१. रामानुजोत्तर-विशिष्टाद्वैत-साहित्य
रामानुज के बाद विशिष्टाद्वैत-साहित्य का बहुत अधिक विकास हुआ। सबसे अधिक साहित्य उनके श्रीभाष्य के व्याख्यान, टिप्पणी, संक्षेप, संग्रह और सार (सारांश) से सम्बन्धित है। श्रीभाष्य पर जो व्याख्याएं लिखी गयी हैं उनमें से अधिकांश अभी तक अप्रकाशित हैं। जो प्रकाशित व्याख्याएं हैं उनकी भी संख्या बहुत अधिक है। श्रीभाष्य की निम्नलिखित व्याख्याएं उल्लेखनीय हैं १. राममिश्र देशिककृत श्रीभाष्यविवृति जो ६ अध्यायों में श्रीभाष्य का संक्षेप प्रस्तुत
करती है। राममिश्र देशिक रामानुज के साक्षात् शिष्य थे। २. सुदर्शनसूरिने श्रीभाष्य पर दो व्याख्याएं लिखी हैं,(9) श्रुतप्रकाशिका और
(२) श्रुतप्रदीपिका। इनमें से श्रुतप्रकाशिका श्रीभाष्य की समस्त टीकाओं में सर्वश्रेष्ठ है। अतः उसका महत्त्व विशिष्टाद्वैत वेदान्त में सर्वाधिक है। इस पर भी कई टीकाएं लिखी गयी हैं जिनमें से (9) वीरराघवदासकृत भावप्रकाशिका, (२) महाचार्य के शिष्य श्रीनिवासकृत टीका, (३) शठकोपाचार्यकृत भाष्यप्रकाशिका दूषणोद्धार और (४) वाधूल श्रीनिवासकृत तूलिका मुख्य हैं। सुदर्शनसूरि ने रामानुज के वेदार्थसंग्रह पर भी तात्पर्यदीपिका नामक एक व्याख्या लिखी है। उनके रचित अन्य ग्रन्थ हैं शरणागतगद्यभाष्य, सुबालोपनिषद्भाष्य और सन्ध्यावन्दनभाष्य। वे वात्स्यवरद के शिष्य थे। प्रायः उन्हें वेदव्यास भट्टार्य कहा जाता है। उनका समय १३वीं शती का उत्तरार्ध और १४वीं शती का पूर्वार्धं माना जाता है। उनकी श्रुतप्रकाशिका को लेकर सम्प्रदाय में कुछ ग्रन्थ उसके खण्डन के लिए भी लिखे गये हैं। उस खण्डन के
निराकरण हेतु ऊपर लिखित ग्रंथ भाष्यप्रकाशिका दूषणोद्धार लिखा गया है। ३. वात्स्यवरद ने, जो रामानुज की बहिन के लड़के थे, श्रीभाष्य पर तत्त्वसार नामक
टीका लिखी है। वीर राघवदास ने तत्त्वसार का खण्डन रत्नसारिणी में किया है। वात्स्यवरद ने तात्पर्यदीपिका नामक एक और टीका श्रीभाष्य पर लिखी है। ये सुदर्शनसूरि के शिक्षक थे। इनके तत्त्वनिर्णय आदि अन्य ग्रन्थ भी हैं। अद्वैत वेदान्ती अप्पय दीक्षित ने श्रीभाष्य पर नयमुखमालिका नामक एक व्याख्या-ग्रन्थ लिखा है। यह उल्लेखनीय है कि उन्होंने रामानुज-शृंगभंग नामक ग्रन्थ लिखकर
रामानुजमत का खंडन भी किया है।
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रामानुजोत्तर-विशिष्टाद्वैत-वेदान्त ५. वेंकटनाथ या वेदान्तदेशिक ने श्रीभाष्य पर तत्त्वटीका लिखी है। उनका समय १४वीं
शती है। वे विशिष्टाद्वैत वेदान्त के बड़कलै मत के संस्थापक हैं। वे सुयोग्य कवि, उच्चकोटि के भक्त, प्रखर नैयायिक तथा आचार्य थे। उन्होंने संस्कृत और तमिल दोनों में ग्रन्थ लिखे। उसके साथ ही उन्होंने कुछ ग्रन्थ मणिप्रवालशैली में (अर्थात् संस्कृत-तमिल-मिश्र भाषा में) भी लिखे। तत्त्वटीका के अतिरिक्त श्रीभाष्य से संबंधित इनके दो और ग्रन्थ हैं-अधिकरण सारावली और मुक्ताकलाप। दोनों ग्रन्थ पद्य में हैं। न्याय में उन्होंने न्यायपरिशुद्धि तथा न्यायसिद्धांजन नामक ग्रन्थ लिखे। साहित्य में उन्होंने हंससन्देश, यादवाभ्युदय, सुभाषितनीति आदि लिखे। उनके लगभग ३२ भक्तिस्तोत्र प्रसिद्ध हैं। भक्तिशास्त्र और रहस्यवाद पर उनके कई ग्रन्थ हैं। प्रपत्ति के बारे में उनका अपना मत है जो टैंकले मत से भित्र है। उन्होंने विशिष्टाद्वैत को परमतखण्डन की ओर एक नया मोड़ दिया और परमतभंग नामक एक ग्रन्थ तमिल में लिखा। इन कृतियों के अतिरिक्त उन्होंने अद्वैतवेदान्त का विशेष खण्डन करने के लिए संस्कृत में शतदूषणी नामक एक ग्रन्थ लिखा। इस पर रामानुजदास ने चण्डमारुत नामक एक सुन्दर टीका लिखी है। इसी नाम से इसकी एक टीका नसिंहराज ने भी की है। श्रीनिवासाचार्य ने इस पर सहस्रकिरणी नामक टीका लिखी है। बीसवीं शती के उत्तरार्ध में अद्वैतवादी अनन्तकृष्ण शास्त्री ने शतभूषणी लिखकर शतदूषणी का खण्डन किया है। उनको दो विशिष्टाद्वैतवादियों ने प्रत्युत्तर भी दिया है। एक हैं उत्तमूर ति. वीरराघवाचार्य जिन्होंने परमार्थभूषणम् लिखकर शतभूषणी का खण्डन किया और दूसरे हैं डी.टी. ताताचार्य जिन्होंने विशिष्टाद्वैतसिद्धि लिखकर ऐसा किया। इस प्रकार शतदूषणी से जो खण्डन-पद्वति
आरम्भ हुई वह आज तक चल रही है। अधिकरण सारावली का २५वाँ श्लोक सम्प्रदाय में बहुत प्रसिद्ध है, क्योंकि उसमें कहा गया है कि वकुलभृत्किंकर (न्यायसुदर्शनकर्ता), वरद नारायण (भट्टारक), व्यासार्य (सुदर्शनसूरि), विष्णुचित्त (प्रमेयसंग्रहकर्ता), वादिहंसाम्बुवाह (न्यायकुलिशकर्ता) इत्यादि मानते हैं कि ब्रह्मसूत्र के प्रथम चार अधिकरण (चतुःसूत्री) समस्त ब्रह्मविद्या के उपोद्घात हैं। “यत्तत्सेनेश्वरायैर्रगणि वकुलभृत्किकरै र्व्यगथकारि व्यासायासि च दिवः श्रुतमितिविशदं विष्णचित्त-विववे। अश्रोषंशेष कल्यादमपि विदुषो वारिहंसाम्बुवादात् अद्धानिर्धायते
चतुर-धिकरणी ब्रह्मचिन्तोपयुक्ता”। मेघनादारि ने श्रीभाष्य पर नयप्रकाशिका नामक एक टीका लिखी। उनका समय १४वीं शती है। इसके अतिरिक्त नयधुमणि, भावप्रबोध और मुमुक्षुपापसंग्रह उनके ग्रन्थ हैं।
नयामणि विशिष्टाद्वैत वेदान्त का एक अत्यन्त श्रेष्ठ ग्रन्थ है। ७. परकालयति ने श्रीभाष्य पर मितप्रकाशिका नामक टीका लिखी। इनका समय १५वीं
शती है।२२८
वेदान्त-खण्ड
द, परकालयति के शिष्य रंगरामानुज ने मूलभावप्रकाशिका नामक एक टीका श्रीभाष्य पर
लिखी और शारीरकशास्त्रदीपिका नामक एक टीका ब्रह्मसूत्र पर लिखी। उन्होंने वेंकटनाथ के न्यायसिद्धांजन पर व्याख्या नामक एक टीका तथा छान्दोग्य और बृहदारण्यक उपनिषद् पर विशिष्टाद्वैतवादी भाष्य लिखे। उनके अन्य ग्रन्थ हैं
द्रामिडोपनिषद्भाष्य, विषयवाक्यदीपिका तथा रामानुजसिद्धान्तसार। ६. किसी अज्ञातनामा व्यक्ति ने श्लोकों में श्रीभाष्यवार्तिक लिखा है जो अत्यन्त उपयोगी
१०. वेंकटनाथ के शिष्य चम्पकैश ने श्रीभाष्यव्याख्या और गुरुतत्त्वप्रकाशिका नामक दो
टीकाएं लिखीं। ११. श्री निवासाचार्य ने श्रीभाष्य की आलोचना ब्रह्मविद्याकौमुदी में की है। १२. श्रीशैल श्रीनिवास ने श्रीभाष्य पर तत्त्वमार्तण्ड नामक टीका लिखी। उनका समय
१६वीं शती हैं। उनके अन्य ग्रन्थ हैं-अद्वैतवनकुठार, भेदमणि, भेददर्पण, विरोध-निरोध, मुक्तिदर्पण, ज्ञानरलदर्पण, नयधुमणि और नयधुमणिसंग्रह। अन्तिम दोनों ग्रन्थ मेघनादारि के नयधुमणि से भिन्न हैं। विरोध-निरोध इनका अत्यन्त गंभीर तथा महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इनमें उन्होंने शांकरमत तथा माध्वमत का खण्डन करते हुए
स्वमत का प्रतिपादन किया है। १३. महाचार्य अपरनाम रामानुजदास ने श्रीभाष्य पर ब्रह्मसूत्रभाष्योपन्यास नामक टीका
लिखी। इसके अतिरिक्त इनके गंथ है-पाराशर्य विजय, ब्रह्मविद्याविजय, वेदान्तविजय, रहस्यत्रयमीमांसा, रामानुजचरित्रचुलुक, और अष्टादशरहस्यार्थ निर्णय। चण्डमारुत के भी लेखक ये ही हैं। इसका समय १५वीं शती है। इनका प्रथम ग्रन्थ प्रसिद्ध और
लोकप्रिय है। १४. सेनापति मिश्र या सेनेश्वर ने शारीरकन्यायकलापसंग्रह नामक टीका लिखी। ब्रह्मसूत्र
के सोलह पादों के वर्ण्यविषयों को इसमें निम्न श्लोकों में व्यक्त किया गया है
प्रमाणता तत्प्रतियोगिभंगः संराधनं तस्य फलोपभोगः। एतानि सम्यक् परिचिन्तितानि शास्त्रे विहाध्यायचतुष्टयेन।।
अस्पष्टतरमस्पष्टं स्पष्टं छायानुसारि च। जीवप्रथानयोरादौ वाक्यजातं विचारितम् ।।
स्मृतिन्यायविरोधश्च परपक्षपराहतिः। कार्यता विपदादीनामक्षादेश्च द्वितीयतः॥
जग
RRE
रामानुलोत्तर-विशिष्टाद्वैत-वेदान्त सदोषत्वमदोषत्वं जीवस्य च परस्य च। तृतीयेन परोपास्तिरिति कर्तव्यताऽपि च।।
उपास्त्यनुष्ठानविद्या गत्युपक्रम एव च।
गतिमार्गप्रकारश्च फलं चापि चतुर्थतः।। अर्थात् प्रमाणता (समन्वय), तत्प्रतियोगिभंगः (अविरोध), संराधन (साधन) और फलोपभोग (फल)- ये ब्रह्मसूत्र के क्रमशः चार अध्याय हैं। प्रथम अध्याय के चार पादों के विषय क्रमशः ये हैं-स्मृतिन्यायविरोध का परिहार, परपक्ष पराहति (सांख्यादि परपक्षी का विरोध (परिहार), आकाश आदि की कार्यता का प्रतिपादन और अक्षादि इन्द्रियों की कार्यता का प्रतिपादन और तृतीय अध्याय के चारों पादों में क्रमशः जीव का सदोषत्व, परब्रह्म का आदोषत्व, परब्रह्म की उपासना तथा इतिकर्तव्यता। चतुर्थ अध्याय के चार पादों के विषय हैं क्रमशः उपासना-विधि, गतिक्रम, गति
मार्गभेद दिवयान, पितृयान आदि) और फल। १५. उत्तमूर ति. वीरराघवाचार्य ने १६६३-६४ में श्रीभाष्य पर भाष्यार्थदर्पण नामक टीका
लिखी। इनके अतिरिक्त श्रीभाष्य का टीका-साहित्य है-शुद्धसत्त्व लक्ष्मणाचार्य (गुरुभाव प्रकाशिका) देशिकाचार्य (प्रयोगरत्नमाला), नारायणमुनि (भावप्रदीपिका) पुरुषोत्तम (सुबोधनी) श्रीनिवास ताताचार्य (लघु प्रकाशिका) श्रीवत्सांक श्रीनिवास (श्रीभाष्य सारार्थसंग्रह), शठकोप (ब्रह्मसूत्रार्थसंग्रह) रंगाचार्य (श्रीभाष्यसिद्धान्तसार) श्री निवासाचार्य (श्रीभाष्योपन्यास) आदि अनेक विद्वानों ने श्रीभाष्य पर टीकाएं लिखी हैं। वास्तव में रामानुज-दर्शन में जितना विपुल टीकासाहित्य श्रीभाष्य पर है उतना किसी अन्य ग्रन्थ पर नहीं है। इससे सिद्ध होता हैं कि सम्प्रदाय में श्रीभाष्य का अध्ययन-अध्यापन बड़ी गहराई से होता आया है। महाचार्य अपरनाम रामानुजदास के शिष्य श्रीनिवास ने, जिन्होंने श्रुतप्रकाशिका पर एक टीका लिखी है, यतीन्द्रमतदीपिका नामक एक संग्रह-ग्रन्थ लिखा है जो रामानुज-वेदान्त का एक उत्तम पाठ्यग्रन्थ है। रामानुज ने श्रीरंगम् में भगवान् रंगनाथ के विग्रह की उपासना की थी और वहाँ एक मठ स्थापित किया था। इस मठ की परम्परा में आलवारों की कृतियों का बड़ा प्रभाव है। रामानुज के बाद जो मठाधीश हुए वे प्रायः सभी-आलवार भक्तों के गीतों पर टीकाग्रन्थ लिखे। उनके ग्रन्थ तमिल तथा संस्कृत दोनों में हैं। वे मुख्यतः द्रविड़ वेदान्त के उन्नायक थे। द्रविड़ आलवारों की गीतियों में उपनिबद्ध वेदान्त है। रामानुज के ७४ प्रमुख शिष्य थे, उनमें से एक कुरेश या तिरुक्कुरुकैप्यिरन् पिल्ले थे। इन्होंने नाम्मालवार की सहस्ररीति पर ६००० श्लोकों की एक टीका लिखी। पराशर भट्टाचार्य
वेदान्त-खण्ड ने १००० श्लोकों में, अभयप्रदराज ने २४००० श्लोकों में और कालिजित् या लोकाचार्य प्रथम के शिष्य कृष्णपाद ने ३६,००० श्लोकों में उस पर टीकाएं लिखीं। रम्य (या सौम्य) जामातृ मुनि ने १२००० श्लोकों में उसकी व्याख्या की। अभयप्रदराज की टीका इन सब में अधिक उपयोगी है। पराशर भट्टाचार्य श्रीरंगम् में रामानुज के उत्तराधिकारी थे। उनके बाद क्रमशः वेदान्ती माधव, कालिजित् (लोकाचार्य प्रथम) तथा लोकाचार्य पिल्ले द्वितीय उसके पीठाचार्य हुए। लोकाचार्य वरिष्ठ सौम्य जामातृ मुनि इन्हीं लोकाचार्य के अनुज थे। पिल्ले लोकाचार्य के तीन ग्रन्थ संस्कृत में हैं-तत्त्वत्रय, तत्त्वशेखर और श्रीवचनभूषण। कहा जाता है कि उन्होंने १५ और ग्रन्थ लिखे थे, किन्तु वे उपलब्ध नहीं हैं। तत्त्वत्रय ११४ अनुच्छेदों में विभक्त एक लघुग्रन्थ है जिसमें चित, अचित् और ईश्वर इन तीन तत्त्वों का निरूपण है। तत्वशेखर चार प्रकरणों में विभक्त है। प्रथम प्रकरण में नारायण को जगत् का कारण बताया गया है। द्वितीय और तृतीय प्रकरण में आत्मा के स्वरूप का वर्णन शास्त्र-प्रमाण के आधार पर किया गया है। चतुर्थ प्रकरण में ईश्वर और उसके शरणागमन का वर्णन है। श्री वचनभूषण मणिप्रवालशैली में लिखा गया ग्रन्थ है। इसमें कुल ४८४ अनुच्छेद हैं। इसमें प्रपत्ति का सुविस्तृत वर्णन है। ज्ञानदशा, वरणदशा, प्राप्त-दशा तथा प्राप्य के अनुभव की दशा, इन चार सोपानों में प्रपत्ति का निरूपण किया गया है। श्री वचनभूषण चार प्रकरणों में विभक्त है। गोवर्धन रंगाचार्य ने उसका अनुवाद संस्कृत में किया। वरवर मुनि ने उस पर संस्कृत में टीका लिखी। रामप्रपन्नाचार्य ने वरवरमुनि की टीका सहित श्रीवचनभूषण के संस्कृतानुवाद का हिन्दी अनुवाद रहस्यमंजरी नाम से किया है जो पुरी के राजगोपाल मठ से १E२६ में प्रकाशित है। श्री वचनभूषण सारतम शास्त्र है। अन्य शास्त्र असार, अल्पसार, सार या सारतर ही हैं।
असारमल्पसारं च सारं सारतरं त्यजेत् ।
भजते सारतमं शास्त्रं रत्नाकर इवामृतम्।।। जो शास्त्र ऐहिक उपायोपेय के प्रतिपादक हैं वे असार हैं। जो शास्त्र आत्मानुभवरूप कैवल्यमुक्ति के प्रतिपादक हैं वे अल्पसार हैं। फिर जो शास्त्र कर्मज्ञानसहित भक्ति के प्रतिपादक हैं वे सार हैं। स्वगत स्वीकाररूप प्रपत्ति के उपाय-प्रतिपादक शास्त्र सारतर हैं। बड़कलैमत के शास्त्र इस रीति में हैं। अन्त में परगत स्वीकार-रूप-प्रपत्ति के उपाय प्रतिपादक शास्त्र सारतम है। श्रीवचनभूषण इस प्रकार सर्वश्रेष्ठ शास्त्र है। ।
श्रीवचनभूषण के अनुसार वेद प्रबलतम प्रमाण है। उसके पूर्वभाग (कर्मकाण्ड) का निर्णय इतिहास-पुराण से होता है।
प्रायेण पूर्वमागार्थपूरणं धर्मशास्त्रतः। इतिहासपुराणाभ्यां वेदान्तार्थः प्रकाश्यते।।
रामानुजोत्तर-विशिष्टाद्वैत-वेदान्त लोकाचार्य वेदान्तदेशिक के समकालीन थे और टेकलै मत के प्रतिपादक थे। उनके श्रेष्ठ अनुयायी वरवरमुनि थे। उनका समय १३७०-१४४३ ई. है। वे द्रविड़ वेदान्त के उत्कृष्ट विशेषज्ञ थे और मणिप्रवालशैली में कई ग्रन्थ लिखे। उनके आठ शिष्य प्रसिद्ध हैं। उनके पुत्र का नाम रामानुजार्य था और पौत्र का नाम विष्णुचित्त था। इन सभी ने उनकी परम्परा को अग्रसर किया। उनका इतना प्रभाव था कि वे रामानुज के बाद रामानुज की ही भांति पूज्य माने गये। दक्षिण के मन्दिरों में उनकी प्रतिमा की पूजा आज तक प्रचलित है। उनकी कृतियों में यतिराजविंशति, गीतातात्पर्यदीप, श्रीभाष्यरथ, तैत्तिरीयोपनिषद्भाष्य, परतत्त्वनिर्णय, रहस्यत्रयटीका, आचार्यहृदय, प्रियालवार, विरुमोरिटीका, ज्ञानसारटीका, प्रयोगसारटीका, सप्तगाथाटीका, दिव्यप्रबन्धटीका आदि ग्रन्थ हैं। उन्होंने संस्कृत तथा तमिल में अनेक भक्तिस्तोत्र भी लिखे। उनके ऊपर भी अनेक ग्रन्थ लिखे गये जिनमें वरवर मुनीसिचर्या, वरवरमुनिशतक, वरवरमुनिचम्पू, यतीन्द्रप्रवणप्रभाव और यतीन्द्रप्रवणप्रभाव चम्पू मुख्य हैं। दिव्य प्रबन्धम् के पाठ के बाद मंदिरों में उनका रचित उपदेश रत्नमाला (तमिल में) तमिल में पढ़ा जाता है। उनके पौत्र अभिराम पराचार्य ने इसका संस्कृत में अनुवाद किया है।
स्पष्ट है कि कनिष्ठ जामातृमुनि को वरवरमुनि या यतीन्द्रप्रवण कहा गया है। उनके अन्य नाम मनबल महामुनि तथा पेरियजियर हैं। वे देवराज (देवरात) के पुत्र श्रीशैल के शिष्य थे। जैसे बड़कलै मत में आत्रेय रामानुज से “पात्रम्" का शुभारम्भ किया जाता है (दुराप्य रामानुज दयापात्रम्) वैसे टेकलै मत में यह पात्रम् श्रीशैल के नाम से शुरू होता है। इस प्रकार टेकले मत की पूजापद्धति पर श्रीशैल और वरवर मुनि का बड़ा प्रभाव है।
ऐतिहासिक कालक्रम का प्रभाव-रामानुज वेदान्त के साहित्य पर बहुत कम पड़ा है। बड़कलैमत संस्कृत को अधिक महत्त्व देते हुए उपनिषदों तथा श्रीभाष्य के अनुशीलन में अधिक लगा रहा और टेकलैमत तमिल को अधिक महत्त्व देते हुए दिव्य प्रबन्धम् विशेषतः शठकोप की सहस्रगीति का विशेष अध्ययन करता रहा। नव्यन्याय का प्रभाव इस साहित्य पर उतना नहीं पड़ा जितना अद्वैत वेदान्त पर पड़ा। सत्रहवीं शती तक रामानुज वेदान्त के अनेक महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ रचे जाते रहे। अट्ठारहवीं और उन्नीसवीं शती में भी उनके परम्परागत अनुशीलन और लेखन का प्रचार था। बीसवीं शती में अंग्रेजी, हिन्दी, आदि भाषाओं में भी इस सम्प्रदाय के कुछ ग्रन्थों के अनुवाद हुए और अनेक ग्रन्थों पर शोध हुए। मेलकोट संस्कृत-शोध-संस्थान से विशिष्टाद्वैत ग्रन्थावली दो भागों में छपी है और कई भागों में विशिष्टाद्वैतकोश प्रकाशित हो रहा है। ये दोनों ग्रन्थ विशिष्टाद्वैत के प्रचार-प्रसार में
अत्यन्त उपयोगी हैं।
वेदान्त-खण्ड
२. बड़कलैमत और टैंकलैमत
रामानुज का धार्मिक मत श्रीवैष्णव मत के नाम से प्रसिद्ध है। उनके बाद इस मत की दो शाखाएं हो गयीं, जिन्हें बड़कलैमत या उत्तरकलार्य और टेकलैमत या दक्षिणकलार्य कहा जाता है। सौम्य जामातृमुनि के शिष्य कस्तूरी रंगाचार्य (१५वीं शती) ने इन दोनों मतों के भेदों का विवेचन कार्याधिकरणवाद और कार्याधिकरणतत्त्व में किया है, विशेषतः प्रथम ग्रन्थ में गोविन्दाचार्य ने इनमें अट्ठारह भेद बताये हैं, जिनमें कुछ निम्नलिखित हैं (१) टेकलैमत में मार्जार-किशोर-न्याय की प्रपत्ति है और बड़कलै मत में कपिकिशोर
न्याय की प्रपत्ति। मार्जार-किशोर को मार्जार स्वयं अपने मुंह में रखकर एक स्थान से दूसरे स्थान ले जाता है, जबकि कपिकिशोर को कपि ऐसे गमनहेतु पकड़ता है। भगवत्प्राप्ति में कुछ कर्म नहीं करना पड़ता और भगवान् स्वयं अपनी कृपा से मोक्ष देते हैं, ऐसा टेकलैमत मानता है। विपरीततः बड़कलैमत का मानना है कि भगवत्कृपा
के अतिरिक्त जीव को भी मोक्षार्थ कुछ कर्म करने पड़ते हैं। (२) टेकलैमत के अनुसार कैवल्यमुक्ति नित्य है, किन्तु बड़कलैमत में वह स्थायी नहीं है। (३) टेकलैमत मानता है कि मुक्ति-अवस्था में जो आनन्दानुभूति होती है वह सभी जीवों
के लिए एक जैसी नहीं है, उसमें तारतम्य है किन्तु बड़कलैमत इस तारतम्य को नहीं
मानता। (४) टेकलैमत मानता है कि केवल लक्ष्मी ही भगवत्कृपा प्रदान कर सकती हैं, किन्तु
बड़कलैमत के अनुसार नारायण स्वयं भी मोक्षदाता हैं। (५) टेकलैमत के अनुसार लक्ष्मी में भगवान् के विग्रह और गुण की व्याप्ति तो है, किन्तु
स्वरूपव्याप्ति नहीं है। बड़कलैमत से लक्ष्मी में भगवान् की स्वरूप-व्याप्ति भी है। (६) बड़कले कहते हैं कि भगवान वात्सल्यवशात् भक्तजीव के दोष नहीं देखते हैं। टेकलै
इससे आगे जाकर कहते हैं कि भगवान वास्तव में जीवों के दोषों को स्वयं भोगते
(७) बड़कलै कहते हैं कि परदुःख के निराकरण की इच्छा करना दया है। टॅकलै कहते
हैं कि परदुःख का अनुभव करना दया है। (८) टेकलै कहते हैं कि शुद्ध सत्त्व जड़ या अचित् है और बड़कलै कहते हैं कि वह चित्
इन दार्शनिक-धार्मिक भेदों के अतिरिक्त दोनों मतों के अनुयायियों में तिलक का भेद तथा पात्रम् (पूजा के अवसर पर पढ़े गये श्लोक) का भी अन्तर है। किन्तु इन अन्तरों को अब विशेष महत्त्व नहीं दिया जाता है। आज भी टेंकलैमत तमिल और द्रविड़वेदान्त पर अधिक बल देता है और बड़कलै मत संस्कृत तथा उभयवेदान्त पर।
रामानुजोत्तर-विशिष्टाद्वैत-वेदान्त
२३३
३. यतीन्द्रमतदीपिका
यतीन्द्रमतदीपिका के लेखक श्रीनिवास ने इस ग्रन्थ को शारीरकपरिभाषा कहा है। इससे स्पष्ट है कि यह ग्रन्थ धर्मराज अध्वरीन्द्र की वेदान्तपरिभाषा की अनुकृति पर लिखा गया है और उसके बाद की रचना है। एकाध स्थानों पर श्रीनिवास ने धर्मराज को उधत भी किया है, जैसे चैतन्यत्रिविधम् के वर्णन में। इस आधार पर यह १७वीं शती का ग्रन्थ है। इसमें प्रत्येक अध्याय को अवतार कहा गया है। प्रथम अवतार में प्रत्यक्षनिरूपण, द्वितीय अवतार में अनुमाननिरूपण और तृतीय अवतार में शब्दनिरूपण किया गया है। इस प्रकार रामानुजवेदान्त में प्रत्यक्ष, अनुमान तथा शब्द ये तीन प्रमाण मान्य हैं। प्रमाण की परिभाषा हैं-‘प्रमाकरण प्रमाणम’। ‘अनधिगतार्थगन्त प्रमाणम्’। इस परिभाषा का खण्डन किया गया है। साक्षात्कारि प्रमा का कारण प्रत्यक्ष है। निर्विकल्पक और सविकल्पक भेद से प्रत्यक्ष द्विविध है। स्मृति, प्रत्यभिज्ञा तथा अभावज्ञान (अनुपलब्धि) प्रत्यक्ष के अन्तर्गत हैं। अन्य ख्यातिवादों का खण्डन करते हुए सत्ख्यातिवाद की स्थापना की गयी है और कहा गया है कि सर्व विज्ञानम् यथार्थम, प्रमादिप्रत्यक्षज्ञानं यथार्थम्। अनुमान का लक्षण है व्याप्यस्य व्याप्यत्वानुसन्धानात् व्यापकविशेषप्रमितिः अनुमितिः। व्याप्ति के दो प्रकार हैं-अन्वय और व्यतिरेक । अनुमान के दो अंग हैं-व्याप्ति और पक्षधर्मता। अनुमान के दो प्रकार हैं अन्वयव्यतिरेक और केवलान्चयि। केवलव्यतिरेकि अनुमान इस मत में अमान्य है। ‘अनाप्तानुक्तवाक्यजनिततदर्थविज्ञानं शब्दज्ञानम् । तत्करणं शब्दप्रमाणम्’ ऐसा शब्दप्रमाण का लक्षण किया गया है। यह लक्षण वेद की अपौरुषेयता के आधार पर है। साङ्गोपाङ्ग वेद प्रमाण है।
चतुर्थ अवतार में प्रकृति का, पंचम अवतार में काल का, षष्ठ अवतार में नित्यविभूति का, सप्तम अवतार में धर्मभूत ज्ञान का, अष्टम अवतार में जीव का, नवम
अवतार में ईश्वर का और दशम अवतार में अद्रव्य का निरूपण है।
इस प्रकार इस मत में ६ द्रव्य और १० अद्रव्य हैं। प्रकृति के अनन्तर जो परिणाम होते हैं उनसे क्रमशः महत, अहंकार और मन, ५ ज्ञानेन्द्रिय, ५ कर्मेन्द्रिय तथा ५ तन्मात्राओं के विकास होते हैं। पांच तन्मात्राओं से पंचीकरणरीति से पंचमहाभूतों की सृष्टि होती है। इस प्रकार रामानुजमत की तत्त्वमीमांसा वस्तुतः सांख्यतत्त्वमीमांसा के शिखर पर विराजमान है।
इस तत्त्वमीमांसा का मूल्यांकन यतीन्द्रमतदीपिका में छः प्रकार से किया गया है दिखिए, वही अद्रव्य प्रकरण में २१वाँ अनुच्छेद) १. विद्वान् लोग तत्त्व को एक ही मानते हैं, वह एक तत्त्व चिदचित् से विशिष्ट है। इस
लिए उसे विशिष्टाद्वैत कहा जाता है। २. ऋषिगण आत्मा और अनात्मा इन दो तत्त्वों को मानते हैं।
२३४
वेदान्त-खण्ड ३. आचार्यगण (जैसे लोकाचार्य पिल्ले) श्रुति के आधार पर भोक्तृ (जीव), भोग्य (जगत्)
तथा नियन्तृ (ईश्वर) इन तीन तत्त्वों को मानते हैं। ४.. कुछ आचार्यगण हेय, हेयनिवर्तक, उपादेय और उपादेय का उपाय, इन चार तत्त्वों
को मानते हैं। इस मत को मोक्षशास्त्रीय चतुर्दूहवाद कहा जाता है। ५. अन्य आचार्यगण अर्थपंचक को मानते हैं। ये हैं प्राप्य (ईश्वर) प्राप्ता (जीव), उपाय
(भक्ति और प्रपत्ति), फल (मोक्ष) तथा विसेधि (मोक्ष मार्ग में आने वाले विघ्नों का
निवारण)। लोकाचार्य पिल्ले ने अर्थपंचक में इसी मत को माना है। ६. अन्त में कुछ आचार्यगण अर्थपंचक में सम्बन्ध (ईश्वर और जगत् का संबंध है)
जोड़कर कुल अर्थ छ: मानते हैं। इस प्रकार श्रीनिवास के मतानुसार विशिष्टाद्वैतवाद में छः प्रस्थान या उपमत हैं, किन्तु ये मतभेद केवल मार्ग या उपगम से संबंधित हैं। विशिष्टाद्वैतवाद को अन्ततः सभी आचार्य मानते हैं।
४. मेघनादारिकृत नयद्युमणि
यतीन्द्रमतदीपिका में वेंकटनाथ या वेदान्तदेशिक के मत दिये गये हैं। मेघनादारि के मत उनके मतों से कहीं-कहीं भिन्न हैं। इस भेद को ध्यान में रखकर मेघनादारि के निम्नलिखित मत उल्लेखनीय हैं जो उनके नयधुमणि में मिलते हैं (9) प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द और अर्थापत्ति, ये पाँच प्रमाण हैं, न कि केवल तीन
प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द। प्रत्यक्ष अर्थपरिच्छेदक साक्षात् ज्ञान है। उपमान की प्रमाणता को स्थापित करते हुए मेघनादारि कहते हैं कि किसी दृश्य विषय के सादृश्यज्ञान के द्वारा एक अदृश्य विषय का ज्ञान संभव है। जब कोई मनुष्य जानता है कि नीलगाय नामक पशु गाय के सदृश है तो वह नीलगाय को देखकर अपने श्रुत सादृश्य-ज्ञान के आधार पर उस पशु को नीलगाय कह देता है। इसी प्रकार अर्थापत्ति भी एक स्वतंत्र प्रमाण है और इसका अन्तर्भाव अनुमान में नहीं हो सकता, क्योंकि उसके ज्ञान में हेतु और व्याप्ति के अभाव हैं। यदि हम किसी प्रमाण से जानते हैं कि देवदत्त जीवित है और वह इस मकान में नहीं रहता है तो अर्थापत्ति से ही ज्ञात होता है कि वह किसी अन्य मकान में कहीं अन्यत्र रहता है। ज्ञान का लक्षण देते हुए मेघनादारि कहते हैं- ‘अर्थपरिच्छेदकारि ज्ञानम् प्रमाणम्’, अर्थात् ज्ञान विषय का परिच्छेदकारक है। ज्ञान विषय का निर्धारण करता है। वेदान्तदेशिक का मत इससे भिन्न है। वे मानते हैं कि ज्ञान यथावस्थित व्यवहारानुगुण्य है। वे ज्ञान को वस्तुतः विषयतन्त्र या मेयाधीन मानते हैं। ज्ञानं मेयाधीनम्, यह वेदान्तदेशिक का मत है। मेघनादारि का मत है कि मेयं मानाधीनम् । एक ही सम्प्रदाय
में इस प्रकार इन दो आचार्यों में प्रचण्ड मतभेद है। (३) मेघनादारि दृढ़तापूर्वक यथार्थख्याति (या सत्ज्याति) को मानते हैं, जबकि वेदान्तदेशिक
रामानुजोत्तर-विशिष्टाद्वैत-वेदान्त
२३५ यथावसर अन्यथाख्यातिवाद, अख्यातिवाद तथा यथार्थख्यातिवाद सभी को मानते हैं। मेघनादारि प्रथम दो ख्यातिवादों का खंडन करते हैं। यथार्थख्यातिवाद के पक्ष में उनकी निम्न युक्ति है
विप्रतिपत्रः प्रत्ययो यथार्थः प्रत्ययत्वात्, संप्रतिपन्नप्रत्ययवद्। (४) स्वतः प्रामाण्यवाद के बारे में मेघनादारि का अपना मत है। वे कहते हैं कि प्रत्येक
अनुभव सदैव अपने प्रामाण्य को समेटे रहता है, अर्थात् अनुभव विषय का ज्ञापक होने के साथ-ही-साथ अपना प्रमापक भी है। वह पर-प्रकाशक तथा स्वप्रकाश दोनों
एक साथ है। (५) मेघनादारि काल को पृथक् प्रमेय नहीं मानते हैं। उनके मत से रामानुज ने भी
श्रीभाष्य, वेदान्तदीप और वेदान्तसार में काल के पृथग्भाव का खण्डन किया है। ‘सूर्यादिसम्बन्ध-विशेषोपाधितः पृथिव्यादिदेशानामेव कालसंज्ञा’-अर्थात् सूर्य आदि के सम्बन्धरूप उपाधिविशेष से जन्य पृथिवी आदि देशों की ही संज्ञा काल है। दूसरे शब्दों में, सूर्य के सम्बन्ध में पृथिवी की स्थिति को काल कहते हैं। वह पृथिवी की गति से
संबन्धित है। (६) कर्मफल के बारे में मेघनादारि का मत है कि कर्म का फल ईश्वर की प्रसन्नता या
अप्रसन्नता है जिसके माध्यम से उसका फल कर्ता जीव को मिलता है। दूसरे शब्दों में, कर्म और उसके फल में कारण-कार्य का संबंध साक्षात् या अव्यवहित नहीं है। इन मतों से सिद्ध है कि मेघनादारि विशिष्टाद्वैत-वेदान्त के एक बड़े मौलिक दार्शनिक थे।
५. शतदूषणी की युक्तियां
रामानुज ने शंकराचार्य के अद्वैतसिद्धान्त पर सात अनुपपत्तियों का आरोप किया था। उसी की परम्परा को तार्किक पराकाष्ठा तक पहुंचाने वाला ग्रन्थ शतदूषणी है जिसके रचयिता वेदान्तदेशिक थे जिनके सौहार्दपूर्ण संबंध अपने समकालीन अद्वैत वेदान्तियों से विशेषतः स्वामी विद्यारण्य से थे। शतदूषणी में सम्प्रति ६६ दोष ही मिलते हैं। अतएव या तो अन्य दोषपरक ग्रन्थभाग लुप्त हो गया या यहाँ ‘शत’ का अर्थ वास्तव में बहुत या अनेक है, इसका अर्थ एक सौ नहीं है। डा. सुरेन्द्रनाथ दास गुप्त ने इन ६६ दोषों का विवरण अपने ‘भारतीय दर्शन का इतिहास’ खण्ड ३ में किया है। उनके मत से दोष ६२, ६३, ६४, ६५ और ६६ दार्शनिक दृष्टि से नगण्य हैं। दरखाँ दोष अपशूद्राधिकरण पर है। ६३वाँ दोष अधिकारि-विवेक पर है। ६४वां दोष शंकरमत से अनुयायियों के तिलक, पोशाक आदि पर है। ६५वां दोष उनके द्वारा कुछ यतियों की संगति से बचने पर है और ६६वें दोष का विषय शंकरमत का ब्रह्मसूत्र से बेमेल होना है। स्पष्टतः इन दोषों का दार्शिनिक महत्त्व नहीं है।
वेदान्त-याण्ड
शतदूषणी में जिन दोषों को गिनाया गया है उनमें से निम्नलिखित महत्त्वपूर्ण हैं १. यदि ब्रह्म निर्गुण सत् है तो “ब्रह्म” शब्द उस सत् का वाचक नहीं हो सकता, क्योंकि
कोई शब्द निर्गुण सत् का अभिध्यान नहीं करता है। फिर लक्षणाशक्ति से भी ‘ब्रह्म" शब्द निर्गुण सत् का वाचक नहीं हो सकता, क्योंकि लक्ष्णाा अन्ततोगत्वा अभिघामूलक होती है। अतः जब उपनिषद् “ब्रह्म” शब्द का प्रयोग करते हैं, तो इसका तात्पर्य है कि इस शब्द का वाच्यार्थ कोई सगुण सत् है। शाम शंकराचार्य ब्रह्मसूत्र १।१।१ के भाष्य में कहते हैं कि ब्रह्म का सामान्य ज्ञान सभी मनुष्यों को “अहमस्मि” रूप से है और उसके विशेष ज्ञान के लिए वेदान्तशास्त्र का उपयोग किया जाता है। परन्तु ज्ञान में ऐसा विभाजन नहीं है। पुनश्च, विशेष ज्ञान उसी विषय का हो सकता है जिसमें गुण हों। यदि ब्रा निर्गुण है तो उसका विशेष
ज्ञान संभव ही नहीं है। ३. जगत को मिथ्या मान लेने पर भी जगत-विषयक समस्त ज्ञान और जगत में
नित्यकर्म, मिथ्या नहीं सिद्ध होते हैं और न वे नष्ट ही होते हैं। पाण्डुरोग केवल इस ज्ञान से दूर नहीं हो जाता है कि पीलापन मिथ्या है, वह उपचार से दूर होता है। इसी प्रकार मोक्ष केवल जगत् मिथ्या है, ऐसा समझ लेने से नहीं होता है, वरन् भगवान् की कृपा और उपासना से होता है। श्रुति का ज्ञान शाब्दिक है, मात्र उसको
सुन लेने से मोक्ष सम्भव नहीं है। ४. शंकराचार्य के मत से अद्वैत-श्रुतियाँ साक्षात् ब्रह्म का अनुभव कराती हैं। इस पर
वेदान्तदेशिक कहते हैं कि यदि ऐसा हो, तो प्रत्येक वाक्य के श्रवण से (और यहाँ तक कि अनुमान से भी), अपरोक्ष साक्षात् ज्ञान होना चाहिए, किन्तु ऐसा नहीं होता। अतः अद्वैत-श्रुतियों के श्रवण मात्र से ब्रह्म का साक्षात् अपरोक्ष अनुभव नहीं होता
५. निर्विषयक चैतन्य का अनुभव किसी को नहीं होता है। प्रत्येक व्यक्ति का चैतन्य सदैव
सविषयक ही रहता है। यदि कहा जाय कि निर्विषयक चैतन्य स्वप्रकाश है तो यह उत्तर भी युक्तियुक्त नहीं है, क्योंकि विषय का प्रकाश किसी व्यक्ति के लिए होता है, वह स्वयं अपने लिए नहीं होता। यदि कहा जाय कि सुषुप्ति में चेतना निर्विषयक रहती है, तो यह ठीक नहीं है क्योंकि उस अवस्था में जिस सुख की अनुभूति होती है वह एक विषय है और वह विषयी आत्मा नहीं है। वास्तव में चेतना कभी भी
निर्विषयक नहीं हो सकती। वह सदैव सविषयक और सविशेष है। मान ६. यदि कहा जाय कि विशिष्टाद्वैतवादी भी निर्विकल्पक प्रत्यक्ष को मानते हैं तो
वेदान्तदेशिक कहते हैं कि वस्तुतः निर्विकल्पक प्रत्यक्ष भी सविषयक है। निर्विकल्पक प्रत्यक्ष का विषय उस विषय की कोई विशेषता नहीं, वरन् वह विषय ही पूर्णतया है। अतएव जब उसके गुणों का प्रत्यक्ष बाद में होता है तो उस सविकल्पक प्रत्यक्ष की
२३७
रामानुजोत्तर-विशिष्टाद्वैत-वेदान्त तुलना में उस विषय के पूर्व प्रत्यक्ष को निर्विकल्पक प्रत्यक्ष कहा जाता है। यह भेद
प्रत्यक्ष की विशदता का तारतम्य सूचित करता है। ७. भेद-ज्ञान को अद्वैत वेदान्ती असत्य मानते हैं। किन्तु वेदान्तदेशिक कहते हैं कि अभेद
और भेद दोनों सत्य है, क्योंकि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं। यदि भेद नहीं है तो अभेद भी नहीं है। प्रत्येक विषय अपने से अभिन्न रहता है और अन्य विषयों से भिन्न रहता है। इस प्रकार भेद और अभेद दोनों सत्य हैं। शांकरवेदान्ती जगत् को मिथ्या मानते हैं। इस पर वेदान्तदेशिक कहते हैं कि जगत् आकाश-कुसुम- जैसा नहीं हो सकता, क्योंकि जगत् प्रतीयमान है। यदि जगत् सत् तथा असत् दोनों से भिन्न है, तो ऐसी कोई वस्तु है नहीं। अतः यह दृष्टि अमान्य है। यदि जगत् का निषेध संभव माना जाय तो यह निषेध ब्रह्म हो जायेगा और इस प्रकार ब्रह्म अभाव-रूप होगा अर्थात् ब्रह्म असत् है, यह मानना पड़ेगा किन्तु
अद्वैतवादी ऐसा नहीं मानते हैं। ६, शांकरवेदान्ती कहते हैं कि ज्ञाता और ज्ञेय में कोई वास्तविक संबंध नहीं हो सकता
और जेय को असत्य मानना इस कारण तर्कसंगत है। इस पर वेदान्तदेशिक कहते हैं कि सम्बन्ध का मिथ्यात्व संबंधियों के मिथ्यात्व को सिद्ध नहीं कर सकता है। शश और श्रृंग में कोई सम्बन्ध नहीं है, किन्तु इससे यह नहीं सिद्ध होता है कि शश और श्रृंग नहीं हैं। पुनश्च-यदि अद्वैत-वेदान्ती की युक्ति को माना जाय तो ज्ञाता का अस्तित्व भी मिथ्या हो जायेगा। यदि कहा जाय कि ज्ञाता तो स्वयंप्रकाश होने के कारण सत् है तो यही युक्ति विषय के अस्तित्त्व के लिए भी दी जा सकती है, क्योंकि कोई संवित्ति या अनुभूति ऐसी नहीं है जो सविषयक न हो। अतः स्वयं प्रकाशत्व वस्तुतः मात्र चैतन्य नहीं है, किन्तु आत्म-चैतन्य (आत्मप्रज्ञता, आत्मबोध) है जिसमें विषयी और विषय दोनों का ज्ञान होता है। चैतन्य विषयिविषयभाव है, न कि मात्र
विषयिता। १०, अविद्या का संबंध ब्रह्म से क्या है? यदि अविद्या ब्रह्म में अनादि है तो फिर ब्रह्म
अविद्या को मिटा नहीं सकता है और इस प्रकार अविद्या के अविनाशी हो जाने पर
मुक्ति असम्भव हो जायेगी। ११. स्वप्रकाशत्व का जो लक्षण चित्सुख ने दिया है वह है “अवेद्यत्वे सति अपरोक्ष
व्यवहारयोग्यत्वम्”। इस पर वेदान्तदेशिक कहते हैं कि यदि स्वप्रकाश या अपरोक्ष अनुभूति के अनुभव की आवश्यकता है तो फिर इस प्रक्रिया में अनवस्था दोष होगा और अपरोक्ष अनुभूति का अनुभव सम्भव न होगा और अपरोक्ष अनुभूति स्वयं घट जैसा एक विषय होगी। दोनों स्थितियाँ शांकरवेदान्त में अमान्य हैं। अतएव
शांकरवेदान्त सदोष है। १२. शांकरवेदान्ती व्यक्ति की चेतना की उत्पत्ति का निराकरण करते हैं। किन्तु ऐसे चैतन्य२३८
वेदान्त-खण्ड
का ज्ञान संभव है। जो ज्ञान नहीं था वह आज हो जाता है। साक्षात् प्रत्यक्ष या युक्ति से ऐसा ज्ञान होता है। अतएव ज्ञान की उत्पत्ति होती है, उसका विकास होता है. किन्तु इसकी व्याख्या शांकरवेदान्त में सम्भव नहीं है, क्योंकि वहाँ ज्ञान नित्य माना जाता है।
इस प्रकार स्थालीपुलाकन्याय से शतदूषणी का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। वेदान्तदेशिक ने शांकरवेदान्त को सांख्य, सौगत और चार्वाक का संकर कहा है। अतएव उसमें इन दर्शनों में पाये जाने वाले दोष भी मिलते हैं तथा कुछ और भी दोष हैं।
सांख्य-सौगत-चार्वाकसकरात् शंकरोदयः।
दूषणान्यपि तान्यत्र भूयस्तदधिकानि च।। आत्मा का ज्ञातृत्व चित्त की छाया से है। उसका कर्तृत्व वास्तव नहीं है, इन दोनों मतों को मानने से शांकरवेदान्त सांख्यमत है। स्तम्भ, घट आदि प्रत्यय मिथ्या हैं, जो प्रत्यय (ज्ञेय) है वह मिथ्या है। इस मत को मानने से अद्वैतवेदान्त सौगतमत जैसा ही है। जैसे चार्वाक मानते हैं वैसे ही अद्वैतवेदान्ती भी मानते हैं कि अहमर्थ का विनाश होता है, अतएव अद्वैतवेदान्त चार्वाकमत जैसा है। निर्गुण सत् भी जड़ ही है। इस दृष्टि से भी अद्वैतवेदान्त चार्वाकमत है। इसका खण्डन करते हुए अनन्तकृष्ण शास्त्री ने अद्वैततत्त्वशुद्धि भूमिका पृ.-२५ में लिखा है -
जैन-कापिल-चार्वाकसंकरादन्त्यजोदयः।
दूषणान्यपि तान्येव भूयस्तदधिकानि च।। अर्थात् रामानुजमत (अन्त्यजोदयः) जैन, सांख्य और चार्वाक का संकर है। उसे अन्त्यजोदय इसलिए कहा गया है कि वह अन्त्यज शठकोप से उत्पन्न हुआ है। इस प्रकार अद्वैतमत में वे सभी दोष हैं जो सांख्य, बौद्ध तथा चार्वाकमत में हैं। किं बहुना, उसमें कुछ दोष अधिक भी हैं। अद्वैततत्त्वशुद्धि में अनन्तकृष्ण शास्त्री ने २६ बिन्दुओं पर विशिष्टाद्वैतवाद तथा अद्वैतवाद के मतभेदों की व्याख्या की है, जिसमें अद्वैतवाद पर विशिष्टाद्वैतवाद द्वारा आरोपित दोषों का प्रत्युत्तर दिया गया है। किन्तु इन सभी खण्डनों तथा प्रत्युत्तरों से यह निष्कर्ष निकलता है कि वस्तुतः इन दोनों दर्शनों की दो दृष्टियाँ हैं और प्रत्येक दृष्टि को लेकर एक सुव्यवस्थित तथा पूर्णतन्त्र या दर्शन की स्थापना का सराहणीय प्रयास किया गया है। पुनश्च, यदि वेदान्तदेशिक की उक्त आलोचना की समीक्षा की जाय तो उनके अनुसार शतदूषणी के दोषों को ४ वर्गों में बाँटा जा सकता है - १. चार्वाक सम्बन्धी दोष। २. सांख्य सम्बन्धी दोष। ३. सौगत सम्बन्धी दोष। ४. अन्य दोष।
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रामानुजोत्तर-विशिष्टाद्वैत-वेदान्त अनन्तकृष्ण शास्त्री के पूर्व अद्वैतवादी उमामहेश्वर ने रामानुजमत में एक सौ दोष दिखाने के लिए विरोधवरूथिनी नामक ग्रन्थ लिखा। किन्तु उसमें केवल २६ दोष उपलब्ध हैं। उमामहेश्वर के अन्य ग्रन्थ हैं, तत्त्वचन्द्रिका, अद्वैतकामधेनु, तत्त्वमुद्राविद्रावण, प्रसंगरलाकर तथा रामायण टीका। विरोधवरूथिनी का खण्डन रंगाचार्य (१६वीं शती) ने
कुदृष्टिध्वान्तमार्तण्ड में तथा श्रीनिवास दीक्षित ने विरोधवरूथिनी-प्रमाथिनी में किया। रंगाचार्य ने सन्मार्गदीप नामक एक और ग्रन्थ लिखा। इस प्रकार अद्वैतवेदान्त और विशिष्टाद्वैत के बीच एक विशाल खण्डनसाहित्य लिखा गया है। दोनों में वाग्युद्ध होते रहते हैं।
६. बत्तीस ब्रह्मविद्याएँ
यूँ तो वेदान्त के सभी सम्प्रदायों में उपनिषद् की बत्तीस विद्याओं का महत्त्व तथा उपयोग है, किन्तु रामानुज-वेदान्त में उनके उपयोग पर बहुत बल है। उनके द्वारा ही वैदिक उपासना होती है। ये विद्याएँ निम्नलिखित हैं - १. अक्षरविद्या । ब्रह्मसूत्र १-२-२२ में है। मुण्डकोपनिषद् का यह वाक्य है इसका
विषय है- अथ परा यथा तदक्षरम् अधिगम्यते । २. अक्षिस्थ सत्यब्रह्मविद्या । ब्रह्मसूत्र ३-३-२० में है। इसका विषय है -
तद्यत्त सत्यं —- यश्चार्य दक्षिणेऽक्षन् (बृहदारण्यक उपनिषद् ५-५-२) ३. अंगुष्टप्रमितविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-३-२३ में है। इसका विषय है -
अंगुष्ठमात्रः पुरुषोऽन्तरात्मा (कठोपनिषद् २-६-१७) ४. अन्तरादित्यविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-१-२१ में है। इसका विषय है -
य एषोऽन्तरादित्ये हिरण्यमयः पुरुषः (छान्दोग्य उपनिषद् १-६-६) १. आकाशविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-१-२३ तथा १-३-४२ में है। इसका विषय है
अस्य लोकस्य का गतिरित्याकाशः। (छान्दोग्य १-६) तथा आकाशो वै नामरूपयोनिर्वहिता
(छान्दोग्य ८-१४) है। ६. आनन्दमयविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-१-३ में है। इसका विषय है तैत्तिरीयोपनिषद् का
वाक्य-तस्माद् वा एतस्माद् विज्ञानमयात् अन्यो ऽन्तर आत्मा आनन्दमयः
(तै.उ.ब्र.व.४)। ७. ईशावास्यविद्या। यह ब्रह्मसूत्र के समन्वयाधिकरण में है। ८. उद्दालकान्तर्यामिविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-२-२६ में है। इसका विषय है -
बृहदारण्यक उपनिषद् (५१-७) का वाक्य-यः पृथिव्यां तिष्ठत्-एष त आत्मा
अन्तर्याम्यमृतः। ६. उपकौसलविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-२-१३ में है। इसका विषय है -
य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते (छान्दोग्य ४-१०)
२४०
वेदान्त-खण्ड
१०. उषस्तकहोलविद्या । यह ब्रह्मसूत्र ३-३-३५ में है। इसका विषय है -
न द्रष्टेर्दष्टारं पश्ये एषत आत्मा सर्वान्तरः (बृहदारण्यक ५-४)। ११. गायत्रविद्या। यह ब्रह्मसूत्र ३-१-२६ में है। इसका विषय है -
गायत्री वा इदं सर्व भूतं यदिदं किंच (छान्दोग्य ३-१२)। १२. गार्ग्यक्षरविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-३-६ में है। इसका विषय है -
एतद् वै तदक्षरं गार्गि ब्राह्मणा अभिवदन्ति (छान्दोग्य ५-८८) १३. ज्योतिषां ज्योतिर्विद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-३-३१ में है। इसका विषय है -
यं देवा ज्योतिषां ज्योतिरायुर्होपासतेऽमृतम् (छान्दोग्य ६-४-१६) १४. त्रिमात्रप्रणवविद्या । इसको परम पुरुष विद्या भी कहते हैं। यह ब्रह्मसूत्र १-३-१२ में है। ____ इसका विषय है - यः पुनरेतं त्रिमात्रेणोमित्येतेनैवाक्षरेण (प्रश्नोपनिषद् ५-५) १५. दहरविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-३-१३ और ३-३-३८ में है। इसका विषय है -
_ अथ यदिदम् अस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरम् (छान्दोग्य ८-१-१) १६. नाचिकेतविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-२-६ में है इसका विषय है -
यस्सेतुरीजानानाम् अक्षरं ब्रह्म यत्परम् (कठोपनिषद् १-२-२) १७. न्यासविद्या। इसका विषय है -यो ब्रह्माणि विदधाति पूर्व-शरणमहं प्रपद्ये (श्वेताश्वतर
उपनिषद्-६) यह ब्रह्मसूत्र १-१-२ में निहित है। १८. पंचाग्निविद्या। यह ब्रह्मसूत्र ३-१-१ और ३-३-३२ में है- उसका विषय है -
तद्यम् इत्थंविदुर्येचेमेऽरण्ये (छान्दोग्य ५-१०) १६. परंज्योतिर्विद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-१-२५ में है। इसका विषय है
अथ यदतः परो दिवोज्योतिदीप्यते छान्दोग्य ३-१३-७ २०. पर्यड्कविद्या । इसका विषय है - अमितीजापर्यक-ब्रह्मविद्वान् ब्रह्मैवाभिप्रेति (कौषीतकि)। २१. प्रतर्दनविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-१-२६ में है। इसका विषय है -
स होवाच प्राणोऽस्मि-अमृतमित्युपास्स्व। (कोषीतकि ३) २२. प्राणविद्या। यह ब्रह्मसूत्र ३-३-१० में है। इसका विषय है
यो ह वै ज्येष्ठ…..ज्यष्टश्च हव (छान्दोग्य ५-१-१)। २३. बालाकिविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-४-१६ में है। इसका विषय-है यो वै बालाक एतेषां
पुरुषाण्यं कर्ता यस्य वै तत्कर्म वै वेदितव्यः । (कौषीतकि ४-१८)। २४. भूमाविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-३-३० में है। इसका विषय है -
यो वै भूमा तत्सुखं–भूमा त्वेव विजिज्ञासितव्यः (छान्दोग्य ७)। २५. मधुविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-३-३० में है। इसका विषय है
असौ वा आदित्यो देवमधु-स य एतदेव अमृतं वेद (छान्दोग्य ३१)। २६. मैत्रेयीविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-४-१६ में है। इसका विषय है -
“आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः (बृहदारण्यक ६।५।६, ४।४।५)।
रामानुजोत्तर-विशिष्टाद्वैत-वेदान्त
२४१ २७. वैश्वानरविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-२-२५ तथा ३-३-५५ में है। इसका विषय है
आत्मानं वैश्वानरं उपासते स सर्वेषु लोकेषु (छान्दोग्य ५-११-२४)। २८. व्याहतिविद्या। इसी को आदित्यमण्डलस्थ सत्य ब्रह्मविद्या कहते हैं। यह ब्रह्मसूत्र
३-३-२० में है। इसका विषय है -
तद्यत् सत्यम् असौ स आदित्यो य एष एतस्मिन् मण्डले (बृहदारण्यक ७1५19)। २६. शांडिल्यविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-१-१ या ३-३-१६ में है। इसका विषय है
सर्व खलु इदम् ब्रह्म तज्जलान् इति शान्त उपासीत (छान्दोग्य ३-१४-१)। ३०. संवर्गविद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-३-३३ में है। इसका विषय है -
वायुवि संवर्गों यदा वा अग्निः (छान्दोग्य ४३१, ४)। ३१. सत्यकामविद्या। इसे षोडशकल ब्रह्मविद्या भी कहते हैं। इसका विषय है
सत्यकामो हि जाबालो—अत्र ह न किंचन वीयाय इति वीयाय इति। (छान्दोग्य
३२. सद्विद्या। यह ब्रह्मसूत्र १-१-५ में है। इसका विषय है -
सदेव सोम्य इदमग्र आसीत्, एकमेवाद्वितीयम् (छान्दोग्य ६-२-१)। इन बत्तीस ब्रह्मविद्याओं के अतिरिक्त भी कुछ आचार्यगण अन्य विद्याओं की चर्चा करते हैं। अतः इन्हें केवल मुख्य ब्रह्मविद्या ही समझना चाहिए। १६५३ में श्री टी. वीरराघवाचार्य ने स्वरचित बृहदारण्यकोपनिषद्भाष्य की भूमिका में इन बत्तीस ब्रह्मविद्याओं को प्रसिद्ध ब्रह्मविद्याएँ बताया है और कई अन्य ब्रह्मविद्याओं को भी गिनाया है। ___ इन ब्रह्मविद्याओं के अतिरिक्त १४ काम्यविद्याएँ भी रामानुजोत्तर वेदान्त में प्रचलित हैं। उदगीथावयव प्रणवविद्या, कृत्स्नोद्गीथ विद्या, प्रणवविद्या, पुरुषविद्या और हानोपादानचिन्तनविद्या उनमें मुख्य हैं। इनका वर्णन ए, श्रीनिवास राघवम् ने अपने द्वारा संपादित श्रुतप्रदीपिका के परिशिष्ट में किया है।
७. शास्त्रानुशीलन की परम्परा
रामानुजोत्तर विशिष्टाद्वैतवाद के वाङ्मय की प्रस्थानत्रयी में उपनिषदों पर अनेक भाष्य, कृति, टीका आदि लिखे गये। ऊपर वर्णित ग्रन्थों के अतिरिक्त रंगरामानुज ने तैत्तिरीय, ऐतरेय, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य तथा ईशावास्योपनिषद् पर भाष्य लिखे जो प्रकाशित हो गये हैं। भगवद्गीता के अनेक विवेचन, व्याख्यान आदि भी किये गये। किन्तु सर्वाधिक अनुशीलन ब्रह्मसूत्र तथा श्रीभाष्य और श्रुतप्रकाशिका के हुए। इस ओर कुछ
आचार्यों ने अधिकरणों का विशेष अध्ययन किया, कुछ ने समस्त पूर्वपक्षों का अनुशीलन किया तथा कुछ ने समग्र श्रीभाष्य का विश्लेषण किया। ब्रह्मसूत्र के प्रत्येक पाद को एक नाम दिया गया जो यह है
प्रथम अध्याय के प्रथमपाद को अयोगव्यवच्छेद पाद तथा दूसरे, तीसरे और चौथे पाद
੨ ੪੨
वेदान्त-खण्ड को अन्ययोगव्यवच्छेद पाद कहा गया। इस प्रकार प्रथम अध्याय को तर्कतः प्रतिष्ठित किया गया। द्वितीय अध्याय के पादों को क्रमशः स्मृतिपाद (स्वपक्ष स्थापन) तर्कपाद (परपक्ष प्रतिक्षेप) विपत्पाद तथा प्राणपाद कहा गया। तृतीय अध्याय के पादों को क्रमशः वैराग्यपाद, उभयलिंगपाद, गुणोपसंहार पाद तथा अंगपाद कहा गया। चतुर्थ अध्याय के पादों को क्रमशः आवृतिपाद, उत्क्रान्तिपाद, गतिपाद तथा मुक्तिपाद कहा गया। सन्दर्भ तथा विश्लेषण की दृष्टियों से इन नामकरणों का महत्त्व बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है। प्रस्थानत्रयी से संबंधित समस्त वाङ्मय के लिए मेलकोटि से प्रकाशित विशिष्टाद्वैत-ग्रन्थावली द्रष्टव्य है। ब्रह्मसूत्र श्रीभाष्य तथा श्रुतप्रकाशिका से संबंधित जो टीका-साहित्य है वह प्रायः स्मरणोपयोगी दृष्टि से लिखा गया है, सृजनात्मकता के लिए नहीं। प्रस्थानत्रयी के अतिरिक्त रहस्यत्रय का विवेचन भी रामानुजमत में अनेक आचार्यों ने किया है। ये रहस्यत्रय हैं अष्टाक्षर मंत्र, द्वयमन्त्र और चरमश्लोक। रहस्यत्रय का विवेचन वेदान्तदेशिक ने ३४ ग्रन्थों में किया है। अमृतरंजिनी, अमृतास्वादिनी तथा पृथग्रहस्य नामक तीन खण्डों में ३४ रहस्यग्रन्थ विभक्त हैं। ये सभी मणिप्रवालशैली में लिखे गये हैं। इनमें तीनों मंत्रों के वर्णों, पदों तथा वाक्यों के अनेक रहस्यमय अर्थ बताये गये हैं। इन रहस्यों के विवेचन में समस्त विशिष्टाद्वैत-दर्शन का उपयोग किया जाता है। मंत्र जप करने के लिए है और रहस्यों का उद्घाटन मनन करने के लिए। दोनों का उपयोग जपसाधना में फलप्रद है।
सन्दर्भ ग्रन्थ
१. डॉ. सुरेन्द्रनाथ दास गुप्ता, ए हिस्ट्री ऑफ इण्डियन फिलासफी भाग ३, कैम्ब्रिज,
१E४०। २. बलदेव उपाध्याय, वैष्णव सम्प्रदायों का साहित्य और सिद्धान्त, चौखम्बा वाराणसी,
१E७८ ३. पिल्ले लोकाचार्य, श्रीवचनभूषण, वरवर मुनि की टीका सहित, पुरी। ४. शतदूषणी, वेदान्तदेशिक। ५. यतीन्द्रमतदीपिका, श्रीनिवासाचार्य, अंग्रेजी अनुवादसहित मद्रास, १६६१. ६. श्रीभाष्य तथा श्रुतप्रकाशिका, सुदर्शनसूरि सं. उत्तमूर ति. वीरराघवाचार्य मद्रास, २
भाग, १६६७।
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रामानुजोत्तर-विशिष्टाद्वैत-वेदान्त ७. श्रुतप्रदीपिका, सुदर्शनसूरि। ८. दर्शनोदय, श्रीनिवासाचार्य, मैसूर, १६३३ । ६. पिल्ले लोकाचार्य, तत्त्वत्रय, चौखम्बा वाराणसी, १६३८ । १०. वेदान्तदेशिक, तत्त्वमुक्ताकलाप और स्वार्थसिद्धि ३ भाग, गवर्नमेण्ट ब्रांच प्रेस मैसूर,
१६५४| ११. आत्रेय रामानुज, न्यायकुलिश, अन्नमलाई युनिवर्सिटी, अन्नमलाई नगर, १६३८ । १२. मेघनादारि, नयधुमणि, गवर्नमेण्ट ओरियण्टल मैनुस्क्रिप्ट मद्रास, १६५६ । १३. वेदान्तदेशिक, न्यायसिद्धाञ्जनम्। वैष्णव प्रचार सभा मद्रास, १६३४, १६७३ । १४. श्रीभाष्य, भाष्यार्थदर्पण सहित उत्तमूर ति. वीर राघवाचार्य मद्रास, २ भाग १६६३-६४।
चतुर्थ अध्याय