) है, जो अलख है, अगम्य (पहुँच से परे) है, जो सारी कुदरति का मालिक है, जो सारे जगत का रचनहार है, और, जो सभ जीवों पे रहिम करने वाला है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मुकामु तिस नो आखीऐ जिसु सिसि न होवी लेखु ॥ असमानु धरती चलसी मुकामु ओही एकु ॥७॥
मूलम्
मुकामु तिस नो आखीऐ जिसु सिसि न होवी लेखु ॥ असमानु धरती चलसी मुकामु ओही एकु ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तिस नो = उसको (परमात्मा को)। जिसु सिसि = जिसके सीस पे। लेखु = मौत का लेख। ओही एकु = वही एक परमात्मा।7।
अर्थ: सदा कायम रहने वाला सिर्फ उस परमात्मा को ही कहा जा सकता है, जिसके सिर पर मौत का लेख नहीं है। ये आकाश ये धरती यब कुछ नाशवान है, पर वह परमात्मा सदा अटल है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दिन रवि चलै निसि ससि चलै तारिका लख पलोइ ॥ मुकामु ओही एकु है नानका सचु बुगोइ ॥८॥१७॥
मूलम्
दिन रवि चलै निसि ससि चलै तारिका लख पलोइ ॥ मुकामु ओही एकु है नानका सचु बुगोइ ॥८॥१७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रवि = सूरज। निसि = रात। ससि = चंद्रमा। पलोइ = पलायन कर जाने वाले, चले जाने वाले, नाशवान। बगोइ = कह।8।
अर्थ: हे नानक! ये अटल वचन कह दे- दिन और सूर्य नाशवान हैं, (ये दिखाई दे रहे) लाखों तारे भी नाश हो जाएंगे। सदा कायम रहने वाला सिर्फ एक परमात्मा ही है।8।17।
विश्वास-प्रस्तुतिः
महले पहिले सतारह असटपदीआ ॥ सिरीरागु महला ३ घरु १ असटपदीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
महले पहिले सतारह असटपदीआ ॥ सिरीरागु महला ३ घरु १ असटपदीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखि क्रिपा करे भगति कीजै बिनु गुर भगति न होइ ॥ आपै आपु मिलाए बूझै ता निरमलु होवै कोइ ॥ हरि जीउ सचा सची बाणी सबदि मिलावा होइ ॥१॥
मूलम्
गुरमुखि क्रिपा करे भगति कीजै बिनु गुर भगति न होइ ॥ आपै आपु मिलाए बूझै ता निरमलु होवै कोइ ॥ हरि जीउ सचा सची बाणी सबदि मिलावा होइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु के सन्मुख रहने से। कीजै = की जा सकती है। आपै = (गुरु के) स्वै में। आपु = अपने आप को। बूझे = समझ लेता है। सदा = सच्चा, सदा स्थिर रहने वाला। सबदि = शब्द के द्वारा।1।
अर्थ: गुरु की शरण पड़ने से (जब) परमात्मा मेहर करता है, तो उसकी भक्ति की जाती है। गुरु (की शरण) के बिना (परमात्मा की) भक्ति नहीं हो सकती। जब कोई मनुष्य (गुरु के) स्वै में स्वयं को मिलाना सीख जाता है, तोवह पवित्र (जीवन वाला) हो जाता है। जो परमातमा सदा स्थिर रहने वाला है जिसकी महिमा की वाणी सदा अटल है, उससे गुरु के शब्द में जुड़ने से मिलाप हो जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे भगतिहीणु काहे जगि आइआ ॥ पूरे गुर की सेव न कीनी बिरथा जनमु गवाइआ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे भगतिहीणु काहे जगि आइआ ॥ पूरे गुर की सेव न कीनी बिरथा जनमु गवाइआ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जगि = जगत में। बिरथा = व्यर्थ।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा की भक्ति से वंचित रहा, उसका जगत में आना किस अर्थ का? जिसने (जगत में आ के) पूरे गुरु का पल्ला नहीं पकड़ा, उसने अपना जन्म व्यर्थ गवा लिया।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपे हरि जगजीवनु दाता आपे बखसि मिलाए ॥ जीअ जंत ए किआ वेचारे किआ को आखि सुणाए ॥ गुरमुखि आपे दे वडिआई आपे सेव कराए ॥२॥
मूलम्
आपे हरि जगजीवनु दाता आपे बखसि मिलाए ॥ जीअ जंत ए किआ वेचारे किआ को आखि सुणाए ॥ गुरमुखि आपे दे वडिआई आपे सेव कराए ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जग जीवनु = जगत का जीवन, जगत के जीवों की जिंदगी का सहारा। बखसि = मेहर करके। आखि = कह के। गुरमुखि = गुरु के द्वारा।2।
अर्थ: परमात्मा खुद ही जगत के सारे जीवों की जिंदगी का सहारा है वह खुद ही मेहर करके (जीवों को अपने साथ) मिलाता है। (नहीं तो) ये जीव-जंतु बिचारे क्या करें? (भाव, इनकी कोई बिसात नहीं कि ये अपने प्रयास से प्रभु चरणों से जुड़ सकें। अपने किसी ऐसे प्रयास के बाबत) कोई जीव क्या कह के (किसी को) सुना सकता है? प्रभु खुद ही गुरु के द्वारा (अपने नाम की) बड़ाई महिमा देता है, स्वयं ही अपनी सेवा भक्ति कराता है।2।
[[0065]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
देखि कुट्मबु मोहि लोभाणा चलदिआ नालि न जाई ॥ सतिगुरु सेवि गुण निधानु पाइआ तिस की कीम न पाई ॥ प्रभु सखा हरि जीउ मेरा अंते होइ सखाई ॥३॥
मूलम्
देखि कुट्मबु मोहि लोभाणा चलदिआ नालि न जाई ॥ सतिगुरु सेवि गुण निधानु पाइआ तिस की कीम न पाई ॥ प्रभु सखा हरि जीउ मेरा अंते होइ सखाई ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देखि = देख के। मोहि = मोह में। सेवि = सेवा करके,शरण पड़ के। गुण निधानु = गुणों का खजाना प्रभु। कीम = कीमत। सखा = मित्र।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘तिस की’ में से ‘तिसु’ की ‘ु’ की मात्रा, संबंधक ‘की’ के कारण हट गई है। देखें गुरबाणी व्याकरण।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (मनुष्य अपने) परिवार को देख के (उस के) मोह में फंस जाता है (कभी ये नहीं समझता कि जगत से) चलने के वक्त (किसी ने उसके) साथ नहीं जाना। जिस मनुष्य ने गुरु की शरण पड़ कर गुणों का खजाना परमात्मा से प्राप्त कर लिया है, उस (की शोभा) का मुल्य नहीं पड़ सकता। प्यारा प्रभु जो (असल में) मित्र है अंत समय (जब अन्य सभी साक-संबंधी साथ छोड़ देते हैं उसका) साथी बनता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पेईअड़ै जगजीवनु दाता मनमुखि पति गवाई ॥ बिनु सतिगुर को मगु न जाणै अंधे ठउर न काई ॥ हरि सुखदाता मनि नही वसिआ अंति गइआ पछुताई ॥४॥
मूलम्
पेईअड़ै जगजीवनु दाता मनमुखि पति गवाई ॥ बिनु सतिगुर को मगु न जाणै अंधे ठउर न काई ॥ हरि सुखदाता मनि नही वसिआ अंति गइआ पछुताई ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पेईअड़ै = पिता के घर में, इस लोक में। मनमुखि = मनमुख ने, अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य ने। पति = इज्जत। मगु = मार्ग, रास्ता। ठउर = जगह, सहारा। मनि = मन में।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘काई’ स्त्रीलिंग है जबकि ‘कोई’ पुलिंग है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य ने (इस) पिता के घर में (इस लोक में) उस परमात्मा को (बिसार के) जो सभ दातें देने वाला है और जो जगत के सारे जीवों की जिंदगी का सहारा है, अपनी इज्जत गवा ली है। मनुष्य (जीवन का सही) रास्ता नहीं समझ सकता, (माया के मोह में) अंधे हुए मनुष्य कोकहीं कोई सहारा नहीं मिलता। जिस मनुष्य के मन में सारे सुख देने वाला परमात्मा नहीं बसता, वह अंत समय यहां से पछताता जाता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पेईअड़ै जगजीवनु दाता गुरमति मंनि वसाइआ ॥ अनदिनु भगति करहि दिनु राती हउमै मोहु चुकाइआ ॥ जिसु सिउ राता तैसो होवै सचे सचि समाइआ ॥५॥
मूलम्
पेईअड़ै जगजीवनु दाता गुरमति मंनि वसाइआ ॥ अनदिनु भगति करहि दिनु राती हउमै मोहु चुकाइआ ॥ जिसु सिउ राता तैसो होवै सचे सचि समाइआ ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मंनि = मन में। अनदिनु = हर रोज। काहि = करते हैं। सिउ = से। सचि = सच में, सदा स्थिर प्रभु में।5।
अर्थ: जिस मनुष्यों ने इस जीवन में ही जगत जीवन दातार प्रभु को गुरु की मति ले के अपने मन में बसाया है, वह दिन रात हर वक्त परमात्मा की भक्ति करते हैं, वह (अपने अंदर से) अहम् और माया का मोह दूर कर लेते हैं।
(ये एक कुदरती नियम है कि जो मनुष्य) जिसके प्रेम में रंगा जाता है वह उसी जैसा हो जाता है (सो, सदा स्थिर प्रभु के प्रेम में रंगा हुआ मनुष्य) सदा स्थिर प्रभु में ही लीन रहता है।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपे नदरि करे भाउ लाए गुर सबदी बीचारि ॥ सतिगुरु सेविऐ सहजु ऊपजै हउमै त्रिसना मारि ॥ हरि गुणदाता सद मनि वसै सचु रखिआ उर धारि ॥६॥
मूलम्
आपे नदरि करे भाउ लाए गुर सबदी बीचारि ॥ सतिगुरु सेविऐ सहजु ऊपजै हउमै त्रिसना मारि ॥ हरि गुणदाता सद मनि वसै सचु रखिआ उर धारि ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भाउ = प्रेम। लाए = पैदा करता है। बीचारि = विचारता है। सेविऐ = अगर सेवा की जाए, आसरा लिया जाए। सहजु = आत्मिक अडोलता। मारि = मार के। सद = सदा। उरधारि = दिल में टिका के (उरस् = हृदय)।6।
अर्थ: जिस मनुष्य पर प्रभु स्वयं ही मेहर की निगाह करता है, उसके अंदर अपना प्यार पैदा करता है, और वह मनुष्य गुरु के शब्द के द्वारा (प्रभु के गुणों की) विचार करता है। सतिगुरु की शरण पड़ने से अहम् मार के और माया की तृष्णा खत्म करके आत्मिक अडोलता पैदा होती है। (जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ता है) सारे गुणों का दाता परमात्मा सदा उसके मन में बसता है। सदा स्थिर रहने वाले प्रभु को वह मनुष्य अपने हृदय में टिकाए रहता है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
प्रभु मेरा सदा निरमला मनि निरमलि पाइआ जाइ ॥ नामु निधानु हरि मनि वसै हउमै दुखु सभु जाइ ॥ सतिगुरि सबदु सुणाइआ हउ सद बलिहारै जाउ ॥७॥
मूलम्
प्रभु मेरा सदा निरमला मनि निरमलि पाइआ जाइ ॥ नामु निधानु हरि मनि वसै हउमै दुखु सभु जाइ ॥ सतिगुरि सबदु सुणाइआ हउ सद बलिहारै जाउ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनि निरमलि = निर्मल मन से। सभु = सारा। सतिगुरि = सतिगुर ने।7।
अर्थ: प्यारा परमात्मा सदा ही पवित्र स्वरूप रहता है (इस वास्ते) पवित्र मन से ही उससे मिला जा सकता है। परमात्मा का नाम (जो सारे गुणों का) खजाना (है) जिस मनुष्य के मन में बस जाता है, उसके सारे का सारा अहंकार का दुख दूर हो जाता है।
मैं (भाग्यशाली मनुष्य से) सदा कुर्बान जाता हूँ, जिसे सतिगुरु ने महिमा का शब्द सुना दिया है, (भाव, जिसकी तवज्जो गुरु ने महिमा में जोड़ दी है)।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपणै मनि चिति कहै कहाए बिनु गुर आपु न जाई ॥ हरि जीउ भगति वछलु सुखदाता करि किरपा मंनि वसाई ॥ नानक सोभा सुरति देइ प्रभु आपे गुरमुखि दे वडिआई ॥८॥१॥१८॥
मूलम्
आपणै मनि चिति कहै कहाए बिनु गुर आपु न जाई ॥ हरि जीउ भगति वछलु सुखदाता करि किरपा मंनि वसाई ॥ नानक सोभा सुरति देइ प्रभु आपे गुरमुखि दे वडिआई ॥८॥१॥१८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चिति = चिक्त में। कहै = कहता है। आपु = स्वै भाव। भगति वछलु = भक्ति को प्यार करने वाला (वछल = वात्सल्य)। मंनि = मन में। देइ = देता है। दे = देता है। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ने से।8।
अर्थ: (बेशक कोई मनुष्य) अपने मन में अपने चिक्त मेंये कहे (कि मैंने अपने अंदर से स्वैभाव दूर कर लिया है, औरों से भी यही) कहलवा ले (कि इसने स्वैभाव दूर कर लिया है, पर) गुरु की शरण पड़े बिना स्वै भाव दूर नहीं होता। परमात्मा (अपनी) भक्ति से प्यार करने वाला है, (जीवों को) सारे सुख देने वाला है। जिस मनुष्य पर वह कृपा करता है वह ही (उसको अपने) मन में बसाता है।
हे नानक! परमात्मा (जीव को) गुरु की शरण पड़ कर स्वयं ही (महिमा वाली) तवज्जो बख्शता है और फिर स्वयं ही उसे (लोक परलोक में) शोभा व उपमा देता है।8।1।18।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ हउमै करम कमावदे जमडंडु लगै तिन आइ ॥ जि सतिगुरु सेवनि से उबरे हरि सेती लिव लाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ हउमै करम कमावदे जमडंडु लगै तिन आइ ॥ जि सतिगुरु सेवनि से उबरे हरि सेती लिव लाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: डंडु = डंडा। करम = (निहित धार्मिक) कर्म। आइ = आ के। जि = जो लोग। सेवनि = सेवा करते हैं। लाइ = लगा के।1।
अर्थ: जो मनुष्य (कोई निहित धार्मिक) काम करते हैं (और यह) अहम् (भी) करते हैं (कि हम धार्मिक कर्म करते हैं), उनके (सिर) पे जम का डंडा आ बजता है। (पर) जो मनुष्य गुरु का आसरा लेते हैं, वह प्रभु (चरणों) में तवज्जो जोड़ के (इस मार से) बच जाते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे गुरमुखि नामु धिआइ ॥ धुरि पूरबि करतै लिखिआ तिना गुरमति नामि समाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे गुरमुखि नामु धिआइ ॥ धुरि पूरबि करतै लिखिआ तिना गुरमति नामि समाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु की शरण पड़के। धुरि = धुर से। पूरबि = पहले जन्म में। करतै = कर्तार ने। समाइ = समाई।1। रहाउ।
अर्थ: हे (मेरे) मन! गुरु की शरण पड़ के परमात्मा का नाम स्मरण कर। (नाम बड़ी दुर्लभ दात है) गुरु की शिक्षा पे चल के उन लोगों की ही (प्रभु के) नाम में लीनता होती है, जिनके माथे पे कर्तार ने धुर से ही उनके पहले जन्म की की हुई नेक कमाई अनुसार लेख लिख दिया है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
विणु सतिगुर परतीति न आवई नामि न लागो भाउ ॥ सुपनै सुखु न पावई दुख महि सवै समाइ ॥२॥
मूलम्
विणु सतिगुर परतीति न आवई नामि न लागो भाउ ॥ सुपनै सुखु न पावई दुख महि सवै समाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: परतीति = श्रद्धा। नामि = नाम में। भाउ = प्रेम। पावई = पाता है। सवै = सोता है, फंसा रहता है।2।
अर्थ: गुरु (की शरण पड़ने) के बिना (मनुष्य के मन में परमात्मा के वास्ते) श्रद्धा पैदा नहीं होती, ना परमात्मा के नाम में उसका प्यार बनता है (और नतीजा ये निकलता है कि उसको) सुपने में भी सुख नसीब नहीं होता। वह सदा दुखों में ही घिरा रहता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जे हरि हरि कीचै बहुतु लोचीऐ किरतु न मेटिआ जाइ ॥ हरि का भाणा भगती मंनिआ से भगत पए दरि थाइ ॥३॥
मूलम्
जे हरि हरि कीचै बहुतु लोचीऐ किरतु न मेटिआ जाइ ॥ हरि का भाणा भगती मंनिआ से भगत पए दरि थाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कीचै = करना चाहिए। लोचीऐ = इच्छा रखते हैं। किरतु = कृत, पिछले कर्मों का असर। भगती = भक्तों ने। दरि = (प्रभु के) दर पर। थाइ = स्थान में, स्वीकार।3।
अर्थ: (अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य के वास्ते) यदि यह बड़ी लालसा भी करें कि वह परमात्मा का स्मरण करे (तो भी इस चाहत और प्रेरणा में सफलता नहीं होती, क्यों कि) पिछले जन्मों के किए कर्मों का प्रभाव मिटाया नही जा सकता। भक्त जन ही परमात्मा की रजा को स्वीकार करते हैं, वह भक्त ही परमात्मा के दर पे स्वीकार होते हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरु सबदु दिड़ावै रंग सिउ बिनु किरपा लइआ न जाइ ॥ जे सउ अम्रितु नीरीऐ भी बिखु फलु लागै धाइ ॥४॥
मूलम्
गुरु सबदु दिड़ावै रंग सिउ बिनु किरपा लइआ न जाइ ॥ जे सउ अम्रितु नीरीऐ भी बिखु फलु लागै धाइ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रंग = प्रेम। सउ = सौ बार। नीरीऐ = सिंचाई करें। बिखु = जहर (आत्मिक मौत लाने वाला), विष। धाइ = दौड़ के, जल्दी।4।
अर्थ: गुरु प्रेम से (अपना) शब्द (शरण आए मनुष्य के दिल में) पक्का करता है। पर (गुरु भी परमात्मा की) कृपा के बिना नहीं मिलता। (गुरु से बे-मुख मनुष्य, जैसे, एक ऐसा वृक्ष है कि) यदि उसे सौ बार भी अमृत से सीचें तो भी उसका जहर का फल ही जल्दी लगता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
से जन सचे निरमले जिन सतिगुर नालि पिआरु ॥ सतिगुर का भाणा कमावदे बिखु हउमै तजि विकारु ॥५॥
मूलम्
से जन सचे निरमले जिन सतिगुर नालि पिआरु ॥ सतिगुर का भाणा कमावदे बिखु हउमै तजि विकारु ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तजि = त्याग के।5।
अर्थ: वही मनुष्य सदा के लिए पवित्र जीवन वाले रहते हैंजिनका गुरु के साथ प्यार (टिका रहता) है। वह मनुष्य अपने अंदर से अहम् का जहर, अहम् का विकार दूर करके गुरु की रजा मुताबिकजीवन बिताते हैं।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनहठि कितै उपाइ न छूटीऐ सिम्रिति सासत्र सोधहु जाइ ॥ मिलि संगति साधू उबरे गुर का सबदु कमाइ ॥६॥
मूलम्
मनहठि कितै उपाइ न छूटीऐ सिम्रिति सासत्र सोधहु जाइ ॥ मिलि संगति साधू उबरे गुर का सबदु कमाइ ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हठि = हठ से। कितै उपाइ = किसी भी तरीके से। जाइ = जा के। सोधहु = विचार के पढ़ के देखो। मिलि = मिल के। साधू = गुरु।6।
अर्थ: (हे भाई!) बे-शक तुम शास्त्रों-स्मृतियों (आदि धार्मिक पुस्तकों) को ध्यान से पढ़ के देख लो, अपने मन के हठ से किए हुए किसी भी तरीके से (अहम् के जहर से) बच नहीं सकते। गुरु के शब्द अनुसार जीवन बना के गुरु की संगति में मिल के ही (मनुष्य अहम् व विकारों से) बचते हैं।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि का नामु निधानु है जिसु अंतु न पारावारु ॥ गुरमुखि सेई सोहदे जिन किरपा करे करतारु ॥७॥
मूलम्
हरि का नामु निधानु है जिसु अंतु न पारावारु ॥ गुरमुखि सेई सोहदे जिन किरपा करे करतारु ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निधानु = खजाना। सेई = वही लोग।7।
अर्थ: जिस परमात्मा के गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता। जिस परमात्मा की हस्ती का इस पार का उस पार का छोर नहीं मिल सकता। उसका नाम (सब पदार्तों के गुणों का) खजाना है। गुरु की शरण पड़ के वही मनुष्य (ये खजाना हासिल करते हैं तथा) सुंदर जीवन वाले बनते हैं, जिस पर परमात्मा खुद कृपा करता है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नानक दाता एकु है दूजा अउरु न कोइ ॥ गुर परसादी पाईऐ करमि परापति होइ ॥८॥२॥१९॥
मूलम्
नानक दाता एकु है दूजा अउरु न कोइ ॥ गुर परसादी पाईऐ करमि परापति होइ ॥८॥२॥१९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुर परसादी = गुरु की कृपा से। करमि = (परमात्मा की मेहर), मेहर से।8।
अर्थ: हे नानक! (गुरु ही परमात्मा के नाम की) दात देने वाला है, कोई और नही (जो यह दात दे सके। परमात्मा का नाम) गुरु की कृपा के साथ ही मिलता है। परमात्मा की बख्शिश से मिलता है।8।2।19।
[[0066]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ पंखी बिरखि सुहावड़ा सचु चुगै गुर भाइ ॥ हरि रसु पीवै सहजि रहै उडै न आवै जाइ ॥ निज घरि वासा पाइआ हरि हरि नामि समाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ पंखी बिरखि सुहावड़ा सचु चुगै गुर भाइ ॥ हरि रसु पीवै सहजि रहै उडै न आवै जाइ ॥ निज घरि वासा पाइआ हरि हरि नामि समाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पंखी = पंछी, जीव पंछी। बिरखि = वृक्ष पर,शरीर रूप में (बसता)। सचु = सदा स्थिर रहने वाला प्रभु का नाम। गुर भाइ = गुरु के प्रेम में। पीवै = पीता है। सहजि = आत्मिक अडोलता में। उडै ना = उड़ता नहीं, भब्कता नहीं। आवै = आता, पैदा होता। जाइ = जाता, मरता। निज घरि = अपने (असल) घर में, प्रभु के चरणों में। नामि = नाम में।1।
अर्थ: जो जीव-पंछी इस शरीर वृक्ष पर बैठा हुआ गुरु के प्रेम में रह के सदा स्थिर प्रभु के नाम का चोगा चुगता है, वह खूबसूरत जीवन वाला हो जाता है। वह परमात्मा के नाम का रस पीता है। आत्मक अडोलता में टिका रहता है। (माया पदार्तों के चोगे की तरफ) भटकता नहीं फिरता, (इस वास्ते) जनम मरण के चक्कर से बचा रहता है। उसको अपने (असल) घर में (प्रभु चरणों में) निवास मिला रहता है। वह सदा प्रभु के नाम में लीन रहता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे गुर की कार कमाइ ॥ गुर कै भाणै जे चलहि ता अनदिनु राचहि हरि नाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे गुर की कार कमाइ ॥ गुर कै भाणै जे चलहि ता अनदिनु राचहि हरि नाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कमाइ = कर। भाणै = रजा में। चलहि = तू चले। अनदिनु = हर रोज। राचहि = रचा रहेगा, टिका रहेगा। नामि = नाम में।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! गुरु की बताई कार कर। अगर तू गुरु के हुक्म में चलेगा, तो तू हर समय परमात्मा के नाम में जुड़ा रहेगा।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पंखी बिरख सुहावड़े ऊडहि चहु दिसि जाहि ॥ जेता ऊडहि दुख घणे नित दाझहि तै बिललाहि ॥ बिनु गुर महलु न जापई ना अम्रित फल पाहि ॥२॥
मूलम्
पंखी बिरख सुहावड़े ऊडहि चहु दिसि जाहि ॥ जेता ऊडहि दुख घणे नित दाझहि तै बिललाहि ॥ बिनु गुर महलु न जापई ना अम्रित फल पाहि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बिरख = पेड़ों पर। उडहि = उड़ते हैं। दिसि = तरफ। जाहि = जाते हैं। घणे = बहुत। दाझहि = जलते हैं। तै = और। जापई = प्रतीत होता है, लगता है, दिखता है।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शब्द ‘तै’ व ‘ते’ का फर्क याद रखने योग्य है: ‘तै’ = और। ‘ते’ = से।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जो जीव-पंछी (अपने-अपने) शरीर वृक्षों पर (बैठे देखने में तो) सुंदर लगते हैं (पर माया के पदार्तों के चोगे के पीछे) उड़ते फिरते हैं, चारों तरफ भटकते हैं। वे जितना भी (चोगे के पीछे) उड़ते हैं, उतना ही ज्यादा दुख पाते हैं। सदा खिझते हैं और बिलकते हैं। गुरु की शरण के बगैर उन्हें (परमात्मा का) ठिकाना नहीं दिखता, और ना ही वह आत्मिक जीवन देने वाला नाम फल प्राप्त कर सकते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखि ब्रहमु हरीआवला साचै सहजि सुभाइ ॥ साखा तीनि निवारीआ एक सबदि लिव लाइ ॥ अम्रित फलु हरि एकु है आपे देइ खवाइ ॥३॥
मूलम्
गुरमुखि ब्रहमु हरीआवला साचै सहजि सुभाइ ॥ साखा तीनि निवारीआ एक सबदि लिव लाइ ॥ अम्रित फलु हरि एकु है आपे देइ खवाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु की शरण में रहने वाला मनुष्य। साचै = सदा स्थिर प्रभु में। सुभाइ = प्रेम में। साखा = टहणीयां। तीनि साखा = तीन टहनियां, माया के तीन गुण। सबदि = शब्द में। लाइ = लगा के। अंम्रित फलु = आत्मिक जीवन देने वाला नाम फल। देइ = देता है।3।
अर्थ: गुरु के सन्मुख रहने वाला मनुष्य परमात्मा का रूप हो जाता है। वह जैसे एक हरा-भरा पेड़ है। (वह भाग्यशाली मनुष्य) सदा स्थिर प्रभु में जुड़ा रहता है।, आत्मिक अडोलता में टिका रहता है, प्रभु के प्रेम में मगन रहता है। परमात्मा के महिमा के शब्द में तवज्जो जोड़ के (माया के तीन रूप) तीन टहनियां उसने दूर कर ली हैं। उसको आत्मिक जीवन देने वाला सिर्फ एक नाम फल लगता है। (प्रभु मेहर करके) खुद ही (उसको यह फल) चखा देता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनमुख ऊभे सुकि गए ना फलु तिंना छाउ ॥ तिंना पासि न बैसीऐ ओना घरु न गिराउ ॥ कटीअहि तै नित जालीअहि ओना सबदु न नाउ ॥४॥
मूलम्
मनमुख ऊभे सुकि गए ना फलु तिंना छाउ ॥ तिंना पासि न बैसीऐ ओना घरु न गिराउ ॥ कटीअहि तै नित जालीअहि ओना सबदु न नाउ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य। उभै = खड़े खड़े। बैसीऐ = बैठिए। गिराउ = ग्राम, गांव। जालीअहि = जलाए जाते हैं।4।
अर्थ: (पर) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य, जैसे, वह वृक्ष हैं जो खड़े खड़े ही सूख गए हैं। उनको ना ही फल लगता है, ना ही उनकी छाया होती है, (भाव, ना ही उनके पास प्रभु का नाम है, और ना ही वे किसी की सेवा करते हैं)। उनके पास बैठना ही नहीं चाहिए, उनका कोई घर घाट नहीं है। (उनको कोई आत्मिक सहारा नहीं मिलता)। वह (मनमुख वृक्ष) सदा काटे जाते हैं और जलाए जाते हैं (भाव, माया के मोह के कारण वे नित्य दुखी रहते हैं)। उनके पास ना प्रभु की महिमा है, ना ही प्रभु का नाम है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हुकमे करम कमावणे पइऐ किरति फिराउ ॥ हुकमे दरसनु देखणा जह भेजहि तह जाउ ॥ हुकमे हरि हरि मनि वसै हुकमे सचि समाउ ॥५॥
मूलम्
हुकमे करम कमावणे पइऐ किरति फिराउ ॥ हुकमे दरसनु देखणा जह भेजहि तह जाउ ॥ हुकमे हरि हरि मनि वसै हुकमे सचि समाउ ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हुकमै = हुक्म में ही। पइऐ किरति = किए हुए कर्मों के संस्कार के अनुसार। पइऐ = उस कर्म अनुसार जो संस्कारों के रूप में मनुष्य के मन में एकत्र हो चुके हैं। फिराउ = फेरा। समाउ = समाई। सचि = सदा स्थिर प्रभु में।5।
अर्थ: (पर, हे प्रभु! जीवों के भी क्या बस? तेरे) हुक्म में ही (जीव) कर्म कमाते हैं। (तेरे हुक्म में ही) पिछले किये कर्मों के संस्कारों के अनुसार उनको जनम मरण का फेरा पड़ा रहता है। तेरे हुक्म अनुसार ही कई जीवों को तेरा दर्शन प्राप्त होता है। जिधर तू भेजता है, उधर जाना पड़ता है। तेरे हुक्म अनुसार ही कई जीवों के मन में तेरा हरि नाम बसता है। तेरे हुक्म में ही तेरे सदा स्थिर स्वरूप में उनकी लीनता बनी रहती है।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हुकमु न जाणहि बपुड़े भूले फिरहि गवार ॥ मनहठि करम कमावदे नित नित होहि खुआरु ॥ अंतरि सांति न आवई ना सचि लगै पिआरु ॥६॥
मूलम्
हुकमु न जाणहि बपुड़े भूले फिरहि गवार ॥ मनहठि करम कमावदे नित नित होहि खुआरु ॥ अंतरि सांति न आवई ना सचि लगै पिआरु ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बपुड़े = बिचारे। गवार = मूर्ख। हठि = हठ से। होहि = होते हैं।6।
अर्थ: कई ऐसे बिचारे मनुष्य हैं जो परमात्मा का हुक्म नहीं समझते, वह (माया के मोह के कारण) गलत रास्ते पर पड़के भटकते फिरते हैं। वह (गुरु का आसरा छोड़ के अपने) मन के हठ से (कई किस्म के निहित धार्मिक) कर्म करते है, (पर विकारों में फंसे हुए) सदा खुआर रहते हैं। उनके मन में शांति नहीं आती, ना ही उनका सदा स्थिर प्रभु में प्यार बनता है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखीआ मुह सोहणे गुर कै हेति पिआरि ॥ सची भगती सचि रते दरि सचै सचिआर ॥ आए से परवाणु है सभ कुल का करहि उधारु ॥७॥
मूलम्
गुरमुखीआ मुह सोहणे गुर कै हेति पिआरि ॥ सची भगती सचि रते दरि सचै सचिआर ॥ आए से परवाणु है सभ कुल का करहि उधारु ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हेति = प्यार में। दरि = दर पर।7।
अर्थ: गुरु के सन्मुख रहने वाले लोगों के मुंह (नाम की लाली से) सुंदर लगते हैं, क्योंकि वह गुरु के प्रेम में गुरु के प्यार में टिके रहते हैं। वह प्रभु की सदा स्थिर रहने वाली भक्ति करते हैं। वह सदा स्थिर प्रभु (के प्रेम रंग) में रंगे रहते हैं। (इस वास्ते वह) सदा स्थिर प्रभु के दर पे स्वीकार रहते हैं। उन लोगों का ही जगत में आना स्वीकार है, वह अपने सारे कुल का भी पार उतारा कर लेते हैं।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभ नदरी करम कमावदे नदरी बाहरि न कोइ ॥ जैसी नदरि करि देखै सचा तैसा ही को होइ ॥ नानक नामि वडाईआ करमि परापति होइ ॥८॥३॥२०॥
मूलम्
सभ नदरी करम कमावदे नदरी बाहरि न कोइ ॥ जैसी नदरि करि देखै सचा तैसा ही को होइ ॥ नानक नामि वडाईआ करमि परापति होइ ॥८॥३॥२०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नदरी = मिहर की निगाह में। सचा = सदा स्थिर प्रभु। करमि = बख्शिश से।8।
अर्थ: (पर, जीवों के भी बस की भी बात नहीं) सारे जीव परमात्मा की निगाह मुताबक ही करम करते हैं। उसकी निगाह से बाहर कोई जीव नहीं, (भाव, कोई जीव परमात्मा से आकी हो के कुछ नहीं कर सकता)। सदा स्थिर रहने वाला प्रभु जैसी निगाह करके किसी जीव की ओर देखता है, वह जीव वैसा ही बन जाता है।
हे नानक! (उस की मेहर की नजर से जो मनुष्य उसके नाम में जुड़ता है), उसको आदर सम्मान मिलता है। पर उसका नाम उसकी बख्शिश से ही मिलता है।8।3।20।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ गुरमुखि नामु धिआईऐ मनमुखि बूझ न पाइ ॥ गुरमुखि सदा मुख ऊजले हरि वसिआ मनि आइ ॥ सहजे ही सुखु पाईऐ सहजे रहै समाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ गुरमुखि नामु धिआईऐ मनमुखि बूझ न पाइ ॥ गुरमुखि सदा मुख ऊजले हरि वसिआ मनि आइ ॥ सहजे ही सुखु पाईऐ सहजे रहै समाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = गुरु की ओर मुंह करके। धिआईऐ = स्मरण किया जा सकता है। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने से। बूझ = समझ। ऊजले = रौशन। मनि = मन में। सहजे = सहज ही, आत्मिक अडोलता में।1।
अर्थ: गुरु के शरण पड़ने से (ही) परमात्मा का नाम स्मरण किया जा सकता है। अपने मन के पीछे चलने से (स्मरण की) सूझ नहीं पड़ती। जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ते हैं, वह (लोक परलोक में) सदा संतुलित रहते हैं, उनके मन में परमात्मा आ बसता है (और उनके अंदर आत्मिक अडोलता बन जाती है)। आत्मिक अडोलता से ही आत्मिक आनंद मिलता है। (गुरु की शरण पड़ने से मनुष्य सदा) आत्मिक अडोलता में लीन रहता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे दासनि दासा होइ ॥ गुर की सेवा गुर भगति है विरला पाए कोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे दासनि दासा होइ ॥ गुर की सेवा गुर भगति है विरला पाए कोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे भाई! परमात्मा के सेवकों का सेवक बन- यही है गुरु की बताई सेवा, यह है गुरु की (बताई) भक्ति। (ये दात) किसी विरले (भाग्यशाली) को मिलती है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सदा सुहागु सुहागणी जे चलहि सतिगुर भाइ ॥ सदा पिरु निहचलु पाईऐ ना ओहु मरै न जाइ ॥ सबदि मिली ना वीछुड़ै पिर कै अंकि समाइ ॥२॥
मूलम्
सदा सुहागु सुहागणी जे चलहि सतिगुर भाइ ॥ सदा पिरु निहचलु पाईऐ ना ओहु मरै न जाइ ॥ सबदि मिली ना वीछुड़ै पिर कै अंकि समाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुहागु = सौभाग्यं, पति को प्रसन्न रखने का सौभाग्य। भाइ = प्रेम में। निहचलु = अटल, अबिनाशी। सबदि = गुरु के शब्द द्वारा। अंकि = गोद में।2।
अर्थ: जो जीव-स्त्रीयां गुरु के प्रेम में (टिक के जीवन-राह पर) चलती हैं, वे परमात्मा पति की प्रसन्नता के सौभाग्य वाली बन जाती हैं। उनका यह सौभाग्य सदा कायम रहता है। (गुरु की शरण पड़ने से) वह पति प्रभु मिल जाता है जो सदा अटल है, जो ना मरता है, ना कभी पैदा होता है। जो जीव-स्त्री गुरु के शब्द द्वारा उस प्रभु में मिलती है, वह पुनः उससे कभी बिछुड़ती नहीं। वह सदा प्रभु पति की गोद में समाई रहती है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि निरमलु अति ऊजला बिनु गुर पाइआ न जाइ ॥ पाठु पड़ै ना बूझई भेखी भरमि भुलाइ ॥ गुरमती हरि सदा पाइआ रसना हरि रसु समाइ ॥३॥
मूलम्
हरि निरमलु अति ऊजला बिनु गुर पाइआ न जाइ ॥ पाठु पड़ै ना बूझई भेखी भरमि भुलाइ ॥ गुरमती हरि सदा पाइआ रसना हरि रसु समाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बूझई = समझ सकता। भरमि = भटकना, माया की दौड़ भाग में। रसना = जीभ। समाइ = लीन रहता है।3।
अर्थ: परमात्मा पवित्र स्वरूप है, बहुत ही पवित्र स्वरूप है। गुरु की शरण के बिना उससे मिलाप नहीं हो सकता। (जो मनुष्य धार्मिक पुस्तकों का) निरा पाठ (ही) पढ़ता है, (वह इस भेद को) नहीं समझता, (निरे) धार्मिक भेखों से (बल्कि) भटकन में पड़ कर गलत राह पर पड़ जाते हैं। गुरु की मति पर चल कर ही सदा परमात्मा मिलता है, और (मनुष्य की) जीभ में परमात्मा के नाम का स्वाद टिका रहता है।3।
[[0067]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
माइआ मोहु चुकाइआ गुरमती सहजि सुभाइ ॥ बिनु सबदै जगु दुखीआ फिरै मनमुखा नो गई खाइ ॥ सबदे नामु धिआईऐ सबदे सचि समाइ ॥४॥
मूलम्
माइआ मोहु चुकाइआ गुरमती सहजि सुभाइ ॥ बिनु सबदै जगु दुखीआ फिरै मनमुखा नो गई खाइ ॥ सबदे नामु धिआईऐ सबदे सचि समाइ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुभाइ = प्रेम में। नो = को। सचि = सदा स्थिर प्रभु में।4।
अर्थ: (जो मनुष्य) गुरु की मति के अनुसार (चलता है वह अपने अंदर से) माया का मोह मार लेता है (वह) आत्मिक अडोलता में (टिक जाता है, वह प्रभु के) प्रेम में (लीन रहता है)। गुरु के शब्द के बिना जगत (माया के मोह के कारण) दुखी रहता है। अपने मन के पीछे चलने वाले लोगों को माया ग्रसे रखती है।
(हे भाई!) गुरु के शब्द से ही प्रभु का नाम स्मरण किया जा सकता है। गुरु के शब्द से ही सदा स्थिर प्रभु में लीन रहा जा सकता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
माइआ भूले सिध फिरहि समाधि न लगै सुभाइ ॥ तीने लोअ विआपत है अधिक रही लपटाइ ॥ बिनु गुर मुकति न पाईऐ ना दुबिधा माइआ जाइ ॥५॥
मूलम्
माइआ भूले सिध फिरहि समाधि न लगै सुभाइ ॥ तीने लोअ विआपत है अधिक रही लपटाइ ॥ बिनु गुर मुकति न पाईऐ ना दुबिधा माइआ जाइ ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सिध = सिद्ध, योग साधना में व्यस्त योगी। लोअ = लोक, भवन। वियापत है = (अपना) जोर डाले रखती है। अधिक = बहुत। मुकति = खलासी। दुबिधा = दु चिक्ता पन, दु किस्मा पन।5।
अर्थ: (साधारण लोगों की तो क्या बात, योग साधना में) माहिर योगी भी माया के प्रभाव में आ के गलत रास्ते पे भटकते फिरते हैं। प्रभु प्रेम में उनकी तवज्जो नहीं जुड़ती। ये माया तीनों भवनों में अपना प्रभाव डाल रही है। (सभी जीवों को ही) बुरी तरह से चिपकी हुई है। (हे भाई!) गुरु की शरण के बिना (माया से) खलासी नहीं मिल सकती। माया के प्रभाव के कारण पैदा हुई तेर-मेर (द्वैत) भी दूर नहीं होती।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
माइआ किस नो आखीऐ किआ माइआ करम कमाइ ॥ दुखि सुखि एहु जीउ बधु है हउमै करम कमाइ ॥ बिनु सबदै भरमु न चूकई ना विचहु हउमै जाइ ॥६॥
मूलम्
माइआ किस नो आखीऐ किआ माइआ करम कमाइ ॥ दुखि सुखि एहु जीउ बधु है हउमै करम कमाइ ॥ बिनु सबदै भरमु न चूकई ना विचहु हउमै जाइ ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: किस नो = किस को। दुखि = दुख में। बधु = बंधा हुआ।6।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘किस नो’ में ‘किसु’ की ‘ु’ मात्रा संबंधक ‘नो’ के कारण नहीं लगी है। देखो गुरबाणी व्याकरण।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (अगर पूछें कि) माया किस चीज का नाम है? (माया का स्वरूप क्या है? जीवों पे प्रभाव डाल के फिर उनसे ही) माया कौन से काम करवाती है? (तो उक्तर ये है कि माया के प्रभाव में) ये जीव दुख (की निर्वती) में ही सुख (की लालसा) में बंधा रहता है। और, “मैं बड़ा हूँ, मैं बड़ा बन जाऊँ” की प्रेरणा में सारे काम करता है। गुरु के शब्द के बिना जीव की यह भटकना खत्म नहीं होती। ना ही इसके अंदर से “मैं मेरी” की प्रेरणा दूर होती है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बिनु प्रीती भगति न होवई बिनु सबदै थाइ न पाइ ॥ सबदे हउमै मारीऐ माइआ का भ्रमु जाइ ॥ नामु पदारथु पाईऐ गुरमुखि सहजि सुभाइ ॥७॥
मूलम्
बिनु प्रीती भगति न होवई बिनु सबदै थाइ न पाइ ॥ सबदे हउमै मारीऐ माइआ का भ्रमु जाइ ॥ नामु पदारथु पाईऐ गुरमुखि सहजि सुभाइ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: थाइ = जगह में। थाइ न पाइ = स्वीकार नहीं पड़ता। भ्रम = भटकणा।7।
अर्थ: गुरु के शब्द के बिना (मनुष्य के अंदर प्रभु चरणों की प्रीति पैदा नहीं होती, और) प्रीति के बिना (जीव से) परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती, (परमात्मा के दर पे) जीव स्वीकार नहीं होता। गुरु के शब्द द्वारा ही अहम् (मन में से) मारी जा सकती है। गुरु के शब्द द्वारा ही माया की प्रेरणा से पैदा हुठ्र भटकना दूर होती है। गुरु की शरण पड़ने से परमात्मा का नाम (कीमती पदार्थ मिलता है, आत्मिक अडोलता में व प्रभु प्रेम से लीनता होती है)।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बिनु गुर गुण न जापनी बिनु गुण भगति न होइ ॥ भगति वछलु हरि मनि वसिआ सहजि मिलिआ प्रभु सोइ ॥ नानक सबदे हरि सालाहीऐ करमि परापति होइ ॥८॥४॥२१॥
मूलम्
बिनु गुर गुण न जापनी बिनु गुण भगति न होइ ॥ भगति वछलु हरि मनि वसिआ सहजि मिलिआ प्रभु सोइ ॥ नानक सबदे हरि सालाहीऐ करमि परापति होइ ॥८॥४॥२१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: न जापनी = प्रतीत नहीं होता, कद्र नहीं पड़ती। भगति वछलु = भक्ति को प्यार करने वाला। मनि = मन में। करमि = मेहर से। करमु = बख्शिश।8।
अर्थ: गुरु की शरण के बिना उच्च आत्मिक जीवन के गुणों की कद्र नहीं पड़ती। और, आत्मिक जीवन वाले गुणों के बिना परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती। (गुरु के शब्द द्वारा ही) भक्ति के साथ प्यार करने वाला परमात्मा (मनुष्य के) मन में बसता है (आत्मक अडोलता प्राप्त होती है) आत्मिक अडोलता में टिका वह प्रभु को प्राप्त कर लेता है।
हे नानक! गुरु के शब्द से ही परमात्मा की महिमा की जा सकती है। (पर यह दाति) उस की मेहर से ही मिलती है।8।4।21।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ माइआ मोहु मेरै प्रभि कीना आपे भरमि भुलाए ॥ मनमुखि करम करहि नही बूझहि बिरथा जनमु गवाए ॥ गुरबाणी इसु जग महि चानणु करमि वसै मनि आए ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ माइआ मोहु मेरै प्रभि कीना आपे भरमि भुलाए ॥ मनमुखि करम करहि नही बूझहि बिरथा जनमु गवाए ॥ गुरबाणी इसु जग महि चानणु करमि वसै मनि आए ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: प्रभि = प्रभु ने। भरमि = माया की भटकना में (डाल के)। भुलाए = गलत रास्ते पर डालता है। मनमुखि = अपने मन के पीछे चलने वाले लोग। करम = (निहित धार्मिक) कर्म। करहि = करते हैं। गवाए = गवाता है। करमि = मेहर से। मनि = मन में। आए = आ के।1।
अर्थ: मेरे प्रभु ने (खुद ही) माया का मोह पैदा किया है, वह खुद ही (जीवों को माया की) भटकना में डाल के गलत रास्ते पर डाल देता है। (उस भटकन में पड़े हुए) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (निहित धार्मिक) कर्म करते है।, और (यह) नहीं समझते (कि हम गलत राह पर हैं)। (जो भी मनुष्य अपने मन के पीछे चल के माया के मोह में फंसा रहता है, वह अपना) जनम व्यर्थ गवाता है।
सतिगुरु की वाणी इस जगत में (जीवन पथ पर) प्र्रकाश (करती) है। यह वाणी (परमात्मा की) मेहर से (ही) मनुष्य के मन में आ बसती है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे नामु जपहु सुखु होइ ॥ गुरु पूरा सालाहीऐ सहजि मिलै प्रभु सोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे नामु जपहु सुखु होइ ॥ गुरु पूरा सालाहीऐ सहजि मिलै प्रभु सोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सालाहीऐ = स्तुति करनी चाहिए, धन्य धन्य कहना चाहिए। सहजि = आत्मिक अडोलता में।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! परमात्मा का नाम जप। (नाम जपने से ही) आत्मिक आनंद मिलता है। (नाम जपने की दाति गुरु से मिलती है, इस वास्ते) पूरे गुरु को घन्य धन्य कहना चाहिए। गुरु की शरण पड़ने से मनुष्य आत्मिक अडोलता में (टिकता है, और मनुष्य को) वह परमात्मा मिल जाता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भरमु गइआ भउ भागिआ हरि चरणी चितु लाइ ॥ गुरमुखि सबदु कमाईऐ हरि वसै मनि आइ ॥ घरि महलि सचि समाईऐ जमकालु न सकै खाइ ॥२॥
मूलम्
भरमु गइआ भउ भागिआ हरि चरणी चितु लाइ ॥ गुरमुखि सबदु कमाईऐ हरि वसै मनि आइ ॥ घरि महलि सचि समाईऐ जमकालु न सकै खाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भरमु = दौड़ भाग, भटकना। चरणी = चरणों में। घरि = घर में, अंतर आत्मे। महलि = प्रभु के महल में, प्रभु के चरणों में। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। जमकालु = मौत, मौत का डर, आत्मिक मौत।2।
अर्थ: (गुरु के द्वारा) परमात्मा के चरणों में चिक्त जोड़ के (मन की) भटकना दूर हो जाती है। (हरेक किस्म का डर) भाग जाता है। गुरु की शरण पड़ के गुरु का शब्द कमाना चाहिए (भाव, शब्द मुताबिक जीवन व्यतीत करना चाहिए। (इस तरह) परमात्मा मन में आ बसता है, अंतरात्मा में ठहराव आ जाता है। प्रभु चरणों में सदा स्थिर प्रभु में लीन रह सकते हैं। और आत्मिक मौत (सदाचारी जीवन को) खा नहीं सकती।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
नामा छीबा कबीरु जुोलाहा पूरे गुर ते गति पाई ॥ ब्रहम के बेते सबदु पछाणहि हउमै जाति गवाई ॥ सुरि नर तिन की बाणी गावहि कोइ न मेटै भाई ॥३॥
मूलम्
नामा छीबा कबीरु जुोलाहा पूरे गुर ते गति पाई ॥ ब्रहम के बेते सबदु पछाणहि हउमै जाति गवाई ॥ सुरि नर तिन की बाणी गावहि कोइ न मेटै भाई ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जुलाहा = (असल शब्द ‘जोलाहा’ है, यहां ‘जुलाहा’ पढ़ना है)। ते = से। गति = उच्च आत्मिक अवस्था। बेते = वेक्तागण, जानने वाले। ब्रहम के बेते = परमात्मा के साथ सांझ डालने वाले। सबदु = प्रभु की महिमा की वाणी। पछाणहि = पहचानते हैं, सांझ डालते हैं (वर्तमान काल को भूतकाल के अर्थ में यहां बर्तना है)। हउमै जाति = अहम् की जाति ही, अहम् का मूल ही। सुर = देवते। भाई = हे भाई!।3।
अर्थ: (देखो) नामदेव (जाति का) छींबा (धोबी) था। कबीर जुलाहा था। (उन्होंने) पूरे गुरु से उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त की। वे परमात्मा के साथ सांझ पाने वाले बन गए। उन्होंने प्रभु की महिमा के साथ गहरी सांझ पा ली। (और, इस तरह उन्होंने अपने अंदर से) अहम् का बीज नाश कर दिया। हे भाई! (अब) देवते और मनुष्य उनकी (उच्चारण की हुई) वाणी को गाते हैं। कोई भी (उनको मिले हुए इस सत्कार को) मिटा नहीं सकता।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दैत पुतु करम धरम किछु संजम न पड़ै दूजा भाउ न जाणै ॥ सतिगुरु भेटिऐ निरमलु होआ अनदिनु नामु वखाणै ॥ एको पड़ै एको नाउ बूझै दूजा अवरु न जाणै ॥४॥
मूलम्
दैत पुतु करम धरम किछु संजम न पड़ै दूजा भाउ न जाणै ॥ सतिगुरु भेटिऐ निरमलु होआ अनदिनु नामु वखाणै ॥ एको पड़ै एको नाउ बूझै दूजा अवरु न जाणै ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दैत पुतु = हरनाखश दैंत पुत्र, प्रहलाद। करम धरम = कर्मकांड। संजम = इन्द्रियों के वश करने के यत्न। भाउ = प्यार। भेटिऐ = मिलने से। अनदिनु = हर रोज।4।
अर्थ: (हरणाकश्यप) दैंत का पुत्र (भक्त प्रहलाद, निहित) धार्मिक कर्मों व इंद्रियों को वश करने की युक्तियां बताने वाली कोई पुस्तक नहीं था पढ़ता, वह प्रभु के बिना किसी और (देवताओं आदि) के साथ प्यार (करना) नहीं था जानता। पूरा गुरु मिलने (की इनायत) से वह पवित्र (जीवन वाला हो गया), हर समय परमात्मा का नाम जपने लग पड़ा। वह एक (परमात्मा) की महिमा पढ़ता था, एक परमात्मा का नाम ही समझता था। प्रभु के बिना किसी और को (प्रभु के जैसा) नहीं था जानता।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
खटु दरसन जोगी संनिआसी बिनु गुर भरमि भुलाए ॥ सतिगुरु सेवहि ता गति मिति पावहि हरि जीउ मंनि वसाए ॥ सची बाणी सिउ चितु लागै आवणु जाणु रहाए ॥५॥
मूलम्
खटु दरसन जोगी संनिआसी बिनु गुर भरमि भुलाए ॥ सतिगुरु सेवहि ता गति मिति पावहि हरि जीउ मंनि वसाए ॥ सची बाणी सिउ चितु लागै आवणु जाणु रहाए ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: खटु = छह। दरसन = भेस। खटु दरसन = छह भेख (जोगी, संन्यासी, जंगम, सरेवड़े, बैरागी, बोधी)। गति = ऊूंची आत्मिक अवस्था। मिति = मर्यादा, जीवन मर्यादा, जीवन जुगति (युक्ति)। मंनि = मन में। वसाए = बसा के। सिउ = साथ। रहाए = खत्म कर देता है।5।
अर्थ: जोगी (हों), संन्यासी (हों, ये सारे ही) छह भेषों के साधु, गुरु की शरण के बिना माया की भटकना में पड़ कर कुमार्ग में पड़े रहते हैं। जब (यह) गुरु की शरण पड़ते हैं, तब परमात्मा का नाम अपने मन में बसा के उच्च आत्मिक अवस्था व (सही) जीवन युक्ति प्राप्त करते हैं।
जिस मनुष्य का चिक्त सदा स्थिर प्रभु की वाणी के साथ तरंगित होता है वह अपना जनम मरन का चक्कर खत्म कर लेता है।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पंडित पड़ि पड़ि वादु वखाणहि बिनु गुर भरमि भुलाए ॥ लख चउरासीह फेरु पइआ बिनु सबदै मुकति न पाए ॥ जा नाउ चेतै ता गति पाए जा सतिगुरु मेलि मिलाए ॥६॥
मूलम्
पंडित पड़ि पड़ि वादु वखाणहि बिनु गुर भरमि भुलाए ॥ लख चउरासीह फेरु पइआ बिनु सबदै मुकति न पाए ॥ जा नाउ चेतै ता गति पाए जा सतिगुरु मेलि मिलाए ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पंडित वखाणहि = पंडित व्याख्यान करते हैं। पढ़ि = पढ़ के। वादु = झगड़ा, बहस। फेरु = फेरा। मुकति = खलासी। मेलि = (प्रभु के) मिलाप में।6।
अर्थ: पंडित (लोक शास्त्र आदि) पढ़ पढ़ के (निरी) चर्चा (ही) करते सुनते हैं, (वह भी) गुरु की शरण के बिना माया की भटकना में पड़ के कुमार्ग पर पड़े रहते हैं। (कोई भी मनुष्य) गुरु के शब्द के बिना (माया के मोह से) निजात हासिल नहीं कर सकता। (गुरु की शरण के बिना) चौरासी लाख योनियों का चक्कर बना रहता है। जब गुरु (मनुष्य को) प्रभु के चरणों में जोड़ता है, जब वह प्रभु का नाम स्मरण करता है, तब वह उच्च आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है।6।
[[0068]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतसंगति महि नामु हरि उपजै जा सतिगुरु मिलै सुभाए ॥ मनु तनु अरपी आपु गवाई चला सतिगुर भाए ॥ सद बलिहारी गुर अपुने विटहु जि हरि सेती चितु लाए ॥७॥
मूलम्
सतसंगति महि नामु हरि उपजै जा सतिगुरु मिलै सुभाए ॥ मनु तनु अरपी आपु गवाई चला सतिगुर भाए ॥ सद बलिहारी गुर अपुने विटहु जि हरि सेती चितु लाए ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: उपजै = पैदा होता है। सुभाए = सही तरीके से, प्रेम से। अरपी = मैं अर्पित करूँ। आपु = स्वै भाव। गवाई = गवा दूँ, मैं दूर करूँ। चला = मैं चलूँ। भाए = प्यार में। विटहु = से। जि = जो।7।
अर्थ: जब (मनुष्य को) प्यार से गुरु मिलता है (गुरु की कृपा से) सत्संग में रह कर मनुष्य के अंदर परमात्मा का नाम प्रगट होता है। (मेरी यही अरदास है कि) मैं अपना मन अपना तन (गुरु के) हवाले कर दूँ। मैं (गुरु के आगे) अपना स्वै भाव गवा दूँ, और मैं गुरु के प्रेम में जीवन गुजारूँ। जो गुरु परमात्मा के साथ मेरा चिक्त जोड़ देता है मैं अपने उस गुरु से सदा सदके जाता हूँ।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सो ब्राहमणु ब्रहमु जो बिंदे हरि सेती रंगि राता ॥ प्रभु निकटि वसै सभना घट अंतरि गुरमुखि विरलै जाता ॥ नानक नामु मिलै वडिआई गुर कै सबदि पछाता ॥८॥५॥२२॥
मूलम्
सो ब्राहमणु ब्रहमु जो बिंदे हरि सेती रंगि राता ॥ प्रभु निकटि वसै सभना घट अंतरि गुरमुखि विरलै जाता ॥ नानक नामु मिलै वडिआई गुर कै सबदि पछाता ॥८॥५॥२२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बिंदे = जानता है। रंगि = प्रेम में। घटअंतरि = हृदय में। सबदि = शब्द के द्वारा।8।
अर्थ: (ऊूंची जाति का गुमान व्यर्थ है) वही ब्राहमण है, जो ब्रह्म (प्रभु) को पहचानता है। जो प्रभु के प्रेम में प्रभु के साथ रंगा रहता है। (जातियों का कोई भिन्न-भेद नहीं) प्रभु सभ शरीरों में सभी जीवों के नजदीक बसता है। पर यह बात कोई विरला ही समझता है, जो गुरु की शरण पड़े।
हे नानक! गुरु के शब्द में जुड़ने से प्रभु के साथ जान पहिचान बनती है, प्रभु का नाम मिलता है और (लोक परलोक में) आदर मिलता है।8।5।22।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ सहजै नो सभ लोचदी बिनु गुर पाइआ न जाइ ॥ पड़ि पड़ि पंडित जोतकी थके भेखी भरमि भुलाइ ॥ गुर भेटे सहजु पाइआ आपणी किरपा करे रजाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ सहजै नो सभ लोचदी बिनु गुर पाइआ न जाइ ॥ पड़ि पड़ि पंडित जोतकी थके भेखी भरमि भुलाइ ॥ गुर भेटे सहजु पाइआ आपणी किरपा करे रजाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नो = को। सभ = सारी सृष्टि। सहजु = आत्मिक अडोलता, मन की शांति। पढ़ि = पढ़कर। जोतकी = ज्योतिषी। भेखी = छह भेषों के साधु। भुलाइ = कुमार्ग पर पड़ के। गुर भेटे = गुरु को मिलने से। रजाइ = अपनी रजा में, अपनी मर्जी से।1।
अर्थ: सारी सृष्टि मन की शांति के लिए तरसती है। पर गुरु की शरण के बिना यह सहज अवस्था नहीं मिलती। पंडित और ज्योतिषी (शास्त्र आदि धार्मिक पुस्तकें) पड़ पड़ के थक गए (पर सहज अवस्था प्राप्त ना कर सके), छह भेषों के साधु भी भटक भटक के कुमार्ग पर ही पड़े रहे (वे भी सहज अवस्था ना पा सके)। जिस पर परमात्मा अपनी रजा मुताबिक कृपा करता है, वे गुरु को मिल के सहज अवस्था प्राप्त करते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाई रे गुर बिनु सहजु न होइ ॥ सबदै ही ते सहजु ऊपजै हरि पाइआ सचु सोइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
भाई रे गुर बिनु सहजु न होइ ॥ सबदै ही ते सहजु ऊपजै हरि पाइआ सचु सोइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ते = से। सचु = सदा स्थिर रहने वाला प्रभु।1। रहाउ।
अर्थ: हे भाई! गुरु की शरण के बिना (मनुष्य के अंदर) आत्मिक अडोलता पैदा नहीं होती। गुरु के शब्द में जुड़ने से ही आत्मिक अडोलता (मन की शांति) पैदा होती है, और वह सदा स्थिर रहने वाला प्रभु मिलता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सहजे गाविआ थाइ पवै बिनु सहजै कथनी बादि ॥ सहजे ही भगति ऊपजै सहजि पिआरि बैरागि ॥ सहजै ही ते सुख साति होइ बिनु सहजै जीवणु बादि ॥२॥
मूलम्
सहजे गाविआ थाइ पवै बिनु सहजै कथनी बादि ॥ सहजे ही भगति ऊपजै सहजि पिआरि बैरागि ॥ सहजै ही ते सुख साति होइ बिनु सहजै जीवणु बादि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: राविआ = महिमा की हुई। थाइ पवै = स्वीकार होता है। कथनी = धार्मिक बातों की कहानी। बादि = व्यर्थ। पिआरि = प्यार में।2।
अर्थ: परमात्मा के गुणों का कीर्तन करना भी तभी स्वीकार होता है, जब आत्मिक अडोलता में टिक के किया जाए। आत्मिक अडोलता के बिनां धार्मिक बातें कहना व्यर्थ जाता है। आत्मिक अडोलता में टिकने पर ही (मनुष्य के अंदर परमात्मा की) भक्ति (का जज्बा) पैदा होता है। आत्मिक अडोलता से ही मनुष्य प्रभु के प्यार में टिकता है। (दुनिया से) वैराग में रहता है। आत्मिक अडोलता से आत्मिक आनंद व शान्ति पैदा होती है। आत्मिक अडोलत के बगैर (मनुष्य की सारी) जिंदगी व्यर्थ जाती है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सहजि सालाही सदा सदा सहजि समाधि लगाइ ॥ सहजे ही गुण ऊचरै भगति करे लिव लाइ ॥ सबदे ही हरि मनि वसै रसना हरि रसु खाइ ॥३॥
मूलम्
सहजि सालाही सदा सदा सहजि समाधि लगाइ ॥ सहजे ही गुण ऊचरै भगति करे लिव लाइ ॥ सबदे ही हरि मनि वसै रसना हरि रसु खाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सालाही = (तू) महिमा करना। लिव लाइ = तवज्जो/ध्यान जोड़ के। रसना = जीभ।3।
अर्थ: (हे भाई!) तू आत्मिक अडोलता में टिक के आत्मिक अडोलता में समाधि लगा के सदा परमात्मा की महिमा करते रहना।
जो मनुष्य आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा के गुण गाता है, प्रभु चरणों में तवज्जो जोड़ के भक्ति करता है, गुरु के शब्द की इनायत से ही उसके मन में परमात्मा आ बसता है। उसकी जीभ परमात्मा के नाम का स्वाद चखती रहती है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सहजे कालु विडारिआ सच सरणाई पाइ ॥ सहजे हरि नामु मनि वसिआ सची कार कमाइ ॥ से वडभागी जिनी पाइआ सहजे रहे समाइ ॥४॥
मूलम्
सहजे कालु विडारिआ सच सरणाई पाइ ॥ सहजे हरि नामु मनि वसिआ सची कार कमाइ ॥ से वडभागी जिनी पाइआ सहजे रहे समाइ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कालु = मौत, मौत का डर, आत्मिक मौत। विडारिआ = मारा हुआ।4।
अर्थ: सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा की शरण पड़ के आत्मिक अडोलता में टिक के जिन्होंने आत्मिक मौत को मार लिया। ये सदा साथ निभने वाली कार करने के कारण उनके अंदर परमात्मा का नाम आ बसता है। और, जिन्होंने परमात्मा का नाम प्राप्त कर लिया, वह लोग बड़े भाग्यशाली हो गए, वे सदा आत्मिक अडोलता में लीन रहते हैं।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
माइआ विचि सहजु न ऊपजै माइआ दूजै भाइ ॥ मनमुख करम कमावणे हउमै जलै जलाइ ॥ जमणु मरणु न चूकई फिरि फिरि आवै जाइ ॥५॥
मूलम्
माइआ विचि सहजु न ऊपजै माइआ दूजै भाइ ॥ मनमुख करम कमावणे हउमै जलै जलाइ ॥ जमणु मरणु न चूकई फिरि फिरि आवै जाइ ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दूजै भाइ = किसी और के प्यार में। मनमुख करम = मनमुखों वाले कर्म, वह कर्म जो अपने मन के पीछे चलने वाले लोग करते हैं। न चूकई = नहीं खत्म होता।5।
अर्थ: माया (के मोह) में टिके रहने से आत्मिक अडोलता पैदा नहीं होती। माया तो (प्रभु के बिना किसी) और प्यार में (फंसाती है)। ऐसे मानवीय कर्म करने से मनुष्य अहंकार में ही जलता है। (अपने आप को) जलाता है। उसका जनम मरन का चक्कर कभी खत्म नहीं होता, वह मुड़ मुड़ पैदा होता रहता है।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
त्रिहु गुणा विचि सहजु न पाईऐ त्रै गुण भरमि भुलाइ ॥ पड़ीऐ गुणीऐ किआ कथीऐ जा मुंढहु घुथा जाइ ॥ चउथे पद महि सहजु है गुरमुखि पलै पाइ ॥६॥
मूलम्
त्रिहु गुणा विचि सहजु न पाईऐ त्रै गुण भरमि भुलाइ ॥ पड़ीऐ गुणीऐ किआ कथीऐ जा मुंढहु घुथा जाइ ॥ चउथे पद महि सहजु है गुरमुखि पलै पाइ ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: त्रै गुण = तीन गुण (रजो, तमो, सतो)। घुथा जाइ = वंचित हो जाता है, कुमार्ग पर पड़ जाता है।6।
अर्थ: माया (के मोह) में टिके रहने से आत्मिक अडोलता पैदा नहीं होती। माया के तीन गुणों के कारण जीव भटकन में फंस कर गलत राह पे पड़ा रहता है। (इस हालात में) धार्मिक पुस्तकों को पढ़ने का विचारने का व और लोगों को सुनाने का कोई लाभ नहीं होता। क्योंकि, जीव अपने मूल प्रभु से विछुड़ के (गलत जीवन-राह पे) चलता है। (माया के तीन गुणों को लांघ के) चौथी आत्मिक अवस्था में पहुँचने से ही मन की शांति पैदा होती है और यह आत्मिक अवस्था गुरु की शरण पड़ के ही प्राप्त होती है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
निरगुण नामु निधानु है सहजे सोझी होइ ॥ गुणवंती सालाहिआ सचे सची सोइ ॥ भुलिआ सहजि मिलाइसी सबदि मिलावा होइ ॥७॥
मूलम्
निरगुण नामु निधानु है सहजे सोझी होइ ॥ गुणवंती सालाहिआ सचे सची सोइ ॥ भुलिआ सहजि मिलाइसी सबदि मिलावा होइ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निरगुण नामु = उस परमात्मा का नाम जो माया के तीनों गुणों से ऊपर है। सोइ = शोभा।7।
अर्थ: तीनों गुणों से निर्लिप परमात्मा का नाम (सभ पदार्तों का) खजाना है, आत्मिक अडोलता में पहुँचने पर ये समझ पड़ती है। गुणवान जीव ही उस प्रभु की महिमा करते हैं। (जो मनुष्य महिमा करता है वह) सदा स्थिर प्रभु का रूप हो जाता है, उसकी शोभा भी अटल हो जाती है। (वह परमात्मा इतना दयालु है कि वह शरण आए) गलत राह पर पड़े लोगों को भी आत्मिक अडोलता में जोड़ देता है। गुरु के शब्द की इनायत से उस (वडभागी परमात्मा से) मिलाप हो जाता है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बिनु सहजै सभु अंधु है माइआ मोहु गुबारु ॥ सहजे ही सोझी पई सचै सबदि अपारि ॥ आपे बखसि मिलाइअनु पूरे गुर करतारि ॥८॥
मूलम्
बिनु सहजै सभु अंधु है माइआ मोहु गुबारु ॥ सहजे ही सोझी पई सचै सबदि अपारि ॥ आपे बखसि मिलाइअनु पूरे गुर करतारि ॥८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभु = सारा जगत। अंधु = अंधा। गुबारु = घुप अंधेरा। अपारि = अपार में, असीमितता में। मिलाइअनु = उसने मिला लिए हैं। करतारि = कर्तार ने।8।
अर्थ: मन की शान्ति के बिनां सारा जगत (माया के मोह में) अंधा हुआ रहता है। (जगत पर) माया के मोह का घोर अंधकार छाया रहता है। सदा स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द से जिस मनुष्य को आत्मिक अडोलता में जुड़ के (परमात्मा के गुणों की) सूझ पड़ जाती है, वह उस अपार प्रभु में (तवज्जो जोड़ के रखता है)। (ऐसे भाग्यशाली लोगों को) पूरे गुरु ने कर्तार ने स्वयं ही मेहर करके (अपने चरणों में) मिला लिया होता है।8।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सहजे अदिसटु पछाणीऐ निरभउ जोति निरंकारु ॥ सभना जीआ का इकु दाता जोती जोति मिलावणहारु ॥ पूरै सबदि सलाहीऐ जिस दा अंतु न पारावारु ॥९॥
मूलम्
सहजे अदिसटु पछाणीऐ निरभउ जोति निरंकारु ॥ सभना जीआ का इकु दाता जोती जोति मिलावणहारु ॥ पूरै सबदि सलाहीऐ जिस दा अंतु न पारावारु ॥९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सहजे = आत्मिक अडोलता में। जोति = प्रकाश स्वरूप। निरंकारु = आकार रहित।9।
अर्थ: आत्मिक अडोलता में पहुँच कर उस परमात्मा के साथ सांझ बन जाती है, जो इन आँखों से नही दिखता, जिसको किसी का डर नही, जो केवल प्रकाश ही प्रकाश है, और जिसका कोई खास स्वरूप (बताया) नहीं (जा सकता)। वही परमात्मा सब जीवों को सारी दातें देने वाला है, और सभ की ज्योति (तवज्जो) को अपनी ज्योति में मिलाने के समर्थ है। (हे भाई!) पूरे गुरु के शब्द से उस परमात्मा की महिमा करनी चाहिए, जिसके गुणों का अंत नहीं पाया जा सकता, जिसके बड़प्पन का उरला व परला छोर नहीं मिल सकता।9।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गिआनीआ का धनु नामु है सहजि करहि वापारु ॥ अनदिनु लाहा हरि नामु लैनि अखुट भरे भंडार ॥ नानक तोटि न आवई दीए देवणहारि ॥१०॥६॥२३॥
मूलम्
गिआनीआ का धनु नामु है सहजि करहि वापारु ॥ अनदिनु लाहा हरि नामु लैनि अखुट भरे भंडार ॥ नानक तोटि न आवई दीए देवणहारि ॥१०॥६॥२३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करहि = करते हैं। लैनि = लेते हैं। अखुट = ना खत्म होने वाले। भंडार = खजाने। देवणहारि = देवनहार ने, दाता ने।10।
अर्थ: जो मनुष्य परमात्मा के साथ गहरी सांझ डाल लेते हैं, परमात्मा का नाम ही उनका (असल) धन बन जाता है। वे आत्मिक अडोलता में टिक के इस नाम धन का ही व्यापार करते हैं। वे हर वक्त (परमात्मा का नाम स्मरण करके) परमात्मा का नाम-लाभ ही कमाते हैं। नाम धन से भरे हुए उनके खजाने कभी खत्म नही होते। हे नानक! ये खजाने दाता दातार ने स्वयं उन्हें दिये हुए हैं, इन खजानों में कभी भी तोट नहीं आती।10।6।23।
[[0069]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ सतिगुरि मिलिऐ फेरु न पवै जनम मरण दुखु जाइ ॥ पूरै सबदि सभ सोझी होई हरि नामै रहै समाइ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ सतिगुरि मिलिऐ फेरु न पवै जनम मरण दुखु जाइ ॥ पूरै सबदि सभ सोझी होई हरि नामै रहै समाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सतिगुरि = सतगुरू से। मिलिऐ = मिलने से। सतिगुरि मिलिऐ = (Locative absolute) यदि सत्गुरू मिल जाए, गुरु के मिलने से। फेरु = (जन्म मरण का) चक्कर, फेरा। सबदि = शब्द द्वारा। नामै = नाम में।1।
अर्थ: यदि गुरु मिल जाए तो (चौरासी लाख योनियों वाला) फेरा नहीं पड़ता, जनम मरन में पड़ने वाला दुख दूर हो जाता है। पूरे (ना भूलने वाले) गुरु के शब्द में जुड़ने से (सही जीवन की) समझ आ जाती है। (गुरु की शरण पड़ने वाला मनुष्य) परमात्मा के नाम में लीन टिका रहता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन मेरे सतिगुर सिउ चितु लाइ ॥ निरमलु नामु सद नवतनो आपि वसै मनि आइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन मेरे सतिगुर सिउ चितु लाइ ॥ निरमलु नामु सद नवतनो आपि वसै मनि आइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सिउ = साथ। सद = सदा। नवतनो = नया, निक्त नये आनंद वाला, जिससे मन कभी ना उकताए। मनि = मन में।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! गुरु से चिक्त जोड़। (गुरु की शरण पड़ने से) परमात्मा का पवित्र नाम सदा नए आनंद वाला लगता है, और परमात्मा स्वयं मन में आ बसता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि जीउ राखहु अपुनी सरणाई जिउ राखहि तिउ रहणा ॥ गुर कै सबदि जीवतु मरै गुरमुखि भवजलु तरणा ॥२॥
मूलम्
हरि जीउ राखहु अपुनी सरणाई जिउ राखहि तिउ रहणा ॥ गुर कै सबदि जीवतु मरै गुरमुखि भवजलु तरणा ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हरि जीउ = हे प्रभु जी! जीवतु मरै = जीवित मरे, स्वै भाव त्यागे, नफस के पीछे चलने से हटे। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ कर। भवजलु = संसार समुंदर।2।
अर्थ: हे प्रभु जी! तू (जीवों को) अपनी शरण में रख। जिस आत्मिक अवस्था में तू (जीवों को) रखता है उसी में वह रहते हैं। गुरु के शब्द में जुड़ के मनुष्य दुनिया में विचरते हुए ही विकारों से बचा रहता है। गुरु की शरण पड़ कर ही संसार समुंदर से पार लांघ जाते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वडै भागि नाउ पाईऐ गुरमति सबदि सुहाई ॥ आपे मनि वसिआ प्रभु करता सहजे रहिआ समाई ॥३॥
मूलम्
वडै भागि नाउ पाईऐ गुरमति सबदि सुहाई ॥ आपे मनि वसिआ प्रभु करता सहजे रहिआ समाई ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भागि = भाग्य से, किस्मत से। सुहाई = (जिंदगी) सुंदर बन जाती है। सहजे = सहिज ही, आत्मिक अडोलता में ही।3।
अर्थ: (हे भाई!) परमात्मा का नाम बड़ी किस्मत से मिलता है। गुरु की मति पर चलने से, गुरु के शब्द में जुड़ने से जिंदगी सुंदर बन जाती है। कर्तार प्रभु स्वयं ही मन में आ बसता है। (गुरु के शब्द से मनुष्य) सदा आत्मिक अडोलता में टिका रहता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इकना मनमुखि सबदु न भावै बंधनि बंधि भवाइआ ॥ लख चउरासीह फिरि फिरि आवै बिरथा जनमु गवाइआ ॥४॥
मूलम्
इकना मनमुखि सबदु न भावै बंधनि बंधि भवाइआ ॥ लख चउरासीह फिरि फिरि आवै बिरथा जनमु गवाइआ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनमुखि = मन के पीछे चलने से। बंधनि = बंधन में। बंधि = बांध के।4।
अर्थ: कई ऐसे हैं जो अपने मन के पीछे चलते हैं, उन्हें गुरु का शब्द प्यारा नहीं लगता। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (माया के) बंधन में बंध के (जनम मरण के चक्कर में) भटकाया जाता है। वह चौरासी लाख जूनियों में मुड़ मुड़ पैदा होता है, और अपना (मानव) जनम व्यर्थ गवा लेता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भगता मनि आनंदु है सचै सबदि रंगि राते ॥ अनदिनु गुण गावहि सद निरमल सहजे नामि समाते ॥५॥
मूलम्
भगता मनि आनंदु है सचै सबदि रंगि राते ॥ अनदिनु गुण गावहि सद निरमल सहजे नामि समाते ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनि = मन में। सबदि = शब्द में। रंगि = प्रेम में। अनदिनु = हररोज।5।
अर्थ: परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदों के मन में आनंद बना रहता है। वह सदा सिथर प्रभु की महिमा के शब्द में प्रभु के प्रेम रंग में रंगे रहते हैं। वे सदैव हर वक्त परमात्मा के पवित्र गुण गाते रहते हैं। (जिसकी इनायत से वे) आत्मिक अडोलता में व प्रभु नाम में लीन रहते हैं।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुरमुखि अम्रित बाणी बोलहि सभ आतम रामु पछाणी ॥ एको सेवनि एकु अराधहि गुरमुखि अकथ कहाणी ॥६॥
मूलम्
गुरमुखि अम्रित बाणी बोलहि सभ आतम रामु पछाणी ॥ एको सेवनि एकु अराधहि गुरमुखि अकथ कहाणी ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंम्रित = आत्मिक जीवन देने वाली। आतम रामु = परमात्मा। पछाणी = पहचान के। सेवनि = सेवते हैं, स्मरण करते हैं। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ के। अकथ = उस परमात्मा की जिसके गुण बयान नहीं किए जा सकते।6।
अर्थ: गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सारी सृष्टि में परमात्मा को बसा हुआ पहचान के आत्मिक जीवन देने वाली प्रभु की महिमा की वाणी उच्चारित करते हैं। गुरु की शरण पड़ कर वह मनुष्य सदा एक परमात्मा का ही स्मरण करते हैं। परमात्मा की ही आराधना करते हैं। और उस परमात्मा की ही कथा वार्ता करते हैं जिसके सारे गुण बखान नहीं हो सकते।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचा साहिबु सेवीऐ गुरमुखि वसै मनि आइ ॥ सदा रंगि राते सच सिउ अपुनी किरपा करे मिलाइ ॥७॥
मूलम्
सचा साहिबु सेवीऐ गुरमुखि वसै मनि आइ ॥ सदा रंगि राते सच सिउ अपुनी किरपा करे मिलाइ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचा = सच्चा, सदा स्थिर रहने वाला। आइ = आ कर।7।
अर्थ: (हे भाई!) सदा स्थिर रहने वाले मालिक प्रभु को स्मरणा चाहिए। जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ कर स्मरण करते हैं उनके मन में प्रभु आ बसता है। (वह भाग्यशाली मनुष्य) सदैव प्रभु के प्रेम रंग में रंगे रहते हैं। सदा स्थिर प्रभु के साथ जुड़े रहते हैं। प्रभु अपनी कृपा करके उनको अपने साथ मिला लेता है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपे करे कराए आपे इकना सुतिआ देइ जगाइ ॥ आपे मेलि मिलाइदा नानक सबदि समाइ ॥८॥७॥२४॥
मूलम्
आपे करे कराए आपे इकना सुतिआ देइ जगाइ ॥ आपे मेलि मिलाइदा नानक सबदि समाइ ॥८॥७॥२४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देइ जगाइ = जगा देता है। सबदि मिलाइ = शब्द में जोड़ के।8।
अर्थ: (पर ये सारी खोज परमात्मा के अपने ही हाथ में है) प्रभु स्वयं ही (सभ जीवों का प्रेरक हो के सब कुछ) करता है। स्वयं ही (जीवों से) कराता है। माया की नींद में सोये हुए कई जीवों को भी प्रभु खुद ही जगा देता है। हे नानक! गुरु के शब्द में जोड़ के प्रभु स्वयं ही (उनको) अपने चरणों में मिला लेता है।8।7।24।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ३ ॥ सतिगुरि सेविऐ मनु निरमला भए पवितु सरीर ॥ मनि आनंदु सदा सुखु पाइआ भेटिआ गहिर ग्मभीरु ॥ सची संगति बैसणा सचि नामि मनु धीर ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ३ ॥ सतिगुरि सेविऐ मनु निरमला भए पवितु सरीर ॥ मनि आनंदु सदा सुखु पाइआ भेटिआ गहिर ग्मभीरु ॥ सची संगति बैसणा सचि नामि मनु धीर ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सेविऐ = अगर सेवा की जाए, यदि शरण ली जाए। मनि = मन में। भेटिआ = मिला। गंभीरु = बड़े जिगरे वाला। सची संगति = सदा स्थिर प्रभु की संगत में। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। धीर = धीरज, धैर्य, टिकाव।1।
अर्थ: यदि गुरु का पल्ला पकड़े रखें, तो मन पवित्र हो जाता है (भाव, ज्ञानेंद्रियां विकारों से हटी रहतीं हैं)। (जो मनुष्य गुरु के दर पे आ जाता है उस के) मन में आनंद पैदा होता है, वह सदा के लिए आत्मिक सुख भोगता है। उसको गहरा और बड़े जिगरे वाला परमात्मा मिल जाता है। सदा स्थिर प्रभु की संगति में टिके रहने से मन सदा स्थिर रहने वाले प्रभु के नाम में टिकाव हासिल कर लेता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन रे सतिगुरु सेवि निसंगु ॥ सतिगुरु सेविऐ हरि मनि वसै लगै न मैलु पतंगु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन रे सतिगुरु सेवि निसंगु ॥ सतिगुरु सेविऐ हरि मनि वसै लगै न मैलु पतंगु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निसंगु = शर्म उतार के। पतंगु = थोड़ा भी।1। रहाउ।
अर्थ: हे मेरे मन! शर्म छोड़ के गुरु की शरण पड़। (हे भाई!) गुरु की शरण पड़ने से परमात्मा मन में आ बसता है, और (मन को विकारों की) रक्ती भर भी मैल नहीं लगती।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचै सबदि पति ऊपजै सचे सचा नाउ ॥ जिनी हउमै मारि पछाणिआ हउ तिन बलिहारै जाउ ॥ मनमुख सचु न जाणनी तिन ठउर न कतहू थाउ ॥२॥
मूलम्
सचै सबदि पति ऊपजै सचे सचा नाउ ॥ जिनी हउमै मारि पछाणिआ हउ तिन बलिहारै जाउ ॥ मनमुख सचु न जाणनी तिन ठउर न कतहू थाउ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पति = इज्जत। सचे नाउ = सदा स्थिर प्रभु का नाम। पछाणिआ = जान पहिचान बनाई, सांझ डाल ली। हउ = मैं। मनमुख = अपने मन की ओर मुंह रखने वाले। कतहू = कहीं भी।2।
अर्थ: स्दा स्थिर प्रभु की महिमा के शब्द में जुड़ने से (लोक परलोक में) इज्जत मिलती है। सदा स्थिर रहने वाले प्रभु का सदा स्थिर नाम मिल जाता है। मैं उन लोगों के सदके जाता हूँ जिन्होंने (अपने अंदर से) अहंकार को दूर करके परमात्मा के साथ गहरी सांझ बनायी है। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य सदा स्थिर प्रभु के साथ जान पहिचान नहीं बना सकते (इस वास्ते आत्मिक शांति के वास्ते) उन्हें और कोई जगह नहीं मिलती।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचु खाणा सचु पैनणा सचे ही विचि वासु ॥ सदा सचा सालाहणा सचै सबदि निवासु ॥ सभु आतम रामु पछाणिआ गुरमती निज घरि वासु ॥३॥
मूलम्
सचु खाणा सचु पैनणा सचे ही विचि वासु ॥ सदा सचा सालाहणा सचै सबदि निवासु ॥ सभु आतम रामु पछाणिआ गुरमती निज घरि वासु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचु = सदा स्थिर प्रभु। सभु = हर जगह। निज डरि = अपने घर में, अंतरात्मे।3।
अर्थ: सदा स्थिर प्रभु का नाम जिस मनुष्यों की आत्मिक खुराक बन गया है, प्रभु का नाम ही जिस की पोशाक है (आदर सत्कार हासिल करने की तरीका है), जिस की तवज्जो सदा स्थिर प्रभु में जुड़ी रहती है, जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु की सदा महिमा करते रहते हैं। सदा कायम रहने वाले परमात्मा के शब्द में जिनका मन टिका रहता है, उन्होंने हर जगह सर्व-व्यापक परमात्मा को बसता पहिचान लिया है। गुरु की मति पे चल के उनकी तवज्जो अंतरात्मे टिकी रहती है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सचु वेखणु सचु बोलणा तनु मनु सचा होइ ॥ सची साखी उपदेसु सचु सचे सची सोइ ॥ जिंनी सचु विसारिआ से दुखीए चले रोइ ॥४॥
मूलम्
सचु वेखणु सचु बोलणा तनु मनु सचा होइ ॥ सची साखी उपदेसु सचु सचे सची सोइ ॥ जिंनी सचु विसारिआ से दुखीए चले रोइ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचा = सच्चा, सदा स्थिर, अडोल। साखी = शिक्षा। सोइ = शोभा। रोइ = रो के।4।
अर्थ: जो मनुष्य सदा स्थिर प्रभु को हर जगह देखता है। सदा स्थिर प्रभु ही जिसको हर जगह बोलता दिखता है। उसका शरीर (माया के हमलों से) अडोल रहता है उसका मन (विकारों के हमलों से) अडोल हो जाता है। सदा स्थिर प्रभु के नाम जपने की ही वह शिक्षा व उपदेश ग्रहण करता है। सदा स्थिर प्रभु का रूप हो चुके उस (भाग्यशाली मनुष्य) की शोभा अटल हो जाती है।
पर जिस मनुष्यों ने सदा स्थिर प्रभु को (यहां) भुलाए रखा, वह यहां भी दुखी रहे, और यहां से चले भी तो दुखी हो हो के।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतिगुरु जिनी न सेविओ से कितु आए संसारि ॥ जम दरि बधे मारीअहि कूक न सुणै पूकार ॥ बिरथा जनमु गवाइआ मरि जमहि वारो वार ॥५॥
मूलम्
सतिगुरु जिनी न सेविओ से कितु आए संसारि ॥ जम दरि बधे मारीअहि कूक न सुणै पूकार ॥ बिरथा जनमु गवाइआ मरि जमहि वारो वार ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कितु = किस काम के लिए? , व्यर्थ ही। संसारि = संसार में। दरि = दर पे। मारीअहि = मारे कूटे जाते हैं। वारो वार = दुबारा दुबारा।5।
अर्थ: जिस लोगों ने सतिगुरु का पल्ला ना पकड़ा उनका संसार में आना व्यर्थ गया। उन्हें यम के दरवाजे पे बांध कर मारा कूटा जाता है, कोई उनकी चीख पुकार की ओर ध्यान नहीं देता। उन्होंने मानव जन्म व्यर्थ गवा दिया और फिर बार बार पैदा होते मरते रहते हैं।5।
[[0070]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
एहु जगु जलता देखि कै भजि पए सतिगुर सरणा ॥ सतिगुरि सचु दिड़ाइआ सदा सचि संजमि रहणा ॥ सतिगुर सचा है बोहिथा सबदे भवजलु तरणा ॥६॥
मूलम्
एहु जगु जलता देखि कै भजि पए सतिगुर सरणा ॥ सतिगुरि सचु दिड़ाइआ सदा सचि संजमि रहणा ॥ सतिगुर सचा है बोहिथा सबदे भवजलु तरणा ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भजि = दौड़ के। सतिगुरि = सत्गुरू ने। दिड़ाइआ = पक्का कर दिया, मन में अच्छी तरह बसा दिया। संजमि = संजम में, जुगति में। बोहिथा = जहाज।6।
अर्थ: जो मनुष्य इस जगत को (विकारों की तपश में) जलता देख के जल्दी से गुरु की शरण जा पड़े, गुरु ने उनके दिल में सदा स्थिर प्रभु का नाम पक्का टिका दिया, उनको सदा स्थिर प्रभु के नाम में (सुंदर) जीवन मर्यादा में रहने की विधि सिखा दी।
(हे भाई!) गुरु सदा कायम रहने वाला जहाज है। गुरु के शब्द में जुड़ के संसार समुंदर से पार लांघ जाते हैं।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
लख चउरासीह फिरदे रहे बिनु सतिगुर मुकति न होई ॥ पड़ि पड़ि पंडित मोनी थके दूजै भाइ पति खोई ॥ सतिगुरि सबदु सुणाइआ बिनु सचे अवरु न कोई ॥७॥
मूलम्
लख चउरासीह फिरदे रहे बिनु सतिगुर मुकति न होई ॥ पड़ि पड़ि पंडित मोनी थके दूजै भाइ पति खोई ॥ सतिगुरि सबदु सुणाइआ बिनु सचे अवरु न कोई ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुकति = खलासी। मोनी = समाधिआं लगाने वाले, मौन धारण रख्खने वाले। दूजै भाइ = प्रभु के बिना और किसी के प्यार में। पति = इज्जत।7।
अर्थ: (जो गुरु की शरण से वंचित रहे वह) चौरासी लाख योनियों के चक्कर में भटकते फिरते हैं। गुरु के बगैर (इस चक्कर में से) निजात नहीं मिलती। पंडित लोग (शास्त्र आदि धर्म पुस्तकों को) पढ़ पढ़ के थक गए (गुरु की शरण के बिना चौरासी के चक्कर से खलासी प्राप्त ना कर सके, उन्होंने बल्कि) प्रभु के बिना औरों के प्यार में अपनी इज्जत गवा ली। जिस मनुष्य को गुरु ने अपना शब्द सुना दिया (उसे निश्चय हो गया कि) सदा स्थिर प्रभु के बिना और कोई (जीव का रक्षक) नही है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जो सचै लाए से सचि लगे नित सची कार करंनि ॥ तिना निज घरि वासा पाइआ सचै महलि रहंनि ॥ नानक भगत सुखीए सदा सचै नामि रचंनि ॥८॥१७॥८॥२५॥
मूलम्
जो सचै लाए से सचि लगे नित सची कार करंनि ॥ तिना निज घरि वासा पाइआ सचै महलि रहंनि ॥ नानक भगत सुखीए सदा सचै नामि रचंनि ॥८॥१७॥८॥२५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचै = सदा स्थिर प्रभु ने। सचि = सदा स्थिर प्रभु में। करंनि = करते हैं। महलि = महल में। सचै महलि = सदा स्थिर प्रभु के घर में। रहंनि = रहते हैं, मस्त रहते हैं।8।
अर्थ: (पर जीवों के भी क्या बस?) जिस जीवों को सदा स्थिर प्रभु ने अपनी याद में जोड़ा, वही सदा स्थिर प्रभु के नाम में लगे हैं। वही सदा ये साथ निभने वाली कार करते हैं। उन लोगों ने (माया की भटकना से बच के) अंतरात्मा में ठिकाना प्राप्त कर लिया है। वह लोग सदा स्थिर रहने वाले प्रभु की हजूरी में रहते हैं।
हे नानक! परमात्मा की भक्ति करने वाले लोग सदा सुखी रहते हैं। वह सदा स्थिर प्रभु के नाम में सदा मस्त रहते हैं।8।17।8।25।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ जा कउ मुसकलु अति बणै ढोई कोइ न देइ ॥ लागू होए दुसमना साक भि भजि खले ॥ सभो भजै आसरा चुकै सभु असराउ ॥ चिति आवै ओसु पारब्रहमु लगै न तती वाउ ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ जा कउ मुसकलु अति बणै ढोई कोइ न देइ ॥ लागू होए दुसमना साक भि भजि खले ॥ सभो भजै आसरा चुकै सभु असराउ ॥ चिति आवै ओसु पारब्रहमु लगै न तती वाउ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कउ = को। अति = बड़ी। मुसकलु = विपदा। ढोई = आसरा। लागू = मारू। भजि खले = दौड़ गए। चुकै = खत्म हो जाए। असराउ = आसरा। ओसु चिति = उसके चिक्त में।1।
अर्थ: जिस मनुष्य को (कोई) भारी विपदा आ पड़े (जिससे बचने के लिए) कोई मनुष्य उसको सहारा ना दे, वैरी उसके मारू बन जाएं। उसके साक संबंधी उससे दूर दौड़ जाएं, उसका हरेक किस्म का आसरा खत्म हो जाए, हरेक तरह का सहारा खत्म हो जाए। अगर उस (विपदा के मारे) मनुष्य के हृदय में परमात्मा याद आ जाए, तो उस का बाल भी बाँका नहीं होता।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
साहिबु निताणिआ का ताणु ॥ आइ न जाई थिरु सदा गुर सबदी सचु जाणु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
साहिबु निताणिआ का ताणु ॥ आइ न जाई थिरु सदा गुर सबदी सचु जाणु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आइ न जाई = ना वह पैदा होता है ना मरता है। थिर = कायम रहने वाला। सचु = सदा कायम रहने वाले परमात्मा को। जाणु = जान पहिचान डाल, गहरी सांझ बना।1। रहाउ।
अर्थ: मालिक प्रभु कमजोरों का सहारा है, वह ना पैदा होता है ना मरता है। सदा ही कायम रहने वाला है। (हे भाई!) गुरु के शब्द में जुड़ के उस सदा स्थिर रहने वाले प्रभु के साथ गहरी सांझ बना।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जे को होवै दुबला नंग भुख की पीर ॥ दमड़ा पलै ना पवै ना को देवै धीर ॥ सुआरथु सुआउ न को करे ना किछु होवै काजु ॥ चिति आवै ओसु पारब्रहमु ता निहचलु होवै राजु ॥२॥
मूलम्
जे को होवै दुबला नंग भुख की पीर ॥ दमड़ा पलै ना पवै ना को देवै धीर ॥ सुआरथु सुआउ न को करे ना किछु होवै काजु ॥ चिति आवै ओसु पारब्रहमु ता निहचलु होवै राजु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दुबला = कमजोर। पीर = पीड़ा, दुख। धीर = धीरज, हौसला, धरवास। सुआरथु = अपनी गरज। सुआउ = स्वार्थ, उद्देश्य। निहचलु = अटल।2।
अर्थ: जो कोई मनुष्य (ऐसा) कमजोर हो जाए (कि) भूख-नंग का दुख (उसे हर समय खाता रहे), यदि उसके पल्ले पैसा ना हो, कोई मनुष्य उसे हौसला ना दे; कोई मनुष्य उसकी जरूरतें पूरी ना करे, उससे अपना कोई काम सिरे ना चढ़ सके (ऐसी दुर्दशा में होते हुए भी) यदि परमात्मा उसके चिक्त में आ बसे, तो उसका अटल राज बन जाता है (भाव, उसकी आत्मिक अवस्था ऐसे बादशाहों वाली हो जाती है जिनका राज कभी नहीं डोले)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जा कउ चिंता बहुतु बहुतु देही विआपै रोगु ॥ ग्रिसति कुट्मबि पलेटिआ कदे हरखु कदे सोगु ॥ गउणु करे चहु कुंट का घड़ी न बैसणु सोइ ॥ चिति आवै ओसु पारब्रहमु तनु मनु सीतलु होइ ॥३॥
मूलम्
जा कउ चिंता बहुतु बहुतु देही विआपै रोगु ॥ ग्रिसति कुट्मबि पलेटिआ कदे हरखु कदे सोगु ॥ गउणु करे चहु कुंट का घड़ी न बैसणु सोइ ॥ चिति आवै ओसु पारब्रहमु तनु मनु सीतलु होइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: देही = शरीर (को)। विआपै = जोर डाल लिए। ग्रिसति = गृहस्थ में। हरखु = खुशी। सोगु = चिन्ता। गउणु = गमन, भ्रमण। बैसणु = बैठना, आराम। सोइ = वह मनुष्य।3।
अर्थ: जिस मनुष्य को हर समय बहुत चिन्ता बनी रहे, जिसके शरीर को (कोई ना कोई) रोग ग्रसे रखे, जो गृहस्थ (के जंजाल) में परिवार (के जंजाल) में (सदा) फंसा रहे, जिसे कभी कोई खुशी है और कभी कोई ग़म घेरे रखता है। जो मनुष्य सारी धरती पर इस तरह भटकता फिरता है कि उसे घड़ी भर भी बैठना नसीब नहीं होता। पर, यदि परमात्मा उसके चिक्त में आ बसे, तो उसका तन शांत हो जाता है उसका मन (संतोष से) शीतल हो जाता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कामि करोधि मोहि वसि कीआ किरपन लोभि पिआरु ॥ चारे किलविख उनि अघ कीए होआ असुर संघारु ॥ पोथी गीत कवित किछु कदे न करनि धरिआ ॥ चिति आवै ओसु पारब्रहमु ता निमख सिमरत तरिआ ॥४॥
मूलम्
कामि करोधि मोहि वसि कीआ किरपन लोभि पिआरु ॥ चारे किलविख उनि अघ कीए होआ असुर संघारु ॥ पोथी गीत कवित किछु कदे न करनि धरिआ ॥ चिति आवै ओसु पारब्रहमु ता निमख सिमरत तरिआ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कामि = काम ने। मोहि = मोह ने। किरपन = कंजूस। लोभि = लोभ में। किलविख = पाप। उनि = उस ने। अघ = पाप। चारे किलविख = (ब्राहमण कैली घात कंञका, अणचारी का धान)। असुर संघारु = संघारने योग्य असुर। करनि = कान में। करनि धरिआ = सुना। निमख = (निमेष) आँख झपकने जितना समय।4।
अर्थ: यदि किसी मनुष्य को काम ने क्रोध ने मोह ने अपने वश में किया हो, यदि उस कंजूस का प्यार (सदा) लोभ में हो, यदि उसने (उन विकारों के वश हो के) चारों ही घोर पाप अपराध किये हों, यदि वह इतना बुरा हो गया हो कि उसे मार देना ही ठीक हो। यदि उसने कभी भी कोई धर्म पुस्तक कोई धर्म गीत कोई धार्मिक कविता सुनी ना हो, पर यदि परमात्मा उसके चिक्त में आ बसे, तो वह आँख झपकने जितने समय के लिए ही प्रभु का स्मरण करके (इन सभी विकारों के समुंदर से) पार लांघ जाता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सासत सिम्रिति बेद चारि मुखागर बिचरे ॥ तपे तपीसर जोगीआ तीरथि गवनु करे ॥ खटु करमा ते दुगुणे पूजा करता नाइ ॥ रंगु न लगी पारब्रहम ता सरपर नरके जाइ ॥५॥
मूलम्
सासत सिम्रिति बेद चारि मुखागर बिचरे ॥ तपे तपीसर जोगीआ तीरथि गवनु करे ॥ खटु करमा ते दुगुणे पूजा करता नाइ ॥ रंगु न लगी पारब्रहम ता सरपर नरके जाइ ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुखागर = मुख+अग्र, ज़बानी। बिचरे = विचार के। तीरथि = तीर्थ पर। नाइ = नहा के। खटु = छह। सरपर = जरूर।5।
अर्थ: यदि कोई मनुष्य चारों वेद, सारे शास्त्र और सारी ही स्मृतियों को मुंह ज़बानी (उचार के) विचार सकता हो। यदि वह तपस्वियों व जोगियों की तरह (हरेक) तीर्थ पर जाता हो, यदि वह (तीर्तों पर) स्नान करके (देवी-देवताओं की) पूजा करता हो और (जाने माने) छह (धार्मिक) कर्मों से दोगुने (धार्मिक कर्म नित्य) करता हो; पर यदि परमात्मा (के चरणों) का प्यार उसके अंदर नहीं है, तो वह जरूर ही नर्क में जाता है।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
राज मिलक सिकदारीआ रस भोगण बिसथार ॥ बाग सुहावे सोहणे चलै हुकमु अफार ॥ रंग तमासे बहु बिधी चाइ लगि रहिआ ॥ चिति न आइओ पारब्रहमु ता सरप की जूनि गइआ ॥६॥
मूलम्
राज मिलक सिकदारीआ रस भोगण बिसथार ॥ बाग सुहावे सोहणे चलै हुकमु अफार ॥ रंग तमासे बहु बिधी चाइ लगि रहिआ ॥ चिति न आइओ पारब्रहमु ता सरप की जूनि गइआ ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मिलक = मिलख, जमीन। अफार = अफरे हुए का, अहंकारी का। चाइ = चाव में।6।
अर्थ: यदि किसी मनुष्य को (मुल्कों के) राज मिल रहे हों, बेअंत जमीनों की मल्कियत मिली हो, यदि (उसकी हर जगह) सरदारियां बनी हुई हों, दुनिया के अनेक पदार्तों के भोग भोगता हो। यदि उसके पास सुंदर सुंदर बाग हों, यदि (इन सारे पदार्तों की मल्कियत के कारण उस) अहंकारी (हुए) का हुक्म हर कोई मानता हो, यदि वह दुनिया के कई किस्म के रंग तमाशों के चाव उल्लास में व्यस्त रहता हो। पर, यदि परमात्मा उसके चिक्त में कभी ना आया हो तो उस को सांप की जून में गया समझो।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बहुतु धनाढि अचारवंतु सोभा निरमल रीति ॥ मात पिता सुत भाईआ साजन संगि परीति ॥ लसकर तरकसबंद बंद जीउ जीउ सगली कीत ॥ चिति न आइओ पारब्रहमु ता खड़ि रसातलि दीत ॥७॥
मूलम्
बहुतु धनाढि अचारवंतु सोभा निरमल रीति ॥ मात पिता सुत भाईआ साजन संगि परीति ॥ लसकर तरकसबंद बंद जीउ जीउ सगली कीत ॥ चिति न आइओ पारब्रहमु ता खड़ि रसातलि दीत ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अचारवंतु = ठीक जीवनशैली वाला। सुत = पुत्र। तरकसबंद लसकर = तर्कश बांधने वाले योद्धाओं के लश्कर। बंद = बंदना। जीउ जीउ = जी जी! खड़ि = ले जा के। रसातलि = रसातल में, नर्क में।7।
अर्थ: यदि कोई मनुष्य बहुत धनवान हो, अच्छी रहिणी बहिणी वाला हो, शोभा वाला होऔर साफ-सुथरी जीवन मर्यादा वाला हो, यदि उसका अपने माँ-बाप भाईयों और सज्जन-मित्रों से प्रेम हे, यदि तर्कश बांधने वाले योद्धाओं के लश्कर उसे सलामें करते हों। सारी सृष्टि ही उसे ‘जी जी’ कहती हो। पर, यदि परमात्मा उसके चिक्त में नहीं बसता तो वह (आखिर) ले जा के नर्क में ही डाला जाता है।7।
[[0071]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
काइआ रोगु न छिद्रु किछु ना किछु काड़ा सोगु ॥ मिरतु न आवी चिति तिसु अहिनिसि भोगै भोगु ॥ सभ किछु कीतोनु आपणा जीइ न संक धरिआ ॥ चिति न आइओ पारब्रहमु जमकंकर वसि परिआ ॥८॥
मूलम्
काइआ रोगु न छिद्रु किछु ना किछु काड़ा सोगु ॥ मिरतु न आवी चिति तिसु अहिनिसि भोगै भोगु ॥ सभ किछु कीतोनु आपणा जीइ न संक धरिआ ॥ चिति न आइओ पारब्रहमु जमकंकर वसि परिआ ॥८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: काइआ = शरीर। छिद्र = नुक्स, छेद, ऐब। काढ़ा = फिक्र, चिन्ता। मिरतु = मृत्यु, मौत। अहि = दिन। निसि = रात। जीइ = जिंद में, दिल में। संक = शंका, झाका। कंकर = किंकर, नौकर। वसि = वश में।8।
अर्थ: यदि किसी मनुष्य के शरीर को कभी कोई रंग ना लगा हो, कोई किसी तरह की तकलीफ़ ना आई हो, किसी तरह की कोई चिन्ता फिक्र उसे ना हो। उसे कभी मौत (का फिक्र) याद ना आई हो। यदि वह दिन रात दुनिया के भोग भोगता रहता हो, यदि उसने दुनिया की हरेक चीज को अपना बना लिया हो, कभी उसके चिक्त में (अपनी मल्कियत के बारे में) कोई शंका ना उठा हो। पर, यदि परमात्मा उसके चिक्त में कभी नहीं आया तो वह अंत में यमराज के दूतों के वश पड़ता है।8।
विश्वास-प्रस्तुतिः
किरपा करे जिसु पारब्रहमु होवै साधू संगु ॥ जिउ जिउ ओहु वधाईऐ तिउ तिउ हरि सिउ रंगु ॥ दुहा सिरिआ का खसमु आपि अवरु न दूजा थाउ ॥ सतिगुर तुठै पाइआ नानक सचा नाउ ॥९॥१॥२६॥
मूलम्
किरपा करे जिसु पारब्रहमु होवै साधू संगु ॥ जिउ जिउ ओहु वधाईऐ तिउ तिउ हरि सिउ रंगु ॥ दुहा सिरिआ का खसमु आपि अवरु न दूजा थाउ ॥ सतिगुर तुठै पाइआ नानक सचा नाउ ॥९॥१॥२६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ओह = वह (साधु संग)। रंगु = प्रेम। तुठै = प्रसन्न होने से।9।
अर्थ: जिस (बड़े भाग्यशाली) मनुष्य पर परमात्मा मेहर करता है, उसे संत संग प्राप्त होता है (और यह एक कुदरती नियम है कि) ज्यों ज्यों वह (सत्संग में बैठना) बढ़ाता जाता है त्यों त्यों परमात्मा से प्यार (भी बढ़ता जाता है)। (पर, दुनिया के मोह और प्रभु चरणों का प्यार इन) दोनों तरफ का मालिक परमात्मा स्वयं है (किसी को माया के मोह में फसाए रखता है, और किसी को गुरु चरणों का प्यार बख्शता है। उस प्रभु के बिनां जीवों के लिए) कोई और दूसरा सहारा नहीं है।
हे नानक! (जब प्रभु की मेहर हो तो वह गुरु मिलाता है, और) गुरु के प्रसन्न होने से सदा स्थिर रहने वाले प्रभु का नाम प्राप्त हो जाता है।9।1।26।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ घरु ५ ॥ जानउ नही भावै कवन बाता ॥ मन खोजि मारगु ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ घरु ५ ॥ जानउ नही भावै कवन बाता ॥ मन खोजि मारगु ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नही जानउ = मैं नही जानता। कवन बाता = कौन सी बात? भावै = ठीक लगती है। मन = हे मन! मारगु = रास्ता।1। रहाउ।
अर्थ: मुझे समझ नहीं कि परमात्मा को कौन सी बात ठीक लगती है। हे मेरे मन! तू (वह) रास्ता ढूँढ (जिस पे चलने से प्रभु प्रसन्न हो जाए)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
धिआनी धिआनु लावहि ॥ गिआनी गिआनु कमावहि ॥ प्रभु किन ही जाता ॥१॥
मूलम्
धिआनी धिआनु लावहि ॥ गिआनी गिआनु कमावहि ॥ प्रभु किन ही जाता ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: धिआनी = समाधिआं लगाने वाले। गिआनी = ज्ञानी, विद्वान। किन ही = किसी खास ने।1।
अर्थ: समाधियां लगाने वाले लोग समाधियां लगाते हैं। विद्वान लोग धर्म चर्चा करते हैं। पर परमात्मा को किसी विरले ने ही समझा है (भाव, इन तरीकों से परमात्मा नही मिलता)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भगउती रहत जुगता ॥ जोगी कहत मुकता ॥ तपसी तपहि राता ॥२॥
मूलम्
भगउती रहत जुगता ॥ जोगी कहत मुकता ॥ तपसी तपहि राता ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भगउती = वैश्नव भक्त। जुगता = युक्ति (व्रत, तुलसी माला आदिक संजम)। तपहि = तप में ही। राता = मस्त।2।
अर्थ: वैश्नव भक्त (व्रत, तुलसी माला, तीर्थ स्नान आदि) संजमों में रहते हैं। जोगी कहते हैं कि हम मुक्त हो गए हैं। तप करने वाले साधु तप (करने) में ही मस्त रहते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मोनी मोनिधारी ॥ सनिआसी ब्रहमचारी ॥ उदासी उदासि राता ॥३॥
मूलम्
मोनी मोनिधारी ॥ सनिआसी ब्रहमचारी ॥ उदासी उदासि राता ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मोनी = चुप रहने वाले। उदासि = उदासी भेख में।3।
अर्थ: चुप धारन करने वाले साधु चुप रहते हैं। संयासी (सन्यास में), ब्रह्मचारी (ब्रह्मचर्य में) और उदासी उदास वेष में मस्त रहते हैं।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भगति नवै परकारा ॥ पंडितु वेदु पुकारा ॥ गिरसती गिरसति धरमाता ॥४॥
मूलम्
भगति नवै परकारा ॥ पंडितु वेदु पुकारा ॥ गिरसती गिरसति धरमाता ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नवै परकारा = नौ किस्म की (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, चरण सेवा, अर्चन, बंदना, सख्य अथवा मित्रभाव, दास्य व दास भाव तथा अपना आप अर्पण करना)। गिरसति = गृहस्थ में। धरमात्मा = धर्म में मस्त।4।
अर्थ: (कोई कहता है कि) भक्ति नौ किस्मों की है। पण्डित वेद ऊँचा ऊँचा पढ़ता है। गृहस्थी गृहस्थ-धर्म में मस्त रहता है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इक सबदी बहु रूपि अवधूता ॥ कापड़ी कउते जागूता ॥ इकि तीरथि नाता ॥५॥
मूलम्
इक सबदी बहु रूपि अवधूता ॥ कापड़ी कउते जागूता ॥ इकि तीरथि नाता ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: इक सबदी = जो एक ही शब्द बोलते हैं, ‘अलख’ ‘अलख’ कहने वाले। बहुरूपि = बहरूपीए। अवधूता = नंगे। कापड़ी = खास किस्म का चोला आदि कपड़ा पहनने वाले। कउते = कवि, नाटक चेटक व स्वांग दिखा के लोगों को खुश करने वाले। जागूता = जागरा वाले, सदा जागते रहने वाले। इकि = अनेक। तीरथि = तीर्थ पे।5।
अर्थ: अनेक ऐसे हैं जो ‘अलख’ ‘अलख’ पुकारते हैं, कोई बहरूपीए हैं, कोई नांगे हैं। कोई खास किस्म का चोला आदि पहनने वाले हैं। कोई नाटक चेटक स्वांग आदि बना के लोगों को प्रसन्न करते हैं। कई ऐसे हैं जो रातें जाग के गुजारते हैं। एक ऐसे हैं जो (हरेक) तीर्थ पर स्नान करते हैं।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
निरहार वरती आपरसा ॥ इकि लूकि न देवहि दरसा ॥ इकि मन ही गिआता ॥६॥
मूलम्
निरहार वरती आपरसा ॥ इकि लूकि न देवहि दरसा ॥ इकि मन ही गिआता ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निरहार = निर+आहार। निरहार बरती = भूखे रहने वाले। आपरसा = किसी से ना छूने वाले। लूकि = छुप के (रहने वाले)। मन ही = अपने मन में ही। गिआता = ज्ञाता, ज्ञानवान।6।
अर्थ: अनेक ऐसे हैं जो भूखे ही रहते हैं। कई ऐसे हैं जो दूसरों के साथ छूते नहीं हैं (ताकि किसी को छूत ना लग जाए)। अनेक ऐसे हैं जो (गुफा आदि में) छुप के (रहते हैं और किसी को) दर्शन नहीं देते। कई ऐसे हैं जो अपने मन में ही ज्ञानवान बने हुए हैं।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
घाटि न किन ही कहाइआ ॥ सभ कहते है पाइआ ॥ जिसु मेले सो भगता ॥७॥
मूलम्
घाटि न किन ही कहाइआ ॥ सभ कहते है पाइआ ॥ जिसु मेले सो भगता ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: घाटि = घट, कमजोर। किन ही = किसी ने भी।7।
अर्थ: (इनमें से) किसी ने भी अपने आप को (किसी और से) कम नहीं कहलवाया। सभी यही कहते हैं कि हमने परमात्मा ढूंढ लिया है। पर (परमात्मा का) भक्त वही है जिसको (परमात्मा ने स्वयं अपने साथ) मिला लिया है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सगल उकति उपावा ॥ तिआगी सरनि पावा ॥ नानकु गुर चरणि पराता ॥८॥२॥२७॥
मूलम्
सगल उकति उपावा ॥ तिआगी सरनि पावा ॥ नानकु गुर चरणि पराता ॥८॥२॥२७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: उकति = दलील। उपावा = उपाय। पावा = मैं पड़ा हूँ। पराता = पड़ा हूँ।8।
अर्थ: पर, मैंने तो ये सारी दलीलें और सारे ही उपाय छोड़ दिए हैं और प्रभु की ही शरण पड़ा हूँ। नानक तो गुरु के चरणों में आ गिरा है।8।2।27।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सिरीरागु महला १ घरु ३ ॥
मूलम्
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सिरीरागु महला १ घरु ३ ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
जोगी अंदरि जोगीआ ॥ तूं भोगी अंदरि भोगीआ ॥ तेरा अंतु न पाइआ सुरगि मछि पइआलि जीउ ॥१॥
मूलम्
जोगी अंदरि जोगीआ ॥ तूं भोगी अंदरि भोगीआ ॥ तेरा अंतु न पाइआ सुरगि मछि पइआलि जीउ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुरगि = स्वर्ग में। मछि = मातृ लोक में। पइआलि = पाताल में।1।
अर्थ: (हे प्रभु!) जोगियों के अंदर (व्यापक हो के तू स्वयं ही) जोग कमा रहा है। माया के भोग भोगने वालों के अंदर भी तू ही पदार्थ भोग रहा है। स्वर्ग लोक में मातृ लोक में पाताल लोक में (बसते किसी भी जीव ने) तेरे गुणों का अंत नहीं पाया।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ वारी हउ वारणै कुरबाणु तेरे नाव नो ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
हउ वारी हउ वारणै कुरबाणु तेरे नाव नो ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नो = को।1। रहाउ।
अर्थ: हे प्रभु! मैं सदके हूँ तेरे नाम से। वारे जाता हूँ तेरे नाम पे। कुर्बान हूँ तेरे नाम पर।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तुधु संसारु उपाइआ ॥ सिरे सिरि धंधे लाइआ ॥ वेखहि कीता आपणा करि कुदरति पासा ढालि जीउ ॥२॥
मूलम्
तुधु संसारु उपाइआ ॥ सिरे सिरि धंधे लाइआ ॥ वेखहि कीता आपणा करि कुदरति पासा ढालि जीउ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सिरे सिरि = हरेक जीव के सिर पर। वेखहि = तू देखता है, तू संभाल करता है। करि कुदरति = कुदरत रच के। पासा ढालि = पासा ढाल के, चौपड़ की नरदें फेंक के।2।
अर्थ: (हे प्रभु!) तूने ही जगत पैदा किया है। हरेक जीव पर (उनके किये कर्मों के लेख लिख के जीवों को तूने ही माया के) धंधों में फंसाया हुआ है। तू कुदरति रच के (जगत चौपड़ की) जीव-नरदें फेंक के तू स्वयं ही अपने रचे जगत की संभाल कर रहा है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
परगटि पाहारै जापदा ॥ सभु नावै नो परतापदा ॥ सतिगुर बाझु न पाइओ सभ मोही माइआ जालि जीउ ॥३॥
मूलम्
परगटि पाहारै जापदा ॥ सभु नावै नो परतापदा ॥ सतिगुर बाझु न पाइओ सभ मोही माइआ जालि जीउ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: परगटि पहारै = दिखाई देते पसारे में। नावै नो = (प्रभु के) नाम को। सभु = हरेक जीव। परतापदा = प्रताप है। सभ = सारी सृष्टि। जालि = जाल में।3।
अर्थ: (हे भाई!) परमात्मा इस दिखाई देते जगत पसारे में (बसता) दिखाई दे रहा है। हरेक जीव उस प्रभु के नाम की लालसा रखता है। पर, गुरु की शरण के बगैर किसी को प्रभु का नाम नहीं मिला (क्योंकि) सारी सृष्टि माया के जाल में फंसी हुई है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतिगुर कउ बलि जाईऐ ॥ जितु मिलिऐ परम गति पाईऐ ॥ सुरि नर मुनि जन लोचदे सो सतिगुरि दीआ बुझाइ जीउ ॥४॥
मूलम्
सतिगुर कउ बलि जाईऐ ॥ जितु मिलिऐ परम गति पाईऐ ॥ सुरि नर मुनि जन लोचदे सो सतिगुरि दीआ बुझाइ जीउ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बलि जाईऐ = कुर्बान जाएं। कउ = से। जितु मिलिऐ = जिस (गुरु) को मिलके। परम गति = सभसे ऊूंची आत्मिक अवस्था। सुरि = देवते। सतिगुरि = गुरु ने।4।
अर्थ: (हे भाई!) गुरु से कुर्बान जाना चाहिए (क्योंकि) उस (गुरु) के मिलने से ही सबसे ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल की जा सकती है। (जिस नाम पदार्थ को) देवते, मनुष्य, मौनधारी लोग तरसते आ रहें हैं वह (पदार्थ) सत्गुरू ने समझा दिया है।4।
[[0072]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतसंगति कैसी जाणीऐ ॥ जिथै एको नामु वखाणीऐ ॥ एको नामु हुकमु है नानक सतिगुरि दीआ बुझाइ जीउ ॥५॥
मूलम्
सतसंगति कैसी जाणीऐ ॥ जिथै एको नामु वखाणीऐ ॥ एको नामु हुकमु है नानक सतिगुरि दीआ बुझाइ जीउ ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिथै = जिस जगह पर।5।
अर्थ: किस तरह के एकत्र को सत संगति समझना चाहिए? (सतसंगति वह है) जहाँ सिर्फ परमात्मा का नाम सलाहा जाता है। हे नानक! सतिगुरु ने ये बात समझा दी है कि (सतसंगति में) सिर्फ परमात्मा का नाम जपना ही (प्रभु का) हुक्म है।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इहु जगतु भरमि भुलाइआ ॥ आपहु तुधु खुआइआ ॥ परतापु लगा दोहागणी भाग जिना के नाहि जीउ ॥६॥
मूलम्
इहु जगतु भरमि भुलाइआ ॥ आपहु तुधु खुआइआ ॥ परतापु लगा दोहागणी भाग जिना के नाहि जीउ ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भरमि = माया की भटकना में (डाल के)। भुलाइआ = कुमार्ग पर डाला है। आपहु तुधु = तू अपने आप से (हे प्रभु!)। खुआइआ = वंचित कर दिया है। परतापु = प्रताप, दुख।6।
अर्थ: ये जगत माया की भटकना में पड़ के जीवन के सही राह से भटक के कुमार्ग पर जा रहा है। (पर, जीवों के भी क्या वश? हे प्रभु!) तूने स्वयं ही (जगत को) अपने आप से विछोड़ा हुआ है। जिस दुर्भागी जीव स्त्रीयों के अच्छे भाग्य नहीं होते, उनको (माया के मोह में फंसने के कारण आत्मिक) दुख लगा हुआ है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दोहागणी किआ नीसाणीआ ॥ खसमहु घुथीआ फिरहि निमाणीआ ॥ मैले वेस तिना कामणी दुखी रैणि विहाइ जीउ ॥७॥
मूलम्
दोहागणी किआ नीसाणीआ ॥ खसमहु घुथीआ फिरहि निमाणीआ ॥ मैले वेस तिना कामणी दुखी रैणि विहाइ जीउ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: खसमहु = खसम से। वेस = कपड़े। तिना कामणी = उन स्त्रीयों के। रैणि = रजनि, जिंदगी की रात। विहाइ = बीतती है।7।
अर्थ: दुर्भाग्यशाली जीव स्त्रीयों के क्या लक्षण हैं? (दुर्भाग्यशाली जीव स्त्रीयां वह हैं) जो खसम प्रभु से वंचित हैं और बेआसरा हो के भटक रही हैं। ऐसी जीव स्त्रीयों के चेहरे भी विकारों की मैल के साथ भ्रष्ट हुए दिखाई देते हैं, उनकी जिंदगी-रूप रात दुखों में ही व्यतीत होती है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सोहागणी किआ करमु कमाइआ ॥ पूरबि लिखिआ फलु पाइआ ॥ नदरि करे कै आपणी आपे लए मिलाइ जीउ ॥८॥
मूलम्
सोहागणी किआ करमु कमाइआ ॥ पूरबि लिखिआ फलु पाइआ ॥ नदरि करे कै आपणी आपे लए मिलाइ जीउ ॥८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पूरबि = पहले जनम में। करे कै = कर के।8।
अर्थ: जो जीव-स्त्रीयां भाग्यशाली कहलाती हैं उन्होंने कौन सा (अच्छा काम) किया हुआ है? उन्होंने पिछले जन्म में की नेक कमायी के लिखे संस्कारों के तौर पर अब परमात्मा का नाम फल प्राप्त कर लिया है। परमात्मा अपनी मेहर की निगाह करके खुद ही उनको अपने चरणों में मिला लेता है।8।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हुकमु जिना नो मनाइआ ॥ तिन अंतरि सबदु वसाइआ ॥ सहीआ से सोहागणी जिन सह नालि पिआरु जीउ ॥९॥
मूलम्
हुकमु जिना नो मनाइआ ॥ तिन अंतरि सबदु वसाइआ ॥ सहीआ से सोहागणी जिन सह नालि पिआरु जीउ ॥९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सहीआं = सहेलियां, सत्संगी। सह नालि = खसम प्रभु के साथ।9।
अर्थ: परमात्मा जिस जीव-स्त्रीयों को अपना हुक्म मानने के लिए प्रेरता है, वह अपने दिल में परमात्मा की महिमा की वाणी बसाती हैं। वही जीव सहेलियां भाग्यशाली होती हैं, जिनका अपने पति प्रभु के साथ प्यार बना रहता है।9।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिना भाणे का रसु आइआ ॥ तिन विचहु भरमु चुकाइआ ॥ नानक सतिगुरु ऐसा जाणीऐ जो सभसै लए मिलाइ जीउ ॥१०॥
मूलम्
जिना भाणे का रसु आइआ ॥ तिन विचहु भरमु चुकाइआ ॥ नानक सतिगुरु ऐसा जाणीऐ जो सभसै लए मिलाइ जीउ ॥१०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रसु = आनंद। भरमु = भटकना। सभसै = सभ जीवों को।10।
अर्थ: जिस मनुष्यों को परमात्मा की रजा में चलने का आनंद आ जाता है, वे अंदर से माया वाली भटकना दूर कर लेते हैं (पर यह मेहर सतिगुरु की ही है)। हे नानक! गुरु ऐसा (दयाल) है कि वह (शरण आए) सभ जीवों को प्रभु चरणों में मिला देता है।10।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतिगुरि मिलिऐ फलु पाइआ ॥ जिनि विचहु अहकरणु चुकाइआ ॥ दुरमति का दुखु कटिआ भागु बैठा मसतकि आइ जीउ ॥११॥
मूलम्
सतिगुरि मिलिऐ फलु पाइआ ॥ जिनि विचहु अहकरणु चुकाइआ ॥ दुरमति का दुखु कटिआ भागु बैठा मसतकि आइ जीउ ॥११॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सतिगुरि मिलिऐ = यदि सत्गुरू मिल जाए। जिनि = जिस ने। अहकरण = अहंकार। मसतकि = माथे पर।11।
अर्थ: जिस मनुष्य ने अपने अंदर से अहंकार दूर कर लिया, उसने गुरु की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम रस प्राप्त कर लिया। उस मनुष्य के अंदर से बुरी मति का दुख काटा जाता है, उसके माथे के भाग्य जाग पड़ते हैं।11।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अम्रितु तेरी बाणीआ ॥ तेरिआ भगता रिदै समाणीआ ॥ सुख सेवा अंदरि रखिऐ आपणी नदरि करहि निसतारि जीउ ॥१२॥
मूलम्
अम्रितु तेरी बाणीआ ॥ तेरिआ भगता रिदै समाणीआ ॥ सुख सेवा अंदरि रखिऐ आपणी नदरि करहि निसतारि जीउ ॥१२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंम्रितु = अमृत, आत्मिक जीवन देने वाला रस। रिदै = हृदय में। अंदरि रखिऐ = यदि दिल में रखा जाए। सुखसेवा = सुखदायी सेवा। करहि = करता है। निसतारि = तू पार लंघाता है।12।
अर्थ: (हे प्रभु!) तेरी महिमा की वाणी (मानो) आत्मिक जीवन देने वाला जल है, ये वाणी तेरे भगतों के दिल में (हर वक्त) टिकी रहती है। तेरी सुखदायी सेवा भक्ति भक्तों के अंदर टिकने के कारण तू उन पर अपनी मेहर की निगाह करता है और उनको पार लंघा लेता है।12।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सतिगुरु मिलिआ जाणीऐ ॥ जितु मिलिऐ नामु वखाणीऐ ॥ सतिगुर बाझु न पाइओ सभ थकी करम कमाइ जीउ ॥१३॥
मूलम्
सतिगुरु मिलिआ जाणीऐ ॥ जितु मिलिऐ नामु वखाणीऐ ॥ सतिगुर बाझु न पाइओ सभ थकी करम कमाइ जीउ ॥१३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पाइओ = पाया, मिला। करम = (तीर्थ, व्रत आदि धार्मिक) कर्म।13।
अर्थ: तभी (किसी भाग्यशाली को) गुरु से मिला हुआ समझना चाहिए जब गुरु के मिलने से परमात्मा का नाम स्मरण किया जाए। गुरु की शरण पड़े बिना (परमात्मा का नाम) नहीं मिलता। (गुरु का आसरा छोड़ के) सारी दुनिया (तीर्थ व्रत आदि और-और निहित धार्मिक) कर्म कर के खप जाती है।13।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ सतिगुर विटहु घुमाइआ ॥ जिनि भ्रमि भुला मारगि पाइआ ॥ नदरि करे जे आपणी आपे लए रलाइ जीउ ॥१४॥
मूलम्
हउ सतिगुर विटहु घुमाइआ ॥ जिनि भ्रमि भुला मारगि पाइआ ॥ नदरि करे जे आपणी आपे लए रलाइ जीउ ॥१४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: विटहु = में से। घुमाइआ = कुर्बान। जिनि = जिस ने। भ्रमि = भटकना में (पड़ के)। भुला = कुमार्ग पर पड़ा हुआ। मारगि = रास्ते पर।14।
अर्थ: मैं (तो) गुरु पर से कुर्बान हूँ, जिसने भटक रहे कुमार्ग पर पड़े जीव को सही रास्ते पर डाला है। अगर गुरु अपनी मेहर की निगाह करे, तो वह स्वयं ही (प्रभु चरणों में) जोड़ देता है।14।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तूं सभना माहि समाइआ ॥ तिनि करतै आपु लुकाइआ ॥ नानक गुरमुखि परगटु होइआ जा कउ जोति धरी करतारि जीउ ॥१५॥
मूलम्
तूं सभना माहि समाइआ ॥ तिनि करतै आपु लुकाइआ ॥ नानक गुरमुखि परगटु होइआ जा कउ जोति धरी करतारि जीउ ॥१५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तिनि करतै = उस कर्तार ने। आपु = अपने आप को। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ने से। जा कउ = जिस को। करतारि = कर्तार ने।15।
अर्थ: (हे प्रभु!) तू सारे जीवों में व्यापक है। (हे भाई! सारे जीवों में व्यापक होते हुए भी) उस कर्तार ने अपने आप को गुप्त रखा हुआ है। हे नानक! जिस मनुष्य के अंदर गुरु के द्वारा कर्तार ने अपनी ज्योति प्रगट की हुई है, उसके अंदर कर्तार प्रगट हो जाता है।15।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आपे खसमि निवाजिआ ॥ जीउ पिंडु दे साजिआ ॥ आपणे सेवक की पैज रखीआ दुइ कर मसतकि धारि जीउ ॥१६॥
मूलम्
आपे खसमि निवाजिआ ॥ जीउ पिंडु दे साजिआ ॥ आपणे सेवक की पैज रखीआ दुइ कर मसतकि धारि जीउ ॥१६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: खसमि = खसम ने। निवाजिआ = मेहर की, बड़प्पन दिया। जिउ = जिंद, जीवात्मा। पिंडु = शरीर। दे = दे कर। पैज = लज्जा, इज्जत। दुइ कर = दोनों हाथ। धारि = रख के।16।
अर्थ: पति प्रभु ने (अपने सेवक को) स्वयं ही आदर मान दिया है, जिंद और शरीर दे के खुद ही उसको पैदा किया है। अपने दोनों हाथ सेवक के सिर पर रख कर खसम प्रभु ने खुद ही उसकी लज्जा रखी है (और उसको विकारों से बचाया है)।16।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभि संजम रहे सिआणपा ॥ मेरा प्रभु सभु किछु जाणदा ॥ प्रगट प्रतापु वरताइओ सभु लोकु करै जैकारु जीउ ॥१७॥
मूलम्
सभि संजम रहे सिआणपा ॥ मेरा प्रभु सभु किछु जाणदा ॥ प्रगट प्रतापु वरताइओ सभु लोकु करै जैकारु जीउ ॥१७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: संजम = इन्द्रियों को वश में करने के साधन। सभि = सारे। रहे = रह गए, असफल हो गए। सभु लोकु = सारा जगत।17।
अर्थ: इन्द्रियों को वश में करने के सारे प्रयत्न और इस तरह की और सभी सियानप भरे निहित धार्मिक कर्म सेवक को करने की जरूरत नहीं पड़ती। प्यारा प्रभु सेवक की हरेक आवश्यक्ता स्वयं जानता है। परमात्मा अपने सेवक का तेज प्रताप प्रगट कर देता है। सारा जगत उसकी जै जैकार करता है।17।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मेरे गुण अवगन न बीचारिआ ॥ प्रभि अपणा बिरदु समारिआ ॥ कंठि लाइ कै रखिओनु लगै न तती वाउ जीउ ॥१८॥
मूलम्
मेरे गुण अवगन न बीचारिआ ॥ प्रभि अपणा बिरदु समारिआ ॥ कंठि लाइ कै रखिओनु लगै न तती वाउ जीउ ॥१८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: प्रभि = प्रभु ने। बिरदु = मूल स्वभाव। समारिआ = चेते रखा, याद रखा। कंठि = गले से। रखिओनु = उस ने रक्षा की।18।
अर्थ: प्रभु ने ना मेरे गुणों का ख्याल किया है, ना ही मेरे अवगुणों की परवाह की है। प्रभु ने तो सिर्फ अपना दया वाला मूल स्वभाव ही चेते रखा है। उसने मुझे अपने गले से लगा के (विकारों से) बचा लिया है, कोई दुख विकार मेरा बाल भी बाँका नही कर सके।18।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मै मनि तनि प्रभू धिआइआ ॥ जीइ इछिअड़ा फलु पाइआ ॥ साह पातिसाह सिरि खसमु तूं जपि नानक जीवै नाउ जीउ ॥१९॥
मूलम्
मै मनि तनि प्रभू धिआइआ ॥ जीइ इछिअड़ा फलु पाइआ ॥ साह पातिसाह सिरि खसमु तूं जपि नानक जीवै नाउ जीउ ॥१९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनि = मन में, मन से। तनि = तन में, तन से। जीअ = जीअ में। जीअ इछिअड़ा = जिसकी जीअ में इच्छा की। सिरि = सिर पर।19।
अर्थ: मैंने अपने मन में प्रभु को स्मरण किया है, अपने हृदय में परमात्मा को ध्याया है। मुझे वह नाम-फल मिल गया है, जिसकी मैं सदा अपने जी में इच्छा रखा करता था।
हे प्रभु! तू सारे शाहों के सिर पर, तू बादशाहों के सिर पर मालिक है। हे नानक! (बड़े भाग्यों वाला मनुष्य) प्रभु का नाम जप के आत्मिक जीवन प्राप्त कर लेता है।19।
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विश्वास-प्रस्तुतिः
तुधु आपे आपु उपाइआ ॥ दूजा खेलु करि दिखलाइआ ॥ सभु सचो सचु वरतदा जिसु भावै तिसै बुझाइ जीउ ॥२०॥
मूलम्
तुधु आपे आपु उपाइआ ॥ दूजा खेलु करि दिखलाइआ ॥ सभु सचो सचु वरतदा जिसु भावै तिसै बुझाइ जीउ ॥२०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आपै = स्वयं ही। आपु = अपने आप को। दूजा खेलु = अपने से अलग तमाशा। करि = कर के, पैदा कर के। सभु = हर जगह। सचो सचु = सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा ही। भावै = चाहता है।20।
अर्थ: हे प्रभु! तूने अपने आप को (जगत रूप में) स्वयं ही प्रगट किया है। (ये तुझसे अलग दिखाई देता) माया का जगत तमाशा तूने स्वयं ही बना के दिखा दिया है।
(हे भाई!) हर जगह सदा स्थिर रहने वाला परमात्मा ही मौजूद है। जिस पर वह मेहर करता है, उसको (यह भेद) समझा देता है।20।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गुर परसादी पाइआ ॥ तिथै माइआ मोहु चुकाइआ ॥ किरपा करि कै आपणी आपे लए समाइ जीउ ॥२१॥
मूलम्
गुर परसादी पाइआ ॥ तिथै माइआ मोहु चुकाइआ ॥ किरपा करि कै आपणी आपे लए समाइ जीउ ॥२१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरपरसादी = गुरु की कृपा से। तिथै = उस (हृदय) में। चुकाइआ = दूर कर दिया।21।
अर्थ: जिस मनुष्य ने गुरु की कृपा से (परमात्मा की सर्व व्यापकता का भेद) पा लिया है, उसके हृदय में से प्रभु ने माया का मोह दूर कर दिया है। प्रभु अपनी मेहर करके खुद ही उसको अपने में लीन कर लेता है।21।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गोपी नै गोआलीआ ॥ तुधु आपे गोइ उठालीआ ॥ हुकमी भांडे साजिआ तूं आपे भंनि सवारि जीउ ॥२२॥
मूलम्
गोपी नै गोआलीआ ॥ तुधु आपे गोइ उठालीआ ॥ हुकमी भांडे साजिआ तूं आपे भंनि सवारि जीउ ॥२२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नै = नदी,यमुना नदी। गोआलीआ = गोपाल, गाऐं चराने वाला। गोपी = गुआलनि। गोइ = धरती।22।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: यहाँ कृष्ण जी के पर्वत उठाने की ओर इशारा है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे प्रभु! तू ही (गोकुल की) गोपी है, तू स्वयं ही (यमुना) नदी है, तू स्वयं ही (गोकुल का) ग्वाला है। तूने स्वयं ही (कृष्ण रूप हो के) धरती (गौवर्धन पर्वत) उठाई थी। तू अपने हुक्म में स्वयं ही जीवों के शरीर सजाता है, तू खुद ही नाश करता है, तू खुद ही पैदा करता है।22।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिन सतिगुर सिउ चितु लाइआ ॥ तिनी दूजा भाउ चुकाइआ ॥ निरमल जोति तिन प्राणीआ ओइ चले जनमु सवारि जीउ ॥२३॥
मूलम्
जिन सतिगुर सिउ चितु लाइआ ॥ तिनी दूजा भाउ चुकाइआ ॥ निरमल जोति तिन प्राणीआ ओइ चले जनमु सवारि जीउ ॥२३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिन = जिन्होंने। भाउ = प्यार। निरमल = विकारों की मैल से रहित। ओइ = वह लोग। सवारि = सवार के, सुंदर बन के।23।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जिन’ बहुवचन है। ‘जिनि’ एकवचन है।
नोट: ‘ओइ’ बहुवचन है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जिस (भाग्यशाली) मनुष्यों ने गुरु के साथ प्यार डाला है, उन्होंने अपने अंदर से माया का प्यार दूर कर लिया है। उन लोगों की आत्मिक ज्योति पवित्र हो जाती है। वह अपना जन्म स्वच्छ करके (जगत से) जाते हैं।23।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तेरीआ सदा सदा चंगिआईआ ॥ मै राति दिहै वडिआईआं ॥ अणमंगिआ दानु देवणा कहु नानक सचु समालि जीउ ॥२४॥१॥
मूलम्
तेरीआ सदा सदा चंगिआईआ ॥ मै राति दिहै वडिआईआं ॥ अणमंगिआ दानु देवणा कहु नानक सचु समालि जीउ ॥२४॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दिहै = दिन में। वडिआईआं = स्तुति, सालाहनाएं। सचु समालि = सदा स्थिर रहने वाले प्रभु को याद रख।24।
अर्थ: हे प्रभु! तेरे सदा कायम रहने वाले गुण (तेरी मेहर से) मैं दिन रात सलाहता हूँ।
हे नानक! कह: प्रभु (जीवों के) मांगने के बिनां ही हरेक दात बख्शने वाला है। (हे भाई!) उस सदा स्थिर रहने वाले प्रभु को अपने हृदय में बसाए रख।24।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ पै पाइ मनाई सोइ जीउ ॥ सतिगुर पुरखि मिलाइआ तिसु जेवडु अवरु न कोइ जीउ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ पै पाइ मनाई सोइ जीउ ॥ सतिगुर पुरखि मिलाइआ तिसु जेवडु अवरु न कोइ जीउ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पै = पड़ के, गिर के। पाइ = पैरों पे। मनाई = मैं मनाता हूँ। पुरखि = पुरख ने। सतिगुर पुरखि = सत्गुरू पुरख ने।1। रहाउ।
अर्थ: (हे भाई!) मैं (गुरु के) चरणों में लग के उस (परमात्मा) को प्रसन्न करने का प्रयत्न करता हूँ। गुरु पुरुष ने (मुझे) परमात्मा मिलाया है। (अब मुझे समझ आई है कि) उस परमात्मा के बराबर और कोई नहीं है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
गोसाई मिहंडा इठड़ा ॥ अम अबे थावहु मिठड़ा ॥ भैण भाई सभि सजणा तुधु जेहा नाही कोइ जीउ ॥१॥
मूलम्
गोसाई मिहंडा इठड़ा ॥ अम अबे थावहु मिठड़ा ॥ भैण भाई सभि सजणा तुधु जेहा नाही कोइ जीउ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गोसाई = सृष्टि का साईं, परमात्मा। मिहंडा = मेरा। इठड़ा = बहुत प्यारा। अंम = अम्मा, माँ। अबा = अब्बा, पिता। थावहु = से। सभि = सारे।1।
अर्थ: सृष्टि का मालिक मेरा (प्रभु) बहुत प्यारा है। (मुझे अपने) माता-पिता से भी ज्यादा मीठा लग रहा है।
(हे प्रभु!) बहिन भाई व अन्य सारे साक-संबंधी (मैंने देख लिए हैं), तेरे बराबर का और कोई (हित करने वाला) नहीं है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तेरै हुकमे सावणु आइआ ॥ मै सत का हलु जोआइआ ॥ नाउ बीजण लगा आस करि हरि बोहल बखस जमाइ जीउ ॥२॥
मूलम्
तेरै हुकमे सावणु आइआ ॥ मै सत का हलु जोआइआ ॥ नाउ बीजण लगा आस करि हरि बोहल बखस जमाइ जीउ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हुकमै = हुक्म में। सावणु = नाम वरखा करने वाला गुरु मिलाप। सत = उच्च आचरण। करि = कर के। बोहल = अन्न का ढेर। बोहल बख्श = बख्शिश का बोहल।2।
अर्थ: (हे प्रभु!) तेरे हुक्म में ही (गुरु से मिलाप हुआ। मानो, मेरे वास्ते) सावन का महीना आ गया। (गुरु की कृपा से) मैंने उच्च आचरण बनाने का हल जोत दिया। मैं यह आस करके तेरा नाम (अपने हृदय रूपी खेत में) बीजने लग पड़ा कि तेरी बख्शिशों का बोहल (अन्न का ढेर) इकट्ठा हो जाएगा।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ गुर मिलि इकु पछाणदा ॥ दुया कागलु चिति न जाणदा ॥ हरि इकतै कारै लाइओनु जिउ भावै तिंवै निबाहि जीउ ॥३॥
मूलम्
हउ गुर मिलि इकु पछाणदा ॥ दुया कागलु चिति न जाणदा ॥ हरि इकतै कारै लाइओनु जिउ भावै तिंवै निबाहि जीउ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हउ = मैं। गुर मिलि = गुरु को मिल के। दुया कागलु = दूसरा कागज, परमात्मा के नाम के बिना और कोई लेखा। चिति = चित्रण। चिति न जाणदा = चित्रना नहीं जानता। इकतै कारै = एक ही कार्य में। लाइओनु = उस ने लगाया है।3।
अर्थ: (हे प्रभु!) गुरु को मिल के मैंने सिर्फ तेरे नाम के साथ सांझ डाली है। मैं तेरे नाम के बिनां और कोई लेखा लिखना नहीं जानता। हे हरि! तूने मुझे (अपना नाम स्मरण करने के ही) एक ही काम में जोड़ दिया है। अब जैसे तेरी रजा हो, इस काम को सरअंजाम दे।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तुसी भोगिहु भुंचहु भाईहो ॥ गुरि दीबाणि कवाइ पैनाईओ ॥ हउ होआ माहरु पिंड दा बंनि आदे पंजि सरीक जीउ ॥४॥
मूलम्
तुसी भोगिहु भुंचहु भाईहो ॥ गुरि दीबाणि कवाइ पैनाईओ ॥ हउ होआ माहरु पिंड दा बंनि आदे पंजि सरीक जीउ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भाईहो = हे भाईयो! गुरि = गुर ने। दीबाणि = दरबार में। कवाइ = पोशाक, सिरोपा। माहरु = चौधरी। पिंड दा = शरीर का। बंनि = बांध के। आदे = ले के आए। सरीक = शरीका करने वाले, विरोधी।4।
अर्थ: हे मेरे सत्संगी भाईयो! तुम भी (गुरु की शरण में आ के) प्रभु के नाम रस का आनंद लो। मुझे गुरु ने परमात्मा की दरगाह में सिरोपा (आदर का प्रतीक कपड़ा) पहिना दिया है (आदर दिलवा दिया है, क्योंकि) मैं अब अपने शरीर का चौधरी (मुखिया) बन गया हूँ, (गुरु की मेहर से) मैंने (कामादिक) पाँचों ही विरोध करने वालों को ला बैठाया है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ आइआ साम्है तिहंडीआ ॥ पंजि किरसाण मुजेरे मिहडिआ ॥ कंनु कोई कढि न हंघई नानक वुठा घुघि गिराउ जीउ ॥५॥
मूलम्
हउ आइआ साम्है तिहंडीआ ॥ पंजि किरसाण मुजेरे मिहडिआ ॥ कंनु कोई कढि न हंघई नानक वुठा घुघि गिराउ जीउ ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सामै = शरण में। तिहंडीआ = तेरी। मुजेरे = मुजारे। मिहडिआ = मेरे। कंनु = कान, कांधा। हंघई = सकता। वुठा = बस पड़ा है। घुघि = संघनी आबादी वाला। गिराउ = ग्राम, गांव।5।
अर्थ: हे नानक! (कह, हे मेरे प्रभु!) मैं तेरी शरण आया हूँ। (तेरी मेहर से) पाँचों (ज्ञान-इंद्रिय) किसान मेरे मुजारे बन गए हैं (मेरे कहे में चलते हैं)। कोई (भी ज्ञानेंद्रिय रूपी किसान मुझसे आकी हो के) सिर नहीं उठा सकता। अब मेरा शरीर रूपी नगर (भले गुणों की) संघनी आबादी से बस गया है।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ वारी घुमा जावदा ॥ इक साहा तुधु धिआइदा ॥ उजड़ु थेहु वसाइओ हउ तुध विटहु कुरबाणु जीउ ॥६॥
मूलम्
हउ वारी घुमा जावदा ॥ इक साहा तुधु धिआइदा ॥ उजड़ु थेहु वसाइओ हउ तुध विटहु कुरबाणु जीउ ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हउ = मैं। घुंमा जावदा = कुर्बान जाता हूँ। साहा = हे शाह! तुधु = तूझे। थेहु = गिरा हुआ गाँव, वह शरीर रूपी गाँव जिसमें से सारे भले गुण खत्म हो चुके हैं।6।
अर्थ: (हे मेरे शाह-प्रभु!) मैं तुझसे सदके जाता हूँ, मैं तूझसे कुर्बान जाता हूँ। में सिर्फ तुझे ही अपने दिल में टिकाए बैठा हूँ। (हे मेरे शाह प्रभु!) मैं तुझसे कुर्बान जाता हूँ तूने मेरा उजड़ा हुआ थेह हुआ हृदय-घर बसा दिया है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि इठै नित धिआइदा ॥ मनि चिंदी सो फलु पाइदा ॥ सभे काज सवारिअनु लाहीअनु मन की भुख जीउ ॥७॥
मूलम्
हरि इठै नित धिआइदा ॥ मनि चिंदी सो फलु पाइदा ॥ सभे काज सवारिअनु लाहीअनु मन की भुख जीउ ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: इठै = प्यारे को। मनि = मन में। चिंदी = चितवता हूँ। सभे काज = सार काम। सवारिअनु = उसने सवार दिए हैं। लाहीअनि = उसने उतार दी है।7।
अर्थ: (हे भाई!) मैं अब सदा सदा प्यारे हरि को ही स्मरण करता हूँ। अपने मन में मैं जो इच्छा धारे बैठा था, वह नाम फल अब मैंने पा लिया है। उस (प्रभु) ने मेरे सारे काम सवार दिए हैं, मेरे मन की माया वाली भूख उसने दूर कर दी है।7।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मै छडिआ सभो धंधड़ा ॥ गोसाई सेवी सचड़ा ॥ नउ निधि नामु निधानु हरि मै पलै बधा छिकि जीउ ॥८॥
मूलम्
मै छडिआ सभो धंधड़ा ॥ गोसाई सेवी सचड़ा ॥ नउ निधि नामु निधानु हरि मै पलै बधा छिकि जीउ ॥८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभो = सारा। धंधड़ा = माया वाली दौड़ भाग। सेवी = मैं स्मरण करता हूँ। सचड़ा = सदा स्थिर रहने वाला। नउ निधि = जगत के नौ ही खजाने। निधान = खजाना। छिकि = कस के, खींच के।8।
अर्थ: (हे भाई! नाम जपने की इनायत से) मैंने दुनिया वाला सारा लालच छोड़ दिया है। मैं सदा स्थिर रहने वाले सृष्टि के मालिक प्रभु को ही स्मरण करता रहता हूँ। (अब) परमात्मा का नाम खजाना ही (मेरे वास्ते) जगत के नौ खजाने हैं, मैंने उस नाम धन को अपने (हृदय के) पल्ले में कस के बांध लिया है।8।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मै सुखी हूं सुखु पाइआ ॥ गुरि अंतरि सबदु वसाइआ ॥ सतिगुरि पुरखि विखालिआ मसतकि धरि कै हथु जीउ ॥९॥
मूलम्
मै सुखी हूं सुखु पाइआ ॥ गुरि अंतरि सबदु वसाइआ ॥ सतिगुरि पुरखि विखालिआ मसतकि धरि कै हथु जीउ ॥९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुखी हूँ सुखु = सुख ही सुख, सबसे श्रेष्ठ सुख। गुरि = गुरु ने। सतिगुरि = सतिगुर ने। पुरखि = पुरख ने। मसतकि = मस्तक पर।9।
अर्थ: गुरु ने मेरे दिल में परमात्मा की महिमा का शब्द बसा दिया है (उसकी इनायत से) मैं (दुनिया के) सारे सुखों से बढ़िया उत्तम आत्मिक सुख ढूँढ लिया है। गुरु पुरख ने सिर पर अपना (मेहर भरा) हाथ रख के मुझे (परमात्मा का) दर्शन करा दिया है।9।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मै बधी सचु धरम साल है ॥ गुरसिखा लहदा भालि कै ॥ पैर धोवा पखा फेरदा तिसु निवि निवि लगा पाइ जीउ ॥१०॥
मूलम्
मै बधी सचु धरम साल है ॥ गुरसिखा लहदा भालि कै ॥ पैर धोवा पखा फेरदा तिसु निवि निवि लगा पाइ जीउ ॥१०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: धरमसाल = धर्म कमाने की जगह। सचु = सदा स्थिर प्रभु का स्मरण। बधी = बनायी है। लहदा = मिलता हूँ। तिसु = उस (गुरसिख) को (जो मुझे मिलता है)। निवि = झुक के।10।
अर्थ: गुरु के सिखों को मैं (यत्न से) ढूँढ के मिलता हूँ। उनकी संगति में बैठना मैंने धर्मशाला बनायी है। जहाँ मैं सदा स्थिर प्रभु को स्मरण करता हूँ। (जो गुरसिख मिल जाए) मैं (जरूरत के मुताबिक) उसके पैर धोता हूं, उसको पंखे से खुद हवा देता हूँ। मैं पूरे अदब से उसकी पैरीं लगता हूँ।10।
[[0074]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सुणि गला गुर पहि आइआ ॥ नामु दानु इसनानु दिड़ाइआ ॥ सभु मुकतु होआ सैसारड़ा नानक सची बेड़ी चाड़ि जीउ ॥११॥
मूलम्
सुणि गला गुर पहि आइआ ॥ नामु दानु इसनानु दिड़ाइआ ॥ सभु मुकतु होआ सैसारड़ा नानक सची बेड़ी चाड़ि जीउ ॥११॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सुणि = सुन के। पहि = पास। दानु = नाम का दान, और लोगों को नाम जपाना। इसनानु = आत्मिक स्नान, पवित्रता। मुकतु = विकारों से आजाद। सैसारड़ा = बिचारा संसार। सची बेड़ी = सदा स्थिर प्रभु के नाम की बेड़ी में। चाढ़ि = चढ़ के।11।
अर्थ: हे नानक! गुरु (जिस जिस को) सदा स्थिर प्रभु के नाम जपने की बेड़ी में बैठाता है वह सारा जगत ही विकारों से बचता जाता है - ये बात सुन के मैं भी गुरु के पास आ गया हूँ, और उसने मेरे हृदय में यह बैठा दिया है किनाम स्मरणा, और लोगों को नाम जपने की ओर प्रेरित करना, पवित्र जीवन बनाना- यही है सही जीवन का राह।11।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभ स्रिसटि सेवे दिनु राति जीउ ॥ दे कंनु सुणहु अरदासि जीउ ॥ ठोकि वजाइ सभ डिठीआ तुसि आपे लइअनु छडाइ जीउ ॥१२॥
मूलम्
सभ स्रिसटि सेवे दिनु राति जीउ ॥ दे कंनु सुणहु अरदासि जीउ ॥ ठोकि वजाइ सभ डिठीआ तुसि आपे लइअनु छडाइ जीउ ॥१२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दे कंनु = कान दे के, पूरे ध्यान से। सुणहु = (हे प्रभु जी!) तुम सनते हो। ठोकि वजाइ = ठनका के, ठोक बजा के, अच्छी तरह परख के। तुसि = प्रसन्न हो के। लइअनु = उस प्रभु ने लिए हैं।12।
अर्थ: (हे प्रभु!) सारी सृष्टि दिन रात तेरी ही सेवा भक्ति करती है। तू (हरेक जीव की) अरदास ध्यान से सुनता है।
(हे भाई!) मैंने सारी दुनिया को अच्छी तरह परख के देख लिया है (जिस जिस को विकारों से छुड़ाया है) प्रभु ने खुद ही छुड़ाया है।12।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हुणि हुकमु होआ मिहरवाण दा ॥ पै कोइ न किसै रञाणदा ॥ सभ सुखाली वुठीआ इहु होआ हलेमी राजु जीउ ॥१३॥
मूलम्
हुणि हुकमु होआ मिहरवाण दा ॥ पै कोइ न किसै रञाणदा ॥ सभ सुखाली वुठीआ इहु होआ हलेमी राजु जीउ ॥१३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पै = जोर डाल के। कोइ = कोई भी कामादिक विकार। रवाणदा = दुखी करता। वुठीआ = वश में पड़ी है। हलेमी राजु = विनम्र स्वभाव का राज।13।
अर्थ: (जिस जिस पर प्रभु की मेहर हुई है वह) सारा संसार (अंतर आत्मे) आत्मिक आनन्द में बस रहा है, (हरेक के अंदर) इस निम्रता का राज हो गया है। मिहरवान प्रभु का अब ऐसा हुक्म वरता है कि कोई भी कामादिक विकार (शरण आए) किसी को भी दुखी नहीं कर सकते।13।
विश्वास-प्रस्तुतिः
झिमि झिमि अम्रितु वरसदा ॥ बोलाइआ बोली खसम दा ॥ बहु माणु कीआ तुधु उपरे तूं आपे पाइहि थाइ जीउ ॥१४॥
मूलम्
झिमि झिमि अम्रितु वरसदा ॥ बोलाइआ बोली खसम दा ॥ बहु माणु कीआ तुधु उपरे तूं आपे पाइहि थाइ जीउ ॥१४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: झिंम झिंम = हल्का हल्का, धीरे-धीरे, आत्मिक अडोलता में। अंम्रितु = आत्मिक जीवन देने वाली नाम वर्षा। बोली = मैं बोलता हूँ। पाइहि = तू पाता है। थाइ = जगह में।14।
अर्थ: हे प्रभु! हे मेरे पति!! मैं भी तेरी ही प्रेरणा से तेरी महिमा के बोल बोल रहा हूँ। आत्मिक अडोलता पैदा करके तेरा नाम-अमृत मेरे अंदर वर्षा कर रहा है। मैं तेरे ऊपर ही मान (गर्व) करता आया हूँ (मुझे निष्चय है कि) तू स्वयं ही (मुझे) स्वीकार कर लेगा।14।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तेरिआ भगता भुख सद तेरीआ ॥ हरि लोचा पूरन मेरीआ ॥ देहु दरसु सुखदातिआ मै गल विचि लैहु मिलाइ जीउ ॥१५॥
मूलम्
तेरिआ भगता भुख सद तेरीआ ॥ हरि लोचा पूरन मेरीआ ॥ देहु दरसु सुखदातिआ मै गल विचि लैहु मिलाइ जीउ ॥१५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पूरन = पूरी कर। लोचा = चाहत, आस।15।
अर्थ: हे प्रभु! तेरी भक्ति करने वाले भाग्यशालियों को सदा तेरे दर्शनों की भूख लगी रहती है। हे हरि! मेरी भी ये तमन्ना पूरी कर। हे सुखों को देने वाले प्रभु! मुझे अपना दर्शन दे, मुझे अपने गले से लगा ले।15।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तुधु जेवडु अवरु न भालिआ ॥ तूं दीप लोअ पइआलिआ ॥ तूं थानि थनंतरि रवि रहिआ नानक भगता सचु अधारु जीउ ॥१६॥
मूलम्
तुधु जेवडु अवरु न भालिआ ॥ तूं दीप लोअ पइआलिआ ॥ तूं थानि थनंतरि रवि रहिआ नानक भगता सचु अधारु जीउ ॥१६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दीप = द्वीपों में, देशों में। लोअ = (चौदह) लोकों में। थानि = जगह में। थनंतरि = थान+अंतर, और जगह में। थानि थनंतरि = हरेक जगह में। सचु = सच, सदा स्थिर प्रभु का नाम। अधारु = आसरा।16।
अर्थ: हे प्रभु! तू सारे देशों में सारे भवनों मेंऔर पातालों में बसता है। तेरे बराबर का कोई और (कहीं भी) नहीं मिलता। हे प्रभु! तू हरेक जगह में व्याप्त है। हे नानक! प्रभु की भक्ति करने वाले लोगों को सदा स्थिर प्रभु का नाम ही (जीवन के लिए) सहारा है।16।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हउ गोसाई दा पहिलवानड़ा ॥ मै गुर मिलि उच दुमालड़ा ॥ सभ होई छिंझ इकठीआ दयु बैठा वेखै आपि जीउ ॥१७॥
मूलम्
हउ गोसाई दा पहिलवानड़ा ॥ मै गुर मिलि उच दुमालड़ा ॥ सभ होई छिंझ इकठीआ दयु बैठा वेखै आपि जीउ ॥१७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हउ = मैं। गोसाई = सृष्टि का मालिक प्रभु। पहिलवानड़ा = छोटा सा पहिलवान। गुर मिलि = गुरु को मिल के। उच दुमालड़ा = ऊँचे दुमाले वाला।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: अखाड़े में जीतने वाले पहिलवान को ‘माली’ मिलती है। वह ‘माली’ व सिरोपा वह अपने सिर पे बांध कर ऊँचा तुरला छोड़ के अखाड़े में चारों तरफ घूमता है ता कि लोग देख लें।
दर्पण-भाषार्थ
छिंझ = कुश्ती देखने आए लोगों की भीड़। दयु = प्यारा प्रभु।17।
अर्थ: मैं मालिक प्रभु का अन्जान सा पहिलवान था। पर, गुरु को मिल के मैं ऊंचे दुमाले वाला (विजयी) बन गया हूँ। जगत अखाड़े में सारे जीव आ इकट्ठे हुए हैं, और (इस अखाड़े को) प्यारा प्रभु स्वयं बैठा देख रहा है।17।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वात वजनि टमक भेरीआ ॥ मल लथे लैदे फेरीआ ॥ निहते पंजि जुआन मै गुर थापी दिती कंडि जीउ ॥१८॥
मूलम्
वात वजनि टमक भेरीआ ॥ मल लथे लैदे फेरीआ ॥ निहते पंजि जुआन मै गुर थापी दिती कंडि जीउ ॥१८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वात = मुंह से बनजे वाले बाजे। टमक = छोटे नगारे। भेरीआ = छोटा नगारा। मल = पहिलवान। निहते = काबू कर लिए। गुरि = गुरु ने। कंडि = पीठ पर।18।
अर्थ: बाजे बज रहे हैं, ढोल बज रहे हैं, नगारे बज रहे हैं (भाव, सारे जीव माया वाली दौड़ भाग कर रहे हैं) पहिलवान आ के एकत्र हुए हैं, (अखाड़े के चारों ओर, जगत अखाड़े में) फेरियां ले रहे हैं। मेरी पीठ पर (मेरे) गुरु ने थापी दी, तो मैं (विरोधी) पंजे (कामादिक) जवान काबू कर लिए।18।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सभ इकठे होइ आइआ ॥ घरि जासनि वाट वटाइआ ॥ गुरमुखि लाहा लै गए मनमुख चले मूलु गवाइ जीउ ॥१९॥
मूलम्
सभ इकठे होइ आइआ ॥ घरि जासनि वाट वटाइआ ॥ गुरमुखि लाहा लै गए मनमुख चले मूलु गवाइ जीउ ॥१९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: इकठे होइ = इकट्ठे हो के, मनुष्य जन्म ले के। घरि = घर में। जासनि = जाएंगे। वाट वटाइआ = रास्ता बदल के, भिन्न-भिन्न जूनियों में पड़ के। लाहा = लाभ, नफा। मूलु = असल पूंजी।19।
अर्थ: सारे (नर-नारी) मनुष्य जन्म ले के आए हैं, पर (यहां अपने-अपने किए कर्मों के मुताबिक) परलोक घर में अलग अलग जूनियों में पड़ के जाएंगे। जो लोग गुरु के बताए राह पर चलते हैं, वे यहां से (हरि नाम का) मुनाफा कमा के जाते हैं। पर अपने मन के पीछे चलने वाले लोग पहिली राशि पूंजी भी गवा जाते हैं (अर्थात, पहिले किए नेक कामों के संस्कार भी बुरे काम करके मिटा लेते हैं)।19।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तूं वरना चिहना बाहरा ॥ हरि दिसहि हाजरु जाहरा ॥ सुणि सुणि तुझै धिआइदे तेरे भगत रते गुणतासु जीउ ॥२०॥
मूलम्
तूं वरना चिहना बाहरा ॥ हरि दिसहि हाजरु जाहरा ॥ सुणि सुणि तुझै धिआइदे तेरे भगत रते गुणतासु जीउ ॥२०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वरन = वर्ण, रंग। चिहन = चिन्ह, निशान। हरि = हे हरि! गुणतासु = गुणों का खजाना प्रभु।20।
अर्थ: हे प्रभु! तेरा ना कोई खास रंग है और ना कोई खास चक्र-चिन्ह है। फिर भी, हे हरि! तू (सारे जगत में) प्रत्यक्ष दिखाई देता है। तेरी भक्ति करने वाले लोग तेरी तारीफ सुन सुन के तुझे स्मरण करते हैं। तू गुणों का खजाना है। तेरे भक्त तेरे प्यार में रंगे रहते हैं।20।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मै जुगि जुगि दयै सेवड़ी ॥ गुरि कटी मिहडी जेवड़ी ॥ हउ बाहुड़ि छिंझ न नचऊ नानक अउसरु लधा भालि जीउ ॥२१॥२॥२९॥
मूलम्
मै जुगि जुगि दयै सेवड़ी ॥ गुरि कटी मिहडी जेवड़ी ॥ हउ बाहुड़ि छिंझ न नचऊ नानक अउसरु लधा भालि जीउ ॥२१॥२॥२९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जुगि जुगि = हरेक युग में, सदा ही। दयै = प्यारे (प्रभु की)। सेवड़ी = सुंदर सेवा। गुरि = गुरु ने। जेवड़ी = रस्सी, फाही। मिहडी = मेरी। बाहुड़ि = फिर दुबारा। न नचऊ = मैं नही नाचूँगा। अउसरु = मौका। भालि = ढूँढ के।21।
अर्थ: हे नानक! (कह) गुरु ने मेरा (माया के मोह का) फंदा काट दिया है, और मैं सदा ही उस प्यारे प्रभु की खूबसूरत सेवा भक्ति करता रहता हूँ। (गुरु की कृपा से) ढूँढ के मैंने (स्मरण) भक्ति का मौका प्राप्त कर लिया है, अब मैं बार-बार इस जगत अखाड़े में भटकता नहीं फिरूँगा।21।2।9।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सिरीरागु महला १ पहरे घरु १ ॥
मूलम्
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सिरीरागु महला १ पहरे घरु १ ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हुकमि पइआ गरभासि ॥ उरध तपु अंतरि करे वणजारिआ मित्रा खसम सेती अरदासि ॥ खसम सेती अरदासि वखाणै उरध धिआनि लिव लागा ॥ ना मरजादु आइआ कलि भीतरि बाहुड़ि जासी नागा ॥ जैसी कलम वुड़ी है मसतकि तैसी जीअड़े पासि ॥ कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै हुकमि पइआ गरभासि ॥१॥
मूलम्
पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हुकमि पइआ गरभासि ॥ उरध तपु अंतरि करे वणजारिआ मित्रा खसम सेती अरदासि ॥ खसम सेती अरदासि वखाणै उरध धिआनि लिव लागा ॥ ना मरजादु आइआ कलि भीतरि बाहुड़ि जासी नागा ॥ जैसी कलम वुड़ी है मसतकि तैसी जीअड़े पासि ॥ कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै हुकमि पइआ गरभासि ॥१॥
दर्पण-टिप्पनी
नोट: पहरे: शीशे, सुरमा, सलाई, चूड़िआं, मुरकियां आदि जनाना श्रृंगार की छोटी छोटी चीजें ले के गाँव गाँव बेचने वाले को वणजारा कहते हैं। अपने नगर शहर से दूर आया हुआ वणजारा रात के चार पहर जिस गाँव रात पड़ी वही गुजारता है। जीव भी बंजारा है। प्रभु दर से दूर यहां संसार में हरि नाम का बणज व्यापार करने आया जीव जिंदगी की चार पहरी रात यहां गुजारता है।
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रेणि = रात, जिंदगी रूप रात। पहिलै पहरै = पहले पहर में। वणजारिआ मित्रा = हरि नाम का व्यापार करने आए हे जीव मित्र! हुकमि = परमात्मा के हुक्म अनुसार। गरभासि = मां के गर्भ में। उरध = उर्ध, उल्टा। अंतरि = (मां के पेट) में। सेती = साथ, आगे। अरदासि वखाणै = अरदास करता है। धिआनि = ध्यान में (जुड़ के)। नामरजादु = ना+मर्याद, मर्यादा के बगैर, नंगा। कलि भीतरि = संसार में (कलि का भाव कलियुग नही है। समय का कोई भी नाम रखा जाए, जीव सदा नंगा ही पैदा होता आया है। जिस समय सतिगुरु नानक देव जी जगत में आए, उस समय का नाम कलियुग प्रसिद्ध था। शब्द ‘कलि’ को साधारण तौर पर ‘संसार’ के अर्थ में इस्तेमाल किया गया है। ये शब्द इसी अर्थ में और भी कई जगह वाणी में बर्ता गया है)। बाहुड़ि = पुनः , दुबारा। जासी = जाएगा। वुड़ी है = चली है। मसतकि = माथे पे। तैसी = वैसी पूंजी, वैसा सौदा।
अर्थ: हरि के नाम का व्यापार करने आए हे जीव मित्र! (जिंदगी की) रात के पहले पहर में परमात्मा के हुक्म अनुसार तूने माँ के पेट में आ के निवास लिया है। हे वणजारे जीव मित्र! माँ के पेट में तु उल्टा लटक के तप करता रहा, पति प्रभु के आगे अरदास करता रहा।
(माँ के पेट में जीव) उल्टा (लटका हुआ) खसम प्रभु के आगे अरदास करता है, (प्रभु के) ध्यान में (जुड़ता है), (प्रभु चरणों में) तवज्जो जोड़ता है। जगत में नंगा आता है, दुबारा (यहां से) नंगा ही चला जाएगा। जीव के माथे पे (परमात्मा के हुक्म अनुसार) जैसी (किए कर्मों के संस्कारों की) कलम चलती है (जगत में आने के समय) जीव के पास वैसी ही (आत्मिक जीवन की राशि पूंजी) होती है।
हे नानक! कह: जीव ने परमात्मा के हुक्म अनुसार (जिंदगी की रात के) पहिले पहर में माँ के पेट में आ के निवास लिया है।1।
[[0075]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा विसरि गइआ धिआनु ॥ हथो हथि नचाईऐ वणजारिआ मित्रा जिउ जसुदा घरि कानु ॥ हथो हथि नचाईऐ प्राणी मात कहै सुतु मेरा ॥ चेति अचेत मूड़ मन मेरे अंति नही कछु तेरा ॥ जिनि रचि रचिआ तिसहि न जाणै मन भीतरि धरि गिआनु ॥ कहु नानक प्राणी दूजै पहरै विसरि गइआ धिआनु ॥२॥
मूलम्
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा विसरि गइआ धिआनु ॥ हथो हथि नचाईऐ वणजारिआ मित्रा जिउ जसुदा घरि कानु ॥ हथो हथि नचाईऐ प्राणी मात कहै सुतु मेरा ॥ चेति अचेत मूड़ मन मेरे अंति नही कछु तेरा ॥ जिनि रचि रचिआ तिसहि न जाणै मन भीतरि धरि गिआनु ॥ कहु नानक प्राणी दूजै पहरै विसरि गइआ धिआनु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हथो हथि = हरेक (संबंधित) के हाथ में। जसुदा घरि = यशोदा के घर में (गोकुल निवासी नंद की पत्नी यशोदा ने श्री कृष्ण जी को पाला था)। कानु = कान्हा, कृष्ण जी। अचेत मूढ़ मन = हे गाफिल मूर्ख मन! चेति = याद रख। अंति = आखिरी समय। जिनि = जिस (परमात्मा) ने। धरि = धर के। गिआनु = जान पहिचान।2।
अर्थ: हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र! (जिंदगी की) रात के दूसरे पहर में (संसार में जनम ले के जीव को परमात्मा के चरणों का वह) ध्यान भूल जाता है (जो उस को माँ के पेट में रहने के समय होता है)। हे बंजारे मित्र! (जन्म ले के जीव घर के) हरेक जीव के हाथ पर (ऐसे) नचाते हैं जैसे यशोधा के घर में श्री कृष्ण जी को। (नव जन्मा) जीव हरेक के हाथ में नचाया जाता है (खिलाया जाता है), माँ कहती है कि ये मेरा पुत्र है। पर, हे मेरे गाफिल मूर्ख मन! याद रख, आखिरी समय में कोई भी चीज तेरी नही बनी रहेगी।
जीव अपने मन में उस प्रभु के साथ गहरी सांझ डाल के उसे याद नहीं करता, जिसने इसकी बंतर (रचना) बना कर इसे पैदा किया है।
हे नानक! कह - (जिंदगी की) रात के दूसरे पहर में (संसार में जन्म ले के) जीव को प्रभु चरणों का ध्यान भूल जाता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा धन जोबन सिउ चितु ॥ हरि का नामु न चेतही वणजारिआ मित्रा बधा छुटहि जितु ॥ हरि का नामु न चेतै प्राणी बिकलु भइआ संगि माइआ ॥ धन सिउ रता जोबनि मता अहिला जनमु गवाइआ ॥ धरम सेती वापारु न कीतो करमु न कीतो मितु ॥ कहु नानक तीजै पहरै प्राणी धन जोबन सिउ चितु ॥३॥
मूलम्
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा धन जोबन सिउ चितु ॥ हरि का नामु न चेतही वणजारिआ मित्रा बधा छुटहि जितु ॥ हरि का नामु न चेतै प्राणी बिकलु भइआ संगि माइआ ॥ धन सिउ रता जोबनि मता अहिला जनमु गवाइआ ॥ धरम सेती वापारु न कीतो करमु न कीतो मितु ॥ कहु नानक तीजै पहरै प्राणी धन जोबन सिउ चितु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: न चेतही = तू नहीं चेतता। बधा = बंधा, (धन जोबन के मोह में) बंधा हुआ। जितु = जिस नाम के द्वारा। बिकुल = व्याकुल, मति हीन। रता = से भीगा, रंगा हुआ। जोबनि = यौवन (के नशे) में। अहिला = आहला, बढ़िया, श्रेष्ठ। करमु = ऊँचा आचरण, श्रेष्ठ कर्म।3।
अर्थ: हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र! (जिंदगी की) रात के तीसरे पहर में तेरा मन धन से तथा जवानी के साथ लग गया है। हे बंजारे मित्र! तू परमात्मा का नाम याद नहीं करता, जिसकी इनायत से तू (धन जोबन के मोह के) बंधनों में से निजात पा सके।
जीव माया (के मोह) में इतना खो जाता है कि ये परमात्मा का नाम याद नहीं रखता। मन के रंग में रंगा जाता है, जवानी (के नशे) में मस्ता जाता है, (और इस तरह) श्रेष्ठ मनुष्य जनम गवा लेता है, ना इसने धर्म (भाव, हरि नाम स्मरण) का व्यापार किया, और ना ही इसने उच्च आत्मिक जीवन को अपना मित्र बनाया।
हे नानक! कह: (जिंदगी की रात के) तीसरे पहर में जीव ने धन से और जवानी से ही चित्त जोड़े रखा।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा लावी आइआ खेतु ॥ जा जमि पकड़ि चलाइआ वणजारिआ मित्रा किसै न मिलिआ भेतु ॥ भेतु चेतु हरि किसै न मिलिओ जा जमि पकड़ि चलाइआ ॥ झूठा रुदनु होआ दुोआलै खिन महि भइआ पराइआ ॥ साई वसतु परापति होई जिसु सिउ लाइआ हेतु ॥ कहु नानक प्राणी चउथै पहरै लावी लुणिआ खेतु ॥४॥१॥
मूलम्
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा लावी आइआ खेतु ॥ जा जमि पकड़ि चलाइआ वणजारिआ मित्रा किसै न मिलिआ भेतु ॥ भेतु चेतु हरि किसै न मिलिओ जा जमि पकड़ि चलाइआ ॥ झूठा रुदनु होआ दुोआलै खिन महि भइआ पराइआ ॥ साई वसतु परापति होई जिसु सिउ लाइआ हेतु ॥ कहु नानक प्राणी चउथै पहरै लावी लुणिआ खेतु ॥४॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लावी = फसल काटने वाला, यमदूत। जमि = जम ने। न मिलिआ भेतु = समझ ना पड़ी। चेतु = चित्त, इरादा। जा = जब। दुोआले = चारों ओर। हेतु = हित, प्यार। लुणिआ = काटा।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘‘दुोआले’ के अक्षर ‘द’ में दो मात्राएं ‘ु’ व ‘ो’ लगीं हैं।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हरि नाम का व्यापार करने आए हे जीव मित्र! (जिंदगी की) रात के चौथे पहर (भाव, बुढ़ापा आ जाने पर) (शरीर) खेत को काटने वाला (यम) आ पहुँचा। हे बंजारे मित्र! जब जम ने (आ के जीवात्मा को) पकड़ के आगे लगा लिया तो किसी (संबंधी) को भी ये समझ ना पड़ी कि ये क्या हो गया। परमात्मा के इस हुक्म और भेद की किसी को भी समझ ना पड़ सकी। जब यम ने (जीवात्मा को) पकड़ कर आगे लगा लिया, तो (उसके मृतक शरीर के) के चारों तरफ व्यर्थ का रोना-धोना शुरू हो गया। (वह जिसको सारे ही संबंधी ‘मेरा मेरा’ कहा करते थे) एक छिन में ही वह पराया हो गया। जिससे (सारी उम्र) मोह किए रखा (और उसके अनुसार जो जो कर्म किए, अंत के समय) वह की कमाई सामने आ गई (प्राप्त हो गई)।
हे नानक! कह: (जिंदगी की रात के) चौथे पहर (भाव, बुढ़ापा आ जाने पर फसल) काटने वाले (यमदूतों) ने (शरीर) खेत को आ काटा।4।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला १ ॥ पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बालक बुधि अचेतु ॥ खीरु पीऐ खेलाईऐ वणजारिआ मित्रा मात पिता सुत हेतु ॥ मात पिता सुत नेहु घनेरा माइआ मोहु सबाई ॥ संजोगी आइआ किरतु कमाइआ करणी कार कराई ॥ राम नाम बिनु मुकति न होई बूडी दूजै हेति ॥ कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै छूटहिगा हरि चेति ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला १ ॥ पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बालक बुधि अचेतु ॥ खीरु पीऐ खेलाईऐ वणजारिआ मित्रा मात पिता सुत हेतु ॥ मात पिता सुत नेहु घनेरा माइआ मोहु सबाई ॥ संजोगी आइआ किरतु कमाइआ करणी कार कराई ॥ राम नाम बिनु मुकति न होई बूडी दूजै हेति ॥ कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै छूटहिगा हरि चेति ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बालक बुधि = बालक जितनी बुद्धि रखने वाला जीव। अचेतु = बेपरवाह। खीर = दुध। सुत हेतु = पुत्र का प्यार। घनेरा = बहुत। सबाई = सारी सृष्टि को। संजोगी = किए कर्मों के संयोग अनुसार। हेति = मोह में। चेति = चेत के, स्मरण करके।1।
अर्थ: हरि नाम का वणज करने आए जीव मित्र! (जिंदगी की) रात के पहले पहर में (जीव) बालकों की अक्ल वाला (अंजान) होता है। (नाम स्मरण से) बे-परवाह रहता है। हे वणजारे मित्र! (बाल उम्र में जीव माँ का) दूध पीता है और खेलों में ही मस्त रहता है, (उस उम्र में) माता पिता का (अपने) पुत्र से (बड़ा) प्यार होता है। माँ-बाप का पुत्र से बहुत प्यार होता है। माया का (ये) मोह सारी सृष्टि को (ही व्याप रहा है)। (जीव ने पिछले जन्मों में) कर्मों का जो संग्रह कमाया, उनके संजोग अनुसार (जगत में) जन्मा, (और यहां आ के पुनः उनके अनुसार) कर्म करता है, कार कमाता है।
दुनिया माया के मोह में डूब रही है, परमात्मा का नाम स्मरण के बिना (इस मोह में से) खलासी नहीं हो सकती।
हे नाक! कह: हे जीव! (जिंदगी की रात के) पहिले पहर में (तू बेपरवाह है), परमात्मा का स्मरण कर (नाम जपने की मदद से ही तू माया के मोह से) बचेगा।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा भरि जोबनि मै मति ॥ अहिनिसि कामि विआपिआ वणजारिआ मित्रा अंधुले नामु न चिति ॥ राम नामु घट अंतरि नाही होरि जाणै रस कस मीठे ॥ गिआनु धिआनु गुण संजमु नाही जनमि मरहुगे झूठे ॥ तीरथ वरत सुचि संजमु नाही करमु धरमु नही पूजा ॥ नानक भाइ भगति निसतारा दुबिधा विआपै दूजा ॥२॥
मूलम्
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा भरि जोबनि मै मति ॥ अहिनिसि कामि विआपिआ वणजारिआ मित्रा अंधुले नामु न चिति ॥ राम नामु घट अंतरि नाही होरि जाणै रस कस मीठे ॥ गिआनु धिआनु गुण संजमु नाही जनमि मरहुगे झूठे ॥ तीरथ वरत सुचि संजमु नाही करमु धरमु नही पूजा ॥ नानक भाइ भगति निसतारा दुबिधा विआपै दूजा ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भरि जोबनि = भरी जवानी में। मै = मय, शराब। अहि = दिन। निसि = रात। चिति = चित्त में। घट अंतरि = हृदय में। जनमि मरहुगे = पैदा हो के मरोगे, जन्म मरण के चक्कर में पड़ जाओगे। भाइ = प्रेम से।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘होरि’ है ‘होर’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हरि नाम का वणज करने आए जीव मित्र! (जिंदगी की) रात के दूसरे पहर में भर-जवानी के कारण जीव की मति (अक्ल ऐसे हो जाती है जैसे) शराब (में मस्त है)। हे वणजारे मित्र! (जीव) दिन रात काम-वासना में दबा रहता है, (काम में) अंधे हुए को परमात्मा का नाम चित्त में (टिकाने की तवज्जो) नहीं (होती)। परमात्मा का नाम जीव के हृदय में नहीं बसता, (नाम के बिना) और मीठे कसेले अनेक रसों के स्वाद पहचानता है।
हे झूठे (मोह में फंसे जीव)! तूने परमात्मा के साथ जान पहिचान नहीं डाली, प्रभु चरणों में तेरी तवज्जो नहीं, परमात्मा के गुण याद नहीं किए (इसका नतीजा ये होगा कि) तू जनम मरण के चक्कर में पड़ जाएगा।
(उच्च आत्मिक जीवन बनाने वाले सेवा-स्मरण के काम करने तो दूर रहे, कामुकता में मदहोश हुआ जीव) तीर्थ, व्रत, सुचि, संजम, पूजा आदिक कर्मकांड के धर्म भी नहीं करता। (वैसे) हे नानक! परमात्मा के प्रेम के द्वारा प्रभु की भक्ति के द्वारा ही (इस काम-वासना से) बचाव हो सकता है, (भक्ति-नाम जपने की ओर से) दुचित्तापन रखने से (कामादिक की शक्ल में) माया का मोह ही जोर डालता है।2।
[[0076]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा सरि हंस उलथड़े आइ ॥ जोबनु घटै जरूआ जिणै वणजारिआ मित्रा आव घटै दिनु जाइ ॥ अंति कालि पछुतासी अंधुले जा जमि पकड़ि चलाइआ ॥ सभु किछु अपुना करि करि राखिआ खिन महि भइआ पराइआ ॥ बुधि विसरजी गई सिआणप करि अवगण पछुताइ ॥ कहु नानक प्राणी तीजै पहरै प्रभु चेतहु लिव लाइ ॥३॥
मूलम्
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा सरि हंस उलथड़े आइ ॥ जोबनु घटै जरूआ जिणै वणजारिआ मित्रा आव घटै दिनु जाइ ॥ अंति कालि पछुतासी अंधुले जा जमि पकड़ि चलाइआ ॥ सभु किछु अपुना करि करि राखिआ खिन महि भइआ पराइआ ॥ बुधि विसरजी गई सिआणप करि अवगण पछुताइ ॥ कहु नानक प्राणी तीजै पहरै प्रभु चेतहु लिव लाइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सरि = शरीर पर। उलथड़े आइ = आ टिके हैं। जरुआ = बुढ़ापा। जिणै = जीत रहा है। आंव = उम्र। जमि = जम ने। विसरजी = दूर हो गई।3।
अर्थ: हरि नाम का वणज करने वाले हे जीव मित्र! (जिंदगी की) रात के तीसरे पहर सर पर हंस आ उतरते हैं (सिर पर सफेद बाल आ जाते हैं)। हे बंजारे मित्र! (ज्यों ज्यों) जवानी घटती है बुढ़ापा (शारीरिक ताकत को) जीतता जाता है। (उम्र का) एक-एक दिन गुजरता है उम्र घटती जाती है।
हे माया के मोह में अंधे हुए जीव! जब यम ने पकड़ के तुझे आगे लगा लिया, तब आखिरी वक्त पर तू पछताएगा। तू हरेक चीज को अपनी बना बना के संभालता गया, वह सब कुछ एक छिन में पराया माल हो जाएगा।
(माया के मोह में फंस के जीव की) अक्ल मारी जाती है, बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, बुरे काम कर कर के (आखिर अंत समय) पछताता है।
हे नानक! कह: हे जीव! (जिंदगी की रात के) तीसरे पहर (सिर पर सफेद बाल आ गए हैं, अब तो प्रभु चरणों में) तवज्जो जोड़ के स्मरण कर।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बिरधि भइआ तनु खीणु ॥ अखी अंधु न दीसई वणजारिआ मित्रा कंनी सुणै न वैण ॥ अखी अंधु जीभ रसु नाही रहे पराकउ ताणा ॥ गुण अंतरि नाही किउ सुखु पावै मनमुख आवण जाणा ॥ खड़ु पकी कुड़ि भजै बिनसै आइ चलै किआ माणु ॥ कहु नानक प्राणी चउथै पहरै गुरमुखि सबदु पछाणु ॥४॥
मूलम्
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बिरधि भइआ तनु खीणु ॥ अखी अंधु न दीसई वणजारिआ मित्रा कंनी सुणै न वैण ॥ अखी अंधु जीभ रसु नाही रहे पराकउ ताणा ॥ गुण अंतरि नाही किउ सुखु पावै मनमुख आवण जाणा ॥ खड़ु पकी कुड़ि भजै बिनसै आइ चलै किआ माणु ॥ कहु नानक प्राणी चउथै पहरै गुरमुखि सबदु पछाणु ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बिरधि = वृद्ध, बूढ़ा। खीणु = क्षीण,कमजोर। अंधु = अंधकार, अंधापन। वैण = वचन,बोल। रस = स्वाद। पराकउ = पराक्रम, बल। ताण = ताकत। अंतरि = (दिल) में। खड़ = (गेहूँ आदि की) नाड़। कुड़ि = कुड़क के (टूट जाना)।4।
अर्थ: हरि नाम का व्यापार करने आए हे जीव मित्र! (जिंदगी की) रात के चौथे पहर (जीव) बुड्ढा हो जाता है, (उसका) शरीर कमजोर हो जाता है। हे वणजारे मित्र! आँखों के आगे अंधेरा आ जाता है, (आंखों से ठीक) दिखाई नहीं देता, कानों से बोल (ठीक तरह) नहीं सुनाई देते। आँखों से अंधा हो जाता है, जीभ में स्वाद (की ताकत) नहीं रहती। उद्यम और ताकत कमजोर हो जाते हैं। अपने हृदय में कभी परमात्मा के गुण नहीं बसाए, अब सुख कहां मिले? मन के मुरीद को जनम मरण का चक्कर पड़ जाता है। (जैसे) पके हुए गेहूँ का नाड़ कुड़क के टूट जाता है (वैसे ही बुढ़ापा आने पर शरीर) नाश हो जाता है, (जीव जगत में) आ के (आखिर यहां से) चल पड़ता है (इस शरीर का) माण करना व्यर्थ है।
हे नानक! कह:हे प्राणी! (जिंदगी की रात के) चौथे पहर (तू बूढ़ा हो गया है, अब) गुरु के शब्द को पहिचान (गुरु-शब्द से गहरी सांझ डाल)।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ओड़कु आइआ तिन साहिआ वणजारिआ मित्रा जरु जरवाणा कंनि ॥ इक रती गुण न समाणिआ वणजारिआ मित्रा अवगण खड़सनि बंनि ॥ गुण संजमि जावै चोट न खावै ना तिसु जमणु मरणा ॥ कालु जालु जमु जोहि न साकै भाइ भगति भै तरणा ॥ पति सेती जावै सहजि समावै सगले दूख मिटावै ॥ कहु नानक प्राणी गुरमुखि छूटै साचे ते पति पावै ॥५॥२॥
मूलम्
ओड़कु आइआ तिन साहिआ वणजारिआ मित्रा जरु जरवाणा कंनि ॥ इक रती गुण न समाणिआ वणजारिआ मित्रा अवगण खड़सनि बंनि ॥ गुण संजमि जावै चोट न खावै ना तिसु जमणु मरणा ॥ कालु जालु जमु जोहि न साकै भाइ भगति भै तरणा ॥ पति सेती जावै सहजि समावै सगले दूख मिटावै ॥ कहु नानक प्राणी गुरमुखि छूटै साचे ते पति पावै ॥५॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ओड़क = आखिरी समय। तिन साहिआ = उन स्वासों का। जर = बुढ़ापा। जरवाण = बली। कंनि = कंधे पर। बंनि = बांध के, इकट्ठे करके। जोहि न साकै = देख नहीं सकता। पति सेती = इज्जत से। सहजि = सहज में, अडोल अवस्था में। साचे ते = सदा स्थिर प्रभु (के दर) से। पति = इज्जत।5।
अर्थ: हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र! (जीव को उम्र के जितने श्वास मिले हैं, आखिर) उन श्वासों का अंत आ गया, बलवान बुढ़ापा कांधे पर (नाचने लग पड़ा)। हे वणजारे मित्र! जिसके हृदय में रत्ती भर भी गुण ना टिके, उस को (उसके अपने ही किए हुए) औगुण बांध के ले चलते हैं।
जो जीव (यहां से आत्मिक) गुणों के संजम (की सहायता) से जाता है, वह (यमराज की) चोट नहीं सहता, उसे जनम मरण का चक्कर नहीं व्यापता। यम का जाल मौत का डर उसकी ओर कोई देख भी नहीं सकता। परमात्मा के प्रेम की इनायत से परमात्मा की भक्ति से वह (संसार समुंदर के सारे) डरों से पार लांघ जाता है। वह यहां से इज्जत से जाता है, सदा अडोल अवस्था में टिका रहता है, वह अपने सारे दुख-कष्ट दूर कर लेता है।
हे नानक! कह: जो जीव गुरु की शरण पड़ता है वह (संसार समुंदर के सारे डरों से) बच जाता है, वह सदा स्थिर प्रभु के दर से आदर प्राप्त करता है।5।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ४ ॥ पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हरि पाइआ उदर मंझारि ॥ हरि धिआवै हरि उचरै वणजारिआ मित्रा हरि हरि नामु समारि ॥ हरि हरि नामु जपे आराधे विचि अगनी हरि जपि जीविआ ॥ बाहरि जनमु भइआ मुखि लागा सरसे पिता मात थीविआ ॥ जिस की वसतु तिसु चेतहु प्राणी करि हिरदै गुरमुखि बीचारि ॥ कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै हरि जपीऐ किरपा धारि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ४ ॥ पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हरि पाइआ उदर मंझारि ॥ हरि धिआवै हरि उचरै वणजारिआ मित्रा हरि हरि नामु समारि ॥ हरि हरि नामु जपे आराधे विचि अगनी हरि जपि जीविआ ॥ बाहरि जनमु भइआ मुखि लागा सरसे पिता मात थीविआ ॥ जिस की वसतु तिसु चेतहु प्राणी करि हिरदै गुरमुखि बीचारि ॥ कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै हरि जपीऐ किरपा धारि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रैणि = रात, जिंदगी रूप रात। पहिले पहरै = पहले पहर में। वणजारिआ मित्रा = हरि नाम का व्यापार करने आए हे जीव मित्र! उदर मंझारि = (माँ के) पेट में। समारि = संभालता है। अगनी = माँ के पेट की आग। जपि = जप के। जीविआ = जीता रहूँ। मुखि लागा = (माता पिता के) मुंह लगा, माता पिता को बताया। सरसे = स+रस, प्रसंन्न। थीविआ = होए। जिस की वसतु = जिस (परमात्मा) की दी हुई चीज (ये बालक)। करि बीचारि = विचार करके। किरपा धारि = (यदि) कृपा धारे।1।
अर्थ: हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र! (जिंदगी की रात के) पहले पहर में परमात्मा (जीव को) माँ के पेट में निवास देता है। (माँ के पेट में जीव), हे वणजारे मित्र! परमात्मा का ध्यान धरता है, परमात्मा का नाम उचारता है, और परमातमा के नाम को हृदय में बसाए रखता है। (माँ के पेट में जीव) परमात्मा का नाम जपता है आराधता है, हरि नाम जप के आग में जीता रहता है। (माँ के पेट में से) बाहर (आ के) जनम लेता है (माता-पिता के) मुंह लगता है, माता-पिता खुश होते हैं।
हे प्राणियों! जिस परमात्मा का भेजा हुआ ये बालक पैदा हुआ है, उसका ध्यान धरो, गुरु के द्वारा अपने हृदय में (उसके गुणों का) विचार करो।
हे नानक! कह: हे प्राणी! यदि परमात्मा मेहर करे तो (जिंदगी की रात के) पहिले पहर में परमात्मा का नाम जपा जा सकता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा मनु लागा दूजै भाइ ॥ मेरा मेरा करि पालीऐ वणजारिआ मित्रा ले मात पिता गलि लाइ ॥ लावै मात पिता सदा गल सेती मनि जाणै खटि खवाए ॥ जो देवै तिसै न जाणै मूड़ा दिते नो लपटाए ॥ कोई गुरमुखि होवै सु करै वीचारु हरि धिआवै मनि लिव लाइ ॥ कहु नानक दूजै पहरै प्राणी तिसु कालु न कबहूं खाइ ॥२॥
मूलम्
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा मनु लागा दूजै भाइ ॥ मेरा मेरा करि पालीऐ वणजारिआ मित्रा ले मात पिता गलि लाइ ॥ लावै मात पिता सदा गल सेती मनि जाणै खटि खवाए ॥ जो देवै तिसै न जाणै मूड़ा दिते नो लपटाए ॥ कोई गुरमुखि होवै सु करै वीचारु हरि धिआवै मनि लिव लाइ ॥ कहु नानक दूजै पहरै प्राणी तिसु कालु न कबहूं खाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दूजै भाइ = परमात्मा के बिना किसी ओर के प्यार में। करि = कर के, कह कह के। पालीऐ = पाला जाता है। गलि = गले में, गले से। ले = ले के। सेती = साथ। मनि = मन में। खटि = कमा के। मूढ़ा = मूर्ख जीव। दिते नो लपटाए = परमात्मा की दी हुई दात को चिपकता है, प्रभु की दी हुई दात केसाथ मोह करता है। लिव लाइ = तवज्जो/ध्यान जोड़ के। कालु = मौत, मौत का डर, आत्मिक मौत।2।
अर्थ: हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र! (जिंदगी की रात के) दूसरे पहर में (जीव का) मन (परमात्मा को भुला के) और प्यार में लग जाता है। हे वणजारे मित्र! (ये) मेरा (पुत्र है, ये) मेरा (पुत्र है, ये) कह कह के (बालक) पाला जाता है। माँ पकड़ के गले से लगाती है, पिता पकड़ के गले से लगाता है। माँ बार बार गले से लगाती है, पिता बार बार गले से लगाता है। माँ अपने मन में समझती है, पिता अपने मन में समझता है कि (हमें) कमा के खिलाएगा। मूर्ख (मनुष्य) उस परमात्मा को नहीं पहचानता (नहीं याद करता) जो (धन पुत्र आदि) देता है, परमात्मा के दिए हुए (धन पुत्र आदिक) से मोह करता है।
जो कोई (भाग्यशाली मनुष्य) गुरु की शरण पड़ता है वह (इस असलियत की) विचार करता है, और तवज्जो जोड़ के अपने मन में परमात्मा का ध्यान धरता है।
हे नानक! कह: (जिंदगी की रात के) दूसरे पहर में (जो) प्राणी (परमात्मा का ध्यान धरता है, उसको) आत्मिक मौत कभी भी नहीं खाती।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा मनु लगा आलि जंजालि ॥ धनु चितवै धनु संचवै वणजारिआ मित्रा हरि नामा हरि न समालि ॥ हरि नामा हरि हरि कदे न समालै जि होवै अंति सखाई ॥ इहु धनु स्मपै माइआ झूठी अंति छोडि चलिआ पछुताई ॥ जिस नो किरपा करे गुरु मेले सो हरि हरि नामु समालि ॥ कहु नानक तीजै पहरै प्राणी से जाइ मिले हरि नालि ॥३॥
मूलम्
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा मनु लगा आलि जंजालि ॥ धनु चितवै धनु संचवै वणजारिआ मित्रा हरि नामा हरि न समालि ॥ हरि नामा हरि हरि कदे न समालै जि होवै अंति सखाई ॥ इहु धनु स्मपै माइआ झूठी अंति छोडि चलिआ पछुताई ॥ जिस नो किरपा करे गुरु मेले सो हरि हरि नामु समालि ॥ कहु नानक तीजै पहरै प्राणी से जाइ मिले हरि नालि ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आलि = आलय, घर में, घर (के मोह) में। जंजालि = जंजाल में, दुनिया के झमेले में। चितवै = चितवता है। संचवै = एकत्र करता है। न समालि = नही याद करता। जि = जो। अंति = आखिर में। सखाई = सहाई, मित्र। संपै = धन पदार्थ। झूठी = झूठे संबंधों वाली, साथ ना निभाने वाली। समालि = समालै, संभालता है। सो = वह लोग।3।
अर्थ: हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र! (जिंदगी की रात के) तीसरे पहर में (मनुष्य का) मन घर के मोह में लग जाता है, दुनिया के धंधों के मोह में फंस जाता है। मनुष्य धन (ही) चितवता है, धन (ही) इकट्ठा करता है, और परमात्मा का नाम कभी भी हृदय में नहीं बसाता। (मोह में फंस के मनुष्य) कभी भी परमात्मा का वह नाम अपने दिल में नहीं बसाता जो आखिरी समय में साथी बनता है। ये धन पदार्थ ये माया सदा साथ निभाने वाले नहीं हैं, और समय आने पर पछताता हुआ इनको छोड़ के जाता है।
जिस मनुष्य पर परमात्मा मिहर करता है उसे गुरु मिलता है, और वह सदा परमात्मा का नाम हृदय में संभालता है। हे नानक! कह: जो प्राणी हरि का नाम संभालते हैं, वह परमात्मा में जा मिलते हैं।3।
[[0077]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हरि चलण वेला आदी ॥ करि सेवहु पूरा सतिगुरू वणजारिआ मित्रा सभ चली रैणि विहादी ॥ हरि सेवहु खिनु खिनु ढिल मूलि न करिहु जितु असथिरु जुगु जुगु होवहु ॥ हरि सेती सद माणहु रलीआ जनम मरण दुख खोवहु ॥ गुर सतिगुर सुआमी भेदु न जाणहु जितु मिलि हरि भगति सुखांदी ॥ कहु नानक प्राणी चउथै पहरै सफलिओु रैणि भगता दी ॥४॥१॥३॥
मूलम्
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा हरि चलण वेला आदी ॥ करि सेवहु पूरा सतिगुरू वणजारिआ मित्रा सभ चली रैणि विहादी ॥ हरि सेवहु खिनु खिनु ढिल मूलि न करिहु जितु असथिरु जुगु जुगु होवहु ॥ हरि सेती सद माणहु रलीआ जनम मरण दुख खोवहु ॥ गुर सतिगुर सुआमी भेदु न जाणहु जितु मिलि हरि भगति सुखांदी ॥ कहु नानक प्राणी चउथै पहरै सफलिओु रैणि भगता दी ॥४॥१॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आदी = आंदी, ले आता है। करि पूरा = पूरा जान के, अमोध जान के। सेवहु = शरण पड़ो। रैणि = रात, उम्र। चली विहादी = गुजरती जा रही है।
खिनु खिनु = हरेक छिन, शवास-श्वास। सेवहु = स्मरण करो। मूलि = बिल्कुल ही। जितु = जिस (उद्यम) से। असथिरु = अटल, अटल आत्मिक जीवन वाले। रलीआ = आत्मिक आनंद। जनम मरण दुख = जनम मरन के चक्कर में पड़ने का दुख। भेदु = फर्क। जितु = जिस (गुरु) में। मिलि = मिल के, जुड़ के। सुखांदी = प्यारी लगती है।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘सफलिओु’ में ‘उ’ के साथ मात्रा ‘ु’ और ‘ो’ है। असल शब्द है ‘सफलिओ’ जिसे ‘सफलिउ’ पढ़ना है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र! (जिंदगी की रात के) चौथे पहर परमात्मा (जीव के यहां से) चलने का समय (ही) आता है। हे वणजारे जीव मित्र! गुरु को अमोध जान के गुरु की शरण पड़ो, (जिंदगी की) सारी रात बीतती जा रही है। (हे जीव मित्र!) स्वास-स्वास परमात्मा का नाम स्मरण करो, (इस काम में) बिल्कुल आलस ना करो, नाम जपने की इनायत से ही सदा के लिए अटल आत्मिक जीवन वाले बन सकोगे। (हे जीव मित्र! नाम जपने की इनायत से ही) परमात्मा के मिलाप का आनंद प्राप्त कर सकोगे और जनम मरण के चक्कर में पड़ने वाले दुखों को खत्म कर सकोगे।
(हे जीव मित्र!) गुरु और परमात्मा के बीच रत्ती भर भी फर्क ना समझो गुरु (के चरणों) में जुड़ के ही परमात्मा की भक्ति प्यारी लगती है।
हे नानक! कह: जो प्राणी (जिंदगी की रात के) चौथे पहर में भी (परमात्मा की भक्ति करते रहते हैं उन) भक्तों की (जिंदगी की सारी) रात कामयाब रहती है।4।1।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ ॥ पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा धरि पाइता उदरै माहि ॥ दसी मासी मानसु कीआ वणजारिआ मित्रा करि मुहलति करम कमाहि ॥ मुहलति करि दीनी करम कमाणे जैसा लिखतु धुरि पाइआ ॥ मात पिता भाई सुत बनिता तिन भीतरि प्रभू संजोइआ ॥ करम सुकरम कराए आपे इसु जंतै वसि किछु नाहि ॥ कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै धरि पाइता उदरै माहि ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ ॥ पहिलै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा धरि पाइता उदरै माहि ॥ दसी मासी मानसु कीआ वणजारिआ मित्रा करि मुहलति करम कमाहि ॥ मुहलति करि दीनी करम कमाणे जैसा लिखतु धुरि पाइआ ॥ मात पिता भाई सुत बनिता तिन भीतरि प्रभू संजोइआ ॥ करम सुकरम कराए आपे इसु जंतै वसि किछु नाहि ॥ कहु नानक प्राणी पहिलै पहरै धरि पाइता उदरै माहि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: धरि = धरे, धरता है। पाइता = पैंतड़ा। उदरै माहि = माँ के पेट में। मासी = महीनों बाद। मानसु = मनुष्य (का बच्चा)। करि = करे, करता है। मुहलति = (उम्र रूप) समय। कमाहि = कमाते हैं। लिखतु = पीछे लिखे कर्मों के संस्कारों का लेख। धुरि = धुर से। सुत = पुत्र। बनिता = स्त्री। तिन भीतरि = उन (पुत्र स्त्री आदिक संबंधियों) में। संजोइआ = मिला दिया, परचा दिया। सुकरम = अच्छे कर्म। वसि = वस में।1।
अर्थ: हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र! (मानव जिंदगी की) रात के पहले पहर परमात्मा माँ के पेट में (जीव का) पैंतड़ा रखता है। हे वणजारे मित्र! (फिर) दसों महीनों में प्रभु मनुष्य (का साबत बुत) बना देता है। (जीवों को जिंदगी का) निश्चित समय देता है। (जिसमें जीव अच्छे-बुरे कर्म) कमाते हैं। परमात्मा जीव के लिए जिंदगी का समय निश्चित कर देता है। पीछे किए कर्मों के संस्कारों के अनुसार प्रभु जीव के माथे पे धुर से जैसा लेख लिख देता है, वैसे ही कर्म जीव कमाते हैं। माता पिता भाई पुत्र स्त्री (आदिक) इन संबंधियों में प्रभु जीव को रचा मचा देता है।
इस जीव के इख्तियार में कुछ नहीं, परमात्मा स्वयं ही इससे अच्छे बुरे कर्म कराता है। हे नानक! कह: (जिंदगी की रात के) पहले पहर परमात्मा प्राणी का पैंतड़ा माँ के पेट में रख देता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा भरि जुआनी लहरी देइ ॥ बुरा भला न पछाणई वणजारिआ मित्रा मनु मता अहमेइ ॥ बुरा भला न पछाणै प्राणी आगै पंथु करारा ॥ पूरा सतिगुरु कबहूं न सेविआ सिरि ठाढे जम जंदारा ॥ धरम राइ जब पकरसि बवरे तब किआ जबाबु करेइ ॥ कहु नानक दूजै पहरै प्राणी भरि जोबनु लहरी देइ ॥२॥
मूलम्
दूजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा भरि जुआनी लहरी देइ ॥ बुरा भला न पछाणई वणजारिआ मित्रा मनु मता अहमेइ ॥ बुरा भला न पछाणै प्राणी आगै पंथु करारा ॥ पूरा सतिगुरु कबहूं न सेविआ सिरि ठाढे जम जंदारा ॥ धरम राइ जब पकरसि बवरे तब किआ जबाबु करेइ ॥ कहु नानक दूजै पहरै प्राणी भरि जोबनु लहरी देइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भरि जुआनी = भरी जवानी, पूरे जोश में पहुँची हुई जवानी। लहरी = लहरें,उछाले। देइ = देती है। मता = मस्त, मतवाला। अहंमेइ = अहं+एव, मैं ही, मैं ही, अहंकार में। आगै = परलोक में पंथु = रास्ता। करारा = करड़ा, सख्त, मुश्किल। सिरि = सिर पर। ठाढे = खड़े हुए। जंदारा = जालम, चंडाल। पकरसि = पकड़ेगा। बवरे = पागल जीव को। करेइ = करता है।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘लहरी’ है ‘लहिर’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: अर्थ- हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र! (जिंदगी की) रात के दूसरे पहर शिखर पर पहुँची हुई जवानी (जीव के अंदर) उछाले मारती है। हे वणजारे मित्र! तब जीव का मन अहंकार (गुरूर) में मद्मस्त रहता है, और वह अच्छे-बुरे काम में तमीज नही करता। (जवानी के नशे में) प्राणी ये नही पहचानता, कि जो कुछ मैं कर रहा हूँ अच्छा है या बुरा (विकारों में पड़ जाता है, और) परलोक में रास्ता मुश्किल बना लेता है। (अहंकार में मस्त मनुष्य) पूरे गुरु की शरण नही पड़ता, (इस वास्ते उस के) सिर पर जालिम यम आ खड़े हुए हैं।
(जवानी के नशे में मनुष्य कभी नही सोचता कि अहंकार में) झल्ले हो चुके को जब धर्मराज आ पकड़ेगा, तब (अपनी गलत करतूतों के बारे में) वह क्या जवाब देगा? हे नानक! कह: (जिंदगी की) रात के दूसरे पहर शिखर पे पहुँचा हुआ जोबन (मनुष्य के अंदर) उछाले मारता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बिखु संचै अंधु अगिआनु ॥ पुत्रि कलत्रि मोहि लपटिआ वणजारिआ मित्रा अंतरि लहरि लोभानु ॥ अंतरि लहरि लोभानु परानी सो प्रभु चिति न आवै ॥ साधसंगति सिउ संगु न कीआ बहु जोनी दुखु पावै ॥ सिरजनहारु विसारिआ सुआमी इक निमख न लगो धिआनु ॥ कहु नानक प्राणी तीजै पहरै बिखु संचे अंधु अगिआनु ॥३॥
मूलम्
तीजै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा बिखु संचै अंधु अगिआनु ॥ पुत्रि कलत्रि मोहि लपटिआ वणजारिआ मित्रा अंतरि लहरि लोभानु ॥ अंतरि लहरि लोभानु परानी सो प्रभु चिति न आवै ॥ साधसंगति सिउ संगु न कीआ बहु जोनी दुखु पावै ॥ सिरजनहारु विसारिआ सुआमी इक निमख न लगो धिआनु ॥ कहु नानक प्राणी तीजै पहरै बिखु संचे अंधु अगिआनु ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बिखु = (आत्मिक मौत देने वाला) जहर, माया। संचे = इकट्ठे करता है, संचय करता है। अंधु = अंध मनुष्य। अगिआनु = ज्ञानहीन मनुष्य। पुत्रि = पुत्र (के मोह) में। कलत्रि = कलत्र अर्थात स्त्री के मोह में (कलत्र = स्त्री। देखें: ‘गुरबाणी व्याकरण’)। लोभानु = लोभवान, लोभी। चिति = चिक्त में। संगु = साथ। निमख = आँख झपकने जितना समय।3।
अर्थ: हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र! (जिंदगी के) रात के तीसरे पहर माया के मोह में अंधा हुआ व ज्ञानहीन मनुष्य (आत्मिक जीवन को खत्म कर देनें वाला धन रूपी) जहर एकत्र करता रहता है। हे वणजारे मित्र! तब मनुष्य माया का लोभी हो जाता है।
इसके अंदर (लोभ की) लहरें उठती हैं, मनुष्य पुत्र (के मोह) में, स्त्री (के मोह) में, (माया के) मोह में फंसा रहता है। प्राणी के अंदर (लोभ की) लहरें उठती हैं, मनुष्य लोभी हुआ रहता है, वह परमात्मा कभी इसके चिक्त में नहीं आता। मनुष्य तब साधु-संगत से मेल मिलाप नहीं रखता, (आखिर) कई जूनियों में (भटकता) दुख बर्दाश्त करता है।
मनुष्य अपने निर्माता मालिक को भुला देता है, आँख झपकने के जितना समय भी परमात्मा में तवज्जो नही जोड़ता। हे नानक! कह: (जिंदगी की) रात के तीसरे पहर अंधा ज्ञान हीन मनुष्य (आत्मिक मौत ले आने धन-रूप) जहर (ही) एकत्र करता रहता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा दिनु नेड़ै आइआ सोइ ॥ गुरमुखि नामु समालि तूं वणजारिआ मित्रा तेरा दरगह बेली होइ ॥ गुरमुखि नामु समालि पराणी अंते होइ सखाई ॥ इहु मोहु माइआ तेरै संगि न चालै झूठी प्रीति लगाई ॥ सगली रैणि गुदरी अंधिआरी सेवि सतिगुरु चानणु होइ ॥ कहु नानक प्राणी चउथै पहरै दिनु नेड़ै आइआ सोइ ॥४॥
मूलम्
चउथै पहरै रैणि कै वणजारिआ मित्रा दिनु नेड़ै आइआ सोइ ॥ गुरमुखि नामु समालि तूं वणजारिआ मित्रा तेरा दरगह बेली होइ ॥ गुरमुखि नामु समालि पराणी अंते होइ सखाई ॥ इहु मोहु माइआ तेरै संगि न चालै झूठी प्रीति लगाई ॥ सगली रैणि गुदरी अंधिआरी सेवि सतिगुरु चानणु होइ ॥ कहु नानक प्राणी चउथै पहरै दिनु नेड़ै आइआ सोइ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सोइ = वह। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ के। बेली = मददगार। अंते = आखिरी समय। सखाई = मित्र। संगि = साथ। झूठी = पूरी ना निभने वाली। सगली = सारी। रैणि = (जिंदगी की) रात। गुदरी = गुजरी (जैसे कादी = काजी, कागद = कागज)। अंधिआरी = माया के मोह के अंधेरे वाली।4।
अर्थ: हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र! (जिंदगी की रात) के चौथे पहर वह दिन नजदीक आ जाता है, (जब यहां से कूच करना होता है)। हे वणजारे मित्र! प्रभु का नाम हृदय में बसा, नाम ही प्रभु की दरगाह में तेरा मददगार बनेगा।
हे प्राणी! गुरु की शरण पड़ के परमात्मा का नाम अपने दिल में बसाए रख, नाम ही आखिरी समय साथी बनता है। माया का यह मोह (जिसमें तू फंसा पड़ा है) तेरे साथ नहीं जा सकता, तूने इससे झूठा प्यार डाला हुआ है। (हे भाई!) जिंदगी की सारी रात माया के अंधेरे में बीतती जा रही है। गुरु की शरण पड़ (ता कि तेरे अंदर परमात्मा के नाम का) प्रकाश हो जाऐ। हे नानक! कह: (जिंदगी की) रात के चौथै पहर वह दिन नजदीक आ जाता है (जब यहां से कूच करना होता है)।4।
[[0078]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
लिखिआ आइआ गोविंद का वणजारिआ मित्रा उठि चले कमाणा साथि ॥ इक रती बिलम न देवनी वणजारिआ मित्रा ओनी तकड़े पाए हाथ ॥ लिखिआ आइआ पकड़ि चलाइआ मनमुख सदा दुहेले ॥ जिनी पूरा सतिगुरु सेविआ से दरगह सदा सुहेले ॥ करम धरती सरीरु जुग अंतरि जो बोवै सो खाति ॥ कहु नानक भगत सोहहि दरवारे मनमुख सदा भवाति ॥५॥१॥४॥
मूलम्
लिखिआ आइआ गोविंद का वणजारिआ मित्रा उठि चले कमाणा साथि ॥ इक रती बिलम न देवनी वणजारिआ मित्रा ओनी तकड़े पाए हाथ ॥ लिखिआ आइआ पकड़ि चलाइआ मनमुख सदा दुहेले ॥ जिनी पूरा सतिगुरु सेविआ से दरगह सदा सुहेले ॥ करम धरती सरीरु जुग अंतरि जो बोवै सो खाति ॥ कहु नानक भगत सोहहि दरवारे मनमुख सदा भवाति ॥५॥१॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: उठि = उठ के। कमाण = कमाए हुए कर्मों के संस्कार, आत्मिक जीवन की अच्छी बुरी कमाई। बिलम = देर। देवनी = देते। ओनी = उन (यमों) ने। मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य। दुहेले = दुखी। सुहेले = सुखी। करम धरती = कर्म कमाने के लिए धरती। जुग अंतरि = युग में, जगत में, मनुष्य जीवन में (यहां ‘जुग’ शब्द किसी खास सतिजुग कलिजुग वास्ते नहीं बरता गया है)। खाति = खाता है। सोहहि = शोभते हैं। दरवारे = प्रभु के दरबार में। भवाति = जनम मरण में डाले जाते हैं।5।
अर्थ: हरि नाम का वणज करने आए हे जीव मित्र! जब परमात्मा द्वारा (मौत का) लिखा हुआ (परवाना) आता है, तब (यहां) कमाए हुए (अच्छे बुरे कर्मों के संस्कार जीवात्मा के) साथ चल पड़ते हैं। उस समय यमों ने पक्के हाथ डाले होते हैं, हे वणजारे मित्र! वे रक्ती मात्र भी समय की टाल मटोल की इजाजत नहीं देते।
जब कर्तार द्वारा (मौत का) लिखा हुआ हुक्म आता है (वह यम जीव को) पकड़ के आगे लगा लेते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (फिर) सदा दुखी रहते हैं। जिन्होंने पूरे गुरु का आसरा लिए रखा, वे परमात्मा की दरगाह में सदा सुखी रहते हैं।
(हे वणजारे मित्र!) मनुष्य जीवन में (मनुष्य का) शरीर कर्म कमाने के लिए धरती (के समान) है, (जिस में) जैसा (कोई) बीजता है वही खाता है। हे नानक! कह:परमात्मा की भक्ति करने वाले बंदे परमात्मा के दर पर शोभा पाते हैं, अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य सदा जनम मरण के चक्कर में पड़े रहते हैं।5।1।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ४ घरु २ छंत ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
सिरीरागु महला ४ घरु २ छंत ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
मुंध इआणी पेईअड़ै किउ करि हरि दरसनु पिखै ॥ हरि हरि अपनी किरपा करे गुरमुखि साहुरड़ै कम सिखै ॥ साहुरड़ै कम सिखै गुरमुखि हरि हरि सदा धिआए ॥ सहीआ विचि फिरै सुहेली हरि दरगह बाह लुडाए ॥ लेखा धरम राइ की बाकी जपि हरि हरि नामु किरखै ॥ मुंध इआणी पेईअड़ै गुरमुखि हरि दरसनु दिखै ॥१॥
मूलम्
मुंध इआणी पेईअड़ै किउ करि हरि दरसनु पिखै ॥ हरि हरि अपनी किरपा करे गुरमुखि साहुरड़ै कम सिखै ॥ साहुरड़ै कम सिखै गुरमुखि हरि हरि सदा धिआए ॥ सहीआ विचि फिरै सुहेली हरि दरगह बाह लुडाए ॥ लेखा धरम राइ की बाकी जपि हरि हरि नामु किरखै ॥ मुंध इआणी पेईअड़ै गुरमुखि हरि दरसनु दिखै ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुंध = मुग्धा, जवान स्त्री। पेइअड़ै = पेके घर में, इस लोक में। किउकरि = कैसे? पिखै = देखे। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ के। साहुरड़ै कम = सहुरे घर के काम, वह काम जिनके करने से पति को मिल सके। सहीआ = सहेलियां, सतसंगी। सुहेली = आसान। बाह लुडाए = बाँह हुलारती है, बेफिक्र हो के घूमती है। जपि = जप के। किरखै = खींच लेती है, खत्म कर लेती है। दिखै = देखे, देखती है।1।
अर्थ: अगर जीव-स्त्री पेके घर में (इस मनुष्य जन्म में) अंञाण ही टिकी रहे, तो वह पति प्रभु का दर्शन कैसे कर सकती है? (दर्शन नही कर सकती)। जब परमात्मा अपनी मिहर करता है, तो (जीव-स्त्री) गुरु के सन्मुख हो के प्रभु पति के चरणों में पहुँचने वाले काम (करने) सीखती है। गुरु की शरण पड़ कर (जीव-स्त्री) वह काम सीखती है, जिनकी सहायता से पति प्रभु की हजूरी में पहुँच सके (वे काम ये हैं कि जीव-स्त्री) सदा परमात्मा का नाम सिमरती है, सहेलियों में (सत्संगियों में रह के इस लोक में) आराम से चलती फिरती है (आरामदायक जीवन व्यतीत करती है, और) परमात्मा की हजूरी में बे-फिक्र हो के पहुँचती है। वह जीव-स्त्री परमात्मा का नाम सदा जप के धर्मराज का लेखा, धर्मराज के लेखे की बाकी, खत्म कर लेती है। भोली जीव-स्त्री पेके घर में (इस मनुष्य जन्म में) गुरु की शरण पड़ के परमात्मा पति का दर्शन कर लेती है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
वीआहु होआ मेरे बाबुला गुरमुखे हरि पाइआ ॥ अगिआनु अंधेरा कटिआ गुर गिआनु प्रचंडु बलाइआ ॥ बलिआ गुर गिआनु अंधेरा बिनसिआ हरि रतनु पदारथु लाधा ॥ हउमै रोगु गइआ दुखु लाथा आपु आपै गुरमति खाधा ॥ अकाल मूरति वरु पाइआ अबिनासी ना कदे मरै न जाइआ ॥ वीआहु होआ मेरे बाबोला गुरमुखे हरि पाइआ ॥२॥
मूलम्
वीआहु होआ मेरे बाबुला गुरमुखे हरि पाइआ ॥ अगिआनु अंधेरा कटिआ गुर गिआनु प्रचंडु बलाइआ ॥ बलिआ गुर गिआनु अंधेरा बिनसिआ हरि रतनु पदारथु लाधा ॥ हउमै रोगु गइआ दुखु लाथा आपु आपै गुरमति खाधा ॥ अकाल मूरति वरु पाइआ अबिनासी ना कदे मरै न जाइआ ॥ वीआहु होआ मेरे बाबोला गुरमुखे हरि पाइआ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मेरे बाबुला, मेरे बाबोला = हे मेरे पिता। वीआहु = पति प्रभु का मिलाप। गुरमुखे = गुरु की ओर मुंह करके, गुरु की शरण पड़ के। अगिआनु = बे समझी। गुर गिआनु = गुरु से मिली हुई परमात्मा से गहरी सांझ। प्रचंडु = तेज। बलाइआ = जलाया। बिनसिआ = नाश हो गया। लाधा = मिल गया। आपु = स्वै भाव। आपै = स्वै के ज्ञान से। गुरमति = गुरु की मति ले के। वरु = खसम। जाइआ = पैदा हुआ।2।
अर्थ: हे मेरे पिता! (प्रभु पति के साथ) मेरा ब्याह हो गया है, गुरु की शरण पड़ के मुझे प्रभु पति मिल गया है। गुरु का बख्शा हुआ ज्ञान (रूपी सूरज इतना) तेज जग मग कर उठा है कि (मेरे अंदर से) बे-समझी का अंधकार दूर हो गया है। गुरु का दिया ज्ञान (मेरे अंदर) चमक पड़ा है (माया मोह का) अंधेरा दूर हो गया है (उस प्रकाश की इनायत से मुझे) परमात्मा का नाम (-रूप) कीमती रत्न मिल गया है। गुरु की मति पे चलने से मेरा अहंकार का रोग दूर हो गया है, अहम् का दुख खत्म हो गया है, स्वै के ज्ञान से स्वै भाव खत्म हो गया है।
(गुरु की शरण पड़ने से) मुझे वह पति मिल गया है, जिसकी हस्ती को कभी काल छू नही सकता, जो नाश-रहित है, जो ना कभी मरता है ना पैदा होता है। हे मेरे पिता! गुरु की शरण पड़ के मेरा (परमात्मा पति के साथ) विवाह हो गया है, मुझे परमात्मा मिल गया है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि सति सते मेरे बाबुला हरि जन मिलि जंञ सुहंदी ॥ पेवकड़ै हरि जपि सुहेली विचि साहुरड़ै खरी सोहंदी ॥ साहुरड़ै विचि खरी सोहंदी जिनि पेवकड़ै नामु समालिआ ॥ सभु सफलिओ जनमु तिना दा गुरमुखि जिना मनु जिणि पासा ढालिआ ॥ हरि संत जना मिलि कारजु सोहिआ वरु पाइआ पुरखु अनंदी ॥ हरि सति सति मेरे बाबोला हरि जन मिलि जंञ सुोहंदी ॥३॥
मूलम्
हरि सति सते मेरे बाबुला हरि जन मिलि जंञ सुहंदी ॥ पेवकड़ै हरि जपि सुहेली विचि साहुरड़ै खरी सोहंदी ॥ साहुरड़ै विचि खरी सोहंदी जिनि पेवकड़ै नामु समालिआ ॥ सभु सफलिओ जनमु तिना दा गुरमुखि जिना मनु जिणि पासा ढालिआ ॥ हरि संत जना मिलि कारजु सोहिआ वरु पाइआ पुरखु अनंदी ॥ हरि सति सति मेरे बाबोला हरि जन मिलि जंञ सुोहंदी ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सति सते = सतय सत्य, सदा कायम रहने वाला। हरि जन = परमात्मा के सेवक, सत्संगी। मिलि = मिल के, इकट्ठे हो के। सुहंदी = सुंदर लगती है। जपि = जप के। साहुरड़ै = सहुरे घर, परमात्मा की हजूरी में। सोहंदी, सुहंदी = शोभती है। जिनि = जिस (जीव-स्त्री) ने। समालिआ = संभाला है, (हृदय में) संभाला है। सभु = सारा। सफलिओ = कामयाब। जिणि = जीत के, वश में करके। पासा ढालिआ = नरदें फेंकी हैं, जिंदगी रूपी चौपड़ की बाजी खेली है। कारजु = विवाह का काम, प्रभु पति के साथ मिलाप का उद्यम। सोहिआ = सुंदर हो गया है, अच्छी तरह सिरे चढ़ा है। पुरखु = सर्व व्यापक प्रभु। अनंदी = आनंद का श्रोत।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘सुोहंदी’ में अक्षर ‘स’ पे दो मात्राएं, ‘ु’ व ‘ो’ हैं। असल शब्द सोहंदी है। यहां ‘सुहंदी’ पढ़ना है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे मेरे पिता! प्रभु पति सदा कायम रहने वाला है, सदा कायम रहने वाला है, (उस पति के साथ मिलाप कराने के लिए) उस प्रभु के भक्त जन मिल के (मानो) सुंदर बारात बनते हैं। (जीव स्त्रीयां इन सत्संगियों में रह के) पेके घर में (इस मनुष्य जनम में) परमात्मा का नाम जप के सुखी जीवन व्यतीत करती हैं, और परलोक में भी बहुत शोभा पाती हैं। (ये यकीन जानों कि) जिस जीव-स्त्री ने पेके घर में परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसाया है, वह परलोक में (जरूर) शोभा कमाती है।
गुरु की शरण पड़ के उन जीव स्त्रीयों का जीवन कामयाब हो जाता है, जिन्होंने अपना मन जीत के (वश में ला के) चौपड़-रूप ये जीवन खेल खेली है।
परमात्मा का भजन करने वाले गुरमुखों के साथ मिल के परमात्मा पति के साथ मधुर मिलाप हो जाता है, वह सर्व-व्यापक और आनन्द का श्रोत पति प्रभु मिल जाता है। हे मेरे पिता! प्रभु पति सदा कायम रहने वाला है, सदा कायम रहने वाला है, (उस पति से मिलाप कराने के लिए) उस प्रभु के भक्त जन मिल के (जैसे) सोहणी बारात बनते हैं।3।
[[0079]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि प्रभु मेरे बाबुला हरि देवहु दानु मै दाजो ॥ हरि कपड़ो हरि सोभा देवहु जितु सवरै मेरा काजो ॥ हरि हरि भगती काजु सुहेला गुरि सतिगुरि दानु दिवाइआ ॥ खंडि वरभंडि हरि सोभा होई इहु दानु न रलै रलाइआ ॥ होरि मनमुख दाजु जि रखि दिखालहि सु कूड़ु अहंकारु कचु पाजो ॥ हरि प्रभ मेरे बाबुला हरि देवहु दानु मै दाजो ॥४॥
मूलम्
हरि प्रभु मेरे बाबुला हरि देवहु दानु मै दाजो ॥ हरि कपड़ो हरि सोभा देवहु जितु सवरै मेरा काजो ॥ हरि हरि भगती काजु सुहेला गुरि सतिगुरि दानु दिवाइआ ॥ खंडि वरभंडि हरि सोभा होई इहु दानु न रलै रलाइआ ॥ होरि मनमुख दाजु जि रखि दिखालहि सु कूड़ु अहंकारु कचु पाजो ॥ हरि प्रभ मेरे बाबुला हरि देवहु दानु मै दाजो ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हरि प्रभ दानु = हरि प्रभु के नाम का दान। मै = मुझे। दाजो = दहेज। कपड़ो सोभा = (दहेज में दिया हुआ कीमती) कपड़ा व धन। जितु = जिस (दहेज) से। सवरै = संवर जाए, सुंदर लगने लगे। काजो = काज, विवाह का काम। सुहेला = सुखदाई। गुरि = गुरु ने। सतिगुरि = सतिगुरु ने। खंडि = खंड में, देश में, धरती पर। वरभंडि = ब्रहमंड में, संसार में। हरि सोभा = हरि नाम के दहेज की शोभा। न रलै रलाइआ = कोई और दहेज इसकी बराबरी नहीं कर सकता। होरि = और लोग। मनमुख = अपने मन के पीछे चलने वाले। जि = जो। रखि = रख के। कूड़ = झूठा। कचु = (काँच जैसा) खोटा। पाजो = पाज, दिखावा।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘होरि’ है ‘होर’ बहुवचन है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: हे मेरे पिता! (मैं तूझसे दहेज मांगती हूँ) मुझे हरि प्रभु के नाम का दान दे, मुझे यही दहेज दे। मुझे हरि का नाम ही (दहेज के) कपड़े दे, मुझे हरि का नाम ही (दहेज के गहने आदिक) धन दे, इसी दहेज से मेरा (प्रभु पति के साथ) विवाह सुंदर लगने लग पड़े।
परमात्मा की भक्ति के साथ ही (परमात्मा से) विवाह का उद्यम सुखदाई बनता है। (जिस जीव कन्या को) गुरु ने सतिगुरु ने ये दान (ये दहेज) दिलाया है, हरि नाम के दहेज से उसकी शोभा (उस के) देश में संसार में हो जाती है। यह दहेज ऐसा है कि इससे और कोई बराबरी नहीं कर सकता। अपने मन के पीछे चलने वाले और लोग जो दहेज रख के दिखाते हैं (दिखावा करते हैं) वह झूठा अहंकार (पैदा करने वाले) हैं वह काँच (के समान कच्चे) हैं, वो (निरा) दिखावा ही है।
हे मेरे पिता! मुझे हरि प्रभु का नाम दान दे, मुझे यही दहेज दे।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि राम राम मेरे बाबोला पिर मिलि धन वेल वधंदी ॥ हरि जुगह जुगो जुग जुगह जुगो सद पीड़ी गुरू चलंदी ॥ जुगि जुगि पीड़ी चलै सतिगुर की जिनी गुरमुखि नामु धिआइआ ॥ हरि पुरखु न कब ही बिनसै जावै नित देवै चड़ै सवाइआ ॥ नानक संत संत हरि एको जपि हरि हरि नामु सोहंदी ॥ हरि राम राम मेरे बाबुला पिर मिलि धन वेल वधंदी ॥५॥१॥
मूलम्
हरि राम राम मेरे बाबोला पिर मिलि धन वेल वधंदी ॥ हरि जुगह जुगो जुग जुगह जुगो सद पीड़ी गुरू चलंदी ॥ जुगि जुगि पीड़ी चलै सतिगुर की जिनी गुरमुखि नामु धिआइआ ॥ हरि पुरखु न कब ही बिनसै जावै नित देवै चड़ै सवाइआ ॥ नानक संत संत हरि एको जपि हरि हरि नामु सोहंदी ॥ हरि राम राम मेरे बाबुला पिर मिलि धन वेल वधंदी ॥५॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हरि राम राम पिर मिलि = हरि मिलि, राम मिलि, पिर मिलि, परमात्मा पति को मिल के। धन = जीव-स्त्री। धन वेल = जीव-स्त्री की पीढ़ी, प्रभु पति को मिली हुई जीव-स्त्री की पीढ़ी। जुगह जुगो = हरेक युग में। जुग जुगह जुगो = हरेक युग में, सदा ही। सद = सदा। पीढ़ी गुरू = गुरु की पीढ़ी। चलंदी = चल पड़ती है। जुगि जुगि = हरेक युग में। जिनी = जो (मनुष्यों) ने। गुरमुखि = गुरु की शरण पड़ के। जावै = नाश होता है। चढ़ै सवाइआ = और-और बढ़ता है। संत हरि = संतों का हरि। जपि = जप के। सोहंदी = (पीढ़ी) शोभती है।5।
अर्थ: हे मेरे पिता! हरि पति के साथ राम पति के साथ मिल के जीव-स्त्री की पीढ़ी चल पड़ती है। अनेक युगों से सदा से ही गुरु की प्रभु पति की, पीढ़ी चली आती है। हरेक युग में सतिगुरु की पीढ़ी (नादी संतान) चल पड़ती है। जिन्होंने गुरु को मिल के परमात्मा का नाम स्मरण किया है (वे गुरु की पीढ़ी हैं, वे गुरु की नादी संतान हैं)। परमात्मा ऐसा पति है, जो कभी भी नाश नहीं होता, जो कभी भी नहीं मरता। वह सदा दातें बख्शता है, उसकी दात सदा बढ़ती ही रहती है।
हे नानक! भक्त जन और भगतों का (प्यारा) प्रभु एक रूप है। परमात्मा का नाम जप जप के जीव स्त्री सुंदर जीवन वाली बन जाती है।
हे मेरे पिता! हरि पति के साथ राम पति के साथ मिल के जीव-स्त्री की पीढ़ी चल पड़ती है (भाव, उसकी संगति में रह कर और अनेक जीव नाम जपने की राह पे पड़ जाते हैं)।5।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ५ छंत ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
सिरीरागु महला ५ छंत ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन पिआरिआ जीउ मित्रा गोबिंद नामु समाले ॥ मन पिआरिआ जी मित्रा हरि निबहै तेरै नाले ॥ संगि सहाई हरि नामु धिआई बिरथा कोइ न जाए ॥ मन चिंदे सेई फल पावहि चरण कमल चितु लाए ॥ जलि थलि पूरि रहिआ बनवारी घटि घटि नदरि निहाले ॥ नानकु सिख देइ मन प्रीतम साधसंगि भ्रमु जाले ॥१॥
मूलम्
मन पिआरिआ जीउ मित्रा गोबिंद नामु समाले ॥ मन पिआरिआ जी मित्रा हरि निबहै तेरै नाले ॥ संगि सहाई हरि नामु धिआई बिरथा कोइ न जाए ॥ मन चिंदे सेई फल पावहि चरण कमल चितु लाए ॥ जलि थलि पूरि रहिआ बनवारी घटि घटि नदरि निहाले ॥ नानकु सिख देइ मन प्रीतम साधसंगि भ्रमु जाले ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मन = हे मन! समाले = संभाल, (अपने अंदर) संभाल रख। निबहै = आखिर तक साथ निभाएगा। नाले = साथ। धिआई = (हे मन!) तू स्मरण कर, तू ध्यान कर। बिरथा = वृथा, खाली। मन चिंदे फल = मन इच्छित फल। लाए = लगाए। बनवारी = जगत का मालिक। घटि घटि = हरेक घट में। निहाले = देखता है। सिख = शिक्षा। देइ = देता है। जाले = जला दे।1।
अर्थ: हे (मेरे) प्यारे मन! हे (मेरे) मित्र मन!! परमात्मा का नाम (अपने अंदर) संभाल के रख। हे प्यारे मन! हे मित्र मन!! ये हरि नाम (सदा) तेरे साथ निभेगा। (हे मन!) परमात्मा का नाम स्मरण कर, (यही तेरे) साथ (रहेगा। जो भी मनुष्य यही हरि नाम स्मरण करता है) वह दुनिया से खाली (हाथ) नहीं जाता। (हे भाई!) परमात्मा के सुंदर चरणों में चिक्त जोड़, तू सारे मन इच्छित फल प्राप्त कर लेगा।
(हे मेरे मन!) जगत का मालिक प्रभु जल में धरती में हर जगह मौजूद है। वह हरेक शरीर में (व्यापक हो के मिहर की) निगाह से (हरेक को) देखता है। हे प्यारे मन! नानक (तुझे) शिक्षा देता है, साधु-संगत में रह के अपनी भटकना का नाश कर।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन पिआरिआ जी मित्रा हरि बिनु झूठु पसारे ॥ मन पिआरिआ जीउ मित्रा बिखु सागरु संसारे ॥ चरण कमल करि बोहिथु करते सहसा दूखु न बिआपै ॥ गुरु पूरा भेटै वडभागी आठ पहर प्रभु जापै ॥ आदि जुगादी सेवक सुआमी भगता नामु अधारे ॥ नानकु सिख देइ मन प्रीतम बिनु हरि झूठ पसारे ॥२॥
मूलम्
मन पिआरिआ जी मित्रा हरि बिनु झूठु पसारे ॥ मन पिआरिआ जीउ मित्रा बिखु सागरु संसारे ॥ चरण कमल करि बोहिथु करते सहसा दूखु न बिआपै ॥ गुरु पूरा भेटै वडभागी आठ पहर प्रभु जापै ॥ आदि जुगादी सेवक सुआमी भगता नामु अधारे ॥ नानकु सिख देइ मन प्रीतम बिनु हरि झूठ पसारे ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: झूठु = आखिर तक साथ ना निभाने वाला। पसारे = पसारा। बिखु = जहर। सागरु = समुंदर। करि = बना। बोहिथ = जहाज। करते चरण कमल = कर्तार के चरण कमलों को। सहसा = सहम। न बिआपै = जोर नही डाल सकता। भेटै = मिलता है। वडभागी = बड़े भाग्यों वाले। जापै = प्रतीत होता है। आदि = शुरू से ही। जुगादि = जुगों के आरम्भ से। सेवक स्वामी = सेवकों के मालिक। आधारे = आधरा, आसरा। झूठ पसारे = साथ ना निभने वाले पसारे।2।
अर्थ: हे मेरे प्यारे मन! परमात्मा के बिना (और कोई सदा साथ निभाने वाला नहीं है), ये सारा जगत पसारा सदा साथ निभाने वाला नहीं। हे मेरे प्यारे मन! ये संसार (एक) समुंदर (है, जो) जहर (से भरा हुआ) है। (हे मन!) कर्तार के सुंदर चरणों को जहाज बना (इसकी इनायत से) कोई सहम कोई दुख अपना जोर नहीं डाल सकता। (पर जीव के वश की बात नहीं) जिस भाग्यशाली को पूरा गुरु मिलता है, वह प्रभु को आठों पहर स्मरण करता है।
आदि से ही, युगों के आरम्भ से ही, (परमात्मा अपने) सेवकों का रक्षक (चला आ रहा) है, (परमात्मा के) भगतों के लिए परमात्मा का नाम (सदा ही) जिंदगी का सहारा है। हे प्यारे मन! नानक (तुझे) शिक्षा देता है: परमात्मा के नाम के बिना बाकी सारे जगत खिलारे आखिर तक साथ निभाने वाले नहीं हैं।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि लदे खेप सवली ॥ मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि दरु निहचलु मली ॥ हरि दरु सेवे अलख अभेवे निहचलु आसणु पाइआ ॥ तह जनम न मरणु न आवण जाणा संसा दूखु मिटाइआ ॥ चित्र गुपत का कागदु फारिआ जमदूता कछू न चली ॥ नानकु सिख देइ मन प्रीतम हरि लदे खेप सवली ॥३॥
मूलम्
मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि लदे खेप सवली ॥ मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि दरु निहचलु मली ॥ हरि दरु सेवे अलख अभेवे निहचलु आसणु पाइआ ॥ तह जनम न मरणु न आवण जाणा संसा दूखु मिटाइआ ॥ चित्र गुपत का कागदु फारिआ जमदूता कछू न चली ॥ नानकु सिख देइ मन प्रीतम हरि लदे खेप सवली ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लदे = लादना। खेप = सौदा। सवली = सफली, नफा देने वाली। निहचलु = अटल, कभी ना हिलने वाली। मली = मल, कब्जा। सेवे = सेवता है, संभालता है। अलख = अदृष्ट। अभेव = जिसका भेद ना पाया जा सके। तह = वहाँ, उस निहचल आसन पर (पहुँच के)। संसा = सहम। चित्र गुपत = धर्मराज के दोनों मुंशी माने गए हैं (शब्द ‘चित्र गुप्त’ का भाव है ‘गुप्त चित्र’ अर्थात छुपे हुए चित्र, वह चित्र जो मनुष्य की नजरों से गुप्त रहते हैं। चित्र = किए कर्मों के संस्कार। मनुष्य जो कर्म करता है उनके संस्कार उनके मन में बनते जाते हैं। शरीर त्यागने से संस्कार-मयी मन जीवात्मा के साथ जाता है।) कागतु = कागज, लेखा। कछू न चली = कोई पेश नही जाती। चली = चलती। नानकु देइ = नानक देता है।3।
अर्थ: हे प्यारे मन! हे मित्र! परमात्मा के नाम का सौदा कर, ये सौदा नफा देने वाला है। हे प्यारे मन! हे मित्र मन! परमात्मा के दरवाजे पर डटा रह, यही दरवाजा अटल है। जो मनुष्य परमात्मा के दर पर कब्जा करके रखता है, जो अदृष्ट है और जिसका भेद नहीं पाया जा सकता, वह मनुष्य ऐसा (आत्मिक) ठिकाना हासिल कर लेता है जो कभी डोलता नहीं। उस आत्मिक ठिकाने पर पहुँच के जनम मरन के चक्कर खत्म हो जाते हैं, मनुष्य हरेक किस्म के सहम व दुख मिटा लेता है। (उस आत्मिक ठिकाने पे पहुँचा मनुष्य धर्मराज के बनाये हुए) चित्र गुप्त का लेखा फाड़ देता है (भाव, कोई गलत कर्म करता ही नहीं जिसे चित्र गुप्त लिख सकें), यमदूतों का भी कोई जोर उस पर नहीं चलता।
(इस वास्ते) हे प्यारे मन! नानक (तुझे) शिक्षा देता है कि परमात्मा के नाम का सौदा कर, यही सौदा नफे वाला है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन पिआरिआ जीउ मित्रा करि संता संगि निवासो ॥ मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि नामु जपत परगासो ॥ सिमरि सुआमी सुखह गामी इछ सगली पुंनीआ ॥ पुरबे कमाए स्रीरंग पाए हरि मिले चिरी विछुंनिआ ॥ अंतरि बाहरि सरबति रविआ मनि उपजिआ बिसुआसो ॥ नानकु सिख देइ मन प्रीतम करि संता संगि निवासो ॥४॥
मूलम्
मन पिआरिआ जीउ मित्रा करि संता संगि निवासो ॥ मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि नामु जपत परगासो ॥ सिमरि सुआमी सुखह गामी इछ सगली पुंनीआ ॥ पुरबे कमाए स्रीरंग पाए हरि मिले चिरी विछुंनिआ ॥ अंतरि बाहरि सरबति रविआ मनि उपजिआ बिसुआसो ॥ नानकु सिख देइ मन प्रीतम करि संता संगि निवासो ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: संता संगि = संतों की संगति में। निवासो = निवास (कर)। जपत = जपने से। परगासो = आत्मिक प्रकाश। सिमरि = स्मरण करके। सुखहगामी = सुख+गामिन्, सुख देने वाला। सगली = सारी। पुंनीआ = पूरी हो जाती हैं। पूरबे कमाए = पहले जन्म में नेक कमाई अनुसार। श्री रंग = (श्री = लक्ष्मी) लक्ष्मी का पति, परमात्मा। सरबति = सर्वत्र, हर जगह। मनि = मन में। बिसुवासो = विश्वाश, श्रद्धा, यकीन।4।
अर्थ: हे प्यारे मन! हे मित्र मन!! गुरमुखों की संगति में उठना बैठना बना। हे प्यारे मन! हे मित्र मन!! (गुरमुखों की संगति में) परमात्मा का नाम जपने से अंदर आत्मिक प्रकाश हो जाता है। सुख पहुँचाने वाले मालिक प्रभु को स्मरण करने से सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं, पहिले जन्म में की नेक कमाई के संस्कारों के अनुसार चिरों से विछुड़ा लक्ष्मी पति प्रभु (फिर) मिल पड़ता है। (हे भाई गुरमुखों की संगति करने से) मन में एक निश्चय बन जाता है कि परमात्मा (जीवों के) अंदर बाहर हर जगह व्यापक है।
हे प्रीतम मन! नानक (तुझे) शिक्षा देता है गुरमुखों की संगति में टिका कर।4।
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विश्वास-प्रस्तुतिः
मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि प्रेम भगति मनु लीना ॥ मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि जल मिलि जीवे मीना ॥ हरि पी आघाने अम्रित बाने स्रब सुखा मन वुठे ॥ स्रीधर पाए मंगल गाए इछ पुंनी सतिगुर तुठे ॥ लड़ि लीने लाए नउ निधि पाए नाउ सरबसु ठाकुरि दीना ॥ नानक सिख संत समझाई हरि प्रेम भगति मनु लीना ॥५॥१॥२॥
मूलम्
मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि प्रेम भगति मनु लीना ॥ मन पिआरिआ जीउ मित्रा हरि जल मिलि जीवे मीना ॥ हरि पी आघाने अम्रित बाने स्रब सुखा मन वुठे ॥ स्रीधर पाए मंगल गाए इछ पुंनी सतिगुर तुठे ॥ लड़ि लीने लाए नउ निधि पाए नाउ सरबसु ठाकुरि दीना ॥ नानक सिख संत समझाई हरि प्रेम भगति मनु लीना ॥५॥१॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लीना = मस्त। जल मिलि = जल को मिल के। मीना = मछली। पी = पी के। आघाने = पेट भर जाना, तृप्ति होना। अंम्रित = अमृत, आत्मिक जीवन देने वाली। बाने = वाणी। स्रब = सरब, सारे। मनि = मन में। वुठे = आ बसते हैं। स्रीधर = श्रीधर, लक्ष्मी का आसरा, परमात्मा। मंगल = खुशी के गीत, आत्मिक आनंद देने वाले गीत, महिमा। सतिगुर तुठे = जब गुरु प्रसन्न होता है। लड़ि = लड़ से, पल्ले से, दामन से। नउ निधि = नौ ही खजाने, दुनिया का सारा ही धन पदार्थ। सरबसु = (सर्वस्व, सर्व = सारा+स्व = धन), सारा ही धन। ठाकुरि = ठाकुर ने। सिख = शिक्षा। संत = संतों ने।5।
अर्थ: हे (मेरे) प्यारे मन! हे (मेरे) मित्र मन!! (जिस मनुष्य का) मन परमात्मा की प्रेमा भक्ति में मस्त रहता है, हे प्यारे मित्र मन! वह मनुष्य परमात्मा को मिल के (ऐसे) आत्मिक जीवन हासिल करता है (जैसे) मछली पानी को मिल के जीती है।
सतिगुरु की प्रसन्नता का पात्र बन के जो मनुष्य परमात्मा की महिमा की आत्मिक जीवन देने वाली वाणी (-रूप) पाणी पी के (माया की प्यास से) तृप्त हो जाता है, उसके मन में सारे सुख आ बसते हैं, वह मनुष्य लक्ष्मी पति प्रभु का मेल हासिल कर लेता है, प्रभु के महिमा के गीत गाता है, उसकी सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं।
हे नानक! जिस मनुष्य को संत जनों ने (परमात्मा के स्मरण की) शिक्षा समझा दी है, उसका मन परमात्मा की प्रेमा भक्ति में लीन रहता है, उसे ठाकुर ने अपने पल्ले से लगा लिया है, ठाकुर की ओर से उसे (मानो) नौ खजाने मिल गए हैं क्योंकि, ठाकुर ने उसको अपना नाम दे दिया है जो (मानो, जगत का) सारा ही धन है।5।1।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीराग के छंत महला ५ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ डखणा ॥
मूलम्
सिरीराग के छंत महला ५ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ डखणा ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
हठ मझाहू मा पिरी पसे किउ दीदार ॥ संत सरणाई लभणे नानक प्राण अधार ॥१॥
मूलम्
हठ मझाहू मा पिरी पसे किउ दीदार ॥ संत सरणाई लभणे नानक प्राण अधार ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: डखणा = दखणा, मुल्तान (जो अब अफगानिस्तान का क्षेत्र है पहले बृहत्तर भारत में ही था) के इलाके की बोली में उच्चारित श्लोक या दोहरा। इसमें अक्षर ‘द’ की जगह ‘ड’ प्रधान है। हठ मझाहू = हृदय में। मा पिरी = मेरा प्रभु पति। पसे = दिखे। किउं = कैसे? नानक = हे नानक! प्राण अधार = जिंदगी का आसरा प्रभु।1।
अर्थ: मेरा प्यारा प्रभु पति (मेरे) हृदय में (बसता है, पर उसका) दीदार कैसे हो? हे नानक! वह प्राणों का आसरा प्रभु संत जनों की शरण पड़ने से ही मिलता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
छंतु ॥ चरन कमल सिउ प्रीति रीति संतन मनि आवए जीउ ॥ दुतीआ भाउ बिपरीति अनीति दासा नह भावए जीउ ॥ दासा नह भावए बिनु दरसावए इक खिनु धीरजु किउ करै ॥ नाम बिहूना तनु मनु हीना जल बिनु मछुली जिउ मरै ॥ मिलु मेरे पिआरे प्रान अधारे गुण साधसंगि मिलि गावए ॥ नानक के सुआमी धारि अनुग्रहु मनि तनि अंकि समावए ॥१॥
मूलम्
छंतु ॥ चरन कमल सिउ प्रीति रीति संतन मनि आवए जीउ ॥ दुतीआ भाउ बिपरीति अनीति दासा नह भावए जीउ ॥ दासा नह भावए बिनु दरसावए इक खिनु धीरजु किउ करै ॥ नाम बिहूना तनु मनु हीना जल बिनु मछुली जिउ मरै ॥ मिलु मेरे पिआरे प्रान अधारे गुण साधसंगि मिलि गावए ॥ नानक के सुआमी धारि अनुग्रहु मनि तनि अंकि समावए ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सिउ = साथ। रीति = मर्यादा। संतन मनि = संतों के मन में। आवए = आए, आती है, बसती है। दुतीआ भाव = (परमात्मा के प्यार के बिना कोई और) दूसरा प्यार। बिपरीति = उल्टी रीति। अनीति = अ+नीति, नीति के उलट। भावए = पसंद आती। दरसावए = दर्शन। बिहूना = विहूण, बिना, बगैर। हीना = हीन, कमजोर। गावए = गावे, गा सके। अनुग्रहु = कृपा। मनि = मन से। तनि = तन से। अंकि = (तेरी) गोद में। समावए = समाए, लीन रह सके।1।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: शीर्षक का शब्द ‘छंत’ बहुवचन है। यहां शब्द ‘छंतु’ एकवचन है।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: छंतु: परमात्मा के सुंदर चरणों से प्यार डाले रखने की मर्यादा संत जनों के मन में (ही) बसती है। परमात्मा के बिना किसी और के साथ प्यार डालना (संत जनों को) उल्टी रीति लगती है, प्रभु के दासों को ये पसंद नहीं आती। परमात्मा के दर्शन के बगैर (कोई और जीवन जुगति) परमात्मा के दासों को अच्छी नहीं लगती। (परमात्मा का दास परमात्मा के दर्शन के बिनां) एक पल भी धैर्य नहीं कर सकता। दास का मन दास का तन प्रभु के नाम के बिना कमजोर (क्षीर्ण) हो जाता है, (नाम के बिना उसको) आत्मिक मौत आ गई प्रतीत होती है जैसे मछली पानी के बिना मर जाती है।
हे मेरे प्यारे प्रभु! हे मेरी जिंद के आसरे प्रभु!! (मुझे अपने दास को) मिल, ता कि तेरा दास साधु-संगत में मिल के तेरे गुण गा सके। हे नानक के खसम प्रभु! मिहर कर, ता कि तेरा दास नानक मन से तन से तेरी गोद में (ही) समाया रहे।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
डखणा ॥ सोहंदड़ो हभ ठाइ कोइ न दिसै डूजड़ो ॥ खुल्हड़े कपाट नानक सतिगुर भेटते ॥१॥
मूलम्
डखणा ॥ सोहंदड़ो हभ ठाइ कोइ न दिसै डूजड़ो ॥ खुल्हड़े कपाट नानक सतिगुर भेटते ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हभ ठाइ = हरेक जगह में। डूजड़ो = दूसरा, परमात्मा से अलग कोई और। कपाट = किवाड़, दरवाजे, भित्ति, पर्दा। सतिगुर भेटते = सतिगुरु को मिलने से।1।
अर्थ: हे नानक! गुरु को मिलने से (माया के मोह से मनुष्य की बुद्धि के बंद हुए) किवाड़ खुल जाते हैं (और मनुष्य को समझ आ जाती है कि परमात्मा) हरेक जगह में (बस रहा है और) शोभायमान है, कोई भी जीव ऐसा नहीं दिखता जो परमात्मा से अलग कोई और हो।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
छंतु ॥ तेरे बचन अनूप अपार संतन आधार बाणी बीचारीऐ जीउ ॥ सिमरत सास गिरास पूरन बिसुआस किउ मनहु बिसारीऐ जीउ ॥ किउ मनहु बेसारीऐ निमख नही टारीऐ गुणवंत प्रान हमारे ॥ मन बांछत फल देत है सुआमी जीअ की बिरथा सारे ॥ अनाथ के नाथे स्रब कै साथे जपि जूऐ जनमु न हारीऐ ॥ नानक की बेनंती प्रभ पहि क्रिपा करि भवजलु तारीऐ ॥२॥
मूलम्
छंतु ॥ तेरे बचन अनूप अपार संतन आधार बाणी बीचारीऐ जीउ ॥ सिमरत सास गिरास पूरन बिसुआस किउ मनहु बिसारीऐ जीउ ॥ किउ मनहु बेसारीऐ निमख नही टारीऐ गुणवंत प्रान हमारे ॥ मन बांछत फल देत है सुआमी जीअ की बिरथा सारे ॥ अनाथ के नाथे स्रब कै साथे जपि जूऐ जनमु न हारीऐ ॥ नानक की बेनंती प्रभ पहि क्रिपा करि भवजलु तारीऐ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: छंतु: अनूप = हे अनूप प्रभु! (अन+ऊप, जो उपमा से ऊपर हो, जिस जैसा और कोई नही), हे सुंदर प्रभु! अपार = हे बेअंत प्रभु! संतन अधार = हे संतों के आसरे प्रभु! बीचारीऐ = (संतों ने) विचारी है। सास गिरास = साँस लेते हुए, गिराहिआं खाते हुए, स्वास स्वास। बिसुआसु = विश्वास, श्रद्धा, निश्चय। मनहु = मन में से। बेसारीऐ = विसारें। निमख = पलक झपकने जितना समय, निमेष। टारीऐ = टाला जा सकता, हटाया जा सकता। गुणवंत = हे गुणों के मालिक प्रभु। प्रान हमारे = हे हमारी जिंद जान प्रभु! बांछत = इच्छित। जीअ की = (हरेक की) जिंद की। बिरथा = वयथा, पीड़ा। सारे = सार लेता है, संभालता है। जपि = जप के। जूऐ = जूए में। पहि = पास, नजदीक। भवजलु = संसार समुंदर। तारीऐ = पार लंघा, तर जाता है।2।
अर्थ: छंतु: हे सुंदर प्रभु! हे बेअंत प्रभु!! हे संतों के आसरे प्रभु! (संतों ने तेरी महिमा के) वचन विचारे हैं (तेरी महिमा की) वाणी विचारी है (हृदय में बसाई है) स्वास स्वास (तेरा नाम) स्मरण करते हुए (उन्हें ये) पूरा भरोसा बन जाता है कि (प्रभु का नाम) कभी भी मन से नहीं भुलाना चाहिए। हे गुणों के श्रोत प्रभु! हे संतों की जिंद जान प्रभु!! (संतों को यह भरोसा बंध जाता है कि तेरा नाम) कभी भी मन से नहीं भुलाना चाहिए, पलक झपकने जितने समय के लिए भी (मन में से) परे हटाना नहीं चाहिए। (उन्हें ये निश्चय हो जाता है कि) मालिक प्रभु मन-इच्छित फल बख्शता है और हरेक जीव की पीड़ा की सार लेता है।
हे अनाथों के नाथ प्रभु! हे जीवों के अंग संग रहने वाले प्रभु!! (तेरा नाम) ज पके मानव जनम (किसी जुआरिए की तरह) जूए (की बाजी) में व्यर्थ नहीं गवाया जाता।
परमात्मा के पास नानक की ये विनती है: हे प्रभु! कृपा कर (मुझे अपना नाम दे और) संसार समुंदर से पार लंघा।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
डखणा ॥ धूड़ी मजनु साध खे साई थीए क्रिपाल ॥ लधे हभे थोकड़े नानक हरि धनु माल ॥१॥
मूलम्
डखणा ॥ धूड़ी मजनु साध खे साई थीए क्रिपाल ॥ लधे हभे थोकड़े नानक हरि धनु माल ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मजनु = स्नान। खे = की। साध खे धूड़ी = गुरमुखों की (चरण) धूल में। साई = सांई, प्रभु मालिक। थीए = होए। हभे = सारे। थोकड़े = सुंदर थोक में, सुंदर पदार्थ।1।
अर्थ: हे नानक! (जिस भाग्यशालियों पर) खसम प्रभु कृपाल होता है, उन्हें गुरमुखों की चरण धूल में स्नान (करना नसीब होता है)। जिनको हरि नाम धन प्राप्त होता है, जिनको हरि नाम पदार्थ मिल जाता है, उन्हें (मानो) सारे ही सुंदर पदार्थ मिल जाते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
छंतु ॥ सुंदर सुआमी धाम भगतह बिस्राम आसा लगि जीवते जीउ ॥ मनि तने गलतान सिमरत प्रभ नाम हरि अम्रितु पीवते जीउ ॥ अम्रितु हरि पीवते सदा थिरु थीवते बिखै बनु फीका जानिआ ॥ भए किरपाल गोपाल प्रभ मेरे साधसंगति निधि मानिआ ॥ सरबसो सूख आनंद घन पिआरे हरि रतनु मन अंतरि सीवते ॥ इकु तिलु नही विसरै प्रान आधारा जपि जपि नानक जीवते ॥३॥
मूलम्
छंतु ॥ सुंदर सुआमी धाम भगतह बिस्राम आसा लगि जीवते जीउ ॥ मनि तने गलतान सिमरत प्रभ नाम हरि अम्रितु पीवते जीउ ॥ अम्रितु हरि पीवते सदा थिरु थीवते बिखै बनु फीका जानिआ ॥ भए किरपाल गोपाल प्रभ मेरे साधसंगति निधि मानिआ ॥ सरबसो सूख आनंद घन पिआरे हरि रतनु मन अंतरि सीवते ॥ इकु तिलु नही विसरै प्रान आधारा जपि जपि नानक जीवते ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: छंतु: धाम = घर (धामन)। सुआमी धाम = प्रभु पति के चरण। बिस्राम = विश्राम, आसरा। भगतह = भगतों के वास्ते। आसा लगि = आस धार के। जीवते = आत्मिक जीवन बनाते हैं, जीवन ऊँचा करते हैं। मनि तने = मनि तनि, मन से और तन से। गलतान = मस्त, खचित। थिरु = टिके हुए, अडोल। थीवते = होते हैं। बिखै बनु = विषौ विकारों का पानी। बनु = पानी (वनं कानने जले)। फीका = बेस्वादा। निधि = खजाना। निधि मानिआ = नाम खजाने में (उनका) मन पतीज जाता है। सरबसो = सरबसु, सर्वस्व, सारा धन। घन = बहुत। मन अंतरि = मन में। सीवते = परो लेते हैं। प्रान आधरा = जिंद का आसरा।3।
अर्थ: छंतु: मालिक प्रभु के सुंदर चरण भक्त जनों (के मन) वास्ते निवास स्थल होते हैं (भक्त जन प्रभु चरणों में टिके रहने की ही) आशा धार के अपना जीवन ऊँचा करते हैं। परमात्मा का नाम स्मरण कर-कर के (भक्त जन अपने) मन से (अपने) शरीर से प्रभु नाम में मस्त रहते हैं, और आत्मिक जीवन देने वाला हरि नाम जल सदा पीते रहते हैं। भक्त जन नाम अमृत सदा पीते हैं और (विषयों की ओर से) सदा अडोल-चित्त टिके रहते हैं। (नाम जपने की इनायत से उन्होंने) विषौ विकारों के पानी को बे-स्वादा जान लिया है। भक्त जनों पर गोपाल प्रभु जी दयावान होते हैं, साधु-संगत में रहके उनका मन प्रभु के नाम खजाने में आनंदित रहता है। भक्त जन प्रभु के श्रेष्ठ नाम को अपने मन में परोए रखते हैं, (प्रभु का नाम ही उनके वास्ते) सब से श्रेष्ठ धन है, (नाम में से ही) वो अनेक आत्मिक सुख आनंद भोगते हैं। हे नानक! भक्त जनों को प्राणों का आसरा प्रभु नाम रत्ती जितने समय के लिए भी नहीं भूलता। परमात्मा का नाम (हर वक्त) जप जप के वह आत्मिक जीवन हासिल करते हैं।3।
[[0081]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
डखणा ॥ जो तउ कीने आपणे तिना कूं मिलिओहि ॥ आपे ही आपि मोहिओहु जसु नानक आपि सुणिओहि ॥१॥
मूलम्
डखणा ॥ जो तउ कीने आपणे तिना कूं मिलिओहि ॥ आपे ही आपि मोहिओहु जसु नानक आपि सुणिओहि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जो = जिस मनुष्यों को। तउ = तू। कूं = को। मिलिओहि = तू मिल पड़ा है। होहिओहु = तू मस्त हो रहा है। जसु = शोभा। नानक = हे नानक!।1।
अर्थ: हे नानक! (कह: हे प्रभु!) जिस (भाग्यशालियों) को तू अपने (सेवक) बना लेता है, उनको तू मिल पड़ता है, (उनकी ओर से) तू (अपना) यश स्वयं ही सुनता है, और (सुन के) तू स्वयं ही मस्त होता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
छंतु ॥ प्रेम ठगउरी पाइ रीझाइ गोबिंद मनु मोहिआ जीउ ॥ संतन कै परसादि अगाधि कंठे लगि सोहिआ जीउ ॥ हरि कंठि लगि सोहिआ दोख सभि जोहिआ भगति लख्यण करि वसि भए ॥ मनि सरब सुख वुठे गोविद तुठे जनम मरणा सभि मिटि गए ॥ सखी मंगलो गाइआ इछ पुजाइआ बहुड़ि न माइआ होहिआ ॥ करु गहि लीने नानक प्रभ पिआरे संसारु सागरु नही पोहिआ ॥४॥
मूलम्
छंतु ॥ प्रेम ठगउरी पाइ रीझाइ गोबिंद मनु मोहिआ जीउ ॥ संतन कै परसादि अगाधि कंठे लगि सोहिआ जीउ ॥ हरि कंठि लगि सोहिआ दोख सभि जोहिआ भगति लख्यण करि वसि भए ॥ मनि सरब सुख वुठे गोविद तुठे जनम मरणा सभि मिटि गए ॥ सखी मंगलो गाइआ इछ पुजाइआ बहुड़ि न माइआ होहिआ ॥ करु गहि लीने नानक प्रभ पिआरे संसारु सागरु नही पोहिआ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: छंतु: ठगउरी = ठग बूटी। पाइ = पा के। रीझाइ = रिझा के, खुश करके। परसादि = कृपा से। अगाधि = अथाह प्रभु। कंठे लगि = गले से लग के। सभि = सारे। दोख = विकार। जोहिआ = तोल लिए जाते हैं। भगति लख्ण करि = भक्ति के लक्षणों करके। वसि = वश में। मनि = मन में। वुठे = आ बसते हैं। तुठे = प्रसन्न होने से। सखी = सखियों ने, सत्संगियों ने। मंगलो = मंगल, खुशी का गीत, आत्मिक आनंद देने वाला गीत, महिमा का शब्द। होहिआ = होहे, हुजके, धक्के। करु = हाथ। गहि = पकड़ के।4।
अर्थ: (हे भाई! भक्तजनों ने) प्रेम की ठग-बूटी खिला के (और इस तरह खुश करके) परमात्मा का मन मोह लिया होता है। भक्त जनों की ही कृपा से (कोई भाग्यशाली मनुष्य) अथाह प्रभु के गले लग के सुंदर जीवन वाला बनता है। जो मनुष्य हरि के गले लग के सुंदर जीवन वाला बनता है, उसके सारे विकार खत्म हो जाते हैं, (उसके अंदर) भक्ति वाले लक्षण पैदा हो जाने के कारण प्रभु जी उसके बस में आ जाते हैं। गोबिंद के उस पर प्रसन्न होने से उसके मन में सारे सुख आ बसते हैं, और उसके सारे जनम मरण (के चक्कर) समाप्त हो जाते हैं। सत्संगियों के साथ मिल के ज्यों ज्यों वह प्रभु की महिमा की वाणी गाता है उसकी कामनाएं पूरी हो जाती हैं (भाव, उसके मन के फुरने समाप्त हो जाते हैं), उसे पुनः माया के धक्के नहीं लगते। हे नानक! प्यारे प्रभु ने जिनका हाथ थाम लिया है, उन पे संसार समुंदर अपना प्रभाव नहीं डाल सकता।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
डखणा ॥ साई नामु अमोलु कीम न कोई जाणदो ॥ जिना भाग मथाहि से नानक हरि रंगु माणदो ॥१॥
मूलम्
डखणा ॥ साई नामु अमोलु कीम न कोई जाणदो ॥ जिना भाग मथाहि से नानक हरि रंगु माणदो ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साई नाम = साई नाम, पति प्रभु का नाम। अमोलु = अमुल्य, जिसका मूल्य ना पड़ सके, जिसके बराबर और कोई कीमती वस्तु ना हो। कीम = कीमत। जाणदो = जानता। मथाहि = माथे पर। से = वह लोग। हरि रंगु = प्रभु के मिलाप का आनंद।1।
अर्थ: पति प्रभु का नाम अमुल्य है, कोई जीव उसके बराबर की और कोई चीज नहीं बता सकता। हे नानक! जिस मनुष्यों के माथे के भाग्य (जाग जाएं), वे परमात्मा के मिलाप का आनन्द लेते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
छंतु ॥ कहते पवित्र सुणते सभि धंनु लिखतीं कुलु तारिआ जीउ ॥ जिन कउ साधू संगु नाम हरि रंगु तिनी ब्रहमु बीचारिआ जीउ ॥ ब्रहमु बीचारिआ जनमु सवारिआ पूरन किरपा प्रभि करी ॥ करु गहि लीने हरि जसो दीने जोनि ना धावै नह मरी ॥ सतिगुर दइआल किरपाल भेटत हरे कामु क्रोधु लोभु मारिआ ॥ कथनु न जाइ अकथु सुआमी सदकै जाइ नानकु वारिआ ॥५॥१॥३॥
मूलम्
छंतु ॥ कहते पवित्र सुणते सभि धंनु लिखतीं कुलु तारिआ जीउ ॥ जिन कउ साधू संगु नाम हरि रंगु तिनी ब्रहमु बीचारिआ जीउ ॥ ब्रहमु बीचारिआ जनमु सवारिआ पूरन किरपा प्रभि करी ॥ करु गहि लीने हरि जसो दीने जोनि ना धावै नह मरी ॥ सतिगुर दइआल किरपाल भेटत हरे कामु क्रोधु लोभु मारिआ ॥ कथनु न जाइ अकथु सुआमी सदकै जाइ नानकु वारिआ ॥५॥१॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
छंतु: सभि = सारे। धंनु = धन्य, भाग्यों वाले। लिखती = जिन्होंने लिखा। कुल = खानदान। संगु = मिलाप। रंगु = आनंद। तिनी = उन्होंने। बीचारिआ = मन में टिकाया। प्रभि = प्रभु ने। करु = हाथ। जसो = जस, यश, महिमा की दात। धावै = दौड़ता है। जोनि न धावै = जनम जनम में नहीं दौड़ता फिरता। मरी = मरता। भेटत = मिलने से। सतिगुर भेटत = गुरु के मिलने से। हरे = सरसे, आत्मिक जीवन वाले। अकथु = जिसका स्वरूप बयान ना किया जा सके, अकथनीय। सदकै = कुर्बान। वारिआ = कुर्बान।5।
अर्थ: जो मनुष्य परमात्मा का नाम उचारते हैं, वे स्वच्छ जीवन वाले बन जाते हैं। जो लोग प्रभु की महिमा सुनते हैं, वह सारे भाग्यशाली हो जाते हैं। जो मनुष्य परमात्मा की महिमा (अपने हाथों से) लिखते हैं, वे (अपने सारे) खानदान को (ही संसार समुंदर में से) पार लंघा लेते हैं। जिस मनुष्यों को गुरु का मिलाप होता है, वे परमात्मा के नाम (-स्मरण) का आनन्द लेते हैं, वे परमात्मा की याद को अपने मन में टिका लेते हैं। जिस के ऊपर प्रभु ने कृपा की, उस ने प्रभु को अपने मन में बसाया और अपना जीवन खूबसूरत बना लिया। प्रभु ने जिस (भाग्यशाली मनुष्य) का हाथ थाम लिया, उसको उसने अपनी महिमा (की दाति) दी, वह मनुष्य फिर जूनियों में नहीं दौड़ा फिरता, उसे आत्मिक मौत नहीं आती।
दया के घर, कृपा के घर सतिगुरु को मिल के (और खसम प्रभु को स्मरण करके) जिन्होंने (अपने अंदर से) काम, क्रोध, लोभ (आदिक विकारों) को मार लिया है, उनके आत्मिक जीवन प्रफुल्लित हो जाते हैं।
पति प्रभु अकथनीय है (उसका रूप) बयान नहीं किया जा सकता। नानक उससे सदके जाता है कुर्बान जाता है।5।1।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: इस ‘छंत’ के पाँच ‘बंद’ हैं। अपनी किस्म का ये एक छंद है सारे छंदों का जोड़ 3 है।
महला 3: का 1 शबद
महला 5: के 2 शबद, कुल 3 शब्द।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु महला ४ वणजारा ੴ सति नामु गुर प्रसादि ॥
मूलम्
सिरीरागु महला ४ वणजारा ੴ सति नामु गुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि हरि उतमु नामु है जिनि सिरिआ सभु कोइ जीउ ॥ हरि जीअ सभे प्रतिपालदा घटि घटि रमईआ सोइ ॥ सो हरि सदा धिआईऐ तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ जो मोहि माइआ चितु लाइदे से छोडि चले दुखु रोइ ॥ जन नानक नामु धिआइआ हरि अंति सखाई होइ ॥१॥
मूलम्
हरि हरि उतमु नामु है जिनि सिरिआ सभु कोइ जीउ ॥ हरि जीअ सभे प्रतिपालदा घटि घटि रमईआ सोइ ॥ सो हरि सदा धिआईऐ तिसु बिनु अवरु न कोइ ॥ जो मोहि माइआ चितु लाइदे से छोडि चले दुखु रोइ ॥ जन नानक नामु धिआइआ हरि अंति सखाई होइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: हरि नामु = हरि का नाम। जिनि = जिस (हरि) ने। सिरिआ = (सृजना = पैदा करना), पैदा किया। सभु कोइ = हरेक जीव। घटि घटि = हरेक घट में। रमईआ = सुंदर राम। मोहि = मोह में। दुखु रोइ = दुख रो के, गिड़गिड़ा के। अंति = (जब सारे और साथ छूट जाते हैं), आखिर को, जरूर। सखाई = मददगार।1।
अर्थ: जिस हरि ने (जगत में) हरेक जीव को पैदा किया है, उस हरि का नाम श्रेष्ठ है, वह हरि सारे जीवों की पालना करता है, और वह सुंदर राम हरेक शरीर में व्यापक है। (हे भाई!) उस हरि का सदा ध्यान धरना चाहिए, उसके बिना (जीव का) कोई और (आसरा) नहीं है।
जो लोग माया के मोह में (अपना) चिक्त लगाए रखते हैं, वे (मौत आने पर) दुख में रो रो के (सभ कुछ) छोड़ कर जाते हैं। (पर) हे दास नानक! जिन्होंने (जिंदगी में) हरि का नाम स्मरण किया, हरि उनका जरूर मददगार बनता है।१।
[[0082]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
मै हरि बिनु अवरु न कोइ ॥ हरि गुर सरणाई पाईऐ वणजारिआ मित्रा वडभागि परापति होइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मै हरि बिनु अवरु न कोइ ॥ हरि गुर सरणाई पाईऐ वणजारिआ मित्रा वडभागि परापति होइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जीअ’ है ‘जीव’ का बहुवचन।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (हे भाई!) मेरा तो परमात्मा के बिना और कोई (आसरा) नही है। हरि नाम का वणज करने आए हे मित्र! (गुरु की शरण पड़) गुरु की शरण पड़ने से ही हरि (का नाम) मिलता है, जो बड़े भाग्यों से ही मिलता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
संत जना विणु भाईआ हरि किनै न पाइआ नाउ ॥ विचि हउमै करम कमावदे जिउ वेसुआ पुतु निनाउ ॥ पिता जाति ता होईऐ गुरु तुठा करे पसाउ ॥ वडभागी गुरु पाइआ हरि अहिनिसि लगा भाउ ॥ जन नानकि ब्रहमु पछाणिआ हरि कीरति करम कमाउ ॥२॥
मूलम्
संत जना विणु भाईआ हरि किनै न पाइआ नाउ ॥ विचि हउमै करम कमावदे जिउ वेसुआ पुतु निनाउ ॥ पिता जाति ता होईऐ गुरु तुठा करे पसाउ ॥ वडभागी गुरु पाइआ हरि अहिनिसि लगा भाउ ॥ जन नानकि ब्रहमु पछाणिआ हरि कीरति करम कमाउ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: विणु = बिना। संत जना बिणु = संत जनों (की संगति करने) के बिना। भाईआ = भाईयों। किनै = किसी ने भी। हरि नाउ = हरि का नाम। निनाउ = नाम के बिना, पिता के नाम के बिना। पिता जाति = पिता की जाति का, पिता के कुल का, प्रभु पिता की कुल का, प्रभु पिता का रूप। ता = तब। तुठा = प्रसन्न। पसाउ = प्रसाद,मेहर। अहिनिसि = (अहि = दिन, निसि = रात) दिन-रात। भाउ = प्रेम। नानकि = नानक ने। पछाणिआ = सांझ डाली है। कीरति = महिमा। कमाउ = कमाई करके।2।
अर्थ: संत जनों भाईयों (की संगति करने) के बिना किसी मनुष्य ने (कभी) हरि का नाम प्राप्त नहीं किया (क्योंकि, संतों की संगति के बिना मनुष्य जो भी निहित धार्मिक कर्म करते हैं वह) अहम् के असर तहत कर्म करते हैं (और इस वास्ते पति हीन ही रह जाते हैं) जैसे किसी वेश्वा का पुत्र (अपने पिता का) नाम नहीं बता सकता। पिता प्रभु की कुल के तभी हो सकते हैं, जब गुरु प्रसन्न (हो के जीव पर) मिहर करता है। जिस मनुष्य को बड़े भाग्यों से गुरु मिल गया, उसका हरि से प्रेम दिन रात लगा रहता है।
दास नानक ने तो (गुरु की शरण पड़ के ही) परमात्मा के साथ सांझ डाली है, और परमात्मा की महिमा के कर्म की कमाई की है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनि हरि हरि लगा चाउ ॥ गुरि पूरै नामु द्रिड़ाइआ हरि मिलिआ हरि प्रभ नाउ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मनि हरि हरि लगा चाउ ॥ गुरि पूरै नामु द्रिड़ाइआ हरि मिलिआ हरि प्रभ नाउ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: म्नि = मन में। गुरि पूरै = पूरे गुरु ने। द्रिड़ाइआ = दृढ़ कर दिया, पक्का कर दिया।1। रहाउ।
अर्थ: (गुरु की कृपा से जिस मनुष्य के) मन में परमात्मा के स्मरण का चाव पैदा हुआ, पूरे गुरु ने उसके हृदय में परमात्मा का नाम पक्का कर दिया, उस मनुष्य को परमात्मा मिल गया, परमात्मा का नाम मिल गया।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जब लगु जोबनि सासु है तब लगु नामु धिआइ ॥ चलदिआ नालि हरि चलसी हरि अंते लए छडाइ ॥ हउ बलिहारी तिन कउ जिन हरि मनि वुठा आइ ॥ जिनी हरि हरि नामु न चेतिओ से अंति गए पछुताइ ॥ धुरि मसतकि हरि प्रभि लिखिआ जन नानक नामु धिआइ ॥३॥
मूलम्
जब लगु जोबनि सासु है तब लगु नामु धिआइ ॥ चलदिआ नालि हरि चलसी हरि अंते लए छडाइ ॥ हउ बलिहारी तिन कउ जिन हरि मनि वुठा आइ ॥ जिनी हरि हरि नामु न चेतिओ से अंति गए पछुताइ ॥ धुरि मसतकि हरि प्रभि लिखिआ जन नानक नामु धिआइ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जब लगु = जब तक। जोबनि = जवानी में। सासु = स्वास। चलदिआ = जीवन सफर में चले जाते हुए। नालि चलसी = (जीव के) साथ चलेगा। अंते = आखिर को (भी)। हउ = मैं। कउ = को। जिन मनि = जिस के मन में। वुठा = वश पड़ा। धुरि = धुर से, प्रभु दरगाह से। प्रभि = प्रभु ने।3।
अर्थ: (हे भाई!) जब तक जवानी में सांस (आ रहा) है, तब तक परमात्मा का नाम स्मरण कर (बुढ़ापे में नाम स्मरणा मुश्किल हो जाएगा) जीवन सफर में हरि नाम तेरे साथ निबाह चलेगा, अंत समय में भी तूझे (मुश्किलों से) बचा लेगा।
मैं उनपे कुर्बान हूँ, जिनके मन में परमात्मा का नाम आ बसता है। जिस लोगों ने परमात्मा का नाम नहीं स्मरण किया, वे आखिर को (यहां से) पछताते ही चले गए।
(पर ये जीव के बस की बात नहीं) हे दास नानक! हरि प्रभु ने अपनी धुर दरगाह से जिस मनुष्य के माथे पे (स्मरण करने का लेख) लिख दिया है, वही प्रभु का नाम स्मरण करता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मन हरि हरि प्रीति लगाइ ॥ वडभागी गुरु पाइआ गुर सबदी पारि लघाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मन हरि हरि प्रीति लगाइ ॥ वडभागी गुरु पाइआ गुर सबदी पारि लघाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मन = हे मन। लघाइ = लंघा लेता है।1। रहाउ।
अर्थ: हे (मेरे) मन! हरि (के नाम स्मरण) में प्रीत जोड़। जिस भाग्यशाली मनुष्य को गुरु मिल पड़ता है, गुरु के शब्द से (प्रभु उस को संसार-समुंदर से) पार लंघा लेता है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि आपे आपु उपाइदा हरि आपे देवै लेइ ॥ हरि आपे भरमि भुलाइदा हरि आपे ही मति देइ ॥ गुरमुखा मनि परगासु है से विरले केई केइ ॥ हउ बलिहारी तिन कउ जिन हरि पाइआ गुरमते ॥ जन नानकि कमलु परगासिआ मनि हरि हरि वुठड़ा हे ॥४॥
मूलम्
हरि आपे आपु उपाइदा हरि आपे देवै लेइ ॥ हरि आपे भरमि भुलाइदा हरि आपे ही मति देइ ॥ गुरमुखा मनि परगासु है से विरले केई केइ ॥ हउ बलिहारी तिन कउ जिन हरि पाइआ गुरमते ॥ जन नानकि कमलु परगासिआ मनि हरि हरि वुठड़ा हे ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आपे = स्वयं ही। आपु = अपने आप को। देवै = (जिंद) देता है। लेइ = ले लेता है। भरमि = भटकन में। भुलाइदा = गलत रास्ते डाल देता है। मनि = मन में। परगासु = प्रकाश। से = ऐसे लोग। केई केइ = कोई कोई। कउ = से, को। गुरमते = गुरु की मति ले के, गुरमति। जिनि = जिसने। नानकि = नानक में, नानक के अंदर। कमलु = हृदय रूप कमल का फूल। परगासिआ = खिल पड़ा है। वुठड़ा हे = आ बसा है।4।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘जिनि’ एक वचन है, जिसका अर्थ है ‘जिसने’; इसका बहुवचन ‘जिन’ है, अर्थ है ‘जिन्होंने’।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: परमात्मा स्वयं ही अपने आप को (जगत के रूप में) प्रगट करता है, स्वयं ही (जीवों को जिंद शरीर) देता है, और स्वयं ही (वापस) ले लेता है। परमात्मा खुद ही (जीवों को माया की) भटकना में (डाल के) कुमार्ग पर डाल देता है, और खुद ही (सही जीवन वास्ते) अक्ल देता है। जो मनुष्य गुरु की शरण पड़ते हैं, उनके मन में (आत्मिक) प्रकाश हो जाता है, पर ऐसे लोग बहुत ही कम होते हैं, कोई विरले ही होते हैं। मैं उन लोगों से सदके जाता हूं, जिन्होंने गुरु की मति ले के परमात्मा (के साथ मिलाप) प्राप्त कर लिया है। (गुरु की मेहर से) दास नानक के अंदर (भी) हृदय का कमल फूल खिल पड़ा है, मन में परमात्मा आ बसा है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मनि हरि हरि जपनु करे ॥ हरि गुर सरणाई भजि पउ जिंदू सभ किलविख दुख परहरे ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
मनि हरि हरि जपनु करे ॥ हरि गुर सरणाई भजि पउ जिंदू सभ किलविख दुख परहरे ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनि = मन में। करे = करि, कर। भजि पउ = दौड़ जा, भाग पड़। जिंदू = हे जिंदे। किलविख = पाप। परहरे = पर हर, दूर कर ले।1। रहाउ।
अर्थ: हे (मेरी) जिंदे! मन में परमात्मा हरि का जाप कर। दौड़ के परमात्मा की शरण जा पड़, अपने सारे पाप और दुख दूर कर ले।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
घटि घटि रमईआ मनि वसै किउ पाईऐ कितु भति ॥ गुरु पूरा सतिगुरु भेटीऐ हरि आइ वसै मनि चिति ॥ मै धर नामु अधारु है हरि नामै ते गति मति ॥ मै हरि हरि नामु विसाहु है हरि नामे ही जति पति ॥ जन नानक नामु धिआइआ रंगि रतड़ा हरि रंगि रति ॥५॥
मूलम्
घटि घटि रमईआ मनि वसै किउ पाईऐ कितु भति ॥ गुरु पूरा सतिगुरु भेटीऐ हरि आइ वसै मनि चिति ॥ मै धर नामु अधारु है हरि नामै ते गति मति ॥ मै हरि हरि नामु विसाहु है हरि नामे ही जति पति ॥ जन नानक नामु धिआइआ रंगि रतड़ा हरि रंगि रति ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: घटि = घट में। घटि घटि = हरेक घट में। रमईआ = सुंदर राम। मनि = मन में। किउ = कैसे। कितु = किससे। भति = भांति। कितु भति = किस तरीके से? भेटीऐ = ढूंढे। चिति = चिक्त में। धर = आसरा। मै = मुझे। अधारु = आसरा। नामै ते = नाम से ही। गति = उच्च आत्मिक अवस्था। विसाहु = राशिपुंजी। जति = जाति, ऊँची जाति। नामे ही = नाम में (जुडना) ही। पति = इज्जत। रंगि = रंग में। रति = प्यार।5।
अर्थ: हरेक घट में, हरेक मन में सुंदर राम बसता है। (पर दिखता नही। वह) कैसे मिले? किस तरीके से प्राप्त हो? अगर गुरु मिल जाए, यदि पूरा सत्गुरू मिल पड़े, तो परमातमा (स्वयं) आ के मन में चिक्त में आ बसता है।
मेरे वास्ते तो परमात्मा का नाम ही आसरे का परना है, परमात्मा के नाम से ही ऊँची आत्मिक अवस्था मिलती है, और अक्ल मिलती है। मेरे पास तो परमात्मा का नाम ही राशि पूंजी है, परमात्मा के नाम में जुड़ना ही (मेरे वास्ते) ऊँची जाति है, और (लोक परलोक की) इज्जत है।
हे दास नानक! जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम स्मरण किया है, वह परमात्मा के रंग में रंगा रहता है परमात्मा के नाम रंग में उस की प्रीति बनी रहती है।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि धिआवहु हरि प्रभु सति ॥ गुर बचनी हरि प्रभु जाणिआ सभ हरि प्रभु ते उतपति ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
हरि धिआवहु हरि प्रभु सति ॥ गुर बचनी हरि प्रभु जाणिआ सभ हरि प्रभु ते उतपति ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सति = सदा कायम रहने वाला। जाणिआ = जाना जा सकता है, सांझ पड़ सकती है। प्रभ ते = प्रभु से। उतपति = उत्पत्ति, पैदाइश।1। रहाउ।
अर्थ: (हे भाई!) सदा कायम रहने वाले हरि प्रभु को स्मरण करते रहो। जिस हरि प्रभु से यह सारी जगत रचना हुई, उस हरि प्रभु के साथ गहरी सांझ गुरु” के वचन से ही पड़ सकती है।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जिन कउ पूरबि लिखिआ से आइ मिले गुर पासि ॥ सेवक भाइ वणजारिआ मित्रा गुरु हरि हरि नामु प्रगासि ॥ धनु धनु वणजु वापारीआ जिन वखरु लदिअड़ा हरि रासि ॥ गुरमुखा दरि मुख उजले से आइ मिले हरि पासि ॥ जन नानक गुरु तिन पाइआ जिना आपि तुठा गुणतासि ॥६॥
मूलम्
जिन कउ पूरबि लिखिआ से आइ मिले गुर पासि ॥ सेवक भाइ वणजारिआ मित्रा गुरु हरि हरि नामु प्रगासि ॥ धनु धनु वणजु वापारीआ जिन वखरु लदिअड़ा हरि रासि ॥ गुरमुखा दरि मुख उजले से आइ मिले हरि पासि ॥ जन नानक गुरु तिन पाइआ जिना आपि तुठा गुणतासि ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जिन कउ = जिन्हें। पूरबि = पहले जनम में (किये कर्मों के अनुसार)। लिखिआ = लिखा हुआ (संस्कारों का लेख)। पासि = नजदीक। भाइ = भाव में (रहने से)। प्रगासि = प्रकाश कर देता है। धनु धनु = धन्य, सराहनीय। वापारीआ = व्यापार करने वाले। वखरु = सौदा। रासि = राशि, पूंजी, संपत्ति, धन-दौलत। दरि = (प्रभु के) दर पर। उजले = रौशन। तुठा = प्रसन्न हुआ। गुणतासि = गुणों का खजाना प्रभु।6।
अर्थ: जिस मनुष्यों को पूर्व जन्म (में किए हुए कर्मों अनुसार भले संस्कारों का) लिखा हुआ (लेख प्राप्त हो जाता है, जिनके अंदर पूर्बले अच्छे संस्कार जाग पड़ते हैं), वह मनुष्य गुरु के पास आ के (गुरु के चरणों में) मिल बैठते हैं। हरि नाम का वणज करने आए हे मित्र! सेवक भाव में रहने से गुरु (उनके अंदर) परमात्मा का नाम प्रगट कर देता है। (जीव-वणजारों का यह) व्यापार सराहने योग्य है, वे जीव वणजारे भी भाग्यशाली हैंजिन्होंने परमात्मा के नाम का सौदा लादा है जिन्होंने हरि नाम की संपत्ति इकट्ठा किया है।
गुरु के सन्मुख रहने वाले लोगों के मुंह परमात्मा के दर पे रौशन रहते हैं, वे परमात्मा के चरणों में आ मिलते हैं। (पर) हे दास नानक! गुरु (भी) उनको ही मिलता है, जिस पर सारे गुणों का खजाना परमात्मा स्वयं प्रसन्न होता है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
हरि धिआवहु सासि गिरासि ॥ मनि प्रीति लगी तिना गुरमुखा हरि नामु जिना रहरासि ॥१॥ रहाउ॥१॥
मूलम्
हरि धिआवहु सासि गिरासि ॥ मनि प्रीति लगी तिना गुरमुखा हरि नामु जिना रहरासि ॥१॥ रहाउ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ससि = (हरेक) साँस से। गिरासि = (हरेक) ग्रास से। मनि = मन में। रहरासि = जीवन-राह की राशि पूंजी।1। रहाउ।
अर्थ: (हे भाई!) हरेक स्वास के साथ और हरेक ग्रास के साथ परमात्मा का ध्यान धरते रहो। गुरु के सन्मुख रहने वाले जिस मनुष्यों ने प्रभु के नाम को अपने जीवन-राह की राशि पूंजी बनाया है, उनके मन में परमात्मा (के चरणों) की प्रीति बनी रहती है।1। रहाउ।1।
[[0083]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सिरीराग की वार महला ४ सलोका नालि ॥
मूलम्
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सिरीराग की वार महला ४ सलोका नालि ॥
दर्पण-भाव
सिरी राग की वार का भाव
पउड़ी - वार:
(1) जीवों को पैदा करने वाला प्रभु ही जीवों का आसरा है, वही हरेक का हर जगह में रक्षक है, हर जगह उसी की हुक्म चल रहा है, इस वास्ते किसी और से डर नहीं होना चाहिए। प्रभु की याद से और सारे डर दूर हो जाते हैं।
(2) परमात्मा स्वयं ही हर जगह मौजूद है, वह स्वयं ही हरेक जीव को काम काज में लगा रहा है, और ये तमाशा देख के खुश हो रहा है।
(3) जीव यहां व्यापार (वणज) करने के लिए आया है। ये जगत इसके व्यापार करने के लिए हाट है। गुरु की शरण पड़ के इसके ‘नाम’ के व्यापारी को ‘जमकाल’ का डर नहीं रहता।
(4) प्रभु हर जगह हरेक जीव में मौजूद है, इस तरह सारे जीव, मानों, उसे याद कर रहे हैं पर बंदगी की कमाई उनकी ही सफल है, जो सत्गुरू के राह पर चल के स्मरण करते हैं।
(5) जीव अपने किए किसी विकार को परमात्मा से छुपा के नहीं रख सकता, कि अंदर बाहर हर जगह व्यापक होने के कारण हरेक का भेद जानता है। इसी लिए पाप करने वाला सोए हुए ही पाप के कारण डरता है। पर स्मरण करने वाला मनुष्य प्रभु में लीन हो जाता है, उसे कोई डर नहीं व्याप्ता।
(6) प्रभु की महिमा करना, प्रभु का स्मरण करना- यही मानव जन्म का असल उद्देश्य है, यही मनुष्य के लिए करने योग्य कार्य है।
(7) ये जगत जैसे, एक गहरा समुंदर है, जिस में जीव, मानो, मछलियां है जो मायावी पदार्थों की भिक्ति की लालच में आ के जमकाल के जाल में फंस रही हैं। जो ‘नाम’ स्मरण करते हैं, वे इस गहरे समुंदर में कमल के फूल की तरह अछोह रहते हैं।
(8) ये जानते हुए भी कि राजक परमात्मा है जीव रोजी की खातिर छल-कपट करते हैं, और तृष्णा अधीन हो के खुआर होते हैं। पर जो जीव स्मरण करते हैं, उन्हें संतोष के जैसेना खत्म होने वाले खजाने मिल जाते हैं।
(9) परमात्मा सभ जीवों को रिजक देने वाला है। और कोई राजक नहीं, जिसके आगे जीव अरजोई कर सके, सारे जीव उसी दर के सवाली हैं। पर, मुबारिक वो हैंजो गुरु के बताए हुए राह पर चल के प्रभु की महिमा करते हैं।
(10) जीवन का असल उद्देश्य है ‘बंदगी’। पर, ये दाति सत्गुरू के द्वारा ही मिल सकती है।
(11) जिस मनुष्य के हृदय में परमात्मा का नाम बसता है, उसको जगत में हर जगह इज्जत मिलती है, उसकी शोभा सदा के लिए कायम हो जाती है, उसका दीदार करके विकारी लोग भी विकारों से हट जाते हैं।
(12) जैसे सूर्य की किरण रात के अंधेरे को दूर करती है, वैसे ही जो भाग्यशाली मनुष्य गुरु की शिक्षा से प्रभु की जीवन रश्मि बख्शने वाली महिमा करता है, उसके अंदर ज्ञान का प्रकाश होता है, और अंदर से माया का अंधकार दूर हो जाता है।
(13) कोई भाग्यशली ही नाम स्मरण करता है। नाम की इनायत से जीवन सुखी हो जाता है, क्योंकि नाम स्मरण करने से सारे पाप और पापों से पैदा होने वाले सारे दुख दूर हो जाते हैं।
(14) परमात्मा की कृपा से जो मनुष्य सत्गुरू की शरण पड़ते हैं, उनकी नित्य की परेशानियां मिट जाती हैं, क्योंकि उनका मन माया की ओर से तृप्त हो जाता है (और माया की तृष्णा ही रोजाना के तौखलों का मूल कारण है)। इस तरह वे मनुष्य लोक और परलोक दोनों जगह आनन्दित रहते हैं।
(15) माया से मोह हो जाने के कारण मायाधारी को मौत का बड़ा सहम होता है। पर, नाम स्मरण करने वालों का ये सहम खत्म हो जाता है, क्योंकि बंदगी की इनायत से माया की तृष्ना ही मिट जाती है, जितना चिर यहां जीते हैं, कोई निंदक बखील भी उनपे दबाव नहीं डाल सकता।
(16) जो मनुष्य माया के मोह में फंस के विकारों में लगे रहते हैं, उन्हें प्रभु अपने चरणों से विछोड़ देता है, और प्रभु चरणों से विछुड़ना जीव के लिए एक कड़ी सजा है। क्योंकि ये विछोड़ा ही दुखों का मूल है। नाम जपने वालों को प्रभु आदर देता है, अपने नजदीक रखता है।
(17) माया के मोह में फंसे हुओं को और विकारों में बिलकते हुओं को इस घोर दुख से परमात्मा स्वयं ही बचाता है। मनमुख मूर्ख अहंकारियों को वह स्वयं ही रास्ते पर लाता है। ये दुख-संताप उनको इस आत्मिक मौत से बचाने के लिए ही प्रभु भेजता है।
(18) विकारियों को दुख-कष्ट देने वाला परमात्मा कोई अन्याय नहीं करता, कर्तव्यपरायणता के उलट नहीं करता कि जीवों को फिक्र-अंदेशा करना पड़े। विकारों में फंसा मनुष्य विकारों से इतना चिपका हुआ है, कि प्रभु द्वारा इस ‘मार’ के कारण ही आखिरवह विकारों से थकता है।
(19) विकारियों का मन सदा भटकता रहता है; वे जैसे, घोर नर्क में पड़े रहते हैं। बंदगी करने वालों का मन टिका रहता है और प्रसन्न रहता है क्योंकि उनको परमात्मा पे पूरा भरोसा होता है।
(20) गुरु के बताए हुए रास्ते पे चल के, अगर दुनियावी जरूरतों की खातिर भी परमात्मा के दर पे अरजोई करते रहें, तो एक तो दुनिया वाले काम सँवर जाते हैं, दूसरे सत्संग में अरजोई करते करते प्रभु चरणों से प्यार बन के ‘नाम’ की दाति भी मिल जाती है, और प्रभु का दीदार हो जाता है।
(21) ज्यों ज्यों मनुष्य परमात्मा की महिमा करता है, त्यों त्यों उसकी आत्मा उसके नजदीक नजदीक आती जाती है, ‘नाम’ की बख्शिश होती है और शाबाश मिलती है।
समूचा भाव:
(1) परमात्मा हरेक जीव का रक्षक है, हरेक जीव में मौजूद हैऔर हरेक जीव को स्वयं ही काम काज में लगा रहा है। फिर भी, जीव को कोई न कोई डर सहम पड़ा रहता है, क्योंकि जगत रूपी बाजार में अपने असल काम नाम व्यापार को छोड़ बैठता है, और उस घट घट वासी प्रभु को कहीं दूर जान के भूलें कर बैठता है। (१ से ५ तक)
(2) मानव जीवन का असल उद्देश्य है ‘बंदगी’। जो जीव स्मरण करते हैं वे इस संसार समुंदर में कमल के फूल की तरह अछोह रहते हैं। स्मरण हीन जीव माया के पदार्थों में इस तरह फंसते हैं जैसे मछली जाल में, परमात्मा को राजक जानते हुए भी तृष्णा-अधीन हो केरोजी की खातिर छल कपट करते हैं और खुआर होते हैं।
चाहिए तो ये कि मनुष्य प्रभु के राज़क होने में श्रद्धा धार के, इस तौखले को छोड़ के, गुरु के बताए हुए राह पे चल के, महिमा करे। यही सब से ऊँचा करने योग्य कार्य है। (६ से १० तक)
(3) माया की तृष्णा ही तौखलों (परेशानियों) का मूल कारण है, माया का मोह ही मौत का सहम पैदा करता है। नाम जपने की इनायत से माया का अंधेरा मन में से दूर हो जाता है, इस लिए झल्लाहट और सहम भी मिट जाते हैं, जीवन सुखी हो जाते हैं क्योंकि मोह से पैदा होने वाले पाप और दुख रोग दूर हो जाते हैं। पर, स्मरण करता कोई भाग्यशाली ही है।
(4) माया का मोह और दुनिया के विकार मनुष्य को परमात्मा से विछोड़ते हैं।, विकारी का मन भटकता है, मानो, घोर नर्क में पड़ा है। पर, ये ‘मार’, ये सजा, उस पर कोई कहर नहीं हो रहा, बल्कि उसको आत्मिक मौत से बचाने के लिए दारू है। विकारों के साथ चिपका हुआ मनमुख आखिर इस ‘मार’ के कारण ही विकारों से परे हटता है; और पुनः प्रभु चरणों में जुड़ने की तमन्ना उसके अंदर पैदा होती है। (११ से १९ तक)
(5) चाहे दुनियावी जरूरतों की खातिर ही सही, ज्यों ज्यों मनुष्य प्रभु की महिमा करता है, त्यों त्यों उसके नजदीक पहुँचता है, दुनिया भी सँवरती है और ‘नाम’ की बख्शिश भी होती है। (२० से २१ तक)
मुख्य भाव:
मनुष्य के जीवन का असल उद्देश्य /उद्देश्य है घट घट वासी प्रभु का स्मरण। पर, मनुष्य तृष्णा अधीन हो के प्रभु का विसार देता है, और दुखी होता है। ये दुख: कष्ट कोई सजा नही है, यह दारू है जो मनुष्य को तृष्णा के रोग से बचा के पुनः प्रभु चरणों में जोड़ने की तमन्ना इसके अंदर पैदा करता है। दुनियावी जरूरतों की खातिर स्मरण किया हुआ नाम भी मनुष्य को आखिर प्रभु के नजदीकतर ही लाता है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
रागा विचि स्रीरागु है जे सचि धरे पिआरु ॥ सदा हरि सचु मनि वसै निहचल मति अपारु ॥ रतनु अमोलकु पाइआ गुर का सबदु बीचारु ॥ जिहवा सची मनु सचा सचा सरीर अकारु ॥ नानक सचै सतिगुरि सेविऐ सदा सचु वापारु ॥१॥
मूलम्
रागा विचि स्रीरागु है जे सचि धरे पिआरु ॥ सदा हरि सचु मनि वसै निहचल मति अपारु ॥ रतनु अमोलकु पाइआ गुर का सबदु बीचारु ॥ जिहवा सची मनु सचा सचा सरीर अकारु ॥ नानक सचै सतिगुरि सेविऐ सदा सचु वापारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सचि = सदा स्थिर रहने वाले प्रभु में। मनि = मन में। आकारु = स्वरूप। सरीरु अकारु = (भाव,) मानव शरीर। सचा = (भाव,) सफल। नानक = हे नानक! सतिगुरि सेविऐ = यदि गुरु की सेवा करें, अगर गुरु के हुक्म में चलें।
अर्थ: (सभ) रागों में से श्री राग (तभी श्रेष्ठ) है, यदि (इससे जीव) सदा स्थिर नाम में प्यार (लगन) जोड़े, हरि सदा मन में बसे और अपार प्रभु (को याद करने वाली) बुद्धि अचल हो जाए। (इसका नतीजा ये होता है कि) गुरबाणी की विचार रूपी अमोलक रत्न प्राप्त होता है, जीभ सच्ची, मन सच्चा और मानव जनम ही सफल हो जाता है। पर, हे नानक! ये सच्चा व्यापार तब ही किया जा सकता है अगर सदा स्थिर प्रभु के रूप गुरु के हुक्म में चलें।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ होरु बिरहा सभ धातु है जब लगु साहिब प्रीति न होइ ॥ इहु मनु माइआ मोहिआ वेखणु सुनणु न होइ ॥ सह देखे बिनु प्रीति न ऊपजै अंधा किआ करेइ ॥ नानक जिनि अखी लीतीआ सोई सचा देइ ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ होरु बिरहा सभ धातु है जब लगु साहिब प्रीति न होइ ॥ इहु मनु माइआ मोहिआ वेखणु सुनणु न होइ ॥ सह देखे बिनु प्रीति न ऊपजै अंधा किआ करेइ ॥ नानक जिनि अखी लीतीआ सोई सचा देइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बिरहा = प्यार। धातु = माया। साहिब प्रीति = मालिक का प्यार। सह = खसम। जिनि = जिस (प्रभु) ने। सचा = सदा स्थिर रहने वाला, सच्चा।
अर्थ: जब तक मालिक के साथ प्रीति (उत्पन्न) नहीं होती, और प्यार सब माया (का प्यार) है, और माया में मोहा ये मन (प्रभु को) देख और सुन नहीं सकता। अंधा (मन) करे भी क्या? (प्रभु) पति को देखे बगैर प्रीति पैदा नहीं हो सकती। हे नानक! (माया में फंसा के) जिस प्रभु ने अंधा किया है, वही सदा स्थिर प्रभु फिर आँखें देता है।2
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ हरि इको करता इकु इको दीबाणु हरि ॥ हरि इकसै दा है अमरु इको हरि चिति धरि ॥ हरि तिसु बिनु कोई नाहि डरु भ्रमु भउ दूरि करि ॥ हरि तिसै नो सालाहि जि तुधु रखै बाहरि घरि ॥ हरि जिस नो होइ दइआलु सो हरि जपि भउ बिखमु तरि ॥१॥
मूलम्
पउड़ी ॥ हरि इको करता इकु इको दीबाणु हरि ॥ हरि इकसै दा है अमरु इको हरि चिति धरि ॥ हरि तिसु बिनु कोई नाहि डरु भ्रमु भउ दूरि करि ॥ हरि तिसै नो सालाहि जि तुधु रखै बाहरि घरि ॥ हरि जिस नो होइ दइआलु सो हरि जपि भउ बिखमु तरि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दीबाणु = आसरा। अमरु = हुक्म। चिति = चिक्त में। जि = अगर। घरि = घर में। घरि बाहरि = घर में और बाहर भी, (भाव,) हर जगह। सो = वह मनुष्य। जपि = जप के। बिखमु = मुश्किल। तरि = तैरता है।
अर्थ: हे भाई! एक ही प्रभु (सबका) करणहार व आसरा है, एक प्रभु का हुक्म (चल रहा है), (इसलिए) उसको हृदय में संभाल। उस परमात्मा का कोई शरीक नहीं, (इस वास्ते) किसी और का डर व भ्रम दूर कर दे। (हे जीव!) उसी हरि की स्तुति कर जो तेरी सभ जगह रक्षा करता है। जिस पर परमात्मा दयाल होता है, वह जीव उस को स्मरण करके मुश्किल (संसार के) डर से पार होता है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः १ ॥ दाती साहिब संदीआ किआ चलै तिसु नालि ॥ इक जागंदे ना लहंनि इकना सुतिआ देइ उठालि ॥१॥
मूलम्
सलोक मः १ ॥ दाती साहिब संदीआ किआ चलै तिसु नालि ॥ इक जागंदे ना लहंनि इकना सुतिआ देइ उठालि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (सारी) दातें मालिक की हैं, उससे कोई जोर नहीं चल सकता। कई जागते जीवों को भी नहीं मिली, और कई सोये हुओं को भी उठा के (दातें) दे देता है।1।
पद्अर्थ: दाती = बख्शिशें। संदीआ = की। तिसु नालि = उस (साहिब) के साथ। किआ चलै = क्या जोर चल सकता है। इकि = कई लोग। लहन्हि = प्राप्त करते हैं।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः १ ॥ सिदकु सबूरी सादिका सबरु तोसा मलाइकां ॥ दीदारु पूरे पाइसा थाउ नाही खाइका ॥२॥
मूलम्
मः १ ॥ सिदकु सबूरी सादिका सबरु तोसा मलाइकां ॥ दीदारु पूरे पाइसा थाउ नाही खाइका ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सादिक = सिदक वाला, भरोसे वाला। सबूरी = शुक्र, एहसान मानना। तोसा = राह का खर्च। मलाइक = देवते, देव स्वभाव वाले मनुष्य। पाइसा = पाते हैं। खाइक = निरी बातें करने वाले।
अर्थ: सिदक वालों के पास भरोसे और शुक्र की, और गुरमुखों के पास सब्र (संतोष) की राशि होती है। (इस करके) वे पूरे प्रभु के दर्शन कर लेते हैं। (पर) निरी बातें करने वालों को जगह भी नहीं मिलती।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ सभ आपे तुधु उपाइ कै आपि कारै लाई ॥ तूं आपे वेखि विगसदा आपणी वडिआई ॥ हरि तुधहु बाहरि किछु नाही तूं सचा साई ॥ तूं आपे आपि वरतदा सभनी ही थाई ॥ हरि तिसै धिआवहु संत जनहु जो लए छडाई ॥२॥
मूलम्
पउड़ी ॥ सभ आपे तुधु उपाइ कै आपि कारै लाई ॥ तूं आपे वेखि विगसदा आपणी वडिआई ॥ हरि तुधहु बाहरि किछु नाही तूं सचा साई ॥ तूं आपे आपि वरतदा सभनी ही थाई ॥ हरि तिसै धिआवहु संत जनहु जो लए छडाई ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (हे हरि!) तूने स्वयं ही सारी (सृष्टि) रच के स्वयं ही काम-धंधों में लगा दी है, अपनी ये प्रतिभा देख के भी तू स्वयं ही प्रसन्न हो रहा है, तू सदा कायम रहने वाला प्रभु है तुझसे परे कुछ भी नहीं। सभ जगह तू खुद ही व्याप रहा है। हे गुरमुखो! उस प्रभु का स्मरण करो जो (विकारों से) छुड़ा लेता है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः १ ॥ फकड़ जाती फकड़ु नाउ ॥ सभना जीआ इका छाउ ॥ आपहु जे को भला कहाए ॥ नानक ता परु जापै जा पति लेखै पाए ॥१॥
मूलम्
सलोक मः १ ॥ फकड़ जाती फकड़ु नाउ ॥ सभना जीआ इका छाउ ॥ आपहु जे को भला कहाए ॥ नानक ता परु जापै जा पति लेखै पाए ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: फकड़ = व्यर्थ। छाउ = सादृष्टिता, नुहार। परु = अच्छी तरह। परु जापै = अच्छी तरह प्रगट होता है। नाउ = नाम, मशहूरी, बड़ाई।1।
अर्थ: जाति (का अहंकार) के नाम (बड़प्पन का अहंकार) वयर्थ हैं, (असल में) सारे जीवों की एक ही नुहार होती है (भाव, सबकी आत्मा एक ही है)। (जाति या बड़प्पन के आसरे) यदि कोई जीव अपने आप को अच्छा कहलवाए (तो वह अच्छा नहीं बन जाता)। हे नानक! (जीव) तो ही अच्छा जाना जाता है, यदि लेखे में (भाव सच्ची दरगाह के लेखे के समय) आदर हासिल करे।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः २ ॥ जिसु पिआरे सिउ नेहु तिसु आगै मरि चलीऐ ॥ ध्रिगु जीवणु संसारि ता कै पाछै जीवणा ॥२॥
मूलम्
मः २ ॥ जिसु पिआरे सिउ नेहु तिसु आगै मरि चलीऐ ॥ ध्रिगु जीवणु संसारि ता कै पाछै जीवणा ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आगै = साहमणे, दर पे। मरि चलीऐ = स्वैभाव मिटा दे। ता कै पाछै = उस की तरफ से मुंह मोड़ के।
अर्थ: जिस प्यारे के साथ प्यार (हो), (जाति आदि का) अहंकार छोड़ के उसके सन्मुख रहना चाहिए। संसार में उससे बेमुख हो के जीना- इस जीवन को धिक्कार है।2।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘वाणी’ मनुष्य के जीवन की अगवाई के लिए है। ‘प्यारे’ से पहिले ही मर जाना; अमली जीवन में ये अनहोनी सी बात है। ‘मरने’ से भाव है स्वै भाव को मिटाना, स्वै वारना, अहम् को दूर करना। पिछले श्लोक से ये ख्याल ही मिल सकता है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ तुधु आपे धरती साजीऐ चंदु सूरजु दुइ दीवे ॥ दस चारि हट तुधु साजिआ वापारु करीवे ॥ इकना नो हरि लाभु देइ जो गुरमुखि थीवे ॥ तिन जमकालु न विआपई जिन सचु अम्रितु पीवे ॥ ओइ आपि छुटे परवार सिउ तिन पिछै सभु जगतु छुटीवे ॥३॥
मूलम्
पउड़ी ॥ तुधु आपे धरती साजीऐ चंदु सूरजु दुइ दीवे ॥ दस चारि हट तुधु साजिआ वापारु करीवे ॥ इकना नो हरि लाभु देइ जो गुरमुखि थीवे ॥ तिन जमकालु न विआपई जिन सचु अम्रितु पीवे ॥ ओइ आपि छुटे परवार सिउ तिन पिछै सभु जगतु छुटीवे ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: (हे परमात्मा!) तूने स्वयं ही धरती रची है और (इसके वास्ते) चंद्रमा व सूरज (जैसे) दो दिऐ (बनाए हैं), (जीवों के सच्चा) व्यापार करने के लिए चौदह (लोक जैसे) दुकानें बना दी हैं। जो जीव गुरु के सन्मुख हो गए हैं, और जिन्होंने आत्मिक जीवन देने वाला सदा स्थिर नाम जल पीया है, उन्हें हरि लाभ प्रदान करता है (भाव, उनका जन्म सफल करता है) और जमकाल उनपे प्रभाव नहीं डाल सकता। वे (जमकाल से) बच जाते हैं, और उनके पद्चिन्हों पे चल के सारा संसार बच जाता है।3।
[[0084]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः १ ॥ कुदरति करि कै वसिआ सोइ ॥ वखतु वीचारे सु बंदा होइ ॥ कुदरति है कीमति नही पाइ ॥ जा कीमति पाइ त कही न जाइ ॥ सरै सरीअति करहि बीचारु ॥ बिनु बूझे कैसे पावहि पारु ॥ सिदकु करि सिजदा मनु करि मखसूदु ॥ जिह धिरि देखा तिह धिरि मउजूदु ॥१॥
मूलम्
सलोक मः १ ॥ कुदरति करि कै वसिआ सोइ ॥ वखतु वीचारे सु बंदा होइ ॥ कुदरति है कीमति नही पाइ ॥ जा कीमति पाइ त कही न जाइ ॥ सरै सरीअति करहि बीचारु ॥ बिनु बूझे कैसे पावहि पारु ॥ सिदकु करि सिजदा मनु करि मखसूदु ॥ जिह धिरि देखा तिह धिरि मउजूदु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: करि कै = रच के, पैदा कर के। सोइ = वह स्वयं ही। वखतु = मनुष्य के जन्म का समय। कही न जाइ = बयान नहीं हो सकती। सरै = शरा का। पारु = अंत, परला छोर। सिजदा = रब के आगे झुकना। मखसूद = निशाना, मखसद, प्रयोजन। जिह धिरि = जिस तरफ। मउजूदु = मौजूद, हाजिर।
अर्थ: सृष्टि (पैदा करने वाला प्रभु) स्वयं ही (इस में) बस रहा है। यहाँ जो मनुष्य (मानव जनम) के समय को विचारता है (भाव, जो यह सोचता है कि इस जगत में मनुष्य का शरीर किस लिए मिला है) वह (उस प्रभु का) सेवक बन जाता है। प्रभु (अपनी रची) कुदरति में व्यापक है, उसका मूल्य नहीं पड़ सकता; जो कोई मुल्य डालने का यत्न भी करे, तो भी उसका मूल्य बताया नहीं जा सकता।
जो मनुष्य निरी शरा आदि (अर्थात, बाहरली धार्मिक रस्मों) की ही विचार करते हैं, वह (जीवन के सही उद्देश्य को) समझे बिना (जीवन का) दूसरा छोर कैसे ढूँढ सकते हैं? (हे भाई!) ईश्वर पे भरोसा रख - ये है उसके आगे सिर झुकाना, अपने मन को ईश्वर में जोड़ना - इसको जिंदगी का निशाना बना। फिर जिस तरफ देखें, उस तरफ रब दिखता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ गुर सभा एव न पाईऐ ना नेड़ै ना दूरि ॥ नानक सतिगुरु तां मिलै जा मनु रहै हदूरि ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ गुर सभा एव न पाईऐ ना नेड़ै ना दूरि ॥ नानक सतिगुरु तां मिलै जा मनु रहै हदूरि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुर सोभा = गुरु का संग। एव = इस तरह (निरा शारीरिक तौर पे)। हदूरि = हजूरी में, चरणों में, याद में।
अर्थ: (शरीर से) गुरु के नजदीक या दूर बैठने से गुरु का संग प्राप्त नहीं होता। हे नानक! सतिगुरु तभी मिलता है जब (सिख का) मन (गुरु की) हजूरी में रहता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ सपत दीप सपत सागरा नव खंड चारि वेद दस असट पुराणा ॥ हरि सभना विचि तूं वरतदा हरि सभना भाणा ॥ सभि तुझै धिआवहि जीअ जंत हरि सारग पाणा ॥ जो गुरमुखि हरि आराधदे तिन हउ कुरबाणा ॥ तूं आपे आपि वरतदा करि चोज विडाणा ॥ ४॥
मूलम्
पउड़ी ॥ सपत दीप सपत सागरा नव खंड चारि वेद दस असट पुराणा ॥ हरि सभना विचि तूं वरतदा हरि सभना भाणा ॥ सभि तुझै धिआवहि जीअ जंत हरि सारग पाणा ॥ जो गुरमुखि हरि आराधदे तिन हउ कुरबाणा ॥ तूं आपे आपि वरतदा करि चोज विडाणा ॥ ४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दीप = (संस्कृत शब्द ‘द्वीप’) जिसके दोनों तरफ जल हो।
दर्पण-टिप्पनी
भारत के पुराने संस्कृत विद्वानों ने पृथ्वी को बहुत हिस्सों में बाँटा। कोई इसके चार हिस्से करते हैं, कोई सात, कोई नौ और कोइ तेरह। हरेक हिस्से का नाम ‘द्वीप’ रखा और ये प्राचीन ख्याल है कि ये हिस्से आपस में भारी समुंद्रों से अलग अलग हैं। संस्कृत के एक प्रसिद्ध कवि श्री हर्ष की रची हुई पुस्तक महाकाव्य नैश्धचरित के पहले सर्ग में 18 द्वीप बताए गए हैं। पर प्रसिद्ध गिनती सात ही है जैसा कि ‘रघुवंश’ व ‘शकुंतला’ नामक प्रसिद्ध पुस्तकों में दर्ज है। इन सातों में बीच के द्वीप का नाम ‘जंबूद्वीप’ है जिसमें हमारा देश भारत वर्ष शामिल है। दस असट पुराणा: अठारह पुराण।18 पुराण ये हैं;
ब्राहम पाहम वैष्णव च शैवं भागवं तथा॥
तथान्यन्नारदीयं च मार्कण्डेयं च सप्रमं॥
आग्नेयमष्टकं प्रोक्तं भविष्यन्नवमं तथा॥
दशमं ब्रहमवैवंर्त लिंगमेकादशं तथा॥
वाराहं द्वादशां प्रोक्तं स्कांद चात्र त्रयोदशं॥
चतुर्दशं वामनं च कौर्म पञचदशं तथा॥
माज्स्यं च गारुडं चैवब्रहम णाष्टादश तथा॥
ब्रह्म, पदम, विष्णु, शिव, भगवत, नारद, मार्कण्डे, अग्नि, भविष्यत, ब्रह्म विर्वत, लिंग, वराह, सकंद, वामन, कूरम, मत्स्य, गरुड़, ब्रह्माण्ड।
दर्पण-भाषार्थ
नव खंड = धरती के नौ हिस्से। सारग = धनुष। पाणा = पाणि, हाथ। सारगपाण = जिसके हाथ में धनुष है। गुरमुखि = गुरु के द्वारा, गुरु के बताए हुए राह पे चल के। चोज = कौतक, लीला। विडाणा = आश्चर्य।4।
अर्थ: सात द्वीप, सात समुंदर, नौ खण्ड, चार वेद; आठारह पुराण, इन सब में तू ही बस रहा है, और सभी को प्यारा लगता है। हे धर्नुधारी प्रभु! सारे जीव-जंतु तेरा ही स्मरण करते हैं। मैं सदके हूँ उन पे से, जो गुरु के सन्मुख हो के तुझे जपते हैं (हलांकि) तू आश्चर्यजनक लीला रच के खुद ही खुद सब में व्यापक है।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ कलउ मसाजनी किआ सदाईऐ हिरदै ही लिखि लेहु ॥ सदा साहिब कै रंगि रहै कबहूं न तूटसि नेहु ॥ कलउ मसाजनी जाइसी लिखिआ भी नाले जाइ ॥ नानक सह प्रीति न जाइसी जो धुरि छोडी सचै पाइ ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ कलउ मसाजनी किआ सदाईऐ हिरदै ही लिखि लेहु ॥ सदा साहिब कै रंगि रहै कबहूं न तूटसि नेहु ॥ कलउ मसाजनी जाइसी लिखिआ भी नाले जाइ ॥ नानक सह प्रीति न जाइसी जो धुरि छोडी सचै पाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कलउ = कलम। मसाजनी = दवात। रंगि = पिआर में। सह प्रीति = पति का प्यार। धुरि = धुर से, अपने दर से। सचै = सदा स्थिर प्रभु ने। पाइ छोडी = (हृदय में) डाल दी है।1।
अर्थ: कलम दवात मंगाने का क्या लाभ? (हे सज्जन!) हृदय में ही (हरि का नाम) लिख ले। (इस तरह यदि) मनुष्य सदा सांई के प्यार में (भीगा) रहे (तो) ये प्यार कभी नहीं टूटेगा। (वरना) कलम दवात तो नाश होने वाली (चीज) है और (इसका) लिखा (कागज) भी नाश हो जाना है। पर, हे नानक! जो प्यार सच्चे प्रभु ने अपने दर से (जीव के हृदय में) बीज दिया है उसका नाश नही होगा।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ नदरी आवदा नालि न चलई वेखहु को विउपाइ ॥ सतिगुरि सचु द्रिड़ाइआ सचि रहहु लिव लाइ ॥ नानक सबदी सचु है करमी पलै पाइ ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ नदरी आवदा नालि न चलई वेखहु को विउपाइ ॥ सतिगुरि सचु द्रिड़ाइआ सचि रहहु लिव लाइ ॥ नानक सबदी सचु है करमी पलै पाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: को = कोई भी मनुष्य। विउपाइ = निर्णय करके। सतिगुरि = गुरु ने। द्रिड़ाइआ = पक्का किया है। सबदी = गुरु के शब्द द्वारा। करमी = मिहर से। पलै पाइ = मिलता है।2।
अर्थ: बेशक निर्णय करके देख लो, जो कुछ (इन आँखों से) दिखता है (जीव के) साथ नही जा सकता, (इस करके) सतिगुरु ने निश्चय कराया है (कि) सच्चा प्रभु (साथ निभने योग्य है), (इसलिए) प्रभु में तवज्जो जोड़ी रखो। हे नानक! जो प्रभु की मेहर हो तो गुरु के शब्द से सच्चा हरि हृदय में बसता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ हरि अंदरि बाहरि इकु तूं तूं जाणहि भेतु ॥ जो कीचै सो हरि जाणदा मेरे मन हरि चेतु ॥ सो डरै जि पाप कमावदा धरमी विगसेतु ॥ तूं सचा आपि निआउ सचु ता डरीऐ केतु ॥ जिना नानक सचु पछाणिआ से सचि रलेतु ॥५॥
मूलम्
पउड़ी ॥ हरि अंदरि बाहरि इकु तूं तूं जाणहि भेतु ॥ जो कीचै सो हरि जाणदा मेरे मन हरि चेतु ॥ सो डरै जि पाप कमावदा धरमी विगसेतु ॥ तूं सचा आपि निआउ सचु ता डरीऐ केतु ॥ जिना नानक सचु पछाणिआ से सचि रलेतु ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मन = हे मन। विगसेतु = खुश होता है। सचा = अटल। केतु = क्यूँ? सचि = सदा स्थिर रहने वाले हरि में।5।
अर्थ: हे हरि! तू हर जगह (अंदर-बाहर) (व्यापक) है, (इस करके जीवों के) हृदयों को तू ही जानता है। हे मेरे मन! जो कुछ करते हैं (सब जगह व्यापक होने के कारण) वह हरि जानता है, (इसलिए) उसका स्मरण कर। पाप करने वाले को (ईश्वर से) डर लगता है, और धर्मी (देख के) खुश होता है। हे हरि! डरें भी क्यूँ? (जब जैसा) तूं स्वयं सच्चा है (तैसे ही) तेरा न्याय भी सच्चा है। (डरना तो कहीं रहा), हे नानक! जिन्हें सच्चे हरि की समझ पड़ी है, वह उसमें ही घुल मिल जाते हैं (भाव, उसके साथ ही एक-मेक हो जाते हैं)।5।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ कलम जलउ सणु मसवाणीऐ कागदु भी जलि जाउ ॥ लिखण वाला जलि बलउ जिनि लिखिआ दूजा भाउ ॥ नानक पूरबि लिखिआ कमावणा अवरु न करणा जाइ ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ कलम जलउ सणु मसवाणीऐ कागदु भी जलि जाउ ॥ लिखण वाला जलि बलउ जिनि लिखिआ दूजा भाउ ॥ नानक पूरबि लिखिआ कमावणा अवरु न करणा जाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पूरबि लिखिआ = पहले से कमाया हुआ। मनुष्य जो जो कर्म करता है, उसके दो नतीजे निकलते हैं: एक स्पष्ट दिखने वाले, माया के लाभ या हानि, और दूसरा, उस कर्म का असर जो मन पर पड़ता है, जिसके वास्ते ‘संस्कार’ शब्द बरता जा सकता है। अच्छे कर्मों के अच्छे संस्कार और बुरे के बुरे। किसी कर्म का अच्छा या बुरा होना भी कर्म की बाहरी दिखती विधि या तरीके से नहीं जांची जा सकती। ये भी मन की भावना के अधीन है। सो मनुष्य का मन क्या है? उसके पिछले किए कर्मों के संस्कारों का समन्वय। मनुष्य सदैव इन संस्कारों के अधीन रहता है। अगर ये संस्कार ठीक हों, तो मन अच्छी ओर ले जाता है, जो बुरे हों तो बुरी ओर। इसी को ही ‘पूरबि लिखिआ’ कहा गया है। ये ‘पूरबि लिखे’ संस्कार मनुष्य के अपने यत्न से नहीं मिट सकते, क्योंकि अपना यत्न मनुष्य सदा अपने मन के द्वारा ही कर सकता है, और मन सदा उधर प्रेरता है जिधर के इस में संस्कार हैं। एक ही तरीका है इनको मिटाने का, भाव, मन के संस्कारों को सतिगुरु की रजा में लीन कर देना।
जलउ = जल जाए। सणु = समेत। जलि बलउ = जल बल जाए। जिनि = जिस ने। भाउ = प्यार। दूजा भाउ = प्रभु को छोड़ के दूसरे का प्यार, माया का प्यार।1।
अर्थ: जल जाए वह कलम, समेत दवात के, और वह कागज भी जल जाए, लिखने वाला भी जल मरे, जिसने (निरा) माया के प्यार का लेखा लिखा है, (क्यूँकि) हे नानक! (जीव) वही कुछ कमाता है, जो (संस्कार अपने अच्छे-बुरे किए हुए कर्मों के अनुसार) पहिले से (अपने हृदय पर) लिखे जाता है; (जीव) इस के उलट कुछ नहीं कर सकता।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ होरु कूड़ु पड़णा कूड़ु बोलणा माइआ नालि पिआरु ॥ नानक विणु नावै को थिरु नही पड़ि पड़ि होइ खुआरु ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ होरु कूड़ु पड़णा कूड़ु बोलणा माइआ नालि पिआरु ॥ नानक विणु नावै को थिरु नही पड़ि पड़ि होइ खुआरु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कूड़ = नाशवान, व्यर्थ।2।
अर्थ: और (माया संबंधी) पढ़ना व्यर्थ का उद्यम है, और बोलना (भी) व्यर्थ (क्योंकि ये उद्यम) माया के साथ प्यार (बढ़ाते हैं)। हे नानक! प्रभु के नाम के बिना कोई भी सदा नहीं रहेगा (भाव, सदा साथ नहीं निभेगा), (इस वास्ते) यदि कोई अन्य पढ़ाईआं ही पढ़ता है ख्वार होता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ हरि की वडिआई वडी है हरि कीरतनु हरि का ॥ हरि की वडिआई वडी है जा निआउ है धरम का ॥ हरि की वडिआई वडी है जा फलु है जीअ का ॥ हरि की वडिआई वडी है जा न सुणई कहिआ चुगल का ॥ हरि की वडिआई वडी है अपुछिआ दानु देवका ॥६॥
मूलम्
पउड़ी ॥ हरि की वडिआई वडी है हरि कीरतनु हरि का ॥ हरि की वडिआई वडी है जा निआउ है धरम का ॥ हरि की वडिआई वडी है जा फलु है जीअ का ॥ हरि की वडिआई वडी है जा न सुणई कहिआ चुगल का ॥ हरि की वडिआई वडी है अपुछिआ दानु देवका ॥६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वडी = बड़ी करनी, सब से अच्छा काम। जीअ का फल = जिंद का फल, जीवन का उद्देश्य। अपुछिआ = किसी की सलाह लेने के बिना, किसी को पूछे बिना।6।
अर्थ: जिस हरि का धर्म का न्याय है, उसकी महिमा और उसका कीरतन करना - यही (जीव के लिए) बड़ी (उत्तम करनी) है। हरि की उपमा करनी सबसे अच्छा काम है (क्योंकि) जीव का (असली) फल (यह ही) है (भाव, जीवन का उद्देश्य ही यही है)। जो प्रभु चुगली की बात पर कान नहीं धरता, उस (प्रभु की) कीर्ति करनी बड़ा कर्म है। जो प्रभु किसी को पूछ के दान नही देता उसकी उपमा उत्तम काम है।6।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ हउ हउ करती सभ मुई स्मपउ किसै न नालि ॥ दूजै भाइ दुखु पाइआ सभ जोही जमकालि ॥ नानक गुरमुखि उबरे साचा नामु समालि ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ हउ हउ करती सभ मुई स्मपउ किसै न नालि ॥ दूजै भाइ दुखु पाइआ सभ जोही जमकालि ॥ नानक गुरमुखि उबरे साचा नामु समालि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभ = सारी सृष्टि। मुई = दुखी हुई। हउ हउ करती = अहंकार कर कर के। संपउ = धन। दूजै भाइ = माया के प्यार में। जोही = देखी,घूरा। कालि = काल ने। समालि = संभाल के।1।
अर्थ: धन किसी के साथ नही (निभता, परंतु धन की टेक रखने वाले सारे जीव अहंकारी हो हो के खपते हैं, आत्मिक मौत मरे रहते हैं। माया के प्यार में सब ने दुख ही पाया है (क्योंकि) जमकाल ने (ऐसे) सभी को घूरा है (भाव, माया के मोह में फंसे जीव मौत से थर थर काँपते हैं, मानों, उन्हें जमकाल घूर रहा है)। हे नानक! गुरु के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सदा स्थिर प्रभु का नाम हृदय में संभाल के आत्मिक मौत से बचे रहते हैं।1।
[[0085]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः १ ॥ गलीं असी चंगीआ आचारी बुरीआह ॥ मनहु कुसुधा कालीआ बाहरि चिटवीआह ॥ रीसा करिह तिनाड़ीआ जो सेवहि दरु खड़ीआह ॥ नालि खसमै रतीआ माणहि सुखि रलीआह ॥ होदै ताणि निताणीआ रहहि निमानणीआह ॥ नानक जनमु सकारथा जे तिन कै संगि मिलाह ॥२॥
मूलम्
मः १ ॥ गलीं असी चंगीआ आचारी बुरीआह ॥ मनहु कुसुधा कालीआ बाहरि चिटवीआह ॥ रीसा करिह तिनाड़ीआ जो सेवहि दरु खड़ीआह ॥ नालि खसमै रतीआ माणहि सुखि रलीआह ॥ होदै ताणि निताणीआ रहहि निमानणीआह ॥ नानक जनमु सकारथा जे तिन कै संगि मिलाह ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आचारी = चाल चलन में। मनहु = मन से। कुसुधा = खोटी। तिनाड़ीआ = उनकी। सेवहि दरु = दरवाजे पे बैठी हैं। सकारथा = सफल।2।
अर्थ: हम बातों में निपुण (है, पर) आचरन की बुरी हैं, मन से खोटी और काली (हैं, पर) बाहर से साफ सुथरी। (फिर भी) हम नकल उनकी करती हैं जो सावधान हो के पति के प्यार में भीगी हुई हैं और आनन्द, सुख माणती हैं, जो ताकत के होते हुए भी विनम्रता में रहती हैं। हे नानक! (हमारा) जनम सफल (तभी हो सकता है) यदि उनकी संगति में रहें।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ तूं आपे जलु मीना है आपे आपे ही आपि जालु ॥ तूं आपे जालु वताइदा आपे विचि सेबालु ॥ तूं आपे कमलु अलिपतु है सै हथा विचि गुलालु ॥ तूं आपे मुकति कराइदा इक निमख घड़ी करि खिआलु ॥ हरि तुधहु बाहरि किछु नही गुर सबदी वेखि निहालु ॥७॥
मूलम्
पउड़ी ॥ तूं आपे जलु मीना है आपे आपे ही आपि जालु ॥ तूं आपे जालु वताइदा आपे विचि सेबालु ॥ तूं आपे कमलु अलिपतु है सै हथा विचि गुलालु ॥ तूं आपे मुकति कराइदा इक निमख घड़ी करि खिआलु ॥ हरि तुधहु बाहरि किछु नही गुर सबदी वेखि निहालु ॥७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मीना = मछली। वताइदा = बिछाता। सैबालु = (संस्कृत: शैवाल) पानी में हरे रंग का जाला (भाव, दुनिया के पदार्थ)। अलिपतु = अलिप्त, निराला। सै हथा विचि = सैंकड़ों हाथ गहरे (पानी) में। गुलाल = सुंदर। निमख = पलक झपकने जितना समय। निहालु = प्रसन्न, चढ़ती कला में, खिला हुआ।7।
अर्थ: (हे प्रभु!) तू स्वयं ही (मछली का जीवन-रूप) जल है, स्वयं ही (जल में) मछली है, और स्वयं ही जाल है। तू खुद ही जाल बिछाता है और खुद ही जल में जाला है, तू खुद ही गहरे जल में सुंदर निर्लिप कमल है। (हे हरि!) जो (जीव) एक पलक मात्र (तेरा) ध्यान धरे (उसे) तू स्वयं ही (इस जाल में से) छुड़ाता है। हे हरि! तुझसे परे और कुछ नही है, सतिगुरु के शब्द से (तुझे हर जगह) देख के (कमल के फूल की तरह) प्रसन्न अवस्था में रह सकते हैं।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ हुकमु न जाणै बहुता रोवै ॥ अंदरि धोखा नीद न सोवै ॥ जे धन खसमै चलै रजाई ॥ दरि घरि सोभा महलि बुलाई ॥ नानक करमी इह मति पाई ॥ गुर परसादी सचि समाई ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ हुकमु न जाणै बहुता रोवै ॥ अंदरि धोखा नीद न सोवै ॥ जे धन खसमै चलै रजाई ॥ दरि घरि सोभा महलि बुलाई ॥ नानक करमी इह मति पाई ॥ गुर परसादी सचि समाई ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: रोवै = रोता है, कलपता है। धोखा = चिन्ता। धन = जीव-स्त्री। दरि = (प्रभु के) दर पर। महिल = प्रभु के महल में, हजूरी में। करमी = मिहर से।1।
अर्थ: (जिस मनुष्य को प्रभु के) भाणे की (रजा की, मर्जी की) समझ नहीं पड़ती, उसे बहुत रोना-धोना लगा रहता है, उसका मन चिन्ता में रहता है। (इस करके) सुख की नींद नहीं सो सकता। (भाव कभी शांति नही मिलती)। अगर (जीव) स्त्री (प्रभु) पति की रजा में चले तो दरगाह में और इस संसार में उसकी शोभा होती है और (प्रभु की) हजूरी में उसको आदर मिलता है। (पर, हे नानक!) प्रभु मेहर करे तो (रजा मानने वाली ये) समझ मिलती है, और गुरु की कृपा से (रजा के मालिक) सदा स्थिर सांई में जीव लीन हो जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ मनमुख नाम विहूणिआ रंगु कसु्मभा देखि न भुलु ॥ इस का रंगु दिन थोड़िआ छोछा इस दा मुलु ॥ दूजै लगे पचि मुए मूरख अंध गवार ॥ बिसटा अंदरि कीट से पइ पचहि वारो वार ॥ नानक नाम रते से रंगुले गुर कै सहजि सुभाइ ॥ भगती रंगु न उतरै सहजे रहै समाइ ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ मनमुख नाम विहूणिआ रंगु कसु्मभा देखि न भुलु ॥ इस का रंगु दिन थोड़िआ छोछा इस दा मुलु ॥ दूजै लगे पचि मुए मूरख अंध गवार ॥ बिसटा अंदरि कीट से पइ पचहि वारो वार ॥ नानक नाम रते से रंगुले गुर कै सहजि सुभाइ ॥ भगती रंगु न उतरै सहजे रहै समाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: छोछा = तुच्छ। पचि मुए = खुआर होते हैं। कीट = कीड़े। पइ = पड़ कर। वारो वार = बार बार। रंगुले = सुंदर। सहजि = सहज अवस्था में। सहजे = सहिज में।2।
अर्थ: हे नाम से वंचित मनमुख! कुसंभ का (माया का) रंग देख के मोहित ना हो जा, इसका रंग (आनंद) थोड़े दिन ही रहता है, और इसका मुल्य भी तुच्छ सा ही होता है। जैसे बिष्ठा में पड़े हुए कीड़े करल-बरल करते हैं वैसे ही मूर्ख (अकल से) अंधे और मति हीन जीव माया के मोह में फंस के मुड़ मुड़ के दुखी होते हैं। हे नानक! जो जीव गुरु के ज्ञान और स्वाभाव में (अपनी मति और स्वाभाव लीन कर देते हैं), वे नाम में भीगे हुए और संदर हैं, सहज अवस्था में लीन रहने के कारण उनकी भक्ति का रंग कभी नहीं उतरता।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ सिसटि उपाई सभ तुधु आपे रिजकु स्मबाहिआ ॥ इकि वलु छलु करि कै खावदे मुहहु कूड़ु कुसतु तिनी ढाहिआ ॥ तुधु आपे भावै सो करहि तुधु ओतै कमि ओइ लाइआ ॥ इकना सचु बुझाइओनु तिना अतुट भंडार देवाइआ ॥ हरि चेति खाहि तिना सफलु है अचेता हथ तडाइआ ॥८॥
मूलम्
पउड़ी ॥ सिसटि उपाई सभ तुधु आपे रिजकु स्मबाहिआ ॥ इकि वलु छलु करि कै खावदे मुहहु कूड़ु कुसतु तिनी ढाहिआ ॥ तुधु आपे भावै सो करहि तुधु ओतै कमि ओइ लाइआ ॥ इकना सचु बुझाइओनु तिना अतुट भंडार देवाइआ ॥ हरि चेति खाहि तिना सफलु है अचेता हथ तडाइआ ॥८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: संबाहिआ = पहुँचाया। इकि = कई जीव। मुहहु = मुंह से। ढाहिआ = बोला। ओइ = वह सारे जीव। बुझाइओनु = बताया, ज्ञान दिया उस (हरि) ने। चेति = चेत के, स्मरण करके।8।
अर्थ: (हे हरि!) तूने स्वयं (सारा) संसार रचा है, और सबको रिजक पहुँचा रहा है। (फिर भी) कई जीव (तूझे राजक नहीं समझते हुए) छल-कपट करके पेट भरते हैं, और मुंह से झूठ-तूफान बोलते हैं। (हे हरि!) जो तेरी रजा है सो ही वो करते हैं, तूने उन्हें वैसे ही कामों (छल-कपट) में ही लगा रखा है। जिन्हें हरि ने अपने सच्चे नाम की सूझ बख्शी है, उन्हें इतने खजाने (संतोष के) उसने दिए हैं कि कमी नहीं आती। (असल बात ये है कि) जो जीव प्रभु को याद करके माया का इस्तेमाल करते हैं, उन्हें फलती है। (भाव, वे तृष्णातुर नहीं होते) और रब की याद से वंचित लोगों के हाथ (सदा) फैले रहते हैं (भाव, उनकी तृष्णा नहीं मिटती)।8।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ पड़ि पड़ि पंडित बेद वखाणहि माइआ मोह सुआइ ॥ दूजै भाइ हरि नामु विसारिआ मन मूरख मिलै सजाइ ॥ जिनि जीउ पिंडु दिता तिसु कबहूं न चेतै जो देंदा रिजकु स्मबाहि ॥ जम का फाहा गलहु न कटीऐ फिरि फिरि आवै जाइ ॥ मनमुखि किछू न सूझै अंधुले पूरबि लिखिआ कमाइ ॥ पूरै भागि सतिगुरु मिलै सुखदाता नामु वसै मनि आइ ॥ सुखु माणहि सुखु पैनणा सुखे सुखि विहाइ ॥ नानक सो नाउ मनहु न विसारीऐ जितु दरि सचै सोभा पाइ ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ पड़ि पड़ि पंडित बेद वखाणहि माइआ मोह सुआइ ॥ दूजै भाइ हरि नामु विसारिआ मन मूरख मिलै सजाइ ॥ जिनि जीउ पिंडु दिता तिसु कबहूं न चेतै जो देंदा रिजकु स्मबाहि ॥ जम का फाहा गलहु न कटीऐ फिरि फिरि आवै जाइ ॥ मनमुखि किछू न सूझै अंधुले पूरबि लिखिआ कमाइ ॥ पूरै भागि सतिगुरु मिलै सुखदाता नामु वसै मनि आइ ॥ सुखु माणहि सुखु पैनणा सुखे सुखि विहाइ ॥ नानक सो नाउ मनहु न विसारीऐ जितु दरि सचै सोभा पाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वखाणहि = व्याख्या करते हैं। सुआइ = स्वाद में। जिनि = जिस हरि ने। जीउ = जिंद। संबाहि देंदा = पहुँचाता है। मनि = मन में। माणहि = (नाम जपने वाले) माणते हैं। सुखि = सुख में। सुखे सुखि = सुख ही सुख में। जितु = जिस द्वारा।1।
अर्थ: (जीभ से) पढ़ पढ़ के (पर) माया के मोह के स्वाद में पंडित लोग वेदों की व्याख्या करते हैं। (वेद पाठी होते हुए भी) जो मनुष्य माया के प्यार में हरि का नाम विसारता है, उस मन के मूर्ख को दण्ड मिलता है। (क्योंकि) जिस हरि ने जिंद और शरीर (भाव, मनुष्य जन्म) बख्शा है और जो रिजक पहुँचाता है उसे वह कभी याद भी नहीं करता, जम की फांसी उसके गले से कभी काटी नहीं जाती और मुड़ मुड़ के वह पैदा होता मरता है। अंधे मनमुख को कुछ समझ नहीं आती, और (पहले किए कर्मों के अनुसार जो संस्कार अपने हृदय से) लिखता रहा है, (उनके अनुसार ही अब भी) वैसे काम किए जाता है। (जिस मनुष्य को) सौभाग्यवश सुखदाता सतिगुरु मिल जाता है, नाम उसके मन में आ बसता है। (गुरु की शरण पड़ने वाले मनुष्य) आत्मिक आनंद का सुख भोगते हैं। (दुनिया का खाना) माणना (उनके वास्ते) आत्मिक आनंद ही है, और (उनकी उम्र) पूरी तरह सुख में ही व्यतीत होती है। हे नानक! ऐसा (सुखदाई) नाम मन में से विसारना ठीक नहीं, जिस से सच्ची दरगाह में शोभा मिलती है।1।
[[0086]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ सचु नामु गुणतासु ॥ गुरमती आपु पछाणिआ राम नाम परगासु ॥ सचो सचु कमावणा वडिआई वडे पासि ॥ जीउ पिंडु सभु तिस का सिफति करे अरदासि ॥ सचै सबदि सालाहणा सुखे सुखि निवासु ॥ जपु तपु संजमु मनै माहि बिनु नावै ध्रिगु जीवासु ॥ गुरमती नाउ पाईऐ मनमुख मोहि विणासु ॥ जिउ भावै तिउ राखु तूं नानकु तेरा दासु ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ सतिगुरु सेवि सुखु पाइआ सचु नामु गुणतासु ॥ गुरमती आपु पछाणिआ राम नाम परगासु ॥ सचो सचु कमावणा वडिआई वडे पासि ॥ जीउ पिंडु सभु तिस का सिफति करे अरदासि ॥ सचै सबदि सालाहणा सुखे सुखि निवासु ॥ जपु तपु संजमु मनै माहि बिनु नावै ध्रिगु जीवासु ॥ गुरमती नाउ पाईऐ मनमुख मोहि विणासु ॥ जिउ भावै तिउ राखु तूं नानकु तेरा दासु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सेवि = सेवा करके, हुक्म मान के। गुणतास = गुणों का खजाना। आपु = अपने आप को। सबदि = शब्द से। संजमु = इन्द्रियों को रोकने का उद्यम। ध्रिगु = धृग, फिटकारयोग्य। मोहि = मोह में (फंस के)।2।
अर्थ: (जिस ने) सत्गुरू की बताई सेवा की है (उसे) गुणों का खजाना सच्चा नाम (रूपी) सुख प्राप्त होता है। गुरु की मति ले के (वह) स्वै की पहिचान करता है, और हरि के नाम का (उसके अंदर) प्रकाश होता है। वह सिर्फ सदा स्थिर नाम नाम जपने की कमाई करता है, (इस करके) प्रभु की दरगाह में (उसको) आदर मिलता है। जिंद और शरीर सब कुछ प्रभु का (जान के वह प्रभु के आगे) विनती व महिमा करता है। शब्द के द्वारा वह सदा स्थिर प्रभु की कीर्ति करता है, और हर समय आत्मिक आनंद में लीन रहता है। प्रभु की महिमा मन में बसानी -यही उस के लिए जप, तप और संयम है और नाम विहीन जीवन (उसे) धिक्कारयोग्य (प्रतीत होता है)। (यही) नाम गुरु की मति पे चलने से मिलता है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य मोह में (फंस के) नष्ट होता है (भाव, मानव जन्म व्यर्थ गवा लेता है)। (हे प्रभु!) जैसे तुझे ठीक लगे, वैसे सहायता कर (और नाम की दाति दे) नानक तेरा सेवक है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ सभु को तेरा तूं सभसु दा तूं सभना रासि ॥ सभि तुधै पासहु मंगदे नित करि अरदासि ॥ जिसु तूं देहि तिसु सभु किछु मिलै इकना दूरि है पासि ॥ तुधु बाझहु थाउ को नाही जिसु पासहु मंगीऐ मनि वेखहु को निरजासि ॥ सभि तुधै नो सालाहदे दरि गुरमुखा नो परगासि ॥९॥
मूलम्
पउड़ी ॥ सभु को तेरा तूं सभसु दा तूं सभना रासि ॥ सभि तुधै पासहु मंगदे नित करि अरदासि ॥ जिसु तूं देहि तिसु सभु किछु मिलै इकना दूरि है पासि ॥ तुधु बाझहु थाउ को नाही जिसु पासहु मंगीऐ मनि वेखहु को निरजासि ॥ सभि तुधै नो सालाहदे दरि गुरमुखा नो परगासि ॥९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सभु को = हरेक जीव। रासि = राशि, पूंजी। अरदासि = अर्ज। करि = करके। पासि = नजदीक (होते हुए भी)। निरजासि = निर्णय करके। को = कोई भी। दरि = दर पे, हजूरी में।9।
अर्थ: (हे हरि!) हरेक जीव तेरा (बनाया हुआ है) तू सबका (मालिक है और) सभी का खजाना है (भाव, राजक, रिजक देने वाला है) इसीलिए सारे जीव जोदड़ियां करके तेरे पास से ही दान मांगते हैं। जिस को तू दान देता है, उसे सब कुछ मिल जाता है (भाव, उसकी भटकना दूर हो जाती है)। (पर, जो और दर ढूँढते हैं, उनके) तू नजदीक होते हुए भी (उनसे) दूर प्रतीत हो रहा है। कोई पक्ष भी मन में निर्णय करके देख ले (हे हरि!) तेरे बगैर और कोई ठिकाना नहीं, जहाँ से कुछ माँग सकें। (वैसे तो) सारे जीव तेरी ही उपमा कर रहे हैं (पर) (जो जीव) गुरु के सन्मुख रहते हैं (उन्हें) तू अपनी दरगाह में प्रकट करता है (भाव, आदर बख्शता है)।9।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ पंडितु पड़ि पड़ि उचा कूकदा माइआ मोहि पिआरु ॥ अंतरि ब्रहमु न चीनई मनि मूरखु गावारु ॥ दूजै भाइ जगतु परबोधदा ना बूझै बीचारु ॥ बिरथा जनमु गवाइआ मरि जमै वारो वार ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ पंडितु पड़ि पड़ि उचा कूकदा माइआ मोहि पिआरु ॥ अंतरि ब्रहमु न चीनई मनि मूरखु गावारु ॥ दूजै भाइ जगतु परबोधदा ना बूझै बीचारु ॥ बिरथा जनमु गवाइआ मरि जमै वारो वार ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंतरि = अपने अंदर। न चीनई = नहीं पहचानता। मनि = मन में। दूजै भाइ = ईश्वर के बिना और प्यार में। परबोधदा = प्रबोध करता, राय देना, ज्ञान देता है, जगाता है।1।
अर्थ: पढ़ पढ़ के पण्डित (जीभ से वेद आदि का) ऊँची स्वर में उच्चारण करता है (पर) माया के मोह प्यार (उसे व्याप रहा है)। (वह) हृदय में ईश्वर की तलाश नहीं करता, (इस करके) मन से मूर्ख व अनपढ़ (ही है) माया के प्यार में (उसे खुद को तो) समझ नहीं आती, (और) संसार को राय देता है। (ऐसा पंडित) मानव जन्म व्यर्थ गवाता है, और जनम मरण के चक्कर में पड़ जाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ जिनी सतिगुरु सेविआ तिनी नाउ पाइआ बूझहु करि बीचारु ॥ सदा सांति सुखु मनि वसै चूकै कूक पुकार ॥ आपै नो आपु खाइ मनु निरमलु होवै गुर सबदी वीचारु ॥ नानक सबदि रते से मुकतु है हरि जीउ हेति पिआरु ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ जिनी सतिगुरु सेविआ तिनी नाउ पाइआ बूझहु करि बीचारु ॥ सदा सांति सुखु मनि वसै चूकै कूक पुकार ॥ आपै नो आपु खाइ मनु निरमलु होवै गुर सबदी वीचारु ॥ नानक सबदि रते से मुकतु है हरि जीउ हेति पिआरु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: चूकै = खत्म हो जाती है। कूक पूकार = चीख पुकार। आपै नो आपु = पूरी तरह से अपने आप को। मुकतु = विकारों से आजाद।2।
अर्थ: विचार करके समझ लो (भाव, देख लो), जिन्होंने सत्गुरू द्वारा दर्शाए हुए कर्म किए हैं उन्हें ही नाम की प्राप्ति हुई है। उनके हृदय में सदा शांति व सुख बसता है और व्याकुलता खत्मब हो जाती है। “अपने आप को खा जाए (अर्थात, स्वै भाव निवारे) तो मन साफ़ होता है” -ये विचार (भी) सतिगुरु के शब्द से ही (उपजता है)। हे नानक! जो मनुष्य सत्गुरू के शब्द में रंगे हुए हैं, वे मुक्त हैं, (क्योंकि) प्रभु जी के प्यार में उनकी तवज्जो जुड़ी रहती है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ हरि की सेवा सफल है गुरमुखि पावै थाइ ॥ जिसु हरि भावै तिसु गुरु मिलै सो हरि नामु धिआइ ॥ गुर सबदी हरि पाईऐ हरि पारि लघाइ ॥ मनहठि किनै न पाइओ पुछहु वेदा जाइ ॥ नानक हरि की सेवा सो करे जिसु लए हरि लाइ ॥१०॥
मूलम्
पउड़ी ॥ हरि की सेवा सफल है गुरमुखि पावै थाइ ॥ जिसु हरि भावै तिसु गुरु मिलै सो हरि नामु धिआइ ॥ गुर सबदी हरि पाईऐ हरि पारि लघाइ ॥ मनहठि किनै न पाइओ पुछहु वेदा जाइ ॥ नानक हरि की सेवा सो करे जिसु लए हरि लाइ ॥१०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरमुखि = वह मनुष्य जो गुरु के बताए मार्ग पर चलता है। गुरमुखि पावै थाइ = गुरमुख की बंदगी परमात्मा स्वीकार करता है। मन हठि = मन के हठ से।10।
अर्थ: प्रभु की बंदगी (वैसे तो हरेक के लिए ही) सफल है (अर्थात, मनुष्य के जन्म को सफल करने वाली है, पर) स्वीकार उसी की होती है (भाव, पूर्ण सफलता उसे ही मिलती है) जो सत्गुरू के सन्मुख रहता है। उसी मनुष्य को (ही) सत्गुरू मिलता है, जिस पर प्रभु मेहरबान होता है और वही हरि नाम का स्मरण करता है। (जीवों को संसार सागर से जो प्रभु) पार लंघाता है, वह मिलता ही सत्गुरू के शब्द द्वारा है। वेद (आदि धार्मिक पुस्तकों) को भी जा के पूछ के देख लो (अर्थात, पुरातन धर्म पुस्तकें भी यही बात बताते हैं) कि अपने मन के हठ से किसी ने प्रभु को नहीं पाया (ये गुरु के द्वारा ही मिलता है)। हे नानक! हरि की सेवा वही जीव करता है जिसे (गुरु मिला के) प्रभु खुद सेवा में लगाए।10।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ नानक सो सूरा वरीआमु जिनि विचहु दुसटु अहंकरणु मारिआ ॥ गुरमुखि नामु सालाहि जनमु सवारिआ ॥ आपि होआ सदा मुकतु सभु कुलु निसतारिआ ॥ सोहनि सचि दुआरि नामु पिआरिआ ॥ मनमुख मरहि अहंकारि मरणु विगाड़िआ ॥ सभो वरतै हुकमु किआ करहि विचारिआ ॥ आपहु दूजै लगि खसमु विसारिआ ॥ नानक बिनु नावै सभु दुखु सुखु विसारिआ ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ नानक सो सूरा वरीआमु जिनि विचहु दुसटु अहंकरणु मारिआ ॥ गुरमुखि नामु सालाहि जनमु सवारिआ ॥ आपि होआ सदा मुकतु सभु कुलु निसतारिआ ॥ सोहनि सचि दुआरि नामु पिआरिआ ॥ मनमुख मरहि अहंकारि मरणु विगाड़िआ ॥ सभो वरतै हुकमु किआ करहि विचारिआ ॥ आपहु दूजै लगि खसमु विसारिआ ॥ नानक बिनु नावै सभु दुखु सुखु विसारिआ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अहंकरणु = अहंकार। वरीआमु = शूरवीर। मरणु = मौत, अंत समय।1।
अर्थ: हे नानक! वह मनुष्य बहादुर शूरवीर है जिस ने (मन) में से दुष्ट अहंकार को दूर किया है और गुरु के सन्मुख हो के (प्रभु के) नाम की महिमा करके जनम सफला किया है। वह (शूरवीर) स्वयं हमेशा के लिए (विकारों से) छूट जाता है, और (साथ ही) सारे कुल को तार लेता है। ‘नाम’ से प्यार करने वाले लोग सच्चे हरि की दरगाह में शोभा पाते हैं। पर, मनमुख अहंकार में जलते हैं और दुखी हो के मरते हैं। इन बिचारों के बस में भी क्या है? सब (प्रभु का) भाणा बरत रहा है। (मनमुख अपने आप की खोज छोड़ के माया में चिक्त जोड़ते हैं, और प्रभु पति को विसारते हैं। हे नानक! नाम से हीन करके उन्हें सदा दुख मिलता है, सुख उन्हें विसर ही जाता है (भाव, सुख का कभी मुंह नहीं देखते)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ तिनि विचहु भरमु चुकाइआ ॥ राम नामु हरि कीरति गाई करि चानणु मगु दिखाइआ ॥ हउमै मारि एक लिव लागी अंतरि नामु वसाइआ ॥ गुरमती जमु जोहि न साकै साचै नामि समाइआ ॥ सभु आपे आपि वरतै करता जो भावै सो नाइ लाइआ ॥ जन नानकु नामु लए ता जीवै बिनु नावै खिनु मरि जाइआ ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ गुरि पूरै हरि नामु दिड़ाइआ तिनि विचहु भरमु चुकाइआ ॥ राम नामु हरि कीरति गाई करि चानणु मगु दिखाइआ ॥ हउमै मारि एक लिव लागी अंतरि नामु वसाइआ ॥ गुरमती जमु जोहि न साकै साचै नामि समाइआ ॥ सभु आपे आपि वरतै करता जो भावै सो नाइ लाइआ ॥ जन नानकु नामु लए ता जीवै बिनु नावै खिनु मरि जाइआ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुरि = गुरु ने। द्रिढ़ाइआ = दृढ़ करवाया, हृदय में पक्का कर दिया। भरमु = भटकना। कीमति = सिफति। मगु = रस्ता। नामि = नाम में। सभु = हर जगह। नाइ = नाम में। खिनु = पलक, पल भर।2।
अर्थ: जिनके हृदय में पूरे सत्गुरू ने हरि नाम दृढ़ कर दिया है, उनके अंदर से भटकना दूर कर दी है। वे हरि नाम की उपमा करते हैं, और (इस महिमा को) प्रकाश बना के (सीधा) राह उन्हें दिखाई देने लगता है। वे अहंकार दूर करके एक के साथ नेह लगाते हैं, और हृदय में नाम बसाते हैं। गुरु की बताए मार्ग पे चलने के कारण यम उन्हें घूर नहीं सकता, (क्योंकि) सच्चे नाम में उनकी तवज्जो जुड़ी होती है। (पर) ये सब प्रभु का अपना कौतक है, जिस पे प्रसन्न होता है उस को नाम में जोड़ता है। (ये) दास नानक (भी) ‘नाम’ के आसरे है, एक पलक भर भी ‘नाम’ से वंचित रहे तो मरने के तुल्य लगता है।2।
[[0087]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ जो मिलिआ हरि दीबाण सिउ सो सभनी दीबाणी मिलिआ ॥ जिथै ओहु जाइ तिथै ओहु सुरखरू उस कै मुहि डिठै सभ पापी तरिआ ॥ ओसु अंतरि नामु निधानु है नामो परवरिआ ॥ नाउ पूजीऐ नाउ मंनीऐ नाइ किलविख सभ हिरिआ ॥ जिनी नामु धिआइआ इक मनि इक चिति से असथिरु जगि रहिआ ॥११॥
मूलम्
पउड़ी ॥ जो मिलिआ हरि दीबाण सिउ सो सभनी दीबाणी मिलिआ ॥ जिथै ओहु जाइ तिथै ओहु सुरखरू उस कै मुहि डिठै सभ पापी तरिआ ॥ ओसु अंतरि नामु निधानु है नामो परवरिआ ॥ नाउ पूजीऐ नाउ मंनीऐ नाइ किलविख सभ हिरिआ ॥ जिनी नामु धिआइआ इक मनि इक चिति से असथिरु जगि रहिआ ॥११॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दीबाण = दरबार। सुरखरू = संतुलित, खिड़े माथे वाला। नामे = नाम ही। परवरिआ = परवार, रौशनी की चक्र (जैसे ‘चाँद’ परवारिया जाता है)। नाइ = नाम के द्वारा। किलविख = पाप। हिरिआ = हरे जाना, नाश हो जाते हैं। इक मनि = एक मन हो के। असथिरु = स्थिर, अटल।11।
अर्थ: जो मनुष्य हरि के दरबार में मिल चुका (आदर पाने योग्य हो गया) है, उसे (संसार के) सब दरबारों में आदर मिलता है। जहाँ वह जाता है, वहीं उसका माथा खिड़ा रहता है (उज्वल मुख ले के जाता है), उसका मुंह देख के (उसके दर्शन करके) सभ पापी तर जाते हैं (क्योंकि) उसके हृदय में नाम का खजाना है, और नाम ही उसका परिवार है (भाव, नाम ही उसके सिर के चारों तरफ घूमने वाला रौशनी चक्र है)। (हे भाई!) नाम स्मरण करना चाहिए, और नाम का ही ध्यान धरना चाहिए, नाम (जपने) से सब पाप दूर हो जाते हैं। जिन्होंने एकाग्रचिक्त हो के नाम जपा है, वे संसार में अटल हो गए हैं (अर्थात, संसार में हमेशा के लिए उनकी शोभा और प्रतिष्ठा कायम हो गई है)।11।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ आतमा देउ पूजीऐ गुर कै सहजि सुभाइ ॥ आतमे नो आतमे दी प्रतीति होइ ता घर ही परचा पाइ ॥ आतमा अडोलु न डोलई गुर कै भाइ सुभाइ ॥ गुर विणु सहजु न आवई लोभु मैलु न विचहु जाइ ॥ खिनु पलु हरि नामु मनि वसै सभ अठसठि तीरथ नाइ ॥ सचे मैलु न लगई मलु लागै दूजै भाइ ॥ धोती मूलि न उतरै जे अठसठि तीरथ नाइ ॥ मनमुख करम करे अहंकारी सभु दुखो दुखु कमाइ ॥ नानक मैला ऊजलु ता थीऐ जा सतिगुर माहि समाइ ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ आतमा देउ पूजीऐ गुर कै सहजि सुभाइ ॥ आतमे नो आतमे दी प्रतीति होइ ता घर ही परचा पाइ ॥ आतमा अडोलु न डोलई गुर कै भाइ सुभाइ ॥ गुर विणु सहजु न आवई लोभु मैलु न विचहु जाइ ॥ खिनु पलु हरि नामु मनि वसै सभ अठसठि तीरथ नाइ ॥ सचे मैलु न लगई मलु लागै दूजै भाइ ॥ धोती मूलि न उतरै जे अठसठि तीरथ नाइ ॥ मनमुख करम करे अहंकारी सभु दुखो दुखु कमाइ ॥ नानक मैला ऊजलु ता थीऐ जा सतिगुर माहि समाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आतमा देउ = परमात्मा। सहजि = सहज में, ज्ञान अवस्था में। सुभाइ = स्वभाव में (लीन हो के)। प्रतीति = यकीन। परचा = वाकफी, प्यार। नाइ = नहा के, नहा लेता है।1।
अर्थ: गुरु की मति ले के और गुरु के स्वभाव में (अपना स्वभाव लीन करके) जीवात्मा का प्रकाश करने वाले (हरि) की महिमा करनी चाहिए। (इस तरह) जब जीव को प्रभु (का अस्तित्व और) सिदक दृढ़ हो जाए, तो हृदय में ही (प्रभु से) प्यार बन जाता है (और तीर्थों आदि में जाने की जरूरत नहीं रहती), क्योंकि सत्गुरू के प्यार में और स्वाभाव में (बरतने से) जीवात्मा (माया की और से) अटल हो के डोलने से हट जाती है। ये अडोल अवस्था सत्गुरू के बिना नहीं आती, और ना ही मन में से लोभ मैल दूर होती है। अगर एक पलक भर भी प्रभु का नाम मन में बस जाए (अर्थात, अगर जीव एक मन हो के एक पलक भर भी नाम जप सके) तो, मानो, अढ़सठ तीर्थों का स्नान कर लेता है। (क्योंकि) सच्चे (प्रभु) में जुड़े हुए को मैल नहीं लगती, मैल सदा माया के प्यार में लगती है, और वह मैल कभी भी धोने से नहीं उतरती, चाहे अढ़सठ तीर्थों के स्नान रहें करते। (कारण ये है कि) मनुष्य (गुरु की ओर से) अहंकार के आसरे (तीर्थ स्नान आदिक) कर्म करता है, और दुख ही दुख एकत्र करता है। हे नानक! मैला (मन) तभी पवित्र होता है, अगर (जीव) सतिगुरु में लीन हो जाए (अर्थात, स्वैभाव मिटा दे)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ मनमुखु लोकु समझाईऐ कदहु समझाइआ जाइ ॥ मनमुखु रलाइआ ना रलै पइऐ किरति फिराइ ॥ लिव धातु दुइ राह है हुकमी कार कमाइ ॥ गुरमुखि आपणा मनु मारिआ सबदि कसवटी लाइ ॥ मन ही नालि झगड़ा मन ही नालि सथ मन ही मंझि समाइ ॥ मनु जो इछे सो लहै सचै सबदि सुभाइ ॥ अम्रित नामु सद भुंचीऐ गुरमुखि कार कमाइ ॥ विणु मनै जि होरी नालि लुझणा जासी जनमु गवाइ ॥ मनमुखी मनहठि हारिआ कूड़ु कुसतु कमाइ ॥ गुर परसादी मनु जिणै हरि सेती लिव लाइ ॥ नानक गुरमुखि सचु कमावै मनमुखि आवै जाइ ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ मनमुखु लोकु समझाईऐ कदहु समझाइआ जाइ ॥ मनमुखु रलाइआ ना रलै पइऐ किरति फिराइ ॥ लिव धातु दुइ राह है हुकमी कार कमाइ ॥ गुरमुखि आपणा मनु मारिआ सबदि कसवटी लाइ ॥ मन ही नालि झगड़ा मन ही नालि सथ मन ही मंझि समाइ ॥ मनु जो इछे सो लहै सचै सबदि सुभाइ ॥ अम्रित नामु सद भुंचीऐ गुरमुखि कार कमाइ ॥ विणु मनै जि होरी नालि लुझणा जासी जनमु गवाइ ॥ मनमुखी मनहठि हारिआ कूड़ु कुसतु कमाइ ॥ गुर परसादी मनु जिणै हरि सेती लिव लाइ ॥ नानक गुरमुखि सचु कमावै मनमुखि आवै जाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनमुखि = वह जिसका मुंह अपने मन की ओर है, मन का मुरीद, आप हुदरा। किरतु = किया हुआ काम। किरति = किए हुए काम के अनुसार। पइऐ किरति = उनके किये कर्मों के संस्कारों के अनुसार जो पीछे एकत्र हो चुके हैं। धातु = माया। सथ = झगड़ा निपटाने के लिए पंचायत इकट्ठी करनी। भुंचीऐ = खाएं। लुझणा = झगड़ना। जिणै = जीत गए।2।
अर्थ: जो मनुष्य सतिगुरु की ओर सें मुख मोड़े बैठा है, वह समझाने से भी कभी नहीं समझता, अगर उसे (गुरमुखों में) मिला भी दें, तो भी (स्वभाव करके) उनके साथ नहीं मिलता और (पूर्बले किए) सिर पड़े कर्मों के मुताबिक भटकता फिरता है। (उस विचारे पर भी क्या रोस?) (संसार में) रास्ते ही दो हैं: (हरि से) प्यार और (माया से) प्यार; (और मनमुख) प्रभु के हुक्म में (ही) (माया वाले) कर्म करता है। (दूसरी तरफ, हुक्म में ही) गुरमुख मनुष्य सतिगुरु के शब्द के द्वारा कसवटी लगा के (परख के) अपने मन को मार लेता है (भाव, माया के प्यार की पकड़ पर काबू पा लेता है)। वह सदा मन (की विकार-तवज्जो) के साथ संघर्ष करता है, और पंचायत करता है (भाव, उसे समझाता है, और अंत में विकार तवज्जो को) मन (की शुभ-ध्यान) में लीन कर देता है। (इस तरह सतिगुरु के) स्वभाव में (स्वै लीन करने वाला) मन जो इच्छा करता है सो प्राप्त करता है। (हे भाई!) गुरमुखों वाले कर्म करके सदा नाम अमृत पीएं। मन को छोड़ के जो जीव (शरीर आदि) औरों से झगड़ा करता है, वह जन्म व्यर्थ गवाता है। मनमुख मन के हठ में (बाजी) हार जाता है, और झूठ-तुफान (की कमाई) तौलता है।
हे नानक! गुरमुख सतिगुरु की कृपा से मन पर विजय प्राप्त करता है, प्रभु से प्यार जोड़ता है और सदा स्थिर हरि नाम नाम जपने की कमाई करता है। (पर,) मनमुख भटकता फिरता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ हरि के संत सुणहु जन भाई हरि सतिगुर की इक साखी ॥ जिसु धुरि भागु होवै मुखि मसतकि तिनि जनि लै हिरदै राखी ॥ हरि अम्रित कथा सरेसट ऊतम गुर बचनी सहजे चाखी ॥ तह भइआ प्रगासु मिटिआ अंधिआरा जिउ सूरज रैणि किराखी ॥ अदिसटु अगोचरु अलखु निरंजनु सो देखिआ गुरमुखि आखी ॥१२॥
मूलम्
पउड़ी ॥ हरि के संत सुणहु जन भाई हरि सतिगुर की इक साखी ॥ जिसु धुरि भागु होवै मुखि मसतकि तिनि जनि लै हिरदै राखी ॥ हरि अम्रित कथा सरेसट ऊतम गुर बचनी सहजे चाखी ॥ तह भइआ प्रगासु मिटिआ अंधिआरा जिउ सूरज रैणि किराखी ॥ अदिसटु अगोचरु अलखु निरंजनु सो देखिआ गुरमुखि आखी ॥१२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साखी = शिक्षा। मुखि = मुंह से। मसतकि = माथे पर। तिनि = उस ने। तिनि जनि = उस जन ने। सहजे = अडोल अवस्था में (पहुँच के)। तह = उस अवस्था में। रैणि = रात। किराखी = खींच लेता है। अगोचरु = अ+गो+चरु। गो = इन्दे्र। चरु = चलना,पहुँचना। अगोचरु = जिस तक ज्ञानेद्रियां नहीं पहुँच सकतीं।12।
अर्थ: हे हरि के संत जन प्यारो! अपने सतिगुरु की शिक्षा सुनो (भाव, शिक्षा पर चलो)। इस शिक्षा को मनुष्य ने हृदय में परो रखा है, जिसके माथे पर धुर से ही भाग्य हों। सतिगुरु की शिक्षा से ही अडोल अवस्था में पहुँच के प्रभु की उत्तम पवित्र और जीवन-किरण बख्शने वाली महिमा का आनंद लिया जा सकता है। (सतिगुरु की शिक्षा को जो हृदय एक बार धारण करता है) उस में (आत्मिक जीवन का) प्रकाश हो जाता है और (माया का) अंधेरा ऐसे दूर होता है जैसे सूरज रात (के अंधेरे) को खींच लेता है। जो प्रभु (इन आँखों से) नहीं दिखता, इन्द्रियों की पहुँच से परे है और अलख है वह सतिगुरु के सन्मुख होने से दिखने लगता है।12।
[[0088]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोकु मः ३ ॥ सतिगुरु सेवे आपणा सो सिरु लेखै लाइ ॥ विचहु आपु गवाइ कै रहनि सचि लिव लाइ ॥ सतिगुरु जिनी न सेविओ तिना बिरथा जनमु गवाइ ॥ नानक जो तिसु भावै सो करे कहणा किछू न जाइ ॥१॥
मूलम्
सलोकु मः ३ ॥ सतिगुरु सेवे आपणा सो सिरु लेखै लाइ ॥ विचहु आपु गवाइ कै रहनि सचि लिव लाइ ॥ सतिगुरु जिनी न सेविओ तिना बिरथा जनमु गवाइ ॥ नानक जो तिसु भावै सो करे कहणा किछू न जाइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: लेखै लाइ = सफल कर लेता है। आपु = स्वै भाव, अहंकार।1।
अर्थ: जो मनुष्य अपने सतिगुरु की बताई सेवा करता है, वह मनुष्य अपना सिर (भाव, मनुष्य जनम) सफल कर लेता है। ऐसे मनुष्य हृदय में से अहंकार दूर करके सच्चे नाम में तवज्जो जोड़े रखते हैं। जिन्होंने सतिगुरु की बताई हुई सेवा नहीं की, उन्होंने मानव जन्म व्यर्थ गवा लिया है। (पर) हे नानक! कुछ (अच्छा-बुरा) कहा नहीं जा सकता (क्योंकि) जो उस प्रभु को ठीक लगता है, स्वयं करता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ मनु वेकारी वेड़िआ वेकारा करम कमाइ ॥ दूजै भाइ अगिआनी पूजदे दरगह मिलै सजाइ ॥ आतम देउ पूजीऐ बिनु सतिगुर बूझ न पाइ ॥ जपु तपु संजमु भाणा सतिगुरू का करमी पलै पाइ ॥ नानक सेवा सुरति कमावणी जो हरि भावै सो थाइ पाइ ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ मनु वेकारी वेड़िआ वेकारा करम कमाइ ॥ दूजै भाइ अगिआनी पूजदे दरगह मिलै सजाइ ॥ आतम देउ पूजीऐ बिनु सतिगुर बूझ न पाइ ॥ जपु तपु संजमु भाणा सतिगुरू का करमी पलै पाइ ॥ नानक सेवा सुरति कमावणी जो हरि भावै सो थाइ पाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वेड़िआ = घिरा हुआ। बूझ = समझ। करमी = मेहर से। पले पाइ = मिलता है। थाइ पाइ = स्वीकार करता है।2।
अर्थ: (ये कुदरत का तरीका है कि) विकारों में फंसा हुआ मन विकारों वाले कर्म ही करता है। (इस वास्ते) माया के प्यार में (फंसे रह के) जो मनुष्य पूजा करते हैं (इस पूजा का उनको कोई लाभ नहीं होता) दरगाह में सजा ही मिलती है। आत्मा को रौशन करने वाले प्रभु की ही पूजा करनी चाहिए, (पर) सतिगुरु के बगैर समझ नहीं आता। सतिगुरु का भाणा (रजा को) (मानना) -यही जप, तप और संजम है, प्रभु मेहर करे तो ये (रजा मानने की स्मर्था) प्राप्त होती है। हे नानक! (वैसे तो) जो सेवा प्रभु को ठीक लगे वही स्वीकार होती है, (पर) सेवा भी ध्यान द्वारा ही (भाव, ध्यान को सतिगुरु की रजा में टिका के ही) की जा सकती है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सदा सुखु होवै दिनु राती ॥ हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सिमरत सभि किलविख पाप लहाती ॥ हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु दालदु दुख भुख सभ लहि जाती ॥ हरि हरि नामु जपहु मन मेरे मुखि गुरमुखि प्रीति लगाती ॥ जितु मुखि भागु लिखिआ धुरि साचै हरि तितु मुखि नामु जपाती ॥१३॥
मूलम्
पउड़ी ॥ हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सदा सुखु होवै दिनु राती ॥ हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु सिमरत सभि किलविख पाप लहाती ॥ हरि हरि नामु जपहु मन मेरे जितु दालदु दुख भुख सभ लहि जाती ॥ हरि हरि नामु जपहु मन मेरे मुखि गुरमुखि प्रीति लगाती ॥ जितु मुखि भागु लिखिआ धुरि साचै हरि तितु मुखि नामु जपाती ॥१३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: किलविख = पाप। जितु मुखि = जिस मुंह से। तितु मुखि = उस मुंह से।13।
अर्थ: हे मेरे मन! हरि नाम का स्मरण कर, जिससे रात-दिन सदा सुख हो। हे मेरे मन! हरि नाम का स्मरण करके सब पाप दूर हो जाते हैं। हे मेरे मन! हरि नाम का स्मरण कर, जिससे सब दरिद्रता, दुख व भूख उतर जाएं। हे मेरे मन! हरि के नाम का स्मरण कर, (जिससे) सतिगुरु के सन्मुख रहके (तेरे अंदर) उत्तम प्रीति (अर्थात हरि के नाम की प्रीति) बन जाए। धुर सच्ची दरगाह से जिसके मुंह पे भाग्य लिखा हो, प्रभु उसके मुंह से (ही) अपने नाम का स्मरण करवाता है।13।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ सतिगुरु जिनी न सेविओ सबदि न कीतो वीचारु ॥ अंतरि गिआनु न आइओ मिरतकु है संसारि ॥ लख चउरासीह फेरु पइआ मरि जमै होइ खुआरु ॥ सतिगुर की सेवा सो करे जिस नो आपि कराए सोइ ॥ सतिगुर विचि नामु निधानु है करमि परापति होइ ॥ सचि रते गुर सबद सिउ तिन सची सदा लिव होइ ॥ नानक जिस नो मेले न विछुड़ै सहजि समावै सोइ ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ सतिगुरु जिनी न सेविओ सबदि न कीतो वीचारु ॥ अंतरि गिआनु न आइओ मिरतकु है संसारि ॥ लख चउरासीह फेरु पइआ मरि जमै होइ खुआरु ॥ सतिगुर की सेवा सो करे जिस नो आपि कराए सोइ ॥ सतिगुर विचि नामु निधानु है करमि परापति होइ ॥ सचि रते गुर सबद सिउ तिन सची सदा लिव होइ ॥ नानक जिस नो मेले न विछुड़ै सहजि समावै सोइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सबदि = शब्द से। गिआनु = ऊँची समझ, प्रकाश, आत्मिक जीवन की सूझ। मिरतकु = मरा हुआ। फेरु = फेरा, चक्कर। सतिगुर की सेवा = गुरु द्वारा बताया हुआ कर्म। निधानु = खजाना। करमि = मेहर से। करम = मेहर।1।
अर्थ: (मनुष्य जन्म पा के भी) जिस जीवों ने सतिगुरु जी की बतायी हुई सेवा नहीं की और सतिगुरु के शब्द से (हरि नाम की) विचार नहीं की, (और इस तरह) हृदय में सच्चा प्रकाश नहीं हुआ, वह जीव संसार में (जीवित होते हुए भी) मरा हुआ है। (चौरासी लाख योनियों) में उसे चक्कर काटना पड़ता है, बारंबार पैदा होता मरता और ख्वार होता है। जिस जीव से प्रभु स्वयं कराए, वही सतिगुरु की बताई कार कर सकता है। सतिगुरु के पास ‘नाम’ का खजाना है, जो प्रभु की मेहर से प्राप्त हो सकता है। जो मनुष्य सतिगुरु के शब्द द्वारा सच्चे नाम में रंगे हुये हैं, उनकी सोच सदा इक तार रहती है। हे नानक! जिसको (एक बारी) मेल लेता है, वह (कभी) विछुड़ता नहीं, वह सदा अडोल अवस्था में टिका रहता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ सो भगउती जुो भगवंतै जाणै ॥ गुर परसादी आपु पछाणै ॥ धावतु राखै इकतु घरि आणै ॥ जीवतु मरै हरि नामु वखाणै ॥ ऐसा भगउती उतमु होइ ॥ नानक सचि समावै सोइ ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ सो भगउती जुो भगवंतै जाणै ॥ गुर परसादी आपु पछाणै ॥ धावतु राखै इकतु घरि आणै ॥ जीवतु मरै हरि नामु वखाणै ॥ ऐसा भगउती उतमु होइ ॥ नानक सचि समावै सोइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भगउती = विष्णु के अवतार कृष्ण का भक्त जो नाचकूद के अपनी भक्ति प्र्रकट करता है। जुो = इन दो मात्राओं में से यहाँ पढ़ना है = जु। आपु = अपने आप को। धावतु = दौड़ता। घरि = घर में। आणै = ले आए।2।
अर्थ: भगउती (सच्चा भक्त) वह है जो प्रभु को जानता है (प्रभु से गहरी सांझ डालता है), और सतिगुरु की कृपा से (भाव, सतिगुरु की शिक्षा लेकर) अपने आप को पहचानता है। (वासना की ओर) दौड़ते (मन) को काबू में रखता है, और एक टिकाव में लाता है, और जीवित होते हुए भी (माया की ओर से) मरा रहता है (अर्थात, संसार में विचरता हुआ भी मन को वासना से तोड़े रखता है)। ऐसा भगउती (भक्त) उत्तम होता है, हे नानक! वह सदा स्थिर प्रभु में लीन हो जाता है (और फिर कभी नहीं विछुड़ता)।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ अंतरि कपटु भगउती कहाए ॥ पाखंडि पारब्रहमु कदे न पाए ॥ पर निंदा करे अंतरि मलु लाए ॥ बाहरि मलु धोवै मन की जूठि न जाए ॥ सतसंगति सिउ बादु रचाए ॥ अनदिनु दुखीआ दूजै भाइ रचाए ॥ हरि नामु न चेतै बहु करम कमाए ॥ पूरब लिखिआ सु मेटणा न जाए ॥ नानक बिनु सतिगुर सेवे मोखु न पाए ॥३॥
मूलम्
मः ३ ॥ अंतरि कपटु भगउती कहाए ॥ पाखंडि पारब्रहमु कदे न पाए ॥ पर निंदा करे अंतरि मलु लाए ॥ बाहरि मलु धोवै मन की जूठि न जाए ॥ सतसंगति सिउ बादु रचाए ॥ अनदिनु दुखीआ दूजै भाइ रचाए ॥ हरि नामु न चेतै बहु करम कमाए ॥ पूरब लिखिआ सु मेटणा न जाए ॥ नानक बिनु सतिगुर सेवे मोखु न पाए ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कपटु = खोट। पाखंड = दिखावे से। अंतरि = अंदर, मन में। बादु = झगड़ा। अनदिनु = रोजाना, सदा। मोखु = मोक्ष, मुक्ति, विकारों से स्वतंत्रता।3।
अर्थ: जो मनुष्य दिल में खोट रखे (पर अपने आप को) भगउती (सच्चा भक्त) कहलाए, वह (इस) पाखण्ड से परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। (जीव) पराई निंदा करके हृदय पर मैल चढ़ाए जाये, (और) बाहर से (शरीर की) मैल (स्नान वगैरा से) धोता रहे, (इस तरह) मन की जूठ दूर नहीं होती। जो मनुष्य सतिसंगति के साथ टकराव डाले रखता है (भाव, जिसे सतसंगति अच्छी नहीं लगती) वह माया के प्यार में रंगा हुआ हमेशा दुखी रहता है। हरि नाम का स्मरण छोड़ के और चाहे जितने कर्मकांड करता रहे (इस तरह) पहले (किए कर्मों के अच्छे बुरे संस्कार जो मन पर) लिखे गए (हैं, और जनम जनम में भटकाते फिरते हैं) मिट नहीं सकते। हे नानक! (सच तो ये है कि) सतिगुरु द्वारा बताए कर्मों को किए बिनां (माया के मोह से) छुटकारा हो ही नहीं सकता।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ सतिगुरु जिनी धिआइआ से कड़ि न सवाही ॥ सतिगुरु जिनी धिआइआ से त्रिपति अघाही ॥ सतिगुरु जिनी धिआइआ तिन जम डरु नाही ॥ जिन कउ होआ क्रिपालु हरि से सतिगुर पैरी पाही ॥ तिन ऐथै ओथै मुख उजले हरि दरगह पैधे जाही ॥१४॥
मूलम्
पउड़ी ॥ सतिगुरु जिनी धिआइआ से कड़ि न सवाही ॥ सतिगुरु जिनी धिआइआ से त्रिपति अघाही ॥ सतिगुरु जिनी धिआइआ तिन जम डरु नाही ॥ जिन कउ होआ क्रिपालु हरि से सतिगुर पैरी पाही ॥ तिन ऐथै ओथै मुख उजले हरि दरगह पैधे जाही ॥१४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कड़ि = कढ़े, कढ़ते (देखो पउड़ी नंबर १ ‘भउ बिखमु तरि’, तरि = तरे) दुखी होते। सवाही = सबाही, सुबह, सवेरे।14।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: इसका अर्थ ‘स्वाह या राख’ करना गलत है, दोनों का मेल नहीं है, देखें ‘आसा दी वार’ में ‘तन विचि सुआह’। ‘कढ़िन’ पाठ भी गलत है, इस हालत में जोड़ ‘कढ़नि’ होता।
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जिन्होंने सतिगुरु का ध्यान धरा है, वो नित्य नये सूरज दुखी नहीं होते, (क्योंकि) जिन्होंने सतिगुरु का ध्यान धारण किया है वे (दुनियावी पदार्थों की ओर से) पूरी तौर पे तृप्त रहते हैं, (इस वास्ते) उन्हें मौत का भी डर नहीं रहता। सतिगुरु की शरण भी वही लगते हैं, जिस पे हरि स्वयं प्रसन्न होता है। वे दोनों जहानों से संतुलित रहते हैं, और प्रभु की दरगाह में (भी) आदर पाते हैं।14।
[[0089]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः २ ॥ जो सिरु सांई ना निवै सो सिरु दीजै डारि ॥ नानक जिसु पिंजर महि बिरहा नही सो पिंजरु लै जारि ॥१॥
मूलम्
सलोक मः २ ॥ जो सिरु सांई ना निवै सो सिरु दीजै डारि ॥ नानक जिसु पिंजर महि बिरहा नही सो पिंजरु लै जारि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: डारि दीजै = फेंक दे। बिरथा = प्यार की खींच।1।
अर्थ: जो सिर प्रभु की याद में ना झुके, वह त्याग देने योग्य है (भाव, उसका कोई गुण नहीं)। हे नानक! जिस शरीर में प्यार नहीं वह शरीर जला दो (भाव, वह भी व्यर्थ है)।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ५ ॥ मुंढहु भुली नानका फिरि फिरि जनमि मुईआसु ॥ कसतूरी कै भोलड़ै गंदे डुमि पईआसु ॥२॥
मूलम्
मः ५ ॥ मुंढहु भुली नानका फिरि फिरि जनमि मुईआसु ॥ कसतूरी कै भोलड़ै गंदे डुमि पईआसु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मुंढहु = मूल से। भोलड़े = भुलावे में। डुंमि = गहरे गड्ढे में।2।
अर्थ: हे नानक! जिस (जीव-स्त्री) ने (सबसे) मूल (निर्माता) को विसारा है, वह बारंबार पैदा होती मरती है, (और वह) कस्तूरी (भाव, उत्तम पदार्थ) के भुलेखे में (माया के) गंदे गड्ढे में पड़ी हुई है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ सो ऐसा हरि नामु धिआईऐ मन मेरे जो सभना उपरि हुकमु चलाए ॥ सो ऐसा हरि नामु जपीऐ मन मेरे जो अंती अउसरि लए छडाए ॥ सो ऐसा हरि नामु जपीऐ मन मेरे जु मन की त्रिसना सभ भुख गवाए ॥ सो गुरमुखि नामु जपिआ वडभागी तिन निंदक दुसट सभि पैरी पाए ॥ नानक नामु अराधि सभना ते वडा सभि नावै अगै आणि निवाए ॥१५॥
मूलम्
पउड़ी ॥ सो ऐसा हरि नामु धिआईऐ मन मेरे जो सभना उपरि हुकमु चलाए ॥ सो ऐसा हरि नामु जपीऐ मन मेरे जो अंती अउसरि लए छडाए ॥ सो ऐसा हरि नामु जपीऐ मन मेरे जु मन की त्रिसना सभ भुख गवाए ॥ सो गुरमुखि नामु जपिआ वडभागी तिन निंदक दुसट सभि पैरी पाए ॥ नानक नामु अराधि सभना ते वडा सभि नावै अगै आणि निवाए ॥१५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अंती अउसरि = आखिरी अवसर पर। गुरमुखि = गुरु के द्वारा। वडभागी = बड़े भाग्य वाले। आणि = ला के। सभि = सारे।15।
अर्थ: हे मेरे मन! जो प्रभु सब जीवों पर अपना हुक्म चलाता है (अर्थात, जिसके हुक्म के आगे सब जीव जन्तु झुकते हैं) उस प्रभु का नाम स्मरणा चाहिए। हे मेरे मन! जो अंत समय (मौत के डर से) छुड़ा लेता है, उस हरि का नाम जपना चाहिए। जो हरि नाम मन की सभी भूखों और तृष्णाओं को मिटा देता है, हे मेरे मन! उसका जाप करना चाहिए। सब निंदक व दुर्जन उन भाग्यशालियों के चरणों में आ लगते हैं, जिन्होंने सतिगुरु की शरण पड़ के यह नाम जपा है। हे नानक! प्रभु के नाम का स्मरण कर - यह (साधन) सभी (साधनों) से बड़ा है; नाम के आगे सब को ला के (प्रभु ने) झुका दिया है।15।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ वेस करे कुरूपि कुलखणी मनि खोटै कूड़िआरि ॥ पिर कै भाणै ना चलै हुकमु करे गावारि ॥ गुर कै भाणै जो चलै सभि दुख निवारणहारि ॥ लिखिआ मेटि न सकीऐ जो धुरि लिखिआ करतारि ॥ मनु तनु सउपे कंत कउ सबदे धरे पिआरु ॥ बिनु नावै किनै न पाइआ देखहु रिदै बीचारि ॥ नानक सा सुआलिओ सुलखणी जि रावी सिरजनहारि ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ वेस करे कुरूपि कुलखणी मनि खोटै कूड़िआरि ॥ पिर कै भाणै ना चलै हुकमु करे गावारि ॥ गुर कै भाणै जो चलै सभि दुख निवारणहारि ॥ लिखिआ मेटि न सकीऐ जो धुरि लिखिआ करतारि ॥ मनु तनु सउपे कंत कउ सबदे धरे पिआरु ॥ बिनु नावै किनै न पाइआ देखहु रिदै बीचारि ॥ नानक सा सुआलिओ सुलखणी जि रावी सिरजनहारि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निवारणहारि = निवारण के काबिल (हो जाती है)। करतारि = कर्तार ने। सुआलिउ = सुंदर। रावी = माणी है। सिरजनहारि = निर्माता ने।1।
अर्थ: झूठी, मानो खोटी, बुरे लक्षणों वाली और कुरूप स्त्री अपने शरीर को श्रृंगारती है; (पर) पति के हुक्म में नहीं चलती, (बल्कि) मूर्ख स्त्री (पति पे) हुक्म चलाती है (नतीजा ये होता है कि सदैव दुखी रहती है)। जो (जीव-स्त्री) सतिगुरु की रजा में चलती है वह अपने सारे दुख-कष्ट निवार लेती है। (पर, कुलक्षणी के भी क्या वश?) (जीवों के किये कर्मों के अनुसार) कर्तार ने धुर से जो (संस्कारों का लेखा जीवों के माथे पर) लिख दिया है, वह लिखा हुआ लेख मिटाया नहीं जा सकता। (सुलक्षणी) तनमन (हरि-) पति को सौंप देती है, और सतिगुरु के शब्द में तवज्जो जोड़ती है। हृदय में विचार करके देख (भी) लो, कि नाम (जपने) के बिना किसी को प्रभु नहीं मिला। हे नानक! शुभ लक्षणों वाली व सुंदर (जीव-) स्त्री वही है, जिस पर निर्माता (पति) ने मेहर की है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ माइआ मोहु गुबारु है तिस दा न दिसै उरवारु न पारु ॥ मनमुख अगिआनी महा दुखु पाइदे डुबे हरि नामु विसारि ॥ भलके उठि बहु करम कमावहि दूजै भाइ पिआरु ॥ सतिगुरु सेवहि आपणा भउजलु उतरे पारि ॥ नानक गुरमुखि सचि समावहि सचु नामु उर धारि ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ माइआ मोहु गुबारु है तिस दा न दिसै उरवारु न पारु ॥ मनमुख अगिआनी महा दुखु पाइदे डुबे हरि नामु विसारि ॥ भलके उठि बहु करम कमावहि दूजै भाइ पिआरु ॥ सतिगुरु सेवहि आपणा भउजलु उतरे पारि ॥ नानक गुरमुखि सचि समावहि सचु नामु उर धारि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गुबार = अंधेरा। भलके = नित्य सुबह, हर रोज। भउजलु = संसार समुंदर। उर = हृदय।2।
अर्थ: माया का मोह प्यार (निरा) अंधेरा है, जिसका उरला व परला छोर दिखता नही। सतिगुरु से मुख मोड़ने वाले, ज्ञान से हीन जीव प्रभु का नाम विसार के (उस अंधेरे में) गोते खाते हैं और बड़ा दुख सहते हैं। नित्य नये सूरज (नाम के बिना) और बहत सारे काम करते हैं और माया के प्यार में (ही उनकी) तवज्जो (जुड़ी रहती है)। (जो जीव) अपने सतिगुरु की बतायी सेवा करते हैं, वह (माया के मोह रूपी) संसार समुंदर से पार हो जाते हैं। हे नानक! सतिगुरु के सन्मुख रहने वाले (जीव) सच्चे नाम को हृदय में परो के सदा स्थिर प्रभु में लीन हो जाते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ हरि जलि थलि महीअलि भरपूरि दूजा नाहि कोइ ॥ हरि आपि बहि करे निआउ कूड़िआर सभ मारि कढोइ ॥ सचिआरा देइ वडिआई हरि धरम निआउ कीओइ ॥ सभ हरि की करहु उसतति जिनि गरीब अनाथ राखि लीओइ ॥ जैकारु कीओ धरमीआ का पापी कउ डंडु दीओइ ॥१६॥
मूलम्
पउड़ी ॥ हरि जलि थलि महीअलि भरपूरि दूजा नाहि कोइ ॥ हरि आपि बहि करे निआउ कूड़िआर सभ मारि कढोइ ॥ सचिआरा देइ वडिआई हरि धरम निआउ कीओइ ॥ सभ हरि की करहु उसतति जिनि गरीब अनाथ राखि लीओइ ॥ जैकारु कीओ धरमीआ का पापी कउ डंडु दीओइ ॥१६॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: महीअलि = मही तलि, धरती के ऊपर। कूड़िआर = खोटे मन वाले। जिनि = जिस (हरि) ने। जैकारु = जै जैकार, उपमा। डंडु = सजा।16।
अर्थ: प्रभु जल में, थल में, पृथ्वी पर हर जगह व्यापक है। उसका कोई शरीक नहीं है। प्रभु स्वयं ही बैठ के (गौर से) (जीवों के अच्छे बुरे कर्मों का) न्याय करता है। मन के खोटे सब जीवों कोमार के निकाल देता है (भाव, अपने चरणों से विछोड़ देता है)। सच के व्यापारियों को आदर बख्शता है, हरि ने यह धर्म का न्याय किया है। (हे भाई!) सारे प्रभु की महिमा करो, जिसने (सदैव) गरीबों अनाथों की रक्षा की है, धर्मियों को आदर दिया है और पापियों को दण्ड दिया है।16।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ मनमुख मैली कामणी कुलखणी कुनारि ॥ पिरु छोडिआ घरि आपणा पर पुरखै नालि पिआरु ॥ त्रिसना कदे न चुकई जलदी करे पूकार ॥ नानक बिनु नावै कुरूपि कुसोहणी परहरि छोडी भतारि ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ मनमुख मैली कामणी कुलखणी कुनारि ॥ पिरु छोडिआ घरि आपणा पर पुरखै नालि पिआरु ॥ त्रिसना कदे न चुकई जलदी करे पूकार ॥ नानक बिनु नावै कुरूपि कुसोहणी परहरि छोडी भतारि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: कामणी = कामिनी, औरत। कुनारि = बुरी औरत। घरि = घर में। त्रिसना = (काम की) वासना। कुरूपि = बुरे रूप वाली।1।
अर्थ: मन का मुरीद (जीव उस) खोटी चंदरे लक्षणों वाली मैली स्त्री (जैसा) है (जिसने) घर में (बसता) अपना पति छोड़ दिया है और पराए आदमी के साथ प्यार (डाला हुआ है)। उसकी तृष्णा कभी नहीं मिटती और (तृष्णा में) जलती हुई बिलकती है। हे नानक! (मनमुख जीव) नाम के बिना बद्-शकल व कुरूप स्त्री के जैसा है और पति द्वारा भी दुतकारी हुई हैं।1।
[[0090]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ सबदि रती सोहागणी सतिगुर कै भाइ पिआरि ॥ सदा रावे पिरु आपणा सचै प्रेमि पिआरि ॥ अति सुआलिउ सुंदरी सोभावंती नारि ॥ नानक नामि सोहागणी मेली मेलणहारि ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ सबदि रती सोहागणी सतिगुर कै भाइ पिआरि ॥ सदा रावे पिरु आपणा सचै प्रेमि पिआरि ॥ अति सुआलिउ सुंदरी सोभावंती नारि ॥ नानक नामि सोहागणी मेली मेलणहारि ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भाइ = प्यार में। सुआलिओ = सुंदर रूप वाली (शब्द ‘सुआलिओ’ का अर्थ है ‘सुंदर रूप वाला’। दोनों में अंदर ध्यान देने वाला है)। मेलणहारि = मेलणहार ने।2।
अर्थ: जीवित पति वाली (गुरमुख जीव) स्त्री (वह है जो) गुरु के शब्द द्वारा सतिगुरु के प्रेम प्यार में सदा अपने हरि पति (की याद) का आनन्द लेती है। वह सुंदर नारी बहुत सुहाने रूप वाली व शोभा वाली है। हे नानक! नाम में (जुड़ी होने करके) (गुरमुख) सुहागन को मेलणहार हरि ने (अपने में) मिला लिया है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ हरि तेरी सभ करहि उसतति जिनि फाथे काढिआ ॥ हरि तुधनो करहि सभ नमसकारु जिनि पापै ते राखिआ ॥ हरि निमाणिआ तूं माणु हरि डाढी हूं तूं डाढिआ ॥ हरि अहंकारीआ मारि निवाए मनमुख मूड़ साधिआ ॥ हरि भगता देइ वडिआई गरीब अनाथिआ ॥१७॥
मूलम्
पउड़ी ॥ हरि तेरी सभ करहि उसतति जिनि फाथे काढिआ ॥ हरि तुधनो करहि सभ नमसकारु जिनि पापै ते राखिआ ॥ हरि निमाणिआ तूं माणु हरि डाढी हूं तूं डाढिआ ॥ हरि अहंकारीआ मारि निवाए मनमुख मूड़ साधिआ ॥ हरि भगता देइ वडिआई गरीब अनाथिआ ॥१७॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: साधिआ = सीधे राह पर डालता है। अनाथ = जिनका और कोई सहारा नहीं है।17।
अर्थ: हे प्रभु! सब जीव तेरी (ही) महिमा करते हैं, जिनको तूने (उन्हें माया में) फंसे हुओं को निकाला है। हे हरि! सब जीव तेरे आगे सिर निवाते हैं, जिसे तूने (उनको) पापों से बचाया है। हे हरि! जिन्हें कहीं आदर नहीं मिलता, तू उनका मान बनता है। हे हरि! तू सर्वश्रेष्ठ है। (हे भाई!) प्रभु अहंकारियों को मार के (भाव, विपता में डाल के) झुकाता है, और मूर्ख मनमुखों को सीधे राह डालता है। प्रभु गरीब व अनाथ भगतों को आदर बख्शता है।17।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ सतिगुर कै भाणै जो चलै तिसु वडिआई वडी होइ ॥ हरि का नामु उतमु मनि वसै मेटि न सकै कोइ ॥ किरपा करे जिसु आपणी तिसु करमि परापति होइ ॥ नानक कारणु करते वसि है गुरमुखि बूझै कोइ ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ सतिगुर कै भाणै जो चलै तिसु वडिआई वडी होइ ॥ हरि का नामु उतमु मनि वसै मेटि न सकै कोइ ॥ किरपा करे जिसु आपणी तिसु करमि परापति होइ ॥ नानक कारणु करते वसि है गुरमुखि बूझै कोइ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भाणै = हुक्म में। वडिआई = आदर। मनि = मन में। करमि = बख्शिश से।1।
अर्थ: जो मनुष्य सतिगुरु के भाणे में जीवन व्यतीत करता है, उसका (हरि की दरगाह में) बड़ा आदर होता है, प्रभु का उत्तम नाम उस के मन में घर करता है (टिकता है)। और कोई (मायावी पदार्थ उत्तम ‘नाम’ के संस्कारों को उसके हृदय में से) दूर नहीं कर सकता। (पर नाम प्राप्ति का कारण, भाव भाणा मानने का उद्यम, मनुष्य के अपने वश में नहीं), कोई गुरमुख जीव ही समझता है, कि जिस पे (हरि खुद) अपनी मेहर करे, उस को उस मेहर सदका (उत्तम नाम) प्राप्त होता है, (क्योंकि) हे नानक! कारण निर्माता के बस में है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ नानक हरि नामु जिनी आराधिआ अनदिनु हरि लिव तार ॥ माइआ बंदी खसम की तिन अगै कमावै कार ॥ पूरै पूरा करि छोडिआ हुकमि सवारणहार ॥ गुर परसादी जिनि बुझिआ तिनि पाइआ मोख दुआरु ॥ मनमुख हुकमु न जाणनी तिन मारे जम जंदारु ॥ गुरमुखि जिनी अराधिआ तिनी तरिआ भउजलु संसारु ॥ सभि अउगण गुणी मिटाइआ गुरु आपे बखसणहारु ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ नानक हरि नामु जिनी आराधिआ अनदिनु हरि लिव तार ॥ माइआ बंदी खसम की तिन अगै कमावै कार ॥ पूरै पूरा करि छोडिआ हुकमि सवारणहार ॥ गुर परसादी जिनि बुझिआ तिनि पाइआ मोख दुआरु ॥ मनमुख हुकमु न जाणनी तिन मारे जम जंदारु ॥ गुरमुखि जिनी अराधिआ तिनी तरिआ भउजलु संसारु ॥ सभि अउगण गुणी मिटाइआ गुरु आपे बखसणहारु ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अनदिनु = हर रोज। लिव तार = एक रस। बंदी = दासी। पूरै = पूरे (गुरु) ने। हुकमि सवारणहार = सवाँरनहार के हुक्म में। मोख = मोक्ष माया के बंधनों से खलासी। जंदारु = जंदाल, जालिम। गुणी = गुणों से।2।
अर्थ: हे नानक! जिन्होंने हर रोज एक रस प्रभु के नाम का स्मरण किया है, पति प्रभु की दासी माया उनकी सेवा में रहती है (भाव, वे लोग माया के पीछे नही घूमते, माया उनकी सेवक बनती है), (क्योंकि) सवाँरनेवाले (प्रभु) के हुक्म में पूरे (गुरु) ने उन्हें पूर्ण कर दिया है (और वे माया के पीछे डोलते नहीं) सतिगुरु की कृपा से जिसने (ये भेद) समझ लिया है, उसने मुक्ति का दर ढूँढ लिया है। मनमुख लोग (प्रभु का) हुक्म नहीं पहचानते, (इस करके) उन्हें जालिम जम दंड देता है। गुरु के सन्मुख हो के जिन्होंने स्मरण किया, वे संसार सागर से तर गए हैं, (क्योंकि सतिगुरु ने) गुणों से (अर्थात, उनके हृदय में गुण प्रगट करके उनके) सारे अवगुण मिटा दिये हैं। गुरु बड़ा बख्शिंद है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ हरि की भगता परतीति हरि सभ किछु जाणदा ॥ हरि जेवडु नाही कोई जाणु हरि धरमु बीचारदा ॥ काड़ा अंदेसा किउ कीजै जा नाही अधरमि मारदा ॥ सचा साहिबु सचु निआउ पापी नरु हारदा ॥ सालाहिहु भगतहु कर जोड़ि हरि भगत जन तारदा ॥१८॥
मूलम्
पउड़ी ॥ हरि की भगता परतीति हरि सभ किछु जाणदा ॥ हरि जेवडु नाही कोई जाणु हरि धरमु बीचारदा ॥ काड़ा अंदेसा किउ कीजै जा नाही अधरमि मारदा ॥ सचा साहिबु सचु निआउ पापी नरु हारदा ॥ सालाहिहु भगतहु कर जोड़ि हरि भगत जन तारदा ॥१८॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: परतीति = भरोसा। जेवडु = जितना, बराबर का। जाणु = जानकार, जानने वाला। धरमु = न्याय की बात। काढ़ा = फिक्र, चिन्ता। अंदेसा = डर। अधरमि = अन्याय के साथ। सचा = सदा स्थिर, अटल, अमोध। कर जोड़ि = हाथ जोड़ के, विनम्रता से।18।
अर्थ: भक्त जनों को प्रभु पे (ये) भरोसा है कि प्रभु अंतरजामी है, उसके बराबर और कोई (दिलों की) जानने वाला नहीं, (और इसलिए) प्रभु न्याय की विचार करता है। यदि (ये भरोसा हो कि) प्रभु अन्याय से नहीं मारता, तो कोई फिक्र डर नहीं रहता। प्रभु खुद अचूक है और उसका न्याय भी अचूक है, (इस ‘मार’ के सदके ही) पापी मनुष्य (पापों से) तौबा करता है। हे भक्त जनों! विनम्र हो के प्रभु की महिमा करो, प्रभु अपने भक्तों को विकारों से बचा लेता है।18।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ आपणे प्रीतम मिलि रहा अंतरि रखा उरि धारि ॥ सालाही सो प्रभ सदा सदा गुर कै हेति पिआरि ॥ नानक जिसु नदरि करे तिसु मेलि लए साई सुहागणि नारि ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ आपणे प्रीतम मिलि रहा अंतरि रखा उरि धारि ॥ सालाही सो प्रभ सदा सदा गुर कै हेति पिआरि ॥ नानक जिसु नदरि करे तिसु मेलि लए साई सुहागणि नारि ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: उरि = हृदय में। सालाही = मैं कीर्ति करूँ। गुर कै हेति = गुरु के (पैदा किये) प्यार से। सुहागणि = जीवित पति वाली।1।
अर्थ: (मन चाहता है कि) अपने प्यारे को (सदा) मिली रहूँ, अंदर दिल में परो के रखूँ और सतिगुरु के लगाए प्रेम में सदा उस प्रभु की महिमा करती रहूँ। (पर) हे नानक! जिस तरफ (वह प्यारा प्यार से) देखता है, उस को (ही अपने साथ) मेलता है, और वही स्त्री सुहागन (जीवित पति वाली) कहलाती है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ गुर सेवा ते हरि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥ माणस ते देवते भए धिआइआ नामु हरे ॥ हउमै मारि मिलाइअनु गुर कै सबदि तरे ॥ नानक सहजि समाइअनु हरि आपणी क्रिपा करे ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ गुर सेवा ते हरि पाईऐ जा कउ नदरि करेइ ॥ माणस ते देवते भए धिआइआ नामु हरे ॥ हउमै मारि मिलाइअनु गुर कै सबदि तरे ॥ नानक सहजि समाइअनु हरि आपणी क्रिपा करे ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मिलाइअनु = मिलाए हैं उस प्रभु ने। सहिज = अडोलता में। समाइअनु = लीन किए हैं उस प्रभु ने। क्रिपा करे = कृपा करके। करे = कर के।2।
अर्थ: प्रभु जिस (जीव) पर मेहर की नजर करता है, वह (जीव) सतिगुरु की बतायी कृत करके प्रभु से मिल जाता है। हरि नाम का स्मरण करके जीव मनुष्य (-स्वभाव) से देवताबन जाते हैं। जिनका अहम् दूर करके उस प्रभु ने अपने साथ मिलाया है, वह गुरु के शबदों के द्वारा विकारों से बच जाते हैं। हे नानक! प्रभु ने अपनी मेहर करके उन्हें अडोल अवस्था में टिका दिया।2।
[[0091]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ हरि आपणी भगति कराइ वडिआई वेखालीअनु ॥ आपणी आपि करे परतीति आपे सेव घालीअनु ॥ हरि भगता नो देइ अनंदु थिरु घरी बहालिअनु ॥ पापीआ नो न देई थिरु रहणि चुणि नरक घोरि चालिअनु ॥ हरि भगता नो देइ पिआरु करि अंगु निसतारिअनु ॥१९॥
मूलम्
पउड़ी ॥ हरि आपणी भगति कराइ वडिआई वेखालीअनु ॥ आपणी आपि करे परतीति आपे सेव घालीअनु ॥ हरि भगता नो देइ अनंदु थिरु घरी बहालिअनु ॥ पापीआ नो न देई थिरु रहणि चुणि नरक घोरि चालिअनु ॥ हरि भगता नो देइ पिआरु करि अंगु निसतारिअनु ॥१९॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: वेखालीअनु = दिखाई है उसने। घालीअनु = मेहनत कराई है उसने। बहालीअनु = बैठाए हैं उसने। चालीअनु = चलाए हैं उसने। निसतारीअनु = निस्तारा किया, पार उतारे हैं उसने। (देखें: ‘गुरबाणी व्याकरण’)19।
अर्थ: प्रभु ने (भक्त जनों से) स्वयं ही अपनी भक्ति कराके (भक्ति की इनायत से उनको अपनी) बड़ाई दिखाई है। प्रभु (भगतों के दिल में) अपना भरोसा स्वयं (उत्पन्न) करता है तथा उनसे स्वयं ही सेवा उसने कराई है। (भगतों को अपने भजन का) आनंद (भी) स्वयं ही बख्शता है (और इस तरह उनको) हृदय में अडोल बैठा रखा है। (पर) पापियों को अडोल चिक्त नहीं रहने देता, चुन के (उनको) घोर नर्क में डाल दिया है। भक्त जनों को प्यार करता है, (उनका) पक्ष करके उसने खुद उनको (विकारों से) बचाया है।19।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः १ ॥ कुबुधि डूमणी कुदइआ कसाइणि पर निंदा घट चूहड़ी मुठी क्रोधि चंडालि ॥ कारी कढी किआ थीऐ जां चारे बैठीआ नालि ॥ सचु संजमु करणी कारां नावणु नाउ जपेही ॥ नानक अगै ऊतम सेई जि पापां पंदि न देही ॥१॥
मूलम्
सलोक मः १ ॥ कुबुधि डूमणी कुदइआ कसाइणि पर निंदा घट चूहड़ी मुठी क्रोधि चंडालि ॥ कारी कढी किआ थीऐ जां चारे बैठीआ नालि ॥ सचु संजमु करणी कारां नावणु नाउ जपेही ॥ नानक अगै ऊतम सेई जि पापां पंदि न देही ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: कुबुद्धि (मनुष्य के अंदर की) मरासणि (डूमणी) है। बे-तरस कसाइण है। पर निंदा अंदर की चूहड़ी (गंदगी) है, और क्रोध चण्डालण (है जिस) ने (जीव के शांत स्वभाव को) ठग रखा है। यदि ये चारों भीतर ही बैठी हों, तो (बाहर चौका स्वच्छ रखने के लिए) लकीरें खींचने का क्या लाभ? हे नानक! जो मनुष्य ‘सच’ को (चौका स्वच्छ करने की) जुगति बनाते हैं, उच्च आचरण को (चौके की) लकीरें बनाते हैं, जो नाम जपते हैं और इसको (तीर्थ) स्नान समझते हैं, जो और लोगों को भी पापों वाली शिक्षा नहीं देते, वह मनुष्य प्रभु की हजूरी में अच्छे गिने जाते हैं।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः १ ॥ किआ हंसु किआ बगुला जा कउ नदरि करेइ ॥ जो तिसु भावै नानका कागहु हंसु करेइ ॥२॥
मूलम्
मः १ ॥ किआ हंसु किआ बगुला जा कउ नदरि करेइ ॥ जो तिसु भावै नानका कागहु हंसु करेइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
अर्थ: जिस ओर (प्रभु) प्यार से देखे उसका बगुला (-पन, भाव, पाखण्ड दूर होना) क्या मुश्किल है और उसका हंस (भाव, उज्जवल मति) बनना क्या (मुश्किल है)? हे नानक! अगर प्रभु चाहे (तो वह बाहर से अच्छे दिखने वाले की तो क्या बात) कौए को भी (अर्थात, अंदर से गंदे आचरण वाले को भी उज्जवल बुद्धि) हंस बना देता है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ कीता लोड़ीऐ कमु सु हरि पहि आखीऐ ॥ कारजु देइ सवारि सतिगुर सचु साखीऐ ॥ संता संगि निधानु अम्रितु चाखीऐ ॥ भै भंजन मिहरवान दास की राखीऐ ॥ नानक हरि गुण गाइ अलखु प्रभु लाखीऐ ॥२०॥
मूलम्
पउड़ी ॥ कीता लोड़ीऐ कमु सु हरि पहि आखीऐ ॥ कारजु देइ सवारि सतिगुर सचु साखीऐ ॥ संता संगि निधानु अम्रितु चाखीऐ ॥ भै भंजन मिहरवान दास की राखीऐ ॥ नानक हरि गुण गाइ अलखु प्रभु लाखीऐ ॥२०॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: सतिगुर साखीऐ = गुरु की शिक्षा से। संगि = संगति में। निधानु = खजाना। मिहरवान = हे मेहरवान। गुण गाइ = गुण गा के। लाखीऐ = समझ लेते हैं। सचु = सदा स्थिर प्रभु।20।
अर्थ: जिस काम को सिरे चढ़ाने की इच्छा हो, उसकी (पूर्णता के लिए) प्रभु के पास विनती करनी चाहिए, (इस तरह) सतिगुरु की शिक्षा से सदा स्थिर प्रभु कार्य सवार देता है। संतों की संगति में नाम खजाना मिलता है, और आत्मिक जीवन देने वाला नाम जल चख सकते हैं। (सो यह बिनती करनी चाहिए कि) हे डर नाश करने वाले और दया करने वाले हरि! दास की लज्जा रख! दास की लज्जा रख लो! हे नानक! (इस तरह) प्रभु की महिमा करने से अलख प्रभु के साथ सांझ डाल लेते हैं।20।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सलोक मः ३ ॥ जीउ पिंडु सभु तिस का सभसै देइ अधारु ॥ नानक गुरमुखि सेवीऐ सदा सदा दातारु ॥ हउ बलिहारी तिन कउ जिनि धिआइआ हरि निरंकारु ॥ ओना के मुख सद उजले ओना नो सभु जगतु करे नमसकारु ॥१॥
मूलम्
सलोक मः ३ ॥ जीउ पिंडु सभु तिस का सभसै देइ अधारु ॥ नानक गुरमुखि सेवीऐ सदा सदा दातारु ॥ हउ बलिहारी तिन कउ जिनि धिआइआ हरि निरंकारु ॥ ओना के मुख सद उजले ओना नो सभु जगतु करे नमसकारु ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जीउ = जिंद। पिंडु = शरीर।1।
अर्थ: जो हरि सब जीवों को धरवासा देता है, ये जिंद और शरीर सब कुछ उसी का (दिया हुआ) है। हे नानक! गुरु के सन्मुख रह के (ऐसे) दातार की नित्य सेवा करनी चाहिए। सदके हूँ उनसे, जिन्होंने निरंकार हरि का स्मरण किया है। उनके मुख सदा खिले रहते हैं और सारा संसार उनके आगे सिर निवाता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
मः ३ ॥ सतिगुर मिलिऐ उलटी भई नव निधि खरचिउ खाउ ॥ अठारह सिधी पिछै लगीआ फिरनि निज घरि वसै निज थाइ ॥ अनहद धुनी सद वजदे उनमनि हरि लिव लाइ ॥ नानक हरि भगति तिना कै मनि वसै जिन मसतकि लिखिआ धुरि पाइ ॥२॥
मूलम्
मः ३ ॥ सतिगुर मिलिऐ उलटी भई नव निधि खरचिउ खाउ ॥ अठारह सिधी पिछै लगीआ फिरनि निज घरि वसै निज थाइ ॥ अनहद धुनी सद वजदे उनमनि हरि लिव लाइ ॥ नानक हरि भगति तिना कै मनि वसै जिन मसतकि लिखिआ धुरि पाइ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नउनिधि = पुरातन संस्कृत पुस्तकों में धन का देवता कुबेर माना गया है. उसका ठिकाना कैलाश पर्वत बताया गया है. उसके खजानों का गिनती 9 बताई गई है, जो इस प्रकार है: (महापद्यश्च पद्यश्च शंखोमकरकच्छपौ। मुकुन्द कुन्द नीलाश्च खर्वश्च निधयो नव) अर्थात, महा पद्म, पद्म,शंख, मकर, कश्यप, मुकुंद, कुंद, नील, खरव। अनहद = एक रस। धुनी = सुर, नाम जपने की लहर। अनहद धुनी वजदे = (उसके अंदर) एक रस टिके रहने वाली सुर वाले बाजे बजते हैं।2।
अर्थ: अगर गुरु मिल जाए, तो मनुष्य की तवज्जो माया की ओर से हट जाती है। (ऐसे मनुष्य को) खाने-खरचने के लिए जैसे सारी ही माया मिल जाती है। अठारह (ही) सिद्धियां (भाव, आत्मिक शक्तियां) उसके पीछे लगी फिरती हैं (पर वह परवाह नहीं करता और) अपने हृदय में अडोल रहता है। सहज स्वभाव एक रस उसके अंदर नाम जपने की लहर चलती रहती है और प्यार की चाहत में वह हरि के साथ तवज्जो जोड़े रखता है। हे नानक! हरि की (ऐसी) भक्ति उनके हृदय में बसती है जिनके मस्तक पे (पिछली भक्ति वाले किए कामों के संस्कारों के अनुसार) धुर से ही (भक्ति वाले संस्कार) लिखे पड़े हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पउड़ी ॥ हउ ढाढी हरि प्रभ खसम का हरि कै दरि आइआ ॥ हरि अंदरि सुणी पूकार ढाढी मुखि लाइआ ॥ हरि पुछिआ ढाढी सदि कै कितु अरथि तूं आइआ ॥ नित देवहु दानु दइआल प्रभ हरि नामु धिआइआ ॥ हरि दातै हरि नामु जपाइआ नानकु पैनाइआ ॥२१॥१॥ सुधु
मूलम्
पउड़ी ॥ हउ ढाढी हरि प्रभ खसम का हरि कै दरि आइआ ॥ हरि अंदरि सुणी पूकार ढाढी मुखि लाइआ ॥ हरि पुछिआ ढाढी सदि कै कितु अरथि तूं आइआ ॥ नित देवहु दानु दइआल प्रभ हरि नामु धिआइआ ॥ हरि दातै हरि नामु जपाइआ नानकु पैनाइआ ॥२१॥१॥ सुधु
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पैनाइआ = आदर मिलना।21।
अर्थ: मैं प्रभु पति का ढाढी प्रभु के दर पर पहुँचा, प्रभु के दरबार में मुझढाढी की पुकार सुनी गयीऔर मुझे दर्शन हुए। मुझढाढी को हरि ने बुला के, पूछा, हे ढाढी! तू किस काम के लिए आया है? (मैंने बेनती की) ‘हे दयावान प्रभु सदा (यही दान बख्शो कि) तेरे नाम का स्मरण करूँ’। (विनती सुन के) दातार हरि ने अपना नाम मुझसे जपाया और मुझे नानक को आदर (भी) दी।21।1। सुधु।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सिरीरागु कबीर जीउ का ॥ एकु सुआनु कै घरि गावणा
मूलम्
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सिरीरागु कबीर जीउ का ॥ एकु सुआनु कै घरि गावणा
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘ऐक सुआन’ कै घरि गावणा’ – कबीर जी का यह शब्द उस ‘घर’ में गाना है जिस घर में वह शब्द गाना है जिसकी पहली तुक है ‘ऐक सुआनु दुइ सुआनी नालि’। ये शब्द गुरु नानक देव जी का है सिरी राग में दर्ज है नंबर 29।
कै घरि = के घर में। अगर संबोधक ‘कै’ का संबंध शब्द ‘सुआन’ के साथ होता, तो इस शब्द के आखिर में मात्रा ‘ु’ ना होती। इससे ये सिद्ध होता है कि ‘ऐकु सुआनु’ से भाव है वह सारा शब्द जिसके शुरू में ये लफ्ज़ हैं।
‘जननी जानत’ शब्द कबीर जी का है, पर इसे गाने के लिए जिस शब्द की तरफ इशारा है वह गुरु नानक देव जी का है। सो, यह शीर्षक ‘ऐकु सुआनु कै घरि गावणा॥’ कबीर जी का नहीं हो सकता।
इस शब्द के शीर्षक के साथ लफ्ज़ ‘ऐकु सुआनु कै घरि गावणा॥’ क्यूँ बरते गए हैं? इस प्रश्न का उत्तर ढूँढने के वास्ते सतिगुरु नानक देव जी का वह शब्द पढ़ के देखें, जिसके आरम्भ के शब्द हैं “ऐकु सुआनु”।
सिरी रागु महला १ घरु ४॥ एकु सुआनु दुइ सुआनी नालि॥ भलके भउकहि सदा बइआलि॥ कूड़ु छुरा मुठा मुरदारु॥ धाणक रूपि रहा करतार॥१॥ मै पति की पंदि न करणी की कार॥ हउ बिगड़ै रूपि रहा बिकराल॥ तेरा एकु नामु तारे संसारु॥ मै एहा आस एहो आधारु॥१॥ रहाउ॥ मुखि निंदा आखा दिन राति॥ पर घरु जोही नीच सनाति॥ कामु क्रोधु तनि वसहि चंडाल॥ धाणक रूपि रहा करतार॥२॥ फाही सुरति मलूकी वेसु॥ हउ ठगवाड़ा ठगी देसु॥ खरा सिआणा बहुता भारु॥ धाणक रूपि रहा करतार॥३॥ मै कीता न जाता हरामखोरु॥ हउ किआ मुहु देसा दुसटु चोरु॥ नानकु नाचु कहै बीचारु॥ धाणक रूपि रहा करतार॥४॥२९॥ (पन्ना२४)
कबीर जी ने अपने शब्द में लिखा है “इतु संगति निहचउ मरणा॥ ” अर्थात, वह कौन सी ‘संगति’ है जिस करके ‘निहचउ मरणा’ होता है? कबीर जी ने इसके उत्तर में सिर्फ शब्द ‘माया’ या ‘बिखिआ रस’ बरते हैं। ‘माया’ का क्या स्वरूप है? वे ‘बिखिआ रस’ कौन से हैं? इसका खुलासा कबीर जी ने नहीं किया। अब पढ़ेंगुरू नानक देव जी का ये उपरोक्त शब्द – सुआन, सुआनी, कूड़, मुरदारु, निंदा, पर घरु, कामु, क्रोधु आदि ये सारे ‘बिखिया’ के ‘रस’ हैं जिनकी संगति में ‘निहचउ मरणा’ है। क्योंकि, ये इन रसों के वश में पड़ा जीव ‘धाणक रूप” रहता है। जो बात कबीर जी ने मात्र इशारे से ‘बिखिआ रस’ के संदर्भ दे के की है, गुरु नानक देव जी ने विस्तार से एक सुंदर ढंग में इस सारे शब्द के द्वारा खोल के बतायी है।
‘शीर्षक’ की सांझ और मजमून की सांझ हमें इस नतीजे पर पहुँचाती है कि गुरु नानक देव जी ने अपना ये शब्द कबीर जी के शब्द की व्याख्या में उचारा है। कबीर जी का ये शब्द सतिगुरु जी के पास मौजूद था।
ये शीर्षक ‘ऐकु सुआनु कै घरि गावणा॥’ भी गुरु नानक देव जी का भी हो सकता है, या गुरु अरजन साहिब जी का। कबीर जी का किसी हालत में नहीं है।
नोट: शब्द ‘घर’ का संबंध ‘गाने’ से है, इसमें रागियों के लिए हिदायत है, इसका संबंध शब्द ‘महला’ के साथ नहीं है। इसलिए शब्द ‘घर’ का संबंध शब्द ‘महला’ के साथ समझ के उसका उच्चारण ‘महल्ला’ करना गलत है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जननी जानत सुतु बडा होतु है इतना कु न जानै जि दिन दिन अवध घटतु है ॥ मोर मोर करि अधिक लाडु धरि पेखत ही जमराउ हसै ॥१॥
मूलम्
जननी जानत सुतु बडा होतु है इतना कु न जानै जि दिन दिन अवध घटतु है ॥ मोर मोर करि अधिक लाडु धरि पेखत ही जमराउ हसै ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जननी = मां। सुतु = पुत्र। इतना कु = इतनी बात। अवध = उम्र। दिन दिन = हर रोज, ज्यों ज्यों दिन बीतते हैं। मोर = मेरा। करि = करे, करती है। अधिक = बहुत। धरि = धरती है, करती है। पेखत ही = जैसे जैसे देखता है।1।
अर्थ: मां समझती है कि मेरा पुत्र बड़ा हो रहा है, पर वह इतनी बात नहीं समझती कि ज्यों ज्यों दिन बीत रहे हैं इसकी उम्र घट रही है। वह ये कहती है “ये मेरा पुत्र है, ये मेरा पुत्र है” (और उसके साथ) बहुत लाड करती है। (मां की इस ममता को) देख देख के यमराज हसता है।1।
[[0092]]
विश्वास-प्रस्तुतिः
ऐसा तैं जगु भरमि लाइआ ॥ कैसे बूझै जब मोहिआ है माइआ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
ऐसा तैं जगु भरमि लाइआ ॥ कैसे बूझै जब मोहिआ है माइआ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तैं = तू (हे प्रभु!)। भरमि = भुलेखे में। रहाउ।
अर्थ: (हे प्रभु!) इस तरह तूने जगत को भुलेखे में डाला हुआ है। माया द्वारा ठगे हुए जीव को ये समझ नहीं आता (कि मैं भुलावे में फंसा हुआ हूँ)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
कहत कबीर छोडि बिखिआ रस इतु संगति निहचउ मरणा ॥ रमईआ जपहु प्राणी अनत जीवण बाणी इन बिधि भव सागरु तरणा ॥२॥
मूलम्
कहत कबीर छोडि बिखिआ रस इतु संगति निहचउ मरणा ॥ रमईआ जपहु प्राणी अनत जीवण बाणी इन बिधि भव सागरु तरणा ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बिखिआ रस = माया के स्वाद। इतु संगति = इस कुसंगत में, माया के रसों की संगत में। निहचउ = जरूर। मरणा = आत्मिक मौत। रमईआ = राम को। अनत = अनंत, अटल। अनत जीवण = अटल जिंदगी देने वाली। भव सागरु = संसार समुंदर।2।
अर्थ: कबीर कहता है: हे प्राणी! माया के चस्के छोड़ दे, इन रसों के साथ लगने से जरूर आत्मिक मौत होती है (भाव, आत्मा मुर्दा हो जाती है); (प्रभु के भजन वाली ये) वाणी (मनुष्य को) अटल जीवन बख्शती है। इस तरह संसार समुंदर को तैर जाते हैं।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जां तिसु भावै ता लागै भाउ ॥ भरमु भुलावा विचहु जाइ ॥ उपजै सहजु गिआन मति जागै ॥ गुर प्रसादि अंतरि लिव लागै ॥३॥
मूलम्
जां तिसु भावै ता लागै भाउ ॥ भरमु भुलावा विचहु जाइ ॥ उपजै सहजु गिआन मति जागै ॥ गुर प्रसादि अंतरि लिव लागै ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तिसु भावै = उस प्रभु को ठीक लगे। भाउ = प्रेम। भुलावा = भुलेखा। विचहु = मन में से। सहजु = वह अवस्था जिस में भटकन ना रहे, अडोलता। गिआन मति = गिआन वाली बुद्धि। अंतरि = हृदय में।3।
अर्थ: (पर) यदि उस प्रभु को ठीक लगे तब ही (जीव का) प्यार उससे पड़ता है और (इस के) मन में से भ्रम और भुलेखा दूर होता है। (जीव के अंदर) अडोलता की हालत पैदा होती है। ज्ञान वाली बुद्धि प्रगट हो जाती है और गुरु की मेहर से इसके हृदय में प्रभु के साथ जोड़ जुड़ जाता है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
इतु संगति नाही मरणा ॥ हुकमु पछाणि ता खसमै मिलणा ॥१॥ रहाउ दूजा ॥
मूलम्
इतु संगति नाही मरणा ॥ हुकमु पछाणि ता खसमै मिलणा ॥१॥ रहाउ दूजा ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: इतु संगति = इस संगति में, प्रभु के साथ जुड़ने वाली हालत में। मिलणा = मिलाप। रहाउ दूजा।1।
अर्थ: प्रभु के साथ चिक्त जोड़ने से आत्मिक मौत नहीं होती, (क्योंकि, ज्यों ज्यों जीव प्रभु के) हुक्म को पहिचानता है, तो प्रभु के साथ इसका मिलाप हो जाता है।1। रहाउ दूजा।
दर्पण-भाव
शब्द का भाव: जीव के भी क्या वश? प्रभु ने स्वयं ही जीवों को माया के मोह में फंसाया हुआ है, इस मोह में पड़े मनुष्य की आत्मा मुर्दा हो रही है।
पर अगर कर्तार मेहर करे, गुरु से मिला दे, तो माया का मोह अंदर से दूर हो जाता है, प्रभु के साथ डोर जुड़ जाती है, मन अडोल हो जाता है, दाते की रजा की समझ पड़ जाती है और आत्मा गिरावट रूपी मौत के चुंगल से बच निकलती है।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: आम तौर पे हरेक शब्द में ‘रहाउ’ एक ही होता है, उसी में सारे शब्द का केन्द्रिय भाव होता है। पर इस शब्द में दो ‘रहाउ’ हैं पहिले में प्रश्न किया गया है कि जीव को कैसे समझ आये कि मै भटक रहा हूँ? इसका उक्तर दूसरे ‘रहाउ’ में दिया गया है कि रजा को समझ के रजा वाले में मिल जाना है।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु त्रिलोचन का ॥ माइआ मोहु मनि आगलड़ा प्राणी जरा मरणु भउ विसरि गइआ ॥ कुट्मबु देखि बिगसहि कमला जिउ पर घरि जोहहि कपट नरा ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु त्रिलोचन का ॥ माइआ मोहु मनि आगलड़ा प्राणी जरा मरणु भउ विसरि गइआ ॥ कुट्मबु देखि बिगसहि कमला जिउ पर घरि जोहहि कपट नरा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मनि = मन में। आगलड़ा = बहुत। जरा = बुढ़ापा। बिगसहि = तू प्रसन्न होता है। कमला जीउ = कमल के फूल की तरह। पर घरि = पराए घर में। जोहहि = तू तोलता है, जांचता है, ताड़ता है। कपट नरा = हे खोटे मनुष्य!।1।
अर्थ: हे प्राणी! तेरे मन में माया का मोह बहुत (जोरों में) है। तुझे ये डर नहीं रहा कि बुढ़ापा आना है, मौत आनी है। हे खोटे मनुष्य! तू अपने परिवार को देख के ऐसे खुश होता है जैसे कमल का फूल (सूरज को देख के), तू पराए घर में देखता फिरता है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
दूड़ा आइओहि जमहि तणा ॥ तिन आगलड़ै मै रहणु न जाइ ॥ कोई कोई साजणु आइ कहै ॥ मिलु मेरे बीठुला लै बाहड़ी वलाइ ॥ मिलु मेरे रमईआ मै लेहि छडाइ ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
दूड़ा आइओहि जमहि तणा ॥ तिन आगलड़ै मै रहणु न जाइ ॥ कोई कोई साजणु आइ कहै ॥ मिलु मेरे बीठुला लै बाहड़ी वलाइ ॥ मिलु मेरे रमईआ मै लेहि छडाइ ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: दूड़ा आइओहि = दौड़े आ रहे हैं। जमहि तणा = यम के पुत्र, जमदूत। तिन आगलड़ै = उन (जमदूतों) के सामने। कोई कोई = गिने चुने। साजणु = संत जन। बाहड़ी वलाइ = बांहें वल के, गले लगा के। बीठलु = हे बीठल! हे प्रभु! हे माया रहित प्रभु! (वि+स्थल)। मै = मुझसे।1। रहाउ।
अर्थ: कोई विरला संत जन (जगत में) आ के इस तरह विनती करता है: हे प्रभु! मुझे मिल, गले लगा के मिल। हे मेरे राम! मुझे मिल, मुझे (माया के मोह से) छुड़ा ले। जमदूत तेजी से आ रहे हैं, उनके सामने मुझसे (पल मात्र भी) अटका नहीं जा सकेगा।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
अनिक अनिक भोग राज बिसरे प्राणी संसार सागर पै अमरु भइआ ॥ माइआ मूठा चेतसि नाही जनमु गवाइओ आलसीआ ॥२॥
मूलम्
अनिक अनिक भोग राज बिसरे प्राणी संसार सागर पै अमरु भइआ ॥ माइआ मूठा चेतसि नाही जनमु गवाइओ आलसीआ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पै = में। अमरु = ना मरने वाला। मुठा = ठगा हुआ। चेतसि नाही = तू याद नहीं करता (हरि को)।2।
अर्थ: हे प्राणी! माया के अनेक भोगों व प्रताप के कारण तू (प्रभु को) भुला बैठा है, (तू समझता है कि) इस संसार समुंदर में (मैं) सदा कायम रहूँगा। माया का ठगा हुआ तू (प्रभु को) नहीं स्मरण करता। हे आलसी मनुष्य! तूने अपना जन्म बेकार गवा लिया है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बिखम घोर पंथि चालणा प्राणी रवि ससि तह न प्रवेसं ॥ माइआ मोहु तब बिसरि गइआ जां तजीअले संसारं ॥३॥
मूलम्
बिखम घोर पंथि चालणा प्राणी रवि ससि तह न प्रवेसं ॥ माइआ मोहु तब बिसरि गइआ जां तजीअले संसारं ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बिखम घोर पंथि = बहुत अंधकार भरे रास्ते पर। रवि = सूर्य। ससि = चंद्रमा। प्रवेसं = दखल। तजीअले = छोड़ा।3।
अर्थ: हे प्राणी! तू (माया के मोह के) ऐसे गहरे अंधकार भरे रास्ते पर चल रहा है, जहाँ ना सूरज का दखल है ना चंद्रमा का (अर्थात, जहाँ तुझे ना दिन में अक़्ल आती है ना ही रात को)। जब (मरने के वक्त) संसार को छोड़ने लगो, तब तो माया का ये मोह (भाव, संबंध अवश्य) छोड़ेगा ही (तो फिर अभी क्यों नहीं?)।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
आजु मेरै मनि प्रगटु भइआ है पेखीअले धरमराओ ॥ तह कर दल करनि महाबली तिन आगलड़ै मै रहणु न जाइ ॥४॥
मूलम्
आजु मेरै मनि प्रगटु भइआ है पेखीअले धरमराओ ॥ तह कर दल करनि महाबली तिन आगलड़ै मै रहणु न जाइ ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पेखीअले = देखा है। तह = वहां, धर्मराज की हजूरी में। कर = हाथों से। दल करनि = दलन कर देते हैं, दल देते हैं।4।
अर्थ: (कोई बिरला संतजन कहता है:) मेरे मन में ये बात स्पष्ट हो चुकी है कि (माया में फंसे रहने से) धर्मराज (का मुंह) देखना पड़ेगा। वहां तो बड़े बड़े बलवानों को भी जमदूत हाथों से दल देते हैं, मेरी तो उनके आगे कोई पेश नहीं चल सकेगी।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जे को मूं उपदेसु करतु है ता वणि त्रिणि रतड़ा नाराइणा ॥ ऐ जी तूं आपे सभ किछु जाणदा बदति त्रिलोचनु रामईआ ॥५॥२॥
मूलम्
जे को मूं उपदेसु करतु है ता वणि त्रिणि रतड़ा नाराइणा ॥ ऐ जी तूं आपे सभ किछु जाणदा बदति त्रिलोचनु रामईआ ॥५॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जे को = जब कोई। मूं = मुझे। वणि = बन में। त्रिणि = तिनके में। वणि त्रिणि = सब जगह। रतड़ा = रविआ हुआ, व्यापक है। ऐ जी रमईआ = हे सुंदर राम जी! बदति = कहता है।5।
अर्थ: (वैसे तो) हे नारायण! (तू कभी याद नहीं आता, पर) जब कोई (गुरमुखि) मुझे शिक्षा देता है, तो तू सब जगह व्यापक दिखाई देने लग पड़ता है। हे राम जी! तेरीआं तू ही जाने - मेरी त्रिलोचन की यही बिनती है।5।2।
दर्पण-भाव
शब्द का भाव: जीव माया के मोह में पूरी तरह फंसे हुए हैं, किसी को ना मौत चेते है ना ही परमात्मा। पदार्थों के रसों मे लिप्त हुए समझते हैं, हमने कभी मरना नहीं और मानव जनम बेकार गवां रहे हैं। ये ख्याल नहीं आता कि एक दिन ये जगत छोड़ना ही पड़ेगा और इस बद्-मस्ती के कारण जमों का दण्ड सहना ही पड़ेगा।
पर हां, कोई गिने चुने भाग्यशाली हैं जो इस अंत समय को याद रख के प्रभु के दर पर अरजोई करते हैं और उसे मिलने की तमन्ना करते हैं।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: त्रिलोचन जी ने शब्द ‘बीठला’ बरता है, उसी को वे ‘वणि त्रिणि रतड़ा नारायणा” और “रामईआ” कहते हैं। शब्द ‘बीठल’ संस्कृत के शब्द ‘विष्ठल’ का प्राक्रित रूप है। वि+स्थल। वि = परे, माया से परे। स्थल = टिका हुआ है। इसी तरह ‘विष्ठल’ या ‘वीठला’ = वह प्रभु जो माया के प्रभाव से दूर परे टिका हुआ है। ये शब्द सतिगुरु जी ने भी कई बार बरता है, और सर्व-व्यापक परमात्मा के वास्ते ही बरता है।
भक्त-वाणी को गुरमति के विरुद्ध समझने वाले एक सज्जन ने त्रिलोचन जी के बारे में यूँ लिखा है: ‘भक्त त्रिलोचन जी बारसी नामी नगर (जिला शैलापुर) महाराष्ट्र के रहने वाले थे। आप का जन्म संवत् 1267 बिक्रमी के इर्द गिर्द हुआ है। साबित होता है कि भक्त नाम देव जी के साथ इनका मिलाप हुआ रहा है। भक्त-मार्ग का ज्ञान भी इन्होंने नामदेव जी से ही प्राप्त किया था।
“आप जी के पाँच शब्द भक्त वाणी के रूप में छापे वाली बीड़ के अंदर पढ़ने में आते हैं, जो दो गूजरी राग में, एक सिरी राग के अंदर और एक धनासरी राग में है। भक्त जी के श्लोक भी हैं। आप भी नामदेव जी की तरह बीठल मूर्ती के ही पुजारी थे।…..भक्त जी के पाँचों शब्द गुरमति के किसी भी आशय का प्रचार नहीं करते। भक्त जी के कई सिद्धांत गुरमति से उलट हैं। भक्त जी जिस कृष्ण भक्ति के श्रद्धालू थे, उस कृष्ण जी का गुरमति के अंदर पूर्ण खण्डन है।”
पाठकों के सामने शब्द और शब्द के अर्थ मौजूद हैं। शब्द का भाव भी दिया गया है। लफ्ज़ ‘बीठल’ बारे नोट भी पेश किया गया है। जहाँ तक इस शब्द का संबंध पड़ता है, पाठक सज्जन स्वयं ही निर्णय कर लें कि यहां कहीं कोई बात गुरमति के उलट है। भक्त जी का ‘बीठल’ वह है जो ‘नारायण’ है और ‘वणि त्रिणि रतड़ा’ है। किसी भी खींच-घसीट से इसे मूर्ती नहीं कहा जा सकता।
विश्वास-प्रस्तुतिः
स्रीरागु भगत कबीर जीउ का ॥ अचरज एकु सुनहु रे पंडीआ अब किछु कहनु न जाई ॥ सुरि नर गण गंध्रब जिनि मोहे त्रिभवण मेखुली लाई ॥१॥
मूलम्
स्रीरागु भगत कबीर जीउ का ॥ अचरज एकु सुनहु रे पंडीआ अब किछु कहनु न जाई ॥ सुरि नर गण गंध्रब जिनि मोहे त्रिभवण मेखुली लाई ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पंडीआ = हे पंडित! सुरि = देवते। गण = शिव के खास निजी सेवक। गंधर्व = देवताओं के रागी। त्रिभवण = तीनों भवनों को, सारे जगत को। मेखुली = (माया की) तगाड़ी।1।
अर्थ: हे पण्डित! उस अचरज प्रभु का एक चमत्कार सुनो! (जो मेरे साथ घटित हुआ है और जो) इस वक्त (ज्यूँ का त्यूँ) कहा नहीं जा सकता। उस प्रभु ने सारे जगत को (माया की) तगाड़ी डाल के देवते, मनुष्य, गण और गंधर्वों को मोह के रखा है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
राजा राम अनहद किंगुरी बाजै ॥ जा की दिसटि नाद लिव लागै ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
राजा राम अनहद किंगुरी बाजै ॥ जा की दिसटि नाद लिव लागै ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अनहद = एक रस, बिना यत्न करने के, बजाने के बिना। किंगुरी बाजै = किंगुरी बज रही है, राग हो रहा है। जा की = जिस (प्रभु) की। दिसटि = (कृपा की) दृष्टि। नाद लिव = शब्द की लगन, शब्द की ओर रुचि। रहाउ।
अर्थ: (वह आश्चर्यजनक चमत्कार ये है कि) जिस प्रकाश-रूपी प्रभु के मेहर की नजर से शब्द में लगन लगती है, उस प्रभु की (मेरे अंदर) एक रस तार बज रही है1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
भाठी गगनु सिंङिआ अरु चुंङिआ कनक कलस इकु पाइआ ॥ तिसु महि धार चुऐ अति निरमल रस महि रसन चुआइआ ॥२॥
मूलम्
भाठी गगनु सिंङिआ अरु चुंङिआ कनक कलस इकु पाइआ ॥ तिसु महि धार चुऐ अति निरमल रस महि रसन चुआइआ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: भाठी = भट्ठी, जहां शराब, अर्क आदि निकाला जाता है। गगनु = आकाश, दसवां द्वार, (चिदाकाश, चिक्त+आकाश) दिमाग, जिस द्वारा प्रभु में तवज्जो जोड़ी जा सकती है। सिंञिआ चुंञिआ = दो नालियां जो अर्क या शराब निकालने के लिए बरती जाती हैं, एक नाली से अर्क निकलता है और दूसरी से फालतू पानी। कनक = सोना। कलसु = मटका, जिसमें अर्क या शराब टपक टपक के पड़ती जाती है। इकु = एक प्रभु। कनक कलसु = सोने का मटका, शुद्ध हृदय। तिसु महि = उस (सुनहरी) कलश में, शुद्ध हृदय में। धार = (नाम अमृत की) धारा। चुऐ = टपक टपक के पड़ती है। रस महि रसन = सभी रसों से स्वादिष्ट रस, नाम अमृत। सिंञिआ चुंञिआ = भाव, बुरे कर्मों को त्यागना व अच्छे कर्मों को ग्रहण करना।2।
अर्थ: मेरा दिमाग भट्ठी बना हुआ है (भाव, तवज्जो प्रभु में जुड़ी हुई है), बुरे कामों से संकोच जैसे, फालतू पानी को बहाने की नाली है; और सद्गुणों का ग्रहण करना जैसे, (नाम रूपी) शराब निकालने वाली नाली (पाइप) है। और शुद्ध हृदय जैसे, सोने का मटका है। अब मैंने एक प्रभु को प्राप्त कर लिया है। मेरे शुद्ध हृदय में (नाम अमृत की) बड़ी साफ धारा टपक टपक के पड़ रही है, और सर्वोक्तम स्वादिष्ट (नाम का) रस खिंचा जा रहा है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
एक जु बात अनूप बनी है पवन पिआला साजिआ ॥ तीनि भवन महि एको जोगी कहहु कवनु है राजा ॥३॥
मूलम्
एक जु बात अनूप बनी है पवन पिआला साजिआ ॥ तीनि भवन महि एको जोगी कहहु कवनु है राजा ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: अनूप = अचरज, अनोखी। पवन = हवा, प्राण, स्वाश। साजिआ = मैने बनाया है। जोगी = मिला हुआ, व्यापक। तीनि भवन = सारे जगत में। राजा = ब्ड़ा।3।
अर्थ: एक और मजेदार बात बन गयी है (वह ये कि) मैंने स्वाशों को (नाम अमृत पीने वाला) प्याला बना लिया है (भाव, उस प्रभु के नाम को मैं स्वास-स्वास जप रहा हूँ)। (इस स्वास-स्वास जपने के कारण मुझे) सारे जगत में एक प्रभु ही व्यापक (दिख रहा है)। बताओ, (हे पण्डित! मुझे) उससे और कौन बड़ा (हो सकता) है?।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
ऐसे गिआन प्रगटिआ पुरखोतम कहु कबीर रंगि राता ॥ अउर दुनी सभ भरमि भुलानी मनु राम रसाइन माता ॥४॥३॥
मूलम्
ऐसे गिआन प्रगटिआ पुरखोतम कहु कबीर रंगि राता ॥ अउर दुनी सभ भरमि भुलानी मनु राम रसाइन माता ॥४॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: ऐसे = इस प्रकार जैसे ऊपर बताया है। पुरखोतम गिआनु = प्रभु का ज्ञान, रब की पहिचान। कहु = कह। कबीर = हे कबीर! रंगि = (प्रभु के) प्रेम में। राता = रंगा हुआ। अउर दुनी = बाकी के लोग। भरमि = भुलेखे में। मनु = (मेरा) मन। रसाइन = रस+आयन, रसों का घर। माता = मस्त।4।
अर्थ: (जैसे ऊपर बताया है) इस प्रकार उस प्रभु की पहचान (मेरे अंदर) प्रगट हो गयी है। प्रभु के प्रेम में रंगे हुए, हे कबीर! (अब) कह कि और सारा जगत तो भुलेखे में भूला हुआ है (पर, प्रभु की मेहर से) मेरा मन रसों के श्रोत प्रभु में मस्त हुआ हुआ है।4।3।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: ‘रहाउ’ की तुकों में शब्द का मुख्य भाव केन्द्रिय भाव हुआ करता है। इस शब्द की रहाउ की तुक को गहु से विचारो। प्रभु के मिलाप की बज रही जिस तार का यहां जिक्र है, सारे शब्द में उसी की ही व्याख्या है।
दर्पण-भाव
शबद का भाव: गुरु के शब्द में जुड़ने से मन में प्रभु के मिलाप की तार बजने लग पड़ती है। उस स्वाद का असल स्वरूप बताया नहीं जा सकता। पर, दिमाग और हृदय उसी के स्मरण और प्यार में भीगे रहते हैं। स्वास स्वास याद में बीतता है। सारे जगत में प्रभु ही सबसे बड़ा दिखता है, केवल उसके प्यार में ही मन मस्त रहता है।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: जोग-अभ्यास, प्रणायाम की सराहना करने वाले किसी ‘पंडीआ’ को कबीर जी परमात्मा के नाम जपने की विधि बताते हैं। चुँकि, योगाभ्यासी जोगी लोग शराब पी के तवज्जो जोड़ने की कोशिश करते हैं, कबीर जी उस मस्ती का जिक्र करते हैं जो स्वास-स्वास के स्मरण से पैदा होता है। कबीर जी ‘नाम’ की शराब के वास्ते (‘पवन’) स्वास-स्वास को ‘प्याला’ बनाते हैं।
कई सज्जन यहां कबीर जी को योगाभ्यासी समझ रहे हैं, पर कबीर जी खुले लफ्जों में ‘आसन पवन’ को, योगभ्यास, प्राणायाम को ‘कपट’ कहते हैं:
“आसनु पवनु दूरि करि बवरे॥ छाडि कपटु नित हरि भजु बवरे॥ ”
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विश्वास-प्रस्तुतिः
स्रीराग बाणी भगत बेणी जीउ की ॥ पहरिआ कै घरि गावणा ॥ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मूलम्
स्रीराग बाणी भगत बेणी जीउ की ॥ पहरिआ कै घरि गावणा ॥ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
विश्वास-प्रस्तुतिः
रे नर गरभ कुंडल जब आछत उरध धिआन लिव लागा ॥ मिरतक पिंडि पद मद ना अहिनिसि एकु अगिआन सु नागा ॥ ते दिन समलु कसट महा दुख अब चितु अधिक पसारिआ ॥ गरभ छोडि म्रित मंडल आइआ तउ नरहरि मनहु बिसारिआ ॥१॥
मूलम्
रे नर गरभ कुंडल जब आछत उरध धिआन लिव लागा ॥ मिरतक पिंडि पद मद ना अहिनिसि एकु अगिआन सु नागा ॥ ते दिन समलु कसट महा दुख अब चितु अधिक पसारिआ ॥ गरभ छोडि म्रित मंडल आइआ तउ नरहरि मनहु बिसारिआ ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: गरभ कुंडल = मां का पेट, कुंडल जैसा गर्भ स्थान। आछत = होता था। उर्ध = ऊंचा। लिव = तवज्जो, लगन। मिरतक पिंडि = मिट्टी के गोले में, शरीर में। पद = अस्तित्व, हस्ती। मद = अहंकार, माण। ना = नहीं था। अहि = दिन। निसि = रात। एकु = एक प्रभु। नागा = अस्तित्व विहीन, अभाव। ते = वह (बहुवचन)। संमलु = याद कर। पसारिआ = पसारा, फैलाव है, खिलारा है, जंजालों में फैलाया है। छोडि = छोड़ के। म्रित मण्डल = जगत, संसार। तउ = जब। नरहरि = परमात्मा को। मनहु = मन से।1।
अर्थ: हे मनुष्य जब तू मां के पेट में था, तब तेरी तवज्जो ऊचे (प्रभु के) ध्यान में जुड़ी रहती थी। (तुझे तब) शरीर के अस्तित्व का अहंकार नहीं था। दिन रात एक प्रभु को (स्मरण करता था)। (तेरे अंदर) अज्ञान नहीं था। (हे मनुष्य!) वो दिन अब याद कर (तब तुझे) बहुत कष्ट व तकलीफें थीं। पर अब तूने अपने मन को (दुनिया के जंजालों में) बहुत फंसा रखा है। मां का पेट छोड़ के जब का तू जगत में आया है, तब से तूने अपने निरंकार को भुला दिया है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
फिरि पछुतावहिगा मूड़िआ तूं कवन कुमति भ्रमि लागा ॥ चेति रामु नाही जम पुरि जाहिगा जनु बिचरै अनराधा ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
फिरि पछुतावहिगा मूड़िआ तूं कवन कुमति भ्रमि लागा ॥ चेति रामु नाही जम पुरि जाहिगा जनु बिचरै अनराधा ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: मूढ़िआ = हे मूर्ख! कवन कुमति = किस बुरी मति से? भ्रमि = भुलेखे में। चेति = याद कर। नाही = नहीं तो। जनु = जानो, मानों, जैसे (लाख बेदन ‘जणु’ आई)। अनराधा = (अनिरुध), अमोड़।1। रहाउ।
अर्थ: हे मूर्ख! तू किस मति, किस भुलेखे में लगा हुआ है? (समय को हाथों से गवा के) फिर हाथ मलेगा। प्रभु को स्मरण कर वरना यमपुरी में धकेल दिया जाएगा। (तू तो ऐसे घूम रहा है) जैसे कोई ना मुड़ने वाला सख्श (जिसने कभी वापिस ही नहीं जाना हो)।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
बाल बिनोद चिंद रस लागा खिनु खिनु मोहि बिआपै ॥ रसु मिसु मेधु अम्रितु बिखु चाखी तउ पंच प्रगट संतापै ॥ जपु तपु संजमु छोडि सुक्रित मति राम नामु न अराधिआ ॥ उछलिआ कामु काल मति लागी तउ आनि सकति गलि बांधिआ ॥२॥
मूलम्
बाल बिनोद चिंद रस लागा खिनु खिनु मोहि बिआपै ॥ रसु मिसु मेधु अम्रितु बिखु चाखी तउ पंच प्रगट संतापै ॥ जपु तपु संजमु छोडि सुक्रित मति राम नामु न अराधिआ ॥ उछलिआ कामु काल मति लागी तउ आनि सकति गलि बांधिआ ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: बिनोद = खेलें। चिंद = ध्यान। बिआपै = दबा रहता है। मोहि = मोह में। रसु = स्वाद, चस्का। मिसु = बहाना। मेधु = पवित्र। बिखु = जहिर। प्रगट = खुले तौर पर, निर्लज हो के, शर्म उतार के। संतापै = सताते हैं। संजमु = इन्द्रियों को रोकना। सुक्रित मति = पुण्य कर्म करने वाली बुद्धि। काल = कालख। आनि = ले आ के। सकति = स्त्री। गलि = गले में, गले से।2।
अर्थ: (पहले) तू बालपन की खेलों व स्वाद में लगा रहा और सदा (इनके ही) मोह में फंसा रहा। (अब जबसे) तूने माया रूपी विष को रसीला व पवित्र अमृत समझ के चख लिया है, तब से तुझे पाँचों विकार (कामादिक) खुले तौर पर सता रहे हैं। जप तप संजम और पुण्य कर्म करने वाली बुद्धि तू त्याग बैठा है। प्रभु के नाम को नहीं स्मरण करता। (तेरे अंदर) काम प्रबल है। तेरी बुद्धि गलत रास्ते पर लगी हुई है। (कामातुर हो के) तूने स्त्री को गले से लगाया है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तरुण तेजु पर त्रिअ मुखु जोहहि सरु अपसरु न पछाणिआ ॥ उनमत कामि महा बिखु भूलै पापु पुंनु न पछानिआ ॥ सुत स्मपति देखि इहु मनु गरबिआ रामु रिदै ते खोइआ ॥ अवर मरत माइआ मनु तोले तउ भग मुखि जनमु विगोइआ ॥३॥
मूलम्
तरुण तेजु पर त्रिअ मुखु जोहहि सरु अपसरु न पछाणिआ ॥ उनमत कामि महा बिखु भूलै पापु पुंनु न पछानिआ ॥ सुत स्मपति देखि इहु मनु गरबिआ रामु रिदै ते खोइआ ॥ अवर मरत माइआ मनु तोले तउ भग मुखि जनमु विगोइआ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तरुण = जवानी। तेजु = जोर। त्रिअ मुख = स्त्रियों के मुंह। जोहहि = तू देखता है। सर अपसर = अच्छा बुरा वक्त, वक्त बेवक्त। उनमत कामि = हे काम में मस्त हुए हुये! संपति = धन, खुशहाली। गरबिआ = अहंकारी हो गया। खोइआ = भुला बैठा है। अवर मरत = औरों के मरने पे। तउ = इस तरह। भग मुखि = भाग्य से मिला श्रेष्ठ। विगोइआ = विगोया, बेकार गवा लिया है।3।
अर्थ: (तेरे अंदर) जवानी का जोश है। तू पराई औरतों का मुंह देखता है। वक्त बेवक्त भी तू नहीं समझता। हे काम में मस्त हुए हुये! हे प्रबल माया में भूले हुए!! तूझे ये समझ नहीं कि पाप क्या है और पुंन्न क्या। पुत्रों को, धन पदार्थों को देख तेरा मन अहंकारी हो रहा है। प्रभु को तू हृदय से विसार बैठा है। औरों (संबंधियों) के मरने पर तेरा मन गिनती मिनती में लग जाता है कि कितनी माया मिलेगी। इस तरह तूने अपने उत्तम व श्रेष्ठ (मनुष्य) जीवन को व्यर्थ गवा लिया है।3।
विश्वास-प्रस्तुतिः
पुंडर केस कुसम ते धउले सपत पाताल की बाणी ॥ लोचन स्रमहि बुधि बल नाठी ता कामु पवसि माधाणी ॥ ता ते बिखै भई मति पावसि काइआ कमलु कुमलाणा ॥ अवगति बाणि छोडि म्रित मंडलि तउ पाछै पछुताणा ॥४॥
मूलम्
पुंडर केस कुसम ते धउले सपत पाताल की बाणी ॥ लोचन स्रमहि बुधि बल नाठी ता कामु पवसि माधाणी ॥ ता ते बिखै भई मति पावसि काइआ कमलु कुमलाणा ॥ अवगति बाणि छोडि म्रित मंडलि तउ पाछै पछुताणा ॥४॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: पुंडर = सफेद रंग का कमल फूल। कुसम = फूल। ते = से। धउले = सफेद। बाणी = बोली, आवाज। सपत पताल की = सातवें पाताल से आयी हुई, बहुत मध्यम व बारीक। लोचन = आँखें। स्रमहि = सिमना, चू रही है, बीच में से नीर चल रहा है। नाठी = भाग गयी। पवसि = पड़ रही है। बिखै पवसि = विषयों की झड़ी। अवगति = अदृष्ट परमात्मा। अवगति बाणि = प्रभु की महिमा की वाणी। म्रित मंडलि = मृत मण्डल, जगत में।4।
अर्थ: तेरे केस सफेद कमल के फूल से भी ज्यादा सफेद हो चुके हैं। तेरी आवाज (बहुत मद्यम हो गयी है, मानो) सातवें पाताल से आ रही है। तेरी आँखें सिम रहीं हैं, तेरी चतुरायी भरी बुद्धि क्षीण हो चुकी है, तो भी काम (की) मथानी (तेरे अंदर) चल रही है (अर्थात, अभी भी काम की वासना जोरों में है)। इन ही वासनाओं के कारण तेरी बुद्धि में विषौ विकारों की झड़ी लगी हुई है, तेरा शरीर रूपी कमल फूल कुम्हला गया है। जगत में आ के तू परमात्मा का भजन छोड़ बैठा है। (समय बीत जाने पर) पीछे हाथ मलेगा।4।
विश्वास-प्रस्तुतिः
निकुटी देह देखि धुनि उपजै मान करत नही बूझै ॥ लालचु करै जीवन पद कारन लोचन कछू न सूझै ॥ थाका तेजु उडिआ मनु पंखी घरि आंगनि न सुखाई ॥ बेणी कहै सुनहु रे भगतहु मरन मुकति किनि पाई ॥५॥
मूलम्
निकुटी देह देखि धुनि उपजै मान करत नही बूझै ॥ लालचु करै जीवन पद कारन लोचन कछू न सूझै ॥ थाका तेजु उडिआ मनु पंखी घरि आंगनि न सुखाई ॥ बेणी कहै सुनहु रे भगतहु मरन मुकति किनि पाई ॥५॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: निकुटी = छोटी सी। निकुटी देह = छोटे छोटे बच्चे। धुनि = प्यार, मोह। जीवन पद = जिंदगी। कारन = वास्ते। सूझे = दिखता। थाका = समाप्त हो गया। तेजु = शारीरिक बल। घरि = घर में। आंगनि = आंगन में। मरन मुकति = मरने के बाद मुक्ति। किनि = किस ने?।5।
अर्थ: छोटे छोटे बच्चे (पुत्र पौत्र) देख के (मनुष्य के मन में उनके लिए) मोह पैदा होता है, अहंकार करता है। पर इसको ये समझ नहीं आती (कि सब कुछ छोड़ जाना है)। आँखों से दिखना बंद हो जाता है (फिर भी मनुष्य) और जीने का लालच करता है। (आखिर) शरीर का बल खत्म हो जाता है, (और जब) जीव पंछी (शरीर में से) उड़ जाता है (तब मुर्दा देह) धर में, आंगन में, पड़ी हुई अच्छी नहीं लगती।
बेणी कहता है: हे संत जनों! (अगर मनुष्य का सारी जिंदगी यही हाल रहा, भाव, जीते जी कभी भी विकारों और मोह से मुक्त ना हुआ, यदि जीवन मुक्त ना हुआ तो ये सच जानो कि) मरने के बाद मुक्ति किसी को नहीं मिलती।5।
दर्पण-भाव
शब्द का भाव: जगत की माया में फंस के जीव प्रभु की याद भुला देता है। सारी उम्र विकारों में ही गुजारता है। बुढ़ापे में सारे अंग कमजोर हो जाने पर भी और-और जीने की लालसा किए जाता है, पर प्रभु की याद की ओर फिर भी नहीं मुड़ता। इस तरह मानव जन्म व्यर्थ गवा लेता है।
दर्पण-टिप्पनी
नोट: “पहरिआ कै घरि गावणा।”
दर्पण-भाव
भाव: (इस शब्द को) उस ‘घर’ में गाना है जिस में वह शब्द है जिसका शीर्षक है ‘पहरे’।
दर्पण-टिप्पनी
ये वाणी ‘पहरे’ इसी ही राग (सिरी राग) में गुरु नानक साहिब जी की है; ‘असटपदियों के बाद में दर्ज है। 1430 पन्नों वाली बीड़ के पन्ना 74 पर। उसका शीर्षक है ‘सिरी राग पहरे महला १ घरु १”।
से बेणी जी के इस शब्द का ‘घरु’ भी ‘१’ है। इसे ‘घर’ पहिले में गाना है।
पर, लफ्ज़ ‘घर १’ की जगह इतने लफ्ज़ ‘पहरिआ कै घरि गावणा’ क्यूँ लिखे हैं? ‘पहरे महला १’ और बेणी जी के इस शब्द में जरूर कोई ना कोई गहरा संबंध होगा। आओ देखें;
(ੴ) एक ओअंकार सतिगुर प्रसादि॥ सिरी रागु महल पहरै १ घरु १॥ पहिलै पहिरै रैणि कै, वणजारिआ मित्रा, हुकमि पइआ गरभासि॥ उरध तपु अंतरि करे वणजारिआ मित्रा खसम सेती अरदासि॥ खसम सेती अरदासि वखाणै उरध धिआनि लिव लागा॥ नामरजादु आइआ मलि भीतरि बाहुड़ि जासी नागा॥ जैसी कलम वुड़ी है मसतकि तैसी जीअड़े पासि॥ कहु नानक प्राणी पहिलै पहिरै हुकमि पइआ गरभासि॥१॥ (पन्ना ७४)
‘पहरिआं’ के दो शब्द सतिगुरु नानक देव जी के हैं। उनमें से सिर्फ पहिले शब्द का पहला बंद यहां प्रमाण के तौर पे दिया गया है। बाकी दानों शब्द पाठक सज्जन पेज 74 से स्वयं पढ़ के देख लें। एक-एक बंद में ही गहु से देखो;
(1) तुकों की चाल गुरु नानक देव जी और बेणी जी की सांझी एक समान है।
(2) दोनों में कई शब्द सांझे हैं;
गुरु नानक बेणी
गरभासि गरभ कुंडल
उरध तपु उरध धिआन
(3) एक तुक हू-ब-हू मिलती है;
बेणी जी: ‘उरध धिआन लिव लागा’।
गुरु नानक देव: ‘उरध धिआनि लिव लागा’।
ये सांझ ब-सबब नहीं हो गयी। स्पष्ट है कि बेणी जी का ये शब्द गुरु नानक देव जी के पास मौजूद था। बेणी जी के ‘ख्यालों’ को सतिगुरु जी ने ‘पहरिआं’ के दोनों शबदों में बयान किया है।
सो, शीर्षक ‘पहरिआं के घरि गावणा’ बेणी जी ने नहीं लिखा। गुरु नानक देव जी ने या गुरु अरजन साहिब ने लिखा है। और, ये शीर्षक ये बात प्रगट करता है कि बेणी जी का ये शब्द गुरु नानक देव जी के पास मौजूद था। भगतों की वाणी गुरु नानक देव जी ने स्वयं ही एकत्र की थी।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सिरीरागु ॥ तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा ॥ कनक कटिक जल तरंग जैसा ॥१॥
मूलम्
सिरीरागु ॥ तोही मोही मोही तोही अंतरु कैसा ॥ कनक कटिक जल तरंग जैसा ॥१॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: तोही मोही = तेरे मेरे में। मोही तोही = मेरे तेरे में। अंतरु = अंतर, फर्क, भेद। अंतरु कैसा = अतर कैसा है, कोई असली फर्क नही है। कनक = सोना। कटिक = कड़े, कंगन। जल तरंग = पानी की लहरें।1।
अर्थ: (हे परमात्मा!) तेरी मुझसे, मेरी तूझसे (असल) दूरी कैसी है? (वैसी ही है) जैसी सोने और सोने के कड़े की, या पानी ओर पानी की लहरों की है।1।
विश्वास-प्रस्तुतिः
जउ पै हम न पाप करंता अहे अनंता ॥ पतित पावन नामु कैसे हुंता ॥१॥ रहाउ॥
मूलम्
जउ पै हम न पाप करंता अहे अनंता ॥ पतित पावन नामु कैसे हुंता ॥१॥ रहाउ॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: जउ पै = यदि, अगर। हम = हम जीव। न करंता = ना करते। अहे अनंता = हे बेअंत (प्रभु)! पतित = गिरे हुए, नीच, विकारों पड़े हुए। पावन = पवित्र करने वाला। पतित पावन = नीचों को ऊचा करने वाला, पापियों को पवित्र करने वाला। हुंता = होता।1। रहाउ।
अर्थ: हे बेअंत (प्रभु) जी! अगर हम जीव पाप ना करते तो तेरा नाम (पापियों को पवित्र करने वाला) ‘पतित पावन’ कैसे हो जाता?।1। रहाउ।
विश्वास-प्रस्तुतिः
तुम्ह जु नाइक आछहु अंतरजामी ॥ प्रभ ते जनु जानीजै जन ते सुआमी ॥२॥
मूलम्
तुम्ह जु नाइक आछहु अंतरजामी ॥ प्रभ ते जनु जानीजै जन ते सुआमी ॥२॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: नाइक = नेता, सीधे राह डालने वाले, तारनहार। आछहु = हैं। प्रभ ते = मालिक से। मालिक को परख के। जनु = सेवक, नौकर। जानीजै = पहचाना जाता है। जन ते = सेवक से, सेवक को जांचा जाता है।2।
अर्थ: हे हमारे दिलों के ज्ञाता प्रभु! तू जो हमारा मालिक है (तो फिर मालिकों वाला बिरद पाल, अपने ‘पतित पावन’ नाम की लज्जा रख)। मालिक को देख के ये पहचान लेते हैं कि इसका सेवक कैसा है और सेवक से मालिक की परख हो जाती है।2।
विश्वास-प्रस्तुतिः
सरीरु आराधै मो कउ बीचारु देहू ॥ रविदास सम दल समझावै कोऊ ॥३॥
मूलम्
सरीरु आराधै मो कउ बीचारु देहू ॥ रविदास सम दल समझावै कोऊ ॥३॥
दर्पण-भाषार्थ
पद्अर्थ: आराधे = स्मरण करे। सरीरु अराधै = शरीर स्मरण करे, जब तक शरीर कायम है मैं स्मरण करूँ। मो कउ = मुझे। बीचारु = सुमति, सूझ। देहू = दे। सम दल = दलों में समान बर्ताव वाला, सब जीवों में व्यापक। कोऊ = कोई (संत जन)।3।
अर्थ: (सो, हे प्रभु!) मुझे ये सूझ बख्श कि जब तक मेरा ये शरीर है तब तक मैं तेरा स्मरण करूँ। (ये भी मेहर कर कि) रविदास को कोई संत जन ये समझ भी दे कि तू सर्व-व्यापक है।3।
दर्पण-भाव
शब्द का भाव: असल में परमात्मा और जीवों में कोई भिन्न-भेद नहीं है। वह स्वयं ही सब जगह व्यापक है जीव उसे भुला के पापों में पड़ के उससे अलग प्रतीत होते हैं। आखिर, वह स्वयं ही कोई संत जन मिला के भूले हुए जीवों को अपना असल स्वरूप दिखलाता है।