०२ योगवासिष्ठ वेदान्त

१. योगवासिष्ठ का काल

प्राचीन वेदान्त के प्रमुख ग्रन्थों में योगवासिष्ठ का महत्त्वपूर्ण स्थान है। डॉ. भीखनलाल आत्रेय इसका रचनाकाल ५०० ई.से लेकर ६५० ई. तक मानते हैं। उनके मत से यह शंकराचार्य के पहले का ग्रन्थ है। डॉ. सुरेन्द्रनाथ दासगुप्त इसको ७००-८०० ई. की कृति मानते हैं। पी.सी. दीवान जी इसका काल ८८५-६७५ ई. बतलाते हैं। एस.पी. भट्टाचार्य कर इसे १०००-१२०० ई. का मानते हैं तो वी. राघवन ११००-१२५० ई. का। टी.जी. माइणकर इसे १२०० ई. के आसपास का मानते हैं

और जे.एन, फारकुअर १३००-१४०० ई. का ग्रन्थ मानते हैं। इस प्रकार योगवासिष्ठ के रचनाकाल के बारे में बड़ा मतभेद है। परन्तु इस मतभेद को निम्नलिखित तथ्यों के आधार पर दूर किया जा सकता है (क) काश्मीर के अभिनन्द गौड ने वीं शताब्दी में योगवासिष्ठ का संक्षिप्त

संस्करण तैयार किया था जिसका नाम लघुयोगवासिष्ठ है। अतः योगवासिष्ठ

की रचना इसके पूर्व अवश्य हुई होगी। (ख) प्रो. एस.पी. भट्टाचार्य ने योगवासिष्ठ के ऊपर काश्मीर शैवमत के त्रिक

सम्प्रदाय का प्रभाव दिखलाया है और सिद्ध किया है कि योगवासिष्ठ ने मायावाद को अस्वीकार किया है और आभासवाद, कल्पनावाद, कियाशक्तिवाद, स्पन्दवाद तथा काश्मीर शैवमत के ३६ तत्वों की स्वीकृति आदि त्रिक

सम्प्रदाय के मतों को अंगीकार किया है। (ग) पी.सी. दीवान ने दिखलाया है कि सर्वज्ञात्म मुनि ने संक्षेपशारीरक के

द्वितीय अध्याय के १५२ वें श्लोक में योगवासिष्ठ का संकेत किया है। इस कारण इसकी रचना संक्षेपशारीरक के पहले अवश्य हुई होगी, अर्थात्

८५०-६०० के पहले होगी। (घ) महाराष्ट्र में योगवासिष्ठ का ज्ञान संत ज्ञानदेव (१२७५-१२६६ ई) को था।

इन्होंने अमृतानुभव और ज्ञानेश्वरी में योगवासिष्ठ से पर्याप्त सहायता ली है। अतः इन सब तथ्यों का विचार करते हुये यही निश्चित होता है कि डॉ. एस. एन. दासगुप्त का मत अधिक समीचीन है।

योगवासिष्ठ के काल-निर्धारण में जो कठिनाई है उसका प्रमुख कारण है कि उसके कई संस्करण निकले थे। उसका वर्तमान संस्करण निश्चित रूप से इतना पुराना नहीं है

योगवासिष्ठ वेदान्त

५५७ जितना पुराना उसका प्रथम संस्करण है जिसका नाम मोक्षोपाय था। डॉ. दासगुप्त का मत मोक्षोपाय के बारे में ही सही है। उसका वर्तमान संस्करण, जैसा कि अन्य विद्वानों ने दिखलाया है, (११०० ई. के पहले का नहीं है। यह उल्लेखनीय है कि न तो शंकराचार्य ने योगवासिष्ठ का उल्लेख किया है और न योगवासिष्ठकार ने शंकराचार्य का। पुनश्च दोनों के मतों में भी कुछ मौलिक अन्तर है, क्योंकि शंकराचार्य माया को भ्रम (प्रातिभासिक) नहीं मानते हैं और योगवासिष्ठ में माया को भ्रम माना गया है। उसमें अद्वैतवाद का सत्तात्रैविध्यवाद नहीं है।

२. योगवासिष्ठ के लेखक

योगवासिष्ठ को कई अन्य नामों से भी जाना जाता है। ये

नाम हैं वासिष्ठ, वासिष्ठरामायण, योगवासिष्ठरामायण महारामायण, आर्ष रामायण, ज्ञानवासिष्ठ और मोक्षोपाय। इसको महारामायण इसलिए कहा जाता है कि यह वाल्मीकि रामायण से आकार में बहुत बड़ा है। यह सिद्धावस्था का ग्रन्थ है। स्वामी रामतीर्थ ने इसे संसार में लिखे गये समस्त ग्रन्थों में एक महान् ग्रन्थ कहा है। यह वेदान्त के सभी ग्रन्थों का शिरोमणि है।

वाल्मीकि से राजा अरिष्टनेमि उस ज्ञान को पूछते हैं जिससे मोक्ष मिलता है। उनकी जिज्ञासा को शान्त करने के लिए वाल्मीकि बसिष्ट और राम के संवाद का वर्णन करते हैं।

अन्त में वाल्मीकि ही योगवासिष्ठ की समाप्ति करते हैं

एतत्ते कथितं राजन्कुम्भयोनेः सुभाषितम्।

अमुना तत्त्वमार्गेण तत्पदं प्राप्स्यसि ध्रुवम् ।। इस प्रकार ग्रन्थ के उपक्रम और उपसंहार के द्वारा सिद्ध होता है कि इसके लेखक वाल्मीकि हैं। किन्तु यह वाल्मीकि रामायणकार वाल्मीकि नहीं हैं। वे कालिदास के पूर्ववर्ती हैं और योगवासिष्ठकार कालिदास के उत्तरवर्ती हैं। फिर चाहे योगवासिष्ठ के जो भी लेखक हों इसको वसिष्ठ का दर्शन माना जाता है। अद्वैतवेदान्त की गुरु -परम्परा में वसिष्ठ का नाम ब्रह्मसूत्रकार व्यास के पहले आता है। योगवासिष्ठ के विचारों को उन्हीं पर आरोपित किया जाता है। योगवासिष्ट की रचना काश्मीर में हुई थी, जहाँ बौद्धमत और शैवमत का समन्वय स्थापित हुआ

था और उसके परिणामस्वरूप उसकी अभिव्यक्ति योगवासिष्ठ में हुई ।

योगवासिष्ठ मूलतः मोक्षोपाय नामक एक संहिता-ग्रन्थ था, यह योगवासिष्ठ के वर्णनों से ही सिद्ध है। उदाहरण के लिये योगवासिष्ट २।१७।६ का निम्न श्लोक लिया जा सकता है

मोक्षोपायाभिधानेयं संहिता सारसंमिता।

त्रिंशदेवेव च सहस्राणि ज्ञाता निर्वाणदायिनी।। इस प्रकार योगवासिष्ठ में ३२ हजार श्लोक हैं जो छः प्रकरणों में बंटे हैं। ये प्रकरण५५८

वेदान्त-खण्ड

हैं- (१) वैराग्य, (२) मुमुक्षु-व्यवहार, (३) उत्पत्ति, (४) स्थिति, (५) उपशम और (६) निर्वाण।

इह वैराग्यमुमुक्षुव्यवहारोत्पत्तिकस्थितयः। उपशमनिर्वाणारव्ये वासिष्ठे षट् प्रकरणानि ।।

(लघुयोगवासिष्ठ ६१८८४) योगवासिष्ठ की रचना-शैली पुराणों-जैसी है। किन्तु उसमें पुराणों के पांच लक्षण नहीं मिलते। वैसे उसमें ज्ञानमार्ग और समाधि-अवस्था के वर्णन आख्यानों द्वारा श्लोकों में किये गये हैं। विषय-वस्तु की दृष्टि से उसका महत्त्व उपनिषदों-जैसा है। डॉ. भीखनलाल आत्रेय ने अपने ग्रन्थ फिलासफी आफ योगवासिष्ठ में दिखलाया है कि महोपनिषद्, बृहत्संन्यासोपनिषद्, शाण्डिल्योपनिषद्, मैत्रेयि उपनिषद्, याज्ञवल्क्योपनिषद्, योगकुण्डलिनी उपनिषद्, तथा पैङ्गलोपनिषद् ने योगवासिष्ठ से अपने वचनों को उधार लिया है। डॉ. माइणकर ने प्रदर्शित किया है कि ऋग्वेद, छान्दोग्य, श्वेताश्वतर आदि प्राचीन उपनिषदें योगवासिष्ठ की स्रोत हैं। इस प्रकार सिद्ध होता है कि योगवासिष्ठ एक वेदान्त-ग्रन्थ है।

३. योगवासिष्ठ की टीकाएं

योगवासिष्ठ पर कई टीकाएं हैं जिसमें निम्नलिखित मुख्य

१. गंगाधरेन्द्र सरस्वती के शिष्य आनन्दबोधेन्द्र सरस्वतीकृत तात्पर्यप्रकाश (१८५४

ई. में लेखक ने इसे लिखा था)। . २. नरहरि के पुत्र अइयारण्यकृत वासिष्ठरामायणचन्द्रिका । ३. माधव सरस्वतीकृत पदचन्द्रिका। ४. रामदेवकृत योगवासिष्ठ व्याख्या। ५. सदानन्दकृत योगवासिष्ठ व्याख्या। ६. योगवासिष्ठतात्पर्यसंग्रह (अज्ञातकर्तृक)।

योगवासिष्ठ में पुनरुक्त कथन बहुत अधिक हैं। आख्यान भी अनेक हैं। इन सबको हटाकर उसके सारांश के रूप में निम्न ग्रन्थ प्रसिद्ध हैं १. बृहद्योगवासिष्ठ २. लघुज्ञानवासिष्ठ ३. योगवासिष्ठ ४. गौड अभिनन्दकृत लघुयोगवासिष्ठ (८वीं शती)

योगवासिष्ठ वेदान्त

५५६ ५. योगवासिष्ठसार (या ज्ञानसार अज्ञातकर्तृक) ६. योगवासिष्ठसारसंग्रह ७. महीधरकृत योगवासिष्ठसारविवृति। इसका एकनाम योगवासिष्ठप्रकाश भी है,

इसकी रचना काशी में १५६७ ई. में हुई थी। इसमें १० प्रकरण और २२० श्लोक

हैं। ८. कवीन्द्राचार्य सरस्वतीकृत योगवासिष्ठसार (भाषा में)। इसकी रचना काशी में

१६६०ई. में हुई थी। कवीन्द्राचार्य का सम्मान मुगल-सम्राट शाहजहाँ के दरबार में बहुत अधिक था। फ्रेंच पर्यटक वर्नियर काशी में उनसे मिला था और उनके वेदान्त-जान सहित अन्य शास्त्रज्ञान से प्रभावित हुआ था। ऐसे प्रसिद्ध और सम्मानित विद्वान् द्वारा योगवासिष्ठसार का हिन्दी में लिखा जाना महत्त्वपूर्ण है।

कवीन्द्राचार्य पर योगवासिष्ठ का अद्भुत प्रभाव था। ६. रामानन्द तीर्थकृत वासिष्ठसार (या वासिष्ठसारगूढार्थ) १०. भीखनलालआत्रेयकृत योगवासिष्ठसार (२०वीं शती)। इसमें मात्र १६७ श्लोक हैं।

इनमें से गौड़ अभिनन्द कृत लघुयोगवासिष्ठ पर निम्न टीकाएं हैं १. आत्मसुखकृत चन्द्रिका। २. मुमुक्षुदेवकृत संसारतारिणी।

अज्ञातकर्तृक योगवासिष्ठसार पर भी पूर्णानन्द और महीधर की दो टीकाएं हैं। अतएव उसका भी महत्त्व बढ़ गया है, अर्थगौरव और प्रचार की दृष्टियों से।

इनके अतिरिक्त अकबर, जहांगीर और दाराशिकोह के संरक्षण में योगवासिष्ठ के कई फारसी अनुवाद किये गये थे जिनका वर्णन तात्पर्यप्रकाश व्याख्या सहित योगवासिष्ठ की भूमिका में किया गया है। फारसी अनुवादों में योगवासिष्ठ के कई अनुवाद हैं। उत्तरी भारत की संत-परम्परा पर योगवासिष्ठ का विशेष प्रभाव पड़ा है। अट्ठारहवीं शती में रामप्रसाद निरंजनी ने खड़ी बोली हिन्दी में सर्वप्रथम भाषायोगवासिष्ट नाम से योगवासिष्ठ का अनुवाद किया था जिसका प्रभाव परवर्ती संतों और विचारकों पर बहुत अधिक पड़ा है। बीसवीं शती में प्रोफेसर भीखनलाल आत्रेय ने योगवासिष्ठ के दर्शन पर खोजपूर्ण और तुलनात्मक सामग्री प्रदान करते हुए कई ग्रन्थों की रचना की है। विशेषतः उन्होंने योगवासिष्ट की तुलना आधुनिक पाश्चात्त्य प्रत्ययवाद से की है और प्रदर्शित किया है कि योगवासिष्ठ का प्रत्ययवाद पाश्चात्त्य प्रत्ययबाद से भी अधिक सुसंगत और सशक्त है। महात्मा गांधी के ऊपर भी योगवासिष्ठ के मुमुक्षु-व्यवहार-प्रकरण का प्रभाव पड़ा था और उन्होंने इसका सूक्ष्म अध्ययन किया था।

५६०

वेदान्त-खण्ड

४. परम सत् का स्वरूप

योगवासिष्ठ सत् को एक और अद्वितीय मानता है। वह

परमात्मा या ब्रह्म है। वह दिक्, काल आदि (कार्य-कारण और द्रव्य) से अनवच्छिन्न है। सभी की आत्मा होने के कारण वह सर्वात्मा या सर्वव्यापी सत् है। वह स्वतः स्थित है। अर्थात् वह निरपेक्ष सत् है। सभी उसका अनुभव करते हैं

दिक्कालाधनवच्छिन्नः परमात्मास्ति केवलः। सर्वात्मत्वात्स सर्वात्मा सर्वानुभवतः स्वतः।।

(योगवासिष्ठ ३८१६१) वह अवाङ्मनसगोचर है। उसके जितने नाम हैं जैसे आत्मा, पुरुष, ब्रह्म, विज्ञान, शून्य आदि, वे सब कल्पित हैं, स्वभावज नहीं हैं। यथार्थतः वह अनाम है।

यतो वाचो निवर्तन्ते यो मुक्तैरवगम्यते। यस्य चात्मादिकाः संज्ञाः कल्पिता न स्वभावजाः ।। य: पुमान् सांख्यदृष्टीनां ब्रह्मवेदान्तवादिनाम्। विज्ञानमात्र विज्ञानविदामेकान्तनिर्मलम् ।। यः शून्यं शून्यवादिनां भासको योऽकतेजसाम् । वक्ता मन्ता ऋतं भोक्ता द्रष्टा कर्ता सदैव सः।।

(योगवासिष्ठ ३।५।५७) परम शुभ या निःश्रेयस होने के कारण ब्रह्म को शिव कहा जाता है। चित् ही शिव है। उसकी शक्ति स्पन्द है। शिव की शक्ति के ही नाम हैं माया, स्पन्द, शक्ति, प्रकृति आदि। किन्तु जैसे काश्मीर शैवमत में शिव और शक्ति का वास्तविक और अनिवार्य सम्बन्ध है जिसे सामरस्य कहा जाता है वैसे योगवासिष्ठ-वेदान्त में शिव-शक्ति का सम्बन्ध नहीं है। यहाँ शिव-शक्ति का सम्बन्ध काकतालीय है। अतएव योगवासिष्ठ-वेदान्त शांकर-वेदान्त के जितना सन्निकट है उतना काश्मीर शैवमत का शिवाद्वयवाद नहीं है। आनन्दबोधेन्द्र सरस्वती योगवासिष्ठ ६ ५ की टीका में कहते हैं कि इष्टप्राप्तिपर्यन्त ही स्पन्द रहता है। इष्टप्राप्ति होने पर शान्ति हो जाती है। अर्थात् स्पन्द नहीं रहता। तब शिव शान्त हो जाते हैं। इस प्रकार योगवासिष्ठ ने दिखलाया है कि स्पन्दशास्त्र का मूल आधार तथा लक्ष्य निर्विशेष ब्रह्म है।

इस प्रकार योगवासिष्ठ ने निरपेक्ष प्रत्ययवाद को स्थापित किया है। उसके मत से उपनिषदों का ब्रह्म, आत्मवादियों (अध्यात्मवादियो) की आत्मा, सांख्यों का पुरुष, बौद्ध विज्ञानवादियों की विज्ञप्तिमात्रता (विज्ञान), शून्यवादियों का शून्य, वैदिकों का ऋत, नैयायिकों

योगवासिष्ठ वेदान्त का कर्ता ईश्वर, शैवों तथा वैष्णवों का द्रष्टा, कती, भोक्ता ईश्वर- ये सभी एक ही निरपेक्ष सत् के विभिन्न नाम है, यद्यपि वह मूलतः अनाम है। उपयुक्त श्लोकों के आधार पर कुछ लोग कहते हैं कि योगवासिष्ठ वेदान्त प्रच्छन्न या प्रकट बौद्धमत है, क्योंकि उसने ब्रह्म, शून्य और विज्ञान का अभेद किया है। परन्तु यह योगवासिष्ठ की उक्ति तथा युक्ति का अनर्थ है। उसने एक समन्वय-दर्शन दिया है जिसमें महाम बौद्ध ही नहीं अपि तु सांख्य, न्याय, मीमांसा आदि का भी समन्वय है। अतएव यद्यपि योगवासिष्ठकार पर बौद्धमत का प्रभाव है, तथापि वह प्रच्छन्न (या प्रकट) बौद्ध नहीं है। वह शुद्ध निर्विशेष ब्रह्मवादी है। आनन्दबोधेन्द्र सरस्वती ने उपर्युक्त श्लोकों की टीका में स्पष्ट कर दिया है कि योगवासिष्ठकार का मंतव्य सभी वादियों में अविवाद स्थापित करना है - ‘सर्ववादिनां सा तत्-तबुद्धिकल्पितविशेषैः सिद्धान्तविषय इत्यविवादः’ ।

ब्रह्म जगत् का मूल कारण है। यह जगत् ब्रह्म का विवर्त है, ब्रह्म में वैसे ही दृश्य है जैसे स्वप्नद्रष्टा में स्वप्न। जगत् की उत्पत्ति काकतालीय है।

संविन्मात्रस्वभावत्वाद्देहोऽहमिति चेतति। माता (क) काकतालीयवद् भ्रान्तमाकारं तेन पश्यति।। स एष ब्राह्मणस्तस्मिन् सर्गादावम्बरोदरे सका निर्विकल्पश्चिदाकाशरूपमास्थाय संस्थितः।।

(वही, ३३, ३८-३६)

५. अजातवाद

योगवासिष्ठ में गौडपाद की निम्न कारिका ज्यों की त्यों उद्धृत है -

माहिम का आदावन्ते च यन्नास्ति वर्तमानेऽपि तत्तथा। शायद

(वही, ४४५४५) संपूर्ण जगत् न आदि में था और न अन्त में रहेगा। अतः वह वर्तमान में भी असत् है। वस्तुतः वह मनोविलसित मात्र है, मनोदृश्यमिदं जगत् । जगत् स्वप्न या मृगतृष्णा है। ‘मनसा कल्पितं सर्व देहादिभुवनत्रयम्’ (योगवासिष्ठ, ४।४५।५) । कार्यकारण का नियम मात्र काकतालीय है। कारण और कार्य में कोई अनिवार्य सम्बन्ध नहीं है। परमार्थतः मात्र एक और अद्वितीय सत् है। वही मन या चित्त है। उससे जो अन्य दृश्य होता है वह मात्र चित्त का स्पन्दन है। वीचीतरंगन्याय से मात्र चित्त की ही सत्ता है। शेष सब कुछ उसका

आवर्त है।

यथा स्वप्नस्तथा चित्तं जगत्सदसदात्मकम्। मलिना रात न सन्नासन्न संजातश्चेतसो जगतो भ्रमः ।।

(योगवासिष्ठ ३।६५-५-६)

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वेदान्त-खण्ड बांज अनाख्य सत् से चित् का विभ्रम पैदा होता है, चित् से जीवत्व का, जीवत्व से अहंकार का, अहंकार से चित्तता का, चित्तता से इन्द्रियादि का और इन्द्रियादि से देहादि का विभ्रम पैदा होता है। सत्-स्वरूप आत्मा को छोड़कर सभी कुछ भ्रम है। जीव का सार आत्मा का स्पन्द है। उसके अतिरिक्त वह मात्र भ्रम है। स्पन्द के कारण जीवत्व का आभास होता है। जीव को ही मन, चित्त या बुद्धि कहते हैं -

जीव इत्युच्यते लोके मन इत्यपि कथ्यते। चित्तमित्युच्यते सैव बुद्धिरित्युच्यते तथा।।

(योगवासिष्ठ ३.६६.३४)

जीव सात प्रकार के होते हैं - (१) स्वप्नजाग्रत। जो स्वप्न देखते हैं उनको यह जगत् स्वप्न लगता है। वे स्वयं अपने को

स्वप्नपुरुष समझते हैं। (२) संकल्पजाग्रत । जो अनिद्रालु तथा संकल्पपरायण हैं वे संकल्पजाग्रत जीव हैं। (३) केवलजाग्रत। कल्पान्तर के जाग्रत्संस्कार से जिन जीवों को स्वप्न नहीं दीखता वे

केवलजाग्रत हैं। वे स्वप्न-हेतु को विनष्ट किये हुये हैं। (४) चिरजानत। जो जीव जन्म-जन्मान्तरों से उत्तरोत्तर जाग्रत अवस्था को प्राप्त कर रहे

हैं वे चिरजाग्रत हैं। वे प्रौढ़ हैं और जाग्रत स्वप्न-रूपी कार्य और सुषुप्ति-रूपी कारण

में संचरण स्वतः करते रहते हैं। (५) घनजाग्रत। घनजाग्रत वे जीव हैं जो जाग्रत अवस्था में अपने दुष्कर्म से जड़ीभूत

हो गये हैं। ये पाँचों प्रकार के जीव बद्ध जीव हैं। (६) जाग्रतस्वप्न। जाग्रतस्वप्न वे जीव हैं जो बन्धन से मुक्त हैं। शास्त्रज्ञान से अथवा

सत्संग से उनको विदित हो जाता है कि यह जगत् स्वप्न है। वे परमपद या परमार्थ

में लीन रहते हैं। (७) क्षीणजाग्रत। क्षीणजाग्रत वे जीव हैं जो तुरीयावस्था को प्राप्त कर लेते हैं। उन्हें

आत्मबोध या ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो जाता है। वे पूर्णतया जीवन्मुक्त हैं। कि इस प्रकार अन्तिम दो प्रकार के जीव वास्तव में जीवन्मुक्ति की अवस्था के जीव हैं।

आत्मा स्पन्दनशील है। उसका स्पन्दन उसकी विमर्श-शक्ति या चिन्तनशक्ति है। स्पन्दन मानसिक या चैतसिक होने से सारी सृष्टि मानसिक है। दृष्टिसृष्टिवाद ही इस प्रकार योगवासिष्ठ का सिद्धान्त निश्चित होता है। इस सिद्धान्त का विशेष प्रभाव प्रकाशानन्द सरस्वती की वेदान्तसिद्धान्तमुक्तावली पर परिलक्षित होता है।

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६. अविद्या और माया

माया असत् का अपर नाम है। उसका कारण अविद्या है।

अविद्या और अज्ञान एकार्थक है। इसी को वासना या मोह कहा गया है।

अज्ञान की सात भूमिकाएं हैं जो निम्न हैं - (5) बीजजाग्रत। जब चित् चिदाभास (चित् का स्पन्दन) से संचालित होता है तो वह

प्राणोपाधिसंपन्न हो जाता है। यही चित् का बीजजाग्रत नामक प्रथम अवस्था का

अज्ञान है। (२) जाग्रत। जाग्रत अवस्था का अज्ञान वह अवस्था है जिसमें जीव को “यह स्थूल देह

मैं हूँ, यह देहादि मेरा भोग्य है,” ऐसा भ्रम होता है। (३) महाजाग्रत। प्राक्तन या ऐहिक संस्कार के दृढ़ अभ्यास से जब अज्ञान उपचित हो

जाता है, अभिनिवेश सुदृढ़ हो जाता है, तो वह महाजाग्रत अज्ञान है। (४) जाग्रतस्वप्न। मनोराज्यजाग्रत स्वप्न का अज्ञान है। इस अवस्था में मनुष्य मृगतृष्णा,

रज्जुसर्प, द्विचन्द्र आदि अनेक प्रकार के प्रमों में रहता है। (५) स्वप्न। निद्राकाल में या निद्रावसान में जो प्रत्यय प्रतीत होता है वह स्वप्न है। (६) स्वप्नजाग्रत । दृढ़ अभिनिवेश के कारण चिरस्थायी कल्पना से उपचित प्रत्यय स्वप्न

जाग्रत है। जैसे राजा हरिश्चन्द्र का द्वादश वर्षीय अज्ञान, अथवा शबर-राजपुरुष

न्याय में शबराभिमानी राजा का अज्ञान। (७) सुषुप्ति। पूर्वोक्त ६ अवस्थाएं कर्मफलभोग की भूमिकाएं है और कर्मज्ञा हैं। अज्ञान

की सातवीं वह अवस्था है जिसमें सूक्ष्म और स्थूल समस्त प्रपंच का विलय हो जाता है, जीव जड़ हो जाता है, किन्तु भावी दुःखबोध से सम्पन्न रहता है। अर्थात् यद्यपि सुषुप्ति में कोई प्रत्यय प्रतीत नहीं होता, तथापि प्रत्ययों का उद्भव करने वाली वासना वहाँ रहती है।

इन सातों अवस्थाओं में प्रत्येक के अनेक अवान्तरप्रभेद भी हैं। ये प्रभेद पदार्थानुसार होते हैं। इन्हीं के कारण जीव अज्ञान की एक अवस्था से दूसरी अवस्था तक तब तक गमन करता रहता है जब तक उसका अज्ञान दूर नहीं हो जाता। अज्ञान का निवारक ज्ञान ही

अविद्या ही प्रकृति है। वह सत्त्व, रजस् और तमस् इन तीन गुणों वाली है।।

अविद्यां प्रकृतिं विद्धि गुणत्रितयधर्मिणीम्। एषैव संसृतिर्जन्तोरस्याः पारं परं पदम्।।

(योगवासिष्ठ ६.१.६.६)

वेदान्त-खण्ड की ये तीन गुण भी पुनः तीन प्रकार से विभक्त हैं। जैसे सत्त्व के तीन भेद शुद्ध सत्त्व, रजोमिश्रित सत्त्व और तमोश्रित सत्त्व है। इसी प्रकार रजोगुण और तमोगुण के भी तीन-तीन भेद हैं। अतः अविद्या नवधा गुणों में विभक्त है। वेदशास्त्र, ब्रह्मादि देव और समस्त सृष्टि अविद्यामय है।

७. बन्ध और मोक्ष

दृश्य सद्भाव ही बन्धन है। दृश्य का अभाव मोक्ष है। बन्ध और

मोक्ष दोनों का कारण मन है। जब मन इन्द्रियादि विषयों का ताना-बाना तानता है तब वह बन्ध है। पुनः जब वह विचारपूर्वक सत्तासामान्य का अनुसन्धान करता है तो वह मोक्ष है। ‘मन एवं मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः’। मोक्ष के पर्याय निर्वाण, प्रपंचविलय, कैवल्य और संसारोपशम हैं। यह वर्तमान जीवन में भी सम्भव है, क्योंकि यह ज्ञान की अवस्था है। अतः जीवन्मुक्ति का सिद्धान्त योगवासिष्ठ के मोक्षवाद का एक अनिवार्य उपप्रमेय है। जीवन्मुक्ति का विवेचन इस ग्रन्थ में विशदरूप से किया गया है। उसका प्रभाव अद्वैतवेदान्ती स्वामी विद्यारण्य के ग्रन्थ ‘जीवन्मुक्ति-विवेक" पर अत्यधिक पड़ा है, क्योंकि उन्होंने इस ग्रन्थ से अनेक उद्धरण दिये हैं। यह ज्ञान कर्मसमुच्चय से लभ्य है। जैसे पक्षी दो पंखों से आकाश में उड़ते हैं वैसे जीव ज्ञान और कर्म दोनों के प्रयोग से परम पद को पहुँचता है। केवल कर्म या केवल ज्ञान से मोक्ष नहीं मिलता है -

उभाभ्यामेव पक्षाभ्यां यथा खे पक्षिणां गतिः। तथैव ज्ञानकर्मभ्यां जायते परमं पदम् ।।

केबलात्कर्मणो ज्ञानान्नहि मोक्षोऽभिजायते। किन्तूभाभ्यां भवेन्मोक्षः साधनं तूभयं विदुः ।।

(योगवासिष्ट १.१.७-८) । ज्ञान की सात भूमिकाएं हैं जो निम्न हैं - १. शुभेच्छा। साधनचतुष्टय से उपलक्षित आत्मसाक्षात्कार की उत्कट इच्छा से गुरु से

उपनिषदों का श्रवण करना ज्ञान की प्रथम भूमिका है। गुरुभक्ति तथा सत्संग इसमें

विशेष सहायक हैं। २. विचारणा। यतिधर्मपालनपूर्वक श्रवण और मनन करना विचारणा है। ३. तनुमानसा। श्रुत्यर्थ पर निदिध्यासन करना तनुमानसा है। इसके मानस तनु या सूक्ष्म

गा रहता है। इस कारण इसका नाम तनुमानसा है। ४. सत्त्वापत्ति । निर्विकल्प समाधि की अवस्था सत्त्वापत्ति है। इस अवस्था में ब्रह्मात्मैकत्व

का अनुभव होता है। अनुभवकर्ता को ब्रह्मविद् कहा जाता है।

योगवासिष्ठ वेदान्त

५६५ ५. असंसक्ति। निरतिशय आनन्द से उपलक्षित नित्य अपरोक्ष ब्रह्मभाव का साक्षात्कार

असंसक्ति की अवस्था है। इसको पाने वाला ब्रह्मविद्वर कहा जाता है। इसमें

अविद्या की संसक्ति नहीं रहती है। ६. पदार्थभाविनी। पंचम अवस्था का परिपाक षष्ठ अवस्था में होता है जिसमें आत्मानन्द

से ज्ञानी आभ्यन्तर और बाह्य पदार्थों की भावना करता है जिन्हें अन्य लोग प्रयोग करते हैं। ज्ञानी की पदार्थ-भावना अपने में अपने द्वारा होती है। इस अवस्था के पाने

वाले को ब्रह्मविद्वरीयान् कहा जाता है। ७. तुर्यगा। अन्त में ज्ञान की अन्तिम अवस्था है जिसमें उसे ब्रह्मविद्वरिष्ठ कहा जाता

है। इस अवस्था में भेद का पूर्ण विलय हो जाता है। ब्रह्मवेत्ता ब्रह्म हो जाता है। ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवति। यतिमा

इसके अनन्तर विदेहमुक्ति की अवस्था है जो तुर्यातीत है और ब्रह्म ही है। अतः इसे अवस्था में नहीं गिना जाता । उपर्युक्त सातों अबस्थाओं में प्रारब्धवशात् देह विद्यमान रहता है। षष्ठी अवस्था में ज्ञानी कुछ कर्म करता है, किन्तु सप्तमी अवस्था में वह कोई कर्म नहीं करता है।

यही ज्ञानदशा जीवमात्र का लक्ष्य है। इसको पशु, म्लेच्छ आदि ने भी प्राप्त किया है और वे भी असंशय रूप से मुक्त हुए हैं -

प्राप्ता ज्ञानदशामेतां पशुम्लेच्छादयोऽपि ते। सदेहा वाप्यदेहा वा ते मुक्ता नात्र संशयः।।

(योगवासिष्ट ३.११८.२२) कुछ लोगों ने सभी भूमिकाओं को प्राप्त किया है, कुछ लोगों ने दो या तीन भूमिकाओं को, कुछ ने चार भूमिकाओं को और कुछ ने छः भूमिकाओं को।

सप्तमी भूमिका तक पहुंचे जीव समस्त ऐहिक उपभोगों को, यहाँ तक कि साम्राज्य को भी, तृणवत् समझते हैं और विदेह कैवल्य का सुख प्राप्त करते हैं।

८. पौरुष का सिद्धान्त

योगवासिष्ठ देववाद या नियतिवाद के विरोध में पौरुषवाद को

अग्रसर करता है। दैव जगत् में कहीं दृष्टिगत नहीं है। सर्वत्र पुरुषार्थ या पौरुष या पुरुष-प्रयत्न ही दिखाई पड़ता है। शास्त्र से, गुरु से या स्वतः पुरुषार्थ से ही सर्वत्र सिद्धि मिलती है।

  • भावाभावसहस्रेषु दशासु विविधासु च।

स्वपौरुषवशादेव निवृत्ता भूतजातयः।।

वेदान्त-खण्ड शास्त्रतो गुरुतश्चैव स्वतश्चेति त्रिसिद्धयः। भाजी वन सर्वत्र पुरुषार्थस्य न देवस्य कदाचन ।। मानिमय

(योगवासिष्ठ २.७.११) संवित्स्पन्द, मनःस्पन्द और इन्द्रिय-स्पन्द - ये तीन पुरुषार्थ पुरुष-प्रयत्न के रूप हैं। (योग वासिष्ट २.७.४)। इनसे ही फलोदय या फल-प्राप्ति होती है। पौरुष क्या है? इसका उत्तर देते हुए योगवासिष्ट में कहा गया है कि साधुओं के उपदिष्ट मार्ग से मन, शरीर और वाणी की जो चेष्टाएं होती हैं। वे पौरुष हैं। पौरुषवान् व्यक्ति ही सफल होता है। पौरुष से अन्य चेष्टाएं उन्मत्तचेष्टित हैं।

साधूपदिष्टमार्गेण यन्मनोऽङ्गविचेष्टितम्। पीपल तत्पौरुषं तत्सफलमन्यदुन्मत्तविचेष्टितम् ।।

(योगवासिष्ठ २.४.११) जो मनुष्य जिस अर्थ की कामना करता है और जिसके लिए कम से यत्न करता है, वह उसे अवश्य प्राप्त करता है। यही नियम है। इसी को स्वतन्त्रेच्छा का सिद्धान्त कहा गया है। अर्थात् मनुष्य की संकल्प शक्ति स्वतन्त्रेण कार्य करती है।

मनुष्य स्वतन्त्र है क्योंकि उसके अतिरिक्त उसको निर्धारित करने वाला कोई तत्त्व ही नहीं है। वह मत्ता (ज्ञाता) है, उसके अतिरिक्त कोई मत्ता (ज्ञाता) नहीं है। यदि उसका भी चेतयिता माना जाय तो अनवस्था दोष हो जायेगा।

अन्यस्त्वां चेतयति चेत् तं चेतयति को वरः। क इमं चेतयेत् तस्मादनवस्था न वास्तवी।।

(योगवासिष्ठ २.६.२६) इस प्रकार अद्वैतवाद मानव-स्वतन्त्रतावाद को जितनी दृढ़ता से सिद्ध करता है उतना कोई द्वैतवाद नहीं कर सकता। अद्वैतवाद ही मानव को परम स्वतन्त्र, संप्रभु, स्वराट् और सम्राट् बनाता है। उस पर उसका ही ईशन या शासन है, अन्य किसी का नहीं। गुरु और शास्त्र से जो अनुशासन प्राप्त होता है उसका श्रवण, मनन और आत्मसात्करण मानव स्वयं अपने प्रयत्न से करता है। अतएव वह उसके स्वातन्त्र्य का वर्धक है, घातक नहीं।

९. योगमार्ग

योगवासिष्ठ में अद्वैतवाद और पातञ्जलयोग का समन्वय किया गया है।

उसमें योग-वेदान्त है। योग और ज्ञान ये दो चित्तनाश के उपाय या क्रम हैं -

योगवासिष्ठ वेदान्त

५६७

माकोस्तान द्वौ क्रमी चित्तनाशस्य योगो ज्ञानं च राघव। सामान कलाकारिताची योगस्तवृत्तिनिरोधो हि ज्ञानं सम्यगवेक्षणम्।। आ नी

योग चित्तवृत्ति-निरोध है और ज्ञान सम्यक् अवेक्षण है। देह में सहस्रों नाड़ियां हैं। नाड़ियों में जो वायु प्रवाहित होता है वहीं प्राण है।

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देहेऽस्मिन् देहनाडीषु वातः स्फुरति योऽभितः।। स्पन्देष्विव भुवो वारि स प्राण इति कीर्तितः।।

(योगवासिष्ट ५.७८.१०)

केला प्राणबन्धन ही मन या चित्त है।

तकनीक को

अन्तःप्राणपरिस्पन्दात् संकल्पकलनोन्मुखी संवित् संजायते यैषा तच्चित्तं विद्धि राघव।।

सिस (वही, ५.७८.१४) __प्राण के संरोधन से मन उपशान्त होता है। मन के उपशान्त होने पर प्रपंच (संसार) का विलय होता है। अतएव प्राणायाम या प्राण का संरोधन प्रपंचविलयरूप मोक्ष का साधन है। पातंजलयोग की प्राणायाम-विधि का उपयोग करते हुए योगवासिष्ठकार ने वैराग्य और अभ्यास से प्राण का निरोध करने को कहा है। प्राण-निरोध चितवृत्ति के निरोध का प्रमुख अंग है, क्योंकि प्राण भी स्वयं एक चित्तवृत्ति है। उसका भी स्वरूप स्पन्दात्मक ज्ञान किया है। उसका निरोध होने पर ही चित्त-निरोध अर्थात् प्राणेतर चित्तवृत्तियों के निरोध संभव हैं। चित्तवृत्ति के निरोध से स्थिरधीत्व या स्थित प्रज्ञा की स्थिति प्राप्त होती है। स्थितप्रज्ञ योगवासिष्ठ के अनुसार जीवन्मुक्त है। जातीय विवाह यः स्थितः स्थिरधीस्तज्ज्ञः स जीवन्मुक्त उच्यते।

(योगवासिष्ठ ५.७६.५४)

१०. योगवासिष्ठ और शांकर अद्वैतवेदान्त

आरम्भ में शांकर अद्वैतवेदान्त का विकास

योगवासिष्ट से पूर्णतया निरपेक्ष था। योगवासिष्ठ को शांकर अद्वैतवेदान्ती अपने सम्प्रदाय का ग्रन्थ नहीं मानते थे। किन्तु स्वामी विद्यारण्य के समय से लेकर आज तक योगवासिष्ठ को शांकर अद्वैतवेदान्ती स्वीकार करने लगे हैं। कम-से-कम ज्ञान की सप्तभूमिका के सिद्धान्त को सभी अद्वैतवेदान्ती मानते हैं। वास्तव में योगवासिष्ट और शांकर अद्वैतवेदान्त में समानताएं और असमानताएं दोनों हैं। (१) निर्गुण५६८

वेदान्त-खण्ड ब्रह्मवाद, (२) ब्रह्मात्मैक्यवाद, (३) जगन्मिथ्यात्ववाद, (४) जीवन्मुक्तिवाद (५) दृष्टिसृष्टिवाद और (६) अजातवाद पर योगवाशिष्ठ तथा शांकर अद्वैतवाद में साम्य है, किन्तु शांकर अद्वैतवेदान्त जहाँ व्यावहारिक सत् और प्रातिभासिक सत् में भेद करता है वहां योगवासिष्ठ ऐसा नहीं मानता। शंकराचार्य के अनुसार माया विषयगत है और मात्र काल्पनिक नहीं है, किन्तु योगवासिष्ठकार माया को काल्पनिक और विषयिगत मानते हैं। अन्त में योगवासिष्ठ में ज्ञानकर्म समुच्चयवाद तथा पातंजल-योगमार्ग से अद्वैतवाद का समन्वय किया गया है। किन्तु शांकर अद्वैतवाद में यह समन्वय नहीं है। तथापि दोनों दर्शनों में सभी दर्शनों का अविवाद ढूँढा गया है और अद्वैतवाद को ही सर्वश्रेष्ठ सिद्धान्त और सर्वदर्शनसमन्वय का सूत्र बताया गया है। इसी ने दोनों में ऐक्य स्थापित कर दिया है। लगभग सात-आठ शताब्दियों से योगवासिष्ठ-वेदान्त शांकर अद्वैतवेदान्त का एकदेशी मत या एक प्रस्थान बन गया है। कुछ भी हो, योगवासिष्ठ-वेदान्त शांकर अद्वैतवेदान्त से जितना सन्निकट है उतना वह अन्य किसी भी दर्शन के निकट नहीं है। गंगाधरेन्द्रसरस्वती के शिष्य आनन्दबोधेन्द्र सरस्वती, जो स्वयं शांकर अद्वैतवेदान्ती हैं, योगवासिष्ठ की १८४५ में लिखी गई अपनी व्याख्या तात्पर्यप्रकाश के आदि में ही कहते हैं कि लोग चाहे मेरी प्रशंसा करें या निन्दा (योगवासिष्ठ पर व्याख्या लिखने के कारण), मैं योगवासिष्ठ की उक्तियों के समुद्र में गोता लगाकर आनन्द लेना चाहता हूँ

प्रशंसन्त स्वैरं मतिभिरथ निन्दन्तु सुधियः प्रवृत्तिर्मे यस्मान् न भवति जनाराधनकृते। अनेन व्याजेनामृतरसवसिष्ठोक्तिभरिते विहर्तुं वाञ्छामि प्रतिदिवसमानन्दजलधौ।

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सन्दर्भ-ग्रन्थ

१. वाल्मीकिकृत योगवासिष्ठ, आनन्दबोधेन्द्र सरस्वतीकृत तात्पर्यप्रकाश व्याख्यासहित,

२ भाग, मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, १६८४. २. डॉ. भीखनलाल आत्रेयकृत दी फिलासफी आफ दी योगवासिष्ठ मद्रास, १६३६ ।

यह उनका काशी हिन्दू विश्वविद्यालय वाराणसी द्वारा डी.लिट. उपाधि के लिए स्वीकृत शोध-प्रबन्ध है।

योगवासिष्ठ वेदान्त

५६६ ३. डॉ. सुरेन्द्रनाथ दासगुप्तकृत ए हिस्ट्री ऑफ इण्डियन फिलासफी, भाग दो,

मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, १६७५. ४. अभिनन्द गौडकृत लघुयोगवासिष्ठ, आत्मसुख की वासिष्ठचन्द्रिका सहित, निर्णयसागर,

बम्बई, १६३७. ५. डॉ. भीखनलाल आत्रेय द्वारा संकलित योगवासिष्टसार, हिन्दी और अंग्रेजी

अनुवाद सहित, दर्शन प्रिन्टर्स, मुरादाबाद (उ.प्र.), १६६२. ६. नरहरि, बोधसार, चौखम्बा, वाराणसी

(यह श्लोकों में लिखा गया अद्वैतवेदान्त का कोश है)। समाना

म्हात संस्थान

परिस.CQ09