२९ राम-रावण-युद्ध, रावण-वध, सर्वत्र जयध्वनि

मूल (चौपाई)

इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा।
निज सारथि सन खीझन लागा॥
सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही।
धिग धिग अधम मंदमति तोही॥

अनुवाद (हिन्दी)

यहाँ आधी रातको रावण (मूर्च्छासे) जगा और अपने सारथिपर रुष्ट होकर कहने लगा—अरे मूर्ख! तूने मुझे रणभूमिसे अलग कर दिया। अरे अधम! अरे मन्दबुद्धि! तुझे धिक्‍कार है, धिक्‍कार है!॥४॥

मूल (चौपाई)

तेहिं पद गहि बहु बिधि समुझावा।
भोरु भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा॥
सुनि आगवनु दसानन केरा।
कपि दल खरभर भयउ घनेरा॥

अनुवाद (हिन्दी)

सारथिने चरण पकड़कर रावणको बहुत प्रकारसे समझाया। सबेरा होते ही वह रथपर चढ़कर फिर दौड़ा। रावणका आना सुनकर वानरोंकी सेनामें बड़ी खलबली मच गयी॥ ५॥

मूल (चौपाई)

जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी।
धाए कटकटाइ भट भारी॥

अनुवाद (हिन्दी)

वे भारी योद्धा जहाँ-तहाँसे पर्वत और वृक्ष उखाड़कर (क्रोधसे) दाँत कटकटाकर दौड़े॥ ६॥

छंद

मूल (दोहा)

धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा।
अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा॥
बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो।
चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु ब्याकुल कियो॥

अनुवाद (हिन्दी)

विकट और विकराल वानर-भालू हाथोंमें पर्वत लिये दौड़े। वे अत्यन्त क्रोध करके प्रहार करते हैं। उनके मारनेसे राक्षस भाग चले। बलवान् वानरोंने शत्रुकी सेनाको विचलित करके फिर रावणको घेर लिया। चारों ओरसे चपेटे मारकर और नखोंसे शरीर विदीर्णकर वानरोंने उसको व्याकुल कर दिया।

दोहा

मूल (दोहा)

देखि महा मर्कट प्रबल रावन कीन्ह बिचार।
अंतरहित होइ निमिष महुँ कृत माया बिस्तार॥ १००॥

अनुवाद (हिन्दी)

वानरोंको बड़ा ही प्रबल देखकर रावणने विचार किया और अन्तर्धान होकर क्षणभरमें उसने माया फैलायी॥ १००॥

छंद

मूल (दोहा)

जब कीन्ह तेहिं पाषंड।
भए प्रगट जंतु प्रचंड।
बेताल भूत पिसाच।
कर धरें धनु नाराच॥ १॥

अनुवाद (हिन्दी)

जब उसने पाखण्ड (माया) रचा, तब भयङ्कर जीव प्रकट हो गये। बेताल, भूत और पिशाच हाथोंमें धनुष-बाण लिये प्रकट हुए!॥ १॥

मूल (दोहा)

जोगिनि गहें करबाल।
एक हाथ मनुज कपाल।
करि सद्य सोनित पान।
नाचहिं करहिं बहु गान॥ २॥

अनुवाद (हिन्दी)

योगिनियाँ एक हाथमें तलवार और दूसरे हाथमें मनुष्यकी खोपड़ी लिये ताजा खून पीकर नाचने और बहुत तरहके गीत गाने लगीं॥ २॥

मूल (दोहा)

धरु मारु बोलहिं घोर।
रहि पूरि धुनि चहुँ ओर।
मुख बाइ धावहिं खान।
तब लगे कीस परान॥ ३॥

अनुवाद (हिन्दी)

वे ‘पकड़ो, मारो’ आदि घोर शब्द बोल रही हैं। चारों ओर (सब दिशाओंमें) यह ध्वनि भर गयी। वे मुख फैलाकर खाने दौड़ती हैं। तब वानर भागने लगे॥ ३॥

मूल (दोहा)

जहँ जाहिं मर्कट भागि।
तहँ बरत देखहिं आगि।
भए बिकल बानर भालु।
पुनि लाग बरषै बालु॥ ४॥

अनुवाद (हिन्दी)

वानर भागकर जहाँ भी जाते हैं, वहीं आग जलती देखते हैं। वानर-भालू व्याकुल हो गये। फिर रावण बालू बरसाने लगा॥ ४॥

मूल (दोहा)

जहँ तहँ थकित करि कीस।
गर्जेउ बहुरि दससीस।
लछिमन कपीस समेत।
भए सकल बीर अचेत॥ ५॥

अनुवाद (हिन्दी)

वानरोंको जहाँ-तहाँ थकित (शिथिल) कर रावण फिर गरजा। लक्ष्मणजी और सुग्रीवसहित सभी वीर अचेत हो गये॥ ५॥

मूल (दोहा)

हा राम हा रघुनाथ।
कहि सुभट मीजहिं हाथ।
एहि बिधि सकल बल तोरि।
तेहिं कीन्ह कपट बहोरि॥ ६॥

अनुवाद (हिन्दी)

हा राम! हा रघुनाथ! पुकारते हुए श्रेष्ठ योद्धा अपने हाथ मलते (पछताते) हैं। इस प्रकार सबका बल तोड़कर रावणने फिर दूसरी माया रची॥ ६॥

मूल (दोहा)

प्रगटेसि बिपुल हनुमान।
धाए गहे पाषान।
तिन्ह रामु घेरे जाइ।
चहुँ दिसि बरूथ बनाइ॥ ७॥

अनुवाद (हिन्दी)

उसने बहुत-से हनुमान् प्रकट किये, जो पत्थर लिये दौड़े। उन्होंने चारों ओर दल बनाकर श्रीरामचन्द्रजीको जा घेरा॥ ७॥

मूल (दोहा)

मारहु धरहु जनि जाइ।
कटकटहिं पूँछ उठाइ।
दहँ दिसि लँगूर बिराज।
तेहिं मध्य कोसलराज॥ ८॥

अनुवाद (हिन्दी)

वे पूँछ उठाकर कटकटाते हुए पुकारने लगे, ‘मारो, पकड़ो, जाने न पावे।’ उनके लंगूर (पूँछ) दसों दिशाओंमें शोभा दे रहे हैं और उनके बीचमें कोसलराज श्रीरामजी हैं॥ ८॥

छंद

मूल (दोहा)

तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही।
जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही॥
प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी।
रघुबीर एकहिं तीर कोपि निमेष महुँ माया हरी॥

अनुवाद (हिन्दी)

उनके बीचमें कोसलराजका सुन्दर श्याम शरीर ऐसी शोभा पा रहा है, मानो ऊँचे तमाल वृक्षके लिये अनेक इन्द्रधनुषोंकी श्रेष्ठ बाड़ (घेरा) बनायी गयी हो। प्रभुको देखकर देवता हर्ष और विषादयुक्त हृदयसे ‘जय, जय, जय’ ऐसा बोलने लगे। तब श्रीरघुवीरने क्रोध करके एक ही बाणसे निमेषमात्रमें रावणकी सारी माया हर ली॥ १॥

मूल (दोहा)

माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे।
सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे॥
श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं।
सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं॥

अनुवाद (हिन्दी)

माया दूर हो जानेपर वानर-भालू हर्षित हुए और वृक्ष तथा पर्वत ले-लेकर सब लौट पडे़। श्रीरामजीने बाणोंके समूह छोडे़, जिनसे रावणके हाथ और सिर फिर कट-कटकर पृथ्वीपर गिर पड़े। श्रीरामजी और रावणके युद्धका चरित्र यदि सैकड़ों शेष, सरस्वती, वेद और कवि अनेक कल्पोंतक गाते रहें, तो भी वे उसका पार नहीं पा सकते॥ २॥

दोहा

मूल (दोहा)

ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास।
जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़इ अकास॥ १०१क॥

अनुवाद (हिन्दी)

उसी चरित्रके कुछ गुणगण मन्दबुद्धि तुलसीदासने कहे हैं, जैसे मक्खी भी अपने पुरुषार्थके अनुसार आकाशमें उड़ती है॥ १०१(क)॥

मूल (दोहा)

काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस।
प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस॥ १०१ख ॥

अनुवाद (हिन्दी)

सिर और भुजाएँ बहुत बार काटी गयीं। फिर भी वीर रावण मरता नहीं। प्रभु तो खेल कर रहे हैं; परन्तु मुनि, सिद्ध और देवता उस क्लेशको देखकर (प्रभुको क्लेश पाते समझकर) व्याकुल हैं॥ १०१(ख)॥

मूल (चौपाई)

काटत बढ़हिं सीस समुदाई।
जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई॥
मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा।
राम बिभीषन तन तब देखा॥

अनुवाद (हिन्दी)

काटते ही सिरोंका समूह बढ़ जाता है जैसे प्रत्येक लाभपर लोभ बढ़ता है। शत्रु मरता नहीं और परिश्रम बहुत हुआ। तब श्रीरामचन्द्रजीने विभीषणकी ओर देखा॥ १॥

मूल (चौपाई)

उमा काल मर जाकीं ईछा।
सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा॥
सुनु सरबग्य चराचर नायक।
प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक॥

अनुवाद (हिन्दी)

(शिवजी कहते हैं—) हे उमा! जिसकी इच्छामात्रसे काल भी मर जाता है, वही प्रभु सेवककी प्रीतिकी परीक्षा ले रहे हैं। (विभीषणजीने कहा—) हे सर्वज्ञ! हे चराचरके स्वामी! हे शरणागतके पालन करनेवाले! हे देवता और मुनियोंको सुख देनेवाले! सुनिये—॥ २॥

मूल (चौपाई)

नाभिकुंड पियूष बस याकें।
नाथ जिअत रावनु बल ताकें॥
सुनत बिभीषन बचन कृपाला।
हरषि गहे कर बान कराला॥

अनुवाद (हिन्दी)

इसके नाभिकुण्डमें अमृतका निवास है। हे नाथ! रावण उसीके बलपर जीता है। विभीषणके वचन सुनते ही कृपालु श्रीरघुनाथजीने हर्षित होकर हाथमें विकराल बाण लिये॥ ३॥

मूल (चौपाई)

असुभ होन लागे तब नाना।
रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना॥
बोलहिं खग जग आरति हेतू।
प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू॥

अनुवाद (हिन्दी)

उस समय नाना प्रकारके अशकुन होने लगे। बहुत-से गदहे, स्यार और कुत्ते रोने लगे। जगत् के दुःख (अशुभ) को सूचित करनेके लिये पक्षी बोलने लगे। आकाशमें जहाँ-तहाँ केतु (पुच्छल तारे) प्रकट हो गये॥ ४॥

मूल (चौपाई)

दस दिसि दाह होन अति लागा।
भयउ परब बिनु रबि उपरागा॥
मंदोदरि उर कंपति भारी।
प्रतिमा स्रवहिं नयन मग बारी॥

अनुवाद (हिन्दी)

दसों दिशाओंमें अत्यन्त दाह होने लगा (आग लगने लगी)। बिना ही पर्व (योग) के सूर्यग्रहण होने लगा। मन्दोदरीका हृदय बहुत काँपने लगा। मूर्तियाँ नेत्र-मार्गसे जल बहाने लगीं॥ ५॥

छंद

मूल (दोहा)

प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही।
बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही॥
उतपात अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहिं जय जए।
सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए॥

अनुवाद (हिन्दी)

मूर्तियाँ रोने लगीं, आकाशसे वज्रपात होने लगे, अत्यन्त प्रचण्ड वायु बहने लगी, पृथ्वी हिलने लगी, बादल रक्त, बाल और धूलकी वर्षा करने लगे। इस प्रकार इतने अधिक अमङ्गल होने लगे कि उनको कौन कह सकता है? अपरिमित उत्पात देखकर आकाशमें देवता व्याकुल होकर जय-जय पुकार उठे। देवताओंको भयभीत जानकर कृपालु श्रीरघुनाथजी धनुषपर बाण सन्धान करने लगे।

दोहा

मूल (दोहा)

खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस।
रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥ १०२॥

अनुवाद (हिन्दी)

कानोंतक धनुषको खींचकर श्रीरघुनाथजीने इकतीस बाण छोड़े। वे श्रीरामचन्द्रजीके बाण ऐसे चले मानो कालसर्प हों॥ १०२॥

मूल (चौपाई)

सायक एक नाभि सर सोषा।
अपर लगे भुज सिर करि रोषा॥
लै सिर बाहु चले नाराचा।
सिर भुज हीन रुंड महि नाचा॥

अनुवाद (हिन्दी)

एक बाणने नाभिके अमृतकुण्डको सोख लिया। दूसरे तीस बाण कोप करके उसके सिरों और भुजाओंमें लगे। बाण सिरों और भुजाओंको लेकर चले। सिरों और भुजाओंसे रहित रुण्ड (धड़) पृथ्वीपर नाचने लगा॥ १॥

मूल (चौपाई)

धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा।
तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा॥
गर्जेउ मरत घोर रव भारी।
कहाँ रामु रन हतौं पचारी॥

अनुवाद (हिन्दी)

धड़ प्रचण्ड वेगसे दौड़ता है, जिससे धरती धँसने लगी। तब प्रभुने बाण मारकर उसके दो टुकड़े कर दिये। मरते समय रावण बड़े घोर शब्दसे गरजकर बोला राम कहाँ हैं? मैं ललकारकर उनको युद्धमें मारूँ!॥ २॥

मूल (चौपाई)

डोली भूमि गिरत दसकंधर।
छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर॥
धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई।
चापि भालु मर्कट समुदाई॥

अनुवाद (हिन्दी)

रावणके गिरते ही पृथ्वी हिल गयी। समुद्र, नदियाँ, दिशाओंके हाथी और पर्वत क्षुब्ध हो उठे। रावण धड़के दोनों टुकड़ोंको फैलाकर भालू और वानरोंके समुदायको दबाता हुआ पृथ्वीपर गिर पड़ा॥ ३॥

मूल (चौपाई)

मंदोदरि आगें भुज सीसा।
धरि सर चले जहाँ जगदीसा॥
प्रबिसे सब निषंग महुँ जाई।
देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई॥

अनुवाद (हिन्दी)

रावणकी भुजाओं और सिरोंको मन्दोदरीके सामने रखकर राम-बाण वहाँ चले, जहाँ जगदीश्वर श्रीरामजी थे। सब बाण जाकर तरकसमें प्रवेश कर गये। यह देखकर देवताओंने नगाडे़ बजाये॥ ४॥

मूल (चौपाई)

तासु तेज समान प्रभु आनन।
हरषे देखि संभु चतुरानन॥
जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा।
जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा॥

अनुवाद (हिन्दी)

रावणका तेज प्रभुके मुखमें समा गया। यह देखकर शिवजी और ब्रह्माजी हर्षित हुए। ब्रह्माण्डभरमें जय-जयकी ध्वनि भर गयी। प्रबल भुजदण्डोंवाले श्रीरघुवीरकी जय हो॥ ५॥

मूल (चौपाई)

बरषहिं सुमन देव मुनि बृंदा।
जय कृपाल जय जयति मुकुंदा॥

अनुवाद (हिन्दी)

देवता और मुनियोंके समूह फूल बरसाते हैं और कहते हैं—कृपालुकी जय हो, मुकुन्दकी जय हो, जय हो!॥ ६॥

छंद

मूल (दोहा)

जय कृपा कंद मुकुंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो।
खल दल बिदारन परम कारन कारुनीक सदा बिभो॥
सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुभि गहगही।
संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही॥

अनुवाद (हिन्दी)

हे कृपाके कन्द! हे मोक्षदाता मुकुन्द! हे (राग-द्वेष, हर्ष-शोक, जन्म-मृत्यु आदि) द्वन्द्वोंके हरनेवाले! हे शरणागतको सुख देनेवाले प्रभो! हे दुष्ट-दलको विदीर्ण करनेवाले! हे कारणोंके भी परम कारण! हे सदा करुणा करनेवाले! हे सर्वव्यापक विभो! आपकी जय हो। देवता हर्षमें भरे हुए पुष्प बरसाते हैं, घमाघम नगाडे़ बज रहे हैं। रणभूमिमें श्रीरामचन्द्रजीके अङ्गोंने बहुत-से कामदेवोंकी शोभा प्राप्त की॥ १॥

मूल (दोहा)

सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं।
जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उडुगन भ्राजहीं॥
भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने।
जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने॥

अनुवाद (हिन्दी)

सिरपर जटाओंका मुकुट है, जिसके बीच-बीचमें अत्यन्त मनोहर पुष्प शोभा दे रहे हैं। मानो नीले पर्वतपर बिजलीके समूहसहित नक्षत्र सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामजी अपने भुजदण्डोंसे बाण और धनुष फिरा रहे हैं। शरीरपर रुधिरके कण अत्यन्त सुन्दर लगते हैं। मानो तमालके वृक्षपर बहुत-सी ललमुनियाँ चिड़ियाँ अपने महान् सुखमें मग्न हुई निश्चल बैठी हों॥ २॥

दोहा

मूल (दोहा)

कृपादृष्टि करि बृष्टि प्रभु अभय किए सुर बृंद।
भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकुंद॥ १०३॥

अनुवाद (हिन्दी)

प्रभु श्रीरामचन्द्रजीने कृपादृष्टिकी वर्षा करके देवसमूहको निर्भय कर दिया। वानर-भालू सब हर्षित हुए और सुखधाम मुकुन्दकी जय हो, ऐसा पुकारने लगे॥ १०३॥

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