१. रामानुज की ऐतिहासिक भूमिका
समस्त वेदान्ताचार्यों में शंकर और रामानुज सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं। उन्होंने क्रमशः अद्वैतवाद और विशिष्टाद्वैतवाद को पुनरुज्जीवित किया। यह सर्वसम्मत है कि शंकर ने एक ऐसे प्रौढ़, पूर्ण एवं ठोस बौद्धिक दर्शन का प्रतिपादन किया जो विश्व में अप्रतिम है। परन्तु रामानुज ने भी एक वैसा ही दर्शन प्रतिपादित कर शंकर का सबल विकल्प प्रस्तुत किया है। रामानुज का प्रमुख लक्ष्य अद्वैतवाद के सिद्धान्तों का खण्डन करके पुरातन वेदान्त की सगुणवादी व्याख्या को सुदृढ़ करते हुए विशिष्टाद्वैत के सिद्धान्तों को तार्किक आधार पर पुष्ट करना था। यद्यपि यह कार्य रामानुज के पूर्व भी अनेक आचार्यों ने, मुख्यतः श्री यामुनाचार्य ने, सिद्धित्रय में किया था, तथापि उसको सुव्यवस्थित, प्रभावशाली और व्यापक रामानुज ने ही बनाया है। वे विशिष्टाद्वैत के संस्थापक नहीं थे और न वे ऐसी मौलिकता का दावा ही करते हैं। वे स्पष्ट कहते हैं कि उनका मत बौधायन-वृत्ति पर आधारित है जिसे टंक, द्रविड़, गुहदेव, कपर्दी, भारुचि आदि पूर्वाचार्यों ने स्वीकार किया था (देखिए वेदार्थसंग्रह, अनुच्छेद, १३०)। रामानुज का मुख्य योगदान अपनी परम्परा के सिद्धान्तों को सुव्यवस्थित एवं प्रभावक रूप से प्रस्तुत करने में है। उन्होंने तार्किक चिन्तन की अवज्ञा किये बिना अपने आध्यात्मिक अनुभव के आधार पर श्रुतियों का अर्थ किया तथा भक्ति के सिद्धान्त को एक ठोस दार्शनिक आधार प्रदान किया। वैदिक ऋचाओं में गर्भित, गीता में वर्धित और विष्णुपुराण में पल्लवित भक्ति तथा भगवत्कृपा के सिद्धांत रामानुज के दर्शन में पुष्पित एवं फलित हुए। यहाँ इस प्रामक मत का निरास करना आवश्यक है कि रामानुज पांचरात्र या श्रीवैष्णव सम्प्रदाय तथा भक्त कवि आलवारों से अत्यधिक प्रभावित थे। इसी आधार पर यह भी माना जाता है कि रामानुज ने वेदान्त के साथ वैष्णव धर्म के समन्वय का प्रयास किया था। परन्तु रामानुज के पांचरात्र सम्प्रदाय के अनुयायी होने का कोई ठोस प्रमाण नहीं मिलता है। इसी तरह आलवार संत भी संभवतः रामानुज के समकालीन और
परवर्ती थे, पूर्ववर्ती नहीं।
१. यह लेखक का निजी मत है। सामान्य मत यह है कि रामानुज ने वैदिक श्रुति और द्रविड श्रुति
निगम और आगम, दोनों का समन्वय किया था, और इनका वेदांत उभयवेदान्त है। सामान्यतः यह भी माना जाता है कि सभी आलवार रामानुज-पूर्व थे। तिसपर भी शठकोप तो निश्चय ही उनसे पूर्व थे। (सं.)
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वेदान्त-खण्ड
रामानुज का जन्म १०१७ ई. में हुआ था। उनके पिता का नाम केशव यज्चा था। उनका तमिल नाम इलय पेरुमल था। उनकी माता का नाम कान्तिमती था, जो यामुनाचार्य के शिष्य महापूर्ण की पुत्री थीं। उनका जन्मस्थान भूतपुरी ग्राम था। कांची में उन्होंने यादवप्रकाश से वेदांत का अध्ययन किया था। बाद में वे यामुन के शिष्य कांचीपूर्ण के शिष्य हो गये। कांचीपूर्ण से उन्होंने वैष्णवी दीक्षा ली थी।३० या ३२ वर्ष की आयु में वे त्रिदण्डी संन्यासी हो गये थे। कुछ वर्ष वे श्रीरंगम् में भी रहे थे। उनका निधन ११३७ ई. में हुआ था। उत्तर भारत के अनेक तीर्थों का भी उन्होंने भ्रमण किया था। उन्होंने कुछ अद्वैतवादियों
और जैनों को श्रीवैष्णव मत में दीक्षित भी किया था। उन्होंने शूद्रों को भी अपने सम्प्रदाय में दीक्षा दी। वे स्वयं शूद्र संत कांचीपूर्ण के शिष्य थे। रामानुज की जीवनी कई लोगों ने तमिल में लिखी है। उनमें सबसे प्राचीन उनके समकालीन गरुडवाह कृत दिव्यसूरिचरित है।
२. रामानुज के रचित ग्रन्थ
संस्कृत में रामानुज के ६ ग्रन्थ हैं-वेदार्थसंग्रह, श्रीभाष्य, गीताभाष्य, वेदान्तसार, वेदान्तदीप, शरणागतिगद्य, वैकुण्ठगद्य, श्रीरंगगद्य और नित्यग्रंथ। इनमें सर्वप्रथम वेदार्थसंग्रह है जिसमें उन्होंने उन श्रुतिवाक्यों की व्याख्या की है जो अद्वैतवादियों के अनुसार अभेद की स्थापना करती है। सुदर्शन सूरि ने वेदार्थसंग्रह की टीका तात्पर्यदीपिका में कहा है कि तिरुपति के प्रभु श्रीनिवास के समक्ष रामानुज ने वेदार्थसंग्रह के रूप में एक व्याख्यान दिया
था
श्रीभाष्यकृदुपन्यस्तो यः श्रीशैलपतेः पुरः।
वेदार्थसंग्रहस्यास्य कुर्मः तात्पर्यदीपिकाम् ।। इसके बाद उन्होंने ब्रह्मसूत्र पर वेदान्तसार नामक एक वृत्ति लिखी। वेदान्तसार में शंकर, भास्कर आदि के भाष्यों का खण्डन नहीं है। इसमें ब्रह्मसूत्र की व्याख्या उपनिषद्-वाक्यों के आधार पर की गयी है। वास्तव में यह ग्रन्थ वेदान्त के आरंभिक विद्यार्थी की आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर लिखा गया है। इसके बाद रामानुज ने अपने प्रमुख ग्रन्थ श्रीभाष्य की रचना की जो ब्रह्मसूत्र का बृहद् भाष्य है। उसके बाद उन्होंने ब्रह्मसूत्र पर वेदान्तदीप नामक एक लघ्वक्षर टीका भी लिखी जो श्रीभाष्य का संक्षेप है। अन्त में उन्होंने भगवद्गीताभाष्य की रचना की। इन समस्त ग्रन्थों में उनका उत्कृष्ट पाण्डित्य और सूक्ष्म चिन्तन देखने को मिलते हैं। इनमें उन्होंने पहले मुख्यतः अद्वैतवाद के इन आधारभूत सिद्धान्तों का खण्डन किया कि ब्रह्म, जो निर्विशेष चिन्मात्र है, एकमेव सत्ता है और नानात्वमय जगत् मायाजनित एवं मिथ्या है। बाद में उन्होंने बड़े विद्वत्तापूर्ण ढंग से अपने दार्शनिक पक्ष का निरूपण किया है और यह भी बताया है कि किस तरह वह श्रुतिसम्मत है। उनके ग्रन्थों में सर्वोत्तम श्रीभाष्य है। अनेक विद्वानों ने शंकराचार्य के शारीरकभाष्य
रामानुज का विशिष्टाद्वैत-वेदान्त
२०१ और श्रीभाष्य का तुलनात्मक अध्ययन करके निश्चय किया है कि शारीरकभाष्य की अपेक्षा श्रीभाष्य ब्रह्मसूत्र के रचयिता बादरायण के अनुसार अधिक है। इनमें थीबो मुख्य हैं। पुनश्च अनेक विद्वानों ने ब्रह्मसूत्र के प्रमुख वैष्णव भाष्यों का तुलनात्मक अनुशीलन करके निष्कर्ष निकाला है कि श्रीभाष्य ही व्याख्या-परीक्षा पर सबसे अधिक सूत्रानुसारी है। डा. रामकृष्ण आचार्य ने रामानुज, निम्बार्क, मध्व, वल्लभ और बलदेव विद्याभूषण के भाष्यों की सुविस्तृत तुलना करते हुए निश्चित किया है कि ‘दार्शनिक विषयों की प्रचुरता एवं प्रतिपादन-शैली की गरिमा की दृष्टि से रामानुज-भाष्य के स्थान को कोई अन्य वैष्णव-भाष्य नहीं पा सका है।" (देखिए, सन्दर्भग्रन्थ-संख्या ८ में पृष्ठ ३३४)। र
संस्कृत-शोध-संसत् मेलकोट, कर्नाटक ने ४ खण्डों में श्रीभाष्य का आलोचनात्मक संस्करण क्रमशः १५. १६७.१EE और १EE9 में प्रकाशित किया है। यह पहले के प्रकाशित सभी संस्करणों से अधिक प्रमाणित है। इन ग्रन्थों के अलावा दो अन्य ग्रन्थ-गद्यत्रय और नित्यग्रंथ रामानुज के नाम से सम्बद्ध हैं। परन्तु इनकी प्रामाणिकता संदिग्ध है। ये दोनों ग्रन्थ अपनी शैली और विषय-वस्तु में अन्य ग्रन्थों से भिन्न हैं तथा दार्शनिक सामग्री से रहित हैं। पद्यत्रय भक्ति का ग्रन्थ है। यह उनके गीताभाष्य का उनके किसी परवर्ती शिष्य द्वारा किया गया अनुकरण लगता है।
३. प्रमाण-निरूपण
रामानुज का तत्त्व-निरूपण उनके प्रमाणविचार पर अवलम्बित है। उनके अनुसार यथार्थ ज्ञान प्राप्त करने के तीन साधन हैं-प्रत्यक्ष, अनुमान और शब्द। रामानुज के मतानुसार समस्त ज्ञान सविशेष होता है। अविशिष्टग्राही ज्ञान होता ही नहीं। समस्त ज्ञान भेद एवं विशेषों से ही युक्त है। न केवल ज्ञान वरन् ज्ञान के समस्त विषय सविशेष होते हैं। समस्त पदार्थ गुण-विशिष्ट होते हैं और निर्गुण वस्तु का अस्तित्व असंभव है। मी इसी तरह ज्ञान के समस्त उपकरण सविशेष का ही ज्ञान प्रदान करते हैं। अतः प्रत्यक्ष चाहे वह निर्विकल्पक हो या सविकल्पक सन्मात्र-ग्राही नहीं है, वरन् उन्हीं विषयों को ग्रहण कर सकता है जो सविशेष हैं। निर्विकल्पक प्रत्यक्ष, अनिश्चित एवं अस्पष्ट होता है, पर वह निर्विशेष नहीं है। उसमें भी सविशेष वस्तु की ही प्रतीति होती है। अनुमान प्रत्यक्ष पर आधारित होता है, अतः उसमें भी सविशेष ज्ञान ही प्राप्त होगा। श्रुति भी निर्विशेषत्व का प्रतिपादन नहीं करती। जिन श्रुतिवाक्यों में गुणनिषेध कर अभेद का प्रतिपादन हुआ है यथार्थ में वे ब्रह्म में हेयगुण का ही निषेध करते हैं, समस्त गुणों का नहीं। अतः रामानुज दृढ़तापूर्वक यह प्रतिपादित करते हैं कि निर्विशेष वस्तु का अस्तित्व है ही नहीं।
__रामानुज के मतानुसार कोई भी ज्ञान मिथ्या या भ्रम नहीं होता। वे सत्ख्यातिवाद को स्वीकार करते हैं जिसके अनुसार ज्ञान के सभी विषय सत्य हैं। जिसे भ्रम कहते हैं उसका यही कारण है कि उससे लौकिक व्यवहार की पूर्ति नहीं होती। र
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वेदान्त-खण्ड
४. तत्त्व-निरूपण
चरम सत्ता के अस्तित्व एवं स्वरूप के बारे में निश्चयात्मक कथन की मांग मानव-बुद्धि के लिये सहज एवम् अनिवार्य है। लेकिन इसका एक सर्वसम्मत समाधान प्रस्तुत करना दुष्कर है। तर्क एवम् चिन्तन हमें एक ऐसे सर्वव्यापी तत्त्व की ओर ले जाते हैं जो एकमेव है और जिससे पृथक् अन्य कोई सत्ता है ही नहीं। इसके विपरीत अनुभूति के तथ्य हमें यह मानने को बाध्य करते हैं कि नानात्व का अस्तित्व एकत्व की चहारदीवारी में समाया नहीं जा सकता। तब हम दुविधा में पड़ जाते हैं। हम न तो एकत्व को अस्वीकार कर सकते हैं और न नानात्व को। प्रश्न यह उपस्थित होता है कि इन दोनों विरोधी निष्कर्षों का समाधान कैसे किया जाये। क्या यह मान लें कि एकत्व ही सत्य है और नानात्व मिथ्या है अथवा नानात्व ही सत्य है और एकत्व मानवबुद्धि का अध्यारोप है। भिन्न-भिन्न विचारकों ने भिन्न-भिन्न सत्ता विषयक दृष्टिकोण अपनाये हैं। कुछ एकत्व की सत्यता स्वीकारते हैं तो कुछ नानात्व की। कुछ दोनों को पृथगुरूपेण स्वीकार करते हैं तो कुछ दोनों को संश्लिष्ट रूप से स्वीकार कर उसमें एक को प्रधान और दूसरे को गौण मानते हैं। ___ अद्वैतदर्शन में, जिसके प्रतिकार के रूप में रामानुज ने विशिष्टाद्वैत का प्रतिपादन किया है, एकत्व को ही सत्य स्वीकार कर नानात्व को मिथ्या घोषित किया गया है। शंकर के अनुसार ब्रह्म ही एकमेवाद्वितीय सत्ता है और जगत् तथा जागतिक प्रपंच मायिक है। परन्तु नानात्व की यह अवज्ञा संभव नहीं है। यदि यह स्वीकार किया जाये कि एक ही ब्रह्म माया के माध्यम से नानारूपों में अभिव्यक्त होता है तो भी मूल प्रश्न ये रहते हैं कि ऐसा क्यों होता है? माया क्या है? वह कैसे ब्रह्म को आच्छादित कर देती है? आदि। अद्वैत की इस तात्विक स्थापना का आधार उसकी ज्ञानशास्त्रीय मान्यता में है जिसके अनुसार ज्ञान
और सत्ता में पूर्ण तादात्म्य है और वे स्वरूप में निर्विशेष है। परन्तु यदि ज्ञान और सत्ता में तादात्य की स्थिति है तो समस्त ज्ञान निरर्थक या पुनरावर्तन (टाटोलाजी) मात्र होगा। यह सही है कि ज्ञान सम्बन्ध दो पूर्णतः पृथक् पदों में स्थापित नहीं हो सकता, परन्तु दो तादात्म्य युक्त पदों में ऐसे सम्बन्ध की चर्चा करना भी निरर्थक है। यद्यपि प्रत्येक विधान तादात्म्य का निरूपक है परन्तु वह तादात्म्य शुष्क तादात्म्य न होकर भिन्नत्व से अनुस्यूत है। ज्ञान सत्ता का विशेषण है और उससे तादात्म्य और भिन्नत्व दोनों समन्वित रूप से सम्बन्धित हैं। ज्ञान की ही तरह ज्ञेयसत्ता भी निर्विशेष एकत्व नहीं, परन्तु ऐसा एकत्व है जिसमें भिन्नत्व के अंश अन्तर्निहित हैं। समस्त विशेषण, अंश, भेद आदि सत्ता में हैं, पर वे सत्ता के मूल स्वरूप को प्रभावित नहीं करते हैं। एकच में नानात्व इस तरह पिरोये हुए हैं कि एकत्व के तत्त्व का कभी लोप नहीं होता। रामानुज ने इसी तरह एकत्व एवम् नानात्व में समन्वय स्थापित कर वेदान्त दर्शन में नयी मान्यतायें स्थापित की।
रामानुज का विशिष्टाद्वैत-वेदान्त
२०३ रामानुज भी शंकर की ही तरह अद्वैतवादी हैं परन्तु उनका अद्वैत सविशिष्ट अद्वैत है, निर्विशिष्ट नहीं। वे एक ही चरमतत्त्व के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं, परन्तु इसके साथ ही यह भी स्पष्ट कर देते हैं कि जगत् के नाना जड़-चेतन पदार्थ उसी एक चरम तत्त्व के अंश हैं। शंकर के विपरीत वे नानात्व को मायिक बताये बिना अद्वैत ब्रह्म की सत्ता को स्वीकार कर लेते हैं। समस्त नानात्वमय जगत् ब्रह्म में ही लीन है। ब्रह्म चित् और अचित् दोनों से विशिष्ट है और उसकी अद्वैतावस्था सविशिष्ट है। शंकर की ही तरह वे भी इस बात पर जोर देते हैं कि ब्रह्म के अतिरिक्त ‘अन्य’ कोई भी नहीं हैं परन्तु वे ‘अन्य’ का तात्पर्य सजातीय और विजातीय भेद से ही लेते हैं, स्वगतभेद से नहीं। इस तरह जहाँ शंकर के केवलाद्वैत में पारमार्थिक दृष्टि से ब्रह्म के अतिरिक्त सब कुछ का निषेध किया गया है, वहाँ रामानुज के विशिष्टाद्वैत में ब्रह्म को ही सब कुछ का स्वीकार कर लिया गया है। रामानुज का ब्रह्म एक ऐसा एकत्व है जो नानात्व में अनुस्यूत है, एक ऐसा विशिष्ट या संघात है जो अपने विशेषणों को अस्वीकार नहीं करता, एक ऐसा पूर्ण है जो अपने अंशों का परित्याग नहीं करता, एक ऐसा द्रव्य है जो अपने गुणों का बहिष्कार नहीं करता, एक ऐसा आधार है जो अपने आधेयों का निषेध नहीं करता।
इस तरह रामानुज एक ऐसे विशिष्ट तत्त्व के अस्तित्व में विश्वास करते हैं जो अपने संश्लिष्ट स्वरूप में एकत्व और नानात्व को समाविष्ट करता है। उनका ब्रह्म चित् एवम् अचित् से विशिष्ट है और उन्हें विशेषण के रूप में अंगीकार करता है। यह विचार रामानुज दर्शन का मूल एवम् सार है। इसकी सर्वसुन्दर अभिव्यक्ति विशिष्टाद्वैत शब्द से ही होती है जो रामानुज दर्शन का नाम है। इस सिद्धान्त की सबसे बड़ी विशेषता इस तथ्य में है कि इसमें जीव के पृथक् व्यक्तित्व और जगत् की सत्यता को स्वीकार किया गया है तथा उन्हें सर्वग्राही चरम सत्ता में उसकी पूर्णता को हानि पहुँचाये बिना एक यथेष्ट स्थान एवम् मूल्य प्रदान किया गया है। रामानुज की एकानेकरूप इस चरम सत्ता की तुलना एक सजीव देह से की जा सकती है जो भेद-विहीन शुष्क एकत्व न होकर एक ऐसा एकत्व है जिसमें नानात्व निहित है और जो नानात्व में ही अपनी अभिव्यक्ति करता है।
यदि ब्रह्म एक विशिष्ट या संघात है जिसमें जीव एवम् जगत् विशेषण, गुण, अंश या पर्याय के रूप में स्थित हैं तो प्रश्न यह उपस्थित होता है कि ब्रह्म तथा जीव और जगत् में किस प्रकार का सम्बन्ध है? इस सम्बन्ध की व्याख्या करने के लिये रामानुज शरीर-शरीरी-भाव या देहात्मभाव की सहायता लेते हैं। ब्रह्म आत्मरूप है और चिदचिद् विश्व उसका देहवत् है। ब्रह्म तथा जीव और जगत् का सम्बन्ध इस प्रकार का है कि ब्रह्म उनकी आत्मा या केन्द्रभूत तत्त्व है, जबकि जीव और जगत् उसके शरीर हैं। ब्रह्म के बिना न तो उनका अस्तित्व ही है और न वे विचार के विषय ही हो सकते हैं। ब्रह्म, जीव और जगत् तीनों सत्य हैं, भिन्न-भिन्न हैं पर समान स्तर के नहीं। केवल ब्रह्म स्वाधीन है, शेष ब्रह्माधीन और ब्रह्मनियन्त्रित है। जीव और जगत् किस अर्थ में ब्रह्म के शरीर हैं यह स्पष्ट
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वेदान्त-खण्ड करने के लिए रामानुज शरीर की निम्नलिखित परिभाषा देते हैं-मनि जाना
शरीर वह द्रव्य है जिसे एक चेतन आत्मा अपने प्रयोजन-हेतु धारण करती है, नियमन करती है, कार्य में प्रवृत्त करती है और जो पूर्णतया उस आत्मा के अधीनस्थ है। इस दृष्टि से समस्त विश्व ब्रह्म का शरीर है, क्योंकि वह ब्रह्म पर आधारित, ब्रह्म द्वारा नियन्त्रित और ब्रह्म के अधीनस्थ रहता है।
शरीर और आत्मा अथवा ब्रह्म तथा जीव और जगत् के बीच यह जो विशिष्ट सम्बन्ध है उसे रामानुज अपृथसिद्धि सम्बन्ध के नाम से पुकारते हैं। रामानुज द्वारा प्रतिपादित इस सम्बन्ध की व्याख्या प्रो. हिरियन्ना ने अपने ग्रन्थ (पृ. १७७) में इस प्रकार
दी है
**It connotes that one of the two entities related is dependent upon the other in the sense that one can not exist without the other also existing and that it can not be rightly known without the other also being known at the same time." _इस प्रकार से निषेधात्मक ढंग से सम्बन्ध निरूपण करने का तरीका सम्बन्धित पदार्थों “के तादात्म्य पर तो जोर देता ही है, परन्तु यह तादात्म्य सम्बन्ध के अस्तित्व को ही समाप्त न कर दे, इस दृष्टि से इसमें भेद पर भी भार देकर सम्बन्ध के अस्तित्व की रक्षा करता है। इस सम्बन्ध को वह धुरी कहा जा सकता है जिस पर उनका सारा दर्शन घूमता है। रामानुज के इस अपृथसिद्धि-सम्बन्ध को न्यायदर्शन के समवाय के सदृश माना जाता है, परन्तु इन दोनों में पर्याप्त भेद है। न्यायदर्शन के अनुसार सम्बन्ध दो पक्षों के बीच विद्यमान एक स्वतन्त्र तत्त्व है जो पदार्थान्तर रूप से विद्यमान रहता है। सम्बन्ध दो प्रकार के होते हैं। यदि सम्बन्ध वियोज्य या युतसिद्ध हो तो उसे संयोग और अयुतसिद्ध हो तो उसे समवाय कहा जाता है। प्रायः यह माना जाता है कि संयोग बाह्य तथा समवाय आन्तरिक सम्बन्ध है। परन्त जैसा कि प्रो. हिरियन्ना ने स्पष्ट किया है, यथार्थ में समवाय भी एक बाह्य संबंध ही है (आउटलाइन्स, पृ. २३०)। रामानुज का अपृथसिद्ध सम्बन्ध संबंधित द्रव्यों की सत्यता, पारस्परिक अनिवार्यता एवम् पार्थक्य के स्वीकार करने में न्यायसमवाय के सदृश है। लेकिन दो तरह से यह उनसे पृथक् भी है। पहला समवाय की तरह अपृथसिद्ध सम्बन्ध सम्बन्धित द्रव्यों से पृथक् कोई बाह्य द्रव्य नहीं है। दूसरा, समवाय में सम्बन्धित वस्तुएँ समवाय द्वारा सम्बन्धित होने पर भी एक दूसरे से बाह्य ही रहती हैं। अर्थात् समवाय सम्बन्ध दो पूर्णतः पृथक् वस्तुओं के बीच ही होता है। परन्तु अपृथसिद्धि सम्बन्ध में पूर्ण भेद एवम् पूर्ण तादात्म्य दोनों का निषेध होता है।
५. सामानाधिकरण्य
एक चरम सत्ता किस तरह नानात्वमय जगत् से अपृथक् रूपेण सम्बन्धित हो सकती
रामानुज का विशिष्टाद्वैत-वेदान्त
२०५ है यह अद्वैतवाद के लिये सबसे बड़ी समस्या रही है और शंकर ने इसे अनिर्वचनीय कह कर छोड़ सा दिया है। प्रसिद्ध अंग्रेज विचारक एफ.एच. ब्रैडले ने इस सम्बन्ध में मानवबुद्धि का असामर्थ्य घोषित करते हुए कहा था कि हम यह नहीं जानते कि क्यों और कैसे चरम तत्त्व अपने को अनेक बिन्दुओं में विभाजित करता है या किस प्रकार विभाजित होकर भी “एकत्व” को बनाए रखता है। परन्तु रामानुज के लिये यह समस्या कभी भी पहेली रूप नहीं रही। उन्होंने अद्वैत के शुष्क एकत्व को अस्वीकार कर एकत्व के हृदय में ही भेद का सजीव सिद्धान्त ढूंढ़ निकाला । चरम सत्ता के एकत्व में अनुस्यूत भेद का यह सिद्धान्त सामानाधिकरण्य के नाम से अभिहित किया गया जिसमें नानात्व को एकत्व का विरोधी नहीं वरन् विशेषण माना गया। इस सिद्धान्त के द्वारा रामानुज ने यह प्रतिपादित किया कि एकत्व और नानात्व एक दूसरे के साथ घनिष्ट सम्बन्ध रखकर एक समन्वयात्मक एकता में समाविष्ट हो सकते हैं। भार
रामानुज ने सामानाधिकरण्य का सिद्धान्त व्याकरण से प्राप्त किया है। यह इस बात का द्योतक है कि भिन्न-भिन्न अर्थ और प्रयोजन वाले अनेक शब्दों की अन्ततोगत्वा एकार्थता में परिणति होती है (भिन्नप्रवृत्तिनिमित्तयुक्तस्यानेकशब्दस्यैकस्मिन्नर्थे वृत्तिस्सामानाधिकरण्यम्)। तर्कमीमांसा में सामानाधिकरण्य का तात्पर्य यह है कि किसी भी विधान में दो या दो से अधिक पद भिन्नार्थक होते हुए भी एकार्थताद्योतक होते हैं। तत्त्व-मीमांसा में यह इस बात को सूचित करता है कि एक ही द्रव्य में अनेक गुणों का अस्तित्व रह सकता है। अतः एक द्रव्यरूप ब्रह्म में चिदचिद्प नानात्व गुणरूप से विद्यमान रह सकता है।
रामानुज के अनुसार जितनी भी वस्तुओं का अस्तित्व है, वे सब अन्ततः ब्रह्म के ही प्रकार हैं। सब नाम उन्हीं के नाम हैं। प्रत्येक शब्द उन्हीं का प्रतीक है और अन्ततः उन्हीं की ओर जाता है। इसी को रामानुज-वेदान्त व्युत्पत्ति कहता है जो शब्दों का आन्तरिक अर्थ जानने में निहित है। इसके अनुसार किसी भी शब्द का साधारण अभिधार्थ के बाद अर्थ समाप्त नहीं हो जाता, बल्कि उसका व्यापार तब तक चलता रहता है जब तक वह परम सत्ता तक नहीं पहुंच जाता । वास्तव में यह बाद वाला अर्थ ही शब्द का आवश्यक अर्थ है।
इस सिद्धान्त के द्वारा रामानुज न केवल ब्रह्म, जीव और जगत् के बीच पारस्परिक सम्बन्धों की व्याख्या करते हैं, अपितु जीव और जगत् की वास्तविकता को भी सिद्ध करते
प्रो. पद्यरजिया (पृ.१०) रामानुज द्वारा व्याकरणीय सिद्धान्त के आधार पर तात्त्विक निर्णयों पर पहुँचने पर आपत्ति उठाते हैं। परन्तु कोई भी सिद्धान्त, चाहे वह व्याकरणीय हो या अन्य कोई, यदि किसी जटिल समस्या का समाधान प्रस्तुत करने में सहायक हो तो उसे स्वीकार करने में आपत्ति नहीं होनी चाहिये। रामानुज प्रकृति, जीव और ब्रह्म में अपृथसिद्धि एकता की स्थापना करते हैं। यह एकता एकभंगीय एकता है जिसमें ब्रह्म प्रधानतत्त्व और जीव तथा उस पर समाश्रित प्रकृति गौणतत्त्व हैं। एकता की इस धारणा
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वेदान्त-खण्ड को “नीलकमल” के उदाहरण द्वारा समझाया जा सकता है। यहाँ नीलत्व कमल से बिल्कुल भिन्न है, क्योंकि गुण और द्रव्य एक नहीं हो सकते। लेकिन साथ ही एक गुण के रूप में नीलत्व अपने अस्तित्व के लिए एक द्रव्य पर, जो यहाँ कमल है, आश्रित है और इसलिये उसे उसके बाहर नहीं माना जा सकता। इस कमल नामक विशिष्ट वस्तु को इस अर्थ में एक एकता कहा गया है कि इसमें नीलत्व का गुण आवश्यक रूप से अन्तर्भूत है। रामानुज नीलत्व गुण और कमल द्रव्य में वास्तविक अन्तर मानते हैं। अद्वैत में इसके विपरीत सब अन्तरों को आभासमात्र ही माना गया है। न्यायवैशेषिक में अन्तर को वास्तविक तो माना गया है, परन्तु वहाँ इन पदार्थों में बाह्य सम्बन्ध माना गया है जबकि रामानुज आन्तरिक सम्बन्ध को मानते हैं। म
इसी सिद्धान्त से रामानुज उपनिषद् के महावाक्य “तत्त्वमसि” का अर्थ-निर्धारण करते हैं। इसमें “चम्"शब्द, जो साधारणतः जीव के लिये आता है, वस्तुतः ब्रह्म की ओर इशारा करता है, जो कि जीव का अन्तर्यामी है और जीव तथा उसके माध्यम से उसका शरीर समानरूप से जिसके प्रकार हैं। इसमें जो “तत्” शब्द है वह भी ब्रह्म का ही द्योतक है पर वह उसके एक भिन्न पक्ष का अर्थात् जगत् के कारण रूप की सूचना देता है। इस तरह इस महावाक्य में ब्रह्म के दो पृथक् पक्षों की एकता का निरूपण है। इस वाक्य का अन्तिम अर्थ यह है कि यद्यपि जगत् और जीव वास्तविक और भिन्न हैं, तथापि जिस ब्रह्म के अन्दर ये अन्तर्भूत हैं वह एक है। ये ब्रह्म के समान ही शाश्वत हैं, परन्तु उनसे बाहर नहीं हैं।
६. ब्रह्मनिरूपण
रामानुज चरम सत्ता को वेदान्तप्रयुक्त ब्रह्म शब्द से ही अभिहित करते हैं तथापि वे कभी-कभी विष्णु, नारायण या श्रीनिवास शब्द का भी प्रयोग करते हैं। ये सभी नाम ब्रह्म के पर्यायवाची हैं और इनका उपयोग किसी साम्प्रदायिक अर्थ में नहीं किया गया है। जैसा कि हम पहले भी लिख चुके हैं रामानुज वेदान्त के ही आचार्य हैं, पाञ्चरात्र या श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के नहीं।
ब्रह्म के ज्ञान के बारे में रामानुज का कहना है कि वह मानवबुद्धि के पर्यवेक्षण के परे है। वे अनुभव तथा तर्क के द्वारा ब्रह्म के अस्तित्व को सिद्ध करने के प्रयासों का बड़े विस्तार एवम् सूक्ष्मता से खण्डन करते हैं। ब्रह्म का साक्षात्कार किया जा सकता है, सिद्धि नहीं। ब्रह्म के अस्तित्व का एकमात्र प्रमाण श्रुति है। उन्हें कर्म और ज्ञान द्वारा पुष्ट भक्ति या उपासना से प्राप्त किया जा सकता है।
ब्रह्म के स्वरूप के बारे में रामानुज द्वारा प्रतिपादित मत अद्वैतमत के प्रत्यक्ष विरोध के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके समस्त विधायक सिद्धान्त बोधायन आदि वेदान्ताचार्यों से प्राप्त किये गये हैं। परन्तु इसके पूर्व कि वे अपने पक्ष का प्रतिपादन करें
रामानुज का विशिष्टाद्वैत-वेदान्त
२०७ मुख्य प्रतिपक्ष के रूप में अद्वैतदर्शन के मूलभूत सिद्धान्त ब्रह्म के निर्विशेषत्व को रखते हैं। इसके अनुसार ब्रह्म एकमेव चरमसत्ता है जो सर्वथा निर्विशेष, निराकार, निष्पक्ष और सर्वभेदरहित है। वह चिद्रूप न होकर चिन्मात्र है। रामानुज अद्वैत की ब्रह्मविषयक इस स्थापना की दो खंडों में समीक्षा करते हैं। सबसे पहले वे इस बात का खण्डन करते हैं कि ब्रह्म निर्विशेष है और बाद में यह सिद्ध करते हैं कि वह चिन्मात्र नहीं है।
रामानुज का यह दावा है कि अद्वैतवादी चरमसत्ता के निर्विशेष होने का कोई प्रमाण नहीं दे सकते, क्योंकि समस्त प्रमाण न केवल विशिष्टग्राही ही होते हैं वरन् सविशेषता पर ही आधारित होते हैं। रामानुज बड़े विस्तारपूर्वक यह सिद्ध करते है कि निर्विशेष सत्ता के अस्तित्व का प्रमाण न तो प्रत्यक्ष, न अनुमान, न भाषा के शब्द और न श्रुति, स्मृति और पुराणादि देते हैं। समस्त ज्ञान का स्वरूप ही ऐसा है कि वह सविशेष एवं सापेक्ष हुए बिना नहीं रह सकता। जिस सत्ता का हमें ज्ञान होता है वह सविशेष ही है। निर्विशेष वस्तु का अस्तित्व ही सम्भव नहीं है। रामानुज का यह दृढ़ विश्वास है कि गुण के बिना सत्ता और सत्ता के बिना गुण का अस्तित्व नहीं हो सकता। केवल सगुण सत्ता ही हमारे अनुभव का विषय हो सकती है। ब्रह्म कभी निर्विशेष एवं निर्गुण नहीं हो सकता, क्योंकि ऐसी सत्ता का
अस्तित्व ही नहीं होता है। वह तो अद्वैतवादी की कल्पना की ही उपज है। अतः रामानुज दृढ़तापूर्वक यह प्रतिपादित करते हैं कि ब्रह्म निर्विशेष न होकर सविशेष है।
इसी तरह रामानुज अद्वैत के ब्रह्मसम्बन्धी इस मन्तव्य का भी खण्डन करते हैं कि ब्रह्म चैतन्यसत्ता न होकर चिन्मात्र है। अद्वैत में सत्ता और चित् या संवित् को एक ही माना गया है और संवित् के निर्विशेषत्व के ही आधार पर ब्रह्म का निर्विशेषत्व सिद्ध किया गया है। परन्तु रामानुज का कहना है कि सत्ता और संवित् का तादात्म्य तथा संवित् का निर्विशेषत्व किसी भी प्रमाण द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता, क्योंकि सभी प्रमाण अनुभूति पर आधारित होते हैं और अनुभूति सदैव सविशेष ही होती है। एक श्रृंगापत्ति (डाइलेमा) की सहायता से अद्वैत के सिद्धान्त का खण्डन करते हुये वे कहते हैं-संवित् की सिद्धि होती है या नहीं? यदि इसकी सिद्धि नहीं होती है तो यह पूर्णतः शून्य (तुच्छ) है, आकाश-कुसुम की तरह, और यदि इसकी सिद्धि होती है तो इसका तात्पर्य यह है कि यह सविशेष है। अद्वैतवादी स्वयं अन्त में कुछ गुणों के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं जैसे कि स्वयंप्रकाशता आदि। न वे यह तर्क कर सकते हैं कि ये सभी गुण मूलतः संवित् ही हैं क्योंकि इनमें मौलिक भेद है। संवित् अपने आप में आत्मतत्त्व का एक गुण है। इसकी पुष्टि इस बात से होती है कि यह क्षणिक अवस्थाओं से निर्मित है जिसका स्थायी आधार आत्मतत्त्व है। पहचानने की क्रिया के द्वारा भी यही प्रमाणित होता है कि आत्मतत्त्व स्थायी है और संवित् जो उसका गुण है परिवर्तनशील है। अन्त में रामानुज कहते हैं कि संवित् का सत्ता से
तादात्म्य नहीं माना जा सकता, क्योंकि स्वयं अद्वैतवादी संवित् को प्रमाणरूप मानते हैं । यदि में यह एक प्रमाण है तो यह किसी वस्तु का किसी व्यक्ति के लिए प्रमाण होना चाहिये। अतः२०८
वेदान्त-खण्ड यह वस्तु और विषय दोनों को मानकर चलता है। यही विषय संवित् का आधार है जो संवित से पृथक् है। इन दोनों में तादात्म्य नहीं। इसलिये हम कहते हैं कि “अनुभवाम्यहम्” (मैं अनुभव करता हूँ) न कि “अनुभूत्यहम्” (मैं अनुभूति हूँ)। सका।
अद्वैतदर्शन में चरमसत्ता का निर्गुण एवं सगुण के रूप में द्विविध वर्णन किया गया है। एक को पारमार्थिक और दूसरे को व्यावहारिक सत्ता कहकर दोनों में वैचारिक पृथक्करण किया गया है। सगुणब्रह्म की सत्ता औपाधिक ही है और जगत्प्रपंच तक ही सीमित है। पारमार्थिकरूप से उसकी सत्ता नहीं है। रामानुज इस वर्गीकरण के पूर्ण विरोधी हैं। उनके अनुसार ब्रह्म एक ही है और वह सगुण है। उपनिषदों में उसकी निर्गुणता
का आख्यान उसमें हेय गुणों के अभाव का ही सूचक है। आमाका
ऊपर लिखित परीक्षण के आधार पर रामानुज यह निष्कर्ष निकालते हैं कि ब्रह्म एक ऐसी चरम सत्ता का नाम है जो समस्त शुभगुण सम्पन्न है और जिसमें हेय गुणों का सर्वथा अभाव है। ब्रह्म के सर्वशुभ गुणसम्पनत्व को सिद्ध करने के लिये वे प्रायः उपनिषदों में प्रयुक्त सत्य, ज्ञानं, अनन्तं, आनन्दं आदि गुणों का वर्णन करते हैं। इनके साथ ही विष्णुपुराण को उद्धृत कर ज्ञान, बल, वरेण्य, ऐश्वर्य, शक्ति और तेजस् गुणों का भी उल्लेख करते हैं। ये गुण पाञ्चरात्र सम्प्रदाय में षाड्गुण्य विग्रह नारायण के लिए वर्णित हैं और व्यूह-प्रक्रिया के आधार हैं। वहाँ इनका सृष्टिप्रक्रिया में बड़ा महत्त्वपूर्ण स्थान है। रामानुज-दर्शन में इन गुणों का विष्णुपुराण के उद्धरण का उल्लेख मात्र है और इनका कोई विशेष स्थान या महत्त्व नहीं है। अतः इस आधार पर यह मानना अप्रामाणिक होगा कि रामानुज पाञ्चरात्र धर्म के अनुयायी थे या उससे प्रभावित थे। रामानुज अनेक मानवीय गुणों, उपमाओं एवम् सौन्दर्यसूचक शब्दों का उपयोग करते हैं। इन गुणों के अलावा रामानुज सोशील्य, कौमार्य, दया, करुणा, सौहार्द, सौलभ्य आदि का भी बड़े विस्तार से अनेक बार वर्णन करते हैं। इस प्रकार के वर्णनों में इनका मानवीकरण-सा हो गया है, जो रामानुज के उत्कृष्ट तत्त्वशास्त्र में कुछ असंगत है।
रामानुज न केवल विधायकरूप से ब्रह्म के अनंत अप्रतिम शुभ गुणों का वर्णन करते। हैं अपि तु ब्रह्म में हेय गुणों का पूर्ण अभाव है, इसको भी उतने ही भार के साथ कहते हैं। इसके लिये वे प्रायः निरवद्य, निर्विकार, समस्तहेयगुणप्रत्यनीक आदि पदों का प्रयोग करते हैं। उपनिषदों में निर्गुण और सगुण दोनों प्रकार की श्रुतियां मिलती हैं। निर्गुण श्रुति से रामानुज हेयगुण के निषेध का तात्पर्य लगाते हैं। सगुण श्रुति के आधार पर वे ब्रह्म के शुभ गुणों का प्रतिपादन करते हैं। ब्रह्म के गुणों की अनेकता उसके स्वरूप के नानात्व का बोध नहीं कराती, क्योंकि, पृथक् होते हुये भी समस्त गुण एक ही ब्रह्म में अस्तित्व रखते हैं और उनकी अद्वयता को हानि नहीं पहुंचाते।
न रामानुज की चरम सत्ता एक चरम तत्त्व ही नहीं, परम पुरुष भी है। सत्ता में गुणों के अस्तित्व को स्वीकार करने का अर्थ उसके व्यक्तित्व को स्वीकार कर पूर्ण पुरुषत्व हो ।
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रामानुज का विशिष्टाद्वैत-वेदान्त भी स्वीकार करना है। ब्रह्म के व्यक्तित्व का वर्णन करते हुए वे उनके देहादि का, उनके वैकुण्ठधाम, वस्त्राभूषण, पत्नियों, सेवकों आदि का पौराणिक पद्धति से चित्रण करते हैं। यह ब्रह्म पर मानवीय रूपों और सम्बन्धों का आरोपण है जो उनके दर्शन में पौराणिक विश्वासों का प्रवेश है। एक विशुद्ध दर्शन में धार्मिक भावना की आड़ में पौराणिक गाथाओं एवं मान्यताओं का यह मिश्रण है।
रामानुज के ग्रन्थों में हमें ब्रह्म के देह का दो प्रकार का वर्णन मिलता है। प्रथम तो वे पुराणों तथा टंक, द्रमिड़ आदि पूर्वाचार्यों के कथन को तार्किक समीक्षा के बगैर स्वीकार कर ब्रह्म के देह का और उनके आंगिक सौन्दर्य, सुकुमारत्व एवं लावण्य का मानवीय आधारों पर बढ़ा-चढ़ाकर वर्णन करते हैं जो कि उनके निम्नस्तरीय मानवीकरण का ही परिचायक है। परन्तु इसके अलावा हम ब्रह्म के देह के दूसरे प्रकार का भी वर्णन पाते हैं जो उनकी दार्शनिक भव्यता के अनुरूप है। इसके अनुसार समस्त चराचर जगत् ब्रह्म का देह है। आत्मभूत ब्रह्म के चिदचिद् शरीर हैं। शरीर वही है जिसे आत्मा धारण करता है, नियमन करता है और अपने प्रयोजन हेतु कार्य में प्रवृत्त करता है। ठीक इसी प्रकार ईश्वर चिदचिद् का धारण एवं नियमन करता है और उन्हें कार्य में प्रवृत्त करता है। जगत् ब्रह्म का शरीर है यह सिद्धान्त रामानुज ने बृहदारण्यक उपनिषद् के अन्तर्यामी ब्राह्मण अधिकरण से प्राप्त किया है जिसमें ब्रह्म की व्याख्या करते हुए कहा गया है कि जो पृथिवी में निवास करता है, जो पृथिवी का अन्तर्यामी है पर जिसे पृथिवी नहीं जानती, जिसकी पृथिवी शरीर है, जो पृथिवी का अन्दर से नियमन करता है, वही तुम्हारी भी आत्मा है, नियन्ता है, अमृत तत्त्व है, वही ब्रह्म है।
ब्रह्म और चिदचिद् विश्व के इस शरीर-शरीरी भाव को रामानुज काफी विस्तार से समझाते हैं। जीव और जगत् वस्तुतः नित्य तथा पृथक् पदार्थ हैं तथापि वे ब्रह्म के अधीन होकर रहते हैं। क्योंकि ब्रह्म भोक्ता (जीव) तथा भोग्य (जड़) इन दोनों के भीतर अन्तर्यामी रूप से विद्यमान रहते हैं। श्वेताश्वतर का भोक्ता, भोग्य तथा प्रेरित यह त्रिविध ब्रह्म यहाँ क्रमशः चित्, अचित् तथा ब्रह्म के रूप में गृहीत किया गया है। रामानुज ब्रह्म में सजातीय और विजातीय भेद का निषेध करते हैं, परन्तु स्वगत भेद को स्वीकार करते हैं। ब्रह्म चित् और अचित् तत्त्वों का एक विशिष्ट है। उसको विशिष्ट करने वाले गुण नितान्त भिन्न हैं, यद्यपि उनका अस्तित्त्व अविभाज्य है। ऐसी दशा में ब्रह्म में स्वगतभेद विद्यमान रहता है। वे उस विराट् वृक्ष के सदृश हैं जिसकी असंख्य शाखायें और प्रशाखायें हैं। ब्रह्म ही जगत् की सृष्टि, स्थिति और प्रलय के कर्ता हैं। किन्तु इस प्रक्रिया में ब्रह्म निर्विकार ही रहते हैं। क्रियाशक्ति उनकी सत्ता या स्वरूप को बाधा नहीं पहुंचाती। प्रलय की अवस्था में चित और
अचित् अव्यक्त या बीजावस्था में ब्रह्म में रहते हैं। ब्रह्म को इस अवस्था में “कारणब्रह्म” कहते हैं। जब सृष्टि होती है तब ब्रह्म शरीरधारी जीवों तथा भौतिक पदार्थों में व्यक्त होते हैं। इस अवस्था में ब्रह्म को “कार्यब्रह्म” कहते हैं। ब्रह्म अपनी इन दोनों विशिष्ट अवस्थाओं
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वेदान्त-खण्ड में अद्वैत रूप है। यही विशिष्टाद्वैत का तात्पर्य है। अभेद श्रुतियां कारणब्रह्म का सम्बोधन करती हैं और भेद श्रुतियां कार्यब्रह्म का।
यदि चित् और अचित् को ब्रह्म का देह या अंश माना जाये तो एक आपत्ति उत्पन्न होती है। सृष्टि की अवस्था में चित् के दोषों और अचित् के विकारों से क्या ब्रह्म में भी दोष एवम् विकार उत्पन्न नहीं होते? यदि चिदचिद् ब्रह्म के वास्तविक अंश हैं तो अंशी ब्रह्म में भी ये दोष अवश्य ही आरोपित किये जा सकते हैं। इस विषम स्थिति से बचने के लिये रामानुज शरीर-शरीरी सम्बन्ध को अधिक स्पष्ट करते हैं। जिस तरह शारीरिक विकारों या त्रुटियों से आत्मा प्रभावित नहीं होता उसी तरह जगत् के विकारों या त्रुटियों से ब्रह्म प्रभावित नहीं होते हैं। कभी-कभी रामानुज इस विषय को समझाने के लिये राजा-प्रजा के संबंधों की भी सहायता लेते हैं। प्रजा के सुख-दुःखों से जिस तरह राजा प्रभावित नहीं होता उसी तरह जीवों के दुःखों से ब्रह्म प्रभावित नहीं होते। परन्तु यह विचारणीय है कि क्या इन व्याख्याओं से रामानुज मूल आपत्ति का निराकरण करने में समर्थ हो सके हैं? यदि जगत् को ब्रह्म का विशेषण, अंश या देह भी माना जाये तो जगत् के दोषों के आरोपण से ब्रह्म अछूते नहीं रह सकते। रामानुज स्वयं इस कठिनाई और विरोधाभास से अवगत थे। इस आपत्ति से बचने के लिये यदि यह मान लिया जाये कि ब्रह्म का चराचर जगत् से बाह्य सम्बन्ध ही है तो इससे उनके अपृथसिद्धि सम्बन्ध पर प्रभाव पड़ता है। रामानुज के सामने इस विरोधाभास से बचने का कोई मार्ग नहीं है और इसी से उनके मूल सिद्धान्त में कुछ दुविधा आ जाती है।
रामानुज के ब्रह्म का निरूपण करते समय इस भ्रामक मान्यता का निरास आवश्यक है कि उन्होंने पाञ्चरात्र सम्प्रदाय से ब्रह्म के पर, व्यूह, विभव, अन्तर्यामी तथा अर्चावतार इन पञ्चविध रूपों के सिद्धान्त को स्वीकार किया है और अपने दर्शन में उनका समावेश किया है। यथार्थ में इस सिद्धान्त का इसके पाञ्चरात्रीय रूप में रामानुज के ग्रन्थों में उल्लेख ही नहीं है और न उन्होंने इस सिद्धान्त का कहीं उपयोग ही किया है। वे केवल ब्रह्म के अवतारों का उल्लेख करते हैं जो भक्तों के ऊपर अनुग्रह किया करते हैं। अवतारवाद का यह सिद्धान्त यजुर्वेद की “अजायमानो बहुधा विजायते” नामक श्रुति से स्पष्ट प्रतिपादित है और गीता तथा विष्णुपुराण में हमें इसका व्यवस्थित रूप मिलता है। रामानुज की अवतारवाद की व्याख्या भी इन्हीं दो ग्रन्थों पर आधारित है।
- संक्षेप में, रामानुज के अनुसार ब्रह्म पूर्ण एवम् परम पुरुष हैं जो समस्त शुभ गुणों के आकर हैं। वे जगत् के चरम लक्ष्य, आधार, नियन्ता, साक्षी, आवास, शरण्य, सखा आदि हैं। वे सर्वत्र विद्यमान समस्त पदार्थों के आदि एवं अंत हैं। जो सब निर्मित एवं विनष्ट किये जा सकते हैं, उन्हीं के स्वरूप हैं। वही सबके अक्षर कारण और सर्वस्व हैं।
रामानुज का विशिष्टाद्वैत वेदान्त
७. सृष्टि-निरूपण
सृष्टि के विषय में रामानुज उपनिषदों एवं गीता के सिद्धान्तों को ही यथावत् स्वीकार करते हैं। उनका मत है कि सर्वव्यापी ब्रह्म स्वेच्छा से ही अपने से मकड़ी के जाले की तरह इस नानात्मक विश्व का सृजन करते हैं। ब्रह्म में चित् और अचित् दो तत्त्व विद्यमान रहते हैं। इनमें चित् जीव का द्योतक है और अचित् जड़ प्रकृति का । प्रकृति से ही समस्त भौतिक पदार्थों की उत्पत्ति होती है। श्वेताश्वतर-उपनिषद् में इसी प्रकृति को अनादि, एक, तथा अपने समान ही बहुत सी प्रजाओं की सृष्टि करने वाली माना गया है। रामानुज इसे स्वीकार करते हैं। इतना तो सांख्यदर्शन में भी माना गया है, परन्तु सांख्यमत से रामानुज का यह भेद है कि रामानुज प्रकृति को ब्रह्म का अंश और ब्रह्म द्वारा परिचालित मानते हैं। प्रकृति स्वयं सृष्टि नहीं करती, प्रत्युत ब्रह्म की अध्यक्षता में ही वह सृष्टि का कार्य करती है। सर्वशक्तिमान् ब्रह्म की इच्छा से सूक्ष्म प्रकृति तीन प्रकार के तत्त्वों में तेज, जल तथा पृथिवी में-विभाजित हो जाती है जिनमें क्रमशः सत्त्व, रज तथा तमोगुण पाये जाते हैं। इन्हीं तीनों तत्त्वों के नाना प्रकार के संयोग तथा मिश्रण के फल से जगत् के स्थूल पदार्थ उत्पन्न होते हैं और इसीलिये ये तीनों तत्त्व संसार के प्रत्येक पदार्थ में विद्यमान रहते हैं। यह सम्मिश्रणक्रिया त्रिवृतकरण कहलाती है। इसका मूलतः संकेत छान्दोग्य उपनिषद् में पाया जाता है।
रामानुज जगत के प्रति वास्तवलक्षी द्रष्टिकोण अपनाते हैं। उनके मत में जगत् उतना ही सत्य है जितना कि ब्रह्म स्वयम् । जगत् मिथ्या है, इस अद्वैत के निष्कर्ष का वे प्रबलरूप से विरोध करते हैं। यथार्थ में उनकी सृष्टिमीमांसा शंकर के मायावाद के प्रत्यक्ष खण्डन के रूप में स्थापित हुई है। यद्यपि दोनों आचार्यों के आधारग्रन्थ एक ही हैं, दोनों की शास्त्र को अध्ययन करने की पद्वति भी एक-सी है फिर भी दोनों के निष्कर्ष भिन्न ही नहीं, विरोधी भी हैं। दोनों ने अपने सृष्टिमीमांसा सम्बन्धी विचार अपनी ज्ञानमीमांसा और तत्त्व-मीमांसा से प्राप्त किये हैं। दोनों में मौलिक भेद सत्ता के प्रति दृष्टिकोण में है। दोनों यह मानते हैं कि सृष्टिप्रक्रिया का मूल कोई सृजन की चाह है और उस चाह को चरम सत्ता में स्थान मिलना चाहिए। परन्तु शंकर उस चाह को माया द्वारा ब्रह्म में आरोपित या मिथ्या मानते हैं। दोनों के अनुसार जगत् ब्रह्म की ही अभिव्यक्ति है, परन्तु शंकर के लिये यह अभिव्यक्ति आभास मात्र है, जबकि रामानुज इसे पूर्ण सत्य मानते हैं। शंकर के लिये यह विवर्त है जबकि रामानुज के लिये यह विकार है। विवर्त और विकार के बीच यह भेद सदानन्द ने वेदान्तसार में इस प्रकार समझाया है
सतत्त्वतोऽन्यथा प्रथा विकार इत्युदीरितः। अतत्त्वतोऽन्यथा प्रथा विवर्त इत्युदीरितः।।
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वेदान्त-खण्ड अर्थात् यदि कोई वस्तु यथार्थ में किसी अन्य वस्तु के रूप में अभिव्यक्त होती है तो उसे विकार कहते हैं और यदि वह अयथार्थतः किसी अन्य वस्तु के रूप में अभिव्यक्त होती है तो उसे विवर्त कहते हैं।
अद्वैत-दर्शन में सत्ता के प्रति जो दृष्टिकोण अपनाया गया है उससे एक प्रश्न उपस्थित होता है कि यदि ब्रह्म एकमेव सत्ता है तो वैविध्यमय जगत् जिसका हम अनुभव करते हैं उसकी व्याख्या कैसे की जाये। इसका उत्तर माया के सिद्धान्त की सहायता से दिया अवश्य गया है, परन्तु माया स्वयं अपने आप में अनिर्वचनीय है, एक पहेली है, जो वास्तविक समाधान की अपेक्षा वैचारिक रहस्य है। यह एकत्व और नानात्व के विरोध को दूर करने के लिये प्रस्तुत की गई है, परन्तु इसमें स्वयं में सत् और असत् दोनों के निषेध का आत्मविरोध है। रामानुज सत्ता के प्रति सजीव दृष्टिकोण रखते हैं, अतः उनके लिये एकत्व और नानात्व के समाधान का प्रश्न ही उत्पन्न नहीं होता। वे इन दोनों को दो पृथक् तत्त्व न मानकर एक ही तत्त्व के दो पक्ष मान लेते हैं। इसमें एक चरम सत्ता अपने सविशेष स्वरूप में जगत के नाना चराचर तत्त्वों का अंग के रूप में समावेश कर लेती है। ताकिक दृष्टि से यह आवश्यक भी है कि यदि ब्रह्म में अभिव्यक्ति को स्वीकार कर लिया जाये तो उन नाना रूपों को भी ब्रह्म में स्वीकार करना पड़ेगा जिनमें ब्रह्म की अभिव्यक्ति हुई है। अद्वैतवादी इस अभिव्यक्त नानात्व को माया के आधार पर मिथ्या घोषित करते हैं। रामानुज सात तर्कों के बल पर मायावाद का खण्डन करते हैं।
(9) आश्रयानुपपत्ति-जिस अविद्या या माया से संसार की उत्पत्ति होती है उसका आधार क्या है? यदि यह कहा जाये कि वह जीवाश्रित है (वाचस्पति का मत) तो यह शंका उत्पन्न होती है कि जीवत्व तो स्वयं अविद्या का कार्य है, फिर जो कारण है वह कार्य पर कैसे निर्भर रह सकता है? यदि यह कहा जाये कि अविद्या ब्रह्माश्रित है (सर्वज्ञात्ममुनि का मत) तो फिर ब्रह्म को शुद्ध ज्ञानस्वरूप कैसे कह सकते हैं? और न अविद्या को एक पृथक् स्वाश्रयी तत्त्व ही माना जा सकता है, क्योंकि इसमें अद्वैत के सिद्धान्त का खण्डन होता
(२) तिरोधानुपपत्ति-अद्वैतवाद के अनुसार अविद्या ब्रह्म को आच्छादित कर अध्यारोप द्वारा जगत् को व्यक्त करती है। परन्तु ब्रह्म जो स्वप्रकाश है अध्यारोप का विषय नहीं हो सकता, अन्यथा उसका तात्पर्य ब्रह्म के स्वरूप का विनाश या लोप होगा।
(३) स्वरूपानुपपत्ति- यदि हम अविद्या की सत्ता को स्वीकार करें तो प्रश्न उपस्थित होता है कि उसका स्वरूप क्या है? क्या वह सत् है या असत् है? अद्वैतवादी उसे सत् मानते ही नहीं। पर उसे असत् भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि इससे अद्वैतवाद की हानि होगी। कारण कि चित् में स्थित अविद्या यदि स्वयं ही चिप है और असत् भी है तो दो प्रकार के चित् की कल्पना करनी होगी-एक तो सत् चित् (ब्रह्म) और दूसरा असत् चित् (अविद्या)। इसके अलावा इस प्रस्थापना में अनवस्था दोष भी होगा, क्योंकि यदि असत् जगत् के कारण के रूप में अविद्या को माना जाये और यह अविद्या स्वयं भी असत् हो
रामानुज का विशिष्टाद्वैत-वेदान्त
२१३ तो इसके भी कारण के रूप में किसी अन्य तत्त्व को मानना पड़ेगा। इस दोष के निवारण हेतु यह माना जा सकता है कि सत् चित् जो स्वयं ब्रह्म है, अविद्या है। तो इसका अर्थ यह होगा कि ब्रह्म स्वयं ही जगत् का कारण है और ऐसी अवस्था में अविद्या के किसी तत्व को मानना अनावश्यक होगा। फिर ब्रह्म तो शाश्वत तत्त्व है। अतः उसका कार्यरूप जगत् का आभास भी शाश्वत ही होगा। अतः अविद्या को सत् माने बिना जगत् के आभास की व्याख्या नहीं हो सकती।
(४) अनिर्वचनीयानुपपत्ति-अविद्या को भावरूप अज्ञान कहते हैं। परन्तु ऐसा कहने का कुछ अर्थ नहीं होता। अज्ञान का अर्थ ज्ञान का अभाव है। तब फिर वह भावरूप कैसे माना जा सकता है? अविद्या का ज्ञान प्रत्यक्ष या अनुमान से भी नहीं होता है। कोई भी अनुभव भ्रामक नहीं है। भ्रम में भी अर्धज्ञान ही होता है अज्ञान नहीं। इस तरह न तो सिद्धान्ततः और न व्यवहार में अविद्या की सिद्धि हो सकती है।
(५) प्रमाणानुपपत्ति-अविद्या की सिद्धि के लिये शास्त्रों में भी कोई प्रमाण नहीं है। प्रकृति को माया कह कर उपनिषदों में सम्बोधित किया गया है परन्तु वहाँ माया का तात्पर्य अज्ञान नहीं, वरन् ब्रह्म की विशिष्ट शक्ति है।
(६) निवर्तकानुपपत्ति- अविद्या का कोई निवर्तक नहीं हो सकता, क्योंकि अद्वैत के अनुसार निर्विशेष ज्ञान ही अविद्या का निवारण कर सकता है। परन्तु यह ज्ञान सम्भव नहीं।
(७) निवर्त्यानुपपत्ति-अविद्या का निवारण भी सम्भव नहीं है, क्योंकि यह भावरूपा है। भावरूप सत्ता का कभी बिनाश नहीं हो सकता।
इस तरह मायावाद का खण्डन कर रामानुज यह प्रतिपादित करते हैं कि सृष्टि वास्तविक है। अपने पक्ष का समर्थन करने के लिये वे कहते हैं कि सभी ज्ञान सत्य होता है और कोई भी विषय मिथ्या नहीं होता है। रज्जु-सर्प वाले श्रम में भी यही बात है। जो तीनों तत्त्व सर्प में विद्यमान हैं वे ही रज्जु में भी हैं। इसलिये हमें रज्जु में सर्प की प्रतीति होती है। वह असत् पदार्थ की प्रतीति नहीं होती। इसी तरह रामानुज इस तर्क का भी खण्डन करते है कि जगत् के पदार्थ मिथ्या हैं क्योंकि वे क्षणिक हैं। इन्हें एक विशेष अर्थ में असत् कहा जा सकता है पर तुच्छ या मिथ्या नहीं। मिथ्या या तुच्छ उनके बाधित होने पर ही हो सकते है, मात्र परिवर्तन से नहीं। शास्त्रों में भी कहीं पर जगत को मिथ्या नहीं कहा गया है। श्रुतियों में जहाँ नानात्व का निषेध और एकत्व का प्रतिपादन किया गया है वहाँ एकत्वविहीन नानात्व का ही निषेध है, एकत्व में निहित नानात्व का नहीं। ब्रह्म व्यतिरिक्त जगत् मिथ्या है, ब्रह्म समाश्रित जगत् मिथ्या नहीं। श्वेताश्वतर-उपनिषद् में जहाँ प्रकृति को माया कहा गया है, वहाँ माया का तात्पर्य अद्भुत पदार्थों की सृष्टि करने वाली शक्ति है। इसी तरह जब ब्रह्म को मायिन कहा गया है तो इसका तात्पर्य केवल इतना ही है कि उनकी सृष्टिलीला अद्भुत तथा विचित्र होती है।
वेदान्त-खण्ड
अतः रामानुज यह निष्कर्ष निकालते हैं कि जगत् ब्रह्म का एक वास्तविक परिणाम है। सृष्टिप्रक्रिया ब्रह्म की आत्माभिव्यक्ति है। ब्रह्म अपनी पूर्णता और विशुद्धता को छोड़े बिना जगत् की अभिव्यक्ति करते हैं। ब्रह्म जगत् को व्याप्त करते हुए इससे परे भी है। वे विश्वानुग तथा विश्वातीत हैं। जगत् के समस्त पदार्थ उनमें स्थित हैं फिर भी ब्रह्म उनसे पृथक् हैं। जगत् ब्रह्म से ही उद्भूत होता है, ब्रह्म में ही स्थित रहता है और उन्हीं में लीन हो जाता है। ब्रह्म जगत् के निमित्त, उपादान और सहकारी कारण एक ही साथ हैं। ब्रह्म जगत् का कारण ठीक उसी तरह है जिस तरह मकड़ी अपने जाले की और आग चिनगारी
यदि ब्रह्म जगत् का कारण है तो यह प्रश्न उपस्थित होता है कि पूर्ण ब्रह्म अपूर्ण विश्व का कारण कैसे हो सकता है? रामानुज का कहना है कि ‘यह कैसे होता है’ यह प्रश्न एक पहेली हो सकता है पर ऐसा होता है, यह सत्य है। श्रुति इसकी पुष्टि करती है। इसी तरह यह भी आपत्ति की जा सकती है कि कारण और कार्य समधर्मी होने चाहिये, परन्तु
जगत् ब्रह्म से बहुत भिन्न है। इसके उत्तर में रामानुज कहते हैं कि दोनों में पूर्ण साधर्म्य - भी नहीं हो सकता। कारण सम्बन्ध में न तो पूर्ण साधर्म्य और न पूर्ण वैधर्म्य ही हो सकता है। किसी वस्तु की एक अवस्था छोड़कर दूसरी अवस्था को प्राप्त करना ही कार्यता है, जैसे कि मिट्टी परिवर्तित होकर घड़े का रूप धारण करती है। दोनों में तात्त्विक एकता है, तथापि गुणों में वैभिन्य है। कार्य और कारण में साधर्म्य इस आधार पर है कि कार्य कारण में गूढरूप से निहित है और कारण कार्य में परिवर्तित होने की क्षमता रखता है। कारण और कार्य में अन्तरंग सम्बन्ध सिद्ध करने के लिये रामानुज जैविक जगत् से विकास के सिद्धान्त को लेते हैं। जिस तरह बालक शिशु से युवक के रूप में विकसित होता है उसी तरह कारण कार्य में परिवर्तित होता है। ब्रह्म में सृष्टि के मूलतत्त्व गूढरूप से निहित होते हैं। सृष्टि का तात्पर्य उन्हीं तत्त्वों का अभिव्यक्त होना है। ब्रह्म का कारणावस्था से (जिससे जगत् गर्भित रूप में रहता है) कार्यावस्था को (जिसमें जगत् प्रकट होता है) प्राप्त करना ही सृष्टि है। अतः सृष्टि का अर्थ अव्यक्त का व्यक्त होना है, सूक्ष्म का स्थूल होना है। सृष्टि के पूर्व जीव
और जगत् सुषुप्त या अव्यक्त रूप में ब्रह्म में निहित रहते हैं। सृष्टिप्रक्रिया में जीव कर्मानुसार देह तथा चित्शक्ति को प्राप्त करते हैं। जगत् के भौतिक पदार्थ स्थूलता को प्राप्त कर लेते हैं। सृष्टि और विसृष्टि ये दोनों प्रक्रियाएं एक ही ब्रह्म की दो अवस्थायें हैं। दोनों अवस्थाओं में ब्रह्म का ऐक्य विद्यमान रहता है। केवल भेद यह रहता है कि विसृष्टि में ऐक्य एकविध होता है जबकि सृष्टि में अनेक विध हो जाता है। ब्रह्म की ये दोनों अवस्थायें समानरूप से सत्य हैं और कोई भी अवस्था असत्य या मिथ्या नहीं है। _ ब्रह्म की, जगत् की कारणता की चर्चा करते हुए यहाँ शंकर और रामानुज की कारणताविषयक मान्यताओं का तुलनात्मक विचार अप्रासंगिक नहीं होगा। रामानज सत्कार्यवाद को स्वीकार करते है। परन्तु यह सत्कार्यवाद सांख्यदर्शन के अर्थ में नहीं जहाँ
रामानुज का विशिष्टाद्वैत-वेदान्त
२१५ कार्य को अभिव्यक्ति के पूर्व भी सत् माना गया है। रामानुज का तात्पर्य केवल इतना ही है कि कार्य कारण का ही अवस्थान्तर है-वही द्रव्य कारण है और वही कार्य। मात्र अवस्था में अन्तर होता है। शंकराचार्य, जो कि पूर्ण अद्वैत को मानते है, यथार्थ में कारणता को स्वीकार नहीं करते। फिर भी व्यावहारिक दृष्टि से वे इसके मूल्य को स्वीकार करते हैं। परिणामतः वे कारणता और अद्वैत में समन्वय स्थापित करने का प्रयास करते हैं जो विवर्तवाद में परिणत होता है। विवर्तवाद में एक ही साथ कारणता का स्वीकार तथा निषेध होता है। इसमें पहले कारणता को स्वीकार कर जगत् के अस्तित्व का प्रतिपादन किया जाता है और बाद में जगत् को मिथ्या तथा अद्वैत ब्रह्म को सत्य घोषित कर कारणता का निषेध कर दिया जाता है। शंकर अद्वैत और कारणता में समन्वय स्थापित करना चाहते थे परन्तु वह सम्भव नहीं था। क्योंकि अद्वैत निरपेक्ष सिद्धान्त है जबकि कारणता सापेक्ष है। एक बुद्धि से परे है तो दूसरा बुद्धि के लिये आवश्यक है। वे इन दोनों में समन्वय तो नहीं कर पाते, पर शंकर अद्वैत को ग्रहण करते हैं और कारणता का त्याग कर देते हैं। इसके विपरीत रामानुज कारणता के सिद्धान्त को अद्वैत के सामने समर्पित नहीं करते। वे चरम सत्ता के एक ऐसे स्वरूप का प्रतिपादन करते हैं जिसमें दोनों का समन्वय हो जाता है। यथार्थ में वे दोनों में विरोध नहीं मानते। अद्वैत का नानात्व में यह परिणाम ही कारणता है। ।
मार यदि ब्रह्म को जगत् का कारण माना जाये तो यह प्रश्न उपस्थित होता है कि अविकारी ब्रह्म कैसे जगत् रूपी परिणाम को प्राप्त हो सकता है। इसके लिये रामानुज ब्रह्म के स्वरूप का द्विविध भेद बताते हैं। ब्रह्म में दो तत्त्व हैं-उनका देह और उनकी आत्मा। ब्रह्म की आत्मा उनकी मूल-प्रकृति का प्रतीक है जो पूर्ण, अविकारी एवं विशुद्ध है। ब्रह्म का देह जगत् से वहीं सम्बन्ध है जो आत्मा और देह में है। इसी को शरीर-शरीरी भाव कहते हैं। ब्रह्म का शारीरिकत्व रामानुज दर्शन का मूल आधार है। यही उपनिषदों का भी मूलभूत सिद्धान्त है। इसका सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादन बृहदारण्यक उपनिषद के अन्तर्यामी प्रकरण में हुआ है। जगत् के रूप में ब्रह्म का परिणाम उनकी अपूर्णता या विकास का द्योतक नहीं, क्योंकि यह परिणाम उनके देह ही में होते हैं, मूल आत्मा में नहीं।
रामानुज जगत् और ब्रह्म के सम्बन्ध को द्रव्य-गुणभाव के आधार पर भी समझाते हैं। यह सिद्धान्त उनकी ज्ञानशास्त्रीय प्रस्थापना की तार्किक परिणति है। उनके अनुसार प्रत्येक द्रव्य गुण या सविशेष ही होता है, निर्विशेष नहीं। द्रव्य-गुण-सम्बन्ध द्रव्य और उसके मौलिक गुणों के बीच ही नहीं, वरन् द्रव्यों के बीच भी होता है। जैसे, वह दंडी है। यहाँ “वह” और “दंड” इन दो द्रव्यों के बीच द्रव्य-गुण सम्बन्ध है। “दंड’ “वह” से पृथक अस्तित्व रखता है फिर भी “वह” का गुण है। इसी तरह जगत् भी एक पृथक् द्रव्य होते हुए भी ब्रह्म का गुण या पर्याय है। रामानुज कारण-कार्य सम्बन्ध और शरीर-शरीरी सम्बन्ध को भी द्रव्य-गुण-सम्बन्ध में घटित करते हैं। द्रव्य द्वारा एक गुण से दूसरे गुण की प्राप्ति ही कार्यता है। इसी तरह शरीर भी शरीरिन् का गुण है क्योंकि वह उस पर
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। वेदान्त-खण्ड
आश्रित रहता है। इस द्रव्य-गुण-सम्बन्ध का आधार लेकर रामानुज ब्रह्म की अखण्डता एवं पूर्णता को बचा लेते हैं और साथ ही साथ जगत् की सत्यता की भी रक्षा करते हैं। कारण, द्रव्य का गुण से भेद होना स्वाभाविक है। किसी द्रव्य के द्रव्यत्व से गुण पार्थक्य होता है। अतः ब्रह्म का पूर्ण और जगत् का अपूर्ण होना अस्वाभाविक नहीं। कोई भी वस्तु किसी द्रव्य का गुण होती तो इस आधार पर नहीं कि वह द्रव्य की समानधर्मी है, परन्तु इस आधार पर कि वह द्रव्य पर पूर्णतया आधारित है। इस तरह रामानुज जगत् का ब्रह्म से पार्थक्य भी सिद्ध करते हैं और जगत् की ब्रह्म पर निर्भरता भी प्रतिपादित करते हैं।
आत्म-निरूपण
रामानुज के दर्शन में ब्रह्म का अद्वैतत्व इस तरह उपहित है कि उनके सविशेष ऐक्य में आत्मा या जीव की वास्तविक सत्ता के लिये पूरा स्थान है। इसके विपरीत अद्वैतवाद में ब्रह्म को ही एकमात्र वास्तविक सत्ता माना गया है। फलतः सभी आत्मा उनके आभासमात्र माने गये हैं। पारमार्थिक रूप से आत्मा ब्रह्म ही है। सभी आत्माएं यथार्थतः एक ही अविभाज्य निष्कल ब्रह्म हैं जो कि अविद्या के द्वारा बहुविध प्रतीत होते हैं। जीव या आत्मा में साक्षी का तत्त्व ही सत्य है, देहादि मायाजनित एवं मिथ्या है। रामानुज अद्वैतवाद की इस मान्यता का पूर्ण विरोध करते हैं। वे आत्मा की पारमार्थिक सत्यता तर्क एवं श्रुति के प्रमाण पर प्रतिपादित करते हैं। प्रत्येक आत्मा ब्रह्म का अंश या प्रकार है और उतना ही वास्तविक है जितना ब्रह्म।
प्रत्येक आत्मा एक पृथक् सत्ता एवं स्वरूपवाला है। अनादि एवं अनन्त है। वह देह, इन्द्रिय, मन, प्राण, बुद्धि आदि से विलक्षण, निर्विकार, निरवयव, स्वप्रकाश, अजड़ एवं असंख्य है। रामानुज आत्मा को अणुरूप मानते हैं। अद्वैत में आत्मा को सर्वव्यापी माना गया है। परन्तु रामानुज का कहना है कि यदि आत्मा सर्वव्यापी होता तो सर्वत्र उसका अस्तित्व होना चाहिये था। आत्मा सर्वव्यापी तो है नहीं और यदि उसे अणु नहीं माना जाये तो उसे सावयव वस्तुओं की तरह मध्यम परिमाण वाला मानना पड़ेगा, परन्तु तब वह विनाशशील हो जायेगा। कर्म-वैभिन्न्य भी आत्मा के अणुत्व की ही पुष्टि करता है। श्रुतियों में जब आत्मा को सर्वव्यापी कहा गया है तो वहाँ उसका तात्पर्य यह है कि आत्मा इतनी सूक्ष्म है कि वह प्रत्येक अचित्र में प्रवेश कर सकता है। यद्यपि आत्मा अणुरूप है, तथापि उसकी चेतना समस्त देह में व्याप्त है। द्रव्य की दृष्टि से आणविक होते हुये भी ज्ञान की दृष्टि से वह असीम है।
अद्वैतवाद में ज्ञान को आत्मा का स्वरूप माना गया है। आत्मा ज्ञाता नहीं, ज्ञानरूप ही है। उसका ज्ञातृत्व औपाधिक है क्योंकि ज्ञातृत्व परिणाम या विकार पर आधारित है जबकि आत्मा अविकारी है। इसके विपरीत रामानुज का मत है कि आत्मा ज्ञानरूप नहीं, ज्ञाता है। ज्ञातृत्व के लिये विकास या परिणाम आवश्यक नहीं। ज्ञान आत्मा का धर्म है,
रामानुज का विशिष्टाद्वैत-वेदान्त
२१७ आत्मा धर्मी है। आत्मा का “अहं” मायोपाधिक नहीं, वरन् वह आत्मा का स्वाभाविक गुण है और प्रत्येक अवस्था में उसमें विद्यमान रहता है। आत्मा का ज्ञान अवस्थानुसार संकुचित
और विकसित होता है। मोक्ष की अवस्था में वह सर्वव्यापी होता है।
- इसी तरह अद्वैत में आनन्द को आत्मा का रूप माना गया है, परन्तु रामानुज आनन्द को आत्मा का गुण मानते हैं। ज्ञान की तरह आनन्द भी अवस्थानुसार घटता-बढ़ता है और मोक्ष की अवस्था में आत्मा पूर्ण आनन्द का भोग करती है।
रामानुज आत्मा को कर्ता और भोक्ता भी मानते हैं। सांख्य और अद्वैत दर्शन में यह कर्तृत्व उपाधिनिमित्त माना गया है, स्वाभाविक नहीं, क्योंकि समस्त कार्य दुःख रूप हैं। यदि कर्म स्वाभाविक है तो कर्मविमोक्ष संभव नहीं होगा और परिणामस्वरूप मोक्ष भी प्राप्त नहीं होगा। इसके विपरीत रामानुज का मन्तव्य है कि समस्त कर्म बन्धरूप या दुःखस्वरूप नहीं होते। केवल देहाध्यासयुक्त कर्म ही ऐसे होते हैं। फिर यदि आत्मा का कर्तृत्व स्वाभाविक भी हो तो इसका तात्पर्य यह नहीं कि कर्म करना उसके लिये अपरिहार्य होगा। मोक्ष की अवस्था में वह कर्म की शक्ति से युक्त होता है, पर वह कर्म करने या न करने के लिए स्वतन्त्र होता है।
। यद्यपि आत्मा का ब्रह्म से पृथक् अस्तित्व है, तथापि वह ब्रह्म से स्वतन्त्र नहीं। अतः ब्रह्म के साथ आत्मा का सम्बन्ध जाने बिना आत्मा के स्वरूप का ज्ञान नहीं हो सकता। श्रुतियों में आत्मा और ब्रह्म का सम्बन्ध कहीं-कहीं अभेद और कहीं-कहीं भेद के रूप में माना गया है। यथार्थ में आत्मा और ब्रह्म में क्या सम्बन्ध है? यह समस्या एक अजीब भूल-भुलैया है जिसमें सभी चक्कर खाने लगते हैं। अद्वैतवाद में पूर्ण अभेदवाद का प्रतिपादन किया गया है, परन्तु रामानुज इसका प्रबल प्रतिवाद करते हैं। उनका विचार है कि उपनिषदों में वर्णित आत्मा और ब्रह्म की एकता पूर्ण अभेद की सूचक नहीं। अणु आत्मा और विभु ब्रह्म, ये दोनों एक कैसे हो सकते हैं? श्रुतिवर्णित अभेदता का केवल यही तात्पर्य है कि ब्रह्म प्रत्येक और समस्त चराचर जगत् में व्याप्त होने के कारण आत्मा में भी व्याप्त है और भीतर से उसका नियमन करता हुआ उसका अन्तर्यामी है। इस प्रसंग में उपनिषद् के महावाक्य ‘तत्त्वमसि” की रामानज द्वारा की गई व्याख्या ध्यान देने योग्य है। उनका कहना है कि दो सर्वथा भिन्न पदार्थों में अभेद स्थापित नहीं किया जा सकता। परन्तु सर्वथा अविकल पदार्थ को लेकर भी इस सम्बन्ध का निर्देश करना निरर्थक हो जायेगा, क्योंकि वह वृथा पिष्टपेषण मात्र होगा। अतः अभेद का सम्बन्ध उसमें लागू हो सकता है जो एक ही पदार्थ के दो भिन्न-भिन्न रूप हों। “सः अयं देवदत्तः” (यह वही देवदत्त है) यह वाक्य पहले देखे हुए देवदत्त और इस समय देखे हुए देवदत्त में तादात्म्य की स्थापना करता है। कालिक तथा अन्यान्य भेद होने पर भी व्यक्ति (देवदत्त) एक ही है। “तत्त्वमसि” का भी ऐसा ही अर्थ लगाना चाहिये। तत् का अर्थ है वह ब्रह्म जो सर्वज्ञ, सर्वशक्तिमान् और जगत् का कारण है। त्वम् का अर्थ है चिदचिद्विशिष्ट शरीर वाला ब्रह्म, जो अन्तर्यामी है। अतएव२१८
वेदान्त-खण्ड
यहाँ जो अभेद कहा गया है वह ब्रह्म के एक विशिष्ट प्रकार में और दूसरे विशिष्ट प्रकार में है। इसका तात्पर्य आत्मा में स्थित अन्तर्यामी ब्रह्म और विश्व का कारण ब्रह्म दोनों की तात्त्विक एकता है।
___ रामानुज न केवल पूर्ण अभेद का ही खण्डन करते हैं वरन् पूर्ण भेद का भी खण्डन करते हैं। श्रुतियों में भेद का भी वर्णन मिलता है और अभेद का भी। इसका समन्वय रामानुज इस प्रकार करते हैं कि आत्मा और ब्रह्म में भिन्न-भित्र दृष्टियों से भेद भी है और अभेद भी है। ब्रह्म पूर्ण और विभु है, जबकि आत्मा अपूर्ण और अणु है। इस आधार पर दोनों में भेद है। आत्मा ब्रह्म पर पूर्णतया आश्रित है और ब्रह्म उसका अन्तर्यामी है, इस दृष्टि से दोनों में अभेद तादात्म्य या अनन्यत्व का सम्बन्ध है। आत्मा ब्रह्म का अंश है अतः दोनों में भेदाभेद सम्बन्ध भी है। इस तरह रामानुज भेद, अभेद और भेदाभेद तीनों को मानते हैं। जब वे भेदाभेद का खण्डन करते हैं तो वहाँ वे उन मतों का खण्डन करते हैं, जिनके अनुसार एक ही वस्तु अमवश दो रूपों में दिखाई देती है अथवा एक ही वस्तु यथार्थतः दो बन जाती है। रामानुज भेदाभेद को इस अर्थ में स्वीकार करते हैं कि एक ही वस्तु दो रूपों में उपस्थित होती है। रामानुज के इस भेदाभेद में भेद की अपेक्षा अभेद पर! ही अधिक महत्त्व दिया गया है, क्योंकि उन्होंने ब्रह्म की स्वतन्त्र सत्ता तथा आत्मा की ब्रह्माश्रित सत्ता का प्रतिपादन किया है। अपनी स्थिति को समझाने के लिये रामानुज अंश
और अंशी के साथ आत्मा और ब्रह्म की तुलना करते हैं। आत्मा को निष्कल ब्रह्म का अंश कैसे माना जा सकता है? इसका उत्तर देते हुए रामानुज कहते हैं कि जिस तरह चिनगारी अग्नि का अंश है उसी तरह आत्मा ब्रह्म का अंश है। जिस तरह अंश का अस्तित्व अंशी पर, गुण का द्रव्य पर, कर्म का कारण पर निर्भर रहता है उसी तरह आत्मा का अस्तित्व ब्रह्म पर निर्भर रहता है। आत्मा अंश है और ब्रह्म अंशी। आत्मा नियम्य है और ब्रह्म नियामक । आत्मा आधेय है और ब्रह्म आधार । यद्यपि आत्मा ब्रह्म का अंश है, तथापि इसका तात्पर्य यह नहीं है कि वह ब्रह्म से पृथक् नहीं है। उसका पर्यायरूप से भी अस्तित्व है और द्रव्यरूप से भी। अपने शरीर के सन्दर्भ में वह द्रव्य है और ब्रह्म के सन्दर्भ में पर्याय है।
सष्टि के पूर्व की अवस्था में प्रत्येक आत्मा ब्रह्म में अव्यक्त रूप में गर्भित रहता है। इस अवस्था में उसके ज्ञानादि लक्षण संकुचित रूप में रहते हैं। इस सूक्ष्मावस्था में वह ब्रह्म के साथ एकरूप-सा हो जाता है, परन्तु यह एकरूपता तादात्म्य नहीं है। आत्मा का ब्रह्म में यह विलय विसर्जन नहीं है। इस अविनाभाव अवस्था में भी उसका पृथक् अस्तित्व एवं स्वरूप बना रहता है।
सृष्टि की प्रक्रिया में आत्मा व्यक्तरूप को प्राप्त होता है, कर्मानुसार उसके ज्ञान का विस्तार होता है और देह की प्राप्ति होती है। देह की प्राप्ति के बाद उसमें ब्रह्म का प्रवेश होता है और वे अन्तर्यामी के रूप में उसमें स्थित रहते हैं। परन्तु इस ब्रह्मप्रवेश से न तो ब्रह्म के पूर्णत्व की हानि होती है और न आत्मा के व्यक्तित्व की ही। इस अवस्था में भी
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रामानुज का विशिष्टाद्वैत-वेदान्त आत्मा का ब्रह्म के साथ वही सम्बन्ध होता है जो देह का आत्मा के साथ। रामानुज के अनुसार मनुष्य के शरीर और आत्मा दोनों ही सत्य हैं। ब्रह्म के अचित् अंश से देह की उत्पत्ति होती है। आत्मा की उत्पत्ति नहीं होती, वह नित्य है। आत्मा का बन्धन कर्म का परिणाम है। शरीरयुक्त होने पर आत्मा चेतन शरीर और इन्द्रियों से बद्ध हो जाता है। वह उस चैतन्यरूप शरीर को ही अपना रूप मानने लगता है। अनात्म विषय में इस आत्म-बुद्धि को ही अहंकार कहते हैं। यही अविद्या है। मि मुक्ति की स्थिति में भी आत्मा का अस्तित्व अविकल रहता है। वह तब ब्रह्मरूप होकर पूर्णता एवं आनन्द का उपभोग करता है। इस अवस्था में आत्मा के अस्तित्व का विनाश नहीं होता, वरन् पूर्णता की प्राप्ति होती है। जीव की यह पूर्णता ब्रह्म के प्रभुत्व का हनन नहीं करती, क्योंकि तब भी वह ब्रह्म में पर्याय और अंश के रूप में ही रहता है।
६. मोक्षोपाय-निरूपण
का आत्मा के बन्धन की अवस्था अपूर्ण एवं दुःखयुक्त है अतः इससे परे एक अन्य अवस्था की ओर लक्ष्य रखती है। यही आत्मा का लक्ष्य या साध्य है। इसकी सिद्धि साधना द्वारा ही सम्भव है। इस साधना में कर्म, ज्ञान और भक्ति-नैतिक, बौद्धिक और आध्यात्मिक तीनों प्रकार के प्रयास आवश्यक हैं।
अद्वैत-दर्शन में अज्ञान ही बन्धन का कारण है, अतः ज्ञान से ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। नैतिक नियम और ईश्वरभक्ति प्रत्यक्ष रूप से मोक्ष की प्राप्ति नहीं करवा सकते। ये ज्ञान की प्राप्ति में सहायक हो सकते हैं और हमें तत्त्वज्ञान में प्रवृत्त कर सकते हैं। परन्तु मोक्ष प्रदान नहीं करवा सकते, क्योंकि कर्म भेद-दृष्टि में ही सम्भव है और मोक्ष भेददृष्टि से सम्भव नहीं। धर्म के विधि-निषेध अज्ञान में ही सम्पन्न होते हैं अतः वे अज्ञान का निवारण नहीं कर सकते। प्रत्येक कर्म, चाहे वह कितना ही इष्ट क्यों न हो, नये बन्धनों को जन्म देता है। कर्म उन्हीं के लिये है जो अविद्या में हैं, ज्ञानी के लिये नहीं। इसके विपरीत मीमांसादर्शन में कर्म को ही एकमात्र साधन माना गया है। इसके अनुसार वेद का प्रयोजन कर्मकाण्ड का प्रतिपादन है, अतः उससे भिन्न ज्ञान प्रतिपादक वाक्य निरर्थक हैं।
रामानुज का मत अद्वैतमत से भिन्न है। अद्वैतमत के अनुसार आत्मा सदैव मुक्त ही है, उसे मात्र उसका अनुभव ही करना है। इसके विपरीत रामानुज यह मानते हैं कि मुक्ति साधना द्वारा प्राप्त करने से होती है। अद्वैत की तरह वे भी मानते हैं कि अज्ञान बन्धन का मूल है, परन्तु उनका यह मानना है कि कोरे बौद्धिक ज्ञान से अज्ञान का निवारण नहीं हो सकता। इसके लिये क्रिया, ज्ञान एवं भावना तीनों की साधना आवश्यक है। कर्मयोग, ज्ञानयोग और भक्तियोग, ये तीन स्वतन्त्र मार्ग न होकर एक दूसरे के पूरक
और अन्तरंग रूप से सम्बन्धित हैं। अतः एक कर्मयोगी मात्र कर्मयोगी नहीं रहता। उसे ज्ञान एवं भक्ति को भी स्वीकार करना होता है। इसी तरह ज्ञानयोगी या भक्तियोगी को दूसरे
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वेदान्त-खण्ड योगों को स्वीकार करना होता है। प्रत्येक साधक को अपनी साधना की प्रक्रिया में पहले या बाद में किसी भी क्रम से इन तीनों का उपयोग करना होता है। रामानुज मानते हैं कि पहले कर्म, बाद में ज्ञान और अन्त में भक्ति, यह क्रम सबसे उपयुक्त है। इसकी पुष्टि छान्दोग्य- उपनिषद् के ‘आहारशुद्धः सत्त्वशुद्धिः सत्त्वशुद्धेः ध्रुवानुस्मृतिः” से होती है।
(१) कर्मयोग-कर्मयोग मोक्षसाधना का प्रथम चरण है। कर्म से रामानुज का तात्पर्य वेदोक्त वर्णाश्रमधर्म के कर्त्तव्य हैं। इन कर्मों का निष्कामभाव से पालन अनिवार्य है। इससे चित्त-शुद्धि होती है और ज्ञान की प्राप्ति में बाधक संस्कारों का विनाश होता है। इन कर्मों का विधिवत् सम्पादन करने के लिये कर्ममीमांसा का अध्ययन आवश्यक है। इससे ब्रह्मजिज्ञासा उत्पन्न होती है। माना
(२) ज्ञानयोग-पक्का कर्मयोगी होने के लिये ज्ञान और भक्ति का पुट नितान्त आवश्यक है। कर्म से कर्तृत्वाभिमान छोड़ना ज्ञानी के लिये ही सम्भव है तथा कर्मफल को ब्रह्मार्पण करना भक्तिप्रवण-चित्त ही कर सकता है। अतः रामानुज ज्ञानयोग की महत्ता को स्वीकार करते हैं। उनका ज्ञानयोग सांख्य जैसा मात्र विवेकज्ञान नहीं या अद्वैत जैसा शुष्क तादात्म्य ज्ञान नहीं, वरन् आत्मा का शरीर से पार्थक्य का तथा ब्रह्म के अंशरूप होने का ज्ञान है। इसके अन्तर्गत आत्मा को आत्मज्ञान की प्राप्ति होती है। परन्तु आत्मज्ञान ही जीवन का अन्तिम लक्ष्य नहीं है। आत्मज्ञान की परिणति ब्रह्मज्ञान या ब्रह्मसाक्षात्कार में होनी चाहिये और इसीलिये रामानुज भक्तियोग की महिमा को स्वीकार करते हैं।
(३) भक्तियोग-भक्तियोग साधनाक्रम का अन्तिम चरण है। उपनिषदों का यह मन्तव्य सत्य है कि ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं मिलती। लेकिन यह ज्ञान पुस्तकीय ज्ञान या श्रुतियों का शाब्दिक ज्ञान नहीं है। यदि ऐसा होता तो वेदान्त को पढ़ते ही लोग तुरन्त मुक्त हो जाते। यथार्थ ज्ञान अपरोक्ष ज्ञान है जो ब्रह्म की ध्रुवानुस्मृति या निरन्तर स्मरण को कहते हैं। यही उपासना या भक्ति है। ध्यान या उपासना ही भक्ति है, यदि वह प्रेमपूर्ण हो । अतः जहाँ शंकर केवल ज्ञान के मार्ग को ही उपादेय बताते हैं, वहाँ रामानुज कर्म की सहायता से उपलब्ध ज्ञानरूपा भक्ति को ही आत्मा के मोक्ष का साधन मानते हैं। इसी तरह रामानुज की भक्ति में ध्यान का समावेश है, पर यह योगदर्शन की भावशून्य एकाग्रता मात्र नहीं है।
रामानुज की भक्ति ज्ञान का ही एक विशेष रूप है। इसमें ब्रह्म का तैलधारावत् अविच्छिन्न समाराधन होता है। यह यद्यपि भावमयी है, भावातिरेक से दबी हुई नहीं है। इसमें चिन्तन प्रधान है और भाव गौण। वे ज्ञान और भक्ति को समानार्थी मानते हैं। उनके अनुसार सच्चा ज्ञान भक्तिरूप है और सच्ची भक्ति ज्ञानरूपा। यह ब्रह्म के प्रति बौद्विक प्रेम है। इस तरह रामानुज भक्ति और ज्ञान को समरूप करके भक्ति को भावातिरेक से
और ज्ञान को बौद्धिक शुष्कता से बचाते हैं।
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रामानुज का विशिष्टाद्वैत-वेदान्त रामानुज ने भक्ति की पूर्व अवस्था के रूप में कर्म करना केवल साधना के प्रारम्भिक चरण में ही आवश्यक नहीं बताया है, बल्कि भक्तियोग में प्रवेश करने के बाद भी कर्म करते रहने का विधान किया है। इस प्रकार रामानुज अद्वैत के कर्म-संन्यास को अस्वीकार करते हैं। मनुष्य को नित्यकर्मों का त्याग कभी नहीं करना चाहिये, अन्यथा उसे पाप लगेगा और वेद के नियोग की उपेक्षा करने से वह मोक्ष से वंचित हो जायेगा। यहाँ उनका कुमारिल से मतैक्य है। पर भेद यह है कि वे निष्काम कर्म पर जोर देते हैं, सकाम पर नहीं।
रामानुज भक्ति की पूर्व अवस्था के रूप में देह, चित्त एवं बुद्धि का नियमन अनिवार्य मानते हैं। आत्मानुशासन के लिये वे सात प्रकार के नियम बताते हैं-विवेक (अशुद्ध भोजन से दूर रहना), विमोक (कामनाओं का परित्याग), अभ्यास, क्रिया (पंच महायज्ञों का सम्पादन), कल्याण (शुभकर्म करना), अनवसाद और अनुद्धर्ष। उन्होंने भक्ति के नव प्रकार
और तीन चरण बताये हैं। नव प्रकार निम्नलिखित हैं-स्तुति, स्मृति, नमस्कृति, वन्दन, याचना, कीर्तन, गुणश्रवण, वचन-ध्यान, अर्चन प्रणाम। तीन चरण ये हैं-ध्रुवानुस्मृति, असकृदावृतम् और दर्शनसमानाकारता।
रामानुज के भक्तिसिद्धान्त के बारे में एक बहुत भ्रामक मत प्रचलित है और वह यह है कि उनका भक्तिसिद्धान्त पाञ्चरात्र सम्प्रदाय तथा आलवार संतों से प्राप्त किया गया है। परन्तु सत्य तो यह है कि रामानुज की भक्ति पाञ्चरात्र सम्प्रदाय की भक्ति से पूर्णतः भिन्न है। पाञ्चरात्र की भक्ति कर्मज्ञानविहीन है, पर रामानुज की भक्ति कर्मज्ञान की परिपाक है। पाञ्चरात्र की भक्ति तन्त्र के जाल से बद्ध है, जबकि रामानुज में तन्त्र का प्रभाव पूर्णतः अनुपस्थित है। रामानुज की भक्ति में जो बौद्धिक गांभीर्य, नैतिक उदात्तता और दार्शनिक आधार है वह पाञ्चरात्र की भावातिरेकी भक्ति में अप्राप्य है। पाञ्चरात्र की भक्ति प्रपत्ति ही है, परन्तु रामानुज में, जैसा कि हम आगे सिद्ध करेंगे, प्रपत्ति का सिद्धान्त है ही नहीं। रामानुज की भक्ति ध्यान और उपासना द्वारा प्राप्त अपरोक्षानुभूति है, जबकि पाञ्चरात्र की भक्ति मात्र ईश्वर की शरणागति। पाञ्चरात्र की भक्ति तान्त्रिक विधि-विधानों के जाल में फंसी हुई मंत्रोच्चारण के बाह्य रूप से भरपूर है, परन्तु रामानुजीय भक्ति नैतिक, बौद्धिक एवम् आध्यात्मिक गुणों से सम्पन्न आत्मानुशासन एवम् प्रयास द्वारा प्राप्त साधना है। पाञ्चरात्र में भक्ति को कर्म और ज्ञान से पृथक एक स्वतन्त्र मार्ग माना गया है, पर रामानुज की भक्ति कर्म और ज्ञान से अनुगृहीत है। पाञ्चरात्र की भक्ति में प्रतिमा की पूजा, जिसे अर्चापूजा कहते हैं, बड़ी महत्त्वपूर्ण है। परन्तु रामानुज के ग्रन्थों में कहीं पर भी अर्चापूजा की स्वीकृति का प्रमाण नहीं मिलता है, यद्यपि अनेक लेखकों ने रामानुज को अर्चापूजा का पक्षपाती बताने का प्रयास किया है। जो विभेद रामानुज की भक्ति का पाञ्चरात्र की भक्ति के साथ है वही विभेद आलवार सन्तों की भक्ति के साथ भी है। आलवारों की भक्ति भावान्धता से ग्रस्त है, पर रामानुज की भक्ति ज्ञान के प्रकाश से युक्त है। रामानुज और आलवार सन्तों के मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोणों में भी पूर्ण भेद हैं, आलवार
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बेदान्त-खण्ड भक्ति स्वयमेव साध्य है, परन्तु रामानुज की भक्ति में बौद्धिक गहनता और ध्यान की प्रशांतता है। आलवार भक्ति में भावतरंगों की चपलता, ईश्वरीय प्रेम और सौन्दर्य की मादकता एवं उन्माद है। अतः यह कहना निराधार है कि रामानुज की भक्ति पाञ्चरात्र सम्प्रदाय एवं आलबार संतों से प्राप्त की गई है। यथार्थ में रामानुजीय भक्ति पूर्णतः वैदिक है। भक्ति के मूल वेदों में दिखाई देते हैं। उपनिषदों में, मुख्यतः बाद के पद्यात्मक उपनिषदों में, इसका स्पष्ट विकास दिखाई देता है। गीता और विष्णुपुराण में हमें इसका सुव्यवस्थित रूप दिखाई देता है और रामानुज का सिद्धान्त पूर्णतः इन्हीं दोनों ग्रन्थों पर आधारित है।
अनेक विद्वानों का यह भी मन्तव्य है कि रामानुज ने पाञ्चरात्र सम्प्रदाय के प्रपत्ति के सिद्धान्त को एक पृथक् एवं अपने आप में पूर्ण साधन के रूप में स्वीकार किया है। परन्तु रामानुज के ग्रन्थों में (केवल गद्यत्रयम्) को छोड़कर, जिसके रचयिता के बारे में संदिग्धता है, इस बात का कोई प्रमाण नहीं है कि अपनी मोक्ष-साधन-प्रक्रिया में रामानुज ने इसे स्वीकार किया हो। उनके मुख्य ग्रन्थ श्रीभाष्य में प्रपत्ति शब्द का उल्लेख ही नहीं मिलता है और न कहीं इस सिद्धान्त की ध्वनि ही मिलती है। कहीं पर भी उन्होंने यह नहीं कहा है कि आत्मा मोक्ष का दायित्व पूर्णतया परमात्मा पर छोड कर निश्चिन्त हो सकता है या मोक्ष की प्राप्ति के लिये ईश्वर की शरणागति पर्याप्त है। यथार्थ में रामानुज इसके विपरीत कर्म और ज्ञान को अनिवार्य एवं अपरिहार्य मानते हैं। उनके प्रथम ग्रन्थ वेदार्थसंग्रह की विद्यमान समस्त हस्तलिपियों में से केवल एक संस्करण में ही पाठभेद के रूप में एक जगह प्रपत्ति शब्द आता है। अन्य संस्करणों में “प्राप्ति” या “प्रतिपत्ति” शब्द मिलता है। इस ग्रन्थ में भी कहीं पर प्रपत्ति के सिद्धान्त का प्रतिपादन नहीं हुआ है। उनके तीसरे ग्रन्थ गीताभाष्य में भी कहीं पर उन्होंने ऐसा नहीं कहा कि नैतिक विधान और आत्मज्ञान के बिना ईश्वरीय कृपा प्राप्त हो सकती है। यथार्थ में तो मूल गीता में प्रपत्ति के सिद्धान्त का स्पष्ट प्रतिपादन हुआ है और प्रपत्ति शब्द का भी अनेक बार प्रयोग हुआ है। यदि रामानुज प्रपत्ति सिद्धान्त को स्वीकार करते तो इन संदर्भो में अवश्य ही इसका निरूपण करते। परन्तु कहीं पर भी उन्होंने प्रपत्ति शब्द का पाञ्चरात्र के प्रचलित अर्थ में अर्थघटन नहीं किया। रामानुज के नाम पर अनेक ऐसे सिद्धान्त और मान्यतायें प्रचलित हैं जिनको उन्होंने स्वीकार ही नहीं किया था और जिनसे उनका कोई सम्बन्ध ही नहीं था। उदाहरणार्थ, उन्होंने परमात्मा की पाँच अभिव्यक्तियों का या शुद्ध सत्त्व के तत्त्व को कहीं पर भी स्वीकार नहीं किया है, फिर भी ये सिद्धान्त उनके नाम से जुड़े हुये हैं। कर्म, ज्ञान और भक्ति के साधनत्रय के अतिरिक्त रामानुज भगवत्कृपा को भी स्वीकार करते हैं। इस सिद्ध्यन्त को भी पाञ्चरात्र सम्प्रदाय एवं आलवार संतों की देन बताया जाता है, परन्तु इसका प्रतिपादन उपनिषदों में भी मिलता है। वहीं से यह गीता में विकसित किया गया है। रामानुज दर्शन में यह भगवत्कृपा निरुपाधिक नहीं, वरन् अधिकारी को ही प्राप्त होती है। भगवत्कृपा का कार्य यहाँ मोक्ष दिलाना नहीं है, वरन् मोक्ष के मार्ग के अवरोधों को दूर करना है।
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रामानुज का विशिष्टाद्वैत-वेदान्त
१०. मुक्ति-निरूपण
मुक्ति की अवस्था में जीवात्मा ब्रह्म के स्वरूप और गुण को प्राप्त कर लेती है। अद्वैत-वेदान्त में मुक्त जीवात्मा ब्रह्म के साथ अभिन्न हो जाती है, लेकिन रामानुज के अनुसार वह केवल ब्रह्म-सदृश होती है, उससे ऐकात्म्यसम्पन्न नहीं होती। मुक्त जीव में सर्वज्ञत्व और सर्वसंकल्पत्व के गुण अवश्य आ जाते हैं, परन्तु सर्वकर्तृत्व के गुण ब्रह्म के ही साथ रहता है। जीवात्मा स्वराट अनन्याधिपति तथा संकल्पसिद्ध हो जाती है, पर उसे जगत् की सृष्टि, स्थिति और लय का अधिकार नहीं होता। रामानुज के मतानुसार मुक्ति जीवित दशा में प्राप्त नहीं हो सकती। अतः वे जीवन्मुक्ति को स्वीकार नहीं करते और केवल विदेहमुक्ति को ही सम्भव मानते हैं।
११. उपसंहार
त्यास रामानुज-दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता ब्रह्म की पुरुषवादी धारणा को ब्रह्मवादी दर्शन से संयुक्त करना है। ईश्वरवाद और ब्रह्मवाद को एक में मिलाने का यह प्रयत्न बहुत पुराना है और स्वयं वैदिक साहित्य में भी दिखाई देता है। गीता में भी इस संश्लेषण का प्रयास किया गया है, परन्तु धार्मिक एवं दार्शनिक पक्षों का जैसा सुन्दर एवं व्यवस्थित समन्वय रामानुज ने किया है वह सर्वश्रेष्ठ है। परन्तु इस आधार पर यह कहना अनुचित होगा कि उनका ईश्वरवाद पाञ्चरात्रोक्त है या आलवार मत से प्रभावित है।
रामानुज का समस्त दर्शन शंकर के ब्रह्मवाद के प्रत्यक्ष प्रतिवाद के रूप में उत्पन्न हुआ है। शंकर और रामानुज दोनों वेदान्त के प्रमुख आचार्य हैं। दोनों अद्वैत के समर्थक हैं। अर्थात् दोनों के अनुसार केवल एक ही सर्वव्याप्त सत्ता है। परन्तु दोनों में भेद यह है कि शंकर का अद्वैत केवल अद्वैत है और रामानुज का अद्वैत विशिष्ट अद्वैत है। दोनों यह मानते हैं कि जो कुछ है वह ब्रह्म ही है, ब्रह्म व्यतिरक्ति अन्य कुछ नहीं है। पर रामानुज ब्रह्म की सत्ता में सब कुछ (वैविध्य) को स्वीकार कर लेते हैं, जबकि शंकर सबका निषेध करते हैं। शंकर ब्रह्म में वैविध्य को स्वीकार नहीं करते, पर रामानुज वैविध्य को ब्रह्म का सार मानते हैं। शंकर के अनुसार वैविध्य माया-जनित होने के कारण मिथ्या है, पर रामानुज के अनुसार यह ब्रह्म की आत्माभिव्यक्ति है और उतना ही सत्य है जितना ब्रह्म।
शंकर का दर्शन तार्किक दृष्टि से सुसम्बद्ध, ठोस एवं प्रभावशाली है। परन्तु वह मानव की समस्त जिज्ञासाओं एवं आकांक्षाओं को तुष्ट नहीं कर सकता। वे धर्म और दर्शन के बीच एक खाई खोद देते हैं और धर्म के सगुण ब्रह्म को दर्शन के निर्गुण ब्रह्म से पृथक् कर देते हैं। भले ही इस पृथक्करण को वैचारिक महत्त्व दिया जाय, किन्तु इसमें धर्म के ईश्वर को मायोपाधिक, निम्नस्तरीय सत्ता मानकर धर्म की प्रगाढ़ अनुभूति की अवहेलना की गई है। यथार्थतः मनुष्य की बौद्धिक और भावात्मक आवश्यकताओं की तुष्टि दो पृथक्- स्तरीय सत्ताओं से नहीं होनी चाहिए। धर्म और दर्शन अपने उच्चतम स्वरूप में
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वेदान्त-खण्ड परस्पर विरोधी नहीं, वरन् एक ही सत्य की प्राप्ति के प्रयास के व्यावहारिक एवं सैद्धान्तिक पहलू हैं। धर्म का सत्य दर्शन के सत्य से मूलतः पृथक् नहीं हो सकता। सत्य अविभाज्य है और जो धर्म में सत्य है वह दर्शन में मिथ्या नहीं हो सकता। यदि अद्वैत के इस कथन को स्वीकार किया जाये कि ब्रह्म माया के सम्पर्क से सगुण ईश्वर के रूप में अभिव्यक्त होता है तो अनेक प्रश्न उत्पन्न हो जाते है, जैसे ब्रह्म का माया के साथ सम्पर्क क्यों और कैसे होता है? यदि परमार्थतः ब्रह्म एकमेव है तो माया कहाँ से उपस्थित हो जाती है? जगत् के रूप में ब्रह्मविकृति का क्या प्रयोजन है? यदि सगुण ईश्वर को स्वीकार किया जाये तो सत्ता के रूप में उसका क्या स्वरूप होगा? यदि वह सत्ता है तो उसका कभी भी लोप नहीं हो सकता और यदि वह सत्ता नहीं है तो उसे किसी भी स्तर की सत्ता नहीं प्रदान की जा सकती। इसके अलावा जीव और जगत् को मिथ्या मानना मानवीय अस्तित्व के लिये बड़ा विघातक है। ऐसा सिद्धान्त जो, वैयक्तिक अस्तित्व का निषेध करे, मानवीय साहस एवं प्रयासों के मूल पर ही कुठाराघात करता है। फिर यह समझ में नहीं आता कि यदि नानात्व मिथ्या है तो क्यों ब्रह्म या माया इस प्रकार अगणित शक्ति का इस मिथ्यासृष्टि के निर्माण में हास करती है। व्यक्ति का समष्टि में समावेश करना एक उचित एवं इष्ट सिद्धान्त है, लेकिन इसमें व्यक्ति की विशिष्टता का हनन नहीं होना चाहिये। यह सत्य है कि विश्व का लक्ष्य व्यक्ति का समष्टि से अधिकाधिक ऐक्य स्थापित करना है, पर इस ऐक्य में व्यक्तित्व का विनाश नहीं होता है, वरन् पूर्णता और बाहुल्य की प्राप्ति होती है।
रामानुज-दर्शन की यह विशिष्टता है कि उसमें इन दोषों का परिहार किया गया है। रामानुज धर्म के ईश्वर और दर्शन के ब्रह्म को एक ही मान लेते हैं। समस्त वैविध्यमय जगत् को वे मायाजनित मिथ्या न मानकर ब्रह्म का अंगभूत मानते हैं। उनकी धार्मिक भावना ब्रह्म के सगुण और साकार रूप को प्रकाशित करती है तो उनकी तार्किक बुद्धि उन्हें समस्त चराचर जगत् को ब्रह्म का देह या विशेषण मानने को प्रेरित करती है। इस तरह उनके दर्शन में धार्मिक भावना और तार्किक बुद्धि दोनों की तुष्टि एवं समन्वय का एक श्रेष्ठ प्रयास मिलता है। जहाँ तक उपर्युक्त प्रयत्न का लक्ष्य दर्शन के अन्तिम तत्त्व के साथ समन्वय करना है, वहाँ तक इसकी श्रेष्ठता में कोई सन्देह नहीं है। परन्तु इन दो तत्त्वों को एक मानना अलग बात है और धर्म में अन्धविश्वासों एवम् कल्पनाओं को दर्शन के सत्य से मिश्रित करना बिल्कुल दूसरी बात है। कारण यह है कि धर्म में श्रद्धा की आड़ में अनेक ऐसी बातें प्रविष्ट कर जाती हैं जो बिना पर्याप्त तार्किक आधार के दर्शन में समाविष्ट नहीं हो सकतीं। धर्म और दर्शन के समन्वय की आतुरता में रामानुज इस तथ्य को मूल जाते हैं और अपने दर्शन में ब्रह्म का मानवीकरण करते हुए अनेक पौराणिक गाथाओं तथा रूपकों को अनुचित प्रवेश दे देते हैं। दर्शन में मानवीकरण की यह प्रवृत्ति अनुचित है और विशुद्ध दर्शन को विकृत तथा सत्य-विहीन कर देती है। यहाँ पर यह प्रश्न उपस्थित होता है कि क्या रामानुजीय दर्शन में इस प्रकार की पौराणिक गाथाओं और
रामानुज का विशिष्टाद्वैत-वेदान्त
२२५ प्रामक कल्पनाओं का उचित स्थान है? हमें यह स्वीकार करना होगा कि भावुकता की यह निम्नस्तरीय अभिव्यक्ति अनुचित, अयोग्य एवं अनुपयुक्त है। व्यावहारिक विश्वास के रूप में वह भले ही मनुष्य की आवश्यकताओं की उत्तम ढंग से पूर्ति करती हो, पर दार्शनिक सिद्धांत के रूप में वह कदापि प्रशंसनीय नहीं हो सकती।
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तृतीय अध्याय