०३ प्रमाण-विचार

१. प्रमा और अप्रमा-ज्ञान वस्तु के स्वरूप को प्रकाशित करता है। यह वस्तु कभी अपने यथार्थ स्वरूप में प्रकाशित होती है और कभी किन्हीं कारणों से अन्यथा प्रकाशित होती है। फलतः ज्ञान यथार्थ और अयथार्थ, दो प्रकार का होता है, जिसमें यथार्थ ज्ञान को प्रमा और अयथार्थ ज्ञान को अप्रमा कहा जाता है। ज्ञान-प्रक्रिया में प्रमाता (ज्ञाता), प्रमेय (ज्ञेय) और ज्ञान के अतिरिक्त उस साधन (करण) का भी महत्त्वपूर्ण स्थान है जिसके रहते ज्ञान संभव होता है। ‘प्रमयाण’ शब्द का प्रयोग इसी यथार्थ ज्ञान के साधन के लिए किया जाता है।

प्रमा

यथार्थ ज्ञान को अन्य दर्शनों में ‘प्रमा’ कहा गया है, किन्तु मीमांसक इसके लिए ‘प्रमाण’ शब्द का ही प्रयोग करते हैं। कुमारिल भट्ट प्रमाण (यथार्थ ज्ञान) का लक्षण बताते हुए कहते हैं कि - तस्मात् दृढं यदुत्पन्नं नापि संवादमृच्छति। ज्ञानान्तरेण विज्ञानं तत् प्रमाणं प्रतीयताम् ।। श्लोक वा. २.८० अर्थात् यथार्थ ज्ञान वह है जो किसी विषय को निश्चितरूप से यथार्थ रूप में बताता है और जो किसी अन्य ज्ञान द्वारा बाधित नहीं होता तथा जो अज्ञात विषयक होता है। इसी प्रकार की परिभाषा पार्थसारथि मिश्र ने भी दी है “कारणदोषबाधकज्ञानरहितमगृहीतग्राहिज्ञानं प्रमाणम्” _इस प्रकार नूतनता, असन्दिग्धत्व और यथार्थत्व (अबाधित्व) प्रमा के अनिवार्य गुण है। इसके विपरीत प्रभाकर ने यथार्थ ज्ञान को अनुभूति माना जो स्मृति से भिन्न है, क्योंकि स्मृति संस्कार-मात्र जन्य ज्ञान है- “अनुभूतिः प्रमाणं सा स्मृतेरन्या स्मृतिः पुनः पूर्वविद्यमानसंस्कारमात्रजं ज्ञानमुच्यते।।”

अप्रमा के प्रकार

प्रमा के लक्षण पर विचार करने से स्पष्ट होता है कि अप्रमा के चार प्रकार हो सकते हैं : (१) संवाद (२) स्मृति (३) संशय और (४) विपयर्य (१) संवाद को अयथार्थ ज्ञान माना गया है, क्योंकि इसके द्वारा हमें किसी अज्ञात विषय का ज्ञान नहीं होता, अपि तु पूर्वप्राप्त ज्ञान का ही पुनर्ग्रहण होता है। जैसे- किसी व्यक्ति ने कहा कि दूर दिखाई पड़ने वाले स्थान-विशेष में अग्नि है। यह सुनकर यदि कोई वहाँ जाय और धुएं को देखकर वहाँ अग्नि के होने का पहले अनुमान करे। तत्पश्चात् उस स्थलविशेष पर पहुँचकर देखे कि वास्तव में वहाँ अग्नि है। यही संवाद है। किन्तु स्मृति की तरह संवाद भी कोई नया ज्ञान नहीं देता अतः अप्रमा रूप है, परन्तु यह स्मृति से इस है मीमांसा दर्शन का इतिहास ३६६ अर्थ में भिन्न है कि यह विषय का अनुभवात्मक ज्ञान है जिसमें ज्ञात विषय विद्यमान है जबकि स्मृति विषय का प्रतिनिधित्व मात्र करती है। " (२) स्मृति - चूँकि अगृहीतग्राहि ज्ञान को प्रमा कहा गया है इसलिए स्मृति अप्रमा है, क्योंकि इसमें पूर्वप्राप्त ज्ञान का ही स्मरण होता है, जो किसी नूतन ज्ञान की सूचना नहीं देती, क्योंकि केवल पूर्वप्राप्त ज्ञान के संस्कारों से ही उत्पन्न होती है। कोई भी व्यक्ति किसी ऐसी वस्तु का स्मरण नहीं कर सकता जिसका कि उसने अतीत में प्रत्यक्ष न किया हो। अपने विषय के निश्चित या अनिश्चित रूप से प्रकाशित करने के कारण स्मृति सत्य या असत्य हो सकती है, किन्तु यह यथार्थ ज्ञान का एक प्रकार नहीं मानी जा सकती। (३) संशय- वस्तु के ‘दृढ़’ निश्चित (अवधारणात्मक) ज्ञान को प्रमा कहा गया है, इसलिए संशय को यथार्थ ज्ञान नहीं माना गया क्योंकि यह वस्तु का अनवाधारणात्मक ज्ञान है जो वस्तु को कई विकल्पों के रूप में प्रस्तुत करता है, किन्तु उसके स्वरूप को निश्चित नहीं करता। जैसे सामने स्थाणु को देखकर कोई कहे कि “यह स्थाणु है या पुरुष है"? (४) विपयर्य - वस्तु जैसी है उसको उसी रूप में ग्रहण करना यथार्थ ज्ञान है किन्तु उसको अन्यथा ग्रहण करना विपयर्य है। जैसे रज्जु को सर्प के रूप में, शुक्ति को रजत के रूप में और एकचन्द्र को द्विचन्द्र के रूप में ग्रहण करना। हमें भ्रम क्यों होता है? हम एक वस्तु को दूसरी वस्तु क्यों समझ बैठते हैं? इन प्रश्नों का विवेचन भारतीय प्रमाण-मीमांसा के एक विशिष्ट सिद्धान्त में किया जाता है जिसे ‘ख्यातिवाद’ कहते हैं, जो कई रूपों में विभक्त दार्शनिकों द्वारा मान्य है- जिनमें से अधोलिखित का सन्दर्भ मीमांसा-ग्रन्थों में मिलता है (क) असत्ख्यातिवाद - माध्यमिक शून्यवादियों का है जिनके अनुसार जो असत् है वही सत् के रूप में प्रतीत होता है। कमर (ख) आत्मख्यातिवाद - योगाचार विज्ञानवादियों का मत है जिनके अनुसार विज्ञान या प्रत्यय जो आत्मगत हैं बाह्यवस्तु के रूप में ज्ञात होते हैं। म (ग) अनिवर्चनीयख्यातिवाद - अद्वैत वेदान्त का मत है जो यह मानता है कि अतत् में तत् की बुद्धि ही अध्यास (भ्रम) है जिसमें स्मृति-रूप पदार्थ अन्यत्र (अपने से भिन्न स्थल में) आभासित होता है। भ्रम का यह विषय सत् नहीं है, क्योंकि इसका पश्चात्कालिक ज्ञान से बाध हो जाता है, असत् नहीं है क्योंकि इसकी प्रतीति होती है और सत् और असत् दोनों नहीं है, क्योंकि ऐसा मानना वदतोव्याधात है अतः वह सदसद्विलक्षण है और इसलिए अनिवर्चनीय है। इसके अतिरिक्त रामानुज का सत्ख्यातिवाद, सांख्य का सदसत्ख्याति, योग का ४०० न्याय-खण्ड विवेकाख्याति, अलौकिक ख्याति आदि सिद्धान्त भी प्रचलित हैं किन्तु इनका उल्लेख मीमांसा में नहीं मिलता। ख्यातिविषयक सिद्धान्त को लेकर कुमारिल और प्रभाकर में मतभेद है। कुमारिल विपरीत ख्याति को मानते हैं जो न्याय के अन्यथाख्याति से कई अर्थों में समान है और प्रभाकर अख्याति को मानते हैं।

विपरीतख्यातिवाद

कुमारिल का यह मत मुरारि मिश्र एवं नैयायिकों से मिलता है। भ्रमज्ञान में एक वास्तविक विषय किसी अन्य विषय के रूप में प्रकाशित होता है जो स्वयं भी वास्तविक है। भ्रम के सभी स्थलों में उद्देश्य एवं विधेय पद द्वारा अभिहित पदार्थों के बीच का सम्बन्ध ही असत होता है जो सत् जैसा प्रतीत होता है। सम्यग ज्ञान से मिथ्या ज्ञान का बाध होता है वस्तु का नहीं। शुक्तित्व और रजतत्व दो धर्म हैं जो शुक्ति और रजत में समवाय सम्बन्ध से रहते हैं जिससे वे कथमपि पृथक् नहीं किये जा सकते परन्तु ‘शुक्ति’ में रजतज्ञान होने के अवसर पर शुक्ति में, शुक्तित्वप्रकारक ज्ञान न होकर रजतत्वप्रकारक ज्ञान होता है इसीलिए इसे विपरीत ख्याति कहते हैं।

अख्यातिवाद

प्रभाकर के मत को अख्यातिवाद इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह भ्रम को ज्ञान का अग्रहण मानते हैं। वह मानते हैं कि सभी ज्ञान यथार्थ होते हैं (यथार्थ सर्वविज्ञानम्)। यह कैसे हो सकता है कि कोई ज्ञान वस्तु को प्रकाशित करे और फिर भी अयथार्थ हो। वस्तुतः जब ‘इदं रजतम्’ ऐसी प्रान्ति होती है तो यहाँ दो भिन्न-भिन्न ज्ञान होते हैं- शुक्ति (इदं) का प्रत्यक्ष होता है और ‘चमक’ के सादृश्य के कारण रजत का स्मरण होता है। शुक्ति और रजत दोनों ही ज्ञान अपने विषयों में यथार्थ हैं, किन्तु उपलभ्यमान ‘इदं’ पदार्थ का स्मरण किए गए रजत पदार्थ से भेद का ग्रहण न होने से ही भ्रम होता है। प्रभाकर इसे विवेकाग्रह (ज्ञान का अभाव) कहते हैं इसीलिए इस सिद्धान्त का नाम अख्यातिवाद पड़ा।

२ स्वतःप्रामाण्यवाद

ज्ञान जब उत्पन्न होता है तो उसका प्रामाण्य (यथार्थता) अथवा अप्रामाण्य (अयथार्थता) उसी के साथ उत्पन्न होता है (स्वतः) अथवा बाहर से उसमें जुड़ता है (परतः) इस समस्या का विवेचन करते समय कुमारिल ने श्लोकवार्त्तिक में जो विकल्प उठाये हैं, उनको निम्नवत् रखा जा सकता है : (१) सांख्य ज्ञान के प्रामाण्य एवं अप्रामाण्य दोनों को स्वतः मानता है। (२) नैयायिक दोनों को परतः मानता है। पर (३) बौद्धगण प्रामाण्य को परतः किन्तु अप्रामाण्य को स्वतः मानते हैं। (४) मीमांसक और अद्वैतवेदान्ती प्रामाण्य को स्वतः और अप्रामाण्य को परतः मानते हैं। मीमांसक मानते हैं कि जिस कारणसामग्री से ज्ञान की उत्पत्ति होती है, उसी उत्पादकसामग्री से उसमें प्रामाणिकता भी उत्पन्न होती है। वह कहीं बाहर से नहीं आती। ४०१ मीमांसा दर्शन का इतिहास और ज्ञान से उत्पन्न होते ही उसके प्रामाण्य का भी ज्ञान हो जाता है, उसकी सिद्धि के लिए किसी अन्य प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। जब कारणसामग्री सदोष होती है तो उससे यथार्थ ज्ञान की उत्पत्ति नहीं होती और उसके अप्रामाण्य को हम कुछ बाह्य तथ्यों से जानते हैं (परतः अप्रमाण्य)। बाधक प्रत्यय और ज्ञान-उत्पादक सामग्री के दोष के ज्ञान से हम उसकी अप्रामाणिकता को जानते हैं यह अप्रामाण्य उत्पादक सामग्री के दोषों से उत्पन्न होती है जो उससे बाह्य (परतः) है। अतः ज्ञान का प्रामाण्य उत्पत्ति एवं ज्ञप्ति दोनों दृष्टियों से स्वतः है और अप्रामाण्य दोनों दृष्टियों से परतः। मीमांसक न्याय के परतः प्रामाण्यवाद में सबसे बड़ा दोष ‘अनवस्था दोष’ बताते हैं। यदि एक ज्ञान की प्रामाणिकता के लिए किसी अन्य ज्ञान की आवश्यकता हो तो उस अन्य की प्रामाणिकता के लिए भी किसी तीसरे ज्ञान की और तीसरे की प्रामाणिकता के लिए चौथे की और इस प्रकार यह प्रक्रिया अनन्तकाल तक चलती रहेगी और ज्ञान की प्रामाणिकता को हम न जान सकेंगे।

३. प्रमाण के प्रकार

मीमांसा दर्शन में कुल छः प्रमाण स्वीकार किए गए हैं, किन्तु प्रभाकर मीमांसक अनुपलब्धि को स्वतन्त्र प्रमाण न मानते हुए केवल ५ प्रमाणों को स्वीकार करते हैं। छ: प्रमाण निम्नवत् हैं : (१) प्रत्यक्ष, (२) अनुमान, (३) शब्द, (४) उपमान, (५) अर्थापत्ति (६) अनुपलब्धि।

१. प्रत्यक्ष प्रमाण

धर्म की व्याख्या करना ही मीमांसा का मुख्य विषय है। इसी सन्दर्भ में प्रत्यक्षादि प्रमाणों का विवेचन करते हुए यह दिखाया गया है कि श्रुति गम्य धर्म का ज्ञान इन प्रमाणों से नहीं हो सकता। इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य ज्ञान को प्रत्यक्ष के रूप में स्वीकार किया गया है। जैमिनि ने प्रत्यक्ष का लक्षण इस प्रकार दिया है :- “सत्संप्रयोगे पुरुषस्येन्द्रियाणां बुद्धिजन्य तत्प्रत्यक्षमनिमित्तं विद्यमानोपलम्भनातू” (मी.सू. १.१४) अर्थात् जब पुरुष की इन्द्रिय का सन्निकर्ष किसी विद्यमान वस्तु के साथ होता है तो उसमें उत्पन्न होने वाली बुद्धि (ज्ञान) को प्रत्यक्ष कहते हैं। विद्यमान का ही ज्ञान कराने वाला होने से वह (प्रत्यक्ष) धर्म की सिद्धि (ज्ञान) में निमित्त नहीं है, क्योंकि धर्म भविष्यत् रूप है। जैमिनि के इसी सूत्र को आधार बनाकर व्याख्याकारों ने प्रत्यक्ष के स्वरूप की व्याख्या की है। आचार्य भवदास ने प्रत्यक्ष के इस लक्षण को दो भागों में बांटकर उसके स्वरूप का निर्धारण किया है। उनके अनुसार ‘सत्संप्रयोगे पुरुषस्येन्द्रियाणां बुद्धिजन्म तत्प्रत्यक्षम्’ इतना अंश प्रत्यक्ष का लक्षण है और ‘अनिमित्तं विद्यमानोपलम्भनात्’ यह अंश प्रत्यक्ष प्रमाण में धर्मज्ञान की अनिमित्तता (अज्ञापकता) का प्रतिपादक है। कुमारिल ने प्रत्यक्ष के लक्षण में आये ‘सम्’ शब्द का अर्थ ‘सम्यक्’ किया और तदनुसार विद्यमान वस्तु के साथ इन्द्रियों के सम्प्रयोग (सम्यक् प्रयोग) से उत्पन्न बुद्धि (ज्ञान) को प्रत्यक्ष माना। या प्रभाकर ने साक्षात्प्रतीति को प्रत्यक्ष माना (साक्षात् प्रतीतिः प्रत्यक्षम्)। प्रभाकर ‘त्रिपुटी ४०२ न्याय-खण्ड FER प्रत्यक्ष’ को मानते हैं, क्योंकि उनके अनुसार प्रत्यक्ष ज्ञान में प्रमेय, प्रमाता और प्रमा इन तीनों का ज्ञान होता है। प्रभाकर का मत नव्य-नैयायिक से मिलता-जुलता है। मानमेयोदय में इन्द्रियार्थसन्निकर्ष से उत्पन्न प्रमारूप ज्ञान हो ही प्रत्यक्ष माना गया (इन्द्रियार्थसन्निकर्षजं प्रमाणं प्रत्यक्षम् ) है। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्रत्यक्ष के स्वरूप से सम्बन्धित प्रभाकर और कुमारिल के बीच मतभेद है। प्रभाकर ने अद्वैत वेदान्त, नव्य न्याय, जैन. आदि की तरह अपरोक्ष प्रतीति को ही प्रत्यक्ष माना (ज्ञानाकरणकं ज्ञानं प्रत्यक्षम्) और कुमारिल ने न्याय-वैशेषिक, सांख्य-योग एवं विशिष्टाद्वैत आदि की तरह इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य ज्ञान को प्रत्यक्ष माना जिसमें सन्निकर्ष पर अधिक जोर दिया गया है, किन्तु कुमारिलमत में सन्निकर्ष के दो भेद माने गए हैं : १. संयोग और २. संयुक्त-तादात्म्य जबकि प्रभाकर ने १. संयोग २. संयुक्त समवाय और ३. समवाय - इन तीन प्रकार के सन्निकर्ष को स्वीकार किया है।

निर्विकल्पक और सविकल्पक प्रत्यक्ष

मीमांसा दर्शन में निर्विकल्प और सविकल्प प्रत्यक्ष की दो अवस्थाओं के रूप में स्वीकृत हैं। दूसरी अवस्था पहली अवस्था का ही विशिष्ट रूप है। विषय के साथ जब इन्द्रियों का सन्निकर्ष होता है, तो सर्वप्रथम नाम, जाति, गुण कल्पना आदि से रहित वस्तु का जो निर्विशेष ज्ञान होता है उसी को निर्विकल्पक कहते हैं और बाद में जब वही वस्तु किसी विशेष नाम, जाति, गुण आदि से युक्त होकर ज्ञात होती है तो उसे सविकल्पक प्रत्यक्ष कहते हैं। कुमारिल ने श्लोकवार्त्तिक में निर्विकल्पक ज्ञान को ‘आलोचन ज्ञान’ कहा है अस्ति यालोचनं ज्ञानं, प्रथमं निर्विकल्पकम्। बालमूकादिसदृशं, विज्ञानं शुद्धवस्तुजम् ।। (४६ ‘कल्पना’ शब्द का प्रयोग दार्शनिक साहित्य में संभवतः सर्वप्रथम बौद्ध दार्शनिक दिङ्नाग ने अपने प्रमाणसमुच्चय नामक ग्रन्थ में किया, जहाँ उन्होंने प्रत्यक्ष को नाम, जाति एवं कल्पना आदि से रहित ज्ञान माना-“प्रत्यक्षं कल्पनापोटं नामजात्याद्यसंयुतम्"। और ‘आलोचन’ शब्द का प्रथम प्रयोग प्रशस्तपादभाष्य में मिलता है। बौद्ध, अद्वैत वेदान्ती और वैयाकरण निर्विकल्पक एवं सविकल्पक के भेद को नहीं मानते। कुमारिल ने इन विरोधी मतों का खण्डन करके प्रत्यक्ष की इन दोनों अवस्थाओं के औचित्य का निरूपण किया है। निर्विकल्पक प्रत्यक्ष में स्मरण, विश्लेषण, संश्लेषण आदि प्रक्रियाओं से स्पष्ट (व्यक्त) होता है।

अलौकिक सन्निकर्ष एवं योगज प्रत्यक्ष का खण्डन

कुमारिल ने नैयायिकों द्वारा मान्य सामान्य लक्षण, ज्ञान लक्षण और योगज सन्निकर्ष की असंभावना को सिद्ध किया है और अलौकिक प्रत्यक्ष के तीनों प्रकारों का खण्डन किया। प्रत्यक्ष सत् (विद्यमान) वस्तु के साथ इन्द्रियों के दोषरहित व्यापार से उत्पन्न होता है। अतएव ४०३ मीमांसा दर्शन का इतिहास हमें किसी भी ऐसे विषय का प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, जो विद्यमान न हो अथवा भविष्य में होने वाला हो। सामान्य लक्षण, ज्ञान लक्षण और योगज प्रत्यक्ष में ऐसे विषय के ज्ञान होने का दावा किया जाता है जो वस्तुतः तत्तत् विषयों को ग्रहण करने वाली इन्द्रियों के संपर्क में नहीं होते। चार्वाक और मीमांसकों के अतिरिक्त सभी भारतीय दार्शनिक योगज-प्रत्यक्ष में विश्वास करते हैं। यह जाना जाता है कि योगी अपनी साधना से प्राप्त अलौकिक शक्ति के कारण भूत, भविष्य वर्तमान और दूरस्थ विषयों का भी साक्षात् ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं। जैन, बौद्ध, न्याय और वैशेषिकादि द्वारा प्रतिपादित इस रहस्यात्मक योगज प्रत्यक्ष का खण्डन करते हुए कुमारिल कहते हैं कि यह कहना कि अलौकिक प्रत्यक्ष भावना प्रकर्ष से उत्पन्न होता है- युक्तिसंगत नहीं है, क्योंकि यह भावना किसी विषय पर चित्त की एकाग्रता के अतिरिक्त कुछ नहीं है। यह भावना विजातीय विषयों द्वारा अबाधित स्मृति की संसृति मात्र है। अतएव योगज प्रत्यक्ष वस्तुतः स्मृति ही है। और चूंकि स्मृति पूर्वज्ञान पर आश्रित है अतः योगज प्रत्यक्ष प्रमा रूप ज्ञान नहीं है। इसी आधार पर कुमारिल सर्वज्ञत्व का भी खण्डन करते हुए कहते हैं कि कोई भी सर्वज्ञ नहीं है और अतीन्द्रिय विषयों का साक्षात् द्रष्टा भी कोई नहीं है।

२. अनुमान

शाबरभाष्य में अनुमान का लक्षण इस प्रकार दिया गया है- ‘अनुमानं ज्ञातसम्बन्धस्यै कदेशदर्शनात् एकदेशान्तरेऽसन्निकृष्टेऽर्थे बुद्धिः’ अर्थात् दो विषयों के बीच ज्ञात सम्बन्ध के एकदेश को देखकर दूसरे अन्य देश वाले परोक्ष विषय में जो बुद्धि (ज्ञान) होती है वह अनुमान है। जैसे धूम और अग्नि के बीच नियत सम्बन्ध के ज्ञात होने पर जब धूम सामान्य के किसी एक भाग (पर्वतस्थ धूम) को देखकर दूसरे सम्बन्धी (अग्नि सामान्य) के उस एक भाग (पर्वतस्थ अग्नि) का ज्ञान होता है जो परोक्ष है, तो इसे अनुमान कहते हैं। शबरोक्त अनुमान के इसी लक्षण को आधार बनाकर कुमारिल और प्रभाकर अनुमान विषयक अपने-अपने मतों की स्थापना करते हैं। प्रभाकर के अनुसार ‘एकदेशदर्शनात् ज्ञातसम्बन्धस्य’ का तात्पर्य’ वह जिसका नियत सम्बन्ध दूसरे के साथ ज्ञात हो। लक्षणगत ‘असन्निकृष्टे’ पद की व्याख्या में कुमारिल का कहना है कि (9) अनुमान द्वारा साध्य विषय अपने गुणों के साथ पहले ही किसी अन्य प्रबल प्रमाण द्वारा ज्ञात न हो और (२) साध्य गुणों के विपरीत गुणवाले के रूप में भी इसका पहले ज्ञान नहीं होना चाहिए, जबकि प्रभाकर के अनुसार अनुमान का विषय स्मृत नहीं होना चाहिए (स्मरणाभिमानशून्यस्य)। शालिकनाथ के अनुसार अनुमान का विषय किसी अन्य प्रबलतर प्रमाण द्वारा बाधित नहीं होना चाहिए। वस्तुतः ‘असन्निकृष्ट’ पद से शबर का तात्पर्य उस विषय से है जो हमारी इन्द्रियों के संपर्क में नहीं है (परोक्ष)। अनुमान के लक्षण में आये ‘ज्ञातसम्बन्धस्य’ पद की व्याख्या करते हुए कुमारिल ने चार पक्ष प्रस्तुत किए हैं : ४०४ न्याय-खण्ड है १. यह पद उस व्यक्ति का संकेत करता है जो दो वस्तुओं (धूम एवं अग्नि) के बीच नियत सम्बन्ध को जानता है। २. यह पद उस आधार का द्योतक हो सकता है जिसमें धूम एवं अग्नि के सम्बन्ध का ग्रहण किया जाता है (जैसे-रसोईघर)। ३. अथवा यह पद मात्र ज्ञात सम्बन्ध का द्योतक हो सकता है और तब ‘एकदेश’ का तात्पर्य इस सम्बन्ध के सदस्यों से होगा (जैसे धूम और अग्नि) और एक सदस्य को देखकर दूसरे के होने का ज्ञान अनुमान है। 5 ४. अथवा यह पद लिंग और लिंगि दोनों का द्योतक हो सकता है जिनका सम्बन्ध ज्ञात PA है। लिंग साध्य का गमक होता है। इस प्रकार हम देखते हैं कि व्याप्ति के आधार पर हेतु को देखकर साध्य का ज्ञान प्राप्त करना अनुमान कहा जाता है। व्याप्तिज्ञान और पक्षधर्मताज्ञान अनुमान का आवश्यक तत्त्व है। लक्षणगत ‘दर्शन’ शब्द का अर्थ हेतु (व्याप्य) के प्रत्यक्ष ग्रहण से है। इसीलिए मानमेयोदय में अनुमान को व्याप्य (हेतु) के दर्शन से उत्पन्न होने वाले परोक्षाविषयक माना गया है - “व्याप्यदर्शनजन्यासन्निकृष्टार्थविषयं ज्ञानं अनुमानम्”। पक्ष, व्याप्य और व्यापक-ये अनुमान के तीन अंग हैं जो अनुमान के लक्षण में आये एकदेशि, लिंग और लिंगि के समानार्थक हैं। हेतु और साध्य के स्वाभाविक सम्बन्ध को व्याप्ति कहा गया है और हेतु का पक्ष में विद्यमान होना पक्षधर्मता है। निश्चितसाध्यवान् को सपक्ष और निश्चितसाध्याभाववान् को विपक्ष कहते हैं। हेतु को पक्ष में रहना चाहिए (पक्षसत्वं), सपक्ष में रहना चाहिए (सपक्षसत्वं) और विपक्ष में नहीं रहना चाहिए (विपक्षव्यावृत्तिः)। अनुमान का स्वार्थ ओर परार्थ भेद सामान्य है। परार्थानुमान के पंचायवयव की नैयायिक परम्परा का मीमांसक खण्डन करते हैं और केवल तीन अवयव को अनुमिति के लिए पर्याप्त मानते हैं। इसलिए प्रतिज्ञा, हेतु और उदाहरण अथवा उदाहरण, उपनय और निगमन से ही काम चल जाता है। अनुमान के विषय को ही साध्य कहा जाता है। कुमारिल के अनुसार अनुमान का विषय न तो केवल लिंगि (अग्नि) है और न केवल पक्ष (पर्वत) बल्कि लिंगि (अग्नि) से विशिष्ट पक्ष (पर्वत) ही अनुमान का विषय है। जिसका अनुमान किया जाता है वह ‘अग्निमान पर्वत’ है। यद्यपि अग्नि का ज्ञान हमें व्याप्तिग्रहण के समय पहले से ही है। इसलिए अग्नि के ज्ञान के लिए किसी अन्य प्रमाण (अनुमान) की आवश्यकता नहीं है किन्तु ‘अग्निमान् पर्वत’ का हमें पहले से ज्ञान नहीं रहता इसलिए इसका ज्ञान ‘अगृहीतग्राहि’ है। इसी प्रकार केवल हेतु से अनुमान संभव नहीं होता, अपितु हेतुविशिष्टपक्ष (धूमवान् पर्वत) से अग्निमान् पर्वत का ज्ञान होता है। हेतु और साध्य के नियत सम्बन्ध को व्याप्ति कहा गया है जो अनिवार्य और अनौपाधिक है। इस सम्बन्ध को बताने के लिए मीमांसा दर्शन में ‘नियम’ शब्द का प्रयोग मीमांसा दर्शन का इतिहास ४०५ किया गया है। व्याप्तिग्रहण के सम्बन्ध में अनेक मत प्रचलित हैं। प्रभाकर के अनुसार धूम और अग्नि के बीच व्याप्ति का ज्ञान प्रथम दृष्टि में ही हो जाता है, भूयोदर्शन की आवश्यकता नहीं है। पश्चात्कालिक निरीक्षणों द्वारा केवल उपाधि का निरास किया जाता है। किन्तु पार्थसारथि मिश्र भूयोदर्शन को आवश्यक मानते हैं। सुचरित मिश्र व्याप्ति को प्रत्यक्ष का विषय मानते हैं, किन्तु यह उचित नहीं क्योंकि प्रत्यक्ष विद्यमान वस्तु का होता है, जबकि व्याप्ति भूत, वर्तमान एवं भविष्य तीनों कालों एवं सभी स्थानों से सम्बन्धित है जो प्रत्यक्ष का विषय नहीं बन सकते। कुमारिल के अनुयायी उम्बेक के अनुसार व्याप्ति का ग्रहण अर्थापत्ति से होता है। परवर्ती भाट्टमीमांसकों ने भूयोदर्शन, उपाधिनिरास, और तक द्वारा व्याप्त ग्रहण को माना है

अनुमान के प्रकार

(१) स्वार्थानुमान और परार्थानुमान का भेद शबरभाष्य में नहीं मिलता। कुमारिल भी इस में भेद को स्वीकारते हुए नहीं प्रतीत होते, यद्यपि वह कहते हैं कि जो व्यक्ति अनुमान द्वारा प्राप्त ज्ञान को किसी अन्य व्यक्ति को बताना चाहता है उसे सर्वप्रथम अपने पक्ष (जिसे वह सिद्ध करना चाहता है) बताना चाहिए। (२) शबरभाष्य में प्रत्यक्षतोदृष्टसम्बन्ध और सामान्यतोदृष्टसम्बन्ध नाम से अनुमान के दो भेद माने गए हैं। धूम से अग्नि का अनुमान प्रथम प्रकार का है और गतिपूर्वक देवदत्त की देशान्तर-प्राप्ति से सूर्य में गति का अनुमान दूसरे प्रकार का है। कुमारिल प्रत्यक्षतोदृष्टसम्बन्ध के स्थान पर ‘विशेषतोदृष्ट’ शब्द का प्रयोग उचित समझते हैं। (३) उद्योतकर द्वारा वर्णित केवलान्वयी, केवलव्यतिरेकि और अन्वयव्यतिरेकि अनुमान में से कुमारिलभट्ट केवल केवलान्वयी अनुमान को स्वीकार करते हैं। अनुमान के दोष को (क) प्रतिज्ञाभास (ख) हेत्वाभास और दृष्टान्तभास के रूप में माना गया है, क्योंकि साध्य, हेतु और पक्ष इन तीनों के निर्दोष होने पर ही अनुमान प्रमाणरूप होता है। प्रतिज्ञाभास के दो रूप हैं- सविशेषण और बाधित। हेत्वाभास तीन प्रकार का माना गया है- १. असिद्ध : स्वरूपासिद्ध, सम्बन्धासिद्ध और व्यतिरेकासिद्ध, आश्रयासिद्ध और व्याप्त्यासिद्ध २. अनैकान्तिक : सत्प्रतिपक्ष और सत्यभिचारी ३. विरुद्ध हेत्वाभास के छः रूप है- धर्मस्वरूपबाध, धर्मविशेषबाध, धर्मिस्वरूपबाध, धर्मिविशेषबाध, उभयस्वरूपबाध और उभयविशेषबाध। दृष्टान्ताभास : दृष्टान्त दो प्रकार के हैं- साधर्म्य और वैधHदृष्टान्त के चार दोषों- साध्यशन्य, हेतुशून्य, उभयशून्य और व्याप्तिशून्य के अतिरिक्त कुमारिल ने एक और दोष बताया है जिसे वह ‘धासिद्ध’ कहते हैं और मानमेयोदयकार नारायण उसे ‘आश्रयहीन’ संज्ञा देते हैं। यद्यपि वैधर्म्य दृष्टान्त को बताना आवश्यक नहीं होता किन्तु जब उसका कथन किया जाता है, तो उसे साध्याभावशून्य, हेत्वाभावशून्य, उभयाभावशून्य और व्याप्तिशून्य नामक दोषों से मुक्त होना चाहिए।४०६ न्याय-खण्ड

३. उपमान

मीमांसा में उपमान को एक स्वतंत्र प्रमाण माना गया है जिसका आधार सादृश्य ज्ञान है। शबर के अनुसार उपमान सादृश्य है जो ऐसे विषय का ज्ञान कराता है जो हमारी इन्द्रियों के संपर्क में नहीं है- ’ उपमानमपि सादृश्यमसन्निकृष्टेऽर्थे बुद्धिमुत्पादयति’। मानमेयोदय के अनुसार दिखाई पड़ने वाली वस्तु के सादृश्य से स्मरण की गई वस्तु के सादृश्य का ज्ञान उपमिति है। प्रभाकर के अनुसार सादृश्य जो कि उपमान का विषय है, द्रव्य, गुण, क्रिया, जाति आदि से भिन्न एक स्वतंत्र पदार्थ है, जबकि कुमारिल इसे समान गुणों के बीच समानता के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानते। कुमारिल, प्रभाकर और अद्वैत वेदान्त के अनुसार जब हम जंगल में ‘गवय’ को देखते हैं तो सादृश्य के बल पर हमें ज्ञान होता है कि ‘गाय गवय के सदृश होती है’ जबकि न्यायमत में गवय को देखकर अतिदेश वाक्य (गवय गाय के समान होता है।) का स्मरण होने पर ‘गाय के सदृश नील गाय (गवय) है’ ऐसा ज्ञान होता है। यदि गवय-दर्शन से गोस्मरण को उपमान मानें तो फिर उपमान प्रमाण ही नहीं होगा क्योंकि यह स्मृति की कोटि में चला जायेगा। अतः शबर में ‘यथा गवयदर्शनं गोस्मरणस्य’ जो उदाहरण दिया उसमें कुमारिल के अनुसार ‘स्मरण’ पद का अर्थ वह बुद्धि है जो स्मरण अंश और नूतन ज्ञान के अंश से युक्त है। अतः सादृश्य से युक्त स्मृत विषय का ज्ञान ही उपमिति है। जो व्यक्ति कभी गवय को नहीं देखा है किन्तु गाय को देखा है वह जंगल में जब प्रथम बार गवय का प्रत्यक्ष करता है तो उसे सद्यः यह ज्ञात होता है कि ‘गवय गाय के सदृश होता है’ इसके अनन्तर उसके मन में जो यह ज्ञान उत्पन्न होता है कि ‘स्मरण की गई गाय गवय के सदृश है’ वह उपमानजन्य है।

४. शब्द प्रमाण

शबरभाष्य में शब्द प्रमाण का लक्षण बताते हुए कहा गया है कि ‘पदों के अर्थ को जानने वाले श्रोता के मन में किसी असन्निकृष्ट (परोक्ष) विषय का ज्ञान उत्पन्न करने वाला वाक्य शब्द प्रमाण है’- ‘शास्त्रं शब्दविज्ञानादसन्निकृण्टेऽर्थे विज्ञानम्’ । वाक्य दो प्रकार के होते हैं- पौरुषेय और अपौरुषेय। पौरुषेय वाक्य तभी प्रामाणिक होते हैं जब वक्ता कोई आप्तपुरुष हो। अपौरुषेय वाक्य तो स्वयं वेदवाक्य हैं जो स्वतः प्रमाणित हैं। वाक्य दो प्रकार के होते हैं- (१) जो किसी सत्ता वाले पदार्थ का कथन करते हैं, उन्हें ‘सिद्धार्थवाक्य’ कहते हैं और (२) वे जो अनुष्ठान के कर्त्तव्य का विधान करते हैं उन्हें ‘विधायक वाक्य’ कहते हैं। जैसे- ‘स्वर्गकामो यजेत्’। मीमांसा के अनुसार ‘सिद्धार्थवाक्य’ (जैसे ‘सत्यं ज्ञानमनन्तं ब्रह्म’) भी अन्ततः विधि की ओर ही श्रोताओं को प्रेरित करते हैं। यहाँ ज्ञानबोधक वाक्यों का पर्यवसान विधिवाक्यों में ही माना गया है। शब्द नित्य हैं। वेद नित्य और अपौरुषेय हैं। प्रभाकर पौरुषेय वाक्य को शब्द प्रमाण नहीं मानते, क्योंकि मनुष्य में बहुत दोष हैं। और फिर वे मीमांसा दर्शन का इतिहास ४०७ उसी ज्ञान को संप्रेषित करते हैं जिसे उन्होंने अन्य-अन्य प्रमाणों से जाना है, किन्तु कुमारिल प्रभाकर के इस मत से सहमत नहीं हैं। बौद्ध और वैशेषिक शब्द को स्वतंत्र प्रमाण न मानकर उसका अन्तर्भाव अनुमान में करते हैं। कुमारिल इस मत का खण्डन करते हुए कहते हैं कि शब्दप्रमाण की रचना ‘पद’ नहीं अपि तु वाक्य करते हैं और यदि हम मान भी लें कि पद के अर्थ का ज्ञान अनुमान से होता है तो भी किसी वाक्य को सुनकर होने वाला तथ्य का ज्ञान अनुमानजन्य नहीं है। वाक्यार्थ के लिए वाक्यगत पदों में आकांक्षा, योग्यता और सन्निधि का होना आवश्यक है, जिनके बिना वाक्य सार्थक नहीं हो सकता। शाब्दबोध के सन्दर्भ में प्रभाकर और कुमारिल में मतभेद है। कुमारिल अभिहितान्वयवाद को और प्रभाकर अन्विताभिधानवाद को मानते हैं। कुमारिल के अनुसार पदों के वाच्यार्थ की उपपत्ति तभी संभव हो सकती है जबकि उनका एक विशिष्ट अर्थ में पर्यवसान हो। जब हम ‘गामानय’ इस वाक्य का अभिधान करते हैं तो ‘गौ’ और ‘आनय’ का परस्पर अन्वय अवगत हो जाता है। और अवगत पदार्थ वाक्यस्थ पदों के द्वारा अन्वय का लाभ करते हैं। किन्तु प्रभाकर के अन्विताभिधानवाद के अनुसार सभी पद इतर पदार्थ से अन्वित पदार्थ का अभिधान करते हैं, शुद्ध अर्थ का नहीं। ‘गामानय’- के प्रथम श्रवण के द्वारा यही अवगत होता है कि ‘गो’ पद उसी ‘गौ’ का बोधक है जो आनीयमान है और ‘आनय’ पद उसी ‘आनयन’ क्रिया का वाचक है जो गौ में हो रही है। अतः उसी के अनुसार पदों को ही अन्वय विशिष्ट अर्थ का वाचक मानना न्यायोचित है।

अर्थापत्ति प्रमाण

मीमांसक और अद्वैत वेदान्ती अर्थापत्ति को स्वतन्त्र प्रमाण मानते हैं। किसी दृष्ट अथवा श्रुत विषय की उपपत्ति के लिए जो अर्थान्तर की कल्पना की जाती है उसे अर्थापत्ति कहते हैं। जैसे-जीवित देवदत्त को घर में न पाकर उसके ‘बाहर होने की कल्पना अथवा देवदत्त को मोटा देखकर और यह जानकर कि वह दिन में भोजन नहीं करता-उसके मोटापन की उपपत्ति के लिए रात्रि-भोजन की कल्पना। शबर ने अर्थापत्ति का लक्षण इस प्रकार दिया- “अर्थापत्तिरपि दृष्टः श्रुतो वार्थोऽन्यथा नोपपद्यते इत्यर्थकल्पना, यथा जीवितो देवदत्तस्य गृहाभावदर्शनेन बहिर्भावस्यादृष्टस्य कल्पना”। कुमारिल के अनुसार वह तथ्य जो अर्थापत्ति को अन्य प्रमाणों से भिन्न करता है, दृष्ट अथवा ज्ञात विषय में विद्यमान ‘अव्याख्येयता’ है। पार्थसारथि के अनुसार जब हम देखते हैं कि कोई ज्ञात तथ्य बिना किसी अन्य तथ्य के संभव नहीं होता तो उसकी उपपत्ति के लिए इस दूसरे तथ्य की कल्पना ही अर्थापत्ति है। जैसे देवदत्त का जीवित रहना और गृह में उपस्थित न होना - दो परस्पर विरोधी ४०८ न्याय-खण्ड तथ्य हैं जिनकी व्याख्या के लिए उसके ‘बहिर्भाव’ की कल्पना करनी पड़ती है, जो उसके गृहाभाव की उपपत्ति को संभव बनाता है। दृष्टार्थापत्ति और श्रुतार्थापत्ति - कुमारिल के अनुसार भाष्यस्थ लक्षण दो प्रकार की अर्थापत्ति का द्योतक है। पुनः वह दृष्ट अर्थापत्ति के ५ प्रकार बताते हैं :- १. प्रत्यक्ष पूर्विका २. अनुमानपूर्विका ३. शब्दपूर्विका ४. अर्थापत्तिपूर्विका और ५. अभावपूर्विका। दहन-क्रिया को देखकर अग्नि में दाह-शक्ति की कल्पना प्रत्यक्षपूर्विका है, देशान्तर-प्राप्ति से सूर्य में गतिशक्ति की कल्पना अनुमानपूर्विका है। ‘मोटा देवदत्त दिन में भोजन नहीं करता’ इस शब्द से ‘रात्रिभोजन’ की कल्पना शब्दपूर्विका है क्योंकि कथन में ‘रात्रि भोजन’ शब्द नहीं आया है। हम उपमान से जानते हैं कि गाय गवय के सदृश होती है, किन्तु यह ज्ञान पहली बार गाय को देखने से क्यों नहीं हुआ और अब गवय को देखने से होता है- इस अनुपपन्नता का समाधान हो जाता है हम गाय में किसी ऐसी शक्ति की कल्पना करें जो कि गवय का प्रत्यक्ष होने पर व्यक्त होती है और गवय के साथ सादृश्य के ज्ञान को उत्पन्न करती है। ‘शब्द की नित्यता की कल्पना’ अर्थापत्तिपूर्विका है। भाष्यस्थ लक्षण में देवदत्त के ‘बहिर्भाव’ की कल्पना अभावपूर्विका अर्थापत्ति का उदाहरण है। पुनश्च प्रभाकर का मत कुमारिल से भिन्न है। प्रभाकर का कहना है कि देवदत्त का गृहाभाव अनुपपन्न नहीं है बल्कि उसका ‘भाव’ ही अनुपपन्न है जब तक कि उसके बर्हिभाव की कल्पना न की जाय। सभी मीमांसक अर्थापत्ति को अनुमान से भिन्न स्वतंत्र प्रमाण मानते हैं।

६. अनुपलब्धि

कुमारिल भट्ट ने अनुपलब्धि को एक स्वतंत्र प्रमाण माना है। प्रभाकर अनुपलब्धि को स्वतंत्र प्रमाण न मानकर इसका अन्तर्भाव प्रत्यक्ष में करते हैं। जब भूतल पर घट रहता है तो हम उसका प्रत्यक्ष ग्रहण करते हैं, किन्तु ‘भूतले घटो नास्ति’ इस प्रकार का ज्ञान हमें प्रत्यक्ष से कैसे हो सकता है, क्योंकि यहाँ घटाभाव के साथ इन्द्रिय सन्निकर्ष संभव नहीं है। अतः कुमारिल इस घटाभाव के ज्ञान के साधन को अनुपलब्धि प्रमाण मानते हैं। शबरभाष्य में अभाव-प्रमाण का लक्षण इस प्रकार दिया गया है “अभावोऽपि प्रमाणाभावो ‘नास्ति’ इत्यस्यार्थस्यासंनिकृष्टस्य” मी अभाव अर्थात् प्रमाण का अभाव ‘नास्ति’ शब्द से व्यवहृत होने वाले अभाव स्वरूप अर्थ का ज्ञापक स्वतंत्र प्रमाण ही है क्योंकि ‘नास्ति’ शब्द से व्यवहृत होने वाला वह अभव पदार्थ प्रत्यक्षादि पाँच प्रमाणों से असंनिकृष्ट अर्थात् अगम्य है। मानमेमोदयकार के अनुसार-यह ज्ञानाभाव रूप अनुपलम्भ अभाव-प्रमा का करण होने से अभाव प्रमाण कहा जाता है। कुमारिल ने अभाव को एक स्वतंत्र पदार्थ माना और उसके चार प्रकार बताये मीमांसा दर्शन का इतिहास ४०६ १. प्रागभाव- उत्पत्ति के पूर्व कार्य का कारण में अभाव प्रागभाव है जैसे दही का दूध २. प्रध्वंसाभाव- उत्पत्ति के बाद कार्य में कारण का अभाव-जैसे मृत्यु के बाद मनुष्य का अभाव प्रध्वंसाभाव है। अन्योन्याभाव- ‘यह गाय अश्व नहीं है’ ‘यह अश्व गाय नहीं है। इस प्रकार की प्रतीति अन्योन्याभाव है। ४. अत्यन्ताभाव- आकाश-कुसुम गोल-वर्ग, शशविषाण, बन्ध्या-पुत्र अत्यन्ताभाव के उदाहरण है। प्रभाकर अभाव को स्वतंत्र प्रमाण नहीं मानते। नैयायिक भी घटाभाव को विशेषण-विशेष्य-भाव सन्निकर्ण से संभव मानते हैं। प्रभाकर के अनुसार न तो अभाव एक स्वतंत्र पदार्थ है और न अनुपलब्धि एक स्वतंत्र प्रमाण। ‘भूतले घटो नास्ति’ इत्याकारक ज्ञान यथार्थ है, किन्तु यहाँ ‘नास्ति’ के अनुरूप कोई तथ्य नहीं है। सत्ता सदैव भावात्मक होती है और अभावात्मक कथन इसे जानने का विषयिगत प्रकार है। अभावात्मक कथन इसलिए सत्य नहीं है कि इसके अनुरूप अभावात्मक तथ्य है, अपि तु इसलिए कि यह परोक्षरीति से भावात्मक तथ्य को ही बताता है। कुमारिल प्रभाकर के मत का खण्डन करते हैं और अभाव प्रमाण की आवश्यकता को विभिन्न युक्तियों से प्रतिपादित करते हैं। यदि हम अभावात्मक कथन को स्वीकार न करें तो दही में दूध नहीं है, गाय अश्व नहीं है, और आत्मा में रूप नहीं है- इनके विरोधी कथन- दही में दूध है, गाय अश्व है और आत्मा में रूप है- इत्यादि भी सत्य हो जायेंगे। इस प्रकार की विसंगति को दूर करने के लिए हमें अभावात्मक तथ्य को मानना पड़ता है। कारण-कार्य और वस्तुओं के बीच भेद अभाव की अवधारणा पर आधारित है। अभाव के चार प्रकार हैं। यदि अभाव असत् होता तो उसके प्रकार न होते। कुमारिल अभाव का ग्रहण मन द्वारा मानते हैं न कि प्रत्यक्ष और स्मृति द्वारा। वह विशेषणविशेष्यभाव सन्निकर्ष को भी नहीं मानते। अतः अभाव का ज्ञान अनुपलब्धि प्रमाण से संभव है।

४ तत्त्वमीमांसा

मीमांसा की तत्त्वमीमांसा परिमाणात्मक एवं गुणात्मक दोनों दृष्टि से बहुवादी है। जगत् सत्य है, मिथ्या नहीं। जगत् का न आदि है और न अन्त। जगत् के सभी पदार्थ यथार्थ हैं। आत्मायें सत्य हैं और वे अनेक हैं। मीमांसा कर्मप्रधान विश्व को मानता है अतः वह बाह्यार्थवादी और बहुवादी है। कुमारिल ने निरालम्बनवाद एवं शून्यवाद दोनों का खण्डन किया है। _ कुमारिल के अनुसार पदार्थों की संख्या पाँच है। वे हैं- द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य और अभाव। इनमें प्रथम चार भाव पदार्थ हैं। अभाव पदार्थ के भी चार विभाग हैं प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अन्योन्याभाव और अत्यन्ताभाव। ALY ४१० न न्याय-खण्ड __ कुमारिल के विपरीत प्रभाकर आठ पदार्थों की सत्ता मानते हैं। वे हैं- द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, परतन्त्रता, शक्ति, सादृश्य और संख्या। परतन्त्रता वैशेषिकों के समवाय के समान है। प्रभाकर ने इसे परतन्त्रता नाम दिया, क्योंकि जाति व्यक्ति के आश्रित (परतंत्र) है और कर्म तथा गुण द्रव्य के आश्रित (परतंत्र) हैं। परतन्त्रता समवाय नहीं है। वैशेषिकों ने समवाय को नित्य सम्बन्ध माना है, किन्तु परतन्त्रता नित्य संबंध नहीं है। यदि जाति और व्यक्ति के मध्य के सम्बन्ध को नित्य मान लिया जाये तो फिर उनमें से किसी का नाश नहीं हो सकेगा। किन्तु व्यक्ति नष्ट होते हुये देखे जाते हैं। वैशेषिकों के विशेष को प्रभाकर ने पृथक्त्व गुण में अन्तर्भूत कर लिया है तथा अभाव को वह स्वतंत्र पदार्थ नहीं मानता। प्रभाकर के अनुसार शक्ति एवं सादृश्य पृथक् पदार्थ हैं, क्योंकि उनकी उपलब्धि द्रव्य के अतिरिक्त गुण एवं कर्म में भी होती है। यदि दो द्रव्यों, दो गुणों एवं दो कर्मों के मध्य सादृश्य होता है तो वह कदापि स्वयं द्रव्य, गुण या कर्म नहीं हो सकता। अतः शक्ति और सादृश्य स्वतंत्र पदार्थ है। नैयायिकों एवं भाट्ट मीमांसकों ने संख्या को गुण माना है। प्रभाकर के अनुसार यह उचित नहीं, क्योंकि यदि ‘दो फल’ में द्वित्व दोनों फलों का गुण है तो इसे दोनों में पृथक्-पृथक् होना चाहिये। यदि द्वित्व गुण दोनों वस्तुओं में पृथक्-पृथक् नहीं है तो दोनों में सम्मिलित रूप से कैसे रह सकता है। अतः संख्या को स्वतंत्र पदार्थ मानना आवश्यक है। कुमारिल ने सादृश्य का द्रव्य में तथा शक्ति और संख्या का गुण में अन्तर्भाव किया है। शक्ति को स्वतंत्र पदार्थ मानने में भी कुमारिल को कोई आपत्ति नहीं दीखती। समवाय का पूर्ण निषेध कुमारिल ने किया है। अवयव-अवयवी, गुण-गुणी, क्रिया-क्रियावान् तथा जाति-व्यक्ति में कुमारिल ने तादात्म्य सम्बन्ध सिद्ध किया है।

द्रव्य

परिमाण के आश्रय को द्रव्य कहते हैं। अणुत्व, महत्त्वादि को परिमाण कहते हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, दिक्, काल, आत्मा, मन, तम और शब्द द्रव्य के ग्यारह भेद हैं। कुमारिल सादृश्य की भी गणना द्रव्य में करते हैं। सादृश्य द्रव्य है क्योंकि उसमें न्यूनाधिकता का गुण पाया जाता है। प्रभाकर ने वैशेषिक सम्मत नौ द्रव्यों को ही स्वीकार किया है।

पृथिवी

पृथिवी गन्धवती होती है। उसका स्वरूप पर्वत, वृक्षादि रूप है। जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज्ज भेद से उसका चार प्रकार का शरीर है। ये शरीर आत्मा के सुख-दुःख उपभोग के साधन हैं। घ्राणेन्द्रिय भी पार्थिव है, इसीलिये घ्राणेन्द्रिय पृथिवी के विशेष गुण गन्ध के प्रत्यक्ष में समर्थ हो पाती है। प्रभाकर उद्भिज्ज शरीर को नहीं मानते क्योंकि वे इन्द्रिय के आयतन नहीं होते। किन्तु यह कहना उचित नहीं है, क्योंकि वृक्षादि OL १. मानमेयोदय, पृष्ठ-२६१, श्लोकवार्त्तिक, प्रत्यक्षसूत्र, पृष्ठ-१४६ २. प्रकरणपंजिका, पृष्ठ- ८१ ३. प्रकरणपंजिका, पृष्ठ-३३० मीमांसा दर्शन का इतिहास ४११ को भी सुख-दुःख का अनुभव होता है। श्रुति भी कहती है- ‘तस्मात् पश्यन्ति पादपाः’। अतः चतुर्विध शरीर हैं।

जल

स्वाभाविक द्रवत्व के अधिकरण को जल कहते हैं। सरित्, समुद्र, सरोवर, करका, रसनेन्द्रिय इत्यादि इसके स्वरूप हैं।

तेज

उष्ण स्पर्श गुण वाला तेज है। सूर्य, चन्द्र, अग्नि, नक्षत्र, सुवर्ण और चक्षुरिन्द्रिय उसके स्वरूप हैं। उसके रूप और स्पर्श उद्भूत, अनुद्भूत और अभिभूत भेद से तीन प्रकार के हैं। तप्त अयः पिण्ड में उद्भूत रूप और स्पर्श, नयनेन्द्रिय में अनुभूत रूप और स्पर्श तथा सुवर्ण में अभिभूत रूप और स्पर्श रहते हैं। पार्थिव रूपादि के बलवान् होने के कारण सुवर्ण में तेज का रूप और स्पर्श अभिभूत रहता है।’

वायु

जो रूपरहित होते हुये स्पर्शवान् हो उसे वायु कहते हैं। मन्दवात, निःश्वास, त्वगिन्द्रिय आदि उसके रूप हैं। पृथिवी, जल, तेज और वायु के इन्द्रिय रूप का ज्ञान अर्थापत्ति प्रमाण से होता है। इन्द्रिय के अतिरिक्त अन्य रूपों का ज्ञान प्रत्यक्ष से होता है। पृथिवी, जल और तेज के प्रत्यक्ष में कोई विवाद नहीं है। किन्तु वायु के विषय में नैयायिकों का कहना है कि अनुष्णाशीतस्पर्शलिंगक अनुमान से वायु का ज्ञान होता है। मीमांसक वायु का भी प्रत्यक्ष त्वगिन्द्रिय से मानते हैं। क्योंकि ‘यह शीत वायु है’, ‘यह उष्ण वायु है’, ‘यह अनुष्णाशीत वायु है’ इन प्रतीतियों में एक ही वायु द्रव्य की प्रत्यभिज्ञा होती है।

तम

अस्पर्शवान होते हुये जो रूपवान् हो उसे तम कहते हैं। यह प्रकाश के न होने पर दिखलायी देनेवाला काले रंग का द्रव्य है। इसका नेत्रेन्द्रिय से प्रत्यक्ष होता है। तम मात्र प्रकाशाभाव नहीं है वरन् एक स्वतंत्र भावरूप द्रव्य है, क्योंकि इसमें नील गुण एवं गमन क्रिया की प्रतीति होती है। प्रभाकर तम को न्यायवैशेषिक के समान प्रकाशाभावरूप मानते है

आकाश

यह नित्य, निरवयव, एवं विभु द्रव्य है। विभु होने पर भी आकाश उपाधिवशात्, घटाकाश, मठाकाश इत्यादि भेद-व्यवहार का विषय बनता है। कर्णशष्कुलि जब आकाश की उपाधि बनती है तब वह श्रोत्रेन्द्रिय कहलाता है। नैयायिक एवं प्रभाकर आकाश को शब्द-गुणक कहते हैं और उसे अनुमान से सिद्ध करते हैं। किन्तु भाट्टमत के अनुसार शब्द स्वयं द्रव्य है और निराश्रय है। आकाश का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है।

दिक्

प्राक्, प्रत्यक् इत्यादि अवच्छेद व्यवहार का हेतु दिक् है। यह एक, नित्य, निरवयव और सर्वगत है। सर्वगत होने पर भी उपाधि के कारण इसके पूर्व, पश्चिम आदि भेद दिखते है। पूर्व, पश्चिम आदि की प्रतीति केवल नेत्र के अधीन होने के कारण दिक् का प्रत्यक्ष भाट्ट अभिमत है। प्रभाकर दिक् को भी अनुमेय मानते हैं।

काल

काल भी एक, नित्य, निरवयव, विभु और प्रत्यक्षज्ञात द्रव्य है। इसके भी १. मानमेयोदय, पृष्ठ- १५५ २. प्रकरणपंजिका, पृष्ठ- ३२३ ४१२ न्याय-खण्ड उपाधि के कारण भेद होते हैं। जैसे- पचास निमेषों की एक काष्ठा, तीस काष्ठाओं का एक मुहूर्त, तीस मुहूत्रों का एक अहोरात्र, तीस अहोरात्र का एक मास, बारह मास का एक संवत्सर होता है। प्रभाकर के मतानुसार काल का अनुमान होता है।

आत्मा

मीमांसा का आत्मविषयक विचार वस्तुवादी एवं बहुवादी है। मीमांसा के लिये शरीर से भिन्न आत्मा के अस्तित्व का निर्धारण आवश्यक है, क्योंकि किसी ऐसे द्रव्य के अभाव में ‘वैदिक यज्ञों का अनुष्ठाता स्वर्ग जाता है’- आदि वेदवाक्य निरर्थक हो जाते। अतः प्रभाकर एवं कुमारिल दोनों ही अनेक आत्माओं को मानते हैं। यह आत्मा नित्य और सर्वगत है। यह वास्तविक जगत् में वास्तविक शरीर से संबद्ध रहता है तथा मृत्यु के उपरान्त कर्मफल भोगने के लिये विद्यमान रहता है। आत्मा चैतन्य का आश्रय है। यही वास्तविक ज्ञाता, कर्ता और भोक्ता है। यही स्वर्ग तथा अपवर्ग का अधिकारी है। आत्मा शरीर, इन्द्रिय, मन एवं बुद्धि से भिन्न है। आत्मा भोक्ता है, शरीर भोगायतन है, इन्द्रियां भोग्यसाधन हैं और आन्तरिक तथा बाह्य विषय भोग्य विषय हैं। आत्मा अहं प्रत्यय से अभिन्न है। ज्ञान एक क्रिया है जिसका आश्रय आत्मा है। कुमारिल’ आत्मा में विकार स्वीकृत करते हैं। क्रिया दो प्रकार की होती है- स्पन्द (स्थान-परिवर्तन) और परिणाम (रूप-परिवर्तन) आत्मा में स्पन्द नहीं होता, किन्तु परिणाम होता है। परिणामी वस्तु होने पर भी आत्मा नित्य है। आत्मा में चित् और अचित् दो अंश होते हैं। चिदंश से वह प्रत्येक ज्ञान का अनुभव करता है और अचित् अंश से परिणाम को प्राप्त होता है। चैतन्य को वेदान्तियों के समान मीमांसक आत्मा का स्वरूप नहीं मानते। प्रभाकर के अनुसार आत्मा स्वरूपतः जड है। चैतन्य आत्मा का औपाधिक गण है जो अवस्था-विशेष में उत्पन्न होता है। सुषुप्ति तथा मोक्ष की अवस्था में चैतन्य नहीं रहता। प्रभाकर के विपरीत कुमारिल आत्मा को जडबोधात्मक या चिदचिद् रूप मानते हैं। आत्मा ज्ञानशक्तिस्वभाव है। आत्मा का ज्ञान किस प्रकार होता है? इसमें भी प्रभाकर एवं कुमारिल में मतभेद है। प्रभाकर के अनुसार प्रत्येक ज्ञान में ज्ञाता, ज्ञेय एवं ज्ञान रूपी त्रिपुटी का बोध होता है। आत्मा ज्ञाता है, वह किसी भी ज्ञान में ज्ञाता और ज्ञेय दोनों नहीं हो सकता। किसी भी क्रिया में कर्ता और कर्म कदापि एक नहीं हो सकते (कर्मकर्तृविरोध)। आत्मा यद्यपि जड़ है और उसके बोध के लिये किसी ज्ञान का होना आवश्यक है किन्तु यह ज्ञान कोई स्वतंत्र ज्ञान नहीं है। किसी भी वस्तु का ज्ञान होने पर आत्मा का ज्ञान कर्ता के रूप में स्वतः हो जाता है। यदि आत्मा का ज्ञाता के रूप में प्रत्येक ज्ञान में प्रकाश स्वीकार नहीं किया जायेगा तो मेरे ज्ञान और दूसरे व्यक्ति के ज्ञान में कोई अन्तर नहीं रह जायेगा। अतः प्रत्येक ज्ञान में आत्मबोध होता ही है। आत्मा अहंप्रत्ययवेद्य है। कुमारिल के अनुसार प्रत्येक १. श्लोकवार्त्तिक, आत्मवाद २. प्रकरणपंजिका, पृष्ठ-३३३ ३. श्लोकवार्त्तिक, आत्मवाद, पृष्ठ- १०७ मीमांसा दर्शन का इतिहास ४१३ ज्ञान में आत्मा का बोध नहीं होता। जब हम आत्मा पर विचार करते हैं तब अपना बोध होता है कि मैं हूं, इसे ‘अहं वित्ति’ कहते हैं। प्रत्येक व्यक्ति को यह अनुभव होता है कि ‘मैं स्वयं को जानता हूँ’। इस ज्ञान में आत्मा एक साथ ज्ञाता और ज्ञेय होता है। वैदिक विधि ‘आत्मानं विद्धि’ और लौकिक व्यवहार कि ‘मैं स्वयं को जानता हूँ’ सिद्ध करते हैं कि आत्मा को एक साथ कर्ता और कर्म मानने में कोई विरोध नहीं है। अतः आत्मा मानस प्रत्यक्षगम्य है। दूसरों की आत्माओं का ज्ञान अनुमान द्वारा होता है। मगर

मन

मन नित्य, निरवयव और विभु द्रव्य है। विभु होने के कारण इसमें स्पन्द (स्थान-परिवर्तन) नहीं होता। सुखादि आत्मगुणों के प्रत्यक्ष में साधनभूत इन्द्रिय के रूप में इसकी कल्पना की गई है। बाह्य पदार्थों का ज्ञान बाह्येन्द्रियों के द्वारा आत्मा एवं मन के संयोग से होता है। मन के विभुत्व की सिद्धि में भाट्ट मीमांसकों’ ने तीन तर्क दिये हैं (१) मन का स्पर्श संभव नहीं है, (२) मन का न तो आरम्भ हुआ है और न ही यह किसी का आरम्भक है, (३) मन ज्ञान के असमवायिकारण के संयोग का आधार है। अतः आत्मा के समान मन भी सर्वगत है। मन का प्रत्यक्ष नहीं होता। कुमारिल के मत के विपरीत प्रभाकर मीमांसकों ने मन को अणु परिणाम ही माना है।

शब्द

शब्द केवल श्रोत्रेन्द्रिय से ग्राह्य, शब्दत्व जातिमान्, नित्य और सर्वगत द्रव्य है। शब्द को नैयायिक आकाश का गुण कहते हैं, किन्तु यह ठीक नहीं है। शब्द का द्रव्यत्व प्रमाण से सिद्ध है। सर्वत्र ही गुण में साश्रयता प्रतीत होती है, किन्तु शब्द की प्रतीति निराश्रयतया होती है। शब्द का ज्ञान घड़े के ज्ञान के समान साक्षात् इन्द्रिय संबंध से होता है। शब्द विभु है क्योंकि इसका स्पर्श सम्भव नहीं, इसका आरम्भ नहीं और यह किसी का आरम्भक नहीं, इसका अवयव नहीं, अतः शब्द आत्मा के समान नित्य, विभु और द्रव्य है। शब्दात्मक वेद की नित्यता के प्रतिपादक मीमांसकों के लिये शब्द की नित्यता का प्रतिपादन उचित ही है। यह नित्य शब्द वर्णात्मक है।

  • शब्द का दूसरा रूप ध्वनि है। ध्वन्यात्मक शब्द को गुण एवं अनित्य माना गया है। यही ध्वन्यात्मक शब्द वर्णात्मक शब्द का अभिव्यंजक है। यह ध्वनि रूप शब्द वायु का गुण है, आकाश का नहीं, क्योंकि वायु के अभिघात से इसकी उत्पत्ति होती है। वाचक, अवाचक भेद से ध्वनि-रूप शब्द के दो भेद हैं। ‘अवाचक शब्द’ भेरी आदि बजाने पर उत्पन्न होने वाली ध्वनि से अभिव्यक्त होता है। ‘वाचक शब्द’, वर्णात्मक है और तालु आदि के व्यापार से जन्य ध्वनि के द्वारा अभिव्यक्त होता है। प्रभाकर के अनुसार शब्द आकाश का गुण है। उपरोक्त ११ द्रव्यों को भाट्ट-मतावलम्बी मीमांसकों ने स्वीकार किया है। इन द्रव्यों में पृथ्वी, जल, तेज, वायु और तम को परमाणुमय १. मानमेयोदय, पृष्ठ-२१४ २. मनश्च्चाऽन्तश्शरीरं परमाणुपरिमाणम्, प्रकरणपंजिका, पृष्ठ- ३३२ ४१४ न्याय-खण्ड माना गया है और आत्मा सहित शेष द्रव्यों को विभु स्वीकार किया गया है। इन परमाणुओं का संचालन कर्म के स्वाभाविक नियम के अनुसार होता है। इन परमाणुओं का प्रत्यक्ष होता है। न्याय-वैशेषिक के मत में परमाणु प्रत्यक्ष योग्य न मानकर अनुमेय माने गये हैं। किन्तु मीमांसक नेत्रगोचर कणों को ही परमाणु मानता है और इनसे सूक्ष्म कणों की कल्पना में कोई प्रमाण नहीं देखता। योगियों का प्रत्यक्ष भी सूक्ष्मतर कणों की सिद्धि में प्रमाण नहीं है, क्योंकि मीमांसक योगज प्रत्यक्ष को साधारण प्रत्यक्ष से भिन्न नहीं मानता है। योगज प्रत्यक्ष भी साधारण प्रत्यक्ष के समान इन्द्रिय-सन्निकर्ष से जन्य होता है और योगियों का इन्द्रिय भी साधारण व्यक्तियों के इन्द्रिय के समान अतीन्द्रियविषयक नहीं होता है।

गुण

गुण की परिभाषा देते हुये मीमांसक कहते हैं कि जो कर्म से भिन्न, अवान्तर जातियों से युक्त तथा उपादान कारण नहीं हो वही गुण है। रूप, रस, गन्ध, स्पर्श, संख्या, परिमाण, पृथक्त्व, संयोग, विभाग, परत्व, अपरत्व, गुरुत्व, द्रवत्व, स्नेह, बुद्धि, सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न, संस्कार, ध्वनि, प्राकट्य, शक्ति, ये चौबीस गुण हैं।’ यद्यपि वैशेषिक दर्शन में भी २४ गुण स्वीकृत हैं किन्तु वे ध्वनि, प्राकट्य एवं शक्ति को गुण नहीं मानते। धर्म, अधर्म एवं शब्द को वैशेषिकों ने गुण माना है। मीमांसक शब्द की गणना द्रव्य में करते हैं तथा धर्म, अधर्म का अन्तर्भाव शक्ति में हो जाता है। प्रभाकर ने संख्या को पृथक् पदार्थ माना है

रूप

केवल चक्षरिन्द्रिय से जिसका ग्रहण हो उसे रूप कहते हैं। वह पृथ्वी, जल, तेज और अन्धकार में रहने वाला विशेष गुण है। शुक्ल, कृष्ण, पीत, रक्त और नील भेद से उसके पांच प्रकार हैं। इसके असंख्य अवान्तर भेद हैं।

रस

केवल रसनेन्द्रिय से जिसका ग्रहण होता है उसे रस कहते हैं। यह पृथ्वी और जल में रहता है। मधुर, तिक्त, अम्ल, कषाय, कटु और लवण इसके भेद हैं। इसके भी अवान्तर भेद अनेक हैं।

गन्ध

केवल घ्राणेन्द्रिय से जिसका ग्रहण होता है उसे गन्ध कहते हैं। यह केवल पृथ्वी में रहता है। सुगन्ध, दुर्गन्ध और साधारणगन्ध भेद से इसके तीन प्रकार हैं। जल, वायु आदि में इसकी प्रतीति पृथिवी के संबंध के कारण होती है।

स्पर्श

केवल त्वगिन्द्रिय से जिसका ग्रहण होता है उसे स्पर्श कहते हैं। यह पृथिवी, जल, तेज, वायु में रहता है। शीत, उष्ण एवं अनुष्णाशीत इसके तीन भेद हैं।

संख्या

एकत्वादि व्यवहार हेतु को संख्या कहते हैं। सभी द्रव्यों में रहने वाला यह सामान्य गुण है। एक से लेकर परार्धपर्यन्त यह अनेक है।

परिमाण

मान व्यवहार का हेतु परिमाण है। यह भी सभी द्रव्यों में रहने वाला १. मानमेयोदय, पृष्ठ- २४० मीमांसा दर्शन का इतिहास ४१५ सामान्य गुण है। अणु, महत, दीर्घ आदि इसके भेद हैं। अणु परिमाण परमाणुओं में, महत् परिमाण गगन आदि में तथा अन्य इतर द्रव्यों में रहते हैं।

पृथक्त्व

‘यह इससे पृथक् है’ इस व्यवहार का कारण पृथक्त्व गुण है जो सब द्रव्यों में रहता है। प्रभाकर नित्यद्रव्यों में पृथक्त्व गुण स्वीकार करते हैं, किन्तु कार्यद्रव्यों में उसकी आवश्यकता नहीं समझते। कुमारिल के मतानुसार कार्य द्रव्यों में भी चूंकि भेद की प्रतीति होती ही है अतः उनमें भी पृथक्त्व गुण अवश्य स्वीकरणीय है।

संयोग

संयुक्त व्यवहार का हेतु संयोग गुण है। यह भी सब द्रव्यों में रहता है। नित्य और अनित्य के भेद से उसके दो प्रकार हैं। नित्य संयोग आकाश, काल आदि नित्य एवं विभु द्रव्यों के बीच होता है। अनित्य संयोग त्रिविध है:- अन्यतरकर्मज, उभयकर्मज और संयोगज।

विभाग

विभक्त प्रत्यय का हेतु विभाग है। यह केवल परिच्छिन्न द्रव्यों में ही रहता है। अन्यतरकर्मज, उभयकर्मज और संयोगज भेद से इसके भी तीन प्रकार है।

परत्वापरत्व

पर और अपर के व्यवहार का साधारण कारण परत्व और अपरत्व गुण है। यह गुण देशकृत और कालकृत दो प्रकार का है। दूर स्थित वस्तु में पर की प्रतीति और समीपस्थित वस्तु में अपर की प्रतीति देशकृत हैं। वृद्ध पुरुष में प्रतीयमान परत्व तथा युवक में प्रतीयमान अपरत्व कालकृत हैं।

गुरुत्व

पतन का असमवायिकारण गुरुत्व गुण है। यह पृथ्वी और जल में रहता

द्रवत्व

बहने का असमवायिकारण द्रवत्व गुण है, जो पृथ्वी, जल और तेज में रहता है। द्रवत्व जल का स्वाभाविक गुण है। पृथ्वी और तेज में यह निमित्त द्वारा उत्पन्न होता है। पृथ्वी में कभी जल के संयोग से तथा कभी मोम, लाख आदि द्रव्यों में अग्नि के संयोग से द्रवत्व होता है। तेज में द्रवत्व अग्निसंयोग से होता है, जैसे सुवर्ण में। जो लोग सुवर्ण को पार्थिव मानते हैं, तैजस नहीं, उनके अनुसार द्रवत्व मात्र पृथ्वी और जल का गुण है।

स्नेह

स्निग्धत्वादि प्रत्यय का विषय स्नेह गुण है, जो जल में रहता है।

बुद्धि

समस्त व्यवहार के हेतु को बुद्धि कहते हैं। वह अनुमान या अर्थापत्ति प्रमाण से जाना जाता है। प्रभाकर के मत में त्रिपुटी प्रत्यक्ष को स्वीकार किया गया है, अतः ज्ञान का प्रत्यक्ष होता है। मुरारिमिश्र नैयायिकों के समान ज्ञान का ग्रहण ‘अनुव्यवसाय’ से मानते हैं। किन्तु कुमारिल ज्ञान को अतीन्द्रिय कहते हैं। अतः उनके मत में ज्ञान का ज्ञान ‘ज्ञाततालिंगक अनुमान’ से होता है। ज्ञान सदैव सकर्मक होता है। उसका कार्य अर्थ-प्रकाशन या प्राकट्य है। वह अपने कर्मभूत पदार्थ में पाक की तरह फल को पैदा करता है। उसी कार्यभूत फल से उसके कारणभूत ज्ञान की कल्पना की जाती है।

सुख-दुःख

ज्ञान के समान सुख, दुःख, इच्छा, द्वेष, प्रयत्न आत्मा के विशेष गुण हैं। वे सभी मानस प्रत्यक्ष द्वारा ज्ञात होते हैं। ऐहिक सुख, स्वर्गसुख और मोक्षसुख, सुख४१६ न्याय-खण्ड के त्रिविध भेद हैं। दुःख ऐहिक और पारलौकिक दो प्रकार का है। ऐहिक दुःख आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक भेद से तीन प्रकार का होता है। सुख का कारण धर्म और दुःख का कारण अधर्म है।

इच्छा-द्वेष

‘मुझे यह प्राप्त हो’, इस प्रकार के संकल्प को इच्छा कहते हैं। किसी विषय के प्रति शत्रुभाव ही द्वेष है। शरीर आदि में कर्म की उत्पत्ति का हेतु प्रयत्न है।

संस्कार

लौकिक एवं वैदिक भेद से संस्कार के दो भेद हैं। लौकिक संस्कार के वेग, भावना एवं स्थितिस्थापक भेद से तीन प्रकार हैं। वेग पृथिवी, जल, तेज, वायु और तम में रहने वाला विशेष गुण है, जिसके कारण उनमें गति होती है। स्मृति का कारण और अनुभव से जन्य भावना आत्मा में रहने वाला विशेष गुण है। किसी पदार्थ में विक्षोभ होने के बाद पुनः उसी स्थिति में आ जाने में कारणभूत स्थितिस्थापक संस्कार है। 15 वैदिक संस्कार तक्षण, उत्पवन, प्रोक्षण, अवहनन आदि क्रियाओं से उत्पन्न होता है। यह संस्कार पहिले से विद्यमान एवं भविष्य में उपयोगी द्रव्य में रहने वाला विशेष गुण है। कुछ मीमांसकों ने वैदिक संस्कार का शक्ति गुण में अन्तर्भाव स्वीकार किया है। क्योंकि प्रोक्षणादि संस्कार क्रिया-रूप हैं, इसलिये उनसे उत्पन्न होने वाले अतिशय का अपूर्व के समान योग्यता-रूप शक्ति में अन्तर्भाव हो सकता है।

ध्वनि

ध्वनि वायु का गुण है और वर्णात्मक शब्द का अभिव्यंजक है। न्याय दर्शन में ध्वनि को आकाश का गुण माना गया है किन्तु मीमांसक इसे वायु का गुण मानते हैं, क्योंकि यह वायु के अभिघात से पैदा होता है।

प्राकट्य

ज्ञान से उत्पन्न होने वाले और विषय में रहने वाले गुण को प्राकट्य कहते हैं। यह सभी द्रव्यों में रहने वाला सामान्य गुण है। यद्यपि प्राकट्य द्रव्याश्रित गुण है तो भी द्रव्य के साथ तादात्म्य सम्बन्ध रखनेवाले जाति, कर्म एवं गुण भी परम्परा से इसके आश्रय बनते हैं। अभाव का भी ज्ञान होता है अतः वह भी प्राकट्य का आश्रय है। प्राकट्य का आश्रय होना ही विषय का लक्षण है। लोक में ‘घट प्रकाशित हो रहा है’, ‘घट प्रकट है’ आदि व्यवहार होता है। ये व्यवहार भ्रम नहीं हैं क्योंकि इनका बाध नहीं होता। अतः इन व्यवहारों की उपपत्ति के लिये प्रकाश से विशिष्ट अर्थ की कल्पना करनी पड़ती है। यह विशेषणभूत प्रकाश पदार्थ ही प्राकट्य है। यह प्राकट्य ज्ञान नहीं है, क्योंकि ज्ञान तो आत्मा का गुण है, जब कि प्राकट्य विषय में रहता है। प्राकट्य को विषयरूप भी नहीं कह सकते, क्योंकि विशिष्ट ज्ञान और समूहालम्बन ज्ञान में विलक्षणता रहती है। विषय-स्वरूप मानने पर दोनों ज्ञानों में विलक्षणता नहीं रहेगी। अतः प्राकट्य ज्ञान एवं विषय से भिन्न ही है। इसे ही ज्ञातता भी कहते हैं।

शक्ति

कार्य एवं कारण के सम्बन्ध के विषय में मीमांसकों ने शक्तिवाद स्थापित किया है। बीज से अंकुर उत्पन्न होते हैं। बीज कारण है और अंकुर कार्य। किन्तु यदि बीज को भुन दिया जाय या उसे चूहे सूंघ लें तो उनसे अंकुर की उत्पत्ति नहीं होती। इससे यह मीमांसा दर्शन का इतिहास ४१७ सिद्ध होता है कि बीज में कोई अतीन्द्रिय शक्ति है जिसके नष्ट हो जाने से कार्य उत्पन्न नहीं होता। अतः शक्ति भी एक स्वतंत्र गुण है। यह शक्ति लौकिक एवं वैदिक भेद से द्विविध है। अग्नि में रहनेवाली दाहकत्व शक्ति लौकिक और यागादि में स्वर्गादि साधनता वैदिक शक्ति है। इनका ज्ञान अर्थापत्ति प्रमाण से होता है। जैसे- अग्निसंयोग से सदैव दहनक्रिया होती दीखती है। किन्तु वही अग्नि, मन्त्रादि का प्रयोग कर दिये जाने पर, संयुक्त होकर भी दाहक्रिया नहीं करती। ऐसी स्थिति में अग्निसंयोग के अतिरिक्त किसी दृश्य या अदृश्य कारण की कल्पना दाहक्रिया के लिये करनी पड़ती है। चूंकि कोई अन्य दृश्य कारण दृष्टिगोचर नहीं होता, अतः अग्निसंयोग और दहनक्रिया के मध्य उपस्थित विरोध को दूर करने के लिये अदृश्य कारण की कल्पना करनी पड़ती है। यही शक्ति है। यह शक्ति द्रव्य, गुण या कर्म में रहती है। अग्नि की दाहकत्वशक्ति द्रव्य में, हिंसा करने पर नरक प्राप्त कराने वाली शक्ति हिंसादि कर्मों में रहती है। ‘वायव्यं श्वेतमालभेत भूतिकामः’ इत्यादि विधिवाक्यों से श्वेतगुणविशिष्ट द्रव्य से ही भूतिसाधनता सिद्ध होने से भूतिसाधनता की शक्ति श्वेतगुण में सिद्ध होती है। न्याय दर्शन में शक्ति गुण को स्वीकार नहीं किया गया है। नैयायिकों का कहना है कि दाहकत्व अग्नि का स्वभाव है, कोई पृथक् शक्ति नहीं। यह स्वभाव प्रतिबन्धक के न रहने पर कार्य करने में समर्थ होता है। मीमांसकों का कहना है कि न्याय को भी ‘प्रतिबन्धकाभाव’ को हेतुरूप में स्वीकार करना पड़ता है। किन्तु अभाव में कारणता कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होती। अतः प्रतिबन्धकाभाव के स्थान पर भावरूप शक्ति की कल्पना श्रेयस्कर है। _प्रभाकर मत में शक्ति की गणना स्वतंत्र पदार्थ के रूप में की गई है। कुमारिल भट्ट के मत में भी यह पक्ष अनादरणीय नहीं है।

कर्म

केवल परिछिन्न द्रव्यों में रहने वाला तथा ‘चलति’ इस प्रत्यय का विषय कर्म कहलाता है। यह संयोग तथा विभाग का हेतु है। यह उत्क्षेपण, अवक्षेपण, आकुंचन, प्रसारण और गमन भेद से पांच प्रकार का है। कुमारिल भट्ट के अनुसार कर्म का प्रत्यक्ष ज्ञान होता है। प्रभाकर कर्म का प्रत्यक्ष नहीं मानते। उनके अनुसार संयोग एवं विभाग के द्वारा कर्म का अनुमान किया जाता है, अतः कर्म अनुमेय है।

जाति

अनुगत या अनुवृत्ति प्रत्यय का कारण जाति है। अर्थात् अनेक गायों में यह गाय है, यह गाय है’ इत्याकार समान बुद्धि जिससे उत्पन्न होती है, उसे जाति कहते हैं। सामान्य एवं आकृति इसके अपर पर्याय हैं। जाति नित्य है। यह व्यक्तियों में रहती है। इसका ज्ञान प्रत्यक्ष होता है। व्यक्ति के ज्ञान से जाति का भी प्रत्यक्ष हो जाता है। व्यक्ति एवं जाति में भिन्नाभिन्न या भेदाभेद संबंध है। जाति एवं व्यक्ति में अत्यंत भेद नहीं है, क्योंकि गाय और घोड़े के समान गाय और गोत्व में भेद नहीं है। जाति एवं व्यक्ति में अत्यंत अभेद भी नहीं, क्योंकि ‘हस्त तथा कर’ के समान गाय व्यक्ति और गोत्व पर्याय न्याय-खण्टामी ४१८ नहीं। जाति सर्वत्र व्याप्त है किन्तु उसकी उपलब्धि व्यक्ति में होती है। व्यक्ति ही जाति का अभिव्यंजक है। RTS OF जाति का महासामान्य और अवान्तर सामान्य दो भेद हैं। द्रव्य, गुण, कर्म एवं सामान्य में ‘सत्ता’ नामक महासामान्य रहता है। अवान्तर सामान्य द्रव्यत्वादि है। प्रभाकर महासामान्य को स्वीकार नहीं करते। प्रभाकर गुण एवं कर्म में भी जाति का अस्तित्व नहीं मानते। जाति केवल द्रव्यों में रहती है। प्रभाकर ने जाति एवं व्यक्ति के मध्य समवाय सम्बन्ध माना है।

अभाव

‘नास्ति’ प्रत्यय के विषय को अभाव कहते हैं। यह प्रागभाव, प्रध्वंसाभाव, अत्यन्ताभाव एवं अन्योन्याभाव भेद से चार प्रकार का है, इन चार प्रकारों में प्रथम तीन को संसर्गाभाव और अन्तिम को तादात्म्याभाव के रूप में विभक्त किया गया है। उत्पत्ति से पूर्व कार्य का अभाव प्रागभाव है। प्रागभाव का प्रतियोगी सदैव उत्पन्न होने वाला कार्य तथा अनुयोगी उस कार्य का उपादान कारण होता है। यह अनादि तथा सान्त होता है, क्योंकि कार्य की उत्पत्ति हो जाने पर यह विनष्ट हो जाता है। उत्पन्न वस्तु का विनाश प्रध्वंसाभाव है। यह अभाव सादि है किन्तु अनन्त है, क्योंकि ध्वंस का ध्वंस नहीं होता। अत्यंताभाव नित्य अभाव है। यह अनादि तथा अनन्त है। जैसे- वायु में रूप का अभाव। अत्यंताभाव का दूसरा उदाहरण मेरी पुस्तक का जिस काल एवं स्थान में अस्तित्व है उस स्थान एवं काल के अतिरिक्त अन्य सभी स्थान एवं कालों में अभाव है। चूंकि ये स्थान एवं काल अनन्त हैं, अत्यंताभाव को अनन्त कहा जाता है। मीमांसक पूर्ण अभाव या केवल असत्ता की धारणा को निष्प्रयोजन कहकर अस्वीकार कर देते हैं, अत्यंताभाव के प्रतियोगी एवं अनुयोगी दोनों का अस्तित्व है, किन्तु दोनों में परस्पर संसर्ग का नित्य अभाव होता है। अन्योन्याभाव दो वस्तुओं या जातियों में परस्पर तादात्म्य का अभाव है। जैसे एक कलम का दूसरे में अभाव तथा गोत्व का अश्वत्व में अभाव । कुमारिल ने चारों प्रकार के अभावों को अंगीकार किया, क्योंकि वे संसार के नानात्व की सत्यता को स्वीकार करते हैं। यदि यह विश्व अपनी भिन्नताओं के साथ सत्य है तो प्रत्येक वस्तु का दूसरी वस्तु में अभाव है और प्रत्येक वस्तु का अन्य देश एवं काल में अभाव है। अभाव का ज्ञान अनुपलब्धि नामक स्वतंत्र प्रमाण से होता है। प्रभाकर ने अभाव को एक पृथक् पदार्थ नहीं माना है। विश्व भिन्नता से युक्त है किन्तु यह भिन्नता भावात्मक है, अभाव को भेद सिद्ध करने के लिये मानना आवश्यक नहीं है। एक भाव वस्तु ही दूसरी वस्तु की अपेक्षा से अभाव कहलाता है। एक वस्तु का अभाव दूसरी वस्तु के भाव से पृथक् नहीं। भूतल पर घट का न होना केवल भूतल का होना है। केवल अधिष्ठान का दिखना ही आधेय के अभाव का ज्ञान है और वह प्रत्यक्षात्मक है। अतः अभाव के ज्ञान के लिये अनुपलब्धि नामक स्वतंत्र प्रमाण को स्वीकार करना आवश्यक नहीं है।

धर्म

मीमांसा का प्रमुख जिज्ञास्य विषय धर्म है। धर्म वह है जो धारण करता है। धर्म विश्व को धारण करता है। यह अनेकता को बांधे रखता है अन्यथा अनेकता से युक्त यह विश्व बिखर जाता। धर्म नैतिक कर्म की संप्रभुता का द्योतक है। जैमिनि ने धर्म की मीमांसा दर्शन का इतिहास ४१६ परिभाषा देते हुये कहा है- ‘चोदना के द्वारा लक्षित अर्थ धर्म है।’ ‘चोदना’ का अर्थ है क्रिया का प्रवर्तक वचन। सम्पूर्ण वेद का तात्पर्य क्रियापरक ही है। वेद कर्म में प्रवृत्ति विधि वाक्यों द्वारा करता है। वेद प्रतिपादित कर्म ही हमारे लिये परम कर्तव्य हैं। कर्त्तव्य के ज्ञान का स्रोत केवल वेद है। अर्थ एवं काम से संबंधित सदाचार का ज्ञान लोक व्यवहार से हो जाता है, किन्तु धर्म एवं मोक्ष जैसे अतीन्द्रिय पुरुषार्थों का ज्ञान मात्र वेद से होता है। अतः लौगाक्षि भास्कर ने धर्म का लक्षण वेद द्वारा प्रतिपादित प्रयोजनयुक्त इष्टार्थ को बतलाया। भोजन करना धर्म नहीं है, क्योंकि वह वेद प्रतिपादित नहीं है। धर्म सप्रयोजन होता है। स्वर्गादि ही धर्म का प्रयोजन है। वह धर्म इष्टार्थ होना चाहिये। श्येन याग इत्यादि यद्यपि सप्रयोजन हैं और वेद प्रतिपादित भी हैं, किन्तु, नरक रूपी अनर्थ के जनक होने के कारण अर्थ नहीं हैं। अतः वे धर्म भी नहीं है। इसलिए वेद प्रतिपाद्य प्रयोजनवान् अर्थ धर्म है। वेद अपौरुषेय वाक्य हैं। महाभारत इत्यादि भी वाक्य हैं किन्तु वे अपौरुषेय नहीं और आत्मा अपौरुषेय है, किन्तु वाक्य नहीं। वेद के पांच विभाग हैं- विधि, मन्त्र, नामधेय, निषेध और अर्थवाद। इस विभाग का आधार वेद वाक्यों के धर्म प्रतिपादन में प्रकार भेद है।

विधि

विधि सबसे प्रधान है, क्योंकि यह क्रिया का साक्षात् विधान करता है, वेद का जो भाग अज्ञात अर्थ का ज्ञान कराता है उसे विधि कहते हैं। यह तीन प्रकार का है (१) प्रधानविधि- जो प्रधान का विधान करे अर्थात् यज्ञ का विधान करे। जैसे- ‘अग्निहोत्रं जुहुयात् स्वर्गकामः’ । स्वर्ग की इच्छा करने वाला अग्निहोत्र का सम्पादन करे। (२) गुण विधि- गौण विषयों का प्रतिपादक वाक्य गण विधि कहलाता है। जैसे- ‘दध्ना जहोति’ अर्थात दही से यज्ञ करे। (३) विशिष्ट विधि- प्रधान एवं गौण विषयों का समवेत प्रतिपादक वाक्य विशिष्ट विधि कहलाता है। अर्थात् यज्ञ के साथ-साथ यज्ञ किस पदार्थ से किया जाय इसका भी विधान करने वाला वाक्य विशिष्ट विधि है। जैसे- ‘सोमेन यजेत’। - प्रकारान्तर से विधि के चार भेद किये गये हैं। (१) उत्पत्ति विधि- जिस वाक्य से कर्मस्वरूप की कर्तव्यता सर्वप्रथम ज्ञात होती है, उसे उत्पत्ति विधि कहते हैं। इसे ही प्रधान विधि भी कहते हैं। (२) विनियोग विधि- जिस वाक्य से अङगाङ्गिभाव का बोध होता है, उसे विनियोग विधि कहते हैं। जैसे- दही से यज्ञ करे। यहाँ दही अंग या साधन है और यज्ञ अंगी या साध्य है। (३) प्रयोग विधि- इसके द्वारा अंगक्रियाओं के क्रम का ज्ञान होता है। जैसे- ‘वेदं कृत्वा वेदिं करोति’ अर्थात् वेद (कुश) के निर्माण के पश्चात् वेदि का निर्माण करना चाहिये। (४) अधिकार विधि- इसके द्वारा फल का कर्तृगामित्व बतलाया जाता है। प्रकारान्तर से विधि का अपूर्व विधि, नियम विधि और परिसंख्या विधि में भेद किया गया है। जो अत्यन्त अप्राप्त विषय का विधान करता है, उसे अपूर्व विधि कहते हैं। यही है १. चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः, मीमांसासूत्र १. २. २. चोदनेति क्रियायाः प्रवर्तकम् वचनमाहुः, मीमांसासूत्र १, २, पर शबरभाष्य ३. वेदप्रतिपाद्यो प्रयोजनवदर्थो धर्मः, अर्थसंग्रह, पृष्ठ- २ ४२० न्याय-खण्ड प्रधान विधि या उत्पत्ति विधि है। जो पक्ष में प्राप्त हुये अर्थ को नियमित करता है, उसे नियम विधि कहते हैं। जैसे- धान से भूसी अलग करने का कार्य पत्थर से कूटकर अथवा नाखून से छीलकर हो सकता है। तब वेद विधान करता है कि अवघात से ही भूसी अलग करना चाहिये। (ब्रीहीन् अवहन्यादेव)। जब दो विकल्पों की प्राप्ति होती है तब एक की व्यावृत्ति जिस विधि से की जाती है वह परिसंख्या विधि है। जैसे- ‘पंच पंचनखा भक्ष्याः’ वाक्य से पांच नखवाले पांच प्राणियों से इतर प्राणियों का भक्षण वर्जित किया जाता है। श्री

मन्त्र

यद्यपि वेद में मन्त्रों का स्थान प्रथम है किन्तु यज्ञ के दृष्टिकोण से मीमांसा ने ब्राह्मण साहित्य में विद्यमान विधि के अनन्तर मन्त्र का स्थान रखा है। अनुष्ठेय अर्थ के प्रकाशक वाक्य को मन्त्र कहते हैं। इनका उच्चारण कर्मकाण्ड में विशिष्ट स्थानों पर किया जाता है। मंत्रोच्चारण से मन्त्रार्थ-स्मरण हो जाता है, यही मन्त्रों का उद्देश्य है। यद्यपि ब्राह्मण वाक्य से भी यह स्मरण हो सकता है, किन्तु मीमांसक नियम-विधि को अंगीकृत कर कहते हैं कि मन्त्र द्वारा ही अर्थ-स्मरण होना चाहिये।

नामधेय

वेद का तीसरा भाग नामधेय है। यह कुछ वैदिक शब्दों को यज्ञ के नाम के रूप में समझने के लिये बाध्य करता है। उदाहरणार्थ ‘उद्भिदा यजेत पशुकामः’ अर्थात् पशु की कामना वाला व्यक्ति उद्भिद् यज्ञ करे, इस विधि वाक्य में उद्भिद् का अर्थ यज्ञ का नाम समझना चाहिये। नामधेय के होने में चार निमित्त हैं- (१) मत्वर्थलक्षण भय, (२) वाक्यभेद का भय, (३) तत्प्रख्यशास्त और (४) तद्व्यपदेश।

निषेध

विधि वाक्यों के विपरीत निषेध वाक्य हैं। ये निषेध निषिद्ध कर्मो से मनुष्य की निवृत्ति करते हैं, क्योंकि निषिद्ध कर्मों का अनुष्ठान अनर्थकारी होता है। उदाहरणार्थ न कलशं भक्षयेत्’ अर्थात् विषाक्त भोजन नहीं करना चाहिये, यह निषेध है, क्योंकि यह पुरुष की कलञ्ज भक्षण से निवर्तना करता है।

अर्थवाद

वे वाक्य जो विधि वाक्यों की स्तुति एवं प्रशंसा करते हैं तथा निषिद्ध की निन्दा करते हैं, अर्थवाद कहलाते हैं। इनका मुख्य प्रयोजन विहित कों में पुरुष को प्रवृत्त करना तथा निन्दित कों से निवृत्त करना है। जैसे- समृद्धि की कामनावाले व्यक्ति को वायु देवता के लिये एक श्वेत पशु की बलि देनी चाहिये (वायव्यं श्वेतमालभेत भूतिकामः) इस विधि वाक्य में प्रवृत्ति के लिये वायु की प्रशंसा में कहा गया कि ‘वायु अत्यंत तीव्रगामी देवता है’ (वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता)। यह अर्थवाद है। अर्थवाद के तीन भेद हैं- गुणवाद, अनुवाद तथा भूतार्थवाद।’ ‘आदित्यो यूपः’ (सूर्य यज्ञ का स्तम्भ है) इस वाक्य में यूप को सूर्य कहना प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित है। अतः इस वाक्य में सूर्य का अभिप्राय सूर्य के उज्ज्वल रूप गुण से है। यही गुणवाद है। प्रमाणान्तर से सिद्ध वस्तु का बोधन करना अनुवाद है। जैसे- ‘अग्निर्हिमस्य भेषजम्’ अर्थात् आग ठंड है १. विरोधे गुणवादः स्यादनुवादोऽवधारिते। भूतार्थवादस्तद्धानादर्थवादस्त्रिधा मतः।। अर्थसंग्रह, पृ. ६७. है मीमांसा दर्शन का इतिहास ४२१ का विरोधी है- यह बात प्रत्यक्ष से भी ज्ञात है। प्रमाणान्तर से अविरुद्ध तथा अप्राप्त अर्थ का बोधक वाक्य भूतार्थवाद है। जैसे- ‘इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदयच्छत्’ (इन्द्र ने वृत्र के विरुद्ध वज्र को उठाया)। इस वाक्य का विषय अन्य प्रमाण से ज्ञात नहीं है और न इसका किसी पौराणिक आख्यान से विरोध है, अतः यह भूतार्थवाद है। उपर्युक्त विधि, मन्त्र, नामधेय, निषेध एवं अर्थवाद सभी धर्म का प्रतिपादन करते हैं। विधि धर्म का प्रतिपादन साक्षात् करती है और मन्त्र, नामधेय इत्यादि विधि से गौण हैं और विधि के माध्यम से धर्म प्रतिपादक हैं। मन्त्र, नामधेय, अर्थवाद इत्यादि का साक्षात् अर्थ कुछ भिन्न हो सकता है, किन्तु उनका तात्पर्यार्थ धर्म ही है (धर्मतात्पर्यवत्त्वेन)। कुछ लोगों की यह शंका कि जैमिनि के धर्म की परिभाषा में ‘चोदना’ शब्द मात्र ‘विधि’ का द्योतक है, अतः धर्म को ‘चोदना प्रतिपाद्य’ कहना धर्म को ‘वेदैकदेशविधिप्रतिपाद्य’ कहना है, उचित नहीं है। जैमिनि की परिभाषा मे प्रयुक्त चोदना शब्द समस्त वेद का बोधक है, केवल विधि भाग का बोधक नहीं है। अतः चोदनाप्रतिपाद्य का तात्पर्य वेदप्रतिपाद्य है, वेदैकदेशविधिप्रतिपाद्य’ नहीं।

कर्म

मीमांसा ने कर्म को परम सत्य स्वीकार किया है। यह जगत् कर्म के लिये बना है और कर्म ही इसका जनक है (कर्मजं लोकवैचित्र्यं)। मनुष्य का वर्तमान जीवन एवं भविष्य कर्म के अभाव में सम्भव नहीं है। मनुष्य ही कर्म द्वारा अपने भविष्य का निर्माता है अथवा मनुष्य ही अपने भविष्य को बिगाड़ता है। और तो और इस कर्ममय लोक को पार करने का साधन भी कर्म ही है। सम्पूर्ण वेद का तात्पर्य कर्म में है। मीमांसा की सम्पूर्ण तत्त्वमीमांसा कर्मपरक है। कर्म की वास्तविकता सिद्ध करने के लिये मीमांसकों ने इस कर्मक्षेत्र जगत् को सत्य एवं नित्य माना। आत्माओं की अनेकता को स्वीकार किया। प्रत्येक आत्मा कर्म करने में स्वतंत्र है और अपने कमों का उत्तरदायी है। प्रत्येक आत्मा को उसी के कर्मों का फल मिलता है। कर्म की संप्रभुता निर्विवाद सत्य है। कर्म एवं धर्म अभिन्न हैं। अतः कर्म का स्वरूप-वर्णन मीमांसा का प्रधान विषय है। मीमांसकों ने कर्म के मूलतः तीन प्रकार बताये हैं :

(१) नित्य-नैमित्तिक कर्म

नित्यकर्म उन कर्मों को कहा जाता है जिसके करने पर कोई पुण्य नहीं होता, किन्तु न करने पर पाप होता है। सन्ध्यावन्दन आदि कर्म इसी श्रेणी के हैं। ‘अहरहः सन्ध्यामपासीत’ इस वचन से सन्ध्योपासन को नित्य कर्त्तव्य बताया 5 गया है। अतः उसका त्याग करने पर उक्त कर्म का अधिकारी व्यक्ति पाप का भागी होता है। निमित्त विशेष के उपस्थित होने पर जिन कमों को शास्त्र ने अवश्यकरणीय र बताया है, वे कर्म नैमित्तिक कर्म कहे जाते हैं। पुत्रजन्म होने पर जातेष्टि, गृहदाह पर होने पर क्षमवद् याग और ग्रहणकाल में स्नान आदि नैमित्तिक कर्म हैं।

(२) निषिद्ध कर्म

निषिद्ध का अर्थ है निषेध किया गया। शास्त्रों में जिन कर्मों का निषेध किया गया है, वे कर्म निषिद्ध कहे जाते हैं। ऐसे कर्म नरकादि अनिष्ट फल के जनक होते हैं। ब्रह्महत्या, गोहत्या, मद्यपान, परस्त्रीगमन, असत्यभाषण आदि ऐसे ही ALK हैं ४२२ अन्याय-खण्डमा पा निषिद्ध कर्म हैं। है

(३) काम्य कर्म

शास्त्रों ने जिन कर्मों का विधान किसी फल की कामना की पूर्ति के लिये किया है, उन कर्मों को काम्य कहा जाता है। जैसे परलोक में स्वर्ग और इस लोक में पुत्र, धन, धान्य आदि मनुष्य को काम्य होते हैं। इन कामनाओं की प्राप्ति के साधनभूत कर्म काम्य कर्म हैं। जैसे- ज्योतिष्टोम यज्ञ स्वर्ग का साधन होने के कारण काम्य कर्म है। नित्य एवं नैमित्तिक कर्मों को करने के लिये तथा निषिद्ध कर्मों का त्याग करने के लिये मनुष्य बाध्य है। किन्तु काम्य कर्मों का पालन व्यक्ति की इच्छा पर है। एक चतुर्थ प्रकार के कर्म का वर्णन भी मीमांसा ग्रंथों में मिलता है। जैसे-श्येनयाग, जिसके द्वारा शत्रवध किया जाता है। मीमांसा ऐसे अनर्थोत्पादक यज्ञों के नियमों का भी वर्णन करती है। किन्तु इस प्रकार के कमों को निन्दित एवं गर्हित बतलाया गया है। इनका पालनकर्ता नरकगामी होता है। मनुष्य कर्म में क्यों प्रवृत्त होता है? इस विषय में कुमारिल एवं प्रभाकर में मतभेद है। कुमारिल के अनुसार काम्य कर्मों का इष्टफल और निषिद्ध कर्मों का अनिष्ट फल होता है। मनुष्य स्वभावतः इष्ट की आकांक्षा और अनिष्ट का परिहार चाहता है। मनुष्य का यह स्वभाव ही उसे कर्म में प्रवृत्त करता है। अर्थात् इष्टसाधनताज्ञान कर्म का अभिप्रेरक है। प्रभाकर के अनुसार कर्म का अभिप्रेरक कार्यताज्ञान है, अर्थात् कर्त्तव्यबोध कर्म में प्रवृत्त करता है। फलाकांक्षा से कर्म में प्रवृत्ति प्रभाकर को स्वीकृत नहीं है। वैदिक विधि के प्रति आदर मात्र व्यक्ति को कर्म में प्रवृत्त करता है। यद्यपि इन कर्मों के करने से फल की प्राप्ति तो होगी, किन्तु फलाकांक्षा गौण है। प्रधान प्रेरक शक्ति वेद विहित होना है। __ कुमारिल नित्य कमों के अनुष्ठान का प्रयोजन दुरितक्षय मानते हैं। किन्तु प्रभाकर के मतानुसार नित्यकर्म हमें इसलिये करना चाहिये कि वे वेद की आज्ञा हैं। नित्यकर्म स्वयं साध्य है, किसी साध्य के साधन नहीं। तात्पर्य यह है कि वैदिक कृत्यों का सम्पादन हमें निष्कामभाव से कर्त्तव्य समझकर करना चाहिए। प्रभाकर कर्त्तव्य के लिये कर्त्तव्य के सिद्धान्त को मानते हैं। उनका यह मत जर्मन दार्शनिक कांट के मत ‘Duty for dutie’s sake’ के समकक्ष है। मामला

अपूर्व

मीमांसक वेद विहित कर्म को धर्म मानते हैं। कर्म का विधान फल के उद्देश्य से किया जाता है। कर्म एवं उसके फल में नियत सम्बन्ध है। कर्म कारण है और फल उसका कार्य। कार्य के अव्यवहित पूर्वक्षण में रहने वाले को कारण कहते हैं। किन्तु यज्ञ के अनुष्ठान में एक विप्रतिपत्ति दिखाई पड़ती है। वेद कहता है ‘दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत’ अर्थात् स्वर्ग की कामना वाला व्यक्ति दर्शपूर्णमास यज्ञ करे। इसका तात्पर्य है कि यज्ञ स्वर्ग का कारण है। किन्तु यजमान यज्ञ आज कर रहा है और उसे फल मिलेगा किसी भविष्य काल में। देवता को उद्देश्य कर द्रव्यत्याग को यज्ञ कहते हैं। इस यज्ञ की क्रिया मीमांसा दर्शन का इतिहास ४२३ तो हम आज कर रहे हैं और फल या कार्य उत्पन्न होगा वर्षों बाद। यहां कर्म और फल के सम्बन्ध में विरोध है। इसी विरोध का परिहार करने के लिये मीमांसा ने ‘अपूर्व’ की कल्पना की है। कर्म और फल के बीच ‘अपूर्व’ सेतु का काम करता है। यज्ञ से उत्पन्न होता है अपूर्व, जो कालान्तर में स्वर्ग-प्राप्ति रूप फल को उत्पन्न करता है। यह ‘अपूर्व’ यज्ञ की उत्तरावस्था एवं फल की पूर्वावस्था है। सका कुमारिल ने अपूर्व की सिद्धि श्रुतार्थापत्ति से की है। यदि अपूर्व को नहीं स्वीकार किया जायेगा तो अनेक वेद वाक्यों की व्याख्या असंभव हो जायेगी। प्रभाकर ‘अपूर्व’ की सिद्धि अनुमान से करते हैं। या अपूर्व के चार प्रकार हैं- (१) परमापूर्व, (२) समुदायापूर्व, (३) उत्पत्त्यपूर्व, और (४) अंगापूर्व। साक्षात् फलजनक अपूर्व को परमापूर्व कहते हैं। इसे ही फलापूर्व भी कहते हैं। प्रधान कर्म से होने वाले अपूर्व को उत्पत्त्यपूर्व कहते हैं। समुदाय से उत्पन्न होने वाले अपूर्व को समुदायापूर्व कहते हैं। अंगों से उत्पन्न होनेवाले अपूर्व को ‘अंगापूर्व’ कहते हैं। का यद्यपि मीमांसा के आचार्यों ने ‘अपूर्व’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग किया है, किन्तु इस शब्द के मूल में जो धारणा है वह प्रायः सभी दार्शनिकों को स्वीकृत है। न्यायकोशकार स्पष्ट कहता है कि यागादि से उत्पन्न एवं स्वर्गादि को उत्पन्न करनेवाला कोई एक गुण विशेष है जिसे मीमांसक ‘अपूर्व’ कहते हैं, वेदान्ती प्रारब्धकर्म कहते हैं, नैयायिक धर्माधर्म कहते है, वैशेषिक अदृष्ट और पौराणिक पुण्य-पाप कहते हैं।’

भावना

भावना का विचार मीमांसा दर्शन का एक विशिष्ट सिद्धान्त है। मीमांसा का प्रधान प्रयोजन धर्म की व्याख्या करना है। धर्म वेदप्रतिपाद्य है। वेद धर्म का प्रतिपादन विधि द्वारा करता है। जैसे- ‘यजेत स्वर्गकामः’ यह एक विधिवाक्य है। यह वाक्य स्वर्ग की कामनावाले व्यक्ति के लिये यज्ञ का साधनरूप में विधान करता है। किन्तु प्रश्न यह है कि ‘यज्ञ स्वर्ग का साधन है’ और ‘वेद इसका विधान करता है’ इन बातों का ज्ञान ‘यजेत स्वर्गकामः’ से कैसे होता है? परिणामस्वरूप मीमांसकों ने वैदिक विधि को समझने के उपाय का व्याख्यान किया। जैसे- ‘यजेत’ एक विधायक पद है। इस पद में एक धातु का भाग है और दूसरा प्रत्यय का भाग है। दोनों को मिलाकर (यज् धातु तथा त प्रत्यय) ‘यजेत’ बना है। इस ‘त’ प्रत्यय के भी दो भाग हैं- आख्यातत्व और लिंगत्व । इन दोनों भागों का ही अर्थ है- भावना। भावना का स्वरूप व्यापार विशेष है। जैसे यजेत का अर्थ यागोत्पादक व्यापार है। एक उदाहरण से भावना के स्वरूप को स्पष्ट समझा जा सकता है। मान लीजिये ( यज्ञदत्त देवदत्त को गाय लाने की आज्ञा देता है। उस यज्ञदत्त (भावयिता या भावक) के मन में यह इच्छा हुई कि देवदत्त गाय को लावे। वह देवदत्त को ‘गाम् आनय’ कहकर प्रेरित करता है। यह प्रेरणा ही भावयिता का विशेष व्यापार है। इस विशेष व्यापार से देवदत्त में गाय ले आने की प्रवृत्ति’ उत्पन्न हो जाती है। यहां यज्ञदत्तनिष्ठ अभिप्राय विशेष ही गाय १. न्यायकोष, पृष्ठ- ६० ४२४ न्याय-खण्ड लाने रूप कार्य को कराने के लिये पुरुषप्रवृत्ति के अनुकूल व्यापार है। अतः यह भावना है, क्योंकि भावना की परिभाषा- ‘भवितुर्भवनानुकूलो भावयितुर्व्यापारविशेषो भावना’ है। अर्थात् एक दृष्टिकोण से देवदत्त को किसी कार्य में प्रवृत्त कराने का यज्ञदत्त का अभिप्राय विशेष भावना है। _ इस विषय को दूसरे दृष्टिकोण से भी देखा जा सकता है। देवदत्त के दृष्टिकोण से देखा जाय तो देवदत्त भी चाहता है कि गाय लाना रूप कार्य सम्पन्न हो जाये। अतः देवदत्त भावयिता है और गाय का लाया जाना ही होने वाला कार्य (भवित) है। इस होने वाले कार्य के सम्पादन हेत देवदत्त का अपने स्थान से उठकर गाय तक जाना और उसे खोलकर अपेक्षित स्थान तक लाना ही अनुकूल व्यापार है। देवदत्त की यह आनयनविषयक प्रवृत्ति भी भावना है। _ इस प्रकार दो दृष्टिकोणों से देखने पर भावना के दो रूप दिखते हैं- (१) प्रेरणा रूप व्यापार, और (२) प्रवृत्तिरूप व्यापार । प्रथम को शाब्दी भावना कहते हैं क्योंकि यह शब्द के माध्यम से अभिव्यक्त होता है। द्वितीय को आर्थी भावना कहते हैं, क्योंकि उक्त व्यापार यजनकर्ता रूप अर्थ में रहता है। __ ‘यजेत स्वर्गकामः’ यह वेदवाक्य स्वर्ग की कामनावाले के लिए यज्ञ की प्रेरणा देता है। यहां भावयिता स्वयं वेद है। वेद किसी व्यक्ति या ईश्वर उच्चरित वाक्य नहीं है। वह अपौरुषेय है। अतः इस वाक्य में प्रेरणा-रूप व्यापार लिंगादिशब्दनिष्ठ माना जाता है। अतः यह शाब्दी भावना है। ‘यजेत स्वर्गकामः’ को स्वर्ग की कामना वाले व्यक्ति की दृष्टि से भी देखा जा सकता है। स्वर्गफल की इच्छा वाले व्यक्ति में इस विधिवाक्य को सुनकर याग करने के लिये ‘प्रवृत्ति’ उत्पन्न होती है। यही आर्थी भावना’ है। ‘यजेत’ पद में जो ‘त’ प्रत्यय है उसके आख्यातत्व अंश से आर्थी भावना तथा उसके लिंगत्व अंश से शाब्दी भावना का निर्देश होता है। अर्थात् विधि-प्रत्यय का अर्थ ‘भावना’ है। शाब्दी भावना एवं आर्थी भावना दोनों ही मानसिक व्यापार हैं। शाब्दी भावना में एक व्यक्ति का अभिप्राय दूसरे व्यक्ति को कार्य में प्रवृत्त करने के लिये प्रेरणा देना होता है। आर्थी भावना में व्यक्ति का अभिप्राय स्वयं अपने आप को कर्म में प्रवृत्त करना होता है। दोनों ही अभिप्राय विशेष हैं। शाब्दी भावना कारण है और आर्थी भावना कार्य।

देवता

मीमांसा के अनुसार सम्पूर्ण वेद का तात्पर्य यज्ञ सम्पन्न करने में है या कर्मकाण्ड में है। यज्ञ अथवा कर्मकाण्ड का स्वरूप समझने के लिये ‘देव’ का स्वरूप समझना आवश्यक है। यज्ञ में देवता के उद्देश्य से द्रव्यत्याग किया जाता है। जिस देवता के लिये हवि दी जाती है, होता उसका मन में ध्यान करता है। अतः देवता के स्वरूप का १. प्रयोजनेच्छाजनितक्रियाविषयव्यापार आर्थी भावना- अर्थसंग्रह, पृष्ठ-७ मीमांसा दर्शन का इतिहास ४२५ ज्ञान अपेक्षित है। यज्ञ में अग्नि, इन्द्र, वरुण, अश्विन, पूषन् इत्यादि अनेक देवताओं के लिये आहुति दी जाती है। इन देवताओं के स्वरूप के विषय में पर्याप्त मतभेद है। एक मत यह है कि देवता मनुष्यों के समान कोई जाति है जो स्वर्ग में निवास करती है। एक मत यह है कि ये देवता आध्यात्मिक-मानसिक शक्तियों के प्रतीक हैं। अग्नि प्राण का प्रतीक है, इन्द्र मन का प्रतीक है, विष्णु आत्मतत्त्व के प्रतीक हैं। एक दूसरा मत यह है कि ये देवता प्राकृतिक शक्तियों के प्रतीक हैं। अग्नि, वायु, सूर्य, पृथिवी, चन्द्रमा आदि प्राकृतिक शक्तियों के मानवीकृत एवं दैवीकृत रूप ही अग्नि, वायु आदि देवता हैं। यास्क के मतानुसार जिस पदार्थ की स्तुति की जाती है वही देवता है। परन्तु मीमांसा में देवता सम्प्रदान-कारक सूचक पद मात्र है। इससे बढ़कर उनकी स्थिति नहीं है। शबरस्वामी ने देवता के विषय में तीन पक्ष बतलाये हैं- अर्थ देवता, शब्दविशिष्ट अर्थ देवता तथा शब्द देवता। इन तीनों पक्षों में तृतीय पक्ष ही मीमांसा को अभीष्ट है, क्योंकि शब्द ही अर्थ का स्मारक एवं उपस्थापक है। अतः देवता शब्दमय है। ‘अग्नये स्वाहा’, ‘इन्द्राय स्वाहा’ आदि मंत्रों में अग्नये ‘इन्द्राय’ ये चतुर्थ्यन्त पद ही देवता हैं। शबर ने देवता के विग्रह आदि का खण्डन किया है। देवता करचरणादि अवयव से युक्त होते हैं (विग्रह), हवि को स्वीकार करते हैं, ऐश्वर्यशाली होते हैं, हवि पाकर प्रसन्न होते हैं तथा कृत कर्म का फल देते हैं। अतः देवता विग्रहवान् होते हैं। मीमांसा के आचार्यों ने शब्दमय देवता के सिद्धान्त को मानने के कारण देवता के विग्रह-पंचक का खण्डन किया है। देवता गौण हैं, कर्म ही प्रधान है। कर्म स्वयं अपना फल देने में समर्थ हैं उसके लिये देवता के विग्रह की कल्पना आवश्यक नहीं है।

ईश्वर

मीमांसा का ईश्वरविषयक विचार अत्यंत विवादास्पद है। अनेक विद्वानों ने मीमांसा को अनीश्वरवादी घोषित कर रखा है। इसका कारण यह है कि जैमिनि ने यद्यपि ईश्वर का खण्डन नहीं किया है, किन्तु उपेक्षा अवश्य की है। मीमांसा के प्रमुख सिद्धान्तों की सिद्धि के लिये ईश्वर को स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं पड़ती है। जगत् सत्य एवं शाश्वत है अतः जगत् की सृष्टि के लिये ईश्वर की आवश्यकता नहीं है। धर्म का विधान वेद करता है जो नित्य एवं स्वतः प्रमाण है अतः वेद के रचयिता अथवा प्रामाण्य के लिये ईश्वर की आवश्यकता नहीं है। कर्म जीवों को फल देने में स्वयं समर्थ है अतः कर्मफलदाता के रूप में ईश्वर को मानने की आवश्यकता नहीं प्रतीत होती। किसी मर्मज्ञ व्यक्ति के अस्तित्व में भी कोई प्रमाण नहीं है। कुमारिल जैसे विद्वानों ने ईश्वर की सिद्धि के लिये प्रस्तुत न्यायदर्शन के अनुमानों का अत्यंत तीक्ष्ण तों द्वारा खण्डन किया है। इन सबसे आपाततः यही प्रतीत होता है कि मीमांसा अनीश्वरवादी है। किन्तु अनेक विद्वानों के अनुसार मीमांसा को अनीश्वरवादी कहना अपनी अल्पज्ञता का परिचय देना है। जो मीमांसा वेद की आधिकारिक व्याख्या करती है वह अनीश्वरवादी कैसे हो सकती है। जैमिनि ने ईश्वर का खण्डन नहीं किया है। सृष्टिकर्ता ईश्वर को न स्वीकार करना ईश्वर का निषेध४२६ माकान्याय-खण्ड शांति नहीं है। कुमारिल प्रभृति विद्वानों ने भी ईश्वर के अस्तित्व की सिद्धि में न्याय दर्शन प्रदत्त अनुमानों का ही खण्डन किया है। अर्थात् अनुमान से ईश्वर की सिद्धि अनुपयुक्त है। वेदसिद्ध ईश्वर का खण्डन उन्होंने नहीं किया है। ‘प्रभाकरविजय’ में नन्दीश्वर ने स्पष्ट कहा है कि ईश्वर के अस्तित्व में श्रेष्ठ प्रमाण वेद ही हैं। मीमांसा के श्रेष्ठ आचार्यों द्वारा किया हुआ मंगलाचरण भी यही सिद्ध करता है कि मीमांसा अनीश्वरवादी नहीं है। कुमारिल ने अपने ग्रंथ का प्रारंभ शिवाराधना से किया है। मीमांसा के ईश्वरवादी होने का एक बहुत बड़ा प्रमाण यह है कि व्यास जी ने जैमिनि के मत को उद्धृत करते हुये कहा है- ‘जैमिनि के अनुसार मुक्त अवस्था में जीव ब्रह्म के आनन्द आदि गुणों को धारण करता है’। इस कथन से स्पष्ट सिद्ध होता है कि जैमिनि ईश्वर को मानते थे और उसके सच्चिदानन्द स्वरूप में विश्वास करते थे।

मोक्ष

भारतीय दर्शन में प्रायः मोक्ष को अन्तिम पुरुषार्थ के रूप में स्वीकार किया गया है। किन्तु जैनिनि एवं शबर ने धर्मविचार को ही अपना लक्ष्य बनाया और उसी तक अपने को सीमित रखा। चूंकि धर्म कर्मप्रधान है, उन्होंने कर्मनिवृत्तिलक्षण मोक्ष का विचार नहीं किया। परन्तु परवर्ती मीमांसा के आचार्य धर्म एवं उसके साध्य स्वर्ग के आदर्श तक अपने को सीमित न रख सके और उन्होंने मोक्ष के आदर्श को स्वीकार कर लिया। __मीमांसकों ने बन्धन एवं मोक्ष के विषय में स्वतंत्र विवेचन किया है। यद्यपि आत्मा नित्य और विभु है, वह इस संसार में बन्धनों से जकड़ा है। सांसारिक बन्धन तीन हैं। पहला बन्धन यह भौतिक शरीर है, दूसरा बन्धन ज्ञानेन्द्रियां हैं और तीसरा बन्धन जगत् के पदार्थ हैं। आत्मा शरीर में स्थित होकर इन्द्रियों के माध्यम से जगत् के पदार्थों का भोग करता है। ये भोगायतन, भोगसाधन और भोग्यविषय ही आत्मा को बन्धनग्रस्त करते हैं तथा उसे अपने से भिन्न वस्तुओं से जोड़ते हैं। मोक्ष का अर्थ जगत के साथ आत्मा के सम्बन्ध का विनाश है। अर्थात् मीमांसा के मतानुसार ‘प्रपंचसम्बन्धविलय’ मोक्ष का स्वरूप है। मीमांसा में प्रपंच को नित्य माना गया है, अद्वैत वेदान्तियों के समान मिथ्या नहीं। अतः मोक्ष में प्रपंच का विलय नहीं होता, जगत् तो उसी प्रकार बना रहता है, केवल आत्मा और प्रपंच का सम्बन्ध सदा के लिये विच्छिन्न हो जाता है। कि 55 - प्रभाकर के मोक्ष विषयक विचारों का ज्ञान हमें प्रकरणपंजिका से होता है। धर्माधर्म के निःशेष नाश होने से देह के आत्यन्तिक नाश को ही मोक्ष कहते हैं। धर्माधर्म के वश में होकर जीव नाना योनियों में भटकता रहता है। या कि तलाक १. विशुद्धज्ञानदेहाय त्रिवेदीदिव्यचक्षुषे। काकी को श्रेयःप्राप्तिनिमित्ताय. नमः सोमार्धधारिणे।। श्लोकवार्त्तिक २. ब्राह्मण जैमिनिरूपन्यासादिभ्यः, ब्रह्मसूत्र- ४.५ ३. आत्यन्तिकस्तु देहोच्छेदो निश्शेषधर्माधर्मपरिक्षयनिबन्धनो मोक्ष इति सिद्धम्। 3 धर्माधर्मवशीकृतो जीवः तासु तासु योनिषु संसरति प्रकरणपंजिका, तत्त्वालोक, पृष्ठ- १५६ ४२७ मीमांसा दर्शन का इतिहास माया धर्माधर्म के नष्ट होने पर धर्माधर्म जनित देहेन्द्रियादि के संबंध से रहित होकर जीव प्रपंच सम्बन्ध रहित हो जाता है और मुक्त हो जाता है। संसार में सुख को दुःखमिश्रित देखकर जीव मोक्षोन्मुख होता है। वह काम्य एवं निषिद्ध कर्मों को त्याग देता है, क्योंकि ये सुख एवं दुःख के जनक हैं। वह पूर्वकृत कर्मों के फलों को भोगकर क्षीण करता है। शम, दम, सन्तोष इत्यादि के द्वारा आत्मज्ञान से युक्त होकर वह भोगायतन शरीर से छुटकारा पाता है। ज्ञान से धर्म एवं अधर्म का संचय अवरुद्ध हो जाता है, किन्तु मात्र ज्ञान से मोक्ष नहीं मिलता। प्रारब्ध कर्मों का क्षय भोग से ही होता है और नित्य कर्मों का अनुष्ठान न करने से प्रत्यवाय होता है। अतः काम्य एवं निषिद्ध कर्मों का त्याग तथा नित्यकर्मों का अनुष्ठान मोक्ष की द्विविध साधना है। अतः प्रभाकर ज्ञानकर्मसमुच्चयवादी हैं। मोक्ष आत्मा की स्वाभाविक अवस्था है। इस अवस्था में ज्ञान, सुख, दुःख आदि गुणों का नाश हो जाता है। अर्थात् मोक्ष की अवस्था में आनन्द का अनुभव भी नहीं होता। बिना मानो हम कुमारिल का मोक्षविषयक मत प्रभाकर से भिन्न है। कुमारिल दुःखरहित परमात्मप्राप्ति की अवस्था को मोक्ष कहते हैं। भाट्टमत के कुछ आचार्यों के अनुसार कुमारिल मुक्ति में आनन्द की अनुभूति मानते हैं। प्रभाकर मुक्ति की अवस्था में ज्ञान, सुख, दुःख आदि गुणों का पूर्ण नाश मानते हैं किन्तु भाट्टमत में ये गुण शक्ति रूप में तब भी विद्यमान रहते हैं। कुमारिल भी ज्ञानकर्मसमुच्चयवादी हैं और मुक्ति के लिये आत्मज्ञान के साथ-साथ नित्यकर्मों के अनवरत अनुष्ठान को आवश्यक साधन मानते हैं। आत्मा का ज्ञान क्रत्वर्थ और पुरुषार्थ दोनों है। आत्मा को शरीर से भिन्न जाने वाले की ही प्रवृत्ति यज्ञ में होती है और आत्मज्ञान से ही उसकी काम्य एवं निषिद्ध कर्मों में अप्रीति तथा संचित संस्कारों का नाश होने से मोक्षरूपी पुरुषार्थ की प्राप्ति होती है। कुमारिल का मोक्षविषयक मत श्लोकवार्तिक के सम्बन्धाक्षेपपरिहार खण्ड में संगृहीत है। शिकााल मिर र मीमांसा और अन्य दर्शन- मीमांसा दर्शन ही संभवतः वह प्रथम दर्शन है, जिसने सन्दिग्ध तत्त्वों का निर्णय करने के लिए अधिकरण प्रणाली का सृजन किया है, इन अधिकरणों की ही आगे चलकर ‘न्याय’ संज्ञा पड़ी, और अधिकरणों के ही विषय, संशय, प्रयोजन के आधार पर न्याय के प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण, उपनय और निगमन इन पांच अंगों की स्थापना की गई। जिल्लामा १ खात्यन्तसमटे सति प्रागात्मवर्तिनःEIRE MENTRIES RSS सुखस्य मनसा भुक्तिर्मुक्तिरुक्ता कुमारिलैः ।। मानमेयोदय, पृष्ठ- २१२ २. मोक्षार्थी न प्रवर्तेत तत्र काम्यनिषिद्धयोः। नित्यनैमित्तिके कुर्यात् प्रत्यवायजिघांसया।। तत्र ज्ञातात्मतत्त्वानां भोगात्पूर्वक्रियाक्षये। उत्तरप्रचयाभावात् देहो नोत्पद्यते पुनः।। कर्मजन्योपभोगार्थ शरीरं न प्रवर्तते। तदभावे न कश्चिद्धि हेतुस्तत्रावतिष्ठते।। तस्मात्कर्मक्षयादेव हेत्वभावेन मुच्यते। ४२८ न्याय-खण्ड मि

  • मीमांसा को नैयायिकों ने अत्यन्त उच्च स्थान दिया है, उनका कथन है- पूजित विचारवचनो हि मीमांसा शब्दः।’ मीमांसकों ने बौद्धमत के निराकरण के लिए जिस शैली को अपनाया, वही नैयायिकों का आदर्शमार्ग है। मीमांसकों ने वेद की प्रमाणता अक्षुण्ण रखने के लिए जिस वाद मार्ग का आश्रय लिया, वह दूसरे आस्तिक दर्शनों का सिद्धान्त बन गया। कणाद और अक्षपाद ने तो अपने-अपने सूत्रों में ‘तद्वचनादाम्नायस्य प्रामाण्यम्’ तथा ‘मन्त्रायुर्वेद प्रामाण्यवच्च तत्प्रामाण्यमाप्तप्रामाण्यम्" पूर्वोत्तर पक्षों की विशद शैली पर वेद की प्रमाणता स्थापित की है। वैदिक सिद्धान्त और संस्कृति का रक्षण मीमांसक एवं नैयायिक दोनों को अभीष्ट है। प्रमेयनिरूपण में नैयायिकों का मीमांसकों से विशेष मतभेद नहीं है। वस्तुतः नैयायिक एवं मीमांसक एक दूसरे के पोषक हैं, क्योंकि एक में प्रमेयनिरूपण प्रधान है और दूसरे में प्रमाणनिरूपण। मीमांसकों में भाट्टमत छ: और प्रभाकर पाँच प्रमाण मानते हैं। नैयायिकों ने चार प्रमाणों में ही उनका समावेश बतलाया है। न शब्द को मीमांसकों ने नित्य माना है, जबकि नैयायिकों ने शब्द को अनित्य सिद्ध करने का महत्प्रयास किया है। मीमांसकों ने शब्द की शक्ति जाति में मानी है, क्योंकि अर्थ के अनित्य होने पर वेद में पौरुषेयत्व मानना पड़ता है, किन्तु नैयायिक शब्द की शक्ति जाति और व्यक्ति दोनों में मानते हैं और वेद को ईश्वर की रचना मानते हैं। कि वैशेषिक दर्शन के ‘अथातो धर्म व्याख्यास्यामः’, यतोऽभ्युदयनिःश्रेयसप्राप्तिः स धर्मः’ ये आरम्भिक सूत्र धर्म का प्रतिपादन करते हैं अतः धर्मस्वरूप-प्रतिपादन में वैशेषिक दर्शन मीमांसा पर आधृत प्रतीत होता है केवल धर्म में प्रमाणभूत वेद का प्रामाण्य अपौरुषेयतया न मानकर ईश्वरप्रणीततया माना है। सांख्य और योग दोनों के दार्शनिक सिद्धान्त प्रायः एक समान है। मीमांसा के कर्मभाग का निराकरण करते हुए ईश्वरकृष्ण ने कहा है कि कर्मकाण्ड के द्वारा दुःखों का आत्यन्तिक प्रतीकार नहीं किया जा सकता और न सुख की प्राप्ति ही की जा सकती है। सांख्ययोग आत्मा को नितान्त निर्लिप्त, असंग एवं अकर्ता मानता है। फिर वह किसी कर्म का अधिकारी कैसे बन सकता है? प्रत्युत अधिकार विरुद्ध ही आत्मा का स्वरूप है। अतः सांख्ययोग कर्ममार्ग का यथाशक्ति खण्डन करता है। योग दर्शन में वेद प्रतिपादित होमादि कर्म को आध्यात्मिक रूप दिया गया है। वेदान्तदर्शन भी एक प्रकार से मीमांसादर्शन ही है, किन्तु वेदान्ती पूर्वमीमांसा से इस वेदान्त या उत्तरमीमांसा की एकवाक्यता नहीं स्वीकार करते हैं। इसीलिए महर्षि व्यास ने १. तात्पर्य टीका 9191१, पृष्ठ-६१ २. वैशेषिक दर्शन १०।२। ३. न्यायसूत्र २।१६८ ४. तद्वचमादाम्नायस्य प्रामाण्यम्। वै० सू० ११३ पृष्ठ-१ ५. दृष्टवदानुश्रविकः स ध्यविशुद्धिक्षयातिशययुक्तः। सां०का० २ ६. अपाने जुह्वति प्राणम्। गीता ४२६ मीमांसा दर्शन का इतिहास ४२६ ‘अथातो ब्रह्मजिज्ञासा’ सूत्र से अपने शास्त्र का नूतन प्रारम्भ सूचित किया है। पूर्वमीमांसा का विषय कर्मकाण्ड के वाक्यों का विचार करना और उत्तरमीमांसा (वेदान्त) का विषय ब्रह्मकाण्ड के वाक्यों का विचार करना है। पूर्वमीमांसा का प्रतिपाद्य विषय धर्म है और उत्तरमीमांसा का ब्रह्म। धर्म का ज्ञान होने पर कर्मानुष्ठान में प्रवृत्ति और प्रवृत्ति के आधार पर जन्म-मरण-परम्परा का प्रवाह उपस्थित होता है, यह पूर्वमीमांसा का सिद्धान्त है। ब्रह्म के ज्ञान मात्र से सर्वथा प्रवृत्तिमार्ग का उच्छेद संसार की आत्यन्तिक निवृत्ति और मोक्षप्राप्ति होती है, यह उत्तरमीमांसा को अभिमत है। इतना होने पर भी दोनों की विचारशैलियों के अध्ययन से यह स्पष्ट है कि एक शास्त्र दूसरे की प्रतिकृति है। वेदान्तियों का ‘व्यवहारे भाट्टनयः’ यह उद्घोष कुमारिल भट्ट के आदर्श को स्पष्टतः स्वीकार करने का प्रमाण है। __शावर भाष्य में बौद्ध दर्शन के निरालम्बनवाद और शून्यवाद की चर्चा है। ये दोनों वाद विज्ञानवाद के ही अंग है। विज्ञानवादी बौद्ध ज्ञान को प्रत्यक्ष मानकर विषय का अपलाप करना पक्ष है। भट्ट मीमांसक ने इस पक्ष का खण्डन करके ज्ञान को अनुमेय और विषय को प्रत्यक्ष मानकर वाह्यवस्तु (पदार्थ) के अस्तित्व का समर्थन किया है। इसी प्रकार मीमांसकों ने बौद्धों के अपोहवाद का भी खण्डन किया है। विभिन्न प्रस्थान प्रवर्तक कुमारिल और प्रभाकर ने बौद्धमत का खण्डन किया है, यह श्लाघनीय है क्योंकि उन खण्डनों का आज तक समाधान नहीं हो पाया है। जानकार १. ब्रह्मसूत्र १ २. विशेष द्रष्टव्य, मीमांसादर्शन का विवेचनात्मक इतिहास, पृष्ठ २२७-२३० ला न्याय-खण्डमा ४३० FRIMADI Pी भी