१. रामायण-महाभारत-पुराण
रामानुज सम्प्रदाय में वाल्मीकि रामायण तथा महाभारत मूल धर्मशास्त्र के रूप में प्रतिष्ठित हैं, महाभारत के भगवद्गीता, विष्णुसहस्रनाम, भीष्मस्तव, अनुस्मृति और गजेन्द्रमोक्ष इस सम्प्रदाय के पंचरत्न माने जाते हैं जिनका स्वाध्याय तथा पारायण सम्प्रदाय के अनुयायी प्रतिदिन करते हैं।
गीतासहस्रनामानि स्तवराजो स्पनुस्मृतिः।
गजेन्द्रमोक्षणं चैव पंचरत्नानि भारते।। इनमें से गजेन्द्रमोक्ष महाभारत में नहीं मिलता। जिस गजेन्द्रमोक्ष का पाठ किया जाता है वह वाराहपुराण में मिलता है। पुराणों में विष्णुपुराण और भागवतपुराण का स्वाध्याय रामानुज सम्प्रदाय में विशेषरूप से किया जाता है। रामायण, महाभारत और पुराणों में वेदान्तविषयक जो विवेचन हैं उनको रामानुज सम्प्रदाय श्रद्धापूर्वक स्वीकार करता है। वह इतिहास-पुराण द्वारा वेद-वेदान्त का उपबृंहण करता है।
२. पाञ्चरात्रादि संहिताएँ
श्रीभाष्य २२३६-४२ में रामानुज ने पांचरात्रसंहिता, पौष्करसंहिता, सात्वतसंहिता और परमसंहिता से उद्धरण देकर भागवत सम्प्रदाय के चतुर्दूहवाद की प्रामाणिकता को सिद्ध किया है। इन संहिताओं में पांचरात्रसंहिता सबसे अधिक दार्शनिक है। उसके अनुसार चतुर्दूहबाद का तात्पर्य चतुर्विध आत्मस्वरूप है। वेदान्तवेष परब्रह्मीभूत नारायण ही पांचरात्र के बक्ता हैं। इस प्रकार पांचरात्रसंहिता तथा उक्त अन्य संहिताओं से रामानुज सम्प्रदाय ने अपने दर्शन तथा धर्म का समन्वय किया है। पांचरात्र आगम में प्रपत्ति के छ: अंगों का सुन्दर वर्णन है। भगवान् के भक्त को वहाँ पंचकालज्ञ कहा गया है। वह अपने समय को ५ भागों में बांटकर भगवत्पूजा में लगा रहता है। पाँच कालों के नाम है- १. अभिगमन, (मनसा, वाचा, कर्मणा, जप ध्यान अर्चन से भगवान के प्रति अभिमुख होना). २. उपादान (पूजासामग्री का संग्रह करना), ३. इज्या (पूजा करना), ४. स्वाध्याय (आगमग्रन्थों को पढ़ना), ५. योग (अष्टांगयोग का अनुष्ठान करना)।
वेदान्त-खण्ड
३. आलवारों के दिव्य प्रबन्धम्
गन रामानुज वेदान्त उभय वेदान्त है। उसमें तमिल श्रुतियाँ वैसे ही प्रमाणित हैं जैसे संस्कृत श्रुतियाँ । तमिल श्रुतियों को तमिल वेद कहते हैं। इनके प्रणेता आलवार संत थे जो संख्या में बारह थे। इनके नाम कालक्रमानुसार एस. कृष्णाचारी आयंगर के मतानुसार निम्न प्रकार हैं
बारह आलवार
भूतयोगी ।
तमिल नाम की संस्कृत नाम प्राचीन काल पोयगै आलवार सरयोगी वीर
भूतन्ता आलवार पेय आलवार
महद्योगी (मान्तयोगी) भक्तिसारी परवर्ती काल नाम्य आलवार मधुर कवि शठकोप (शठारि
बकुलाभरण)
कुलशेखर पेरिय आलवार का विष्णुचित्त (भट्टनाथ)
अण्डाल ।
गोंदा । अन्तिम काल टोण्डरडिप्पोडि 15 भक्तांघ्रिरेणु (विप्रनारायण) कुमार
तिरुप्पन आलवारणा योगिवाहन (मुनिचाहन)
तिरुमगै आलवार का परकाल (नीलन) ‘आलवार’ शब्द तमिलभाषा का है। इसका अर्थ है अध्यात्मज्ञानरूपी सागर में गोता लगाने वाला। सभी आलवार उच्चकोटि के भक्त थे। उन्हें दिव्यसूरि कहा जाता है। उनकी वाणियों के संग्रह को नालायिर प्रबन्धम् (दिव्य प्रबन्ध) कहा जाता है। ये तमिल भाषा में हैं। इन्हें तमिलवेद या वैष्णववेद कहा जाता है। उनमें प्रपत्ति अर्थात् शरणागति-रूप भक्ति का पूर्ण विकास हुआ है। आलवारों के आराध्य देव कृष्ण थे। कृष्णलीला के विविध पक्षों का वर्णन उनकी गाथाओं में मिलता है। कुलशेखर आलवार के इष्टदेव भगवान राम थे। न आलवारों में शठकोप अछूत जाति के थे। योगिवाहन चाण्डाल थे। परकाल यति नीच जाति के थे और भगवद्भक्त होने के पूर्व डाकू थे। गोदा महिला थी और विष्णुचित्त की कन्या थी। कुलशेखर क्षत्रिय राजा थे। एस. कृष्णाचारी आयंगर के अनुसार सभी आलवारों का युग प्रथम शताब्दी ईसवी से लेकर वीं शती ईसवी का प्रथमार्ध था। परकाल यति का काल ७५० ई. के आस-पास माना जाता है और सरयोगी का प्रथमशती ईसवी। किन्तु डॉ. रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर ने कुलशेखर के समय को ११५० ई. के आस-पास निश्चित किया है। उनकी इस खोज से आलवारों का जो कालक्रम ऊपर दिया गया है उसमें
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रामानुजपूर्व विशिष्टाद्वैत-वेदान्त भी हेरफेर हो जाता है। कुछ भी हो ये सभी आलवार रामानुज के पूर्व थे। वे ही उनके ईश्वरवाद और प्रपत्ति-मार्ग के प्रवर्तक थे। सभी आलवारों में सर्वश्रेष्ठ शठकोप थे। उनकी चार कृतियां है-तिरुचिरुत्तम तिरुवसिरियन, पेरिय तिरुवतिरि और तिरुवायोमोडि। अन्तिम को द्रविडोपनिषद् के नाम से संस्कृत में रूपान्तरित किया गया है। उस पर रम्य जामातृमुनि ने द्रविडोपनिषत्संगति तथा वेदान्तदेशिक ने द्रविडोपनिषत्-तात्पर्यरत्नावली नामक व्याख्याएं लिखी हैं। गोदा की दो कृतियां हैं जिनके नाम नाच्चियार तिरुमोडि और तिरुप्पावै हैं। पहले में १४३ पद्य हैं और दूसरे में ३० पद्य है। संस्कृत में तिरुप्पावै का अनुवाद श्रीव्रतम् के नाम से किया गया है। इसमें नीला देवी का उल्लेख है जो राधा का एक नाम है। मधुरकवि शठकोप के शिष्य थे। उन्होंने अपने गुरु की जीवनी लिखी थी, और उनके तिरुवायोमीडि का संग्रह या संकलन किया था। जात्या वे ब्राह्मण थे। गुरुभक्ति को उन्होंने ईश्वर-भक्ति के समकक्ष कर दिया है। उनकी एक और कृति कपिणनुप्प शिख्तांबु है जिसका संस्कृत अनुवाद ग्रन्थिमत्सूक्ष्म हस्वरज्जु के नाम से किया गया है।
कुलशेखर आलवार मालाबार के राजा थे। तमिल में उन्होंने पेरुमाल तिरोमोडि नामक ग्रन्थ लिखा। संस्कृत में उनकी एक रचना है जिसका नाम मुकुन्दमाला है। इसमें मुकुन्द या कृष्ण की स्तुति की गयी है। इसका निम्नलिखित श्लोक भागवतपुराण के एकादश स्कन्ध के द्वितीय अध्याय का ३६वाँ श्लोक है
कायेन बाचा मनसेन्द्रियैर्वा विनियोजन बुद्धात्मना वानुसृतः स्वभावात्। वारा जाता करोमि यद्यत्सकलं परस्मै
नारायणायैव समर्पयामि।। मेरी समझ में यह भागवतपुराण का प्राचीनतम उद्धरण है। मुकुन्दमाला के दो संस्करण (एक छोटा, एक बड़ा) मिलते हैं। इस पर कई टीकाएं भी हैं।
पुराण के निम्न श्लोक द्रविडप्रदेश के विमलभक्त आलवारों का संकेत करते हैं
कृतादिषु प्रजा राजन् कलाविच्छन्ति सम्भवम् । कलौ खलु भविष्यन्ति नारायणपरायणाः।।
क्वचित् क्वचिन्महाराज द्रविडेषु च भूरिशः। ताम्रपर्णी नदी यत्र कृतमाला पयस्विनी। कावेरी च महापुण्या प्रतीची च महानदी।। ये पिबन्ति जलं तासां मनुजा मनुजेश्वर। प्रायो भक्ता भगवति वासुदेवेऽमलाशयाः।।
भागवतपुराण ११५३-४०
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वेदान्त-खण्ड शठकोप की चारों सहसगीतियाँ चार तमिलवेद हैं। परकाल यति के तमिल में छ; ग्रन्थ हैं जिनमें तिरुमलय और पेरिय तिरुमोडि बहु प्रचलित हैं। उनके ग्रन्थ तमिल वेदांग कहे जाते हैं संभवतः संख्या में छः होने के कारण। ग्रन्थकार के रूप में भी सभी आलवारों में परकाल का स्थान शठकोप के बाद दूसरे स्थान पर आता है। अन्य आलवारों के १४ ग्रन्थ हैं जो चतुर्दश तमिलवेदोपांग कहे जाते हैं। इस प्रकार तमिल-वेद भी अंगों और उपांगों से विभूषित है।
‘दिव्य प्रबन्धम्’ का सर्वप्रथम संग्रह नाथमुनि ने किया था। लगभग ४००० गाथाओं को उन्होंने एक-एक हजार के चार भागों में बाँटा था। प्रत्येक भाग को सहस्रगीति कहा जाता है। प्रत्येक सहस्रगीति भी १० शतकों में बाँटी गयी है और प्रत्येक शतक १० दशकों में है। अन्त में प्रत्येक दशक में १० गाथाएं हैं। इस प्रकार सहस्रगीति का विभाजन बड़े वैज्ञानिक ढंग से किया गया है। आलवारों के कुछ तमिलवाक्यों का एक अनुवाद गोवर्धन रंगाचार्य ने संस्कृत में किया है जो श्री वेंकटेश्वर प्रेस बम्बई से १६१३ ई. में प्रकाशित है। इसमें शठकोप का निम्न वाक्य अविज्ञेय ईश्वर की एक और अद्वितीय सत्ता का कितना
सुन्दर वर्णन करता है।
तिष्ठन्त आसीनाः शयानाः संचरन्त अतिष्ठन्त अनासीना अशयाना असंचरन्तश्च ये तत्सर्व सदैकस्वभाववानिति ज्ञातुमशक्यः ।।
सदैकस्वभावतया स्थितोऽस्माकं दृढ ।। (गोवर्धन रंगाचार्यकृत तिरुवाय मोडि १.१.६ का अनुवाद)
शठकोप अहर्निश नारायण परायण थे। श्रीमन् नारायण से उनका वियोग कभी नहीं
हुआ
श्रीमनारायण इति शब्दे श्रुतेऽपि प्रवहति नेत्रजलम् । विचनोम्याश्चर्यमेव रात्रौ च समीचीने दिवसे च मध्ये, विच्छेदमन्तरा स्नेहं कृत्वा मां न त्यजति विश्वस्य पूर्णः।।
(वही १।१०८) शठकोप ने अनेक पदों में कहा है- ‘कृष्णं विना नास्ति शरणं पश्यत’। इससे उनके द्वारा शरणागति-रूप प्रपत्ति नामक भक्ति की अवतारणा हुई है। उनके पदों में एकेश्वरवाद और प्रपत्तिमार्ग की बड़ी सशक्त अभिव्यक्ति हुई है। भक्तमाल में नाभादास ने उन्हें पुनीत मुनिवर्य कहा है और वैष्णव सम्प्रदाय का चतुर्थ आचार्य माना है। उनके पूर्व के तीन आचार्य नारायण, लक्ष्मी और विष्वक्सेन देवता हैं। अतएव शठकोप ही प्रथम मनुष्य हैं जिन्हें श्रीवैष्णव सम्प्रदाय का आद्य प्रवर्तक कहा जा सकता है।
रामानुजपूर्व विशिष्टाद्वैत-वेदान्त
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४. गुरुपरम्परा के ग्रन्थ ।
रामानुज तक श्रीवैष्णव सम्प्रदाय की गुरुपरम्परा यों है
१. नारायण, २. लक्ष्मी, ३. विष्वक्सेन, ४. शठकोप, ५. बोपदेव, ६. नाथमुनि,७. पुण्डरीकाक्ष, ८. राममिश्र, ६. यामुनाचार्य, १०. पूर्णाचार्य और, ११. रामानुज। इनमें से नाथमुनि से लेकर रामानुज तक के आचार्य श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के मान्य देशिक (गुरु) हैं। नाभादास ने बोपदेव को भी इसी सम्प्रदाय में रखा है। उनके भी कई ग्रन्थ हैं जिनमें भक्तिदर्शन विकसित हुआ है। प्रसिद्धि है कि बोपदेव ने लुप्त भागवतपुराण का उद्धार किया है इससे कुछ लोगों ने यह माना था कि बोपदेव ही भागवतपुराण के लेखक हैं। पर यह मान्यता अब असिद्ध हो गयी है, क्योंकि बोपदेव रामानुज के परवर्ती थे। वे संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् थे और मंत्री हेमाद्रि के आश्रित थे जिनका समय तेरहवीं शताब्दी है। वास्तव में बोपदेव ने भागवत की एक विषय-सूची तैयार की थी और भागवतपुराण पर परमहंसप्रिया नामक एक टीका लिखी थी। भागवततत्त्व का विवेचन उन्होंने दो और ग्रन्थों में किया है, उनके नाम हरिलीलामृत और मुक्ताफल हैं। हरिलीलामृत में सम्पूर्ण भागवत पुराण का सारांश है। इस कारण इसका दूसरा नाम भागवतानुक्रमणिका है। मुक्ताफल पर हेमाद्रि की टीका भी है। कुछ भी हो, श्रीवैष्णव सम्प्रदाय बोपदेव को अपनी गुरुपरम्परा में सम्मिलित नहीं करता है। उसकी परम्परा यथार्थतः नाथमुनि से आरम्भ होती है। परन्तु चूंकि भागवतपुराण का प्रभाव रामानुजसम्प्रदाय पर पड़ा है और रामानुज ने स्वयं वेदार्थसंग्रह में भागवतपुराण का उल्लेख किया है और वेदान्तसार में भागवतपुराण के कई श्लोकों को उधृत भी किया है और बोपदेव ने भी भागवत दर्शन का उद्वार किया था इस कारण कुछ क्षेत्रों में यह मान्यता चल पड़ी कि बोपदेव भी श्रीवैष्णवसम्प्रदाय की गुरु-परमारा में आते हैं। इस मान्यता की सत्यता इतनी ही प्रतीत होती है कि भागवतपराण का श्री वैष्णव सम्प्रदाय पर प्रभाव है और उसके कर्ता को इस कारण रामानुज के श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के स्रोत के रूप में माना जाता है। संभवतः नाथमुनि ने इस परम्परा को भागवत पुराण से जोड़ा था। काम
रामानुज वेदान्त के अनुसार भागवतपुराण पर सुदर्शनसूरि ने शुकपक्षीय टीका (चौदहवीं शती) लिखी है, जिसको सम्प्रदाय में बड़ा आदर मिला है। भागवतपुराण निश्चित रूप से रामानुज के पहले की रचना है। भागवतपुराण की नवधाभक्ति श्री वैष्णवों को स्वीकार्य है। श्रवण, कीर्तन, वन्दन, अर्चन, स्मरण, पादसेवन, दास्य, सख्य और
आत्मनिवेदन ये भक्ति के नौ प्रकार हैं
श्रवणं कीर्तनं विष्णोः स्मरणं पादसेवनम्। अर्चनं वन्दनं दास्यं सख्यमात्मनिवेदनम्।।।
(भागवतपुराण ६।५।२३) 5
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वेदान्त-खण्ड इसी प्रकार विष्वक्सेन का भी तात्पर्य विष्वक्संहिता है जो रामानुज सम्प्रदाय में एक मान्य आगमग्रन्थ हैं। उसके प्रणेता विष्वक्सेन नामक विष्णुरूप माने जाते हैं। कुछ भी हो, यदि उसके प्रणेता मानव हैं तो वे भी सम्प्रदाय की गुरुपरम्परा में हैं अन्यथा ग्रन्थरूपी गुरु का स्थान तो गुरु-परम्परा में सुरक्षित है ही।
नाथमुनि ने आलवारों में ‘दिव्य-प्रबन्धम्’ को चार सहस्रगीतियों में विभाजित किया था। इसके अतिरिक्त उन्होंने दो और ग्रन्थ लिखे थे-नयतत्त्व और योगरहस्य। परन्तु ये ग्रन्थ अनुपलब्ध हैं। इसके कुछ उद्धरण वेदान्तदेशिक ने नयसिद्धांजन में दिये हैं। पुण्डरीकाक्ष का भी कोई ग्रन्थ उपलब्ध नहीं है। राममित्र अध्यात्मरामायण के लेखक माने जाते हैं। किन्तु पं. रघुवर मिठूलाल शास्त्री ने स्वामी रामानन्द को अध्यात्मरामायण का लेखक सिद्ध किया है। वैसे कुछ अन्य लोग इन दोनों में से किसी को भी अध्यात्मरामायण का लेखक नहीं मानते हैं। इस प्रकार राममिश्र की भी कोई कृति उपलब्ध नहीं है।
वास्तव में यामुनाचार्य ही श्रीवैष्णवसम्प्रदाय और विशिष्टाद्वैत वेदान्त के प्रथम मान्य आचार्य हैं। इनकी निम्नलिखित कृतियां हैं १. आलवन्दार स्तोत्र या स्तोत्ररत्न। २. सिन्द्रित्रय जिसमें आत्मसिद्धि, ईश्वरसिद्धि और संवित्सिद्धि सम्मिलित हैं। ३. गीतार्थसंग्रह जो भगवद्गीता का एक स्वतंत्रभाष्य है। ४. आगम प्रामाण्य जिसमें पांचरात्रादि आगमों के प्रामाण्यों को सिद्ध किया गया है।
आगम और निगम (वेद) दोनों के प्रामाण्य एक जैसे हैं। ५. श्रीचतुःश्लोकी जिसमें लक्ष्मी की स्तुति है।
इनके अतिरिक्त उनका एक और ग्रन्थ था महापुरुषनिर्णय-जो अनुपलब्ध है। संभवतः वह विष्णु को महापुरुष सिद्ध करने वाला ग्रन्थ था।
यामुनाचार्य नाथमुनि के पौत्र थे। उनका जन्म यमुना के किनारे हुआ था। उस समय उनके माता-पिता तीर्थयात्रा पर वहाँ गये थे। उनका नाम आलवन्दार के नाम से प्रसिद्ध हुआ। आलवन्दार का अर्थ है विजयी। उन्होंने किसी विद्वान् को शास्त्रार्थ में पराजित किया था। तब से उन्हें आलबन्दार कहा जाने लगा।
आलवन्दार स्तोत्र में यामुनाचार्य ने नाथमुनि की वन्दना प्रशस्तिपूर्वक की है। उन्होंने नाथमुनि को परमार्थ तथा समग्र भक्तियोग का अवतार कहा है (आलवन्दारस्तोत्र)। वहीं पंचम श्लोक में उन्होंने शठकोप को प्रणामांजलि अर्पित की है और चतुर्थ में पराशर को जो विष्णुपुराण के लेखक माने जाते हैं। ग्यारहवें श्लोक में कहा गया है कि कौन वैदिक है जो नारायण को परमेश्वर नहीं मानता
स्वाभाविकानवधि कातिशयेशितृत्वं मना । नारायण! त्वयि न मृष्यति वैदिकः कः?
रामानुजपूर्व विशिष्टाद्वैत-वेदान्त
१५ इसी प्रकार आलवन्दार स्तोत्र में रामानुज-दर्शन के बीज भरे हैं। शरणागति का सिद्धान्त तो कूट-कूट कर भरा है। म
५. रामानुज के पूर्ववर्ती वेदान्ताचार्य
यामुनाचार्य ने सिद्धित्रय में अपने कुछ पूर्ववर्ती आचार्यों को विप्रलुब्ध कहा है-आचार्य टंक, भर्तृप्रपंच, भर्तृमित्र, ब्रह्मदत्त, शंकरश्रीवत्सांक भास्करादिविरचित-सितासितविविध निबन्धन-शुद्धविप्रलुब्धबुद्वयो न यथावत् अन्यथा च प्रतिपद्यत इति तत्प्रतिपत्तये युक्तः प्रकरणक्रमः। उन्होंने शंकराचार्य के पूर्ववर्तियों में टंक, भर्तृप्रपंच भर्तृमित्र, भर्तृहरि और ब्रह्मदत्त का उल्लेख किया है और उनके मतों से असहमति प्रकट की है। रामानुज ने वेदार्थसंग्रह में अपने पंथ को जिन आचार्यों से सेवित सिद्ध किया है उनमें यथाक्रम आते हैं बोधायन से भारुचि तक आचार्य
भगवद्बोधायन-टंक-द्रमिड-गुहदेव-कपर्दि-भारुचिप्रभृत्यवगीत-शिष्टपरिगृहीत पुरातनवेदवेदान्तव्याख्यानसुव्यक्तार्थ श्रुतिनिकरनिदर्शनोऽयं पन्थाः। श्रीभाष्य में वे कहते हैं कि भगवान् बोधायन ने ब्रह्मसूत्र पर एक विस्तृत वृत्ति लिखी थी जिसका अनेक पूर्वाचार्यों ने संक्षेप किया है। बोधायन को वृत्तिकार के नाम से जाना जाता है। रामानन्द सम्प्रदाय भी बोधायन को एक विशिष्टाद्वैतवादी आचार्य मानता है। अतः रामानुज के अन्तरंग साक्ष्य से तथा रामानन्द सम्प्रदाय के बहिरंग साक्ष्य से सिद्ध है कि बोधायन एक विशिष्टाद्वैत वेदान्ती थे, जिनकी वृत्ति के आधार पर रामानुज ने श्रीभाष्य लिखा। बोधायन के मत से मीमांसा और वेदान्त एक ही शास्त्र के अन्तरंग अंग हैं, १२ अध्यायों वाला जैमिनिसूत्र और चार अध्यायों वाला बादरायणसूत्र मिलकर षोडशलक्षण शास्त्र (१६ अध्यायों वाला शास्त्र) कहलाते हैं। रामानुज के अनुसार बोधायनवृत्ति एक संहिता थी। कुछ लोगों का अनुमान है कि बोधायनवृत्ति का नाम कृतकोटि था। किन्तु आधुनिक खोजों ने सिद्ध किया है कि कृतकोटि एक आचार्य का नाम था जो वेदान्ती थे और रामानुज के पूर्ववर्ती थे। ।
प्रो. संगमलाल पाण्डेय ने खोजा है कि शंकर, पद्मपाद आदि अद्वैत वेदान्त के आचार्यों ने ब्रह्मसूत्र के दो वृत्तिकारों के निर्देश किये हैं जिनमें से एक अद्वैतवेदान्ती उपवर्ष हैं और दूसरे विशिष्टाद्वैतवादी बोधायन हैं। उन्होंने इन दोनों की वृत्तियों के प्रमुख सिद्धान्तों
की पुनर्रचना भी की है। दिखिए उनका ग्रन्थ प्री शंकर अद्वैत फिलासफी)
-रामानुज कहते हैं कि बोधायन के अनुसार जीवात्मा अणु है और ईश्वर विभु है तथा ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग ज्ञानकर्म-समुच्चय का मार्ग है, केवल ज्ञानमार्ग नहीं।
बोधायन, टंक, द्रमिड, गुहदेव, कपर्दि और भारुचि के ग्रन्थ आज अनुपलब्ध हैं। परवर्ती विशिष्टाद्वैत-साहित्य में उनके कतिपय वचन मिलते हैं जिनके आधार पर उन्हें विशिष्टाद्वैतवादी माना जाता है। श्रीभाष्य में उद्धृत बोधायन के २३ वाक्यों को उदयवीर शास्त्री ने वेदान्तदर्शन के इतिहास में दिया है। रामानन्द-सम्प्रदाय में बोधायन के कई और
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वेदान्त-खण्ड भामा ग्रन्थ बताये जाते हैं, किन्तु उनकी प्रामाणिकता उनके सम्प्रदाय के अतिरिक्त अन्य परम्पराओं से प्रमाणित नहीं है। रामानुजोत्तर विशिष्टाद्वैतवाद में बोधायन, टंक तथा द्रमिड क्रमशः वृत्तिकार, वाक्यकार और भाष्यकार के नाम से जाने जाते हैं।
भर्तृप्रपंच आदि वेदान्ती भेदाभेदवादी थे। रामानुज ने भेदाभेदवाद का भी खण्डन उसी प्रकार से किया है जिस प्रकार से अभेदवाद का। पहले उन्होंने यादवप्रकाश से वेदान्त का अध्ययन किया था। यादवप्रकाश मूलतः भेदाभेदवादी थे। रामानुज से उनका मतभेद था। रामानुज ने उनके मत का निरादर करते हुए विशिष्टाद्वैतवाद को स्वीकारा था। हालात
६. ईश्वरवाद
ME रामानुज के पूर्ववर्ती सभी दिव्यसूरि तथा आचार्यगण एकेश्वरवादी थे। वे नारायण या विष्णु को भगवान मानते थे। विष्णु ही सृष्टिकर्ता, धर्ता और हर्ता हैं। उनकी तीन शक्तियाँ हैं- श्री (लक्ष्मी), भू और लीला। उनके छः गुण हैं-ऐश्वर्य, तेज, शक्ति, बल, वीर्य और विज्ञान । विज्ञान भगवान् का स्वरूप है। वह धर्मिभूत है। अन्य गुण धर्मभूत हैं। ऐश्वर्य अबाधित इच्छाशक्ति है। तेज का अर्थ सहकारी से निरपेक्षता है। शक्ति का अर्थ श्रम का अभाव है, थकान न होना । वीर्य का अर्थ निर्विकारता है। इन छ: गुणों (पागुण्य) से सम्पन्न होना ही भगवान् का लक्षण है, भगवत्-तत्त्व है। धर्म-स्थापना के निमित्त विष्णु भगवान् प्रत्येक युग में अवतार लेते है। ये अवतार भगवान् के विभव कहे जाते हैं। कृष्ण, राम आदि इसी कोटि में आते हैं। विभव के अतिरिक्त भगवान् के चार और रूप भी हैं-परस्वरूप, व्यूहरूप, अन्तर्यामी रूप और अर्चारूप। परस्वरूप का नाम वासुदेव है जिनमें उक्त छ: गुण हैं। व्यूहरूप में संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध ये तीन रूप हैं जो भगवान् वासुदेव के शान्तोदित रूप हैं। अन्तर्यामी रूप में भगवान् सभी जीवों में विद्यमान हैं। अर्चारूप में भगवान् मंदिरों और मूर्ति में विराजमान हैं। रामानुज-सम्प्रदाय की गुरु-परम्परा के सभी आचार्य गुरु श्रीरंगम् के उपासक थे। उनके इष्टदेव श्रीरंगम् मन्दिर में प्रतिष्ठिापित श्रीरंग भगवान् की मूर्ति थे। नाथमुनि के समय से ही वहाँ आलवारों के दिव्य-प्रवन्धम् का गायन होता चला आ रहा है। महिला
लि भगवान् को प्राप्त करना, उनके सान्निध्य में रहना ही मानव-जीवन का परम लक्ष्य है। भगवत्प्राप्ति ही मोक्ष है। जमी।
७. प्रपत्तिमार्ग
रामानुज-सम्प्रदाय का प्रपत्तिमार्ग उनकी परम्परा में प्राचीन आचार्यों की रचनाओं में पर्याप्त रूप से मिलता है। प्रपत्ति का अर्थ है, शरणागति, भगवान् की शरण में जाना, उनसे प्रपन्न होना। यह कैतवरहित, अहंकार-विगलित भक्ति है। इसके छ: अंग हैं
रामानुजपूर्व विशिष्टाद्वैत-वेदान्त
-१७ १. आनुकूल्य संकल्प। ईश्वरेच्छा का पालन करना। अपने को ईश्वराधीन कर देना। २. प्रतिकूल्यवर्जन। ईश्वर को जो अप्रिय हो उसका त्याग करना। ३. महाविश्वास। भगवान् अनुग्रहवान् या कृपालु हैं। इनमें अटूट विश्वास करना। उनकी
अहेतुकी कृपा का पात्र होना। ४. कार्पण्य। अपने को अंकिचित्कर (दीन) समझना कार्पण्य है अर्थात् ज्ञान, कर्म और
भक्ति करने में अपनी असमर्थता का भाव। ५. गोप्तृत्व-वरण। भगवान् रक्षक हैं। वे तारक हैं। इस रूप में उनका वरण करना
गोप्तृत्व-वरण है। आत्मनिक्षेप। भगवान् के प्रति पूर्णतया आत्म-समर्पण करना आत्मनिक्षेप है। प्रपत्तिमार्गी कामरहित, स्थितप्रज्ञ और शान्तचित्त होता है। वह अहर्निश भगवान् का नाम लेता रहता है और उनका मंत्र जपता रहता है। मंत्रजप से ही सिद्धियां और भगवत्-प्राप्ति होती है। सम्प्रदाय में तीन प्रकार के मंत्र हैं जिनका विवेचन रहस्यात्मक ढंग से किया जाता है। ये मंत्र अधोलिखित हैं
१. मंत्र-‘ॐ नमो नारायणाय’। यह अष्टाक्षर मंत्र है। यह मंत्रराज नाम से अभिहित किया जाता है। यहाँ प्रणव के तीन अक्षर अ, उ और म् क्रमशः विष्णु, लक्ष्मी
तथा दास (भक्तजीव) के वाचक हैं। २. मंत्रद्वय ‘श्रीमन्नारायणचरणी प्रपद्ये, श्रीमते नारायणाय नमः।’ यह मंत्रदय के नाम
से जाना जाता है। मा ३. चरमश्लोक। ‘सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज अहं त्वा सर्वपापेभ्यो
मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।
भगवद्गीता का यह श्लोक चरम श्लोक कहा जाता है। उल्लेखनीय है कि मंत्रराज में ३, मंत्रद्वय में ६ और चरमश्लोक में १२ पद हैं। अत: मंत्रराज से दो गुना प्रभाव मंत्रद्वय का है और मंत्रद्वय से दो गुना प्रभाव चरमश्लोक का है, ऐसी सम्प्रदाय में मान्यता है।
इन मंत्रों के प्रत्येक शब्द के नाना सार्थक अभिप्राय या तात्पर्य बताये गये हैं। इनकी शब्द-मीमांसा में रामानुज वेदान्त के सभी सिद्धान्तों का उपयोग किया जाता है। दर्शन केवल मंत्रबोध में उपयोगी है। मंत्रबोध से ही वह निरतिशय आनन्द मिलता है जिसे ब्रह्म-लाभ या मोक्ष कहा जाता है। यही कारण है कि सम्प्रदाय के सभी आचार्य इन तीन मंत्रों के रहस्योद्घाटन पर बल देते हैं। उनमें से अधिकांश ने रहस्यत्रय का भाष्य किया है।१८
वेदान्त-खण्ड
सन्दर्भ-ग्रन्थ
१. भारतन कुमारप्पा २. संगम लाल पाण्डेय ३. उदयवीर शास्त्री ४. रामकृष्ण भण्डारकर
५. संगमलाल पाण्डेय ६. यामुनाचार्य ७. यामुनाचार्य ८. यामुनाचार्य ६. यामुनाचार्य १०. कुलशेखर
दी हिन्दू कन्सेपशन आव डेटी प्री. शंकर अद्वैत फिलासफी वेदान्त दर्शन का इतिहास वैष्णविज्म शैविज्म एण्ड माइनर रिलीजस सेक्टस भारतीय दर्शन का सर्वेक्षण
आलवन्दार स्तोत्र आगमप्रामाण्य सिद्धित्रय गीतार्थसंग्रह मुकुन्दमाला, एक टीका सहित अन्नमलाई विश्वविद्यालय तिरुवायमौलि (सहस्रगीतिः) वेंकटरेश्वर प्रेस, बम्बई, १६१३. द्राविडाम्नाय-दिव्य प्रबन्ध टीका (संस्कृत और हिन्दी) एल. कांचीपुरम, मद्रास, १६६७. द्रविडोपनिषत्सार द्रविडोपनिषत्तात्पर्यावली गोदा-गीतावली, बिहार राष्ट्रभाषा परिषद्, पटना, १६६७.
११. गोवर्धनाचार्य
१२. अपर्णगराचार्य
१३. वेदान्तदेशिक १४. वेदान्तदेशिक १५. वागीशाचार्य शास्त्री,
द्वितीय अध्याय
काय