०४ मध्वोत्तर द्वैत-वेदान्त का विकास

१. सामान्य परिचय

मध्वोत्तर द्वैत-वेदान्त का विकास मुख्यतः दो विधियों से हुआ। प्रथम, मध्व की रचनाओं और अवधारणाओं की विशद व्याख्याओं और टिप्पणियों के द्वारा। द्वितीय, शंकरोत्तर अद्वैतियों के साथ मध्वोत्तर लैतियों के वैचारिक वाद-विवाद के द्वारा। इन विधियों से ऐसे ग्रन्थों की रचना की गयी जिनसे द्वैत-दर्शन के विकास के साथ ही साथ एक नयी तर्क-प्रणाली भी विकसित हुई।

मध्वोत्तर द्वैत-वेदान्त का महत्त्व इस बात में है कि इसने ऐसे महान व्याख्याकार, टीकाकार और तर्कशास्त्री पैदा किए, जिनकी कृतियों में महत्त्वपूर्ण दार्शनिक तत्त्व और अकाट्य तर्क भरे हैं। इस काल में द्वैत की संकल्पनाओं की न केवल प्रामाणिक व्याख्या ही हुई, अपितु द्वैत-दर्शन को मानक आकार भी मिला और वाद-प्रतिवाद के माध्यम से उसे एक नया निखार मिला। इसके अलावा द्वैतमत के सिद्धान्तपक्ष का संरचनात्मक विकास हुआ तथा हरिदास कूट के रहस्यवादी भक्तों के नेतृत्व में दर्शन के धार्मिक पक्ष का संवर्धन हुआ। मध्व ने जिस दार्शनिक वट-वृक्ष का बीजारोपण किया था वह आगे बढ़ता ही गया। कि आनन्दतीर्थ, जयतीर्थ और व्यासतीर्थ माध्वमत में मुनित्रय के नाम से प्रसिद्ध हैं।

आनन्दतीर्थ मध्व का ही नामान्तर है। अब उनके परवर्ती आचार्यों के ग्रन्थों तथा मतों का परिचय यहाँ दिया जायेगा।

मध्व के साक्षात् शिष्यों में त्रिविक्रम पंडित (१२५८-१३२०) और पद्मनाभ (१३१८-१३२४ के लगभग) और अक्षोभ्यतीर्थ (१३५० के आसपास) विशेषरूप से उल्लेखनीय हैं। त्रिविक्रमपंडित ने मध्व के ब्रह्मसूत्रभाष्य पर तत्त्वप्रदीप नामक सुस्पष्ट टीका लिखी। पद्मनाभतीर्थ के लगभग १५ ग्रन्थ हैं जिनमें मध्व के ब्रह्मसूत्रभाष्य पर सत्तर्कदीपावली (चतुःसूत्रीपर्यन्त), अनुव्याख्यान पर सन्यायरत्नावली, मध्व के गीताभाष्य पर गीताभाष्यदीपिका, उनके गीतातात्पर्यनिर्णय पर प्रकाशिका और दश प्रकरणों पर टीकाएं प्रसिद्ध हैं। इनमें से अधिकांश अप्रकाशित हैं। ये टीकाकार के नाम से प्रसिद्ध हैं। अक्षोभ्यतीर्थ और विद्यारण्य के मध्य शास्त्रार्थ हुआ था जिसकी अध्यक्षता वेदान्तदेशिक ने

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बैदान्त-खण्ड

की थीं। प्रसिद्धि है कि अक्षोभ्य मुनि ने विद्यारण्य को परास्त किया था। इसके प्रमाण में निम्न श्लोक विख्यात है

असिना तत्त्वमसिना परजीवप्रभेदिना।

विद्यारण्यमहारण्यमक्षोभ्यमुनिरच्छिनत्। किन्तु अद्वैत-परम्परा मानती है कि विद्यारण्य ने ही अक्षोभ्यमुनि को ध्वस्त किया था। उक्त श्लोक इस परम्परा में यों है:

असिना तत्त्वमसिना परजीवप्रभेदिना।

अक्षोभ्यं क्षोभयामास विद्यारण्यो महामुनिः।। कुछ भी हो, अक्षोभ्यमुनि को जयतीर्थ जैसा एक सुयोग्य शिष्य मिल गया जिसने मध्ववेदान्त को तार्किक आधार पर सुप्रतिष्ठित कर दिया।

२. जयतीर्थ (१३६५-१३८८)

महाराष्ट्र के प्रसिद्ध तीर्थ पंढरपुर के पास मंगलवेद्य ग्राम में धोण्डू पन्त रघुनाथ का जन्म हुआ जिन्होंने पिता की आपत्ति के बावजूद अक्षोभ्यतीर्थ से संन्यास की दीक्षा ली। इनके पिता का नाम देशपाण्डे बताया जाता है जो सेना में एक अधिकारी थे। जयतीर्थ ने भारतीय दर्शन की सभी प्रणालियों का गहन अध्ययन किया और माध्वदर्शन की यथार्थवादी अवधारणाओं की न केवल विशद व्याख्या की, अपि तु उनको नये तार्किक ढाँचे में रखकर मानक आकार भी दिया। साथ ही नूतन और मौलिक अवधारणाओं की संरचना कर द्वैतवेदान्त को समृद्ध बनाया।

बताया जाता है कि जयतीर्थ ने कुल २२ रचनायें की जिनसे द्वैत-दर्शन को एक नयी दार्शनिक प्रणाली मिली। उनके मुख्य ग्रन्थों का विवरण यों है:

(१) तत्त्वसंख्यान-टीका। इसमें मध्च के तत्त्वसंख्यान के प्रथम प्रकरण की टीका करके यथार्थवादी वेदान्त को मौलिक तकों से जयतीर्थ ने पोषित किया। ।

(२) तत्त्वविवेक-टीका और

(३) तत्त्वोद्योत-टीका में द्वैती अवधारणाओं की व्याख्या के साथ ही “तत्त्वमसि” आदि महावाक्यों की यथार्थवादी व्याख्या भी है। वे कहते हैं: “तत्त्वमसीति वाक्येन परमात्मसादृश्यविशेषः परिपाद्यते, अभेदस्य प्रमाणवाधित्वात्"। इसमें अद्वैत और विशिष्टाद्वैत की व्याख्याओं का सशक्त खण्डन है।

मा (४) विष्णुतत्त्वनिर्णय-टीका में माध्वमत के समर्थन के साथ ही अद्वैतवादी चित्सुख

मध्वोत्तर द्वैत-वेदान्त का विकास

३८५ की तत्वप्रदीपिका में दिए गये उन तर्को का खण्डन है जो “भेद” की अवधारणा के विरुद्ध

(1) मायावादखण्डन-टीका में मध्च के मायावाद के खण्डन विषयक तर्कों का स्पष्टीकरण और समर्थन है।

(६) प्रपंचमिथ्यात्वानुमानखण्डन-टीका में जगत् के मिथ्यात्व के लिए अद्वैत द्वारा दिये गये तों का खण्डन करके जगत् को सत् सिद्ध किया गया है।

  • (७) उपाधिखण्डन-टीका और

(८) तत्त्वप्रकाशिका में अद्वैत की अविद्या की अवधारणा का खण्डन किया गया है। ३ () प्रमाणलक्षणटीका या न्यायकल्पलता और न

(१०) कथालक्षणटीका में जयतीर्थ ने प्रमाण पर विचार करते हुए कथा, वाद, जल्प, वितण्डा, वाद-वितण्डा, जल्पवितण्डा आदि पर मत व्यक्त किया है।

(११) कर्मनिर्णयटीका में नरहरितीर्थ द्वारा मध्व के कर्मनिर्णय की आलोचना का जवाब दिया गया है। तत्त्वप्रकाशिका द्वैतवेदान्त का अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है जिसमें सूत्रप्रस्थान की तार्किक व्याख्या है।

(१२) न्यायसुधा में जयतीर्थ ने मध्व के अनुव्याख्यान की व्याख्या की है। इसका मूल नाम विषमपद वाक्यार्थविवृति है। इसमें अद्वैत और अन्य सम्प्रदायों के दार्शनिक मतों की कटु आलोचना और माध्वमत के समर्थन में अकाट्य तर्क दिए गये हैं। जयतीर्थ ने इस ग्रन्थ में सशक्त तर्कों से माध्वभाष्य का समर्थन किया है और कहा है कि इसमें पाणिनि के व्याकरण-नियमों का उल्लंघन नहीं हुआ है।

न्यायसुधा जयतीर्थ की सर्वश्रेष्ठ कृति है। इसमें जयतीर्थ की व्याख्या-पद्धति उन्हीं के शब्दों में इस प्रकार है

है। स्पष्टीकरणं चानेकविधम् । (9) क्वचिद् अनुक्तांशस्योक्तिः, (२) क्वापि अतिविक्षिप्तस्य उपपादनम्, (३) क्वचिद् अतिविस्तृततया बुड्यनारुढस्य संक्षेपः, (४) क्वापि विक्षिप्तस्य एकीकरणम, (2) कुत्रापि उक्तस्य उपपादनम् (६) क्वचिद् अपव्याख्याननिराकरणेन दृढीकरणमित्यादि (न्यायसुधा, पृ. ८) ।

अर्थात उनका स्पष्टीकरण छ: प्रकार का है। इस षोढा स्पष्टीकरण के कारण न्यायसुधा सम्पूर्ण भारतीय-दर्शन के टीका-ग्रन्थों में सर्वोत्तम टीका हो गयी है। जयतीर्थ न्यायसुधा के अन्त में विनम्रतापूर्वक कहते हैं कि सभी विद्वानों को न्यायसुधा को अवश्य पढ़ना चाहिए

ना । इयं न्यायसुधा भौमैर्विबुधैः सैव्यतां सदा।

सीताराम

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वेदान्त-खण्ड

इससे मध्वाचार्य के अनुव्याख्यान का सम्यक् ज्ञान ही नहीं प्राप्त होता, अपितु यह भी ज्ञात होता है कि टीका कैसे लिखी जानी चाहिए। जो लोग टीका का उपहास करते हैं और टीकाकार को मौलिक विचारक नहीं मानते हैं उन्हें न्यायसुधा अवश्य पढ़नी चाहिए। इससे उनकी प्रान्ति दूर हो जाएगी। (१३) न्यायविवरणटीका में मध्व के न्यायविवरण के प्रथम अध्याय के प्रथम दो पादों पर टीका है। रघूत्तम तीर्थ ने इसे पूरा किया है। (१४) षट्प्रश्न-उपनिषद्भाष्य-टीका में मूलग्रन्थ की अक्षर-योजना और भाष्य-योजना का विवरण है। (१५) ईश-उपनिषद्-भाष्यटीका में अद्वैत और विशिष्टाद्वैत द्वारा दिए गये ईशोपनिषद्भाष्य की आलोचना है। इसमें कहा गया है कि इस उपनिषद् का मुख्यार्थं द्वैत की प्रतिष्ठापना है। शंकर ने अनेक पदों की मनमानी व्याख्या की है जैसे “संभूति” को “असंभूति” समझ लेना। (१६) ऋग्भाष्यटीका या सम्बन्धदीपिका में मध्व के अतिरिक्त यास्क आदि का उद्धरण देकर ऋग्वेद की माध्व- व्याख्या को पाणिनि के व्याकरण के अनुरूप सिद्ध किया गया है। (१७) गीताभाष्यप्रमेयदीपिका में शंकर और भास्कर के गीताभाष्य की आलोचना के साथ मध्च की तथाकथित व्याकरणीय त्रटियों के बचाव में जयतीर्थ ने तर्क दिये हैं तथा माध्व-भाष्य के निहितार्थ को स्पष्ट किया है। (१८) गीतातात्पर्यन्यायदीपिका में भी भास्कर की आलोचना और माध्वभाष्य का समर्थन है। (१६) वादावली जयतीर्थ का एक मौलिक ग्रन्थ है जिसे वेदान्तवादावली या वादमाला भी कहा गया है। इसमें मौलिक तकों से मायावाद का तार्किक और तत्त्वमीमांसीय ढंग से परीक्षण तथा खण्डन है। इन्द्रियजन्य ज्ञान की वैधता के लिए इसमें तर्क दिए गये हैं। अविद्या, मिथ्यात्व और ‘नेह नानास्ति’ आदि की अद्वैती व्याख्या का जोरदार खण्डन किया गया है। इस ग्रन्थ में चित्सुख की तत्त्वप्रदीपिका और विवरण तथा न्यायकन्दली के मतों का खण्डन विस्तार से है। अद्वैत की भेद-विषयक आलोचना का जवाब देकर भेद और जगत् की सत्ता के लिए इसमें अनुपम तर्क दिए गये हैं। वादावली व्यासतीर्थ के न्यायामृत का उपजीव्य है। वादावली में मुख्यतः अविद्या का लक्षण और उसका खंडन, अविद्या के लिये दिये गये अनुमानों का परीक्षण, मिथ्यात्व का लक्षण और उसका खंडन, दृश्यत्व, जड़त्व और परिच्छिन्नत्व हेतुओं का खण्डन, आरोपवाद का दोष, असद्वाद के प्रति श्रुति का विरोध, भेद के धर्मिस्वरूप का निरूपण, विशेष की व्याख्या, आदि वादों का द्वैतवादी निरूपण है। वादावली का खण्डन वादावलीखण्डन नामक ग्रन्थ में किसी अद्वैतवादी ने किया है, जो अभी मैसूर ओरियण्टल लाइब्रेरी में पाण्डुलिपि के रूप में सुरक्षित है। (२०) प्रमाणपद्धति जयतीर्थ का सबसे बड़ा स्वतंत्र ग्रन्थ है। द्वैतदर्शन के विद्वानों ने इस पर आठ टीकाएं लिखी हैं। इस सम्प्रदाय की तर्कमीमांसा, ज्ञानमीमांसा और तत्त्वमीमांसा का यह सर्वाधिक प्रामाणिक ग्रन्थ है। इसमें प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम नामक तीन परिच्छेद हैं जिनमें प्रमाण के स्वभाव, क्षेत्र, लक्षण, सत्य, प्रामाण्य और तर्काभास आदि पर विशद विचार किया गया है। सभी भारतीय ज्ञानमीमांसा की प्रणालियों का परीक्षण करके इस ग्रन्थ को जयतीर्थ ने

मध्योत्तर दैत-वेदान्त का विकास

२८३ अनुपम बना दिया है। (२१) पद्यमाला, (२२) शतापरार्थस्तोत्र, (२३) अध्यात्मतरंगिणी जयतीर्थ के तीन लघु ग्रन्थ हैं जो भक्तजनों के लिए उपयोगी हैं।

इन ग्रन्थों के माध्यम से जयतीर्थ ने द्वैतदर्शन में वही काम किया जो चित्सुख और वाचस्पति ने अद्वैतवेदान्त में किया है। उन्होंने आलोचनात्मक-संरचनात्मक पद्धति से द्वैतदर्शन को ठोस तार्किक आधार दिया है। अवधारणाओं और प्रत्ययों को स्पष्टतः व्याख्यापित करने की जो पद्धति उन्होंने अपनायी, वह द्वैतदर्शन को मानक आकार देने में अत्यन्त उपयोगी सिद्ध हुई और उनके परवर्ती लगभग सभी द्वैतियों ने इसी पद्धति को अपनाया और विकसित किया। अन्य दर्शनप्रणालियों का परीक्षण और खण्डन करके जयतीर्थ ने द्वैत-दर्शन के तर्कशास्त्रीय, ज्ञानमीमासात्मक, तत्त्वमीमांसात्मक सिद्धान्तों और प्रत्ययों का समीक्षात्मक और संरचनात्मक विवेचन किया जिससे द्वैतदर्शन को स्वतंत्र, स्वतःपूर्ण और समसामयिक रूप मिला । मध्च के महाभारततात्पर्यनिर्णय, भागवततात्पर्य जैसे धार्मिक ग्रन्थों पर जयतीर्थ ने कोई टीका नहीं लिखी। इनका उद्देश्य द्वैतमत को तार्किक रूप से सबल बनाना था।

वाचस्पति, विवरणकार, अमलानन्द, चित्सुख, विज्ञानघन, रामानुज, श्रीकण्ठ, वल्लभ, प्रकाशात्म, संक्षेपशारीरक, मण्डन आदि के मतों का जयतीर्थ ने तार्किक खण्डन किया और मध्व की व्याख्या को तर्कसम्मत सिद्ध किया। भाषादर्शन और व्याकरण की जटिलताओं का उनका ज्ञान अप्रतिम था। उन्हें टीकाचार्य के रूप में याद किया जाता है।

३. विष्णुदासाचार्य (१३६०-१४४०) ।

जयतीर्थ की तरह इन्होंने सभी भारतीय दर्शन-प्रणालियों के साथ मिथिला के गंगेश उपाध्याय की तर्कविद्या का गहन अध्ययन किया और इनके प्रकाश में अद्वैत-वेदान्त के नवीनतम तों का खण्डन करके द्वैतदर्शन को आगे बढ़ाया। विष्णुदास ने जयतीर्थ की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया।

विष्णुदास ने वादरत्नावली में जयतीर्थ की वादावली और अन्य रचनाओं में प्रस्तुत प्रत्ययों का पुनःपरीक्षण और समर्थन किया। मध्व और जयतीर्थ के तर्कों के अलावा उन्होंने नई युक्तियां देकर अद्वैतमत का खण्डन किया। इसके लिये उन्होंने पूर्वमीमांसा, व्याकरण और अन्य शास्त्रों के सिद्धान्तों का उद्धरण दिया। जैमिनि, कुमारिल, भवनाथ, वरदराज आदि के तर्कों का उपयोग उन्होंने किया। वाचस्पति मिश्र के अवच्छेदन्याय-प्रयोग का खण्डन किया और प्रत्यक्ष की वैधता के लिए मौलिक तर्क दिया। तत्त्वमसि, एकमेवाद्वितीयम्, नेह नानास्ति किंचन, आदि अभेद-श्रुतियों की जो व्याख्या मध्व और जयतीर्थ ने की थी, उनके समर्थन में इन्होंने व्याकरण-महाभाष्य और उसकी टीकाओं के नियमों और पाणिनिसूत्रों का उपयोग किया। महाभाष्य, कैय्यट, पदमंजरी एवं अन्य ग्रन्थों के उद्धरण

वेदान्त-खण्ड

देकर इन्होंने ‘तत्त्वमसि’ की बीस और ‘एकमेवाद्वितीयम्’ की सात सम्भाव्य व्याख्यायें की

और उनसे जीव और ब्रह्म के भेद तथा जगत् की सत्ता को सिद्ध किया। तत्र भेद एव “तत्त्वमसि’ इति वाक्यस्य विंशतियोजनाः कथयिष्यन्ते । “एकमेवाद्वितीयम्” इति श्रुतेस्तु भेद एव सप्तयोजनाः सन्तीत्युक्तं खण्डनखण्डने। माना जाता

मध्व की अभेद श्रुतियों की व्याख्या का समर्थन, चित्सुख के भेद की आलोचना तथा अखण्डार्थ का खण्डन इन्होंने जोरदार शब्दों में किया है। वादरत्नावली के प्रथम परिच्छेद में ही मिथ्यात्व और नेह नानास्ति की अद्वैती व्याख्या की इन्होंने धज्जी उड़ा दी है। पंचपादिका आदि को उद्धृत करते हुए विष्णुदास ने असत्यता की ग्यारह संभाव्य परिभाषाओं का परीक्षण कर मिथ्यात्व का खण्डन विस्तार से किया और कहा कि दृश्यत्वम्, जडत्वम्, परिच्छिन्नत्वम्, अनात्मत्वम् और अंशित्वम् आदि असत्यता के सदोष हेतु हैं तथा भेदत्वम् या परतंत्रम् के आधार पर की गयी भेद की अद्वैती आलोचना अतार्किक है।

“इष्टसिद्धि” आदि के द्वारा अद्वैतियों की दृगृदृष्टिसम्बन्धानुपपत्ति का परीक्षण करते हुए विष्णुदास ने कहा कि दृक् और दृश्य के बीच उपयुक्त सम्बन्ध न स्थापित कर पाने से यह सिद्ध नहीं होता कि दृश्य असत्य है। ‘न हि दृगदृश्यसम्बन्धस्योपपादकं दृश्य मिथ्यात्वम्, अपितु प्रतिक्षेपम्’। इस संबंध की सत्ता का प्रमाण हमारा व्यवहार है। इस सम्बन्ध का यदि नाम दिया जाय तो इसे विषय-विषयीभाव कहा जा सकता है। यह अनुभवाश्रित है और इसके बारे में अधिक कुछ नहीं कहा जा सकता। ‘स एव सः न त्वन्यः’। गुड़ की मिठास को हमें स्वीकार करना होगा चाहे हम उसके बारे में कुछ भले ही न कह सकें। बाल की खाल निकालने के बजाय हमें अनुभूत तथ्य को स्वीकार करना चाहिए। विषयविषयीभाव को हम संयोग, वियोग या समवाय के वर्गों में नहीं रख सकते हैं।

मिथ्यात्व के विषय में अद्वैतियों द्वारा उद्धृत श्रुतियों, जैसे नासद् आसीत्, मायामात्रमिदम् द्वैतम् आदि की पुनर्व्याख्या करके इन्होंने द्वैत का समर्थन करते हुए कहा है कि प्रत्यक्ष-समर्थित अनुभव को अनुमान से अवैध सिद्ध नहीं कर सकते । अनुमान प्रत्यक्षाश्रित होता है और प्रत्यक्ष का स्वप्रामाण्य सिद्ध है। साक्षी-प्रत्यक्ष द्वारा जगत् की सत्ता वैसे ही है जैसे ब्रह्म की सत्ता जो त्रैकालिकबाधाभावलक्षणम् है। अद्वैतियों के जगत की तात्कालिक सत्ता की अवधारणा अतार्किक है जिसे विवरणविडम्बनम् में श्रेणीबद्ध सत्ता की असत्यता से दर्शाया गया है।

न केवल अनुमान, अपितु आगम भी प्रत्यक्ष की उपेक्षा नहीं कर सकता, क्योंकि साक्षी प्रत्यक्ष की वैधता अकाट्य है। इससे जिस जगत् की सत्ता का अनुभव हमें होता है वह मिथ्या नहीं हो सकता।

अनेक युक्तियाँ देकर विष्णुदास ने सिद्ध किया है कि जीव और ब्रह्म का भेद नित्य है। अद्वैतियों का यह कथन कि भेद-श्रुतियाँ मात्र अर्थवाद हैं, तर्कसंगत नहीं है। वस्तुतः

मध्वोत्तर द्वैत-वेदान्त का विकास

३८५ भेद-श्रुतियाँ अभेद-श्रुतियों की अपेक्षा श्रेष्ठ हैं, क्योंकि जहाँ अस्पष्ट होने के कारण अभेद-श्रुतियों की अनेक व्याख्यायें हो सकती हैं, भेद-श्रुतियाँ स्पष्ट और असन्दिग्ध हैं। साथ ही अभेद-श्रुतियों की व्याख्या इस तरह की जा सकती है कि वे द्वैत-श्रुतियों के अनुरूप हों। यही श्रुतियों का आशय भी है।

विष्णुदास ने जीव और ब्रह्म के तादात्म्य की अवधारणा को नकारते हुए कहा कि “तत्त्वमसि” आदि महावाक्यों में तत् और त्वम् दो विभिन्न सत्ताओं का निर्देश करते हैं, क्योंकि इनके गुण अलग-अलग हैं। वस्तुतः तादात्म्य की अवधारणा भेद की अपेक्षा करती है। दो पदार्थों में तादात्म्य स्थापित करने के लिये पहले उन्हें भिन्न मानना होगा। परन्तु “तत्’ में सर्वज्ञत्व और “त्वम्” में अल्पज्ञत्व आदि गुणों की भिन्नता उन्हें सदैव अलग रखती है। आँख मूंद लेने मात्र से भेद नहीं मिट जाता। आग और पानी का तादात्य नहीं हो सकता। श्रुतियों का स्पष्ट निर्देश है कि जीवों की अनेकता, परतंत्रता, सीमितता तथा ब्रह्म की एकता, स्वतंत्रता, सर्वज्ञता आदि के भेद नित्य हैं जो मोक्षावस्था में भी रहते हैं। अतः ‘तत्त्वमसि’ की सर्वाधिक उपयुक्त व्याख्या यह है कि जीव ब्रह्म पर आधृत है, ऐतदात्म्यमिदम् सर्वम्। इसी तरह विभिन्न गुणों, जैसे सुख-दुख से सम्पन्न प्रत्येक जीव भी एक दूसरे से सदैव भिन्न रहता है।

विष्णुदासाचार्य ने वादावली के तीसरे परिच्छेद में अद्वैतवेदान्त के ब्रह्माज्ञानवाद का खण्डन यह कह कर किया कि अज्ञान केवल जीव में हो सकता है जो उसे ब्रह्म को जानने नहीं देता। अज्ञान ब्रह्म में नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त यदि ब्रा से भिन्न सब कछ अध्यास है तो फिर ब्रह्माच्छादिका अविद्या भी अध्यास ही है। यदि ऐसा नहीं है तो अविद्या सत्य होगी और ब्रह्म अद्वैत नहीं होगा। यदि यह कहा जाए कि एक अन्य अविद्या है जो इसी अविद्या का कारण है तो इसमें अनवस्था-दोष होगा। पुनश्च, यदि अध्यास अज्ञानजनित है, जैसा कि अद्वैती कहते हैं, तो अज्ञान अध्यास पर कैसे निर्भर होगा। इसमें चकक दोष होगा। साथ ही प्रश्न उठता है कि अज्ञान सीमित है या सर्वव्यापी? याद यह सर्वव्यापी है तो यह आत्मा की तरह अमर होगा। यदि इसकी सत्ता है तो इस पर निर्भर. सभी पदार्थ सत्य होंगे और यदि यह असत्य है तो यह आत्माच्छादक अध्यास है। यदि यह स्वाभाविक है तो इसका कभी नाश नहीं हो सकता और यदि इसका अन्य कोई कारण है तो वह कारण क्या है? अकर्मण्य होने से आत्मा इसका कारण नहीं है। फिर अविद्या स्वप्रकाशिका है या नहीं? यदि नहीं है, तो यह मात्र कल्पना है और यदि है तो यह ब्रह्म की तरह नित्य होगी और इसकी निवृत्ति नहीं हो सकती। अविद्या को जानता कौन है? शुद्ध आत्मा इसका ज्ञाता नहीं हो सकता, क्योंकि अद्वैतियों के अनुसार शुद्ध आत्मा प्रमाता नहीं है। सोपाधिक आत्मा को अविद्या का ज्ञाता मानने में चक्रक दोष है, क्योंकि ज्ञाता की

किया को अविद्याजनित कहा गया है।

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वेदान्त-खण्ड

स इस ग्रन्थ में विष्णुदास ने चित्सुख के भावरूप अज्ञान, वाचस्पति के जीवाश्रित अज्ञान और मण्डन के ब्रह्माश्रित अज्ञान का खण्डन किया है। इसी तरह अद्वैतियों के एकजीववाद, अज्ञानवाद, बहुजीवाज्ञानवाद, अधिकारी विषय आदि, आदि मतों का खण्डन किया है। साथ ही ईश्वर के अवतार की अवधारणा के विपक्ष में दिए गये तकों का उत्तर दिया है।

इसी ग्रन्थ में निर्गुण ब्रह्म की अवधारणा का खण्डन कर विष्णुदास ने सगुण ब्रह्म की प्रतिष्ठापना की है। अद्वैती ब्रह्म को निर्गुण कहते हैं। नैयायिक ईश्वर के गुणों को आकस्मिक बताते हैं। भास्कर के अनुसार ब्रह्म में कुछ गुण स्वाभाविक और कुछ आकस्मिक हैं। रामानुज के अनुसार ब्रह्म के कुछ गुण धर्मीस्वरूप और कुछ अधर्मीस्वरूप हैं। इन चारों मतों की आलोचना करके विष्णुदास ने कहा है कि ईश्वर सगुण है और उसके गुण स्वाभाविक हैं। ‘उक्त्वा धर्मान् पृथक् पश्यन्ति वेद्यात् एव हि। विशेषो ज्ञायते श्रुत्या’ । अणुभाष्य)। ब्रह्मसूत्र में भी यही कहा गया है -‘अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः’ (१-२-२१)

और ‘अनन्यभावव्यावृत्तेश्च’ । (१-३-१२)।

विष्णुदास ने तर्क दिया है कि सगुणविद्या निर्गुणविद्या से श्रेष्ठ है। सगुणविद्या निर्गुणविद्या के पूर्व आती है तो उससे इसका खण्डन नहीं हो सकता। सगुणविद्या निर्दोष है और इसकी अन्यथा व्याख्या नहीं हो सकती। यह निर्गुणविद्या का उपजीव्य है और इसकी वैधता अबाधित है। इसका उपयोग विशिष्ट अर्थ में होता है और इसमें किसी प्रकार का सन्देह नहीं है। निर्गुण-श्रुतियाँ सन्दिग्ध हैं। उनकी अनेक ढंग से व्याख्या हो सकती है। वे सगुण-श्रुतियों पर आधृत होती हैं। अतः निर्गुण-श्रुतियों की व्याख्या सगुण-श्रुतियों के अनुरूप होनी चाहिये। वे ईश्वर के केवल भौतिक गुणों का निषेध करती हैं। वस्तुतः किसी भी गुण का पूर्णतः निषेध हो ही नहीं सकता। उदाहरणार्थ, ‘एको देवः सर्वभूतेषु गूढः - निर्गुणश्च’ में प्रथम भाग अधिक महत्त्वपूर्ण है। एकत्व, देवत्व आदि ईश्वर के गुण है। ‘निर्गुणश्च’ केवल तीन मौलिक गुणों (त्रैगुण्य) का निषेध करता है। जब निर्गुण श्रुतियों का प्रयोग सामान्यरूप से होता है, तब वे विशेष गुणों का निषेध नहीं करतीं। वस्तुतः ईश्वर को निर्गुण कहना उसे सगुण कहना है। “सत्यम् ज्ञानम्” आदि की व्याख्या यह कहकर करना, जैसा अद्वैती करते हैं, कि ब्रह्म असत्य नहीं है, या अज्ञानी नहीं है, वाक्यार्थ का अनर्थ करना है। सगुण-श्रुतियाँ निर्गुण-श्रुतियों के सामान्य अर्थ का अपवाद बताती हैं। अपवाद सामान्य कथन को सीमित करते हैं- ‘अपवादैरुत्सर्गा बाध्यन्ते । सामान्य निषेधात्मक कथन की व्याख्या विशिष्ट अर्थवाले कथनों के अनुरूप होनी चाहिए। ‘सामान्यविहितस्य निषेधस्य विशेषविधायकेन बाधो युक्तः।।

मा इन सबके आधार पर विष्णुदास सिद्ध करते हैं कि ब्रह्म निर्गुण नहीं है। उसमें अनेक शुभ गुण हैं, जो नित्य, स्वाभाविक, अनन्त और निस्सीम हैं। ये गुण माया के अध्यास नहीं हैं। ब्रह्म सविशेष या सगुण है।

मध्वोत्तर द्वैत-वेदान्त का विकास

३८७ ब्रह्म को सविशेष या सगुण कहने के विरोध में सभी संभाव्य आपत्तियों का उत्तर भी विष्णुदास ने दिया है। इस सन्दर्भ में उन्होंने द्रव्य और गुण के सम्बन्ध का बड़ा अच्छा विवेचन किया है। यदि गुण और ब्रह्म में तादात्म्य है तो या तो ब्रह्म अनेक होगा या फिर गुणों की अनेकता समाप्त हो जाएगी। किन्तु चूँकि गुण अनेक हैं और ब्रह्म एक है, उनमें तादात्म्य नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त दो पदार्थों में तब तक कोई सम्बन्ध नहीं हो सकता जब तक कि वे एक दूसरे से भिन्न न हों। और कोई पदार्थ बिना गुणों के स्वतः विशिष्ट नहीं होता। न हि स्वेनैव तद्वान्। गुण द्रव्य नहीं होते और ब्रह्म मात्र गुणों का समवाय नहीं है। यदि ब्रह्म मात्र गुण है तो वह द्रष्टा, ज्ञाता नहीं हो सकता।

विष्णुदास कहते हैं कि द्रव्य-गुण के सम्बन्ध पर अद्वैतियों ने जो आपत्तियाँ उठाई हैं, वे मध्च के सविशेष भेद पर लाग नहीं होती। सविशेष भेद न्याय-वैशेषिक के समवाय और कुमारिल के भेदाभेद के अनुरूप है। ध्वनि और ध्वान जैसे पदों में निर्विशेषाभेद होता है, इसलिए उनमें तादात्म्य होता है। किन्तु मिट्टी और घड़े, अश और अंशी, के बीच सविशेषभेद होता है, अतः इनमें तादात्म्य सम्बन्ध नहीं हो सकता। विशेष भेद का प्रतिनिधित्व करता है और भेद न करते हुए भी भेद का काम करता है। गुणों की अनेकता और भेद को बनाये रखते हुए, समवाय की तरह यह स्वशासित रहता है। इसमें समवाय और भेद समाहित हैं और दोनों के दोषों से यह मुक्त है। द्रव्य और गुणों को अलग करते हए भी यह उन्हें परस्पर सम्बद्ध करता है। “इदम रजतम” में उददेश्य और विधेय एक-दूसरे के पर्याय नहीं है, यद्यपि उनमें तादात्म्य है। इसी तरह ब्रह्म और उसके गुणों में तादात्म्य होते हुए भी उन्हें एक दूसरे का पर्याय नहीं माना जा सकता, क्योंकि “विशेष” उन्हें अलग करता है। “विशेष” प्रत्येक द्रव्य में होता है और तादात्म्य एवं भेद के बीच सेतु का कार्य करता है।

_ विशेष के माध्यम से अखण्डार्थ का भी खण्डन हो जाता है और ब्रह्म का सविशेष एवं अनन्त शुभगुणों से सम्पन्न होना सिद्ध होता है। विशेष का लक्षण विष्णुदास ने निम्न श्लोक में किया है

यत्राभेदश्च भेदव्यवहृतिरुभयं वस्तुनो मानसिद्धं TAAR तत्र श्रुत्यानुभूत्यास्ति गुणगुणिनो र्दीपदीप्त्योर्विशेषः। अंगीकार्यश्च भेदप्रतिनिधिरखिलैरन्ततो दुस्त्यजोऽयं

नो चेद् बाधोऽनवस्था स्ववचनविहतिः स्यात् स्वनिर्वाहकोऽयम् ।। विशेष स्वनिर्वाह है। वह भेद-प्रतिनिधि है तथा श्रुति, अनुभूति और अनुमान से सिद्ध३८८

वेदान्त-खण्ड

विष्णुदास ने ‘वादरत्नावली’ में बौद्धों, चार्वाकों आदि द्वारा की गयी वेदों की वैधता पर आपत्तियों का प्रबल उत्तर दिया है और नैयायिकों की आलोचना करते हुए कहा है कि वेद अपौरुषेय हैं। ज्ञान के स्वतः प्रामाण्य और साक्षी-प्रत्यक्ष की वैधता के लिए भी इन्होंने अनेक तर्क दिए हैं।

४. व्यासतीर्थ (१४६०-१५३६)

व्यास राजा स्वामिन् या व्यासतीर्थ का जन्म मैसूर के पास बन्नूर गाँव में सन् १४६० में हुआ था। इनके पिता काश्यप गोत्री रलण्णा सुमति और माँ अकम्मा थी। इनका बचपन का नाम यतिराज था। ब्रह्मण्यतीर्थ से संन्यास-दीक्षा लेकर इन्होंने काँची तथा मूलवागल में भारतीय दर्शन की विभिन्न प्रणालियों का गहन अध्ययन किया। विजयनगर के राजा चन्द्रगिरि ने इनका सम्मान किया। इन्होंने तिरुपति में १२ वर्ष तक पूजा की। इन्होंने अनेक विद्वानों को शास्त्रार्थ में पराजित किया। कृष्णदेव राय ने इन्हें विजयनगर में कुलदेवतार्क के रूप में सम्मान दिया। यहीं पर इन्होंने आठ मार्च सन् १५३६ में देह त्याग किया। _माध्ववेदान्त के मुनित्रय में ये तीसरे महान् मुनि हैं। दर्शन, धर्मशास्त्र, तर्कशास्त्र में निष्णात व्यासतीर्थ ने संस्कृत और कन्नड़ में भी भक्तिगीत लिखे हैं। दासकूट के पुरन्दरदास

और कनकदास इनके शिष्य थे जिन्होंने वैष्णवधर्म को घर-घर पहुंचाया। संस्कृत में इन्होंने कुल नौ ग्रन्थ लिखे जिनमें तीन दार्शनिक दृष्टि से अत्यन्त महत्त्वपूर्ण हैं। न्यायामृत, तर्कताण्डव और तात्पर्यचन्द्रिका। भेदोज्जीवन, खण्डनत्रय और तत्त्वविवेक पर टीकायें तथा ग्रन्थमालिकास्तोत्र आदि लघुग्रन्थ इनकी अन्य रचनाएं हैं।

न्यायामृत व्यासतीर्थ की सर्वश्रेष्ठ कृति है। इस पर कम से कम १० टीकाएं हैं। इसने एक ओर नव्य अद्वैतवेदान्त के उन्नयन में ऐतिहासिक भूमिका अदा की तो दूसरी ओर नव्य माध्ववेदान्त की भी अवतारणा की। इसमें चार अध्याय (परिच्छेद) हैं। प्रथम अध्याय में यथार्थवादी तत्वमीमांसा के पक्ष में तर्क हैं। अद्वैत के अनेक सिद्धान्तों जैसे संसार का मिथ्यात्व, असत, सत्ता की श्रेणी-बद्धता, अध्यास, अनिर्वचनीयत्व आदि की समीक्षा है। मिथ्यात्व के चार हेतुओं का प्रबल खण्डन है। प्रत्यक्ष की वैधता और अनुमान एवं आगम से उसकी श्रेष्ठता सिद्ध की गयी है और वाचस्पति द्वारा मीमांसा के “अवच्छेदन्याय" के प्रयोग की आलोचना है। जिन

दृष्टि-सृष्टिवाद, एकजीवाज्ञानवाद, भावरूपाज्ञान और भामती एवं विवरण के सभी मतों का परीक्षण और खण्डन किया गया है।

न्यायामृत के दूसरे अध्याय में अखण्डार्थ से लेकर ब्रह्म के निर्गुणत्व, निराकारत्व, स्वप्नकाशत्व और अवाच्यत्व तक का खण्डन है। इन सभी की व्याख्या व्यासतीर्थ ने सेश्वरवाद द्वारा की है। उनके अनुसार भेद कथ्य, ज्ञेय और सत्य है। पंचभेदों का समर्थन

मथ्वोत्तर द्वैत-वेदान्त का विकास

३६६ प्रमाण से करते हुए व्यासतीर्थ ने कहा है कि अद्वैती व्याख्या में ब्रह्म उपादान और निमित्त कारण नहीं हो सकता। ऐक्य-सिद्धान्त को असम्भव बता कर यहाँ उन्होंने आत्मा के अणुस्वरूप का प्रतिपादन किया है।

की तृतीय अध्याय में व्यासतीर्थ ने श्रवण, मनन, धार्मिकशिक्षा, श्रुतिशिक्षा, आत्मानुशासन आदि साधनों का विचार किया है। अन्तिम अध्याय में मध्वाचार्य की मुक्ति-विषयक अवधारणा को विस्तार दिया है। मोक्ष की अन्य साम्प्रदायिक अवधारणाओं की आलोचना करते हुए कहा है कि मोक्ष को मात्र अविद्या का अन्त कहना श्रुत्यर्थ की उपेक्षा करना है। अद्वैत का निर्गुण आनन्द मानव को मोक्ष के लिए प्रेरित नहीं करता। विशिष्टाद्वैत की मोक्ष-अवधारणा के विपरीत व्यासतीर्थ ने मोक्ष की कमबद्धता को स्वीकार किया है।

अपने समय तक उपलब्ध सभी पक्ष-विपक्ष मतों का व्यासतीर्थ ने परीक्षण किया और मध्व, जयतीर्थ एवं विष्णुदास के सैद्धान्तिक मतों को तार्किक आधार तथा विस्तार दिया। अद्वैत की असत्यता की पाँच परिभाषाओं को त्रुटिपूर्ण बताते हुए, चित्सुख, आनन्दबोध आदि के दृश्यत्व, जड़त्व, हेतुओं में परस्पर विरोध दिखाकर खण्डन किया। इन्होंने पूछा कि क्या जगत् पूर्णतः असत्य है (स्वरूपेण निषेधप्रतियोगि) या केवल पारमार्थिक रूप से असत्य है (पारमार्थिकत्वाकारेण वा)? प्रथम अवस्था में अद्वैती बौद्ध के शून्यवाद को ग्रहण करेंगे

और उनके द्वारा किया गया सत्ता का व्यावहारिक और पारमार्थिक में भेद निरर्थक हो जाएगा। द्वितीय विकल्प अनुचित है क्योंकि उपरोक्त भेद असिद्ध है। अद्वैतसिद्धि में जगत् को पूर्णतः असत्य कहा गया है। ‘स्वरूपेण त्रैकालिकनिषेध-प्रतियोगित्वस्य प्रपंचे शुक्तिरूपे चांगीकारात्’ । इस सन्दर्भ में मिथ्यात्व भी पूर्णतः असत्य हो जाएगा। ‘स्वरूपेण त्रैकालिकनिषेध प्रतियोगित्वे, अत्यन्तासत्वापातात’। अद्वैत की अन्य परिभाषाओं में भी यही परिणाम निकलेगा। ‘इति पक्षत्रयेऽत्यन्तासत्वं स्यादनिवारितम्’। इससे अद्वैत के इस मत से भी विरोध है कि भ्रम में असत्य उपस्थित रहता है और सत्य का निषेध रहता है।

व्यासतीर्थ न केवल एक नवीन तर्कविद्या के प्रणेता हैं, अपि तु द्वैत-अद्वैत के उस नवीन वाद-विवाद के जनक भी हैं जो विगत तीन शताब्दियों तक चलता रहा। न्यायामृत का उत्तर मधुसूदन सरस्वती ने अपनी अद्वैतसिद्धि में दिया जिसका प्रत्युत्तर रामाचार्य ने तरंगिणी में प्रस्तुत किया। इसकी आलोचना गौड ब्रह्मानन्द सरस्वती ने की जिसका उत्तर वनमाली मिश्र ने दिया। न्यायामृत की मौलिकता का उल्लेख स्वयं व्यासतीर्थ निम्न प्रकार से करते हैं -

विक्षिप्तसंग्रहात्क्वापि क्वाप्युक्तस्योपपादनात्। अनुक्तकथनात्क्वापि सफलोऽयं मम श्रमः ।।

३E0

वेदान्त-खण्ड

न्यायामृत का महत्त्व इसी से आँका जा सकता है कि इस पर १० टीकाएं हैं। व्यासतीर्थ ने प्रतिकर्मव्यवस्था, कर्तृत्वाध्यास, दृष्टिसृष्टिवाद, देहात्मैक्याध्यास, भ्रम का ज्ञानद्वयात्मकत्व, सत्तात्रैविध्य, बिम्ब-प्रतिबिम्बैक्य, शब्दापरोक्षवाद, जीवन्मुक्ति, मुक्ति में परम साम्य, प्रपत्ति आदि अवधारणाओं की समीक्षा की है। न्यायकुसुमांजलि, आत्मतत्त्वविवेक, पदमंजरी, भारतीतीर्थ, शांकरभाष्य, सुरेश्वर के बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्यवार्तिक, इष्टसिद्धि, महाभाष्य, खण्डनखण्डखाद्य, माध्यमिककारिका, न्यासनयविवेक, आनन्दबोध, सिद्धित्रय, टुप्टीका, चित्सुखी, उपदेशसाहस्री, वेदान्तकौमुदी, विवरण आदि के मतों का सम्यक् परीक्षण द्वैतमत को सम्पुष्ट करने के उद्देश्य से उन्होंने किया है।

तात्पर्यचन्द्रिका व्यासतीर्थ का दूसरा महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है जो जयतीर्थ की तत्त्वप्रकाशिका की टीका है। वस्तुतः इसमें ब्रह्मसूत्र के शंकर, रामानुज और मध्व के भाष्यों, भामती, पंचपादिका, विवरण, कल्पतरू, श्रुतिप्रकाशिका, अधिकरणसारावली, तत्त्वप्रकाशिका और न्यायसूत्र में प्रस्तुत सिद्धातों का तुलनात्मक, समीक्षात्मक और मौलिक अध्ययन किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य माध्वभाष्य का समर्थन और अन्य भाष्यों का खण्डन करना है। इसके लिए व्याकरण और पूर्वमीमांसा के नियमों और नये तर्कों का प्रचुर प्रयोग है। उनका वचन है-‘सूत्रे भाष्ये ऽनुभाष्ये च सन्यायविकतौ तथा। टीकासु च यदस्पष्टं तच्च स्पष्टीकरिष्यते।’ चन्द्रिका तत्त्वप्रकाशिका पर न केवल सर्वप्रथम टीका है, अपितु अब तक इसकी सबसे अधिक प्रामाणिक और विद्वतापूर्ण टीका है। यह मध्व के सूत्र-प्रस्थान पर द्वैतदर्शन का अन्तिम निर्णय है।

इस ग्रन्थ में यह दिखाया गया है कि माध्वभाष्य पूर्वमीमांसा और व्याकरण के नियमों का उल्लंघन नहीं करता। इसमें कैय्यट, पंचपादिका, भास्कर, यादव प्रकाश, न्यास, कल्पतरू, महाभाष्यनिबन्धन, पदमंजरी, पंचपादिका, भामती, ऋग्वेदानुक्रम, कात्यायन, तंत्रसारसंग्रह, विवरण, श्लोकवार्तिक, शारीरकभाष्य और श्रीभाष्य का परीक्षण किया गया

तर्कताण्डव में व्यासतीर्थ ने द्वैत और न्यायवैशेषिक के मतभेद को दर्शात हुए, उदयन की कुसुमांजलि, गंगेश की तत्त्वचिन्तामणि और पक्षधर, प्रगल्भ मिश्र एवं यज्ञपति आदि की आलोचना की है। मध्व द्वारा मान्य तीन प्रमाणों के अनसार इस पस्तक में तीन अध्याय हैं, जिनमें प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम पर विशद विचार किया गया है। प्रामाण्यवाद, वेदापौरुषेयत्ववाद, ईश्वरवाद, समवायवाद, निर्विकल्पकवाद, शक्ति, जाति, विधि, अपूर्व, वेदवाक्य, शब्दों की अर्थात्मकशक्ति, संयुक्ताक्षर, अभाव, तात्पर्यलिंग, श्रुतिलिंग, वाक्य आदि की समीक्षा कर द्वैतदृष्टिकोण का समर्थन किया है। व्याप्ति, पक्षता, उपाधि, परामर्श, तर्क, अनुमान, तर्कामास आदि पर विपक्ष की आलोचना की है। इसके अनुसार संयुक्त कथनों में उपसंहार उपक्रम या प्रारंभिक कथन की अपेक्षा श्रेष्ठ होता है। “एवं सर्वत्र,

मध्वोत्तर द्वैत-वेदान्त का विकास लिङ्गाच्युतेरिख, उपक्रमादुपसंहारस्य उत्सर्गतो बाधकाभावे बलवत्तममूह्यम्’ । इस आधार पर पूर्वमीमांसा के विभिन्न अधिकरणों की व्याख्या को अमान्य किया गया है। तर्कताण्डव की रचना से जिन नैयायिकों ने व्यासतीर्थ की प्रशंसा उनके न्यायामृत के कारण की थी उन्होंने उनकी भर्त्सना की

न्यायामृतार्जिता कीर्तिस्ताण्डवेन विनाशिता।” इसके पूर्व उन्होंने व्यासतीर्थ की प्रशंसा यों की थीं -

यदधीतं तदधीतं यदनधीतं तदप्यधीतम्।

पक्षधरविपक्षो नावेक्षि विना नवीनव्यासेन ।। व्यासतीर्थ के बारे में नैयायिकों की सम्मति में यह जो परिवर्तन हुआ उसका कारण है तर्कताण्डव में न्याय-वैशेषिक का खण्डन । अतः यह ध्यातव्य है कि व्यासतीर्थ ने जो नव्य माध्ववेदान्त चलाया वह नव्यन्याय से भिन्न है। उसमें अनुमान की अपेक्षा श्रुतिप्रमाण पर अधिक बल है। वह वेद को अक्षरशः अपौरुषेय मानता है, नैयायिकों की तरह उसे पौरुषेय नहीं कहता।

मंदारमंजरी में व्यासतीर्थ ने मध्व के दस प्रकरणों में से चार की टीका लिखी है। इसमें सत्ताशास्त्र की विभिन्न अवधारणाओं का, जिन्हें अद्वैतियों ने अपनाया था, खण्डन किया गया है, जैसे मायावाद, उपाधि, प्रपंचमिथ्यात्वानुमान। साथ ही मध्व के तत्त्वविवेक में दिए गये सिद्धान्तों का तार्किक समर्थन किया गया है।

भेदोज्जीवन व्यासतीर्थ का अन्तिम ग्रन्थ है जिसमें भेद की संकल्पना के पक्ष में तर्क दिया गया है। प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम तीनों प्रमाण भेद की प्रतिष्ठापना करते हैं। वे

भेद को धर्म नहीं, अपितु धीं मानते हैं।

अद्वैतवादी नृसिंहाश्रम ने भेदोज्जीवन का खण्डन भेदधिक्कार में किया है। व्यासतीर्थ के शिष्य विजयीन्द्र ने भेदधिक्कार का खण्डन भेदविद्याविलास में किया है। व्यासतीर्थ और विजयीन्द्र के अनुसार भेद का जो खण्डन अद्वैतवादी करते हैं वह अन्योन्याभाव, वैधर्म्य

और पृथक्त्व का खण्डन है। किन्तु ये सब धर्मरूप भेद है अर्थात् इस खण्डन में भेद को धर्म या गुण माना जाता है। व्यासतीर्थ भेद को धर्मी कहते हैं। चित्सुख आदि प्राचीन वेदान्ती तथा नृसिंहाश्रम आदि नवीन वेदान्ती धर्मिरूप भेद का खण्डन नहीं करते हैं। इसके साथ ही शंकर और रामानुज द्वारा की गयी ब्रह्मसूत्र की पादव्यवस्था की आलोचना कर मध्व का समर्थन व्यासतीर्थ ने किया है। उन्होंने सत्ता की परिभाषा दी कि सत्ता वह है जो सामान्य अनुभव का विरोध नहीं करती। उन्होंने कहा कि यदि ब्रह्म अवाच्य है तो जगत् भी अपरिभाष्य होगा। ‘सत्वानिर्वचनेऽपि तद्वदेव स्वरूपपारमार्योपपत्तेः’। यदि ब्रह्म की सत्ता असत् से भिन्न और निरुपाधिक है तो जगत् की सत्ता भी ऐसी ही है। ब्रह्म की सत्ता को

३६२

वेदान्त-खण्ड

अपरिच्छिन्न या असीमित कहने में अतिव्याप्ति का दोष है। शुक्ति में अध्यस्त रजत यद्यपि सीमित है तो भी वह असत् या अभाव नहीं है और बौद्धों का शून्य और शशशंग असीमित होते हुए भी सत्तात्मक नहीं हैं। अतः सत्ता को कालादि की सीमा से रहित कह कर परिभाषित करना व्यर्थ है। व्यासतीर्थ के अनुसार सत्ता वह है जो त्रिकाल और सर्वदेश के निषेध की प्रतियोगी न हो। ‘त्रिकालसर्वदेशीयनिषेधाप्रतियोगिता सत्तोच्यते’ । देशकालसम्बंधित्व सत्ता का लक्षण है। अभावात्मक पदार्थ, जैसे वंध्यापुत्र, किसी भी देश या काल में नहीं पाये जाते। साक्षी प्रत्यक्ष सत्ता और उसके अभाव को जानने में पूर्ण सक्षम है।

इसी तरह व्यासातीर्थ ने मिथ्यात्व की अवधारणा का विश्लेषण और निषेध किया है। वे मिथ्यात्व के विभिन्न अर्थों के परीक्षण से सिद्ध करते हैं कि अद्वैतियों के मिथ्यात्व की अवधारणा और अभाव की अवधारणा में कोई अन्तर नहीं है। यह कहना व्यर्थ है कि अभाव की कल्पना नहीं की जा सकती, जबकि मिथ्या की कल्पना हो सकती है। वस्तुतः यदि अभाव की कल्पना नहीं होती तो हम इसके बारे में कुछ कह भी नहीं सकते। ‘न च निरुपाख्यत्वमेव तेषामसत्वं, निरुपाख्यत्वेनैव ख्यामानत्वात्’। यह कहना भी व्यर्थ है कि असत् को प्रस्तुत नहीं किया जा सकता, क्योंकि यदि ऐसा होता तो अद्वैती उसका भेद जगत से कैसे जानते? यह कहना भी व्यर्थ है कि असत का प्रत्यक्ष नहीं होता क्योंकि प्रत्यक्ष नित्यपदार्थ का भी नहीं होता। “नित्यातीन्द्रियेऽपि सत्त्वात् । साथ ही, यह नहीं कह सकते कि असत्ता में कोई गुण नहीं होते। ऐसे अनेक तर्कों से व्यासतीर्थ दिखाते हैं कि असत्ता

और मित्यात्व एक ही हैं। ‘तरमात् सर्वत्र त्रैकालिकनिषेधप्रतियोगित्वमेव असत्त्वम् । तदेव च मिथ्यात्वम्’। जिस अर्थ में ब्रह्म सत्य है उसी अर्थ में जगत् भी सत्य है।

विशेष की अवधारणा द्वैतदर्शन में महत्त्वपूर्ण है। उससे द्रव्य और गुण के अन्तर को स्पष्ट किया जाता है। व्यासतीर्थ द्रव्य-गुण के सम्बन्ध को भेद में तादात्म्य या सविशेषभेद की संज्ञा देते हैं। पूर्णभेद, पूर्णतादात्म्य, समवाय, भेदाभेद आदि इनके अनुसार द्रव्य-गुण के सम्बन्ध नहीं है। विशेष द्रव्य की वह शक्ति है जो द्रव्य को गुण से और एक गुण को दूसरे गुण से अलग करती है तथा साथ ही द्रव्य की इकाई को भी बनाये रखती है। विशेष के माध्यम से ही एकता में अनेकता और अनेकता में एकता की प्रतिष्ठापना होती है। “विज्ञानमानन्दम्’ में विज्ञान और आनन्द ब्रह्म के दो भिन्न-भिन्न गुण हैं और दोनों ब्रह्म से भिन्न हैं। इनमें किसी प्रकार का तादात्म्य नहीं है। __इसी तरह ‘तत्त्वमसि’ की व्याख्या बिना विशेष के नहीं हो सकती। विशेष का प्रत्यक्ष भी होता है। जैसे शक्लः पटः अयम घटः आदि। तादात्म्य का कथन भी भेदाश्रित है। अन्यथा वह पुनरुक्ति है। पट सफेद है, इसमें यह निहितार्थ है कि पट और सफेद भिन्न है। यह भिन्नता पट में उपस्थित विशेष के कारण है जो भेद का कार्य और उसका प्रतिनिधित्व करता है। विशेष और साक्षी प्रत्यक्ष के आधार पर अभेद श्रुतियों की जो

मध्वोत्तर द्वैत-वेदान्त का विकास

३E३ व्यवस्था द्वैती करते हैं, व्यासतीर्थ उसका पूर्ण समर्थन करते हैं और जहाँ ऐसा नहीं हो सकता वहाँ वे अभेद-श्रुतियों को गौण या प्रतीकात्मक मानते हैं।

मनुष्य और ब्रह्म के भिन्न-भिन्न गुणों के कारण इनमें ऐक्य नहीं हो सकता। ‘विशिष्टयोरतत्त्वं पदवाच्ययो क्यम्’। इन भेदों की उपेक्षा करके दोनों के चिन्मात्रैक्य की जो व्यवस्था अद्वैती करते हैं वह व्यासतीर्थ को अमान्य है। सभी गुणों से ब्रह्मको शून्य करके ‘सर्वं खल्विदम् ब्रह्म’ आदि की जो व्याख्या अद्वैती करते हैं वह मात्र बकवास है। यदि जीवों की अपूर्णता केवल मुक्ति के पूर्व होती है, तो ‘तत्त्वमसि’ की जगह ‘तत्त्वम् भविष्यसि’ होता। गुणों और भेद को असत् या अध्यास मानकर व्याख्या करना भी व्यर्थ है क्योंकि गुण और भेद का न केवल साक्षी प्रत्यक्ष होता है, अपितु श्रुतियाँ भी इन्हें स्वीकारती हैं। ‘निर्दोष श्रुतिसाक्षिसिद्धयोंविरुद्धधर्मयोमिथ्यात्वायोगात्’। जीव और ब्रह्म में उपजीव्य और उपजीवक का सम्बन्ध है। जीव ब्रह्म से भिन्न है और उस पर आश्रित है। इसे अभेदवाक्य की कोई भी व्याख्या अवैध नहीं कर सकता।

उपजीव्य प्रमाण को अनुमान या श्रुतियों से अवैध नहीं बनाया जा सकता। अभेद-श्रुतियों का उपजीव्य प्रमाण के साथ विरोध होने के कारण द्वैती उनकी व्याख्या के लिए पूर्वमीमांसा के लक्षणार्थ नियम का प्रयोग करते हैं, जबकि अद्वैती जहदजहल्लक्षणा का प्रयोग करते हैं। व्यासतीर्थ कहते हैं कि अद्वैती व्याख्या में ‘तत्’ और ‘त्वम्’ के विशेष गुणों की उपेक्षा से तोड़मरोड़ आ जाता है। इसमें दोनों पदों पर लक्षणा का प्रयोग करना पड़ता है। इसके विपरीत द्वैती व्याख्या में तोड़मरोड़ नहीं है। पुनश्च, लक्षणा का प्रयोग एक समय केवल एक पद पर ही होता है। भाषा का सामान्य अर्थ जब उसके निहितार्थ को स्पष्ट न कर सके तभी व्याकरण, या लक्षणा का प्रयोग होना चाहिए और साथ ही इनका कम से कम प्रयोग होना चाहिए। ‘तत्’ पर पाँच बार और ‘त्वम्’ पर दो बार लक्षणा का प्रयोग कर इस महावाक्य की व्याख्या व्यासतीर्थ करते हैं। कुछ व्याख्यायें वे बिना लक्षणा के प्रयोग से सिर्फ व्याकरण के माध्यम से करते हैं। इन सभी से वे यह सिद्ध करते हैं कि जीव ब्रह्म पर आश्रित है, परन्तु वह उससे भिन्न है। वे कहते हैं कि ‘तत्त्वमसि’ का प्रयोग श्रुतियों में कुल नौ बार हुआ है और सभी में दोनों पदों की भिन्नता ही निर्दिष्ट है। इस

तर्कविद्या में पारंगत व्यासतीर्थ सम्पूर्ण भारतीय दर्शन में निष्णात थे। मध्व, जयतीर्थ, विष्णुदास के द्वारा स्थापित द्वैतदर्शन को इन्होंने मौलिक तर्कों से मण्डित किया और उस समय तक उपलब्ध सभी विपक्षी मतों का तर्कसंगत खण्डन किया। न्याय, पूर्वमीमांसा तथा व्याकरण, निरुक्त, अनुक्रमणिका, निबन्ध, आदि के नियमों का प्रयोग किया तथा बौद्धों, श्रीहर्ष, उदयन, चित्सुख आदि के तर्कों में परस्पर विरोधाभास और दोष निकालकर उनके मतों का खण्डन किया।

दर्शन, तर्कशास्त्र, ज्ञानमीमांसा आदि के साथ इन्होंने अपने सम्प्रदाय के धार्मिक जीवन

वेदान्त-खण्ड

में भी महान योगदान किया। संस्कृत और कन्नड़ भाषा में लिखे अपने भजनों, गीतों और स्तोत्रों से इन्होंने दासों के माध्यम से कर्नाटक संगीत की नींव डाली तथा वैष्णवमत का प्रचार-प्रसार किया। इसीलिए इन्हें द्वैतदर्शन के तीन महान विभूतियों में चिन्तामणि कहा जाता है

श्रीमध्वः कल्पवृक्षस्तु जयायः कामधुक् स्मृतः। चिन्तामणिस्तु व्यासार्यः मुनित्रयमुदीरितः।।

५. अन्य विचारक

द्वैतमत का प्रवाह अविरल गति से चलता रहा है। किन्तु जयतीर्थ, विष्णुदास और व्यासतीर्थ के जोड़ का कोई दूसरा दार्शनिक बाद में पैदा नहीं हुआ।

परवर्ती काल में अनेक आचार्य हुए हैं जिनकी कुछ रचनाएं प्रसिद्ध हैं। उनमें भी विशेष महत्त्वपूर्ण हैं विजयीन्द्रतीर्थ और वादिराज। (१) विजयीन्द्रतीर्थ (१५१४-१५६५) व्यासतीर्थ के शिष्य थे। विपक्षियों के उत्तर में अनेक ग्रन्थ लिखकर उन्होंने द्वैतवाद को पुष्ट किया। वे मद्रास के पास कुम्मकोणम् में रहते थे और छोटे बड़े १०४ ग्रन्थों की रचना की। दस प्रकरणों, माध्वभाष्य, न्यायविवरण, अणुभाष्य, अनुव्याख्यान और तत्त्वप्रकाशिका पर उनकी टीकायें है। मध्वतंत्रन्यायमंजरी, गीताप्रस्थान पर प्रमेयदीपिका और न्यायदीपिका तथा दस उपनिषदों पर भाष्य भी उन्होंने लिखे हैं। लघु-आमोद, न्यायमौक्तिकमाला, युक्तिरत्नाकर, प्रमाणपद्धति, अधिकरणमाला, चन्द्रिको दाहृतन्यायविवरण, अप्पयकपोलचपेटिका, मध्वाध्वकप्टकोद्वार, चक्रमीमांसा, मेदविद्याविलास, न्यायमुकुर, परतत्त्वप्रकाशिका, न्यायसंग्रह, सिद्धान्तसारासारबिवेक, आनन्दतारतम्य वादार्थ, न्यायाध्वदीपिका, श्रुतितात्पर्यकौमुदी, उपसंहारविजय, न्यायपंचकमाला वागवैखरी, नारायणशब्दार्थनिर्वचन प्रणवदर्पण, खण्डनपिष्टपशुमीमांसा, कुचौद्यकुटार, अद्वैतशिक्षा, शैवसर्वस्वखण्डन, श्रुत्यर्थसार आदि उनके अन्य ग्रन्थ है। उन्होंने तीन नाटक भी लिखे हैं। वास्तव में विजयीन्द्र ने व्यासतीर्थ की आलोचना-पद्धति को अग्रसर किया। उन्होंने न केवल अद्वैतवाद का खण्डन किया, अपि तु विशिष्टाद्वैतवाद और श्रीकंठभाष्य तथा वीरशैवमत का भी खण्डन किया। सिद्धान्तसारासरविवेक में रामानुजमत का खण्डन है। कुम्भकोणम् ताताचार्य ने विजयीन्द्रपराजय में उसका प्रतिवाद किया है। उपसंहारविजय अप्पय दीक्षित के उपक्रमपराक्रम का प्रतिवाद है। व्याख्यानव्याख्येयभाव में उपसंहार-प्राबल्य सिद्ध है, क्योंकि उपसंहार उपक्रम के अर्थ का तर्कसंगत विस्तार है।

(२) वादिराज (१४८०-१६००) तुलू ब्राह्मण रामाचार्य के पुत्र थे और दक्षिण कैनरा के निवासी थे। इन्होंने १०४ ग्रन्थ लिखे जिनमें ६० ग्रन्थ संस्कृत में हैं और शेष कन्नड में।

मध्वोत्तर द्वैत-वेदान्त का विकास

३६५ प्रायः ५२ ग्रन्थ छोटे-छोटे स्तोत्र हैं। शेष में १२ मौलिक और अन्य भाष्य या टीकायें हैं। उपन्यास रत्नमाला, तत्त्वप्रकाशिका गुणार्थदीपिका, न्यायसुधागुर्वर्थदीपिका, ईश, केन, तैत्तिरीय आदि एवं गीता के भाष्य, एकोनपंचपादिका, विवरणवणम्, पाषण्डखण्डनम्, न्यायरत्नावली, माध्ववाग्वजावली, चक्रमीमांसा, वृन्दावनाख्यान, श्रुतितत्त्वप्रकाश, कल्पलता, लक्षालंकार, भावप्रकाशिका, तीर्थप्रबन्ध, रुक्मिणीश विजय, सरसभारतीविलास आदि इनकी रचनायें हैं। वादिराज की सर्वश्रेष्ठ कृति युक्तिमल्लिका है। इसमें पांच अध्याय हैं जिन्हें सौरभ कहा गया है। ये हैं-गुणसौरभ, शुद्धिसौरभ, भेदसौरभ, विश्वसौरभ और फलसौरभ । निर्गुण ब्रह्मवाद का खण्डन करते हुए वादिराज कहते हैं

बोधव्यं चेन्निर्गुणत्वं स्यात्, निर्गुणत्वं न सिद्धयति।

न बोधव्यं निर्गुणत्वं चेन्निर्गुणत्वं न सिद्धयति ।। अर्थात् यदि निर्गुण बोधव्य है तो वह असिद्ध है और यदि वह बोधव्य नहीं हैं तो वह और भी असिद्ध है।

(३) नारायणाचार्य (१६००-१६६०) के तीन ग्रन्थ हैं-अद्वैतकालानल, मध्वमंत्रार्थमंजरी और विष्णुतत्त्वविवेक। प्रथम ग्रन्थ अप्पययादीक्षित के मध्वतन्त्रमुखमर्दन का प्रबल खण्डन है। नारायणाचार्य ने उस नहिनिन्दान्याय का खण्डन किया है जिसके आधार पर विष्णु

और शिव के अभेद का प्रतिपादन किया जाता है। उनके मत से नहिनिन्दान्याय का प्रयोग सीमित है और परमात्मा के बारे में उसका प्रयोग ठीक नहीं है।

(४) राघवेन्द्र तीर्थ (१६२३-१६७१) विजयीन्द्र के बाद मध्ववेदान्त में एक अत्यन्त प्रभावशाली व्याख्याकार हैं। न्यायसुधा पर परिमल नामक इनकी टीका इतनी प्रौढ़ और प्रसिद्ध है कि उसके आधार पर इन्हें परिमलाचार्य कहा जाता है। इनके मागिनेय नारायणाचार्य ने इनकी जीवनी लिखी है जिसका नाम राघवेन्द्रविजय है। राघवेन्द्र के कुल ४० से अधिक ग्रन्थ हैं जिनमें से अधिकांश मध्व, जयतीर्थ और व्यासतीर्थ के ग्रन्थों की व्याख्याएं हैं। कुछ उपनिषदों पर इन्होंने भावदीप नामक टीकाएं लिखी हैं।

(५) सत्यनाथ यति (१६४८-१६७४) ने बारह ग्रन्थ लिखे जिनमें खण्डनत्रय की तीन टीकायें, परशु, कर्मप्रकाशिका और अभिनवचन्द्रिका हैं। ऋग्भाष्य-टिप्पणी अभिनवामृत, अभिनवगदा, अभिनवतर्कताण्डव, विजयमाला आदि ग्रन्थों में इन्होंने विपक्ष मत का खण्डन कर द्वैतदर्शन को सबल सिद्ध किया है।

(६) वनमाली मिश्र (१७वीं शती) मथुरावासी थे। इन्होंने अप्पयदीक्षित के माध्यमुखमर्दन के खंडन में माध्वमुखालंकार लिखा और न्यायामृत तथा तरंगिणी पर टीका लिखकर क्रमशः अद्वैतसिद्धि और गौड ब्रह्मानन्दी का खंडन किया।

३६६

वेदान्त-खण्ड

(७) गौडपूर्णानन्द चक्रवर्ती (१६वीं शताब्दी) बंगाली ब्राह्मण थे। इन्होंने तत्त्वमुक्तावली मायावाद-शतदूषणी की रचनाकर द्वैत का समर्थन किया। विजयधवतीर्थ (१४१०-१४५०) , व्यासतीर्थ, यदुपति आचार्य, कम्बालु रामचन्द्रतीर्थ, सुधीन्द्र तीर्थ, विद्याधीश तीर्थ, विश्वेश्वर तीर्थ, राघवेन्द्र तीर्थ, विद्यानिधि तीर्थ, वेदेश भिक्षु केशवाचार्य, विदरहल्ली, श्रीनिवासाचार्य, शर्कराश्रीनिवास, लक्ष्मीनाथ तीर्थ, कण्डलगिरि सूरि, चलारी नरसिंहाचार्य, शेषाचार्य, संकर्षणाचार्य, सत्याभिनवतीर्थ, रघुनाथतीर्थ, सुमतीन्द्र तीर्थ, सत्यप्रिय तीर्थ, जगन्नाथ तीर्थ, वादीन्द्र तीर्थ, वरदेन्द्र तीर्थ, धीरेन्द्र तीर्थ, सत्यव्रततीर्थ, सत्यधर्मतीर्थ, कृष्णावधूत आदि अन्य दार्शनिक हैं, जिन्होंने अद्वैतवाद का खण्डन करके द्वैतदर्शन में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है। द्वैतवेदान्त-दर्शन

और धर्म के मठ और अनुयायी कर्णाटक, आन्ध्रप्रदेश, तमिलनाडु, केरल और गोवा में विखरे हैं। द्वैत-वेदान्त स्टडीज एण्ड रिसर्च फाउण्डेशन बैंग्लूर, अडोली और उडिपी में माध्वदर्शन पर विशेष अध्ययन तथा शोधकार्य आज भी चल रहे हैं। निःसन्देह द्वैतवेदान्त एक जीवन्त दर्शन है। उसकी दो परम्पराएं हैं जिन्हें आचार्यकूट (संस्कृत के दार्शनिक गण)

और दासकूट (कन्नड लेखक भक्तगण) कहा जाता है। दोनों की जीवन्तता वर्धमान है। दासकूटों की कृतियाँ कन्नड में हैं। अतः उनका विवेचन यहाँ इष्ट नहीं है।

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