०२ निम्बार्क-वेदान्त का इतिहास

१. निम्बार्क का जीवन

निम्बार्क-वेदान्त द्वैताद्वैतवाद है। यह चार प्रकार के वैष्णव-सम्प्रदायों में एक प्रमुख वैष्णव-सम्प्रदाय है जिसे हंस-सम्प्रदाय या सनकादि-सम्प्रदाय कहा जाता है। हंसावतार परमात्मा ने जो उपदेश सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार (चतुःसन) को दिया था उसे ही सनत्कुमार ने नारद को दिया था। निम्बार्क ने उसे अपने शिष्य श्रीनिवास को दिया।

इस प्रकार निम्बार्क-सम्प्रदाय की गणना वैष्णव-सम्प्रदाय-चतुष्टय में की जाती है। पद्मपुराण में कहा गया है

रामानुजं श्रीः स्वीचक्रे मध्वाचार्य चतुर्मुखः।

श्रीविष्णुस्वामिनं रुद्रो निम्बादित्यं चतुःसनः।। अर्थात् श्री ने रामानुज को, ब्रह्मा ने मध्वाचार्य को, रुद्र ने विष्णुस्वामी को तथा चतुःसन ने निम्बार्क को स्वीकार किया। निम्बार्कमत को सनकादिमत कहना पुराण-सम्मत

भविष्यपुराण से निम्बार्क का एक मत उद्धृत मिलता है, यद्यपि वह वहाँ मिलता नहीं

निम्बार्को भगवान् येषां वाञ्छितार्थफलप्रदः।

उदयव्यापिकी ग्राह्या कुले तिथिरुपोषणे।। अर्थात् भगवान् निम्बार्क के मत से उदयव्यापिनी एकादशी को उपवास हेतु मानना चाहिए। इस उद्धरण से निम्बार्क सम्प्रदाय की प्राचीनता तथा पूज्यता सिद्ध होती है। १२वीं शती के हेमाद्रि ने चतुर्वर्गचिन्ता में इसको उद्धृत किया है। अतः निम्बार्क का समय १२वीं शती निश्चित होता है। वे हेमाद्रि के वरिष्ठ समकालिक थे।

किन्तु निम्बार्क-पूर्व यह उपर्युक्त गुरुपरम्परा ऐतिहासिक दृष्टि से प्रामाणिक नहीं है और वह मिथक तथा पुराण पर आधारित है। किन्तु निम्बार्कोत्तर गुरुपरम्परा ऐतिहासिक है। डॉ. रमा चौधरी, जिन्होंने निम्बार्क-वेदान्त पर शोध करके आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय से

निम्बार्क वेदान्त का इतिहास डी.फिल. उपाधि अर्जित की है, कहती हैं कि निम्बार्क रामानुज के बाद जन्मे थे। डॉ. रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर ने भी निम्बार्कमत की गुरु-परम्परा के आधार पर लगभग यही निश्चय किया है। वे वैष्णविज्म, शैविज्म एण्ड माइनर रिलीजस सिस्टम्स में कहते हैं कि निम्बार्क का समय ११वीं शती है। किन्तु निम्बार्की विद्वान् निम्बार्क को रामानुज-पूर्व दार्शनिक द्रमिडाचार्य (या द्रविडाचार्य) से अभिन्न कहते हैं और इस प्रकार उन्हें रामानुज-पूर्व मानते हैं। उनके मत से निम्बार्क ब्रह्मसूत्रकार बादरायण के कनिष्ट समकालीन थे। किन्तु यह मत मान्य नहीं हो सकता क्योंकि निम्बार्क के अनुयायी ही उन्हें वृत्तिकार उपवर्ष का परवर्ती मानते हैं। पुनश्च, मध्वमुखमर्दन नामक एक ग्रन्थ निम्बार्ककृत कहा जाता है। इस आधार पर उनका समय मध्वाचार्य के बाद चौदहवीं शती में निश्चित होता है। डॉ. सुरेन्द्रनाथ दासगुप्त ने ए हिस्ट्री ऑफ इण्डियन फिलासफी भाग-३ में यही निश्चय किया है। किन्तु निम्बार्की विद्वान् मध्वमुखमर्दन को न तो निम्बार्ककृत मानते हैं और न निम्बार्की ग्रन्थ । अतः डॉ. दासगुप्त द्वारा निर्धारित समय ठीक नहीं है। पुनश्च, निम्बार्क ने ब्रह्मसूत्र का जो भाष्य लिखा है उसको उन्होंने शारीरकमीमांसावाक्यार्थ कहा है। इससे सिद्ध होता है कि निम्बार्क शंकराचार्य के परवर्ती हैं, क्योंकि ब्रह्मसूत्र को सर्वप्रथम शंकर ने ही शारीरकमीमांसा कहा और उसके भाष्य को शारीरकभाष्य की संज्ञा दी। और भी, निम्बार्क के साक्षात् शिष्य श्रीनिवास ने शंकर के मायावाद आदि मतों का निराकरण भी किया है। अतः निम्बार्क को शंकरपूर्व कथमपि नहीं माना जा सकता है। सम्प्रदाय में निम्बार्क को वाक्यार्थकार तथा श्रीनिवासाचार्य को भाष्यकार माना जाता है। डॉ. राजेन्द्र लाल मिश्र निम्बार्क को वल्लभाचार्य का परवर्ती मानते हैं और सोचते हैं कि चतुर्वैष्णवों में सबसे परवर्ती निम्बार्क ही हैं। किन्तु यह मत भी निम्बार्क की ऐतिहासिक गुरु-परम्परा के

आधार पर गलत सिद्ध हो जाता है।

प्राप्त साक्ष्य के आधार पर वल्लभाचार्य निम्बार्की आचार्य केशव काश्मीरी भट्ट के समकालीन थे। श्कर, सुरेश्वर, रामानुज, वाचस्पति और सुदर्शनसूरि के ग्रन्थों में स्वाभाविक भेदाभेदवाद का जो खण्डन मिलता है उसके आधार पर निम्बार्की विद्वान् निम्बार्क का समय शंकराचार्य के पूर्व मानते हैं। किन्तु यह अनुमान ठीक नहीं है क्योंकि कुछ अन्य भेदाभेदवादी शंकर के पूर्व और ठीक बाद हो गये थे। शंकर और वाचस्पति के ग्रन्थों में ऐसे जो सन्दर्भ हैं उनका सम्बन्ध ब्रह्मदत्त, भर्तृप्रपंच आदि से है। रामानुज और सुदर्शनसूरि में प्राप्त ऐसे सन्दर्भो का सम्बन्ध यादव प्रकाश से है। अतः इन सन्दों में निम्बार्क का सन्दर्भ देखना ठीक नहीं है। सर्वदर्शनसंग्रह में १४वीं शती के माधव ने निम्बार्कमत को नहीं शामिल किया। यदि निम्बार्कमत उनके समय प्रतिष्ठित होता तो वे निश्चित रूप से सर्वदर्शनसंग्रह में उसका उल्लेख करते, जैसे उन्होंने रामानुज, मध्व और विष्णुस्वामी का उल्लेख किया है। जो भी हो, कार्तिक पूर्णिमा को निम्बार्क का जन्मदिन मनाया जाता है और

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वेदान्त-खण्ड

सम्प्रदाय के लोग उस दिन बड़ा उत्सव करते हैं। किन्तु कुछ लोग उनका जन्मदिन वैशाख शुक्लपक्ष तृतीया को मानते हैं।

निम्बार्क का असली नाम नियमानन्द था। निम्बार्क उनको इसलिए कहा जाता है कि उन्होंने रात में सूर्य को एक नीम के पेड़ पर विद्यमान दिखला दिया था। यह घटना यों है। एक संन्यासी, जो रात में कुछ जल, अन्न आदि नहीं ग्रहण करते थे, नियमानन्द से मिलने गये। दोनों में कुछ देर बात-चीत हुई। इतने में सूर्यास्त हो गया। संन्यासी चलने लगे तो नियमानन्द ने उन्हें कुछ खाने को दिया। किन्तु संन्यासी ने कहा- मैं सूर्यास्त के बाद कुछ ग्रहण नहीं करता हूँ। तब नियमानन्द ने कहा- देखो, उधर नीम पर अभी सूर्य हैं और सूर्यास्त नहीं हुआ है। तब संन्यासी ने कुछ खाया-पीया। तत्पश्चात् तुरन्त रात्रि या अन्धकार हो गया। सभी लोगों ने इस चमत्कार को देखा और वे तब से नियमानन्द को निम्बार्क, निम्बभास्कर, निम्बभानु आदि कहने लगे। वे तैलंग ब्राह्मण’ थे और वृन्दावन व्रज में रहते थे जहाँ आजकल निम्बग्राम है। किन्तु वे कहाँ जन्मे थे? इस पर मतभेद है। कुछ लोग कहते हैं कि वे गोदावरी के तट पर सुदर्शन आश्रम में जन्मे थे। अन्य लोग कहते हैं कि वे बेलारी जिले के मुंगीपाटन में पैदा हुए थे। कुछ लोग कहते हैं कि वे मथुरा जिले में गोवर्धन के पास निम्बग्राम में ही जन्में थे। इसी प्रकार उनके माता-पिता के नामों पर भी विवाद है। कुछ लोगों के मत से उनके पिता का नाम असरा और माता का नाम जयन्ती था। अन्य लोगों के मत से उनके पिता का नाम जगन्नाथ तथा माता का नाम सरस्वती था। वे सुदर्शनचक्र के अवतार माने जाते हैं। इस कारण उन्हें सुदर्शन भी कहा जाता है। आसणि, जयन्तेय, हरिप्रिय रंगदेवी तथा हविर्धन उनके अन्य नाम हैं। उन्हें रंगदेवी इसलिए कहा जाता है कि इस रूप से उन्होंने राधाकृष्ण की उपासना की थी। वे राधा की कान्ति थे।

निम्बार्क के चार शिष्य थे। (१) श्रीनिवासाचार्य, (२) औदुम्बराचार्य, (३) गौरमुखाचार्य तथा (४) लक्ष्मणभट्ट। श्रीनिवासाचार्य प्रधान शिष्य थे। लक्ष्मणभट्ट ने ब्रह्मसूत्र पर एक सूक्ष्म वृत्ति लिखी थी जिसकी पाण्डुलिपि उपलब्ध है। गौरमुखाचार्य ने निम्बार्कसहस्रनाम लिखा था जो हस्तलिखित रूप में प्राप्त है। औदुम्बराचार्य ने श्रीनिम्बार्कविकान्ति तथा औदुम्बरसंहिता लिखी (प्रथम प्रकाशित है और द्वितीय की हस्तलिखित प्रति उपलब्ध है)। श्रीनिम्बार्कविक्रान्ति की हिन्दी टीका भाषासुधा नाम से श्रीव्रजवल्लभशरण ने १६४१ में प्रकाशित की है। इसमें २२० इन्द्रवजा छन्दों में निम्बार्क के चतुर्दश चमत्कारों का वर्णन है। जल को स्थल बनाना, रात को दिन बनाना, निर्जन स्थान को आबाद करना, निःसंतान को पुत्र देना, अजेयों को

कृष्णाज्ञया श्रुतिपथं प्रचितुं पृथिव्यां तैलगविप्रवरमूर्तिघर: स देवः । निम्बार्कदेशिकयर करुणाकरः श्रीचक्रावतारमतिमाद्वियत्ता मदुक्तिम् ।। (केशवकाश्मीरी,

वेदान्तकौस्तुमानमा, पृ. ३६३ संस्कृतविश्वविद्यालय, सं. १EE२ ई.) (प्र.स.)

निम्बार्क-वेदान्त का इतिहास शास्त्रार्थ में परास्त करना, अपने अन्दर संपूर्ण विश्व दिखाना आदि निम्बार्क के चमत्कार हैं जिनका वर्णन यहाँ किया गया है। श्रीनिवासाचार्य के कई ग्रन्थ हैं जिनका परिचय आगे दिया जायेगा। अनन्तरामदेव ने पुराणों के वचन से सिद्ध किया है कि निम्बार्क ने मायाबाद की जन्मभूमि काशी को जला दिया था और मथुरा, द्वारिका, नैमिषारण्य तथा सुदर्शन आश्रम (गोदावरी तट) में अपना पीठ स्थापित किया था। इसलिए कहा जाता है कि उनका प्रादुर्भाव कमण्डल में चतुर्विधा हुआ।

२. निम्बार्क की कृतियाँ

निम्बार्क के कुल १४ ग्रन्थ बनाये जाते हैं जिनमें से तीन (सदाचार-प्रकाश, प्रपत्ति-चिन्तामणि तथा भगवद्गीतावाक्यार्थ) अनुपलब्ध हैं। चार ग्रन्थ अभी अप्रकाशित हैं। उनके नाम हैं- (१) स्वधर्माध्वबोध, (२) ऐतिह्यतत्त्वराद्वान्त, (३) पञ्चसंस्कारप्रमाणविधि तथा (४) वेदान्ततत्त्वबोध। निम्न तीन स्तोत्रग्रन्थ प्रकाशित हैं : (१) प्रातः स्मरणस्तोत्र जिसमें राधाकृष्ण का स्मरण १० श्लोकों में किया गया है। (२) राधाष्टक, (३) कृष्णाष्टक ।

शेष चार ग्रन्थ निम्नलिखित हैं जो सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण हैं और प्रकाशित हैं -

(१) वेदान्तपारिजातसौरभ- यह ब्रह्मसूत्र का वाक्यार्थ है। पुष्पिका में इसे शारीरकमीमांसावाक्यार्थ कहा गया है। इसमें ब्रह्मसूत्र के प्रत्येक सूत्र का अर्थ किया गया है और किसी भी भाष्यकार के मत का खण्डन नहीं किया गया है। इसमें तर्कपाद (अध्याय २ पाद २) के अन्तिम अधिकरण की व्याख्या शक्तिमत के खण्डनार्थ की गयी है। शंकराचार्य ने शारीरकभाष्य में इस अधिकरण में पाञ्चरात्र का खण्डन किया है। रामानुज ने श्रीभाष्य में इस अधिकरण में पाञ्चरात्र का समर्थन किया है। इन दोनों भाष्यों को निम्बार्क अवश्य जानते थे। तभी उन्होंने एक तीसरा मार्ग निकाला-शक्तिमत के खण्डन का। संभवतः उनके समय में शाक्तमत की प्रधानता थी।

(२) दशश्लोकी- इसी को सिद्धान्तरत्न या वेदान्तकामधेनु कहते हैं। सम्प्रदाय में इसका पठन-पाठन बहुत अधिक होता है। इसमें निम्बार्कमत के मुख्य मतों का प्रतिपादन हुआ है। अतः इसे यहाँ दिया जा रहा है -

ज्ञानस्वरूपं हरेरधीनं, शरीरसंयोगवियोगयोग्यम् । अणुं हि जीवं प्रतिदेहभिन्नं ज्ञातृत्वं तं यमनन्तमाहुः।। १।।

ना

अनादिमायापरियुक्तरूपं, त्वेनं विदुई भगवत्प्रसादात्। मुक्तं च बद्धं किल बद्धमुक्तं प्रभेदबाहुल्यमथापि बोध्यम् ।। २।।

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अप्राकृतं प्राकृतरूपकं च कालस्वरूपं तदचेतनं मतम् । माया प्रधानादिपदप्रवाच्यं शुक्लादिभेदाश्च समेऽपि तत्र ।। ३।।

स्वभावतोऽपास्तसमस्तदोषमशेषकल्याणगुणकराशिम्। व्यूहांगिनं ब्रह्मवरं वरेण्यं ध्यायेम कृष्णं कमलेक्षणं हरिम् ।। ४।।

अङ्गे तु वामे वृषभानुजां मुदा, विराजमानामनुरूपसौभगाम् । सखीसहस्रैः परिसेवितां सदा, स्मरेम देवीं सकलेष्टकामदाम्।। ५।।

उपासनीयं नितरां जनैः सदा, प्रहाणये जानतमोऽनुवृत्तेः। सनन्दनाद्यैर्मुनिभिस्तथोक्तं, श्रीनारदायाखिलतत्त्वसाक्षिणे।।६।।

सर्व हि विज्ञानमतो यथार्थकं श्रुतिस्मृतिभ्यो निखिलस्य वस्तुनः । ब्रह्मात्मकत्वादिति वेदविन्मतं त्रिरूपतापि श्रुतसूत्रसाधिता।। ७।।

नान्या गतिः कृष्णपदारविन्दात्, संदृश्यते ब्रह्मशिवादिवन्दितात्। भक्तेच्छयोपान्तसुचिन्त्यविग्रहादचिन्त्यशक्तेरविचिन्त्य साशयात् ।। ८ ।।

माता

कृपास्य दैन्यादि युजि प्रजायते यथाभवेत्प्रेमविशेषलक्षणा। भक्तिीनन्याधिपतेर्महात्मनः सा चोत्तमा साधनरूपिका परा।। ६।। यामी के

उपास्यरूपं तदुपासकस्य च कृपाफलं भक्तिरसस्ततः परम्। कला विरोधिनीरूपमथैतदाप्तेशैंया इमेऽर्था अपि पञ्चसाधुभिः ।। १०।।

यहाँ दसवें श्लोक में सारांश दिया गया है। ‘४-५ श्लोकों में उपास्य (ब्रह्म) का स्वरूप, १-२ श्लोकों में उपासक (जीव) का स्वरूप, ६-८ श्लोकों में साधन (भक्ति) का स्वरूप, नवें श्लोक में फल (कृपा) का स्वरूप और तीसरे श्लोक में इन चारों के विरोधी का स्वरूप बताया गया है। ये ही पाँच अर्थ (अर्थपंच) ज्ञेय हैं।

(३) सविशेष-निर्विरोध -श्रीकृष्णस्तवराज। इसमें कुल २५ श्लोकों में कृष्ण की स्तुति की गयी है। किशोरदास ने १६१२ में इस पर वेदान्ततत्त्वसुधा नामक टीका लिखी है। इसमें निम्बार्क के भेदाभेदवाद का निर्वचन तथा दृष्टिसृष्टिवाद का खण्डन (श्लोक २२)

और ब्रह्म अज्ञान का आश्रय और विषय है, इस मत का खण्डन (श्लोक २३) में है। अन्तिम श्लोक है -

निम्बार्क-वेदान्त का इतिहास FREE प्राप्य जन्म यदि मानुषं नरः सेवते न तव पादपंकजम्।

धिक् च जन्म कुलमादिदेव! तद् यौवनादिसकलं न शोभते।। जानि (४) रहस्यमीमांसा-इसके दो खण्ड हैं। प्रथम खण्ड का नाम मन्त्ररहस्यषोडशी है जिसमें गुरूपसत्ति का विवेचन है। द्वितीय खण्ड का नाम प्रपत्रकल्पवल्ली है। उसमें प्रपत्ति का वर्णन है और मुकुन्दशरणागति-मन्त्र की व्याख्या है। इस मन्त्र को केशवकाश्मीरी की क्रमदीपिका (१५) में दिया गया है। उनका श्लोक यह है

श्रीमुकुन्दचरणौ सदेतिशरणं ततः।

अहं प्रपद्य इत्युक्तो मौकुन्दोऽष्टादशाक्षरः।। अतः मंत्र यह है -

“श्रीमन्मुकुन्दचरणौ सदा शरणमहं प्रपद्ये।” वैष्णवीदीक्षा में सर्वप्रथम यही मंत्र शिष्य को दिया जाता है। इसके बाद अर्हता प्राप्त करने पर उसे श्री गोपालमन्त्र दिया जाता है।

निम्बार्क के अन्तिम चार ग्रन्थों पर अनेक टीकाएँ हैं जिनसे उनका महत्त्व बढ़ गया है। सर्वप्रथम, वेदान्तपारिजातसौरभ पर उनके साक्षात् शिष्य श्रीनिवासाचार्य की टीका है जिसका नाम है वेदान्तकौस्तुभ। डॉ. रमा चौधरी ने इन दोनों ग्रन्थों का अंग्रेजी अनुवाद किया है जो रायल एशियाटिक सोसायटी आफ बंगाल, कलकत्ता से १६४० ई. में दो खण्डों में प्रकाशित है। उसके तृतीय खण्ड में उन्होंने निम्बार्क और उनके अनुयायियों के दर्शन का विवेचन उनके ग्रन्थों के आधार पर किया है। इसका प्रकाशन १६४३ में वहीं से हुआ है। यह सम्पूर्ण ग्रन्थ निम्बार्क-वेदान्त को समझने में अत्यन्त उपयोगी है। केशव काश्मीरी ने वेदान्तकौस्तुभ पर वेदान्तकौस्तुभ-प्रभा नामक टीका लिखी है। देवाचार्य ने निम्बार्क के वेदान्तपारिजातसौरभ के आधार पर ब्रह्मसूत्र की एक वृत्ति लिखी जिसका नाम सिद्धान्तजास्नवी है। यह ब्रह्मसूत्र के प्रथम अध्याय प्रथम पाद तक ही उपलब्ध है। इस पर देवाचार्य के शिष्य सुन्दरभट्ट ने द्वैताद्वैत-सिद्धान्त-सेतुका नामक टीका लिखी जो चतुःसूत्री पर्यन्त प्रकाशित है। इसमें सुन्दरभट्ट ने अद्वैतवेदान्त का खण्डन किया है और उसमें पुरुषोत्तमकृत वेदान्तरत्नमञ्जूषा का पर्याप्त उपयोग किया है। सेतुका में सुन्दरभट्ट ने कई पूर्वाचार्यों के उन ग्रन्थों का उल्लेख किया है जो अब अनुपलब्ध हैं।

दशश्लोकी पर गिरिधर प्रपन्न की लघुमंजूषा, हरिव्यासदेव की सिद्धान्तकुसुमाञ्जलि और पुरुषोत्तम की वेदान्तरत्नमञ्जूषा नामक टीकाएँ हैं जो प्रकाशित हैं। इनमें पुरुषोत्तम की टीका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उसमें अद्वैतवाद का विशद खण्डन किया गया है। निम्बार्कवेदान्त में यह प्रथम खण्डन-ग्रन्थ है। पुरुषोत्तम विश्वाचार्य के साक्षात् शिष्य थे और३३८

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विश्वाचार्य श्रीनिवासाचार्य के साक्षात् शिष्य थे। इस प्रकार वे निम्बार्क से चौथी पीढ़ी में थे। निर्गुणवाद, निर्विशेषवाद, अप्रमेयत्ववाद, प्रतिबिम्बवाद, अवच्छेदवाद (उपाधिवाद), सर्वगतात्मवाद, एकजीववाद और विवर्तवाद के खण्डन यहाँ किये गये हैं।

सविशेष निर्विशेष श्रीकृष्णस्तवराज पर व्रजेश प्रसादकृत श्रुतिसिद्धान्तमंजरी, पुरुषोत्तमप्रसाद वैष्णव प्रथमकृत श्रुत्यन्तकल्पवल्ली और पुरुषोत्तम प्रसाद वैष्णव द्वितीय कृत श्रुत्यन्तसुरद्रुम टीकाएँ हैं। ये सभी चौखम्बा संस्कृत सीरीज वाराणसी से प्रकाशित हैं। इनमें से पुरुषोत्तम प्रसाद वैष्णव प्रथम की टीका बहुत विस्तृत तथा विशद है। वे हरिव्यासदेव के साक्षात् शिष्य स्वभूदेव के साक्षात् शिष्य थे। इसमें निर्विशेषवाद, अध्यासवाद, ब्रह्म की उपादानकारणता, अद्वैतवेदान्त के ईश्वरवाद, प्रतिबिम्बवाद, अवच्छेदवाद एकजीववाद, मायावाद, सत्त्ववैविध्यवाद (पारमार्थिक, व्यावहारिक तथा प्रातिभासिक सत्तात्रयवाद), दृष्टिसृष्टिवाद, अभेदवाद-इन अद्वैतवादी मतों का विशद खण्डन है। इसके साथ ही इसमें विशिष्टाद्वैतवाद तथा भेदवाद (द्वैतवाद) का भी खण्डन है। इन खण्डनों के अतिरिक्त इसमें निम्बार्क की तत्त्वमीमांसा का स्वीकारात्मक विवेचन भी है।

__मन्त्ररहस्यषोडशी पर सुन्दरभट्टकृत मन्त्रार्थरहस्य नामक टीका है। प्रपन्नकल्पवल्ली पर एक प्रपन्नसुरतरुमंजरी नामक टीका है जिसके लेखक का नाम अज्ञात है और जिसे किशोरदास ने प्रकाशित किया है। प्रथम कलकत्ता से १६३२ में तथा दूसरी वृन्दावन (मथुरा) से १६१५ में प्रकाशित हैं। सुन्दरभट्ट का मन्त्रार्थरहस्य बहुत मौलिक और उपयोगी ग्रन्थ हैं। इसमें उन्होंने गुरूपसत्ति साधन की विशद व्याख्या की है। जैसे, याजक हवि को स्रुव से अग्नि में डालता है, वैसे जीव (उपासक) अपने को गुरु के माध्यम से परमात्मा को समर्पित करता है। अथवा जैसे कोई पिता अपने उस पुत्र के पास अपना धन लेने के लिए एक मध्यस्थ भेजता है जिसे उसने चुरा लिया है और पुत्र उस चुराये हुए धन को वापिस देकर पिता की सम्पूर्ण सम्पत्ति का उत्तराधिकारी बन जाता है, वैसे ही शिष्य अपनी अर्हता

और ममता को छोड़कर गुरु के पास जाता है और उसकी आध्यात्मिक संपदा का उत्तराधिकारी बन जाता है। सुन्दरभट्ट के अनुसार गोपालमन्त्र में प्रणव या वीजापन्न के द्वारा यह स्पष्ट किया गया है कि आत्मा अपना समर्पण भगवान् को कर दे। पूरा गोपालमन्त्र १८ अक्षरों का है। यह यों है- “कृष्णाय गोविन्दाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा”। इसमें पाँच पद है, कृष्णाय, गोविन्दाय, गोपीजनवल्लभाय और स्वाहा। इस कारण यह मन्त्र या पञ्चपदी ब्रह्मविद्या के नाम से प्रसिद्ध है। इसका प्रथम वर्णन गोपालपूर्वतपनी-उपनिषद् में मिलता है। श्रीगोपालमंत्र ब्रह्मविद्या है। केशव काश्मीरी क्रमदीपिका (१/४) में कहते हैं कि यह सभी को अभिवाञ्छित फल प्रदान करने वाला मन्त्र है

निम्बार्क-वेदान्त का इतिहास सर्वेषु वर्णेषु तथाश्रमेषु नारीषु नानाहयजन्मभेषु। न दाता फलानामभिवाञ्छितानां और पानी का

द्रागेव गोपालकमन्त्र एषः।। इस ब्रह्मविद्या का बीजमन्त्र क्लीं है। यहाँ ककार का अर्थ सच्चिदानन्द कृष्ण है,ई का अर्थ राधामहाभावस्वरुपिणी प्रकृति है, ल का अर्थ प्रेम और आनन्द है तथा चन्द्रबिन्दु का अर्थ जीव का परमात्मा का आलिंगन-चुम्बन है।

ककारो नामकः कृष्णः सच्चिदानन्दविग्रहः

ईकारः प्रकृतिः राधामहाभावस्वरूपिणी। जो या लश्चानन्ददायकः प्रेमसुखं च परिकीर्तितम् नाममा

चुंबनाश्लेषमाधुर्य बिन्दुनादं समीरितम् । गोपालपूर्वतापिनी उपनिषद् (४/१७) का वचन है कि जो - मनुष्य इस पंचपदी ब्रह्मविद्या का जप करता है वह अनायास ही परम पद को प्राप्त कर लेता है

अमुं पंञ्चपदमनुमावर्तयेद् यः। स याति अनायासतः केवलं तत्पदं तत् ।।

३. निम्बार्क की गुरु-शिष्य-परम्परा

डॉ. रमा चौधरी ने (१) निम्बार्क, (२) श्रीनिवासाचार्य, (३) विश्वाचार्य, (४) पुरुषोत्तमाचार्य, (५) विलासाचार्य, (६) स्वरूपाचार्य, (७) माधवाचार्य, (८) बलभद्राचार्य, (६) पद्माचार्य, (१०) श्यामाचार्य, (११) गोपालाचार्य, (१२) कृपाचार्य, (१३) देवाचार्य, (१४) सुन्दरभट्ट, (१५) पद्मनाभभट्ट, (१६) उपेन्द्रभट्ट, (१७) रामचन्द्र भट्ट, (१८) वामन भट्ट, (१६) कृष्णभट्ट, (२०) पद्माकर भट्ट, (२१) श्रवणेश भट्ट, (२२) भूरि भट्ट, (२३) माधव भट्ट, (२४) श्याम भट्ट, (२५) गोपाल भट्ट, (२६) बलभद्र भट्ट, (२७) गोपीनाथ भट्ट, (२८) केशव भट्ट, (२६) गांगल भट्ट, (३०) केशव काश्मीरी भट्ट, (३१) श्रीभट्ट और (३२) हरिव्यासदेव-इस गुरुपरम्परा को माना है। फिर हरिव्यासदेव के बाद निम्बार्कमत में दो उप सम्प्रदाय हो गये। प्रथम के संस्थापक हरिव्यासदेव के प्रधान शिष्य स्वभूदेव या पुरुषोत्तम प्रसाद वैष्णव प्रथम हैं और द्वितीय के परशुराम देव हैं। इन दोनों सम्प्रदायों में आपसी भेदभाव रहता है जो दार्शनिक दृष्टि से नगण्य है। हरिव्यासदेव के कुल १२ शिष्य थे। उपर्युक्त दो शिष्यों के अतिरिक्त अन्य शिष्यों के नाम हैं (9) वोहित देवाचार्य (२) मदनगोपाल देवाचार्य, (३) उद्धव देवाचार्य, (४) बाहुबल देवाचार्य, (५) गोपाल

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देवाचार्य, (६) ऋषीकेश देवाचार्य, (७) माधव देवाचार्य, (८) केशव देवाचार्य, (E) गोपाल देवाचार्य द्वितीय और (१०मुकुन्ददेवाचार्य । हरिव्यासदेव की एक रचना महावाणी हिन्दी में है। उनके गुरु श्रीभट्ट की भी प्रसिद्ध हिन्दी रचना मुगलशतक है जो आदि वाणी के नाम से प्रसिद्ध है। इन दोनों हिन्दी ग्रन्थों का प्रभाव हिन्दी के कृष्णभक्तों पर बहुत अधिक पड़ा है। हिन्दी के महाकवि विहारी, घनानन्द, तोस आदि निम्बार्की थे। श्रीभट्ट ने संस्कृत में श्रीकृष्णशरणागतिस्तोत्र (२५ श्लोक) लिखा है जिसमें श्रीकृष्ण के गुणों और लीलाओं का वर्णन है।

हरिव्यासदेव की संस्कृत रचनाएं हैं-सिद्धान्तकुसुमांजलि जिसका वर्णन ऊपर दशश्लोकी की टीका में किया गया है, तत्त्वार्थपंचक (हस्तलिखित), पंचसंस्कार निरूपण (हस्तलिखित)

और प्रेमभक्तिविवर्धिनी (जो प्रकाशित है)। अन्तिम ग्रन्थ सदानन्द भट्टकृत श्री निम्बार्कशतनामस्तोत्र की टीका है। हरिव्यासदेव का समय १६०० ई. के आस-पास माना जाता है। उद्धवदेव, जो हरिव्यासदेव के शिष्य थे, रासलीला के संस्थापक हैं। उनका एक दूसरा नाम घमण्डदेव है जिससे वे अधिक प्रसिद्ध हैं। राधा-कृष्ण रासधारी ने रास-सर्वस्व नामक एक ग्रन्थ हिन्दी में लिखा है। उसमें उन्होंने घमण्डदेव के संस्कृत वाक्यों को उद्धृत किया है जिनमें रासलीलानुकरण के ५ प्रयोजन बताये गये हैं। ये प्रयोजन हैं- (१) अन्तःकरण को शुद्ध (निर्मल) करना, (२) स्त्री और शूद्रों को पुरुषार्थ-चतुष्टय की प्राप्ति कराना, (३) योग से प्राप्त भगवदानन्द को सर्वसुलभ करना, (४) युग-प्रभाव के कारण उत्पन्न राजसी और तामसी बुद्धि को सात्त्विक बनाना और (५) व्रजवासियों को जीविका प्रदान करना। शुकसुधा ने स्वधर्मामृतसिन्धु में रासलीलानुकरण का धार्मिक-दार्शनिक विवेचन किया है।

पुरुषोत्तम प्रसाद वैष्णव प्रथम की परम्परा में आगे चलकर सातवीं पीढ़ी में धर्मदेव हुए जिनके शिष्य पुरुषोत्तम प्रसाद वैष्णव द्वितीय थे। उनका जन्म १६२३ ई. में जगाधरी, कुरुक्षेत्र में हुआ था। उन्होंने ही सविशेष निर्विशेष श्रीकृष्णस्तवराज पर श्रुत्यन्तसुरद्रुम नामक टीका लिखी थी। अध्यात्मसुधातरंगिणी (श्रीनिवासकृत लघुस्तवराजस्तोत्र की टीका), मुकुन्दमहिमास्तव और परतत्त्वनिर्णय उनकी अन्य कृतियां हैं। पुरुषोत्तम प्रसाद वैष्णव द्वितीय के सतीर्थ्य अनन्तरामदेव थे। उनकी रचनाएं हैं-(१) वेदान्ततत्त्वबोध, (२) वेदान्तरत्नमाला, (३) तत्त्वसिद्धान्तबिन्दु, (४) श्रुतिसिद्धान्तरत्नमाला, (५) वेदान्तसारपद्यमाला, (६) श्रीकृष्णचरणभूषणस्तोत्र (७) श्रीमुकुन्दशरणापत्तिस्तोत्र और (८) श्रीमदाचार्यपरम्परास्तोत्र । अन्तिम ग्रन्य पर लेखक ने श्रीगुरुनतिवैजयन्ती नामक एक व्याख्या भी लिखी है। यह किशोरदास के संपादकत्व में मथुरा से १६३६ में प्रकाशित हैं। इसमें स्वभूराम तक गुरुपरम्परा दी गयी है। अनन्तरामदेव का लेखन-काल १७वीं शती का अन्तिम चतुर्थांश है। उन-जैसा निम्बाकी विद्वान् अठारहवीं और उन्नीसवीं शती में नहीं हुए। श्रीआचार्य-चरित्र,

निम्बार्क-वेदान्त का इतिहास

३४१ में जिसके लेखक दम्पत्तिशरण हैं, इस मत के आचार्यों का वर्णन है। वृन्दावन से १६३३ ई. में किशोरदास ने हिन्दी में आचार्यपरम्परापरिचय प्रकाशित किया है जो ऐतिहासिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

उपर्युक्त गुरुपरम्परा में अनेक विद्वान् लेखक हुए हैं। उनके ग्रन्थों का थोड़ा परिचय आवश्यक हैं। सर्वप्रथम श्रीनिवास ने वेदान्तकौस्तुभ के अतिरिक्त लघुस्तबराजस्तोत्र, वेदान्तकारिकावली, स्तवपंचकमाहात्म्य तथा निगद नामक वेदभाष्य लिखे। कहा जाता है कि उन्होंने भगवद्गीता तथा उपनिषदों पर टीकाएं लिखी थीं, किन्तु वे सभी अनुपलब्ध है। उनका समय शंकर के बाद सुनिश्चित हैं क्योंकि उन्होंने शंकर के प्रतिबिम्बवाद का खण्डन किया है। उन्होंने ही सर्वप्रथम निम्बार्कवेदान्त को अद्वैतवेदान्त के खण्डन की ओर मोड़ा था। उनके लघुस्तवराजरतोत्र पर पुरुषोत्तमप्रसाद वैष्णव प्रथम ने गुरुभक्तिमंदाकिनी नामक टीका लिखी है। ४१ श्लोकों में यहां निम्बार्क के विभिन्न गुणों का वर्णन किया गया है। भेदाभेदवाद की सुन्दर व्याख्या श्लोक ६ की टीका में की गयी है।

केशव-काश्मीरी निम्बार्क-वेदान्त के एक श्रेष्ठ दार्शनिक हैं। उनका समय १४वीं शती माना जाता है। वे गोमलभट्ट के शिष्य थे। वेदान्तकौस्तुभप्रभा के अतिरिक्त उनकी अन्य रचनाएं हैं-(१) तत्त्वप्रकाशिका (गीताटीका), जो वृन्दावन से हिन्दी अनुवाद सहित प्रकाशित है, (२) क्रमदीपिका, जिसमें निम्बार्क सम्प्रदाय की उपासना-पद्धति का निरूपण है और जिस पर श्रीगोविन्द विद्याविनोद भट्टाचार्य की विवरण नामक टीका है, आठ पटलों (अध्यायों) में विभक्त है। (३) श्रीगोविन्दशरणागतिस्तोत्र, (४) यमुनास्तोत्र, (५) तत्त्वप्रकाशिका (भागवतपुराण के वेदस्तुति अंश की टीका), ब्रह्मोपनिषत् टीका, (७) विष्णुसहस्रनाम टीका तथा (८) तैत्तिरीयप्रकाश (तैत्तिरीय उपनिषद् टीका) और (E) मुण्डकोपनिषद् टीका। कहा जाता है कि उन्होंने कई अन्य उपनिषदों पर भी टीकाएं लिखी थीं, किन्तु वे सभी अनुपलब्ध हैं। निम्बार्कमत में प्रस्थानत्रयी या प्रस्थानचतुष्टय (जिसमें भागवतपुराण शामिल है) पर लेखनी चलाने वाले एकमात्र आचार्य केशव काश्मीरी हैं। वे दिग्विजयी के नाम से प्रसिद्ध हैं क्योंकि उन्होंने तीन बार सम्पूर्ण भारत की दिग्विजय की थी और अनेक पण्डितों को शास्त्रार्थ में परास्त किया था। उनके मतों को जानने के लिए उनकी भगवद्गीता की टीका तथा वेदान्तकौस्तुभप्रभा पर्याप्त हैं। वे वल्लभाचार्य के समकालीन थे।

निम्बार्कमत के अन्य उल्लेखनीय ग्रन्थ हैं-माधवमुकुन्दकृत परपक्षगिरिवज्र, जिसमें अद्वैतवेदान्त का खण्डन किया गया है और वनमाली मिश्रकृत वेदान्तसिद्धान्त-संग्रह या श्रुतिसिद्धान्तसंग्रह, जो श्लोकबद्ध है और जिस पर लेखक की स्वोपज्ञ टीका भी गद्य में दी गयी है। इन दोनों ग्रन्थों के सारांश डॉ. दास गुप्त ने ए हिस्ट्री आफ इण्डियन फिलासफी के तृतीय खण्ड में दिया है। उन्होंने परपक्षगिरिवन को अधिक महत्त्व दिया है। किन्तु वास्तव में इस ग्रन्थ की जितनी युक्तियां हैं वे सभी पूर्वाचार्यों के द्वारा पहले ही प्रस्तुत कर

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वेदान्त-खण्ड

दी गयी थीं। माधवमुकुन्द ने केवल वचोविन्यास की नवीनता दिखलाते हुए उन्हें एक जगह संगृहीत कर दिया है। बीसवीं शती में वैष्णवदास नामक एक निम्बार्की विद्वान् व्रज में हुए हैं। उनका देहपात १६५५ ई. में हुआ था। उनके ६ ग्रन्थ हैं-सिद्धान्तजाह्नवी, वैष्णवधर्मादर्श, वेदान्तपदार्थपरिचय, वैष्णवधर्मविवेचना, भगवद्गीताभाष्य, ब्रह्मसूत्रचतुःसूत्रीभाष्य, श्रीआचार्यवल्ली, वैष्णवसंस्कारकौस्तुभ और द्वैताद्वैतमतौघकुठारः। इन सभी ग्रन्थों के आधार सम्प्रदाय के पूर्वाचार्यों के ग्रन्थ हैं। निम्बार्कमत का सबसे बड़ा पीठ सलेमाबाद, राजस्थान, में है जिसके वर्तमान पीठाधीश्वर श्री राधासर्वेश्वर शरण देवाचार्य हैं। उन्होंने श्री स्तवरत्नाञ्जलि नामक एक ग्रन्थ लिखा है जो सर्वेश्वरपत्रिका के वर्ष २७ अंक ११-१२ में प्रकाशित है। यह विभिन्न स्वरचित स्तोत्रों का संग्रह है। इसके अतिरिक्त उन्होंने निम्बार्क के प्रातःस्मरणम् पर युग्मतत्त्वप्रकाशिका नामक टीका १६६० में प्रकाशित की है। “सर्वेश्वर” इस सम्प्रदाय की मासिक पत्रिका है जो वृन्दावन से सर्वेश्वर कार्यालय से प्रकाशित होती है। इसी प्रकार प्रयाग निम्बार्क पीठ से दिव्य उपासना नामक एक पत्रिका प्रकाशित होती है। इसके प्रमख संपादक आचार्य ललित कृष्ण गोस्वामी थे जिनका गोलोकवास १६६२ ई. में हो गया। उन्होंने वेदान्तपारिजातसौरभ तथा वेदान्तकामधेनु के हिन्दी अनुवाद किये हैं जो एक प्रकार से इन मूल ग्रन्थों के भाष्य हैं । वे सभी वैष्णव सम्प्रदायों की एकता के समर्थक थे। इसीलिए उन्होंने रामानुज के श्रीभाष्य, वल्लभाचार्य के अणुभाष्य तथा मध्वाचार्य के ब्रह्मसूत्रभाष्य के भी हिन्दी अनुवाद किये। इन अनुवादों से सभी वैष्णव सम्प्रदायों में सौमनस्य तथा सौहार्द की वृद्धि हुई है।

सलेमाबाद में श्री निम्बार्काचार्यपीठ के अध्यक्ष को “श्री जी” कहा जाता है। इस पीठ के अनेक अध्यक्षों ने संस्कृत तथा हिन्दी में ग्रन्थ लिखे हैं। वास्तव में निम्बार्क के अनुयायी उत्तरी भारत में सर्वत्र फैले हैं और वे अपने धर्म तथा दर्शन के प्रचार-प्रसार में सदा संलग्न रहते हैं। इससे इस सम्प्रदाय की साहित्यिक सम्पदा दिनानुदिन बढ़ रही है। किन्तु इस अनुपात में उसकी दार्शनिक प्रगति कम हो रही है। डॉ. रमा चौधरी ने निम्बार्क के स्वाभाविक भेदाभेदवाद की तुलना अंग्रेजी में रामानुज के विशिष्टाद्वैत, भास्कर के औपाधिक भेदाभेदवाद, श्रीकण्ठ के विशिष्टशिवाद्वैतवाद और बलदेव विद्याभूषण के अचिन्त्य भेदाभेदवाद से करके सभी प्रकार के भारतीय भेदाभेदवादों को एक जगह विवेचन किया है। यह विवेचन प्रामाणिक तथा उपयोगी है। उनका ग्रन्थ है वेदान्तपारिजातसौरभ तथा वेदान्तकौस्तुभ के अंग्रेजी अनुवाद का तृतीय खण्ड। इसी प्रकार वी. एस. घाटे ने अंग्रेजी में सभी प्रमुख ब्रह्मभाष्यों का विवेचन करते हुए दिखाया है कि निम्बार्कभाष्य बादरायण के ब्रह्मसूत्र के अन्य भाष्यों की अपेक्षा अधिक निकट है। भारतीय राजनीति में भी राष्ट्रीय एकता, राष्ट्रीय एकीकरण, सर्वधर्मसमभाव आदि प्रत्ययों में निम्बार्क के भेदाभेदवाद का बढ़ता हुआ प्रयोग द्रष्टव्य है।

निम्बार्क वेदान्त का इतिहास

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४. ज्ञानमीमांसा

ज्ञान आत्मा (जीव) का नित्यगुण हैं। जैसे गन्ध पुष्प में व्याप्त है और उसका प्रसार चतुर्दिक भी होता है, वैसे ही ज्ञान यद्यपि जीव में आनखशिख व्याप्त है तथापि वह उसके बाहर भी व्याप्त है। निम्बार्क ब्रह्मसूत्र २-३-२६ के वाक्यार्थ में कहते हैं

गुणभूतस्य ज्ञानस्य व्यतिरेकस्तु गन्धवद् उपपद्यते," एतादृशगुणाश्रयं जीवम् ‘स एष प्रविष्ट आलोमभ्य र

आनखेभ्यः" (कौषीतकि उपनिषद् ३/६)। इस प्रकार यद्यपि जीव का परिमाण अणु है, तथापि ज्ञान विभु है क्योंकि ज्ञान वास्तव में आत्मा में व्याप्त है और आत्मा अमर है। इस कारण ज्ञान भी अविनाशी है। सुषुप्ति

आदि अवस्थाओं में ज्ञान सत् है, किन्तु वहाँ वह अभिव्यक्त नहीं है। जाग्रत अवस्था में वह अभिव्यक्त होता है।

जो ज्ञान दोषरहित तथा अकाट्य है वह प्रमाण है। प्रमाण के तीन भेद हैं-प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द। प्रत्यक्ष इन्द्रियों और विषय के संयोग से उत्पन्न ज्ञान है, अनुमान व्याप्तिज्ञान से उत्पन्न ज्ञान है। मैं अपने गुरु को देखता हूँ, यह प्रत्यक्ष ज्ञान है। सामने पहाड़ पर आग है क्योंकि वहाँ धुआं दिखाई देता है, यह अनुमान है। आप्तवाक्य से उत्पन्न ज्ञान शब्द प्रमाण है। आप्तवाक्य भी तीन प्रकार के है-आप्त, आप्ततर तथा आप्ततम। वेद आप्ततम प्रमाण है। मनुस्मृति आदि स्मृतियां आप्ततर हैं। उनका प्रामाण्य वेद-प्रामाण्य से कम है। श्रुतियों और स्मृतियों के व्याख्यान आप्त हैं। ब्रह्मसूत्र इस कोटि का शब्दप्रमाण है। पुराणों का प्रामाण्य स्मृति के समकक्ष है। किन्तु उनमें भी सात्त्विक, राजसिक, तामसिक

और संकीर्ण प्रकार हैं। सात्त्विक पुराणों के विषय हरि हैं, राजस के ब्रह्मा हैं, तामस के शिव हैं और संकीर्ण के सरस्वती हैं। इनके प्रामाण्य क्रमशः श्रेष्ठतम, श्रेष्ठतर, श्रेष्ठ और हीन हैं। केवल सात्त्विक पुराण ही मनुस्मृति के समकक्ष हैं। अन्य पुराणों का प्रामाण्य स्मृति-प्रामाण्य की तुलना में कम है। इस प्रकार प्रस्थानत्रयी में सर्वश्रेष्ठ उपनिषत् प्रमाण हैं, तदनन्तर भगवद्गीता है और अन्त में ब्रह्मसूत्र है।

इन तीनों प्रमाणों में प्रत्यक्ष तथा अनुमान सावध हैं। प्रत्यक्ष से मृगमरीचिका का भ्रम होता है। जिस अनुमान से पहाड़ पर अग्नि का ज्ञान होता है वह भी सावध है क्योंकि संभव है कि पहाड़ की अग्नि बुझ गई हो और उसका धुआं ऊपर दिखाई देता हो। किन्तु शब्दप्रमाण सर्वथा निरवद्य है। अनुमान के दो प्रकार हैं- स्वार्थानुमान और परार्थानुमान। परार्थानुमान में केवल तीन अवयव माने जाते हैं-प्रतिज्ञा, हेतु और उदाहरण (व्याप्तिसहित उदाहरण) । केवलान्वयी, केवलव्यतिरेकी तथा अन्वयव्यतिरेकी-इन अनुमान-भेदों को भी

वेदान्त-खण्ड

निम्बार्क मत में माना जाता है। इस मत में श्रुतिवाक्यों से भी व्याप्तिज्ञान होता है, जैसे ‘अविनाशी वा अरे आत्मा अनुच्छित्तिधर्मा’, इस वाक्य को एक व्याप्तिवाक्य माना जाता है

और इससे आत्मा की अमरता सिद्ध की जाती है। उपमान, अर्थापत्ति, अनुपलब्धि, संभव तथा ऐतिय, इन प्रमाणों का अन्तर्भाव उपर्युक्त तीन प्रमाणों में ही हो जाता है। उपमान का अन्तर्भाव अनुमान के उदाहरण अवयव में किया जाता है-‘उपमानस्य दृष्टान्तमात्रैकविग्रहत्येन अनुमानावयवे उदाहरणे अन्तर्भावः’ (प्रतिक्षगिरिवन, पृष्ठ २५४) । पुनश्च, निम्बार्कमत में अभाव को पदार्थ नहीं माना जाता है, अतः उसके लिए एक पृथक् या स्वतन्त्र प्रमाण की आवश्यकता नहीं है। अभाव का प्रत्यक्ष वास्तव में किसी विषय के साथ किसी अन्य संबन्धित विषय को न देखना है। अतः ऐसा ज्ञान प्रत्यक्ष के अन्तर्गत है। अर्थापत्ति तथा संभव का अन्तर्भाव अनुमान में है तथा ऐतिय का अन्तर्भाव शब्दप्रमाण में है। अतएव वे स्वतंत्र प्रमाण नहीं है।

शब्द की दो वृत्तियां हैं मुख्या और गौणा। मुख्या वृत्ति रूढ़ि, योग और योगरूढ़ि भेद से त्रिविध है। रूढ़ि सामुदायिक शक्ति है, जैसे हरि, नारद आदि में। वह दो प्रकार की है-पर्याय तथा अनेकार्थ। कर, हस्त, आदि पर्याय हैं। हरि अनेकार्थक है। योगवृत्ति अवयवशक्ति है, जैसे माधव, रमाकान्त आदि में। योगरूढ़ि में सामुदायिक शक्ति और अवयवशक्ति दोनों रहती हैं, जैसे सोम, पंकज आदि में।

गौणवृत्ति के दो भेद हैं-लक्षणा और गौणी। गौणी केवल विषय के गुणों से सम्बन्धित रहती है, विषय से नहीं, जैसे देवदत्त सिंह है। यहाँ पराक्रम, साहस आदि गुणों का बोध सिंह शब्द से होता है। लक्षणा त्रिविध है-जहत्, अजहत् और जहदजहत्। गंगा पर घोष है, यह जहत् लक्षणा का उदाहरण है। काक से दधि की रक्षा करो, यह अजहत् लक्षणा का उदाहरण है और ‘तत्त्वमसि’ इस वाक्य का अर्थ जहदजहत् लक्षणा का उदाहरण है।

की ‘तत्त्वमसि’ की व्याख्या करते हुए वेदान्तरत्नमंजूषाकार कहते हैं कि तत शब्द का अर्थ ईश्वर है, त्वम् शब्द का अर्थ जीव है और असि शब्द का अर्थ दोनों में भेदाभेद का सम्बन्ध है। अर्थात् जीव ईश्वर से भिन्न और अभिन्न दोनों है। ईश्वर स्वतंत्र सत्ता है और जीव परतंत्र सत्ता है क्योंकि वह ईश्वर के अधीन है। जब त्वम् शब्द का अर्थ अभेद होता है तो जहत् लक्षणा रहती है और जब उसका अर्थ भेद होता है तो अजहत् लक्षणा रहती है। ये दोनों अर्थ लाक्षणिक हैं, मुख्य या अभिधेय नहीं, क्योंकि त्वम् के अभिधेय अर्थ में उसके शरीर, इन्द्रिय आदि भी सम्मिलित हैं। यहाँ इन अर्थों से अभिप्राय नहीं है। इस प्रकार “एकमेवाद्वितीयम्” इस श्रुति का अर्थ करते हुए श्रुत्यन्तकल्पवल्लीकार कहते हैं कि एकम् का अर्थ है कि ईश्वर परम स्वतन्त्र है, अद्वितीयम् का अर्थ है कि ईश्वर के समान या उससे श्रेष्ठ कुछ नहीं है, और एव शब्द का अर्थ है कि ईश्वर के गुण स्वतन्त्र नहीं है, किन्तु ईश्वर के अधीन हैं।

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निम्बार्क-वेदान्त का इतिहास म अथवा एकम् का अर्थ है कि जीव स्वतंत्र नहीं हैं, अद्वितीयम् का अर्थ है कि प्रकृति या अजीव तत्त्व स्वतंत्र नहीं है और एव का अर्थ है कि ईश्वर के गुण ईश्वर से स्वतन्त्र नहीं हैं। इस प्रकार यह श्रुति कहती है कि चित्, अचित् तथा ईश्वर के स्वगत धर्म ईश्वर से स्वतन्त्र नहीं हैं। यहाँ स्पष्ट है कि ईश्वर सजातीय, विजातीय तथा स्वगतभेद को सुरक्षित रखते हुए अपनी स्वतन्त्र सत्ता को एकम् और अद्वितीयम् बनाये रखता है। यह मत

अद्वैतवाद तथा अन्य वैष्णव मतों से भिन्न है।

निम्बार्कमत में अद्वैतवाद के स्वतः प्रामाण्यवाद तथा परतः अप्रामाण्यवाद को माना जाता है। ख्यातिवाद में उनका सिद्धान्त सत्ख्यातिवाद है। अनन्तराय कहते हैं- जब किसी भम का बाध हो जाता है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उस भ्रम का विषय असत् है। यह सांप है, इस भ्रम को दूर करने पर यह नहीं सिद्ध होता कि रस्सी असत् है। समस्त ज्ञान सद्हेतुक हैं। मानम् मेयाधीनम् इस यथार्थवादी मत को निम्बार्की मानते हैं। इस आधार पर भम का कारण भी विषयगत है। पूर्ववर्ती ज्ञान कभी-कभी परवर्ती ज्ञान से बाधित हो जाता है और तब अपच्छेद न्याय से वहाँ सत्य के रूप में परवर्ती ज्ञान को मान्यता मिलती

५. तत्त्वमीमांसा

निम्बार्क ब्रह्म, चित् तथा अचित् इन तीन तत्त्वों को मानते हैं। ब्रह्म स्वतन्त्र तत्त्व है और चित् तथा अचित् ब्रह्माधीन हैं और इस कारण वे परतन्त्र तत्त्व हैं। ब्रह्म एक और अद्वितीय है नित्य तथा विभु है। वह सविशेष तथा निर्विशेष दोनों है। उसी को कृष्ण कहते हैं। गोपालपूर्वतापिनी-उपनिषद् में कृष्ण की व्याख्या यों है

कृषि वाचकः शब्दो नश्च निवृत्तिवाचकः ।

तयोरैक्यं परं ब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते।। - कृष्ण की अनन्त तथा अचिन्त्य शक्तियां हैं। उनके अनन्त गुण भी हैं। वहीं जगत् का अभिन्ननिमित्तोपादान कारण है। जगत्-सृष्टि से संबन्धित उनके गुण हैं-बल, वीर्य, शक्ति, तेज, ज्ञान और ऐश्वर्य । इन्हें षाड्गुणा कहा जाता है। इन्हें सत्, चित् और आनन्द में रखने पर ये ही गुण सच्चिदानन्द हो जाते हैं। इन गुणों में आनन्द की प्रधानता है। अन्य गुण आनन्द के ही उपकारक हैं। ‘रसो वै सः’, इस श्रुति से आनन्द ही ब्रह्म है, आनन्द ही कृष्ण है।

चित् जीव है। उसका स्वरूप ज्ञान है। जीव ज्ञान तथा ज्ञाता दोनों है। जीव धर्मी है, ज्ञान उसका धर्म है। यह धर्मधर्मिभाव वैसे ही है जैसे मणि तथा उसका प्रकाश ।

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वेदान्त-खण्ड

जीव कर्त्ता और भोक्ता भी है। जीव अणु है किन्तु उसका ज्ञान विभु है। उनकी संख्या असंख्य या अनन्त है। बद्ध तथा मुक्त इन दो वर्गों में उन्हें बांटा जाता है। बद्ध जीव भी बुभुक्षु और मुमुक्षु दो प्रकार के हैं। बुभुक्षु भी दो प्रकार के हैं-लौकिक भोग के इच्छुक और पारलौकिक भोग के इच्छुक। मुमुक्षु भी दो प्रकार के हैं-ब्रह्म से सारूप्य चाहने वाले और अपने स्वरूप को उपलब्ध करने वाले। इसी प्रकार मुक्त जीव भी दो प्रकार के हैं-नित्यमुक्त और बद्धमुक्त। नित्यमुक्त दो प्रकार के हैं-आनन्तर्य और पार्षद । बद्धमुक्त

भी दो प्रकार के हैं-ब्रह्म-स्वरूप पाने वाले तथा अपना स्वरूप पाने वाले।

अचित् तीन प्रकार का है-प्रकृति, काल और अप्राकृत। प्रकृति को ही प्रधान, माया, तमस्, अव्यक्त आदि कहा जाता है। वह सत्त्व, रजस् तथा तमस् इन तीन गुणों का आश्रय है। प्रकृति से समस्त जगत् की उत्पत्ति महत्, अहंकार आदि के क्रम से होती है। अन्त में शब्दतन्मात्रा से आकाश, गन्धतन्मात्रा से पृथिवी, स्पर्श-तन्मात्रा से वायु रस-तन्मात्रा से जल और रूप-तन्मात्रा से तेजस् (प्रकाश) की सृष्टि होती है। इन पांच महाभूतों से एक ब्रह्माण्ड का निर्माण होता है। पृथिवी इस ब्रह्माण्ड के मध्य में है। इसके नीचे क्रमशः अतल, वितल, नितल, गभस्तिमान, महातल, सुतल और पाताल हैं जिन्हें संक्षेप में सात पाताल कहा जाता है। सातों पाताल सहित पृथिवी को शेषनाग अपने फन पर धारण किये हुये हैं।

जितनी दूरतक सूर्य और चन्द्र का प्रकाश जाता है उतने प्रदेश को पृथिवी कहते हैं। प्रथिवी भूलोक है। उसके ऊपर भुवर्लोक है जो पृथिवी से सूर्यमण्डल तक है। भूवर्लोक के ऊपर स्वर्लोक है जो सूर्यमण्डल से लेकर ध्रुवचक्र तक है। यह ज्योतिश्चक्र है। स्वर्लोक यज्ञानुष्ठान की भोगभूमि है। इसके ऊपर महर्लोक है जहाँ कल्पान्तस्थायी भृगु आदि सिद्धगण रहते हैं। महर्लोक के ऊपर जनलोक है, जहाँ सनकादि रहते हैं। जनलोक के ऊपर तपोलोक है, जहाँ वैराज नामक देवगण रहते हैं। तपोलोक के ऊपर सत्यलोक है जिसे ब्रह्मलोक भी कहते हैं। यहाँ फिर न मरने वाले अमरगण रहते हैं। ब्रह्मलोक से लेकर पाताल तक एक ब्रह्माण्ड है। ब्रह्माण्ड के समस्त लोकों तथा पातालों का परिमाण विष्णुपुराण में दिया गया है। उसी आधार पर वेदान्तरत्नमंजूषा में ब्रह्माण्ड का वर्णन किया गया है। ऐसे

अनन्तकोटि ब्रह्माण्ड हैं। ये सभी प्राकृत-तत्त्व के विकास हैं। जागा

मा प्रकृति का यह परिणाम वैसे ही है जैसे सांख्यदर्शन में। किन्तु निम्बार्क सांख्य के प्रकृतिपरिणामवाद के स्थान पर शक्तिविक्षेपात्मक परिणामवाद को मानते हैं। केशव काश्मीरी कहते हैं कि सांख्य ब्रह्मानधिष्ठित स्वतन्त्र प्रकृति का स्वरूप परिणाम मानते हैं। किन्तु वेदान्ती जिस शक्तिपरिणामवाद को मानते हैं उसमें मूलकारण के स्वरूप की प्रच्युति नहीं होती और कार्य की उत्पत्ति भी हो जाती है। वस्तुतः कृष्ण सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् तथा अच्युतविभाव हैं। वे अपनी शक्ति को विक्षिप्त कर जगत् के आकार में अपनी आत्मा को अहिकुण्डवत् परिणत कर देते हैं। उनकी स्वभावसिद्ध अनन्त शक्तियां हैं। उनके विक्षेप से ही सृष्टि होती है।

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निम्बार्क-वेदान्त का इतिहास काल नित्य और विभु है। वह भूत, भविष्यत् और वर्तमान के व्यवहार का असाधारण कारण है। लौकिक ज्ञानमात्र में कालज्ञान अनुप्रविष्ट है। यह मत जर्मन दार्शनिक काण्ट के कालवाद के निकट है। काल सृष्टि-आदि का सहकारी और प्राकृत वस्तुमात्र का नियामक है।

अप्राकृत तत्त्व वह है जो प्रकृति का विकार नहीं है। वह प्रकृति और काल दोनों से परे है। वह सूर्य के प्रकृतिमण्डल के बाहर है। नित्यविभूति, विष्णुपद, परमव्योम, परमपद, ब्रह्मलोक आदि इसी के अन्य नाम हैं। यह भगवान् के तथा उनके नित्य और मुक्त भक्तों के भोग्य, भोगोपकरण और स्थान के रूप में विविध रूप धारण करता है। यह भगवान् के अनादि संकल्प से प्रकट होता है। अप्राकृत को ही वैकुण्ठ या महावैकुण्ठ कहा जाता है क्योंकि वहाँ किसी को किसी प्रकार की कुण्ठा नहीं रहती है। इससे सिद्ध होता है कि प्राकृतिक जगत् का मुख्य लक्षण जीवों की कुण्ठा है। मृत्युलोक में मनुष्य का मुख्य लक्षण यही कुण्ठा है। अप्राकृत का सर्वोच्च अंश गोलोक है जिसे नित्य और दिव्य वृन्दावन धाम कहा जाता है। पृथिवी पर स्थित वृन्दावन उसी की छाया है और उसे भौम वृन्दावन कहा जाता है। नित्य वृन्दावन में राधा-कृष्ण की लीलाएं नित्य होती रहती हैं।।

भगवान् श्रीकृष्ण का देह सच्चिदानन्दरूप है। वह स्वरूपतः अनन्त हैं, कल्याणगुणसागर हैं। निरतिशय आनन्द, सौन्दर्य, मार्दव, सौकुमार्य, लावण्य, औज्जवल्य आदि अनन्त गुणों से भगवान् सुशोभित हैं। उनके देह के प्रत्येक स्थान के दर्शन, स्पर्श, गमन आदि कार्य होते हैं और उसमें ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों का पृथक्-पृथक् अस्तित्व नहीं है। यही कारण है कि भगवान् को अप्राकृत कहा गया है और साथ ही सर्वग तथा सर्वकर्ता भी माना गया

अप्राकृत लोक में जो भक्त जाते हैं उन्हें भगवान् पहले अप्राकृत या दिव्य देह देते हैं जो कभी नष्ट नहीं होता है। उसी देह से भक्त भगवान के साम्य को प्राप्त करता है। अप्राकृत लोक भगवान का धाम है। भगवान् स्वयं धामी हैं। धाम और धामी में भेदाभेद का सम्बन्ध है।

  • इस प्रकार अन्य वैष्णव-दर्शनों की भाँति निम्बार्की भी तत्त्वत्रय (ब्रह्म, चित् और अचित्) या ५ तत्त्वों (ब्रह्म, जीव, प्रकृति, काल और अप्राकृत) को मानते हैं। किन्तु इन तत्त्वों के बीच क्या सम्बन्ध है? इस प्रश्न पर निम्बार्की विशिष्टाद्वैत और द्वैत का खण्डन करते हैं और द्वैताद्वैत या भेदाभेद का प्रतिपादन करते हैं। नमा ब्रह्म और जीव का सम्बन्ध स्वाभाविक भेदाभेद है। यही सम्बन्ध ब्रह्म और अचित का भी है। यह सम्बन्ध भास्कर के भेदाभेदवाद से भिन्न है, क्योंकि वह औपाधिक भेदाभेदवाद है। बलदेव विद्याभूषण के अचिन्त्यभेदाभेदवाद से भी यह भिन्न है, क्योंकि यह चिन्त्य, ध्येय और ज्ञेय है।३४८

देदान्त-खण्ड

गति

६. ब्रह्मवाद

ब्रह्म का वास्तविक स्वरूप नराकृति कृष्ण है। वह सदा राधा से युक्त रहता है। राधा के बिना माधव (हरि = कृष्ण) की सत्ता नहीं है और माधव के बिना राधा भी नहीं है। यह राधा कृष्ण की ही हलादिनी शक्ति है। कृष्ण का स्वरूप आनन्द है। औदुम्बराचार्य

औदुम्बरसंहिता में कहते हैं

‘करवलोलको वस्तुत एकरूपको राधामुकुन्दौ समभावभावितौ’। अर्थात् कृष्ण और राधा दोनों एकरूप हैं। दोनों में भेद करना दोष माना गया है

‘दोषाकरत्वाद्धि भिदानुवर्तिनाम् (औदुम्बरसंहिता) मिकिन युगल-मूर्ति का ध्यान, स्मरण,अर्चन, कीर्तन आदि निम्बार्कमत की उपासना-पद्धति है। काव्यशास्त्र की दृष्टि से इस मत में राधा कृष्ण की स्वकीया है। ‘अंगे तु वामे वृषभानुजां मुदा’, ऐसा निम्बार्क ने स्वयं दशश्लोकी में कहा है। गोलोक में ही दोनों का युग्मत्व नित्य स्थापित है। अतः भौम वृन्दावन में राधा वस्तुतः कृष्ण की विवाहिता ही हैं। पुराणों में जिस छाया राधिका की कला पायी जाती है उसे निम्बार्की परकीया मानते हैं। किन्तु नित्यलीला में जो राधा हैं वे कृष्ण की स्वकीया हैं। ब्रह्मविद्या के बीजमन्त्र में ही राधा और कृष्ण का यह संबंध निहित है।

र कृष्ण के अनेक व्यूह हैं। उनके चार व्यूह सृष्टि-प्रक्रिया से संबन्धित होने के कारण प्रसिद्ध हैं। ये हैं - वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध । इनके अतिरिक्त केशव आदि द्वादश व्यूह भी हैं। पुनश्च, कृष्ण अवतारी हैं। सृष्टि करने के लिए, उसकी रक्षा तथा उसका संहार करने के लिए, धर्म की स्थापना के लिए, अधर्म के निवारण के लिए और अपने भक्तों की इच्छा को पूरा करने के लिए वे अवतार लेते हैं। उनके अवतार त्रिविध हैं- गुणावतार, पुरुषावतार और लीलावतार । जगत् के स्रष्टा (ब्रह्मा), पालक (विष्णु) और संहारक (शिव) गुणावतार हैं। इन कार्यों के अन्य संपादक भी गुणावतार के अन्तर्गत हैं, जैसे मनु जो रक्षक हैं, दक्ष जो प्रजापति स्रष्टा हैं, आदि। पुरुषावतार भी तीन प्रकार के हैं- कारणार्णवशायी, गर्भोदशायी और क्षीरोदशायीं । प्रथम इस प्रकृति का नियन्ता है जिससे महत् उत्पन्न होता है। गर्भोदशायी समष्टि का अन्तर्यामी है और क्षीरोदशायी व्यष्टि का अन्तर्यामी है। लीलावतार द्विविध है-आवेशावतार और स्वरूपावतार। आवेशावतार भी द्विविध है-स्वांश-अवतार, जिसमें नर-नारायण आदि आते हैं और शक्त्वंश-अवतार । शक्त्यंश अवतार दो प्रकार के हैं-प्रभव और विभव। प्रभव में परशुराम, धन्वन्तरि आदि हैं और विभव में कपिल, व्यास, नारद आदि। अन्त में, स्वरूपावतार भी द्विविध है-पूर्ण

निम्बार्क-बेदान्त का इतिहास

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और अंशी। मत्स्य, वाराह आदि अंशी अवतार हैं। राम, कृष्ण, नृसिंह आदि पूर्ण अवतार हैं। यद्यपि भगवान् इन व्यूहों और अवतारों में अपने को अभिव्यक्त या प्रकट करता है, तथापि वह पूर्णतः अविकृत रूप से सदा विद्यमान भी रहता है। उसी के बारे में कहा गया

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात्पूर्णमुदच्यते।

पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते।। अतः भगवान् श्रीकृष्ण नित्य, पूर्ण, अनन्त, विभु, आप्तकाम, प्रभु, सर्वशक्तिमान् तथा अचिन्त्यशक्तिसंपन्न हैं।

श्रीकृष्ण समस्त हेय गुणों से रहित होने के कारण निर्गुण और निर्विशेष भी कहे गये हैं और साथ ही समस्त शुभ गुणों से युक्त होने के कारण सविशेष और सगुण भी माने गये हैं। वास्तव में निर्विशेषत्व और सविशेषत्व इस प्रकार एक दूसरे के बाधक नहीं हैं।

भगवान् के जिस विश्वरूप का दर्शन अर्जुन ने भगवद्गीता के अनुसार किया था वह भगवान का परमव्योम में विराजमान रूप है। वास्तव में वह भी श्रीकृष्ण से ही प्रकट हुआ है। अतएव नराकृति श्रीकृष्ण उस विश्वरूप से भी ऊर्ध्व हैं। समस्त ब्रह्माण्डों तथा उनके नियामकों से ऊर्ध्व होता हुआ भी वह सर्वव्यापी है क्योंकि जो कुछ भी है वह उसी में है। इस कारण एकमात्र सत्ता श्रीकृष्ण की है। यह अलग बात है कि यह सत्ता केवलाद्वैतवाद के अनुसार नहीं देखी जा सकती है, अपि तु भेदाभेदवाद के अनुसार द्रष्टव्य है। ब्रह्म के अस्तित्व को प्रत्यक्ष प्रमाण तथा अनुमान प्रमाणों से नहीं सिद्ध किया जा सकता है, क्योंकि यदि वह इन प्रमाणों से सिद्ध किया जाता तो वह उसका अस्तित्व इन प्रमाणों से निराकृत भी किया जा सकता था, क्योंकि इन प्रमाणों से जो स्थापित होता है वह त्रिकाल सत्य नहीं है। ब्रह्म के अस्तित्व को सिद्ध करने का मुख्य प्रमाण वेद और उपनिषद् हैं। फिर पुराण तथा स्मृतियाँ भी उसके अस्तित्व को सिद्ध करती हैं। समस्त शब्दप्रमाणों का समन्वय करके ब्रह्म के स्वरूप तथा कार्य का ज्ञान प्राप्त किया जाता है।

७. ब्रह्मसाक्षात्कार का साधन

ब्रह्म-प्राप्ति के ५ साधन हैं- १. कर्मयोग, २. ज्ञानयोग, ३. भक्तियोग, ४. प्रपत्तियोग और ५. गुरूपसत्तियोग। हाला १. कर्मयोग- कर्म तीन प्रकार के हैं नित्य, नैमित्तिक और काम्य। इनके अतिरिक्त, निषिद्ध कर्म हैं, जैसे परस्त्रीगमन, परधन-अपहरण, हत्या आदि। नित्यकर्म वर्ण और आश्रम के अनुसार भिन्न-भिन्न व्यक्तियों के लिए अलग-अलग हैं। नैमित्तिक कर्म वे हैं जो

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विशिष्ट अवसरों पर किये जाते हैं, जैसे चन्द्रग्रहण के अवसर पर गंगा-स्नान, अन्त्येष्टि कर्म आदि। काम्यकर्म अभ्युदय तथा स्वर्गप्राप्ति के लिए किये जाने वाले कर्म हैं।

अस्तेय, अहिंसा, इन्द्रियसंयम, तीर्थयात्रा, उपवास, शाकाहार, अन्नदान आदि सभी मनुष्यों के लिए कर्तव्य हैं। ये साधारण धर्म हैं। इसी प्रकार पूर्त भी सभी मनुष्यों के लिए काम्यकर्म हैं, जैसे तालाब खुदवाना, मंदिर बनवाना आदि। निषिद्धकर्म से नरक प्राप्त होता है। किन्तु यदि निषिद्धकर्म का प्रायश्चित्त कर लिया जाय तो नरक नहीं मिलता है। इसलिए प्रायश्चित्त का विधान महत्त्वपूर्ण है। वैसे प्रायश्चित्त का विधान स्मृतियों में बताये गये हैं। किन्तु निम्बार्की कहते हैं कि भगवान् श्रीकृष्ण के नामजप से ही प्रायश्चित्त हो जाता है। इसलिए जप और कीर्तन मनुष्य को सत्कर्म में लगाते हैं। मोक्षार्थी को काम्यकर्म तथा निषिद्धकर्म नहीं करने चाहिए, क्योंकि उनसे प्रवृत्ति ही पुष्ट होती है और नित्य तथा नैमित्तिक कर्म करने चाहिए अन्यथा उसके मार्ग में विघ्न आ जायेंगे -

मोक्षार्थी न प्रवर्तेत तत्र काम्यनिषिद्धयोः।

नित्यनैमित्तिके कुर्यात्प्रत्यवायजिहासये।। २.ज्ञानयोग- ज्ञान का तात्पर्य भगवान् के गुणों का अनुभव-विशेष है। उपनिषदों के नवण से अथवा गुरु के उपदेश से भगवान् के गुणों का परिचय मिलता है। निम्बार्क-मत में उपनिषद्-श्रवण से अधिक महत्त्व गुरु के उपदेश-श्रवण को दिया जाता है। उसपर शास्त्र के आधार पर चिन्तन करना मनन है। फिर स्वयं भगवान् के स्वरूप का या गुण का ध्यान करना निदिध्यासन है।

३. भक्तियोग- मन, वचन, कर्म तथा शरीर से निष्कामभाव से नित्य भजन करना भक्ति है। वह दो प्रकार की है- साधनभक्ति और फलभक्ति। अनुष्ठानों से जो भक्ति उत्पन्न होती है वह साधनभक्ति है। वह भी द्विविध है-वैदिकी और पौराणिकी। मधुविद्या आदि ब्रह्मविद्या से उत्पन्न भक्ति वैदिकी है। पुराणोक्त ईश्वर की आराधना करना पौराणिकी भक्ति है। इन दोनों से भिन्न प्रेमाभक्ति है। वह भगवान् की कृपा से मिलती है। वह फल-भक्ति है। उसी को परा भक्ति, प्रेमलक्षणाभक्ति, धुवा स्मृति आदि कहते हैं। सत्संग से वह बढ़ती है। उसका लक्ष्य भगवत्प्राप्ति है। ऐसे भक्त को भगवान् की चरणसेवा के अतिरिक्त और कोई चीज प्रिय नहीं है। वह सभी पुरुषार्थों को इस इष्ट के सामने तृणवत् मानता है।

४.प्रपत्तियोग- प्रपत्तियोग निरपेक्ष साधन है। उसे किसी अन्य साधन या सहकारी की आवश्यकता नहीं है। जब भक्त भगवान् की शरण में जाता है और अहर्निश केवल भगवान की प्रार्थना करता रहता है तब उसे प्रपत्ति-रूप भक्ति प्राप्त होती है। यह षोढा (छ: प्रकार) की है।

निम्बार्क-वेदान्त का इतिहास आनुकूल्यस्य संकल्पः प्रातिकूल्यस्य वर्जनम्। रक्षिष्यतीति विश्वासो गोप्तृत्ववरणं तथा। जला शिमला कर

आत्मनिक्षेपकार्पण्ये षड्विधा शरणागतिः।। अर्थात् (१) जो भगवान् के अनुकूल है उसे ही करना, (२) जो भगवान् के प्रतिकूल है उसका परित्याग करना, (३) यह विश्वास करना कि भगवान् मेरी रक्षा करेंगे, (५) यह वरण करना कि भगवान् मेरे संरक्षक हैं, (५) आत्मनिवेदन करना तथा (६) अपने को अकिंचित्कर (कृपण दीन-किंकर) मानना- ये इसके छ: प्रकार हैं। शरणागतिरूप प्रपत्ति के लिए भगवान् की गीतोक्ति प्रमाण है- ‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज’।

५.गुरूपसत्ति- इसे गुरु-आज्ञानुवृत्ति भी कहते हैं। जब कोई व्यक्ति स्वयं अपना हित-अहित नहीं सोच पाता और सदैव संशय में रहता है तब उसके संशय का निराकरण

और उसको हित में लगाना गुरु का कार्य है। (१) वह पहले गुरु के पास जाता है और अपनी समस्या रखता है। (२) फिर वह गुरु की शरण में जाता है। (गुरु-मंत्र लेता है, दीक्षित होता है) और गुरु की आज्ञा का पालन करता है। (३) गुरु उसकी रक्षा करता है, (४) वह उसे मोक्ष की ओर ले जाता है और (५) अन्त में, गुरु उसके मोक्ष के लिए जो भी आवश्यक है वह करता है। इस साधन में शरणागत हो जाने पर शिष्य का कार्य केवल गुरु आज्ञा का पालन करना है और उसके अभ्युदय तथा निःश्रेयस की देखभाल उसका गुरु करता है। इसीलिए गुरु का निम्न लक्षण किया गया है -

ज्ञापयेद् यः परं तत्त्वं प्रापयेच्च परं पदम्।

गमयेच्च परं धाम स गुरुः परमेश्वरः।। इन साधनों में से किसी एक का आश्रय लिया जा सकता है। उससे मोक्षप्राप्ति संभव

८. मोक्षवाद

उपर्युक्त साधनों में से किसी का अवलम्बन करने से भगवान भक्त से प्रसन्न हो जाते हैं और किसी बहाने से वह उसके समक्ष प्रकट होकर उसे दर्शन देते हैं। भक्त इस प्रकार भगवान् का साक्षात्कार करने पर अपने अहंभाव और ममत्वभाव को नष्ट कर देता है। तब भगवान् उसे अप्राकृत या दिव्यविग्रह प्रदान करते हैं और वह भगवान् से साम्य या साधर्म्य का अनुभव करता है। यह सायुज्य ही मोक्ष या मुक्ति है। भक्त सायुज्य पाने पर भी भगवान के ऐश्वर्य में और उसके जगद्व्यापार में समानता नहीं प्राप्त कर सकता है। किन्तु सर्वज्ञता, सौशील्य, माधुर्य, सौन्दर्य, धैर्य आदि गुणों को वह पूर्णतः प्राप्त कर लेता है।

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वेदान्त-खण्ड

ऐसे भक्त मृत्यु के अनन्तर अर्चिरादिमार्ग से ब्रह्मलोक तक जाते हैं। ब्रह्मलोक से पुनः श्रीकृष्ण उसे अपने गोलोक में ले जाते हैं। वहाँ से उसकी पुनरावृत्ति नहीं होती है। वह अजर-अमर हो जाता है।

जिन जीवों को ऐसा सायुज्यलाभ नहीं होता वे अपने कर्म के फलानुसार नरकगामी, पितृलोकगामी या स्वर्गगामी होते हैं। वहाँ जब उनका पुण्य या पाप क्षीण हो जाता है तो वे पुनः मृत्युलोक में जन्म लेते हैं। जब तक सायुज्य-लाभ नहीं होता तब तक जन्म-मरण-चक्र रूपी संसार चलता रहता है। इसे पार करने के लिए सायुज्य-लाभ के लिए यत्न करना चाहिए।

स्पष्ट है कि मुक्त अवस्था में भी जीव तथा ईश्वर में भेदाभेद संबंध है और जीव-ब्रह्म की पूर्ण अभिन्नता या एकता नहीं है। सायुज्य का तात्पर्य भगवान् के आनन्द-स्वरूप से तादात्म्य स्थापित करना है। इस अनुभव की अभिव्यक्ति मधुरा भक्ति या प्रेमलक्षणा भक्ति में अधिक हुई है। इसलिए यह माधुर्यभाव निम्बार्क-वेदान्त से अभिन्न रूप से जुड़ गया है।

६. निम्बार्क-वेदान्त का प्रभाव

निम्बार्कमत से वृन्दावन का सखी-सम्प्रदाय प्रादुर्भूत हुआ है। इसके प्रवर्तक स्वामी हरिदास थे जो १५वीं शती में विद्यमान थे। पहले वे निम्बार्की थे और बाद में उन्होंने राधाकृष्ण के युगलभाव की अपनी विशिष्ट उपासना कर ली। वे एक महान संगीतज्ञ थे। उनके अनेक पद हिन्दी में हैं।

राधावल्लभीय सम्प्रदाय भी निम्बार्कमत से ही वृन्दावन में उत्पन्न हुआ। इसके प्रवर्तक स्वामी हितहरिवंश थे जिसका जन्म १५०३ ई. में हुआ था। वे कृष्ण की अपेक्षा राधा को अधिक महत्त्व देते थे। संस्कृत में उनका २६० श्लोकों में लिखा गया, ‘राधासुधानिधि नामक ग्रन्थ है जिसमें रसिकों की प्रेमा-भक्ति का निरूपण है। हिन्दी में उनका ग्रन्थ हितचौरासी है जिस पर धरणीधर, सुखलाल, लोकनाथ, जुगलदास, प्रेमदास, केलिदास, रतनदास, आदि की टीकाएँ हैं। रीवांनरेश विश्वनाथ सिंह राधावरएनभीय मत को मानते थे। इस मत के आधार पर उन्होंने ब्रह्मसूत्र का राधावल्लभीय भाष्य लिखा है। अध्यात्मरामायण पर उन्होंने इस मतानुसारी एक टीका लिखी है। रसिक सम्प्रदायों में आजकल राधावल्लभीय मत को ही प्रमुख माना जाता है। किन्तु रसिक सम्प्रदाय चैतन्यमत और वल्लभमत से भी संबंधित है, निम्बार्कमत का तो वह प्राण ही है। इस प्रकार वृन्दावन में निम्बार्क ने जो रसोपासना चलाई वह विभिन्न रूपों में आज तक चल रही है। उसका प्रभाव राजस्थान के किशनगढ़ की चित्रकला पर भी बहुत पड़ा है। वस्तुतः काव्य, संगीत, कला और धर्म सबको उन्होंने प्रभावित किया है। व्रजसंस्कृति में जितना योगदान वल्लभ, चैतन्य तथा अन्य आचार्यों का है, कम से कम उतना ही योगदान निम्बार्क तथा उनके अनुयायियों का भी है।

निम्बार्क वेदान्त का इतिहास

सन्दर्भ ग्रन्थ

वातावरी प्रहार

याला का

१. डा. रमा चौधरी, वेदान्तपारिजात सौरभ एण्ड वेदान्त कौस्तुभ (अंग्रेजी के अनुवाद)

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राधा-अंक और लीला-अंक भी द्रष्टव्य हैं।

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वेदान्त-खण्ड १४. डा. उमेश मिश्र, निम्बार्क स्कूल आफ वेदान्त, यूनिवर्सिटी आफ इलाहाबाद स्टडीज,

इलाहाबाद, १६४०.

(१०५ पृष्ठों का निबन्ध) विश्वविद्यालय, इलाहाबाद, १६४० १५. बलदेव उपाध्याय, भारतीय वाङ्मय में श्रीराधा, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना,

१६३. १६. भण्डारकर, सर रामकृष्ण गोपाल, वैष्णविज्म, शैविज्म एण्ड माइनर रिलीजस

सिस्टम्स, भण्डारकर ओरियन्टल रिसर्च इन्स्टीच्यूट, पूना, १६२८.

तृतीय अध्याय

की

RAPIED

सहा